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व्याख्यान 9
व्याख्यान 9
[पाठ] पद 5. तब योना नगर से निकलकर नगर की पूर्व ओर बैठ गया, और वहाँ अपने लिए एक छप्पर बनाकर उसकी छाया में बैठा रहा, कि देखे नगर का क्या होता है।
[कैल्विन] यहाँ यह सन्देह उठ सकता है कि योना चालीस दिन पूरे होने तक ठहरा रहा, अथवा उससे पहले ही निकल गया। क्योंकि यदि हम कहें कि वह चालीसवें दिन से पहले नगर से निकल गया, तो एक और प्रश्न उठता है: वह कैसे जान सकता था कि आगे नगर पर क्या बीतेगा? क्योंकि अब तक हम देखते हैं कि उसे इस विषय में किसी आकाशवाणी से शिक्षा नहीं मिली थी; वरन् यहाँ जो शब्द हम पढ़ते हैं वे कुछ और ही ध्वनि देते हैं, अर्थात् यह कि बात के परिणाम और अन्त से ही उस पर प्रकट हुआ कि परमेश्वर ने नगर को विनाश से बचा लिया है। क्योंकि पिछले व्याख्यान में कहा गया था कि परमेश्वर ने अपने कहे हुए वचन के विषय में पछताकर उसे पूरा न किया। इससे प्रतीत होता है कि योना नगर से तभी निकला जब चालीस दिन भली-भाँति बीत चुके थे।
परन्तु अब इसके विपरीत एक प्रश्न उठता है: जब यह पहले ही प्रकट हो चुका था कि या तो परमेश्वर का निश्चय बदल गया है, या कम से कम जो दण्डाज्ञा उसने सुनाई थी वह परिवर्तित हो गई है, तब उसे नगर के पास बैठने की क्या आवश्यकता थी? तब तो उसे नगर के पास इस प्रकार बैठे नहीं रहना चाहिए था मानो वह अब भी सन्देह में हो।
परन्तु मैं इस अनुमान को सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि योना चालीसवें दिन के बाद नगर से निकलकर चला गया; और शब्द भी हमें इसी ओर ले जाते प्रतीत होते हैं। रही यह बात कि जब उसने देख लिया कि समय पूरा होकर बीत चुका है, तब भी वह क्यों सन्देह में रहा कि नगर का क्या होगा, इसका उत्तर सरल है। क्योंकि यद्यपि चालीस दिन बीत चुके थे, तौभी योना मन में दुविधा में पड़ा रहा, क्योंकि वह अपने आपको पूरी रीति से यह समझा न सका कि वही वचन जो उसने स्वयं परमेश्वर की आज्ञा से सुनाया था, व्यर्थ ठहरेगा और उसका कोई प्रभाव न होगा। इसलिए मुझे सन्देह नहीं कि यही विचार उसे व्याकुल करता था, और वह अपने मन में इस प्रकार तर्क करता था:
“तूने कुछ भी उतावली से नहीं कहा। अब यह कैसे हो सकता है कि जिस बात को परमेश्वर ने अपने ही नाम से और अपनी ही आज्ञा से प्रचारित करवाना चाहा, वह अब व्यर्थ ठहरे, और उसका परिणाम उसके अनुरूप न हो?” इसलिए, चूँकि योना परमेश्वर की आज्ञा का ध्यान रखता था, वह इस सारी उलझन से तुरन्त मुक्त न हो सका। यही कारण था कि वह ठहराए हुए समय के बाद भी प्रतीक्षा करता रहा, मानो बात अब भी अनिश्चित हो।
अब, कि बात और भी स्पष्ट हो जाए, हमें यह ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर की युक्ति योना की समझ से कहीं अधिक गुप्त थी, यहाँ तक कि उसकी अपनी बुलाहट के विषयों में भी। क्योंकि परमेश्वर ने जब नीनवे के लोगों को विनाश की धमकी दी, तो उसने सशर्त बात कही; क्योंकि यदि यह शर्त उसके साथ न जुड़ी होती कि यदि नीनवे के लोग पश्चाताप करें तो वे बचा लिए जाएँगे, तो उस वचन का प्रयोजन ही क्या रहता? तब किसी भविष्यद्वक्ता की आवश्यकता ही न होती, परन्तु परमेश्वर इसी रीति से उनके बचाव का प्रबन्ध करना चाहता था; क्योंकि परमेश्वर बिना किसी भविष्यद्वक्ता के भी वह दण्ड दे सकता था जिसके नीनवे के लोग योग्य ठहरे थे।
यदि कोई यह उत्तर दे कि उनके पास प्रचारक इसलिए भेजा गया कि वे और भी अधिक निरुत्तर ठहरें, तो यह बहुत फीकी दलील होगी; क्योंकि परमेश्वर ने अन्य सब अधर्मी जातियों पर अपने सारे दण्ड बिना ऐसी किसी पूर्व चेतावनी के ही उतारे थे। क्योंकि निकट आए हुए दण्डों की घोषणा भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा करना कलीसिया का विशेष वरदान था; परन्तु अन्य जातियों के विषय में परमेश्वर ने घटना के द्वारा ही अपने आपको उनका न्यायी प्रकट किया, और उन्हें पहले से चेताने के लिए कोई भविष्यद्वक्ता नहीं भेजा।
