इस पुस्तक में खोजें
यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना। छः दिन तो तू परिश्रम करके अपना सब काम-काज करना; परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें न तो तू किसी भाँति का काम-काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो; क्योंकि छः दिन में यहोवा ने आकाश और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें है, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।
पिछले पच्चीस वर्षों में इस देश में विश्रामदिन के विषय में भयानक ढिलाई आ गई है, और बहुत से मनुष्य शिमशोन के समान आत्मिक सामर्थ्य से वंचित कर दिए गए हैं, क्योंकि वे इस प्रश्न पर सीधे नहीं हैं। क्या आप कह सकते हैं कि आप विश्रामदिन को ठीक रीति से मानते हैं? हो सकता है कि आप मसीही होने का अंगीकार करते हों: परन्तु क्या आप इस आज्ञा का पालन कर रहे हैं? या क्या आप विश्रामदिन को परमेश्वर के भवन की उपेक्षा करते हैं, और अपना समय दुराचार और अपराध के अड्डों में पीने और रंगरलियाँ मनाने में बिताते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का तिरस्कार करते हैं? क्या आप तराजू में चढ़ने के लिये तैयार हैं? पिछले विश्रामदिन आप कहाँ थे? आपने उसे कैसे बिताया?
मैं सच्चाई से विश्वास करता हूँ कि यह आज्ञा आज भी उतनी ही बाध्यकारी है जितनी पहले कभी थी। मैंने ऐसे लोगों से बातचीत की है जिन्होंने कहा कि यह रद्द कर दी गई है, परन्तु वे बाइबल में कभी कोई ऐसा स्थान नहीं दिखा सके जहाँ परमेश्वर ने इसे रद्द किया हो। जब मसीह पृथ्वी पर था, तब उसने इसे हटाने के लिये कुछ नहीं किया; उसने इसे उन बन्धनों से छुड़ाया जिनमें शास्त्रियों और फरीसियों ने इसे जकड़ रखा था, और इसे इसका सच्चा स्थान दिया।
“विश्रामदिन मनुष्य के लिये बनाया गया है, न कि मनुष्य विश्रामदिन के लिये।” (मरकुस 2:27) यह आज के मनुष्यों के लिये उतना ही व्यावहारिक और उतना ही आवश्यक है जितना पहले कभी था—वरन पहले से भी अधिक, क्योंकि हम ऐसे तीव्र और भाग-दौड़ भरे युग में जी रहे हैं।
विश्रामदिन अदन में भी बाध्यकारी था, और तब से बराबर लागू रहा है। चौथी आज्ञा “स्मरण रखना” शब्द से आरम्भ होती है, जिससे प्रकट होता है कि जब परमेश्वर ने सीनै पर्वत पर पत्थर की पटियाओं पर यह व्यवस्था लिखी, तब विश्रामदिन पहले से विद्यमान था। जब लोग यह मानते हैं कि अन्य नौ आज्ञाएँ अब भी बाध्यकारी हैं, तो वे यह दावा कैसे कर सकते हैं कि केवल यह एक आज्ञा उठा दी गई है?
मेरा विश्वास है कि आज विश्रामदिन का प्रश्न सारे देश के लिये एक जीवन-मरण का प्रश्न है। यह वर्तमान समय का सबसे ज्वलन्त प्रश्न है। यदि आप विश्रामदिन को छोड़ दें तो कलीसिया चली जाती है; यदि आप कलीसिया को छोड़ दें तो घर चला जाता है; और यदि घर चला जाए तो राष्ट्र चला जाता है। हम इसी दिशा में यात्रा कर रहे हैं।
परमेश्वर की कलीसिया अपनी सामर्थ्य खोती जा रही है, क्योंकि बहुत से लोग विश्रामदिन को छोड़ रहे हैं और उसे स्वार्थ को बढ़ाने में लगा रहे हैं।
विश्रामदिन को कैसे मानें
“सब्त” (विश्रामदिन) का अर्थ है “विश्राम,” और इस शब्द का अर्थ ही इस दिन को मानने की सच्ची रीति की ओर संकेत करता है। परमेश्वर ने सृष्टि के बाद विश्राम किया, और मनुष्य के लिये विश्राम के रूप में विश्रामदिन ठहराया। उसने उसे आशीष दी और उसे पवित्र ठहराया। विश्राम के दिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना। यह वह दिन है जब छः दिन के परिश्रम के बाद शरीर को ताज़गी और बल मिले, और प्राण अपने सृजनहार के साथ और अधिक निकट संगति में खिंच आए।
विश्रामदिन को सच्चाई से मानने पर दो मुख्य शीर्षकों के अन्तर्गत विचार किया जा सकता है: साधारण सांसारिक काम से रुक जाना, और धार्मिक कार्य।
