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मलिकिसिदक के इतिहास पर पहला उपदेश
जिसमें अब्राम द्वारा लूत के छुड़ाए जाने का भी वर्णन है।
उत्पत्ति अध्याय 14। 13 तब एक जन जो बचकर भाग आया था, उसने अब्राम इब्री को, जो एमोरी ममरे के बांज वृक्षों के बीच रहता था और एशकोल और आनेर का भाई था, यह समाचार दिया; ये लोग अब्राम के संधि करनेवाले थे।
14 जब अब्राम ने सुना कि उसका भाई बन्दी बना लिया गया है, तब उसने अपने घर में जन्मे और पले हुए तीन सौ अठारह जनों को लेकर दान तक उनका पीछा किया।
15 तब वह और उसके दास रात को उनके विरुद्ध टुकड़ियों में बँटकर उन पर टूट पड़े और उन्हें मारा, और होबा तक, जो दमिश्क की बाईं ओर है, उनका पीछा किया।
16 और उसने सारा माल वापस छीन लिया, इत्यादि।
आज हमें उसी इतिहास को आगे बढ़ाना है जिसे हमने कल लूत के छुड़ाए जाने के विषय में आरम्भ किया था। और पहले हम देख सकते हैं कि अब्राम पर परमेश्वर की कितनी बड़ी भलाई और कृपा थी कि उसने उसे लूत के छुड़ाने के साधन दिए। और ध्यान दो कि मूसा विशेष रूप से यह क्यों कहता है (कि जो बचकर भाग आया था, उसने अब्राम इब्री के पास आकर समाचार दिया)। यह सच है कि यह शब्द निन्दा के रूप में नहीं कहा गया है, क्योंकि वहाँ एबेर का कुल इसी नाम से पुकारा जाता था; और एबेर शेम का वंशज था (जैसा हम पहले बता चुके हैं); सो परमेश्वर ने अब्राम को इस रीति से अलग कर रखा था कि वह कनानियों के बीच कलंकित या अशुद्ध न हो। तौभी जो कुछ हो, मूसा ने उसे यह उपाधि इस प्रकार दी मानो कहता हो, तू तो कनान देश में केवल परदेशी और नया आया हुआ अतिथि है। और फिर यह कोई आश्चर्य नहीं कि उसकी कुछ गिनती न की गई क्योंकि वहाँ न उसके कुटुम्बी थे, न मित्र। तौभी परमेश्वर ने उसे ऐसी कृपा और विशेषाधिकार दिया कि जब समय और स्थान ने साथ दिया, तो उसे अपने भतीजे पर पड़ी विपत्ति की सूचना मिल गई, कि वह उसे छुड़ाने में सहायता कर सके।
अब मूसा यह जोड़ता है कि वह अपने कुछ पड़ोसियों से संधि में था। फिर भी हम देखते हैं कि कुछ ही समय पहले उसे इधर-उधर, एक स्थान से दूसरे स्थान भटकना पड़ा था, क्योंकि सब कहीं उसके साथ अशिष्ट व्यवहार हुआ; क्योंकि वह जहाँ कहीं गया, उसे सदा बुरा ही मिला। सचमुच परमेश्वर ने उसे परखने के लिए आज्ञा दी थी कि वह देश में दूर-दूर तक घूमे, यद्यपि इससे पहले वह आवश्यकता के कारण ऐसा करने को विवश हो चुका था। अब इसमें सन्देह नहीं कि उसके गुणों ने उसे ऐसी साख और अधिकार दिला दिया था कि वह उनके बीच स्वीकार किया गया; हाँ, उस देश के प्रमुख लोग भी उसे अपना मित्र समझते थे और परस्पर एक होने के लिए उससे संधि करते थे। तौभी यह निश्चित है कि संसार के सब गुण भी कभी-कभी मनुष्य को ऐसा कोई भला फल नहीं दे सकते, जब तक उनके साथ ये दो बातें न मिलें: एक यह कि जो लोग धर्म और खराई से चलते हैं, वे पहले अपने जीवन को परमेश्वर के वचन के निर्धारित नियम के अनुसार ढालेंगे, और जब तक वे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तब तक अपने पड़ोसियों के प्रति मानवीय स्नेह भी दिखाएँगे, और इस प्रकार बहुत बार अपने लिए शान्ति मोल लेंगे और उन लोगों की द्वेषभावना को रोक देंगे जो अन्यथा उन्हें दुःख देने और सताने को तैयार रहते। और सचमुच सन्त पतरस ने इसी विषय पर बात करते हुए, जब वह सेवकों को भले काम करने और जिनकी सेवा करने को वे बँधे हैं उनकी सेवा करने का उपदेश देता है, कहता है: कि इस प्रकार वे ऐसी कृपा पाएँ कि न मारे जाएँ और न उनसे कठोर व्यवहार किया जाए। तौभी (वह कहता है) जो कुछ हो, यदि तुम भले काम करके दुःख उठाओ और अन्याय सहो, और अपने ही विवेक की गवाही से उसे धीरज से सह लो, तो तुम परमेश्वर के सम्मुख धन्यवाद के योग्य हो। और यही बात है जो हमें यहाँ इस स्थान पर ध्यान में रखनी है।
अब दूसरी बात यह है कि परमेश्वर उन सब को आशीष देता है जो इस प्रकार धर्म से चलते हैं, और मनुष्यों के हृदयों को उनके प्रति कोमल कर देता है। सो जब हम यहाँ सुनते हैं कि अब्राम के साथ कुछ लोग संधि में थे, तो इसमें सन्देह नहीं कि यह सहज ही देखा जा सकता है कि वे या तो ऐसे लोग थे जो पहले उसे बिलकुल पसन्द नहीं करते थे, या ऐसे प्रकार के लोग थे जो उपद्रव और लूट-पाट पर जीना चाहते थे; क्योंकि सचमुच ऐसे लोग उसके साथ मिलने के लिए काफ़ी तैयार थे। तौभी सच कहें तो उनका यह गठबन्धन केवल कुछ समय तक ही रहनेवाला था। क्योंकि यह निश्चित है कि अब्राम उन लोगों से कभी संगति न रखता जिन्हें परमेश्वर ने पहले ही दोषी ठहरा दिया था, यद्यपि उसने उनके दण्ड को रोक रखा था; और यह प्रतिज्ञा के भी विरुद्ध होता। इसलिए अब्राम सदा दृढ़ भूमि पर खड़ा रहा, क्योंकि वह अपने से की गई आशीष की प्रतिज्ञा को घटाना नहीं चाहता था। तौभी जो कुछ भी हो, उसने उनसे संधि करने से कभी इनकार नहीं किया, क्योंकि इस प्रकार वह शान्ति से रह सकता था और मानो उनके बीच शिकार और लूट न बने। इससे हमें चिताया जाता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि हम मनुष्यों के साथ इस रीति से व्यवहार करें, चाहे वे हमें मानो तीखे काँटे बनकर चुभें, हमारा तिरस्कारपूर्वक अपमान करें, और हमारे साथ द्वेष और कठोरता से पेश आएँ, तौभी हम झुकें, ताकि वे देखें कि हम शान्ति और उनकी भलाई के उपाय के सिवा और कुछ नहीं चाहते। और चाहे वे हर सम्भव उपाय से हमें हानि पहुँचाने और हमारे साथ अन्याय करने का यत्न करें, तौभी हम इस आशा में स्थिर रहें कि परमेश्वर उनके शापित और विषैले हृदयों को बदल देगा, या उन पर ऐसा लगाम लगाएगा कि यद्यपि हम फाड़नेवाले भेड़ियों के झुण्ड के बीच भेड़ों के समान हों, तौभी इस स्वर्गीय चरवाहे के हाथ से हमारी रक्षा और हमारा बचाव होगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि इससे हमें क्या सीखना है।
