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मलिकिसिदक पर तीसरा उपदेश
जिसमें दशमांश के प्रयोग और अधिकार का, और साथ ही शपथ का भी वर्णन किया गया है।
उत्पत्ति अध्याय 14। और अब्राम ने सब वस्तुओं का दसवाँ अंश मलिकिसिदक को दिया।
21 तब सदोम के राजा ने अब्राम से कहा, मनुष्यों को मुझे दे, और धन-सम्पत्ति अपने पास रख।
22 अब्राम ने सदोम के राजा से कहा, मैंने परमप्रधान परमेश्वर यहोवा की ओर, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, अपना हाथ उठाया है।
23 कि जो कुछ तेरा है, उसमें से मैं एक सूत या जूती का बन्धन तक न लूँगा, ऐसा न हो कि तू कहे, कि मैंने अब्राम को धनी बनाया।
24 केवल वही जो जवान खा चुके हैं, और उन मनुष्यों का भाग जो मेरे साथ गए थे, अर्थात् आनेर, एशकोल और मम्रे; वे अपना-अपना भाग ले लें।
कल हमने विस्तार से विचार किया था कि मलिकिसिदक, जिसका यहाँ उल्लेख हुआ है, हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह का एक प्रतिरूप और प्रतिमा था, क्योंकि वह अब्राम से, जो कलीसिया का पिता था, मर्यादा में बड़ा था; और जैसा भजन संहिता में भी कहा गया है, कि आनेवाला छुड़ानेवाला केवल राजा ही नहीं वरन् मलिकिसिदक की रीति पर याजक भी होगा। हमने यह भी दिखाया था कि यह सब किसलिए कहा गया, यह हमारे किस काम का है, और इससे हमें क्या लाभ मिलता है। अन्त में आशीर्वाद का भी वर्णन किया गया था, अर्थात् यह कि मलिकिसिदक में जो पद और क्रम था उसकी सामर्थ्य से अब्राम को आशीष मिली; और इससे यह दिखाया गया कि हमारी सब प्रार्थनाएँ परमेश्वर की महिमा के सम्मुख घृणित ठहरेंगी और उसके हाथ से कुछ भी प्राप्त न कर सकेंगी, यदि यीशु मसीह हमारे लिए मध्यस्थता न करे; और यही पद पवित्र शास्त्र में उसी को सौंपा गया है।
अब यहाँ कहा गया है कि अब्राम ने सब वस्तुओं का दसवाँ अंश मलिकिसिदक को दिया। इससे उस याजकीय मर्यादा का प्रमाण मिलता है जो मलिकिसिदक में थी, जैसा प्रेरित ने भी भली-भाँति स्मरण कराया है। परन्तु इससे हमें निश्चय के साथ यह नहीं ठहराना चाहिए कि ये शब्द लूट से सम्बन्ध रखते हैं या अब्राम की अपनी सम्पत्ति से। क्योंकि जब उसने लूट में से अपने लाभ के लिए कुछ भी ग्रहण नहीं किया, तो यह सम्भव नहीं कि वह मलिकिसिदक को वह वस्तु देना चाहता जिसे वह अपनी नहीं मानता था। परन्तु परमेश्वर के प्रति अपनी स्वीकृति प्रकट करने का उसका कारण और ढंग कुछ और ही था, न कि उसे अपने उपयोग में लगाकर अपने को धनी बनाने का। फिर भी, चाहे जो हो, इतना ही पर्याप्त है कि हम उस बात को थामे रहें जो निश्चित है, अर्थात् यह कि अब्राम यह प्रमाणित करता है कि उसने मलिकिसिदक को परमेश्वर का याजक माना। क्योंकि यदि वह मूरतों की सेवा करता, या किसी ऐसी मर्यादा को हड़पता जो उसकी नहीं थी, तो उसे दशमांश देकर अब्राम ने बहुत बुरा किया होता; क्योंकि हम जानते हैं कि मूरतों को बलिदान चढ़ाना उनका आदर करना और परमेश्वर को त्याग देना है। इसलिए अब्राम की यह भेंट अवश्य ही मलिकिसिदक के याजकत्व की साक्षी और पुष्टि थी। और इसी से हम देखते हैं कि प्रेरित, व्यवस्था के प्राचीन याजकत्व की तुलना हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के याजकत्व से करते हुए, क्यों कहता है कि लेवी ने, जो उस समय अब्राम की कमर में था, दशमांश दिया; अर्थात् वह उस व्यवस्था के अधीन था।
यही बात हम यहूदा के विषय में भी कह सकते थे, जिसके वंश से हमारा उद्धारकर्ता मसीह आया। फिर भी इसका उत्तर सहज है, अर्थात् यह कि मलिकिसिदक को हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह उसी का प्रतिनिधित्व करता है, और जो भी उत्कृष्टता उसमें है वह इसी पर निर्भर है कि वह यीशु मसीह का प्रतिरूप है। और इसलिए प्रेरित ने बहुत उचित रीति से दिखाया कि जिसे व्यवस्था के अनुसार दशमांश पाने का अधिकार था, वह भी मलिकिसिदक के अधीन ही था। इसलिए हमें इससे यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हमारा प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह हारून से, और उसके सब उत्तराधिकारियों से भी, कहीं अधिक श्रेष्ठ है, चाहे वे इस दृष्टि से मनुष्यों की मण्डली से मानो अलग ही किए गए थे।
और जब याजक अपने सब याजकीय वस्त्र पहने होता था, तो वह केवल यह दिखाने के लिए था कि वह परमेश्वर के एक स्वर्गदूत के समान है, जो उसकी महिमा के निकट आ सकता है, और लोगों के अधर्म और अपराधों को मिटाने के लिए मध्यस्थ है। और यद्यपि यह सब ऐसा ही था, तौभी प्रेरित दिखाता है कि हमारा प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह आदर में उससे कहीं बढ़कर है, और उसे व्यवस्था की सब छायाओं से ऊपर ऊँचा किया जाना चाहिए, जिससे मनुष्य उसे उन सब का यथार्थ सत्य और सार जानें। और यद्यपि मनुष्य एक समय के लिए जितनी भी छायाएँ थीं उन सब को ग्रहण कर लें, तौभी उन्हें कुछ लाभ न होगा, और वे सब निष्फल ठहरेंगी, जब तक कि वे सच्चे नमूने तक न पहुँचें।
इसलिए हम भली-भाँति विचार करें कि जब अब्राम ने सब दशमांश मलिकिसिदक को चढ़ाए, तो यह दिखाने के लिए था कि यद्यपि परमेश्वर शीघ्र ही अपने लोगों में याजकत्व का एक क्रम स्थापित करेगा, तौभी उससे हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के याजकत्व की कोई हानि नहीं होती, जिसका प्रतिरूप मलिकिसिदक के व्यक्तित्व में पहले ही दिखाया जा चुका था, मानो वह उस समय ही स्थापित हो चुका हो। फिर, याजकों को दशमांश देने के विषय में हम देखते हैं कि अब्राम ने यह तब किया जब कोई लिखित व्यवस्था नहीं थी; इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह परमेश्वर का आत्मा ही था जिसने उसे इसके लिए प्रेरित किया और उकसाया।
