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विविध परामर्श “प्रचार एक ऐसी कला थी जिसके लिए अत्यन्त सावधान अध्ययन के साथ-साथ महान स्वाभाविक वरदानों की भी आवश्यकता थी, और बहुत अभ्यास तथा प्रशिक्षण के बिना उत्कृष्टता प्राप्त नहीं की जा सकती थी; फिर भी हर नवयुवक पादरी को बहुत कम सहायता या मार्गदर्शन के साथ अपनी राह चलने दिया जाता था। और स्वाभाविक परिणाम निकला; मंच की वक्तृत्व-कला पहले से कहीं अधिक निम्न स्तर पर गिर गई थी। उन्होंने कहा, वह प्रार्थना से भी परे हो चुकी थी; और प्रचारक, यदि कहीं मिलते भी थे, तो केवल नॉनकन्फ़ॉर्मिस्टों में ही मिलते थे।”
— बेंजामिन जॉवेट का जीवन-चरित।
विविध परामर्श पठन सबसे उपयोगी पुस्तकें पढ़ो, और वह भी नियमित तथा निरन्तर। सारी सुबह इसी काम में लगातार बिताओ, या कम से कम चौबीस घण्टों में पाँच घण्टे।
“परन्तु मैं तो केवल बाइबल पढ़ता हूँ।”
तब तुम्हें दूसरों को भी सिखाना चाहिए कि वे केवल बाइबल पढ़ें, और उसी तर्क से केवल बाइबल ही सुनें।
परन्तु यदि ऐसा है, तो तुम्हें और प्रचार करने की आवश्यकता नहीं।
यह घोर उन्माद है। यदि तुम्हें बाइबल के सिवा किसी पुस्तक की आवश्यकता नहीं, तो तुम सन्त पौलुस से भी ऊपर निकल गए हो। उसे भी दूसरों की आवश्यकता थी। वह कहता है, ‘पुस्तकें ले आना, विशेष करके चर्मपत्र,’
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग जो चर्मपत्रों पर लिखे गए थे। ‘परन्तु मुझे पढ़ने में रुचि नहीं।’ उपयोग करते-करते रुचि उत्पन्न करो, या अपने पुराने पेशे को लौट जाओ।”
श्री जॉन ट्रेम्बैथ को पत्र (1760): — “जिस बात ने बीते समय में तुम्हें बहुत हानि पहुँचाई है, बल्कि मुझे डर है कि आज तक पहुँचा रही है, वह है पढ़ने का अभाव। मैंने शायद ही कभी किसी प्रचारक को इतना कम पढ़ते देखा हो।
और सम्भवतः इसकी उपेक्षा करने से तुमने इसके प्रति रुचि खो दी है। इसीलिए प्रचार में तुम्हारी प्रतिभा बढ़ती नहीं। वह ठीक वैसी ही है जैसी सात वर्ष पहले थी। वह जीवन्त है, पर गहरी नहीं; उसमें विविधता कम है; विचारों का कोई विस्तार नहीं।
केवल पठन ही मनन और दैनिक प्रार्थना के साथ इसकी पूर्ति कर सकता है। इसे छोड़कर तुम विविध परामर्श अपने साथ बड़ा अन्याय करते हो। इसके बिना तुम कभी गहरे प्रचारक नहीं बन सकते, उसी प्रकार जैसे सच्चे मसीही भी नहीं। अरे, आरम्भ करो!