अब युद्ध का कारण हमारे सामने फिर रखा गया है, कि अब्राम ने अपने कुटुम्बी को बन्दी देखकर हथियार उठा लिए। उन्होंने इससे बहुत पहले उसे उनसे झगड़ने के अनेक अवसर दिए थे; तौभी जो कुछ हानि उन्होंने उसे पहुँचाई थी और जो कुछ घाटा उसे उनके हाथों से उठाना पड़ा था, वह कभी उसे युद्ध करने के लिए प्रेरित न कर सका। उसने वह सब कुछ धीरज से सहा; परन्तु केवल उसके भतीजे की बन्दी-दशा ने उसे इस ओर उभारा। यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि अब्राम के लिए हथियार उठाना उचित था या नहीं; क्योंकि यद्यपि (जैसा हम साधारण कहावत में कहते हैं) रक्त झूठ नहीं बोल सकता, और उसे अपने भतीजे को छुड़ाने की ऐसी लालसा हो सकती थी कि उसे दोष न ठहराया जा सके; तौभी उसे यह एक सामान्य नियम मानकर चलना होगा:
कि किसी भी मनुष्य के लिए हथियार उठाना उचित नहीं।* क्योंकि यह केवल परमेश्वर का काम है। वही है (जैसा सन्त पौलुस कहता है) जो राजाओं और हाकिमों को सज्जित करता है। और जब वह कहता है कि दुष्टों को दण्ड देने का अधिकार और प्रधानता उन्हीं की है, तो वह कहता है, देखो वे तलवार क्यों धरते हैं; इसलिए नहीं कि वे उसे अपनी मनमानी से हड़प लें और जैसा दूसरे लोग चाहें वैसा उससे करें। इसलिए परमेश्वर ही इसका कर्ता होना चाहिए। देखो, मैंने इसीलिए कहा है कि कोई भी मनुष्य बल और हिंसा का प्रयोग तब तक न करे जब तक कि वह उसे उसी से न पाए जिसका यह अधिकार है। और इसलिए राजाओं, हाकिमों और न्यायियों के सिवा कोई नहीं जो हथियार उठा सके, और जिनके साथ लोग मिल सकें। और यह एक ऐसी बात है जिस पर हमें निश्चय के साथ नींव डालनी और स्थिर रहना है:
क्योंकि यदि हर एक पर अन्याय हो और वह मैदान में निकल पड़े तो यह कैसी बात होगी? निःसन्देह इससे सब कहीं भयानक अव्यवस्था फैल जाएगी। फिर सन्त पौलुस हमें मर्यादा में रखने* और धीरज का उपदेश देने के लिए मूसा के उस कथन का हवाला देता है जो उसके गीत में है,* पलटा लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है। इसी पर वह यह निष्कर्ष निकालता है कि हमें क्रोध और रोष को स्थान देना चाहिए। यदि कोई अति और अन्याय हुआ हो तो परमेश्वर बदला लेने का यह काम अपने ऊपर लेता है, क्योंकि उसे दण्ड देना उसी का काम है अब यदि हर कोई इसे अपने ऊपर ले ले और हर एक व्यक्ति बदला लेने के लिए बीच में घुस पड़े, तो निःसन्देह वह मनुष्य परमेश्वर से उसकी महिमा और अधिकार लूटता है, मानो वह उसे पूरी तरह निकाल बाहर करना चाहता हो। इसलिए कि हम क्रोध को स्थान दें, अर्थात् यदि हम चाहें कि परमेश्वर अपने आपको हमारा रक्षक और बचानेवाला प्रकट करे, हमारे शत्रुओं से बदला ले और हमारे युद्ध अपने हाथ में ले, तो हम सब को शान्त और मेल-मिलाप से रहना चाहिए। क्योंकि जो अपने आप को सज्जित करेगा, वह, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर से उस अधिकार को लूटता है जो उसने अपने लोगों की रक्षा के लिए अपने ही हाथ में रखा है। संक्षेप में, निजी व्यक्तियों को न केवल हर प्रकार की हिंसा से दूर रहना चाहिए, परन्तु जब कभी परमेश्वर को उन्हें दीन करना भला लगे, तब सहने के लिए उनका मन शान्त और मेलमिलाप से भरा भी होना चाहिए। और इस बीच* (जैसा सन्त पतरस हमें उपदेश देता है) हमें अपने प्राण और जीवन दोनों को उसके हाथ सौंप देना चाहिए जो उनका रक्षक भी है और स्वामी भी। तौभी हम यहाँ देखते हैं कि अब्राम कैसे स्वीकृत ठहरा (क्योंकि मलिकिसिदक ने उसे आशीष देते हुए कहा कि जो जय परमेश्वर ने उसे दी थी वह उसी के निर्देशन से मिली), यद्यपि वह निजी व्यक्ति ही था, क्योंकि वह न राजा था न हाकिम, परन्तु कनान देश में परदेशी होकर रहता था। फिर भी यहाँ सबसे पहले हमें एक बात पर ध्यान देना है, कि वह पहले ही इस देश का स्वामी और अधिकारी ठहराया और नियुक्त किया जा चुका था। और यद्यपि उसका अधिकार उसे अब तक दिया नहीं गया था, तौभी उस पर उसका हक़ और स्वत्व था। क्योंकि परमेश्वर ने अपने ही मुँह से यह कह दिया था, देख, यह देश तेरा और तेरे वंश का है।* इसलिए अब्राम को औरों के समान नहीं गिना जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने स्वयं उसके सामने साक्षी दी थी कि वह उसे इस देश का अधिकार देता है, यद्यपि वह अभी उसका उपभोग नहीं करता था। अब हमें देखना चाहिए कि अब्राम और दूसरों के बीच क्या भेद है। क्योंकि यदि कोई उत्तर दे और कहे कि यह पर्याप्त नहीं कि वह कालान्तर में उसका वैध स्वामी होनेवाला था; तो इस पर हमें यह ध्यान देना है:
