अध्याय 7

दूसरा उपदेश: धर्मी ठहराए जाने के विषय में

On the History of Melchizedek · John Calvin

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दूसरा उपदेश: धर्मी ठहराए जाने के विषय में

उत्पत्ति अध्याय 15।

6 अब्राम ने यहोवा पर विश्वास किया, और उसने उसे उसके लिये धार्मिकता गिना।

हमने कल इस बात पर विचार करना आरम्भ किया था कि विश्वास के द्वारा परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखने का सही मार्ग क्या है; अर्थात् हमें अपनी आदि दशा और स्थिति से आरम्भ करना चाहिए, और देखना चाहिए कि हम अब्राम में किस दशा में जन्मे। उसमें हम अपने आप को सब के सब शापित, दण्डित और खोए हुए देखते हैं। और जब तक हम इसे भली भाँति नहीं जान लेते, तब तक हम कभी यह अनुभव नहीं करेंगे कि परमेश्वर की कृपा और दया पाना क्या होता है। सो यहाँ हमें वह सच्ची नींव दिखाई देती है जिस पर निर्माण करना चाहिए: कि जब हम ठीक-ठीक जाँच लें कि हम क्या हैं, और अपने भीतर घोर लज्जा और घबराहट के सिवा कुछ न पाएँ, तब हम उपाय को कहीं और ढूँढ़ें। और ऐसी जाँच करने के लिये हमें अनिवार्य रूप से पवित्रशास्त्र के पास आना ही होगा। सच तो यह है कि यदि हर मनुष्य बिना चापलूसी के अपने आप को देखे, तो हम बिना किसी और जाँच के अपने आप पर दोष लगा देते। अपने विरुद्ध पर्याप्त साक्षियाँ खोजने के लिये हमें लम्बे-चौड़े प्रसंगों की आवश्यकता न पड़ती: क्योंकि हम में से हर एक के भीतर एक दहकता हुआ दाग है, जो हम पर परमेश्वर का शाप अंकित करता है।

परन्तु क्योंकि हम अपने पापों को छिपाने और दबा देने के स्वभाव के हैं, इसलिये परमेश्वर ने अपना वचन हमारे सामने दर्पण के समान रखा है, कि हम उसमें देखकर सीखें कि अपने आप को उसी के अनुसार परखें, न कि अपनी कल्पनाओं के अनुसार। और यद्यपि हम आरम्भ में अपनी दुर्दशा को नहीं पहचानते, फिर भी जब हम उसे परमेश्वर के वचन से उघड़ा हुआ देखेंगे, तो वही हमें पूरी तरह घबरा देने के लिये काफी है। क्योंकि यदि हम में से हर एक अपनी ही राय पर भरोसा करे, तो हम सब धर्मी ही ठहरें। क्योंकि सुलैमान कहता है, "हम सब आत्म-प्रेम से ऐसे अन्धे हो गए हैं कि हम में से कोई भी ऐसा नहीं जो अपने आप को यह न समझा ले कि वह अद्भुत रूप से सद्गुणी है।" परन्तु वह कहता है कि मन को तौलनेवाला तो परमेश्वर है। इसलिये हमें किसी और तराजू पर तौला जाना चाहिए: क्योंकि जब हम समझते हैं कि हम पुण्यों से भरे हैं, तो वे झूठे माल और निरे मैल के सिवा कुछ नहीं निकलते। और जब संसार भी हमारे विषय में ऐसा ही समझता है, तो इससे प्रकट होता है कि वे बाहरी दिखावे से आगे नहीं देखते। अब जिसे मनुष्य इतना ऊँचा मानते हैं, वह परमेश्वर के सम्मुख घृणित है। और ऐसा क्यों? क्योंकि कर्मों का न्याय हृदय के छिपे हुए और गुप्त भाव के अनुसार किया जाना चाहिए। और इसके अतिरिक्त उसमें कोई पवित्रता है ही नहीं, क्योंकि जब तक (जैसा प्रेरितों के काम में कहा गया है) हम विश्वास के द्वारा शुद्ध न किए जाएँ, तब तक हमारा शुद्ध और निर्मल होना असम्भव है।

और दूसरी ओर, जब तक हम यह न जान लें कि वह हम पर भला और दयालु होगा, तब तक हम कभी स्वतंत्र मन से परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते, जैसा भजन संहिता में कहा गया है: "हे यहोवा, तेरे यहाँ सदा करुणा और पूरा छुटकारा है।" अब वे अभागे अविश्वासी लोग जो परमेश्वर की इच्छा के विषय में सन्देह करते हैं, और बड़ी व्याकुलता के बिना कभी शान्त नहीं होते, निःसन्देह परमेश्वर की सेवा साहस से कभी नहीं कर सकते, और न परमेश्वर कभी उनके किए को ग्रहण करेगा, क्योंकि वह चाहता है कि हम उसके लिये स्वेच्छा से बलि चढ़ाएँ: और सन्त पौलुस भी कहता है, "कि वह उनसे प्रेम रखता है जो उसके साथ उदारता से व्यवहार करते हैं और स्वतंत्र मन से आते हैं।" सो यहाँ हम देखते हैं कि हमारे कर्म, चाहे वे हमारी अपनी दृष्टि में या संसार की दृष्टि में कितने ही महिमामय दिखाई दें, परमेश्वर के सम्मुख गोबर और मैल ही हैं, जब तक कि वह हमें हमारे दागों और अशुद्धता से शुद्ध न कर दे, और इसके अतिरिक्त हमें यह न दिखा दे कि वह हमें किस लक्ष्य पर निशाना बाँधने को कहता है, और हमें अपने जीवन का सारा मार्ग किस ओर फेरना चाहिए; अर्थात् वह चाहता है कि हम उसका आदर करें, और एक बार उसकी सेवा के लिये समर्पित होकर, उस धार्मिकता के अनुरूप, जो उसने हमारे सम्मुख रखी है, अपने आप को पूरी तरह और सर्वथा ढालने का परिश्रम करें। तथापि इस पर हम विस्तार से तब विचार करेंगे जब हम व्यवस्था की चर्चा करेंगे: परन्तु इस समय इतना समझ लेना पर्याप्त है कि क्योंकि हम आत्म-प्रेम में बहे जाते हैं, और वह मानो हमारी आँखों पर बाँधने की पट्टी ही नहीं, वरन् हमें मानो पूरी तरह मोह भी लेता है, इसलिये हम निरे जड़ बुद्धि हो गए हैं और अपनी दुर्दशा का विचार तक नहीं करते। और इसलिये, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उचित है कि परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमें दोषी ठहराए।

और इसी कारण सन्त पौलुस इतनी साक्षियाँ लाता है, और उनके द्वारा दिखाता है कि हम सब दोषी ठहरे हैं। इसलिये हर एक में, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, बिना किसी और न्यायी के यह भावना होनी चाहिए। परन्तु क्योंकि हम ऐसे पापी और पाखण्ड से भरे हैं, और हमारे पास इतनी दुकानें और निजी कोठरियाँ हैं जिनमें छिपकर हम अपने पापों के सच्चे और निश्चित ज्ञान से बच निकलते हैं, इसलिये परमेश्वर का वचन हमारे लिये दर्पण का काम करे कि हम उसमें अपने पापों को देखें।

अब, जब कि हम स्वभाव से ही हठीले हैं, और हम में विद्रोह और बैर के सिवा कुछ नहीं, और जैसा सन्त पौलुस कहता है, हमारी सारी अभिलाषाएँ और विचार परमेश्वर के विरुद्ध इतने ही बैर हैं, तो हम किसी भी रीति से उसकी महिमा के सम्मुख कोई ऐसी वस्तु कैसे प्रस्तुत और अर्पित कर सकते हैं जो उसे भाए? सचमुच, हम अपने विषय में कोई मूर्खतापूर्ण, अहंकारी और घमण्डी धारणा रख सकते हैं; तौभी वह सदा हमारे दुःख को दुगुना ही करेगी, क्योंकि घमण्ड ऐसा पाप है जो परमेश्वर को बाकी सब पापों से अधिक अप्रसन्न करता है।

