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तीसरा उपदेश: धर्मी ठहराए जाने के विषय में
उत्पत्ति अध्याय 15:6। अब्राम ने यहोवा पर विश्वास किया, और उसने उसे उसके लिये धार्मिकता गिना।
हमने कल सुना कि अपने उद्धार के विषय में हमें किसी भी प्रकार परमेश्वर के साथ साझा नहीं करना है, वरन् इसके लिए सारी स्तुति उसी को दी जानी चाहिए। क्योंकि जब हम भली-भाँति देख लेंगे कि हममें क्या-क्या पाया जा सकता है, तो हमें यही निष्कर्ष निकालना पड़ेगा कि हम सब प्रकार की खराई से ऐसे रहित हैं कि हममें भ्रष्टता के सिवा और कुछ नहीं, और इसलिए मृत्यु के सिवा और कुछ नहीं।
अब हमारे लिए इतना जान लेना पर्याप्त नहीं कि केवल परमेश्वर ही की महिमा होनी चाहिए, और हम स्वयं मानो निश्चय ही किसी मूल्य के नहीं हैं; क्योंकि यदि हम ऐसा न करें, तो हमने अपने ही लिए उद्धार का द्वार बन्द कर दिया है। क्योंकि जहाँ सन्त पौलुस ने भविष्यद्वक्ता हबक्कूक में से यह उद्धृत किया कि “हम विश्वास से जीवित रहते हैं,” वहाँ हमें यह सिखाया जाता है कि विश्वास मानो वह कुंजी है जो हमारे लिए स्वर्ग का राज्य खोल देती है। यदि वह हमारा उत्तराधिकार है, तो हमें सन्तान होकर वहाँ पहुँचना है; और जैसा सन्त यूहन्ना अपने पहले अध्याय में कहता है, हम परमेश्वर की सन्तान विश्वास के बिना हो ही नहीं सकते। अब यह विश्वास, जैसा हम पहले कह चुके हैं, निश्चय को अपने में समाए हुए है।
और यह भी देखिए कि यह क्यों कहा गया है, “कि हम खुले मुँह से पुकारें कि परमेश्वर हमारा पिता है, और यदि वह ऐसा न हो, तो हम उसकी सन्तान गिने ही नहीं जा सकते।” और यह पुकार कहाँ से उठती है? निस्सन्देह, जैसा सन्त पौलुस रोमियों के आठवें अध्याय में और गलातियों के चौथे अध्याय में भी कहता है, गोद लिए जाने के आत्मा से। और इसलिए परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्मा को ऐसी साक्षी देता है कि हम गोद लेने के द्वारा उसकी सन्तान हैं, कि हम बिना किसी संकोच या सन्देह के उसे अपना पिता कहकर पुकार सकें।
और एक अन्य स्थान में भी कहा गया है, “कि वह उस उद्धार के उत्तराधिकार की मुहर कहलाता है जिसकी हम बाट जोहते और प्रतीक्षा करते हैं।” जब ऐसा है कि विश्वास का निश्चय इसी को समाए हुए है कि हम परमेश्वर की गोद ली हुई सन्तान हैं, और हमारा उद्धार इसी पर आधारित है, तो इस पर एक मुहर भी लगनी चाहिए, इस बात के चिह्न और प्रमाण के रूप में कि वह अचूक है। तो यहाँ हम देखते हैं कि हमारे लिए केवल इतना अंगीकार कर लेना पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर हमारे उद्धार का कर्ता है और यह केवल उसी का माना जाए; वरन् दूसरी ओर हमें उसके पास आना, और निजी रूप से उसे अपना पिता कहकर पुकारना भी है, और पूरी तरह निश्चित होना है कि वह हमें न त्यागेगा।
अब इस निश्चय को पोपवादी कभी समझ ही न सके, वरन् इसका दृढ़ता और निरन्तरता से विरोध करते हैं, यह कहते हुए कि हमें किसी भी प्रकार यह निश्चित नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर हमें स्वीकार करता और हमसे प्रसन्न है, और कि हम उसके अनुग्रह और कृपा में स्थिर हैं; केवल इतना कि हम इसका कोई सम्भावित अनुमान रख सकते हैं। अब ऐसा कहना मसीही धर्म की सारी नींव को जड़ से उखाड़ फेंकना है। और वास्तव में, जब सन्त पौलुस इस विषय की चर्चा करता है, तो वह हमें इस तर्क पर ले जाता है कि यदि हम व्यवस्था पर निर्भर रहें और उसी पर भरोसा रखें, तो विश्वास व्यर्थ ठहरता है और की हुई प्रतिज्ञा निष्फल हो जाती है। और ऐसा क्यों? निस्सन्देह इसलिए नहीं कि परमेश्वर अपनी ओर से विश्वासयोग्य नहीं, परन्तु इसलिए कि हम उसकी पूर्ति तक कभी पहुँच न सकेंगे जो हमारे उद्धार के लिए अपेक्षित है। क्योंकि परमेश्वर सचमुच हमसे प्रतिफल की प्रतिज्ञा करता है जब हम उसकी सेवा कर चुके हों, और जो कुछ उसने हमें आज्ञा दी है उसे आदि से अन्त तक मान चुके हों: परमेश्वर निःसन्देह हमसे यह सब प्रतिज्ञा करता है।
अब यह तो असम्भव शर्त है। क्योंकि आज तक किसी मनुष्य ने व्यवस्था को पूरा नहीं किया, और न कभी करेगा। सो हम अपनी ओर से इस प्रतिज्ञा को कभी पूरा और सिद्ध नहीं कर सकते। और इसलिए हम सदा तर्क-वितर्क करते, डगमगाते और बेचैन रहेंगे, और अन्त में निराशा में जा पड़ेंगे, जब हम अपने कर्म साथ लेकर परमेश्वर के सामने लेखा-जोखा करने चलेंगे; क्योंकि एक सौ तैंतालीसवें भजन में कहा गया है: “अपने दास का न्याय न कर, हे यहोवा; क्योंकि तेरी दृष्टि में कोई प्राणी धर्मी ठहर नहीं सकता।” और इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यदि हमारा उद्धार हमारी योग्यताओं के सिवा कहीं और से न होता, तो हम सदा सताए और व्याकुल रहते, और हमारी आत्माएँ अत्यन्त घबराई रहतीं।
और इसे भली-भाँति समझने के लिए, आइए हम उस पर जो पहले कहा जा चुका है, अच्छी तरह तौलकर विचार करें, अर्थात् हमें यह न समझना चाहिए कि हम परमेश्वर को तुच्छ वस्तुओं से चुका देंगे। क्योंकि उसका विरोध में होना भयानक बात है। और जब तक हम कर्मों पर भरोसा करते रहेंगे, तब तक वह इसके सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता। क्योंकि हम उसकी महिमा इतनी घटाते और उसका अधिकार इतना छीनते हैं, जैसा पहले दिखाया जा चुका है, कि जो कोई अपने लिए थोड़ी-सी भी महिमा लेने से अपना मुँह बन्द नहीं रखता, और केवल परमेश्वर को धर्मी मानने के लिए अपना मुँह पूरा नहीं खोलता, वह निःसन्देह उसकी महिमा के सामने अपने को खड़ा करता है। अब हम उसके विरुद्ध अपना मुकद्दमा कभी न जीतेंगे; दण्ड की आज्ञा तो फिर भी हमारे ही सिरों पर पड़ेगी।
इसलिए हम जानबूझकर और सचमुच उसके क्रोध को अपने विरुद्ध न भड़काएँ; और इसके सिवा यह हो ही नहीं सकता कि जब हम अपनी योग्यताओं पर भरोसा करेंगे, तब हम अपने होश में न रहें। और इसमें दोहरा दुरुपयोग है, जो अपने साथ तीसरा भी लाता है।
