इस पुस्तक में खोजें
यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी की प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है। तू उनको दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखनेवाला ईश्वर हूँ, और जो मुझ से बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ, और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करुणा किया करता हूँ।
पहली आज्ञा, जिस पर हमने अभी विचार किया है, आराधना के एकमात्र सच्चे पात्र की ओर संकेत करती है; यह आज्ञा हमें आराधना करने का सही ढंग बताती है। पहली आज्ञा हमें केवल परमेश्वर ही की आराधना करने की आज्ञा देती है; यह आज्ञा माँग करती है कि जब हम उसके निकट आएँ तो शुद्धता और आत्मिकता के साथ आएँ। पहली आज्ञा झूठे देवताओं की उपासना को दोषी ठहराती है; यह झूठे रूपों और ढंगों का निषेध करती है। इसका सम्बन्ध विशेष रूप से आराधना के बाहरी कामों से है; परन्तु वे तो केवल उसी की अभिव्यक्ति हैं जो मन में है।
शायद आप कहेंगे कि इस बाट के विषय में कोई कठिनाई नहीं है। हम दूसरे युगों या दूसरे देशों में जाकर ऐसे लोग पा सकते हैं जो मूर्तियाँ बनाते हैं और उन्हें दण्डवत करते हैं; परन्तु यहाँ तो ऐसा कोई नहीं है। आइए, देखें कि क्या यह सच है। आइए, हम तराजू पर चढ़ें और देखें कि इस आज्ञा के सामने तौले जाने पर क्या हम पलड़ा अपनी ओर झुका सकते हैं।
मेरा विश्वास है कि युद्ध यहीं लड़ा जाता है। शैतान हमें परमेश्वर की ठीक रीति से आराधना करने से, और हर बात में उसे पहला स्थान देने से रोकने का यत्न करता है। यदि मैं मनुष्य की बनाई हुई किसी प्रतिमा को अपने मन में घुसने दूँ और उसे सृष्टिकर्ता परमेश्वर का स्थान लेने दूँ, तो यह पाप है। मेरा विश्वास है कि शैतान इस बात के लिये राज़ी है कि हम किसी भी वस्तु की आराधना करें, चाहे वह कितनी ही पवित्र क्यों न हो—बाइबल, क्रूस पर लटकी मसीह की प्रतिमा, कलीसिया—बस हम स्वयं परमेश्वर की आराधना न करें।
आप बाइबल में एक भी ऐसा स्थान नहीं पा सकते जहाँ किसी मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर और उसके पुत्र यीशु मसीह को छोड़ किसी और के आगे झुककर उसकी आराधना करने दी गई हो। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में जब एक स्वर्गदूत यूहन्ना के पास उतरा, तो यूहन्ना उसके आगे गिरकर उसकी आराधना करने को था, परन्तु स्वर्गदूत ने उसे ऐसा करने न दिया। यदि स्वर्ग से आए स्वर्गदूत की भी आराधना नहीं की जानी चाहिए, तो जब आप लोगों को चित्रों के आगे, मूर्तियों के आगे झुकते देखते हैं, यहाँ तक कि जब वे क्रूस के आगे झुककर उसकी आराधना करते हैं, तो यह पाप है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो इन बातों में बह गए दिखाई देते हैं।
“तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।”
“तू किसी खुदी हुई मूर्ति को दण्डवत न करना।” परमेश्वर चाहता है कि हम केवल उसी की आराधना करें, और यदि हम यह विश्वास नहीं करते कि यीशु मसीह शरीर में प्रगट हुआ परमेश्वर है, तो हमें उसकी आराधना नहीं करनी चाहिए। मुझे मसीह के ईश्वरत्व के विषय में उतना भी सन्देह नहीं है जितना अपने अस्तित्व के विषय में।
आराधना में दो बातें सम्मिलित हैं: भीतरी विश्वास, और बाहरी काम। इससे पहले कि हम किसी काम के द्वारा उसे सार्वजनिक रूप से प्रगट करें, हम परमेश्वर और यीशु मसीह के विषय में गलत धारणा रखकर अपने मन में ही अपराध कर बैठते हैं। जैसा किसी ने कहा है, ढीले-ढाले आचरण का दोषी होना जितना गलत है, उतना ही ढीले-ढाले विचार रखना भी गलत है। पौलुस का यही अर्थ था जब उसने कहा: “हमें यह समझना उचित नहीं, कि ईश्वरत्व सोने या रूपे या पत्थर के समान है, जो मनुष्य की कारीगरी और कल्पना से गढ़े गए हों।” (प्रेरितों के काम 17:29, तिरछे अक्षर जोड़े गए हैं।) कुछ लोग मसीह के विषय में जो धारणाएँ रखते हैं वे बाइबल के अनुसार नहीं हैं, और वे इस दूसरी आज्ञा का सचमुच उल्लंघन हैं।