क्योंकि मूसा यहाँ यह नहीं बताता कि यह कार्य यों ही और बिना कारण किया गया; वरन् वह यह प्रकट करता है कि परमेश्वर ने मलिकिसिदक के पद की पुष्टि की, क्योंकि वह उसे अपना याजक बनाना चाहता था, और अब्राम ने उसे ऐसा ही स्वीकार किया। तौभी हमें इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि इसके लिए कोई सामान्य व्यवस्था थी, और न यह कि विश्वासियों पर दशमांश देना अनिवार्य था, जब तक कि परमेश्वर ने उसे अपनी व्यवस्था में भी ठहरा न दिया हो; और यह उसने केवल इसलिए नहीं किया कि वे पृथ्वी की उपज से उसका आदर करें, और यह मानें कि वह सब उसकी निरी उदार दया से आया है; न ही यह केवल वेदी के सेवकों के पालन-पोषण के लिए था, अर्थात् उनके लिए जो मन्दिर में सेवा करते थे; वरन् इसलिए कि वे अब्राम के वंश से थे। अतः भूमि का एक भाग उनका था जिन्हें उस पर अधिकार करना था, जैसा अब्राम से कहा गया था: “तेरा वंश इस देश का अधिकारी होगा।” लेवी को अब्राम के घराने में एक प्रधान पुरुष होना था; पर उसे उससे निकाल दिया गया; और उसके स्थान पर यूसुफ के घराने से दो प्रधान पुरुष बनाए गए, अर्थात् एप्रैम और मनश्शे।
यहाँ हम देखते हैं कि लेवी को उसके निज भाग से वंचित किया गया, यद्यपि वह पहले स्वयं परमेश्वर की ओर से उसे दिया गया था। और इसी कारण उसके उत्तराधिकारियों को दशमांश से पूर्ति की जाती है। अब परमेश्वर ने यह दो कारणों से किया: पहला यह कि वे न तो उस सेवा से, जो उनके सुपुर्द की गई थी, और न शिक्षा से विचलित हों। क्योंकि परमेश्वर ने व्यवस्था के अधीन याजकों को केवल रीति-विधियाँ पूरी करने के लिए नहीं चुना था, वरन् एक और कारण से, जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ता मलाकी करता है; अर्थात् उसने उन्हें अपने राजदूत ठहराया, ताकि हम उनके होठों से सच्चा ज्ञान और व्यवस्था की शुद्ध व्याख्या माँगें।
इसलिए, कि याजकों को मन्दिर की सेवा में लगे रहने और लोगों को सिखाने के लिए पर्याप्त अवकाश मिले, उनके लिए दशमांश ठहराए गए। और इसी कारण वे सारे देश में बिखेर भी दिए गए। उनका कोई अलग और निज बँटवारा नहीं था कि वे औरों के समान किसी एक निश्चित देश में बसते; वरन् वे यहाँ-वहाँ बोए गए, ताकि संसार में कोई ऐसा कोना न रहे जहाँ परमेश्वर के दूत और व्यवस्था-दाता उसके लोगों को भय में रखने के लिए न हों।
यहाँ (मैं कहता हूँ) हम वह कारण देखते हैं कि परमेश्वर ने क्यों चाहा कि उन्हें दशमांश मिले, और वे भूमि जोतने और बोने में न लगें। दूसरा कारण यह है कि यदि वे भूमि के अधिकारी होते, तो परमेश्वर वैसा प्रभु और स्वामी न जाना जाता जैसा वह तब जाना गया जब लेवीय याजक मानो उसके प्रतिनिधि बन गए, और उसने उन्हें अपने नाम से भेजा कि वे अधिकार ग्रहण करें और पृथ्वी पर उसके योग्य श्रद्धा-भेंट माँगें।
और इसके अतिरिक्त, यद्यपि इस्राएली अपने पिता अब्राम के उत्तराधिकार और विरासत के रूप में वह पाते थे जो उनका था, तौभी परमेश्वर मानो उन्हें दिखाना चाहता था कि पृथ्वी उसकी है, और उसने उसका स्वामित्व अपने ही पास रखा; और वे उसे इस शर्त पर रखते थे कि जो कुछ उनके पास हो उसे वे उसी की ओर से मानकर रखें, और काम और परिणाम में भी वैसा ही प्रकट करें। और साथ ही यह भी कि उन दशमांशों में से कंगालों को भेंटें दी जाएँ; क्योंकि यह नहीं कहा गया कि याजक सब कुछ खा-पी जाएँ, वरन् अपने को मर्यादा में रखें, और इस प्रकार दिखाएँ कि वे सामान्य व्यवस्था से मुक्त नहीं थे, वरन् जो भोजन वे खाते थे उसके लिए परमेश्वर के ऋणी थे, और सब कुछ उसकी निरी भलाई से आता था।
तो हम देखते हैं कि व्यवस्था में जो दशमांश बताए गए थे वे विशेषकर इस्राएल के लोगों के लिए थे। फिर भी अन्यजातियों में, यहाँ तक कि राजाओं, हाकिमों और कुलीनों के लिए भी, दशमांश बहुत प्रचलित थे। लौकिक इतिहासों से भी हम देखते हैं कि वे वसूल भी किए जाते थे, और कुछ देशों में दूसरों से अधिक वसूल किए जाते थे, भूमि की उपजाऊ शक्ति और अच्छाई के अनुसार; क्योंकि उन किसानों के लिए, जिनकी भूमि चिकनी और भरपूर उपज देनेवाली थी, आठवाँ अंश देना उतना बड़ा बोझ नहीं था जितना उनके लिए दसवाँ अंश देना था जिनकी भूमि पतली और बंजर थी।
परन्तु चाहे जैसा हो, यह शब्द दशमांश या दसवाँ अंश सब जातियों में सामान्य और प्रचलित रहा है। और सब हाकिमों और बड़े लोगों ने, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जब से सुसमाचार ग्रहण किया गया, दशमांश का कुछ भाग वचन के सेवकों के पालन-पोषण के लिए दिया है, जो बहुत उचित भी है, सन्त पौलुस के इस कथन के अनुसार, “कि जो पुराने नियम में वेदी पर सेवा करते थे उनका पालन-पोषण होता था, तो जो आज उत्कृष्टतर रीति से परमेश्वर को बलिदान चढ़ाते हैं, अर्थात् जो प्राणियों को उसके लिए जीतते हैं कि उन्हें उसकी महिमा के लिए बलिदान बनाएँ, उनके लिए भी उचित प्रबन्ध और पालन-पोषण होना चाहिए: और यद्यपि परमेश्वर ने यह निर्धारित नहीं किया कि किस रीति से या किस आय से उनका पालन-पोषण हो, तौभी इसके लिए एक व्यवस्था तो है।
अब जब से परमेश्वर सुसमाचार के प्रचार के द्वारा जाना गया है, तब से दशमांश के एक भाग को देने और ठहराने के लिए एक मसीही व्यवस्था और विधि बनाई गई है। और इसमें हम पोप और उसके अनुयायियों का छल देख सकते हैं; क्योंकि जब वे अपने कैनन-नियमों में दशमांश की व्यवस्था का वर्णन करते हैं, तो उसे ऐसा लेते हैं मानो यीशु मसीह के लेवी के याजकत्व का अन्त कर देने के पश्चात् वह उन्हें सौंप दी गई हो। ये सब निरे झूठ हैं, जो पवित्र शास्त्र को बिगाड़ते और दुष्टता से उसे भ्रष्ट करते हैं। क्योंकि हम इसके विपरीत देखते हैं, जैसा पहले दिखाया जा चुका है, कि बहुत समय से यह नहीं जाना जाता था कि मूसा की व्यवस्था के बल पर दशमांश देना क्या होता है, और वे सदा या तो सम्राट को, या किसी और विशेष बड़े पुरुष को दिए जाते थे।
