1 कुरिन्थियों 1:8-9

अन्त में गिर जाने का भय

चार्ल्स एच. स्पर्जन · सब कुछ अनुग्रह से, 1894

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    मसीह के पास आने वाले बहुत से लोगों के मन पर एक अँधेरा भय छाया रहता है; वे डरते हैं कि वे अन्त तक स्थिर नहीं बने रहेंगे। मैंने खोजी को यह कहते सुना है: “यदि मैं अपने प्राण को यीशु पर डाल भी दूँ, तो भी कदाचित् मैं अन्त में पीछे हटकर नाश हो जाऊँ। इससे पहले भी मेरे मन में अच्छी भावनाएँ आई हैं, और वे मिट गई हैं। मेरी भलाई भोर के मेघ और सवेरे की ओस के समान रही है। वह अचानक आई, कुछ समय तक टिकी रही, उसने बहुत कुछ की आशा दिलाई, और फिर लोप हो गई।”

    मेरा विश्वास है कि यह भय प्रायः उसी बात का जनक बन जाता है जिससे वह डरता है; और कि कुछ लोग जो सारे समय और सारी अनन्तता के लिये मसीह पर भरोसा रखने से डरते रहे, इसलिये असफल हुए कि उनका विश्वास एक अस्थायी विश्वास था, जो उन्हें बचाने के लिये कभी पर्याप्त दूर तक नहीं गया। उन्होंने कुछ हद तक यीशु पर भरोसा रखकर यात्रा आरम्भ की, परन्तु स्वर्ग की ओर जाने वाले मार्ग पर बने रहने और स्थिर रहने के लिये वे अपनी ही ओर देखते रहे; और इस प्रकार उन्होंने दोषपूर्ण रीति से आरम्भ किया, और स्वाभाविक परिणाम के रूप में, थोड़े ही समय में लौट गए। यदि हम टिके रहने के लिये अपने आप पर भरोसा रखें, तो हम टिके नहीं रहेंगे। चाहे हम अपने उद्धार के एक भाग के लिये यीशु पर निर्भर हों, फिर भी यदि हम किसी भी बात के लिये अपने आप पर भरोसा रखें तो हम असफल होंगे। कोई भी जंजीर अपनी सबसे कमज़ोर कड़ी से अधिक मज़बूत नहीं होती: यदि यीशु एक बात को छोड़ और सब बातों के लिये हमारी आशा हो, तो हम पूरी रीति से असफल होंगे, क्योंकि उसी एक बात में हम मिट्टी में मिल जाएँगे। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि पवित्र लोगों के स्थिर बने रहने के विषय में एक भूल ने बहुत से ऐसे लोगों को स्थिर बने रहने से रोक दिया है जो भली भाँति दौड़ रहे थे। किसने उन्हें रोका कि वे दौड़ते न रहें? उन्होंने उस दौड़ के लिये अपने आप पर भरोसा रखा, और इसलिये वे बीच ही में रुक गए। जिस गारे से आप निर्माण करते हैं, उसमें थोड़ा-सा भी अपना-आप मिलाने से सावधान रहिए, नहीं तो आप उसे कच्चा गारा बना देंगे, और पत्थर आपस में जुड़े नहीं रहेंगे। यदि आप अपने आरम्भ के लिये मसीह की ओर देखते हैं, तो अपने अन्त के लिये अपनी ओर देखने से सावधान रहिए। वह अल्फा है। ध्यान रखिए कि आप उसे ओमेगा भी बनाएँ। यदि आप आत्मा की रीति पर आरम्भ करते हैं, तो आपको यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि आप शरीर के द्वारा सिद्ध किए जाएँगे। जैसा आगे चलना चाहते हैं वैसा ही आरम्भ कीजिए, और जैसा आरम्भ किया वैसा ही आगे चलते रहिए, और प्रभु को अपने लिये सब में सब कुछ होने दीजिए। ओह, कि परमेश्वर पवित्र आत्मा हमें इस बात का बहुत स्पष्ट ज्ञान दे कि वह सामर्थ्य कहाँ से आनी चाहिए जिसके द्वारा हम अपने प्रभु के प्रकट होने के दिन तक सुरक्षित रखे जाएँगे!

