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पहला उपदेश: धर्मी ठहराए जाने के विषय में
उत्पत्ति, अध्याय 15।
4 तब देखो, यहोवा का यह वचन उसके पास पहुँचा, कि यह तेरा वारिस न होगा, परन्तु जो तेरे निज वंश से उत्पन्न होगा, वही तेरा वारिस होगा।
5 फिर वह उसे बाहर ले गया और कहा, आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, यदि तू उन्हें गिन सके; और उसने उससे कहा, तेरा वंश ऐसा ही होगा।
6 और अब्राम ने यहोवा पर विश्वास किया, और उसने इसे उसके लिये धार्मिकता गिना।
कल हमने सुना कि अब्राम ने परमेश्वर के सामने अपना दुखड़ा रोया, क्योंकि उसके कोई सन्तान नहीं थी जो उसकी वारिस होती; फिर भी उसने प्रतिज्ञा पर अविश्वास नहीं किया, जैसा कि हम में से बहुत लोग करते हैं, जो यदि परमेश्वर तुरन्त वही न दे जो हमें चाहिए और जो हमें सबसे अच्छा लगता है, तो कुड़कुड़ाने और बड़बड़ाने लगते हैं। अब्राम ने ऐसा नहीं किया, वरन् इसी से सन्तुष्ट रहा कि उसने परमेश्वर को अपने प्रति भला और अनुग्रहकारी अनुभव किया, और यह कि वह जीवन और मृत्यु दोनों में उसी का है। क्योंकि वह इससे आगे कभी नहीं गया; वह केवल यही देखता रहा कि प्रतिज्ञा किस रीति से पूरी होगी। उसे तो छुड़ानेवाले की प्रतिज्ञा मिल चुकी थी, और इसी कारण वह सन्तान पाने को इतना उत्सुक था; पर किसी सांसारिक विचार से नहीं, जैसा हम पहले कह चुके हैं, वरन् इसलिए कि वह और किसी रीति से इस बात का निश्चय नहीं कर सकता था कि परमेश्वर उससे प्रेम रखता है। और यह उस प्रतिज्ञा से और भी दृढ़ होता है जो परमेश्वर ने उससे की: क्योंकि उसने उसकी विनती को आरम्भ में ही स्वीकार कर लिया, और उसके सन्देह करने पर उसे डाँटा भी, इसलिए कि परमेश्वर पहले ही उसे अपना वचन दे चुका था। क्योंकि उसने कहा, “यह तेरा वारिस न होगा, परन्तु जो तेरे निज वंश से उत्पन्न होगा, वही तेरा वारिस होगा।”
इसमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर बहुत बार मनुष्यों की अविचारित विनतियाँ भी पूरी कर देता है; परन्तु यहाँ हम देखते हैं कि उसने अपने दास अब्राम की इच्छा को स्वीकार किया। और यह अकारण नहीं था, क्योंकि उसने और कुछ नहीं माँगा था, केवल यह कि प्रतिज्ञा उसी रीति से पक्की की जाए जिस रीति से वह माँगी गई थी; परन्तु क्योंकि वह उतावला हो रहा था, परमेश्वर ने उससे कहा, नहीं, और उसकी अति तीव्र उत्कट इच्छा को रोक दिया, इसलिए नहीं कि छुड़ानेवाले को देखने की माँग करना उसके लिए उचित न था; फिर भी हमें सदा मर्यादा रखनी चाहिए, और जैसा भी हो, परमेश्वर की व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वही जानता है कि हमारा भला करने का सबसे उत्तम समय कौन-सा है।
और इसलिए हमें धीरज से उसके अवकाश की बाट जोहनी चाहिए, क्योंकि पवित्र शास्त्र कहता है कि विश्वास का स्वभाव ही यही है। संक्षेप में, हम यहाँ देखते हैं कि परमेश्वर ने दिखाया कि अब्राम का सन्तान माँगना उसे भला लगा, क्योंकि उसने देखा कि वह किस उद्देश्य से माँग रहा था। और क्योंकि उसने उसकी निर्बलता को देखा, इसलिए उसने उसमें कुछ और पुष्टि जोड़ना चाहा: वह उसे उसके तम्बू से बाहर लाया, और उससे कहा, “अब आकाश की ओर दृष्टि कर और तारों को गिन, यदि तू गिन सके; तेरा वंश ऐसा ही होगा।” यदि तारों की संख्या ऐसी अनगिनत है कि उन्हें गिनने के लिए देखते समय तेरी आँखें चौंधिया जाएँ, तो तेरा वंश भी ऐसे अनोखे रूप से बढ़ेगा कि लोग उसकी अनोखी बात पर चकित रह जाएँगे। अब जैसा कि हम बारहवें अध्याय में पहले ही विचार कर चुके हैं, इस स्थल का और कोई अर्थ नहीं हो सकता सिवाय इसके कि यीशु मसीह अब्राम के वंश का सिर और मानो सीधी वंश-रेखा है: क्योंकि हम आगे सुनेंगे कि इश्माएल उत्पन्न हुआ, तो भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई; यद्यपि वह अब्राम का शारीरिक पुत्र था, परन्तु (जैसा सन्त पौलुस कहता है) प्रतिज्ञा का शारीरिक पुत्र नहीं था।
और इसलिए हमें इसे शारीरिक उत्पत्ति नहीं समझना चाहिए, वरन् ऊपर की ओर देखना चाहिए, अर्थात् हमें अब्राम के उन सन्तानों में, जो अपनी दशा और क्रम में परमेश्वर की सन्तान जानी और मानी जाती हैं, और उनमें जो उसके वंश में उत्पन्न होकर भी हरामी हैं, भेद करना चाहिए। क्योंकि यद्यपि इसहाक से एसाव और याकूब उत्पन्न हुए, और एसाव पहलौठा था और दोनों एक ही स्त्री से थे, तो भी एसाव पूरी तरह द्वार से बाहर निकाल दिया गया। अब कोई यह भेद नहीं समझ सकता था कि (इन दोनों पुत्रों में से) याकूब को दूसरे पर क्यों प्रधानता दी जाए, जबकि वे दोनों एक ही समय गर्भ में आए, दोनों एक ही बार जन्मे, और फिर एसाव पहलौठा भी था। तो फिर वह परदेशी क्यों गिना जाता है, और उस आत्मिक मीरास में, जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अब्राम के वंश से की थी, उसका न कोई स्थान है न कोई भाग? कारण यह है कि आशीष उससे ले ली गई और उसके छोटे भाई को दी गई: फिर भी पहलौठे का अधिकार उसी का था। तो यहाँ संक्षेप में हम देखते हैं कि यदि हम उन सब को अब्राम का वंश मानें जो शरीर के अनुसार उससे उत्पन्न हुए, तो हमें इसमें न कोई कारण मिलेगा, न कोई ठोस आधार।
