रोमियों 8:33

परमेश्वर ही धर्मी ठहराता है

चार्ल्स एच. स्पर्जन · सब कुछ अनुग्रह से, 1894

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    यह धर्मी ठहराया जाना, अर्थात् धर्मी बनाया जाना, एक अद्भुत बात है। यदि हमने परमेश्वर की व्यवस्था को कभी न तोड़ा होता तो हमें इसकी आवश्यकता न होती, क्योंकि तब हम अपने आप में धर्मी होते। जिसने जीवन भर वे काम किए हैं जो उसे करने चाहिए थे, और कभी कोई ऐसा काम नहीं किया जो उसे नहीं करना चाहिए था, वह व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरता है। परन्तु, प्रिय पाठक, आप उस प्रकार के नहीं हैं, इसका मुझे पूरा निश्चय है। आप में इतनी ईमानदारी है कि आप पापरहित होने का ढोंग नहीं करते, और इसलिए आपको धर्मी ठहराए जाने की आवश्यकता है।

    अब, यदि आप अपने आप को धर्मी ठहराएँगे, तो आप केवल अपने आप को धोखा देनेवाले ठहरेंगे। इसलिए इसका प्रयत्न मत कीजिए। इसका कोई लाभ नहीं।

    यदि आप अपने संगी मनुष्यों से कहें कि वे आपको धर्मी ठहराएँ, तो वे क्या कर सकते हैं? छोटे-छोटे उपकारों के बदले आप उनमें से कुछ से अपनी प्रशंसा करवा सकते हैं, और दूसरे उससे भी कम बात पर आपकी पीठ पीछे निन्दा करेंगे। उनके निर्णय का कोई विशेष मूल्य नहीं।

    हमारा पाठ कहता है, “परमेश्वर वह है जो धर्मी ठहराता है,” और यह बात कहीं अधिक सटीक है। यह एक विस्मयकारी तथ्य है, और ऐसा तथ्य जिस पर हमें सावधानी से विचार करना चाहिए। आइए और देखिए।

    पहली बात, परमेश्वर के सिवा किसी और को कभी यह विचार भी न आता कि जो दोषी हैं उन्हें धर्मी ठहराया जाए। वे खुले विद्रोह में जीते रहे हैं; उन्होंने दोनों हाथों से बुराई की है; वे बुरे से बदतर होते गए हैं; पाप के कारण चोट खाने और इसलिए कुछ समय के लिए उसे छोड़ने को विवश होने के बाद भी वे फिर पाप की ओर लौट गए हैं। उन्होंने व्यवस्था को तोड़ा है, और सुसमाचार को पाँवों तले रौंदा है। उन्होंने दया की घोषणाओं को ठुकराया है, और भक्तिहीनता में लगे रहे हैं। उन्हें कैसे क्षमा किया और धर्मी ठहराया जा सकता है? उनके संगी मनुष्य उनसे निराश होकर कहते हैं, “इनका कुछ नहीं हो सकता।” मसीही भी उन्हें आशा से अधिक दुःख के साथ देखते हैं। परन्तु उनका परमेश्वर ऐसा नहीं करता। उसने अपने चुननेवाले अनुग्रह के तेज में उनमें से कुछ को जगत की उत्पत्ति से पहले चुन लिया है, और वह तब तक विश्राम न करेगा जब तक उन्हें धर्मी न ठहरा दे, और उस प्यारे में ग्रहणयोग्य न बना दे। क्या यह नहीं लिखा है, “फिर जिन्हें उस ने पहिले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी, और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है, और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है”? इस प्रकार आप देखते हैं कि कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें धर्मी ठहराने का प्रभु ने निश्चय किया है: तो आप और मैं उनकी गिनती में क्यों न हों?

