उपदेश 5 / 11

त्रिएकता के बाद पाँचवाँ रविवार

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

जैसे-जैसे सुसमाचार आगे बढ़ता है, वह अपने साथ दरिद्रता, और उसके साथ भूख, नंगापन और अभाव भी लाता है।

परन्तु अन्त में, जब शैतान की आँधियाँ कुछ थम जाती हैं, और संसार का लोभ और उसकी भूख तृप्त हो जाती है,

तब मसीह आता है और घोषणा करता है कि वह भी पृथ्वी का प्रभु है।

क्योंकि भजन संहिता 24:1 में लिखा है: "पृथ्वी और जो कुछ उसमें है यहोवा ही का है," इत्यादि।

"तू ने सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया है; सब भेड़-बकरी और गाय-बैल, और जितने वनपशु हैं, आकाश के पक्षी और समुद्र की मछलियाँ।" ये सब हमारे प्रभु की आज्ञा मानने को बाध्य हैं, और उसके राजदण्ड के आगे झुकने को बाध्य हैं, ताकि संसार आखिरकार उसे और उसके लोगों को अपने भोजन में भागी होने से रोक न सके।

33. परन्तु, जैसा मैंने कहा है, पहले हमें भूख और अभाव सहना ही होगा, अर्थात् पतरस की खाली नाव और खाली जाल, वहाँ भी जहाँ बहुत देर तक परिश्रम किया गया हो। फिर भी मसीह ऐसी परीक्षा के बाद अपने दानों को और भी अधिक भरपूर कर देता है; केवल एक टब भर नहीं, जिससे चेले सन्तुष्ट हो जाते, वरन् पूरा जाल भर, और दोनों खाली नावें भर।

वह यह इसलिए करता है कि उसकी आत्मिक सहायता पर उनका विश्वास इसके द्वारा दृढ़ हो जाए।

वह यह चिन्ह पतरस को और उन दूसरों को दिखाता है जिन्हें वह अपने प्रेरित होने के लिए बुलाना चाहता है; केवल इसलिए नहीं कि वे विश्वास करें कि वह उनके शरीर की चिन्ता करेगा, वरन् इसलिए कि वह उनकी प्रेरिताई की बुलाहट में उन्हें ऐसा दृढ़ करेगा और ऐसी सहायता देगा कि वह व्यर्थ या निष्फल सिद्ध न हो।

भाग II. आत्मिक संकट और संघर्ष। 34. इस सुसमाचार का दूसरा भाग विवेक के भीतरी संकट और संघर्ष की महान शिक्षा प्रस्तुत करता है, और यह बताता है कि उसके बीच हमारी सच्ची शान्ति क्या है। जब पतरस ने मसीह का यह अद्भुत काम और उससे उत्पन्न हुई बहुतायत देखी, तभी उसने सोचना आरम्भ किया कि यह आश्चर्यकर्मी किस प्रकार का पुरुष होगा, और उसकी तुलना में वह स्वयं किस प्रकार का मनुष्य है।

इस बड़ी आशीष में से उस पर ऐसा बड़ा संकट आ पड़ता है जैसा उसने किसी भी शारीरिक अभाव से कभी अनुभव नहीं किया था।

अब वह ऐसा पूर्ण रूप से दरिद्र और निराश्रय हो जाता है कि

भय के मारे वह लगभग भूमि पर गिर पड़ता है और मसीह से विनती करता है कि वह उसके पास से चला जाए। वह अपनी अयोग्यता और अपने पापों को अनुभव करने लगा है।

वह यह मानने और विलाप करने को विवश है कि वह एक दीन पापी है।

35. पतरस को एक दूसरा ही मनुष्य बनना है; और उसमें मछलियों के उस बड़े झुंड से भी बड़ा आश्चर्यकर्म होना है।

जो उपदेश मसीह ने पहले नाव में से दिया था, उसका प्रभाव अब पहली बार उस पर पड़ने लगा।

उसने दूसरों के साथ इससे पहले भी मसीह की बातें सुनी तो थीं, परन्तु उसने उसके व्यक्तित्व के स्वरूप पर कोई ध्यान नहीं दिया था। उसने उससे कोई सांसारिक या अनन्त भलाई पाने की बात नहीं सोची थी; और न वह अब तक अपने पापों के कारण काँपने लगा था।

परन्तु अब जब पतरस उस आश्चर्यकर्म और आशीष को देखता है, और इस घटना के द्वारा समझ लेता है कि यह यीशु किस प्रकार का पुरुष है, तो वह एक ओर आशीष और उस व्यक्ति की महानता पर, और दूसरी ओर अपनी अयोग्यता की सीमा पर ठोकर खाता है। वह अपने पापों के कारण काँपता है।

उसका हृदय उससे कहता है कि वह इतनी बड़ी कृपा के योग्य नहीं, वरन् वह परमेश्वर के क्रोध और अप्रसन्नता के कहीं अधिक योग्य है। अब वह चिन्ता और भय से भर जाता है; सांसारिक दरिद्रता या जीविका के साधनों के विषय में नहीं, क्योंकि जो कुछ उसे चाहिए था वह उसे मिल चुका है; वरन् इस विषय में कि वह परमेश्वर के सामने और इस पुरुष के सामने कैसे खड़ा रह सकेगा, जिसने उस जैसे अयोग्य और पापी मनुष्य पर इतनी बड़ी कृपा दिखाई है।

36. इस प्रकार मसीह पतरस को अनन्त भली वस्तुओं में आत्मिक रूप से धनी बनाना आरम्भ करता है, ताकि वह उन्हें दूसरों को, हाँ, सारे संसार को बाँट सके। जैसे पिछली बार हुआ था, वैसे ही उसे पहले आत्मिक भूख और संकट, अर्थात् विवेक का आतंक और वेदना, अनुभव करनी होगी, इससे पहले कि वह क्षमा और शान्ति तक पहुँच सके।

नाव और संसार उसके लिए बहुत सँकरे हो गए हैं।

वह नहीं जानता कि मसीह से भागकर कहाँ जाए, जबकि उसने मसीह को भयानक नहीं, वरन् मित्रवत् और सहायक पाया है।

37. यहाँ तुम देखते हो कि विवेक कितना दीन और दयनीय होता है जब वह सचमुच अपने पापों को अनुभव करने लगता है। वह कैसे काँपता है!

जब परमेश्वर निकट आता है तो वह उससे बचने के लिए कैसे भागता है, मानो वह सौ संसारों के पार भाग जाना चाहता हो!

[आदम ने अदन की वाटिका में] छिप जाने की सोची, जब परमेश्वर ने कृपापूर्वक पूछा:

"आदम, तू कहाँ है?"

ऐसा हृदय और विवेक इतना संकोची और डरपोक होता है कि वह अपने आप से ही डर जाता है, और खड़खड़ाते पत्ते से ऐसे भागता है जैसे गर्जन और बिजली से।

वह व्यवस्था के न्याय को सह नहीं सकता, जो उसके पापों और परमेश्वर के अनन्त क्रोध को प्रकट करता है। और यहाँ किसी मनुष्य को उन उपकारों का स्मरण दिलाकर शान्ति देना कुछ काम नहीं आता जो परमेश्वर ने अतीत में उस पर किए हैं।

इससे वह और भी अधिक भयभीत होता है, क्योंकि इससे उसे यह बोध होता है कि अपनी कृतघ्नता और पापों के कारण वह और भी बड़े क्रोध के योग्य है।

38. हाँ, जिन्होंने विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह की शान्ति पहले ही पा ली है, उन्हें भी इस परीक्षा और भय से सदा संघर्ष करना पड़ता है। क्योंकि उसकी भलाई और उसका अनुग्रह अत्यन्त महान और अभिभूत करनेवाले हैं। दूसरी ओर, हमारा हृदय, अपनी अयोग्यता को अनुभव करते और उस पर विचार करते हुए, ऐसी बड़ी भलाई और दया को थामने और समझने के लिए बहुत ही सँकरा और निर्बल है। इस पर वह केवल विस्मय से भर जाता है।

इसलिए परमेश्वर इन बातों को सीधे-सादे वचनों के नीचे और बड़ी निर्बलता के नीचे ढाँककर और छिपाकर हम पर अपनी दया प्रकट करता है।

39. परन्तु हमारे स्वभाव की दुष्टता ऐसी भयानक है कि जब मसीह अपने अनुग्रह और शान्ति के साथ हमारे पास आता है, तब भी हम अपने उद्धारकर्ता से कतराते और भागते हैं, जबकि हमें चाहिए था कि नंगे और नंगे पाँव ही सही, पृथ्वी की छोर तक उसके पीछे दौड़ते।

हम इधर-उधर मुड़ते और ऐंठते हैं, और अपने ही कर्मों का सहारा लेते हैं, और चाहते हैं कि पहले अपने ही प्रयत्नों से अपने आप को शुद्ध करें और इतना योग्य बना लें कि ऐसे अनुग्रहकारी

इसी प्रकार पतरस प्रभु से दूर भागकर शान्ति ढूँढ़ने और पाप से बचने की सोचता है। वह पहले अपने आप में कुछ ऐसा खोजता है जो उसे मसीह के पास आने के योग्य बनाए, परन्तु इससे वह और भी गहरे आतंक और निराशा में गिरता जाता है, जब तक कि उद्धारकर्ता अपने वचन के द्वारा उसे फिर से उठा नहीं लेता।

40. यह सब वहाँ होता है, और होना ही चाहिए, जहाँ केवल व्यवस्था ही सिखाई और समझी जाती है, और जहाँ सुसमाचार के द्वारा मसीह को ठीक-ठीक और पूर्ण रूप से नहीं जाना जाता।

व्यवस्था का ज्ञान स्वभाव ही से हर मनुष्य के हृदय में लिखा और रोपा गया है, जैसा संत पौलुस रोमियों में कहता है।

व्यवस्था हमें सिखाती है कि हमें क्या करना है, और हमें आज्ञा न मानने का दोषी ठहराती है।

वह यह अनेक रीतियों से करती है; केवल दण्ड और परमेश्वर के क्रोध के भयानक चिन्हों और अनुभूतियों के द्वारा ही नहीं, वरन् प्रभु के उन विविध दानों और कामों के द्वारा भी जो मनुष्य की आँखों और कानों के सामने आते हैं, और उसे उस पाप और ईश्वरीय क्रोध की ओर संकेत करते हैं जो परमेश्वर का तिरस्कार और उसकी आज्ञा न मानने में उन दानों के दुरुपयोग के पीछे-पीछे आते हैं। इससे वह यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि जो परमेश्वर के दानों और उपकारों के लिए उसके कृतघ्न हैं, वे उसके क्रोध और दण्ड की आज्ञा के योग्य हैं।

41. परमेश्वर के सब उपकार, जब वे हृदय को छूते हैं, सचमुच पश्चाताप के लिए जीवित उपदेश हैं, जो मनुष्य को अपने पापों को मानने तक ले आते हैं और उसे उनसे डरनेवाला बनाते हैं; जैसा संत पौलुस रोमियों 2:4 में उस अपश्चातापी, कठोर कपटी से कहता है:

"क्या तू उसकी भलाई, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? और क्या यह नहीं समझता कि परमेश्वर की भलाई तुझे पश्चाताप की ओर ले जाती है?"

42. इसलिए हमारे व्यवस्था-विरोधी (एन्टीनोमियन) जो इस उदाहरण पर बाज़ीगरी के करतब दिखाते हैं, उनमें कुछ दम नहीं, जब वे कहते हैं कि पश्चाताप का प्रचार और अभ्यास व्यवस्था के द्वारा नहीं, वरन् सुसमाचार के द्वारा, या जैसा वे कहते हैं, पुत्र के प्रकाशन के द्वारा होना चाहिए। वे इन दोनों भागों का उचित क्रम उलट देते हैं, अर्थात् अनुग्रह के प्रकाशन और क्रोध के प्रकाशन का, मानो हमें पहले अनुग्रह के द्वारा शान्ति का प्रचार करना हो और उसके बाद क्रोध के द्वारा भयभीत करना हो।

यह इन लोगों की ओर से एक अन्धे और मूर्खतापूर्ण बहाने के सिवा और कुछ नहीं।

उन्हें न क्रोध की, न अनुग्रह की, न पश्चाताप की कुछ समझ है, और वे नहीं जानते कि विवेक को शान्ति कैसे दी जाए।

43. पाप और परमेश्वर के क्रोध का सारा प्रचार व्यवस्था का प्रचार है, चाहे वह किसी भी रीति से या किसी भी समय किया जाए। दूसरी ओर, सुसमाचार ऐसा प्रचार है जो मसीह में केवल अनुग्रह और क्षमा ही प्रस्तुत करता और प्रदान करता है।

और फिर भी यह सत्य है कि प्रेरितों और सुसमाचार के प्रचारकों ने व्यवस्था के प्रचार को मान्यता दी, जैसा स्वयं मसीह ने किया, और उन लोगों के विषय में इसी से आरम्भ किया जिन्होंने अब तक अपने पापों को नहीं माना था और कोई भय अनुभव नहीं किया था

परमेश्वर के क्रोध का। इसी प्रकार हमारा प्रभु यूहन्ना 16:8 में कहता है: "वह सहायक जब आएगा, तो संसार को पाप के विषय में निरुत्तर करेगा," इत्यादि।

हाँ, परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के दुःखभोग और मृत्यु से बढ़कर परमेश्वर के क्रोध का और कौन-सा गम्भीर और भयानक प्रमाण और प्रचार हो सकता है?

जब तक केवल परमेश्वर का क्रोध ही प्रचार किया जाता है और मनुष्यों को भयभीत किया जाता है, तब तक वह सुसमाचार का प्रचार नहीं है, और न मसीह का अपना प्रचार है, वरन् अपश्चातापियों के लिए मूसा और व्यवस्था का प्रचार है। क्योंकि सुसमाचार और मसीह न तो भयभीत करने या दोषी ठहराने के लिए ठहराए गए और न दिए गए, वरन् उन्हें शान्ति देने और उठाने के लिए जो डरे हुए और हताश हैं।

और इससे यह निकलता है कि जिस मनुष्य के हृदय पर मसीह के दुःखभोग की ठीक-ठीक छाप पड़ी है, वह अपने आप ही उनमें पाप के विरुद्ध परमेश्वर के असहनीय क्रोध को देखेगा और अनुभव करेगा, और इसके द्वारा ऐसे भय से मारा जाएगा कि संसार उसके लिए बहुत सँकरा हो जाएगा। संत बर्नार्ड गवाही देता है कि जैसे ही उसे [मसीह] के दुःखभोग की सही समझ मिली, उसका यही अनुभव हुआ। वह कहता है: "हाय, मैं समझता था कि मैं सुरक्षित हूँ!

मैं उस न्याय और क्रोध के विषय में कुछ नहीं जानता था जो मुझ पर आ पड़ा था, जब तक मैंने यह न देखा कि परमेश्वर के एकलौते पुत्र को मेरा स्थान लेना पड़ा," इत्यादि।

यह विचार इतना भयानक है कि नरक में पड़े दण्डित लोगों को भी परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु के इस दर्शन से, जिसके लाभ वे खो चुके हैं, बड़ी कोई पीड़ा, परमेश्वर के क्रोध और दण्ड की इससे बड़ी कोई अनुभूति नहीं हो सकती।

विश्वासघाती यहूदा, क्योंकि उसने प्रभु यीशु की प्रेमपूर्ण चेतावनियों और समझाने पर ध्यान न दिया, और यह विचार न करना चाहा कि वह उसके साथ कैसा व्यवहार कर रहा है, अन्त में इस दर्शन से ऐसे आतंक में पड़ गया कि उसने स्वयं को ही व्यवस्था और दण्ड का प्रचार किया, यह कहकर:

"मैं ने निर्दोष को घात के लिए पकड़वाकर पाप किया है," इत्यादि, मत्ती 27:4।

44. इसी प्रकार पतरस अपने पापों और परमेश्वर के क्रोध के विषय में स्वयं को व्यवस्था का प्रचार करता है, और अपने प्रति मसीह की बड़ी कृपा को अपना मूलपाठ बनाता है।

इस कृपा से वह परमेश्वर के सामने अपनी अयोग्यता के कारण क्रोध और आतंक के सिवा और कुछ नहीं निकाल पाता। क्योंकि अब तक उसके हृदय में व्यवस्था की समझ के सिवा और कोई समझ नहीं है, जो

व्यवस्था यह दिखाती है कि परमेश्वर पाप का बैरी है और उसे दण्ड देगा।

वह अब तक मसीह के उस अनुग्रह से अनजान है जो सुसमाचार के द्वारा सब पापियों को सेंत-मेंत दिया जाता है। इस अनुग्रह तक वह पहुँच ही नहीं सकता था, वरन् अपने आतंक के बीच निराश हो गया होता, यदि मसीह ने एक और उपदेश न दिया होता जिसके द्वारा उसने उसे शान्ति दी और उठा लिया। क्योंकि कोई मनुष्य अपने आप से इस शिक्षा को न पकड़ सकता है, न उसकी समझ तक पहुँच सकता है, जब तक कि सुसमाचार के वचन के द्वारा पवित्र

आत्मा का प्रकाशन न हो।

45. इसलिए वे मूर्ख लोग बिल्कुल गलत हैं जो यह दावा करते हैं कि नये नियम के युग में व्यवस्था का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए, या यह कि मनुष्यों को अनुग्रह का प्रचार कर देने के बाद ही सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर के क्रोध से भयभीत किया जाए।

क्योंकि यह निश्चित है कि सुसमाचार कोई क्रोध प्रचार नहीं करता; और न वह भय और वेदना उत्पन्न करता है।

जब वह आता है, तो विवेकों को शान्ति देने के लिए आता है।

पवित्रशास्त्र में हर जगह जो क्रम बताया और माना गया है वह यह है कि व्यवस्था के प्रचार या अनुभव के द्वारा पहले सदा पाप को माना जाए और परमेश्वर के क्रोध का भय अनुभव किया जाए, इससे पहले कि क्षमा से उत्पन्न होनेवाली शान्ति मिल सके; इस क्रम का उद्देश्य यह है कि मनुष्य अनुग्रह की लालसा करने लगें और सुसमाचार की शान्ति पाने के योग्य बनाए जाएँ। इसलिए जिनमें अब तक परमेश्वर के क्रोध का कोई भय नहीं है, जो निश्चिन्त, कठोर और हठी हैं, उन्हें उस क्रोध की धमकियों और भयों के द्वारा कड़ाई से चेतावनी दी जानी चाहिए और पश्चाताप के लिए विवश किया जाना चाहिए; अर्थात् उन्हें कोई सुसमाचार नहीं, वरन् केवल व्यवस्था और मूसा का ही प्रचार किया जाए।

