बालक
हम Joshua 5.12 मन्ना बन्द हो गया, ऐसा लिखा है। जब तक इस्राएल की सन्तान जंगल में थी, तब तक परमेश्वर उन्हें प्रतिदिन मन्ना देता रहा। कनान में आने के बाद वह बन्द हो गया। अब उन्हें अपने भोजन के लिए परिश्रम करना पड़ा। आत्मिक परिपक्वता तक पहुँचने के लिए हमें परमेश्वर के सक्रिय सहभागी बनना है। हमारे आत्मिक जीवन के आरम्भ में कुछ समय के लिए परमेश्वर विशेष रीति से हमारी देखभाल और रखवाली करता है। परन्तु जैसे-जैसे हम आत्मिक परिपक्वता में आगे बढ़ते हैं, परमेश्वर हमसे आशा करता है कि हम अधिक विश्वास दिखाकर, अधिक कठिन आत्मिक फल पाने के लिए उससे सहायता माँगें। वह चाहता है कि हम उसकी इच्छा को अधिक स्पष्टता से जानें और अपनी ज़िम्मेदारियाँ उठाएँ तथा सबके सामने आने वाली परीक्षाओं और कठिनाइयों का परमेश्वर की सहायता से अधिक परिपक्व भरोसे के साथ सामना करें। इस प्रकार परमेश्वर चाहता है कि हम विश्वास से उसकी विजय का दावा करना सीखें।
प्रेरित पौलुस ने अपने अनुयायियों की आत्मिक बातों में सहायता करने के लिए परमेश्वर के वचन के अनेक भेदों को कभी-कभी समझाया। फिर, जब वह दूर था, तो उसने उन्हें लिखा कि वे भय और कँपकँपी के साथ अपने उद्धार का काम पूरा करें (Phil. 2:12। कुछ समय के लिए परमेश्वर हमें चरवाहे देगा जो हमें खिलाएँ, सिखाएँ और आगे ले चलें। इसके बाद हमें अपने आप कार्य करना सीखना है। हमें बाइबल को गहरी समझ के साथ पढ़ना, उस पर मनन करना और उसके द्वारा परमेश्वर की आवाज़ सुनना सीखना है। कुछ विश्वासी बहुत लम्बे समय तक बालक ही बने रहते हैं। वे चाहते हैं कि परमेश्वर के अन्य सेवक उन्हें दूध पिलाते रहें। वे न तो बढ़ते हैं, न अधिक समझदार बनते हैं, न ही उनमें परमेश्वर के वचन के ठोस आत्मिक आहार को पचाने की बढ़ती हुई क्षमता होती है (Heb. 5:12-15। प्रभु हमारी सहायता करके हमें सिखाए, अधिक से अधिक यह कि उसकी आवाज़ कैसे सुनें और उसकी सिद्ध इच्छा कैसे जानें, ताकि हम आत्मिक वृद्धि में और अधिक बालक न बने रहें।
