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रोगों को सह लिया, और हमारे ही दुःखों को उठा लिया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी," इत्यादि। और पवित्रशास्त्र के अन्य वचन भी इसकी गवाही देते हैं।
5. क्योंकि प्रभु मसीह का चित्र ऐसा खींचा जाना चाहिए कि वही एकमात्र व्यक्ति है जो किसी एक देश या किसी एक नगर का नहीं, वरन् सारे संसार का दुर्भाग्य अपने ऊपर ले लेता है; जैसा सन्त यूहन्ना उसका नाम लेकर कहता है, यूहन्ना 1:29: "देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप उठा ले जाता है।"
परन्तु यदि वह पापों को उठाता है, तो इससे यह निकलता है कि जो कुछ पाप से सम्बन्ध रखता है और जो कुछ पाप के पीछे आता है, जैसे शैतान, मृत्यु और नरक, उसे भी उसने अवश्य उठाया होगा।
6. यही कारण है कि वह यहाँ इस प्रकार आह भरता है, उस व्यक्ति के रूप में जिसे यह काम करना था, और जिसके विषय में भविष्यद्वक्ताओं ने बहुत पहले से घोषणा कर दी थी कि वह सारी मानव जाति की सब बुराइयों पर गहरी करुणा करेगा। उसे केवल इसी एक बेचारे मनुष्य की जीभ और कानों की चिन्ता न थी; वरन् यह सब जीभों और कानों पर, हाँ, सब हृदयों, शरीरों और प्राणों पर, और आदम से लेकर उस अन्तिम मनुष्य तक जो अभी जन्म लेनेवाला है, सब मनुष्यों पर एक सामान्य आह थी। इसलिए वह मुख्यतः इस कारण आह नहीं भरता कि यह मनुष्य भविष्य में बहुत से पाप करेगा; वरन् मुख्य कारण यह है कि उसने,
प्रभु मसीह ने, माँस और लहू के उस सारे ढेर को देखा जिसे शैतान ने अदन की वाटिका में घातक चोट पहुँचाई थी, और मनुष्य जाति को बहरा और गूँगा बनाकर इस प्रकार उन्हें मृत्यु और नरक की आग में धकेल दिया था।
यह दृश्य मसीह की आँखों के सामने था, इसलिए उसने दूर-दूर तक अपने चारों ओर दृष्टि की, और देखा कि शैतान ने एक मनुष्य के पतन के द्वारा अदन की वाटिका में कितनी बड़ी हानि पहुँचाई है। वह उन दो कानों को नहीं देखता, वरन् मनुष्यों की उस सारी संख्या को देखता है जो आदम से निकले थे और जो अभी आनेवाले थे। इसलिए यह सुसमाचार-पाठ
मसीह को ऐसे मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करता है जो तुम्हारी और मेरी, और हम सब की ऐसी चिन्ता करता है जैसी हमें स्वयं अपनी चिन्ता करनी चाहिए, मानो वह स्वयं उन्हीं पापों और क्लेशों में डूबा हुआ हो जिनमें हम डूबे हुए हैं; और वह इस बात पर आह भरता है कि स्वयं शैतान ने यह विनाश कर डाला है।
7. निश्चय ही यही कारण है कि वह इस घटना में इतनी बड़ी गम्भीरता दिखाता है और विशेष रीतियों और उपायों से काम लेता है। मानो वह कहना चाहता हो: "तुम्हारी शोचनीय दशा, तुम्हारा
पाप और मृत्यु का बन्धन, मुझे इतनी गहराई से छूता है कि किसी और बात से नहीं, केवल अपने ही विचारों से प्रेरित होकर मुझे एक विशेष रीति से काम करना पड़ता है।" क्योंकि उसके अन्य कामों की तुलना में इस घटना में उसके काम इतने असाधारण हैं कि यह सचमुच आश्चर्य की बात है।
उसने बहुतों को अक्सर एक ही वचन से चंगा किया, या दुष्टात्माओं को निकाला; हाँ, उसने कुछ लोगों की सहायता तो उनके पास गए बिना ही की, जैसे सूबेदार के सेवक की, मत्ती 8:13; परन्तु यहाँ दो रोगी अंगों, अर्थात् जीभ और कान के कारण, उसके काम बहुत ही विलक्षण हैं, मानो उसे विशेष रूप से चिन्ता हो।
इसके द्वारा वह हमें दिखाता है कि इस समय उसकी मनुष्य जाति के विषय में एक विशेष दृष्टि और विशेष विचार थे।
8. क्योंकि जैसे हम मानते हैं कि मसीह, हमारे प्रभु और परमेश्वर में, पाप को छोड़कर, अन्य सब मानवीय गुण थे, वैसे ही हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि उसके विचार सदा एक से नहीं रहते थे, न वह सदा एक ही मनोदशा में रहता था, न सदा एक सा उत्साही रहता था; वरन् अन्य पवित्र जनों के समान वह भी विभिन्न रीतियों से प्रेरित होता था। इसलिए, जैसे इस घटना में उसकी भावनाएँ और विचार विलक्षण थे, वैसे ही उसके काम भी विलक्षण थे, ताकि हम देखें कि वह शरीर और प्राण में कितना सच्चा मनुष्य था, जिसका मन हर समय एक सी दशा में नहीं रहता था, ठीक वैसे ही जैसे वह एक ही समय में सदा भूखा और नींद से भरा नहीं रहता था। जैसे मनुष्यों में ये दशाएँ बदलती रहती हैं, वैसे ही उसमें भी बदलती थीं, जैसा सन्त पौलुस कहता है,
फिलिप्पियों 2:7: "उसने दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया, और मनुष्य के रूप में प्रगट हुआ," इत्यादि। इसे केवल बाहरी रूप-रंग के विषय में नहीं, वरन् उसके प्राण और उसके हृदय के विचारों के विषय में भी समझना चाहिए, कि वह एक समय उत्साही होता था तो दूसरे समय और भी अधिक उत्साही, इत्यादि।
तो यह एक कारण है कि मसीह ने यहाँ ऐसा किया, अर्थात् इसलिए कि वह सच्चा मनुष्य है; परन्तु साथ ही वह ऐसा व्यक्ति भी है जो सब मनुष्यों के स्थान पर खड़ा हुआ और जिसने एक ही समय में इस मनुष्य के और सब मनुष्यों के रोगों को अपने ऊपर ले लिया।
9. दूसरा विचार भी सत्य है, कि वह यह जानकर बहुत दुःखी हुआ कि यदि वह इस मनुष्य को चंगा करेगा, तो चंगा होने के बाद यह मनुष्य बहुत पाप कर सकता है। परन्तु इसे केवल इस मनुष्य के भविष्य के पापों पर लागू करके समझाना बहुत संकीर्ण है। क्योंकि मसीह, हमारे प्रभु परमेश्वर का काम यह था कि
वह न केवल एक मनुष्य के पाप के लिए चिन्ता करे और दुःख उठाए, वरन्, जैसा हम प्रकाशितवाक्य 13:8 में पढ़ते हैं, उन सब पापों के लिए जो जगत के आरम्भ से, आदम से लेकर हमारे समय तक, हाँ, न्याय के दिन से पहले जन्म लेनेवाले अन्तिम मनुष्य तक किए जाएँगे। इसलिए उन लोगों की दृष्टि बहुत संकीर्ण है जो इसे केवल उन पापों के विषय में समझाते हैं जो यह मनुष्य भविष्य में करनेवाला था। यद्यपि उसने अन्य घटनाओं में यह दिखाया कि वह कुछ व्यक्तियों के भावी जीवन का ध्यान रखता था, जैसे उसने उस लकवे के रोगी से कहा, यूहन्ना [5]:14: "देख, तू चंगा हो गया है; फिर पाप मत करना, ऐसा न हो कि इससे कोई भारी विपत्ति तुझ पर आ पड़े।"
10. क्योंकि मसीह, हमारे प्रिय प्रभु का हृदय इतना दयालु है कि किसी मनुष्य के पाप करने का विचार करके ही वह दुःखी होता है। क्योंकि वह भली-भाँति जानता है कि पाप बिना दण्ड के नहीं रह सकते; इसलिए वह यरूशलेम नगर पर भी रोया, क्योंकि उसने देखा कि उसके पापों का दण्ड अवश्य मिलेगा। उसका हृदय इतना दयालु और प्रेमी है कि जहाँ पाप किया जाता है वहाँ उसे कदापि प्रसन्नता नहीं होती।