पहला यह है कि जब हम परमेश्वर के साथ मोटे तौर पर हिसाब करने की सोचते हैं, जैसा पोपवादी करते हैं। और यद्यपि वे बहुत बातों में चूकते हैं, तो भी अपने आप को विश्वास दिला लेते हैं कि वह उन्हें ग्रहण करता है। अब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा केवल उन्हीं से की है जो सारी व्यवस्था को पूरा करेंगे। और इसलिए हम इन वचनों को भली-भाँति ध्यान में रखें: “कि जो कोई उन सब बातों को जो व्यवस्था में लिखी हैं करेगा, वह उनके कारण जीवित रहेगा।” यह नहीं कहा गया कि केवल एक भाग को। यह सन्त याकूब के उस कथन से भी मेल खाता है, “कि जिसने कहा, व्यभिचार न करना, उसी ने यह भी कहा, चोरी न करना।” क्योंकि यदि कोई मनुष्य अपने जीवन के सारे दिन पवित्रता से बिताए, और फिर भी किसी अन्य आज्ञा का दोषी हो, तो भी वह दोषी ठहराई हुई आत्मा ही है। और ऐसा क्यों? निस्सन्देह इसलिए कि जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे हमें अलग नहीं करना चाहिए। व्यवस्था की धार्मिकता जुड़ी हुई और एक है; इसलिए हमें उसके टुकड़े-टुकड़े करने या उसे बाँटने का ढोंग नहीं करना चाहिए।
अब आइए विचार करें कि क्या हम अंशतः या पूर्णतः अपने आप को ऐसा निर्दोष ठहरा सकते हैं कि हमारे सारे जीवन-क्रम में सुधार की आवश्यकता ही न रहे। हाय, तब हम क्या हैं? और जैसा सुलैमान कहता है, “कौन कह सकता है कि मैंने अपने हृदय को पवित्र किया है?” वास्तव में बहुत लोग हैं जो सोचते हैं कि उन्होंने किया है, क्योंकि संसार में बहुत से कपटी हैं। और इसलिए वह मनुष्य, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जो इस बिन्दु पर खड़ा है, निश्चय ही निरा निर्बुद्धि है; क्योंकि यदि वह यह विचार करे कि उसका सामना किस न्यायी से है, तो चाहे जैसे भी हो, जब हम सारे विषय पर भली-भाँति विचार कर लेंगे, निःसन्देह यदि हम उसके पास एक औंस, या शायद आधा औंस लेकर जाएँ, तो, जैसा कहते हैं, उसे दबाने के लिए उससे पाँच गुना पाया जाएगा; और जब हम आधे औंस से उसे चुकाने की सोचेंगे, तब उसे पाँच गुने में हमें दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त कारण मिल जाएगा। और तब हमारा क्या होगा? इसलिए आइए हम ठीक-ठीक जानना सीखें कि हम क्या हैं, ताकि अन्त में हम निकम्मे से भी बदतर न पाए जाएँ। और आइए हम यह भी विचार करें, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि हम कभी उद्धार नहीं पा सकते जब तक हम निश्चित न हों कि हम परमेश्वर को अपना पिता कहकर पुकार सकते हैं।
अब इस पहले दुरुपयोग के अतिरिक्त एक दूसरा भी है, और वह यह कि जो लोग अपनी योग्यताओं से धर्मी ठहरने की सोचते हैं, वे कभी यह विचार नहीं करते कि जब परमेश्वर उन पर कड़ाई से दृष्टि करेगा तब हमारा एक भी कर्म भला नहीं ठहरेगा: क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, चाहे हम व्यवस्था का आधा भाग या तीन भाग भी मानें, तो भी वह सब कुछ नहीं के बराबर होगा; क्योंकि यदि हम केवल एक ही बात में चूकें तो हम सब दोषी ठहरेंगे: और फिर भी एक और कारण है, अर्थात् हम व्यवस्था की पूर्ति के निकट कभी आए ही नहीं, न पूर्ण रूप में, न अंश रूप में। और यह कैसे? हमने कल कहा था कि परमेश्वर हमारे कर्मों का न्याय वैसे नहीं करता जैसा हम कल्पना करते हैं। क्योंकि उसके अपने तराजू और बाट हैं। और वह उनका न्याय कैसे करता है? निस्सन्देह वह देखता है कि हृदय शारीरिक अशुद्धताओं से निर्मल और शुद्ध है या नहीं। और ऐसा हृदय मनुष्य कहाँ पाएगा? हम सदा बहुत-सी दुष्ट अभिलाषाओं में उलझे रहते हैं, और यद्यपि वे हममें राज्य नहीं करतीं, तो भी हम उनसे पूरी तरह छूट नहीं सकते। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की महिमा करने की जैसी धुन हममें होनी चाहिए वैसी हम कभी न पाएँगे, वरन् सदा कुछ न कुछ दुर्बलता बनी रहेगी: हमारा अभिप्राय भला करने का हो सकता है, परन्तु वह इतनी सिद्धता से नहीं किया जाएगा कि उसके सम्मुख टिक सके। अब हम यहाँ यह इस प्रकार नहीं कह रहे कि मैं सोचता हूँ, और मैं मानता हूँ: परन्तु हमें निष्कर्ष निकालकर कहना चाहिए, परमेश्वर ने ऐसा कहा है, और परमेश्वर इसे मानता और इससे प्रसन्न होता है। और इसलिए हम उसके सम्मुख कुछ भी कमाने से बहुत दूर होंगे, और न ही विवेक में चैन पाएँगे: क्योंकि इसके अतिरिक्त कि हम बहुत बातों में चूकते हैं, और ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसके विवेक में सदा कुछ पछतावा न रहता हो, और यद्यपि हमने सोचा कि जितना हो सकता था उतना सबसे अच्छा किया, तो भी वह सब लँगड़ा और अपंग ही होता। हाँ, कुछ ऐसी दुर्बलता भी हो सकती है जो अत्यन्त भले कर्मों को भी अशुद्ध कर दे।
क्योंकि अब्राम के उस कर्म से उत्तम कर्म कौन-सा हुआ, जब वह अपने ही पुत्र को मारने को तैयार था? तो भी उसका हृदय बहुत-से दुःखों और शोकों से छिदा था, जो उसकी निर्बलता को प्रकट करते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि यह कर्म भी परमेश्वर के सम्मुख अशुद्ध था और किसी योग्यता के रूप में गिना नहीं जा सकता था। तब हम उस पर क्या कहें जो हम करते हैं, यह देखते हुए कि हम में से कोई ऐसा नहीं जो उस मार्ग पर चलने को कहे जाने पर तुरन्त अटक न जाए? और यद्यपि हम परमेश्वर की विश्वासयोग्यता से सेवा करने में अपने को लगाने को प्रसन्न होते, तो भी हम उतने ठीक और खरे नहीं चलते जितना चलना चाहिए, सौवें भाग के बराबर भी नहीं। तो क्या हमें निरन्तर सताया और बेचैन रहना ही होगा? हाँ निश्चय, और हम सब यह जानते हैं, जब तक कि हम अत्यन्त अन्धे न हों।