एक प्रश्न
तुरन्त यह प्रश्न उठता है—क्या इस आज्ञा का उद्देश्य सृजी हुई वस्तुओं के रेखाचित्रों और चित्रों के उपयोग को पूरी तरह वर्जित करना है? कुछ लोग तर्क देते हैं कि हाँ, ऐसा ही है। वे प्रमाण के रूप में यहूदियों और मुसलमानों की ओर संकेत करते हैं। यहूदी कभी भी कला की ओर अधिक झुके हुए नहीं रहे। मुसलमान आज तक अपने नमूनों में पशुओं आदि की आकृतियों का प्रयोग नहीं करते। परन्तु मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। मेरा विचार है कि परमेश्वर का अभिप्राय केवल मूर्तियों और दूसरी प्रतिकृतियों को वर्जित करना था, जब उनका प्रयोग धार्मिक श्रद्धा और पूजा के पात्रों के रूप में किया जाना हो। “तू अपने लिये... न बनाना... तू उनको दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना।” निर्गमन में हमें बताया गया है कि परमेश्वर ने आज्ञा दी कि मिलापवाले तम्बू की सोने की दीवट के पुष्पकोष “बादाम के फूल के सरीखे, एक एक गांठ और एक एक फूल सहित” बनाए जाएँ (निर्गमन 25:33); और एपोद के बागे के घेरे पर बारी-बारी से एक घण्टी और एक अनार लगाया जाना था। परमेश्वर कोई ऐसी बात करने की आज्ञा कैसे दे सकता था जिससे यह दूसरी आज्ञा टूटती?
मेरा विश्वास है कि यह आज्ञा आत्मिक आराधना की पुकार है। यह मसीह के उस कथन के अनुरूप है जो उसने उस सामरी स्त्री से कहा था: “परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करनेवाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।” (यूहन्ना 4:24)
मनुष्यों के लिये ठीक यही करना कठिन है। प्रेरितों को कब्रों में गए बहुत दिन भी न हुए थे कि लोग उनकी मूर्तियाँ खड़ी करने और उनके अवशेषों की पूजा करने लगे। लोगों में किसी ऐसी वस्तु की लालसा होती है जिसे छुआ जा सके, जिसे वे देख सकें। इसी कारण कर्मकाण्ड की माँग होती है। कुछ लोग जन्म से ही प्यूरिटन होते हैं; वे आराधना का सादा रूप चाहते हैं। दूसरे लोग सोचते हैं कि वे उन रीतियों और विधियों के बिना काम नहीं चला सकते जो इन्द्रियों को भाती हैं। और बहुत से लोग, जिनका मन परमेश्वर के सामने सच्चा नहीं है, इन्हीं रीतियों की शरण लेते हैं, और धर्म का बाहरी दिखावा करके अपने विवेक को शान्त कर लेते हैं।
दूसरी आज्ञा इसी लालसा और झुकाव पर रोक लगाने के लिये है।
जब हम परमेश्वर के प्रति सच्चे नहीं रहते तो वह दुःखी होता है। परमेश्वर प्रेम है, और जब हमारा स्नेह किसी और वस्तु की ओर चला जाता है तो उसे चोट पहुँचती है। इस आज्ञा के साथ जुड़ा हुआ दण्ड हमें सिखाता है कि मनुष्य जो कुछ बोता है वही उसे काटना पड़ता है, चाहे वह भला हो या बुरा; और इतना ही नहीं, उसके बच्चों को भी उसके साथ काटना पड़ता है। ध्यान दीजिए कि दण्ड तो तीसरी या चौथी पीढ़ी तक बच्चों पर डाला जाता है, जबकि दया हजारों पर, या (जैसा अधिक सही अर्थ है) हजारवीं पीढ़ी तक दिखाई जाती है।
मूर्तियों की मूर्खता
क्षण भर सोचिए, तो आप देखेंगे कि परमेश्वर का कोई भी चित्रण बनाने का यत्न करना कितना व्यर्थ है। मसीहियों ने त्रिएकता का चित्र बनाने का यत्न किया है, परन्तु अदृश्य का चित्रण आप कैसे कर सकते हैं? क्या आप अपने प्राण या आत्मा या इच्छा-शक्ति का चित्र बना सकते हैं? मूसा ने इस्राएल के मन में यह बात बिठा दी कि जब परमेश्वर ने आग के बीच में से उनसे बातें कीं, तब उन्होंने कोई रूप न देखा, केवल उसका शब्द ही सुना।