11. वह यहाँ विशेष रूप से शरीर के दो अंगों, अर्थात् कान और जीभ से व्यवहार करता है; क्योंकि तुम जानते हो कि मसीह का राज्य वचन पर स्थापित है, जिसे इन दो अंगों, कान और जीभ, के बिना न तो ग्रहण किया जा सकता है और न समझा जा सकता है; और वह मनुष्यों के हृदयों में केवल वचन और विश्वास के द्वारा राज्य करता है। कान वचन को ग्रहण करते हैं, हृदय उस पर विश्वास करता है; परन्तु जीभ उस बात को बोलती या अंगीकार करती है जिस पर हृदय विश्वास करता है।
इसलिए जीभ और कानों को छोड़ दें, तो मसीह के राज्य और संसार के राज्य में कोई दिखाई देनेवाला अन्तर नहीं है।
12. क्योंकि बाहरी जीवन के विषय में एक मसीही के कर्तव्य एक अविश्वासी के समान ही होते हैं; वह भूमि जोतता है, अपने खेतों में काम करता है, और दूसरों की तरह हल चलाता है; और खाने, पीने, काम करने, सोने या किसी और बात में वह कोई विशेष काम या कर्म नहीं करता।
परन्तु शरीर के ये दो अंग एक मसीही और एक अविश्वासी के बीच अन्तर करते हैं; मसीही दूसरी रीति से बोलता और सुनता है; उसकी ऐसी जीभ है जो परमेश्वर के अनुग्रह की स्तुति करती है और प्रभु मसीह का एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में प्रचार करती है, इत्यादि।
संसार ऐसा नहीं करता; वह लोभ और अन्य दुर्गुणों की बातें करता है, और अपनी ही महिमा का प्रचार और गुणगान करता है।
13. इसी प्रकार दोनों के कान भी भिन्न हैं। एक मसीही के कानों में वही वचन रहता है जिसका प्रचार जीभ करती है और जिस पर हृदय विश्वास करता है; परन्तु संसार यह सुनना अधिक पसन्द करता है कि कोई उसकी बुद्धि, समझ, सम्मान और महिमा की बात करे। इस प्रकार मसीहियों के कान और जीभें संसार के, या अविश्वासियों के, कानों और जीभों से भिन्न हैं; वे चाँदी या सोने की कुछ परवाह नहीं करते, केवल उसकी परवाह करते हैं जो मसीह के विषय में कहा जाता है, और इस बात की कि मसीह के विषय में कैसे बोलें और उसका प्रचार कैसे करें।
14. निश्चय ही हमारे प्रिय प्रभु ने पहले से देख लिया था कि जीभों और कानों के द्वारा आगे चलकर कितनी हानि और दुर्दशा होगी। यह बड़ी हानि की बात है कि मसीही सताए जाते हैं, डुबोए, जलाए और फाँसी पर लटकाए जाते हैं, और संसार बलपूर्वक वचन का विरोध करता है; परन्तु यह हानि सब में प्रवेश नहीं करती, और न यह जीतेगी।
क्योंकि जब यह ज्ञात होता है कि लोगों के साथ इतना घोर अन्याय किया जा रहा है, तो वे इससे और भी साहसी और निडर हो जाते हैं, और ऐसी यातना और दुःख को तुच्छ जानते हैं। इसलिए वह सबसे बड़ी हानि नहीं है जो अत्याचारी मसीही जगत को पहुँचाते हैं; वरन् माँस का वह टुकड़ा जो दाँतों के पीछे छिपा रहता है, मसीह के राज्य को सबसे बड़ी हानि पहुँचाता है।
मैं अभी उन लोगों की बात नहीं कर रहा जो एक-दूसरे के विषय में झूठ बोलते और एक-दूसरे की निन्दा करते हैं; मैं ऊँची बातों के विषय में कह रहा हूँ, कि जब मसीह ने जीभ को खोल दिया और उसे सुसमाचार दे दिया, उसके बाद वही जीभ ऐसी कुख्यात हानि पहुँचाए। यह सच है कि यह हानि इतनी प्रत्यक्ष नहीं है, और किसी मनुष्य का सिर काट दिया जाना इससे कहीं बुरा दिखाई देता है कि कोई झूठा भविष्यद्वक्ता या लेखक सामने आ खड़ा हो; परन्तु एक झूठा उपदेश, हाँ, एक झूठा वचन भी, जो परमेश्वर के नाम में घूमता हुआ चला आता है, अनगिनत प्राणों को काट डालेगा, यहाँ तक कि एक पूरा नगर या देश उसके नीचे गिर सकता है।
15. यह उन क्लेशों में से एक है जिनके कारण मसीह ने आह भरी; मानो वह कहना चाहता हो: चौकस रहो! उन छली जीभों से, जो पवित्रशास्त्र में हस्तक्षेप करती हैं, उन जीभों से अधिक सावधान रहो जो मदिरालय में या पंसारी की दुकान में बकबक करती हैं; यद्यपि ये भी हानिरहित नहीं हैं, तौभी जब वे जीभें बोलने लगें जिन्हें मैंने खोल दिया है कि वे मसीह पर गर्व कर सकें, तब उनसे सावधान रहो, इत्यादि। और सचमुच यह बात विलाप करने योग्य है कि जिनके पास वचन है और जो उसके विषय में बहुत कुछ बोल सकते हैं, वे फिर भी जीभ और घूँसे से वचन को सताएँ।
त्रिएकता के बाद बारहवाँ रविवार।
तुर्क भी मसीही जगत के लिए एक खतरा है, परन्तु उसकी हानि केवल तलवार से पहुँचाई जाती है, और वह किसी भी प्रकार पंथवादियों द्वारा की गई हानि के बराबर नहीं है। अब भी इस बात की आवश्यकता है कि कोई आह भरे, क्योंकि ऐसी जीभें बहुत से लोगों को भटकाती हैं और फिर भी मसीही होने का, और मसीही कलीसिया को सुधारने का दावा करती हैं। यह पहली बात है, अर्थात् यह कि जीभ के खुल जाने और लोगों के यह जान लेने के बाद भी कि
मसीह कौन है, शैतान बिगाड़-बिगाड़कर हानि पहुँचाता ही रहता है। 16. इसलिए मसीह कहता है, ऐसे बिगड़े हुए कान मिलेंगे जो, यद्यपि मैंने उन्हें खोल दिया है, फिर भी उसके सिवा और कुछ सुनना नहीं चाहते जो ऐसी झूठी, दुष्ट जीभें कहती हैं। जैसा पौलुस कहता है, 2 तीमुथियुस 4:3:
"ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे, पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिए बहुत से उपदेशक बटोर लेंगे, और अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएँगे," इत्यादि।
जो प्रचारक ऐसी शिक्षा देते हैं, वे धूर्त और शैतान के प्रेरित हैं। अब दूसरों को इतना भक्त होना चाहिए कि वे कहें, मैं उनकी जीभों की बात नहीं सुनूँगा।
हाँ, सन्त पौलुस कहता है, वे उस धन्य जीभ को सुनना नहीं चाहते, वरन् किसी दूसरी को खोजते हैं; और सचमुच वे उसे पा भी लेते हैं, जैसा अब हमारे दिनों के पंथवादियों के बीच हो रहा है। इसलिए, सन्त पौलुस कहता है, जैसे उनके कानों में खुजली होती है, वैसे ही वह उनके पास ऐसे प्रचारक भेजेगा जो उन्हें बलपूर्वक भ्रम में ले जाएँगे। ठीक वैसे ही जैसे हमने पोप के अधीन रहते हुए देखा कि कोई भी छोटी से छोटी भ्रान्ति का भी सामना न कर सका, वरन् उनका गढ़ा हुआ शोधन-स्थान, पाप-क्षमा-पत्र, भटकती आत्माएँ, और जो कुछ भी
नया होता था, वह तुरन्त विश्वास का एक सिद्धान्त मान लिया जाता था।
इस प्रकार शैतान ने उनके कानों को खुजलाया, जिससे वे [परमेश्वर] के वचन की अपेक्षा ऐसे छल को सुनने के लिए कहीं अधिक तैयार थे। 17. अब भी ऐसा ही है।
हमारा प्रभु परमेश्वर कानों को खोलता है, जिससे सच्चा सुसमाचार सुना जाता है; तौभी जहाँ कहीं कोई पंथवादी आ खड़ा होता है, लोग तुरन्त उसे अपना लेते हैं, और ऐसे उन्मत्त और सच्चे प्रचारकों के ऐसे शत्रु बन जाते हैं कि मैं बड़ी उलझन में पड़ जाता हूँ कि ऐसे उत्तम हृदय, जिन्हें मैं अपना शरीर और प्राण सौंप देता, हमारे प्रति इतने द्वेषपूर्ण शत्रु कैसे बन सकते हैं, मानो वे शैतान से भरे हों और सुसमाचार पाने से पहले की अपेक्षा अब जीभों और कानों से कहीं अधिक घोर पाप करते हों, यहाँ तक कि भला होता कि मसीह