अब जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें अपने आप को निश्चय दिलाना चाहिए कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता, हमें ग्रहण करता और अपनाता है, मानो हम धर्मी हों। और यह विशेषाधिकार हमें किससे मिलता है? हमें रोमियों के नाम सन्त पौलुस के उस कथन पर आना चाहिए: अर्थात् हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर देखना चाहिए। क्योंकि जब हमारे उद्धार की बात होती है, और हम महिमामय स्वर्ग को देखते हैं, तो हम तुरन्त एक ओर तो उस पर चकित और विस्मित हो जाते हैं, क्योंकि हम उसके निकट आने के भी योग्य नहीं। और दूसरी ओर हम देखते हैं कि नरक हमारे सामने हमें निगल जाने को मुँह खोले खड़ा है, क्योंकि हम भयानक अभागे पापी हैं। और तब हम कहेंगे, “स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा?” क्योंकि हमारा वहाँ पहुँचना असम्भव है: क्योंकि वहाँ उड़ने के लिए हमारे पंख कहाँ हैं? और इसके अतिरिक्त, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, नरक हमें ग्रहण करने को मुँह फैलाए तैयार खड़ा है: यदि वह हमारे विरुद्ध दण्ड-आज्ञा सुनाए: और तब हम कहेंगे, हम कैसे जानें कि हम क्षमा किए और छोड़े गए हैं, और परमेश्वर हमें सिर के बल अथाह नरक के गड्ढे में क्यों न गिरा दे? अब इस पर सन्त पौलुस उत्तर देता और उपाय बताता है, जो यह है, कि हमें सन्देह न करना चाहिए कि स्वर्ग हमारा है। और हम इस बात का निश्चय कैसे करें? निस्सन्देह इसलिए कि यीशु मसीह की देह में हम जानते हैं कि वह हमारे लिए पूरा खुला है।
और इसलिए सन्देह के साथ यह प्रश्न पूछना, “स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा?” सन्त पौलुस कहता है, यीशु मसीह को वहाँ से नीचे लाना है। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर के पुत्र ने कहा है, “कि मेरे पिता के घर में बहुत-से रहने के स्थान हैं,” और कि उसने उन्हें अपने निजी लाभ के लिए नहीं लिया, वरन् इसलिए कि हमें अपने साथ ग्रहण करे, अपने संगी वारिसों के रूप में। जहाँ तक नरक की बात है, वह उसमें उतर गया: क्योंकि उसने वे यातनाएँ और पीड़ाएँ सहीं जो हमें सहनी चाहिए थीं, उसने परमेश्वर के क्रोधपूर्ण श्राप की भयानक यातनाएँ सहीं, जिनके कारण वह पुकार उठा और कहा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” इसी प्रकार जब हम अपने उद्धार को निश्चित करते हैं, तब हम देख सकते हैं कि हम निश्चिन्त हैं। और उसका अभिप्राय भी यही है जहाँ वह कहता है, “परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा?” वह शैतान से और जो कुछ हमारे विरुद्ध है उससे क्रोधित है, मानो वह कह रहा हो, चूँकि हमने अपना सारा अहंकार छोड़ दिया है, और हमारे मन में यह कल्पना तक नहीं कि हम अपने साथ कुछ अपना परमेश्वर के पास ला सकते हैं जो हमें उसके योग्य ठहराए, यह जानते हुए कि यह उसकी अपनी मुफ़्त दया और भलाई ही है कि उसने हमें चुना, और सुसमाचार के द्वारा हमें अपने पास बुलाया भी, शैतान अपनी सब कल्पनाओं के साथ जितना चाहे हम पर दोष लगाए, तो भी वह हमें धर्मी ठहराएगा और क्षमा करेगा: और कैसे? निस्सन्देह, वह कहता है, देखो हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे लिए कैसे बिनती करता है, और इस प्रार्थना की सामर्थ्य और गुण से, क्योंकि वह अपने पिता परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने के लिए हमारा वकील है, इससे हम देखते हैं कि हम कैसे क्षमा किए गए हैं। और यही वह निश्चय है जिसकी चर्चा वह दूसरे स्थान में करता है, जैसा हम पहले कह चुके हैं। यही बात हमें उस बेचारे चुंगी लेनेवाले के उदाहरण में भी दिखाई जाती है, अर्थात् उस महसूल लेनेवाले में जिसे लोग तुच्छ जानते थे, जब वह प्रार्थना करने परमेश्वर के पास आया। वह घमण्ड के साथ उसके पास नहीं आया, फिर भी उसने सचमुच विश्वास किया कि परमेश्वर उस पर दया करेगा: और उसमें वह साहसी था, जैसा हम सबको भी होना है, जैसा इफिसियों की पत्री में कहा गया है।
परन्तु जब उसने उसकी ओर देखा, तो उसने अपने आप को दीन किया और लज्जित हुआ, और क्षमा के सिवा कुछ न माँगा: और यीशु मसीह ने कहा कि वह केवल इसी वचन से धर्मी ठहराया गया। और हम देखते हैं कि फरीसी इसलिए ठुकराया गया कि उसने अपने कर्मों पर ऐसा मूर्खतापूर्ण भरोसा किया। और चुंगी लेनेवाला, जिसने साफ़ और सीधे अपने आप को अभागा पापी और ऐसी दयनीय, दोषी ठहराई हुई आत्मा कहकर मान लिया, परमेश्वर के सम्मुख धर्मी ठहराया जाकर लौटा। फिर भी फरीसी ने अपनी योग्यताओं के कारण अपनी प्रशंसा नहीं की, क्योंकि उसने यह नहीं कहा, “मैंने यह किया और मैंने वह किया, और इसलिए परमेश्वर उनके लिए मेरा ऋणी है,” वरन् केवल इतना कहा, “हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करनेवाला, अन्यायी, चोर, व्यभिचारी, और इस चुंगी लेनेवाले के समान भी नहीं हूँ।”
कोई सोचेगा कि यह तो अच्छी भूमिका थी, जब उसने अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर के अधीन किया, और घोषणा की कि उसमें जो कुछ भी भलाई और सद्गुण है वह पवित्र आत्मा के केवल दान से आया है। पर इस सबसे क्या? फिर भी वह ऐसे गर्व और अहंकार से फूला हुआ था कि अपने कर्मों के कारण अपने को ग्रहणयोग्य और प्रिय समझता था। और इसलिए हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उसे दोषी क्यों ठहराया: क्योंकि यह हो ही नहीं सकता था कि वह अत्यन्त मूढ़ न हो जो यह सोचे कि परमेश्वर अपने कर्मों के कारण उसका ऋणी है। इसलिए हम सबको परमेश्वर की केवल दया की शरण में भागना चाहिए, और तब, मैं कहता हूँ, हम निश्चिन्त होंगे कि वह हमसे प्रेम रखेगा, जब हम अपनी सारी योग्यताएँ यीशु मसीह में खोजेंगे, अपनी बड़ी अयोग्यता के होते हुए भी उससे प्रार्थना करना कभी न छोड़ेंगे, क्योंकि उसने हमें न तो हमारे व्यक्तित्व के कारण गोद लिया है, न हमारे कर्मों के कारण, वरन् अपनी केवल और मुफ़्त दया से: इस प्रकार हम देखते हैं कि हम अपने उद्धार के विषय में कैसे निश्चिन्त होंगे।
यह सच है कि हम सदा शंकाओं और सन्देहों से भरे रहेंगे, क्योंकि हममें हमारा विश्वास सिद्ध नहीं है: परन्तु फिर भी हमारा निश्चय सदा प्रबल रहेगा, जब तक हम साहस से लड़ते रहें और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को थामे रहें, और उन्हें उन सब परीक्षाओं और अविश्वासों के विरुद्ध जो शैतान हमारे सामने रखेगा, ढाल और रक्षा बनाएँ। इसलिए जब हम विश्वास के इस निश्चय की चर्चा करते हैं, तो हमारा यह अर्थ नहीं कि वह हिल नहीं सकता, और हम बहुत बार अत्यन्त घबराए और व्याकुल न हों: परन्तु हमारा अर्थ यह है कि हम अन्त में, चाहे जो हो, यह निष्कर्ष निकाल सकें कि परमेश्वर हम पर दया करेगा, और इसी निश्चय पर उससे प्रार्थना करें। और यही वह बात है जो हमें अब स्मरण रखनी है।