इसलिए परमेश्वर की युक्ति के विषय में, जब उसने नीनवे के लोगों को उस इतने स्पष्ट प्रचार से भयभीत करने की आज्ञा दी, तब निश्चय ही उसमें एक शर्त सम्मिलित थी। परन्तु योना, यदि मैं ऐसा कह सकूँ, अक्षरों से बँधा हुआ शिक्षक था; क्योंकि जो उसे समझना चाहिए था वह उसने पूरी रीति से नहीं समझा, अर्थात् यह कि अब भी पश्चाताप के लिए स्थान था, और यदि नीनवे के लोग अपनी दुष्टता से फिर जाएँ तो नगर बचा लिया जाएगा। इसलिए जब योना ने बात को आधा ही समझा था, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि वह दुविधा में रहा और अब तक यह निश्चित करने का साहस न कर सका कि क्या होनेवाला है; परमेश्वर ने उस पर प्रकट नहीं किया था कि वह क्या करना चाहता है, क्योंकि योना की आँखों के सामने अपने प्रचार के तात्कालिक परिणाम के सिवा और कुछ न था। अब आगे बढ़ें।
[पाठ] पद 6. और यहोवा परमेश्वर ने एक लौकी का पौधा उगाया, और उसे योना के ऊपर चढ़ाया, कि उसके सिर पर छाया हो और उसका क्लेश दूर हो जाए; और योना उस लौकी के कारण बहुत ही आनन्दित हुआ।
पद 7. परन्तु अगले दिन भोर होते ही परमेश्वर ने एक कीड़ा ठहराया, जिसने उस पौधे को ऐसा काटा कि वह सूख गया।
पद 8. और जब सूर्य उदय हुआ, तब परमेश्वर ने पुरवाई की प्रचण्ड लू चलाई; और धूप योना के सिर पर ऐसी लगी कि वह मूर्छित हो गया, और उसने मन में मरने की इच्छा की, और कहा: मेरे लिए जीने से मरना ही भला है।
[कैल्विन] इससे पहले कि मैं मुख्य विषय को छुऊँ, इब्रानी शब्द कीकायोन के विषय में मैं थोड़ा कहूँगा, क्योंकि प्राचीन काल में इस शब्द को लेकर कुछ कम विवाद नहीं हुआ। कोई इसे “लौकी” पढ़ते हैं; कुछ अन्य इसे “खीरा” पढ़ना पसन्द करते हैं, क्योंकि अस्पष्ट और अनिश्चित विषयों में अटकलें और अनुमान काफ़ी स्वतन्त्र होते हैं। परन्तु सामान्यतः पहला अनुवाद ही ग्रहण किया गया था।
ऑगस्टीन कहता है कि किसी कलीसिया में उस समय गड़बड़ी मच गई जब अध्यक्ष ने जेरोम का नया अनुवाद पढ़ा, जिसमें उसने इस शब्द का अनुवाद “आइवी” किया था। परन्तु निश्चय ही वे लोग उतावले और मूर्ख थे जो इतनी तुच्छ बात पर इतने रुष्ट हुए, क्योंकि उन्हें तो यत्नपूर्वक यह जाँचना चाहिए था कि कौन-सा अनुवाद अधिक उत्तम और सच्चा है। ऑगस्टीन ने भी इस विषय में बहुत बुद्धिमानी से काम नहीं लिया, क्योंकि उस पर ऐसा अन्धविश्वासपूर्ण लगाव छा गया था कि वह पुराने नियम के प्रचलित अनुवाद में कोई परिवर्तन नहीं चाहता था। वह इतने से सन्तुष्ट था कि जेरोम ने नया नियम यूनानी से अनुवादित किया है, परन्तु वह नहीं चाहता था कि पुराने नियम के साथ छेड़छाड़ की जाए; क्योंकि यहूदियों के विषय में यह सन्देह था कि वे सदा विश्वास के घोर शत्रु होने के कारण सम्पूर्ण व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं को बिगाड़ने पर उतारू हुए होंगे। इसलिए जब यहूदियों की ओर से मिलावट का यह गुप्त सन्देह था, तो ऑगस्टीन ने इसी कारण प्रचलित अनुवाद पर ही टिके रहना उचित समझा।
जेरोम भी बताता है कि उसे स्वयं रोम में अधिकारियों के सामने लाया गया था क्योंकि उसने “लौकी” के स्थान पर “आइवी” अनुवाद किया था; परन्तु ऑगस्टीन ने उसे भी बहुत कठोरता से, और लगभग शत्रु की भाँति उत्तर दिया। और जेरोम ने भी बदले में कॉर्नेलियस नामक किसी व्यक्ति पर (मैं नहीं जानता वह कौन था) और असिनियस पोल्लियो नामक एक और व्यक्ति पर बड़ी कड़वाहट से आक्रमण किया, जिन्होंने रोम में इस अंश को बदलने के कारण उस पर लगभग मन्दिर-अपमान का दोष लगाया था। परन्तु मैं यहाँ उन्हें निर्दोष नहीं ठहराता, यदि उन्होंने हठपूर्वक उसे अस्वीकार किया जो वास्तव में सम्भाव्य था।