ने उन्हें कभी चंगा ही न किया होता, और उन्होंने उसका वचन कभी सुना ही न होता।
18. तो मसीह की आहों का अर्थ यह है कि उसने न केवल जगत के आरम्भ से लेकर सब क्लेशों पर अपने मन में विचार किया, वरन् उसने इस निश्चित बात पर विलाप किया कि सुसमाचार के प्रकट होने के बाद उसके राज्य को उन्हीं व्यक्तियों के द्वारा इतनी हानि उठानी पड़ेगी जिनकी वह सहायता करना चाहता था, और उसका राज्य ऐसा थपेड़ा खाएगा और फाड़ा जाएगा, जो कभी न होता यदि मनुष्यों को पहले उसके द्वारा छुड़ाया न गया होता। निश्चय ही उसे यह सहना होगा, और हमें भी यह सहना होगा; परन्तु तौभी उसने इसके कारण व्यर्थ आह नहीं भरी होगी।
19. और यद्यपि उसकी आहों का स्वरूप यहाँ पूरी तरह नहीं बताया गया है, क्योंकि वह लिखा नहीं जा सकता, जैसा सन्त पौलुस रोमियों 8:26 में कहता है कि ऐसी आहें लिखे या बोले गए शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकतीं, तौभी हाय उन पर जो ऐसी हानि पहुँचाते हैं और इस आह को इतना तुच्छ समझते हैं, और ऐसे चलते-फिरते हैं मानो उन्होंने अच्छा किया हो। क्योंकि मसीह इससे अनेक और विविध सतानेवाले विचारों से व्याकुल हुआ, जैसे ये: देखो, इसका मुझे इतना मूल्य चुकाना पड़ता है, इतना भय और इतनी यातना मुझे सहनी पड़ती है, जब तक कि मैं यह न कर दूँ कि ये लोग मेरा
वचन सुनें और उसका प्रचार करें; और फिर भी वे उसे इतनी निर्लज्जता से बिगाड़ेंगे और उलट देंगे, और मुझे और मेरे राज्य को इतनी बड़ी हानि पहुँचाएँगे! वचन के प्रति यह कृतघ्नता हर मसीही प्राण को अवश्य चुभती है; इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि इसने प्रभु मसीह को भी इतना अधिक विचलित किया कि वह यहाँ विशेष रीतियों और विधियों से काम लेता है, क्योंकि उस समय यह विचार उसके मन पर बड़े बल से पड़ा।
20. अब हमें इन विधियों और प्रदर्शनकारी कार्यों से, जिनसे मसीह यहाँ काम लेता है, यह सीखना चाहिए कि मसीह हमारा प्रभु कितनी गम्भीरता से हमारी चिन्ता करता है; हमें यत्नपूर्वक
चौकस रहना चाहिए कि अपने कानों और जीभों को उसी दशा में बनाए रखें जिसमें उसने उन्हें हमें दिया है, और शैतान और मनुष्यों के विरुद्ध अपने आप को दृढ़ करें, ऐसा न हो कि वे हमारे कानों और जीभों को उलटी दशा में बदल दें। दूसरे, हमें भी, हर एक को अपनी बुलाहट में, इस आशीष के लिए उसके वचन के प्रति अपनी कृतज्ञता इस रीति से दिखानी चाहिए कि अपने देश में शासक, मंच पर प्रचारक, घर में पिता और माता,
अपनी बुलाहट के कर्तव्यों को ठीक-ठीक पूरा करें, और दूसरे लोग उसे सुनें, अपने कानों को वैसे ही खुला रखें जैसे मसीह ने उन्हें खोला है, और यत्न से ध्यान रखें, जैसे मसीह ने इस मनुष्य के विषय में किया, कि वे भी वैसे ही गम्भीर हों, और इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें।
21. हमारे बीच, परमेश्वर की स्तुति हो, जीभ इतनी विकसित हो गई है कि हम शुद्धता से बोलते हैं, और कान आनन्द से उसे सुनते हैं; क्योंकि अब भी हर जगह बहुत से भक्त लोग हैं जो परमेश्वर का वचन सुनने में आनन्द पाते हैं। परन्तु इसके साथ-साथ हमारे बीच भी बड़ी कृतघ्नता है, और परमेश्वर के वचन के प्रति भयानक तिरस्कार है, कदाचित् हाँ, एक गुप्त सताव और दुःख भी। अन्य शासक उसे खुलेआम सताते हैं; परन्तु हम यहाँ आश्रय में बैठे हैं, मानो गुलाबों के बगीचे में, और फिर भी गुप्त रूप से इतने सारे नागरिक और किसान, और अपनी सोने की ज़ंजीरों वाले सरदार भी हैं, जो यदि उनका बस चलता, तो सब पास्टरों और प्रचारकों को आनन्द से देश से खदेड़ देते। इससे प्रकट होता है कि वे वचन को तुच्छ जानते हैं और गुप्त रूप से उससे घृणा करते हैं; जैसा हम देखते हैं कि यही होता है कि जहाँ वचन खुलेआम सताया जाता है, वहीं वह जीवित रहना चाहता है, और जहाँ वह बेरोक-टोक और सार्वजनिक है, वहाँ वे उसे नहीं चाहते।
22. परन्तु हमारे प्रभु परमेश्वर ने निश्चय ही व्यर्थ आह नहीं भरी होगी।
कुछ लोग तो यह सोचते हैं कि यह सदा ऐसा ही बना रहेगा, क्योंकि वह इसके विषय में इतना चुप रहता है; परन्तु बहुत जल्दी ऐसा हो जाता है कि एक मंच का स्वरूप बदल जाता है। इसलिए हमारा प्रभु
परमेश्वर चाहता है कि हम यहाँ चेतावनी लें, जैसा सन्त पौलुस ने भी पहले से कहा था, ताकि हम सावधान रहें। जीभें अपनी बोली बदल लेंगी, और लोगों के कान झूठे प्रचारकों के लिए खुजलाएँगे, जैसा पोप के शासन में हुआ था, जहाँ लोग सुनने और करने के लिए इतने इच्छुक और उत्सुक थे, जब भी कोई ऐसा व्यक्ति आता जिसके पास कहने को कुछ नया होता, चाहे वह कितना ही अनुचित और मूर्खतापूर्ण क्यों न हो।
उस समय यदि कोई यह प्रचार करने उठ खड़ा होता कि एल्बे नदी में एक गिरजाघर बनाया जाए, तो वे उसे बना डालते।
परन्तु अब जब कि मंच से वचन की शिक्षा दी जाती है और प्रचार किया जाता है कि परमेश्वर पर भरोसा रखो और अपने पड़ोसी की सेवा करो, तो लोगों का जीवन कहीं भी उसके अनुरूप नहीं है।
यह स्वयं शैतान का काम है, परन्तु इससे हम निर्दोष नहीं ठहरते।
23. क्योंकि जब शिक्षा को ऐसा रूप और आकार दे दिया गया है कि विश्वास के सिद्धान्तों का प्रचार उनकी शुद्धता में होता है, और जब जीभें अब खुल गई हैं और कान खुल गए हैं, तो हमें भी इसमें लगना चाहिए कि यह शिक्षा हमारे दैनिक जीवन में दिखाई दे। परन्तु मुझे डर है कि यह तब तक न होगा जब तक बिजली और गर्जन हम पर न टूट पड़ें, जैसा सन्त पौलुस कहता है। परमेश्वर ने पोप से आरम्भ तो कर दिया है, और मसीह-विरोधी को सुसमाचार की बिजली से मारा है, जो उसके मुँह का आत्मा है, जो अब खुल गया है और बोलता है, और अब भी दुष्टों के बीच प्रहार कर रहा है; परन्तु मुझे डर है कि शिक्षा के पीछे सही जीवन तब तक न चलेगा जब तक वह आकर सब कुछ पूरी तरह भूमि पर न गिरा दे, और अपने महिमामय आगमन के प्रकाश से अभक्ति का अन्त न कर दे, 2 थिस्सलुनीकियों 2:8।
24. अब, क्योंकि धार्मिक कर्म और जीवन हमारे बीच शिक्षा के पीछे इतनी सिद्धता से चलते दिखाई नहीं देते जितना वास्तव में चलना चाहिए, मुझे डर है कि हमारा प्रभु परमेश्वर, यदि न्याय का दिन हम पर न आ पड़े, तो अपने दण्ड को टलने न देगा; क्योंकि हमारा जीवन शिक्षा से तनिक भी मेल नहीं खाता, छोटी से छोटी बात में भी नहीं, जैसे यह कि हम अपने पड़ोसी की सेवा करें, जो सचमुच कोई बड़ी माँग नहीं है।
