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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
दानिय्येल के पाँचवें अध्याय में हम राजा बेलशस्सर का इतिहास पढ़ते हैं। उसके विषय में हम जो कुछ जानते हैं, वह सब एक ही अध्याय हमें बताता है। उसके जीवन-वृत्तान्त की केवल एक छोटी-सी झलक ही हमारे पास है। वह अचानक रंगमंच पर प्रकट होता है और फिर लुप्त हो जाता है।
पूर्वी देश का भोज
हमें बताया गया है कि उसने अपने हज़ार प्रधानों के लिये बड़ा भोज किया और उनके सामने दाखमधु पिया। उन दिनों पूर्वी देशों में कोई भोज कभी-कभी छः महीने तक चलता रहता था। यह भोज कितने समय से चल रहा था, यह हमें नहीं बताया गया, परन्तु उसके बीच में ही उसने “आज्ञा दी, कि सोने-चाँदी के जो पात्र उसके पिता नबूकदनेस्सर ने यरूशलेम के मन्दिर में से निकाले थे, उन्हें ले आओ, कि राजा अपने प्रधानों, और रानियों और रखेलियों समेत उनमें से पीए। तब जो सोने के पात्र यरूशलेम में परमेश्वर के भवन के मन्दिर में से निकाले गए थे, वे लाए गए; और राजा अपने प्रधानों, और रानियों, और रखेलियों समेत उनमें से पीने लगा। वे दाखमधु पी पीकर सोने, चाँदी, पीतल, लोहे, काठ और पत्थर के देवताओं की स्तुति कर रहे थे।” (दानिय्येल 5:2-4)
जब यह अधर्म का काम हो रहा था, तब “उसी घड़ी मनुष्य के हाथ की सी कई उँगलियाँ निकलकर दीवट के सामने राजभवन की दीवार के चूने पर कुछ लिखने लगीं; और हाथ का जो भाग लिख रहा था वह राजा को दिखाई पड़ा।” (दानिय्येल 5:5)
हमें यह नहीं बताया गया कि यह दिन या रात के किस पहर में हुआ। शायद आधी रात थी। शायद लगभग सभी अतिथि कम या अधिक नशे में थे; परन्तु वे इतने मतवाले नहीं थे कि जब उन्होंने कुछ अलौकिक देखा—दीवार पर, ठीक सोने के दीवट के ऊपर, एक लिखावट—तो वे अचानक होश में न आ जाते।
हर चेहरा मुर्दे के समान पीला पड़ गया।
“उसे देखकर राजा का मुख उतर गया, और वह अपने सोच में घबरा गया, और उसकी कमर के जोड़ ढीले हो गए, और काँपते काँपते उसके घुटने एक दूसरे से टकराने लगे।” (दानिय्येल 5:6)
उसने उतावली से अपने सबसे बुद्धिमान पुरुषों को बुलवा भेजा कि वे आकर दीवार पर की उस लिखावट को पढ़ें। वे एक के बाद एक भीतर आए और उसे समझने का प्रयत्न किया; परन्तु वे उसका अर्थ न बता सके। राजा ने वचन दिया कि जो कोई उसे पढ़ सके, वह राज्य में तीसरा प्रधान बनाया जाएगा; उसे भेंटें मिलेंगी, और उसके गले में सोने की माला पहनाई जाएगी। परन्तु बुद्धिमानों का प्रयत्न व्यर्थ गया। राजा बहुत घबरा गया।
अन्त में, उस घबराहट के बीच, रानी भीतर आई, और उसने राजा से कहा कि यदि वह उस पुरुष को बुलवा भेजे जो नबूकदनेस्सर के स्वप्नों का अर्थ बताया करता था, तो वह इस लेख को पढ़कर उसका अर्थ बता सकेगा। इसलिये दानिय्येल को बुलवाया गया। वह उस लिखावट से भली-भाँति परिचित था। वह अपने पिता की लिखावट पहचानता था।
“जो लिखा गया वह यह है, मने, मने, तकेल, और ऊपर्सीन। इस वाक्य का अर्थ यह है, मने, अर्थात् परमेश्वर ने तेरे राज्य के दिन गिनकर उसका अन्त कर दिया है। तकेल, तू मानो तराजू में तौला गया और हलका पाया गया है। परेस, अर्थात् तेरा राज्य बाँटकर मादियों और फारसियों को दिया गया है।” (दानिय्येल 5:25-28)
