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इसहाक के बलिदान के विषय में दो उपदेश, जो उत्पत्ति के इक्कीसवें अध्याय के अन्तिम भाग से आरम्भ होते हैं
तीन उपदेश,
जो उत्पत्ति के इक्कीसवें अध्याय के अन्तिम भाग से आरम्भ होते हैं, और अब्राहम के अपने पुत्र इसहाक को बलि चढ़ाने के विषय में हैं।
जॉन कैल्विन द्वारा।
33 और अब्राहम ने बेर्शेबा में झाऊ का एक वृक्ष लगाया, और वहाँ यहोवा, अर्थात् सनातन परमेश्वर से प्रार्थना की।
34 और अब्राहम पलिश्तियों के देश में बहुत दिनों तक परदेशी होकर रहा।
1 इन बातों के पश्चात् परमेश्वर ने अब्राहम की परीक्षा की, और उससे कहा, हे अब्राहम! उसने कहा, देख, मैं यहाँ हूँ।
2 उसने कहा, अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिससे तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।
कल हमने देखा था कि अब्राहम ने गरार के राजा के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हुए उसे कर दिया। अब मूसा इस पर यह जोड़ता है कि जैसे ही वह भली भाँति बस गया, उसने गम्भीरता से परमेश्वर का नाम लिया। अतः यहाँ हमें वस्तुतः यह सीखना है कि अब्राहम ने स्वेच्छा से अपने आप को उस देश के प्रधान शासक के अधीन किया; उसने तब तक प्रतीक्षा नहीं की कि उसे एक भले और विश्वासयोग्य प्रजाजन का कर्तव्य निभाने के लिये विवश किया जाए, वरन् बिना माँगे ही उसे निभाया। तौभी इस सब के होते हुए, हम इसके विपरीत देखते हैं कि इसने उसे परमेश्वर की सच्ची सेवा करने से किसी रीति से नहीं रोका । और यद्यपि (जैसा हम पहले कह चुके हैं) जिन लोगों के बीच वह रहता था उनके धर्म से सर्वथा विपरीत धर्म का होना घृणा की बात थी, तौभी वह ऐसा कायर न था कि उसी विश्वास का अंगीकार न करे जिसकी आज्ञा उसके परमेश्वर यहोवा ने उसे दी थी। इससे हम देखते हैं कि उसने परमेश्वर और मनुष्य दोनों के प्रति ऐसा आचरण किया कि वह हमारे लिये सच्ची दीनता का उत्तम उदाहरण ठहरे, और इस प्रकार हमें दिखाए कि जिनके प्रति हम बँधे हैं उनके अधीन हमें कैसे रहना चाहिए, परन्तु सदा परमेश्वर को प्रधान और सर्वोच्च अधिकार देना चाहिए। और चाहे मनुष्य बड़े अधिकार में हों, तौभी हमें सीखना है कि वह स्वर्गीय महामहिम के सामने बहुत तुच्छ है, जो मनुष्य में जो कुछ भी श्रेष्ठता है उसे मलिन और धुँधला कर देता है।
और यह बिलकुल निश्चित है कि यदि अब्राहम का अभिप्राय अपने पड़ोसियों को प्रसन्न करना होता, तो वह भी उनके रीति-रिवाजों के अनुसार चलता, और कभी यह न कहता कि मेरा अपना एक परमेश्वर है जिसकी मैं उपासना करूँगा; और उस समय प्रचलित मूर्तिपूजाओं और उन अन्धविश्वासों को, जिनसे वह देश भरा हुआ अशुद्ध था, त्याग न देता। परन्तु जो भी हो, उसने पूरी रीति से यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि वह सच्चाई और शुद्धता से परमेश्वर की उपासना और सेवा करेगा; इसलिये, जैसा हम सुन चुके हैं, उसकी अपनी एक वेदी थी, जिस पर वह गम्भीरता से परमेश्वर के लिये बलि चढ़ाता था; और इस रीति से उसने अपने पड़ोसियों के सब पापों और भ्रष्टाचारों का त्याग कर दिया, और उन सब को दोषी ठहराकर तुच्छ जाना, मानो वह कह रहा हो कि परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाली एक ही सच्ची उपासना है, और एक ही जीवित परमेश्वर है; और इसके अतिरिक्त जो कुछ है वह केवल झूठी और छलपूर्ण कल्पनाएँ हैं।
और यद्यपि पहले उसका कोई निश्चित निवासस्थान या विश्राम का स्थान न था, वरन् वह इधर-उधर भटकता फिरता था, तौभी जहाँ-जहाँ वह गया वहाँ-वहाँ परमेश्वर को पुकारने से कभी न चूका, और इस प्रकार उसने दिखाया कि संसार में जो पाप और भ्रष्टाचार तब प्रबल थे वे उसे तनिक भी अच्छे न लगे। परन्तु यहाँ एक विशेष कारण भी है जिसने इस स्थान में उसे फिर से यहोवा का नाम लेने के लिये प्रेरित किया; और वह यह है कि अब उसे पहले की किसी भी समय से अधिक विश्राम मिला और उसने अपने लिये अधिक लाभ और सुविधा का अनुभव किया। क्योंकि उससे पहले वह कोई वृक्ष लगाने का साहस नहीं कर सका; परन्तु वहाँ उसने बहुत से वृक्ष लगाए, क्योंकि उसे वहाँ शान्ति से रहने की अनुमति थी। और जैसे उसने उस देश के राजा, एक पार्थिव प्रधान, का आदर और सम्मान किया, वैसे ही उसने इसके साथ यह भी दिखाया कि वह अपने भले परमेश्वर को नहीं भूला था; और न ही उसका उत्साह ठण्डा पड़ा था; और तौभी उसने उसे सदा अपना प्रधान प्रभु नहीं ठहराया, यद्यपि उसने अपने आप को उसके अधीन किया और उसकी सुरक्षा में रहने से सन्तुष्ट रहा।
इस प्रकार हम यहाँ देखते हैं कि मूसा क्यों यह उल्लेख करता है कि अब्राहम ने यहोवा का नाम लिया। घरों के प्रतिष्ठित किये जाने की व्यवस्था तब तक लिखी नहीं गई थी, तौभी उसने उसका पालन किया; अर्थात् उसने प्रभावशाली रीति से दिखाया कि उसका घर परमेश्वर का मन्दिर है। और इसी प्रकार सब विश्वासियों को भी निश्चय ही यह ठान लेना चाहिए कि अपने निवासस्थान को शुद्ध और निर्मल रखें, अपवित्रता से मुक्त।
यह सच है कि जो रीति परमेश्वर ने यहूदियों को पालन करने की आज्ञा दी थी वह आज समाप्त हो चुकी है, अर्थात् यह कि वे अपने घरों में रहना आरम्भ करने से पहले उन्हें प्रतिष्ठित करें। परन्तु उसका सत्य और वह उद्देश्य, जिस पर परमेश्वर की दृष्टि थी, हमारे लिये बना हुआ है, अर्थात् यह कि जब हम बसाए और स्थापित किए जाएँ, तब उन्हें ऐसी कोठरियों के समान न बरतें जिनसे परमेश्वर की उपस्थिति बाहर रखी जाए, और न अपनी ही इच्छाओं और अभिलाषाओं के पीछे चलने की स्वतन्त्रता लें।