परन्तु अब जब बात इस प्रकार ठहराई जा चुकी है (बशर्ते कि कोई दुरुपयोग न हो, और सब सत्य के विपरीत लोगों को यह विश्वास न दिलाया जाए कि यह पवित्र शास्त्र से आया है; वरन् इसे एक राजनैतिक व्यवस्था माना जाए), तो हम वह नियम थामे रहें जो सन्त पौलुस ने बताया है: अर्थात् यह कि जब बैल हमें खिलाने के लिए परिश्रम करता है तो हम उसका मुँह न बाँधें; और इसलिए यह कहीं अधिक उचित है कि जो लोग ऐसे उत्कृष्ट पद पर ठहराए गए सुसमाचार की शिक्षा का प्रचार करते हैं, उनके पालन-पोषण में कटौती न की जाए और उन्हें उससे वंचित न किया जाए, वरन् उन्हें भली-भाँति वेतन मिले।
अब, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जब दशमांश और ऐसी वस्तुएँ किसी अच्छे काम में लगाई जाती हैं, तब हमें बात को इतनी कठोरता से नहीं परखना चाहिए कि यह पूछें कि ऐसा क्यों है, जैसा बहुत-से सनकी लोग करते हैं, जो आज सारे संसार को उलट-पुलट कर देने में सन्तुष्ट होंगे, यह कहते हुए, “ओह, अब दशमांश देने का समय नहीं रहा, क्योंकि जब इसका इतने समय तक दुरुपयोग होता रहा है, तो उचित नहीं कि यह और चलता रहे।” तब तो उनके कहने के अनुसार हमें सब कुछ खुरचकर मिटा देना होगा; क्योंकि वे समझते हैं कि मसीही धर्म सूर्य और चन्द्रमा का रंग बदलने में है।
परन्तु यदि कुछ ऐसा है जिसे सुधारना चाहिए, जैसा मैंने कहा, जैसे यदि पोप के अनुयायियों ने कोई झूठा मत चला दिया हो, तो उसे बिलकुल मिटा दिया जाए। परन्तु इस बीच हम हर उत्तम विधि को थामे रहें: अर्थात् दशमांश और ऐसी सब वस्तुएँ जो कंगालों और सेवकों के पालन-पोषण के लिए हैं, वे अपने वैध उपयोग में लौटा दी जाएँ, और अतृप्त चौड़े गले सब कुछ निगल न जाएँ। वे उन्हें अपनी फ़ालतू वस्तुओं, ठाट-बाट, मतवालेपन और अन्य उच्छृंखलताओं में न उड़ाएँ; वरन् जान लें कि ये पवित्र वस्तुएँ हैं, जो कलीसिया के काम के लिए रखी जानी चाहिए, जैसा मैं कह चुका हूँ, कंगालों के पालन-पोषण के लिए भी, और उनके पोषण के लिए भी जो परमेश्वर और उसके लोगों की सेवा करते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि उचित था कि हम चलते-चलते दशमांश की व्यवस्था को भी छू लें; और अब हम आगे की बात की ओर बढ़ें। मूसा अब सदोम के राजा की ओर लौटता है, जिसके विषय में उसने पहले कहा था, और मलिकिसिदक के विषय में कहना छोड़ देता है। वह कहता है कि सदोम का राजा केवल मनुष्य ही चाहता था, और सारी लूट अब्राम के लिए छोड़ देता था: मानो वह कहना चाहता हो कि जो कुछ उसके शत्रुओं ने उससे छीन लिया था उसमें से वह कुछ भी नहीं माँगता, क्योंकि वह भली-भाँति जानता था कि अब्राम ने उसे जीतकर पाया है; वह केवल मनुष्य और अपना निवास-स्थान चाहता था।
हम नहीं जानते कि उसने यह कपट से किया या नहीं, यह देखते हुए कि सब कुछ अब्राम के हाथ में था; या सचमुच उसने समझा कि अब्राम सब कुछ के योग्य है, और यही बहुत है कि वह और उसके लोग शत्रुओं के हाथ से छुड़ाए गए। परन्तु जैसा भी हो, कहा गया है कि अब्राम ने वह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, कि वह उसका कुछ भी न लेगा, एक सूत या जूती का बन्धन तक नहीं। अर्थात्, जैसा हम साधारणतः कहते हैं, एक पिन के मोल की भी वस्तु नहीं; केवल उसे छोड़कर, वह कहता है, जो जवान खा चुके हैं: क्योंकि वे वहाँ कोई हिसाब चुकाने नहीं आए थे, और इसके अतिरिक्त सदोमियों को छुड़ाने के लिए अपने प्राण जोखिम में डालने के बदले उन्हें इससे कम प्रतिफल नहीं मिल सकता था।
अच्छा महाशय, जो उन्होंने खा लिया है, उसे, मैं कहता हूँ, रहने दो: परन्तु जो मेरे साथ आए, आनेर, एशकोल और मम्रे, उन्हें तो लूट में से अवश्य ही अपना भाग मिलना चाहिए: क्योंकि मैं उनके लाभ में से कुछ भी नहीं घटाऊँगा, और न मेरा यह काम है कि उन पर कोई व्यवस्था या अनिवार्यता थोपूँ: मैं उदार हूँ, इसलिए उन्हें किसी प्रकार तंग या नाप-तौलकर नहीं दे सकता। वे अपना-अपना भाग ले लें; जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं कुछ न लूँगा।
और अपनी बात को और दृढ़ करने के लिए वह कहता है, “मैंने परमप्रधान परमेश्वर यहोवा की ओर, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, अपना हाथ उठाया है,” मानो वह कहना चाहता हो कि उसने शपथ खाई है और उसे पूरा करेगा, क्योंकि उसके लिए अपना वचन वापस लेना उचित नहीं था, और इस प्रकार इस विषय में उसका मुँह बन्द करना चाहता था। यहाँ हम देखते हैं कि अब्राम का अभिप्राय सब ठोकरों से बचना था, जब उसने अपनी किसी भी वस्तु से कुछ लाभ उठाने से इनकार किया। क्योंकि यदि वह युद्ध जो उसने हाथ में लिया था उचित था, तो वह मनुष्यों के न्याय में उचित रीति से वह सब अपने पास रख सकता था जो उसने पाया था; परन्तु क्योंकि वह दिखाना चाहता था कि वह लोभ की इच्छा में बहक नहीं गया, और उसने लाभ के लिए शस्त्र नहीं उठाए, इसलिए उसने कहा कि वह उसका एक सूत तक भी न लेगा: और यह कहने में, “ताकि तू यह न कहे कि तूने अब्राम को धनी बनाया,” निश्चित है कि वह महत्त्वाकांक्षी नहीं था। जैसा हम प्रायः देखेंगे कि बड़े मन के लोग दूसरों की सम्पत्ति से अपने को धनी बनाना सहर्ष चाहते हैं: परन्तु क्योंकि वे संसार की लज्जा और निन्दा से डरते हैं, इसलिए दिखावे के लिए वे उसमें एक प्रकार की दृढ़ता दिखाते हैं।