    इस विषय पर पौलुस ने एक बार कुरिन्थियों को लिखते हुए यह कहा था:

    हमारा प्रभु यीशु मसीह, जो तुम्हें अन्त तक दृढ़ भी करेगा, कि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह के दिन में निर्दोष ठहरो। परमेश्वर सच्चा है, जिसने तुम को अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया है।

    यह भाषा हमें यह बताकर कि एक बड़ी आवश्यकता की पूर्ति कैसे की गई है, चुपचाप उस आवश्यकता को स्वीकार करती है। जहाँ कहीं प्रभु कोई प्रबन्ध करता है, वहाँ हमें पूरा निश्चय है कि उसकी आवश्यकता थी, क्योंकि अनुग्रह की वाचा पर कोई अनावश्यक वस्तु बोझ नहीं बनती। सुलैमान के आँगनों में सोने की ढालें लटकी रहती थीं जो कभी काम में नहीं लाई गईं, परन्तु परमेश्वर के शस्त्रागार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है। परमेश्वर ने जो कुछ प्रबन्ध किया है, उसकी हमें निश्चय ही आवश्यकता पड़ेगी। इस घड़ी से लेकर सब बातों की समाप्ति तक, परमेश्वर की हर एक प्रतिज्ञा और अनुग्रह की वाचा का हर एक प्रबन्ध काम में लाया जाएगा। विश्वास करने वाले प्राण की अत्यन्त आवश्यकता है—दृढ़ किया जाना, बने रहना, अन्त तक स्थिर रहना, अन्त तक सुरक्षित रखा जाना। यह सबसे अधिक उन्नत विश्वासियों की भी बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि पौलुस कुरिन्थुस के संतों को लिख रहा था, जो ऊँचे दर्जे के मनुष्य थे, जिनके विषय में वह कह सकता था, “मैं तुम्हारे विषय में अपने परमेश्वर का धन्यवाद सदा करता हूँ, इसलिये कि परमेश्वर का यह अनुग्रह तुम पर यीशु मसीह के द्वारा हुआ।” ठीक ऐसे ही मनुष्य सबसे अधिक निश्चय के साथ यह अनुभव करते हैं कि यदि उन्हें टिके रहना है, और अन्त तक डटे रहना है, और अन्त में जयवन्त होकर निकलना है, तो उन्हें प्रतिदिन नए अनुग्रह की आवश्यकता है। यदि आप संत न होते, तो आप में कोई अनुग्रह न होता, और आपको अधिक अनुग्रह की कोई आवश्यकता भी अनुभव न होती; परन्तु क्योंकि आप परमेश्वर के जन हैं, इसलिये आप आत्मिक जीवन की प्रतिदिन की माँगों को अनुभव करते हैं। संगमरमर की मूर्ति को भोजन की आवश्यकता नहीं होती; परन्तु जीवित मनुष्य भूखा और प्यासा होता है, और वह आनन्दित होता है कि उसकी रोटी और उसका पानी उसके लिये निश्चित किए गए हैं, क्योंकि नहीं तो वह निश्चय ही मार्ग में मूर्छित हो जाता। विश्वासी की व्यक्तिगत आवश्यकताएँ इस बात को अनिवार्य बना देती हैं कि वह सब पूर्तियों के उस महान स्रोत से प्रतिदिन ले; क्योंकि यदि वह अपने परमेश्वर के पास न जा सके, तो वह क्या कर सकता है?

    यह बात संतों में सबसे अधिक वरदान पाए हुओं पर भी लागू होती है—कुरिन्थुस के उन मनुष्यों पर भी जो सारे वचन और सारे ज्ञान में धनी किए गए थे। उन्हें अन्त तक दृढ़ किए जाने की आवश्यकता थी, नहीं तो उनके वरदान और उनकी उपलब्धियाँ ही उनके विनाश का कारण बन जातीं। यदि हम मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियाँ बोलते, फिर भी यदि हमें नया अनुग्रह न मिलता, तो हम कहाँ होते? यदि हमें इतना सारा अनुभव होता कि हम कलीसिया में पिता बन जाते—यदि हम परमेश्वर से ऐसे सिखाए गए होते कि सब भेदों को समझ लेते—तो भी हम अपने वाचा के सिर से हम में बहने वाले ईश्वरीय जीवन के बिना एक दिन भी जीवित नहीं रह सकते थे। जीवन भर की तो बात ही क्या, हम एक घड़ी भर भी टिके रहने की आशा कैसे कर सकते थे, जब तक कि प्रभु ही हमें थामे न रहे? जिसने हम में अच्छा काम आरम्भ किया है, उसे वह काम मसीह के दिन तक पूरा करना ही होगा, नहीं तो वह एक दुःखदायी विफलता सिद्ध होगा।