और इसलिये हमें मानना होगा कि स्वाभाविक मनुष्य होने के कारण हम परमेश्वर के ऐसे बड़े शत्रु हैं कि हमारे विचार और कल्पनाएँ तक उसकी इच्छा के विपरीत हैं, और जब तक हम जीवित हैं, हम न कुछ कह सकते हैं न कर सकते हैं, जो हमारे सिर पर अत्यन्त भारी दण्ड का ढेर न लगाए। इसलिये हम देखते हैं कि पवित्रशास्त्र हमें मरे हुओं के समान क्यों बताता है, जब परमेश्वर एक बार हमें त्याग देता है, और जब तक हमारा उद्धारकर्ता मसीह अपने आप को हमारा जीवन प्रकट न कर दे, तब तक हम मरे हुओं से बढ़कर नहीं हैं। और मैं तुम से पूछता हूँ, एक मरा हुआ मनुष्य क्या कर सकता है?

इसके अतिरिक्त, हमें यह पाठ सीखना और ग्रहण करना चाहिए, नहीं तो हम कभी यह प्रकट न कर पाएँगे कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में परमेश्वर की भलाई हमारे प्रति कैसी है। वरन् हमें अपने आप से निराश होना चाहिए ताकि हम परमेश्वर पर भरोसा रखें। क्योंकि हम इस अहंकार की ओर ऐसे झुके हुए हैं, जो हम में ऐसी जड़ पकड़े हुए है कि हम सदा अपने आप को बढ़ाते रहेंगे। और इसलिये परमेश्वर को हमें पूरी तरह गिरा देना चाहिए, कि हम उसके हाथ से सुधारे जाएँ और उसकी सामर्थ्य से सँभाले जाएँ।

फिर, हम व्यर्थ घमण्ड के हवा के छोटे से झोंके से जल्दी फूल उठते हैं। और इसलिये, इससे पहले कि हम परमेश्वर से कोई सच्ची वस्तु पाएँ, हमें पहले बहुत खाली और मानो भूख से तड़पता हुआ होना चाहिए। और इसी कारण विशेष रूप से कहा गया है, "कि परमेश्वर भूखों और दीन-दुखियों को तृप्त करता है।" इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसकी भलाई उन्हीं तक पहुँचती है जो उसके योग्य हैं। परन्तु जब हम उसकी कलीसिया को इकट्ठा करने की बात करते हैं, तो उसे इसी रीति से उसे तैयार करना होता है, और इसी कारण विशेष रूप से कहा गया है, "कि परमेश्वर का आत्मा हमारे प्रभु यीशु मसीह पर ठहरेगा, कि वह बन्दियों को छुटकारे का सन्देश दे, अभागे अन्धों को आँखें दे, रोगियों और पीड़ितों को चंगा करे, और निर्बलों और दुर्बलों को बल और शान्ति दे।" अब वह यह तब पूरा करता है जब वह कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा, और तुम अपने मन में चैन पाओगे।" सो यहाँ हम देखते हैं कि वह दीनता ही है जो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास ले जाती है, ताकि हम उस धार्मिकता के भागी हों जो वह हमारे लिये लाता है।

अब, दीनता वैसी वस्तु नहीं जैसी बहुतेरे समझते हैं, कि परमेश्वर के सम्मुख भक्तिपूर्ण और नम्र मुख दिखाया जाए, परन्तु हमें अपने भीतर किसी भी भली वस्तु से ऐसा नंगा और खाली होना चाहिए कि हम उसके चरणों पर गिर पड़ें और मान लें कि हम अभागे और दुखियारे पापियों के सिवा कुछ नहीं हैं, और अपने आप से उद्धार की सारी आशा से रहित हैं। सो हम देखते हैं कि हम उसकी दया तक कैसे पहुँचते हैं: अपनी दुर्दशा को अनुभव करने और पकड़ लेने से। और ये दोनों बातें अलग नहीं की जा सकतीं। क्योंकि परमेश्वर हम पर तरस खाकर हमारी सहायता क्यों करता है? निश्चय इसलिये कि वह हमारी दुर्दशा को देखता है, और वही उसे दया के लिये उभारती और प्रेरित करती है। और देखो, इसी कारण सन्त पौलुस, हमारे उद्धार की चर्चा करते हुए, कहता है, "तुम्हारा उद्धार अपनी ओर से नहीं हुआ, वह परमेश्वर का दान है, जो विश्वास के द्वारा मिला है: क्योंकि तुम उसकी कारीगरी हो, क्योंकि उसने तुम्हें मसीह यीशु में भले कामों के लिये सृजा है, जिन्हें उसने पहले से तैयार किया कि तुम उन पर चलो।" यहाँ सन्त पौलुस हमारी अपनी सामर्थ्य के विषय में हम जो भी अच्छी धारणा बना सकते हैं, उसे दूर कर देता है, जब वह कहता है, "अच्छा, यदि तुम अपने उद्धार की प्रशंसा का कोई भाग अपने ऊपर लो, और फिर भी समझो कि तुमने उसे अपने आप से नहीं पाया, वरन् उसमें तुम्हारी सहायता की गई है: तो देखो, यह बात कैसे या किस प्रकार ठीक बैठ सकती है? क्योंकि तुम मरणशील मनुष्य सृजे गए थे, अर्थात् पापी: और इसलिये सब के सब शापित, निकाले हुए और परमेश्वर की उपस्थिति से, जिसमें सारी भलाई है, पराए हुए। और इसलिये तुम्हें यही निष्कर्ष निकालना चाहिए कि तुम सब मानो मरे हुए हो।"

इसलिये, परमेश्वर की दृष्टि में कुछ होने से पहले तुम में एक नया और दूसरा सुधार और जीर्णोद्धार होना अनिवार्य है। और जब तुम यीशु मसीह में नया जन्म पा चुके हो, तब वही नई सृष्टि कहलाती है। और इसलिये तुम में से हर एक परमेश्वर की सृष्टि है, क्योंकि उसने तुम्हें रचा और अपनी ओर बुलाया है, जब कि इसके लिये तुम्हारी अपनी ओर से कोई तैयारी न थी, परन्तु परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा भले कर्म तैयार किए हैं।

जब बात ऐसी है, तो हम भली भाँति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारा उद्धार हम से रत्ती भर भी नहीं है, एक बूँद भी नहीं, वरन् केवल परमेश्वर का दान है जो उसकी अपनी उदारता से निकलता है। सो पहली बात के विषय में हम यह देखते हैं कि परमेश्वर के हाथ से दया और अनुग्रह पाने के लिये हमें सचमुच स्वीकार करना चाहिए कि हम क्या हैं, हमारी दशा और स्थिति कितनी दयनीय है, और हम सब निरे निकम्मे ठहरे हुए हैं।