परन्तु मुख्य विषय के सम्बन्ध में, मैं इस स्थान पर इसे “लौकी” या “खीरा” ही रहने देना अधिक पसन्द करूँगा, बजाय इसके कि इतनी अल्प महत्त्व की बात पर और झगड़ा उठाऊँ। जेरोम कहता है कि यह आइवी बिल्कुल नहीं है, वरन् एक प्रकार का छोटा वृक्ष है, जो सीरिया में सब जगह उगता है। वह कहता है कि यह छोटा वृक्ष अपने ही तने के सहारे खड़ा रहता है, जो आइवी के विषय में नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आइवी यदि किसी दीवार या वृक्ष से न लिपटे तो केवल भूमि पर रेंगती है; इसलिए वह आइवी नहीं हो सकती थी, और इसीलिए उसने इसका ऐसा अनुवाद करना अनुचित माना।
वह अपने चुनाव का बचाव यह कहकर करता है कि यदि वह इब्रानी नाम को बिना अनुवाद किए ज्यों का त्यों रख देता, तो बहुत-से पाठक उसे किसी पशु या सर्प का नाम समझ बैठते; इसलिए उसने उसके स्थान पर कोई परिचित नाम रखना चाहा। परन्तु वह स्वयं भी इसी प्रकार बहुत-सी शंकाएँ उठा सकता था, जैसे यह कि “आइवी” इतने थोड़े समय में योना के सिर के ऊपर कैसे उग आई और उसे छाया कैसे दी? अब मुझे आश्चर्य होता है कि जेरोम एक स्थान पर कहता है कि इस प्रकार के वृक्ष को उसके अपने समय में सीरियाई भाषा में कीकियोन कहा जाता था, और फिर भी दूसरे स्थान पर, अपनी टीकाओं में, वह कहता है कि उसी भाषा में उसे एल्केरोआ कहा जाता था, जो कीकियोन से बिल्कुल भिन्न शब्द है। और जब वह ऑगस्टीन को उत्तर देता है, तो मुझे सन्देह नहीं कि वह उसका उपहास कर रहा था, क्योंकि वह जानता था कि ऑगस्टीन इब्रानी नहीं जानता, और इसलिए उस भाषा की उसकी अनभिज्ञता के कारण वह उसके साथ बालक की भाँति हँसी-ठट्ठा करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसने तत्काल अपनी सुविधा के लिए कोई नया शब्द गढ़ लिया, और मुझे सन्देह नहीं कि उसने उसे जल्दी में, केवल कीकायोन और कीकियोन शब्दों में कोई समानता बनाने के लिए ही गढ़ा।
परन्तु बात चाहे जैसी भी हो, वह लौकी रही हो या कोई छोटा वृक्ष, इस पर अधिक झगड़ना उचित नहीं कि वह इतने शीघ्र इतने बड़े आकार तक कैसे बढ़ गया होगा। जेरोम कहता है कि उसके पत्ते चौड़े होते हैं, और वह अंगूर की डाली के आकार तक बढ़ता है। ऐसा ही सही; परन्तु ऐसा पौधा एक दिन में, न दो दिन में, यहाँ तक कि तीन दिन में भी नहीं उग आता। इसलिए यह अवश्य कोई असाधारण बात रही होगी; क्योंकि न आइवी, न लौकी, न कोई छोटा अंकुर, न कोई और पौधा इतनी शीघ्रता से बढ़कर योना के सिर को ढक सकता था। और केवल इसी एक पौधे ने योना के सिर को छाया नहीं दी; वरन् यह अधिक सम्भव है कि यह उस छप्पर में जोड़ा गया जो वह पहले ही अपने लिए बना चुका था। इसलिए योना ने केवल इसी पौधे के नीचे शरण नहीं ली, वरन् जब वह केवल छप्पर से सूर्य की गर्मी से अपना पर्याप्त बचाव न कर सका, तब उसे यह अतिरिक्त सहायता दी गई। इसलिए परमेश्वर ने इस छोटे पौधे को छप्पर की छाया में जोड़ दिया, कि योना उससे ताज़ा हो जाए; क्योंकि हम जानते हैं कि उन देशों में सूर्य प्रचण्ड रूप से जलाता है, और यह तो, जैसा हम देखेंगे, असाधारण गर्मी थी।
“आइवी” शब्द के विषय में मैं यही कहना चाहता था, और मैंने इस पर अपनी योजना से अधिक समय लगा दिया; परन्तु क्योंकि प्राचीन काल में उस शब्द को लेकर इतना झगड़ा हुआ, इसलिए मैंने उचित समझा कि उन बातों का उल्लेख कर दूँ जो अधिक जिज्ञासु पाठक को भी सन्तुष्ट कर सकें।
अब मैं मुख्य विषय पर आता हूँ। योना बताता है कि यहोवा की ओर से एक लौकी, या खीरा, या आइवी “ठहराई” गई। इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रकृति के सामान्य क्रम के विपरीत यह पौधा अचानक उग आया कि योना के छप्पर को ढक ले; यह मेरा मत है। परन्तु हम जानते हैं कि जब-जब परमेश्वर प्रकृति के सामान्य क्रम के विपरीत कार्य करता है, तब भी वह किसी रीति से स्वयं प्रकृति की ओर लौट आता है। ऐसा सदा नहीं होता, परन्तु हम अधिकतर यही पाएँगे कि परमेश्वर ऐसे कार्य करता है कि प्रकृति के क्रम से बढ़कर भी हो, और फिर भी उससे पूरी तरह हटे नहीं; जैसे जब उसने जंगल में बटेरों का बड़ा ढेर इकट्ठा करके अपने लोगों को मांस देना चाहा, तो उसने पुरवाई चलाई। कितनी ही बार हवाएँ चली हैं, परन्तु उन्होंने कभी पक्षियों की ऐसी भीड़ इकट्ठी नहीं की। इसलिए यह एक आश्चर्यकर्म था; तौभी परमेश्वर ने प्रकृति के सामान्य साधनों को पूरी तरह एक ओर नहीं रखा, क्योंकि उसने हवा का प्रयोग किया, यद्यपि वह हवा अपनी स्वाभाविक शक्ति से उन पक्षियों को अपने साथ नहीं ला सकती थी।