    परमेश्वर के सिवा किसी और को मुझे धर्मी ठहराने का विचार कभी न आता। मैं अपने लिए स्वयं एक आश्चर्य हूँ। मुझे सन्देह नहीं कि दूसरों में भी अनुग्रह उतना ही दिखाई देता है। तरसुस के शाऊल को देखिए, जो परमेश्वर के दासों के विरुद्ध मुँह से झाग उगलता था। एक भूखे भेड़िये के समान वह इधर-उधर मेमनों और भेड़ों को फाड़ता फिरता था; और फिर भी परमेश्वर ने दमिश्क के मार्ग पर उसे गिरा दिया, और उसका हृदय बदल दिया, और उसे इतनी पूरी रीति से धर्मी ठहराया कि थोड़े ही समय में यह मनुष्य विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने का सबसे महान प्रचारक बन गया जो कभी हुआ हो। उसे बहुधा इस पर आश्चर्य होता होगा कि वह मसीह यीशु पर विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया गया; क्योंकि एक समय वह व्यवस्था के कामों के द्वारा उद्धार का कट्टर और हठी समर्थक था। शाऊल जैसे सतानेवाले मनुष्य को धर्मी ठहराने का विचार परमेश्वर के सिवा किसी और को कभी न आता; परन्तु प्रभु परमेश्वर अनुग्रह में महिमामय है।

    परन्तु, यदि किसी को भक्तिहीनों को धर्मी ठहराने का विचार आ भी जाता, तो भी परमेश्वर के सिवा कोई ऐसा कर नहीं सकता था। किसी भी व्यक्ति के लिए उन अपराधों को क्षमा करना सर्वथा असम्भव है जो उसके अपने विरुद्ध नहीं किए गए। किसी व्यक्ति ने आपकी बड़ी हानि की है; आप उसे क्षमा कर सकते हैं, और मुझे आशा है कि आप करेंगे; परन्तु कोई तीसरा व्यक्ति आपको छोड़कर उसे क्षमा नहीं कर सकता। यदि अन्याय आपके साथ हुआ है, तो क्षमा भी आप ही की ओर से आनी चाहिए। यदि हमने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है, तो क्षमा करना परमेश्वर के अधिकार में है; क्योंकि पाप उसी के विरुद्ध है। इसीलिए दाऊद इक्यावनवें भजन में कहता है: “मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है”; क्योंकि तब परमेश्वर, जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, उस अपराध को दूर कर सकता है। जो कुछ हम पर परमेश्वर का बकाया है, उसे हमारा महान सृष्टिकर्ता, यदि उसे भाए, माफ़ कर सकता है; और यदि वह उसे माफ़ कर दे, तो वह माफ़ हो गया। केवल वह महान परमेश्वर, जिसके विरुद्ध हमने पाप किया है, उस पाप को मिटा सकता है; इसलिए आइए, हम ध्यान रखें कि हम उसी के पास जाएँ और उसी के हाथ से दया माँगें। आइए, हम उन लोगों के बहकावे में न आएँ जो चाहते हैं कि हम उनके सामने पाप-स्वीकार करें; उनके इन दावों के लिए परमेश्वर के वचन में उन्हें कोई अधिकार नहीं दिया गया है। परन्तु यदि उन्हें परमेश्वर के नाम से पाप-मुक्ति की घोषणा करने के लिए ठहराया भी गया होता, तो भी यह कहीं अच्छा होता कि हम स्वयं मध्यस्थ यीशु मसीह के द्वारा उस महान प्रभु के पास जाएँ, और उसके हाथ से क्षमा माँगें और पाएँ; क्योंकि हमें निश्चय है कि यही सही मार्ग है। दूसरों के भरोसे का धर्म बहुत बड़ा जोखिम है: अच्छा यही है कि आप अपने प्राण के मामलों को स्वयं देखें, और उन्हें किसी मनुष्य के हाथों में न छोड़ें।