परन्तु अब्राम ने ऐसा नहीं किया: वरन् जैसा मैंने कहा, उसने यह इसलिए किया कि वह नहीं चाहता था कि उसके कारण परमेश्वर के नाम की निन्दा हो। क्योंकि कहा जा सकता था, क्या कहें? यह मनुष्य, जहाँ तक हम अब तक देख सकते हैं, अब तक बहुत सीधा-सादा दिखता रहा, और अकेले परमेश्वर की उपासना करता है, और आश्चर्यजनक रूप से भक्त है: वह कहता है कि उसने परमेश्वर की आज्ञा से अपना देश छोड़ा, और फिर भी वह युद्ध करता है, लूटता और उजाड़ता है, और इसलिए कोई भी देख सकता है कि वह चोर से अच्छा नहीं। यहाँ हम देखते हैं कि अब्राम के नाम के कारण परमेश्वर का नाम बहुतों की निन्दा के जोखिम में पड़ गया होता। और इसी कारण उसने अपने को मर्यादा में रखा।
अब यह हमारी शिक्षा के लिए लिखा गया है। क्योंकि पहले तो हमें यह नियम ध्यान में रखना है कि यह पर्याप्त नहीं कि हमारे विवेक परमेश्वर के सम्मुख शुद्ध हों, वरन् हमें यह भी यत्न करना चाहिए (जैसा सन्त पौलुस हमें इसका उदाहरण दिखाता है) कि अपने पड़ोसियों में हमारी अच्छी प्रतिष्ठा और भली धारणा हो: और क्यों? इसलिए कि वे हमें दोषी न ठहराएँ, इस कारण कि उनकी हमारे विषय में यह धारणा हो कि हम कोई बुरा काम न करेंगे, वरन् उन्हें भले कामों के लिए उभारें।
यह सच है कि हम बहुत-से कुत्तों के काटने और भौंकने से कभी बच न सकेंगे: वरन् यदि हम सब दाग और कलंक से रहित भी हों, तौभी वे हमारी निन्दा और बुराई करना कभी न छोड़ेंगे: क्योंकि परमेश्वर के पुत्र को भी इसमें अपना भाग मिला, और सब भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों पर भी झूठी बातें लगाई गईं। और इसलिए (जैसा सन्त पौलुस दूसरे स्थान पर कहता है) हमें सदा भला करने को तैयार रहना है, और फिर भी हमारी बुराई की जाएगी, हमारा बहुत उपहास होगा, तिरस्कार और अपमान होगा, क्योंकि यही हमारा प्रतिफल होना है: तौभी हमें जहाँ तक हमसे हो सके, उन लोगों को, जो इसकी ताक में रहते हैं, कोई अवसर न देना चाहिए, वरन् उनके मुँह बन्द करने चाहिए, ताकि, जैसा मैं कह चुका हूँ, हमारी चूक के कारण परमेश्वर के नाम की निन्दा न हो।
तो यहाँ हम देखते हैं कि हमें अब्राम का अनुकरण किस बात में करना है, अर्थात् हमें यह समझना है कि सब ओर से हम पर दृष्टि रखी जाती है: वरन् यदि न भी रखी जाती हो, तौभी अपने पड़ोसियों के प्रति हमारा यह कर्तव्य है कि हम निर्बलों को, जो हमसे कोई बुरा उदाहरण ले सकते हैं, कोई ठोकर न दें। क्योंकि निश्चय जानें कि सदा ऐसे दुष्ट मनुष्य होंगे जो हम पर दोष लगाने, हमसे झगड़ा खोजने और हमें बदनाम करने का यत्न करेंगे: फिर भी इस सब के होते हुए (जैसा मैं कह चुका हूँ) हम निर्मल और निर्दोष रहें। क्योंकि परमेश्वर की यह इच्छा है कि हम मानो मंच पर खड़े किए जाएँ, कि उसका नाम और चिह्न धारण करें, जैसा सन्त पौलुस फिलिप्पियों से कहता है, और दूसरी ओर दुष्टों के सामने ज्योति की नाईं चमकें: और यद्यपि वे हठीले और कुटिल लोग हैं, तौभी हम उनके सामने पवित्रता और भक्ति से चलें: कि वे इससे लज्जित हों, क्योंकि हममें कुछ ऐसा न पा सकें जिससे हमारी बुराई की जाए: और इस प्रकार वे और भी निरुत्तर ठहरें, जब वे हमें जीवन की खराई से परमेश्वर की सेवा करते, और अपने आपको सब छल, दुष्टता और ऐसी ही बातों में लगा हुआ देखेंगे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि इस शिक्षा को हमें व्यवहार में कैसे लाना है। अब, जहाँ तक अब्राम के कार्य का सम्बन्ध है, हम यहाँ देखते हैं कि उसका विवेक कैसा शुद्ध था। क्योंकि जब कोई एक बार हाथ में ले लिया जाता है, तो हम समझते हैं कि हमारे लिए जो चाहें करना उचित है, जैसा एक प्राचीन कहावत में कहा गया है, “कि जब युद्ध छिड़े हों, तब व्यवस्थाएँ थम जाती हैं”: यद्यपि वास्तव में तब नीति और व्यवस्था होती है, क्योंकि तब शान्ति के समय से अधिक उसकी आवश्यकता होती है: और एक प्रकार का अधिकार भी होना चाहिए, कि हर सेनापति की आज्ञा मानी जाए, सब सिपाही अपने झण्डे या ध्वज के साथ रहें, लोग सब जोखिमों में अपने आपको न डालें, और शत्रु से सावधान रहने में बहुत चौकस रहें।
और इसलिए ये बातें जो शस्त्रों के कार्यों से सम्बन्ध रखती हैं, उनके नियम, व्यवस्थाएँ और विधियाँ होनी चाहिए: फिर भी बहुत-से अत्याचार किए बिना कोई युद्ध होना असम्भव है। और इसी कारण वे सब जो अपनी तलवारें खींचने की सोचते हैं, उन्हें काँपना और थरथराना चाहिए जब-जब वे उस पूँछ और परिणाम का विचार करें जो उसके पीछे खिंचा चला आता है। क्योंकि ऐसे मेल-जोल में बहुत-से निर्दोषों का मारा जाना, बहुत-से घरों, अनाथ बालकों और विधवाओं का लुटना और उजड़ना अनिवार्य है: और यह भी कि जो सबसे असमर्थ हैं उनकी सम्पत्ति उनसे छीन ली जाएगी, जैसी सिपाही को अपनी घटी जान पड़ेगी: और इस सब के अतिरिक्त, यदि उन्हें रसद की कमी हो, और पेट को लगे कि उसे अकाल सहना पड़ेगा, तो वे किसी को नहीं छोड़ेंगे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि युद्ध स्वयं सदा अपने साथ अव्यवस्था लाता है। फिर, जो लड़ाई पर जाते हैं, चाहे उनके पास कितने ही वैध अधिकार हों, और वे बड़ा कारण और हेतु दिखा सकें जो उन्हें इसके लिए प्रेरित करता है, वरन् मानो अनिवार्यता से उसे करने को विवश हों: तौभी वे जो कुछ करें उसमें पर्याप्त छूट लेने और अपने आपको क्षमा करने में हिचकेंगे नहीं: क्योंकि वे यों कहेंगे, “यदि मेरे शत्रु ने मुझे जीत लिया होता, तो वह क्या करता? क्या तुम समझते हो कि वह मुझे या मेरों को छोड़ देता? निःसन्देह यदि उसने मुझे जीता होता, तो मेरा सब कुछ लूट लेता, सब कुछ तहस-नहस हो जाता: और जब ऐसा ही है, तो मैं भी वैसा ही क्यों न करूँ?”