हर दिन का कुछ भाग निजी साधना के लिए निश्चित करो। जो रुचि तुम्हारे पास नहीं है, वह तुम पा सकते हो। जो आरम्भ में उबाऊ है, वह बाद में सुखद हो जाएगा। चाहे तुम्हें अच्छा लगे या नहीं, प्रतिदिन पढ़ो और प्रार्थना करो। यह तुम्हारे जीवन के लिए है; इसके सिवा कोई मार्ग नहीं; नहीं तो तुम जीवन भर खिलवाड़ करने वाले और एक सतही प्रचारक बने रहोगे। अपनी आत्मा के साथ न्याय करो; उसे बढ़ने का समय और साधन दो। अब और अपने को भूखा मत रखो। अपना क्रूस उठाओ और पूरी तरह मसीही बनो। तब परमेश्वर की सब सन्तानें तुम्हारे विषय में आनन्दित होंगी (शोकित नहीं)।” b/
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग श्री जोसेफ़ बेन्सन को पत्र (1768): — “अब तुम्हारे पास फ़िलॉसॉफ़िकल ट्रांज़ैक्शन्स के बीस और खण्ड हैं। डॉ. बर्टन की लातीनी और यूनानी कविताएँ तुम्हें अध्ययन-कक्ष में मिल जाएँगी।
मालब्रांश और कुछ अन्य पुस्तकें आ रही हैं। तर्कशास्त्र को तुम बिना शिक्षक के नहीं समझ सकते। यदि हम मिलने तक जीवित रहे, तो मुझे इसे पीटर और तुम्हें पढ़कर सुनाना होगा।
यदि मेरे पास किंग्सवुड की पुस्तकों की सूची हो तो अच्छा होगा, तब मैं बेहतर जान सकूँगा कि क्या खरीदना है। जैसे-जैसे वे नीलामियों में मिलेंगी, जो अभी कम हैं उन्हें मैं जुटाता जाऊँगा। परन्तु सावधान रहो कि पुस्तकों में ही न डूब जाओ: ज्ञान के एक पौंड से प्रेम का एक औंस अधिक मूल्यवान है।”
विविध परामर्श अपने प्रचारकों के पठन में वेस्ली की रुचि उनकी पत्रिका (जर्नल) के इन अंशों से भी प्रकट होती है: — “किंग्सवुड, 1749। — मेरी योजना थी कि लेंट के दिनों में हमारे जितने प्रचारक सम्भवतः छोड़े जा सकें, उन्हें यहाँ रखूँ; और हर दिन उन्हें व्याख्यान दूँ, जैसे मैं ऑक्सफ़ोर्ड में अपने विद्यार्थियों को देता था। कुल सत्रह लोग थे। इन्हें मैंने दो वर्गों में बाँटा; एक को बिशप पियर्सन की ‘पंथमत (क्रीड) पर’ पुस्तक पढ़ाई; दूसरे को आल्ड्रिच का तर्कशास्त्र; और दोनों को ‘कर्म और उच्चारण के नियम’। — जर्नल, खण्ड 2, पृ. 128।
“लंदन, अक्टूबर, 1756। — शहर में उपस्थित प्रचारकों के साथ मैंने श्री पाइक की ‘फ़िलॉसोफ़िया सैक्रा’ पढ़ना आरम्भ किया। इसमें श्री हचिन्सन के दर्शन का सार स्पष्टता से
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग और विनम्रता से प्रस्तुत है; परन्तु निकट से जाँच करने पर मैंने पाया कि प्रमाण बहुत दोषपूर्ण हैं। मैं श्री हचिन्सन का मत तब तक कभी स्वीकार नहीं करूँगा जब तक ‘ipse dixit’ [लातीनी: “उसने स्वयं कहा”] को प्रमाण न माना जाए।” — जर्नल, खण्ड 2, पृ. 388।
लंदन, दिसम्बर, 1756। — इस सप्ताह मैंने प्रचारकों के साथ श्री हचिन्सन की रचनाओं का ग्लासगो संक्षेप पढ़ा; जिसमें संक्षेपकर्ताओं ने उनके न केवल अर्थ को, बल्कि उनकी आत्मा को भी आश्चर्यजनक यथार्थता से व्यक्त किया है। परन्तु सच तो यह है कि मैं न इसकी प्रशंसा कर सकता हूँ, न उसकी; बल्कि उनकी परिकल्पना की प्रशंसा मैं उत्तरोत्तर कम करता जा रहा हूँ, क्योंकि मैं देखता हूँ कि पूरी की पूरी पवित्रशास्त्र से असमर्थित है।
बहुत चतुराईपूर्ण, पर बिलकुल अनिश्चित।” — जर्नल, खण्ड 2, पृ. 389।
निश्चय ही यह उनके खुले मन और सत्य में उनके भरोसे का प्रमाण है कि उन्होंने अपने प्रचारकों के साथ विविध परामर्श पठन के लिए ऐसी रचनाएँ चुनीं जिनसे वे इतनी दृढ़ता से असहमत थे।