    केवल परमेश्वर ही भक्तिहीन को धर्मी ठहरा सकता है; परन्तु वह इसे पूर्णता से कर सकता है। वह हमारे पापों को अपनी पीठ के पीछे फेंक देता है, वह उन्हें मिटा देता है; वह कहता है कि चाहे उन्हें ढूँढ़ा भी जाए, तो भी वे न मिलेंगे। अपनी असीम भलाई के सिवा किसी और कारण के बिना, उसने एक ऐसा महिमामय मार्ग तैयार किया है जिसके द्वारा वह लाल रंग के पापों को हिम के समान उजला कर सकता है, और हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर सकता है जितना पूर्व पश्चिम से दूर है। वह कहता है, “मैं तुम्हारे पापों को स्मरण न करूँगा।” वह यहाँ तक जाता है कि पाप का अन्त कर देता है। प्राचीनकाल में एक जन ने विस्मित होकर पुकारा, “तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहाँ है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढाँप दे? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है” (मीका 7:18)।

    हम अभी न्याय की बात नहीं कर रहे, और न इस बात की कि परमेश्वर मनुष्यों से उनकी करनी के अनुसार व्यवहार करे। यदि आप धर्मी प्रभु से व्यवस्था की शर्तों पर लेन-देन करने का दावा करते हैं, तो अनन्त क्रोध आपके सिर पर मँडरा रहा है, क्योंकि आप उसी के योग्य हैं। धन्य हो उसका नाम, उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया; परन्तु अब वह सेंतमेंत अनुग्रह और असीम करुणा की शर्तों पर हम से व्यवहार करता है, और वह कहता है, “मैं तुम्हें अनुग्रह से ग्रहण करूँगा, और सेंतमेंत तुम से प्रेम करूँगा।” इस पर विश्वास कीजिए, क्योंकि यह निश्चय ही सत्य है कि महान परमेश्वर दोषियों से भरपूर दया का व्यवहार करने में समर्थ है; हाँ, वह भक्तिहीनों से ऐसा व्यवहार करने में समर्थ है मानो वे सदा भक्त रहे हों। उड़ाऊ पुत्र का दृष्टान्त ध्यान से पढ़िए, और देखिए कि क्षमा करनेवाले पिता ने लौटकर आए भटकनेवाले को उतने ही प्रेम से ग्रहण किया मानो वह कभी गया ही न हो, और उसने वेश्याओं के साथ अपने आप को कभी अशुद्ध किया ही न हो। उसने यह बात यहाँ तक निभाई कि बड़ा भाई इस पर कुड़कुड़ाने लगा; परन्तु पिता ने अपना प्रेम कभी वापस नहीं लिया। अरे मेरे भाई, आप चाहे कितने भी दोषी हों, यदि आप केवल अपने परमेश्वर और पिता के पास लौट आएँ, तो वह आपसे ऐसा व्यवहार करेगा मानो आपने कभी कोई बुराई की ही न हो! वह आपको धर्मी मानेगा, और उसी के अनुसार आपसे व्यवहार करेगा। इस पर आप क्या कहते हैं?