इस प्रकार हम देखते हैं कि जो युद्ध करते हैं वे कैसे अपने आपको क्षमा करते और ऐसी छूट लेते हैं कि जब वे हाथ लगी हर वस्तु को लूटते और बटोरते हैं तो समझते हैं कि कोई हानि नहीं कर रहे; और फिर भी हम देखते हैं कि अब्राम ने ऐसा नहीं किया। यह सच है कि जब इस्राएली कनान देश में घुसे, तो उन्होंने अपने सामने का सारा देश लूट लिया। परन्तु क्यों? क्योंकि प्रभु ने उन्हें ऐसी ही आज्ञा दी थी, और इसलिए वे और कुछ कर नहीं सकते थे: वरन् उन्हें बड़ी कठोरता से दण्ड भी मिला, क्योंकि उन्होंने उस देश के निवासियों को छोड़ दिया। और इसके अतिरिक्त परमेश्वर ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि उन्होंने उनमें से किसी एक को भी जीवित छोड़ा, तो वे उनकी पसलियों में अंकुश और उनकी आँखों में काँटों और चुभनों के समान होंगे। परन्तु इस मामले में एक विशेष कारण है: क्योंकि अब्राम परमेश्वर की ओर से इसलिए नहीं ठहराया गया था कि शस्त्र धारण करके सदोम नगर और आसपास के नगरों को उनके निवासियों से शुद्ध करे, और न उन पर प्रभुता करे। क्योंकि वह केवल अपने भतीजे लूत को छुड़ाने नहीं गया था: यद्यपि इस रीति से परमेश्वर ने सदोमियों और उनके पड़ोसियों पर भी दया की, क्योंकि वह उस दण्ड को, जो उसने उनके लिए ठहरा रखा था, थोड़े समय के लिए टालना चाहता था: इसलिए अब्राम ने, यह जानते हुए कि उसने शस्त्र किस कारण उठाए हैं, कोई छूट नहीं ली, और न चतुराई से अपने आपको निर्दोष ठहराने का यत्न किया, जैसा लाभ की ताक में रहनेवाले करते हैं: वरन् कहा कि वह कुछ न लेगा। फिर भी वह आनेर, एशकोल और मम्रे के किसी भी देय भाग को नहीं घटा सका, क्योंकि वे ऐसे मनुष्य थे जिन पर उसका कोई अधिकार नहीं था। क्योंकि वे अपनी इच्छा से उसके साथ वहाँ आए थे: और उसके मित्र और सहयोगी होने के नाते उन्होंने उसकी सहायता की, ताकि उसके भतीजे लूत को वापस लाएँ: और इसलिए वह किसी प्रकार उनका कोई अधिकार उनसे नहीं छीन सकता था। यहाँ एक ओर हम देखते हैं कि अब्राम कैसा संयमी मनुष्य था, और दूसरी ओर हम देखते हैं कि यद्यपि उसने एक पिन के मोल की भी वस्तु नहीं ली, तौभी उसके साथ ऐसा हुए बिना न रहा कि उसे इससे हानि और क्षति पहुँची, और जो उसकी संगति में थे उनका लुटना भी अनिवार्य था: जिससे और भी प्रत्यक्ष होता है कि जो कोई भी युद्ध आरम्भ करे, चाहे वह मानो स्वर्ग के स्वर्गदूत के समान हो, जो न सोने की, न चाँदी की चिन्ता करता हो, और इसे स्वीकार करने से कि प्राण जोखिम में डालने के बहाने वह आधे पैसे के मोल का भी लाभ उठाए, मर जाना उत्तम समझता हो: तौभी वह युद्ध स्वयं सदा अपने साथ बहुत-से पाप और अधर्म, अथवा आश्चर्यजनक अति लाता है: और यद्यपि उसे उचित रीति से वैध कहा जा सकता है, तौभी यह नहीं हो सकता कि बड़ा अत्याचार न किया जाए, और बहुत-से लोग, जैसा हम कहते हैं, रोते हुए घर न लौटें: क्योंकि किसी का घर जला दिया जाएगा, दूसरा लूटा जाएगा, तीसरे की बिछावन के पुआल तक की तलाशी ली जाएगी, और चौथा अपने सब माल से ऐसा लुट जाएगा कि बिलकुल नंगा रह जाएगा।
और इसलिए जब कभी खुले युद्ध होते हैं, तब रोना-पीटना और हाथ मलना अवश्य होता है: इसलिए हमें सदा चेताया जाना चाहिए कि हम मानो मुट्ठी बन्द रखें: और चौकस रहें कि ऐसी अव्यवस्थाओं में न पड़ें जिनका कोई उपाय न मिल सके, चाहे वे अपने शासन में ऐसा मन रखते हों जैसा स्वयं स्वर्गदूतों का होता है, जैसा मैं कह चुका हूँ। संक्षेप में, जो न्यायसंगत रीति से अपनी रक्षा करते हैं और ऐसा करने को विवश हैं, उन्हें भी ऐसी बुद्धिमानी और सावधानी से व्यवहार करना चाहिए कि कम से कम हमारे पिता अब्राम के पदचिह्नों पर चलें। और यदि इससे बचा न जा सके कि बड़ी अति, बड़ी हानि और लूटपाट हो, तौभी वे कम से कम मन में यह ठान लें कि युद्ध को उतावली से, अपनी हठ से और लूट के लिए हाथ में न लेंगे: वरन् वह किसी देश की न्यायसंगत रक्षा के लिए हो, जब उस पर कोई दुष्ट और हानिकारक हिंसा चढ़ आए। क्योंकि मनुष्य किसी भी राजा या हाकिम के विरुद्ध अपनी रक्षा कर सकते हैं, यदि वह उन पर चढ़ाई करे जो शान्ति से जीना चाहते और उसकी मित्रता माँगते हैं। इसलिए मनुष्य सदा यह ध्यान रखें कि महत्त्वाकांक्षी और अभिमानी न हों, और न दूसरे का धन चाहें: अथवा यदि कोई शस्त्र उठाए, तो वह इस बात को भली-भाँति देखे जो यहाँ अब्राम के विषय में कही गई है, और उसके उदाहरण के अनुसार अपने को ढाले। क्योंकि पवित्र आत्मा का अभिप्राय केवल यही नहीं था कि उसकी प्रशंसा करे कि वह लोभी न था और सोने-चाँदी की चिन्ता नहीं करता था: वरन् उसने उसे हमारे सामने दर्पण के समान रखा है, कि हम सीखें कि वैसा करने के लिए किस नियम पर चलें।
क्योंकि अपनी लापरवाह लूटपाट और डकैती को ढाँकने के लिए हम बहुत-से मूर्खतापूर्ण बहाने ढूँढ़ सकते हैं: परन्तु जब तक हम अपने पिता अब्राम के उदाहरण के अनुसार अपने को न ढालें, तब तक वे हमारे काम न आएँगे। और यही हमें इस स्थान से सीखना है।
तौभी अब्राम ने सदोम के राजा से केवल इतना सीधा-सादा कह देने से सन्तोष नहीं किया: वरन् उसने शपथ भी खाई, और कहा कि उसने अपने आपको शपथ से बाँध लिया है, कि सब के मुँह बन्द कर दे, और सब आपत्तियाँ काट दे, ताकि राजा आगे बढ़कर यह न कहे, अच्छा तो तेरे लिए उत्तम होगा कि लूट ले ले: नहीं, अब्राम कहता है, जो मैंने कह दिया है उसी पर अटल रहूँगा। और इसके अतिरिक्त मैंने परमप्रधान परमेश्वर यहोवा की ओर अपना हाथ उठाया है।