इसी प्रकार इस स्थान पर मुझे सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने ऐसा पौधा चुना जो शीघ्र इतनी ऊँचाई तक बढ़ सकता था, और फिर भी उसे ऐसा करवाने में प्रकृति के सामान्य क्रम से आगे निकल गया। इसी अर्थ में कहा गया है कि परमेश्वर ने कीकायोन को “ठहराया”, और उसे योना के सिर के ऊपर उगाया, कि वह उसके सिर के लिए छाया हो और उसकी बेचैनी दूर करे। परन्तु जो आगे कहा गया है कि “एक कीड़ा ठहराया गया”, इसमें भी हम देखते हैं कि वे बातें भी जो संयोग या भाग्य से होती दिखाई देती हैं, तौभी परमेश्वर के गुप्त विधान से शासित हैं।
यदि कोई यह कहे कि इससे यह नहीं दिखता कि सामान्यतः क्या होता है, वरन् केवल यह कि इसी एक अवसर पर क्या किया गया, तो मैं उत्तर देता हूँ कि यद्यपि परमेश्वर उस समय एक उल्लेखनीय और स्मरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता था, तौभी यह सदा सत्य बना रहता है कि कीड़ों का काटना भी परमेश्वर की इच्छा और ठहराव से शासित होता है, यहाँ तक कि उसकी इच्छा के बिना न कोई पौधा और न कोई वृक्ष सूख सकता है; जैसे मसीह कहता है कि पिता के आदेश के बिना दो गौरैयाओं में से एक भी भूमि पर नहीं गिरती। कीड़े के विषय में इतना ही।
अब जो आगे जोड़ा गया है कि “जब अगले दिन सूर्य उदय हुआ, तब एक हवा ठहराई गई”, इससे भी हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि हवाएँ अपने आप, या संयोग से नहीं उठतीं, वरन् परमेश्वर के द्वारा उठाई जाती हैं। प्रकृति में निस्सन्देह ऐसे कारण मिलते हैं कि वायु कभी शान्त और कभी हवाओं से उद्वेलित क्यों रहती है; परन्तु ये सब मध्यवर्ती कारण परमेश्वर की युक्ति और बुद्धि से शासित हैं, इसलिए यह सदा सत्य रहता है कि प्रकृति कोई अन्धी, अनियमित गति नहीं है, वरन् उस पर सदैव परमेश्वर की इच्छा से ठहराया हुआ नियम चलता है। इसलिए जो कुछ भी होता है, परमेश्वर उसे अपनी बुद्धि और हाथ से चलाता है। भेद केवल इतना है कि उसके वे कार्य जो अपने सामान्य क्रम पर चलते हैं “प्रकृति” का नाम पाते हैं, जबकि उसके आश्चर्यकर्म, जब परमेश्वर सामान्य क्रम को बदल देता है, प्रकृति का नाम नहीं रखते, यद्यपि वे अपने कर्ता के रूप में परमेश्वर से ही निकलते हैं।
इसलिए इस हवा के विषय में यह ध्यान देने योग्य है कि यह कोई साधारण या सामान्य हवा नहीं थी; और तौभी साधारण हवाएँ भी परमेश्वर के विधान से प्रतिदिन उतनी ही उठाई जाती हैं जितनी वह हवा जिसकी चर्चा योना यहाँ करता है; इस स्थान पर परमेश्वर ने बस, जैसा कि कहते हैं, प्रकृति के सामान्य क्रम से भिन्न रीति से कार्य किया, यद्यपि प्रतिदिन वह प्रकृति की व्यवस्था में सामान्यतः एक अटूट और स्थिर नियम बनाए रखता है।
अब हमें देखना चाहिए कि यह सारी चर्चा क्यों लिखी गई है। योना मानता है कि जब उसे सूर्य की प्रचण्ड गर्मी से आड़ मिली तो वह बहुत आनन्दित हुआ; और जब पौधा मर गया और सूख गया, तो वह ऐसे भारी शोक से भर गया कि मरने की इच्छा करने लगा। यहाँ कुछ भी अनावश्यक नहीं है, क्योंकि योना अपने आनन्द और अपने शोक, दोनों में दिखाता है कि वह दोनों छोरों की ओर कितना कोमल और झुकाववाला है; वह अपनी नाज़ुकी और कोमलता को मान लेता है, जब वह कहता है कि वह बहुत आनन्दित हुआ, और फिर जब कहता है कि उसे उस मरे हुए पौधे पर इतना भारी दुःख हुआ कि अपने ही जीवन से घृणा करके उसने मृत्यु चाही। यहाँ उसकी अपनी निर्बलता का एक खुला अंगीकार निहित है; क्योंकि योना अधिक सरलता से केवल अपने आनन्द का उल्लेख कर सकता था, और अपने शोक की चर्चा बिल्कुल न करता। परन्तु उसने दोनों भावनाओं में अपनी अति को स्पष्ट कह दिया, कि हम जानें कि वह अपनी भावनाओं में बह गया था; कि छोटी-से-छोटी बातों में वह या तो अत्यधिक क्रोधित होता था, या आनन्द से फूलकर उसमें भी कोई उचित मर्यादा नहीं रखता था। उसके आनन्द और शोक के विषय में इतना ही।