1. सांसारिक काम से रुक जाना
मनुष्य को सात दिनों में से एक दिन अपने साधारण काम-धन्धे से अलग हो जाना चाहिए। बहुत से ऐसे हैं जिनका पेशा उन्हें रविवार मानने की अनुमति नहीं देता, परन्तु उन्हें किसी दूसरे दिन को विश्रामदिन के रूप में मानना चाहिए। शनिवार मेरा विश्राम का दिन है, क्योंकि मैं सामान्यतः रविवार को प्रचार करता हूँ, और मैं उसकी वैसी ही प्रतीक्षा करता हूँ जैसे कोई लड़का छुट्टी की करता है। परमेश्वर जानता है कि हमें किस बात की आवश्यकता है।
पादरी और मिशनरी प्रायः मुझसे कहते हैं कि वे कोई विश्राम का दिन नहीं लेते; उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वे प्रभु के काम में लगे हैं। यह भूल है। जब परमेश्वर मूसा को निवासस्थान (तम्बू) के बनाने के विषय में निर्देश दे रहा था, तब उसने विशेष रूप से विश्रामदिन का उल्लेख किया और उसे कड़ाई से मानने की आज्ञाएँ दीं; और बाद में, जब मूसा प्रभु के वचन इस्राएलियों तक पहुँचा रहा था, तब उसने उनका अर्थ यह कहकर समझाया कि विश्रामदिन को धातु गलाने या किसी और काम के लिये आग जलाने को लकड़ियाँ तक न बीनी जाएँ। निवासस्थान को खड़ा करने के लिये उनके सारे उत्साह और जल्दी के होते हुए भी, कारीगरों को अपना विश्राम का दिन मिलना था। यह आज्ञा आज मसीही काम में लगे पादरियों और दूसरे लोगों पर उतनी ही लागू होती है जितनी प्राचीनकाल के उन इस्राएली कारीगरों पर होती थी।
आवश्यकता के और संकट के काम
यह परखने में कि कोई काम विश्रामदिन को उचित रीति से किया जा सकता है या नहीं, उसे करने का कारण और उद्देश्य पता कीजिए। आवश्यकता के कामों और संकट के कामों के लिये छूट दी जानी चाहिए। “आवश्यकता के कामों” से मेरा अभिप्राय उन कामों से है जिन्हें मसीह ने तब उचित ठहराया जब उसने अपने बैल या गदहे को पानी पिलाने ले जाने को ठीक माना। पहरेदार, पुलिस, भाप-जहाज़ों पर भट्ठी झोंकनेवाले, और बहुत से दूसरे लोगों के ऐसे काम हैं जिनके कारण उन्हें विश्रामदिन को काम करना ही पड़ता है। “संकट के कामों” से मेरा अभिप्राय उन कामों से है जिनकी ओर मसीह ने संकेत किया जब उसने विश्रामदिन को गड्ढे में से बैल या गदहे को खींच निकालने को ठीक माना। आग लगने या बीमारी के समय मनुष्य को प्रायः ऐसे काम करने पड़ते हैं जो अन्यथा उचित न ठहरते।
एक बार एक मसीही मनुष्य से उसका मालिक रविवार को काम करने का आग्रह कर रहा था। “क्या तेरी बाइबल नहीं कहती कि यदि विश्रामदिन को तेरा गदहा गड्ढे में गिर जाए, तो तू उसे खींचकर निकाल सकता है?” “हाँ,” उसने उत्तर दिया; “परन्तु यदि उस गदहे की आदत हर विश्रामदिन उसी गड्ढे में गिरने की हो, तो मैं या तो गड्ढे को भर दूँगा या गदहे को बेच दूँगा।”
अनावश्यक काम के विषय में यह प्रश्न हर मनुष्य को अपने विवेक के साथ निपटाना होगा।
किसी भी मनुष्य को दूसरे से सप्ताह में सातों दिन काम नहीं करवाना चाहिए। एक दिन विश्राम के लिये आवश्यक है। जिस मनुष्य को सातों दिन काम करना पड़ता है, उसके पास आगे देखने को कुछ नहीं रहता, और जीवन नीरस हो जाता है। बहुत से मसीही इस विषय में दोषी हैं।
विश्रामदिन को यात्रा करना
उदाहरण के लिये, विश्रामदिन को यात्रा करने का प्रश्न लीजिए। मेरा विश्वास है कि रविवार को ट्राम-गाड़ियों का उपयोग करके और कंडक्टरों तथा दूसरों को उनके विश्रामदिन से वंचित करके हम परमेश्वर की व्यवस्था तोड़ रहे हैं। स्मरण रखिए, चौथी आज्ञा स्पष्ट रूप से “परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो” का उल्लेख करती है। क्या यह बात विश्रामदिन की यात्रा पर लागू नहीं होती?
परन्तु आप पूछते हैं, “तो हम क्या करें? हम कलीसिया तक कैसे पहुँचें?”