परमेश्वर का कोई [मनुष्य-निर्मित] चित्र या [मनुष्य-निर्मित] मूर्ति उसके विषय में हमारी धारणा को अवश्य ही नीचे गिरा देती है। वह हमें एक ही विचार से बाँध देती है, जबकि हमें अनुग्रह और ज्ञान में बढ़ते जाना चाहिए। वह परमेश्वर को सीमित बना देती है। वह उसे हमारे स्तर पर नीचे ले आती है। इसी से भारत और चीन की भयानक मूर्तियाँ उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि वे लोग इन मूर्तियों को अपनी ही धारणाओं के अनुसार गढ़ते हैं। यदि अमेरिकी लोग राष्ट्रपति से मिलती-जुलती वैसी ही घिनौनी आकृतियाँ बनाएँ जैसी अन्यजाति देशों में लोग अपने देवताओं की बनाते हैं, तो राष्ट्रपति को कैसा लगेगा? यशायाह ने मूर्ति बनानेवालों की मूर्खता पर बड़े तीखे व्यंग्य के साथ प्रहार किया: उस लोहार पर जो चिमटे और हथौड़ों से देवता गढ़ता था; और उस बढ़ई पर जो एक पेड़ लेता, उसके एक भाग को आग जलाकर तापने और अपना मांस भूनने के काम में लाता, और दूसरे भाग को अपनी डोरी, रन्दे और परकार से मनुष्य के आकार में बनाता, और उसे अपना देवता कहकर उसकी उपासना करता था।
“भरमाई हुई बुद्धि के कारण वह भटकाया गया है।” (यशायाह 44:20) मनुष्य अवश्य ही उस हर वस्तु से बड़ा है जिसे वह बना या गढ़ सकता है। तो फिर ऐसी वस्तुओं की आराधना करने की बात सोचना कैसी मूर्खता है! परमेश्वर को किसी ऐसी वस्तु के द्वारा प्रस्तुत करने का मानव-हृदय का झुकाव, जो इन्द्रियों को भाती हो, सारी मूर्तिपूजा की जड़ है। यह सीधे मूर्ति-पूजा की ओर ले जाता है। आरम्भ में शायद उस वस्तु की ही पूजा करने की कोई इच्छा न हो, परन्तु अन्त अनिवार्य रूप से उसी में होता है। जैसा डॉ. मैकलारेन कहते हैं: “इन्द्रियों को आत्मा का सहयोगी बनाना जोखिम का काम है। एक बार आरम्भ करने के बाद वे अपने ही पक्ष में लड़ने लगती हैं, और सब प्रतीकात्मक और कर्मकाण्डी आराधना का इतिहास दिखाता है कि इस प्रयोग का अन्त इन्द्रियों को आत्मिक बनाने की अपेक्षा धर्म को इन्द्रियपरक बना देने में कहीं अधिक सम्भव है।
“यदि मैं प्रतिदिन प्रार्थना में क्रूस पर लटकी मसीह की प्रतिमा के आगे झुकूँ, यदि मैं उसे ऐसे सम्बोधित करूँ मानो वह मसीह हो, यद्यपि मैं जानता हूँ कि वह मसीह नहीं है, तो मेरे मन में उसके प्रति ऐसी श्रद्धा और प्रेम उत्पन्न हो जाएगा जो ठीक मूर्तिपूजा का सार है।”
क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि संसार के पास मसीह का एक भी [मनुष्य-निर्मित] चित्र नहीं है जो उसके चेलों से होकर हम तक पहुँचा हो? कौन जानता है कि वह कैसा दिखता था? बाइबल हमें नहीं बताती कि वह देखने में कैसा था, केवल एक-दो अलग-अलग सामान्य कथनों को छोड़, जैसे जब वह कहती है, “उसका रूप यहाँ तक बिगड़ा हुआ था कि मनुष्य का सा न जान पड़ता था और उसकी सुन्दरता भी आदमियों की सी न रह गई थी।” (यशायाह 52:14)
हम उसके नैन-नक्श के विषय में, उसके बालों और आँखों के रंग के विषय में, और उन दूसरी बारीकियों के विषय में जिनसे उसका सच्चा चित्रण करने में सहायता मिलती, कुछ भी निश्चित रूप से नहीं जानते। कौन सा चित्रकार हमें बता सकता है? उसने अपने चेलों के लिये कोई स्मृति-चिह्न नहीं छोड़ा। उसके वस्त्र उन रोमी सैनिकों ने ले लिए जिन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया। उसके अनुयायियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपे जाने के लिये एक भी वस्तु शेष न रही। क्या ऐसा नहीं लगता कि मसीह ने इसीलिये कोई अवशेष नहीं छोड़ा कि कहीं उन्हें पवित्र मानकर उनकी पूजा न की जाने लगे?