46. दूसरी ओर, उन लोगों को कोई व्यवस्था प्रचार नहीं की जानी चाहिए जिनके हृदय में उसने अपना उद्देश्य पूरा कर दिया है, यहाँ तक कि अपने पापों का बोध होने से वे भयभीत, हताश और डरे हुए हो गए हैं। ऐसे लोगों को सुसमाचार और उसकी शान्ति के सिवा और कुछ प्रचार नहीं किया जाना चाहिए।

क्योंकि मसीह के आने का, और सब दीन पापियों को सुसमाचार प्रचार करने की उसकी आज्ञा का वास्तविक उद्देश्य यही है कि वे विश्वास करें कि वह व्यवस्था के सब दोषारोपणों, भयों और धमकियों को मिटा देता और दूर कर देता है, और उनके स्थान पर पूर्ण शान्ति रख देता है।

सुसमाचार में सिखाता है; और लूका 4:18 में, यशायाह 61:1 से उद्धृत करके, वह कहता है:

"प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिए कि उसने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिए मेरा अभिषेक किया है।"

इसलिए मैंने बहुधा कहा है कि जो विवेक शैतान के आक्रमणों और परमेश्वर के क्रोध के भय से व्याकुल हैं, उन पर मूसा को प्रभुता करने नहीं दी जानी चाहिए, वरन् उन्हें चाहिए कि मूसा को, सारी

व्यवस्था समेत, तुरन्त विदा कर दें और उसकी न सुनें।

47. परन्तु इसके अतिरिक्त, हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि व्यवस्था की शिक्षा को पूरी तरह हटाया नहीं जाना है, उनके विषय में भी नहीं जो मसीही हैं; क्योंकि मसीहियों को प्रतिदिन पश्चाताप में अपने आप को अभ्यस्त करना है, इसलिए कि वे अब भी उस शरीर में जीते हैं जो पापमय अभिलाषाओं से उभारा जाता है।

इसलिए पापों की क्षमा पा लेने के बाद भी उन्हें ऐसी शिक्षा और चेतावनी दी जानी चाहिए कि वे फिर से निश्चिन्तता की दशा में न गिर पड़ें, और न शरीर को आत्मा के विरुद्ध लड़ने का अवसर दें। गलातियों 5:13।

48. इस समय पतरस का अनुभव ऐसा ही है। अपने आतंक में उसे अब तक अनुग्रह या पापों की क्षमा का कोई प्रकाशन या ज्ञान नहीं है।

क्रोध का प्रकाशन उसमें काम कर रहा है, और यह उसे मसीह से भी भाग जाने को प्रेरित करता है; यदि वह उसे ठीक-ठीक जानता तो निश्चय ही ऐसा न करता।

परन्तु मसीह अब उसे एक सच्चा मसीही बनाने पर है; उसे विवेक की उस वास्तविक शान्ति का अनुभव कराने पर है जो व्यवस्था के आतंक पर जय पाती है और मनुष्य को पाप के दुःख से अनुग्रह और आनन्द में, मृत्यु से जीवन में, नरक से स्वर्ग में उठा ले जाती है।

इसलिए यह आवश्यक है कि वह पहले व्यवस्था की उस शक्ति का सच्चा स्वाद चखे जो मसीह के द्वारा नहीं, वरन् मूसा के द्वारा दस आज्ञाओं के माध्यम से जगाई और उत्पन्न की जाती है।

49. अब देखो, मसीह भयभीत हृदय और विवेक को कैसे प्रेम से शान्ति देता है।

वह कहता है: "मत डर; अब से तू मनुष्यों को पकड़ा करेगा।"

ऐसे सचमुच प्रेम भरे स्वर में उद्धारकर्ता उन सब से बोलता है जो अपने पापों के कारण भय और आतंक में हैं।

वह नहीं चाहता कि वे अब और भय और वेदना में बने रहें।

वह उनसे व्यवस्था का सारा भय दूर कर देता है, और उन्हें दिखाता है कि अपने पापों के कारण उन्हें उससे दूर नहीं, वरन् उसकी ओर भागना चाहिए, ताकि वे उसे उस प्रेमी उद्धारकर्ता के रूप में जानना सीखें जो इस संसार में दीन पापियों को ठुकराने नहीं, वरन् उन्हें अपनी ओर खींचने, और अपनी शान्ति और सहायता से उन्हें धनी और धन्य करने आया है।

इसलिए वह लूका 19:10 में कहता है: "मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।"

और 1 तीमुथियुस 1:15 में संत पौलुस कहता है: "मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।"

50. मसीह दीन, आतंकित पतरस को केवल उन प्रेम भरे वचनों के द्वारा ही शान्ति नहीं देता जिनमें वह उस पर अपना अनुग्रह और पाप-मोचन घोषित करता और उसे प्रदान करता है, वरन् वह इस शान्ति को उस बड़ी प्रतिज्ञा के द्वारा और भी दृढ़ करता है कि वह उसे ऐसी वस्तु देगा जो उस सब से कहीं बढ़कर है जो उसने अब तक उससे पाया है; और यह सब इसलिए कि पतरस समझे और अनुभव करे कि मसीह का हृदय और प्रेम कैसे उसकी ओर उमड़ता है।

मसीह कहता है, "अब से तू मनुष्यों को पकड़ा करेगा।"

पतरस को अपनी अयोग्यता और पापों के कारण घबराना नहीं है, यह अपने आप में भरपूर शान्ति और अनुग्रह है।

परन्तु उसे केवल अपने पापों की क्षमा ही नहीं मिलनी है, वरन् उसे यह भी जानना है कि परमेश्वर उसके द्वारा और भी बड़े काम करना चाहता है, अर्थात् उसे दूसरों के लिए सहायता और शान्ति का कारण बनाकर।

मसीह का आशय यह है:

"जो कुछ तू ने मछलियों के इस झुंड से प्राप्त किया है वह बहुत ही थोड़ा है; वास्तव में वह कुछ भी नहीं। अब से तुझे एक दूसरे ही प्रकार का मछुआ बनना है, एक दूसरे समुद्र में, एक दूसरे जाल और नाव के साथ।

क्योंकि मैं तुझे एक ऐसे काम में लगाने जा रहा हूँ जो 'मनुष्यों को पकड़ना' कहलाएगा; और इसका अर्थ यह है कि सारे संसार में तुझे आत्माओं को शैतान की शक्ति से खींचकर परमेश्वर के राज्य में लाना है। तब, पहली बार, तू ऐसा मनुष्य बनेगा जो दूसरों की सहायता कर सके, जैसे स्वयं तेरी सहायता की गई है।"

51. इस सुसमाचार से आओ, हम मसीह को और उसकी शान्ति की शक्ति को ठीक-ठीक पहचानें और थाम लें, ताकि हम अपने आप को और दूसरों को भी शान्ति दे सकें, और संकट और भय में पड़े विवेकों को सिखा सकें और स्मरण दिला सकें कि उन्हें किसी भी रीति से मसीह से दूर दौड़ना या भागना नहीं है, वरन् इसके विपरीत उसी की ओर भागना और उसकी शान्ति की बाट जोहनी है।

इस प्रकार दूर भागना, इस प्रकार डरना, अपने ही उद्धार और आनन्द को अपने से दूर भगाने के सिवा और कुछ नहीं। क्योंकि मसीह तुम्हें डराने नहीं, वरन् तुमसे तुम्हारे पाप और संकट को दूर करने आया है।

और न वह तुम्हें भगाने के लिए तुम्हारे निकट आता और तुम्हारे पीछे-पीछे आता है, वरन् इसलिए कि वह प्रेम से तुम्हें अपनी ओर खींच ले।

इसलिए तुम्हें उसे अपने से दूर धकेलकर उसका अनादर नहीं करना चाहिए।

और जो शान्ति वह तुम्हारे लिए लाता है, उसे तुम अपने भय और निराशा में न बदलो, वरन् पूरे भरोसे के साथ उसकी ओर दौड़ो।

तब तुम शीघ्र ही वे उत्साह देनेवाले और शान्तिदायक वचन सुनोगे जो वह तुम्हारे हृदय से, और सब व्याकुल विवेकों के हृदयों से कहता है, और जिनके द्वारा वह सब पापों का पाप-मोचन घोषित करता और सारा भय दूर कर देता है।

हाँ, वह तुम्हें और भी अधिक अनुग्रह देगा, अर्थात् तुम्हें अपने राज्य में ऐसा पवित्र, धन्य और उपयोगी मनुष्य बनाकर कि तुम दूसरों को शान्ति दे सको, और उन्हें उसके पास ला सको जो तुम्हारी ही तरह अब भय से भरे हैं और जिन्हें शान्ति और अनुग्रह की आवश्यकता है।

52. यहाँ तुम देखते हो कि मनुष्य आत्मिक दरिद्रता और संकट से कैसे छुड़ाया जाता है; अर्थात् कैसे वह मसीह के वचन के द्वारा पापों की क्षमा और विवेक की शान्ति, और उसके साथ अनुग्रह और आत्मिक दानों की बढ़ती पाता है, अपने किसी पुण्य या योग्यता के बिना, केवल मसीह के अनुग्रह के द्वारा।

इस बात में यह वैसा ही है जैसा मछलियों के झुंड का वह सांसारिक आश्चर्यकर्म था, जिसे चेलों ने अपने परिश्रम के बल पर प्राप्त नहीं किया, और जो उन्हें तब तक नहीं दिया गया जब तक उन्होंने व्यर्थ परिश्रम और संघर्ष न कर लिया और कुछ भी पकड़ने की आशा न छोड़ दी।

और फिर भी, जैसे मसीह उस अवसर पर उनके परिश्रम करने को मना नहीं करता, वरन् उन्हें आज्ञा देता है कि मछलियाँ पकड़ने के लिए अपने जाल डालें, वैसे ही अब वह कर्मों को समाप्त नहीं करता। यद्यपि पतरस अपने किए हुए कामों से अनुग्रह और क्षमा के योग्य नहीं ठहरता, वरन् क्षमा और अनुग्रह सेंत-मेंत पाता है, फिर भी प्रभु उसे सारे काम और प्रयत्न से छुट्टी नहीं देगा।

हाँ, वह उसे दूसरों तक वही आशीषें पहुँचाने का कर्तव्य और काम सौंपता है, और यह कर्तव्य सौंपते हुए उसे इस आश्वासन से शान्ति देता है कि आवश्यक शक्ति और आशीष भी साथ में दी जाएगी।

"क्योंकि," वह कहता है, "मैं तुझे बनाऊँगा एक इस प्रकार दोनों भाग ठीक-ठीक सिखाए जाते हैं, अर्थात् यह कि विश्वास अपने कर्मों के द्वारा कुछ भी अर्जित नहीं करता, और फिर भी यह कि वह परमेश्वर के वचन और आज्ञा के अनुसार अपने पद और बुलाहट में सब प्रकार के काम करता है।

भाग III. मछलियों के इस झुंड का आत्मिक अर्थ।

53. पतरस के मछलियों के झुंड के इस वृत्तान्त का अर्थ स्वयं मसीह सिखाता है जब वह कहता है:

"अब से तू मनुष्यों को पकड़ा करेगा।"

इसमें कलीसिया का आत्मिक शासन दर्शाया गया है, जो प्रचार के पद में निहित है।

समुद्र या जल संसार को दर्शाता है, मछलियाँ मनुष्यों को, जबकि प्रचार का बाहरी पद उस हाथ और जाल के द्वारा दर्शाया गया है जिससे मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।

क्योंकि जैसे जाल लहरों के बीच डाला जाता है, वैसे ही उपदेश मनुष्यों के बीच अपना मार्ग पाता है।

54. परन्तु प्रचार का यह पद दो प्रकार का है।

एक मसीह के बिना मनुष्यों को जीतना चाहता है।

यह व्यवस्था का प्रचार है, जो हमसे कर्मों के सिवा और कुछ नहीं माँगता; और या तो ऐसे घमण्डी संत बनाता है जो कुछ भी पूरा किए बिना जंगली और जलमय बीहड़ों में अपनी ही स्वच्छन्द, बेरोक-टोक राह चलना चाहते हैं, या फिर केवल उन विवेकों को भयभीत करता और भगा देता है जो कर्मों के बिना डरपोक और निर्बल हैं।

55. इसलिए पूरी रात (व्यवस्था की रात) का परिश्रम और प्रयत्न व्यर्थ और निष्फल ही सिद्ध होगा, जब तक मसीह दूसरे प्रकार के प्रचार के साथ न आए,—जब तक वह अपने साथ उस शान्तिदायक और आनन्द देनेवाले सुसमाचार का भोर और प्रकाशन न लाए जो परमेश्वर के अनुग्रह के ज्ञान से मनुष्यों के हृदयों को प्रकाशित करता है,—जब तक वह हमें मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल डालने की आज्ञा न दे।

जब यह उसके वचन और आज्ञा पर किया जाता है, तो बड़े और भरपूर फल उत्पन्न होते हैं।

तब मनुष्यों के हृदय मसीह में विश्वास की आज्ञाकारिता में आने को इच्छुक और तैयार होते हैं, हाँ, उसकी ओर बढ़ने के लिए धक्का-मुक्की तक करते हैं, और उसे पाने के लिए प्राण और अंग तक जोखिम में डालते हैं; जैसा मसीह [मत्ती 11:12] में कहता है: "यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के दिनों से अब तक स्वर्ग के राज्य पर ज़ोर होता रहा है, और बलवान उसे छीन लेते हैं।"

56. मछलियों का यह झुंड इतना बड़ा है कि अकेली एक नाव (जो अब तक यहूदी लोगों की कलीसिया को दर्शाती थी) न तो उसे खींचकर ऊपर ला सकती है और न उसे समाने लायक बड़ी है।

जो एक नाव में हैं उन्हें दूसरी नाव के अपने साथियों को संकेत करना पड़ता है कि आकर उनकी सहायता करें।

यह दूसरी नाव अन्यजातियों की सभा और कलीसिया है, जिसे प्रेरितों ने स्थापित किया और फैलाया है।

इस प्रकार दोनों नावें एक ही मछलियों के झुंड से भर गईं, अर्थात् एक ही प्रकार के प्रचार से, और उसी के अनुरूप विश्वास और अंगीकार से।

57. बड़े झुंड के कारण जाल फटने लगे, और कुछ मछलियाँ बाहर गिर पड़ीं।

ये वे हैं जो सच्चे नहीं हैं, और सुसमाचार में बने नहीं रहते, वरन् अपने आप को उससे बाहर फेंक देते हैं, और मसीह के अधीन होने के बजाय अपनी स्वच्छन्द और जंगली लहरों के बीच बने रहना अधिक पसन्द करते हैं।

इसी प्रकार बहुत से थे, विशेषकर यहूदियों में, जिन्होंने सुसमाचार की आज्ञा न मानी और उसका विरोध किया। ये, और वे सब दूसरे जो अपने ही पंथ और दल खड़े करते हैं, कलीसिया की सभा में परमेश्वर के लोगों की सच्ची मण्डली के साथ न तो बने रह सकते हैं और न बने रहने पाते हैं, वरन् अपने आप को निकम्मा प्रकट कर देते हैं।

इसलिए संत पौलुस 1 कुरिन्थियों 11:19 में कहता है:

"दलबन्दी भी तुम में अवश्य होगी, इसलिए कि जो लोग तुम में खरे निकले हैं वे प्रगट हो जाएँ।" इसलिए इन पंथों और दलों का अलग हो जाना अवश्य है, जबकि दूसरे जाल में से इकट्ठे करके दोनों नावों में रखे जाते हैं, जहाँ वे कलीसिया की और मसीह में विश्वास की एकता में ऐसे सुरक्षित रखे जाते हैं कि वे फिर अलग न हो जाएँ।

नहीं तो वे भी अन्त में उन दलों के साथ अलग हो जाने के जोखिम में पड़ते जिनके द्वारा वे बहकाए गए थे।

58. और जैसे जाल को पानी में डाले जाने से कष्ट उठाना पड़ता है और वह भीग जाता है, वैसे ही प्रचार के पद को संसार में सब प्रकार की परीक्षाओं और सतावों के द्वारा कष्ट उठाना पड़ता है, यहाँ तक कि वह फट और चिथड़ा हो जाए।

वह सब मनुष्यों में लाभदायक या फलदायक परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता; फिर भी जो दृढ़ बने रहते हैं और अन्त तक सुरक्षित रखे जाते हैं, उनमें बड़ी शक्ति और बहुत फल पाया जाता है।

तौभी हमारी शान्ति यह है कि मसीह हमारे प्रचार के द्वारा अपने लोगों को नाव में ले आएगा, और उन्हें वहाँ सुरक्षित रखेगा; यद्यपि हम जानते हैं कि जिन सब को हम प्रचार करते हैं उन सब को हम भक्त नहीं बना सकते, और अपने पद के कारण सताव से बच नहीं सकते; हाँ, यद्यपि हम जानते हैं कि बहुत से लोग अलग हो जाएँगे, उनमें से भी जिनके विषय में हमें निश्चय था कि वे हमारे जाल में हैं।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

मूलपाठ। मत्ती 5:20-26। क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।

तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि हत्या न करना, और जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई अपने भाई को निकम्मा (राका) कहेगा, वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे "अरे मूर्ख," वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा। इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा। जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग ही में है, उससे झटपट मेल मिलाप कर ले; कहीं ऐसा न हो कि मुद्दई तुझे न्यायी को सौंपे, और न्यायी तुझे सिपाही को सौंप दे, और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए।

मैं तुझ से सच कहता हूँ कि जब तक तू कौड़ी-कौड़ी भर न दे, तब तक वहाँ से छूटने न पाएगा।

पाँचवीं आज्ञा की व्याख्या। कर्म किसी भी रीति से किसी व्यक्ति को धर्मी नहीं बनाते 4. इस भाग के कारण क्या थे। 1-3।

कर्म कपटी उत्पन्न करते हैं, और मसीह की इस व्याख्या के लिए व्यवस्था निराशा उत्पन्न करती है। 18।

जब विवेक व्यवस्था से भयभीत हो तब उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए II. स्वयं व्याख्या। 19।

III. … द्वारा उठाई गई एक आपत्ति। A. [पहला भाग।] …

C. तीसरा भाग। 9।

कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो कर सके सांसारिक तलवार के विषय में, पाँचवीं आज्ञा का पालन। 5-10।