क्योंकि इसे पाने के लिए न तो रोम दौड़ने की आवश्यकता है, न सन्त याकूब के पास, न धन या कोई मूल्यवान वस्तु देने की; तुम्हें केवल इतना चाहिए कि उसे करने की अपनी इच्छा दो। परन्तु क्योंकि हम ऐसे हताश लोग हैं, जो पोप के अधीन तो बहुत अधिक कर चुकने के बाद अब कुछ भी नहीं करते, इसलिए या तो न्याय का दिन हमारे बीच टूट पड़ेगा, या हमारा प्रभु परमेश्वर विधर्म भेजेगा, और तब हम फिर से अनावश्यक काम करने को विवश किए जाएँगे। प्रभु मसीह के लिए यह बड़ी चिन्ता का विषय है कि उसके वचन को इस प्रकार तुच्छ जाना और सताया जाए; इसलिए जो इसके कारण हैं वे बिना दण्ड के न छूटेंगे। इस पाठ के विषय में इतना ही पर्याप्त हो।
[आओ, हम अपने प्रभु परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें अपना अनुग्रह दे, कि हम वैसा ही करें और जीएँ जैसा उसने हमें बोलने और सुनने योग्य बनाया है। आमीन।]
2 पतरस, 18 घृणित कार्य, 31, 43, 71, 137, 138, 179, 273
274, 305, 323 अब्राहम, 5, 6, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20, 33, 88, 91, 92, 250, 266, 267, 292, 297, 330 आदम, 66, 125, 146
369, 372, 374 व्यभिचारी, 325, 334, 349, 351 व्यभिचार, 7, 49, 57, 76, 97, 124, 233, 250, 275, 333, 340 विरोधी, 156, 161
163, 175 सहायक (वकील), 272, 364 पीड़ित, 15, 84, 99, 329, 372 क्लेश, 11, 15, 70, 344, 372, 375, 377 सर्वशक्तिमान, 44 वेदी, 23, 28, 74, 156
161, 174, 175, 299 एमिश, 132 पुनर्बपतिस्मावादी (एनाबैप्टिस्ट), 271 स्वर्गदूत, 5, 23, 24, 31, 39, 47, 54, 55, 85, 91, 353, 364 क्रोधित परमेश्वर, 349 मसीह-विरोधी (वैकल्पिक वर्तनी), 28 मसीह-विरोधी, 231, 245
274, 322, 379 व्यवस्था-विरोधी (एन्टीनोमियन), 130, 147 प्रेरितीय, 144 वस्त्र, 8 एक्विनास, 172 एरियस-पंथी, 190, 240, 376 एरियस-पंथ, 240 अरस्तू, 243, 261 सभा, 154 निश्चय, 152, 194
311, 314 प्राप्त किया, 149, 285, 342 प्राप्ति, 153 ऑगस्टीन, 103, 161, 208, 226, 227, 229 अधिकार, 71, 107, 159, बाबुल, 183 बेकर बुक हाउस, 2 बपतिस्मा, 31, 32, 60, 61
64, 66, 68, 71, 74, 243, 261, 272, 276, 367 बपतिस्मा देनेवाला, 24, 34, 153, 186, 253, 271, 272 बपतिस्मा पाया हुआ, 21, 40, 41, 42, 63, 205, 231, 278 पशु, 49, 144, 198 बेग, 5, 39, 40, 89
124, 195, 219, 289 आस्था, 3, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 15, 17, 19, 41, 43, 121, 122, 124, 233, 234, 273, 334 विश्वास करना, 6, 7, 10, 12
14, 15, 16, 17, 18, 19, 20, 25, 27, 33, 35, 40, 41, 42, 47, 55, 60, 63, 64, 80, 82, 85, 89, 90, 91, 92, 94, 101, 104, बिरीया-वासी, 269 बाइबल, 244, 262 बिशप, 20, 21, 30, 37
39, 43, 106, 184, 202, 255, 316, 321 निन्दाएँ, 186 परमेश्वर-निन्दा, 19, 323, 333, 335 आशीष, 12, 34, 36, 89, 104, 114, 115, 120
305, 308, 377 अन्धे अगुवे, 69 लहू, 14, 28, 29, 32, 61, 91, 101, 111, 116, 364, 372 मसीह का लहू, 28, 29, 61, 246, 264, 276 शरीर और प्राण, 16, 87
370, 373, 376 इच्छा का बन्धन, 2 जीवन की पुस्तक, 50, 164 नया जन्म, 160, 170 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
व्यवस्था की दोनों पटियाएँ, भाई, 5, 25, 38, 51, 92, 96, 111, 112, 113, टूटा हुआ, 87, 114, 191
199, 220, 247 जलना, 320 व्यापार, 24, 139, 151, 152, 218, 283 केवल विश्वास से, 297 कैसर, 21 बुलाहट, 38, 51, 67, 92, मोमबत्तियाँ, 230 धर्मग्रन्थ-सूची (कैनन), 2, 281 जीवन-वृत्ति, 355 शारीरिक मन, 245, 263 कैथोलिक, 2 भर्त्सना, 7, 266, 270
342, 353, 354 विधियाँ, 19, 370, 371, 377 दान, 220 बच्चे, 24, 25, 77, 89, 350, 356 गायक-मण्डली, 249 मसीह, 2, 3, 6, 8, 15
16, 21, 23, 24, 25, 26, 27, 28, 29, 31, 32, 33, 34, 35, 36, 37, 38, 39, 40, 41, 42, 43, 45, 46, 47, 48, 50, 51, 52, 53, 54, 55, 56, 57, 58, 59
60, 61, 62, 63, 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 72, 74, 75, 76, 77, 78, 79, 80, 81, 82, 83, 84, 85, 89, 90, 91, 92, 93, 378, 379 केवल मसीह, 69, 71, मसीह यीशु, 52, 91
110, 151, 288, 298 मसीही जगत, 29, 70, 72, 81, 132, 206, 210, 274, 376 मसीही, 2, 3, 6, 15, 28, 29, 31, 37, 43, 47, 50, 55, 56, 60, 61, 63
64, 66, 67, 68, 69, 71, 72, 90, 94, 98, 99, 100, 376, 377 मसीही स्वतन्त्रता, 3, 55 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं]
[पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] मसीही प्रेम, 99, 186, 334, 344 मसीहियत, 67, 136
224, 244, 261 कलीसिया, 7, 11, 13, 14, 15, 17, 19, 21, 23, 25, 27, 28, 29, 31, 33, 35, 36, 37, 39, 41, 43, 45, 46, 47, 48, 49, 50, 51
53, 55, 60, 61, 63, 65, 67, 71, 73, 75, 79, 81, 83, 85, 87, 89, 91, 93, 95, 97, 99, 101, 103, रोम की कलीसिया, 246 खतना किया हुआ, 66 खतना, 121, 342 परिस्थिति, 142, 202 परिस्थितियाँ, 142, नागरिक शासन, 34
36, 130, 138, 141, 182, 206, 231 वस्त्र, 7, 8, 194, 195, 258, 261, 263, 289 आज्ञा, 3, 25, 36, 59, 60, 63, 76, 91
94, 99, 150, 156, 157, गर्भधारण, 51, 169 अंगीकार, 2, 54, 104, विश्वास-अंगीकार, 2 दृढ़ीकरण, 91 मण्डली, 242, 260, विवेक, 16, 17, 22
26, 27, 29, 41, 47, 54, 60, 61, 62, 63, 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 72, 74, 75, 76, 77, 78, 81, 83, 84, 85, 88, 99, 110
209, 210 सन्तोष, 122, 217 धर्म-परिवर्तित, 103, 104, 129, 129, 185, 238, 332 दृढ़ धारणा, 194 कुरिन्थियों, 108, 230, भ्रष्टता, 353 ट्रेंट की महासभा, 2 परामर्श, 212 परामर्शदाता, 213 साहस, 42, 63, 65, 69
79, 105, 110, 118, 135, 313, 314, 344, 357 न्यायालय, 174, 180, 315 लालच करना, 36, 37, 57, 113, 322, 351 लोभ, 36, 37, 57, 115, 116, 117, 134
236, 292, 322 सृष्टिकर्ता, 313 अपराधी, 269 क्रूस पर चढ़ाया गया, 23, 33, 59, 66, 101, 111 श्राप, 34, 86, 102, 105 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं]
[पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] 284, 314, 346, 355 कोसना, 160 दण्ड-आज्ञा, 136, 137, 148, 236 दण्डित, 41, 50, 148
163, 246, 287, 299 दानिय्येल, 8, 105 अन्धकार, 97, 133, 284, बेटी, 24 दाऊद, 8, 14, 35, 47, 51, 78, 114, 129, 165, 166