यदि एक घड़ी पहले कोई राजा से कहता कि वह समय आ पहुँचा है जब उसे तराजू पर चढ़कर तौला जाना होगा, तो वह इस विचार पर हँस पड़ता। परन्तु वह निर्णायक घड़ी आ चुकी थी।
तौलना शीघ्र ही पूरा हो गया। निर्णय सुनाया गया, और दण्ड की आज्ञा पूरी की गई।
“उसी रात कसदियों का राजा बेलशस्सर मार डाला गया। और मादी दारा ने राज्य ले लिया।” (दानिय्येल 5:30-31)
दारा और उसकी सेना उन सड़कों पर कूच करती हुई आ पहुँची। हथियारों की झनझनाहट हुई। युद्ध और विजय के नारों से आकाश गूँज उठा। उस रात राजा का लहू भोज-भवन के दाखमधु में मिल गया। न्याय उस पर अनपेक्षित रूप से, अचानक आ पड़ा: और सम्भवतः सौ में से निन्यानवे न्याय इसी प्रकार आते हैं। मृत्यु हम पर अनपेक्षित रूप से आती है; वह हम पर अचानक आ पड़ती है।
शायद आप कहें: “मुझे आशा है कि मि. मूडी मेरी तुलना उस अन्यजाति राजा से नहीं करने जा रहे।”
मैं आप से कहता हूँ कि जो मनुष्य सुसमाचार के इन दिनों में बुराई करता है, वह उस राजा से कहीं अधिक बुरा है। हम बाइबलों के देश में रहते हैं। आप पाँच सेंट के एक सिक्के में नया नियम ले सकते हैं, और यदि आपके पास वह सिक्का भी नहीं है, तो आप उसे मुफ़्त में पा सकते हैं। बहुत सी संस्थाएँ उसे आपको मुफ़्त देने में प्रसन्न होंगी। हम कलवरी के पूरे प्रकाश में रहते हैं। हम क्रूस के इस पार रहते हैं, परन्तु बेलशस्सर उसके उस पार पाँच सौ से भी अधिक वर्ष पहले रहता था। उसने यीशु मसीह के विषय में कभी नहीं सुना। उसने परमेश्वर के पुत्र के विषय में कभी नहीं सुना। उसने परमेश्वर के विषय में कभी नहीं सुना, सिवाय शायद अपने पिता के उस अद्भुत दर्शन के सम्बन्ध में। सम्भवतः उसके पास बाइबल का कोई भाग नहीं था, और यदि था भी, तो सम्भवतः वह उस पर विश्वास नहीं करता था। उसके पास कोई भक्त प्रचारक नहीं था जो उसे परमेश्वर के मेम्ने की ओर संकेत करता।
मुझ से यह न कहिए कि आप उस राजा से अच्छे हैं। मेरा विश्वास है कि वह न्याय के दिन उठ खड़ा होगा और हम में से बहुतों को दोषी ठहराएगा।
यह सब बहुत शताब्दियों पहले हुआ था। आइए, हम इस शताब्दी में, इस वर्ष में, अपने आप तक उतर आएँ। हम वर्तमान समय पर आएँगे। आइए कल्पना करें कि अभी, जब मैं प्रचार कर रहा हूँ, परमेश्वर के सिंहासन से एक तराजू नीचे उतर आता है। वह स्वयं सिंहासन से ही बँधा हुआ है। वह निष्पक्षता का, न्याय का सिंहासन है। आपको और मुझे तौला जाना है। मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि तब यह सभा अत्यन्त गम्भीर हो जाती। कोई हँसी-ठिठोली न होती। कोई उदासीनता न होती। कोई भी बेपरवाह न होता।
कुछ लोगों के पास अपने ही तराजू हैं। बहुत से लोग अपने तौले जाने के लिये अपने ही तराजू बना रहे हैं। परन्तु आख़िरकार हमें परमेश्वर के तराजू में, पवित्रस्थान के तराजू में तौला जाना है। अविश्वासियों को यह बात बहुत प्रिय है कि वे अपना ही मापदण्ड ठहराएँ, और दूसरे लोगों से अपने आप को नापें। परन्तु न्याय के दिन यह काम न आएगा। अब हम परमेश्वर की व्यवस्था को तौलने के बाट के रूप में काम में लाएँगे। जब मनुष्य मसीही होने का दावा करनेवालों के जीवन में दोष निकालते हैं, तो यह परमेश्वर की व्यवस्था को दी गई एक श्रद्धांजलि है।
