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अध्याय 4

शक्तिशाली सेनापति

हमारी विरासत · बख्त सिंह

शक्तिशाली सेनापति

यरीहो एक बहुत मोटी दीवारों वाला मज़बूत नगर था, और उसमें लड़ने के लिए बहुत से शूरवीर पुरुष थे

इस्राएल की सन्तान के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार थे। फिर भी रहाब का विश्वास दृढ़ और महान था, और उसे जीवते परमेश्वर की विजय पर विश्वास था। इसीलिए बिना किसी विलम्ब के उसने लाल डोरी बाँधी। यह विश्वास के द्वारा, और केवल सरल विश्वास के द्वारा ही है कि हम उद्धार पा सकते हैं और इस प्रकार उस महान स्वर्गीय विरासत को पाने के लिए तैयार हो सकते हैं।

[शक्तिशाली सेनापति]

तब इस्राएलियों के लिए यरदन नदी को पार करके कनान देश में प्रवेश करने का समय आया। वे उस नदी को एक बहुत ही असाधारण रीति से पार हुए। यह हमें यह भी दिखाता है कि हम मसीह यीशु में अपनी विरासत में कैसे प्रवेश करके उसका आनन्द ले सकते हैं। परमेश्वर ने आज्ञा दी, “तुम्हारे और उसके बीच लगभग दो हज़ार हाथ का अन्तर हो, उसके निकट न आना, जिससे तुम उस मार्ग को जान सको जिस से तुम्हें जाना है, क्योंकि तुम इस मार्ग से पहले कभी नहीं गए” (यहो. 3:4)। जब वाचा का सन्दूक उठाने वाले याजकों को प्रतिज्ञा किए हुए देश में प्रवेश करना था, तो पहले परमेश्वर स्वयं उनकी ओर से लड़ने के लिए उनके आगे-आगे चल रहा था। यह उनकी अपनी शक्ति, सामर्थ्य या योग्यता से नहीं था कि वे उस नदी को पार करके, उस देश पर अधिकार जमाए बैठे बलवान शत्रुओं अर्थात् कनानियों, हित्तियों, हिव्वियों, परिज्जियों, गिर्गाशियों, एमोरियों और यबूसियों को जीत सके। वह सन्दूक उन्हें याद दिलाने के लिए था कि जीवता और महान परमेश्वर स्वयं उनके बीच उनके शक्तिशाली सेनापति के रूप में उपस्थित था। वह उन्हें आगे ले जाकर उनके सामने से शत्रुओं को खदेड़ देगा, और उन्हें अपनी शक्ति, योग्यता या युद्ध के हथियारों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं थी।

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