परन्तु जब परमेश्वर ने हम पर यह अनुग्रह किया है कि हमें रहने के लिये घर दिए, चाहे वे किसी पिछवाड़े के कितने ही निचले कोने में क्यों न हों, तौभी आओ हम वहाँ उसका आदर करें और उन्हें पूरी रीति से उसकी सेवा और उपासना के लिये समर्पित करें।
अब इसका अर्थ यह नहीं कि हम दीवारों और छतों को उसके लिये समर्पित करें, वरन् सारे घराने को; अर्थात् हम पूरी रीति से उसके हों और अपने प्राणों और शरीरों को एक भेंट और बलिदान बनाएँ, और शेष को भी इसी में सहमत करने का परिश्रम करें। अब सच कहें तो गृहस्थ को सबसे पहले अपने आप से आरम्भ करना चाहिए, और तौभी उसे अपनी पत्नी को भी भली भाँति शिक्षित करना न भूलना चाहिए। और इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर ने उसे बच्चे और सेवक दिए हैं, तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि वे सब परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बने रहें, जैसा यहाँ कहा गया है कि अब्राहम ने अपने घराने को रखा।
परन्तु सच कहें तो यह ऐसी बात है जो कम ही देखने में आती है। क्योंकि हम देखते हैं कि हर कोई जैसे उसे अच्छा लगे वैसे परमेश्वर की सेवा करना चाहता है, और इस बीच उसकी महिमा की (मानो) बहुत कम या कुछ भी परवाह नहीं करता। क्योंकि यदि स्वामी और स्वामिनियाँ अपने सेवकों से वह काम करवा सकें जिससे उन्हें लाभ पहुँचे, तो वे समझते हैं कि सब ठीक है। परन्तु यदि परमेश्वर की कितनी ही निन्दा और अवहेलना हो, और घर ऐसा अपवित्र हो कि उसमें न उत्साह है और न धर्म, तो इसकी कोई चर्चा नहीं होती, वरन् सब ठीक माना जाता है। परन्तु वे इस बात का निश्चय रखें कि परमेश्वर अपना अधिकार यों ही नहीं खोएगा।
इसलिये आओ हम अपने निवासगृहों को इस प्रकार बरतना सीखें कि परमेश्वर वहाँ हमारे प्रधान शासक के रूप में हमारे साथ निवास करे, और क्या बड़े क्या छोटे, सब अपने आप को उसके लिये समर्पित करें, और इसके साथ उसे केवल अपने प्राण ही नहीं वरन् अपने शरीर भी अर्पित करें।
और जो यह सोचते हैं कि परमेश्वर का आदर अपने प्राण जोखिम में डाले बिना नहीं किया जा सकता, वे यह न समझें कि यदि वे उसका आदर न करें तो इसलिये वे क्षमा के योग्य हैं। क्योंकि यही वह सर्वश्रेष्ठ आदर है जो हम उसे दे सकते हैं या जो हमें देना चाहिए। और न हम यह कहें कि हमें अपने प्राण जोखिम में डालने का ऐसा कोई अधिकार या स्वतन्त्रता नहीं है। परन्तु हम जो चाहें कहें, यहाँ अब्राहम के विषय में जो कहा गया है वह हमारी शिक्षा के लिये होना चाहिए; क्योंकि हम जानते हैं कि वह सब विश्वासियों का आदर्श है, इसलिये कि वह उनका पिता है। और इस कारण, जब ऐसा है, तो हम जान लें कि यद्यपि हम परमेश्वर और उसके सत्य के शत्रुओं के बीच ही रहते हों और अभी सताए जाने को हों, तौभी हमें अपने विश्वास का अंगीकार करना चाहिए; क्योंकि हमें मुख्य को गौण से ऊपर रखना है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि इस स्थान से हमें क्या सीखना है। अब यहाँ विशेष रूप से कहा गया है कि उसने सनातन परमेश्वर को पुकारा, उस परमेश्वर को जो सारे संसार पर शासन करता है; अर्थात् उस परमेश्वर को जो सदा जीवित है।
यहाँ मूसा मानो अब्राहम के मन में चलनेवाली उथल-पुथल और परिवर्तनों की तुलना उसके विश्वास की स्थिरता से करता है, जो इतना दृढ़ और अटल था कि चाहे जो हो जाए वह बदलनेवाला न था। अतः यहाँ हम देखते हैं कि अब्राहम इधर-उधर कैसे घसीटा गया। पहले उसने अपना निवासस्थान बदला; वरन् वह पवन के आगे भूसे के समान खदेड़ा गया। तौभी बात ऐसी थी कि वह जानता था कि उसे परमेश्वर में दृढ़ और स्थिर बने रहना ही है; और उसका विश्वास ऐसी दृढ़ नींव पर बैठा था कि कोई बात उसे हिला न सके, और न उसके व्यक्तित्व को एक बार भी बदल सके। इस प्रकार हम देखते हैं कि अब्राहम उसी मार्ग पर चलता रहा जिस पर परमेश्वर ने उसे चलाया। और इसलिये उसने सनातन परमेश्वर की उपासना की, यद्यपि ऐसा प्रतीत होता था कि परमेश्वर उसके साथ टेनिस की गेंद की नाईं खेल रहा है, कभी इधर और कभी उधर उछालता हुआ।
अब कहा गया है कि वह पलिश्तियों के देश में बहुत दिनों तक रहा। परन्तु मूसा जो शब्द प्रयोग करता है उनका अर्थ है, परदेशी होकर रहना। और यह बात भली भाँति ध्यान देने योग्य है: क्योंकि यद्यपि उसे वहाँ शान्ति से रहने दिया गया, और उसके साथ न कोई अन्याय हुआ और न पहले के समान कोई बलपूर्वक व्यवहार किया गया, तौभी वह जानता था कि वह अभी इस देश का स्वामी और अधिकारी नहीं है; और तौभी यह सच है कि परमेश्वर ने उसके इसमें आने से पहले ही यह देश उसे दे दिया था, और इसी उपकार की उसने कई बार पुष्टि की थी। क्योंकि यह उससे कहा गया था, "तेरे वंशज चार सौ वर्ष तक पराए देश में परदेशी होकर रहेंगे।" और इसलिये अब्राहम को यह शिक्षा निरन्तर व्यवहार में लानी पड़ी: अर्थात् यह कि वह वहाँ उधार की अनुमति से परदेशी के रूप में रहता हुआ भी शान्त और विश्रामी रहे, और सदा एक पाँव उठाए हुए चलने को तैयार रहे। संक्षेप में, उसे वैसा होना था जैसा हम कहते हैं, डाली पर बैठी चिड़िया। इस प्रकार हम देखते हैं कि उसने गरार के राजा के प्रति क्यों राजभक्ति दिखाई। क्योंकि उसने उस अनुदान को नहीं छोड़ा जो परमेश्वर ने उसे दिया था; परन्तु क्योंकि अभी वह समय नहीं आया था कि वह उसका भोग करे और उस पर अधिकार करे, इसलिये वह वहाँ परदेशी की नाईं रहने से सन्तुष्ट रहा। और हम आगे यह भी देखेंगे कि उसने अपनी पत्नी के लिये कब्रिस्तान क्यों मोल लिया: इसलिये कि वह अब तक भूमि के एक पाँव भर का भी स्वामी न