फिर, यद्यपि परमेश्वर ने याकूब के सारे वंश को गोद लिया, तो भी उनमें से अधिकांश उसके लिए पराए बना दिए गए। हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें इतनी बार क्यों अस्वीकार किया। इसलिए इस वंश का कोई मुख्य और प्रधान होना अवश्य है, नहीं तो हम इस प्रतिज्ञा की सच्चाई को कभी न पा सकेंगे। इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने केवल यीशु मसीह के विषय में ही नहीं कहा, जैसा कुछ लोगों ने अति उतावली से किया है; पर यह क्रम भी रखना चाहिए, अर्थात् हमें यीशु मसीह को अपने सामने रखना है और उसमें एक साथ जुड़ना है; तब यही एकता हमें अब्राम की सन्तान ठहराएगी और मानेगी। इसलिए जिस वंश की यहाँ चर्चा है वह तब तक हो नहीं सकता था जब तक यीशु मसीह सिर न हो, और हम उसके साथ उसकी देह के अंगों के रूप में जुड़े हुए न हों, और इस प्रकार परमेश्वर के घराने के, और फलस्वरूप अब्राम के घराने के न हों। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर ने इस वंश को छोटा दिखाया, ताकि वह उसे बढ़ाए। और यह ऐसा व्यवहार है जो संसार को अनोखा लगता है; परन्तु हम सब को इससे परिचित होना चाहिए। क्योंकि सामान्य मत के अनुसार, जब हम वंश की बात करते हैं, तो पहलौठा दूसरे को लाता है, और इसी प्रकार एक के बाद एक सब।
परन्तु परमेश्वर जब वंश चाहता है, तब दूसरी रीति से काम करता है: हाँ, इतनी बड़ी संख्या और भीड़ कि उसे देखकर मनुष्य दंग रह जाए, और परमेश्वर उसे ऐसा काटता, घटाता और छोटा करता है कि समय पाकर ऐसा हो जाता है कि मानो वह पूरी तरह नाश हो गया हो और उसका कुछ भी शेष न रहा हो, जैसा कि वह अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के दसवें अध्याय में कहता है: पर वह ऐसा इसलिए करता है कि थोड़े ही समय बाद वह उसे मनुष्य की सारी समझ और आशा से परे बढ़ा दे; ताकि उसकी अद्भुत सामर्थ्य भली भाँति जानी जाए, और सब मनुष्य उससे विवश होकर उसकी आराधना करें। क्योंकि यद्यपि अब्राम से अद्भुत रीति से बहुत लोग उत्पन्न हुए, पहले तो बारह गोत्र, फिर इश्माएली और एदोमी भी; तो भी उसके घराने में कभी इतनी बड़ी भीड़ न हुई जितनी हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हुई। क्योंकि जो शरीर के अनुसार अब्राम के न थे, वे भी उसके घराने के लोग बना दिए गए। क्योंकि जैसा हम आगे देखेंगे, वह सब विश्वास करनेवालों का पिता था।
इसलिए अब्राम का वंश तब कहीं अधिक बड़ा हुआ जब परमेश्वर ने उसके शरीर से उत्पन्न होनेवालों को घटाया, उस दशा की अपेक्षा जब वह उन सब को बने रहने और टिके रहने देता। इसलिए हमें इससे चेतावनी मिलती है कि परमेश्वर के कामों को अपनी राय और कल्पना के अनुसार न नापें, वरन् उसकी अगम्य सामर्थ्य को स्थान दें, और जब वह वचन कह दे तब सन्तुष्ट रहें कि वह उसे पूरा करने में समर्थ है, जैसा कि आगे और विस्तार से कहा जाएगा। इस बात में कि परमेश्वर अब्राम को उसके तम्बू से, जहाँ वह रहता था, बाहर लाया और उसे आकाश की ओर देखकर उसके तारे निहारने को कहा, हमें इस बचकानी बारीकी में उलझने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर कलीसिया की तुलना तारों से कैसे करता है, क्योंकि हम स्वर्ग के राज्य के नागरिक हैं, जो यहाँ पृथ्वी पर परदेशियों की नाईं रहते हैं और सदा आगे यात्रा करते रहते हैं। क्योंकि इस स्थल का यह अर्थ नहीं है। और जहाँ हम पहले धूल की चर्चा कर चुके हैं, वहाँ भी कुछ लोगों ने अटकल लगाकर यह समझा कि कलीसिया को धूल के रूप और चित्र में दिखाया गया है, और संसार उसे कुछ न गिनेगा: ये सब और कुछ नहीं, केवल व्यर्थ के खिलौने हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं। परन्तु हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अपने दास अब्राम के सामने आकाश के तारे देखने को क्यों रखे: इसलिए कि वह उसकी सामर्थ्य को देखे, और अपनी ही बुद्धि और तर्क से इस प्रतिज्ञा की सच्चाई का न्याय न करे, जो मनुष्य की स्वाभाविक समझ में अविश्वसनीय थी। क्योंकि जब तक यह दोष सुधारा न जाए, तब तक हमें विश्वास कभी न होगा: अर्थात् अपने स्वाभाविक विवेक को छोड़ दें और अपनी सारी बुद्धि त्याग दें, ताकि परमेश्वर को अकेले वही महिमा दें जो उसी की है। अब देखें कि क्या यह परमेश्वर की अनन्त सामर्थ्य का अत्यन्त उत्तम और उत्कृष्ट दर्पण नहीं है, कि आकाश के तारों की इस अनन्त भीड़ को, जो एक क्षण में सृजी गई, निहारा जाए।
और हम भजन संहिता में भी देखते हैं कि इस आश्चर्यकर्म की महिमा क्यों गाई गई है, जहाँ कहा गया है, “वही तारों की गिनती करता और उनके नाम रखता है”: अर्थात् वही उन्हें अपने और अपने शासन के अधीन रखता है। और इसलिए जब हम तारों को देखने के लिए आँखें उठाएँ, तो हमें तुरन्त उनकी सृष्टि की ओर दृष्टि करनी चाहिए: क्योंकि एक पल में, जैसे ही परमेश्वर ने वचन कहा, देखो आकाश इस राजकीय सेना से भर गया, जैसा कि पवित्र शास्त्र उन्हें कहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वर्गीय सेना एक पल में सृजी गई, और निरन्तर उसकी महिमा की आज्ञाकारी है। हम देखते हैं कि सब तारे अपनी नियत गति और परिधि पर चलते हैं, और यद्यपि उनका परिक्रमण हर ओर से बहुत बड़ा है, और ग्रह आकाशमण्डल को हिला सकते और सब आपस में मिल सकते थे, तो भी हम देखते हैं कि वे सब ऐसे संचालित हैं कि हमें इस पर चकित होना पड़ता है। जब बात ऐसी है, तो आश्चर्य नहीं कि यह दर्पण अब्राम की आँखों के सामने रखा गया: क्योंकि इसमें वह यह निष्कर्ष निकाल सकता था, कि जब परमेश्वर ने एक क्षण में सारे आकाश को तारों से भर दिया, जहाँ पहले एक भी न था, तो क्या वह न केवल मेरे घर को, वरन् एक सारे देश को, हाँ, अनेक देशों को नहीं भर सकता, जब कभी वह मुझे सन्तान देना चाहे? क्योंकि उसकी सामर्थ्य रत्ती भर भी घटी नहीं है: उसने न केवल जगत को एक ही बार में सृजा, वरन् सृजने के बाद भी चमत्कारिक रीति से उसे निरन्तर बनाए रखा। और इसलिए अब्राम को एक पक्का और निश्चित चिह्न, और मानो एक बन्धक मिल गया। और इसमें हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उसमें कुछ दुर्बलता जानी: इस कारण नहीं कि उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर अविश्वास किया, परन्तु इसलिए कि वह मनुष्य था, वह अपने आप को ऐसी सीमा में न रख सका, वरन् पूछ बैठा कि यह कैसे सम्भव है कि उसके वंश में पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी: और इसलिए, क्योंकि उसका विश्वास कुछ निर्बल था, जैसा हमने कल सुना, हम देखते हैं कि परमेश्वर ने इस रीति से उसे यह सहारा और सहायता क्यों जोड़ी। और इसलिए हमें इस स्थान में, जैसे अन्य सब में, यह ध्यान देना है कि परमेश्वर हमारी सारी निर्बलता में हमें सम्भालता है।