मैं उत्तर देता हूँ, पैदल। यह आपके लिये अच्छा ही होगा। एक बार जब मैं लंदन में सभाएँ कर रहा था, तो अपनी अनजानकारी में मैंने एक विश्रामदिन को अलग-अलग स्थानों पर चार बार प्रचार करने का प्रबन्ध कर लिया। वे कार्यक्रम तय कर लेने के बाद मुझे पता चला कि मुझे सोलह मील पैदल चलना पड़ेगा; परन्तु मैं पैदल चला, और उस रात मैं शुद्ध विवेक के साथ सोया। मैंने यह नियम बना लिया है कि मैं कभी ट्राम-गाड़ियों का उपयोग नहीं करूँगा, और यदि मेरे पास निजी घोड़ागाड़ी हो, तो मैं आग्रह करता हूँ कि घोड़ा और गाड़ीवान सोमवार को विश्राम करें। मैं नहीं चाहता कि कोई किराये की गाड़ी चलानेवाला न्याय के समय मेरे विरुद्ध खड़ा हो।
मेरे मित्रो, यदि हम विश्रामदिन की सहायता करना चाहते हैं, तो व्यापारी और मसीही लोग विश्रामदिन को कभी ट्राम-गाड़ियों को सहारा न दें। मुझे उन कम्पनियों के हिस्से रखना बहुत बुरा लगेगा, कि मैं इन लोगों से विश्रामदिन छीन लेने का साधन बनूँ, और न्याय के दिन मुझे इसका लेखा देना पड़े। कम से कम जो मसीही हैं, वे इस बात में ऐसा विवेक रखने का यत्न करें जो निर्दोष हो।
विश्रामदिन को व्यापार करना
बहुत से लोग ऐसे हैं जो अधिक जल्दी धन कमाने के लिये विश्रामदिन का उपयोग करने की ओर झुके रहते हैं। यह कोई नया पाप नहीं है। आमोस भविष्यद्वक्ता ने उन अन्धेर करनेवालों के विरुद्ध कड़े वचन कहे जो कहते थे, “नया चाँद कब बीतेगा कि हम अन्न बेच सकें? और विश्रामदिन कब बीतेगा, कि हम अन्न के खत्ते खोलें?” (आमोस 8:5)
लोभी मनुष्य इस रोक-टोक से सदा चिढ़ते रहे हैं, परन्तु वर्तमान समय से पहले हम यह नहीं पाते कि उन्होंने धन कमाने के लिये खुलेआम विश्रामदिन के व्यापार पर भरोसा रखा हो। हमें बताया जाता है कि यदि विश्रामदिन की सवारियाँ न हों तो बहुत सी ट्राम कम्पनियों को लाभ ही न हो, और समाचार-पत्रों का विश्रामदिन वाला संस्करण भी सबसे अधिक लाभदायक माना जाता है।
इस देश के रेलवे कर्मचारी मस्तिष्क के क्षीण हो जाने से टूट रहे हैं, और पचास या साठ वर्ष की आयु में मर जाते हैं। वे सोचते हैं कि उनका व्यापार इतना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें सप्ताह में सातों दिन अपनी गाड़ियाँ चलानी ही चाहिए। व्यापारी लोग विश्रामदिन को यात्रा करते हैं ताकि सोमवार की सुबह व्यापार के लिये उपस्थित रहें। परन्तु यदि वे ऐसा करते हैं तो परमेश्वर उन्हें सफल नहीं करेगा।
काम मनुष्य के लिये अच्छा है और उसकी आज्ञा दी गई है, “छः दिन तो तू परिश्रम करना”; परन्तु अत्यधिक काम और विश्रामदिन को काम उससे वह सबसे अच्छी वस्तु छीन लेता है जो उसके पास है।
आवश्यक और लाभदायक
काम से रुकने के साथ विश्रामदिन के लौट-लौटकर आने से किसी राष्ट्र के स्वास्थ्य और सुख पर जो अच्छा प्रभाव पड़ता है, उसका मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आँका जा सकता। छः दिन के काम के बाद शरीर की मरम्मत करने और उसे फिर से स्वस्थ करने के लिये इसकी आवश्यकता है। यह सिद्ध हो चुका है कि मनुष्य सात दिनों की अपेक्षा छः दिनों में अधिक काम कर सकता है। लॉर्ड बीकन्सफ़ील्ड ने कहा था: “सब ईश्वरीय विधानों में सबसे अधिक ईश्वरीय वह है जो मनुष्य के लिये विश्राम का एक दिन सुनिश्चित करता है। मैं इसे मनुष्य को दी गई सबसे बहुमूल्य आशीष मानता हूँ। यह सारी सभ्यता के कोने का पत्थर है, और इसे हटा देने से लोगों का स्वास्थ्य तक प्रभावित हो सकता है।”
श्री ग्लैडस्टन ने हाल ही में एक मित्र को बताया कि उनकी लम्बी आयु का रहस्य यह है कि सार्वजनिक चिन्ताओं के सारे दबाव के बीच भी वे विश्रामदिन को, और उसमें शरीर और प्राण को मिलनेवाले विश्राम को, कभी नहीं भूले। संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान राष्ट्रपति के साप्ताहिक विश्राम के दिन की रक्षा करता है। हस्ताक्षर के लिये उसके पास भेजे गए किसी विधेयक पर विचार करने के लिये उसे दस दिन मिलते हैं, “रविवार को छोड़कर।” गणराज्य के हर श्रमिक को उतनी ही पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए जितनी राष्ट्रपति को। यदि श्रमिक विश्रामदिन को अनावश्यक काम के विरुद्ध हड़ताल करें, तो उन्हें बहुत से लोगों की सहानुभूति मिलेगी।