अब जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो उसका अर्थ यह नहीं कि हमारा ज्ञान एक भटकती हुई समझ हो, जो हमारे मस्तिष्क में तैरती रहे, वरन् हमारे हृदय उसके द्वारा घातक रूप से घायल हों, ताकि हम परमेश्वर के न्याय-दण्डों को ऐसा अनुभव करें कि वे हमें ऐसा भयभीत करें कि हम लगभग पूरी निराशा में पहुँच जाएँ। क्योंकि हम कैसे जानेंगे कि भोजन और पानी कितना बड़ा उपकार है, यदि हम भूख और प्यास से पीड़ित न हों? क्योंकि यदि हम ठूँस-ठूँसकर भरे होते, तो वैसे ही रहते, हम (जैसा कहा जाता है) कभी टुकड़े या पपड़ी की भी खोज न करते, परन्तु यह भूख ही है जो हमें भोजन की खोज में दौड़ाती है। क्योंकि जब हम बीमार होते हैं, तो उपाय ढूँढ़ते हैं, परन्तु यदि कोई मनुष्य ऐसा संवेदनहीन हो कि उसे किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव ही न हो, तो वह सहायता को पुकारने या एक बार चाहने से पहले सौ बार मर जाएगा।

इसलिये, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें अपनी दुर्दशा से ऐसा स्पर्श पाना चाहिए मानो हम सचमुच मर गए हों, और मानो हम उस मृत्यु को अनुभव करते हों जिसकी चर्चा पवित्रशास्त्र करता है, ताकि हम उस जीवन को पाएँ जो हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने सुसमाचार के द्वारा हमें देता है। और यही कारण है कि पवित्रशास्त्र हमें हमारे पापों के लिये इतनी बार डाँटता है और मानो दोषी ठहराता है। क्योंकि परमेश्वर को इस रीति से हम से व्यवहार करने में आनन्द नहीं आता, परन्तु वह इसकी आवश्यकता जानता है।

सो देखो, पवित्र शास्त्र में जितनी धमकियाँ, दण्ड की आज्ञाएँ, डाँट-फटकारें और ऐसी ही बातें हैं, वे सब हमारे सिरों पर पड़नेवाले मुगदर के समान हैं, जो हमें उस दीनता तक पहुँचाते हैं जिससे हम तब तक दूर रहते हैं जब तक वह हमें इस प्रकार बलपूर्वक मार न डाले। और इस विषय में इतना ही।

इसके अतिरिक्त, जो कुछ पहले कहा जा चुका है उसका हमें और बड़ा लेखा-जोखा करना चाहिए, अर्थात् जब तक हम परमेश्वर के वचन में अपनी दुर्दशा को न देख लें, तब तक हम अपने कपट में मृत नींद में सुलाए जाएँगे और बहुत निश्चिन्त हो जाएँगे। और यह निश्चिन्तता हमें परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानने की ओर ले जाएगी, और इस प्रकार धीरे-धीरे हम उससे पूरी तरह बाहर कर दिए जाएँगे।

अब परमेश्वर ने हमारा दण्ड हमारे सामने विशेष रूप से व्यवस्था में रखा है, और सचमुच सारा पवित्रशास्त्र उनसे भरा है। और जब कहा जाता है कि वह लाभदायक है, तो अन्य बातों के साथ वह डाँट-फटकार भी सामने रखता है। और इसके अतिरिक्त हम जानते हैं कि सुसमाचार क्या सिखाता है, "मन फिराओ और सुधरो, क्योंकि परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है।" सो हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने चुने हुओं को उस मुफ्त धार्मिकता को ग्रहण करने के लिये कैसे तैयार करता है जो वह उन्हें अपने पुत्र के द्वारा देता है, अर्थात् यह कि हम मन फिराएँ और सुधरें।

और इसका अर्थ क्या है? निश्चय, हम में अपने पापों के लिये ऐसा शोक और दुःख होना चाहिए कि हम अपनी दुष्टता के लिये अपने आप को दोषी ठहराएँ, और जैसा सन्त पौलुस कहता है, अपने आप से बदला लें, क्योंकि वह केवल "शोक और भय" का शब्द ही नहीं रखता, वरन् कहता है कि हम में ऐसी तीव्र लालसा और जोश होना चाहिए कि मानो हम अपने आप से बदला लें क्योंकि हम परमेश्वर के ऐसे बड़े शत्रु हैं।

अब यद्यपि यह शिक्षा सारे पवित्रशास्त्र में मिलती है, तौभी परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था विशेष रूप से इसी उद्देश्य के लिये ठहराई है, और इसीलिये सन्त पौलुस कहता है, "कि वह क्रोध ही उत्पन्न करती है।" जब हम जो कहा गया है उसे भली भाँति तौलेंगे और विचार करेंगे, तो हम परमेश्वर को अपने विरुद्ध पाएँगे, और हम उसके निकट तभी जा सकते हैं जब उसे अपने विरुद्ध शस्त्र बाँधे और गरजता हुआ और हमें स्पष्ट रूप से नाश करता हुआ पाएँ। यह सच है कि व्यवस्था भली भाँति दिखाती है कि धार्मिकता से जीना क्या है, और यदि हम उसके योग्य होते तो उस तक पहुँचना क्या है, जैसा आगे और विस्तार से बताया जाएगा।

लैव्यव्यवस्था में लिखा है, "कि जो मनुष्य इन बातों को करेगा वह इनके कारण जीवित रहेगा।" परन्तु इस बीच आओ देखें कि क्या हम उस के निकट कहीं पहुँचते हैं जिसकी परमेश्वर हमें आज्ञा देता है, हाँ या नहीं? सचमुच हम ऐसे अहंकारी और घमण्डी हैं कि जब तक हम व्यवस्था को भली भाँति न समझ लें, वह हमारी सारी मूर्खतापूर्ण धारणा को कभी न तो कायल कर सकती है और न जीत सकती है।

क्योंकि हम देखते हैं कि सन्त पौलुस, जो बचपन से व्यवस्था में पाला और सिखाया गया था, और उसका गुरु था; तौभी कहता है कि वह अब भी अपने सद्गुणों पर घमण्ड करता था और अपने आप को बहुत धर्मी मनुष्य समझता था क्योंकि वह व्यवस्था को जानता था और उसी पर टिका था, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को पूरी तरह तुच्छ जानता था। और इसका कारण क्या था? निश्चय यह, कि वह मृत अक्षर और उसके बाहरी रूप से आगे नहीं देखता था। जैसे जब कहा जाता है, "तू हत्या न करना," तो वह भली भाँति जानता था कि वह हत्यारा नहीं है। फिर कहा गया है, "तू व्यभिचार न करना," किसी मनुष्य ने उसे कभी लम्पट या व्यभिचारी नहीं जाना। इसके बाद, "तू चोरी न करना," और कभी यह भी नहीं सुना गया कि वह चोर था। और इसलिये उसने अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख निर्दोष समझा। सो हम देखते हैं कि वह अपनी व्यर्थ चापलूसियों में कैसी गहरी, ऊँघती नींद में पड़ा था।

परन्तु बाद में परमेश्वर ने उसे जगाया और उसे आगे खींच ले गया और अपने विचारों की गहराई में प्रवेश करके खोज करवाई। और जहाँ कहा गया है, "तू लालच न करना," तब उसने अपने आप को ऐसा दोषी और दण्डित पाया कि उसके लिये छुटकारे की कोई आशा न रही। क्योंकि उसने अपने भीतर बहुत सी व्यर्थताएँ अनुभव कीं जो उसे गुदगुदाती थीं। उसकी दुर्बलता ने उसे अनेक परीक्षाओं का स्मरण कराया, और उसने जाना कि वह परमेश्वर के उस प्रेम के सौवें अंश से भी अपने आप को मुक्त नहीं कर सकता जो सब विश्वासियों में होना चाहिए। यह बात सन्त पौलुस ने जानी, और इस प्रकार हम देखते हैं कि उसने, एक अभागे मृतक के समान, अपने उस जीवन को भुला दिया जिससे वह छला और धोखा खाया था, और अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख एक अभागी सड़ी हुई लोथ के समान पूरी तरह माना। क्योंकि व्यवस्था ने उसे ऐसा मार डाला कि संसार में उसके पास अपने आप में घमण्ड करने को कुछ भी न रहा। और इसलिये, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम देख सकते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्था में विशेष कारण निहित है जो हमें दिखाता है कि हम में दण्ड के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि हमें विशेषकर यहाँ हर आज्ञा पर ठहरना चाहिए। हमारा केवल एक ही परमेश्वर होना चाहिए। और वह कौन है? और हमें उसका आदर और सेवा कैसे करनी चाहिए? सो जब कि हमें पूरी तरह उसी से बँधा और जुड़ा होना है, तो हम उसकी महिमा करने के सिवा किसी और भलाई, सुख या आनन्द की खोज न करें। हमारे मुँह से उसकी महिमा के प्रति स्तुति और धन्यवाद के सिवा कुछ और कभी न सुना जाए, और किसी भी रीति से यह प्रकट न हो कि हम संसार को छोड़कर पूरे मन से उसके पास आना और उसके नाम को वैसा बड़ा करना नहीं चाहते जैसा वह योग्य रूप से उसके योग्य है।