    यह बड़ी आवश्यकता बहुत कुछ हमारे अपने ही कारण उत्पन्न होती है। कुछ लोगों में यह दुःखदायी भय होता है कि वे अनुग्रह में स्थिर नहीं रहेंगे, क्योंकि वे अपनी चंचलता को जानते हैं। कुछ व्यक्ति स्वभाव ही से अस्थिर होते हैं। कुछ मनुष्य स्वभाव से रूढ़िवादी होते हैं, हठीले न भी कहें तो; परन्तु दूसरे उतने ही स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील और चंचल होते हैं। तितलियों के समान वे एक फूल से दूसरे फूल पर उड़ते फिरते हैं, यहाँ तक कि वे बाग़ की सारी सुन्दरताओं के पास हो आते हैं, पर किसी पर भी टिकते नहीं। वे कभी किसी एक स्थान पर इतनी देर नहीं रहते कि कुछ भला कर सकें; न तो अपने व्यापार में, और न अपने बौद्धिक कामों में। ऐसे व्यक्ति उचित ही डर सकते हैं कि दस, बीस, तीस, चालीस, कदाचित् पचास वर्ष की निरन्तर धार्मिक चौकसी उनके लिये बहुत ही अधिक होगी। हम मनुष्यों को पहले एक कलीसिया में और फिर दूसरी में सम्मिलित होते देखते हैं, यहाँ तक कि वे कम्पास की सारी दिशाएँ घूम लेते हैं। वे बारी-बारी से सब कुछ बनते हैं, पर देर तक कुछ भी नहीं रहते। ऐसे लोगों को दुगुनी आवश्यकता है कि वे प्रार्थना करें कि वे परमेश्वर की ओर से दृढ़ किए जाएँ, और न केवल स्थिर परन्तु अटल भी बनाए जाएँ, नहीं तो वे “प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाते” हुए नहीं पाए जाएँगे।

    हम सब को, चाहे हम में स्वभाव से चंचलता की कोई परीक्षा न भी हो, यदि हम सचमुच परमेश्वर के द्वारा जिलाए गए हैं, तो अपनी निर्बलता का अनुभव अवश्य होना चाहिए। प्रिय पाठक, क्या आप किसी भी एक दिन में इतना कुछ नहीं पाते जो आपको ठोकर खिलाने के लिये पर्याप्त हो? आप जो सिद्ध पवित्रता में चलना चाहते हैं, जैसा मुझे भरोसा है कि आप चाहते हैं; आप जिन्होंने अपने सामने इस बात का ऊँचा आदर्श रखा है कि एक मसीही को कैसा होना चाहिए—क्या आप यह नहीं पाते कि मेज़ पर से नाश्ते के बर्तन उठाए जाने से पहले ही आप इतनी मूर्खता प्रकट कर चुके होते हैं कि आपको अपने आप पर लज्जा आए? यदि हम अपने आपको किसी संन्यासी की एकान्त कोठरी में बन्द कर लें, तो भी परीक्षा हमारे पीछे आएगी; क्योंकि जब तक हम अपने आप से बच नहीं सकते, तब तक हम पाप की उत्तेजनाओं से भी बच नहीं सकते। हमारे हृदयों के भीतर कुछ ऐसा है जो हमें परमेश्वर के सामने चौकस और दीन बनाए रखना चाहिए। यदि वह हमें दृढ़ न करे, तो हम इतने निर्बल हैं कि हम ठोकर खाकर गिर पड़ेंगे; किसी शत्रु के द्वारा उलटे नहीं जाएँगे, परन्तु अपनी ही लापरवाही से। हे प्रभु, तू हमारा बल हो। हम तो साक्षात् निर्बलता हैं।

    इसके अतिरिक्त, वह थकावट भी है जो लम्बे जीवन से आती है। जब हम अपना मसीही अंगीकार आरम्भ करते हैं, तब हम उकाबों के समान पंख फैलाकर ऊपर उड़ते हैं; आगे चलकर हम बिना थके दौड़ते हैं; परन्तु अपने सबसे अच्छे और सबसे सच्चे दिनों में हम बिना मूर्छित हुए चलते हैं। हमारी चाल धीमी लगती है, परन्तु वह अधिक उपयोगी और अधिक टिकाऊ होती है। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हमारी जवानी की शक्ति हमारे साथ बनी रहे, जहाँ तक वह आत्मा की शक्ति है और घमण्डी शरीर का केवल उफान नहीं। जो बहुत समय से स्वर्ग के मार्ग पर है, वह पाता है कि इस प्रतिज्ञा के पीछे एक अच्छा कारण था कि उसके जूते लोहे और पीतल के होंगे, क्योंकि मार्ग ऊबड़-खाबड़ है। उसने जान लिया है कि कठिनाई की पहाड़ियाँ और दीनता की घाटियाँ हैं; कि मृत्यु की छाया की एक तराई है, और उससे भी बुरा, व्यर्थता का एक मेला है—और इन सब में से होकर जाना है। यदि मनोहर पर्वत हैं (और परमेश्वर का धन्यवाद हो कि वे हैं), तो निराशा के गढ़ भी हैं, जिनके भीतर का दृश्य यात्रियों ने बहुत बार देखा है। सब बातों पर विचार करने से, जो पवित्रता के मार्ग पर अन्त तक डटे रहते हैं, वे “अचम्भे के मनुष्य” ठहरेंगे।