पठन और भेंट-मुलाकात श्री जोसेफ़ बेन्सन को पत्र (1774): — “बहुत-से लोग बहुत कम पढ़ने के संकट में रहते हैं। तुम बहुत अधिक पढ़ने के संकट में हो। जहाँ कहीं भी हो, अपना क्रूस उठाओ, और घर-घर जाकर सारी सोसाइटी से भेंट करो। जो फल (सम्भवतः थोड़े ही समय में) मिलेगा, वह तुम्हारे परिश्रम का भरपूर प्रतिफल होगा।”
श्री ज़कर्याह यूडाल को पत्र (1779): — “तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि हर सुबह नए नियम का एक अध्याय टिप्पणियों सहित पढ़ो, और
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग सुबह का अधिकांश भाग पठन, मनन और प्रार्थना में बिताओ। दोपहर के बाद तुम सम्मेलन की कार्यवाही (मिनट्स) में बताई गई रीति से घर-घर जाकर सोसाइटी से भेंट कर सकते हो। जितना अधिक परिश्रम, उतनी अधिक आशीष।”
प्रचार की सामान्य पद्धति “(1) आमन्त्रित करना। (2) कायल करना:
(3) मसीह को प्रस्तुत करना। (4) उन्नति करना; और यह हर प्रवचन में किसी न किसी मात्रा में करना।”
छोटी-छोटी सलाहें “(1) ध्यान रखो कि कभी किसी मण्डली को निराश न करो, सिवा जीवन-मरण की स्थिति के।
“(2) ठीक नियत समय पर आरम्भ करो और समाप्त करो।
विविध परामर्श “(3) मण्डली के सामने तुम्हारा सारा आचरण गम्भीर, भारी और पवित्र हो।
अपना विषय सदा श्रोताओं के अनुकूल चुनो।
जितने सरल से सरल पाठ हो सकें, उन्हें चुनो।
ध्यान रखो कि भटको मत; अपने पाठ पर टिके रहो, और जो हाथ में लिया है उसे पूरा करो।
रूपकात्मक या आध्यात्मीकृत व्याख्या में संयम रखो।
अपने हाव-भाव, वाक्य-रचना या उच्चारण में किसी भी अटपटेपन या बनावट से सावधान रहो।
अपनी रचना का कोई भजन मत गाओ।
बिना रुके प्रायः आठ या दस मिनट (अधिक से अधिक) से अधिक प्रार्थना न करो।”
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग छोटी प्रार्थनाएँ बहुत वांछनीय हैं।
सर्वशक्तिमान से लम्बे निवेदन मण्डली को बहुत थका देते हैं।
“(11) हर कहीं बड़े पर्वों का लाभ उठाओ, उस अवसर पर प्रचार करके और भजन गाकर, जिन्हें तैयार रखने का ध्यान रखना चाहिए।
“(12) बोलचाल या वेशभूषा में गँवारपन से सावधान रहो।”
मसीह का प्रचार “क्या हम में से कुछ लोग उस बात के कारण, जिसे मसीह का प्रचार करना कहा जाता था, व्यावहारिक प्रचार से भटक नहीं गए? निश्चय ही हाँ। मसीह का प्रचार करने का सबसे प्रभावी मार्ग है उसे उसके सब पदों में प्रचार करना, और विश्वासियों तथा अविश्वासियों दोनों के सामने उसकी व्यवस्था के साथ-साथ उसका सुसमाचार भी घोषित करना। आओ हम
विविध परामर्श भीतरी और बाहरी पवित्रता पर उसकी सब शाखाओं में दृढ़ता और निकटता से बल दें।”
संयम “(1) क्या तुम सब बातों में संयमी हो? उदाहरण के लिए भोजन में: क्या तुम केवल वही प्रकार और उतनी ही मात्रा लेते हो जो तुम्हारे शरीर और आत्मा दोनों के लिए सर्वोत्तम है? क्या तुम इसकी आवश्यकता देखते हो?
क्या तुम रात के भोजन में मांस नहीं खाते, देर रात का भोजन नहीं करते?
क्या तुम हर भोजन में आवश्यकता से अधिक नहीं खाते? क्या दोपहर के भोजन के बाद तुम भारी या ऊँघते तो नहीं हो जाते?
क्या तुम पेय का भी केवल वही प्रकार और मात्रा लेते हो जो तुम्हारे शरीर और आत्मा दोनों के लिए सर्वोत्तम है?
क्या तुम पानी पीते हो? क्यों जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग नहीं? क्या कभी पिया था? इसे क्यों छोड़ दिया? यदि स्वास्थ्य के कारण नहीं, तो फिर कब शुरू करोगे? आज ही?