“तकेल।” यह बहुत छोटा पाठ है। यह इतना छोटा है कि मुझे निश्चय है कि आप इसे स्मरण रखेंगे: और मेरा उद्देश्य यही है, बस यह कि लोग परमेश्वर के अपने वचन को स्मरण रखें।
परमेश्वर की लिखावट
मैं आपका ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूँ कि परमेश्वर ने बेलशस्सर के राजभवन की दीवार पर ही नहीं, वरन् सीनै पर्वत पर पत्थर की पटियाओं पर भी लिखा।
मनुष्यों के लिये यही वे एकमात्र सन्देश हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपने ही हाथ से लिखा है। उसने आज्ञाओं को दो बार लिखा, और इस्राएल के सुनते हुए उन्हें ऊँचे स्वर से बोलकर सुनाया।
यदि यह ज्ञात हो जाए कि परमेश्वर स्वयं एक बार फिर मनुष्य से बात करनेवाला है, तो कैसी उत्सुकता और हलचल मच जाएगी! लगभग उन्नीस सौ वर्षों से वह चुप है। लगभग उन्नीस सौ वर्षों से बाइबल में कोई ईश्वर-प्रेरित सन्देश नहीं जोड़ा गया। यदि परमेश्वर एक बार और बोले, तो सब मनुष्य कितनी उत्सुकता से सुनेंगे! फिर भी मनुष्य भूल जाते हैं कि बाइबल परमेश्वर का अपना वचन है, और वह आज भी उतना ही सचमुच उसका सन्देश है जितना तब था जब वह प्राचीनकाल में दिया गया था। सीनै पर दी गई व्यवस्था की गम्भीरता में कुछ भी कमी नहीं आई है। समय न उसके अधिकार को घिसकर मिटा सकता है, न इस तथ्य को कि उसका रचयिता कौन है।
मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कोई कहता है, “मैं उस व्यवस्था से नहीं तौला जाऊँगा। मैं उस पर विश्वास नहीं करता।”
अब मनुष्य बाइबल के दूसरे भागों के विषय में जितनी चाहें उतनी नुक्ताचीनी करें, परन्तु मुझे आज तक कोई ऐसा ईमानदार मनुष्य नहीं मिला जिसने दस आज्ञाओं में दोष निकाला हो। अविश्वासी व्यवस्था देनेवाले का उपहास कर सकते हैं और उसे अस्वीकार कर सकते हैं जिसने हमें व्यवस्था के शाप से छुड़ाया है, परन्तु वे यह माने बिना नहीं रह सकते कि आज्ञाएँ ठीक हैं। रेनान ने कहा कि वे सब जातियों के लिये हैं, और सब शताब्दियों तक परमेश्वर की आज्ञाएँ बनी रहेंगी।
यदि परमेश्वर ने इस जगत को रचा, तो उसे इस पर शासन करने के लिये कुछ नियम भी बनाने होंगे। जीवन को सुरक्षित बनाने के लिये हमारे पास अच्छे नियम होने चाहिएँ; सूर्य जिस पर चमकता है ऐसा कोई देश नहीं जिसके पास नियम न हों। यह परमेश्वर की व्यवस्था है। यह ऊपर से आई है, और अविश्वासियों और संशयवादियों को भी मानना पड़ता है कि यह शुद्ध है। संसार भर की लगभग सभी विधान-सभाएँ इसे अपनी न्याय-व्यवस्था की नींव के रूप में अपनाती हैं।
“यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को बहाल कर देती है; यहोवा के नियम विश्वासयोग्य हैं, साधारण लोगों को बुद्धिमान बना देते हैं; यहोवा के उपदेश सिद्ध हैं, हृदय को आनन्दित कर देते हैं; यहोवा की आज्ञा निर्मल है, वह आँखों में ज्योति ले आती है।” (भजन संहिता 19:7-8)
अब आपके और मेरे लिये प्रश्न यह है—क्या हम इन आज्ञाओं का पालन कर रहे हैं?