था, और तौभी उसने विश्वास से वह ग्रहण किया जो उसे दिया गया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि उसकी आशा इस वर्तमान जीवन से आगे बढ़ गई थी। और तौभी हम देखते हैं कि वह बात व्यर्थ नहीं कही गई जो एक सौ उन्नीसवें भजन में लिखी है: कि परमेश्वर पीढ़ी से पीढ़ी तक उन सब के लिये जो उस पर भरोसा रखते हैं एक तम्बू है। क्योंकि अब्राहम हवा और वर्षा और सब आँधियों में बाहर ढकेल दिया गया, जब वह एक बर्बर और अत्यन्त निर्दयी जाति के बीच रहता था; और तौभी परमेश्वर ने उस पर छाया की: परन्तु यह इसलिये था कि उसे पृथ्वी को छोड़ना और अपना हृदय स्वर्ग की ओर उठाना इससे अधिक भाया कि वह भूमि और सम्पत्ति पाने की चिन्ता में सिर खपाए। इसलिये वह इस संसार में से ऐसे गुज़रा कि उसने इस पर कभी अपना मन न लगाया। और इस प्रकार परमेश्वर ने अन्त में इस प्रतिज्ञा का प्रभाव और पूर्ति दिखाई; ऐसा नहीं कि उसने अपने जीते जी इसका कुछ अंश न देखा हो। परन्तु उसकी आशा, जैसा हम पहले कह चुके हैं, बहुत आगे तक फैली हुई थी: और इसलिये हम प्रेरित के साथ कह सकते हैं कि उसने इस संसार में अपना घोंसला न बनाया: और न यही उसका लक्ष्य था: क्योंकि वह उस देश में लौट सकता था जहाँ से वह आया था, अर्थात् उस देश में जहाँ वह जन्मा था; अर्थात् कसदियों के देश में: परन्तु वह वहाँ ठहरा रहा जहाँ उसकी न कोई भूमि थी, न कुटुम्ब, न मित्र। इस प्रकार हम देखते हैं कि उसकी दृष्टि संसार से ऊँची थी।
अब यदि उन दिनों में उसमें यह बात थी, जब शिक्षा आज की अपेक्षा जो हमारे सामने है कहीं अधिक अस्पष्ट थी, तो हम क्या बहाना बनाएँगे, जबकि हमारा प्रभु यीशु मसीह एक बार प्रकट हुआ, और यहाँ संसार में रहा, और स्वर्ग पर चढ़ गया, और हमारे लिये द्वार खोल दिया, और अपने सुसमाचार के द्वारा हमें निरन्तर ऊपर की ओर अभिलाषा रखने को उकसाता है? यदि हम (मैं कहता हूँ) इन नाशमान वस्तुओं में निरन्तर लिपटे और लपेटे रहें, तो क्या यह अत्यन्त नीच कृतघ्नता न होगी?
और इसलिये आओ हम इस संसार में इस प्रकार रहना सीखें कि जो भलाइयाँ प्रभु यहाँ हमें देता है उनका आनन्द और सुख उठाएँ: परन्तु इस रीति से कि सन्त पौलुस के साथ कहें: "हमारा देश तो स्वर्ग में है," और हम अभी से उसके नागरिक हैं, यद्यपि अभी केवल आशा में ही। और वास्तव में हमें वह भी स्मरण रखना चाहिए जो दूसरे स्थान में कहा गया है: "कि जब तक हम इन मरणशील देहों में रहते हैं, हम मानो परमेश्वर से अलग हैं।" हम यह भी देखते हैं कि हमें उसकी उपस्थिति का भोग नहीं मिला: क्योंकि हमारा आत्मिक जीवन छिपा हुआ है। क्योंकि यदि ऐसा न होता तो हम उसका वास्तविक भोग करते, और तब विश्वास समाप्त हो जाता: क्योंकि, जैसा सन्त पौलुस कहता है, "जिस वस्तु की आशा की जाती है वह देखी नहीं जाती।" और इसलिये आओ हम सीखें कि जब परमेश्वर हमें अपनी ओर खींचता है, तो हम इतने नीच मन के न हों कि यहाँ पृथ्वी पर, मानो सिर तक गन्दे कीचड़ और मैल में डूब जाएँ, परन्तु निरन्तर आगे बढ़ते जाएँ, यह जानकर कि यही हमारे लिये वह घिसा हुआ मार्ग और राजमार्ग है जिससे हम कहीं ऊँचे की अभिलाषा करें।
अब यह बहुत है जो यहाँ अब्राहम के विषय में कहा गया है। देखो, यहाँ अत्यन्त बड़े और सराहनीय गुण हैं, जैसे जब परमेश्वर उसे विश्राम और शान्ति देता है, तब वह उसमें निश्चिन्त होकर नहीं सोता: क्योंकि यद्यपि राजा ने उसे अपने तम्बू में धीरज से रहने की अनुमति दी, तौभी उसने अपने आप को केवल परदेशी जाना: और यद्यपि हर कोई उसका मित्र बन गया और उससे मेल रखने को तैयार था, तौभी वह किसी रीति से उनकी संगति में नहीं रह सकता था, वरन् उनसे पूरी तरह विरोध करना उसे स्वीकार था, इसकी अपेक्षा कि वह किसी भी दशा में उनके अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजाओं के अनुसार अपने आप को ढाले, और सदा जीवित परमेश्वर की सच्ची उपासना के अपने मार्ग पर बना रहे। इन सब बातों में (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) उसने अति उत्तम गुण दिखाए। परन्तु मूसा एक और बलिदान जोड़ता है जो कहीं बड़ा और कहीं अधिक कठिन है: अर्थात् अब्राहम को अपने पुत्र को, वरन् अपने एकलौते पुत्र को, मारने को विवश किया गया। अब यह परमेश्वर के प्रति ऐसी आज्ञाकारिता थी जो हर माप से बढ़कर मनुष्य की सामर्थ्य से परे थी, यद्यपि सचमुच हमें जीवन और मृत्यु दोनों में उसी का होना चाहिए: परन्तु जो यहाँ अब्राहम को करने की आज्ञा मिली, वह शेष सब से कहीं बढ़कर है। क्योंकि यहाँ प्रश्न केवल यह नहीं कि अब्राहम परमेश्वर की पूरी आज्ञाकारिता करे, अपने आप को त्यागकर, और अपने पुत्र को, जो उसे दिया गया था, अपने से छिन जाने दे, और जब परमेश्वर उसे उससे ले जाना चाहे तब उससे पूरी तरह छूट जाए, और यह सब धीरज से सहे। मैं कहता हूँ, यह प्रश्न नहीं है, परन्तु बात यह है कि उसे उसे अपने ही हाथों से मारना होगा। अब यह ऐसी कठोर और विचित्र बात है कि इसका एक बार कहा जाना सुनना ही किसी मनुष्य के हृदय को स्तब्ध और मार डालने के लिये बहुत है। इसलिये यह अकारण नहीं कि मूसा ने, अब्राहम के जीवन का वर्णन पहले करके, उन्नीसवें अध्याय से यह कार्य लिखा है, और कहता है कि इन बातों के पश्चात् परमेश्वर ने उसकी फिर परीक्षा की। अब यह बहुत बड़ी परीक्षा थी जब परमेश्वर ने उसे उसके पिता के घर से निकाला: क्योंकि शब्दों का यही आशय है जब उसने कहा, "अपने देश और अपनी जन्मभूमि और अपने पिता के घर को छोड़कर," और मैं तुम से पूछता हूँ, इससे अच्छा रहने का स्थान उसे कहाँ मिल सकता था?