तो हम इससे सहज ही देखते हैं कि जिन्होंने “धर्मी ठहराना” शब्द का यह अर्थ लिया है कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें बदलता और चलाता है कि हम परमेश्वर की सेवा करें, वे बहुत ही बहुत भ्रम में हैं: क्योंकि बहुत हैं जो कहेंगे कि हम अपनी योग्यताओं से धर्मी नहीं ठहरते, और न हममें एक बिन्दु भी है जिस पर घमण्ड करें, और जो कुछ भलाई हममें है वह परमेश्वर के मुफ़्त दान से आती है, क्योंकि अपने आप से हम पाप के सिवा और कुछ नहीं कर सकते: यह सब वे मान लेंगे, और सार रूप में कहेंगे कि हम केवल अनुग्रह से धर्मी ठहरते हैं, कर्मों से नहीं, और कि हममें कोई भलाई नहीं, परन्तु परमेश्वर ही सब देता है: क्या उन्होंने यह सब मान लिया? हाँ, निश्चय: फिर भी वे अपने आप को और दूसरों को भी गिराने में लगे रहते हैं। और कैसे? निस्सन्देह इसलिए कि वे समझते हैं कि वे सिद्धता तक पहुँच चुके हैं, जबकि वास्तव में उनमें अपूर्णता के सिवा और कुछ नहीं।
क्योंकि ऐसा मनुष्य कहाँ मिलेगा जो अपने आप में इस प्रकार दीन हो जाए कि मानो कुछ भी न रहे, और अपने आप को सर्वथा श्रापित माने, और जो कुछ भलाई उसमें है उसे परमेश्वर की अपनी केवल उदारता से आई माने, ताकि इसलिए परमेश्वर ऊँचा और बड़ा किया जाए, और वह स्वयं कुछ न रहे, इस उद्देश्य से कि वह परमेश्वर के सम्मुख स्वीकार करे और दीन हो और कहे कि जो कुछ उसके पास है वह उसकी केवल भलाई से पाया है? हाँ, परन्तु हम पहले ही कह चुके हैं कि यदि हम सन्देह में हैं, तो स्वर्ग के फाटक हमारे लिए बन्द हैं। अब जब हम अपने कर्मों की ओर देखते हैं तो हम सन्देह किए बिना रह ही नहीं सकते, अन्यथा बिलकुल पागल ही हों। मान लीजिए कि परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा किसी मनुष्य को नया जन्म दिया है, और वह फरीसी की नाईं केवल परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और कहता है, “निश्चय जो कुछ मेरे पास है वह परमेश्वर से है,” तो भी जब वह प्रार्थना करता है, तब उसे दृढ़ता से और पूरे निश्चय के साथ प्रार्थना करनी चाहिए। और वह यह कैसे करेगा? क्योंकि जब तक वह अभी अपूर्ण और निर्बल है, परमेश्वर ने जो सद्गुण उसे दिए हैं वे बहुत दुर्गुणों से मिले होंगे: हाँ, और ये सद्गुण भी भ्रष्ट होंगे, क्योंकि, मैं कहता हूँ, वह शरीर के दागों से पूरी तरह शुद्ध नहीं हुआ होगा। जब मनुष्य अपने आप को ऐसा पाए, जैसा कहते हैं, बीच समुद्र में, और फिर भी उस अन्त और लक्ष्य से दूर हो जहाँ वह जाना चाहता है, तो वह सन्देह किए बिना और क्या कर सकता है?
इसलिए अब हम यह निष्कर्ष निकालें कि यह मान लेना और कह देना कि हमारा उद्धार परमेश्वर के केवल अनुग्रह और कृपा से हुआ है क्योंकि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें चलाता है, कुछ भी नहीं है, परन्तु हमें अपने पापों की क्षमा की शरण में भागना चाहिए। और इसलिए जो इसमें झगड़ालू तर्कवादी बनते हैं, यह कहते हुए कि हम अपने कर्मों से धर्मी नहीं ठहरते क्योंकि भले कर्म हमारे नहीं, वरन् पवित्र आत्मा के दान हैं, वे उस बात को भूल जाते हैं जिसे हमने अभी छुआ, अर्थात् यह कि हमारा विश्वास निश्चित होना चाहिए, और वह तब तक निश्चित नहीं हो सकता जब तक यीशु मसीह हमारा वकील और उसकी मृत्यु हमारे पापों का प्रायश्चित्त न हो, जिससे हम ऋण को माने बिना यह नहीं कर सकते, जैसा हमारे उद्धृत किए हुए चुंगी लेनेवाले के उदाहरण से देखा जा सकता है। और हम यह भी देखते हैं कि यह धार्मिकता केवल एक दिन के लिए नहीं, वरन् हमारे जीवन के सब दिनों तक बनी रहनी चाहिए।
क्योंकि यद्यपि हमने परमेश्वर की सेवा में उन्नति की है, तो भी वह सब अपूर्णता में ही हुई है। और इसलिए यह स्पष्ट है कि हमें धर्मी ठहरानेवाला केवल विश्वास है। और यहाँ पोपवादियों की उस मूर्खतापूर्ण और विकृत धारणा को दीवार से लगाकर गिरा देना चाहिए, जो समझते हैं कि वे कुछ अपने कर्मों से और कुछ उस क्षमा से धर्मी ठहरते हैं जो वे परमेश्वर के अनुग्रह से पाते हैं: क्योंकि परमेश्वर को हम पर पूर्ण और सम्पूर्ण रूप से दयालु होना है, जैसा दिखाया जा चुका है। और ऐसा क्यों? क्योंकि हमारे कर्मों का एक भाग कुछ भी योग्यता नहीं रखता: और इसके अतिरिक्त, हमारे सबसे उत्तम कर्म में भी भ्रष्टता है, यदि हम उसकी योग्यता के अनुसार उसका न्याय करने की बात करें। और इसलिए हम देखते हैं कि हम पूरी तरह और सम्पूर्णतः बहिष्कृत हैं। इसलिए हमें इस बिन्दु तक पहुँचना चाहिए कि सबसे धर्मी भी, यद्यपि वे स्वर्गदूतों के समान धर्मी दिखाई दें, तो भी परमेश्वर के द्वारा मुफ़्त ही ग्रहण किए जाने चाहिए।
परन्तु यहाँ एक आपत्ति इस प्रकार उठ सकती है: क्यों महाशय? उनमें बड़ा अन्तर है जिन्हें परमेश्वर पहले ही बुला चुका है और जो उससे सर्वथा दूर हैं, और विश्वासी मनुष्य में भी बड़ी भिन्नता है, जब परमेश्वर उसे सही मार्ग पर रख देता है और जब वह उसे उसके अपने स्वभाव की भ्रष्टता पर छोड़ देता है। क्योंकि हम किसी को देखेंगे कि वह बहुत समय तक भटकी हुई और त्यागी हुई भेड़ की नाईं जिया: और अन्त में परमेश्वर उसे अपने सुसमाचार से प्रकाश देता है, और उसे ऐसा छूता और सुधारता है कि मनुष्य उसे, जैसा पवित्रशास्त्र कहता है, नई सृष्टि बनते देखे। और निःसन्देह, हम तब तक सच्चे मसीही नहीं कहे जा सकते जब तक हम उस रीति से नए न किए जाएँ और परमेश्वर की रचना न बनें, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में सृजे गए हैं: उन भले कामों के लिए जो परमेश्वर ने पहले से तैयार किए हैं: यह सब, मैं कहता हूँ, उसमें होना चाहिए। परन्तु इसमें कुछ असंगति दिखाई दे सकती है।