279, 287, 307, 343 क्रोध का दिन, 115, 282 मृत्यु, 11, 12, 15, 16, 17, 18, 19, 21, 23, 32, 41, 43, 52, 72, 82, 83, 84, 87, 89, 108, 109, वाद-विवाद, 174 छल, 117 घोषणा, 52, 227
228, 273, 275 परमेश्वर का आदेश, 117 भ्रम, 308, 352 निराशा, 17, 26, 27, 41, 54, 64, 68, 72, 78, 90, निरंकुशता, 70 यरूशलेम का विनाश, 3, 304, 305, शैतान, 20, 21, 23, 30
31, 39, 40, 41, 42, 45, 46, 50, 54, 61, 63, 68, 69, 71, 72, 74, 75, 76, 78, 79, 80, 82, 83, 84, 94, 96, 116, 117, 119, 376, 377, 379 भक्ति, 19, 116, 270, चेला, 26, 59, 62, 86
96, 98, 99, 101, 104, 281, 331 अनुशासन, 216, 270, रोग, 373 युग-व्यवस्था, 149 ईश्वरीय, 12, 42, 54, 59, 87, 134, 135, 147, 166, ईश्वरीय अधिकार, 179 फूट, 35, 235, 238
240, 247, 265 डॉक्टर, 37, 358 शिक्षा, 3, 23, 35, 36, 40, 43, 52, 55, 56, 57, 59, 62, 64, 67, 70, 72, 76, 77, 100, 101, 106
354, 371, 376, 379 अनुग्रह की शिक्षा, 56 मत-सिद्धान्त, 2 प्रभुता, 137, 230 सन्देह, 16, 47, 134, अजगर, 137 ढोल, 63 मतवाला, 33, 58, 72, 248
249, 265, 351 पियक्कड़, 351 मतवालापन, 72, 248, ईस्टर (पुनरुत्थान-पर्व), 280, 308, 310 आठवीं आज्ञा, आयर, 365 चुनाव, 92, 106, 297, तत्व, 28, 98, 350 एलिय्याह, 24
[सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] भावना, 158, 373 सम्राट, 61, 63, 111
187, 248, 265 इफिसियों, 282, 301 इफिसुस, 235, 254 इरास्मस, 2 एस्तेर, 8 अनन्त जीवन, 25, 26, 33, 42, 43, 84, 100, 210, अनन्तकाल, 311, 344 सुसमाचारी, 112, 128, प्रमाण, 259, 310 बुरी शिक्षा, 225 असाधारण, 200
208, 248, 338, 373 आँखें, 5, 7, 9, 10, 11, 13, 18, 66, 80, 90, 95, 96, 117, 128, 138, 147, विश्वास, 2, 3, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 12, 14, 15, 16, 19
20, 21, 25, 27, 29, 43, 45, 51, 55, 60, 61, 63, 66, 68, 69, 71, 72, 75, 78, 79, 80, 81, 82, 83, 84, 86, 87, 88, 89, 90, 91, 92, 93, 94, 95, 101, केवल विश्वास, 87, 91, 228
297, 326, 331 मसीह में विश्वास, 71, 143, परमेश्वर में विश्वास, 136 यीशु मसीह में विश्वास, 101, 105, 292 विश्वासयोग्य सेवक, 252 विश्वासयोग्यता, 112, 113
247, 344 भूल करनेवाला, 2 भटक जाना, 154 झूठा मसीह, 105, 225, 276, 352 झूठी कलीसिया, 356 झूठी शिक्षा, 223, 270, 317, 371 झूठा भविष्यद्वक्ता, 3, 223
311, 375 झूठा शिक्षक, 205, 224, 262, 268, 270, 276 झूठी उपासना, 116 परिवार, 66, 282, 346 रीति, 52, 298, 333, उपवास, 88, 175, 191
333, 340 पिता, 5, 14, 15, 24, 25, 34, 36, 40, 51, 77, 86, 87, 88, 89, 90, 95, 96, 98, 103, 107, 108, 365, 366, 377 भय, 37, 41, 42, 45, 50
51, 53, 60, 73, 75, 77, 78, 79, 81, 82, 85, 91, 364, 375, 377, 379 परमेश्वर का भय मानना, 250, 266 परमेश्वर का भय, 149, 343 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं]
[पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] भोज, 8, 30, 32, 37, 84, 136, 249 अनुभूति, 55, 80, 81, 85
216, 354 संगति, 64, 185 पाँचवीं आज्ञा, 3, 156, 168, 178 अन्तिम न्याय, 18, 53 पहली आज्ञा, 224, 232, 340, 343 पहली पटिया, 337, 340 व्यवस्था की पहली पटिया
337, 340 फिशर, 38, 120, 121, 151, 153 शरीर, 38, 49, 53, 61, 66, 67, 69, 84, 93, 96, 357, 364, 372, 375 जलप्रलय, 60, 221, 252, 257 मूर्ख, 6, 12, 13, 14, 38
41, 45, 69, 71, 97, 102, 367, 371, 378 क्षमा, 3, 42, 55, 56, 68, 90, 100, 101, 357, 358 पापों की क्षमा, 3, 276, 305, 343 व्यभिचार (परस्त्रीगमन), 265, 303 फ़ॉस्टर, 132 नींव, 45, 195
318, 332 ढाँचा, 24 स्वतन्त्र इच्छा, 2, 47, 60, 83, 159, 169, 347 स्वतन्त्र-इच्छा, 2 स्वतन्त्रता, 65 आत्मा का फल, 224, 247, 265, 286 मूलभूत, 196, 264
349, 362 गलातियों, 233, 247, खेल, 54 पीढ़ी, 114, 218, 255, 284, 350 अन्यजाति, 26, 48, 121, 315, 316, 339 कोमलता, 233 जर्मन, 133, 138, 218
311, 312, 323 जर्मनी, 138, 239, मुद्रा (इशारा), 82 वरदान, 53, 128, 132, 133, 342, 343, 353, 363 महिमा पाया हुआ, 204 परमेश्वर की महिमा करना, 298, 369 महिमा, 9, 91, 105, 123
332, 360, 374, 375 परमेश्वर की महिमा, 91, 298 पेटू, 14, 58, 221 परमेश्वर पिता, 277 परमेश्वर का कोप, 147, 148 परमेश्वर की आज्ञा
36, 59, 63, 231, 270, 334, 342, 345, 356 परमेश्वर का अनुग्रह, 110, 239, 331, 350, 352, 369 परमेश्वर की व्यवस्था, 59, 344, 347 परमेश्वर की दया, 90, 287
330, 334, 363 परमेश्वर की इच्छा, 19, 254, 277, 300, 309 परमेश्वर का वचन, 2, 16, 51, 59, 68, 116, 118, 136, 353, 368, 371, 378 परमेश्वर का क्रोध, 79, 110
344, 350, 354 देवी, 12, 13 ईश्वरत्व, 298 भले काम, 9, 11, 50, 60, 63, 64, 65, 76, 87, 88, 92, 94, 100, 106, 351, 355, 363 भलाई, 9, 10, 12
79, 82, 89, 135, 146 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
340, 348, 361 परमेश्वर की भलाई, 9, 10, 147, 193, 361 सुसमाचार, 5, 6, 7, 8, 9, 15, 18, 19, 20, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28, 30, 31
32, 33, 34, 35, 36, 37, 38, 39, 40, 41, 43, 44, 47, 52, 53, 54, 55, 56, 58, 64, 65, 67, 70, 78, 79, 81, 85, 86, 89, 90, 93, 94, 95, 96, 99, 100
377, 379 यूहन्ना रचित सुसमाचार, 241, 259 लूका रचित सुसमाचार, 325 मरकुस रचित सुसमाचार, 370 शासन, 30, 34, 351, 352 कलीसिया का शासन, 141 अनुग्रह, 2, 3, 12, 28, 29
31, 35, 38, 41, 42, 43, 48, 52, 55, 56, 61, 66, 69, 72, 74, 77, 79, 83, 369, 374, 379 परमेश्वर का अनुग्रह, 2, 12, 43, 69, 106, 146, 153, 160
294, 320, 338, 374 कब्रें, 14, 16, 185 यूनानी, 34 दोष, 49, 147, 158, 199, 250, 343 हाग्गै, 115, 204 सुख, 9, 152 वेश्या, 49, 53, 88, 96, घृणा, 134, 137, 139
335, 347 हृदय, 2, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 19, 22, 24, 25, 26, 29, 33, 39, 41, 42, 43, 48, 51, 54, 63, 65, 66, 67, 68, 69, 70
71, 72, 73, 74, 75, 76, 77, 78, 79, 80, 81, 82, 84, 85, 87, 88, 90, 92, 97, 98, 103, 106, 110, 374, 375, 376 अन्यजाति (मूर्तिपूजक), 21, 26, 40
42, 103, 104, 112, 115 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] स्वर्ग, 6, 32, 34, 37
39, 41, 42, 46, 48, 50, 54, 55, 84, 85, 87, 89, 90, 95, 98, 103, 105, 369, 371 स्वर्गीय, 84, 87, 89, 90, 95, 123, 246, 263, इब्रानी, 12, 194, 281, इब्रानियों, 12, 194 नरक, 5, 6, 13, 14, 15