"उस देश में जो मैं तुझे दिखाऊँगा", वह देश जिसे वह कभी जानता न था: और इसलिये उसे वहाँ वायु में फेंके हुए पर के समान होना था, यह न जानते हुए कि अपने आप को किस ओर मोड़े। मैं कहता हूँ, यह अब्राहम के लिये भारी परीक्षा थी, जब उसे वहीं जाना पड़ा जहाँ परमेश्वर ने उसे बुलाया, यह न जानते हुए कि कहाँ, और तौभी यह मानो उसकी वर्णमाला की पहली पाठशाला थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि जब परमेश्वर अपनी पाठशाला में सिखाना चाहता है तो कैसे आरम्भ करता है। और वह देश में पहुँचा ही था कि वहाँ से तुरन्त मानो अकाल के कारण निकाल दिया गया, और उसकी पत्नी भी उससे ले ली गई। और अगली बार भी हम देखते हैं कि वह हर स्थान में सताया गया और कहीं विश्राम न पा सका, क्योंकि सारे देश में कोई ऐसा न था जो उसके विरुद्ध न खड़ा हुआ हो, और तौभी उसने धीरज से ये सब बातें सहीं और झेलीं। और तौभी उसने परमेश्वर के विरुद्ध एक बार भी कुड़कुड़ाया नहीं, वरन् उस पर डाले गए सब क्लेशों और दुःखों को बिना हताश हुए सहा: वह उन लोगों से बहुत भिन्न था जो ऐसे नाज़ुक और कोमल हैं कि यदि परमेश्वर उनके साथ उनकी अपनी भली इच्छा के अनुसार व्यवहार न करे तो वे सब कुछ समेट लेंगे, और उसकी महिमा के प्रति अपनी आज्ञाकारिता को पूरी तरह भूल जाएँगे। और यद्यपि अब्राहम के साथ ऐसा कठोर व्यवहार हुआ, तौभी उसने जो मार्ग आरम्भ किया था उसी पर चलना जारी रखा। परन्तु उसने इन सब परीक्षाओं को कितने समय तक सहा? उसके साथ ऐसा व्यवहार केवल तीन या चार वर्ष ही न हुआ, वरन् वह ऐसा उछाला और झकझोरा गया कि जब वह उस देश में बीस, तीस और चालीस वर्ष बिता चुका, तब उसे फिर से आरम्भ करना पड़ा, और पहले की किसी भी बार से कहीं बुरी आँधियाँ झेलनी पड़ीं; जैसे अपने जेठे पुत्र के प्रेम को छोड़ने और उससे पूरी तरह लुट जाने को विवश होना, जो उसके लिये मृत्यु से भी बढ़कर पीड़ा और शोक था।
इन बड़ी और अत्यन्त कठिन परीक्षाओं को सहने के पश्चात्, कि परमेश्वर ने उसे देश देने की प्रतिज्ञा की थी, तौभी उसे ऐसा सताया गया मानो वह उस देश के किसी स्थान में पाँव रखने के योग्य भी न था।
परमेश्वर ने उससे वंश की भी प्रतिज्ञा की थी, परन्तु वह तब तक न आया जब तक वह अस्सी वर्ष का न हो गया और उसकी पत्नी बाँझ रही, यहाँ तक कि उन्हें ऐसा लगा कि यह प्रतिज्ञा केवल एक ठट्ठा ही है। और जब वह सौ वर्ष का था तब उसके इसहाक हुआ। परन्तु इश्माएल को निकाल बाहर करना पड़ा, और जैसा हम पहले सुन चुके हैं, वह निर्वासित किया गया। यदि हम इन परीक्षाओं का स्वाद भली भाँति चख सकते, तो निःसन्देह हम चकित रह जाते कि अब्राहम में ऐसा सामर्थी और दृढ़ विश्वास था कि वह ऐसे आक्रमणों से लड़ा और उन पर जयवन्त हुआ। अब जब कहा गया है, "इन बातों के पश्चात्," तो यह दिखाने के लिये है कि परमेश्वर अब्राहम के व्यक्तित्व में हमारे सामने ऐसा दृश्य रखना चाहता है कि जब कभी हम संघर्ष में आएँ, तो हमारे लिये उसके पदचिह्नों पर चलना हानिकारक न हो, और न यह सोचें कि उसके समान बनना, जो सारी कलीसिया का पिता है, कोई अनोखी या नई बात है। परन्तु यह अत्यन्त निश्चित है कि यद्यपि हर मनुष्य उन परीक्षाओं को जो उसे सहनी हैं भली भाँति देखे, तौभी जो हम अब्राहम में देखते हैं उसका सौवाँ अंश भी वह न देख सकेगा। और इसलिये यह ध्यान देने योग्य है कि जैसे परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के दान और अनुग्रह उस पर उदारता से उण्डेले थे, वैसे ही उसने उसके विश्वास की पूरी परख भी करनी चाही: क्योंकि परमेश्वर नहीं चाहता कि उसके दान हम में पड़े-पड़े जंग खाएँ और निष्फल रहें; परन्तु वह हर मनुष्य के साथ उसके अनुग्रहों के उस माप के अनुसार व्यवहार करेगा जो उसने हमें दिया है। क्योंकि वह हमें उन्हें सहने के लिये तैयार करता है, नहीं तो हम उन्हें कभी न सह सकते: और न भलाई करने के लिये एक उँगली भी हिला सकते, जब तक प्रभु ऐसा प्रबन्ध न करे और हमें करने की सामर्थ्य न दे। और इसलिये जब कभी वह हमें संघर्ष में डालता है, तब वह अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह हम पर देता है। अब क्योंकि हमारी तुलना में, जहाँ तक हम मनुष्य हैं, अब्राहम में बड़ी सिद्धता थी, देखो परमेश्वर ने उसे ऐसी विचित्र प्रकार की परीक्षाओं से भी परखा जिनके निकट हम कभी नहीं पहुँच सकते। तौभी हमारे पास अपने आलस्य, ठण्डेपन और ढिठाई का उतना ही कम बहाना है, यदि हम कम से कम कुछ माप में भी अपने पिता अब्राहम का अनुसरण न करें। और यद्यपि हमारे विश्वास की दृढ़ता उसके बराबर नहीं, तौभी यदि हम अपनी सामर्थ्य और दुर्बलता के अनुसार उसके पीछे कुछ दूर रहकर (जैसा हम कहते हैं) चलने का यत्न न करें, तो निःसन्देह हम सर्वथा निरुत्तर होंगे। इसलिये हमें यहाँ से यह समझना है: कि अब्राहम अपने सारे जीवन भर प्राण और शरीर दोनों में सताया गया: और जब बात अन्त पर (जैसा हम कहते हैं) आ पहुँची, तब परमेश्वर ने उसे बिना किसी तुलना के पहले की किसी भी बार से कहीं अधिक प्रचण्ड रीति से परखना चाहा, ऐसा कि वह उसे एक लाख बार निराश कर सकता था, यदि परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उसे अति आश्चर्यजनक रीति से उसमें दृढ़ न किया होता।