कि यहाँ जो उदाहरण हम पढ़ते हैं वह मूसा के उदाहरण के समान है।* क्योंकि जब मूसा ने उस मिस्री को मार डाला, तब तक लोगों के छुटकारे का समय नहीं आया था। वह तो चालीस वर्ष बाद आया; तौभी मूसा तलवार चलाने से न रुका; और यह नहीं कहा जा सकता कि वह उतावली और मूर्खता से किया गया, क्योंकि परमेश्वर ने उस काम को स्वीकार किया।* और सन्त स्तिफनुस विशेष रूप से यह बताता है कि मूसा ने समझा कि उसके भाई जानते हैं कि परमेश्वर ने उसे इसी के लिए ठहराया है और उसे यह पद सौंपा है। इसलिए मूसा ने इससे प्रकट किया कि वह अपनी ही ओर से उस काम में नहीं घुसा। और सचमुच,* चालीस वर्ष बाद जब परमेश्वर ने उसे बुलाया, तब उसने अपने आपको अयोग्य ठहराया, और उस आयोग से बचने के लिए जितने तर्क और बहाने सम्भव थे सब बनाए। इससे उसने दिखाया कि उसने वह काम किसी दुस्साहस से नहीं किया था; और परमेश्वर ने भी इसमें यह प्रकट किया कि उसने अपने दास को उस काम को अकेले करने देकर इसलिए अलग रखा था कि समय आने पर उसे और बड़े कामों में लगाए। इसलिए परमेश्वर एक बार के लिए अपने दास अब्राम को तलवार का बल चलाने की अनुमति और स्वतन्त्रता दे सकता था, यद्यपि वह अब तक उस देश के अधिकार में नहीं बैठा था जिसकी उसने उससे प्रतिज्ञा की थी। और इसके अतिरिक्त हमें यह भी ध्यान देना है कि परमेश्वर प्रायः अपने दासों को ऐसी विशेष प्रेरणाएँ देता है जिन्हें हमें अपने ऊपर लेकर उनका अनुकरण नहीं करना चाहिए। इसका एक अति उत्तम दर्पण हमारे देखने के लिए न्यायियों की पुस्तक में है; क्योंकि वह पुस्तक कुछ ऐसे पुरुषों की चर्चा करती है जिन्हें परमेश्वर ने अपने लोगों की सहायता के लिए उठाया था; वे सब हमारे लिए इतनी ही साक्षियाँ हैं कि हम यह न समझें कि जब कोई एक मनुष्य तलवार और अधिकार से सज्जित हो तो उसका चुनाव सदा निश्चित और पक्का होता है।
क्या गिदोन निश्चय जानता था कि वह चुना गया है? नहीं, निश्चय ही नहीं। न शिमशोन, और न शेष किसी ने। मुझे उनमें से तीन-चार का ब्योरा देने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जितनों की वहाँ चर्चा है वे सब परमेश्वर के चुने हुए थे, तौभी वे स्वयं इसे नहीं जानते थे। हम देखते हैं कि गिदोन कैसे सन्देह में पड़ा और बड़ी उलझन में था; इसलिए उसने चाहा कि परमेश्वर उसे अपने बुलावे का प्रत्यक्ष चिह्न दे; और कोई सोचता कि जब उसे वह वस्तु मिल गई जो उसने माँगी थी, तो उसका साहस दुगुना हो जाना चाहिए था; पर उसके साथ ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि हम देखते हैं कि वह बहुत डरपोक था। तौभी परमेश्वर ने उसे लोगों के छुटकारे के लिए ऐसा चुना और ठहराया था कि उसने 300 पुरुषों से एक बड़ी भीड़ को, हाँ, एक बड़ी और सामर्थी सेना को पराजित किया। तौभी जो कुछ यहाँ हमें सुनाया गया है, उसे हमें सामान्य नियम नहीं बना लेना है। क्योंकि हमारे लिए इस प्रकार तर्क करना उपहास और मूर्खतापूर्ण युक्ति होगी: देखो, परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को दुष्टों और अविश्वासियों के अत्याचार से यिप्तह,* शिमशोन, गिदोन आदि के हाथों से कैसे छुड़ाया। इसलिए जब हम परमेश्वर की सन्तान को अन्याय से सताया जाता देखें, तो हमारे लिए उनकी सहायता को हथियार उठाना उचित होगा: यह तो अत्यन्त ही बेतुकी युक्ति होगी।
क्योंकि उचित है कि हम में वही आत्मा हो जिनका आत्मा हम में होने का दावा करते हैं; अर्थात् हमें निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें भी इसके लिए बुलाया है। और क्यों? इसलिए कि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उनकी अपनी विशेष प्रेरणाएँ थीं, मानो उन्हें किसी सार्वजनिक व्यवस्था द्वारा इसका विशेषाधिकार मिला हो। और हमें सब बातों में यह ध्यान रखना है कि जब परमेश्वर अपने वचन पर आधारित होकर असाधारण रीति से कार्य करता है, तो वह विशेषाधिकार हमारे हड़प लेने के लिए नहीं है। क्योंकि किसी को विशेषाधिकार देना राजा या परिषद् का काम है, और यह जानना मेरा काम नहीं कि वह ऐसा क्यों करता है; क्योंकि यदि मैं भी वैसा ही करूँ जैसा वह करता है जिसे विशेषाधिकार मिला है, तो मैं उसके साथ जा मिलूँगा जो अपने आपको सामान्य व्यवस्था से अलग करना चाहता है। क्योंकि हमें राजाओं और न्यायियों के अधिकार पर छोड़ देना चाहिए कि जो कुछ वे जानें कि सार्वजनिक भलाई के लिए उत्तम है वही करें; और यही उचित भी है। इसलिए जब कभी हम देखें कि परमेश्वर अपनी कलीसिया के छुटकारे और उद्धार को ऐसे लोगों के द्वारा स्मरण करना चाहता है जिन्हें उसने मानो अपनी तैयार की हुई सेवा के लिए ठहराया है, तो हमें समझना चाहिए कि ये अद्वितीय कार्य हैं जो उसी के हाथ से सम्पन्न हुए और ये मनुष्य उसी के चुने हुए हैं; और उसी के अधिकार और सामर्थ्य से सज्जित भी किए गए हैं; परन्तु यह कहना कि हर एक मनुष्य इतना करने का साहस कर सकता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, भयानक अव्यवस्था ले आएगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि अब्राम के विषय में जो बात यहाँ हमें सुनाई गई है, उससे हमें क्या सीखना है। अर्थात् यह कि परमेश्वर ने उसे पहले ही यह चिह्न दे दिया था कि उसने उसे कनान देश का स्वामी और अधिकारी व्यर्थ नहीं ठहराया था। और इसके अतिरिक्त उसने उसे यह थोड़ा-सा स्वाद भी चखाया कि उसके वंशज उस देश में प्रवेश करेंगे; और चाहे जो सेनाएँ उनके विरुद्ध आएँ, तौभी वे सारे देश को जीतने से उन्हें किसी रीति से रोक नहीं सकेंगी। और यद्यपि उन राजाओं की सेना, जिनकी चर्चा हमने कल की थी, तीस या