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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
उन्हीं को।
मुझे श्रीमती —— से वे वस्तुएँ मिल गई हैं जो आपने मेरे लिए उन्हें दी थीं। मुझे आश्चर्य है कि आपने उस छोटी पुस्तक के विषय में, जो मैंने आपको भेजी थी और जो आपको मिल गई होगी, अपने विचार मुझे नहीं बताए। कृपया अपने बुढ़ापे में मन लगाकर उसके अभ्यास में लग जाइए: देर से करना कभी न करने से अच्छा है।
मैं कल्पना नहीं कर सकता कि धर्मसंघी लोग परमेश्वर की उपस्थिति के अभ्यास के बिना कैसे सन्तुष्ट होकर जी सकते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मैं जितना हो सके अपनी आत्मा की गहराई या केन्द्र में अपने आप को उसके साथ एकान्त में रखता हूँ; और जब मैं इस प्रकार उसके साथ होता हूँ तो मुझे किसी बात का भय नहीं होता, परन्तु उससे तनिक-सा भी हटना मेरे लिए असहनीय है।
यह अभ्यास शरीर को बहुत नहीं थकाता; फिर भी यह उचित है कि कभी-कभी, वरन् प्रायः, उसे बहुत-से ऐसे छोटे-छोटे सुखों से वंचित किया जाए जो निर्दोष और उचित हैं, क्योंकि परमेश्वर यह अनुमति नहीं देगा कि जो आत्मा पूरी रीति से उसे समर्पित होना चाहती है, वह उसके साथ मिलनेवाले सुख को छोड़ अन्य सुख ले: और यह तो उचित से भी बढ़कर है।
मैं यह नहीं कहता कि इसलिए हमें अपने ऊपर कोई कठोर दबाव डालना चाहिए। नहीं, हमें पवित्र स्वतंत्रता में परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए; हमें अपना काम विश्वासयोग्यता से करना चाहिए; बिना घबराहट या अशान्ति के, और जितनी बार हम अपने मन को उससे भटकता हुआ पाएँ, उतनी बार उसे नम्रता से और शान्ति के साथ परमेश्वर की ओर लौटा लाना चाहिए।
फिर भी, यह आवश्यक है कि हम अन्य सब चिन्ताओं को, और भक्ति के कुछ विशेष रूपों को भी, एक ओर रखकर अपना सारा भरोसा परमेश्वर पर रखें; वे रूप अपने आप में बहुत अच्छे हों तो भी, ऐसे हैं जिनमें मनुष्य प्रायः बिना विवेक के लगा रहता है, क्योंकि ये भक्तियाँ लक्ष्य तक पहुँचने के साधन मात्र हैं। इसलिए जब परमेश्वर की उपस्थिति के इस अभ्यास के द्वारा हम उसके साथ होते हैं जो हमारा लक्ष्य है, तब साधनों की ओर लौटना व्यर्थ है; परन्तु हम उसके साथ अपने प्रेम का आदान-प्रदान जारी रख सकते हैं, उसकी पवित्र उपस्थिति में स्थिर बने रहकर — कभी स्तुति, आराधना या अभिलाषा के किसी कार्य द्वारा; कभी समर्पण या धन्यवाद के किसी कार्य द्वारा; और उन सब रीतियों से जिन्हें हमारी आत्मा ढूँढ़ निकाल सके।
स्वभाव की ओर से इसमें आपको जो अरुचि हो, उससे निरुत्साहित न होइए; आपको अपने ऊपर बल प्रयोग करना होगा। आरम्भ में मनुष्य प्रायः इसे समय की बर्बादी समझता है, परन्तु आपको आगे बढ़ते रहना चाहिए, और जो भी कठिनाइयाँ आएँ उनके होते हुए भी मृत्यु तक इसमें स्थिर बने रहने का निश्चय करना चाहिए। मैं अपने आप को आपके पवित्र संघ की, और विशेषकर आपकी, प्रार्थनाओं में सौंपता हूँ। मैं हमारे प्रभु में हूँ,
आपका, इत्यादि।