अब, जो वह कहता है कि उसने “प्रार्थना की”, जैसा उसने थोड़ा पहले कहा था, उसमें वह केवल वही इब्रानी शब्द प्रयोग करता है जिसका अर्थ “इच्छा करना” है। वह कहता है, “उसने अपने मन में इच्छा की कि वह मर जाए।” इसलिए यह विश्वसनीय है कि योना शोक से इतना दब गया था कि उसने अपना मन परमेश्वर की ओर बिल्कुल नहीं उठाया; और तौभी हम देखते हैं कि इस पर भी परमेश्वर ने उसे त्यागा या उसकी चिन्ता करना नहीं छोड़ा। अब आगे तुरन्त यह है।
[पाठ] पद 9. तब परमेश्वर ने योना से कहा: क्या तेरा उस लौकी के कारण क्रोध करना भला है? उसने कहा: मेरा क्रोध करना भला है, यहाँ तक कि मरने तक।
[कैल्विन] यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर ने यद्यपि कुछ समय तक अपने आपको छिपाए रखा, तौभी अपने दास को नहीं त्यागा; जैसे वह प्रायः हम पर दृष्टि करता है, अर्थात् जब हम समझते हैं कि उसने हमें भुला दिया है, तब भी वह देखता रहता है कि हम पर क्या बीतती है, कि उचित समय पर हमारी सहायता करे। और इसलिए प्रायः जब हम गिरने ही को होते हैं, तब वह हमें थाम लेता है और फिर सीधा खड़ा कर देता है, इससे पहले कि हमें यह सन्देह भी हो कि वह हमारे निकट है। यहाँ ऐसा ही हुआ, जब उसने योना से बातें करना आरम्भ किया; क्योंकि, जैसा हम कह चुके हैं, शोक ने उस पवित्र भविष्यद्वक्ता के मन को ऐसा दबा दिया था कि वह अपने आपको परमेश्वर की ओर उठा न सका। अब वह अपने भीतर मरना चाहता था, तौभी परमेश्वर उसे नहीं त्यागता। यह एक दुर्लभ उदाहरण है, और उस अपार दया का प्रदर्शन है जो परमेश्वर अपने लोगों पर दिखाता है, तब भी जब वे अपने आपको औंधे मुँह गिरा देते हैं; जैसे योना यहाँ निराशा में गिर पड़ता है और किसी उपचार की चिन्ता नहीं करता।
परन्तु परमेश्वर ने इसकी प्रतीक्षा नहीं की कि उसे खोजा जाए, वरन् उस अभागे योना को, यहाँ तक कि उस विनाश को भी जो वह अपने ऊपर लाने लगा था, पहले ही रोक दिया, यह कहते हुए: “क्या तेरा उस लौकी के कारण इतना क्रोध करना भला है?” मानो वह कह रहा हो कि योना इतनी छोटी-सी बात पर अत्यधिक व्याकुल और विचलित था।
और बोलने की इस रीति पर सदा ध्यान देना चाहिए, जैसा हमने कल विस्तार से बताया था; क्योंकि परमेश्वर योना को केवल इसलिए नहीं डाँटता कि उसने लौकी के सूख जाने को कठोरता से लिया। तो फिर किसलिए? निश्चय ही इसलिए कि वह क्रोधित हुआ; क्योंकि क्रोध में सदा अति होती है; इसलिए, जब योना बिना किसी माप या संयम के क्रोध से भड़का, तो परमेश्वर ठीक ही उसमें इस बड़े दोष को ताड़ना देता है।
अच्छा; मैं अब वह दोहराऊँगा नहीं जो मैंने कल कहा था, कि दोष और भी बड़ा कैसे हो गया, क्योंकि योना ने न केवल पौधे की हानि पर कुड़कुड़ाया, वरन् अपने आपको भी पूरी तरह क्रोध से उबलने के हवाले कर दिया, और वह भी अत्यधिक सीमा तक; जिसकी पुष्टि योना का अपना उत्तर करता है, जब वह कहता है: “मेरा क्रोध करना भला है, यहाँ तक कि मरने तक।” यहाँ हम देखते हैं कि वह पवित्र भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की उसी चेतावनी को कितनी निर्भीकता से ठुकराता है, जिसके द्वारा उसे बल्कि एक उत्तम मनोदशा में लौटा लाया जाना चाहिए था। वह अनजान नहीं कि परमेश्वर बोल रहा है; तो फिर वह तुरन्त भय से क्यों नहीं भर जाता? बोलनेवाले के अधिकार से प्रभावित होकर वह मन की उस कठोरता को तुरन्त क्यों नहीं छोड़ देता?