इसलिए नहीं कि हम अपने आप को बहलाएँ: क्योंकि हमें अपनी सब वासनाओं से, और अपने सब बुरे विचारों और भावनाओं से लड़ना है, ताकि परमेश्वर की सच्चाई को स्थान दें और उसे निश्चित और अचूक मानें: फिर भी, हम जो कुछ करें, यह हो ही नहीं सकता कि वह किसी न किसी रीति से निर्बल न हो: और यद्यपि हम अपने दोषों को नहीं जानते, तो भी परमेश्वर उन्हें भली भाँति जानता है।
तो फिर यदि वह अपनी अनन्त भलाई से हमें न बचाए, तो हम क्या करेंगे? तो यहाँ हम देखते हैं कि इस पाठ से हमें क्या विचार करना है, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने अब्राम को अपने वचन और अपनी प्रतिज्ञा दोनों में दृढ़ किया; ऐसा ही हम प्रतिदिन अपने में भी देख सकते यदि हम अपनी ही दुष्टता से अन्धे न हो गए होते: क्योंकि हम परमेश्वर के कामों को उतनी बारीकी और परिश्रम से नहीं देखते जितना देखना चाहिए। परन्तु यदि हम उन सब साधनों से लाभ उठाएँ जो परमेश्वर हमें देता है, कि हम उसकी प्रतिज्ञाओं का निश्चय कर सकें, तो हम देखेंगे कि जहाँ उसने अपने दास अब्राम को बख्शा, वहाँ, क्योंकि वह हमें सौ गुना अधिक निर्बल जानता है, वह अपनी ओर से कोई ऐसी बात न भूलेगा जो हमारे विश्वास को दृढ़ करे। अब इस पर मूसा आगे कहता है, कि अब्राम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिये धार्मिकता गिनी गई। यहाँ हम एक ऐसा पाठ देखते हैं जो पर्याप्त स्पष्ट है, और पहली दृष्टि में इस पर अधिक रुकने योग्य नहीं लगता, तो भी यहूदी ऐसे मूढ़ और अन्धे हैं कि वे नहीं जानते इसका क्या अर्थ है। और मसीहियों में भी सौ में एक ही कठिनता से मिलेगा जो इन शब्दों का अर्थ मात्र समझता हो। क्योंकि यदि ये तीन-चार शब्द (कि अब्राम ने विश्वास किया, और यह उसके लिये धार्मिकता गिनी गई) सच्चाई से समझे जाते, तो निःसन्देह पोपवाद का सारा ढाँचा उलट जाता: जो अन्धविश्वास आज राज करते हैं वे मिट जाते: और जो विवाद अब चल रहे हैं वे सब निपट जाते। क्योंकि यही वह कुंजी है जो हमारे उद्धार के लिए आवश्यक हर बात को खोलती है: यही सब विवादों को निपटाने का साधन है: यही सच्चे धर्म की नींव है: संक्षेप में, यही वह है जो हमारे लिए स्वर्ग खोल देता है, यदि हम उसे समझ सकें जो मूसा यहाँ एक ही वचन में हमारे सामने रखता है। और जो कुत्ते इतने निर्लज्ज हैं कि ऐसी अद्भुत स्पष्ट ज्योति को धुँधला करने का साहस करते हैं, उनसे हमें और भी घृणा करनी चाहिए: इस प्रकार के वे हैं जो कहते हैं कि अब्राम बुद्धिमान मनुष्य माना गया, और परमेश्वर पर विश्वास करना उसमें एक गुण था: ऐसे कुत्तों से तो हमें सचमुच घृणा करनी चाहिए। क्योंकि ये सबसे दुष्ट निन्दाएँ हैं जो शैतान किसी भी प्रकार उगल सकता है।
अब यहूदियों के विषय में हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके पास कोई व्याख्या करनेवाला न था। इसमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर मूसा के मुख पर प्रबल रूप से चमका, तो भी उनके सामने परदा था, जैसा सन्त पौलुस कहता है, और इसलिए वे इन शब्दों को बिना यह सोचे कि उनका क्या आशय है, आगे बढ़ गए। परन्तु जो अपने आप को मसीही कहते हैं, और सन्त पौलुस के अधिकार से इसका अर्थ बता सकते हैं, जब वे, मैं कहता हूँ, प्रकट रूप से परमेश्वर के विरोध में खड़े हों, और जैसा हम उन्हें करते देखते हैं, पागल कुत्तों की नाईं ऐसी ढिठाई से लड़ें: तो उनके पास इसके लिए क्या कारण है? मैं अब पोपवादियों की बात नहीं कर रहा, परन्तु उन शैतानी आत्माओं की जो मसीही कहलाना चाहते हैं, और खुले मुँह इसका अंगीकार भी करते हैं, फिर भी पोपवादियों से कहीं बुरे हैं, क्योंकि वे पोपवाद में भी कभी इतनी दूर नहीं गए कि कहें कि जो परमेश्वर के सामने शापित और दण्डित थे वे बिना विश्वास के किसी भी प्रकार उद्धार पा सकते हैं। स्वयं पोपवादी भी यह मानेंगे: और ये कुत्ते इस सब को पूरी तरह ठुकराते और मिटाते हैं, मानो इतना ही कहा गया हो: इसलिए अब्राम, जो बड़ा बुद्धिमान मनुष्य था, उसमें यही गुण था जिसने उसे परमेश्वर पर विश्वास कराया। यहाँ हम ऐसे दुष्टों का एक दल देखते हैं जो प्रसिद्ध पुरुष गिने जाना चाहते हैं, और स्वामी और गुरु कहलाते हैं, तो भी ऐसे पागल और क्रोध से ऐसे ग्रस्त हैं कि सब कुछ उलट देना चाहते हैं।
