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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
मैंने ब्रदर लॉरेंस को पहली बार 3 अगस्त, 1666 को देखा। उन्होंने मुझे बताया कि अठारह वर्ष की आयु में उनके मन-परिवर्तन के समय परमेश्वर ने उन पर एक अनोखी कृपा की थी।
कि जाड़े के दिनों में, पत्तों से रहित एक पेड़ को देखकर, और यह सोचकर कि थोड़े ही समय में उसके पत्ते फिर से नये हो जाएँगे और उसके बाद फूल और फल दिखाई देंगे, उन्हें परमेश्वर के विधान (प्रावधान) और सामर्थ्य का एक ऊँचा दर्शन मिला, जो तब से कभी उनके प्राण से मिटा नहीं। कि इस दर्शन ने उन्हें संसार से पूरी तरह छुड़ा दिया था, और उनमें परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम जगा दिया था कि वे यह नहीं बता सकते थे कि उसके बाद बीते चालीस से अधिक वर्षों में वह प्रेम बढ़ा भी है या नहीं।
कि वे कोषाध्यक्ष एम. फ़्यूबेर के सेवक (फ़ुटमैन) रह चुके थे, और वे एक बड़े ही भद्दे और अनाड़ी व्यक्ति थे जो हर चीज़ तोड़ देते थे।
कि उन्होंने किसी मठ में भर्ती होने की इच्छा की थी, यह सोचकर कि वहाँ उन्हें अपने अनाड़ीपन और अपने किए जानेवाले दोषों के लिए कष्ट भुगतना पड़ेगा, और इस प्रकार वे अपना जीवन, उसके सारे सुखों समेत, परमेश्वर को बलिदान कर देंगे; परन्तु परमेश्वर ने उनकी यह आशा पूरी नहीं होने दी, क्योंकि उस अवस्था में उन्हें सन्तोष के सिवा और कुछ नहीं मिला।
कि हमें परमेश्वर से निरन्तर वार्तालाप करते हुए अपने आप को उसकी उपस्थिति के बोध में स्थिर करना चाहिए। कि उसके साथ वार्तालाप छोड़कर तुच्छ और मूर्खतापूर्ण बातों के विषय में सोचना एक लज्जा की बात है।
कि हमें परमेश्वर के विषय में ऊँचे विचारों से अपने प्राणों को खिलाना और पोषित करना चाहिए; जिससे उसके प्रति समर्पित होने में हमें बड़ा आनन्द मिलेगा।
कि हमें अपने विश्वास को सजीव करना, अर्थात् उसमें जान डालना चाहिए। कि यह खेद की बात है कि हममें इतना थोड़ा विश्वास है; और यह कि विश्वास को अपने आचरण का नियम बनाने के बजाय मनुष्य तुच्छ भक्ति-क्रियाओं में मन बहलाते रहते हैं, जो प्रतिदिन बदलती रहती हैं। कि विश्वास का मार्ग ही कलीसिया की आत्मा है, और वह हमें सिद्धता की ऊँची अवस्था तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है।
कि हमें सांसारिक और आत्मिक दोनों प्रकार की बातों के सम्बन्ध में अपने आप को परमेश्वर के हाथ में सौंप देना चाहिए, और केवल उसकी इच्छा पूरी करने में ही अपना सन्तोष ढूँढ़ना चाहिए, चाहे वह हमें दुःख के मार्ग से ले चले या सान्त्वना के मार्ग से; क्योंकि जो प्राण सचमुच समर्पित है उसके लिए ये सब बराबर होंगे। कि प्रार्थना में उन सूखेपन, या संवेदनहीनता और ऊब की अवस्थाओं में, जिनके द्वारा परमेश्वर उसके प्रति हमारे प्रेम को परखता है, विश्वासयोग्यता की आवश्यकता है; कि वही समय है जब हमें समर्पण के अच्छे और प्रभावशाली कार्य करने चाहिए, जिनमें से अकेला एक कार्य भी प्रायः हमारी आत्मिक उन्नति को बहुत आगे बढ़ा देता है।
कि संसार में जिन दुःखों और पापों के विषय में वे प्रतिदिन सुनते थे, उन पर आश्चर्य करना तो दूर रहा, इसके विपरीत उन्हें यह देखकर आश्चर्य होता था कि वे इससे अधिक नहीं हैं, यह देखते हुए कि पापी कितनी दुष्टता करने में समर्थ हैं; कि अपनी ओर से वे उनके लिए प्रार्थना करते थे; परन्तु यह जानते हुए कि वे जो हानि करते हैं, परमेश्वर जब चाहे उसका उपाय कर सकता है, वे इसके विषय में और अधिक चिन्ता नहीं करते थे।
कि परमेश्वर जैसा समर्पण चाहता है, वैसे समर्पण तक पहुँचने के लिए हमें उन सब वासनाओं पर ध्यानपूर्वक चौकसी करनी चाहिए जो आत्मिक बातों में भी और स्थूल (सांसारिक) बातों में भी मिल जाती हैं; कि जो लोग सचमुच उसकी सेवा करना चाहते हैं, परमेश्वर उन्हें उन वासनाओं के विषय में प्रकाश देगा। कि यदि मेरा उद्देश्य यही है, अर्थात् सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा करना, तो मैं जितनी बार चाहूँ उनके (ब्रदर लॉरेंस के) पास आ सकता हूँ, बिना इस डर के कि मैं उन्हें कष्ट दे रहा हूँ; परन्तु यदि ऐसा नहीं है, तो मुझे फिर उनसे मिलने नहीं आना चाहिए।