परमेश्वर ने उस फाँसी पर टँगे चोर को धर्मी ठहराया क्योंकि उसने अपना उद्धार यीशु मसीह में माना: और जब वह धर्मी ठहराया गया, तो क्या उसमें पहले से कोई भिन्न गुण था? हाँ, निश्चय। तो फिर हम यह क्यों कहते हैं कि मुफ़्त की धार्मिकता का असर हमारे सारे जीवन भर रहता है? वास्तव में विश्वासी मनुष्य कम से कम इतना तो चाहेगा कि अपने आप को परमेश्वर की आज्ञाकारिता की सीमा में रखे, वह अपने पापों से अप्रसन्न होगा, हाँ, उनके लिए कराहेगा और शोक करेगा, और उसकी मुख्य अभिलाषा यह होगी कि अपना जीवन व्यवस्था के अनुसार ढाले। अब जब विश्वासी मनुष्य यहाँ तक पहुँच चुका है, तो हमें यह नहीं कहना चाहिए कि वह वैसे ही धर्मी ठहराया जाता है जैसे आरम्भ में, क्योंकि तब वह उच्छृंखल मनुष्य था और परमेश्वर से सर्वथा दूर था। इसका हम यह उत्तर देते हैं: जब परमेश्वर पहले-पहल हमें धर्मी ठहराता है, अर्थात् जब वह हम पर दया करता और हमें उस दण्ड-आज्ञा से निकाल लेता है जिसमें हम थे, तब वह सामान्य क्षमा का प्रयोग करता है: और जब वह बाद में हमें धर्मी ठहराता है, तब वह उन उपकारों को स्वीकार करता है जो उसने हम पर किए हैं, और उन्हें अपना कहता और मानता है, क्योंकि वह अपने आप का इन्कार नहीं कर सकता: और जब वह हमें अपने पवित्र आत्मा से चलाता है, तो यद्यपि पाप हममें बसता है, फिर भी वह हममें राज्य नहीं करता, जैसा लिखा है, “जो भलाई हम चाहते हैं वह यद्यपि नहीं करते, तो भी करने का यत्न करते हैं।” और इसलिए परमेश्वर उसे मानता और उससे प्रसन्न होता है क्योंकि वह उसी से आता है: परन्तु यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि वह हमें हमारे व्यक्तित्व में भी और हमारे कर्मों में भी केवल विश्वास से धर्मी ठहराता है। क्योंकि जब वह पहले-पहल हमें ग्रहण करता है, तो वह हममें किसी कर्म को धर्मी नहीं ठहरा सकता। और ऐसा क्यों? क्योंकि वे सब दुष्ट हैं। क्योंकि जैसा हम पहले कह चुके हैं, सड़ा हुआ पेड़ क्या फल ला सकता है? और इसलिए जब परमेश्वर अभागे पापियों को, जो उसके राज्य और कलीसिया से निर्वासित और निकाले गए हैं, अपनी ओर खींचता है, तो वह उनके कर्मों को धर्मी नहीं ठहराता: परन्तु उनकी दुर्दशा को देखकर और उनके विनाश पर तरस खाकर, देखिए, इसी कारण वह उन्हें धर्मी ठहराता है।
अब उन्हें ग्रहण कर लेने के बाद वह उन्हें उनके व्यक्तित्व में धर्मी ठहराता है, अर्थात् उन्हें अपनी सन्तान के रूप में स्वीकार करता है, और उसके बाद वह उनके कर्मों को धर्मी ठहराता है: और यह वह कैसे करता है? निस्सन्देह, उन्हें लेखा देने को बुलाकर नहीं, न कठोरता से उनका न्याय करके: क्योंकि, जैसा मैंने कहा है, उनके बीच सदा कुछ भ्रष्टता, या कुछ चूकें और फिसलनें और ऐसी ही बातें रहेंगी जो सब बिगाड़ देंगी। क्योंकि यदि कोई मनुष्य संसार की सबसे उत्तम दाखमधु किसी बेस्वाद पीपे में या सड़ी बोतल में डाल दे, तो दाखमधु सब बिगड़ जाएगी। हमारे सब कर्मों का भी यही हाल है: क्योंकि जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हमें मार्ग दिखाता और चलाता है, वे भले, पवित्र और सराहनीय हैं: परन्तु देखिए हम कैसे पात्र हैं, निश्चय अत्यन्त मलिन और भ्रष्ट। हमारे कर्म भी वैसे ही हैं, और इसलिए परमेश्वर को उन्हें शुद्ध और निर्मल करना होगा। और यह कैसे? निश्चय अपने अनुग्रह से, उनमें जो दोष और अपूर्णताएँ हैं उन्हें क्षमा करके।
इसलिए जैसे विश्वासी मनुष्य में, और उसमें जिसे परमेश्वर आरम्भ में सुसमाचार की ओर बुलाता है, भिन्नता है, वैसे ही धर्मी ठहराए जाने में भी कुछ भिन्नता है। परन्तु इस विषय में वह नहीं बदलता, अर्थात् यह कि परमेश्वर सदा अपनों को मुफ़्त धर्मी ठहराता है, अर्थात् वह उन्हें ग्रहण करता है, उन सद्गुणों के कारण नहीं जो उनमें अपने आप हैं, क्योंकि उनमें तो कोई है ही नहीं, और न उनके कारण जो उसने उन्हें दिए हैं: क्योंकि उनमें जो निर्बलता है उसके कारण वे दोषी ठहराए जाने के योग्य हैं। परन्तु इसलिए कि जैसा सन्त पौलुस कहता है, “जिन्हें उसने चुना, उन्हें धर्मी भी ठहराया।” तो यहाँ हम सार रूप में देखते हैं कि इस प्रश्न की गति के विषय में हमें क्या थामे रखना है।
अब हमें यह ध्यान देना है कि इसके अतिरिक्त जो पोपवादी कल्पना करते हैं कि हम अंशतः धर्मी ठहरने को पा सकते हैं, वे अपने प्रायश्चित्तों में भी बहुत मोटे तौर पर धोखा खाए हुए हैं, मूल से ही धोखा खाए हुए, और मैं कहता हूँ इस में अन्धे भी हैं कि वे अपने आप में कुछ ऐसे सद्गुण समझते हैं जिन्हें परमेश्वर को मानना और पसन्द करना चाहिए। परन्तु वास्तव में वे यह कहने में लजाते हैं कि उनके कर्म योग्यता अर्जित करते हैं, पर यह कि उनमें कुछ सम्भावना है: क्योंकि, वे कहते हैं, यद्यपि वे पूरी तरह योग्यता अर्जित नहीं करते, तो भी उचित है कि परमेश्वर, जो न्यायी है, उस भलाई को स्वीकार करे जो वे करते हैं। हाँ, परन्तु वे अपनी धार्मिकता में इतने अन्धे हो गए हैं कि वे अपने पापों को नहीं समझते, जैसा हम पहले कह चुके हैं: फिर दूसरे, वे इसलिए धोखा खाए हैं कि वे अपने आप को अपने प्रायश्चित्तों से मुक्त करने के योग्य समझते हैं। मैं यहाँ यह कहना टाल दूँगा कि उनके प्रायश्चित्त क्या हैं, क्योंकि वे अत्यन्त मूर्खतापूर्ण हैं, जिनसे वे अपने विरुद्ध परमेश्वर के भारी क्रोध को भड़काने के सिवा कुछ नहीं करते, यह सोचते हुए कि वे उसे मलिन खिलौनों और तुच्छ वस्तुओं से, अर्थात् अपने ही मन से गढ़ी हुई अन्धविश्वासी बातों से चुका देंगे: क्योंकि हम कौन-सा प्रायश्चित्त कर सकते हैं जो हमें परमेश्वर के न्याय से छुड़ाए? और एक पाप करने का मूल्य कितना है? सचमुच हम सोचते हैं कि जब हमने परमेश्वर की धार्मिकता का उल्लंघन किया है, और उसके लिए कुछ थोड़ा-सा भाग चुका दिया है, तो हमने पर्याप्त किया। क्या हमें यह न समझना चाहिए कि जब हम इस प्रकार घमण्डी बन जाते हैं तब शैतान हमें पूरी तरह वश में किए हुए है?