इसलिए जो यहाँ लिखा है उस पर हमें और भी अधिक ध्यान और सावधानी रखनी चाहिए। क्योंकि एक ओर मूसा कहता है कि अब्राम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और दूसरी ओर वह जोड़ता है कि यह विश्वास उसके लिये धार्मिकता गिना गया। और पहले हमें यहाँ यह ठहराना है कि विश्वास क्या है: नहीं तो हम इससे कुछ न बना सकेंगे। और यहाँ हम देखते हैं कि पोपवादी अपनी भूलों में कैसे उलझे हैं: क्योंकि यद्यपि वे अंशतः मानते हैं कि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, तो भी वे इसे पूरी तरह समझ और ग्रहण नहीं कर सकते। और इसका कारण क्या है? निश्चय ही यह कि वे नहीं समझते कि विश्वास शब्द का क्या अर्थ है। और इसे भली भाँति समझने के लिए हमें विश्वास और प्रतिज्ञा के बीच कुछ जोड़ना होगा। क्योंकि कोई मनुष्य अकेले एक स्वर से भली भाँति गा सकता है: तो भी जब तक अनेक सुरीले स्वर मिलकर न गाएँ, तब तक पूर्ण मधुर संगीत नहीं होगा। विश्वास के साथ भी ऐसा ही है: क्योंकि यदि परमेश्वर का वचन पहले न आए, और विश्वास उससे मेल न खाए, तो कभी कोई अच्छा सुर-मेल न होगा। क्योंकि परमेश्वर का वचन और विश्वास दो ऐसी वस्तुएँ हैं जो अलग नहीं की जा सकतीं। क्योंकि कोई मनुष्य विश्वास के विषय में बहुत कुछ कह सकता है, फिर भी वह (जैसा हम कहते हैं) ऊँची जर्मन के समान, एक बर्बर बोली के समान होगा, जैसा पोपवादियों में है, जब तक हम इस बात पर न आएँ कि परमेश्वर को बोलना है, और हमें उसके वचन को मानने और उसे स्थान देने के लिए अपने कान खुले और सावधान रखने हैं।
तो विश्वास क्या है? यह उस सब को, जो परमेश्वर के मुख से हमसे कहा जाता है, ऐसी श्रद्धा से ग्रहण करना है कि हम उसे निश्चित और पक्का मानें। फिर भी हमें इस सब से अधिक करना है: क्योंकि परमेश्वर कभी-कभी ऐसी रीति से बोलता है कि उसे सुनकर हमें कुछ भी लाभ नहीं होता। हम पहले देख चुके हैं कि जब उसने कैन से बात की, और पूछा कि तेरा भाई कहाँ है, तब कैन भली भाँति जानता था कि उसे अपने न्यायी के सामने अनिच्छा से भी उत्तर देना होगा, तो भी वह बड़बड़ाया और क्रोधित हुआ, यह कहता हुआ: क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ? आदम ने भी ऐसा ही शब्द सुना, तू कहाँ है? तो भी वह ऐसा डर गया कि छिप जाना चाहता था, और परमेश्वर की उपस्थिति से भागने के लिए कोई अथाह कालकोठरी पाकर प्रसन्न होता। इसलिए हमारे लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि हम परमेश्वर का वचन उस अधिकार के साथ सुनें जिसके वह योग्य है: परन्तु उसे इसके साथ-साथ ऐसा भी होना चाहिए: अर्थात् वह हमारे लिए ऐसा पक्का और निश्चित वचन हो जो हमें परमेश्वर के निकट आने दे, और हमें उसकी उदारता और भलाई का भागी बनाए: और हम सन्देह न करें कि वह हमारा पिता और उद्धारकर्ता होगा, और इस प्रकार उसे पुकारने का साहस करें, और अपने आप को उसकी सन्तान मानें, और सहायता और रक्षा के लिए उसकी शरण में भागें।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अब्राम ने कैसे विश्वास किया: यह कोई काल्पनिक धारणा नहीं थी जो उसने अपने मन में बना ली हो: क्योंकि विश्वास (जैसा सन्त पौलुस कहता है) सुनने से, और परमेश्वर का वचन सुनने से होता है। अब्राम ने इसलिए विश्वास करने से पहले सुना और सीखा। और न उसे किसी सृष्ट वस्तु या नश्वर मनुष्य ने सिखाया, वरन् वह भली भाँति जानता था कि वह परमेश्वर ही है जिसने उसे अपनी सन्तानों में से एक होने को बुलाया है। अब यह, जैसा हम पहले कह चुके हैं, पर्याप्त न होता, परन्तु अब्राम ने ये वचन सुने: मैं तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल हूँ। मैं तेरी ढाल हूँ: मत डर, क्योंकि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो तुझे कसदियों के ऊर, अर्थात् कसदियों के देश से निकाल लाया हूँ; और जैसा हम आगे देखेंगे, और जैसा हम बारहवें अध्याय में आंशिक रूप से विचार कर चुके हैं, अब्राम ने यह विश्वास इस प्रकार नहीं किया कि वह न जाने क्या सुनता जो उससे कोई सम्बन्ध न रखता था, या कोई विशेष बात सुनता: परन्तु उसने परमेश्वर पर विश्वास तब किया जब उसने सचमुच विश्वास किया कि वह स्वर्ग के राज्य का वारिस होने के लिए सुरक्षित और बचाए रखा गया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि उसका विश्वास क्या था। परन्तु इसे भली भाँति समझने के लिए हमें यह ध्यान देना है कि एक विशेष विश्वास है, और एक ऐसा विश्वास भी है जिसमें वह सब समाया है जो हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है। जैसे यदि परमेश्वर अब हमें धमकाए, तो ऐसा हो सकता है कि वह कपटियों और उसके वचन को तुच्छ जाननेवालों के हृदयों को भी हिला और छू दे। यही विशेष विश्वास कहलाता है। क्योंकि हम कितनों को देखते हैं, जब परमेश्वर के न्याय उनके सामने रखे जाते हैं, तो चकित हो जाते हैं, और मानो भीतर से तपते लोहे से दागे जाते हैं, हर ओर देखते हैं कि वे कब उन पर आ पड़ेंगे: और ऐसा क्यों? निश्चय ही कारण यह है कि चाहे वे कितना ही हठ करें और डींग मारें, तो भी उन्हें मानना और समझना पड़ेगा कि वे स्वर्गीय न्यायी के हाथों से कभी बच न सकेंगे। तो ऐसे लोगों में, मैं कहता हूँ, एक प्रकार का विश्वास तो है, चाहे वह केवल अंश मात्र हो: और वह ऐसा टुकड़ा-भर विश्वास है जो उन्हें कुछ लाभ नहीं देगा: जैसे, उदाहरण के लिए, तुम कुछ लोगों को देखोगे जो संकट में किसी विशेष प्रतिज्ञा पर अपने को आश्वस्त कर लेते हैं: क्योंकि यदि कोई आकर उनसे कहे कि परमेश्वर उन पर दया करेगा, तो उन्हें यह बात बहुत अच्छी लगती है, चाहे वह केवल एक आशा ही क्यों न हो। फिर, हम किसी और को देखेंगे जो अत्यन्त रोगी है या बड़ी दरिद्रता भोग रहा है: और हो सकता है कि वह परमेश्वर को सहायता के लिए पुकारे। कोई और ऐसे घोर संकट में पड़ सकता है कि मानो उसकी बुद्धि काम नहीं करती: फिर भी उसे अच्छी आशा रहती है क्योंकि वह जानता है कि परमेश्वर उसकी सहायता कर सकता है। अब ये तो केवल विशेष विश्वास हैं, और हमें बचा नहीं सकते, और इसलिए धर्मी भी नहीं ठहरा सकते: परन्तु जब हम अपने गोद लिए जाने के विषय में आश्वस्त हों, जिसमें हमारा सारा सुख है: तब यही है जो हमें आशा दिलाता है कि परमेश्वर अन्त तक हमारा पिता रहेगा: क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की है कि उसकी सन्तानें नाश न होंगी: और हम उसे अपने परमेश्वर के रूप में अपने निःसन्देह उद्धार के लिए पुकार सकें। अब जब हमारे पास वह प्रतिज्ञा होगी जिसके द्वारा परमेश्वर हमें अपने साथ जोड़ता है, और हमसे ऐसा सम्बन्ध बाँधता है कि हम कभी सन्देह नहीं करते कि वह हमें भूल जाएगा: तब यह ऐसा विश्वास है जिसमें सब प्रतिज्ञाएँ समाई हैं। क्योंकि (जैसा सन्त पौलुस कहता है) विश्वास से उत्पन्न होनेवाले परमेश्वर के भय में न केवल वर्तमान जीवन की, वरन् आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञाएँ हैं। क्योंकि हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यदि परमेश्वर हम पर प्रसन्न है और हमें ग्रहण करता है, तो हमारा सब कुछ भला होगा।