अब हाथ उठाने का यह कथन-प्रकार इसलिए है कि जो मनुष्य मन्द और सांसारिक हैं, उन्हें शपथ खाते समय किसी चिह्न और संकेत के द्वारा स्मरण दिलाया जाए कि यह मानो परमेश्वर को न्यायी के रूप में साक्षी बनाना है। वास्तव में यह शब्द स्वयं भी यही अर्थ रखता है, जब हम कहते हैं मैं परमेश्वर के सामने घोषणा करता हूँ, या परमेश्वर मेरा साक्षी है, या नहीं तो परमेश्वर मुझे दण्ड दे। अब जब हम यह कथन-प्रकार प्रयोग करते हैं, तो यदि हम झूठ बोलें या किसी प्रकार का छल करें तो हमारे सिर के बाल खड़े हो जाने चाहिए, क्योंकि परमेश्वर अपने आपको नहीं त्यागेगा कि हमारे झूठों से सहमत हो, क्योंकि यदि वह ऐसा करे तो उसे अपनी ही महिमा की चापलूसी करनी पड़े। क्योंकि वह उतना ही सच्चा है जितना उसका सार-तत्त्व अपरिवर्तनीय है।
तो शब्द अपने आप में पर्याप्त हैं: फिर भी हम इतने मन्द और जड़ हैं कि हमें स्मरण दिलाने के लिए कुछ सहायताओं की बड़ी आवश्यकता है, और साथ ही यह भी कि शपथ खाते समय हम उसकी महिमा के सामने काँपें: और इसी से हम देखते हैं कि सब युगों में मनुष्य क्यों हाथ उठाते आए, और वह भी परमेश्वर के अपने ही मार्गदर्शन से। और मनुष्य गम्भीर शपथ में अपने हाथ उठाते थे, ठीक वैसे ही जैसे हम प्रार्थना करते समय करते हैं।
क्योंकि जब हम अपने हाथ उठाते हैं, तो यह उतना ही है मानो हम परमेश्वर से बिनती करते हों कि वह स्वर्ग से उतरकर हमारी सहायता करे: इसलिए नहीं कि वह अपना स्थान बदलता है, वरन् इसलिए कि वह अपनी सामर्थ्य को ऐसा फैलाता है कि हम उसे हमारी विनतियाँ स्वीकार करने में उपस्थित अनुभव करें। इस प्रकार हम देखते हैं कि रीति और अपनी बाहरी मुद्रा के द्वारा हम दिखाते हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ हमें परमेश्वर से जोड़ती हैं, और उनके द्वारा हम विश्वास से स्वर्ग में प्रवेश करते हैं, और परमेश्वर अपनी ओर से हमारे पास उतरता है, कि दिखाए कि वह निकट है।
इसी प्रकार शपथ के विषय में भी कहा गया है, जब हम अपने हाथ उठाते हैं, अर्थात् मानो हम यह कहें: मैं परमेश्वर को साक्षी बनाता हूँ, और यह कि जब मैं बोलता हूँ तो मैं उसके सामने हूँ: कि यदि मैं छल करूँ, तो यह उतना ही है मानो मैंने उसकी महिमा को कलंकित और भंग किया। अब हम इन शब्दों का अर्थ देख चुके।
और यहाँ हम यह ध्यान दें कि विश्वासियों की शपथ को दो-तीन बार भली-भाँति तौलना चाहिए: क्योंकि जो इसका प्रयोग करते हैं, और बातचीत के हर हल्के अवसर पर परमेश्वर का नाम लेते हैं, वे अपने आपको उसका तिरस्कार करनेवाला प्रकट करते हैं। क्योंकि यदि हम परमेश्वर के नाम का वैसा आदर करें जैसा वह योग्य है, तो निःसन्देह हम उसे ऐसे व्यर्थ ही इधर-उधर न उछालते, जैसे लोग टेनिस की गेंदें उछालते हैं: क्योंकि जब हम बहुत-से मनुष्यों के मुँह में शपथें इधर-उधर उछलती सुनते हैं, तो इससे हम जान सकते हैं कि वे दुष्ट, अधर्मी और अपवित्र मनुष्य हैं, और ऐसे जो वास्तव में परमेश्वर को बिलकुल नहीं जानते।
अब वे किसी प्रकार यह मानेंगे नहीं कि वे परमेश्वर को नहीं जानते: क्योंकि जब कोई उन्हें बाज़ार और गली दोनों में निरन्तर शपथ खाते सुने, और उन्हें डाँटे, तो तुरन्त उनका उत्तर यह होता है: अरे भले मानुष, मैं तुमसे प्रतिज्ञा करता हूँ, जहाँ तक मेरी बात है, मैं परमेश्वर से डरता हूँ: सचमुच महाशय, ऐसा लगता है कि आप झूठ के साथ ही डरते हैं। क्योंकि निःसन्देह, यदि हम सचमुच उससे डरते हैं, तो यह उसके नाम को अपने मुँह में संयम और बुद्धिमानी से लेने से प्रकट होगा, न कि उसे अपवित्र करने से।
और वास्तव में, जब हम भली-भाँति विचार करेंगे कि शपथ का कारण क्या है, तो निश्चय ही यदि हम उसका दुरुपयोग और उसे भ्रष्ट करें तो परमेश्वर को अपने विरुद्ध निरन्तर भड़काएँगे। क्योंकि जैसा सन्त पौलुस कहता है, मरणहार मनुष्य अपने से बड़े की शपथ खाते हैं, और परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, क्योंकि उससे बड़ा कोई नहीं। और इसलिए सब शपथों में परमेश्वर का नाम अवश्य आना चाहिए।
यह बहुत सच है कि जब कोई कहे, परमेश्वर की शपथ, तो शब्द-दर-शब्द यह स्पष्ट नहीं कहा जाता कि परमेश्वर दण्ड देता और बदला लेता है: मनुष्य ऐसा नहीं कहेंगे, परन्तु यही पर्याप्त है कि उसका नाम न्यायी के रूप में वहाँ रखा गया है। अतः हम किसी भी रीति से बोलें, परमेश्वर के साथ इस प्रकार मुट्ठी बाँधकर व्यवहार नहीं करना चाहिए: और इसके अतिरिक्त, उसके साथ कोई छल-कपट करके हम उसके हाथ से कुछ न पाएँगे, क्योंकि निःसन्देह लज्जा फिर भी हमारे ही सिर पर आएगी।
फिर, यदि कोई कभी उचित रीति से शपथ दिलाना चाहे, तो अत्यन्त निश्चित है कि वहाँ परमेश्वर का नाम लिया जाएगा और उसे साक्षी बुलाया जाएगा। अब वह साक्षी नहीं हो सकता जब तक कि न्यायी भी न हो।
और इसके अतिरिक्त कभी-कभी शाप देना और कोसना भी होता है, अर्थात् मनुष्य परमेश्वर से बिनती करेगा कि जब-जब वह उसके पवित्र नाम का दुरुपयोग करे, तो वह उसे उसके योग्य दण्ड दे। और इसी से हम देखते हैं कि पवित्र शास्त्र में इतनी बार क्यों कहा गया है, परमेश्वर मुझसे ऐसा और ऐसा करे, अर्थात् परमेश्वर मुझे देह और आत्मा दोनों में दण्ड दे। दूसरे स्थानों में यह स्पष्ट नहीं कहा गया, वरन् केवल एक यदि है, और यह एक अधूरा कथन-प्रकार है, जैसा इस स्थान में है, मैंने परमप्रधान परमेश्वर यहोवा की ओर अपना हाथ उठाया है, यदि मैं उसमें से कुछ भी लूँ।
अब इसका क्या अर्थ है? हमें इसे यों समझना चाहिए: परमेश्वर न्यायी हो, और यदि मैं झूठ बोलूँ और सच न कहूँ तो मुझे दण्ड दे। यह टूटा और अधूरा कथन-प्रकार दिखाता है कि जब हमें शपथ खानी हो, तो हमें मानो लगाम से रोका जाना चाहिए: ताकि हम हल्के और बिना सोचे-समझे परमेश्वर के क्रोध को न भड़काएँ। क्योंकि निःसन्देह जो बार-बार और बिना सोचे शपथ खाते हैं, वे हर बार झूठी शपथ खानेवाले ठहरते हैं, क्योंकि ये दोनों बातें साथ-साथ चलती हैं: इसलिए जब कभी हम किसी को भोजन की मेज़ पर या गलियों में शपथ खाते सुनें, तो निडर होकर उससे कह सकते हैं, मेरे मित्र, तू केवल परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग ही नहीं करता, वरन् झूठी शपथ भी खाता है, जब परमेश्वर का नाम तेरे मुँह में इस प्रकार अपवित्र किया जाता है: इसलिए जब हमें परमेश्वर का नाम अपने मुँह में लेना ही पड़े, तो हमें संयम की सीमाओं के भीतर रहना चाहिए।