अब्राहम का यह वृत्तान्त हमें किस उद्देश्य से सुनाया गया है? इसलिये नहीं कि हम उसके गुण पर चकित हों और उसकी इतनी बड़ी शक्ति और बल की बड़ाई और प्रशंसा करें: परन्तु इसलिये कि सीखें कि अति कोमल न बनें। और जब कभी प्रभु को भाए कि हमें किसी भी प्रकार की परीक्षा में डाले, तो हम उसके पास ले जाए जाने को आज्ञाकारी हों, और हमारी भावनाएँ इतनी वश में हों कि केवल परमेश्वर ही उन पर स्वामी होकर शासन करे, और हमारे साथ जैसा उसे भाए वैसी वाचा बाँधे। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस स्थान से हमें क्या सीखना है। और इसलिये जब कभी हमने कोई परीक्षा सही हो, या कोई संघर्ष झेला हो, और परमेश्वर उसके तुरन्त पश्चात् हमें फिर परखे, तो हम इसे तनिक भी विचित्र न समझें। क्योंकि हम उसकी सेवा इस शर्त पर नहीं करते कि जब वह एक दिन या एक वर्ष हमारे साथ कठोर व्यवहार कर ले तो हमें तुरन्त छुट्टी मिल जाए और हम पारपत्र माँग लें: परन्तु इसके विपरीत हमें कठोर बनाने के लिये, क्योंकि परमेश्वर हमारे विश्वास को परखने के लिये ऐसी परीक्षाएँ निरन्तर भेजना नहीं छोड़ता: परन्तु वही हमारे लिये, मैं कहता हूँ, स्वभाव के समान हो जाना चाहिए: क्योंकि हम देखते हैं कि एक पुराना अनुभवी सैनिक नए अनाड़ी सैनिक (जैसा हम कहते हैं) से कहीं अधिक पीड़ा सह सकता है। क्योंकि नया रंगरूट नहीं जानता कि क्या होता है, वह एक रात के पहरे से थक जाएगा, वह न ठण्ड सह सकता है न गर्मी, न झड़पों को झेल सकता है, न सदा पहरे और चौकसी में रह सकता है: परन्तु जो इसका बहुत समय से अभ्यस्त है, वह इन बातों को सहने में कहीं अधिक सक्षम होगा। इसी प्रकार हमारे साथ भी होना चाहिए, कि जब प्रभु हमें हर प्रकार से अभ्यस्त कर चुका होगा, तब हम और भी अधिक सक्षम और तैयार होंगे कि और भली-भाँति और अधिक समय तक टिके रहें। और यद्यपि हमें ऐसा लगे कि परमेश्वर ने हम पर बहुत भारी बोझ डालकर हमारे साथ बहुत कठोर व्यवहार किया है, तौभी हम अपनी दशा को विचित्र न समझें। और क्यों? क्योंकि हम यहाँ अपने पिता अब्राहम में, जिसके अनुरूप हमें बनना है, इसका नमूना देखते हैं। अब जहाँ तक "परखना" शब्द का सम्बन्ध है, हम जानते हैं कि जब इसे परमेश्वर के लिये कहा जाता है तो इसका क्या अर्थ है: इसका अर्थ यह नहीं कि वह हमें बुराई करने की ओर ले जाने के लिये परखता है, क्योंकि हम तो स्वयं ही उस ओर बहुत झुके हुए हैं: और जैसा सन्त याकूब कहता है, "प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फँसकर परीक्षा में पड़ता है।" और इसलिये हमें इन दोषों का कारण अपने भीतर ही ढूँढ़ना चाहिए, कहीं और नहीं: इसलिये परमेश्वर हमें इस रीति से नहीं परखता कि दोष उसमें ठहरे, और हम जो बुराई करते हैं उसे उस पर लगा सकें मानो वही उसका कर्ता हो; परन्तु परमेश्वर अपनों को परखता है कि उनकी थाह ले। और इसलिये इस शब्द का अर्थ है, जाँचना, परखना; इसलिये नहीं कि उसे यह पूछताछ करनी पड़े कि हम में क्या है, क्योंकि हम जानते हैं कि उससे कुछ भी छिपा नहीं।
पुस्तकें अभी खुली नहीं हैं: तौभी परमेश्वर जानता और न्याय करता है जो वह अन्तिम दिन प्रगट करेगा। और इसलिये उसे हमारी थाह लेने और हमें परखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह जो हम में है उसे जानता ही है: परन्तु यह हमारे विश्वास की परख से सम्बन्धित है। क्योंकि जैसा हम पहले कह चुके हैं, परमेश्वर नहीं चाहता कि उसके दान निष्फल रहें, परन्तु उन्हें किसी काम में लगाएगा, कि उससे उसकी महिमा हो: और हम भी उसके द्वारा और भली-भाँति दृढ़ हों, यह सोचकर कि वह हमारी कैसी अद्भुत चिन्ता करता है: और चाहता है कि हम शैतान और संसार के सब आक्रमणों से धीरज के साथ लड़ें: कि इस प्रकार हम अनुभव से जानें कि परमेश्वर हमारे साथ है, और हम से प्रेम रखता है; इसलिये हमारे पास अच्छा कारण है कि और भी निडर होकर उसे पुकारें, उसके पास दौड़ें, और उसकी भलाई पर टिके रहें, और अन्त तक उसकी सहायता में सन्देह न करें। इस प्रकार हम संक्षेप में देखते हैं कि परमेश्वर हमें क्यों परखता है, अर्थात् वह चाहता है कि जो दान वह हमें देता है वे उसकी सेवा में लगाए जाएँ: कि सब मनुष्य उसकी सामर्थ्य, भलाई और बुद्धि को जानें: कि इस प्रकार उसकी महिमा हो जैसी उसके योग्य है: परन्तु मुख्यतः इस उद्देश्य से कि हम अपने प्रति उसकी पैतृक भलाई को जानें, और उसका आदर करने के लिये और भी उभारे जाएँ, और अपने आप को पूरी रीति से उसे समर्पित करें: और इसके साथ पूर्णतः उसी पर भरोसा रखें। इस प्रकार हम देखते हैं कि अब्राहम कैसे परखा गया, और आज परमेश्वर के सब विश्वासयोग्य सेवक भी वैसे ही परखे जाते हैं। क्योंकि यदि हम सुख-चैन से जीएँ और परमेश्वर की सेवा में हमारा कुछ व्यय न हो, तो हमारे विश्वास का क्या प्रमाण होगा?