तो यहाँ हम देखते हैं कि इस विश्वास शब्द के विषय में हमें क्या स्मरण रखना है। (अब्राम ने परमेश्वर पर विश्वास किया) अर्थात् अब्राम ने वह प्रतिज्ञा ग्रहण की जिसके द्वारा परमेश्वर ने उसे निश्चय दिलाया कि वह उसका उद्धारकर्ता है; कि उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह को, जो उसे दिया गया था, गले लगाया, जिसके द्वारा उसने जाना कि हम परमेश्वर से मेल-मिलाप पाए हैं, यद्यपि हम अपने पाप और भ्रष्टता के कारण उसके शत्रु गिने जाने और हम पर घातक युद्ध छेड़े जाने के योग्य थे। इसलिए अब्राम हमारे प्रभु यीशु मसीह का ऋणी है, और उसे पूरा निश्चय था कि यही वह बन्धन है जिससे हम परमेश्वर से ऐसे जुड़े और मिले हैं कि हम उसके जीवन और उसके सब उपकारों के भागी हैं। तो यहाँ हम अब्राम का विश्वास देखते हैं, ताकि हम उसे इतना दुबला और कंजूसी का न मानें जैसा पोपवादी मानते हैं। हम अब संक्षेप में देखते हैं कि हम इस विश्वास शब्द का अर्थ तब तक कभी न समझ सकेंगे जब तक हम प्रतिज्ञा और उसके ग्रहण करने के इस सुर-मेल पर न आएँ। और परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा इतनी बार क्यों कहता है, मैं तुम्हें अपनी प्रजा कहूँगा, और तुम कहोगे, तू हमारा परमेश्वर है? इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर पहले क्यों बोलता है: और यही उसे शोभा देता है: क्योंकि मैं, जो पृथ्वी पर रेंगनेवाले कीड़े से बढ़कर नहीं, वरन् उससे भी अच्छा नहीं, बल्कि पाप और भयानक सड़ाहट हूँ जो सदा के लिए दण्डित होने योग्य है, जिसे शैतान स्वभाव से अपने अधिकार में रखता है, और जिसके हम सब बन्दी दास हैं: फिर भी परमेश्वर को अपना पिता कहूँ, यह मेरी कैसी ढिठाई होगी कि मैं उसके निकट पहुँचने को घुस पड़ूँ? हाँ, यह देखना कि मैं ऐसा आदर अपने ऊपर ले लूँ जिसके योग्य स्वयं स्वर्गदूत भी अपने आप से नहीं हैं? परन्तु जब वह एक बार यह वचन कह दे, मैं तेरा पिता हूँ: तब अपने आप को उसकी सन्तानों में गिनना शापित साहस और धृष्टता नहीं, वरन् पवित्र भरोसा और विश्वास है, जिससे हम उसकी सच्चाई पर मुहर लगाते हैं। और यही सबसे बड़ा आदर है जो हम उसे दे सकते हैं, कि जब वह वचन कह दे, तो उसी में सन्तुष्ट रहें और उसी में विश्राम करें।
इस प्रकार, मैं कहता हूँ, हम देखते हैं कि सच्चा विश्वास क्या है, अर्थात् वही जो यहाँ अब्राम के उदाहरण और शिक्षा में हमें दिखाया गया है। अब कहा गया है कि वह उसके लिये धार्मिकता गिना गया: और कि यह परमेश्वर ही था जिसने उसे उसके लिये गिना। अब हमें यह ठहराना है कि यह गिनना शब्द, और धार्मिकता शब्द, परमेश्वर के नाम को भी साथ लेते हुए, क्या सूचित करता है। यह गिनना शब्द इस अर्थ का है कि मान लेना या हिसाब में लेना। जैसे जब किसी मनुष्य पर कुछ ऋण हो, और वह उसे चुका दे, तो वह उसके लिये मान लिया जाता है। या जब उसके ऋणों की सूची रखी जाए और वह दिखाए कि उसने यह चुकाया और वह चुकाया, तो वह इस प्रकार माना जाता है कि वह उससे छूट जाता है और उसे चुकता की रसीद मिल जाती है। अब हमारी स्वाभाविक फ्रांसीसी भाषा में यह गिनना शब्द सदा बुरे अर्थ में लिया जाता है। क्योंकि हम कभी नहीं कहते कि किसी मनुष्य को कोई गुण गिना गया: क्योंकि गिनना शब्द निन्दा या किए गए दोष की बात सूचित करता है: क्योंकि हम कहेंगे, यह बात उसके दोष के रूप में उसके नाम गिनी जाएगी। अब पवित्र शास्त्र इस शब्द को साधारणतः भले और बुरे दोनों अर्थों में प्रयोग करता है, अर्थात् धार्मिकता गिनता है, और पाप नहीं गिनता। और इसलिए जब कहा जाता है कि अब्राम के लिये विश्वास गिना गया, तो इसका अर्थ यह है कि जो कुछ उसकी ओर से आ सकता था उसे वह उलट देता है। तो भी हम इस शब्द का मूल्य और महत्व उसके विपरीत से ही समझ सकेंगे। क्योंकि जब कहा जाता है कि हमारे पाप हमारे नाम गिने जाते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि हमारे पाप अभिलेखों में दर्ज हैं, और हम उनमें दोषी ठहरे हैं, यहाँ तक कि न्याय और दण्ड के सिवाय कुछ शेष नहीं रहता। और इसलिए जब तक परमेश्वर हमारे अपराध हमारे नाम गिनता है, तब तक हम शापित हैं। क्योंकि कहा गया है, “धन्य हैं वे जिनके पाप यहोवा नहीं गिनता।” और फलस्वरूप सारा संसार शापित है, जब परमेश्वर न्यायी के रूप में उसके विरुद्ध कार्यवाही करे, और उस पर जीवन और मृत्यु का पंच बैठाए।