सो हम देखते हैं कि पहली पटिया की चारों आज्ञाएँ यहाँ हमारे सम्मुख रखी गई हैं। अब जब हम उनकी विषय-वस्तु को भली भाँति जाँच चुकेंगे, तब आओ हम अपने आप को परखें, और हम पाएँगे कि उस पर टिके रहने के बदले हम बड़े जंगली बदमाश और आवारा बन गए हैं, और ऐसे भी कि हमारे विचार और कल्पनाएँ हमें हर कहीं ले जाती और बहा ले जाती हैं।

और पहले आओ हम प्रार्थना की बात करें। क्योंकि यह क्रिया हमें, जो यहाँ पृथ्वी पर नीचे हैं, अपने विचार स्वर्ग में रखने को प्रेरित करे, क्योंकि तब हम मानो अपने परमेश्वर की उपस्थिति में होते हैं। और तौभी जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हमारे सिरों में कितनी ओछी कल्पनाएँ भर जाएँगी, जो हमें अपना बन्दी बनाए रखेंगी? और जब ऐसा है, तो हमारे सारे जीवन के शेष भाग का क्या होगा? व्यवस्था की सब आज्ञाओं का भी ऐसा ही हाल होगा जब हम उनकी तुलना अपने जीवन से करेंगे। और इसलिये हमें एक ही मृत्यु नहीं, वरन् लाख मृत्युएँ मिलेंगी।

इसके अतिरिक्त, हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था में हमें मर्म तक छूना चाहता है। क्योंकि कहा गया है कि हृदय सचमुच और सच्चाई से घायल होना चाहिए। क्योंकि जब यह वाक्य सुनाया गया, "श्रापित हो वह जो इन में लिखी सब बातों को न करे," तब वह केवल न्यायी होकर और अपने ही मुँह से हमें दोषी ठहराकर सन्तुष्ट नहीं हुआ, वरन् चाहता है कि लोग भी कहें, "आमीन"; अर्थात् वह चाहता है कि हर मनुष्य स्वेच्छा से और अपनी ही इच्छा से अपने आप को दोषी ठहराए, और इस प्रकार पूरी तरह दोषी माना जाए, और उस दण्ड को जो उसने सुनाया है, न्यायसंगत और ठीक स्वीकार करे।

सो हम देखते हैं कि व्यवस्था हमें अपने जीवन की जाँच-परख में ऐसा प्रवेश कराती है कि हमें अपने भीतर कोई आशा नहीं मिलती, वरन् अपनी धार्मिकता का आरम्भ हमारे प्रभु यीशु मसीह के हाथ से खोजने को विवश हो जाते हैं।

अब हम देखते हैं कि ये दोनों बातें आग और पानी के समान एक दूसरे के विपरीत हैं: अपने कर्मों के द्वारा परमेश्वर के सम्मुख धर्मी गिना जाना, और विश्वास की शक्ति और सामर्थ्य के द्वारा उसके द्वारा ग्रहण किया जाना। क्योंकि जैसा सन्त पौलुस कहता है, यदि हम कुछ अपना लाएँ, तो निःसन्देह परमेश्वर हमारा ऋणी ठहरे, चाहे हम न पूरे रूप से न सिद्ध रूप से धर्मी हों; तौभी, जैसा भी हो, हमें कोई अनुपात के अनुसार प्रतिफल मिल सकता था। परन्तु कहा गया है कि विश्वास और कर्म कभी साथ नहीं चल सकते, और इसलिये हमारा निष्कर्ष यही होना चाहिए: कि जब हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, तो कर्मों को अनिवार्य रूप से थम जाना और निकम्मा हो जाना चाहिए।

अब, यह पहली दृष्टि में कठोर बात लग सकती है, अर्थात् यह कि विश्वास और भले कर्म कभी साथ नहीं जा सकते, क्योंकि ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यदि केवल विश्वास ही धर्मी ठहराता है, तो हर प्रकार के अधर्म के लिये लगाम ढीली और छोड़ दी गई है। अब, सन्त पौलुस यह एक विशेष गुण और दृष्टि के अनुसार कहता है, जैसे वह व्यवस्था और विश्वास के विषय में भी कहता है: व्यवस्था, वह कहता है, किसी रीति से विश्वास के साथ मेल नहीं खा सकती, क्योंकि वे दो परस्पर असंगत वस्तुएँ हैं। और किस रीति से? क्या परमेश्वर जैसे सुसमाचार का, वैसे ही व्यवस्था का भी रचयिता नहीं है? क्या उसमें कोई विरोध या विपरीतता है? निःसन्देह नहीं, क्योंकि वह अपरिवर्तनीय है। तो फिर सन्त पौलुस व्यवस्था और सुसमाचार के बीच ऐसा विरोध क्यों पाता है? निश्चय, यह हमारे धर्मी ठहराए जाने के विषय में है। और ठीक ऐसा ही विश्वास और कर्मों के बीच है: और विरोध यह है, कि कर्मों को पुण्य बना लिया जाता है। और इससे भी बढ़कर, हम विश्वास के बिना कोई भला कर्म कर ही नहीं सकते, जैसा हम पहले कह चुके हैं, और आगे और विस्तार से बताया जाएगा।

क्योंकि कारण और परिणाम विपरीत नहीं होते: परन्तु जब हम अपने कर्मों में कोई पुण्य स्थापित करना चाहते हैं, अर्थात् जब हम उन्हें परमेश्वर के हाथ से कृपा पाने और अपने पापों का दण्ड चुकाने में कारगर बनाने का प्रयत्न करते हैं; संक्षेप में, जब हम उन्हें अपने उद्धार के काम में लगाना चाहते हैं, तो यह विश्वास को सर्वथा उलट देना है और इस प्रकार उसे निकम्मा बना देना है। सो हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का यह निष्कर्ष निकालना व्यर्थ नहीं है: कि जब हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, तब कर्म किसी मूल्य के नहीं, वरन् उन्हें पूरी तरह दरवाज़े के बाहर कर देना चाहिए, इस किसी भी धारणा के लिये कि हमें पुण्यों या सद्गुणों को गिनना चाहिए जिनसे हम परमेश्वर को प्रसन्न करें।