क्या हमने व्यवस्था की सब माँगों को पूरा किया है? यदि परमेश्वर ने हमें बनाया, जैसा कि हम जानते हैं कि उसने बनाया, तो उसे वह व्यवस्था बनाने का अधिकार था; और यदि हम उसका ठीक उपयोग न करें, तो हमारे लिये भला होता कि वह हमें कभी मिली ही न होती, क्योंकि वह हमें दोषी ठहराएगी। हम हलके पाए जाएँगे। व्यवस्था तो बिल्कुल ठीक है, परन्तु क्या हम ठीक हैं?
एक अविश्वासी की गवाही
एक चतुर अविश्वासी के विषय में कहा जाता है कि उसने बाइबल की सच्चाइयों से परिचित होना चाहा, और मूसा की पुस्तकों से पढ़ना आरम्भ किया। वह बाइबल की हँसी उड़ाने का आदी था, और मसीही लोगों द्वारा दिए गए तर्कों का खण्डन कर सकने के लिये, उसने यह ठान लिया कि, क्योंकि वह उसके विषय में कुछ नहीं जानता था, इसलिये वह बाइबल पढ़ेगा और उसकी विषय-वस्तु का कुछ ज्ञान प्राप्त करेगा। जब वह दस आज्ञाओं तक पहुँचा, तो उसने अपने एक मित्र से कहा: “मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं पहले क्या सोचा करता था। मैं समझता था कि मूसा लुटेरों के एक दल का सरदार था; कि दृढ़ बुद्धि का होने के कारण उसने एक अन्धविश्वासी जाति पर बड़ा प्रभाव जमा लिया; और कि सीनै पर्वत पर उसने अपने अज्ञानी अनुयायियों को चकित करने के लिये किसी प्रकार की आतिशबाज़ी दिखाई, और उन्होंने अपने भय और अन्धविश्वास में समझ लिया कि वह प्रदर्शन अलौकिक था। मैं उस व्यवस्था के स्वरूप की छानबीन करता रहा हूँ। मैं यह देखने का प्रयत्न करता रहा हूँ कि क्या मैं उसमें कुछ जोड़ सकता हूँ, या उसमें से कुछ घटा सकता हूँ, जिस से वह और अच्छी हो जाए। महाशय, मैं नहीं कर सकता! वह सिद्ध है!