परन्तु निश्चय ही सदा ऐसा ही होता है, जब मनुष्यों के मन किसी बिगड़ी हुई वासना से अन्धे हो जाते हैं; चाहे प्रभु गरजे या स्वर्ग से बिजली गिराए, वे नहीं सुनेंगे; या कम से कम वे हिंसक रीति से दौड़ते जाने से नहीं रुकेंगे, जैसा योना यहाँ करता है। इसलिए ऐसे पवित्र जन में हठ का ऐसा उदाहरण देखकर, हममें से प्रत्येक को कितना अधिक डरना चाहिए? इसलिए आओ, हम समय रहते अपनी वासनाओं को रोकना और बुझाना सीखें, और आरम्भ से ही उन पर लगाम लगाएँ, ऐसा न हो कि यदि उन्हें लम्बे समय तक बिना रोक-टोक फूट निकलने दिया जाए, तो हम भी अन्तिम घड़ी तक हठी और सुधार के अयोग्य बन जाएँ।
योना कहता है, “मेरा क्रोध करना भला है, यहाँ तक कि मरने तक।” परमेश्वर ने अपने दास योना पर केवल क्रोध का दोष लगाया था; परन्तु अब योना अपने पागलपन में यहाँ तक पहुँच जाता है कि निराशा को भी निष्पाप बताने लगता है: वह कहता है, “मैं निराश होने पर भी अपराध नहीं करता; वरन् यदि मैं क्रोधोन्माद में अपने आपको मृत्यु के हवाले कर दूँ, तब भी अपराध नहीं करता।”
कौन कह सकता था कि ऐसी बात उस पवित्र भविष्यद्वक्ता में घटित हो सकती या पाई जा सकती है? परन्तु इस इतने उल्लेखनीय उदाहरण से हमें चेतावनी मिलती है कि हमारे शरीर की वासनाएँ कैसे उग्र और पशु-समान प्राणी हैं। इसलिए इससे उत्तम कुछ नहीं कि हम उन्हें इससे पहले रोक लें कि वे अपनी उचित सीमा से अधिक बल पकड़ें; क्योंकि जब भी कोई मनुष्य अपने पापों को पालता है, तो यह हठ और अड़ियलपन सदा पीछे-पीछे चलेगा। परन्तु मरने तक क्रोधित या कुपित होना जीवन से इतनी घृणा करना है कि हम स्वयं अपनी इच्छा से अपने आपको मृत्यु के हवाले कर दें। तौभी योना का उद्देश्य वास्तव में अपने को मार डालना न था; परन्तु यद्यपि वह ऐसी खुली हिंसा से रुका रहा, तौभी उसने दृढ़ मन से अपनी ही मृत्यु का प्रयत्न किया, क्योंकि उसने अपने आपको परमेश्वर के अधीन नहीं किया, वरन् अन्धी वासना या आवेग में बह गया। अब आगे यह है।
[पाठ] पद 10. तब यहोवा ने कहा: तूने उस लौकी पर तरस खाया, जिसके लिए तूने परिश्रम नहीं किया, और न उसे उगाया, जो एक रात में उगी और एक रात में नष्ट हो गई।
पद 11. फिर क्या मैं उस बड़े नगर नीनवे पर तरस न खाऊँ, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने और बाएँ हाथ का भेद नहीं जानते, और बहुत-से पशु भी हैं?
[कैल्विन] यहाँ परमेश्वर प्रकट करता है कि उसने किस उद्देश्य से अचानक लौकी को उगाया, और फिर कीड़े के काटने से उसे नष्ट होने और सूख जाने दिया; अर्थात् इसलिए कि योना सीखे कि उसने नीनवे के लोगों के प्रति कितना अस्वाभाविक व्यवहार किया था। और यद्यपि हम देखते हैं कि वह पवित्र भविष्यद्वक्ता ऐसे भयंकर आवेश में पड़ गया, तौभी परमेश्वर ने, एक प्रकार से, उसका कोमलता से परिहास करके, उसकी मूर्खता के विषय में उसे चेताया। क्योंकि लौकी के रूप के द्वारा उसने दिखाया कि योना ने नीनवे जैसे घनी आबादीवाले नगर के विनाश की कितनी कठोरता से इच्छा की थी।
परन्तु यह तुलना कुछ बातों में पूरी तरह उपयुक्त न लगे; क्योंकि योना लौकी के लिए स्वयं शोक नहीं करता था, वरन् केवल अपने ही विषय में सोचता था; और इसलिए उसने इसे कठोरता से लिया कि जिस सुख में वह आनन्दित था वह उससे छीन लिया गया। इसलिए चूँकि योना को क्रोध दिलानेवाली बात उसका अपना निजी कष्ट थी, इसलिए जब परमेश्वर इस प्रकार तर्क करता है, “तू चाहता है कि लौकी पर तरस खाया जाए; और क्या मैं इस बड़े नगर को न बचाऊँ?” तो तुलना बुरी रीति से लगाई हुई प्रतीत हो सकती है। क्योंकि सच तो यह है कि उसे स्वयं लौकी की कोई वास्तविक चिन्ता न थी; यदि संसार की सब लौकियाँ सूख जातीं, तो उसे उनके लिए कभी कोई शोक न होता; परन्तु क्योंकि वह अपने आपको अत्यन्त कष्ट में पाता था, सूर्य की अधिक गर्मी से झुलसता हुआ, इसी कारण वह क्रोधित था।
मैं उत्तर देता हूँ कि यद्यपि योना की चिन्ता निजी तौर पर केवल अपने ही लिए थी, तौभी यह तुलना बहुत ही ठीक बैठती है; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों को उसी उपयोग में रखता है जिसके लिए उसने उन्हें ठहराया है। योना ने लौकी की हानि पर इसलिए शोक किया कि उसकी छाया से वह वंचित हो गया था। परन्तु परमेश्वर मनुष्यों को व्यर्थ नहीं बनाता, और इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि वह चाहे कि वे बचाए रखे जाएँ।