अब, यहाँ हमें फिर यह ध्यान देना है कि परमेश्वर अपनी केवल उदारता से हमें धर्मी ठहराता है और हमारी दुर्दशा को उसे सँभालने के लिये खोजता है, ताकि वह अकेला धर्मी जाना जाए और हमारे उद्धार की प्रशंसा पूरी तरह उसी को दी जाए, जैसा सन्त पौलुस इफिसियों की पत्री में और रोमियों की पत्री में भी भली भाँति कहता है: कि परमेश्वर ने सब को पाप के अधीन बन्द कर दिया ताकि वह अकेला धर्मी जाना जाए, और हर एक मुँह बन्द किया जाए, क्योंकि वही अकेला है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के द्वारा पापियों को धर्मी ठहराता है और हमें अपनी धार्मिकता के मार्ग में लाता है। जैसे गलातियों के तीसरे अध्याय में भी, जब सन्त पौलुस यह प्रश्न उठाता है: यह कैसे सम्भव है कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के बाद व्यवस्था दी? क्योंकि ऐसा प्रतीत हो सकता है कि परमेश्वर ने अपना उद्देश्य बदल दिया और भटक गया, क्योंकि उसने अब्राम को मुफ्त धर्मी ठहराया, और बहुत समय बाद व्यवस्था दी; और उसमें वह कहता है, कि जो कोई इन बातों को करेगा वह इनके कारण जीवित रहेगा।

इसका उत्तर सन्त पौलुस यह देता है कि व्यवस्था मुफ्त प्रतिज्ञा को रद्द करने के लिये नहीं दी गई, परन्तु उस उपयोग के लिये जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, अर्थात् यह कि हम सब पाप और दण्ड के अधीन बन्द किए जाएँ, क्योंकि नहीं तो हम कभी यह अनुभव न करते कि परमेश्वर की दया का मूल्य क्या है, और न उसकी खोज करते, और इसके अतिरिक्त हम समझते कि हमें उसकी आवश्यकता ही नहीं।

और सचमुच, दो प्रकार के लोग हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह को कुछ नहीं गिनते, और अपने आप को उन सब लाभों से, जो हमें उसके द्वारा मिलते हैं, और उस उद्धार से भी जो हमें उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा मिलता है, वंचित कर लेते हैं। एक प्रकार वे हैं जो अपने आप को समझाते हैं कि उनमें कोई योग्यता है और इसी पर अपने घमण्ड की बहुतायत में परमेश्वर की अवहेलना करते हैं; और ऐसे हैं तुम्हारे मौजी भिक्षुओं, साधुओं और उनके जैसों का झुण्ड: जिनके पास धार्मिकता का एक प्रकार का तड़क-भड़कवाला चमकता दिखावा है, जो एक अद्भुत और मानो स्वर्गदूतों के समान पवित्रता का नाटक करते हैं। इन मनुष्यों ने, मैं कहता हूँ, द्वार बन्द कर रखा है और यीशु मसीह के पास उनका प्रवेश नहीं, क्योंकि वे उसे अपने से बहुत दूर धकेल देते हैं।

दूसरे प्रकार के वे हैं जो लापरवाह और निश्चिन्त हैं और अपने आप को धर्मी नहीं समझते। और ऐसा क्यों? क्योंकि उनमें से कुछ व्यभिचारी हैं, कुछ चोर हैं, कुछ पियक्कड़ हैं, कुछ कामी हैं, और कुछ परमेश्वर के ऐसे तिरस्कारी हैं कि छोटे बच्चे भी उन्हें वैसा ही कह सकते हैं। ये मनुष्य घमण्ड और अहंकार से नहीं बहकाए गए, परन्तु शैतान ने उन्हें ऐसा मतवाला कर दिया है कि वे अनन्त जीवन की चिन्ता कभी नहीं करते, वरन् सर्वथा पशु समान हो गए हैं।

और देखो, इसी कारण सुलैमान कहता है, "कि वह धन्य और आशीषित है जो अपने हृदय की चौकसी करता है और अपने पापों और दुर्दशा को समझने के लिये डरता और जागता रहता है।" सो हम देखते हैं कि व्यवस्था प्रतिज्ञा के बाद इसके सिवा किसी और कारण से नहीं दी गई कि हमें दोषी ठहराए, इस उद्देश्य से कि हम अपनी सारी धार्मिकता परमेश्वर में खोजें और अपने उद्धार के लिये सारी स्तुति उसी को दें। सो आओ हम यहाँ इस अन्तिम उद्देश्य पर ध्यान दें, और इसी कारण सन्त पौलुस इफिसियों के पहले अध्याय में इस विषय की और विस्तार से चर्चा करता है। क्योंकि वह इसे हल्के में नहीं टालता, वरन् इस विषय को ऐसे सँभालता है मानो उसे हमारे कानों में गरज कर सुनाना चाहता हो, इस उद्देश्य से, वह कहता है, "कि परमेश्वर की महिमा जानी जाए, वही अकेला महिमा पाए, वही अकेला धर्मी जाना जाए, कि हम जानें कि हमारे पास जो कुछ है सब उसी से है।" क्योंकि हमें जानना चाहिए, वह कहता है, "कि उसकी केवल कृपा और अनुग्रह के बिना हम सब दोषी ठहरे हैं।"

यहाँ हम देखते हैं, मैं संक्षेप में कहता हूँ, कि जब परमेश्वर हम से हमारी अपनी शक्ति और सामर्थ्य की सारी धारणा छीन लेता है, तो उसका अभिप्राय क्या है; अर्थात् उसका अर्थ यह है कि वह चाहता है कि वह अकेला धर्मी जाना जाए, और हम अपने आप से खोए हुए और दोषी ठहरे हुए प्राणी। सो जो कोई भी अपने लिये ज़रा सी भी धार्मिकता का दावा करे, मानो वे परमेश्वर के सहायक और सहयोगी हों, जैसे पोप-भक्त अपने आप को परमेश्वर के सहकर्मी या साथ मिलकर काम करनेवाले कहते हैं, निःसन्देह संसार के सब चोरों से अधिक घृणित अपराध करते हैं। क्योंकि एक मरणशील मनुष्य से सोना, चाँदी और उसका बाकी सब कुछ छीन लेना परमेश्वर से उसका आदर लूटने की तुलना में क्या है, जो वह सबसे बढ़कर चाहता है कि अपने ही लिये सुरक्षित रखा जाए? और वह यह है कि अकेला वही धर्मी माना जाए। और फिर जब अभागे मरणशील प्राणी, या कहें पृथ्वी पर रेंगनेवाले कीड़े, जो एक अत्यन्त भ्रष्ट और घिनौनी वस्तु से बढ़कर कुछ नहीं, परमेश्वर के स्थान पर खड़े होकर कहें, "तू हमारे उद्धार का पूरा करनेवाला नहीं, परन्तु हमने उसमें तेरी सहायता की है।" क्या यह अति शापित निन्दा नहीं जब हम परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता का कुछ अंश अपने साथ लाने का साहस करते हैं?