टालमेज कहते हैं, “हमारे शरीर सात-दिन वाली घड़ियाँ हैं, और उन्हें चाबी देने की आवश्यकता है, और यदि उन्हें चाबी न दी जाए तो वे चलते-चलते रुककर कब्र में जा पहुँचती हैं। कोई भी मनुष्य लगातार विश्रामदिन को तोड़ते हुए अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बनाए नहीं रख सकता। बूढ़े लोगों से पूछिए, और वे आपको बताएँगे कि उन्होंने ऐसे किसी मनुष्य को नहीं जाना जो लगातार विश्रामदिन तोड़ता रहा हो और मन, शरीर या नैतिक सिद्धान्तों में विफल न हुआ हो।”
मनुष्य के विश्राम के विषय में जो कुछ कहा गया है, वह सब काम करनेवाले पशुओं पर भी लागू होता है। परमेश्वर इस आज्ञा में उन्हें नहीं भूला, और मनुष्य को भी उन्हें नहीं भूलना चाहिए।
2. धार्मिक कार्य
परन्तु “विश्राम” का अर्थ आलस्य नहीं है। कोई भी मनुष्य बहुत समय तक आलस्य का आनन्द नहीं लेता। जब कोई छुट्टियों पर जाता है, तो वह पूरे समय कुछ किए बिना इधर-उधर पड़ा नहीं रहता। टेनिस, शिकार और दूसरे कामों में कड़ी मेहनत से घंटे भरते हैं। स्वस्थ मन को कुछ न कुछ करने को ढूँढ़ना ही पड़ता है।
इसलिये विश्रामदिन के विश्राम का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। “शैतान निठल्ले हाथों के लिये कोई न कोई शरारत ढूँढ़ ही लेता है।” बुरे विचारों को दूर रखने और परीक्षा से बचने का सबसे अच्छा उपाय सक्रिय धार्मिक कार्यों में लगे रहना है।
इनके विषय में हमें अतियों से बचना चाहिए। एक ओर हम विश्रामदिन मानने में ऐसी कठोरता पाते हैं जिसकी आज्ञा पवित्रशास्त्र में कहीं नहीं दी गई, और जो सुसमाचार की आत्मा की अपेक्षा फरीसियों की औपचारिकता की अधिक याद दिलाती है। ऐसी कठोरता लाभ से अधिक हानि करती है। वह लोगों को दूर भगाती है और विश्रामदिन को एक बोझ बना देती है। दूसरी ओर, हमें विश्रामदिन को ढिलाई से मानने की रीति से बड़ी सावधानी से बचना चाहिए। बहुत से नगरों में अभी से उसे खुलेआम अपवित्र किया जा रहा है।
जब मैं लड़का था, तब विश्रामदिन शनिवार के सूर्यास्त से रविवार के सूर्यास्त तक रहता था, और मुझे याद है कि जब वह समाप्त होता था तो हम लड़के कैसे चिल्ला उठते थे। वह हमारे लिये सप्ताह का सबसे बुरा दिन था। मेरा विश्वास है कि उसे सप्ताह का सबसे उज्ज्वल दिन बनाया जा सकता है। हर बच्चे का पालन-पोषण ऐसा होना चाहिए कि वह कह सके कि उसके बचपन का विश्रामदिन उसकी स्मृति से मिट जाए, इसकी अपेक्षा वह यह अधिक पसन्द करेगा कि बाकी छः दिन उसकी स्मृति से मिट जाएँ।
सार्वजनिक आराधना
विश्रामदिन को धार्मिक कार्य का दिन बनाइए। निःसन्देह, सबसे पहले सार्वजनिक आराधना में उपस्थित होना है। जॉन मैकनील कहते हैं, “विश्रामदिन के विषय में हमारे विश्वास-सूत्र और हमारे वास्तविक आचरण के बीच एक विसंगति है। बहुत से परिवारों में विश्रामदिन को दस बजे भी कलीसिया जाना एक खुला प्रश्न ही बना रहता है। सोमवार की सुबह कोई खुला प्रश्न नहीं होता—‘जॉन, क्या तुम आज काम पर जाओगे?’” एक पादरी ने एक किसान को कलीसिया में न आने के लिये डाँटा, और कहा, “जॉन, तुम जानते हो कि तुम बाज़ार से तो कभी अनुपस्थित नहीं रहते।”
“ओह,” उत्तर मिला, “बाज़ार तो हमें जाना ही पड़ता है।”
किसी ने कहा है कि विश्रामदिन के बिना मसीह की कलीसिया एक दृश्य संगठन के रूप में पृथ्वी पर बनी नहीं रह सकती। किसी दूसरे ने कहा है कि “हमें विश्वास की स्वतन्त्रता के साथ-साथ पालन के अभ्यास में भी रहने की आवश्यकता है।” मनुष्य का स्वभाव इतना धोखेबाज़ है कि जब तक किसी काम को करने का कोई विशेष कारण न हो, हम उसे पूरी तरह छोड़ देने की ओर झुके रहते हैं। जब तक मनुष्य के पास आराधना के लिये नियमित रूप से ठहराए हुए समय और साधन न हों, तब तक सम्भव नहीं कि वह आराधना करे ही। पारिवारिक और निजी भक्ति लगभग निश्चय ही पूरी तरह छूट जाती है, जब तक कि किसी को उसकी आदत न पड़ जाए और प्रतिदिन उसके लिये एक विशेष समय अलग न किया गया हो।
एक संस्मरण
मुझे याद है कि विश्रामदिन को मुझे कलीसिया भेजने के लिये मैं अपनी माँ को दोष दिया करता था। एक अवसर पर प्रचारक को मुझे जगाने के लिये किसी को गैलरी में भेजना पड़ा। मैं सोचता था कि सारे सप्ताह खेत में काम करना और फिर कलीसिया जाने को विवश होकर ऐसा उपदेश सुनना जिसे मैं समझता ही न था, कितना कठिन है। मैंने सोचा था कि जब मैं घर से दूर चला जाऊँगा तो फिर कभी कलीसिया नहीं जाऊँगा; परन्तु मुझे जाने की ऐसी आदत पड़ गई थी कि मैं दूर न रह सका। एक-दो विश्रामदिनों के बाद मैं फिर परमेश्वर के भवन में लौट गया। वहीं मैंने पहली बार मसीह को पाया, और तब से मैंने अक्सर कहा है, “माँ, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि जब मैं जाना नहीं चाहता था तब भी आपने मुझे परमेश्वर के भवन में जाने को विवश किया।”
