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संसार में शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ आत्मिक पीड़ा भी है। आत्मिक पीड़ा पाप और परमेश्वर से अलगाव का परिणाम है, जबकि शारीरिक पीड़ा किसी शारीरिक रोग या चोट से आती है। सब जीवित प्राणी अपनी इन्द्रियों के विकास के अनुपात में दुःख उठाते हैं, परन्तु उतनी मात्रा में नहीं जितना मनुष्य, जिसकी भावनाएँ और ऊँची बौद्धिक शक्तियाँ दुःख उठाने की उसकी क्षमता को बहुत अधिक बढ़ा देती हैं; क्योंकि जब कभी वह कल्पना करता है कि उसे पीड़ा है, तो उसके वास्तविक कष्ट उसी मात्रा में बढ़ जाते हैं।
साधारणतः शिकारी पक्षियों और पशुओं के दाँत, पंजे और चोंचें ऐसी होती हैं कि उनके शिकार का उनसे बच निकलना लगभग असम्भव होता है; इसलिए शिकार अत्यधिक पीड़ा के बिना तुरन्त मारा जाता है, और उस दुःख से बच जाता है जो घायल होकर बच निकलने पर होता। फिर, साँपों और विषैले कीड़ों का विष लहू में पहुँचकर ऐसी सुन्नता उत्पन्न करता है कि मृत्यु पीड़ा के बिना हो जाती है। प्रकृति में, कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, मृत्यु साधारणतः किसी अत्यधिक पीड़ा के बिना होती है, क्योंकि मृत्यु के समय शिकार, या तो विष के प्रभाव से या घाव के धक्के से, केवल अर्ध-चेतन होते हैं। संक्षेप में, उनकी दशा वास्तव में उतनी बुरी नहीं जितनी हम प्रायः कल्पना करते हैं; परन्तु जो पीड़ा और दुःख शारीरिक या आत्मिक बुराई का परिणाम है, वह सचमुच अत्यन्त यातनापूर्ण है।
पीड़ा और दुःख प्रायः हमारे जीवन की आत्मिक उन्नति और बढ़ोतरी के लिए आवश्यक होते हैं, और परमेश्वर की यह इच्छा नहीं कि हम सदा उनसे बचे रहें। बहुत-सी वस्तुएँ स्वाद में कड़वी और बुरी लगती हैं, जो वास्तव में हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। हम यहाँ तक कह सकते हैं कि हर विष और हर अरुचिकर कड़वी वस्तु किसी-न-किसी रोग में औषधि या अचूक दवा का काम करती है। उनके वास्तविक औषधीय गुणों से अनजान होने के कारण हम उन्हें विष कहते हैं; परन्तु परमेश्वर ने हर वस्तु को किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए रचा है, और अपने उद्देश्य के लिए वे पर्याप्त हैं; परन्तु क्योंकि हम उनके ठीक प्रयोग से अनजान हैं, इसलिए उनका हमारा उपयोग प्रायः हानि में समाप्त होता है। और परमेश्वर ने कोई ऐसी वस्तु नहीं रची जो अपने आप में हानिकारक या बुरी हो, या जो ठीक से उपयोग किए जाने पर उसके किसी भी प्राणी को हानि पहुँचा सके। इसी प्रकार सब पीड़ा और दुःख आत्मिक जीवनों के बढ़ने और गहरे होने का साधन है (रोमियों 7:18)। हमारे जीवनों में विषैले और हानिकारक प्रभाव परमेश्वर द्वारा दी गई शक्तियों और क्षमताओं के विकृत उपयोग से, परन्तु विशेषकर आज्ञा न मानने से उत्पन्न होते हैं।