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सच्चे बच्चे, और जो सच्चे मन से उसकी सेवा करते हैं, वे कपटियों से किस रीति से पहचाने जाएँ? और इसलिये हमें परीक्षाओं से परखा जाना है, जैसे सोना और चाँदी भट्ठी में परखे जाते हैं। देखो, सन्त पतरस क्यों कहता है: कि यह उचित है कि हमारे विश्वास की परख हो। अब क्योंकि सोना और चाँदी बहुमूल्य वस्तुएँ हैं, इसलिये यह अति उचित है कि वे आग से परखी जाएँ। और तौभी ये तो नाशमान धातुएँ ही हैं: और क्या हमारा विश्वास, जो इनसे कहीं उत्तम है, भूमि में गाड़ा जाए, और इस प्रकार जंग खाए, और उसमें परमेश्वर की महिमा न दिखाई दे? नहीं, नहीं, ऐसा न होना चाहिए; और इसलिये उचित है कि उसकी परख हो। इसलिये यदि प्रभु हमारे साथ ऐसा व्यवहार करे कि शैतान को लगाम ढीली कर दे कि वह हमें बुराई की ओर ले जाए: कि दुष्ट भी हमें सताएँ और पीड़ा दें: और इसके अतिरिक्त और भीतरी परीक्षाएँ भी हम पर आएँ, तो इसे विचित्र न समझें। संक्षेप में, यदि हम हर प्रकार से अभ्यस्त किए जाएँ; तौभी जान लें कि हमें अपने लिये प्रभु की आवश्यकता है कि वह हमारे सामने वह बात रखे जो पहले छिपी हुई थी और हमें अज्ञात थी। इसलिये हम देखते हैं कि परीक्षाएँ हमें कड़वी नहीं, वरन् मीठी लगनी चाहिए, क्योंकि हमारा परमेश्वर प्रभु उन्हें हमारे उद्धार के लिये काम में लाता है, और उनसे अपना प्रयोजन ऐसे पूरा करता है कि उसके नाम की महिमा होती है, और हम भी इस प्रकार अधिक से अधिक लाभ पाते हैं, यदि हम परिणाम पर दृष्टि रखें।
अब इस परीक्षा में जिसका यहाँ उल्लेख है, अब्राहम मर्मान्तक रीति से घायल हुआ, मानो परमेश्वर उसे निराशा के उस सबसे गहरे अथाह गड्ढे में डाल देना चाहता था जिसकी कल्पना की जा सकती है। और तौभी वह डटा रहा: क्योंकि अब्राहम एक दुर्बल मनुष्य होने के नाते हज़ार बार चूक जाता जब परमेश्वर ने उसे अपने पुत्र को मारने की आज्ञा दी: तौभी यह सब नहीं है: अब्राहम का अपनी ही तलवार लेकर अपने ही पुत्र को मारना: परन्तु उस पर एक और कहीं अधिक भारी परीक्षा ठहराई गई जो ध्यान देने योग्य है, जिसके विषय में हम आगे विस्तार से बोलेंगे। परन्तु इस बार इतना पर्याप्त है कि हम उसका थोड़ा सा स्वाद आपको दें। क्योंकि प्रश्न यह नहीं है कि पिता के सबसे प्रिय और एकलौते बच्चे को मार डाला जाए, और वह भी पिता की ही आँखों के सामने और पिता के ही हाथों से हिंसक मृत्यु से मरे: यह सब कुछ नहीं और मुख्य बात नहीं: परन्तु प्रश्न यह है कि वह उद्धार किस मार्ग से आएगा जिसकी अब्राहम ने प्रभु की प्रतिज्ञा के अनुसार अपने मरे हुए पुत्र इसहाक के द्वारा बाट जोही थी। क्योंकि मनुष्यों के लिये अपने बच्चों को मार डालना इसकी तुलना में कुछ भी नहीं। क्योंकि कोई मनुष्य अपने बच्चे को अपना उद्धारकर्ता नहीं मानेगा। परन्तु यद्यपि इसहाक अब्राहम का उद्धारकर्ता न था: तौभी वह जानता था कि संसार का उद्धारकर्ता उसी से उत्पन्न होगा। तब अब्राहम अपनी धार्मिकता, कुशल और उद्धार की आशा कहाँ से रखता, यदि इसहाक के व्यक्तित्व में नहीं, अर्थात् उसमें जो उससे उत्पन्न होनेवाला था? तो क्या इसहाक मर गया? तो फिर सारा संसार पूरी तरह खो गया और दण्डित हो गया, और शैतान सर्वत्र राज्य और प्रभुता करता है। देखो तब परमेश्वर सब मनुष्यों और सब सृष्टि का शत्रु है: और अब परमेश्वर के क्रोध और प्रतिशोध के सिवा, जो सब कुछ भस्म और नष्ट करने के लिये धधका और भड़का हुआ है, और कुछ नहीं बचा: क्योंकि उसके इस पुत्र इसहाक को अब्राहम के अपने ही हाथ से मारा जाना है: हाँ, उसी अब्राहम के हाथ से, जिसने परमेश्वर के अपने मुँह से यह प्रतिज्ञा पाई थी, कि मैं तुझे एक पुत्र दूँगा, जो ऐसा धन्य होगा कि उस अनुग्रह के द्वारा जो मैं उस पर करूँगा सब मनुष्य उद्धार पाएँगे: और तौभी इस पुत्र को मार डाला जाए?
तो यहाँ हम देखते हैं (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि नरक पूरी तरह खुला हुआ है, और शैतान ऐसा राज्य कर रहा है कि सब कुछ पूरी तरह नष्ट हो गया: क्योंकि अब उद्धार की प्रतिज्ञाओं की बाट जोहने को कुछ नहीं रहा, क्योंकि जिसे सब प्राणियों को जीवन देना था वही मार डाला जाता है।
तो अब हम कहाँ जाएँ? तब यहाँ प्रश्न मनुष्य के विचार के अनुसार केवल यह नहीं कि अब्राहम के हृदय को क्लेशों और दुःखों से घायल किया जाए? परन्तु प्रश्न यह है कि उसके विश्वास को ही, और अपने उद्धार की सारी आशा को, मार डाला जाए। ऐसा प्रतीत होता था कि परमेश्वर अपने अनुग्रह और भलाई की उस सारी आशा को जो उसने उससे की थी पाँव तले रौंदना चाहता था। संक्षेप में, ऐसा प्रतीत होता था कि वह अब्राहम का केवल उपहास कर रहा है: मानो वह कहता हो: अपना मार्ग ले; तू तो बस पशु है जो मेरी बाट जोहता और मेरे पीछे चलता और मेरी आज्ञा मानने में इतना परिश्रम करता है। मैंने तुझसे एक वंश की प्रतिज्ञा की थी, जिससे सारे संसार का उद्धार आएगा: और मैंने तुझे तेरा पुत्र इसहाक देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की: परन्तु अब तुझे तुरन्त जाकर उसका गला काटना है, कि तू यह समझे कि तू निरा भोला और मूर्ख है जो मेरी की हुई प्रतिज्ञा पर भरोसा रखता है; और यह सोचता है कि तेरा एक वंश होगा, और ऐसा बहुमूल्य वंश जो शेष सारे संसार से अधिक मूल्यवान होगा: हाँ, एक लाख संसारों से भी अधिक। क्योंकि यह ऐसी बात है जो तेरे अपने प्राण के, और अन्य सब मनुष्यों के प्राणों के अनन्त उद्धार से सम्बन्ध रखती है: और तौभी तू अब यह सब मिटाने पर तुला है। अब (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमारे लिये इन बातों को पर्याप्त रीति से समझ पाना और उनसे पर्याप्त रीति से मर्म तक छुआ जाना असम्भव है: तौभी जब हम इन पर मनन करते हैं, तो इसलिये कि वे व्यर्थ ही लिखी गईं। तो यहाँ हम इस इतिहास की भूमिका देखते हैं। अब आओ हम उसे विशेष रूप से रखें जो मूसा ने यहाँ कहा है: अपने एकलौते पुत्र को, अपने पुत्र इसहाक को, अपने उस पुत्र को जिससे तू ही प्रेम रखता है, ले। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर अब्राहम के हृदय को बेधने ही से सन्तुष्ट नहीं, मानो उसे कटार से भोंक दे, परन्तु उसे यातना के यन्त्र पर चढ़ाता है, और उसे कई खूँटियों से खींचकर तानता है, मानो उसे यों तानने के पश्चात् वह उसे रस्सी की यातना भी देना चाहता हो, और उसके पश्चात् और भी भारी कोई दूसरी यातना। क्योंकि जब उसने उसे अपने पुत्र को मारने की आज्ञा दी; तो क्या यह पर्याप्त न था कि वह उससे कहता: अपना मार्ग ले और अपने पुत्र का बलिदान चढ़ा? परन्तु उसने उससे कहा: अपने पुत्र को, हाँ अपने एकलौते पुत्र को, अपने पुत्र इसहाक को, जिससे तू ही प्रेम रखता है, ले: ताकि वह दिखाए कि उसने अब्राहम की सारी आशा काट डाली है।