परन्तु यहाँ चलते-चलते एक प्रश्न उठ सकता है: क्या अब्राम के लिए इतनी छोटी-सी बात के लिए शपथ खाना उचित था: क्योंकि कहा गया है, तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ न लेना। और इसलिए क्या अब्राम इतने से सन्तुष्ट नहीं हो सकता था कि सीधे कह देता, नहीं: मैं कुछ भी न लूँगा: परन्तु जो कुछ तुझसे लिया गया है, वह मैं अपने ही हाथ से तुझे लौटा दूँगा: क्योंकि तेरी वस्तु में से एक कौड़ी से भी मैं धनी न होऊँगा। कोई सोचेगा कि यदि उसने ऐसा कहा होता तो यही पर्याप्त होता: फिर भी हम देखते हैं कि मनुष्यों का कपट कैसा होता है: क्योंकि सज्जनता के नाम पर मनुष्य आश्चर्यजनक रूप से बहुत कुछ देने को तैयार हो जाते हैं, और फिर भी जो ऐसा बोलते हैं, उनके मन में बिलकुल उलटा अभिप्राय होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि वे समझते हैं कि जब कोई शब्दों में ऐसा प्रस्ताव करता है तो वह बँधा नहीं होता: क्योंकि वे कहते हैं कि यह तो एक फ़ालतू-सा कथन है, क्योंकि वे नहीं समझते कि जिन मनुष्यों में ऐसा शिष्ट साहस होता है उनमें विश्वास या ईमानदारी भी होती है, क्योंकि अधिकांश मनुष्य इसी के अधीन होते हैं: और इसलिए अब्राम के लिए शपथ खाना आवश्यक था। और इसके अतिरिक्त उसे अपने आपको हर प्रकार की परीक्षा से भी मुक्त करना था, और अपने कर्तव्य की सीमा के भीतर ऐसा बना रहना था कि यद्यपि वह वैध रीति से दूसरे मनुष्य की सम्पत्ति से अपने को धनी बना सकता था, तौभी उस शपथ के बल से जो उसने खाई थी, वह अपने आपको ऐसी कोई छूट देने से रुका रहे, और ऐसा कुछ भी करने से अपने को अलग रखे।
तो अब इससे हम देखते हैं कि अब्राम का यह कहना कि उसने शपथ खाई है, निष्कारण नहीं था, ताकि सदोम के राजा को किसी प्रकार उत्तर देने का अवसर न रहे, और इसलिए भी कि एक व्यवस्था थी जो उसे ऐसा कुछ भी करने से रोकती थी जिससे ठोकर लगे, और जिससे अन्यजातियों में परमेश्वर का भी कुछ मान न रह जाए।
फिर, एक और बात भी हमें विचारनी है कि वह कहता है, (कि उसने परमप्रधान परमेश्वर यहोवा की ओर, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, अपना हाथ उठाया है) जैसे मलिकिसिदक ने भी आशीर्वाद देते समय यही रूप प्रयोग किया था। क्योंकि अब्राम परमेश्वर के नाम को साक्षी बुलाने से ही सन्तुष्ट नहीं था, वरन् वह यह भी प्रकट करना चाहता था कि वह किस प्रकार के परमेश्वर की उपासना करता है।
हम भली-भाँति जानते हैं कि उस समय संसार मूर्तिपूजा और अन्धविश्वास से भरा था, और फिर भी हर मनुष्य के मुँह में परमेश्वर का नाम था, जैसे आज भी अन्यजाति बहुत डींग मारते हैं कि हम परमेश्वर का आदर करते हैं। क्योंकि तुर्क, यहूदी और पोप के अनुयायी इस पवित्र नाम का दुरुपयोग करने में नहीं हिचकेंगे: तौभी यह उसे अपवित्र करना ही है, क्योंकि तुर्क उसकी उपासना करते हैं जिसे उन्होंने अपने ही मन से गढ़ा है, और इस प्रकार जीवते परमेश्वर की निन्दा करते हैं।
क्योंकि जैसा सन्त यूहन्ना कहता है, जिसके पास पुत्र नहीं, उसके पास पिता भी नहीं: क्योंकि जब पुत्र का आदर नहीं होता, तो पिता उसे अपनी ही लज्जा समझकर ग्रहण करता है। क्योंकि उसके जीवित प्रतिरूप का तिरस्कार नहीं होना चाहिए, और न उसकी महिमा का कोई अपमान किया जाना चाहिए। और इसलिए तुर्क परमेश्वर के नाम के अधीन शैतान को छोड़ और किसी की उपासना नहीं करते।
और जहाँ तक पोप के अनुयायियों का सम्बन्ध है, जब हम उनसे कहें कि यीशु मसीह हमारा सहायक है, तो वे इसे किसी प्रकार सह नहीं सकते, फिर भी वे पवित्र शास्त्र का सर्वथा इनकार करने का साहस नहीं करते: क्योंकि यह एक विधर्मी और ठोकर लगानेवाली बात है, क्योंकि लोग इससे यह कहने का अवसर लेते हैं कि पुरुष और स्त्री सन्त हमारे लिए मध्यस्थता नहीं करते। क्योंकि जब हम अपने पापों की मुफ़्त क्षमा की बात करते हैं: और यह कि हमें उनके उस मूर्तिपूजक और अत्यन्त घृणित नारकीय मिस्सा-विधि में नहीं उलझना चाहिए: तो वे सब के सब ऐसे उन्मत्त हो जाते हैं कि उनके लिए उस मूरत, मिस्सा, की शपथ खाना परमेश्वर के नाम की सौ बार निन्दा करने से कहीं बड़ा अपराध है।
तो हम देखते हैं कि पोप के अनुयायियों का धर्म अत्यन्त नारकीय है। और जहाँ तक यहूदियों की बात है, वे हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह का पूर्णतः इनकार करते हैं। हम पहले ही दिखा चुके हैं कि पुत्र को पिता से अलग नहीं किया जा सकता: और उसे अस्वीकार करके उन्होंने अपने आपको द्वार से बिलकुल बाहर कर लिया है, और उस मुख्य वाचा को छोड़ दिया है जो परमेश्वर ने उनसे बाँधी थी: अर्थात् इसलिए कि वे उस उद्धार के सहभागी नहीं होना चाहते जो हमारा प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह अपने साथ लाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वे हर दशा में परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करते हैं। और अब्राम के समय से ही ऐसा होता आया है।