अब पोपवादी शिक्षा का सबसे बड़ा भाग यही है, कि जब हम दण्ड पाने के योग्य थे तब क्षमा किए जाएँ। और यह इसी से निकलता है कि वे सोचते हैं कि उन्हें अपने कर्मों से धर्मी ठहरना चाहिए: और इसलिए वे कहते हैं कि यह केवल अनुमान की बात है, क्योंकि वे देखे बिना नहीं रह सकते कि यदि हम अपनी जाँच करें तो अन्त में कम पड़ जाएँगे, और न हमारे पास वह होगा जो परमेश्वर के सामने अपना हिसाब पूरा करने और यह कहने के लिए आवश्यक है कि हम बरी किए गए हैं। परन्तु इस अनुमान के अतिरिक्त उनके सिर में एक और मूर्खतापूर्ण खिलौना है, और वह यह है: वे कहते हैं, यदि यह सच होता कि परमेश्वर आज हम पर कृपालु है, तो हो सकता है कि वह कल ऐसा न हो। अब वे कभी नहीं सोचते कि विश्वास के साथ सदा आशा रहती है, और आशा जीवन और मृत्यु दोनों में फैली रहती है। और हम यह भी देखते हैं कि इसके अतिरिक्त एक कहीं बड़ा दोष है, और वह यह कि वे मृत्यु की अन्तिम घड़ी की ओर कभी देखते ही नहीं, जिसके विषय में हम (परमेश्वर चाहे तो) आगे बोलेंगे। इसलिए इस समय हम उसी को आगे बढ़ाएँगे जो हमने आरम्भ किया था, अर्थात् वे यह सोचते हैं कि परमेश्वर को सन्तुष्ट और शान्त कर लेंगे, जब वे उन पापों और अधर्मों के लिए जो उन्होंने किए हैं कुछ प्रतिफल साथ लाते हैं। इसमें वे परमेश्वर से उसका सम्मान छीन लेते हैं: क्योंकि यदि ऐसा होता, तो वह अकेला हमें अपने पिता परमेश्वर से मिलाने के लिए पर्याप्त न होता। अब वह हमारा छुटकारा-मूल्य कहलाता है, यह बिना कारण नहीं: क्योंकि वह इसी शर्त पर हमारा जमानती बना कि उसने हमारे ऋण पूरे और सम्पूर्ण रूप से चुका देने का भार अपने ऊपर लिया। और इसलिए जो कोई अब यह ठान ले कि वह परमेश्वर को चुकाएगा, वह यीशु मसीह का पद हड़पता है, जो अत्यन्त घृणित दुरुपयोग है। फिर भी पोपवादी अपना उद्धार इसी पर खड़ा करते हैं। परन्तु इस सबके बावजूद वे बहाने बनाकर कहते हैं कि यद्यपि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने पाप और उसके दण्ड दोनों की क्षमा प्राप्त कर ली है, तो भी यह आरक्षित है: यद्यपि वे स्पष्टतः अपना ही खण्डन करते हैं। क्योंकि दूसरी ओर वे कहते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए योग्यता अर्जित नहीं की, परन्तु योग्यता का अवसर है। अब जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वे कहेंगे कि हम स्वभाव से ऐसे बुरे और अत्यन्त दुष्ट हैं कि हम कुछ ऐसा नहीं कर सकते जिसे परमेश्वर ग्रहण करे: पर कहते हैं कि जब यीशु मसीह आगे चलता है, तो वह हमें योग्यता का अवसर देता है, और इसे वे पहली योग्यता कहते हैं, ताकि वे उसे कुछ थोड़ा-सा टुकड़ा या छोटा भाग देते हैं, और हमें मुख्य भाग। अब यदि ऐसा है कि यीशु मसीह ने केवल योग्यता का अवसर अर्जित किया है, अर्थात् यह कि हमें उसके द्वारा स्वर्ग में पहुँचना है, तो अनिवार्य निष्कर्ष यह निकलेगा कि हम पाप के लिए भी और दण्ड के लिए भी सदा परमेश्वर के ऋणी रहेंगे। और यह भयंकर घृणित बात है, जब पोपवादी अपने प्रायश्चित्तों से परमेश्वर के सामने अपने आप को इस प्रकार मुक्त कर लेने का साहस करते हैं।
और इसके अतिरिक्त, जैसे एक बुराई दूसरी को खींच लाती है, वैसे ही वे अपने आप को एक अत्यन्त थका देनेवाली भूलभुलैया में धकेल देते हैं: क्योंकि वे भली-भाँति जानते हैं कि यदि हम अपनी सामर्थ्य से सौ गुना अधिक करने का भी जोर लगाएँ, तो भी हम अपने पापों के लिए परमेश्वर को किसी प्रकार सन्तुष्ट और तृप्त नहीं कर सकते। और ऐसा क्यों? क्योंकि जो हमें करना चाहिए उसमें हम इतने कम पड़ जाते हैं कि वह अत्यन्त भयानक है। और दाऊद कहता है, “कौन अपनी भूलों को जान सकता है?” और इसलिए यद्यपि हम प्रायश्चित्त करने में कितना ही परिश्रम करें, फिर भी पोपवादियों को यह कहने को विवश होना पड़ेगा कि हम उनका अन्त कभी नहीं कर पाएँगे। फिर भी उनमें एक तीसरी भूल भी है, अर्थात् उनके क्षमा-पत्र और पूर्ण पापमोचन की क्षमाएँ, जो उनके पापों की क्षमा के लिए खरीदी जाती हैं। और फिर भी वे यह पर्याप्त नहीं समझते कि उनके पास ये क्षमा-पत्र हैं, परन्तु उन्हें अपना शुद्धिकरण-स्थान भी चाहिए ताकि वे उससे अपना मुँह भर सकें, सब कुछ के लिए, जिससे वे भूलों में ऐसे उलझे हैं कि उन्हें पता नहीं कि उनमें से अपने आप को कैसे निकालें। क्योंकि जब वे एक साथ पवित्रशास्त्र की शुद्ध सरलता से भटक गए हैं, तो शैतान ने उन्हें ऐसे जालों और फन्दों में फँसा और जकड़ लिया है कि वे उनसे कभी निकल नहीं सकते। इसलिए हमें इस शिक्षा को और भी अधिक परिश्रम से सुनना चाहिए जो सब प्रायश्चित्तों को बहिष्कृत करती और हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के पास भेजती है, कि जो हममें घटी है उसे हम उसमें पाएँ।
इसके अतिरिक्त, इस बिन्दु को भली-भाँति समझने के लिए हमें यह ध्यान देना है कि परमेश्वर के केवल अनुग्रह से उद्धार पाने और विश्वास के हमारे लिए धार्मिकता गिने जाने का क्या अर्थ है, और यह तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम मृत्यु के द्वार पर न पड़े हों: क्योंकि जब पोपवादी अपनी योग्यताओं, प्रायश्चित्तों और क्षमा-पत्रों की बात करते हैं, तो वे जैसे चाहें बकवास और बड़बड़ करें: परन्तु जब कपटी लोग परमेश्वर के विरुद्ध ऐसे मतवाले और कठोर हो जाते हैं कि सारे जीवन चमत्कारों और अचम्भों पर विश्वास करने लगें, तो शैतान थोड़े ही समय बाद उन्हें अच्छी तरह हटा देता है, जब उन्हें सचमुच न्यायी के सामने आना पड़ता है। क्योंकि हम देखते हैं कि हम कितने मूढ़ हैं, और जब तक परमेश्वर हमें जीवन देना चाहे, हम उसे ऐसा समझ लेते हैं जैसा हमें भाता है, और जैसे चाहते हैं उसे बदल देते हैं: परन्तु जब हमें इस जीवन से विदा होना और उसके न्याय-आसन के सामने आना होगा, जिससे स्वर्गदूत स्वयं डरते और थरथराते हैं, हाय, तब हम, अत्यन्त दीन नश्वर प्राणी, क्या करेंगे? और इसलिए जब हम