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खुले आकाश के नीचे प्रचार “किसी भी क्षेत्र में सदा लोगों की एक बड़ी संख्या होती है जो या तो विरोध या उदासीनता के कारण अछूती और अपहुँच बनी रहती है। मेरे विचार में इस समस्या का समाधान केवल एक ही है, अर्थात् चूँकि वे हमारे पास नहीं आएँगे, हमें उनके पास जाना होगा। मेरी समझ में जॉन वेस्ली की पत्रिका (जर्नल) का कोई भी पाठक इस कथन पर आपत्ति न करेगा कि अठारहवीं शताब्दी का धार्मिक पुनरुत्थान हमें खुले आकाश के नीचे प्रचार के पुनरुद्धार के कारण मिला।”
— श्री आर. म्यूडी स्मिथ, ‘डेली न्यूज़’ में।
खुले आकाश के नीचे प्रचार इस अध्याय में दिए गए अंश स्पष्ट दिखाते हैं कि श्री वेस्ली ने बाहर या खेतों में प्रचार करने की प्रथा पर कितना ज़ोर दिया। मेथोडिस्ट आन्दोलन की स्थापना में यह सबसे प्रभावशाली साधनों में से एक था, और उनकी राय में उसकी वृद्धि और विस्तार की अनिवार्य बातों में से एक।
यह मुश्किल से कहा जा सकेगा कि उनके अनुयायी उनके आग्रहों के प्रति विश्वासयोग्य सिद्ध हुए हैं। उनके आराधना-स्थलों की वृद्धि के साथ गली या खेत की सेवा के लिए उनका उत्साह स्पष्ट रूप से घट गया। यह वेस्ली के अपने जीवनकाल में भी दिखाई देने लगा था। मेथोडिस्ट आन्दोलन ने अद्भुत जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग उन्नति की है, परन्तु यदि इसके संस्थापक के उपदेश और उदाहरण का और निकटता से पालन किया जाता तो उसकी सफलता और भी उल्लेखनीय होती।
और कौन सन्देह कर सकता है कि आज, अन्य सब कलीसियाओं के साथ-साथ, उसे आदिम पद्धतियों की ओर लौटने की आवश्यकता है? जन-साधारण की सार्वजनिक आराधना के प्रति बढ़ती उदासीनता कलीसियाओं के लिए एक गम्भीर समस्या खड़ी कर रही है। लंदन की हाल की धार्मिक जनगणना से यह निश्चय ही चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि “उपलब्ध जनसंख्या का 60 प्रतिशत रविवार को आराधना-स्थल में उपस्थित होने के विषय में प्रत्यक्षतः या तो उदासीन है या विरोधी।” और लंदन की उदासीनता की बराबरी बड़े प्रान्तीय नगर भी करते हैं। खुले आकाश के नीचे
खुले आकाश के नीचे प्रचार अपने आप में इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का उपचार नहीं करेगा; परन्तु यदि इसे उचित रूप से अनुरूप पैमाने पर और पर्याप्त योग्य रीति से किया जाए, तो इसके परिणाम सामान्यतः अपेक्षित परिणामों से कहीं अधिक होंगे।
जॉन वेस्ली खेतों में प्रचार करने के लिए इच्छा से नहीं, आवश्यकता से प्रेरित हुए; परन्तु जो आरम्भ में परिस्थितियों ने उन पर थोपा, वही बाद में ऐसी पद्धति बन गया जिसकी प्रशंसा करते वे कभी न थके। अपने जीवन की अनेक अन्य घटनाओं की तरह, जिस बात की ओर उन्हें धकेला गया, वही वह बात बन गई जिसे वे स्वयं चुनते; आवश्यकता की कठोर, अप्रिय भृकुटि विशेषाधिकार की मुस्कान में बदल गई।