1. सांसारिक तलवार किन व्यक्तियों के बीच, और कहाँ चलाई जानी चाहिए कोई भी अपने कर्मों से कैसे और क्यों उद्धार नहीं पा सकता। 11।

D. चौथा और पाँचवाँ भाग।

2. उसे किस रीति से काम में लाना है, यह बताया गया है: 1. इन भागों का भाव और अर्थ। 12-14।

2. परमेश्वर कैसे और क्यों चाहता है b. सैक्सनी के निर्वाचक के कुलचिह्न और ढाल के विषय में। कि इन भागों का पालन किया जाए।

(1) इस कुलचिह्न 3. पोप-तन्त्र ने उनकी कितनी कम परवाह की। और ढाल का पहला भाग। 23-24। 16।

(2) दूसरा भाग। 25-27।

इस सुसमाचार का सारांश: 1. परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास के द्वारा है, और वही हृदय की धार्मिकता है।

बाहरी धार्मिकता, चाहे वह कितनी ही पवित्र और सुन्दर क्यों न दिखाई दे, कपटपूर्ण, धोखा देनेवाली धार्मिकता है।

2. प्रभु एक अच्छा पेड़ चाहता है, जिसके बिना फल अच्छा नहीं हो सकता।

3. यदि कोई हाथ से हत्या नहीं करता, और फिर भी उसी समय अपने हृदय में क्रोध पालता है, तो यह कपटपूर्ण, धोखा देनेवाली धार्मिकता है; परन्तु मसीही धार्मिकता यह माँगती है कि हम क्रोध न करें। ऐसा करने के लिए हमें निरन्तर परमेश्वर से अनुग्रह और क्षमा प्राप्त करनी चाहिए, और अपने आप को पापी मान लेना चाहिए, जो मसीही धार्मिकता का अंग है।

4. यदि हम अपने भाई से मेल न करें तो यह परमेश्वर को भाता नहीं।

यहाँ हम सब सीख सकते हैं कि वे भले काम कौन-से हैं जिन्हें परमेश्वर बड़ा मानता है।

1. यह सुसमाचार हमें सच्ची भक्ति और दिखावे, अर्थात् कपट, के बीच का अन्तर सिखाता है। और यह सिखाने के लिए यह सबसे अच्छे सुसमाचारों में से एक है कि हमारे कर्म हमें धर्मी नहीं बना सकते; उस सब से ऊँची किसी वस्तु की आवश्यकता है जो हम कर सकते हैं। क्योंकि फरीसी भी भक्ति का जीवन बिताते थे; बाहरी रूप से वे वही करते थे जो उन्हें करना चाहिए था; वे परमेश्वर की किसी आज्ञा को नहीं तोड़ते थे, पराई सम्पत्ति से दूर रहते थे, सुन्दर, भड़कीले वस्त्र पहनकर घूमते थे, और इसी से उन्हें अपना नाम मिला, अर्थात् वे फरीसी कहलाए, जिसका अर्थ है अलग किए हुए, या चुने हुए।

2. इसी प्रकार वह शास्त्रियों पर भी प्रहार करता है, जो यहूदियों के फूल थे, और परमेश्वर की व्यवस्था और पवित्रशास्त्र में इतने निपुण थे कि दूसरे लोगों को सिखाते, समाज के लिए नियम ठहराते और सब मामलों में निर्णय देते थे। संक्षेप में, यहाँ हमारे सामने यहूदियों में से सबसे अच्छे, सबसे विद्वान और सबसे भक्त लोग हैं। मसीह इन्हीं पर प्रहार करता है, जिन पर सब मनुष्यों में से उसे सबसे कम प्रहार करना चाहिए था। परन्तु वह उनके विषय में अपने चेलों से कहता है:

"यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।"

3. मानो वह कहता हो: देखो, फरीसी और शास्त्री ऐसा अच्छा जीवन बिताते हैं कि वे स्वयं और दूसरे लोग भी विश्वास करते हैं कि वे राज्य के अधिकारी होंगे; परन्तु वे लक्ष्य से बहुत दूर हैं।

इसलिए वह उन्हें डाँटता है और कहता है:

मैं तुम से सच कहता हूँ, यदि तुम शास्त्रियों और फरीसियों से अधिक धर्मी न बनोगे, तो तुम स्वर्ग में कभी प्रवेश न करोगे।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

यहाँ उन लोगों के प्रश्न का निपटारा हो जाता है जो पूछते हैं: धर्मी बनने के लिए हम क्या करें?

क्योंकि यहाँ वे सब कर्म जो मनुष्य कर सकता है, उलट दिए और निपटा दिए जाते हैं, और पवित्रता का ढोंग करनेवालों में से सबसे पवित्र भी भूमि पर गिरा दिए जाते हैं। इसलिए तुम ऐसा कोई काम नहीं कर सकते जिसके द्वारा कोई उद्धार पाए और पाप से छुड़ाया जाए।

यदि कोई मनुष्य अब यह कहे, तो वह निश्चय ही विधर्मी ठहरता है।

भाग I. इस व्याख्या का अवसर।

4. वे उस समय कह सकते थे: अच्छा, तू तो विधर्मी है; क्या तू भले कामों को ठुकराने जा रहा है? परन्तु वह इस पर कोई ध्यान नहीं देता, वरन् खुलकर यह निष्कर्ष निकालता है कि उनके कर्म शून्य हैं।

वे अब कह सकते थे: कृपया बताओ, यदि कर्म हमें पवित्र नहीं बनाते, तो हमारे पास वह व्यवस्था क्यों है जिसके द्वारा, यदि हम उसके अनुसार जीएँ, उद्धार पाने की हम आशा रखते हैं? यह बात अब मसीह को आज्ञाओं को सामने लाने, उनकी व्याख्या करने और हमें यह बताने का अवसर देती है कि उन्हें कैसे समझा जाए।

"तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि हत्या न करना, और जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई अपने भाई को निकम्मा (राका) कहेगा, वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे 'अरे मूर्ख,' वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।"

भाग II. व्याख्या।

5. ये वचन इतने ऊँचे और इतने गहरे हैं कि कोई भी उन्हें पूरी तरह व्यवहार में नहीं ला सकता। इसकी गवाही यहाँ केवल हमारा प्रभु ही नहीं देता, वरन् हर मनुष्य का अनुभव और उसकी अपनी भावनाएँ भी देती हैं।

यहाँ चार बातें प्रस्तुत की गई हैं, अर्थात्:

विचार, आचरण, वचन और कर्म; जिनसे कोई बच नहीं सकता; वह दोषी ठहरेगा ही।

मानो वह कहता हो: तुम्हें ऐसे लोग मिल सकते हैं जो अपने हाथों से हत्या नहीं करते; परन्तु बैर से रहित होना, क्रोध न करना, मुस्कुराते

चेहरे वाला होना, लोगों को झिड़कना नहीं—ऐसे स्वभाव का कोई नहीं मिलता।

अब, अनुभव यही सिखाता है।

6. क्योंकि किसी भक्त पुरुष या भक्त स्त्री को लो; जब तक हर कोई दूरी बनाए रखता है, तब तक शान्ति और मेल बना रहता है, परन्तु यदि कोई आ जाए जो कठोरता से बोले और शायद

दखल दे, चाहे वह छोटे से छोटा शब्द ही क्यों न हो, तो वह क्रोधित हुए बिना नहीं रह सकता; और इसके बाद वह अपराधी को चिढ़ाता और भड़काता है।

हमारी बुद्धि कभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकती कि हमें दुष्टों के प्रति भी विचारशील होना है।

अपनी सब अन्यजाति पुस्तकें पढ़ डालो, अपने ही अनुभव में उतरकर देखो, और तुम पाओगे कि ऐसा ही है: हम क्रोध करने से रुक नहीं सकते; यदि अपने मित्रों पर नहीं, तो अपने शत्रुओं पर।

अब परमेश्वर इससे सन्तुष्ट नहीं है, और न मेरा मांस और लहू इस प्रश्न से बच सकता है; क्योंकि शब्दों पर ध्यान से गौर करो जब वह कहता है, "तू हत्या न करना।" यह "तू" कौन है?

नहीं; वरन् तू, तू और जो कुछ तुझ में और तेरे साथ है; तेरा हाथ, हृदय और विचार हत्या न करें।

7. इस प्रकार मसीह अधिकार के साथ व्यवस्था की व्याख्या करता है, यह कहकर: "जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा।"

यह वचन सारे संसार पर लागू होता है, क्योंकि मैं पूछता हूँ: इस पृथ्वी पर कौन है जो इस आज्ञा का ऋणी न हो?

जब हमें इसका पालन करना है और हम कर नहीं सकते, तो हम क्या करें? क्योंकि हम उस मैल को कभी दूर नहीं कर सकते। तब निराशा ही हमारे भाग में आएगी, इस पर भरोसा रखो। इस प्रकार परमेश्वर की आज्ञाएँ केवल एक दर्पण हैं, जिसमें हम अपनी मलिनता और दुष्टता देखते हैं; क्योंकि वे हम सब को पाप के अधीन बन्द कर देती हैं, और हम अपने प्रयत्नों और स्वतन्त्र इच्छा से अपना मार्ग निकाल नहीं सकते, जब तक कोई और वस्तु हमारी सहायता को न आए। यह पहली बात है।

8. प्रभु आगे कहता है:

"जो कोई अपने भाई को राका कहेगा," जो क्रोध और बैर के विविध प्रदर्शनों को सूचित करता है। परन्तु इससे कोई भी मुक्त नहीं है। क्योंकि यदि मुझसे कहा जाए कि जिस व्यक्ति से मैं बैर रखता हूँ उसके प्रति मित्रभाव रखूँ, तो लोग मेरे विषय में भाँप लेंगे कि मेरा हृदय उसमें नहीं है। क्योंकि तुम हृदय को बाँधकर नहीं रख सकते; वह बाहर निकलेगा ही, और संकेतों या शब्दों के द्वारा अपनी उपस्थिति प्रकट करेगा।

वह अपने को छिपाता नहीं, और छिपाया भी नहीं जा सकता।

इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि हम राका कहने के दोषी पाए जाते हैं, अर्थात् मित्र और शत्रु दोनों के प्रति दयालु न होने के।

अब बीते अनुभवों पर दृष्टि डालो और इसे दूसरे लोगों में और अपने आप में देखो, अर्थात् यह कि कोई भी अपने आप को इस दशा से, इस दुष्ट हृदय से, जो मनुष्य के स्वभाव में इतनी गहराई से रोपा गया है, छुड़ा नहीं सकता।

अपने भाई के प्रति मित्रवत्; परन्तु तुम उसे अपना हृदय दे दो, यह तुम नहीं कर सकते, चाहे तुम अपने आप को टुकड़े-टुकड़े कर डालो। इसलिए यहाँ कोई मनुष्य अपनी सहायता नहीं कर सकता।

9. इसके बाद वह कहता है: "जो कोई कहे 'अरे मूर्ख,' वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।" यह भी परमेश्वर के अनुग्रह के बिना तुम्हें शून्य ठहराता है, क्योंकि कोई भी ऐसा प्रेम-करुणा से भरा नहीं कि कभी कोई अनुचित शब्द न बोले, यदि अपने मित्रों से नहीं तो अपने शत्रुओं से। जब तुम्हें विवश होकर अपने पड़ोसी से दयालुता से बोलना पड़ता है, तब भी तुम्हारा हृदय उसमें नहीं होता, और जब कभी तुम ऊपरी शिष्टता के साथ ऐसा कर सको, तुम कह ही दोगे, "अरे मूर्ख।"

यह तो पहले ही इस आज्ञा के विरुद्ध है, जो मित्र और शत्रु दोनों को समेटती है, क्योंकि उसमें लिखा है, "तेरा भाई।"

तुम जानते हो, हम सब भाई हैं, एक ही सामान्य पिता के वंशज, और पवित्रशास्त्र हमें इतना निकट ले आता है कि हम सब को एक ही मांस कहता है। यशायाह 58:7 में कहता है: "जब तू किसी को नंगा देखे, तो उसे वस्त्र पहनाए, और अपने ही मांस से अपने आप को न छिपाए।" यहाँ भविष्यद्वक्ता तुम्हारे पड़ोसी के विषय में बोल रहा है; और "मूर्ख" शब्द में हर प्रकार की बदनामी, कोसना, निन्दा, गाली-गलौज, दोष लगाना, बुराई करना और हर प्रकार की निन्दा-भर्त्सना समाई हुई है।

10. इससे स्पष्ट निकलता है कि हम सब इस आज्ञा के दोषी हैं: "तू हत्या न करना," और जो कोई परमेश्वर से नये सिरे से जन्मा नहीं, वह हत्या से बच नहीं सकता। चाहे वह स्वयं उस काम से रुका रहे, वह विचारों और झुकावों को दूर नहीं कर सकता; क्योंकि यदि हमारे शत्रु पर मृत्यु आ पड़े, तो हम कहने को तैयार रहते हैं: उसके साथ ठीक ही हुआ! और सिपाही उस शत्रु पर गीत रचते हैं जिसे उन्होंने मार डाला या भगा दिया। परन्तु यह फिर इस आज्ञा के विरुद्ध है, क्योंकि परमेश्वर बाहरी काम को नहीं, वरन् हृदय को देखता है। इसलिए इन शब्दों में बहुत कुछ समाया है: "तू हत्या न करना," मानो यह कहना हो:

तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना होगा और एक नई सृष्टि बनना होगा।

11. इसलिए सुसमाचार सदा इसी प्रश्न पर लौट आता है: मनुष्य क्या करे कि वह धर्मी बन जाए? क्योंकि जितनी देर चाहो प्रार्थना करो; जितनी देर चाहो उपवास करो; जितना चाहो दान दो; जितने चाहो मिस्सों के लिए पैसा दो और जितने चाहो गिरजाघर बनाओ; फिर भी तुम हत्यारे ही हो, क्योंकि तुम

अपने भाई से बैर रखते हो; तुम उसकी ओर न दया भरी दृष्टि डाल सकते हो, न दया भरा शब्द कह सकते हो। इससे निकलता है कि तुम्हारी धार्मिकता शून्य है; वह विनाश की है और विनाश से ही सम्बन्ध रखती है।

और अब हमारे सामने दो और बातें हैं जो लगभग पिछली बातों जितनी ही कठोर हैं। हम पढ़ते हैं:

"इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।

जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग ही में है, उससे झटपट मेल मिलाप कर ले; कहीं ऐसा न हो कि मुद्दई तुझे न्यायी को सौंपे, और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए।

मैं तुझ से सच कहता हूँ कि जब तक तू कौड़ी-कौड़ी भर न दे, तब तक वहाँ से छूटने न पाएगा।"

12. यहाँ दो बातें हैं जो हमारे स्वभाव के विरुद्ध जाती हैं। पहली:

जब मैं क्रोधित होऊँ, तो मेरे भाई को मुझे मनाना है।

जब मेरी भावनाओं को ठेस पहुँची हो, तो मुझे अपने भाई को क्षमा करना है, चाहे वह कोई क्षमा-याचना न करे; मुझे उसके प्रति दयालु हृदय रखना है, ताकि वह मुझे न्यायी को न सौंपे, जैसा तुमने अभी सुना।

इस अन्तिम भाग को पहले लोग इस सुसमाचार से अलग कर देते थे, और मेरा मानना है कि ऑगस्टीन ने अपने लेखन में ऐसा किया, जैसा उसकी पुस्तक "De Spiritu et Litera" (आत्मा और अक्षर के विषय में) से प्रकट होता है।

इस खण्ड का भाव इस प्रकार है:

13. यहाँ दो व्यक्ति हैं: जिसने ठेस पहुँचाई है उसे क्षमा माँगनी है।

दूसरे को, जिसे ठेस पहुँची है, प्रेम और प्रसन्नता से क्षमा करना है, चाहे उससे ऐसा करने को कहा भी न जाए। स्वभाव से हम दोनों में से कुछ भी नहीं कर सकते। हमारा स्वभाव हमें जाकर यह कहने को प्रेरित कर सकता है: मेरे प्रिय मित्र, मुझे क्षमा कर! परन्तु यह विवशता में, नरक और परमेश्वर के क्रोध के भय से करने पर, बैर तब भी हमारे हृदय में बना रहता है। दूसरी ओर, जिसे ठेस पहुँची है वह हृदय से क्षमा नहीं कर सकता; और जैसे एक क्षमा माँगने में कपट करता है, वैसे ही दूसरा क्षमा देने में।

परन्तु परमेश्वर के सामने इसका निश्चय ही कोई मूल्य नहीं, क्योंकि हमारा मूलपाठ यों कहता है: "इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।" और यह मेल-मिलाप हृदय से निकलना चाहिए; मूलपाठ के शब्दों पर भली-भाँति ध्यान दो।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

14. इस खण्ड का अर्थ यह है कि परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम पहले अपने भाई से मेल किए बिना आकर उसकी सेवा करो; "तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।"

"देख, हे मनुष्य, मैंने तुझे सृजा और छुड़ाया है; इसे पहचान, और अपना सारा जीवन अपने पड़ोसी की सेवा की ओर ढाल।

यदि नहीं, तो मेरी सेवा भी मत कर।

यदि तू एक काम (अपने पड़ोसी की सेवा) नहीं करेगा, जबकि उसकी आवश्यकता है, तो अच्छा होगा कि तुम दूसरा काम (मेरी सेवा) भी न करो, क्योंकि उसकी आवश्यकता नहीं है।" इस प्रकार परमेश्वर उस सेवा से वंचित होना कहीं अधिक पसन्द करेगा जो उसकी होती है, बजाय उस सेवा के जो तुम अपने पड़ोसी के ऋणी हो; और यदि तुम अपने पड़ोसी की सेवा की कीमत पर भक्त बनते हो, तो वह यह अधिक पसन्द करेगा कि तुम उसकी अपनी सेवा में कम कठोर रहो।

संक्षेप में, परमेश्वर चाहता है कि तुम पहले अपने पड़ोसी की सेवा और उसके हितों का ध्यान रखो।

15. अब, अपने पड़ोसी को हानि पहुँचाने के बहुत से तरीके हैं; जैसे, जब मैं भली-भाँति समर्थ होते हुए भी उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा नहीं करता; जब मैं उसके प्रति दयालु नहीं होता, या उसकी सहायता करने से चूक जाता हूँ; तो मैं पहले ही उसका विरोधी बन चुका हूँ।

इसलिए यदि मैं परमेश्वर को भाना चाहता हूँ, तो मुझे पहले अपने भाई से मेल करना होगा; नहीं तो मैं उसे प्रसन्न नहीं कर सकता। क्योंकि यदि पड़ोसी के प्रति उचित सेवा पूरी न की जाए, तो परमेश्वर अपनी की गई सेवा को ठुकरा देता है।