परन्तु यहाँ हमें वह स्मरण रखना है जिस पर हमने कल विचार किया था, अर्थात् यह कि "धर्मी ठहराना" शब्द का अर्थ यह नहीं कि हम धर्मी बनाए जाते हैं, अर्थात् परमेश्वर हमें ऐसा नया कर देता है कि हम स्वर्गदूत हो जाएँ, परन्तु उसका अर्थ यह है कि वह अपनी केवल भलाई से हमें ग्रहण करता और स्वीकार करता है, चाहे हम अभागे पापी ही हों। और इसलिये हम यहाँ देख सकते हैं कि मूसा इस स्थान पर "गिनना" शब्द को कैसे छूता है, मानो उसने कहा हो कि यह परमेश्वर की मुफ्त कृपा पर टिका है और यह पूछने की बात नहीं कि मनुष्य की ओर से धार्मिकता है या नहीं, या वह ग्रहण किए जाने के योग्य है या नहीं। इसका तो कोई अर्थ ही नहीं। परन्तु हम इसी से सन्तुष्ट रहें कि परमेश्वर हमें धर्मी मानकर ग्रहण करता है, चाहे हम कर्म में रत्ती भर भी वैसे नहीं।

और यहाँ हम यह भी देखते हैं कि विश्वास की धार्मिकता कर्मों को क्यों बाहर रखती है: क्योंकि हम में जो घटी है, उसे हम यीशु मसीह से पाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि अंशतः, जैसे पोप-भक्त अपने आप को फँसाते हैं, परन्तु हम यीशु मसीह की धार्मिकता उधार लेते हैं क्योंकि हम में उसकी एक बूँद या एक कौड़ी भी नहीं। और इसलिये जब हम धार्मिकता को कहीं और खोजते हैं तो कर्मों का उलट जाना अनिवार्य है। क्योंकि यदि यीशु मसीह में केवल एक अंश होता और हम में दूसरा, तो वह पूर्ण न ठहरता: और तब यह वचन कैसे पूरा होता, "कि अनुग्रह की परिपूर्णता उसे पवित्र आत्मा के द्वारा दी गई, कि वह उसे हर एक को नाप के अनुसार बाँटे?" क्योंकि ये दो शब्द, "प्राप्त करना" और "ग्रहण करना," एक दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं; और जब परमेश्वर हमें धर्मी ठहराता है, तो वह उसके लेपालक करने के द्वारा है, और क्योंकि हम स्वभाव से क्रोध की सन्तान हैं, इसलिये वह हमें गोद लेता है और अपनी सन्तान गिनता है।

और वह हम में क्या पाता है? संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो हमें भला करने को प्रेरित कर सके। और इसलिये हमारे उद्धार की वह मीरास जिसकी हम आशा रखते हैं, और जो सुसमाचार में हम से प्रतिज्ञा की गई है, परमेश्वर के इसी लेपालक करने से आती है और हम में की किसी वस्तु से नहीं; क्योंकि यदि हम अपने आप से कुछ प्राप्त कर सकते, तो निःसन्देह हम परमेश्वर के साथ हिस्सा बाँटते, जैसे पोप-भक्त करते हैं। परन्तु क्योंकि परमेश्वर ऐसा करता है कि हम कुछ नहीं करते, इसलिये अकेला वही महिमा पाने के योग्य है।

अब हम संक्षेप में देखते हैं कि जिस धार्मिकता की यहाँ चर्चा है, उसका अर्थ पापों की क्षमा और उस साख के सिवा कुछ नहीं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में हमें उसकी आज्ञाकारिता के पुण्य के द्वारा धर्मी बनाए जाने के लिये मिली है। परन्तु जब सन्त पौलुस हमारे बचपने के अनुसार हमें कठोरता से सिखाना चाहता है, तो वह केवल पापों की क्षमा को सामने लाता है और इस प्रकार तर्क करता है, "हम," वह कहता है, "अपने कर्मों से धर्मी नहीं ठहर सकते।" और ऐसा क्यों? निश्चय इसलिये कि लिखा है, "धन्य है वह मनुष्य जिसका पाप यहोवा क्षमा करता है, और जिसके अधर्म ढाँपे गए हैं, और जिसकी दुष्टता उसके लेखे में नहीं गिनी जाती।" यहाँ, वह कहता है, हम अपना सारा सुख देखते हैं, जो यह है कि परमेश्वर हमें दया से ग्रहण करे और हमारे उन सब पापों को भुला दे और गाड़ दे जिनके लिये हम उसके सम्मुख दोषी हैं।

सो जब ऐसा है, तो अनिवार्य रूप से यही निकलता है कि जब तक परमेश्वर हमें क्षमा न कर दे, हम सब शापित हैं; और यदि हम दुष्ट हैं, तो फिर हमारी धार्मिकता कहाँ पाई जाएगी? क्योंकि परमेश्वर उससे घृणा नहीं कर सकता जो उसके स्वभाव के अनुकूल हो, क्योंकि वह सारी धार्मिकता का सोता है। और इसलिये यदि वह हम में ज़रा सी भी भलाई पाए, तो निःसन्देह वह उसे ग्रहण करेगा। इसलिये हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि क्योंकि हम दुष्ट हैं, हम अधर्मी और सर्वथा शापित हैं, और जब तक परमेश्वर हम से प्रेम न रखे, किसी रीति से धन्य नहीं हो सकते। अब, यदि वह हम से प्रेम रखता है, तो उसे तुरन्त हमें स्वीकार और पसन्द करना होगा; और यदि वह हमें स्वीकार और पसन्द करता है, तो हमें अनिवार्य रूप से धर्मी होना होगा। ये वे सिद्धान्त हैं जिन्हें हमें समझना चाहिए। तथापि हमें अब भी यह जानना है कि जब तक परमेश्वर हम से प्रेम न रखे, हम धन्य नहीं हो सकते; क्योंकि जब तक वह हमारा शत्रु है, हाय, हम कैसी शोचनीय दशा और स्थिति में हैं?

तो फिर हमारा सुख किस पर निर्भर है? निश्चय इसी पर, कि परमेश्वर हम से प्रेम रखे। अब हमें विचार करना चाहिए कि वह हम से कैसे प्रेम रखता है: उसे अनिवार्य रूप से हमें स्वीकार और पसन्द करना होगा, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, क्योंकि वह अपने आप का इन्कार नहीं कर सकता। क्योंकि यदि वह हमें ठुकराए और घृणा करे, तो हम उससे कैसे मेल करेंगे? अब आओ देखें किस उपाय से: क्योंकि परमेश्वर का रूप बदल नहीं सकता, और यदि (जैसा सन्त पौलुस कहता है) हम ऐसा कोई ढोंग रचें, तो वह व्यर्थ होगा; क्योंकि वह सदा अपने ही समान बना रहेगा और हमें हमारे सब झूठों समेत अलग करना और अपनी बही से मिटा देना भली भाँति जानता है। और तब परमेश्वर हमें कैसे स्वीकार और पसन्द करेगा? सुनो भाई, हमें धर्मी होना चाहिए। अब, वह कैसी धार्मिकता है? यह वह धार्मिकता नहीं जो हम अपने कर्मों में मान बैठे हैं, न वह कि हम उसके सम्मुख अपने आप कमा सकें, या अपने किसी कर्तव्य से, जो हम निभा सकें, उसका दण्ड चुका सकें: इन सब में से कुछ भी हमारे काम न आएगा। तो वह कैसी धार्मिकता है? निश्चय यही, कि परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करे, हमारे अधर्मों को भुला दे, और हमारे अपराधों को हमारे लेखे में न गिने।

और इसलिये दाऊद का इन तीन प्रकार की बातों को कहना उचित था: क्योंकि कोई समझे कि यह एक अनावश्यक प्रकार की भाषा है; परन्तु वह विशेष रूप से इसे इसलिये दोहराता है कि मनुष्य की वह दशा जिसमें वह जन्मा और सिर से पैर तक डूबा हुआ है, जब तक परमेश्वर उसे उस में से न निकाले, केवल अथाह गहराई ही नहीं, वरन् सब गहराइयों की अथाह गहराई है, अर्थात् वह नरक की अथाह गहराई है। और इसलिये परमेश्वर को इसमें एक अनोखे ढंग से काम करना होगा। और इसलिये हम देखते हैं कि वह तुरन्त ही यह भी क्यों कहता है, और उस आत्मा में जिसमें कपट नहीं: क्योंकि उचित है कि हम समझें कि परमेश्वर की दया हमारे लिये कितनी आवश्यक है, क्योंकि हमारे पाप ऐसे घिनौने और भयानक हैं कि वे स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को दूषित और विषैला कर सकते हैं, और केवल परमेश्वर को ही नहीं वरन् स्वर्गदूतों, सूर्य और चन्द्रमा को, और स्वर्ग और पृथ्वी की सारी सेनाओं को हमारे विरुद्ध भड़का सकते हैं।