तुम कितनी बार दाखमधु या एल पीते हो? क्या प्रतिदिन? क्या तुम्हें इसकी चाह रहती है?”
प्रचार करने का बुलावा “जो लोग समझते हैं कि पवित्र आत्मा उन्हें प्रचार करने को प्रेरित कर रहा है, उन्हें हम कैसे परखें?
“पूछताछ करो, (1) क्या वे परमेश्वर को क्षमा करने वाले परमेश्वर के रूप में जानते हैं? क्या परमेश्वर का प्रेम उनमें बना रहता है? क्या वे परमेश्वर के सिवा और कुछ नहीं चाहते और खोजते? और क्या वे सब प्रकार के आचरण में पवित्र हैं? (2) क्या उनमें इस कार्य के लिए (अनुग्रह के साथ-साथ) वरदान हैं? क्या उनमें (कुछ सहनीय मात्रा में) स्पष्ट, सुदृढ़ समझ है?
विविध परामर्श क्या परमेश्वर की बातों में उनका निर्णय सही है? क्या विश्वास से उद्धार की उनकी समझ यथार्थ है?
और क्या परमेश्वर ने उन्हें कुछ मात्रा में वाक्शक्ति दी है? क्या वे ठीक, सहज और स्पष्ट बोलते हैं? (3) क्या उनके फल हैं?
क्या उनके प्रचार से कुछ लोग सचमुच पाप के कायल होकर परमेश्वर की ओर फिरे हैं?
“जब तक ये तीनों चिह्न किसी एक में एक साथ पाए जाते हैं, हम मानते हैं कि वह प्रचार करने के लिए परमेश्वर की ओर से बुलाया गया है। इन्हें हम पर्याप्त प्रमाण मानते हैं कि वह ‘पवित्र आत्मा की प्रेरणा से इस ओर प्रवृत्त हुआ है।’”
युवा प्रचारकों के लिए शैली का आदर्श “हवा हमारे मुँह पर थी जो सूर्य की गर्मी को सहने योग्य बना रही थी, और हमारी डबलिन तक की यात्रा सुखद रही। सन्ध्या को मैंने पवित्र शास्त्र के सबसे गहरे भाग की व्याख्या आरम्भ की, अर्थात् सन्त यूहन्ना की पहली
जॉन वेस्ली ऑन प्रीचिंग पत्री, जिससे, अन्य सब से बढ़कर, यहाँ तक कि प्रेरित लेखों से भी बढ़कर, मैं हर युवा प्रचारक को सलाह देता हूँ कि अपनी शैली गढ़े। यहाँ उदात्तता और सादगी साथ-साथ हैं, सबसे सशक्त अर्थ और सबसे सरल भाषा।” — जर्नल, 1765।
इससे रोचक रूप से मेल खाती वह भाषा है जिसमें फ़ेनेलों पर एक हाल के योग्य लेखक ने उस धर्माध्यक्ष के मंच-वाक्पटुता सम्बन्धी विचार को व्यक्त किया है: “रूप और गति में, लगभग वर्णन और सार में भी, यूनानी के समान एक और उससे भी उच्च साहित्य था; डेमॉस्थनीज़ को सन्त पौलुस के लिए, और होमर को मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के लिए स्थान छोड़ना होगा, क्योंकि पवित्र शास्त्र अपनी भव्य सादगी में मसीही वाक्पटुता का सच्चा, ईश्वरीय आदर्श थे।” * * फ्रांस्वा द फ़ेनेलों, विस्काउंट सेंट सायर्स द्वारा।
विविध परामर्श मंच से डाँटना कठिन है “गुरुवार, 1 दिसम्बर। — आँधी मनुष्य और पशु दोनों को उड़ा ले जाने को तैयार थी। परन्तु दोपहर के लगभग वह थम गई; इसलिए मार्गेट में प्रचार करने के बाद मेरी कैंटरबरी तक की यात्रा सुखद रही।
मैंने यहाँ एक विचित्र बात देखी, जिसे मैं अपने सब प्रचारकों को सुझाता हूँ। कैंटरबरी के लोगों को इतनी बार (और प्रायः बिना कारण) मृतप्राय और ठण्डे होने के लिए डाँटा गया है कि वे बिलकुल निराश हो गए हैं और पत्थर की तरह ठण्डे हो गए हैं। डाँटना कितनी नाज़ुक बात है; इसे भली-भाँति करने के लिए मानवीय बुद्धि से अधिक की आवश्यकता है।”