16. अब देखो, हमने अब तक कैसा जीवन बिताया है। हम संत याकूब के यहाँ, आखेन (ऐक्स-ला-शापेल) को, रोम को, यरूशलेम को जाते रहे हैं, गिरजाघर बनाते रहे हैं, मिस्सों के लिए पैसा देते रहे हैं, और इस सब के साथ अपने पड़ोसी को भूल गए हैं; यह तो अब उलटी बात है। परन्तु प्रभु यहाँ कहता है: जा, और वह पैसा जिससे तू गिरजाघर बनाने जा रहा था, ले जाकर अपने पड़ोसी को दे दे।

अपने पड़ोसी की ओर देखो कि तुम उसकी सेवा कैसे कर सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के लिए कभी कोई गिरजाघर न बनाओ, तो भी परमेश्वर को इसकी कोई चिन्ता नहीं, जब तक तुम अपने पड़ोसी के काम आते हो। परन्तु अब इस सब की उपेक्षा की जा रही है, और केवल इसका उलटा माना जाता है। हाय, वह दयनीय, विकृत जीवन जो हमने पोप-पक्षियों से सीखा है! इसी कारण कोई विवाह की दशा में प्रवेश करना नहीं चाहता, क्योंकि कोई उसे सहारे का हाथ नहीं देता, कोई उसे कोई सहायता नहीं देता कि वह अपना निर्वाह कर सके और आगे बढ़ सके।

ऐसा होता है कि एक भिक्षु बन जाता है, दूसरी भिक्षुणी, तीसरा याजक; एक ऐसी बात जिसे हम सचमुच रोक सकते थे, यदि हम केवल प्रेम के काम दिखाते। इस प्रकार वे दासियों और दासों को भूलकर चलते रहते हैं, और अन्त में वसीयत में कोई दान छोड़ जाते हैं और अपने उस दान के साथ विनाश में चले जाते हैं।

17. इससे निकलता है कि परमेश्वर बस यही चाहता है कि तुम अपने पड़ोसी की सेवा करो, उसके प्रति अपना कर्तव्य निभाओ, ताकि सबसे पहले तुम्हारे और उसके बीच बातें ठीक हो जाएँ और तुम पहले उससे मेल कर लो; नहीं तो परमेश्वर न तुम्हें देखेगा और न तुम्हारी सुनेगा।

इसके अतिरिक्त, यदि मेरा विरोधी मेरे पास आए, तो मुझे उसे प्रसन्नता से क्षमा करना है; यदि वह न आए, तब भी मुझे उसके प्रति मेल-मिलाप का भाव और दयालुता रखनी है, जब तक मैं उसके साथ मार्ग में हूँ, अर्थात् इस जीवन में, ताकि वह मुझे न्यायी को न सौंपे।

18. यह कैसे होता है? वह मेरा हाथ पकड़कर मुझे न्यायी के पास नहीं ले जाता; परन्तु जब मैं न्याय का सामना करता हूँ, तब मेरा विवेक समझ लेता है कि वह पड़ोसी को क्षमा करने को तैयार नहीं था, और तब भी गुप्त परन्तु पुराना जमा हुआ बैर पाले हुए था। मेरे पड़ोसी के सम्बन्ध में मेरा विवेक मुझे न्यायी को सौंपता है; वह मुझे सिपाही को सौंपता है; और वह, बदले में, मुझे बन्दीगृह में, अर्थात् नरक की आग में, डाल देता है, जब तक मैं अन्तिम कौड़ी न चुका दूँ, जिसका अर्थ है सदा के लिए; क्योंकि वहाँ ऋण का चुकाया जाना और छुटकारा असम्भव है।

यहाँ तुम वे ऊँचे काम देखते हो जिन तक कोई नहीं पहुँच सकता, न कर्मों की धार्मिकता से और न व्यवस्था से।

क्योंकि कर्म, यदि अकेले हों, कपटी और ढोंगी बनाएँगे; व्यवस्था, यदि अकेली हो, निराशा उत्पन्न करती है।

19. परन्तु मैं क्या करूँ? क्या मैं ठीक सुन रहा हूँ: क्या मुझे दण्ड की आज्ञा मिलनी है? इस प्रकार करो:

जब तुम्हें इस प्रकार अधर्म का बोध हो, तो मसीह के पास भागो और कहो: हे मेरे परमेश्वर, तेरी व्यवस्था अब मेरे लिए एक दर्पण है, जिसमें मैं देखता हूँ कि मैं कैसा विकृत और खोया हुआ प्राणी

हूँ! हे परमेश्वर, अब अपने एकलौते पुत्र के निमित्त मेरा उद्धार कर। इस प्रकार विश्वास के द्वारा परमेश्वर तुम्हें आत्मा देता है, जो तुम्हारा हृदय बदल देता है, ताकि तुम अपने पड़ोसी के प्रति बहुत दयालु बनोगे और यों तर्क करोगे: देखो, यदि परमेश्वर ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया है, और मुझे उससे अधिक क्षमा किया है जितना मैं कभी क्षमा करने की आशा कर सकता हूँ, तो मैं अपने पड़ोसी को थोड़ा-सा क्षमा करने को तैयार क्यों न होऊँ?

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

भाग III. एक आपत्ति और उसका उत्तर।

20. अब शासन की तलवार इसके विरुद्ध प्रतीत होती है, और यह प्रश्न उठता है: यदि मुझे क्षमा करना है, बैर नहीं रखना है, हत्या नहीं करनी है, तो फिर मैं सुधार और ताड़ना कैसे करूँ?

यदि मुझे तलवार चलानी है और उससे प्राणदण्ड देना है, तो मैं क्रोधित हुए बिना कैसे रह सकता हूँ? यह प्रश्न उचित है, क्योंकि यहाँ सुसमाचार प्रत्यक्ष रूप से शासन की तलवार को उलटता हुआ प्रतीत होता है।

परन्तु हमें यह स्मरण रखना है: मसीह यहाँ एक आत्मिक शिक्षक है, जो केवल विवेकों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें दिखाता है कि उनमें कितना बैर, डाह और क्रोध भरा है, और उससे छुटकारा कैसे पाया जाए।

यही उसका पद है जिसमें वह लगा हुआ है; सांसारिक तलवार से उसका कोई लेना-देना नहीं, वह उसे उन्हीं पर छोड़ता है जिनका यह कर्तव्य है।

21. अब, यह शिक्षा सब हृदयों में प्रवेश नहीं करती; उसका अधिकांश ऊपर ही रह जाता है। परन्तु जिनके हृदय में यह पड़ती है, वे परमेश्वर के सामने दण्डवत् गिरकर सहायता के लिए उसकी दोहाई देते हैं, वे तुरन्त धर्मी हैं और उन्हें सांसारिक तलवार की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वे वचनों के द्वारा चलाए जाते हैं। अब जो इसे नहीं पकड़ते वरन् बाहरी रूप से दुष्ट जीवन बिताते हैं, वहाँ सांसारिक तलवार का प्रयोग करना ही होगा।

इस प्रकार अब तुम्हें यह समझना है कि कोई सांसारिक शासक, या जो कोई भी सांसारिक तलवार चलाता हो, उसे भी उसी के अनुरूप चलना है जो यहाँ सिखाया गया है, अर्थात् क्रोध न करना और हत्या न करना।

22. तो जो परमेश्वर के स्थान पर तलवार चलाते हैं, वे कैसा आचरण करें? इस प्रकार: उनका तलवार चलाना उनके पद का एक भाग है।

एक अर्थ में सुसमाचार का उन पर दावा है, और तब उन्हें हृदय में बहुत दयालु, नम्र और करुणामय होना है; फिर, जब कर्तव्य पुकारे, तब उन्हें गम्भीर होना है, और मित्र, शत्रु, सुन्दरता, धन या विद्या का कोई विचार किए बिना तत्परता से दण्ड देना है। यह हम मूसा के उदाहरण में देखते हैं। वह अब तक जीवित रहे सब मनुष्यों में सबसे नम्र था, यहाँ तक कि वह गिरकर विनती करने लगा कि उसका नाम जीवन की पुस्तक में से काट दिया जाए, निर्गमन 32:32, यदि केवल वह भीड़ बच जाए। देखो, क्या वह कोमल, मधुर और दयालु मनुष्य न था, जो इसके लिए तैयार था कि लोग बच जाएँ चाहे वह स्वयं विनाश में जाए और शरीर और आत्मा दोनों में दण्डित ठहरे? परन्तु जब उसे प्रधान अधिकारी के पद पर रखा गया, तब उसने शासन के मामलों में कठोर कदम उठाए, और तेईस हज़ार लोगों को प्राणदण्ड दिया, जिससे वह परमेश्वर के क्रोध को शान्त कर सके।

संत पौलुस ने भी ऐसा ही किया। वह भी यहूदियों के लिए अपनी आत्मा का उद्धार तक त्याग देने को तैयार था, जैसा रोमियों 9:3 से प्रकट होता है। परन्तु जब उसे पता चला कि कुरिन्थुस में एक मनुष्य "अपने पिता की पत्नी को रखता है," तो उसने ऐसी कड़ी और कठोर पत्री लिखी जैसी उसने पहले कभी नहीं लिखी थी, और आज्ञा दी कि ऐसा मनुष्य शैतान को सौंप दिया जाए, "ताकि उसकी आत्मा प्रभु यीशु के दिन में उद्धार पाए," 1 कुरिन्थियों 5:5।

इसी प्रकार दाऊद और दूसरों ने किया। वास्तव में पुराने नियम में हमें ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो बाहरी रूप से तलवार को पूरी कठोरता से चलाते थे, और लोगों को ऐसे प्राणदण्ड देते थे जैसे कोई मुर्गियाँ मारता हो, और उसी समय हृदय में बहुत कोमल और दयालु होते थे।

23. आओ, हम एक साहसी दृष्टान्त लें, ताकि तुम देख सको कि अधिकार में रहनेवाले व्यक्ति को कैसा आचरण करना चाहिए। सैक्सनी के निर्वाचक का कुलचिह्न लो। उसमें एक सफ़ेद और काले क्षेत्र में दो तलवारें दिखाई गई हैं, जो इस प्रकार रखी हैं कि मूठ नीचे सफ़ेद पृष्ठभूमि पर है, और फल ऊपर काली पृष्ठभूमि पर। ये सूचित करते हैं कि अधिकार में रहते हुए तुम्हें कैसा आचरण करना है: नीचे, तलवार को मूठ से पकड़े हुए, तुम्हें शुद्ध, उजले, कोमल-हृदय और कृपालु होना है, और सबसे भले अभिप्राय रखने हैं; ऊपर, जब तुम कर्तव्य पर हो, तुम्हारे पास काले क्षेत्र में फल है, अर्थात् अपराधियों को बाहरी रूप से रोकने के लिए दृढ़ और कड़ा प्रवर्तन आवश्यक है।

और तलवारों का लाल रंग सूचित करता है कि लहू बहाया जाना है।

मूसा, दाऊद और दूसरों ने इस प्रकार तलवार को सफ़ेद क्षेत्र में मूठ से सुन्दर रीति से थामा, हृदय में संयमी, कोमल और दयालु रहकर; और काले क्षेत्र में फल को चलाया, अपने पद के कर्तव्यों में गम्भीर और कठोर रहकर।

24. ठीक ऐसा ही किसी नागरिक या सांसारिक न्यायी को भी करना चाहिए। जब उसका सामना किसी ऐसे दुष्ट व्यक्ति से हो जो वचनों से वश में नहीं आता, तो उसके विचार ये हों:

"हे मेरे परमेश्वर, यदि ऐसा हो सकता तो मैं इस मनुष्य के लिए कितनी प्रसन्नता से मर जाता! उसकी एक आत्मा है जिसकी मैं सहायता नहीं कर सकता; इसके अतिरिक्त वह दुष्ट जीवन बिताता है, और अपने मांस और लहू को आत्मा के अधीन नहीं कर पाता।" और फिर जब वह दोनों की तुलना करता है और देखता है कि कौन दूसरे से भारी है, तो वह पाएगा कि

मनुष्य का मरना एक सहज बात है, परन्तु आत्मा का मरना एक गम्भीर बात है, क्योंकि आत्मा का मरना अनन्त है।

इसलिए उसके विचार और वचन ये होने चाहिए:

"आह, देखो, तुम्हारी आत्मा कैसे न्याय में पड़ सकती है; देखो, तुम कैसे विनाश में जा सकते हो। इस कारण, ताकि पाप और आगे न बढ़े, मुझे तुम्हें तुम्हारे शरीर से वंचित करना होगा, और तुम्हारी आत्मा के उद्धार का ध्यान रखना होगा, क्योंकि मैं तुम्हारे शरीर को नहीं बचा सकता।"

और तब हमें कड़ा प्रहार करना होगा, दृढ़ता से तलवार उठानी होगी, ताकि हम क्रोध और कठोर न्याय को रोक सकें, जैसा मूसा ने इस्राएलियों के साथ किया।

उस दशा में तुम अपनी तलवारें एक सफ़ेद और एक काले क्षेत्र में धारण किए हुए हो।

25. दोनों तलवारों का एक दूसरे को काटते हुए रखा जाना, मानो एक दूसरी को रोक रही हो, भली-भाँति सोचा गया है।

यह इस बात की शिक्षा देने के लिए है कि न्यायी को बुद्धिमान और विवेकी होना चाहिए, और देखना चाहिए कि कहाँ उसे किसी कठोर दण्डादेश को नरम और परिवर्तित करना है, जहाँ वह न्यायोचित और ठीक हो। यह ऐसा है जैसे दो निर्णय आपस में टकराएँ जब एक दूसरे को रद्द कर देता है।

तुम्हें सदा secundum strictum jus, अर्थात् कड़ाई से व्यवस्था के अक्षर के अनुसार, कार्यवाही नहीं करनी है, वरन् देखना है कि क्या न्यायोचित और ठीक है; और जहाँ किसी मामले को सुलझाया जा सके, वहाँ भी उसे ध्यान देना चाहिए।

26. एक उदाहरण लो। प्रभु के चेलों ने खेतों में से होकर जाते हुए बालें तोड़ीं और खाईं। अब सब्त का पालन ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार मृत्युदण्ड के भय के अधीन किया जाना था, गिनती 15:35; परन्तु चेले भूखे थे, इसलिए एक व्यवस्था ने दूसरी को रद्द कर दिया। इस कारण प्रभु फरीसियों के सामने उन्हें निर्दोष ठहराता है, यह कहकर: "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है," मत्ती 12:8। यद्यपि सब्त का पालन ईश्वरीय आज्ञा का विषय था, फिर भी चेले निर्दोष ठहराए गए, क्योंकि सब्त का पालन इतनी कड़ाई से नहीं किया जाना था कि वह उन्हें खाने से रोके और इस प्रकार इसी पालन के कारण उनका नाश करा दे।

यही बात दाऊद पर भी लागू होती है, जिसने वह पवित्र रोटी खाई जिसे खाने की अनुमति किसी साधारण जन को न थी, 1 शमूएल 21:6।

यह दो तलवारों के टकराने का एक उदाहरण था, क्योंकि यह आवश्यक था कि एक व्यवस्था दूसरी को स्थान दे। इस कारण दाऊद और चेले भी निर्दोष ठहराए गए।

क्योंकि परमेश्वर ने कोई भी व्यवस्था मनुष्य के विनाश के लिए नहीं, वरन् उसके शारीरिक और आत्मिक कल्याण के लिए स्थापित की है।

27. इसलिए, सब का सारांश यह है कि सांसारिक अधिकारी बाहरी रूप से कठोर हों और अपराधों को रोकें; परन्तु भीतर से वे एक कोमल, नम्र, मसीही, प्रेममय आत्मा रखें; साथ ही वे बुद्धिमान और विवेकी हों, ताकि वे जानें कि जो ठीक और उचित है उसके अनुसार कठोर न्याय को कैसे नरम किया जाए। इस सुसमाचार पर इतना ही पर्याप्त हो। आओ, हम अनुग्रह के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

दूसरा उपदेश। मत्ती 5:20-26।

यह उपदेश 1523 में दो बार पुस्तिका के रूप में और "लूथर के तेरह उपदेश, 1523" में प्रकाशित हुआ।

पाँचवीं आज्ञा की व्याख्या।

एक बड़ी आशीष के रूप में देखी गई … यह व्याख्या देना। 2.

III. कैसे मसीह इस व्याख्या में सब कपटियों पर एक भयानक न्याय सुनाता है … यहूदियों और पोप-पक्षियों द्वारा दी गई व्याख्या से पाँचवीं आज्ञा की इस व्याख्या की तुलना। 4.

IV. कैसे मसीह इस व्याख्या में … की दयनीय दशा प्रकट करता है। सब मनुष्य स्वभाव से हत्यारे हैं।

जब क्रोध किसी के हृदय को जकड़ ले, तब उसे कैसा आचरण करना चाहिए। 6.

V. … का सारांश। एक मसीही को अपने शत्रु के प्रति कैसा आचरण करना चाहिए। 7-8.

VI. इस व्याख्या पर पोप-पक्षियों की झूठी टीका … यहाँ क्रोध की चार श्रेणियाँ और सीढ़ियाँ। 10-12.

क. ये श्रेणियाँ और सीढ़ियाँ विस्तार से।

1. पहली श्रेणी और सीढ़ी। 13.

2. दूसरी श्रेणी और सीढ़ी।

3. तीसरी श्रेणी और सीढ़ी।

4. चौथी श्रेणी और सीढ़ी।

ख. ये श्रेणियाँ और सीढ़ियाँ सामान्य रूप से। 17-18.

जो किसी मसीही को ठेस पहुँचाए, उसके प्रति मसीही को कैसा व्यवहार करना चाहिए। 19.