माता-पिताओ, यदि आप चाहते हैं कि आपके बच्चे बड़े होकर आपका आदर करें, तो उनसे विश्रामदिन का आदर करवाइए। उन्हें मछली पकड़ने जाने और बुरी संगति में पड़ने न दीजिए, नहीं तो बहुत समय न बीतेगा कि वे घर आकर आपको कोसेंगे। मैं बहुत कम ऐसी बातें जानता हूँ जो इससे अधिक सुन्दर हों कि पिता और माता अपने बेटे-बेटियों के साथ गलियारे में से आते हुए दिखाई दें, और परमेश्वर का वचन सुनने के लिये एक साथ बैठें। अच्छा है कि बच्चों को किसी दूर की अटारी या गैलरी में नहीं, बल्कि किसी अच्छे स्थान पर, भली भाँति सामने बिठाया जाए। यद्यपि वे अभी उपदेश को समझ नहीं सकते, फिर भी जब वे बड़े होंगे तब वे अलग हो जाना नहीं चाहेंगे; वे परमेश्वर के भवन में सार्वजनिक आराधना में आते रहेंगे।
परन्तु हमें साधन को लक्ष्य नहीं समझ लेना चाहिए। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि विश्रामदिन केवल इसलिये है कि हम सभाओं में उपस्थित हो सकें। कुछ लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं कि उन्हें पूरा दिन सभाओं में या निजी भक्ति में बिताना ही चाहिए। परिणाम यह होता है कि रात होते-होते वे बिल्कुल थक जाते हैं, और उस दिन से उन्हें कोई विश्राम नहीं मिला होता। कोई व्यक्ति कितनी आराधना-सभाओं में उपस्थित हो, इसे उसकी इस क्षमता से नापना चाहिए कि वह थके बिना उनका आनन्द ले सके और उनसे लाभ उठा सके। सभाओं में उपस्थित होना विश्रामदिन मानने का एकमात्र तरीका नहीं है। इस्राएलियों को आज्ञा दी गई थी कि वे इसे पवित्र सभा में ही नहीं, अपने घरों में भी मानें। घर, जो लोगों के जीवन और चरित्र पर इतने बड़े प्रभाव का केन्द्र है, सच्चे रूप से विश्रामदिन मानने का स्थान बनाया जाना चाहिए।
घर में विश्रामदिन मानना
यिर्मयाह ने भक्तिहीन कुलों को अन्यजातियों के साथ गिना: “जो जाति तुझे नहीं जानती, और जो कुल तुझ से प्रार्थना नहीं करते, उन्हीं पर अपनी जलजलाहट उण्डेल; क्योंकि उन्होंने याकूब को निगल लिया, वरन् उसे खाकर अन्त कर दिया है, और उसके निवासस्थान को उजाड़ दिया है।” (10:25)
बहुत सी माताओं ने समय-समय पर मुझे पत्र लिखकर पूछा है कि विश्रामदिन को अपने बच्चों का मन बहलाने के लिये वे क्या करें। लड़के कहते हैं, “काश, रात हो जाती,” या, “मुझे विश्रामदिन से घृणा है,” या, “काश, विश्रामदिन बीत जाता।” यह तो उनके लिये सप्ताह का सबसे आनन्दमय दिन होना चाहिए, एक ऐसा दिन जिसकी वे प्रसन्नता से बाट जोहें। इस उद्देश्य के लिये बहुत से सुझावों का पालन किया जा सकता है। बच्चों से बाइबल का कोई पद या कहानी सीखवाकर पारिवारिक प्रार्थना को विशेष रूप से आकर्षक बनाइए। अपने बच्चों को सप्ताह के दूसरे दिनों की अपेक्षा अधिक समय दीजिए, उन्हें पढ़कर सुनाइए, और सम्भव हो तो दोपहर बाद या शाम को उन्हें टहलाने ले जाइए। अपने आचरण से दिखाइए कि विश्रामदिन आनन्द का दिन है, और वे शीघ्र ही आपकी भावना ग्रहण कर लेंगे। धार्मिक शिक्षा के लिये कुछ समय अलग रखिए, परन्तु इसे बोझ न बनाइए। आप बाइबल की कहानियाँ सुनाकर और बच्चों से पात्रों के नाम बूझने को कहकर इसे उनके लिये रोचक बना सकते हैं। छोटे बच्चों के लिये रविवार के खेल रखिए। चित्रों वाली पुस्तकें, पलिश्तीन (फ़िलिस्तीन) के पहेली-नक्शे, और ऐसी वस्तुएँ सहज ही मिल सकती हैं। रविवार के एल्बम और रविवार की घड़ियाँ भी ऐसे ही उपाय हैं। विश्रामदिन के लिये आकर्षक पुस्तकें अलग रखिए, और सप्ताह भर बच्चों को वे न दीजिए। ऐसा करने से बच्चे उस दिन की उत्सुकता और प्रसन्नता से बाट जोहना सीख सकते हैं।
निजी रूप से विश्रामदिन मानना
सार्वजनिक और पारिवारिक रूप से मानने के अतिरिक्त, हर व्यक्ति को समय का एक भाग अपनी उन्नति में लगाना चाहिए। प्रार्थना, मनन और पढ़ना भूलना नहीं चाहिए। सोचिए, मनुष्य सप्ताह के छः दिन अपने शरीर को देते हैं, जो शीघ्र ही नाश हो जाएगा, और प्राण को, जो युगानुयुग जीवित रहेगा, एक दिन देने में भी कुढ़ते हैं! जब दूसरी इन्द्रियाँ बाकी छः दिन व्यस्त रखी जाती हैं, तो क्या परमेश्वर का यह माँगना बहुत अधिक है कि एक दिन आत्मिक इन्द्रियों की बढ़ती और प्रशिक्षण में लगाया जाए?
