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अध्याय 5

पूर्ण अधीनता

हमारी विरासत · बख्त सिंह

पूर्ण अधीनता

5. पूर्ण अधीनता।

अब यरदन नदी बहुत चौड़ी या गहरी नहीं है। यह 26 से 30 फुट से अधिक चौड़ी नहीं है। इस्राएल की सन्तान उस पर पुल बना सकती थी या नाव का प्रयोग करके उसे पार कर सकती थी। परन्तु यहोवा ने उन्हें आज्ञा दी थी कि सन्दूक उठाने वाले याजक पहले जाएँ और बाकी सब लोग उनके पीछे-पीछे चलें। ज्यों ही याजकों के पाँव जल में पड़े, त्यों ही जल दो भागों में बँट गया और लोग सूखी भूमि पर होकर पार हो गए। यरदन का जल हमारे पापमय शारीरिक स्वभाव को दर्शाता है जो हमें अपनी विरासत को अपनाने से रोकता है। जब तक हम उस स्वभाव पर विजय पाने के लिए अपनी इच्छाशक्ति और सामर्थ्य पर निर्भर रहते हैं, तब तक हम हारते ही रहेंगे। जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवन की बागडोर अपने हाथ में ले लेता है, तभी हम विजय का आनन्द ले सकते हैं।

प्रेरित पौलुस अपने समय के सबसे अधिक योग्य पुरुषों में से एक था। वह यह भी कह सकता था कि व्यवस्था के अनुसार धार्मिकता की दृष्टि से वह निर्दोष था। फिर भी उसने अपनी मानवीय योग्यताओं पर भरोसा नहीं किया, बल्कि यह कहा कि उसे शरीर पर कोई भरोसा नहीं है (Phil. 3:4) उसने यह भी कहा, “मैं नहीं, वरन मसीह”। जिस प्रकार इस्राएल की सन्तान के पास उस नदी को पार करने की अपनी कोई योजना नहीं थी परन्तु वे परमेश्वर द्वारा दी गई योजना के पूरी तरह अधीन थे, उसी प्रकार हमें भी प्रभु यीशु मसीह को अपने हृदय के सिंहासन पर राजा के रूप में विराजमान करके उसके पूर्ण अधीन रहना चाहिए। जिस प्रकार याजकों के पाँव जल को छूते ही जल बँट गया, उसी प्रकार हम भी प्रभु की सामर्थ्य को हमारी ओर से कार्य करते और हमें विजय की ओर ले जाते हुए पाएँगे। प्रतिदिन हमें अपने हृदय में अनेक लड़ाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि शत्रु हमें बैर, वैमनस्य, ईर्ष्या, वासना, अशुद्धता, लालच, अभिमान आदि के विचारों से उकसाता है। इन इच्छाओं, भावनाओं और विचारों को हम अपनी इच्छाशक्ति, ज्ञान या चतुराई से नहीं जीत सकते।

हमें विश्वास से यह कहना चाहिए, “हे प्रभु यीशु, मैं इन पापमय इच्छाओं को अपने बल से नहीं जीत सकता। ये मुझे सताती हैं। कृपया तू ही मेरी ओर से इन्हें जीत ले।” तभी हम उसकी विजय का आनन्द ले सकते हैं।

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