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग वेस्ली ने खुले आकाश के नीचे कैसे आरम्भ किया “मैं फ़रवरी 1738 के आरम्भ में इंग्लैंड लौटा। मुझे अब जल्दी थी कि ऑक्सफ़ोर्ड लौटकर अपनी प्रिय गुमनामी में अपने को दफ़ना दूँ; परन्तु जॉर्जिया उपनिवेश के न्यासियों ने मुझे सप्ताह-दर-सप्ताह लंदन में रोके रखा। इस बीच मुझसे निरन्तर कहा जाता रहा कि कभी एक, कभी दूसरी कलीसिया में प्रचार करूँ; और वह भी केवल रविवार को सुबह, दोपहर और रात ही नहीं, बल्कि सप्ताह के दिनों में भी। चूँकि मैं हाल ही में दूर देश से आया था, विशाल भीड़ें इकट्ठी होती थीं; परन्तु थोड़े ही समय में, कुछ तो बेढंगी भीड़ के कारण, कुछ मेरी अप्रचलित शिक्षा के कारण, मुझे एक-एक करके कलीसियाओं से निकाल दिया गया, और अन्त में
खुले आकाश के नीचे प्रचार सब से बाहर कर दिया गया! चुप रहने का साहस न करते हुए, सम्मान और विवेक के बीच थोड़े संघर्ष के बाद, मैंने आवश्यकता को गुण बना लिया, और मूरफ़ील्ड्स के बीच में प्रचार किया। वहाँ हज़ारों-हज़ार लोग थे, किसी भी कलीसिया में समाने वालों से कहीं अधिक; और उनमें बहुत-से ऐसे थे जो कभी किसी कलीसिया या सार्वजनिक आराधना-स्थल में गए ही नहीं थे। उनमें से अधिकाधिक के हृदय छिद गए, और वे सब रोते हुए मेरे पास आए और अत्यन्त उत्सुकता से पूछने लगे कि उद्धार पाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। मैंने कहा, ‘यदि तुम सब गुरुवार की सन्ध्या को मिलो, तो मैं यथाशक्ति तुम्हें सलाह दूँगा।’ पहली सन्ध्या को लगभग बारह लोग आए; अगले सप्ताह तीस या चालीस।
जब वे बढ़कर लगभग सौ हो गए, तब मैंने उनके नाम जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग और निवास-स्थान लिख लिए, यह सोचकर कि जब-जब सुविधा हो, उनके घरों पर उनसे भेंट करूँ।
इस प्रकार, बिना किसी पूर्व योजना या अभिप्राय के, इंग्लैंड में मेथोडिस्ट सोसाइटी का आरम्भ हुआ।” — प्रवचन 132, वेस्ली की रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 422।
खेतों में प्रचार की विभिन्न प्रशंसाएँ “मुझे उन लोगों पर आश्चर्य होता है जो अब भी खेतों में प्रचार की अशोभनीयता की इतनी ऊँची आवाज़ में बात करते हैं। सबसे बड़ी अशोभनीयता तो सेंट पॉल्स कलीसिया में है, जहाँ मण्डली का एक अच्छा-खासा भाग सोया रहता है, या बातें करता है, या इधर-उधर देखता रहता है, प्रचारक के एक शब्द पर भी ध्यान नहीं देता। दूसरी ओर, कलीसिया के प्रांगण या खेत में सबसे बड़ी शोभनीयता होती है, जब सारी मण्डली
खुले आकाश के नीचे प्रचार ऐसा व्यवहार और ऐसी दृष्टि रखती है मानो वह सबके न्यायी को देख रही हो और उसे स्वर्ग से बोलते सुन रही हो।” — जर्नल, 1748, खण्ड 2, पृ. 113।
“मैंने आठ बजे गिन्स में, नगर के एक ओर के गाँव में, एक खुली जगह पर प्रचार किया। वहाँ बहुत-से ऐसे लोग थे जो कभी कक्ष में न आए थे और न आते। ओह, यदि शैतान खेतों में प्रचार का अन्त करवा सके तो वह कितनी बड़ी विजय पाएगा! परन्तु मुझे भरोसा है कि वह ऐसा कभी न करेगा: कम से कम मेरे सिर के मिट्टी में रखे जाने तक तो नहीं।” — जर्नल, 1759, खण्ड 2, पृ. 480।
“सोमवार और मंगलवार की सन्ध्या को मैंने कीलमेन्स अस्पताल के पास बाहर प्रचार किया, उतने लोगों के सामने जितने हमारे भवन में दुगुने समाते।