“पहली आज्ञा हमें निर्देश देती है कि हम सृष्टिकर्ता को अपने सर्वोच्च प्रेम और श्रद्धा का पात्र बनाएँ। यह ठीक है। यदि वह हमारा सृष्टिकर्ता, पालनहार और सर्वोच्च उपकारी है, तो हमें उसके साथ, और किसी दूसरे के साथ नहीं, ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए। दूसरी आज्ञा मूर्तिपूजा का निषेध करती है। यह निश्चय ही ठीक है। तीसरी आज्ञा अपवित्र वचनों का निषेध करती है। चौथी आज्ञा धार्मिक आराधना के लिये समय ठहराती है। यदि कोई परमेश्वर है, तो निश्चय उसकी आराधना की जानी चाहिए। यह उचित है कि कोई बाहरी श्रद्धांजलि हो जो हमारे भीतरी आदर को प्रकट करे। यदि परमेश्वर की आराधना की जाए, तो उचित है कि उस उद्देश्य के लिये कुछ समय अलग ठहराया जाए, जब सब लोग मिलकर, और बिना किसी बाधा के, उसकी आराधना कर सकें। सात में से एक दिन निश्चय ही बहुत अधिक नहीं है, और मैं नहीं कह सकता कि यह बहुत कम है।
“पाँचवीं आज्ञा पारिवारिक सम्बन्धों से उत्पन्न होनेवाले विशेष कर्तव्यों को निर्धारित करती है। इसके बाद नैतिक व्यवस्था हमारे पड़ोसी के प्रति की जानेवाली हानियों का वर्गीकरण करती है। वे जीवन, सतीत्व, सम्पत्ति और चरित्र के विरुद्ध अपराधों में बाँटी गई हैं; और मैं देखता हूँ कि हर वर्ग में सबसे बड़ा अपराध स्पष्ट रूप से मना किया गया है। इस प्रकार जीवन की सबसे बड़ी हानि हत्या है; सतीत्व की, व्यभिचार; सम्पत्ति की, चोरी; चरित्र की, झूठी गवाही। अब सबसे बड़े अपराध में उसी प्रकार का छोटे से छोटा अपराध भी सम्मिलित होना चाहिए। हत्या में उसी प्रकार का छोटे से छोटा अपराध भी सम्मिलित होना चाहिए। हत्या में जीवन की हर हानि सम्मिलित होनी चाहिए; व्यभिचार में पवित्रता की हर हानि, और इसी प्रकार शेष में भी। और नैतिक संहिता एक ऐसी आज्ञा से पूरी और सिद्ध की गई है जो हमारे पड़ोसियों के विषय में हर अनुचित इच्छा का निषेध करती है।
“मैं सोचता रहा हूँ। मूसा को वह व्यवस्था कहाँ से मिली? मैंने इतिहास पढ़ा है। मिस्री और आसपास की जातियाँ मूर्तिपूजक थीं; वैसे ही यूनानी और रोमी भी थे; और सबसे बुद्धिमान या सबसे श्रेष्ठ यूनानियों या रोमियों ने भी कभी इसके समान नैतिक संहिता नहीं दी। मूसा ने वह व्यवस्था कहाँ से पाई, जो सबसे अधिक प्रबुद्ध युगों के ज्ञान और दर्शन से भी बढ़कर है? वह अपेक्षाकृत असभ्य युग में रहता था; परन्तु उसने ऐसी व्यवस्था दी है जिसमें बाद के सारे समय की विद्या और सूझ-बूझ भी कोई दोष नहीं ढूँढ़ सकी। उसने उसे कहाँ से पाया? वह अपने युग से इतना ऊँचा नहीं उठ सकता था कि उसे स्वयं गढ़ लेता। मुझे सन्तोष है कि मैं जानता हूँ उसने उसे कहाँ से पाया। वह स्वर्ग से उतरी। इसने मुझे बाइबल के धर्म की सच्चाई का निश्चय करा दिया है।”
वह भूतपूर्व अविश्वासी अपनी मृत्यु तक मसीही धर्म की सच्चाई में दृढ़ विश्वास रखनेवाला बना रहा।
हम इसे “मूसा की” व्यवस्था कहते हैं, परन्तु ठीक ही कहा गया है कि आज्ञाओं का आरम्भ मूसा से नहीं हुआ, और न ही वे उस समय मिटा दी गईं जब मूसा की व्यवस्था मसीह में पूरी हुई और उसकी बहुत सी रीतियाँ और विधियाँ उठा दी गईं। उन प्राचीन समयों में हमें किसी व्यवस्था बनानेवाली संस्था के अस्तित्व का कोई चिह्न नहीं मिलता, न कोई संसद, न कोई कांग्रेस जिसने नियमों की कोई प्रणाली खड़ी की हो। यह हम तक पूर्ण और सम्पूर्ण रूप में पहुँची है, और इसका एकमात्र सन्तोषजनक विवरण वही है जो हमें बताता है कि परमेश्वर ने स्वयं आज्ञाओं को पत्थर की पटियाओं पर लिखा।
आज भी बाध्यकारी
कुछ लोग ऐसा सोचते प्रतीत होते हैं कि हम आज्ञाओं से आगे निकल गए हैं। मसीह ने क्या कहा?