यदि आपकी परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो कोई निश्चित मसीही काम कीजिए, जैसे सण्डे स्कूल में पढ़ाना, या बीमारों से भेंट करना। जितनी भलाई कर सकें, कीजिए। पाप कोई विश्रामदिन नहीं मानता, तो भले काम भी विश्राम न लें। इस पतित संसार में दया और धर्म के काम करने के बहुत अवसर हैं। यहाँ नीचे अपने विश्रामदिन को उस अनन्त विश्राम का पूर्वस्वाद बनाइए जो विश्वासियों के लिये रखा हुआ है।
आप अपने मसीही जीवन में सामर्थ्य चाहते हैं, है न? आप पवित्र आत्मा की सामर्थ्य चाहते हैं?
आप चाहते हैं कि स्वर्ग की ओस आपके माथे पर हो? आप चाहते हैं कि लोग पाप के लिये कायल होकर मन फिराएँ? मैं नहीं मानता कि जब तक हम परमेश्वर की इस व्यवस्था के विषय में सीधे नहीं हो जाते, तब तक हमें कभी सच्चे मन-परिवर्तन देखने को मिलेंगे।
विश्रामदिन को अपवित्र करना
लोग मानो यह सोचते हैं कि उन्हें पवित्र दिन को छुट्टी के दिन में बदल देने का अधिकार है। चालीस वर्ष पहले हमारे सामने जितनी परीक्षाएँ थीं, उनसे अधिक परीक्षाएँ आज युवाओं के सामने विश्रामदिन तोड़ने की हैं। तीन बड़ी परीक्षाएँ हैं: पहली, बिजली की ट्राम, जो आपको पाँच सेंट में मनोरंजन का दिन बिताने के लिये देहात में ले जाएगी; दूसरी, साइकिल, जो बहुत से मसीही पुरुषों को अपना विश्रामदिन छोड़कर वह दिन सैर-सपाटे में बिताने की ओर ले जा रही है; और तीसरी, रविवार का समाचार-पत्र।
बीस वर्ष पहले यदि किसी ने भविष्यद्वाणी की होती कि सब नाट्यशालाएँ हर विश्रामदिन खुली रहेंगी, तो शिकागो के मसीही लोग भयभीत हो जाते; परन्तु ठीक यही हुआ है। यदि बीस वर्ष पहले यह भविष्यद्वाणी की गई होती कि मसीही पुरुष रविवार की सुबह साइकिल लेकर निकल जाएँगे और सारा दिन सैर-सपाटे पर बाहर रहेंगे, तो मसीही लोग भयभीत हो जाते और कहते कि यह असम्भव है; परन्तु आज सारे देश में यही हो रहा है।
रविवार का समाचार-पत्र
रविवार के समाचार-पत्र के विषय में, मैं वे सब तर्क जानता हूँ जो उसके पक्ष में दिए जाते हैं—कि उसका काम सप्ताह के दिनों में किया जाता है, कि रविवार को काम तो सोमवार के समाचार-पत्र के कारण होता है, इत्यादि। परन्तु दो लाख अख़बार बेचनेवाले लड़के रविवार को अख़बार बेचते हैं। क्या आप चाहेंगे कि आपका लड़का उनमें से एक हो? अख़बार बाँटने के लिये लोगों से गाड़ियाँ चलवाई जाती हैं। क्या आप चाहेंगे कि आपका विश्रामदिन आपसे छीन लिया जाए? यदि नहीं, तो सुनहरे नियम का पालन कीजिए, और उन अख़बारों को छुइए भी नहीं।
उनकी विषय-सामग्री उन्हें किसी भी दिन पढ़ने के अयोग्य बना देती है, रविवार की तो बात ही क्या। न्यूयॉर्क के कुछ दैनिक पत्र साठ पृष्ठों के रविवार संस्करणों का विज्ञापन करते हैं। इस देश और दूसरे देशों के बहुत से गन्दे कांड खोद-खोदकर उनमें भरे जाते हैं। “आठ पृष्ठ मनोरंजन के!”—रविवार के लिये यह बढ़िया पठन-सामग्री है, है न? जब कोई तथाकथित उपदेश छापा भी जाता है, तो वह कहानियों और समाचारों के नीचे पूरी तरह दब जाता है। अब समय आ गया है कि पादरी अपने मंचों पर जाकर रविवार के समाचार-पत्रों के विरुद्ध प्रचार करें, यदि उन्होंने अब तक ऐसा नहीं किया है।
जो मनुष्य रविवार के अख़बार ख़रीदता और पढ़ता है, उसे तराजू में रखिए। दो-तीन घंटे उन्हें पढ़ने के बाद वह जाकर संसार का सबसे अच्छा उपदेश भी सुने, तो भी आप उसके भीतर कुछ भी नहीं उतार सकते। उसका मन उसी से भरा है जो उसने पढ़ा है, और परमेश्वर के विचारों के लिये कोई स्थान नहीं रहता। मेरा विश्वास है कि स्वयं प्रधान स्वर्गदूत जिब्राईल भी ऐसे श्रोताओं पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता जिनके सिर ऐसे कूड़े-कचरे से भरे हों। यदि आप किसी मनुष्य के सिर में छेद भी कर दें, तो भी आप उसमें परमेश्वर और स्वर्ग का कोई विचार नहीं डाल सकते।
मैं नहीं मानता कि प्रकाशक अपने ही बच्चों को उन्हें पढ़ने देंगे। तो फिर वे उन्हें मेरे बच्चों और आपके बच्चों को क्यों दें?