आश्चर्य नहीं कि शैतान खेतों में प्रचार को पसन्द नहीं करता! मैं भी जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग सुविधाजनक कमरा, मुलायम गद्दी और सुन्दर मंच पसन्द नहीं करता। परन्तु यदि मैं एक और प्राण बचाने के लिए इन सब को पैरों तले न रौंद दूँ, तो मेरा उत्साह कहाँ है?” — जर्नल, 1759, खण्ड 2, पृ. 491।
“मूरफ़ील्ड्स की विशाल मण्डली का बहुत बड़ा बहुमत गहरी गम्भीरता में था। ऐसा एक घण्टा किसी भी निष्पक्ष मनुष्य को खेतों में प्रचार की उपयोगिता का कायल कर सकता था।
सेंट पॉल्स कलीसिया को छोड़कर कौन-सा भवन ऐसी मण्डली को समा सकता है? और यदि समा भी सकता, तो वहाँ कौन-सी मानवीय आवाज़ उन तक पहुँच सकती? बार-बार के अवलोकन से मैं पाता हूँ कि खुले आकाश में मैं छत के नीचे की अपेक्षा तिगुनी संख्या पर नियन्त्रण पा सकता हूँ। और कौन कह सकता है कि खेतों में प्रचार का समय बीत गया, जबकि (1) पहले से कहीं अधिक संख्या में लोग
खुले आकाश के नीचे प्रचार आते हैं। (2) परमेश्वर की कायल करने वाली ही नहीं, परिवर्तित करने वाली सामर्थ्य भी उनके बीच विशेष रूप से उपस्थित है?” — जर्नल,
1759, खण्ड 2, पृ. 515।
लगभग सात बजे मैंने गिन्स में प्रचार किया, और लोग चारों ओर से उमड़ पड़े। खेतों में प्रचार का अभाव यहाँ मृतप्रायता का एक कारण रहा है। इसके बिना मुझे परमेश्वर के कार्य की कोई बड़ी वृद्धि नहीं दिखती। यदि कभी इसे छोड़ दिया गया, तो मुझे आशा है कि पूरा कार्य ही मिट जाएगा।” —
जर्नल, 1764, खण्ड 3, पृ. 184।
“क्या हमने इसका प्रयोग बहुत कम नहीं किया?
“लगता है कि किया है: (1) क्योंकि हमारा बुलावा खोए हुओं को बचाना है।
अब हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वे हमें खोजें। इसलिए हमें जाकर उन्हें खोजना चाहिए। (2) क्योंकि हमें विशेष रूप से ‘सड़कों और बाड़ों में जाकर’ जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग, जो और कोई नहीं करेगा, ‘उन्हें बरबस ले आने’ के लिए बुलाया गया है। (3) क्योंकि इसके विरुद्ध वह कारण ठीक नहीं है: ‘भवन में वे सब समा जाएँगे जो आएँगे।’ भवन उन सबको समा सकता है जो भवन में आएँ; परन्तु उन सबको नहीं जो खेत में आते।”
— सम्मेलन की कार्यवाही (मिनट्स), वेस्ली की रचनाएँ, खण्ड 8, पृ. 300।
बैण्डन में काफ़ी भलाई हुई है; और और भी होगी, यदि प्रचारक अपने को भवन में बन्द करके न रखें। परन्तु खेतों में प्रचार के बिना किसी भी स्थान पर कोई बड़ी भलाई नहीं होगी।” — श्री जॉन मेसन को पत्र (1768), खण्ड 12, पृ. 435। “यदि तुम परमेश्वर के कार्य को आगे बढ़ाना चाहते हो, तो जितनी बार सम्भव हो बाहर प्रचार करो। इसके समान कुछ भी
खुले आकाश के नीचे प्रचार शैतान के राज्य को नष्ट नहीं करता।” — श्री ज़कर्याह यूडाल को पत्र (1782), खण्ड