16, 17, 18, 32, 33, 41, 44, 50, 64, 68, 83, 87, 89, 109, 119, 137, 138, नरक की आग, 372 हेनरी, 370 विधर्म (बहुवचन), 224, 236, 254, 276, 379 विधर्म, 45, 244, 261, विधर्मी, 6, 101, 106, विधर्मपूर्ण, 349 वीर, 11, 227, 308 ऊँचे स्थान, 34, 209 इतिहास, 6, 20, 60, 113
308, 319 पवित्रता, 39, 40, 49, 74, 79, 126, 180, 181, 184, 275, 337, 343, 346 पवित्र, 7, 8, 10, 20, 21, 23, 24, 28, 29, 30, 31
32, 34, 38, 39, 43, 57, 58, 59, 71, 72, 85, 91, 368, 369, 371 पवित्र आत्मा (होली घोस्ट), 130, 234, 235, 243, 253 पवित्र स्थान, 315, 327 पवित्रशास्त्र, 91, 114
244, 261, 262, 371 पवित्र आत्मा, 23, 24, 71, 366, 368, 369 घर, 8, 25, 26, 36, 37, 44, 46, 47, 55, 73, 74, 77, 78, 81, 82, 84, ईमानदारी, 57 आशा, 7, 29, 35, 44, 57
73, 75, 90, 121, 124, 320, 341, 345, 360 हॉर्ट, 9, 23, 44, 48, 59, 62, 64, 83, 87, 91, 114, होशे, 228 घर (भवन), 2, 13, 19, 20
21, 22, 25, 26, 28, 30, 31, 36, 37, 40, 44, 46, 51, 52, 53, 64, 77, 111, 329, 330, 357, 375 मानव स्वभाव, 62, 142 मानवीय परम्परा, 41 मानवतावादी, 2 दीनता, 173, 332 हंट, 2, 75, 76, 80, 83
102, 309 पति, 103, 104, 231 कपट, 95, 157, 169, 170, 224, 281 कपटी, 6, 11, 14, 33 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं]
[पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] कपटी लोग, 14, 33, 49, 96, 97, 98, 156, 163, 169, 281, 333 मूर्ति, 8, 21, 31, 40, 87
97, 121, 127, 128, 137, 323, 343, 351 मूर्तिपूजक, 351 मूर्तिपूजा-भरा, 40, 321 मूर्तिपूजा, 31, 247, 265, 273, 275 प्रतिमा, 14, 19, 229
247, 248, 264 जंगल में, 46, 52, 71, 194 धूप, 246, 263, 316 स्वतन्त्र, 272, 362 लिप्त, 8 पाप-क्षमा-पत्र, 2, 28, 273
285, 321, 376 पाप-क्षमा-पत्र (बहुवचन), 2, 28, 273, 285, 376 अचूक, 2 असीम, 71 इंस्टिट्यूट्स, 30 साधन, 30, 301 मध्यस्थता की प्रार्थना, 359, 364
368, 369 व्याख्या, 93, 156, गढ़ी हुई बात, 88 यशायाह, 38, 58, 91, 160, 301, 315, 316, 336 इस्राएल, 24, 26, 33, 34, 50, 51, 77, 166, 198
236, 255, 366 इस्राएली, 50 याकूब, 50, 54, 120, 326, 330, 379 जेम्स प्रथम, 181 जलन रखनेवाला परमेश्वर, 349 जलन, 186 यहोवा, 11, 25, 51, 91
316, 336, 349 जेरोम, 227, 283 यरूशलेम, 3, 162, 183, 316, 322, 323, 374 यीशु, 3, 26, 29, 31, 33, 34, 35, 41, 42, 52, 63
315, 354, 360 यीशु मसीह, 26, 29, 31, 33, 34, 35, 41, 42, 63, 75, 82, 92, 100, 101, 245, 263, 292 यहूदी, 24, 26, 33, 34, 35
36, 37, 38, 39, 40, 43, 44, 51, 97, 111, 121, 338, 339, 340, 342 यहूदी (विशेषण), 44, 154 अय्यूब, 14, 233 आनन्द, 8, 21, 24, 33, 34, 35, 40, 43, 44, 46, 47
54, 55, 56, 57, 65, 68, 69, 72, 75, 80, 81, 82, 84, 85, 114, 115, 116, 347, 351, 353, 364 आनन्दित, 21, 33, 40, 44, 56, 72, 75, 84, 85, 116, यहूदा, 294 न्यायी, 97, 178, 189
269, 275, 327, 336 न्याय, 6, 7, 12, 13, 14, 16, 17, 18, 50, 53, 88, 93, 95, 96, 97, 110, 356, 357, 363, 374 न्याय (धार्मिकता), 37, 94, 95, 107
302, 352 धर्मी ठहराया जाना, 293, 297 बाबुल का राजा, 183 राज्य, 32, 34, 35, 37, 38, 39, 42, 71, 74, 85, 92, 95, 110, 113
375, 377 परमेश्वर का राज्य, 32, 34, 38, 131, 151, 202, 205, 277, 322, 344, 351 स्वर्ग का राज्य, 34, 85, 153, 157, 169, 179
278, 299, 331 राजा, 8, 13, 39, 106, 305, 322, 365 रसोई, 64 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
ज्ञान, 10, 26, 47, 49, 52, 54, 72, 80, 97, 99, 140, 142, 143, 145, 356, 373 परमेश्वर का ज्ञान, 258 क़ुरआन, 273 परमेश्वर का मेम्ना, 372 विलापगीत, 117 भाषा, 174, 281, लुचपन, 265 अन्तिम दिन, 15, 35, 118, लातीनी, 4, 291 स्तुति, 24, 190, 341 परमेश्वर की व्यवस्था, 54, 62, 157, प्रकृति का नियम, 250, 302 एल.डी.एस., 5, 13, 18, 37, 72
73, 74, 75, 79, 83, 96, 350, 355, 374 अगुवा, 34, 38, 39, 69, 255, 274, 281, 320 पीछे छूटे हुए, 290 पत्र, 21, 23, 92, 213
321, 334 झूठे, 187 उदार, 116, 220 स्वतन्त्रता (स्वाधीनता), 3, 21, 55, 56, 61, 63, 180, 182, 291 ज्योति, 8, 19, 26, 38, 45, 46, 52, 53, 54, 57, 64
85, 96, 97, 111, 118, 368, 376, 378, 379 छोटा झुण्ड, 38, 72, 356 लॉक, 239 धीरज, 247, 265 प्रभु यीशु, 29, 31, 33
34, 75, 112, 148, 165, प्रभु यीशु मसीह, 29, 31, 33, 34, 75, 112, 292 प्रभु भोज, 99 प्रेम, 3, 6, 7, 9, 10, 12, 20, 24, 25, 39, 42, 47
48, 49, 50, 51, 56, 59, 65, 72, 73, 74, 79, 81, 82, 85, 86, 89, 90, 92, 95, 99, 100, 102, 104, 365, 367 परमेश्वर का प्रेम, 47, 99, 302 अभिलाषा, 8, 122, 134, 135
299, 344, 376 लूथर, 2, 6, 7, 11, 13, 17, 19, 21, 22, 23, 25, 27, 31, 33, 35, 37, 39, 43, 45, 47, 51, 53, 55, 61, 63, 65, 71, 73, 75
79, 81, 83, 86, 87, 89, 91, 93, 95, 97, 99, 100, 377, 379 प्रताप, 32, 344, 346, 347, 351 मलाकी, 299, 316 द्वेषपूर्ण, 221 मानी-पंथी, 272 विवाह, 231, 273, मार्टिन, 2, 6, 22, 86, मार्टिन लूथर, 2, 6, 22
86, 100, 120, 223, 235, 280, 304, 359, 370 शहीद, 35, 121, 179, 187, 309 शहादत, 35 मिस्सा, 6, 19, 20, 42, 50 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं]
[पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] नरसंहार, 170 मत्ती, 178 अर्थ, 7, 15, 22, 23, 55, 96, 112, 130, 131
365, 367, 369, 377 मीडिया, 18, 20, 56, 64, 73, 102, 104, 114, 198, 351, 354, 376 मध्यस्थ, 287, 288 नम्र, 76, 164, 177, 247, 265 दया, 3, 5, 6, 33, 42
52, 61, 86, 89, 90, 91, 94, 95, 96, 98, 99, 100, 366, 371 परमेश्वर की दया, 320, 360, पुण्य, 8, 24, 88, 89, 90, 91, 93, 101, 105, 110, मसीहा, 34, 35, 350 मीका, 127 मिलर, 207, 211 मन, 2, 14, 15, 18, 28
50, 52, 54, 59, 60, 64, मनुष्यों के मन, 2 सेवक, 36, 60, 106, सेवकाई, 200, 203, 204, 260, 368 आश्चर्यकर्म, 31, 57, 145, 241, 242, 243, 370 चमत्कारी, 3, 120
121, 131, 208, 210 दुर्दशा, 12, 13, 32, 42, 99, 136, 150, 219, 229, 348, 371, 375 मिशन (सेवा-कार्य), 219, 273 ठट्ठा करनेवाला, 45, 310 शालीनता, 353 मुहम्मद, 269, 271, मठवाद, 270 धन, 36, 47, 115