पीड़ा और दुःख न केवल मनुष्य को उसकी आत्मिक दशा के प्रति जगाने का सबसे उपयोगी साधन है, बल्कि उनके लिए भी लाभदायक है जो उसके संकट में उसकी सहायता कर रहे हैं, क्योंकि इससे उन्हें भी उन विशिष्ट गुणों के अभ्यास का अवसर मिलता है जो सिद्धता की ओर उनकी अपनी बढ़ोतरी के लिए आवश्यक हैं। और सच्ची विजय यह नहीं कि हम पीड़ा और दुःख या मृत्यु और बुराई से बचा लिए जाएँ, बल्कि यह कि परमेश्वर के अनुग्रह से हम पीड़ा को चैन में, क्रूस और मृत्यु को जीवन में, और बुराई को भलाई में बदल दें। केवल इसी कारण हम इस युद्ध और संघर्ष में धकेले गए हैं, क्योंकि “हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा” (प्रेरितों के काम 14:22)। पीड़ा को जाने बिना चैन का, कड़वाहट चखे बिना मिठास का, बुराई देखे बिना भलाई का, यहाँ तक कि मृत्यु से गुज़रे बिना जीवन का वास्तविक मूल्य नहीं समझा जा सकता। इसलिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसके साथ उसके राज्य में प्रवेश करके अनन्तकाल तक उसका आनन्द लेने से पहले हम इन सब से गुज़र चुके हों, और अपने अनुभव से अनन्तकाल के लिए एक सबक सीख चुके हों।
मोती के धीरे-धीरे बनने से पहले सीप को बड़ा दुःख उठाना पड़ता है। “सीप, या नेकर, किसी जीवित वस्तु — किसी छेद करने वाले परजीवी, किसी कीड़े, या किसी छोटी मछली — या रेत के किसी कण, या किसी अन्य अजैव पदार्थ के घुस आने से यातना पाकर, और अपने आप को मुक्त करने का कोई साधन न होने के कारण, वह घोंघा विवश होकर उस चुभने वाले पदार्थ को सुन्दरता की वस्तु में बदलकर निष्प्रभावी कर देता है।” मोती पीड़ा और दुःख की उपज हैं; फिर भी उपेक्षा किए जाने पर उनकी चमक नष्ट हो जाती है। “उनका आकर्षण, जो सतह पर प्रकाश के एक विशेष खेल के कारण है, चिकनाई, स्याही, या ऐसे ही पदार्थों के सम्पर्क से नष्ट हो सकता है।” कभी-कभी प्राचीन कब्रों में मोती शव के साथ रख दिए गए, परन्तु वे भी सड़ गए और अपनी धूल मरे हुओं के साथ मिला दी। इसलिए पीड़ा से जन्मे मोती के समान, आत्मिक जीवन भी पीड़ा और दुःख के बिना सुन्दर नहीं बन सकता। और जब हम सुन्दरता की उस अवस्था तक पहुँच भी जाते हैं, तब भी यह भय बना रहता है कि यदि हम दीन और धन्यवादी हृदयों के साथ प्रेम में सदा प्रभु से लिपटे न रहें, तो हम उस ऊँची अवस्था से गिर जाएँगे, और अपनी चमक खो देंगे (1 कुरिन्थियों 10:12)। इसलिए हमारे लिए सदा जागते रहना और प्रार्थना करते रहना आवश्यक है।
जैसे हीरे और दूसरे बहुमूल्य पत्थर अपनी सुन्दरता की सिद्धता तक पहुँचने से पहले प्रकृति की प्रयोगशाला में गर्मी और ठंड और दबाव में लाखों वर्षों से गुज़रते हैं, वैसे ही सिद्ध किए जाने से पहले हमें पीड़ा और दुःख से गुज़रना होगा। और यद्यपि रसायनशास्त्री कृत्रिम रीति से हीरे और दूसरे बहुमूल्य पत्थर बना सकते हैं, फिर भी जब हम उन पर सावधानी से परीक्षण करते हैं, तो उनके दोष दिखाई देते हैं। इसलिए हम एक ही दिन में ऐसी सिद्धता तक नहीं पहुँच सकते कि हम में कोई दोष न रहे; परन्तु अपने स्वर्गीय पिता के निकट और उसकी उपस्थिति में निरन्तर रहकर, हम वैसे ही सिद्ध बन जाएँगे जैसा वह सिद्ध है।
