निर्भरता
यहोवा ने यहोशू को इस्राएल की सन्तान का खतना करने की आज्ञा दी। परमेश्वर ने अब्राहम और उसके बाद उसके वंश के साथ वाचा बाँधकर कहा, “मेरी यह वाचा है जिसे तुम्हें मानना है... तुम्हारे बीच के हर पुरुष का खतना किया जाए” (Gen. 17:10), उसी समय परमेश्वर ने अब्राहम से किया अपना वादा फिर से दोहराया कि वह निश्चय उसे एक पुत्र देगा, उसे बहुत बढ़ाएगा और उसे कनान देश विरासत के रूप में देगा। उस समय अब्राहम निन्यानवे वर्ष का था। और उसकी पत्नी सारा नवासी वर्ष की थी। मानवीय दृष्टि से उनके शरीरों में पुत्र उत्पन्न करने की कोई सम्भावना नहीं थी। परमेश्वर ने अब्राहम को हर पुरुष सन्तान का खतना करने के लिए कहा, ताकि उन्हें यह समझ आए कि वे अपनी शक्ति या ऊर्जा से नहीं, बल्कि परमेश्वर के अपने जीवन और पुनरुत्थान की सामर्थ्य से ही फलवन्त हुए। उसी प्रकार यहोशू और इस्राएल की सन्तान को यह ध्यान रखना था कि वे अपनी विरासत का आनन्द अपनी शक्ति या चतुराई से नहीं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा, सामर्थ्य और शक्ति के द्वारा ही ले सकते हैं।
हमें यही सन्देश जरुब्बाबेल को दिए जाने का उल्लेख भी मिलता है, Zech. 4:6में। “‘न तो सामर्थ्य से, और न बल से, परन्तु मेरे आत्मा ही से यह होगा, ऐसा सेनाओं का यहोवा कहता है’। यरूशलेम का मन्दिर कैसे फिर से बनाया जाएगा, इस बारे में जरुब्बाबेल संदेहों और प्रश्नों से भरा हुआ था। वह जानता था कि यिर्मयाह की भविष्यवाणी के अनुसार इस्राएल की सन्तान बाबुल में 70 वर्षों तक बन्दी रहेगी। उसने यरूशलेम की गिराई गई शहरपनाह और आग से जलाए गए फाटकों को देखा। जरुब्बाबेल के साथ जो इस्राएली लोग थे वे संख्या में कम, थोड़े धन और थोड़ी सहायता के साथ थे। इन परिस्थितियों में यहोवा का वचन जरुब्बाबेल के पास आया कि परमेश्वर का कार्य मानवीय बल या मानवीय सामर्थ्य से नहीं, बल्कि उसके आत्मा से होगा। हम अपनी शक्ति से प्रभु की कोई सेवा नहीं कर सकते और अपने प्रयासों से अपनी विरासत को अपना और उसका आनन्द नहीं ले सकते। हमें परमेश्वर के आत्मा पर निर्भर रहना सीखना है और अपने आप को उसके पूर्ण अधीन लाना है।
परमेश्वर के मार्गदर्शन की उपेक्षा करके और उसकी आज्ञाओं को न मानकर हम आत्मिक रूप से अन्धे हो जाएँगे। आज हम पाते हैं कि बहुत से लोगों ने अवज्ञा के कारण या अधूरी आज्ञाकारिता के कारण परमेश्वर की बातों को लेकर अपनी दृष्टि खो दी है।
उदाहरण के लिए, राजा शाऊल ने परमेश्वर की आधी-अधूरी आज्ञा मानी, जिसके परिणामस्वरूप वह परमेश्वर द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। दाऊद भी अपनी विशाल सेना को गिनने की परीक्षा में पड़ गया और इस तरह अपनी शक्ति पर घमण्ड करने लगा (2 Sam. 24:2,3)। वह भली-भाँति जानता था कि उसकी सब विजयें उसकी अपनी सेना के बल से नहीं बल्कि परमेश्वर के द्वारा ही मिली थीं। उसने गोलियत को अपनी शक्ति या चतुराई से नहीं हराया था। उसने यहोवा परमेश्वर के नाम में गोलियत से लड़कर उसे हराया (1 Sam. 17:45,50)। फिर भी वृद्धावस्था में वह अपनी सेना की गिनती करने की परीक्षा के आगे झुक गया। उसके सेनापति योआब ने उसे इस भूल से बचाने की कोशिश की, परन्तु दाऊद का निश्चय प्रबल रहा। इससे यह प्रगट हुआ कि दाऊद की दृष्टि परमेश्वर पर नहीं बल्कि अपने लोगों की बड़ी संख्या पर लगी थी। इसीलिए परमेश्वर ने उसे खलिहान में मुँह के बल गिरा दिया। इस प्रकार दाऊद को यह सीखना पड़ा कि उसे केवल यहोवा पर ही भरोसा रखना चाहिए।
इस प्रकार की परीक्षा हम सबके सामने आती है। हम अपनी परीक्षाओं पर विजय पाने के लिए या परमेश्वर की सेवा करने के लिए अपनी इच्छाशक्ति, योग्यता या ज्ञान पर भरोसा करने की परीक्षा में पड़ जाते हैं। बहुत से लोग अपने कैमरों, भवनों और सम्पत्तियों पर निर्भर रहते हैं। वे सोचते हैं कि इन सब चीज़ों के होने से उन्हें अधिक फल और अच्छे परिणाम मिलेंगे।
फलदायक सेवकाई के लिए, हर परिस्थिति में हमें अपने आप को प्रभु पर डालना होगा। यदि उपदेशक भी अपने बीते हुए आशीषों और उपलब्धियों पर निर्भर रहें, तो वे बहुत फल देखने का अवसर खो देंगे। हमें प्रतिदिन परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह हमारे होंठों, जीभ और कण्ठ को स्पर्श करके अपने लोगों के लिए अपना सन्देश हमें दे। तभी हमारी सेवकाई पूरे जीवन और ताज़गी से भरी होगी। कुछ चतुर गृहिणियाँ बासी और सूखे भोजन में नमक, मिर्च, इमली और अन्य मसाले डालकर उसे तलती हैं ताकि वह ताज़ा दिखे और स्वादिष्ट लगे। कुछ उपदेशक भी उन्हीं पुराने सन्देशों को उसी तरह बार-बार उपयोग करते रहते हैं। इससे हमें परमेश्वर की आशीष नहीं मिलेगी और हमारे परिश्रम में फल नहीं आएगा। यह आवश्यक है कि हम घुटनों के बल जाकर प्रभु से विनती करें कि वह हमें अभिषिक्त करे और प्रतिदिन अपना सन्देश हमें दे। हमें कभी भी सन्देश तैयार करने के लिए अपनी चतुराई, योग्यता या शक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इससे विजयी और उपयोगी जीवन नहीं मिलेगा।
यह सब सिखाने के लिए, परमेश्वर ने यहोशू से लोगों का खतना करवाने को कहा। उसने उन्हें याद दिलाया कि वे अपने युद्ध के हथियारों, अपनी सेना की बड़ी संख्या, या अपनी चतुराई और चाल पर निर्भर रहकर नहीं, बल्कि केवल यहोवा की शक्ति पर निर्भर रहकर ही उन सात बड़ी जातियों पर विजय पाकर कनान देश पर अधिकार कर सकेंगे।