इसलिये हम देखते हैं कि दाऊद पापों की क्षमा को इतना क्यों बड़ा ठहराता है। और इसी पर सन्त पौलुस स्वयं भी निष्कर्ष निकालता है और हमें दिखाता है कि हमारी सारी धार्मिकता किस में है, अर्थात् यह कि हमारे पाप क्षमा किए गए हैं। और आओ हम यह भी ध्यान दें, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि दाऊद उसे उस आत्मा में कहता और लिखता है जिसमें कपट नहीं: क्योंकि वह दिखाता है कि हमारे पाप हमें क्षमा नहीं हो सकते, चाहे परमेश्वर हमें क्षमा देने को प्रस्तुत हो, जब तक हम अपने आप में पूरी तरह घबरा न जाएँ, और ऐसे चौंका और जगाए न जाएँ कि कोई कपट या छल हमें यह या वह न मनवाए, और न हम निश्चिन्तता की मृत नींद में पड़े रहें, वरन् अपने आप को अति अभागे, दोषी और खोए हुए प्राणियों के समान पाएँ, और ऐसे जिन्हें परमेश्वर के न्याय-दण्ड ऐसा सताएँ कि हम न जानें किधर मुड़ें, और ऐसी निराश दशा में हों मानो हम अपने सामने मृत्यु को खड़ा और परमेश्वर के हाथ को उस शाप का दण्ड, जो वह हमारे विरुद्ध सुनाता है, देने को शस्त्र बाँधे हुए देखते हों।

और यह उस धार्मिकता की परिभाषा है जिस पर हमें ध्यान देना है, यदि हम उसकी ठीक परिभाषा चाहते हैं। हम यह भी देखते हैं कि प्रेरितों के काम के पन्द्रहवें अध्याय में ऐसा क्यों कहा गया है, जहाँ सन्त पौलुस व्यवस्था की रीतियों की चर्चा करते हुए कहता है कि हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उन सब बातों से धर्मी ठहरना चाहिए जिनसे मूसा की व्यवस्था हमें धर्मी न ठहरा सकी। यहाँ "व्यवस्था" शब्द अपने साथ लम्बी पूँछ लिए हुए है: क्योंकि हमें समझना चाहिए कि सन्त पौलुस विशेष रूप से व्यवस्था की रीतियों की चर्चा क्यों करता है जब वह कहता है कि कर्म हमें परमेश्वर के सम्मुख किसी रीति से ग्रहण-योग्य नहीं बना सकते। अब पोप-भक्त, और प्राचीन पिताओं में से बहुत से, जो पवित्रशास्त्र को नहीं जानते थे वरन् जैसा कहा जाए, आधे दार्शनिक थे, इस शब्द "व्यवस्था" से बहुत घबराए, और यद्यपि सन्त पौलुस नैतिक कर्मों के विषय में, जैसा वे उन्हें कहते थे, नहीं झगड़ता था: अर्थात् वह इस बात से इन्कार करने नहीं जा रहा था कि यदि हम पवित्रता, संयम और सादगी से जीएँ, किसी का अनिष्ट न करें, और ऐसे सब अन्य नैतिक सद्गुणों को थामे रहें तो हम परमेश्वर के सम्मुख धर्मी नहीं ठहरते: उन्होंने सोचा कि सन्त पौलुस ने इन में से किसी को नहीं छुआ, परन्तु सचमुच यह कहना चाहता था कि ये सब कर्म अंशतः उद्धार के योग्य हैं: परन्तु उन्होंने सोचा कि व्यवस्था की रीतियाँ धर्मी ठहराए जाने के लिये किसी रीति से लाभदायक नहीं हो सकतीं। अब यह कल्पना बहुत ही स्थूल मूर्खता है: क्योंकि पहली बात तो यह कि सन्त पौलुस ने कभी व्यवस्था की रीतियों की चर्चा की ही नहीं।

इसलिये, मैं तुम से बिनती करता हूँ, देखो वे कितने अविवेक से भरमाए गए हैं; और इसे प्रमाणित करने के लिये भजन के उस स्थान पर विचार करो जो मैंने पहले उद्धृत किया, कि दाऊद मनुष्य की धन्यता को केवल पापों की क्षमा में बताता है, किसी कर्म का नाम लिए बिना; और कर्मों की यह चर्चा अपने भीतर वे सब सद्गुण समाविष्ट करती है जो हम किसी भी रीति से अपने ऊपर ले सकते हैं और जिन पर हम बहुत घमण्ड करते हैं। अब यह शापितपन (सन्त पौलुस कहता है) दिखाता है कि हमें परमेश्वर के सम्मुख नंगे और खाली आना ही होगा, कि हम उसकी केवल और मुफ्त भलाई से भरे जाएँ और समृद्ध किए जाएँ।

इसके अतिरिक्त, जब वह व्यवस्था के कर्मों की बात करता है, तो इसलिये कि यदि उनमें कोई पुण्य है, तो उस वाचा के कारण है जिसका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं, "कि जो कोई इन बातों को करेगा वह इनमें जीवित रहेगा।" मान लो कि कभी कोई व्यवस्था प्रकाशित ही नहीं हुई होती, तौभी हम रत्ती भर भी परमेश्वर को अधिक ग्रहण-योग्य न होते। और जहाँ तक उसकी बात है, वह हमारा कुछ देनदार नहीं, और न हमारे प्रति रत्ती भर भी बँधा है; क्योंकि कहा गया है, "कि जब हम वह सब कर चुकें जिसकी हमें आज्ञा दी गई है, तौभी हमें अनिवार्य रूप से मानना चाहिए कि हम निकम्मे दास हैं।" और ऐसा क्यों? क्या? क्या हम अपनी ही इच्छा और स्वतंत्रता से जो चाहें करें? क्या हम में कुछ ऐसा है जो हमारा अपना हो? नहीं, सचमुच नहीं, और इसलिये हम कोई पुण्य नहीं जता सकते, चाहे हम व्यवस्था को पूर्ण रूप से पूरा भी करें।

तो फिर अपने कर्मों पर हमारा जो भरोसा है, वह किस पर निर्भर है? निश्चय इसी प्रतिज्ञा पर, "कि जो कोई इन बातों को करेगा वह इनके कारण जीवित रहेगा।" क्योंकि परमेश्वर ने अपनी ही इच्छा से अपने आप को इसमें बाँधा, यद्यपि वह युक्ति से इस से बँधा नहीं था। इसलिये जब सन्त पौलुस व्यवस्था के कर्मों की चर्चा करता है, तो वह दिखाता है कि यद्यपि परमेश्वर ने उन सब से जिनसे उसने प्रतिज्ञा की है यह प्रतिज्ञा की कि जितने कोई भी उन सब बातों को जिनकी उसने आज्ञा दी है, व्यवस्था की धार्मिकता के द्वारा पूरा करेंगे, वे धर्मी गिने और माने जाएँगे, और उसके द्वारा अनन्त जीवन पाएँगे; तौभी व्यवस्था के कर्म यह नहीं कर सकते। और ऐसा क्यों? क्योंकि वे हमें फिर भी व्यवस्था के शाप और दण्ड के अधीन छोड़ देते हैं: क्योंकि जब तक हम देह के इस तम्बू में रहते हैं, हम पाप के सिवा कुछ नहीं कर सकते, और वह कोई भी हो जो अपने आप को सबसे अधिक धर्मी समझे, अपने कर्तव्य के सौवें अंश से भी कभी अपने आप को मुक्त और बरी नहीं कर सकेगा।