    क्या आप नहीं देखते—क्योंकि मैं इसे स्पष्ट रूप से सामने लाना चाहता हूँ कि यह कैसी शानदार बात है—कि यद्यपि परमेश्वर के सिवा किसी को भक्तिहीन को धर्मी ठहराने का विचार न आता, और परमेश्वर के सिवा कोई ऐसा कर भी नहीं सकता था, तौभी प्रभु ऐसा कर सकता है? देखिए, प्रेरित किस प्रकार यह चुनौती देता है, “परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उन को धर्मी ठहरानेवाला है।” यदि परमेश्वर ने किसी मनुष्य को धर्मी ठहराया है, तो वह भली-भाँति किया गया है, ठीक-ठीक किया गया है, न्यायपूर्वक किया गया है, सदा के लिए किया गया है। मैंने एक पत्रिका में, जो सुसमाचार और उसके प्रचारकों के विरुद्ध विष से भरी है, यह कथन पढ़ा कि हम किसी ऐसे सिद्धान्त को मानते हैं जिसके द्वारा हम कल्पना करते हैं कि मनुष्यों से पाप दूर किया जा सकता है। हम कोई सिद्धान्त नहीं मानते, हम एक तथ्य की घोषणा करते हैं। आकाश के नीचे सबसे महान तथ्य यह है—कि मसीह अपने बहुमूल्य लहू के द्वारा वास्तव में पाप को दूर करता है, और कि परमेश्वर, मसीह के कारण, मनुष्यों से ईश्वरीय दया की शर्तों पर व्यवहार करते हुए, दोषियों को क्षमा करता और उन्हें धर्मी ठहराता है—किसी ऐसी बात के अनुसार नहीं जो वह उनमें देखता है, या पहले से देखता है कि उनमें होगी, परन्तु अपनी उस दया के धन के अनुसार जो उसके अपने हृदय में है। यही हमने प्रचार किया है, यही प्रचार करते हैं, और जब तक जीवित रहेंगे यही प्रचार करेंगे। “परमेश्वर वह है जो धर्मी ठहराता है”—जो भक्तिहीन को धर्मी ठहराता है; वह ऐसा करने में लज्जित नहीं होता, और न हम इसका प्रचार करने में लज्जित होते हैं।

    जो धर्मी ठहराया जाना स्वयं परमेश्वर की ओर से आता है, वह हर प्रश्न से परे होना चाहिए। यदि न्यायी ही मुझे निर्दोष ठहरा दे, तो मुझे दोषी कौन ठहरा सकता है? यदि ब्रह्माण्ड के सबसे ऊँचे न्यायालय ने मुझे धर्मी घोषित कर दिया है, तो मुझ पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर की ओर से धर्मी ठहराया जाना जागे हुए विवेक के लिए पर्याप्त उत्तर है। उसके द्वारा पवित्र आत्मा हमारे सम्पूर्ण स्वभाव पर शान्ति फूँक देता है, और फिर हम भयभीत नहीं रहते। इस धर्मी ठहराए जाने के द्वारा हम शैतान और भक्तिहीन मनुष्यों की सारी गर्जनाओं और गालियों का उत्तर दे सकते हैं। इसी के सहारे हम मर सकेंगे: इसी के सहारे हम साहस के साथ फिर जी उठेंगे, और उस अन्तिम महान न्याय-सभा का सामना करेंगे।

    मित्र, प्रभु आपके सब पापों को मिटा सकता है। यह कहते हुए मैं अँधेरे में तीर नहीं चला रहा। “मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी।” चाहे आप गले तक अपराध में डूबे हुए हों, वह एक वचन से उस अशुद्धता को दूर कर सकता है, और कह सकता है, “मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा।” प्रभु बड़ा क्षमा करनेवाला है।

    “मैं पापों की क्षमा में विश्वास करता हूँ।” क्या आप करते हैं?

    वह इसी घड़ी यह निर्णय सुना सकता है, “तेरे पाप क्षमा हुए; कुशल से चला जा;” और यदि वह ऐसा करे, तो स्वर्ग में, या पृथ्वी पर, या पृथ्वी के नीचे की कोई भी शक्ति आपको सन्देह के घेरे में नहीं ला सकती, क्रोध के अधीन लाना तो दूर की बात है। सर्वशक्तिमान प्रेम की सामर्थ पर सन्देह मत कीजिए। यदि आपके संगी मनुष्य ने आपका उतना अपराध किया होता जितना आपने परमेश्वर का किया है, तो आप उसे क्षमा न कर पाते; परन्तु आपको परमेश्वर के अनाज को अपने पैमाने से नहीं नापना चाहिए; उसके विचार और उसकी गति आपके विचारों और गति से उतने ही ऊँचे हैं जितना आकाश पृथ्वी से ऊँचा है।