चालीस हज़ार से अधिक नहीं थी, तौभी अब्राम के पास केवल उसके घर के लोग थे, जो केवल 300 और 18 पुरुष थे। अब किसी का यह कहना कि वे अनुभवी योद्धा थे, एकदम उपहास होगा: क्योंकि अब्राम कभी युद्ध में पला न था; वह नहीं जानता था कि तलवार या ढाल कैसे सँभाली जाती है। और जो मित्र उसके साथ आए थे उनके कारण उसका और अधिक निडर और साहसी होना तो दूर, यह उसे और भी डरानेवाली बात बन गई। क्योंकि वे कह सकते थे कि देखो, यह परदेशी तो हम सब के गले कटवाना चाहता है। क्योंकि क्या हम यहाँ नहीं देखते कि चार विजयी राजा हैं जिन्होंने सदोम और अमोरा को और उनके आसपास के सब पड़ोसी नगरों को लूट लिया है; तो क्या हम सोचते हैं कि उन पर चढ़ाई करके कुछ भला कर पाएँगे? निश्चय ही ऐसा करने में हम जानबूझकर और स्वेच्छा से अपने आपको नाश कर देंगे। इसलिए अब्राम को अपने आपको इस प्रकार संकट में देखकर, मनुष्य की साधारण सम्मति के अनुसार, पीछे हट जाना और शान्ति से रहना चाहिए था। अब पहली दृष्टि में उसके लिए यह बड़ी मूर्खता प्रतीत होगी कि वह CCC और xviii पुरुषों के साथ युद्ध अपने ऊपर ले, और स्वयं एक भोला-भाला बूढ़ा होकर उनका सेनापति बन जाए; वह जो, जैसा हम पहले कह चुके हैं, कभी नहीं जानता था कि युद्ध या संग्राम क्या होता है, फिर भी अपने आपको इतनी मूर्खता से नाश करने का जोखिम उठाए। इसलिए हमें और भी गम्भीरता से उस बात पर ध्यान देना है जिसे मैं पहले छू चुका हूँ: अर्थात् यह कि परमेश्वर इसके द्वारा उसे दिखाना चाहता था कि जब वह अपने वंशजों को उस देश के अधिकार में बैठाने की मंशा रखता है, तो उसके लिए ऐसा करना उस उत्तम विजय के कारण सरल बात है जो उसने उसे दी; ऐसी बात, जिस पर मनुष्य की बुद्धि के अनुसार विचार करने पर विश्वास नहीं किया जा सकता था। यहाँ हम संक्षेप में देखते हैं कि इस बात के विषय में हमें क्या सीखना है, जहाँ कहा गया है कि अब्राम ने अपने घर के लोगों को सज्जित किया। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उसे कैसी बुद्धि दी, यद्यपि वह कभी युद्ध में प्रशिक्षित नहीं हुआ था, और न किसी युद्ध-चाल या सैनिक नीति से परिचित था; तौभी हम देखते हैं कि उसने अपने शत्रुओं को चौंका दिया, रात को अचानक उन पर टूट पड़ा, हाँ, उसी समय जब वे अपने आपको सब से अधिक सुरक्षित और निश्चिन्त समझ रहे थे, अच्छे भोजन और तेज़ मदिरा से भरे हुए, और सदोम और अमोरा की लूट के आनन्द में मग्न थे। अब हम जानते हैं कि ऐसी विजयों के बाद बहुत उपद्रव और अशुद्धता की जाती है। तौभी अब्राम में इतनी चतुराई थी कि उसने अपने शत्रुओं को चौंका दिया; यद्यपि सचमुच शत्रुओं ने जो पहले विजयें पाई थीं, वे उसे बहुत डराने के लिए पर्याप्त थीं। और फिर उसके इतने अचानक और शीघ्र आने से बड़ी हलचल और कोलाहल होना अनिवार्य था; यदि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उसका संचालन न करता। इससे हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर चाहता था कि यह काम उसी के द्वारा हाथ में लिया जाए; न केवल लूत के कारण, परन्तु इसलिए भी कि वह जाने कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा न व्यर्थ थी न तुच्छ, जब उसने उसे कनान के सारे देश पर अधिकार और प्रधानता दी थी। और संक्षेप में हमें इससे यही सीखना है।
आगे लिखा है (कि सदोम का राजा उसके पास आया), जो अब्राम पर परमेश्वर की बड़ी कृपा और अनुग्रह को बढ़ाकर दिखाता है। क्योंकि हम यहेजकेल का वह कथन पहले उद्धृत कर चुके हैं* जिसमें कहा गया है कि सदोमी अत्यन्त घमण्डी थे, जो उन सब घोर पापों का मूल स्रोत था जिन्होंने परमेश्वर के बदले को भड़काया कि उन्हें जड़ से उखाड़ फेंके। अब सदोम का राजा कितना ही घमण्डी क्यों न रहा हो, तौभी उसे अब्राम के पास आकर उसे दण्डवत करना भाया, क्योंकि वह जानता था कि उसका प्राण और उसका सारा देश उसी का ऋणी है।
इससे हम देखते हैं कि इस काम में निर्देशन परमेश्वर ही का था, और उसी ने अपने दास अब्राम को आशीष दी। यह सच है कि उसके लिए यह कहीं अच्छा होता कि वह अपने तम्बू से निकलकर अपने आपको इतने खतरे में न डालता; परन्तु परमेश्वर ही ने उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया, क्योंकि वह चाहता था कि वह इस बात में उसकी सामर्थ्य और सहायता का अनुभव करके जाने। इससे अब्राम को बड़ा लाभ हुआ; क्योंकि यदि वह परमेश्वर की ऐसी रक्षा को समझे बिना अपने घर में ही पड़ा रहता, तो निःसन्देह वह उतना दृढ़ कभी न होता जितना बाद में हुआ। इसलिए हम देखते हैं कि जब परमेश्वर हम पर कोई क्लेश भेजता है, तो चाहे आरम्भ में वे कितने ही कठिन और दुखदायी क्यों न हों, तौभी अन्त में उनका परिणाम हमारी भलाई के लिए लाभदायक ही होता है।* क्योंकि जैसा सन्त पौलुस कहता है, धीरज से परखा हुआ चरित्र उत्पन्न होता है। इसलिए कि हम भली-भाँति जानें कि परमेश्वर ही ने हमारी सहायता की है; और जब हम एक बार यह जान लेते हैं, तो उस पर भरोसा रखने में अधिकाधिक दृढ़ होते जाएँ। और आशा से लज्जा नहीं होती; क्योंकि जो कोई परमेश्वर की शरण लेगा, वह कभी लज्जित न होगा। इसलिए हम देखते हैं कि हम कभी चैन और शान्ति से तब तक नहीं रह सकते जब तक परमेश्वर हमें यह न दिखाए कि उसने हमें क्यों दुःख दिया, और इस बीच वह हमें यह अनुभव न कराए कि यह हमारी भलाई के लिए है; और इस प्रकार हमें उसे धन्य कहने और अधिक निश्चय से उसे पुकारने का अवसर मिलता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस बात के विषय में यहाँ हमें क्या ध्यान देना है। अब जहाँ कहा गया है कि सदोम का राजा अब्राम के पास आया, वहाँ वह तुरन्त आगे जोड़ता है, (कि सालेम के राजा मलिकिसिदक ने भी रोटी और दाखमधु निकाला।) और चूँकि वह परमेश्वर का महायाजक था, इसलिए उसने अब्राम को आशीष दी: और अब्राम ने उसे सारी लूट का दशमांश दिया। यहाँ हम ऐसा उल्लेखनीय इतिहास देखते हैं जैसा सारे पवित्र शास्त्र में कोई और नहीं है; और केवल इतिहास ही नहीं, वरन ऐसा इतिहास जो हमारे प्रभु यीशु मसीह का जीवित चित्र प्रस्तुत करता है, जैसा भजन संहिता के 110वें भजन में लिखा है।