वर्षा और आँधी-तूफ़ान विनाशकारी लग सकते हैं, फिर भी वे वास्तव में छिपी हुई आशीषें हैं, क्योंकि वे महामारियों और रोगों के हर प्रकार के घातक कीटाणुओं को साफ़ कर देते हैं और हमें स्वास्थ्य देते हैं। इसी प्रकार पवित्र आत्मा की हवा (यूहन्ना 3:8), और पीड़ा और दुःख के तूफ़ान का धक्का, हमारे लिए आत्मिक स्वास्थ्य और आशीष लाते हैं।
फिर, सूर्य की गर्मी जल की भाप को ऊपर खींचकर बादल बनाती है, जो वर्षा के रूप में हमारे पास लौट आते हैं; इसी प्रकार धार्मिकता का सूर्य भी जीवन के जल की उन धाराओं को हमारे आत्मिक जीवनों में बहाकर हमें जीवन देता है।
बहुत-से लोग नहीं जानते कि इस संसार में और अगले संसार में हृदय की लालसा केवल परमेश्वर में ही पूरी हो सकती है। उनमें से कुछ — दार्शनिक भी और अनैतिक और अपराधी भी — जब संसार में किसी प्रकार की तृप्ति पाने में असफल रहे, तो निराश हो गए और अपने प्राण लेकर सब कुछ समाप्त करने का प्रयत्न किया। इसके बिलकुल विपरीत छोर पर हम सच्चे मसीही विश्वासियों को देखते हैं। वे इस संसार में बहुत दुःख उठाते हैं, क्योंकि वे अपने आत्मिक अनुभव में जितना ऊँचे बढ़ते हैं, उतनी ही बड़ी कठिनाइयाँ उठ खड़ी होती हैं। सांसारिक मन वाला मनुष्य इसे बिलकुल नहीं समझता, इसलिए उनकी सहायता करने के बजाय वह प्रायः उनका विरोध करता और उन्हें सताता है। फिर भी वे निराशा की आत्महत्या तक नहीं पहुँचते, क्योंकि अपनी सांसारिक महत्वाकांक्षाओं का इनकार करने के कार्य में ही वे परमेश्वर के साथ संगति में शान्ति पाते हैं। परन्तु यद्यपि मनुष्य की सब आत्मिक लालसाएँ परमेश्वर में तृप्त हो जाती हैं, फिर भी वह अपने संगी मनुष्यों की मित्रता और सहानुभूति के लिए तरसता है; और जहाँ सामाजिक संगति की यह स्वाभाविक इच्छा पूरी नहीं होती, वहाँ मसीह, जो परमेश्वर भी है और मनुष्य भी, उसके सामाजिक और आत्मिक दोनों स्वभावों की लालसाओं को पूरा करता है। क्योंकि मनुष्य की कठिनाइयों और दुःखों के विषय में उसकी समझ केवल उसके ईश्वरीय स्वभाव से ही नहीं, बल्कि उसके व्यक्तिगत अनुभव से उत्पन्न होती है, जब उसने स्वयं मनुष्य के रूप में दुःख उठाया; और यही अनुभव उसे अब मनुष्यों की सब व्याकुल सन्तानों को सिद्ध सहायता और सहानुभूति देने में समर्थ बनाता है।