अब जहाँ वह कहता है, तेरा पुत्र जिससे तू ही प्रेम रखता है; यह केवल पैतृक प्रेम न था, जैसा स्वाभाविक पिता अपने बच्चों से स्वभावतः प्रेम रखते हैं: परन्तु अब्राहम ने इसहाक से उसी के अनुसार प्रेम रखा जैसा वह अपने प्राण के और सारे संसार के उद्धार का ध्यान रखता था, जिसके द्वारा वे स्वर्गदूतों के सहभागी और स्वर्ग के राज्य के उत्तराधिकारी हो सकते थे।
अन्ततः, यहाँ हम देखते हैं कि इस कथन एक पुत्र, और अति प्रिय पुत्र, का क्या अर्थ है। और इसके अतिरिक्त, इसहाक का जो नाम यहाँ लिया गया है, वह निन्दा के शब्द के रूप में रखा गया है। क्योंकि परमेश्वर ने ही उसका नाम इसहाक रखा, मनुष्यों ने नहीं। यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर ने बालक को नाम दिया: और वह क्या था? हँसी और आनन्द। अब ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब केवल उपहास में था, मानो वह कह रहा हो: तेरे लिये यह बहुत अच्छा है; क्योंकि यहाँ केवल आनन्द ही आनन्द है। तू इसहाक में बहुत आनन्दित है, और यह सब आनन्द की बात समझता है। परन्तु शीघ्र ही तेरे पेट में ऐसी मरोड़ उठेगी जो तेरे हृदय को बेध देगी: क्योंकि जिस बालक से तू इतना प्रेम रखता है उसका जल्लाद तुझे स्वयं बनना है: और अपनी छुरी खींचनी है, और उसका गला काटने को हाथ उठाना है। अब क्या तुम सोचते हो कि अब्राहम को निरा जल्लाद न समझा जाएगा; और इस रीति से अपने सब पड़ोसियों को क्रोध में न भड़काएगा: कि वे कहें, यह कैसा दुष्ट है जो अपने ही पुत्र को मारने निकला है? देखो एक पागल; एक मनुष्य जिसमें दुष्टात्मा समाई है; क्या यह निरा शैतानी उन्माद न होगा?
इस प्रकार हम उसे मानो परमेश्वर के सामने लज्जित और संसार से घृणित देखते हैं। परन्तु यह भी सब नहीं: क्योंकि वह कहता है, "अपने पुत्र को ले"; और मैं उसका क्या करूँ? उसे ले, मैं कहता हूँ, और उसका बलिदान कर। और मैं उसे कहाँ ले जाऊँ? उसे किसी ऐसे पहाड़ पर ले जा जो मैं तुझे बताऊँगा। अब अब्राहम का अत्यन्त व्याकुल और दुःखी होना अनिवार्य था: और इसके अतिरिक्त, क्या उसे अपने एकलौते पुत्र को मारना ही था? क्या उसे बिना किसी मार्गदर्शक के इतनी लम्बी और थकानेवाली यात्रा करनी ही थी, यह भी न जानते हुए कि कहाँ? और क्या परमेश्वर उसे न केवल चक्की के पाट पर नाक रगड़वाए, वरन् उसे ऐसा यातना भी दे कि किसी जीभ से कहना या हृदय से कल्पना करना असम्भव हो? क्या ये ऐसी बातें नहीं जो मनुष्य की सारी बुद्धि से बहुत परे हैं, और (मानो) सहना और झेलना असम्भव है?
क्योंकि जैसा उससे पहले कहा गया था, जब वह उस स्थान से निकला जहाँ वह था; कि वह नहीं जानता था कि परमेश्वर उसे कहाँ ले जाएगा: वैसे ही यहाँ भी है; क्योंकि इस समय उसे कोई स्थान नियुक्त नहीं किया गया, केवल इतना कि: "तू यहाँ से मोरिय्याह देश में जा।" उसे सचमुच उस स्थान से जाना ही था जहाँ वह अपनी वृद्धावस्था के अधिकांश वर्ष रहा था; हाँ, जब तक वह बहुत बूढ़ा न हो गया, जैसा हम पहले सुन चुके हैं: "अपना मार्ग ले" (वह कहता है) "और जब तू वहाँ पहुँचे, तब मैं तुझे दिखाऊँगा कि तू अपने पुत्र का बलिदान कहाँ चढ़ाए।"
तो यहाँ हम देखते हैं कि प्रभु ने अपने सेवक के हृदय की कितनी रीतियों से थाह ली, कि जितनी परीक्षाएँ हम इकट्ठी कर सकें वे कभी इसके समान न होंगी: और यदि हम उनकी तुलना उनसे करें जो हम पर सहने के लिये आएँ, तो जो हम यहाँ देखते हैं उसके सामने वे कुछ भी न लगेंगी। और इसलिये हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारी दुर्बलता को आश्चर्यजनक रीति से बचाता है, कि हमें यहाँ तक नहीं पहुँचाता। क्योंकि यदि हम में से किसी पर कोई लम्बी बीमारी आ पड़े, तो हम ऐसा शोक और दुःख करें कि परमेश्वर पर बहुत क्रोधित हो जाएँ।
फिर, यदि कोई मर जाए, तो उसकी पत्नी ऐसी उदास हो जाएगी कि बिलकुल अधीर और कुड़कुड़ानेवाली हो जाएगी। यदि परमेश्वर हमारे किसी बच्चे को ले जाए: हाँ, यद्यपि हमारे बहुत से हों, तौभी हम अपने आप पर क्रोधित होंगे, और अत्यन्त रोएँगे और विलाप करेंगे: और इसलिये यदि हम इस दशा में पहुँचाए जाएँ, जैसा यहाँ कहा गया है, कि अपने ही हाथों से अपने बच्चों को मारें, और एक को भी जीवित न छोड़ें, वरन् अपना घर उन सब से खाली कर दें, तो हम क्या करेंगे? तौभी यह सब अब्राहम की परीक्षा के बराबर न होगा। क्योंकि जो बच्चे परमेश्वर हमें आज देता है वे हमारे उद्धार की नींव नहीं हैं: और न हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को पाने से हाथ खींचना चाहिए, चाहे सारा मानवीय ज्ञान नष्ट और क्षीण हो जाए: इसलिये हम स्वीकार करें कि परमेश्वर हमें सँभालता है और हमारी दुर्बलता पर तरस खाता है, जब वह हमें ऐसी कठिन परीक्षा में नहीं लाता जैसी का मूसा यहाँ उल्लेख करता है। तो यह हमारे लिये एक भली चेतावनी हो कि जब परमेश्वर हमें परखे, तो हम अपनी गर्दनें जूए के नीचे दें, और उसे अपनी परख करने दें। और यही हमारे सारे जीवन की सबसे मुख्य बात है, कि हम अपने आप को ऐसे सौंप दें कि परमेश्वर हमारे साथ जैसा उसे भाए वैसा करे: और कुड़कुड़ाते हुए उत्तर न दें और न कहें कि वह हमारे साथ ऐसा और ऐसा कठोर व्यवहार करता है। मैं कहता हूँ, यही हमारे सारे जीवन की सबसे मुख्य बात है। (मुझे कहना ही पड़ेगा) निश्चय यह हम में बहुत उत्तम और महान दान होगा, कि हम अपने पड़ोसियों के बीच खरे जीवन में चलें, किसी पर अन्याय न करें, अपने जीवन के सब दिन पवित्रता और संयम से बिताएँ, और मतवालेपन, असंयम, निन्दा और ऐसी बातों से दूर रहें।