    आप कहते हैं, “अच्छा, यदि प्रभु मुझे क्षमा कर दे तो यह बड़ा आश्चर्यकर्म होगा।” ठीक ऐसा ही है। यह सबसे बड़ा आश्चर्यकर्म होगा, और इसीलिए इसकी सम्भावना है कि वह इसे करेगा; क्योंकि वह “ऐसे बड़े काम करता है जिनकी थाह नहीं लगती,” जिनकी हमने आशा भी नहीं की थी।

    मैं स्वयं अपराध-बोध की एक भयानक भावना से ऐसा कुचला गया था कि मेरा जीवन मेरे लिए दुःखमय हो गया था; परन्तु जब मैंने यह आज्ञा सुनी, “हे पृथ्वी के दूर दूर के देश के रहनेवालो, तुम मेरी ओर दृष्टि करो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्वर हूँ और दूसरा कोई नहीं है”—मैंने दृष्टि की, और एक क्षण में प्रभु ने मुझे धर्मी ठहरा दिया। मेरे लिए पाप ठहराया गया यीशु मसीह—यही मैंने देखा, और उस दृश्य ने मुझे विश्राम दिया। जंगल में जिन्हें तेज विषवाले साँपों ने डसा था, जब उन्होंने पीतल के साँप की ओर देखा तो वे तुरन्त चंगे हो गए; और जब मैंने क्रूस पर चढ़ाए गए उद्धारकर्ता की ओर देखा तो मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। पवित्र आत्मा ने, जिसने मुझे विश्वास करने की सामर्थ दी, विश्वास करने के द्वारा मुझे शान्ति दी। मुझे उतना ही निश्चय हो गया कि मैं क्षमा किया गया हूँ, जितना पहले मुझे अपने दण्ड का निश्चय था। मुझे अपने दण्ड का निश्चय इसलिए था कि परमेश्वर का वचन यही घोषित करता था, और मेरा विवेक इसकी गवाही देता था; परन्तु जब प्रभु ने मुझे धर्मी ठहराया तो उन्हीं गवाहों के द्वारा मुझे उतना ही निश्चय कराया गया। पवित्रशास्त्र में प्रभु का वचन कहता है, “जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती,” और मेरा विवेक गवाही देता है कि मैंने विश्वास किया, और कि परमेश्वर मुझे क्षमा करने में न्यायी है। इस प्रकार मेरे पास पवित्र आत्मा की और मेरे अपने विवेक की गवाही है, और ये दोनों एक बात पर सहमत हैं। अहा, मैं कितना चाहता हूँ कि मेरे पाठक इस विषय में परमेश्वर की गवाही को ग्रहण कर लें, और तब बहुत शीघ्र उनके पास भी अपने ही में गवाही होगी!

    मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि परमेश्वर द्वारा धर्मी ठहराया गया पापी उस धर्मी मनुष्य से भी अधिक पक्की नींव पर खड़ा है जो अपने कामों के द्वारा धर्मी ठहराया गया हो, यदि ऐसा कोई हो भी। हमें कभी पक्का निश्चय न हो पाता कि हमने पर्याप्त काम कर लिए हैं; विवेक सदा बेचैन रहता कि कहीं अन्त में हम कम न पड़ जाएँ, और भरोसा करने को हमारे पास केवल एक भूल करनेवाली बुद्धि का काँपता हुआ निर्णय होता; परन्तु जब परमेश्वर स्वयं धर्मी ठहराता है, और पवित्र आत्मा हमें परमेश्वर के साथ मेल देकर इसकी गवाही देता है, तब तो हम अनुभव करते हैं कि बात पक्की और निश्चित हो गई, और हम विश्राम में प्रवेश करते हैं। कोई जीभ उस शान्ति की गहराई का वर्णन नहीं कर सकती जो उस प्राण पर छा जाती है जिसने परमेश्वर की वह शान्ति पाई है जो समझ से बिलकुल परे है।

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