इसलिए हम देखते हैं कि इस रूप के द्वारा योना को उचित रीति से सिखाया गया कि उसने नीनवे के लोगों के साथ कितना निर्दयी व्यवहार किया था। क्योंकि वह स्वयं तो केवल एक अकेला मनुष्य था; और तौभी जब वह अपने और केवल उस लौकी के विषय में इतनी चिन्ता रखता था, तो इतने बड़े और घनी आबादीवाले नगर की सारी चिन्ता वह कैसे छोड़ सकता था? क्या उसके मन में यह नहीं आना चाहिए था कि यदि परमेश्वर को इतने हज़ारों मनुष्यों की चिन्ता है, तो यह आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि वह उनका पिता और रचयिता है? क्योंकि यद्यपि नीनवे के लोग परमेश्वर से दूर हो गए थे, तौभी मनुष्य होने के कारण, परमेश्वर ने, जो समस्त मानवजाति का पूर्ण पिता है, उन्हें कम से कम इस सीमा तक अपना माना कि वे जीवित रहें और इस पृथ्वी के जीवन के अन्य सुखों का भोग करें।
अब हम इस तुलना का कारण समझते हैं: परमेश्वर कहता है, “तू लौकी पर तरस खाएगा; और क्या मैं इस बड़े नगर पर तरस न खाऊँ?” इससे प्रकट होता है कि जेरोम की वह धारणा कितनी तुच्छ है कि योना नगर के बचाए जाने पर क्रोधित नहीं था, वरन् इसलिए कि उसने पहले से देख लिया था कि नीनवे के लोगों के मन फिराने के कारण उसकी अपनी जाति नष्ट हो जाएगी। क्योंकि प्रभु यहाँ फिर दोहराता है कि योना का मन कुछ और ही था, अर्थात् यह कि उसने इसे कठोरता से लिया कि नगर विनाश से छुड़ाया जाए। और जेरोम का योना को इस प्रकार निर्दोष ठहराना और भी असहनीय है, क्योंकि योना स्वयं परमेश्वर को स्पष्ट और निर्भीकता से उत्तर देता है कि उसका क्रोध करना, यहाँ तक कि मरने तक, कोई अपराध नहीं है। वह मनुष्य निश्चय ही, इस सबके होते हुए भी, बिना किसी लज्जा के झूठा रंग चढ़ाने का साहस करता है, कि ऐसी लज्जाजनक हठ का बचाव कर सके।
परन्तु हमारे लिए यही पर्याप्त है कि हम भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय के सीधे और सच्चे अर्थ को पकड़े रहें और समझें। क्योंकि यहाँ परमेश्वर के पात्र के अधीन योना यह बताता है कि उसकी अपनी निर्दयता को ठीक ही दोषी ठहराया गया, क्योंकि उसने उस घनी आबादीवाले नगर के विनाश की इतनी उत्सुकता से कामना की। इस तुलना के अंगों पर भी ध्यान देना चाहिए, जब वह कहता है: “तूने तरस खाया”; “तू” सर्वनाम में एक बल, या ज़ोर है। क्योंकि परमेश्वर अपनी तुलना योना से करता है, मानो वह कह रहा हो: “तू कौन है? निश्चय ही एक मरणशील मनुष्य स्वभाव से दया और करुणा की ओर उतना झुका हुआ नहीं होता जितना मैं हूँ। तू अपने लिए यह नियम मानता है कि तू लौकी पर तरस खाने पर अड़ा रहेगा; तू, जो मिट्टी से बना है, यह करेगा। अब यह लौकी,” वह कहता है, “तेरे अपने हाथ की बनाई हुई नहीं है; तूने उसके लिए परिश्रम नहीं किया, अर्थात् वह तेरी अपनी जुताई या मेहनत से नहीं निकली; फिर, तूने उसे उगाया नहीं, और न उसे भूमि से उपजाया; तीसरे, वह केवल एक रात की उपज थी, और एक ही रात में नष्ट हो गई; वह एक छोटा, मुरझानेवाला पौधा ही तो था। इसलिए, यदि तू लौकी के स्वभाव पर विचार करे, या अपने आप पर विचार करे, और इन सब अन्य परिस्थितियों को जोड़ ले, तो तेरे क्रोध करने का कोई कारण नहीं है। और अब मैं, जो परमेश्वर हूँ, जिसके हाथ में सब कुछ है, क्या मैं तरस न खाऊँ? मैं, जिसका निरन्तर स्वभाव ही मनुष्यों को दया से सहना है, और उन्हें सहना है चाहे वे नाश के योग्य ही क्यों न हों, क्या मैं तरस न खाऊँ? फिर यह एक बड़ा नगर है”; क्योंकि यहाँ अब केवल एक पौधे का मामला नहीं, वरन् लोगों की एक विशाल भीड़ का है।
अन्त में: “जिसमें,” वह कहता है, “एक लाख बीस हज़ार मनुष्य हैं जो अपने दाहिने और बाएँ हाथ का भेद नहीं जानते।” अच्छा; अब हम देखते हैं कि इस तुलना का प्रत्येक अंग कितना बलपूर्वक है। परन्तु यद्यपि परमेश्वर का उद्देश्य योना के मूर्खतापूर्ण और बिगड़े हुए शोक को डाँटना था, तौभी यहाँ से हम एक सामान्य सिद्धान्त निकाल सकते हैं, यदि हम इस प्रकार तर्क करें: हम स्वयं, दुष्ट और निर्दयी लोग होते हुए भी, एक-दूसरे पर दया करने को प्रेरित होते हैं; इसलिए यदि किसी गुप्त स्वभाव से मरणशील मनुष्य दया की ओर इतने झुके हुए हैं, तो परमेश्वर की अगम्य भलाई से, जो हमारा पिता और सारे जगत का रचयिता, और भलाई तथा दया का सोता है, क्या आशा न रखी जाए? क्या वह हम पर तरस न खाए?