तो इन वचनों का क्या अर्थ है: कि विश्वास धार्मिकता के लिये गिना गया? यह कि परमेश्वर उसे हमारे लिए हिसाब में लगाता है, जिससे हमारे पाप हमारे नाम नहीं गिने जाते: क्योंकि एक को दूसरे के बिना नहीं समझा जा सकता: और इसलिए धार्मिकता का गिना जाना ही कारण है कि हमारे पाप अब हमारे नाम गिने नहीं जाते कि हमारा न्याय और दण्ड करें। क्योंकि धार्मिकता का गिना जाना, संक्षेप में, केवल क्षमा और छुटकारा है। तो यहाँ हम इस शब्द का सही अर्थ देखते हैं। और अब देखें कि धार्मिकता शब्द का क्या आशय है: क्योंकि यह शब्द कोई गुण नहीं है, जैसे कोई उसे धर्मी और धार्मिक कहे जो निर्दोष रीति से शासन करता है। परन्तु जिस धार्मिकता की यहाँ चर्चा है वह एक कृपा और अनुग्रह है जो परमेश्वर हम पर करता है क्योंकि वह हम पर दया करना चाहता है, और अपनी निरी उदारता से हमसे मेल कर लेता है। और इसलिए यह धार्मिकता जिसकी चर्चा मूसा यहाँ करता है, कोई ऐसा गुण नहीं जो हमें मनुष्यों में ढूँढ़ना हो: वरन् वह कृपा है जो परमेश्वर हम पर रखता है, जब उसे भाता है कि हमारे पापों को अपनी दया के अथाह सागर में गाड़ दे, और उन्हें फिर कभी न देखे: और हमें ऐसे ग्रहण करे मानो हमने व्यवस्था को पूरी तरह पूरा किया हो। और ऐसा क्यों? निश्चय ही इसलिए कि यीशु मसीह धर्मी है, और उसकी सिद्ध धार्मिकता हमारे नाम गिनी और मानी जाती है। और जैसे वह अपने पिता परमेश्वर के दान से हमारा है, और सुसमाचार के द्वारा प्रतिदिन अपने आप को हमें अर्पित भी करता है, वैसे ही वह अपनी धार्मिकता हमें देता है, जब हम उसे पाते और उसका भोग करते हैं। और परमेश्वर उसे ऐसे ही स्वीकार करता है मानो हमने स्वयं अपने ही व्यक्तित्व में उसे पूरा किया हो। और इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिकता शब्द का क्या अर्थ है: क्योंकि अभी मैं इन बातों को थोड़ा-थोड़ा करके ही खोल रहा हूँ, क्योंकि हम आगे सारे विषय का सच्चा सार और विस्तार से कहने का विचार रखते हैं।
अब हम परमेश्वर के नाम की चर्चा पर आएँगे: क्योंकि मनुष्य पवित्रता और सद्गुण के कुछ दिखावे और बाहरी रूप के कारण, जो वे समझते हैं कि हममें है, हमें धर्मी गिन सकते हैं और हमसे प्रसन्न हो सकते हैं, और इस प्रकार हमारे नाम बहुत सी गिनतियाँ होंगी, अर्थात् धार्मिकता की पूरी सूचियाँ और गिनतियाँ, हम निर्दोष ठहराए जाएँगे, हाँ और बहुत सराहे और प्रशंसित भी होंगे, जब वे हमें भक्ति और सद्गुण से चलते देखेंगे: फिर भी यह सब कुछ नहीं। और इसलिए हमें स्वर्गीय न्यायी के पास आना है जैसा उसके विषय में कहा गया है। और देखें कि मूसा विशेष रूप से यह क्यों कहता है कि परमेश्वर अब्राम के विश्वास को धार्मिकता गिनता है। यदि सारा संसार अब्राम के विश्वास को ऐसा ही आँकता और मानता, और उसे मानो स्वर्गदूत समझकर सन्त घोषित कर देता, तो वह सब धुएँ की नाईं उड़ जाता, परन्तु यह परमेश्वर ने कहा, जो योग्य न्यायी है, और जिसे उद्धार या दण्ड का निर्णय सुनाने का अधिकार है। इसलिए जब परमेश्वर ने अब्राम को इस रीति से निर्दोष ठहराया, और उसे धर्मी माना और जाना, तो हम देखते हैं कि यही मुख्य बात थी। और इसलिए अब हम देखते हैं कि अब्राम विश्वास से धर्मी ठहरा। इस पर सन्त पौलुस कहता है कि इससे यह निकलता है कि वह अपने कामों से धर्मी होने की योग्यता किसी प्रकार नहीं पा सकता था, और अपने साथ अपना कुछ ऐसा न लाया था जिसके कारण परमेश्वर उससे प्रसन्न हो, परन्तु उसने उसे सेंत-मेंत ग्रहण किया और अपनी सन्तानों में से एक बना लिया। और सचमुच जब सन्त पौलुस सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाने की बात कहना चाहता है, तो वह अपने आप से यही मार्ग यहाँ लेता है, यह दिखाने के लिए कि उद्धार पाने की और कोई आशा नहीं, केवल परमेश्वर की निरी दया और भलाई, क्योंकि वह हमारे पाप क्षमा करता है कि हम उसे भाएँ। इसलिए जब सन्त पौलुस इस विषय में प्रवेश करता है, तब वह यह विषय अब्राम से लाता है: क्योंकि वह यह मानकर चलता है जो सच है, कि परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरने के अनेक मार्ग नहीं हैं, और केवल एक ही नियम है।
और इसलिए यदि अब्राम विश्वास से धर्मी ठहरा, तो हम सब को भी बिना किसी अपवाद के ऐसे ही ठहरना होगा। फिर, यदि किसी नश्वर मनुष्य में वह गुण पाया जा सकता जो योग्यता कमा सके: तो निःसन्देह अब्राम इसमें सब से बढ़कर था। हम पहले सुन चुके हैं कि उसने अपना जन्म-देश कैसे छोड़ा, कैसे उसने अपने आप को और अपनी सारी मानवीय और स्वाभाविक भावनाओं को त्याग दिया, और कैसे उसने परमेश्वर की पूरी आज्ञा मानी। हमने उसके धीरज के विषय में भी सुना है, कि वह अपनी सब परीक्षाओं में कितनी दृढ़ता से डटा रहा, कैसे वह उस बुलाहट पर जिसके लिए परमेश्वर ने उसे बुलाया था अन्त तक स्थिर रहा: संक्षेप में, हमने सुना है कि वह किसी बात में चूका नहीं।
अब हम जो यहाँ हैं, इस सिद्धता से बहुत दूर हैं। तो फिर कोई भी, चाहे वह कोई हो, इतना साहस कैसे कर सकता है कि अपने आप पर घमण्ड करे कि वह अपनी योग्यताओं के द्वारा परमेश्वर के सामने धर्मी ठहर सकता है, जबकि अब्राम भी कभी ऐसा न कर सका? फिर भी, जो मैं पहले कह चुका हूँ, वही हमारे लिए पर्याप्त हो, अर्थात् कि केवल एक ही नियम है जो हमें परमेश्वर को भाने वाला बना सकता है: और वह वही है जो यहाँ अब्राम के व्यक्ति में हमारे सामने रखा गया है। और साथ ही हमें यह निष्कर्ष भी निकालना है कि जब अब्राम परमेश्वर पर विश्वास करने से धर्मी ठहरा, तो हमारे काम परमेश्वर को भाने में, और उस आशा की नींव डालने में जो हमें अनन्त उद्धार के लिए रखनी चाहिए, कुछ भी काम नहीं आ सकते: परमेश्वर ही को हमें सब कुछ देना है, और हम इसके लिए अपना कुछ भी लाने का कभी दुस्साहस न करें। हम इस विषय में आगे और विस्तार से कहेंगे: परन्तु इस बीच हम इस विषय में जितना सरल मार्ग हो सके उसी से चलेंगे।