    “हे आश्चर्यों के संसार, मैं इससे कम नहीं कह सकता।” एक मसीही के जीवन के दिन मानो दया के इतने सारे कोहिनूर हैं जो ईश्वरीय विश्वासयोग्यता के सुनहरे धागे में पिरोए गए हैं। स्वर्ग में हम स्वर्गदूतों, और प्रधानों, और अधिकारियों को मसीह के उस अगम्य धन के विषय में बताएँगे जो यहाँ नीचे रहते हुए हम पर खर्च किया गया और जिसका हमने आनन्द उठाया। हम मृत्यु के किनारे पर जीवित रखे गए हैं। हमारा आत्मिक जीवन समुद्र के बीच में जलती रहने वाली एक ज्वाला, हवा में लटका रहने वाला एक पत्थर रहा है। जब सारा विश्व हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के दिन में निर्दोष होकर मोतियों के फाटक में प्रवेश करते देखेगा, तो वह चकित हो जाएगा। यदि हम एक घड़ी भर भी सुरक्षित रखे जाएँ, तो हमें कृतज्ञतापूर्ण आश्चर्य से भर जाना चाहिए; और मुझे भरोसा है कि हम भरे हुए हैं।

    यदि बस इतना ही होता, तो भी चिन्ता का पर्याप्त कारण होता; परन्तु इससे कहीं अधिक है। हमें यह सोचना है कि हम कैसे स्थान में रहते हैं। परमेश्वर के बहुत से लोगों के लिये यह संसार एक गरजता हुआ जंगल है। हम में से कुछ पर परमेश्वर के विधाता-प्रबन्ध में बहुत कृपा हुई है, परन्तु दूसरों को कठोर संघर्ष करना पड़ता है। हम अपना दिन प्रार्थना से आरम्भ करते हैं, और अपने घरों में बहुधा पवित्र गीत का स्वर सुनते हैं; परन्तु बहुत से भले लोग सवेरे अपने घुटनों पर से उठे ही होते हैं कि उनका स्वागत ईश-निन्दा से होता है। वे काम पर जाते हैं, और सदोम में धर्मी लूत के समान दिन भर गन्दी बातचीत से दुःखी होते रहते हैं। क्या आप खुली सड़कों पर चल भी सकते हैं बिना इसके कि आपके कान गन्दी भाषा से पीड़ित हों? संसार अनुग्रह का मित्र नहीं है। इस संसार के साथ हम सबसे अच्छा यही कर सकते हैं कि जितनी जल्दी हो सके इसमें से पार निकल जाएँ, क्योंकि हम शत्रु के देश में रहते हैं। हर एक झाड़ी में एक डाकू घात लगाए बैठा है। हर कहीं हमें अपने हाथ में “नंगी तलवार” लेकर, या कम से कम उस हथियार को, जो सब प्रकार की प्रार्थना कहलाता है, सदा अपने पास रखकर यात्रा करनी पड़ती है; क्योंकि हमें अपने मार्ग के एक-एक इंच के लिये संघर्ष करना पड़ता है। इस विषय में कोई भूल न कीजिए, नहीं तो आप अपने प्रिय भ्रम में से कठोरता से झकझोरकर जगाए जाएँगे। हे परमेश्वर, हमारी सहायता कर, और हमें अन्त तक दृढ़ कर, नहीं तो हम कहाँ होंगे?

    सच्चा धर्म अपने आरम्भ में अलौकिक है, अपने बने रहने में अलौकिक है, और अपने अन्त में अलौकिक है। वह आदि से अन्त तक परमेश्वर का काम है। इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि प्रभु का हाथ अब तक बढ़ा हुआ रहे: मेरा पाठक अभी उस आवश्यकता को अनुभव कर रहा है, और मैं आनन्दित हूँ कि वह उसे अनुभव करता है; क्योंकि अब वह अपने सुरक्षित रखे जाने के लिये उस प्रभु की ओर देखेगा जो अकेला ही हमें गिरने से बचा सकता है, और हमें अपने पुत्र के साथ महिमा दे सकता है।

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