अब संख्या के विषय में: यहाँ योना बारह गुना दस हज़ार मनुष्य बताता है, जो, जैसा हम पहले कह चुके हैं, एक लाख बीस हज़ार होते हैं। यहाँ परमेश्वर दिखाता है कि वह मानवजाति के लिए कैसी पिता-समान चिन्ता रखता है। हममें से प्रत्येक का उसके द्वारा एक अनूठी, व्यक्तिगत देखभाल से पालन-पोषण होता है; परन्तु यहाँ वह हमारे सामने यह बड़ी संख्या रखता है, कि और भी स्पष्ट हो जाए कि उसे मानवजाति की इतनी चिन्ता है कि वह किसी एक जाति पर भी उतावली से अपना क्रोध नहीं बरसाता।
और जहाँ वह जोड़ता है कि वे अपने दाहिने और बाएँ हाथ का भेद नहीं जानते थे, मुझे सन्देह नहीं कि यह इन विशेष मनुष्यों की छोटी आयु की ओर संकेत करता है; यह मत लगभग सर्वमान्य भी है। तौभी एक टीकाकार को नगर को बहुत बड़ा दिखाने का भय हुआ, यदि वह मान ले कि वह पूरी संख्या केवल शिशुओं से बनी थी, इसलिए वह उस संख्या में बूढ़ों, अधेड़ों और शिशुओं, सबको एक साथ गिन लेता है, और कहता है कि वे “अपने दाहिने और बाएँ हाथ का भेद नहीं जानते थे” क्योंकि उन्हें परमेश्वर की पाठशाला में शिक्षा नहीं मिली थी, और उन्होंने भले और बुरे का अन्तर नहीं पहचाना था; जैसा हम जानते हैं कि अविश्वासी अपनी ही भ्रान्तियों में भटकते हैं। परन्तु यह व्याख्या बहुत खींची-तानी हुई है, और इस युक्ति का कोई उचित कारण भी नहीं है; क्योंकि हम जानते हैं कि यह नगर केवल उन बड़े नगरों के तुल्य ही नहीं था जो आज यूरोप में पाए जाते हैं, वरन् उनसे भी बढ़कर था जो आज सबसे प्रमुख हैं। हम जानते हैं कि अकेले पेरिस में चार लाख से अधिक प्राणी रहते हैं, और अन्य नगरों के विषय में भी यही सच है। इसलिए मैं उस धारणा को अस्वीकार करता हूँ कि योना यहाँ उस संख्या से सब नीनवे वासियों को बिना भेद के सूचित करता है; क्योंकि परमेश्वर यहाँ बल्कि यह प्रकट करना चाहता है कि यद्यपि उस नगर को पूरी तरह नष्ट करने का अत्यन्त न्यायसंगत कारण था, तौभी ऐसे अन्य कारण भी थे जो इतने भयंकर दण्ड को हल्का कर सकते थे; अर्थात् यह कि उस समय वहाँ बहुत-से शिशु थे, जो अपने अपराधों से अब तक ऐसे विनाश के योग्य नहीं ठहरे थे।
इसलिए परमेश्वर यहाँ योना को बताता है कि वह अपनी धुन में कितनी निर्दयता से बह गया था; यद्यपि वह धुन, जैसा कहा गया, एक अच्छे आरम्भ से उत्पन्न हुई थी, तौभी योना अत्यधिक उग्र आवेग से बह गया। यह परमेश्वर इस बात से दिखाता है कि उसने इतने निर्दोष शिशुओं को बचाया। वह शिशुओं के साथ मूक पशुओं को भी जोड़ता है; क्योंकि निश्चय ही बैल केवल पौधों से कहीं श्रेष्ठ हैं और अधिक मूल्य के हैं। यदि योना ने एक छोटे सूखे पौधे पर ठीक ही शोक किया, तो निश्चय ही यह कहीं अधिक कठोर और निर्दयी बात होती कि इतने निर्दोष प्राणी नष्ट हो जाएँ।
इसलिए हम देखते हैं कि सब बातें इस तुलना से कितनी उचित रीति से मेल खाती हैं, कि योना अपनी ही मूर्खता पर लज्जित और दुःखी हो, कि वह परमेश्वर के गुप्त निश्चय से आगे दौड़ता प्रतीत होता, और एक प्रकार से अपनी ही इच्छा से अपने आपको चलाता, और नीनवे के लोगों को बचाने से इन्कार करता, यद्यपि उन्होंने सच्चे पश्चाताप से परमेश्वर के क्रोध और न्याय को टालने का प्रयत्न किया था। इसलिए वह इस पाप के विरुद्ध प्रार्थना करे।
[प्रार्थना]
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तूने इतने प्रकारों से साक्षी दी और प्रकट किया है, और प्रतिदिन हम पर स्पष्ट रीति से प्रकट करता है, कि मानवजाति तुझे कितनी प्रिय और मूल्यवान है; और हम प्रतिदिन तेरी भलाई और तेरी दया के इतने उल्लेखनीय प्रमाणों और साक्षियों का आनन्द लेते हैं: इसलिए, मैं कहता हूँ, ऐसा कर कि हम तेरी उसी भलाई पर पूरी रीति से भरोसा रखना सीखें, जिसके इतने चिन्ह और उदाहरण तू हमें दिखाता है, और जिसे तू निरन्तर हम पर प्रकट करने की कृपा करता है; कि हम न केवल इस पार्थिव और क्षणभंगुर यात्रा को पार करें, वरन् श्रद्धापूर्ण भय के साथ उस धन्य और स्वर्गीय जीवन की आशा की ओर भी बढ़ें जो स्वर्ग में हमारे लिए रखा और सुरक्षित है, यीशु मसीह हमारे प्रभु के द्वारा। आमीन।
समाप्त।