क्योंकि वहाँ यह बात बिना कारण नहीं लिखी गई कि परमेश्वर ने शपथ खाई है और उससे पछताएगा नहीं, कि वह उस गम्भीर शपथ को, जो उसने खाई थी, कभी न तोड़ेगा। अर्थात् यह कि यीशु मसीह मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए याजक है। यदि इसके सिवा और कुछ न होता, केवल इसका इतिहास ही होता, तो भी हम देखते हैं कि मलिकिसिदक परमेश्वर का याजक कहलाया है: फिर भी जो कुछ हो, वह पद और दशा में अब्राम से अत्यन्त मिलता-जुलता तो है, परन्तु उसमें बहुत कुछ घटी है। क्योंकि जैसा हम आगे सुनेंगे, अब्राम सब विश्वासियों का और सारी कलीसिया का पिता कहलाता है, और परमेश्वर की सन्तान होनेवाले सब लोग उसकी आत्मिक सन्तान ठहरते हैं। इसलिए मलिकिसिदक एक दृष्टि से अनिवार्य रूप से उसका छोटा ठहरता है। मूसा का यह आशय बिलकुल नहीं है कि उसे अब्राम से बढ़कर ठहराए, जैसा प्रेरित बहुत ठीक रीति से करता है,* जैसा हम आगे देखेंगे। कुछ लोगों ने सोचा है कि यह शेम था: परन्तु इसमें किसी सत्य की सम्भावना नहीं। क्योंकि यदि ऐसा होता, तो क्या अब्राम उस कुलपिता शेम को, जिसका वह वंशज था, देखने में इतनी देर लगाता? निःसन्देह वह आरम्भ ही में उसके पास जाता, और उसके साथ रहता: क्योंकि वह सालेम का राजा था। और सचमुच अब्राम उसकी सुरक्षा के तले भली-भाँति शरण ले सकता था, परन्तु वह सारे देश में भटकता फिरा: और उस सारे समय मलिकिसिदक की कोई चर्चा नहीं हुई। फिर प्रेरित ने यह बात भी बिना उचित कारण के नहीं कही कि मलिकिसिदक न पिता न माता वाला था, जिसका न आदि और न अन्त था, मानो वह कोई अमर मनुष्य हो जो सीधे स्वर्ग से उतरा हो; ऐसा नहीं कि मलिकिसिदक मनुष्य नहीं था; परन्तु प्रेरित का आशय यह दिखाना है कि वह इस रूप में प्रस्तुत किया गया है मानो वह कभी जन्मा ही न हो। क्योंकि कोई नहीं जानता कि उसका पिता कौन था, न यह कि उसकी माता कौन थी: कोई उसके कुटुम्ब को नहीं जानता, न यह कि वह कैसे जीया: और इसके अतिरिक्त कोई नहीं जानता कि वह कहाँ मरा: तौभी वह जीवते परमेश्वर का याजक है। फिर भी वह प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हुआ, और तुरन्त छिप भी गया, और गाड़ा गया, परन्तु कोई नहीं जानता कैसे और कब। इस पर प्रेरित दिखाता है कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का एक प्रतिरूप था, जो यद्यपि परमेश्वर का सनातन पुत्र है, तौभी मनुष्यों की साधारण रीति से उसका कोई पिता नहीं था क्योंकि उसका ईश्वरीय सार आत्मिक और सनातन है: और वह प्रकृति के क्रम से परे पवित्र आत्मा के द्वारा आश्चर्यजनक रीति से गर्भ में आया। और यद्यपि वह मर गया, तौभी वह सदा जीवित है: हाँ, और उसने हमारे लिए जीवन प्राप्त किया है, क्योंकि वह हमारे लिए मरा। इसलिए वह आदि और अन्त रहित है: आदि रहित, क्योंकि वह सनातन परमेश्वर है: और अन्त रहित, क्योंकि हम उसमें सदा जीवित रहते हैं, जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, उसके वंश का वर्णन कौन करेगा? हमारे प्रभु यीशु मसीह के गुण और सामर्थ्य से कलीसिया अमर है:* इसलिए उसके अन्त रहित होने का कारण और भी अधिक अद्भुत है।
परन्तु हम इसे आगे और विस्तार से सम्भालेंगे, और इस समय संक्षेप में इस पर से निकल जाते हैं, केवल यह दिखाने के लिए कि वह शेम नहीं था। इसीलिए देखो कि दाऊद भी आनेवाले छुड़ानेवाले को विशेष रूप से मलिकिसिदक से जोड़ता है। तौभी आगे बढ़ने से पहले हमें यह ध्यान देना है कि यह परमेश्वर का आश्चर्यजनक अनुग्रह था कि मलिकिसिदक अपने आपको इतना शुद्ध रख सका, यह देखते हुए कि उस समय सारा देश मूर्तिपूजा से भरा हुआ था: क्योंकि अब्राहम के पिता का घर मूर्तियों का अड्डा था, जैसा हम पहले कह चुके हैं, और जैसा पवित्र आत्मा यहोशू के मुँह से हमें साक्षी देता है।* जब कसदियों के देश में सब कुछ ऐसा बिगड़ चुका था, जो उस स्थान के बहुत निकट था जहाँ नूह रहा था, जहाँ वह निरन्तर जीवित रहा था, जहाँ शेम और उसके समान लोग भी रहे होंगे; जब शैतान ने परमेश्वर की उपासना को ऐसा बिगाड़ और इतना घृणित रीति से अशुद्ध कर दिया था, तो यह कैसे सम्भव है कि कनान देश में, जहाँ लोग दुष्ट हैं, जहाँ अधर्म, परमेश्वर की अवहेलना और विद्रोह के सिवा कुछ नहीं, जहाँ अनर्थ, छल, क्रूरता और हिंसा के सिवा कुछ नहीं, वहाँ भी जीवते परमेश्वर का एक याजक रहता हो? इससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर की कलीसिया प्रायः, जैसे कोई कहे, राख में दबी रहती है, और मनुष्यों के निर्णय में दिखाई नहीं देती: परन्तु इतना पर्याप्त है कि परमेश्वर उसे जानता है। इसकी साक्षी हमारे पास यहाँ मलिकिसिदक में है। कोई सोचता कि उस समय कोई एक मनुष्य भी नहीं था जो परमेश्वर की सच्चाई और सरलता से उपासना करता हो:
क्योंकि जब अब्राहम का दादा और उसके सब कुटुम्बी शैतानी भ्रमों में पड़े थे और मूर्तियों की उपासना करते थे, तो शेष लोगों के विषय में हमें क्या सोचना चाहिए? तब कोई यह निर्णय करता कि परमेश्वर की कलीसिया सर्वथा मिट गई है: परन्तु हम देख सकते हैं कि उसने उसका एक छोटा-सा बीज रख छोड़ा था, जब उसकी यह इच्छा हुई कि मलिकिसिदक वहाँ याजक हो, हाँ, ऐसे देश में भी जो सब अधर्म में शेष सब से बढ़कर था। तो आओ, इसे अपने काम में लाएँ: क्योंकि हमारे लिए यह सोचना एक खतरनाक परीक्षा है कि परमेश्वर की संसार में कोई कलीसिया नहीं; क्योंकि तब तो उसकी प्रतिज्ञा व्यर्थ और निष्फल ठहरेगी। और इसके अतिरिक्त जब मनुष्य अपने आपको अकेला छोड़ा हुआ समझता है, तो वह ऐसा निश्चिन्त और लापरवाह हो जाता है कि निराशा में गिर पड़ता है: जैसे हम देखते हैं कि एलिय्याह उसमें गिरने के कितने निकट पहुँचा था, जब उसने कहा कि इस सब का क्या बनेगा? क्योंकि उन्होंने तेरे भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला है,* हर जगह अपनी मूर्तियाँ खड़ी कर ली हैं, और मैं ही अकेला बचा हूँ। वह मानो एक घबराए हुए दीन जन के समान था जो अपने आपको निराशा के अथाह गड्ढे में सिर के बल गिराने को तैयार था। पर क्या हुआ? परमेश्वर ने उसे शान्ति दी और उससे कहा* कि उसने अब तक अपने लिए सात हज़ार रख छोड़े हैं, अर्थात् एक बड़ी संख्या, जिन्होंने बाल के आगे घुटने नहीं टेके। इसलिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमारा विश्वास आश्चर्यजनक रीति से हिल जाएगा, हाँ, पूरी तरह उलट जाएगा, यदि हमें इस बात का विश्वास दिलाया जाए कि परमेश्वर ने संसार को ऐसा त्याग दिया है कि उसमें उसकी कोई कलीसिया नहीं बची। इसलिए आओ, हम सीखें कि आँखों के बाहरी दर्शन से यह न आँकें कि कलीसिया है या नहीं: परन्तु अपनी ही दृष्टि को त्याग दें; क्योंकि हमें चिताया गया है कि परमेश्वर बहुत बार उसके एक छोटे-से बीज को छिपा रहने देता है: जैसे अन्न के दाने तब तक दिखाई नहीं देते जब तक उन पर भूसे का बड़ा ढेर पड़ा रहता है, क्योंकि जो दाने उसके नीचे ढके हैं वे छोटे और थोड़े हैं। वैसे ही कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर के सब विश्वासयोग्य सेवक यहाँ पृथ्वी के ऊपर से पूरी तरह उखाड़ दिए गए हैं: तौभी प्रभु के पास अपने लोगों को थामे रखने के अगम्य उपाय हैं: और अवश्य है कि उसकी निरन्तर उपासना और सेवा होती रहे, इसलिए नहीं कि वह अपनी कलीसिया में कोई बड़ी, वैभवशाली और धूम-धाम वाली भीड़ चाहता है: परन्तु हमारे लिए इतना पर्याप्त है कि वह जानता है कि कौन उसके हैं। इसलिए आओ, हम सब अधर्म से दूर हो जाएँ, ताकि हम ऊँचे स्वर से उसका नाम लें, और अपने भाइयों के साथ जुड़ें, चाहे हम उन्हें न जानते हों: क्योंकि यह परमेश्वर के गोद लेने पर निर्भर है, जब वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें साक्षी देता है कि उसके पास विश्वासियों की बड़ी संख्या है, और यह आवश्यक नहीं कि हम उन्हें जानें। इसलिए उसकी इच्छा और प्रसन्नता यही है कि वे सारी पृथ्वी के ऊपर बिखरे रहें, और मनुष्यों के सामने उनकी कोई प्रतिष्ठा न हो: वरन् तुच्छ और घृणित ठहरें, और संक्षेप में, उनकी उतनी ही गिनती और आदर हो मानो वे मनुष्यों के पाँवों के तले रौंदे पड़े हों। और इस विषय में इतना ही; तौभी हमें इस स्थान से कुछ उपदेश भी लेना है, और वह यह है कि भीड़ का अनुसरण न करें।
क्योंकि मलिकिसिदक भी औरों के समान मूर्तिपूजा में गिर सकता था, यदि वह उनके कामों का ध्यान रखता: क्योंकि वहाँ आसपास सब कहीं परमेश्वर की उपासना का भ्रष्ट होना ही था, तौभी वह उसी में बना रहा जिसे वह भला और धर्मयुक्त जानता था, उसी के अनुसार जो परमेश्वर ने उसे सिखाया था। उस समय कोई व्यवस्था भी लिखी हुई नहीं थी: परन्तु परमेश्वर ने उसे उतना ज्ञान दिया था, चाहे नूह के द्वारा, चाहे शेम के द्वारा, जितना उद्धार के लिए आवश्यक था। अब यदि मलिकिसिदक की इतनी थोड़ी शिक्षा ने उसे शुद्ध धर्म में दृढ़ता से स्थिर रखा, तो हम अपने आप को कैसे निर्दोष ठहरा सकेंगे, जब परमेश्वर प्रतिदिन अपने आपको हमारे कानों के सामने प्रस्तुत करता है, कि उसने एक व्यवस्था ठहराई है जो दिखाती है कि वह कैसे पूजा और सेवा किया जाना चाहता है, उसने हमें भविष्यद्वक्ता दिए हैं जो उसे हमें समझाएँ, और हमें सुसमाचार भी दिया है, जो एक तुरही है जो न केवल हमारे कानों में बजती है, वरन् हमारे विचारों और मनोभावों को भी पूरी तरह भेदती है? जब परमेश्वर के पास हमें मर्यादा में रखने के इतने साधन हैं कि हम उसकी शुद्धता और सच्चाई से सेवा करें, तब यदि हम उससे हट जाएँ, और मनुष्यों के द्वारा बहा ले जाए जाएँ, और इस बहाने से कि हम देखते हैं कि ऐसी रीति का बोलबाला है, कि ऐसा दुराचार शासन और राज्य करता है और ग्रहण और स्वीकार किया जाता है, और कि हम अविश्वासियों और मूर्तिपूजकों के बीच बसे और जीते हैं: तो यह हमारे लिए कैसा दण्ड होगा, जब मलिकिसिदक अपने विश्वास और धारणा में इतनी स्थिरता और दृढ़ता से बना रहा?