339, 346, 379 शरीर-दमन, 175 मूसा, 5, 7, 17, 19, 20, 35, 36, 40, 47, 50, 59, 61, 63, 64, 65, 66, 67, 68, 69, 72, 76, 77, 78
315, 317 माता, 24, 25, 77, 367, 377 हत्या, 71, 76, 78, 93, 95, 98, 108, 109, 111, संगीत, 213 नंगा, 12, 13, 89, 93, 94, 144, 146, 160, 231, परमेश्वर का नाम, 137, 183
320, 344 जातियाँ, 15, 31, 51, 273, 274, 305 शारीरिक मनुष्य, 326 आवश्यक, 2, 14, 15, 20, 26, 35, 42, 63, 66, 93, 107, 109, 112, 130, नहेम्याह, 94 नया नियम, 149 कुख्यात, 141, 375 गिनती, 281 शपथ, 333 आज्ञाकारिता, 36, 147
[सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] पद, 8, 36, 57, 101
365, 368 पुराना नियम, 165, 206 अत्याचार, 6, 136 ठहराया हुआ, 40, 108, 148, 319, 322 विधि, 121, 139, अंग, 180, 373, 374 पीड़ा, 17, 56, 69, 72
74, 75, 78, 82, 85, 121, 340, 345, 372 पोप-तन्त्र, 116, 121, 156 पोप-पक्षी, 2, 23, 28, 29, 30, 31, 36, 47, 80, 88, 93, 104, 109, 111, 162, दृष्टान्त, 3, 6, 28, 32
43, 46, 47, 52, 86, 98, 293, 325, 326 अदन की वाटिका (परादीस), 240, 349, 353, 372 माता-पिता, 114, 273, 327 दल, 356 पास्कल, 187 दुःखभोग, 98, 164, 191
371, 372 पास्टर, 137, 138, 203, पौलुस, 19, 23, 31, 34, 38, 47, 51, 66, 91, 92, 97, 102, 103, 104, 105, 378, 379 शान्ति, 6, 16, 61, 75, सिद्धता, 172, 173 नाश होना, 14, 73, 78, 84
318, 319, 351 सताया गया, 101, 111, 375, 378 सताव, 6, 37, 134, 154, 155, 274, 378 विकृति, 28, 87, 322 फरीसी, 3, 7, 14, 31
38, 46, 47, 49, 52, 53, 54, 55, 56, 57, 58, 64, 69, 156, 157, 166, 169, 350, 352, 353, 355 फिलिप्पियों, 51, 298, फिलि., 359, 367 औषधि, 205, 320, 345 पियर्स, 59, 122, 135
171, 333 भक्ति (धर्मपरायणता), 48, 49, 50, 53, 61, 157, 179, 253, 286, सुख-विलास, 8, 9, 10, 12, 14, 15, 81, 85, 96, 110, पुलिस, 27 कंगाल, 7, 9, 10, 11, 12
13, 14, 21, 22, 26, 30, 31, 37, 38, 39, 42, 43, 47, 48, 56, 58, 65, 66, 70, 73, 74, 76, 77, 80, पोप, 2, 30, 31, 41, 43
45, 46, 61, 106, 116 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
376, 378, 379 पोपवाद, 2, 31, 225, 269, 270, 273, 323 पोपवादी, 2 सम्पत्ति (अधिकार), 12, 14, 23, 93, 94, 111, 114, 118, 318, 321, 365 वंशज, 206, 222 दरिद्रता, 11, 12, 13, 14
209, 218, 346 सामर्थ्य, 11, 20, 24, 27, 37, 38, 39, 40, 43, 80, 82, 83, 106, 114, 127, परमेश्वर का सामर्थ्य, 226 स्तुति (प्रशंसा), 2, 29, 47, 65
66, 71, 93, 106, 107, 368, 369, 374, 378 परमेश्वर की स्तुति करना, 360, 369 प्रार्थना करना, 5, 6, 18, 19, 21, 22, 42, 50, 51, 54, 86, प्रार्थना, 19, 21, 50, 54
98, 132, 142, 175, 212, प्रचार करना, 20, 23, 26, 32, 34, 35, 39, 41, 42, 45, 56, 64, 65, 70, 72, 74, 75, 76, 77, 81, 84, 86, 97, 100, 101, 102, 103, वचन का प्रचार करना, 227 प्रचारक, 122, 137
376, 377, 378 प्रचार, 32, 41, 42, 76, 77, 101, 102, 103, 353, 368, 369 अध्यक्ष, 4 दिखावटी, 35, 57, 69, 270, 335 याजक, 19, 28, 30, 35
36, 37, 38, 39, 40, 94, 365, 366, 368 याजकपद, 35, 36, 37, 39, 309, 320, 322, 365 सिद्धान्त, 2, 185, 265 बन्दीगृह, 62, 111, 156
289, 309 सम्पत्ति, 116, 128 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
272, 283, 312 भविष्यद्वाणी, 3, 204, 229, 245, 263, 304, 305 भविष्यद्वक्ता, 3, 5, 14, 17, 19, 20, 24, 33, 34, 51, 91, 99, 105, 115, 160
336, 371, 372, 375 समृद्धि, 141 प्रोटेस्टेंट, 2 नीतिवचन, 217 भजन, 9, 10, 36, 129, 329, 334, 371 भजनकार, 133, 134, 198 भजन संहिता, 317, 329, 371 सार्वजनिक मूर्तिपूजा, 275 सार्वजनिक पाप, 47, 49, 182
190, 224, 340 मंच (प्रचार-मंच), 203, 206, 281, 377, 378 दण्ड, 107, 108, 351, 379 शोधन-स्थान, 2, 273, 376 उद्धरण, 150, 243, 244
306, 315 पठन, 2, 93, 282 तर्क-बुद्धि, 6, 7, 8, 9, 12, 24, 27, 31, 38, 40, 49, 51, 53, 56, 60, 70, 71, 373, 378 मेल-मिलाप, 161, 354 छुड़ानेवाला, 288 छुटकारा, 91 सन्दर्भ, 23 सुधार, 2, 72, 116, 186
247, 305, 332, 344 सुधारवादी (रिफ़ॉर्म्ड), 2, 247, 332 सुधारवादी विश्वास-अंगीकार, 2 सुधारक, 2 आनन्द करना, 6, 46, 81, 84, 85, 185, 248, 266, 337
345, 346, 347, 356 आनन्द मनाना, 46, 96 धर्म, 2, 55 पश्चाताप करना, 5, 41, 42, 43, 44, 46, 47, 54, 56, 84, 348, 351, 355, 357 पश्चाताप, 41, 42, 43
44, 46, 56, 109, 147, 348, 351, 355, 357 पश्चाताप किया, 306 संकल्प, 226, 229 पुनरुत्थान, 26, 105 मृतकों का पुनरुत्थान, 105 प्रकाशन, 147, 149, समीक्षा, 222, 377 प्रतिफल, 37, 68, 90, 92
344, 362 रेक्स, 133 धनी, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 16, 17, 18, 23, 24, 25, 27, 31, 32, 33, 36, 38, 42, 43, 48, 87, 92, 105, 106
314, 319 धन-सम्पत्ति, 8, 9, 13, 14, 24, धार्मिकता, 6, 47, 48, 50, 52, 62, 63, 64, 65, 66, 79, 91, 92, 101, 342, 343, 357 परमेश्वर की धार्मिकता
48, 157, 181, 202, 292 रीति-विधियाँ, 14, 33, 49, 58, 59, 92, 96, 97, 98, 156, 308, 325, 333 अनुष्ठान, 12, 26, 27, 34, 44, 46, 72, 89, 93, 121
[सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] 367, 369 चट्टान, 58, 208, 209, 261
265, 271, 309 रोमन कैथोलिक, 2 रोमियों, 91, 97, 100, 322, 323 रोम, 54, 162, 227, राउज़, 134, 150 सब्त, 59, 62, 166, 340, 356 संस्कार, 23, 28, 29
30, 31, 32, 35, 74, 112, संस्कार (बहुवचन), 210, 272 बलिदान, 91, 198, 199, 216, 329 उदासी, 84 उद्धार, 2, 26, 33, 42, 330, 344, 345, 365 मसीह में उद्धार, 63 शमूएल, 47, 51 पवित्र किया गया, 63, 192, 356 स्वीकृति, 147 शैतान (सातान), 19, 21, 22, 59
87, 165, 177, 178, 185, 338, 376 शाऊल, 150, 169 उद्धारकर्ता, 31, 71, 92, 370, 374 ठोकर (कलंक), 80, 274, 314, 317, 318, 346 ठोकर दिलानेवाला, 80, 274
314, 317, 318, 346 पाठशाला, 65, 66, 125, पवित्रशास्त्र (लेख), 6, 19, 22, 23, 45, 59, 91, 92, 93, 95, 372, 375 एस.डी.ए., 44 मुहरें, 92 दूसरी आज्ञा, दूसरी पटिया, 340, 344 व्यवस्था की दूसरी पटिया, गुप्त पाप, 8, 9 पंथवादी, 240, 376 पंथवाद, 240 पंथवादी लोग, 376 पंथ, 70, 154, 235
277, 310, 311 सांसारिक, 164 संयम, 247, 265 समझ, 27, 72, 103, 321, 349, 360 अलग किया गया, 308, 370 उपदेश, 3, 4, 5, 22, 28