जो व्यापारी रविवार के अख़बारों में विज्ञापन देता है, वह विश्रामदिन नहीं मान रहा है। मसीही पुरुषों को सोमवार के लिये व्यापार बनाने हेतु ऐसा करने को उकसाना शैतान की एक चतुर चाल है। परन्तु यदि कोई मनुष्य धन तो कमा ले, पर उसके बेटे नाश हो जाएँ और उसका घर उजड़ जाए, तो उसने क्या पाया?
महिलाएँ रविवार के अख़बार ख़रीदती हैं और यह देखने के लिये कि वे क्या सस्ता ख़रीद सकती हैं, सोमवार के सस्ते सौदों के विज्ञापन पढ़ती हैं। ठीक यही बात उनके धर्म के साथ है। यदि उसमें कुछ ख़र्च न हो, तो वे उसे रखने को तैयार हैं। यदि मसीही पुरुष और स्त्रियाँ उन्हें ख़रीदने से इनकार कर दें, यदि मसीही व्यापारी उनमें विज्ञापन देने से इनकार कर दें, तो वे शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे, क्योंकि उन्हें अपना अधिकांश सहारा वहीं से मिलता है।
लोग मुझसे कहते हैं कि रविवार का अख़बार अब टिकने के लिये आ चुका है, और अच्छा हो कि मैं उसे छोड़ दूँ। कभी नहीं! मेरा विश्वास है कि यह एक बड़ी बुराई है, और जब तक मैं जीवित हूँ इससे लड़ता रहूँगा। मैं कभी रविवार का अख़बार नहीं पढ़ता, और उसे अपने घर में रखूँगा भी नहीं। वे अक्सर मुझे भेजे जाते हैं, परन्तु मैं उन्हें बिना पढ़े फाड़ देता हूँ। मैं उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखूँगा। जितने भी साधन मैं जानता हूँ, उनमें से किसी एक की अपेक्षा वे धर्म को अधिक हानि पहुँचाते हैं। उनका सारा प्रभाव विश्रामदिन को पवित्र मानने के विरुद्ध है। वे एक अनावश्यक बुराई हैं। क्या मनुष्य विश्रामदिन को अपवित्र किए बिना सप्ताह के दिनों में पर्याप्त समाचार नहीं पढ़ सकता? युद्ध के आने तक हमारे यहाँ रविवार के कोई अख़बार नहीं थे, और हम उनके बिना बहुत अच्छी तरह काम चला लेते थे। तब से वे आकार और संख्या में बढ़ते ही गए हैं, और मेरे विचार में तब से उनका स्तर गिरता ही गया है। यदि आप इस बात पर विश्वास करते हैं, तो उनसे लड़ने में आप भी सहायता कीजिए। उन्हें कुचल डालिए, और आरम्भ अपने आप से कीजिए।
दण्ड या आशीष?