इसलिए आओ, हम अपनी आँखें परमेश्वर की ओर उठाएँ, अपने कान मानो उसके वचन पर लगाए रखें, और अपनी सारी इन्द्रियों को सचेत रखें, ताकि हम कभी बहक न जाएँ, चाहे यहाँ नीचे हम मानो समुद्र में उछाले जाएँ और आँधी और तूफ़ानों से इधर-उधर बहाए जाएँ: और यदि कोई जाति हो जो कोई धर्म माने, और कोई महान राजा हो जो चाहे कि वे इस-इस रीति से अपना शासन करें, तौभी हम सीखें कि सदा अपने ही परमेश्वर से लगे रहें, और हमारे लिए इतना ही काफ़ी है कि हम चौकस रहें कि उस मार्ग से कभी न हटें जो उसने अपने वचन के द्वारा हमें दिखाया है: और व्यवस्था और सुसमाचार का उजला चमकता प्रकाश सदा हमारे आगे रहे, और जब तक हम परमेश्वर को अपना मार्गदर्शक और अगुवा जानते हैं तब तक हम कभी भटकेंगे नहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि मलिकिसिदक के उदाहरण से हमें क्या सीखना है।
अब हम मूसा के पाठ पर आएँ: कहा गया है कि सालेम के राजा मलिकिसिदक ने रोटी और दाखमधु निकाला, और वह जीवते परमेश्वर का याजक था, और उसने अब्राम को आशीष दी। उचित है कि इस पाठ का समाधान किया जाए: कि मलिकिसिदक ने राजा होने के नाते अब्राम का स्वागत किया, और अपने लोगों की तरावट के लिए उसे रोटी और दाखमधु दिया: और गुण से याजक होने के कारण उसे आशीष दी, और अब्राम ने भी उसे सारी लूट का दशमांश दिया। यहाँ हम देखते हैं कि मलिकिसिदक हमारे सामने राजा और याजक दोनों के रूप में रखा गया है। अब यहाँ हमें भिन्न-भिन्न कार्यों को उनके अलग-अलग पदों के अनुसार भेद करके देखना है। क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, राजा होने के कारण उसने अब्राम के प्रति उदारता दिखाई: उसने उसे और उसके सारे दल को तरोताज़ा किया: और याजक होने के कारण उसने अब्राम को आशीष दी। अब प्राचीन पूर्वजों में यह एक साधारण बात थी कि हर राजा याजक भी हो: और स्वयं अन्यजाति लोग भी दिखाते हैं कि यह बहुत से देशों में चलता था। क्योंकि राजा अपनी राजकीय दशा से सन्तुष्ट न होते थे, परन्तु महत्त्वाकांक्षा से याजक भी बनना चाहते थे, क्योंकि वे उसे राजा की महिमा से अधिक पवित्र पद समझते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि वे प्रायः क्यों याजक बनना चाहते थे। और सचमुच हम देखते हैं कि वह अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी इच्छा थी, और जो लोग प्रतिष्ठा और मान चाहते थे वे सदा उसी ओर लपकते और चढ़ते थे: परन्तु जो कुछ हो, यह निश्चित है कि मूसा इसे मलिकिसिदक में एक अद्वितीय बात के रूप में बताता है। तौभी हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में एक और दूसरे के बीच भेद रखा है, और नहीं चाहता कि दोनों एक ही व्यक्ति में रहें। और मूसा सब गुणों की सिद्धता में वैसा ही उत्तम मनुष्य था जैसा संसार में कभी कोई जन्मा हो: तौभी परमेश्वर ने इस सब के होते हुए भी नहीं चाहा कि वह याजक भी हो, वरन् चाहा कि उसका भाई हारून यह पद सँभाले, क्योंकि मूसा पर जो नागरिक शासन का भार रखा गया था वही उसके लिए काफ़ी था। और सचमुच हम देखते हैं कि उज्जिय्याह को कैसा दण्ड मिला:* क्योंकि राजा होकर वह घमण्ड से फूल गया और याजकपद को हड़पने लगा: और केवल वेदी पर धूप जलाने के कारण वह कोढ़ से मारा गया, बड़ी लज्जा में पड़ा, और जीवन भर के लिए अलग रहने को विवश किया गया। तौभी ऐसा प्रतीत होता था कि उसकी भक्ति अच्छी थी, या कम से कम यह कि वह क्षमा के योग्य था। हाँ, परन्तु परमेश्वर ने केवल बाहरी कर्म को दण्ड नहीं दिया: क्योंकि वह राजा उज्जिय्याह के हृदय का घमण्ड भली-भाँति जानता था। और इसके अतिरिक्त कहा गया है कि आज्ञा मानना संसार के सब बलिदानों से उत्तम है।* और क्योंकि वह एक ऐसे पद में घुस गया जिसे परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से वर्जित किया था, और उस बुलाहट और क्रम को बिगाड़ा जो अटल रूप से माना जाना चाहिए था, इसलिए हम देखते हैं कि उसे दण्ड क्यों मिला। और क्योंकि वह अपनी दशा और पद से सन्तुष्ट न हुआ, इसलिए उचित था कि वह कलंकित और घृणित ठहरे, और मनुष्यों की संगति से पूरी तरह अलग कर दिया जाए। इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यवस्था में दो बातें थीं जिन्हें एक ही मनुष्य में होने की अनुमति नहीं थी, अर्थात् राज्य और याजकपद। और इसलिए जब ऐसा है, तो हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यह उदाहरण जो यहाँ दिया गया है, बिलकुल अद्वितीय है और व्यवस्था से सम्बन्ध नहीं रखता। यह सच है कि उस समय व्यवस्था अभी लिखी नहीं गई थी, और लेवी का गोत्र याजकीय पद का अधिकार लेने के लिए अभी संसार में नहीं था: तौभी यह उदाहरण हमारी शिक्षा के लिए यहाँ दिया गया है, ताकि व्यवस्था अपनी पूरी शक्ति में बनी रहे, और कलीसिया की उन्नति हो, जैसा मेरे उद्धृत किए हुए भजन से प्रकट होता है। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए* कि यह सुलैमान के विषय में नहीं कहा गया, न दाऊद के वंश से निकले किसी और राजा के विषय में: क्योंकि यदि वे राजा थे, तो उन्हें याजकपद में हाथ नहीं डालना चाहिए था, क्योंकि यदि वे डालते तो धर्मत्यागी ठहरते। इसलिए जब कहा गया है कि एक राजा होगा जो मलिकिसिदक का प्रतिरूप और उसकी रीति और दशा के अनुसार होगा: तो इससे प्रकट होता है कि यह दाऊद के सारे वंश के विषय में नहीं कहा गया, जो शरीर के अनुसार उससे उत्पन्न हुआ, सिवाय इसके कि हम महायाजक अपने प्रभु यीशु मसीह तक पहुँचें। यह सच है कि वह दाऊद का पुत्र और उसके वंश का है। परन्तु उसमें एक विशेष, हाँ, एकमात्र बात पर ध्यान देना चाहिए: कि उसने व्यवस्था के याजकपद का अन्त कर दिया, क्योंकि उसका राज्य आत्मिक है: और वही इस पार्थिव राज्य का भी अन्त करेगा, जो केवल कुछ समय के लिए, और उसके आने तक के लिए, स्थापित किया गया था।