इतिहास हमें आगे यह भी बताता है कि आरम्भिक मसीही मसीह के किसी भी प्रकार के चित्र और प्रतिमाएँ बनाने से कतराते थे। वे उसे वैसा ही जानते थे जैसा उन्होंने उसे उसके पुनरुत्थान के बाद देखा था, और उनके पास उसकी निरन्तर उपस्थिति की प्रतिज्ञाएँ थीं जिन्हें कोई चित्र और अधिक वास्तविक नहीं बना सकता था।
मैंने मसीह के बहुत थोड़े ऐसे चित्र देखे हैं जो मुझे कुछ-न-कुछ खटकते न हों। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि उसके चित्र रखना ही गलत है।
क्रूस पर लटकी मसीह की प्रतिमा के विषय में डॉ. डेल कहते हैं: “यह हमारी आराधना और हमारी प्रार्थना को अवास्तविक बना देती है। हम एक ऐसे मसीह की उपासना कर रहे होते हैं जिसका अस्तित्व ही नहीं है। वह अब क्रूस पर नहीं, परन्तु सिंहासन पर है। उसकी पीड़ाएँ सदा के लिये बीत चुकी हैं। वह मरे हुओं में से जी उठा है। वह परमेश्वर के दाहिने हाथ है। यदि हम मरते हुए मसीह से प्रार्थना करते हैं, तो हम स्वयं मसीह से नहीं, परन्तु उसकी केवल एक स्मृति से प्रार्थना कर रहे हैं। एक रुग्ण और अवास्तविक भक्ति को बढ़ावा देकर क्रूस पर लटकी प्रतिमा ने मसीही जगत के धार्मिक जीवन को जो हानि पहुँचाई है, वह सचमुच अनगिनत है। इसने हमें जीवित मसीह के स्थान पर मरता हुआ मसीह दिया है, निकट रहनेवाले मसीह के स्थान पर ऐसा मसीह दिया है जो कई शताब्दियों की दूरी पर हमसे अलग है।”
भीतर वास करनेवाला मसीह
कोई नहीं कह सकता कि आजकल हमें ऐसी वस्तुओं की कोई आवश्यकता है।
“देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ।” (प्रकाशितवाक्य 3:20)
यदि मसीह हमारे हृदयों में है, तो हमें उसे अपनी आँखों के सामने रखने की क्या आवश्यकता है?
“जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ।” (मत्ती 18:20)
यदि हम विश्वास से उस प्रतिज्ञा को थाम लें, तो बाहरी प्रतीकों और स्मरण-चिह्नों की क्या आवश्यकता है? यदि राजा स्वयं उपस्थित है, तो हमें उन प्रतिमाओं के आगे क्यों झुकना चाहिए जिन्हें उसका प्रतिनिधित्व करनेवाली माना जाता है? किसी ने कहा है कि उसके स्थान को किसी मूर्ति से भरना ऐसा है जैसे आकाश से सूर्य को मिटाकर उसके स्थान पर कोई दूसरी ज्योति रख देना: “आप उसे कर्मकाण्ड की दरारों में से नहीं देख सकते; न भूल करनेवाले मनुष्य की अन्धी आँखों से; न मनुष्य की कारीगरी और कल्पना से गढ़ी गई मूर्तियों के द्वारा; न कृत्रिम और विकृत धर्मविज्ञान की चतुराई से गढ़ी हुई कहानियों में। नहीं, उसे उसके अपने वचन में खोजिए, उस प्रकाशन में जो वह अपने विषय में उन सब को देता है जो उसके मार्गों पर चलते हैं। इस प्रकार आप सम्पूर्ण नये नियम के प्रकाशन के उस अन्तिम वचन की चेतावनी को मान सकेंगे: ‘हे बालको, अपने आप को मूरतों से बचाए रखो।’” (1 यूहन्ना 5:21) मेरा विश्वास है कि यदि बहुत से उत्सुक मसीहियों को इस आज्ञा के सामने तराजू में रखा जाए तो वे हलके पाए जाएँगे। “तकेल” वह दण्ड-वाक्य होगा जो उनके विरुद्ध लिखा जाएगा, क्योंकि परमेश्वर और मसीह की उनकी आराधना शुद्ध नहीं है। परमेश्वर हमारी आँखें उस खतरे के प्रति खोले जो सारे मसीही जगत में सार्वजनिक आराधना में अधिकाधिक घुसता चला आ रहा है! आइए, हम यूहन्ना रचित सुसमाचार के चौथे अध्याय में मसीह के वचनों को सदा स्मरण रखें, जो दिखाते हैं कि सच्ची आत्मिक आराधना विशेष समयों और विशेष स्थानों का विषय नहीं है, क्योंकि वह सब समयों और सब स्थानों की है: “मेरी बात की प्रतीति कर कि वह समय आता है कि तुम न तो इस पहाड़ पर पिता का भजन करोगे न यरूशलेम में... परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है, जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही भजन करनेवालों को ढूँढ़ता है। परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करनेवाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें” (यूहन्ना 4:21,23-24)।