VIII. इस व्याख्या से उठनेवाली एक आपत्ति और उसका … 1. इस सुसमाचार में प्रभु मूसा की व्यवस्था की महिमा बताने और उसकी व्याख्या करने का कार्य अपने हाथ में लेता है, क्योंकि उसके लिए यह शोभा न देता कि वह लोगों को धर्मी बनाने के लिए कठोरता से दबाव डाले।

वह व्यवस्था देनेवाला नहीं, परन्तु उद्धारकर्ता है, जो कभी किसी से कुछ नहीं लेता, परन्तु सदा देता ही है।

इसी प्रकार यहाँ भी वह व्यवस्था की व्याख्या करने और नम्रता से शिक्षा देने में अपनी कृपालुता प्रमाणित करता है; जहाँ आवश्यकता और घटी है, वहाँ वह मूसा की नाईं कठोरता से दबाव नहीं डालता, जो बिना अधिक सोच-विचार के यही चाहता था कि लोग या तो धर्मी हों या मर जाएँ।

इस कारण इस अवसर पर मसीह के इस कार्य को हमारे लिए बड़े लाभ का कार्य समझना चाहिए, क्योंकि वह हमें सिखाता है कि हम कहाँ चूकते और कहाँ कम पड़ते हैं। यहाँ

वह विशेष रूप से उन दोषों की चर्चा करता है जो क्रोध से उत्पन्न होते हैं, जो मनुष्यों के बीच इतना विनाश करता है, जैसा कि चारों ओर दिखाई देता है; हाँ, लगभग सारा संसार उसके वश में है।

2. अब हम इस आज्ञा, "तू हत्या न करना," को जाँचें कि यहूदी उसे किस अर्थ में लेते थे, और हमें उसे किस अर्थ में लेना चाहिए।

यहूदी केवल उन्हीं को हत्यारे मानते थे जो अपने हाथों से हत्या का काम करते थे; और जो बाहरी काम से बचे रहते थे, उन्हें वे धर्मी समझते थे।

इसी प्रकार उन्होंने मसीह के साथ भी व्यवहार किया।

उसे पुन्तियुस पीलातुस के हाथ मुकद्दमे के लिए सौंपकर वे स्वयं बाहर ही रहे, और इस प्रकार समझते रहे कि वे उसके लहू से निर्दोष हैं और उन्होंने व्यवस्था का पूरी रीति से पालन किया है, यूहन्ना 18:28. फिर, शाऊल ने भी दाऊद के प्रति ऐसा ही किया; वह अपने को तब तक भक्त समझता रहा जब तक वह दाऊद को अपने हाथ से न मारे, 1 शमूएल 19.

इस प्रकार उन्होंने व्यवस्था का अर्थ लगाया, और यह न देखा कि उसकी जड़ें हृदय तक पहुँचती हैं। इसी को ध्यान में रखकर मसीह यहाँ अपने मसीहियों से कहता है:

"क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।"

3. यह एक कठोर, हाँ, भयानक वचन है, जिससे वे सब झूठे संत और कपटी दोषी ठहराए जाते हैं, जो अपने ही बाहरी कामों को लेकर फिरते हैं।

4. परन्तु हमने इस आज्ञा का क्या अर्थ लगाया है? थोड़ा अच्छा, अर्थात् दुगना बुरा है हमारा अर्थ। वह इस प्रकार: यह तो सचमुच हृदय का विषय है कि हमें बैर से मुक्त रहना है। परन्तु हमारी धारणा के अनुसार मनुष्य मित्रता का व्यवहार करके अपने हृदय से बैर को निकाल सकता है। इस प्रकार हमने इसे स्वतन्त्र इच्छा का प्रश्न बना दिया, और बुरे से और बुरे की ओर बढ़ गए। यहूदियों ने इसे धोखा देनेवाले दिखावे का विषय बना दिया; हमने इस बात को स्वतन्त्र इच्छा पर टिका दिया।

इस प्रकार यहूदियों का कपट उनके कामों में है; हमारा कपट हमारे विचारों में।

अच्छा, मैं उसे क्षमा करूँगा, उसके साथ भलाई करूँगा; और इस प्रकार हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा के बल पर उस काम को हाथ में लेते हैं, तो वह पूरा हो जाएगा।

5. तो फिर हमें क्या करना चाहिए? हमें यह दृष्टिकोण अपनाना है: पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य नहीं, जब तक कि वह

नए सिरे से जन्मा न हो, जो क्रोधित न होता हो और बुरे वचन और बुरे काम न करता हो; स्वभाव इसके सिवा और कुछ कर ही नहीं सकता।

क्योंकि व्यवस्था वहाँ खड़ी होकर कहती है: तुझे हृदय में, वचनों में और कामों में एक भला, मधुर स्वभाव का मनुष्य होना है; और तुझ में बुराई का एक रेशा भी न पाया जाए। अच्छा, ऐसा मनुष्य मैं कहाँ पाऊँ? मेरी माता उसे मुझे नहीं देती; उसे स्वर्ग से उतरकर आना होगा। क्योंकि पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य नहीं, जहाँ तक वह मांस और लहू है, जो क्रोधित होने और बुरे वचन और काम करने से अपने को रोक सके।

परन्तु यदि मैं रुक जाता हूँ, तो निश्चय इसलिए कि मैं तलवार से डरता हूँ या कोई स्वार्थ साधता हूँ। यदि मैं शाप नहीं देता, यदि मैं निन्दा नहीं करता, तो या तो तलवार या नरक मुझे रोकता है, मृत्यु का या शैतान का भय; ये बातें मेरे मन में रहती हैं और मैं रुक जाता हूँ, नहीं तो मैं रुक ही नहीं सकता था।

इतना ही नहीं, परन्तु जहाँ कहीं और जब कभी मुझ से हो सकता, मैं सचमुच हत्या और मार-काट करता। स्वभाव से मैं एक भी दयालु वचन या काम उत्पन्न नहीं कर सकता। यदि करता हूँ, तो वह निश्चय ही कपट है, क्योंकि कम से कम हृदय तो सदा विष से भरा रहता है।

यह अब तुम मसीह से सुनते हो, जो व्यवस्था की ऐसी व्याख्या करता है कि तुम अपने भीतरी हृदय में लज्जित हो जाओ। मानो वह कहता है:

तेरा हृदय मधुर नहीं, तेरा हृदय बैर से भरा है, हत्या और लहू से भरा है, और इसलिए तेरे हाथ और तेरी आँखें भी उसी से भर जाना चाहती हैं; और तू इसे रोक भी नहीं सकता, जैसे तू आग को जलने से नहीं रोक सकता, क्योंकि जलना उसका स्वभाव है।

6. यहाँ कोई कह सकता है, तो फिर मैं क्या करूँ? मैं यह सब अपने भीतर अनुभव करता हूँ, परन्तु मैं दशा को बदल नहीं सकता। मैं उत्तर देता हूँ, प्रभु अपने परमेश्वर के पास भाग जा, अपनी शिकायत उसके सामने रख और कह: देख, हे प्रभु, मेरे पड़ोसी ने मुझे थोड़ी हानि पहुँचाई है, मेरे सम्मान को छूनेवाले कुछ शब्द कहे हैं, मेरी सम्पत्ति को कुछ नुकसान पहुँचाया है, इसे मैं सह नहीं सकता, इसलिए मैं उसे मार डाला गया देखकर प्रसन्न होता। हाय मेरे परमेश्वर, मैं कितनी प्रसन्नता से उसके प्रति स्नेहशील होना चाहता, परन्तु हाय, मैं नहीं हो सकता!

देख, मैं कितना पूरी रीति से ठण्डा, हाँ, मरा हुआ हूँ!

हे प्रभु, मैं अपनी सहायता नहीं कर सकता, मुझे पीछे हटना पड़ता है। तू मुझे बदल दे, तब मैं भक्त बनूँगा; नहीं तो मैं वैसा ही बना रहूँगा जैसा मैं रहा हूँ।

यहीं तुम्हें अपनी सहायता ढूँढ़नी है, और किसी स्थान पर नहीं; यदि तुम उसे अपने भीतर ढूँढ़ोगे, तो कभी न पाओगे। तुम्हारा हृदय

निरन्तर क्रोध से उफनता और खौलता रहता है, तुम उसे रोक नहीं सकते।

7. अब व्यवस्था का सार यह है: तुम्हें हृदय, वचन और कर्म में दयालु, स्नेहशील और कृपालु होना है; और चाहे वे तुम्हारा प्राण भी ले लें, तौभी तुम्हें प्रेम में सब कुछ सहना है, और अपने प्रभु का धन्यवाद करना है। देखो, इस प्रकार इस छोटे से वचन, "तू हत्या न करना," में बहुत कुछ सम्मिलित है।

मसीह ने इसके अनुसार जीवन बिताया; तुम भी वैसा ही करो, तो तुम एक अच्छे मसीही हो। जब वह क्रूस पर कीलों से जड़ा गया, तब यहूदियों ने उसके नाम का, जो सब नामों में श्रेष्ठ है, और उसके सम्मान का अपमान किया, और इस प्रकार के और ऐसे ही अर्थ के वचनों से उसकी निन्दा की: वाह, इसका परमेश्वर कैसा अच्छा है! यदि यह

परमेश्वर का पुत्र है, तो नीचे उतर आए! इसका परमेश्वर, जिस पर इसने इतना भरोसा रखा और इतनी डींग मारी, अब आकर इसकी सहायता करे! मत्ती

27:43, मरकुस 15:32, लूका 23:35. ऐसे वचनों ने उसके हृदय को बेध दिया, और उसे उसके अन्य सब दुःखों से अधिक पीड़ा दी; तौभी उसने यह सब धीरज से सहा; वह अपने शत्रुओं पर रोया, क्योंकि वे उस बड़े लाभ में कोई भाग न लेना चाहते थे जो उसकी मृत्यु से प्राप्त होना था; हाँ, उसने उनके पाप के लिए प्रार्थना की। और इसके सामने हम छोटी से छोटी बात पर गुर्राने और झल्लाने को तैयार रहते हैं, जब हमसे अपने पड़ोसी के लिए थोड़ा सा भी झुकने को कहा जाता है।

8. यहाँ तुम देखते हो कि हम अब भी मसीह से कितनी दूर हैं।

यदि हम उसके साथ महिमा में प्रवेश करना चाहते हैं, तो मसीह के साथ दुःख उठाना सचमुच आवश्यक है।

वह आगे गया है, इसलिए हमें उसके पीछे चलना चाहिए, जैसा कि संत पतरस कहता है, पहली पत्री 2:21 आदि: "और तुम इसी के लिए बुलाए भी गए हो, क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिए दुःख उठाकर, तुम्हें एक आदर्श दे गया है, कि तुम भी उसके पद-चिह्नों पर चलो; न तो उसने पाप किया, और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली; जब उसने दुःख उठाया, तो धमकी न दी; पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था।"

अब देखो कि संत पतरस हमारे सामने कैसा आदर्श रखता है; सचमुच हमें उसका अनुकरण करना चाहिए, और उसके समान होने और उसके समान काम करने का यत्न करना चाहिए।

परन्तु यह हम स्वभाव से नहीं कर सकते; इससे यह निकलता है कि हम बिना किसी अपवाद के शैतान के अपने हैं, क्योंकि पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो निर्दोष पाया जाए। इसलिए यह वचन अटल रहता है: तुम्हें भी वैसा ही निपुण, अर्थात् हृदय से भला होना है, नहीं तो तुम विनाश के भागी हो।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

9. तो फिर हमें क्या करना चाहिए? तुम्हें इस प्रकार करना है: तुम्हें मान लेना है कि तुम व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहराए गए हो, और शैतान की अपनी सम्पत्ति हो, और कि तुम अपनी किसी भी शक्ति से अपने को छुड़ा नहीं सकते।

इसलिए तुम्हें परमेश्वर के पास भागना है, उससे प्रार्थना करनी है कि वह तुम्हें बदल दे, नहीं तो सब कुछ खो गया और नष्ट हो गया।

इसे उन बड़े विद्वानों ने भली-भाँति समझा और देखा था, परन्तु उन्होंने इस प्रकार तर्क किया:

यदि हम यह प्रचार करें कि सारा संसार दोषी ठहराया गया है और शैतान का अपना है, तो उन पवित्र बननेवाले याजकों और भिक्षुओं का क्या होगा, क्योंकि तब वे भी दोषी ठहरेंगे?

परमेश्वर न करे! ठहरो, ठहरो, हम अपनी जीभें तेज़ करेंगे, अपने परमेश्वर के लिए कागज़ में एक छेद कर देंगे, एक टीका लिखेंगे और यों कहेंगे: अरे, परमेश्वर का यह अर्थ कभी नहीं था, क्योंकि इसे कौन पूरा कर सकता है?

उसने इसकी आज्ञा नहीं दी, परन्तु केवल उन लोगों को सुझाव दिया जो सिद्ध होना चाहते थे।

फिर, सिद्ध लोग भी ऐसे होने के लिए बाध्य नहीं हैं, इतना पर्याप्त है कि वे सिद्धता के लिए प्रयत्न करें।

इस विषय पर अनेक बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखी गई हैं, जिन्हें Formas conscientiarum (विवेकों के रूप) कहा जाता है, अर्थात् विवेकों को सान्त्वना देने और उन्हें दोषमुक्त करने के ग्रन्थ। इस क्षेत्र में थॉमस एक्विनास लगभग सबसे अग्रणी विधर्मी था।

बाद में इसी शिक्षा को पोप ने पुष्ट किया, और सारे संसार में फैलाया; इसी से उन (धार्मिक) संघों की बाद की उत्पत्ति समझ में आती है, जिनका लक्ष्य सिद्धता था। अच्छा, परमेश्वर की स्तुति हो कि हमने इस भूल को पहचान लिया है, ताकि हम उससे बच सकें।

10. हम विवेकों को बिलकुल भिन्न रीति से सान्त्वना देते हैं, अर्थात् इस प्रकार:

प्रिय भाई, यह सब केवल भिक्षुओं और याजकों से ही नहीं कहा गया; मसीह अपने वचनों से खिलवाड़ नहीं कर रहा; यह एक सीधी आज्ञा है, तुम्हें उसके अनुसार चलना है, नहीं तो तुम शैतान की सम्पत्ति हो। यह है हमारे सान्त्वना देने की रीति।

हाय! हमारा स्वभाव चिल्लाता है, क्या तुम इसे सान्त्वना कहते हो? यह तो आत्माओं को शैतान के हाथ सौंपना है। ठीक है, मित्र, परन्तु तुम्हें स्वर्ग तक ऊपर ले जाने से पहले मुझे तुम्हें नरक तक नीचे ले जाना होगा; पहले तुम्हें निराश होना होगा, फिर मसीह के पास आना होगा, उसके आदर्श को देखना होगा कि उसने अपने शत्रुओं के प्रति कैसा आचरण किया, कि वह उन पर रोया। परन्तु केवल यह आदर्श ही तुम्हें प्रेरित करता है; तौभी वह तुम्हारी कुछ विशेष सहायता नहीं करता।

11. इसी को ध्यान में रखकर उसके वचन और प्रतिज्ञा को थाम लो, कि

वह तुम्हें बदल देगा; केवल यही तुम्हारी सहायता करेगा। इस प्रकार प्रार्थना करो: हे मेरे परमेश्वर, तूने मसीह को, अपने एकलौते प्रिय पुत्र को, मेरे सामने आदर्श के रूप में रखा है, ताकि मैं वैसा ही जीवन बिताऊँ; परन्तु मैं यह करने में असमर्थ हूँ। हे मेरे परमेश्वर, मुझे बदल दे, मुझे अपना अनुग्रह दे! तब परमेश्वर आता है और कहता है:

देख, क्योंकि तू अपने आप को पहचानता है और मुझ से अनुग्रह माँगता है, मैं तुझे बदल दूँगा और जैसा तू चाहता है वैसा ही करूँगा। और यद्यपि तू मसीह के समान सिद्ध नहीं है, जैसा कि तुझे वास्तव में होना चाहिए, तौभी मैं अपने पुत्र के जीवन और सिद्धता से तेरी अपूर्णताओं को ढाँप दूँगा।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हमारे पास सदा कुछ न कुछ होना चाहिए जो हमें उचित दीनता और भय में बनाए रखे।

12. यही सच्ची सान्त्वना है, जो हमारी सामर्थ्य पर नहीं टिकी, परन्तु इस बात पर कि हमारा एक अनुग्रहकारी परमेश्वर है, जो हमारे पापों को क्षमा करता है; इस बात पर कि हम मसीह पर विश्वास करते हैं, न कि अपनी योग्यता पर, और वह हमें दिन-प्रतिदिन शुद्ध करता है; इस बात पर कि जब कभी हम कम पड़ें, हमें सदा अपनी आशा और भरोसा मसीह पर रखना चाहिए।

देखो, यही हमारे सुसमाचार का मुख्य आशय है। अब हम संक्षेप में पाठ पर दृष्टि डालें और उसकी विषय-वस्तु पर विचार करें।

क्रोध की चार श्रेणियों के विषय में।

13. प्रभु यहाँ क्रोध या कोप की चार श्रेणियाँ या दर्जे बताता है। पहला है हृदय का क्रोध; और यही मुख्य श्रेणी है; हृदय इतना शुद्ध होना चाहिए कि तुम्हें उसका आभास तक न हो। परन्तु हमारी वर्तमान दशा में यह नहीं हो सकता।

इसलिए जब तुम्हें उसका आभास हो, तो सीधे मसीह के पास आओ और उससे विनती करो कि वह अनुग्रह करके तुम्हें बदल दे; उससे विनती करो कि जहाँ आग जलने लगे, वहीं वह उसे बुझा दे; तुम अपने प्रयत्नों से कोई मार्ग नहीं निकाल सकते।

14. दूसरी श्रेणी "राका" है, जिसका अर्थ है आँखों से, गर्दन से और सारे चेहरे से, और जिस किसी अन्य रीति से भी हो, क्रोधपूर्ण, रूखा भाव प्रकट करना। यह भी किसी प्रकार नहीं होना चाहिए। इसलिए तुम्हें सदा यह जानना चाहिए कि सहायता कब और कैसे प्राप्त करनी है।

तीसरी श्रेणी यह कहने में है, "अरे मूर्ख।"

इसमें सब प्रकार के डाँटने-फटकारने और अपवित्र शब्दों का प्रयोग सम्मिलित है, जिनसे हमारे पड़ोसी का अपमान होता है।

… यह भी त्याग दी जाए; परन्तु जहाँ कहीं हम कर सकें, हमें अपने पड़ोसी की अत्यन्त उत्साह से रक्षा और बचाव करना चाहिए।

16. चौथी श्रेणी अपने हाथों से की गई घोर हत्या में है। इसका अर्थ यह है कि हमें अपने हाथों से अपने पड़ोसी की सहायता करनी है, उसे देना और आगे बढ़ाना है, ताकि उसका निर्वाह हो सके। क्योंकि यदि मैं किसी कंगाल को संकट में पड़ा देखूँ और सहायता, रक्षा और दान न करूँ, जिससे उसका निर्वाह हो, तो मैं अपने ही हाथ से उसकी हत्या करता हूँ।