ठीक है महोदय, मुझे सच में कहना ही पड़ेगा कि ये बड़े गुण हैं, परन्तु ये सदा हम में नहीं पाए जाते; और तौभी इस सब के होते हुए यह सबसे मुख्य बात नहीं है। क्योंकि सबसे प्रधान बात (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यह है कि जब हम परमेश्वर की सेवा करें, यद्यपि बहुत से शोक और दुःख हमें सताएँ, यद्यपि शैतान हम पर चेतावनी के नगाड़े बजाए और हमारे लिये घात लगाए बैठे, यद्यपि मनुष्य ऐसे हठीले और दुष्ट हो जाएँ कि कोई हमें यहाँ ठोकर मारे; कोई वहाँ मारे, और कोई हमारा सर्वनाश ढूँढ़े: और दूसरी ओर, यद्यपि हम (जैसा हम कहते हैं) पंख लटकाए हों, यद्यपि भूख से पीड़ित हों, और सब ओर से दोषी ठहराए और तुच्छ जाने जाएँ, यद्यपि ये सब बातें हमारे भाग और हिस्से में आएँ, तौभी हमें परमेश्वर के नाम को इस प्रकार धन्य कहना है कि अपनी सब पीड़ाओं और दुःखों को हल्का और शान्त करें, और सदा यह कहने को तैयार रहें, "हे प्रभु, तेरी इच्छा पूरी हो, हमारे साथ जैसा तुझे भाए वैसा कर," और यद्यपि यह सब इससे कहीं बुरा हो जाए, तौभी हमें सब कुछ धीरज से ग्रहण करना है।
अब जब हम इस धीरज तक बढ़ेंगे, तो वह (निःसन्देह) सबसे मुख्य लक्ष्य होगा जिस पर हमें निशाना लगाना है। और सब से बढ़कर इस इतिहास का हमें और भी अधिक आदर और मनन करना चाहिए, क्योंकि प्रभु हमें वह दिखाना चाहता है जो हमें अपने पिता अब्राहम से समझना है, कि हम उसके उदाहरण पर चलें। और जब परमेश्वर, (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमें इस प्रकार गढ़ चुका होगा और इस दशा तक पहुँचा चुका होगा, तब आओ हम अपने आप को और जो कुछ हमारा है उसे उसकी महिमा के प्रति समर्पित करें। क्योंकि यदि अब्राहम में यह आधार और सिद्धान्त न होता, तो निःसन्देह वह एक पग भी आगे न बढ़ाता, वरन् परमेश्वर के पास आने की अपेक्षा उससे भाग जाता: तौभी यह सिद्धान्त उसमें अपने आप से न था, परन्तु क्योंकि यह परमेश्वर का दान था, इसलिये उसे इसे अपनी इच्छा से रखना या दबाना न था: परन्तु उसका लेखा उसे देना था जिसने उसे दिया, यह कहकर, "देख, मैं यहाँ हूँ," जैसा उसने आगे दिखाया। क्योंकि जब परमेश्वर ने उसे बुलाया और कहा, "अब्राहम": तो उसने कहा, "हे प्रभु, देख, मैं यहाँ हूँ।" इस उत्तर से दिखा कि अब्राहम मानो हाथ में तैयार था कि उन आज्ञाओं को ग्रहण करे जो परमेश्वर उसे देगा, जैसा एक परिश्रमी सेवक करता है। क्योंकि यदि उसका स्वामी बाहर निकले, तो वह तुरन्त उसकी एड़ी पर होता है, यह कहने को, "क्या आप को मुझ से कुछ काम है?" और यदि उसका स्वामी घर के भीतर ठहरा रहे, तो वह कान लगाकर सुनने बैठ जाएगा कि उसका स्वामी उसे क्या आज्ञा देगा; जैसे यह करने को कहे, या अमुक स्थान पर जाने को। इस प्रकार अब्राहम ने दिखाया कि वह न अपनी सेवा करता था न अपनी इच्छाओं की, परन्तु अपने आप को परमेश्वर के प्रति ऐसा समर्पित किया कि जो कुछ उसका था वह भी उसी का था। और न उसने यह कपट से किया, जैसा बहुत से मनुष्य अपने मुँह से परमेश्वर से कह सकते हैं, "देख, मैं यहाँ हूँ": और तौभी उससे बहुत दूर हों। परन्तु जब अब्राहम ने कहा, "देख, मैं यहाँ हूँ," तब उसने इसके द्वारा प्रतिज्ञा की कि वह परमेश्वर के सम्मुख था: क्योंकि आगे उसने प्रतिज्ञा की कि उसके पाँव, हाथ, आँखें, कान, उसकी सब इन्द्रियाँ, और उसके शरीर और प्राण के सब अंग परमेश्वर की सेवा करने, और उसके जूए के नीचे गर्दन देने, और जहाँ कहीं वह उसे ले जाना चाहे वहाँ जाने को तैयार थे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हमें अपने पिता अब्राहम से क्या ग्रहण करना है: और इसलिये आओ हम समझें और जानें कि इस लक्ष्य और उद्देश्य के बिना हम (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) सर्वथा भटक जाएँगे, चाहे हम में संसार के सारे सराहनीय गुण हों, और स्वर्गदूतों के समान भी माने जाएँ, तौभी सब कौड़ी के मोल का है, जब तक हम यह न जानें कि परमेश्वर हमें देखता है, और चाहता है कि हम निरन्तर पूरी आज्ञाकारिता में उसके प्रति झुके रहें। और यद्यपि वह किसी समय हमें इधर और उधर घुमाए, और हमें अत्यन्त परिश्रम और कष्ट कराए; तौभी हम किसी दशा में उसकी आज्ञा मानना और उसका भय मानना न छोड़ें, परन्तु कहें: "हे प्रभु, देख, मैं यहाँ हूँ, मेरा जो भी हो," और उन सब बाधाओं पर क्रोधित हों जो हमें रोक और पीछे खींच सकती हैं; और उन सब कठिनाइयों, क्लेशों और संघर्षों से जो हमारे विरुद्ध उठाए जाएँ, वैर रखें: मैं कहता हूँ, हम इस सब पर क्रोधित हों, कि हम निरन्तर अपने मार्ग पर बढ़ते जाएँ, जब तक कि उस लक्ष्य और चिह्न तक न पहुँच जाएँ जिसकी ओर परमेश्वर हमें बुलाता है: अर्थात् जब तक हम अपने सब दुःखों और क्लेशों से छुड़ाए न जाएँ, और उसके स्वर्गीय राज्य के विश्राम का आनन्द न लें।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने पापों को मानते हुए दण्डवत् करें, उससे बिनती करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम उनसे अप्रसन्न हों, और उनसे अधिक से अधिक छूटते जाएँ, और उसकी धार्मिकता से ऐसे ढके जाएँ कि वह हम में पूर्णतः राज्य और शासन करे, कि इस प्रकार हम अपने आप को उसका प्रगट करें, क्योंकि उसने हमें बहुत मूल्य देकर मोल लिया है: और यह कि यीशु मसीह ने मरकर और जी उठकर हमें अपने लिये मोल लिया है, कि हमें अपनी महिमा का सहभागी बनाए, और जीवन और मृत्यु दोनों में हमारी निरन्तर अगुवाई करे।
समाप्त।