31, 32, 46, 55, 56, 68, 70, 72, 86, 100, 120, 337, 359, 370, 375 सत्र, 12, 14, 23, 93, 94, 111, 114, 118, 126, 302, 318, 321, 365 स्थिर, 23, 225 सातवीं आज्ञा, यौन-सम्बन्ध, 21, 231 छाया, 287, 294 लज्जा, 6, 12, 28, 29
30, 38, 53, 57, 70, 71, 72, 99, 112, 115, 119, 354, 377 तीखा, 5, 32, 37, 172 शेड, 246, 264 चरवाहा, 52, 54, 55, 71, 73, 74, 75, 76, 77
78, 79, 80, 81, 82, 83, 85, 91, 224, 237, 255 रोगी, 10, 15, 31, 77, 99, 289, 345 सीनै, 77, 349 पापमय, 10, 16, 26, 42, 74, 120, 126, 127, 128
145, 150, 341, 349 अविवाहित (एकल), 23, 71, 117 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] पापी, 3, 41, 46, 47
48, 49, 50, 51, 52, 53, 54, 55, 56, 57, 58, 59, 62, 64, 65, 66, 70, 80, 84, 85, 90, 96, 97, 98, 99, 110, 129, 145, 149, 356, 357, 368 पाप, 3, 7, 8, 10, 18, 24
26, 27, 32, 33, 40, 41, 42, 43, 48, 49, 50, 51, 52, 53, 54, 55, 56, 61, 63, 67, 68, 71, 72, 76, 78, 79, 84, 91, 95, 96, 98, 99, 100, 101, 102
372, 373, 374 छठी आज्ञा, दास, 271, 299, 309 सदोम, 306 सैनिक, 160, 308, 309 गम्भीर, 148, 181 सुलैमान, 109, 123
136, 142, 301, 312 परमेश्वर का पुत्र, 148, 241, 245, 263, 298 मनुष्य का पुत्र, 60, 151, 166, 300 टोना, 247, 265 प्राण, 6, 7, 10, 15, 16
18, 19, 20, 25, 56, 71, 76, 85, 87, 109, 117, 373, 375, 376, 377 सर्वोच्च, 2 सर्वोच्च परमेश्वर, 2 बोलना, 7, 16, 17, 18, 28, 32, 38, 40, 42, 44
49, 59, 62, 64, 66, 73, 77, 80, 81, 82, 91, 93, 95, 96, 101, 104, 105, 378, 379 विशेष प्रकाशन, 272 वाणी, 226, 349, 359
364, 365, 371, 378 आत्मा, 6, 10, 11, 12, 14, 15, 19, 20, 21, 23, 24, 26, 27, 34, 44, 46, 60, 66, 67, 69, 71, 72, 74, 81, 82, 88, 89, 93, 109
369, 376, 379 परमेश्वर का आत्मा, 232, 241, 245, 259, 263 आत्मिक, 12, 26, 27, 34, 44, 46, 72, 89, 93, 121, 367, 369 आत्मिक वरदान, 152 आत्मिक मनुष्य, 228, 248 खेल-तमाशा, 45, 61, 221
[सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] सोता, 14, 59, 60, 135, भण्डारी, 3, 280, 281
283, 301, 302, 303 भण्डारीपन, 280 ज़ोर, 41, 67, 76, 115, 354, 360 झगड़ा, 247, 265, 282 अध्ययन, 244, 262, 302, सफलता, 56, 130, 140
141, 218, 219, 256 दुःख-भोग, 11, 15, 18, 82, 100, 147, 148, 171, रविवार, 3, 4, 5, 6, 8, 10, 12, 14, 16, 18, 20, 22, 24, 26, 28, 30, 32
34, 36, 38, 40, 42, 44, 46, 48, 50, 52, 54, 55, 56, 58, 60, 62, 64, 66, 68, 70, 72, 74, 76, 78, 80, 82, 84, 86, 88, 90, 372, 374, 376, 378 शपथ खाना, 183, 352 शपथ खाना (कसम), 183 मिलापवाला तम्बू, 280, 281
292, 300, 301 शिक्षक, 58, 61, 98, 270, 276, 320, 376 उपदेश (शिक्षण), 2, 9, 20, 22, 23, 27, 30, 36, 56, 76, 93, 130, 157, 177, 224, आँसू, 82, 235, 238, 247
254, 256, 309, 315 स्वभाव, 166, 167, 170, संयम (मिताचार), 233 मन्दिर, 35, 40, 66, 71, 97, 204, 304, 305, 307, 325, 340, 347, 357 परीक्षा, 20, 63, दस आज्ञाएँ, 76
350, 354, 355 आतंक, 42, 70, 72, 76, 276, 355, 357 साक्षियाँ, 260 साक्षी, 17, 102, चोरी, 112, 114 धर्मविज्ञान, 337, 349, 355 थॉमस एक्विनास, 172 हज़ार वर्ष, 18, 225 जीभ, 5, 13, 16, 33
51, 159, 172, 182, 194, पीड़ा (यन्त्रणा), 5, 6, 16, 65, 106, 148, 229, 239 यातना, 375, 377 परम्परा, 41, 270 ट्रैप, 335 ट्रेंट, 2 परख, 100, 132, 140
144, 154, 169 क्लेश (संकट), 132 त्रिएकता, 3, 4, 5, 6, 8, 10, 12, 14, 16, 18, 20, 22, 24, 26, 28, 30, 32, 34, 36, 38, 40, 42, 44, 46
48, 50, 52, 54, 55, 56, 58, 60, 62, 64, 66, 68, 70, 72, 74, 76, 78, 80, 82, 84, 86, 88, 90, 92, 94, 96, 98, 100, 102 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं]
[पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं] 372, 374, 376, 378 सच्चे मसीही, 106, 261, 269, 276 सच्ची कलीसिया, 45, 269
276, 338 सच्ची उपासना, 320, 321, 322, 329, 340 तुरहियाँ, 124 भरोसा, 8, 9, 14, 16, 19, 376, 378 सत्य, 20, 51, 79, 80, 97, 98, 101, 110, 111
362, 376 तुर्क, 43, 57, 139, 205, 277, 360 दो गवाह, 48, 241, अत्याचारी, 75, 238, 256, 258, 375 अशुद्धता, 78, 247, अभक्त, 92, 218, 252, एकता, 23, 31, 95, 96
346, 354, 366 कलीसिया की एकता, 154 यू.एस.ए., 3, 18, 50, 57, 106, 322, 323, 374 विजय, 68, 100 कुँवारी, 6, 33, 53, 128, 363, 367 कुँवारी मरियम, 33 दर्शन, 35, 124, 194
247, 265, 314 बुलाहट (पेशा), 270 मत, 361 मन्नत, 198, 273 वॉर्न, 237, 240, 256 चेतावनी, 3, 19, 116, 305, 378 वेब, 59 व्हाइट, 165, 166 वेश्या (व्यभिचारिणी), 218, 273, 274
324, 338, 342, 345 विधवा, 138, 203 पत्नी, 22, 24, 25, 36, दाखरस, 9, 28, 30, 38, 39, 58, 112, 185, 204, 271, 282, 294, 299, 375 बुद्धि, 6, 12, 24, 32
40, 71, 141, 213, 214, 353, 354, 355, 375 गवाह, 14, 45, 48, 62, 331, 340, 372 गवाह (बहुवचन), 48, 189, 297, 330, 331 गवाही देना, 212 स्त्रियाँ, 53, 197, 207
212, 213, 321 परमेश्वर का वचन, 15, 16, 17, 19, 20, 26, 35, 97, 120 [सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
काम, 3, 4, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 19, 26, 27, 29, 36, 41, 43, 47, 48, 49, 50, 54, 60
61, 62, 63, 64, 65, 66, 69, 71, 72, 76, 77, 78, 79, 80, 84, 86, 87, 88, 89, 90, 91, 92, 93, 94, 96, 100, 101, 102, 104, 373, 374, 379 कर्मों की धार्मिकता
128, 163 संसार, 6, 7, 12, 13, 18, 19, 23, 30, 33, 37, 38, 40, 44, 45, 46, 47, 49, 52, 61, 62, 65, 66, 70, 71, 72, 73, 85, 98, 99
372, 374, 375, 377 सांसारिक (लौकिक), 12, 30, 37, 44, 46, 49, 111, 164, 230, 245, 256, 263, 351 उपासना, 14, 40, 41, 50, 341, 343, 346, 356 परमेश्वर की उपासना, 116
277, 320, 321, 322 क्रोध, 32, 41, 42, 43, 44, 45, 52, 67, 70, 77, 79, 80, 90, 102, 106, 355, 356 परमेश्वर का क्रोध, 32, 41, 43, 67, 70, 77, 80, 102
344, 348, 356 जवान, 28, 31, 35, 77, 206, 229, 230, 303 युवावस्था, 28, 116 उत्साह, 53, 174, 178, 187, 305, 310, 320 उत्साही, 53, 187 जकर्याह, 305
[सूची में आंशिक मिलान भी सम्मिलित हो सकते हैं] [पृष्ठ-संख्याएँ पीडीएफ़ की पृष्ठ-संख्याओं को दर्शाती हैं]