अब जब उसे सनातन कहा गया है: तो अर्थ यह है कि वह छुड़ानेवाले के व्यक्तित्व में बना रहा। इसलिए मूसा के इन शब्दों से हमें यही देखना है, जब वह कहता है कि मलिकिसिदक सालेम का राजा था, और साथ ही याजक भी था। तब हम देखते हैं कि ये दोनों पद हमारे प्रभु यीशु मसीह के सिवा किसी के नहीं हैं: उस नियम के अनुसार जो परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में ठहराया है: और इसलिए हमें सब सन्देह से परे निश्चय है कि अब्राम को यीशु मसीह का याजकपद दिखाया गया था: ताकि इस रीति से उसके विश्वास पर मुहर लगे और वह और दृढ़ हो। क्योंकि जब देह दिखाई न देती थी, तो उसकी कम से कम कुछ छायाएँ होना आवश्यक था। इसलिए पूर्वजों के पास अपने विश्वास को थामे रखने के लिए उसकी छायाएँ थीं, और वे सदा यीशु मसीह के प्रकट होने की बाट जोहते थे। उनके पास (मैं कहता हूँ) छायाएँ और प्रतिरूप थे। और यद्यपि वह हमारे लिए उनके साथ साझा नहीं है, तौभी हमारे लिए बहुत लाभदायक है। क्योंकि हमें यह समझना है कि यीशु मसीह हमारे पास जल्दी में नहीं भेजा गया, और न परमेश्वर ने एक क्षण में यह ठहराया कि उसे हमारे छुड़ानेवाले के रूप में हमारे पास भेजे: क्योंकि वह पहले ही से सच्चा छुड़ानेवाला था, यद्यपि उसने अब तक हमारा स्वभाव धारण नहीं किया था, न प्रकट हुआ था, और न सुसमाचार प्रचार किया गया था। इससे हम देखते हैं कि जो विश्वास हमारा आज है, वह दूर-दूर तक फैला हुआ है। और सुसमाचार आदि से ही था: इस रीति से कि प्राचीन पूर्वज हमारे प्रभु यीशु मसीह पर बनाए गए थे, और उसी में उनकी आशा और उद्धार था: संक्षेप में, यह ऐसी सहायता है जिसे तुच्छ नहीं जानना चाहिए। परन्तु जब हम छायाओं की तुलना देह से करेंगे, तो देखेंगे कि हमारा छुटकारा पूर्वजों की दशा से कहीं अधिक चाहने योग्य है। इसलिए हम देखते हैं कि यह क्यों कहा गया है कि धन्य हैं वे आँखें जिन्होंने वह देखा जो चेलों ने देखा: क्योंकि बहुत से राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं ने ऐसे दर्शन के आनन्द की तीव्र अभिलाषा की, तौभी जो वे ढूँढ़ते थे उसे कभी न पा सके: परन्तु इस पक्के भरोसे से सन्तुष्ट रहे कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा उचित समय में पूरी होगी: जैसा हम आगे देखेंगे, जब याकूब ने इस जीवन से कूच करते हुए कहा, हे प्रभु, मैं तेरे उद्धार की बाट जोहता रहा हूँ, और उसी पर अपना भरोसा रखूँगा। अब जब हम ऐसी तुलना करेंगे, तो हमारे पास दृढ़ होने के लिए बड़ा आधार है, और उस सब पर क्रोधित होने का भी, जो शैतान हमें सुसमाचार की शुद्धता से हटाने के लिए डाल सकता है: और हम और भी अधिक उभारे जाएँ कि अपने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करें, क्योंकि वह उसकी पूर्ण और सिद्ध सच्चाई ले आया है जिसका व्यवस्था में प्रतिरूप था। इस प्रकार हम देखते हैं कि शास्त्र के इस स्थान से हमें कैसे लाभ उठाना है।
जहाँ तक मलिकिसिदक के निवास-स्थान का प्रश्न है, यह अत्यन्त सम्भव है कि वह यरूशलेम था, यद्यपि वहाँ रहनेवाले यबूसियों के कारण यबूसालेम नाम का एक संयुक्त शब्द भी बना। जो भी हो, यह वह नगर था जिसमें मलिकिसिदक रहा था, और वहीं यीशु मसीह ने भी अपना याजकपद निभाया, न केवल जब उसने सुसमाचार का प्रचार किया, वरन् तब भी जब वह हमारे लिए क्रूस पर चढ़ाया गया, और अपने पिता परमेश्वर के लिए एक पवित्र बलि चढ़ाई, ताकि हमें सदा के लिए उससे मिला दे और हमारे सब पापों से हमें शुद्ध करे।
आओ, अब हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दण्डवत करें, अपने अपराधों को मानते हुए: और उससे बिनती करें कि वह हमें अपनी दया में ग्रहण करे। और चूँकि हम अपने आप में दोषी ठहरे हैं, इसलिए उस छुड़ानेवाले के द्वारा जो उसने हमें दिया है, हम उस शाप से छुड़ाए जाएँ जिसमें हम डूबे रहते, यदि उसने अपनी अनन्त भलाई से हमें न छुड़ाया होता: और जैसे उसने हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर खींचने के लिए अपना हाथ बढ़ाया है, वैसे ही वह हमें विश्वास की ऐसी दृढ़ता में अधिकाधिक स्थिर करे कि हम उससे जुड़े रहें, और इस संसार की किसी परीक्षा से कभी उससे अलग न किए जाएँ। परन्तु हम उन सब आक्रमणों से, जिनसे शैतान हम पर चढ़ाई करे, तब तक लड़ते रहें जब तक हम उस अनन्त राज्य में न पहुँचें, जो जगत की सृष्टि से पहले हमारे लिए तैयार किया गया था, और जो हमारे लिए इतने महँगे दाम से मोल लिया गया। कि वह प्रसन्न हो कि यह कृपा न केवल हम पर, वरन् सब लोगों पर भी दिखाए, इत्यादि।