विश्वास के इस निश्चय की बात करते हैं, तो प्रश्न केवल परमेश्वर की कलीसिया में हमारे प्रवेश का नहीं है, वरन् हमारी आशा अजेय होनी चाहिए, कि शैतान की सब परीक्षाओं से लड़े, पर विशेषकर जब हमें परमेश्वर के सम्मुख उत्तर देने आना होगा, तब हमें उन सब भयों के विरुद्ध जिनसे हम हिलाए और धकेले जा सकते हैं दृढ़ और अटल खड़े रहना है। और यह कोई सैद्धान्तिक कल्पना नहीं, वरन् व्यवहार की शिक्षा है। यह सच है कि पवित्रशास्त्र हमें सिखाए, परन्तु केवल तब तक जब तक परमेश्वर वास्तव में हमारे लिए दिन ठहरा न दे, और हमारे विवेक स्वर्गीय न्यायी का दण्ड-वचन सुनने के लिए उपस्थित होने को बाध्य न हो जाएँ। इसमें सन्देह नहीं कि इस विषय पर तर्क करते हुए हम इसे खेल ही बना लेंगे। परन्तु इसका व्यवहार, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें दूसरी ही शिक्षा सिखाएगा कि यह क्या है, अर्थात् हमें पूर्ण रूप से अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह की शरण में भागना है, और यह समझकर कि वह हमारा वकील है, अपने आप को निश्चय दिला सकते हैं कि परमेश्वर हमारे साथ न्याय में प्रवेश नहीं करेगा। और ऐसा क्यों? क्योंकि हम अपने दोषारोपण-पत्र के मसौदे के अनुसार नहीं, वरन् अपने सब पापों और अधर्मों को दूर कर देने के द्वारा क्षमा किए जाते हैं। और यही वह बात है जो हमें इस विषय में स्मरण रखनी है।
अब ऐसा प्रतीत होगा कि हम पूर्णतः धर्मी नहीं हो सकते, यदि हमारी धार्मिकता केवल विश्वास में है: क्योंकि हमारा विश्वास, जैसा हम पहले कह चुके हैं, जब तक हम यहाँ जीते हैं सदा दुर्बल रहेगा। और इसलिए यह कैसे सम्भव है कि हम परमेश्वर के सम्मुख पूर्ण रूप से धर्मी हों? क्योंकि परिणाम कारण से बढ़कर नहीं हो सकता। क्योंकि यदि हमारे पास केवल आधा सूर्य होता, तो हमारे पास उतना प्रकाश न होता जितना अब है; और इसलिए हमारे पास पूरा सूर्य होना चाहिए ताकि उसकी किरणें सारे संसार में फैल सकें। इसलिए जब हममें विश्वास ऐसा दुर्बल है, तो ऐसा प्रतीत होगा कि हम परमेश्वर को केवल अंशतः ग्रहणयोग्य हैं, और इसके विपरीत यह कि वह हमसे प्रसन्न नहीं: फिर भी यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि हम विश्वास की सामर्थ्य और गुण से धर्मी नहीं ठहरते; और न हमें उसे ऐसा सिद्ध समझना चाहिए कि कहें कि उसी से हमारा उद्धार सिद्ध है। क्योंकि ठीक-ठीक कहें तो हमें धर्मी ठहरानेवाला केवल परमेश्वर है, जैसा हमने रोमियों के आठवें अध्याय से सुना है। और यही वह धर्मी ठहराया जाना है जिसकी चर्चा सन्त यूहन्ना अपने तीसरे अध्याय में करता है, अर्थात् “कि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र न छोड़ा, इसलिए कि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश करे।” इस प्रकार हम देखते हैं कि ठीक-ठीक कहें तो हमें धर्मी ठहरानेवाला केवल परमेश्वर है: जो सन्त पौलुस के कुरिन्थियों के नाम दूसरी पत्री के पाँचवें अध्याय के उस कथन से मेल खाता है, जो कहता है, “कि परमेश्वर मसीह में होकर जगत को अपने साथ मिला रहा था, और उनके अपराधों को उनके विरुद्ध गिन नहीं रहा था, क्योंकि यीशु मसीह को जो पाप से अज्ञात था, उसने हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।” यहाँ हम देखते हैं कि सन्त पौलुस पहले यह दिखाता है कि परमेश्वर हमें कैसे धर्मी ठहराता है, अर्थात् यह कि वह हमारे पापों को हमारे विरुद्ध नहीं गिनता।
और शब्द की परिभाषा के विषय में इतना ही। फिर भी हमें सिखाया जाता है कि हमें धर्मी ठहराना परमेश्वर का अपना ही कार्य है। क्योंकि वह कहता है कि वह यीशु मसीह में जगत को अपने साथ मिला रहा था, और इसके अतिरिक्त, वह हमारी धार्मिकता है, अर्थात् वह हमें ग्रहण करता और हमसे प्रसन्न होता है: तो फिर यह क्यों कहा जाता है कि विश्वास धर्मी ठहराता है? निस्सन्देह इसी रीति से: क्योंकि यदि हम मुख्य कारण की ओर देखें, और ढूँढ़ें कि हमारे उद्धार का कर्ता कौन है, तो हम फिर भी कहेंगे कि परमेश्वर अपनी केवल भलाई से हमें धर्मी ठहराता है क्योंकि वह हम पर दया करता है, हमारे पापों को नहीं गिनता, वरन् हमें क्षमा करता है। अब यीशु मसीह भी अपनी ओर से हमें धर्मी ठहराता है क्योंकि वही हमारे धर्मी ठहराए जाने की सच्ची सामग्री है। तो हम उसे कहाँ खोजें? उसके लहू के धोने में जो उसने हमारे लिए बहाया, उस बलिदान में जो उसने हमारे पापों के प्रतिफल के लिए चढ़ाया, इसमें कि उसने पूर्ण आज्ञाकारिता निभाई, इस रीति से कि हमारे सब अपराध गाड़ दिए और मिटा दिए गए हैं, क्योंकि वह हमारे लिए पवित्र ठहराया गया, जैसा सन्त यूहन्ना के सत्रहवें अध्याय में कहा गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि यीशु मसीह हमें किस रीति और किस प्रकार धर्मी ठहराता है। अब जब कहा जाता है कि विश्वास हमें धर्मी ठहराता है, तो वह उस सामर्थ्य और गुण के कारण नहीं जो उसमें है, और न किसी योग्यता के कारण जो उसमें है।
और इसी में पोपवादी धोखा खाते हैं: क्योंकि वे विश्वास और कर्मों की तुलना करते हैं और कहते हैं, यह कैसे कि विश्वास प्रेम से अधिक धर्मी ठहराता है? क्योंकि सन्त पौलुस कहता है, “कि प्रेम विश्वास से बड़ा है।” यह सच है कि वे इस स्थान को गलत समझते हैं: परन्तु मान लें कि प्रेम विश्वास से अधिक योग्य था। क्योंकि हम अब ऐसे तुच्छ खिलौनों की बात नहीं कर रहे, जैसे यह कहना कि वह संसार का सबसे बड़ा राजा होने के योग्य होगा जो किसी भी किसान या दाख की बारी के माली के समान भूमि में खाद डाल और उसे सँवार सके। और विश्वास का भी यही हाल है, क्योंकि, वह हमें धर्मी नहीं ठहराता, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, अपने आप में किसी उत्कृष्टता के कारण, वरन् इसलिए कि जो हममें घटी है उसे वह यीशु मसीह से उधार लेता है। और इसीलिए सन्त पौलुस कहता है, “कि विश्वास की धार्मिकता कर्मों की सारी धार्मिकता को, और जो कुछ और सांसारिक महिमा है उसे, गिरा देती और निष्फल कर देती है।” और इसलिए पोपवादी इसमें बहुत ही मूढ़ हैं, और हमें अपनी ओर से इसी बिन्दु पर और भी अधिक विश्राम करना है जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं, अर्थात् यह कि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, यानी हमें परमेश्वर के ग्रहणयोग्य बनाने का मार्ग यह है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के लिए खुला मार्ग तैयार रखें, ताकि वह अपनी धार्मिकता हम पर लागू कर सके।