किसी भी ऐसे राष्ट्र ने कभी उन्नति नहीं की जिसने विश्रामदिन को धूल में रौंदा हो। मुझे ऐसा कोई राष्ट्र दिखाइए जिसने ऐसा किया हो, और मैं आपको ऐसा राष्ट्र दिखाऊँगा जिसके भीतर विनाश और पतन के बीज पड़ चुके हैं। मेरा विश्वास है कि विश्रामदिन को अपवित्र करना किसी राष्ट्र को किसी भी दूसरी बात की अपेक्षा अधिक शीघ्र नीचे गिरा देगा। आदम अदन से विवाह और विश्रामदिन अपने साथ लाया, और इन दोनों में से किसी की भी उपेक्षा दुःख उठाए बिना नहीं की जा सकती। जब इस्राएली प्रतिज्ञा किए हुए देश में गए, तो परमेश्वर ने उनसे कहा कि हर सात वर्ष में अपनी भूमि को विश्राम दें, और वह उन्हें छः वर्षों में उतना ही देगा जितना सात में। चार सौ नब्बे वर्ष तक उन्होंने उस व्यवस्था की उपेक्षा की। परन्तु ध्यान दीजिए, नबूकदनेस्सर आया और उन्हें बाबुल ले गया, और उन्हें सत्तर वर्ष तक बन्धुआई में रखा, और भूमि ने अपने सत्तर विश्राम-वर्षों का विश्राम पाया। सात गुणा सत्तर चार सौ नब्बे होता है। इस प्रकार इस व्यवस्था को तोड़कर उन्होंने कुछ अधिक नहीं पाया। आप परमेश्वर को उसका दिन दे सकते हैं, नहीं तो वह उसे ले लेगा।
दूसरी ओर, चौथी आज्ञा का आदर करने से आशीष मिलती है: “यदि तू विश्रामदिन को अशुद्ध न करे अर्थात् मेरे उस पवित्र दिन में अपनी इच्छा पूरी करने का यत्न न करे, और विश्रामदिन को आनन्द का दिन और यहोवा का पवित्र किया हुआ दिन समझकर माने; यदि तू उसका सम्मान करके उस दिन अपने मार्ग पर न चले, अपनी इच्छा पूरी न करे, और अपनी ही बातें न बोले, तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा, और मैं तुझे देश के ऊँचे स्थानों पर चलने दूँगा; मैं तेरे मूलपुरुष याकूब के भाग की उपज में से तुझे खिलाऊँगा, क्योंकि यहोवा ही के मुख से यह वचन निकला है।” (यशायाह 58:13-14)
मैं नहीं जानता कि यदि हम अपना मसीही विश्रामदिन छोड़ दें तो इस गणराज्य का क्या होगा। यदि शैतान किसी एक बात पर विवेक को तोड़ सकता है, तो वह सब बातों पर उसे तोड़ सकता है। जब मैं 1867 में फ्रांस में था, तब मैं एक दिन को दूसरे दिन से अलग नहीं पहचान पाता था। रविवार को दुकानें खुली रहती थीं और इमारतें बनाई जाती थीं, ठीक दूसरे दिनों की तरह। देखिए, वह देश कितनी जल्दी नीचे गिर गया। सौ वर्ष पहले राष्ट्रों की प्रगति में फ्रांस और इंग्लैंड कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़े थे। आज वे कहाँ खड़े हैं? फ्रांस ने विश्रामदिन को मिटा डालने का बीड़ा उठाया, और लगभग अपने आप को ही मिटा डाला है, जबकि इंग्लैंड सारी पृथ्वी को घेरे हुए है।
दृढ़ता से खड़े होना
इस राष्ट्र को बचाने का हमारे पास अब भी संघर्ष भरा अवसर है, और हमें ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की आवश्यकता है जिनमें नैतिक साहस हो कि वे खड़े होकर कहें: “नहीं, मैं रविवार के अख़बार को नहीं छूऊँगा, और मेरे पास जितना भी प्रभाव है, वह सब मैं पूरी तरह उसके विरुद्ध लगाऊँगा। यदि लौटने के लिये मुझे रविवार को यात्रा करनी पड़े, तो मैं शनिवार की शाम को कहीं बाहर नहीं जाऊँगा। मैं विश्रामदिन को अनावश्यक काम नहीं करूँगा। जैसी परमेश्वर ने आज्ञा दी है, उसे पवित्र मानने के लिये मैं जो कुछ कर सकता हूँ, सब करूँगा।”
परन्तु कोई कहता है: “मि. मूडी, आप क्या करेंगे? मुझे सप्ताह में सातों दिन काम करना पड़ता है, नहीं तो भूखा मरूँ।”
तो भूखे मरिए! क्या उन्नीसवीं शताब्दी में एक शहीद का होना बड़ी शानदार बात न होगी? “शहीदों का लहू कलीसिया का बीज है।” कोई कहता है कि बीज बहुत कम होता जा रहा है; बहुत समय हो गया है जब से हमें कोई बीज मिला हो। परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति उसकी विश्वासयोग्यता के लिये ऐसे शहीद का स्मारक खड़ा करने में मैं कुछ भी दे दूँगा। उसके अन्तिम संस्कार में सम्मिलित होने के लिये मैं सारी पृथ्वी का चक्कर लगाकर जाऊँगा।
आज हमें ऐसे पुरुषों की आवश्यकता है जो जो उचित है उसे करने का मन में ठान लें और उस पर डटे रहें, चाहे आकाश उनके सिर पर टूट पड़े। यदि मसीही विश्रामदिन मनोरंजन को सौंप दिया जाए और छुट्टी का दिन बना दिया जाए, तो मसीही संघों और सण्डे स्कूलों का, कलीसियाओं और क्रिश्चियन एण्डेवर संस्थाओं का क्या होगा? यदि लोग परमेश्वर के साथ सामर्थ्य चाहते हैं, तो क्या रुकने का आदेश देने का समय नहीं आ गया? लोग आपको संकीर्ण और कट्टर कहें तो कहने दीजिए, परन्तु परमेश्वर की व्यवस्था पर डटे रहने का पुरुषार्थ दिखाइए, और आपको सामर्थ्य और आशीष मिलेगी। इस समय इस देश में हमें इसी प्रकार की मसीहियत की आवश्यकता है। भीड़ के साथ तो कोई भी चल सकता है, परन्तु हमें ऐसे लोग चाहिए जो धारा के विरुद्ध चलें।
हे विश्रामदिन तोड़नेवाले, क्या आप तराजू में चढ़ने के लिये तैयार हैं?