यदि हमारे समय का खुले में प्रचार भूतकाल के समान परिणाम देना चाहता है, तो उसे स्वरूप में उसके निकट होना होगा। उसे संयोग पर छोड़े गए प्रयास और सद्भावनापूर्ण पर अयोग्य उत्साह पर नहीं छोड़ा जा सकता; उसे संगठन और वरदान में वह सर्वोत्तम माँगना होगा जो कलीसियाएँ दे सकती हैं। यह एक विशेष रूप से अर्थपूर्ण तथ्य है कि अठारहवीं शताब्दी का सबसे सफल खुले में प्रचार व्हाइटफ़ील्ड और वेस्ली का था, जो विश्वविद्यालय की पढ़ाई से अभी-अभी निकले दो युवक थे, भक्त होने के साथ-साथ सुसंस्कृत भी। हमारे बड़े नगरों का कारीगर बुद्धि की क़द्र कर सकता है, और यदि आधुनिक मंच के जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग स्वामी बाहर जाकर, ईमानदार, पौरुषपूर्ण और स्नेहभरे मन से उसे अपना सर्वोत्तम दें, तो उसकी ओर से प्रतिक्रिया की कमी न होगी।
लंदन की हाल की धार्मिक जनगणना के अधीक्षक श्री आर. म्यूडी स्मिथ की इस विषय पर टिप्पणियाँ गम्भीर ध्यान के योग्य हैं। वे खुले में प्रचार को, बाहर के लोगों तक पहुँचने के उन साधनों में से एक बताते हुए, जिनकी आवश्यकता जनगणना ने सिद्ध की है, कहते हैं: “आज वह ईश्वरीय पद्धति अनादर में पड़ गई है, क्योंकि वह लगभग उन लोगों का एकाधिकार बन गई है जो जितने उत्साही हैं उतने ही नासमझ भी। रविवार की सन्ध्याओं को, यदा-कदा सड़क के कोनों पर, कोई भाई मुट्ठी-भर लोगों को सम्बोधित करता दिखाई-सुनाई देता है, जिनमें अधिकांश उस कलीसिया या मिशन से उसके साथ आए होते हैं जिससे वह जुड़ा है। खुले आकाश के नीचे प्रचार
वक्ता में उत्साह है, परन्तु उसका उत्साह ‘ज्ञान के अनुसार नहीं’ है, और सुनते हुए मैं प्रायः यह देखकर लज्जा से लाल हो गया हूँ कि मसीही धर्म को इस प्रकार तोड़-मरोड़कर और बदनाम करके प्रस्तुत किया जा रहा है। या तो बिना सम्बन्ध, तुक या तर्क के बेचारे श्रोता पर पाठ पर पाठ दे मारे जाते हैं; या विचार में संकीर्ण, भाषा में अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किए जाते हैं, जिनके साथ स्वर्ग के वचन या नरक की धमकियाँ ऐसी तीव्रता से दी जाती हैं जो सवोनारोला के योग्य होती, और ऐसी सर्वज्ञता के साथ जो किसी लॉर्ड चीफ़ जस्टिस में भी अक्षम्य होती। मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है कि जिस पद्धति को यीशु मसीह और उसके शिष्यों ने इतनी सफलता से अपनाया, उसे उन्हीं के हाथों में छोड़ दिया जाए जो उसका कुशल उपयोग करने में सबसे कम समर्थ हैं। यह अर्थहीन नहीं कि संसार ने जो सबसे महान प्रवचन सुना, वह पहाड़ की ढलान पर दिया गया था। यदि कोई एक स्थान दूसरों से अधिक हमारा सर्वोत्तम माँगता है, तो वह सड़क का कोना है। बुद्धि, चातुर्य, संस्कृति, अनुभव, वक्तृत्व, प्रस्तुति ‘शरीर के लिए भी उतनी ही आवश्यक और अनिवार्य हैं जितनी आत्मा के लिए।’
इन कामों के लिए मज़बूत फेफड़े और उत्साह पर्याप्त नहीं हैं। मनाने वाला स्वर होना चाहिए, साथ मिलकर तर्क करना होना चाहिए, आकर्षण और समझाने की शक्ति होनी चाहिए, यदि हमें वह पूरा करना है जो इस कार्य में हमारे पूर्ववर्तियों ने पूरा किया।”
वेस्ली का अपना अनुभव और व्यवहार “उन्होंने एक प्रेरित का जीवन जिया, जो कुछ कमाया सब दे दिया, अट्ठासी वर्ष की आयु तक वर्ष के सारे दिन और हर वर्ष यात्रा और प्रचार करते रहे; गणना की गई है कि उन्होंने तीस हज़ार पौंड दान किए, लगभग एक लाख मील यात्रा की, और चालीस हज़ार प्रवचन दिए।”
— टेन की ‘अंग्रेज़ी साहित्य का इतिहास’।