तो यहाँ हम, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, अपनी वर्णमाला क, ख, ग देखते हैं। और यही हमारी सारी बुद्धि की सिद्धता है। और क्या यह पर्याप्त न होगा जब हमने अपने विश्वास का मूल सिद्धान्त और नींव सीख ली हो? और समझ लिया हो कि परमेश्वर की पाठशाला में अपने लाभ के लिए हमें कैसा प्रवेश करना चाहिए? जो सारे सुसमाचार की मुख्य कुंजी है, और जो हमें सच्चे अन्त तक पहुँचाती है, जिससे हम जान सकें कि किस मार्ग से हम सीधे चल सकते हैं, और उस मीरास को पा सकते हैं जो परमेश्वर ने हमारे लिए रख छोड़ी है। और इसलिए जब हम देखें कि यह स्थल हमें इसी की ओर ले जाता है, तो निःसन्देह हमें इस पर ध्यान देना चाहिए, नहीं तो हम अत्यन्त नीचता से कृतघ्न ठहरेंगे।
अब तक हमने ये बातें अत्यन्त सरल और सहज रीति से रखी हैं, ऐसे कि कोई ऐसा छोटा बालक नहीं जो इसका स्वाद न पा सके। अब हम उस बात पर आएँ जिसे मैं पहले छू चुका हूँ, अर्थात् कि अब्राम अपने साथ कुछ भी न लाया जिसके कारण परमेश्वर उसे ग्रहण करे: परन्तु पूरी तरह उस निरे अनुग्रह और उदारता पर टिका रहा जो प्रतिज्ञा में निहित है। अब इस पर विचार करें कि यह किस समय की बात कही गई है। निश्चय यह उस समय की है जब अब्राम परमेश्वर की इतने समय से सेवा कर चुका था कि मनुष्य के साधारण और सामान्य निर्णय में कोई सोच सकता था कि अब वह भली भाँति मुक्त और छूट सकता है। और इसलिए अनिवार्य रूप से यही निष्कर्ष निकलता है कि अब्राम अपने सारे जीवन में केवल विश्वास के ही साधन से धर्मी ठहराया गया। अब यह कुछ अस्पष्ट और अँधेरा लगेगा यदि हम इसे और स्पष्ट और प्रकट न करें। और यह और स्पष्ट और प्रकट तब होगा जब हम सत्य को पोपवाद की झूठी बातों से, और उन भूलों से जिनसे वे सब नारकीय पाठशालाएँ बिगड़ी और संक्रमित हैं, प्रकाश दें।
मैं पहले कह चुका हूँ कि पोपवादी यह आसानी से मान लेंगे कि बिना विश्वास के हम किसी प्रकार परमेश्वर को नहीं भा सकते, या उसके अनुग्रह में नहीं रह सकते। इसलिए जब वे यह सिद्धान्त एक बार मान लें कि हम सब आदम में शापित हैं: तो वे यह भी कह सकते हैं कि हमें पहला अनुग्रह यीशु मसीह से पाना है। अर्थात् कि जब हम आदि पाप के द्वारा विनाश के अथाह गड्ढे में डूबे हैं, तो यीशु मसीह को हमें उसमें से निकालना ही होगा। अब यहाँ से वे एक झूठा और घातक सिद्धान्त निकालते हैं, जिससे वे मूसा के निष्कर्ष को, और सन्त पौलुस की अत्यन्त उत्कृष्ट व्याख्या को भी, बिगाड़ते और झूठा ठहराते हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि जिस धार्मिकता को वे आदिक कहते हैं वह विश्वास से आती है, और निरे और सरल विश्वास से: परन्तु इसके बाद हमें अंशतः अपने कामों से धर्मी ठहरना होगा। अब यह समझने में कुछ कठिन है, फिर भी मैं इसे ऐसे रखूँगा कि हर कोई समझ सके। यह आदिक शब्द तो आरम्भ के अर्थ का है, और यह लातीनी से लिया गया शब्द है: क्योंकि इसका अर्थ है, निरे विश्वास में आरम्भिक धार्मिकता। इसलिए पोपवादी मानेंगे कि परमेश्वर हमें अपना शत्रु जानता है, और हम पर दोष लगाता है: क्योंकि हम और कुछ नहीं, मानो अत्यन्त घिनौना और बदबूदार कूड़ा-ढेर हैं: और इसलिए हमारे दागों और अशुद्धताओं के कारण वह हमें त्यागे बिना रह नहीं सकता। वे यह सब मान लेंगे: और पहली दृष्टि में यह हमें दीन बनाने का मार्ग लगता है। और इसके अतिरिक्त वे यह भी दिखाते हैं कि यीशु मसीह ही है जिसे हमारी सब घटियों की सहायता और उपाय करना है, हमारा हाथ थामना है, और हमें अपने पिता परमेश्वर से मिलाना है। अब जब वे हमें यहाँ तक ले आते हैं, तो वे हमसे कहते हैं कि हमें अंशतः धर्मी होने की योग्यता कमानी होगी, और यह, निश्चय ही, हमारे कामों की योग्यताओं के द्वारा होना है: ऐसे कि वे सेंत-मेंत धार्मिकता को एक ही बार में ठहरा देते हैं, जब हम बपतिस्मा के द्वारा कलीसिया में ग्रहण किए जाते हैं, जो पर्याप्त है: और इस प्रकार हम देखते हैं कि यीशु मसीह ने अपना भाग पूरा कर दिया। तो भी सचमुच वे जोड़कर कहते हैं कि हम पूरी तरह धर्मी नहीं हो सकते: परन्तु वे अनिच्छा से भी इसे अनुभव करेंगे, और अनुभव भी उन्हें कायल कर देगा, कि वे अनेक प्रकार से परमेश्वर के ऋणी हैं।
परन्तु शीघ्र ही वे आकर कहते हैं कि उनके पास अपने प्रायश्चित्त हैं, और वे परमेश्वर को और रीति से भी भर देते हैं, ऐसे काम करके जिनकी उन्हें आज्ञा नहीं दी गई, जैसे अमुक दिन उपवास करना, दूसरे दिन मांस खाने से परहेज़ करना, तीर्थयात्रा पर जाना, मिस्सा गवाना, और ऐसे ही अन्य तुच्छ खिलौने, जिनका वे पहाड़ बना लेते हैं कि परमेश्वर के सामने अपने आप को छुड़ा लें। इस प्रकार हम देखते हैं कि वे अपने सारे जीवन अपने कामों और योग्यताओं से धर्मी बनने में कैसे लगे रहते हैं, जब एक बार विश्वास से धर्मी ठहराए जा चुके हों, अर्थात् मार्ग में लाए जा चुके हों। वे मानते हैं कि यीशु मसीह उनके लिए द्वार खोलता है: परन्तु कहते हैं कि उन्हें स्वयं उसमें से भीतर जाना और यात्रा पूरी करनी है। उनमें एक और भूल भी है: क्योंकि वे समझते हैं कि जब वे कोई भला काम करते हैं, चाहे उसके बीच बहुत बुराई हो, तो भी वह भला काम गिना जाता है, और इसे वे आंशिक धार्मिकता कहते हैं। और इस प्रकार वे थिगड़ों और जोड़ों की धार्मिकता बनाते हैं, यहाँ-वहाँ से एक टुकड़ा लेते हैं, इधर-उधर भटकते और ऐसी खिचड़ी बनाते हैं जो किसी काम की नहीं, केवल गड़बड़ बात या बिना समझ की बात है। वे यह भी कहते हैं कि हम पहले यीशु मसीह के निरे अनुग्रह से धर्मी ठहरते हैं, फिर विश्वास से: और फिर अपने कामों से, और अंशतः अपने प्रायश्चित्तों से, जो हमारे विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने और हमें उन सब पापों से मुक्त करने में काम आते हैं जिनके हम दोषी हैं। और यह पोपवादियों की राय है। अब देखें कि अब्राम कब धर्मी ठहराया गया, जैसा हम पहले छू चुके हैं: वह सब सद्गुणों से सम्पन्न मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जिसने परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अपने आप को पूरी तरह छोड़ दिया था। और इसलिए ऐसा लग सकता था कि उसमें कुछ धार्मिकता हो सकती थी, यदि किसी जीवित प्राणी में पाई जाती: फिर भी उसका विश्वास उसके लिये धार्मिकता गिना गया। और इसलिए सन्त पौलुस इस पर से यह निष्कर्ष निकालता है कि उसमें कोई काम न था जिससे वह अपने आप को धर्मी ठहरा सके। और मैं पूछता हूँ, उसमें कब कोई न था? निश्चय तब भी, जब उसने ऐसा उत्कृष्ट परिश्रम किया और ऐसी परीक्षाएँ सहीं कि वह अपनी शुद्धता, अपने धीरज, परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता, अपनी भक्ति के कारण स्वर्गदूतों के सब गुणों का मानो आदर्श बन सकता था: संक्षेप में, उसने अपनी सारी भावनाओं को मार डाला, ताकि अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर की धार्मिकता के अनुसार ढाले।
और जब उसने यह सब कर लिया, तब भी (जैसा सन्त पौलुस कहता है) उसके पास घमण्ड करने को कुछ न था: वरन् उसे अपना मुँह बन्द रखना था, जब तक वह विश्वास से धर्मी न ठहराया गया, और इसलिए हम समय की परिस्थिति से देखते हैं कि विश्वास की जिस धार्मिकता की हम अब चर्चा कर रहे हैं, वह वैसी नहीं जैसी पोपवादी कल्पना करते हैं। परन्तु यह मानो वैसा ही है जैसे पवित्र शास्त्र यह कहे कि जब हम दीन अभागे पापी हैं, परमेश्वर के ऋणी, और अनन्त मृत्यु के दण्ड के अधीन: तो अनिवार्य है कि वह हमें किसी और साधन से ग्रहण करे, अर्थात् वह यह न जाँचे कि हम क्या हैं, और न हममें कुछ ऐसा ढूँढ़े जो किसी रीति से हमें उसकी दृष्टि में ग्रहणयोग्य बनाए, परन्तु हमें धर्मी माने क्योंकि उसकी यही इच्छा है, या इसलिए कि हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखते हैं जिनके द्वारा उसने हमसे पहले पहल की। यहाँ हम वह धार्मिकता देखते हैं जो टिकी रहती है, जो जीवन और मृत्यु दोनों में फैली है। परन्तु अब हमें इन बातों को और विस्तार और स्पष्टता से रखना है। और पहले हमें वह स्मरण रखना है जो मैंने पहले छुआ था, अर्थात्: हमें अपनी धार्मिकता अपने से बाहर कहीं और ढूँढ़नी है, क्योंकि हममें कोई नहीं है। और देखें कि सन्त पौलुस मनुष्य जाति के शाप पर इतना जोर और आग्रह क्यों देता है, जब वह हमें इस बात तक पहुँचाना चाहता है कि परमेश्वर हमें सेंत-मेंत धर्मी ठहराता है: क्योंकि वहाँ वह दिखाता है कि अन्यजातियाँ भी दोषी ठहराई गई हैं, यद्यपि उनके पास न व्यवस्था है, न शास्त्र, न भविष्यद्वक्ता, और कहता है कि वे अपने आप से पहले ही दण्डित हैं, और उन्हें और आगे जाने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को सब पर सामान्य रूप से प्रकट किया है, हमें जगत की सृष्टि को देखने के लिए आँखें देकर। अब हम देखते हैं कि हम उस महिमा को दबाते और घोंटते हैं जिसे हमें अत्यन्त स्पष्ट रूप से निहारना चाहिए। और इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हम सब, हाँ, अत्यन्त कृतघ्न मन्दिर-लुटेरे हैं, क्योंकि हम परमेश्वर को उस आदर से वंचित करते हैं जो उसका है। जो व्यवस्था के अधीन हैं, उनके सिर पर दुहरा दण्ड है, क्योंकि वे जानबूझकर पाप करते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को अपने सामने स्पष्ट प्रकट पाते हैं। तो यहाँ हम सारी मनुष्य जाति को शाप में घिरा हुआ देखते हैं। इसलिए, वह कहता है, हर एक मुँह बन्द किया जाए, और चुप रहे: इस पर वह शास्त्र के अनेक स्थान लाता है, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर ने मनुष्यों की सन्तानों पर दृष्टि की, और एक भी भला न पाया, परन्तु सब भ्रष्ट: अर्थात् वे अपनी अधर्मता में ऐसे लिपटे थे कि घृणा के योग्य थे। तो यहाँ हम देखते हैं कि पहले स्थान में हमें क्या ध्यान देना है, अर्थात् इससे हमें यह समझना है कि हमारी दशा और स्थिति क्या है, जब तक परमेश्वर हम पर दया करने को हमारे पास न आए, और हमारी सुधि न ले, जब हम नरक के अथाह गड्ढे में डूबे हों। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि यदि हम ठीक-ठीक समझना चाहें कि हम विश्वास से कैसे और क्यों धर्मी ठहराए जाते हैं, तो हमें किस छोर से आरम्भ करना होगा। परन्तु अब यह जैसा चाहिए वैसा नहीं निभाया जा सकता, और इसलिए हम इसे अपनी अगली सभा तक छोड़ देंगे।
तो अब आइए हम यीशु मसीह में अपने भले परमेश्वर और दयालु पिता की महिमा के सामने गिरें, अपने अनेक पापों और अधर्मों को मानते हुए, जिनके कारण हम उसके अत्यन्त ऋणी और बँधे हैं, और जिनके लिए हमें अपनी दृष्टि में पूरी तरह लज्जित होना चाहिए। और यद्यपि हम निराशा की ऐसी अथाह गहराई में गिरा दिए गए हैं, तो भी हम उसकी महिमा की ओर अपने सिर और हाथ उठाने से न रुकें, क्योंकि उसने हम पर ऐसी कृपा दिखाई कि हमारी सुधि ली, क्योंकि वह हमें अपने पास इकट्ठा करना चाहता था, और इसलिए भी कि यीशु मसीह नरक में उतरा कि हमें उसमें से निकाल ले और स्वर्ग के राज्य तक पहुँचाए। और इसलिए यह हमारे हृदयों में ऐसा अंकित हो कि हम सचमुच विश्वास के द्वारा उठाए जाकर इस भले परमेश्वर को पुकार सकें, जिसने हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया है, और पूरी तरह उसी पर भरोसा रखें। और आगे हम उससे विनती करें कि वह हमें ऐसा चलने का अनुग्रह दे कि उसका गोद लेना हममें व्यर्थ और निष्फल न हो, वरन् उसका फल दिखाए, इस प्रकार कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा संचालित हों, जैसे उसने हमें अपने में सम्मिलित किया है।
केवल इतना ही नहीं, वरन् इत्यादि।