इस संसार में आत्मिक मन वाले मनुष्य दुःख उठाते हैं (2 तीमुथियुस 3:12), क्योंकि उन्हें ऐसे लोग गलत समझते हैं जो सत्य को सराह नहीं पाते, और जिनके स्वभाव टेढ़े हो गए हैं, और जिनकी आत्मिक परख उनमें बसे पाप के कारण सुन्न हो गई है। जब इस वर्ग के मनुष्य किसी भले मनुष्य से मिलते हैं, तो वे पाते हैं कि उसका स्वभाव उनके स्वभावों से मेल नहीं खाता, और वे स्वाभाविक रूप से उसके प्रति विरोधी रवैया अपनाने को प्रेरित होते हैं। परन्तु वह मनुष्य, जिसकी भावनाएँ और विवेक परमेश्वर के प्रति जीवित हैं, किसी समान मन वाले मनुष्य के सम्पर्क में आने पर उसमें बसे परमेश्वर के जीवन को पहचान लेता है और उसकी ओर खिंच जाता है।
सच्चे मसीही का जीवन चन्दन की लकड़ी के समान है, जो उसे काटने वाली कुल्हाड़ी को भी बिना कोई हानि पहुँचाए अपनी सुगन्ध दे देती है। हेनरी सूसो को परमेश्वर की यह चेतावनी, “तुझे सबके सामने अपने अच्छे नाम की हानि उठानी पड़ेगी, और जहाँ तू प्रेम और विश्वासयोग्यता की आशा करेगा, वहाँ तुझे विश्वासघात और दुःख मिलेगा,” अनगिनत मसीहियों के अनुभव में दोहराई गई है। इस संसार में, जहाँ सब भक्त भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों को, और स्वयं प्रभु को भी, दुःख उठाना पड़ा है, यदि कोई दुःख से बचना चाहे, तो उसे सत्य का इनकार करना होगा, और परमेश्वर से अपना मुँह फेरकर संसार से मित्रता करनी होगी। दूसरी ओर, स्वयं प्रभु के साथ “उसके दुःखों में सहभागी होने” का सम्मान (फिलिप्पियों 3:10) एक बड़ा सौभाग्य है। अन्त में, जब ठहराया हुआ समय आएगा, तो जो सचमुच अपने प्रभु के दुःखों में सहभागी होता है, वह अनन्त महिमा में प्रवेश करेगा, और उसके साथ राज्य करेगा (2 तीमुथियुस 2:12)।
अपने ठहराए हुए लक्ष्य तक पहुँचने से पहले हमें पीड़ा, दुःख, और परीक्षा से गुज़रना होगा। ये सब अवस्थाएँ हमारे आत्मिक जीवनों की बढ़ोतरी और हमारे भविष्य के कल्याण के लिए आवश्यक हैं, इसलिए परमेश्वर की इच्छा है कि हम इनसे गुज़रें। यदि यह हमारे लिए परमेश्वर की योजना न होती, तो वह हमसे इसकी माँग न करता। परन्तु यदि वह माँग करता है, तो हम कौन हैं कि उसका विरोध करें? इससे अधिक कुछ कहने को नहीं। जो कुछ हमारे भाग में आए, उसे हमें प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए, और अपने हृदयों में किसी प्रकार के सन्देह को स्थान नहीं देना चाहिए, जो हमारे और परमेश्वर के बीच दीवार खड़ी करके उसकी उपस्थिति और संगति का आनन्द लेने की हमारी क्षमता को नष्ट कर देता है।
जब तक हम संसार में हैं, हमें पीड़ा और दुःख सहना होगा। मधुमक्खी केवल मधु ही इकट्ठा नहीं करती: किसी अपने विशेष उद्देश्य के लिए उसके पास डंक भी है। सुन्दर और सुगन्धित गुलाब पर काँटे बिना उद्देश्य के नहीं लगाए गए। पौलुस के शरीर का काँटा भी किसी बड़ी और बुद्धिमान योजना की पूर्ति के लिए दिया गया था। यह भी बहुत आवश्यक है कि हम उस अनन्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए, जिसके लिए हम रचे गए हैं, इन परीक्षा के समयों से गुज़रें।