तो हम यहाँ देखते हैं कि वह उसे सनातन क्यों कहता है, और थोड़े ही बाद परमप्रधान परमेश्वर: क्योंकि वह उसे अन्यजातियों की मूरतों से अलग करना चाहता था। क्योंकि अन्यजाति भी भली-भाँति जानते थे कि एक परमप्रधान और उत्कृष्ट स्वर्गीय स्वभाव है: फिर भी उनकी सदा यह लालसा रहती थी कि अपनी इच्छा और मनमानी के अनुसार छोटे-छोटे देवताओं का एक बाड़ा रखें। अब्राम इससे बहुत दूर था, और कहता है कि सनातन के सिवा कोई नहीं, जो परमप्रधान परमेश्वर है। और साथ ही वह जोड़ता है, आकाश और पृथ्वी का अधिकारी: यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर स्वर्ग में वैसा नहीं है जैसा कल्पनाशील सिर कल्पना करते हैं, अर्थात् कि वह वहाँ केवल इसलिए बैठा है कि जो संसार में होता है उसे देखता रहे: और इतने से सन्तुष्ट है कि उसने एक बार सब कुछ बना दिया: और अब हमें छोड़ देता है कि हम यहाँ नीचे मेंढकों के समान इधर-उधर उछलते-कूदते रहें।
परन्तु अब्राम दिखाता है कि उसकी महिमा के विषय में ऐसी मन्द धारणा नहीं थी, वरन् वह उसे अनन्त सामर्थ्य का स्वामी मानता है जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में फैली हुई है। और यह इसलिए किया गया कि हम उसके भय में चलें, और हमें चेताया जाए कि हम सदा उसकी आँखों के सामने हैं: और हमारी बुद्धि और विचार भी उसके सामने लेखे में आएँगे: क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी का अधिकारी इसलिए नहीं कि खाए और पेट भरे, और कुछ न करे: वह उनका अधिकारी इसलिए नहीं कि उनसे केवल मूक नाटक करे: वरन् वह अपनी अकेली और अनन्त महिमा से भी सन्तुष्ट है, और सब आशीष अपने ही में रखता है।
और यद्यपि उसने कभी कुछ न रचा होता, तौभी इससे उसमें न कुछ घटता न बढ़ता। और इसलिए जब वह ऐसा कहा जाता है, तो यह दिखाने के लिए है कि सब कुछ उसके अधीन है, और हम सब को उसके सामने उत्तर देना है: और वह संसार पर ऐसा शासन करता है कि उससे कुछ भी छिपा नहीं: और उसका काम ऐसा है कि वह विचारों को जाँचे, और हमारे सब वचनों और कामों को परखे, ताकि स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का अधिकारी होने के साथ-साथ वह हमारा प्रभु और न्यायी भी हो।
तो हम देखते हैं कि यह उपाधि उस पर क्यों रखी गई है, ताकि हम यहाँ मानो उसकी महिमा के सामने चलें। गुप्त कोनों की खोज में रहना हमारे लिए बुद्धिमानी की चाल न होगी, क्योंकि सब कुछ प्रकाश में आएगा: और यदि आज हम अपनी चालाक युक्तियों से उसे धोखा देने की सोचें, तौभी अन्त में वह सब हमारे ही सिर पर आएगा।
फिर, जब परमेश्वर को स्वर्ग और पृथ्वी का अधिकारी कहा जाता है, तो हमें चेताया जाता है कि हम उससे अपने पालनहार पिता के समान प्रेम करें, और अपने न्यायी के समान उससे डरें। क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी का अधिकारी इसलिए है कि वह हम पर सर्वोच्च शासक है, और हमें उसके न्याय-आसन के सामने उपस्थित होना है, ताकि हम अपनी देह में किए हुए सब कामों का, चाहे भले हों चाहे बुरे, प्रतिफल पाएँ। यही वह अधिकार है जो उसका स्वर्ग और पृथ्वी में है।
अब वह इसे केवल अपने लिए नहीं रखता: वरन् अपनी अनन्त भलाई से उदारतापूर्वक हमें वह सब देता है जिसकी हमें घटी है, क्योंकि उसने सब कुछ हमारे उपयोग के लिए बनाया है। और इसलिए जब हम अपने परमेश्वर की अनन्त सामर्थ्य और भलाई के विषय में यों सुनते हैं, और अनुभव से भी उसे जानते हैं, तो यदि हम तुरन्त उससे प्रेम करने और उसकी आज्ञा मानने का यत्न न करें, तो हम अत्यन्त नीच कृतघ्न लोग ही ठहरेंगे।
और स्वर्ग इस शब्द के अधीन केवल वे लाभ ही हमारे सामने नहीं रखे गए जो हमें सूर्य और तारों से मिलते हैं, वरन् स्वर्गदूत भी यहाँ सम्मिलित किए गए हैं, ताकि हम सीखें कि उन्हीं के समान अपने को ढालें। यदि वे ऐसे उत्कृष्ट प्राणी उसकी सेवा में लगे रहने के सिवा और कोई ध्यान नहीं रखते, तो हम पृथ्वी के तुच्छ कीड़ों का, वरन् भटकते हुए जंगली पशुओं का क्या होगा, जब हम अपनी मलिन अभिलाषाओं और वासनाओं के वश में पड़कर उसकी महिमा के विरुद्ध विद्रोह करने के सिवा और कुछ न करेंगे।
क्या हमारे लिए यह बहुत बड़ी लज्जा की बात नहीं कि स्वर्गदूतों को ऐसा दीन देखें, जैसा मैं कह चुका हूँ: और अपने आपको ऐसा अभिमानी और विद्रोही? तो यहाँ हम संक्षेप में देखते हैं कि हमें क्या स्मरण रखना है, कि जब कभी हम परमेश्वर के विषय में बोलें, तो सदा उसकी सामर्थ्य को उसके सार-तत्त्व के साथ जोड़ें: और परमेश्वर यह शब्द अपने होठों से ऐसे हल्के ढंग से न निकलने दें जैसा बहुत-से लोग करते हैं, वरन् जानें कि जैसे वह सनातन है और उसने सब कुछ बनाया है, वैसे ही उसने हमारे व्यक्तियों, हमारी सम्पत्ति और शेष सब सृष्ट वस्तुओं पर प्रभुता और शासन भी अपने ही पास रखा है: और हमें जानना चाहिए कि हमें उसे लेखा देना है, वरन् ऐसा लेखा कि फिर भी इस बीच हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम उससे सचमुच और सच्चाई से प्रेम करें, और अपने आपको उसकी आज्ञाकारिता के अधीन करें: क्योंकि वह हमें केवल अपनी महिमा के नाम से बल और हिंसा द्वारा ही नहीं जीतेगा, वरन् उन अनुग्रहों और लाभों के द्वारा भी जो वह हमें देता है, ताकि हम उसके पास आने के लिए लुभाए जाएँ: जिससे हमारे सब वचनों, विचारों और कामों में हम सदा उसके पवित्र नाम की महिमा करने पर ध्यान रखें।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दण्डवत् करें, अपने अपराध मानें, और उससे बिनती करें कि वह हमें उनसे इतनी गहराई से छुए कि हम उसके सामने दीन हों, अपने आप से खेदित और लज्जित हों, ताकि हम अपना सारा भरोसा उसकी उस दया पर रखें जो हम पर उसके एकलौते पुत्र में दिखाई गई, और अपना पूरा शरण उसी में लें। इसके अतिरिक्त वह हमें ऐसी प्रीति से छुड़ाए कि हम देह और आत्मा दोनों में शुद्धता के साथ अपने आपको पूर्णतः उसे समर्पित करने का यत्न करें, और उसे ऐसी श्रद्धा अर्पित करें कि प्रकट करें कि सचमुच हम अपने लिए जीना नहीं चाहते, वरन् अपने आपको पूर्णतः उसकी सेवा में सौंपते हैं, क्योंकि उसे यह भला लगा कि हमें अपना ले। कि वह न केवल, आदि।