तो यहाँ हम देखते हैं कि विश्वास केवल साधन और उपकरण है: परन्तु परमेश्वर कारण और कर्ता है, और सारी स्तुति हमारे प्रभु यीशु मसीह की है, जो उसकी सच्ची और यथार्थ सामग्री और सार है। और यही वह है जो हमें यहाँ स्मरण रखना है। और इसके फलस्वरूप हम यह भी देखते हैं कि पोपवादी बहुत ही मूर्खता से यह बहाना बनाते हैं कि विश्वास स्वयं एक कर्म है, और यदि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं तो कर्म बहिष्कृत नहीं होते। और अपनी बात सिद्ध करने के लिए वे वह उद्धृत करते हैं जो सन्त यूहन्ना के छठे अध्याय में लिखा है, “परमेश्वर का कार्य यह है कि तुम उसके एकलौते पुत्र पर विश्वास करो।” अब यीशु इस स्थान में विश्वास को कर्म कहता है, मानो वह कहता हो, देखो तुम्हें किस ओर लक्ष्य करना और अपना सारा अध्ययन लगाना है: क्योंकि प्रश्न यह नहीं कि कर्म योग्यता अर्जित करे। और इसके अतिरिक्त, यदि हम मान भी लें कि विश्वास एक कर्म है, जो वास्तव में वह नहीं है, तो भी वह हमारे किए हुए कर्म के रूप में धर्मी नहीं ठहराता: क्योंकि यदि मैं दान दूँ और उससे परमेश्वर के सम्मुख योग्यता कमाने का ढोंग करूँ, तो देखिए मैं अपने कर्मों से कैसे धर्मी ठहरूँगा: यदि मैं अपने पड़ोसी की सहायता करूँ और इसके या उसके भले के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार परिश्रम करूँ: देखिए मैं अपने कर्मों से कैसे धर्मी ठहरूँगा। अब विश्वास में तर्क बिलकुल उलटा है: क्योंकि यह मानकर कि हम सब श्रापित हैं, और विश्वास से हम वह ग्रहण करते हैं जो परमेश्वर हमें देता है, हम अपनी ओर से कुछ साथ नहीं लाते, वरन् खाली हाथ उसके पास आते हैं।
इसलिए विश्वास धर्मी ठहराता है, परमेश्वर के पास कोई योग्यता या गुण लाने के द्वारा नहीं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर यीशु मसीह से वह ग्रहण करता है जो वह हमारे नाम पर उसके सामने प्रस्तुत करता है।
और यह अंगीकार पहले होना चाहिए, कि उनमें जो ऐसा मार्ग अपनाते हैं कुछ नहीं है, अर्थात् परमेश्वर के हाथों से उस धार्मिकता की माँग करना जिससे वे सर्वथा रिक्त हैं। और इसलिए हम देखते हैं कि पोपवादी इसमें बहुत मूर्खता करते हैं, जब वे कहते हैं कि यदि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं तो हम किसी कर्म से धर्मी ठहरते हैं। अब विश्वास वह बलिदान है जिससे परमेश्वर प्रसन्न होता है, क्योंकि उससे उसका आदर होता है, और जो अकेला ही धर्मी और भला है उसे स्तुति और धन्यवाद दिया जाता है: फिर भी हम उसकी सामर्थ्य और गुण से धर्मी नहीं ठहरते। संक्षेप में, जब परमेश्वर हमें विश्वास से धर्मी ठहराता है, तो इस धर्मी ठहराए जाने में वह अनुग्रह निहित है जो वह हम पर करता है, क्योंकि वह उस निर्बलता को नहीं देखना और ताकना चाहता जो हमारे विश्वास में है।
तो विश्वास धर्मी ठहराता है, पर इस रूप में कि वह त्रुटिपूर्ण और अपूर्ण है, और फिर भी उसी में वह धर्मी ठहराता है। यह कैसे हो सकता है, जबकि वह त्रुटिपूर्ण और अपूर्ण है? हाँ, भली-भाँति हो सकता है: क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, विश्वास से ऐसी कोई बात अपेक्षित नहीं कि वह स्वयं धर्मी ठहराने की सामर्थ्य रखे, परन्तु वह केवल वह ग्रहण करता है जो परमेश्वर की ओर से इसके लिए उसे दिया जाता है। और इसलिए यदि हमारे पास विश्वास की छोटी-सी चिनगारी भी हो, जैसा कहते हैं, इस निष्कर्ष के साथ कि हममें कोई जीवन नहीं सिवा उसके जो हमें यीशु मसीह में है: और कि सारी परिपूर्णता उसी में है, जिससे हम वह खींचते हैं जो हमारे पास है, और जिससे हम भरे जाते हैं, तो निःसन्देह हमारे पास पर्याप्त है। इसलिए आइए हम अपने प्रभु यीशु मसीह पर ऐसा विश्वास करना सीखें कि जब भी हम सन्देह में पड़ें, तो भी उसकी उस दया के अधीन होना कभी न छोड़ें जो कभी विफल नहीं हो सकती, और निरन्तर उसकी शरण में भागें, भली-भाँति जानते हुए कि धार्मिकता की सारी सिद्धता उसी में है, और ऐसी भी है कि हम उसके भागी बनाए जाएँगे, और यद्यपि हमारे पास विश्वास की केवल छोटी-सी बूँद ही हो, जैसा सन्त पौलुस कहता है, और हम अपने भीतर के भ्रष्टता और पाप के इस विशाल ढेर से घिरे और लदे हों, जो अपने साथ मृत्यु के सिवा कुछ नहीं लाता, फिर भी यदि यीशु मसीह हममें है, तो जीवन है: अर्थात् हमारे शरीर की शेष निर्बलताएँ और भ्रष्टता, और जो कुछ और हमारे उद्धार में बाधा बन सकता है, सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के आत्मा के द्वारा मिटा दिया जाएगा; यदि हमारे पास कितना ही थोड़ा अंश हो, तो भी हम निश्चय सदा जीवित रहेंगे।
अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने पापों को मानते हुए, उससे बिनती करते हुए कि वह हमें वह सामर्थ्य और गुण अनुभव कराए जो उसने अपने एकलौते पुत्र को दिया है, ताकि हम उसके द्वारा खिंचकर पूरी तरह उससे लिपट जाएँ। और कि हम उस भरोसे के अधीन इकट्ठे होना सीखें जो उसने हमें अपने में दिया है, अपनी सब निर्बलताओं से लड़ते हुए, और इस बीच, कि हममें सब घमण्ड और अहंकार गिरा दिया जाए, और हममें इसके सिवा और कुछ न रहे कि यह मानें कि जैसे वह धर्मी है, वैसे ही उसी का काम है कि अपनी धार्मिकता हम पर उँडेले, ताकि हम उसके फल का आनन्द लें, अर्थात् स्वर्गीय जीवन का उत्तराधिकार। और कि वह न केवल, इत्यादि।