17. अब यदि तुम देखना और जानना चाहते हो कि तुम कौन हो, तो तुम्हें अपने को उन लोगों से नहीं जाँचना चाहिए जिनसे तुम प्रेम करते हो। स्वभाव ही सिखाता है कि जिनसे हम प्रेम करते हैं, उन पर कोई विपत्ति आए यह हम नहीं चाहते। परन्तु अपने को अपने शत्रुओं से जाँचो, तो तुम शीघ्र देख लोगे कि तुम कौन हो। यदि तुम पाते हो कि तुम अपने हृदय में उनके प्रति दयालु भाव नहीं रखते, न व्यवहार में दयालु हो, परन्तु उनकी बुराई करते हो, और अपने हाथों से उनकी सहायता नहीं करते, तो तुम हत्यारे हो।

18. परन्तु जब हमारा प्रभु कहता है: "जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई अपने भाई को राका कहेगा, वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे, अरे मूर्ख, वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा," तो वह उस भाषा का प्रयोग करता है जो सांसारिक न्यायालयों में प्रचलित थी, जब अभियुक्त को न्यायालय के सामने लाया जाता है; पहले दोषी या निर्दोष होने के प्रश्न पर विचार होता है; उसके बाद दिए जानेवाले दण्ड पर विचार-विमर्श होता है; और अन्त में अपराधी को दण्ड के लिए सौंप दिया जाता है।

क्रोध की इन श्रेणियों के विषय में भी यही बात सच है; अर्थात् जैसे-जैसे वे बढ़ती जाती हैं, एक को पिछली से अधिक कठोर दण्ड मिलता है। नरक तो वास्तव में एक ही है, परन्तु दण्डों और सज़ाओं में विविधता है, और उनमें से एक सदा दूसरी की अपेक्षा दिए जाने के अधिक निकट होती है: जैसे वह मनुष्य, जिसके विषय में यह विचार हो रहा है कि वह किस मृत्यु से मरे, उस मनुष्य की अपेक्षा मृत्यु के अधिक निकट है जिसे अभी-अभी न्यायालय के सामने बुलाया गया है।

प्रभु स्वयं अपने वचनों को और समझाता है जब वह कहता है:

"इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल-मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा। जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग ही में है, उससे झटपट मेल-मिलाप कर ले; कहीं ऐसा न हो कि मुद्दई तुझे न्यायी को सौंपे, और न्यायी तुझे सिपाही को सौंप दे, और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए।

मैं तुझ से सच कहता हूँ कि जब तक तू कौड़ी-कौड़ी भर न दे तब तक वहाँ से छूटने न पाएगा।"

19. यहाँ तुम देखते हो कि परमेश्वर हमसे क्या माँगता है, कि वह नहीं चाहता कि उसके लिए भी कोई काम किया जाए, जब तक कि वह प्रेम में न किया जाए, और पड़ोसी के साथ उचित सम्बन्ध स्थापित न हो जाए।

इस प्रकार तुम देखते हो कि क्रोध उन सब भले कामों को रद्द कर देता है जो किए जा सकते हों, जैसे प्रार्थनाएँ, उपवास, आत्म-दमन, दान देना, और ऐसे ही अन्य काम।

परमेश्वर सबसे पहले यह चाहता है कि जो फूट में रहते हैं उनका मेल-मिलाप हो, और जिन्हें उन्होंने ठेस पहुँचाई है उनसे वे क्षमा माँगें, जैसा कि उचित ही है।

यही अर्थ वह प्रकट करना चाहता है जब वह कहता है: "इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल-मिलाप कर," अर्थात् उससे क्षमा माँग।

"अपने मुद्दई से झटपट मेल-मिलाप कर ले;" और चाहे वह तुरन्त तेरे पास आकर क्षमा न माँगे, तौभी तू उसके प्रति दयालु भाव रख और उसे क्षमा कर। देखो कैसे

परमेश्वर ने दोनों पक्षों को सन्तुलित किया है: एक ओर, जब हमें ठेस पहुँचे, तो हमें दयालु और क्षमाशील होना है; दूसरी ओर, ठेस पहुँचानेवाले को क्षमा माँगनी है, ताकि सब बातें भली-भाँति चलें।

20. अब कोई पूछ सकता है: तुम हमसे कहते हो कि "अरे मूर्ख" न कहें, परन्तु मसीह के विषय में क्या, जो अपने चेलों को अक्सर "मूर्ख" और "अविश्वासी" कहता था, मरकुस 16:14, जो एक मसीही के लिए बड़ी और कठोर निन्दा है? उत्तर: हमें हृदय की दशा के अनुसार न्याय करना चाहिए: वही हमारे कामों का स्वरूप निर्धारित करती है।

मसीह और पौलुस कठोरता से डाँटते और झिड़कते हैं, परन्तु उनका अभिप्राय सबसे उत्तम होता है, इसलिए उनके वचनों को भले कामों में गिना जाना चाहिए।

जैसे एक पिता अक्सर अपने पुत्र को मूर्ख कहता है, हाँ, और शारीरिक ताड़ना भी देता है, तौभी वह यह सब प्रेम से करता है, क्योंकि उसके हृदय में अपने पुत्र के प्रति सदा दया रहती है; वैसे ही मसीह और प्रेरित और सब विश्वासी करते हैं; वे जो कुछ करते हैं, एक पिता के और माता के

हृदय से करते हैं, इसलिए वे सचमुच भले काम हैं।

इसलिए हमें ऐसे प्रश्नों का न्याय हृदय और व्यक्ति के अनुसार करना चाहिए। इस सुसमाचार पर इस समय के लिए इतना पर्याप्त हो।

त्रिएकता के बाद छठा रविवार।

यह उपदेश पहले "क्रोध पर दो उपदेश" में छपा था।

एक नया और अपरिवर्तित पुनर्मुद्रण इस शीर्षक से प्रकाशित हुआ: "एक व्यक्ति को दूसरे पर क्रोध नहीं करना चाहिए, एक उत्तम उपदेश। — धीरज और नम्रता के लिए एक उपदेश, डॉ. मार्टिन लूथर का दूसरा उपदेश, विटनबर्ग, 1543।" अन्त में ये शब्द हैं, "विटनबर्ग में योसेफ़ क्लुग द्वारा मुद्रित।"

विषय-वस्तु: क्रोध और उसके चिह्नों के विषय में।

1. क्रोध एक बहुत ही सामान्य बुराई है। 1.

2. क्रोध एक सुन्दर शैतानी पाप है, जो अपने को अच्छे दिखावे से सजाने का यत्न करता है। 2-7.

3. मसीह कैसे सब क्रोध को पूरी तरह मिटा देना चाहता है। 8-10.

जब हमें ठेस पहुँचे, तब हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए। 9-10.

4. क्रोध की इस शिक्षा पर उठाई गई आपत्तियाँ, और उनका उत्तर। क. पहली आपत्ति और उसका उत्तर। 11-13. ख. दूसरी आपत्ति और उसका उत्तर। 14-15.

5. क्रोध सदा अपने पड़ोसी के प्रति बैर और डाह से भरा रहता है, और शैतान का फल है। 16.

6. क्रोध के विभिन्न प्रकार। क. वह प्रेम से कैसे उत्पन्न होता है। 17-19. ख. यह मानवीय नहीं, परन्तु ईश्वरीय क्रोध है। 19. ग. पोप इस क्रोध का कैसे दुरुपयोग करता है। 20. क. इस क्रोध का स्वरूप। ख. इस क्रोध के दुरुपयोग से क्यों सावधान रहना चाहिए। 22. ग. इस क्रोध की आवश्यकता। 22. क. इस क्रोध का स्वरूप। ख. इस क्रोध को कैसे और क्यों पूरी तरह मिटा देना चाहिए। 23-24. ग. कर्म-धर्मियों में यह क्रोध कैसे पहचाना जाता है। 25. घ. यह क्रोध कैसे और क्यों पूरी तरह दोषी ठहराया जाता है। 26.

II. क्रोध के चिह्नों के विषय में … 1. पहला चिह्न। 27. ख. यहाँ उठाई गई एक आपत्ति, और उसका उत्तर। 29-31.

यह पाठ अब पन्द्रह सौ से अधिक वर्षों से उपदेशों का विषय रहा है, और न्याय के दिन तक रहेगा, इससे पहले कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो इस पर पूरी रीति से विश्वास करे और इसका पालन करे। इसकी पर्याप्त प्रतिलिपियाँ बनाई गई हैं और इसकी पर्याप्त स्पष्ट व्याख्या की गई है, ताकि हम इसे प्रतिदिन और निरन्तर पढ़ और सुन सकें। तौभी यह निश्चय ही कभी समाप्त न होगा, और इसके अनुसार सिद्ध रीति से जीवन बिताना तो और भी कम होगा, यद्यपि हर कोई समझता है कि वह एक ही दिन में इसे जी भरकर सुन और सीख सकता है, कि फिर उसे इसकी और आवश्यकता न रहेगी। परन्तु परमेश्वर जानता है कि हम कैसे मूर्ख और

बुद्धिहीन हैं, जब हम अपने को सबसे बुद्धिमान समझते हैं; इसी कारण वह निरन्तर एक ही उपदेश हमारे सामने रखता है, और उसे लगातार हम में रटाने और ठूँसने से नहीं थकता, इस आशा में कि वह हमें इस स्थिति तक ले आए कि हम अपना अन्धापन और अपनी मूर्खता देखें, और आज्ञाकारी विद्यार्थियों की नाईं उसे सीखना और उसका अभ्यास करना आरम्भ करें। [ऊपर का भाग लूथर के दो उपदेशों, "Zwo Predigten" (दो उपदेश), से जोड़ा गया है।]

भाग I. क्रोध के विषय में।

1. इस सुसमाचार की व्याख्या हमने अन्य अवसरों पर पूरी और पर्याप्त रीति से की है, जब हमने मसीह के उस सम्पूर्ण उपदेश पर विचार किया था, जिसे सुसमाचार-लेखक मत्ती तीन अध्यायों में लिखता है; क्योंकि आज हम उसका एक भाग लेंगे, जहाँ मसीह पाँचवीं आज्ञा की व्याख्या करता और उसे समझाता है।

क्योंकि यहाँ हम पहले यह देखते हैं कि मसीह क्रोध नामक एक पाप पर आक्रमण करता है, जो बहुत ही सामान्य है और संसार पर बड़ी शक्ति से राज्य करता है।

और यह उन मोटे, खुले दुर्गुणों में से नहीं है जिन्हें संसार भी दण्ड देता है, परन्तु शैतान के उन बारीक पापों में से एक है जो पाप नहीं कहलाना चाहते। क्योंकि वे झूठे झण्डे के नीचे चलते हैं, ताकि कोई उन्हें डाँट या दण्ड न दे सके। उदाहरण के लिए, घमण्ड घमण्ड नहीं कहलाना चाहता, परन्तु सत्य और धार्मिकता; डाह और बैर नहीं चाहते कि उन्हें झिड़का जाए, परन्तु यह चाहते हैं कि दुष्टता के विरुद्ध सच्ची गम्भीरता और ईश्वरीय उत्साह के रूप में उनकी प्रशंसा की जाए। ये वास्तव में वे दो झण्डे हैं जो शैतान अपने राज्य में लेकर चलता है, अर्थात् झूठ और हत्या, जो संसार की दृष्टि में सर्वोच्च पवित्रता और धार्मिकता होने का सम्मान और प्रशंसा पाने का दावा करते हैं।

2. इस कारण हमारा प्रभु और उद्धारकर्ता फरीसियों को चुनकर अलग करता है, जो सबसे पवित्र और सबसे धर्मी होना चाहते थे, और चाहते थे कि हर कोई उन्हें ऐसा ही समझे; वह उनके कामों को धार्मिकता का सुन्दर नाम भी देता है, परन्तु वह उसका ऐसा चित्र खींचता और ऐसा न्याय करता है कि वह स्वर्ग की ओर नहीं, परन्तु विनाश के अथाह गड्ढे में ले जाती है, शैतान का सच्चा फल।

और वह ऐसा इस कारण करता है कि वे धर्मी और भक्त कहलाना चाहते थे, और सारे संसार को इसके विपरीत सिद्ध करने की चुनौती देते थे, और साथ ही विषैले क्रोध, डाह और बैर से भरे हुए थे। संसार ऐसी बातों में न देख सकता है न न्याय कर सकता है, इसलिए यहाँ केवल मसीह ही न्यायी है, जो ऐसा न्याय-दण्ड सुनाने का साहस कर सकता है और सुना सकता है।

चाहे फरीसियों की यह धार्मिकता कितनी ही सुन्दर और पवित्र क्यों न हो, तौभी वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेंगे; क्योंकि मैं ऐसी धार्मिकता न चाहता हूँ न रखूँगा जो अपने ऊपर स्वयं धार्मिकता की छाप लगाती है, और पाप कहलाना नहीं चाहती, परन्तु ईश्वरीय धार्मिकता के सुन्दर वस्त्र में अकड़ती फिरती है, यहाँ तक कि हमें उन्हें मसीही, भक्त लोग, पवित्र आत्मिक पिता इत्यादि कहना पड़ता है।

3. अब, फरीसियों की यह धार्मिकता किस पर आधारित है और उसे यह नाम कहाँ से मिलता है?

इस बात पर कि परमेश्वर ने कहा, "तू हत्या न करना," इत्यादि। इन्हीं वचनों पर वे जमकर खड़े हो गए। पाठ "तू हत्या न करना" से अधिक कुछ नहीं कहता; इसलिए इससे यह निकलता है कि जो कोई हत्या नहीं करता, वह धर्मी है।

परन्तु जब मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचती है और मेरे साथ अन्याय होता है, तो मेरे पास भड़क उठने और अन्याय पर रोष करने के अच्छे आधार और कारण होते हैं; साथ ही मेरा क्रोध दुगना उचित ठहरता प्रतीत होता है, क्योंकि वह हिंसा और अन्याय सहता है, और वास्तव में हत्या नहीं करता।

मेरा यह क्रोध एक कदम आगे बढ़ता है, अपने कारण को सजाकर, अपनी निर्दोषता की घोषणा करके और परमेश्वर और संसार के सामने अपनी भक्ति का प्रदर्शन करके, इस प्रकार:

क्या मेरे पास क्रोध करने के अच्छे कारण नहीं हैं? मेरे पड़ोसी ने मेरे अनेक उपकारों के बदले में मेरे साथ यह और वह किया है, और मैं प्रसन्नता से उसके लिए अपने जीवन का लहू तक दे देता; यही धन्यवाद है, यही बदला है, जो वह मुझे चुकाता है। क्या मैं यह सब सहूँ और ऐसे द्वेष को अनदेखा कर दूँ? और इस बिन्दु पर एक फरीसी निडर होकर अपने पड़ोसी की निन्दा करने और जहाँ कहीं हो सके उसे अत्यधिक सताने, उसे हानि और चोट पहुँचाने लगता है; और यह सब न्यायपूर्वक किया गया बताया जाता है, और वह स्वयं भक्त और पवित्र है, हाँ, परमेश्वर और मनुष्यों की दृष्टि में शहीद के रूप में सराहा जाता है।

4. इसी प्रकार, जब पोप और उसके अनुयायी उन सब को दोषी ठहराते, जलाते और मार डालते हैं जो उनकी घृणित बातों की उपासना नहीं करते, और उन्हें मसीही कलीसिया के अवज्ञाकारी और हठी गिनते हैं, तो निश्चय ही इसे परमेश्वर की सच्ची सेवा कहा जाना चाहिए, और परमेश्वर को इस बात पर फूला न समाना चाहिए कि वह ऐसे संतों के योग्य ठहरा। हमारे बड़े-बड़े सामन्त भी बहुत कुछ इसी प्रकार करते हैं, जो इतने ऊँचे स्वर से डींग मारते हैं कि वे परमेश्वर और सारे संसार के मित्र हैं, परन्तु अधर्म के शत्रु हैं।

सचमुच, यहाँ हमारी कैसी बड़ी मित्रता है

परमेश्वर और मनुष्यजाति के साथ! परमेश्वर ऐसे संतों के सामने कहाँ खड़ा हो, ताकि उन्हें स्वर्ग की ओर पर्याप्त ऊँचा उठा सके?

