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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
“विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है” (इफिसियों 2:8)।
मैं यह उचित समझता हूँ कि थोड़ा एक ओर मुड़कर अपने पाठक से यह कहूँ कि वह आराधना के भाव से हमारे उद्धार के मूल सोते पर ध्यान दे, जो परमेश्वर का अनुग्रह है। “अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।” क्योंकि परमेश्वर अनुग्रहकारी है, इसलिये पापी मनुष्य क्षमा किए जाते हैं, फेरे जाते हैं, शुद्ध किए जाते हैं, और उद्धार पाते हैं। वे अपने भीतर की किसी बात के कारण, या किसी ऐसी बात के कारण जो कभी उनमें हो सकती है, उद्धार नहीं पाते; बल्कि परमेश्वर के असीम प्रेम, भलाई, तरस, करुणा, दया, और अनुग्रह के कारण। तो एक क्षण के लिये इस सोते के मुहाने पर ठहरिए। जीवन के जल की उस निर्मल नदी को देखिए, जो परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन से निकलती है!
परमेश्वर का अनुग्रह कैसा अथाह गहरा है! कौन उसकी चौड़ाई नाप सकता है? कौन उसकी गहराई की थाह ले सकता है? अन्य सब ईश्वरीय गुणों के समान, वह भी असीम है। परमेश्वर प्रेम से परिपूर्ण है, क्योंकि “परमेश्वर प्रेम है।” परमेश्वर भलाई से परिपूर्ण है; (अंग्रेज़ी में) “गॉड” (परमेश्वर) नाम ही “गुड” (भला) का संक्षिप्त रूप है। असीम भलाई और प्रेम परमेश्वरत्व के मूल तत्व में ही समाए हुए हैं। यह इसलिये है कि “उसकी करुणा सदा की है” कि मनुष्य नाश नहीं किए जाते; इसलिये कि “उसकी दया अमर है” कि पापी उसके पास लाए जाते और क्षमा किए जाते हैं।
इस बात को स्मरण रखिए; नहीं तो आप अपने मन को उस विश्वास पर, जो उद्धार की नाली है, इतना अधिक लगाकर भूल में पड़ सकते हैं कि उस अनुग्रह को ही भूल जाएँ जो स्वयं विश्वास का भी सोता और स्रोत है। विश्वास हम में परमेश्वर के अनुग्रह का कार्य है। कोई भी मनुष्य पवित्र आत्मा के बिना नहीं कह सकता कि यीशु ही मसीह है। यीशु कहता है, “कोई मेरे पास नहीं आ सकता, जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले।” इसलिये विश्वास, जो मसीह के पास आना है, ईश्वरीय खिंचाव का परिणाम है। अनुग्रह उद्धार का पहला और अन्तिम प्रेरक कारण है; और विश्वास, यद्यपि वह अनिवार्य है, उस यन्त्र-व्यवस्था का केवल एक महत्वपूर्ण पुर्ज़ा है जिसे अनुग्रह काम में लाता है। हम “विश्वास के द्वारा” उद्धार पाते हैं, परन्तु उद्धार “अनुग्रह ही से” है। इन शब्दों को मानो प्रधान स्वर्गदूत की तुरही से गुँजा दीजिए: “अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।” अयोग्यों के लिये यह कैसा आनन्द का समाचार है!
विश्वास एक नाली या जल ले जानेवाले नल का स्थान रखता है। अनुग्रह सोता और धारा है; विश्वास वह जलसेतु है जिसके सहारे दया की बाढ़ नीचे बहकर मनुष्यों की प्यासी सन्तानों को तरोताज़ा करती है। जब जलसेतु टूट जाता है तो यह बड़े खेद की बात होती है। रोम के चारों ओर उन अनेक भव्य जलसेतुओं को देखना एक दुःखद दृश्य है जो अब नगर में जल नहीं पहुँचाते, क्योंकि उनके मेहराब टूट गए हैं और वे अद्भुत रचनाएँ खंडहर हो गई हैं। धारा को पहुँचाने के लिये जलसेतु को पूरा और अखंड रखना आवश्यक है; और ठीक इसी प्रकार, विश्वास को सच्चा और खरा होना चाहिए—ऊपर सीधे परमेश्वर तक पहुँचता हुआ और नीचे सीधे हम तक आता हुआ—ताकि वह हमारे प्राणों के लिये दया की उपयोगी नाली बन सके।
तौभी मैं आपको फिर स्मरण दिलाता हूँ कि विश्वास केवल नाली या जलसेतु है, मूल सोता नहीं, और हमें उसकी ओर इतना अधिक नहीं देखना चाहिए कि उसे सारी आशीष के उस ईश्वरीय स्रोत से ऊपर उठा दें जो परमेश्वर के अनुग्रह में है। अपने विश्वास को कभी मसीह न बना लीजिए, न ही उसके विषय में ऐसा सोचिए मानो वह आपके उद्धार का स्वतंत्र स्रोत हो। हमारा जीवन “यीशु की ओर ताकने” में मिलता है, अपने ही विश्वास की ओर ताकने में नहीं। विश्वास के द्वारा हमारे लिये सब कुछ सम्भव हो जाता है; तौभी सामर्थ्य विश्वास में नहीं, बल्कि उस परमेश्वर में है जिस पर विश्वास भरोसा रखता है। अनुग्रह शक्तिशाली इंजन है, और विश्वास वह ज़ंजीर है जिसके द्वारा प्राण का डिब्बा उस महान चालक शक्ति से जोड़ा जाता है। विश्वास की धार्मिकता विश्वास की नैतिक उत्तमता नहीं, बल्कि यीशु मसीह की धार्मिकता है जिसे विश्वास थाम लेता और अपना बना लेता है। प्राण के भीतर की शान्ति अपने ही विश्वास पर मनन करने से प्राप्त नहीं होती; बल्कि वह हमें उसकी ओर से मिलती है जो हमारी शान्ति है, जिसके वस्त्र के आँचल को विश्वास छूता है, और उसमें से सामर्थ्य निकलकर प्राण में आती है।
तो प्रिय मित्र, देखिए कि आपके विश्वास की दुर्बलता आपको नाश नहीं करेगी। काँपता हुआ हाथ भी सोने का उपहार ग्रहण कर सकता है। चाहे हमारे पास केवल राई के दाने के बराबर विश्वास हो, तौभी प्रभु का उद्धार हम तक पहुँच सकता है। सामर्थ्य परमेश्वर के अनुग्रह में है, हमारे विश्वास में नहीं। बड़े-बड़े सन्देश पतले तारों के द्वारा भेजे जा सकते हैं, और पवित्र आत्मा की शान्ति देनेवाली गवाही धागे जैसे पतले विश्वास के द्वारा भी मन तक पहुँच सकती है, जो अपना ही बोझ सँभालने में लगभग असमर्थ दिखाई देता है। दृष्टि करने से अधिक उसके विषय में सोचिए जिसकी ओर आप दृष्टि करते हैं। आपको अपने दृष्टि करने से भी दृष्टि हटानी होगी, और यीशु के सिवा, और उसमें प्रगट हुए परमेश्वर के अनुग्रह के सिवा, और कुछ न देखना होगा।