तो फिर हम क्या करें, सिवाय इसके कि सिर झुकाएँ और अपने न्यायी के चरणों पर गिर पड़ें, और इस प्रकार क्षमा और माफ़ी माँगें? जैसा आगे और विस्तार से बताया जाएगा। अब आओ हम उस स्थान पर लौटें जो उस पर निर्भर है जिसे मैं पहले छू चुका हूँ, अर्थात् यह कि यीशु मसीह हमारे सम्मुख इसलिये रखा गया है कि हमें उन सब बातों में धर्मी ठहराए जिनमें मूसा की व्यवस्था कभी धर्मी न ठहरा सकी। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि वे समझते थे कि रीतियों से और व्यवस्था के बाकी सब से भी उन्हें सहायता मिलती है कि परमेश्वर के सम्मुख वे बड़े गिने जाएँ, और उसे प्रसन्न कर सकें; क्योंकि यदि वे चूक जाते, तो उनके पास बलिदान थे जो उचित उपचार थे, जैसे उन्हें शुद्ध करने के लिये लहू का छिड़कना, परमेश्वर के प्रति प्रायश्चित के लिये कुछ धुलाइयाँ भी, और इनके अतिरिक्त और भी बहुत सी प्रतिज्ञाएँ।

तब ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब उन्हें परमेश्वर के सम्मुख ग्रहण-योग्य बनाने के लिये कुछ नहीं था, वरन् इसके विपरीत, यीशु मसीह को आना पड़ा कि हमें उन बातों से धर्मी ठहराए जिनसे व्यवस्था कभी न कर सकी। इस कथन का क्या अर्थ है कि हमें बातों से धर्मी ठहराए? अर्थात् हमें उन्हें क्षमा और माफ़ करना। अब हम इस स्थान से जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ यह देखते हैं कि जिस धार्मिकता की चर्चा मूसा यहाँ करता है, वह हमारे व्यक्तियों में बसी हुई वस्तु नहीं है।

परन्तु परमेश्वर का हमें मुफ्त क्षमा करना है, जब वह हम पर दयालु और प्रेमी होता है, चाहे हम उसके रत्ती भर भी योग्य नहीं: क्योंकि यह जो मूसा यहाँ बताता है, किसी भी मनुष्य में कभी नहीं पाया जा सकता, केवल यीशु मसीह में, जिसे अकेले हमें धर्मी ठहराना है: और वह कैसे? अर्थात् यदि शैतान हम पर दोष लगाए, और परमेश्वर हमारा न्याय करने और हमें दोषी ठहराने को तैयार हो: तब यीशु मसीह हमारा ज़मानती बनकर हमारी ओर से उत्तर देगा। सो हम देखते हैं कि यीशु मसीह की आज्ञाकारिता हमारे लिये चादर का काम करती है जो हमारे सब विद्रोहों और अधर्मों को ढाँप देती है। वही है जिसने हमारे लिये दण्ड चुकाया और अपनी मृत्यु के पुण्य से हमें हमारे सब ऋणों से मुक्त किया और अपना बहुमूल्य लहू बहाया कि उससे हमें धोए।

संक्षेप में, हम परमेश्वर के पुत्र में वह सब पाते हैं जो हमें उसके सम्मुख ग्रहण-योग्य बनाने के लिये आवश्यक है क्योंकि हमारे पाप हमारे लेखे में नहीं गिने जाते। सो यहाँ हम संक्षेप में देखते हैं कि हमें इस स्थान से क्या स्मरण रखना है। अब हमें कुछ और आगे बढ़ना है, अर्थात् यह कि जब परमेश्वर एक बार हमें इस प्रकार दया में ग्रहण कर चुका है, तो वह हमारे जीवन के सब दिनों, और मृत्यु में भी, हमें धर्मी कैसे बनाए रखता, थामे रहता और मानता है: क्योंकि यही मुख्य बात है जिसकी ओर हमें लक्ष्य करना और पहुँचना है, तथापि इस समय हम उस पर विचार करने के लिये ठहर नहीं सकते। सो यही पर्याप्त हो, कि बातें भली भाँति स्मरण रहें, हम जानें और समझें कि खुला मार्ग क्या है, जो हमारे लिये परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के द्वारा हम तक पहुँचनेवाले अनन्त उद्धार के भागी होने के लिये चाहिए, अर्थात् हमें जानना और समझना है कि हमारी दशा और स्थिति कितनी दयनीय और अभागी है, केवल मुँह से उसे मान लेने या अपने मस्तिष्क में तैरती व्यर्थ कल्पना रखने से नहीं।

परन्तु ऐसे शोकपूर्वक घायल और दुःखी होने से, कि हम परमेश्वर की महिमा के सम्मुख घबरा जाएँ, यहाँ तक कि अपने आप से घृणा और बैर करने लगें। और जब हम अपने विषय में इस प्रकार ठीक-ठीक न्याय करेंगे, तब हम निश्चित होंगे कि परमेश्वर हमें क्षमा करेगा। और जब हम अपने आप में इस प्रकार मर जाएँगे, तब हम यीशु मसीह में जीवन पाएँगे। क्योंकि इतना जानना पर्याप्त नहीं कि हम अति अभागे रोगी प्राणी, और दीन और कंगाल जन हैं, परन्तु हमें पूरी तरह मरा हुआ होना चाहिए, इस उद्देश्य से कि हम केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से जिलाए जाएँ। और कि इस पर हम ऐसे दीन किए जाएँ जैसा पवित्रशास्त्र हमें आज्ञा देता है, अर्थात् परमेश्वर को वह आदर दें जो उसका ठहरा है।

और दाऊद का यह कहना व्यर्थ नहीं, जब वह कहता है, "कि परमेश्वर तो दीन और पिसा हुआ मन चाहता है।" क्योंकि जब तक हम अपने आप में पूरी तरह गिरा न दिए जाएँ, हम कभी उसके पास नहीं आएँगे। और तब हमें यह मन और भाव अपने साथ रखना चाहिए कि हम अपनी विपत्तियों में अद्भुत रूप से दुःखी और व्याकुल हैं, और तब हम सचमुच मान लेंगे कि हम धर्मी नहीं हैं। और तब हमारी इच्छा और भाव ऐसे प्रज्वलित होंगे कि हम अपनी धार्मिकता को अपने पुण्यों में नहीं खोजेंगे, वरन् इसके सर्वथा विपरीत, सारा अहंकार दूर फेंककर अपना सारा लाभ और उद्धार उसके अकेले पुत्र में खोजेंगे, और जब हम एक बार जान लेंगे कि उसने हमें मृत्यु की छाया से खींच निकाला है, तब हमारे मुँह खुलेंगे और उसकी अकथनीय स्तुति का प्रचार करने को तैयार होंगे, सन्त पतरस के उस कथन के अनुसार, जो उसने अपनी पहली सार्वभौमिक पत्री के पहले अध्याय में हमारे उद्धार के उद्देश्य की चर्चा करते हुए कहा है।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने पापों को मानते हुए, उससे बिनती करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें ऐसे चलाए कि हम उसके पवित्र नाम की महिमा और धन्यवाद के सिवा और कुछ न खोजें, और पहचानें कि हम किन-किन रीतियों से उसके ऋणी हैं, यहाँ तक कि जीवन की जो भी आशा हमारे पास है वह सब उसी से थामे हुए हैं, और इस सारे समय उसकी सेवा से न थकें, वरन् अपनी भरसक चेष्टा करें कि अपने आप को उसकी पवित्र इच्छा के अनुरूप ढालें, जब तक कि वह हमें हमारी देह की सब भ्रष्टताओं से ऐसा रहित न कर दे कि हम पूरी तरह उसकी धार्मिकता से ढक जाएँ। तब हम सब कहेंगे, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर और स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"

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