5. देखो घुड़सवार सामन्त या कुलीन पुरुष के उस उत्तम, भव्य और पवित्र क्रोध को, जो किसी अपराध या अन्याय का दोषी हो ही नहीं सकता; और जो कोई इस मत का नहीं, वह स्पष्टतः भक्त मनुष्य नहीं है।

इसलिए मसीह संसार को बहुत विचित्र प्रतीत होता है; वास्तव में उसकी (यह शिक्षा) व्यवहार और अभ्यास में अनजानी है, यद्यपि शब्दों के रूप में वह बहुत बार सुनी जाती है और भली-भाँति जानी जाती है।

क्योंकि संसार इसे पाप नहीं मानता कि कोई मनुष्य, जब वह निर्दोष हो, किसी अन्याय पर रोष करे; और यह सच है कि जिसके पास अपने अपराधी के विरुद्ध स्पष्ट मामला है, वह न्यायालय में भी न्याय माँग सकता है, यह सब हमें मानना पड़ता है। परन्तु जब वह इन बातों में अपना निजी क्रोध जोड़ देता है और स्वयं बदला लेने का यत्न करता है, तो वह सीमा पार कर जाता है; अब एक व्यवस्था दूसरी से टकराती है, और एक छोटा सा अधिकार एक बड़े अन्याय में बदल जाता है।

6. इसलिए इस विषय में तुम्हें बाजे को ऐसा सुर में मिलाना है कि उसकी नलियाँ एक स्वर में बजें, और कोई दो आपस में बेसुरी न हों। क्योंकि तुम इसे कैसा न्याय कहोगे, जब कोई केवल एक शब्द से तुम्हें ठेस पहुँचाए, या एक पैसे की चीज़ चुरा ले, और तुम जाकर उसकी बाँह काट डालो या उसका घर जला दो, और साथ ही क्रोध से चिल्लाते रहो: अच्छा, उसने मेरे साथ अन्याय किया, और मेरे पास अच्छे कारण हैं, इत्यादि! ऐसी दशा में तुम्हारा हत्यारा क्रोध, जो मेरे साथ दस गुना अधिक हिंसा और अन्याय करता है, पाप नहीं, परन्तु धार्मिकता और पवित्रता कहलाए, और मैं अधर्मी समझा जाऊँ और अन्याय सहूँ।

7. यह मैं अब बाहर के परायों के लाभ के लिए नहीं कह रहा, सिवाय केवल एक उदाहरण के रूप में यह दिखाने के लिए कि यह दुर्गुण संसार में कैसे राज्य करता है; परन्तु हमारे विषय में कह रहा हूँ, शिक्षक और विद्यार्थी दोनों, जो सुसमाचारी होने पर गर्व करते हैं और फिर भी यह स्वतन्त्रता चाहते हैं कि जब चाहें क्रोधित हों और भड़कें; और अपने को न दण्ड पाने देते हैं न डाँट खाने देते हैं, परन्तु इससे तो यही अच्छा समझते हैं कि सब कुछ टुकड़े-टुकड़े हो जाए, बस हम ही सही और भक्त समझे जाएँ, इस बात के बावजूद कि अधिकार का ऐसा घृणित स्वाँग सौ गुना अधिक अन्याय उत्पन्न करता है।

8. इसलिए मसीह यहाँ दृढ़ कार्रवाई करता है, और सारे संसार में क्रोध को पूरी तरह और सम्पूर्ण रूप से मिटा देता है, उसे अपने अधिकार में ले लेता है और कहता है: मैं केवल यही नहीं कहता, तू हत्या न करना, न अपने भाई को राका कहना, परन्तु तू किसी भी दशा में क्रोध न करना; एक बात उतनी ही गम्भीरता और कड़ाई से मना है जितनी दूसरी।

क्योंकि तुमसे यह नहीं कहा गया कि तुम स्वयं न्याय करो या बदला लो, और चाहे तुम सही हो और तुम्हारा कारण न्यायसंगत हो, तौभी तुम्हारा क्रोध शैतान की ओर से है; जैसा कि संत याकूब अपनी पत्री, 1:20, में कहता है:

"मनुष्य का क्रोध परमेश्वर की धार्मिकता का निर्वाह नहीं कर सकता।

इसलिए सब क्रोध हम में से पूरी तरह मिटा दिया जाना चाहिए, और केवल परमेश्वर का कोप ही कार्य करे; नहीं तो वह शैतान का क्रोध निकलेगा, और निश्चय ही वह बिना पाप के ठण्डा नहीं होता। जैसे ये तीन बातें भी: न्याय करना, बदला लेना और महिमा पाना, हमसे ले ली गई हैं, और किसी व्यक्ति को इनमें भाग नहीं लेना चाहिए, चाहे उनका कारण कितना ही अच्छा हो और उनकी पवित्रता कितनी ही बड़ी हो। परन्तु सम्मान, न्याय और बदला केवल परमेश्वर का है, इसलिए कोप भी।

9. अब, मुझे डर है, जब तक हम यहाँ इस जीवन में हैं, यह हम से न होगा, और फिर भी यह अनुग्रह ही होगा यदि हम केवल इतने भक्त बन जाएँ कि इसका आरम्भ कर सकें; क्योंकि जैसे ही हमें कोई चोट पहुँचती है, मांस और लहू तुरन्त मांस और लहू की नाईं काम करने लगते हैं; वे क्रोध और अधीरता में भड़कने और बड़बड़ाने लगते हैं।

जब हम अन्याय और हिंसा सहते हैं, तो चोट का अनुभव करना हमारे लिए स्वाभाविक है, इसलिए क्रोध की भावनाओं को रोकना और थामना और उनका सामना करना आवश्यक है।

यह भावना कि तुम्हें चोट पहुँची है, जाती रहेगी; परन्तु यह कि तुम उसके अतिरिक्त इस या उस रीति से बदला लेना चाहते हो, मना है। इसलिए ध्यान रखो कि एक बात दूसरी के साथ भली-भाँति बैठे, कि एक दावा दूसरे से न टकराए और न उसे रद्द करे, परन्तु दोनों मेल में रहें, ताकि दोनों बने रह सकें।

यदि तुम बिना अधिक हानि किए अपने अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते, तो उन्हें जाने दो।

क्योंकि एक अन्याय को दूसरे अन्याय से रोकना या दण्ड देना अच्छा नहीं, और न परमेश्वर यह चाहता है कि तुम्हारे तुच्छ दावों के कारण सर्वसाधारण न्याय नष्ट हो जाए।

10. अब मसीह के इस उपदेश का उद्देश्य और विषय-वस्तु यह है: तुम समझते हो कि जो कोई अपनी बाँह से प्रहार नहीं करता, उसने परमेश्वर की आज्ञा के विरुद्ध काम नहीं किया; परन्तु वह अपने पड़ोसी पर क्रोध करने और अपना बदला लेने के लिए स्वतन्त्र है; और बदला लेना उस सीमा तक उचित है, और बिलकुल पाप नहीं। इससे तो आज्ञा व्यर्थ हो जाएगी, और उसमें कोई बल ही न रहेगा।

क्योंकि वह केवल यही नहीं माँगती कि तुम अपनी मुट्ठी से हत्या करने से रुके रहो, परन्तु यह भी कि अपनी जीभ या अपने हृदय से हानि या चोट पहुँचाने से भी रुके रहो। नहीं तो उस आज्ञा का क्या होगा कि हमें अपने शत्रु की भलाई करनी है? यदि वह अटल रहनी है, तो निश्चय ही हमें अपने पड़ोसी के विरुद्ध काम नहीं करना चाहिए। नहीं तो हम चुंगी लेनेवालों और खुले पापियों से किस बात में अच्छे होंगे, जैसा कि मसीह स्वयं कहता है, लूका 6:32, जो एक दूसरे के मित्र हैं, और एक दूसरे को कोई हानि नहीं पहुँचाता?

11. परन्तु शायद तुम कहो: अच्छा, यदि क्रोध को मनुष्य के हृदय से इतनी पूरी रीति से उखाड़ फेंकना है, तो बुराई को कैसे रोका और दण्डित किया जाए, जो कुछ कठोरता के बिना नहीं हो सकता?

परन्तु यदि बुराई को खुली छूट मिले और वह बिना दण्ड के छोड़ दी जाए, तो शीघ्र ही तुम्हारे पास न घर रहेगा न नगर।

हम जानते हैं कि परमेश्वर ने न्याय का कार्य सांसारिक शासन को सौंपा है, और इसी उद्देश्य से शासकों और स्वामियों को ठहराया है, जो परमेश्वर के स्थान पर तलवार धारण करते हैं; उनकी तलवार और उसकी धार परमेश्वर की तलवार और धार है।

इसके अतिरिक्त वे व्यक्तिगत रूप से ठीक अन्य लोगों के समान हैं, और उन्हें किसी और से अधिक क्रोध करने का अधिकार नहीं है।

अब न्यायाधीश या जल्लाद, जब किसी ऐसे मनुष्य को दोषी ठहराता और प्राणदण्ड देता है जिसने उनमें से किसी को व्यक्तिगत रूप से कभी कोई हानि नहीं पहुँचाई, तो वह ऐसा परमेश्वर के स्थान पर करता है, परमेश्वर की जगह कार्य करते हुए, क्योंकि वह अपराधी परमेश्वर के न्याय-दण्ड और सज़ा का भागी हो गया है। निश्चय ही मनुष्य के हृदय में न क्रोध होना चाहिए न कड़वाहट, और फिर भी परमेश्वर का कोप और उसकी तलवार अपना काम पूरा करते हैं।

12. युद्ध में भी यही बात लागू होती है, जब तुम्हें या तो अपना बचाव करना पड़ता है, या ज़ोर से वार करना, मारना और जलाना पड़ता है: तब सम्भवतः कोप और बदला सर्वोपरि राज्य करते हैं, और फिर भी यह मनुष्य के हृदय से नहीं निकलना चाहिए, परन्तु ईश्वरीय अधिकार और आज्ञा से उत्पन्न होना चाहिए, ताकि दुष्टों को दण्ड मिले और शान्ति बनी रहे। चाहे इससे तुम्हें नुकसान और हानि भी उठानी पड़े, तुम्हें उसके अधीन होना है। इसी प्रकार परमेश्वर ने

अपने कोप को बाबुल के राजा के द्वारा यरूशलेम पर आने दिया; फिर रोमियों के द्वारा, यहाँ तक कि एक पत्थर पर दूसरा पत्थर भी न बचा।

13. इसलिए जहाँ ऐसा कोप होता है, उसे मनुष्य का क्रोध नहीं, परन्तु परमेश्वर का कोप कहा जाना चाहिए। और जब, दुर्भाग्य से, तुम परमेश्वर के और मनुष्य के क्रोध को मिला देते हो, तो यह शैतान का दयनीय काम है। दुष्टता, मैं कहता हूँ, रोकी जानी चाहिए; परन्तु यह कर्तव्य परमेश्वर के स्थान पर और उसकी जगह पूरा किया जाना चाहिए। परन्तु जब कोई न्यायाधीश और शासन भक्त नहीं होते, और वे अपने निजी क्रोध को परमेश्वर के कोप के साथ मिला देते हैं, और अपने कामों को पद के नाम और ढाल से सजाते हैं; जब वे भीतर ही भीतर मुझ से बैर रखते हैं और मुझे हानि पहुँचा सकते हैं, तो वे ऐसा करने के अवसरों का लाभ उठाते हैं, और फिर दावा करते हैं कि उन्होंने ऐसा पद के अनुसार किया: इसे मैं शैतानी द्वेष कहूँगा, परन्तु वे दावा करते हैं कि उन्होंने उचित काम किया है और वे प्रशंसा के अधिकारी हैं।

14. परन्तु तुम कहते हो: अच्छा, उस अधिकारी ने मेरे साथ यह और वह किया है, और मैं उसे किसी और रीति से रोक नहीं सकता; यदि मैं इसे होने दूँ, तो मुझे कभी शान्ति न मिलेगी।

यह सचमुच उचित नहीं कि लोग तुम्हें हानि पहुँचाएँ, और न तुम्हें उचित रीति से अपनी रक्षा करने से मना किया गया है; परन्तु यह कभी ठीक न होगा कि तुम दोहरी चाल चलो, और पद को अपने क्रोध को निकालने का साधन बनाओ, ताकि लोग बाद में कहें: यह श्रीमान योहन्ना या श्रीमान पतरस ने नहीं किया, परन्तु महापौर ने या न्यायाधीश ने किया, और फिर तुम यह कहकर श्रेय लो कि तुमने यह क्रोध या बैर के कारण नहीं, परन्तु कर्तव्य और न्याय के कारण किया।

15. यहाँ तुम वह कुख्यात गन्दगी देखते हो, जो ईश्वरीय कोप के साथ मानवीय, हाँ, शैतानी क्रोध को जोड़कर और दोनों की एक ही रोटी बनाकर बनती है, जिन्हें वास्तव में आकाश और पृथ्वी से भी अधिक दूर अलग रखा जाना चाहिए। और जैसे वे दूसरी आज्ञा के विरुद्ध शपथ खाने और ऐसे ही कामों से परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेते हैं, और उस पवित्र नाम को झूठ की सेवा में लगाते हैं, ताकि वह उस सुन्दर और महिमामय नाम के ठप्पे के नीचे बाज़ार में बिक सके: वैसे ही इस विषय में भी पद और व्यवस्था, जो परमेश्वर के हैं, तुम्हारी डाह और बैर की सेवा करें, और उन्हें ऐसी प्रतिष्ठा दें कि वे पड़ोसी को हानि पहुँचाने के अपने सब उद्देश्य पूरे कर सकें। साथ ही तुम ऐसे अकड़ते फिरते हो मानो तुमने उचित और ठीक काम किया हो।

हाँ, तुम दुगने संत हो; पहले तो इसलिए कि तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार हुआ है; दूसरे इसलिए कि तुम व्यक्तिगत रूप से बदला नहीं लेते या न्याय नहीं माँगते, परन्तु एक अधिकारी या न्यायाधीश की हैसियत से।

इसी रीति से हमारे कोमल संत, पोप-पक्षी, बिशप और याजक, अब हर जगह काम करते हैं, और उनके पीछे-पीछे चलते हुए बड़े-बड़े शासक और स्वामी लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते और उन्हें मार डालते हैं, जैसी उनके उन्मत्त क्रोध और बैर की सनक उन्हें प्रेरित करे।

और अन्त में यह सब परमेश्वर की सेवा और सर्वोच्च पवित्रता कहलाना है।

16. इस प्रकार मनुष्य का क्रोध सदा अपने पड़ोसी के प्रति डाह और बैर से भरा रहता है, क्योंकि वह शैतान के द्वारा उत्पन्न किया जाता और मनुष्य के हृदय में बोया जाता है, विशेषकर फरीसी संतों में, जो अनेक प्रकार से पाप करते हैं और दूसरों की अपेक्षा दण्ड के अधिक योग्य हैं, क्योंकि एक तो वे परमेश्वर के पद और व्यवस्था में हस्तक्षेप करते हैं, और जो उसका अपना है उसे लूट लेते हैं, और फिर भी सही ठहरना और भक्त समझा जाना चाहते हैं।

17. इसके विपरीत, जब परमेश्वर का कोप उसकी आज्ञा के अनुसार चलाया जाता है, तो वह डाह या बैर से नहीं, परन्तु शुद्ध प्रेम और भले हृदय से उत्पन्न होता है। ऐसा हृदय जो इस बात पर दुःखी होता है कि मनुष्य पर कोई विपत्ति आए, और फिर भी, अपने ही कारण और अपने पद के कारण, परमेश्वर को दुष्टता को दण्ड देना और मिटाना पड़ता है।

18. क्योंकि यह सचमुच स्पष्ट है कि आदम अपने पुत्र कैन से, उसके पहिलौठे मांस और लहू के रूप में, प्रेम करता था; और वह (कैन) पवित्र भी होना चाहता था और उसने अपनी पहली भेंट से परमेश्वर की सेवा करनी आरम्भ की, इत्यादि; और समझता था कि उसकी भेंट उसके भाई की भेंट से कहीं अधिक परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है। वह इस बात पर भी अड़ा रहा कि पहिलौठा होने के कारण वह सही है और उसका भाई गलत, इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में उसे ही सच्चा याजक और प्रथम होना चाहिए। इन्हीं बातों पर वह भरोसा करता था, अपने भाई को तुच्छ जानता था, और समझता था कि उसके पास क्रोध करने और अपने भाई को सताने और मार डालने के अच्छे कारण हैं; मानो उसके साथ अन्याय हुआ हो कि यहोवा ने उसकी भेंट को आदर से नहीं देखा।

इसलिए वह आगे बढ़ता है, और क्योंकि उसके पिता ने उसे स्वीकार नहीं किया और उसकी प्रशंसा नहीं की, वह अपने भाई की हत्या कर देता है। इसके बाद वह ढिठाई करता है, क्योंकि जब

आदम परमेश्वर के नाम से और उसके स्थान पर उससे लेखा माँगता है, तो वह पलटकर उत्तर देता है, मैं अपने भाई के विषय में क्या जानूँ? क्या मैं उसका रखवाला हूँ? अब, यद्यपि वह स्वाभाविक सन्तान के रूप में आदम को प्रिय था, और हाबिल की मृत्यु के बाद उसकी एकमात्र सन्तान था, तौभी उसका पिता वह कठोर और भयानक दण्ड सुनाता है, उत्पत्ति 4:10:

"तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दोहाई दे रहा है। इसलिए अब भूमि की ओर से तू शापित है।" फिर:

"तू पृथ्वी पर भटकनेवाला और भगोड़ा होगा।"

सचमुच ये कोप के वचन और काम हैं, क्योंकि इनके द्वारा उसने उसे सबसे भारी बहिष्कार और सबसे भयानक शाप के अधीन कर दिया, और उसे स्वर्ग और पृथ्वी से निकाल दिया।

आदम तुरन्त इस कठोर कोप को पूरा करने लगता है, और अपने पुत्र को निकाल देता है, ताकि उसे कहीं भी सुरक्षित निवास-स्थान न मिले। निःसन्देह उसने यह बड़ी अनिच्छा से किया, क्योंकि वह अपने पुत्र को अपने पास रखना कहीं अधिक पसन्द करता; परन्तु परमेश्वर के कोप को अपना मार्ग लेना ही होता है, जो मृत्यु और नरक की आग ठहराता है।

19. मसीही कलीसिया को भी इन्हीं सिद्धान्तों पर काम करना चाहिए, जब वह किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करती है और "ऐसे मनुष्य को शैतान को सौंप देती है," जैसा कि संत पौलुस ने कुरिन्थुस में किया, 1 कुरिन्थियों 5:5; और जब वह उसे संस्कार और सारी संगति से वंचित करती है, ताकि उसके पाप में भागी न बने। यह सचमुच एक भयानक दण्ड और भीषण कोप है; तौभी यह मनुष्य का नहीं, परन्तु परमेश्वर का कोप है। क्योंकि कलीसिया कहीं अधिक यह देखना चाहती है कि मनुष्य फिरे और उसका उद्धार हो; जैसा कि वह अपने कामों से दिखाती है, क्योंकि जहाँ कोई पश्चाताप करता और फिरता है, वहाँ वह उसे अपने प्रिय पुत्र के समान आनन्द से फिर ग्रहण करती है और सब स्वर्गदूतों के साथ उस पर आनन्द मनाती है, जैसा कि मसीह खोई हुई भेड़ और उड़ाऊ पुत्र के विषय में कहता है। लूका 15:6 आदि।

20. यहाँ हमें सावधान रहना चाहिए कि इस अधिकार का दुरुपयोग न करें, जैसा कि पोप उन लोगों के विरुद्ध करने का दोषी रहा है जो उसके व्यक्तित्व या उसके शासन पर आक्रमण करते थे; इस प्रकार उसने अपने व्यक्तित्व को अपने पद के साथ गड्डमड्ड कर दिया, और अपने क्रोध को परमेश्वर का कोप बता दिया, और इससे दोनों को बिगाड़ दिया और दाखरस में विष उँडेल दिया।

क्योंकि इसी प्रकार पोप ने ईश्वरीय कोप के नाम से सम्राटों और राजाओं को धमकाया और स्तब्ध किया, और फिर भी उसने अपने ही क्रोध और द्वेष को उँडेलने के सिवा और कुछ नहीं किया।

इसी कारण पवित्रशास्त्र में उसकी कलीसिया को निन्दाओं की कलीसिया कहा गया है, प्रकाशितवाक्य 13:5, 16, जिसके माथे पर, उसके सब वचनों और कामों में, निन्दाओं के चिह्न लिखे हुए हैं।

21. अब यही वह कोप है जिसे हम ईश्वरीय या पितृतुल्य कोप कहते हैं। फिर एक और है, जिसे भाईचारे का कोप कहा जाता है, जो उसी स्वरूप का है क्योंकि वह प्रेम से उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए, जब मैं किसी ऐसे व्यक्ति पर क्रोधित होता हूँ जिससे मैं हृदय से प्रेम करता हूँ और जिसकी मैं हर प्रकार की भलाई चाहता हूँ, और मैं इस कारण दुःखी होता हूँ कि वह अपने पापों को नहीं छोड़ता और सुधरता नहीं, इस प्रकार कि मैं सदा व्यक्ति और पाप में भेद करता हूँ, ताकि व्यक्ति की सहायता करूँ और पाप को रोकूँ, और समझाने, चेतावनी देने, धमकाने और सुधारने के द्वारा जो कुछ मुझ से हो सके करता हूँ, ताकि उसे अपने पापों को छोड़ने की ओर ले जाऊँ।

22. परन्तु यहाँ भी चौकस रहना अच्छा है, कहीं ऐसा न हो कि इसके पीछे कोई धूर्त छिपा हो, अर्थात् अपना ही क्रोध उसमें मिल जाए।

क्योंकि हमारा क्रोध इतना पूरी तरह अनुपस्थित होना चाहिए कि उसका एक कण भी न पाया जाए; परन्तु केवल परमेश्वर का कोप ही राज्य करे, जो या तो सौंपे गए पद से, या भाईचारे के प्रेम से निकले, जिसका यहाँ अर्थ परमेश्वर के कोप से होगा। क्योंकि यह परमेश्वर की आज्ञा है कि हम एक दूसरे को समझाएँ, सुधारें, संवारें और एक दूसरे की सहायता करें, ताकि हमारा पड़ोसी अपने पापों से रुक जाए और हमारी चितावनियों को आनन्द और धन्यवाद के साथ ग्रहण करे। यह उस सामान्य मसीही प्रेम का "कोप" है जिसके विषय में मसीह कहता है, मत्ती 18:15: "यदि तेरा भाई तेरे विरुद्ध अपराध करे, तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा," और पवित्रशास्त्र में इसे एक उत्तम, ईश्वरीय धुन (जलन) कहा गया है।

[2 कुरिन्थियों] 11:2 कहता है: "मैं तुम्हारे विषय में ईश्वरीय धुन लगाए रहता हूँ।"

क्योंकि इस प्रकार का कोप तुम्हारा अपमान या तुम्हारी हानि नहीं, परन्तु तुम्हारा सम्मान और लाभ चाहता है; उसे यह देखकर दुःख होगा कि तुम अपने प्राण के उद्धार की आशा को हानि पहुँचाओ।

23. इसलिए हम दृढ़ता से कहते हैं कि मसीह यहाँ उस पद के विषय में उपदेश नहीं दे रहा जो परमेश्वर का है, न प्रेम के विषय में, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के अपने और निजी क्रोध के विषय में, जो हमारे हृदय और इच्छा से निकलता है, और हमारे पड़ोसी के व्यक्तित्व के विरुद्ध होता है:— यह क्रोध पूरी तरह मिटा दिया जाए और मार डाला जाए, चाहे हमारे साथ हुई हानि और अन्याय हमें कितना ही दुःख और पीड़ा दे। उदाहरण के लिए: कि यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला

इतनी लज्जाजनक रीति से मारा गया, कि मसीह क्रूस पर कीलों से जड़ा गया, कि पवित्र शहीद इतनी क्रूरता से मार डाले गए, यह सब भक्त हृदयों के रोने और विलाप के बिना नहीं बीता; क्योंकि हमारे हृदय लोहे के नहीं, परन्तु मांस के हैं, और होने भी चाहिए, जैसा कि संत बर्नार्ड कहता है: Dolor est, sed contemnitur; यह पीड़ादायक है, परन्तु इसे सहना और इस पर जय पाना ही है।

और पीड़ा सहने, रोने और विलाप करने में, तथा बदला ढूँढ़ने या बैर और डाह पालने में बड़ा अन्तर है।

24. अब परमेश्वर चाहता है कि इस आज्ञा: तू हत्या न करना, को इतना व्यापक समझा जाए कि कोई क्रोध न करे।

क्योंकि स्वभाव से हम सब झूठे हैं, स्वाभाविक पाप और अन्धेपन में जन्मे हैं, न यह जानते हैं कि क्रोध कैसे करें, न यह देखते हैं कि हमारा स्वभाव कितना भ्रष्ट है, अर्थात् यह कि वह न ठीक रीति से प्रेम कर सकता है न क्रोध, क्योंकि दोनों में वह अपने आप और स्वार्थ के सिवा और कुछ नहीं ढूँढ़ता।

क्योंकि अब स्वभाव से हम इतने भ्रष्ट हैं, इसलिए मनुष्य के रूप में प्रेम करना और क्रोध करना, जिसमें हमारा स्वभाव अपना ही स्वार्थ ढूँढ़ेगा, दोनों मना और रद्द कर दिए गए हैं। दूसरी ओर, वह ईश्वरीय प्रेम जो "अपनी भलाई नहीं चाहता" परन्तु अपने पड़ोसी की, उसकी आज्ञा दी गई है, और वह क्रोध भी जो अपने लिए नहीं, परन्तु परमेश्वर के लिए उत्साह रखता है, जिसे उचित है कि वह या तो उसकी आज्ञाओं के उल्लंघनों को दण्ड दे, या प्रेम की आत्मा से और हमारे पड़ोसी की भलाई के लिए उसकी सहायता करे।

25. परन्तु फरीसी पवित्रता इस प्रकार नहीं करती; परन्तु जैसे उसमें अपने पड़ोसी के लिए कोई प्रेम नहीं, और वह केवल यही चाहती है कि अपना ही सम्मान हो, अपनी ही प्रशंसा और सेवा हो; वैसे ही वह सच्चे भक्त लोगों के विरुद्ध भड़कने और बड़बड़ाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकती, और फिर भी यह दिखावा करती है कि उसने उस आज्ञा के विरुद्ध पाप नहीं किया। जैसा कि फरीसियों और महायाजकों ने मसीह के साथ व्यवहार किया, जिन्होंने उसे न्यायी

पीलातुस को सौंप दिया कि वह क्रूस पर चढ़ाया जाए, और फिर भी वे दोषी नहीं गिने जाना चाहते थे, परन्तु फसह का मेमना खाना और पवित्र बने रहना चाहते थे।

26. इसलिए प्रभु सारी फरीसी पवित्रता और धार्मिकता पर एक नया प्रहार करता है, उन्हें अनुग्रह के प्रत्येक कण और स्वर्ग के राज्य से वंचित करता है और उन्हें नरक की आग का दण्ड सुनाता है, क्योंकि उनकी अधार्मिकता

परमेश्वर की दृष्टि में दुगनी गलत है और जड़ तक भ्रष्ट है। इसलिए मैं कहता हूँ, परमेश्वर कहता है:

"जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा;" मैं यह नहीं कहता, केवल वही जो अपने हाथ से मार डाले, परन्तु यदि तुम्हारे हृदय में क्रोध है, तो तुम पहले ही न्याय के द्वारा दोषी ठहराए जाने के योग्य हो; क्योंकि ऐसा क्रोध केवल मनुष्य की जन्मजात दुष्टता से उत्पन्न होता है, जो या तो अपना बदला और अपनी उच्छृंखलता, या अपना सम्मान और लाभ ढूँढ़ती है। परन्तु परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम अपना सम्मान और अपना अधिकार ढूँढ़ो; परन्तु उसे वह ढूँढ़ने और माँगने दो जिसे यह करना चाहिए, और जिसे उसने अधिकार दिया है, अर्थात् न्यायाधीश और जल्लाद, जो अपना नहीं, परन्तु परमेश्वर का काम देखते हैं, क्योंकि नहीं तो उन्हें किसी को प्राणदण्ड देने या दण्डित करने की अनुमति न होती। परन्तु ध्यान रखो, वह कहता है, कि तुम व्यक्तिगत रूप से क्रोधित न हो, परन्तु अपने क्रोध को इतनी पूरी रीति से वश में रखो कि, चाहे पद के कर्तव्य में हो या नहीं, वह हृदय से न निकले।

भाग II. क्रोध के चिह्नों के विषय में।

27. इस पाठ के दूसरे भाग, "जो कोई अपने भाई को राका कहेगा," इत्यादि, का अर्थ हम हर प्रकार का बुरा व्यवहार और पड़ोसी के साथ किए गए बुरे काम समझते हैं, जो क्रोध भरे शब्दों से नहीं किए जाते।

ऐसा मनुष्य, मसीह कहता है, "महासभा में दण्ड के योग्य होगा;" अभी यह निश्चित नहीं हुआ कि उसके साथ क्या किया जाए, परन्तु उस पर दोषी होने का निर्णय हो चुका है; केवल दण्ड निश्चित करना शेष है।

इसका अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता, परन्तु पहले ही अपना दण्ड कमा चुका है; उसमें और विनाश में पड़े हुओं में केवल इतना अन्तर है कि वह अन्तिम दण्ड से थोड़ा अधिक दूर है; परन्तु तौभी वह भी वहीं का है।

28. तीसरा भाग है: "जो कोई कहे, अरे मूर्ख।"

यह भी एक बहुत सामान्य दुर्गुण है, जो हमारे पड़ोसी का सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा छीन लेने में है, चाहे यह उसकी पीठ पीछे किया जाए या उसके मुँह पर, जिसे "contumeliam" और "convitium" (अपमान और गाली), अर्थात् बदनाम करना और गाली देना, कहा जाता है। जो कोई ऐसा करता है, मसीह कहता है, "वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा;" अर्थात् प्रश्न पर विचार-विमर्श करने, अपराधी को बुलाने, उस पर अभियोग लगाने और उसे दण्ड सुनाने की कोई आवश्यकता नहीं; वह पहले ही दोषी सिद्ध और दण्डित हो चुका है, केवल यह शेष है कि जल्लाद उसे ले जाए और अपना कर्तव्य पूरा करे।

इसलिए परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम क्रोध से किसी भी रूप या रीति से बदला लो, चाहे अपने हृदय से, अपनी मुट्ठी से, या अपने मुँह से, और इस प्रकार अपने पड़ोसी को हानि पहुँचाओ, उससे द्वेष दिखाओ, उसे कठोर शब्द कहो, इत्यादि।

29. परन्तु मैं तुम्हें यह कहते सुनता हूँ, तो फिर कौन प्रचारक या न्यायाधीश या वादी हो सकता है, यदि किसी के सम्मान पर प्रश्न न उठाया जाए, या किसी को कभी मूर्ख न कहा जाए?

तब तो प्रचारक, न्यायाधीश, वादी, गवाह इत्यादि सब को चुप रहना पड़ेगा। परन्तु यहाँ, जैसा मैंने कहा है, यह अन्तर ध्यान में रखना है।

जब मैं, एक प्रचारक के रूप में, तुम्हें मंच से सबके सामने, या पाप-अंगीकार में अकेले में डाँटता हूँ, तो यह मैं नहीं करता, परन्तु परमेश्वर का वचन करता है: इसलिए तुम्हें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि मैं तुम्हारे सम्मान के विरुद्ध बोल रहा हूँ। क्योंकि एक प्रचारक अपने पद के अनुसार किसी को अपमानित या उसकी निन्दा नहीं कर सकता, जब तक कि वह धूर्त न हो, जो अपने पद के साथ अपना द्वेष और बैर मिला देता है।

और तुम किसी न्यायाधीश से, जब वह अपने पद के कार्य कर रहा हो, यह नहीं कह सकते:

तुम मुझे चोर और हत्यारा कहकर मेरे सम्मान के विरुद्ध बोल रहे हो; क्योंकि तुमसे परमेश्वर ने ऐसा कहा है, न्यायाधीश ने नहीं। इसलिए जब तुम्हें डाँटा या सुधारा जाए, तो यह कहना ठीक नहीं कि इससे तुम्हारे सम्मान को ठेस पहुँचती है।

सच है, ऐसे शब्द तुम्हारे सम्मान को नहीं बढ़ाते; परन्तु यह मनुष्य ने नहीं, परमेश्वर ने किया; क्या उसे इस विषय में बोलने का अधिकार और प्रभुत्व न हो?

30. परन्तु जब परमेश्वर पद के द्वारा पहले ही निर्णय दे चुका हो, तब मैं और दूसरे भी उसके विषय में बोल सकते हैं; क्योंकि कोई भी परमेश्वर के सार्वजनिक कामों और न्याय-निर्णयों के विषय में बोल सकता है; तब वह इतिहास का विषय हो जाता है, जिसकी हर जगह चर्चा होती है। इसलिए हमें तौभी हर किसी पर इस सीमा तक चुप्पी नहीं थोपनी चाहिए कि उसे यह कहने से भी रोक दें, "यह मनुष्य चोर या धूर्त है," जब न्यायाधीश उसे ऐसा घोषित कर चुका हो। क्योंकि जितना सम्मान परमेश्वर ने किसी मनुष्य से ले लिया या उसे दिया है, उससे अधिक तुम न उससे ले सकते हो न उसे दे सकते हो। अब क्योंकि परमेश्वर ने निर्णय घोषित कर दिया है और न्यायाधीश या प्रचारक के द्वारा उसे सबके सामने प्रकाशित कर दिया है, तो कोई भी अच्छे विवेक के साथ उसके विषय में बोल सकता है। मैं इस पर फिर इसलिए आता हूँ क्योंकि हम सदा गलत मार्ग पर जाने को प्रवृत्त रहते हैं।

प्रचार करते समय सदा यह प्रवृत्ति रहती है कि हर बात को ऐसा मोड़ा और ऐंठा जाए कि परमेश्वर के वचन से बँधना न पड़े। इसी प्रकार, जब हम मसीह के साथ कहते हैं कि किसी को अपने भाई पर क्रोध या उससे विरोध नहीं करना चाहिए या उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए, तो हर कोई प्रचारक को इस सीमा तक चुप कराना चाहेगा कि वह सार्वजनिक पापों और दुर्गुणों को न छुए और न उन्हें दण्ड दे।

31. अन्त में हमारे सुसमाचार-पाठ का अर्थ यह है: जब तुम एक मनुष्य के रूप में, निजी कारणों से, अपने पड़ोसी के सम्मान के विरुद्ध बोलते हो, और उसके पापों पर फूले नहीं समाते, तो यह दुष्टता और अन्याय है। परन्तु जब बात यहाँ तक पहुँच जाए कि परमेश्वर स्वयं किसी बात को सार्वजनिक कर दे, तब मेरे लिए यह ठीक न होगा कि मैं किसी सार्वजनिक दुष्ट की प्रशंसा करूँ, जिसे परमेश्वर ने स्वयं सबके सामने ऐसा सिद्ध कर दिया है; क्योंकि यह धूर्तता का बचाव करने और उसे बढ़ावा देने के समान होगा। इसलिए हमारा सारा आचरण इसी से संचालित होना चाहिए कि हम अपनी ओर से कुछ न सोचें न करने का यत्न करें; परन्तु यह देखें कि परमेश्वर क्या आज्ञा देता है, या अपने सेवकों के द्वारा क्या करता है; तब यह परमेश्वर ने स्वयं किया है और सब कुछ भला और उचित है। इसलिए ऐसे मामलों में चुप करा दिया जाना ठीक नहीं, परन्तु सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होना, और परमेश्वर के न्याय-निर्णय को बनाए रखने और उसकी प्रशंसा करने में अपना प्रभाव लगाना चाहिए, ताकि दूसरे भयभीत हों और चेतावनी पाएँ।

इस सुसमाचार-पाठ पर इस समय के लिए इतना पर्याप्त हो।

लूथर की कलीसियाई पोस्टिल।

त्रिएकता के बाद सातवाँ रविवार।

यह उपदेश वर्ष 1523 में सात अलग-अलग संस्करणों में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ; और 1523 के "दस उपयोगी

उपदेशों" के संग्रह में तथा 1523 के सत्ताईस उपदेशों के संग्रह में भी।

पाठ। मरकुस 8:1-9. उन दिनों में, जब फिर बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई, और उनके पास कुछ खाने को न था, तो उसने अपने चेलों को पास बुलाकर उनसे कहा, मुझे इस भीड़ पर तरस आता है, क्योंकि ये तीन दिन से बराबर मेरे साथ हैं, और इनके पास कुछ भी खाने को नहीं; और यदि मैं इन्हें भूखा घर भेज दूँ, तो मार्ग में थककर रह जाएँगे; और इनमें से कोई-कोई दूर से आए हैं। उसके चेलों ने उसको उत्तर दिया, यहाँ जंगल में इतनी रोटी कोई कहाँ से लाए कि ये तृप्त हों? उसने उनसे पूछा, तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं? उन्होंने कहा, सात।

तब उसने लोगों को भूमि पर बैठने की आज्ञा दी; और वे सात रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके तोड़ीं, और अपने चेलों को देता गया कि उनके आगे रखें; और उन्होंने लोगों के आगे परोस दिया।

और उनके पास थोड़ी सी छोटी मछलियाँ थीं; और उसने उन पर आशीष माँगकर उन्हें भी लोगों के आगे रखने की आज्ञा दी।

अतः वे खाकर तृप्त हो गए; और जो टुकड़े बच रहे थे, उनके सात टोकरे भरकर उठाए।

और लोग लगभग चार हज़ार थे; और उसने उन्हें विदा किया।

विश्वास और प्रेम के विषय में।

I. विश्वास के विषय में।

1. विश्वास को मसीह का कौन सा सच्चा चित्र रखना चाहिए। 1. 3. अनन्त सम्पत्ति के सम्बन्ध में विश्वास के विषय में।

भय और अनुग्रह का चित्र। ख. यह विश्वास यहाँ एक दृश्य, जीवित रूप में कैसे चित्रित किया गया है। 2. सांसारिक सम्पत्ति के विषय में विश्वास। क. जहाँ यह विश्वास नहीं है, वहाँ

अविश्वास की शक्ति और कार्य। 14. आत्मिक और अनन्त सम्पत्ति के विषय में कोई विश्वास नहीं हो सकता। 3-4. II. प्रेम के विषय में।

1. हम मसीह के आदर्श से प्रेम कैसे सीख सकते हैं। 15-16. यह विरला ही है कि तुम कोई

2. यह प्रेम याजकों, भिक्षुओं और भिक्षुणियों में नहीं पाया जाता। 16. ख. सच्चा स्वरूप और रीति

3. परमेश्वर अपने सारे वचन में इस प्रेम पर ज़ोर देता है। 17-18. ग. यह विश्वास किसी भी … में मेल नहीं खाता

4. यह प्रेम विश्वास के साथ जुड़ा होना चाहिए। 19. घ. इस विश्वास को कैसे पहचानें

[मुद्रित पृष्ठ-चिह्न — अनुवाद में छोड़ा गया]

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