“यह न समझो, कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ। लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ। क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।” (मत्ती 5:17-18)
होरेब पर्वत पर मूसा को दी गई परमेश्वर की आज्ञाएँ आज भी उतनी ही बाध्यकारी हैं जितनी वे उस समय से सदा रही हैं जब वे लोगों के सुनते हुए सुनाई गई थीं। यहूदी कहते थे कि व्यवस्था पलिश्तीन में (जो इस्राएल का था) नहीं, परन्तु जंगल में दी गई, क्योंकि व्यवस्था सब जातियों के लिये थी।
यीशु ने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं को कभी दोषी नहीं ठहराया, परन्तु उसने उन लोगों को अवश्य दोषी ठहराया जो उनका पालन नहीं करते थे। इससे कि उसने नई आज्ञाएँ दीं, यह परिणाम नहीं निकलता कि उसने पुरानी आज्ञाओं को उठा दिया। मसीह की व्याख्या ने उन्हें और भी अधिक मर्मभेदी बना दिया। अपने पहाड़ी उपदेश में उसने आज्ञाओं के सिद्धान्तों को केवल अक्षर से कहीं आगे तक पहुँचाया। उसने उन्हें खोलकर समझाया और दिखाया कि उनमें और भी अधिक सम्मिलित है, कि वे केवल निषेध करनेवाली ही नहीं, वरन् करने की आज्ञा देनेवाली भी हैं। पुराना नियम इन शब्दों के साथ समाप्त होता है: “मेरे दास मूसा की व्यवस्था अर्थात् जो जो विधि और नियम मैं ने सारे इस्राएलियों के लिये उसको होरेब में दिए थे, उनको स्मरण रखो। देखो, यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहले, मैं तुम्हारे पास एलिय्याह नबी को भेजूँगा। और वह माता पिता के मन को उनके पुत्रों की ओर, और पुत्रों के मन को उनके माता-पिता की ओर फेरेगा; ऐसा न हो कि मैं आकर पृथ्वी को सत्यानाश करूँ।” (मलाकी 4:4-6)
क्या इससे ऐसा लगता है कि मूसा की व्यवस्था पुरानी होकर व्यर्थ होती जा रही थी?
वर्षों के साथ-साथ मुझ में यह दृढ़ विश्वास गहरा होता जाता है कि बाइबल की पुरानी सच्चाइयों को सबसे सरल भाषा में बार-बार कहा और दोहराया जाना चाहिए। मुझे स्मरण नहीं कि मैंने कभी आज्ञाओं पर प्रचार किया गया कोई उपदेश सुना हो। मेरे पास स्पर्जन द्वारा प्रचार किए गए ढाई हज़ार उपदेशों की एक सूची है, और उनमें से एक भी अपना पाठ निर्गमन 20 के पहले सत्रह पदों में से नहीं लेता। लोगों को यह समझाया जाना चाहिए कि दस आज्ञाएँ अब भी बाध्यकारी हैं, और कि उनके उल्लंघन के साथ दण्ड जुड़ा हुआ है। हमें केवल भावुकता का सुसमाचार नहीं चाहिए। पहाड़ी उपदेश ने दस आज्ञाओं को मिटा नहीं दिया।
जब मसीह आया, तो उसने व्यवस्था के कथन को संक्षिप्त करके इस रूप में रखा: “तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना... [और] अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।” (मरकुस 12:30,31)
पौलुस ने कहा: “प्रेम रखना व्यवस्था को पूरा करना है।” (रोमियों 13:10) परन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि दस आज्ञाओं के विस्तृत नियम हटा दिए गए हैं और पुराने अंकों के समान बेकार हो गए हैं? क्या कोई पिता अपने बच्चों को मानने के लिये नियम देना इसलिये छोड़ देता है कि वे उससे प्रेम करते हैं? क्या कोई राष्ट्र अपनी विधि-पुस्तकों को इसलिये जला देता है कि लोग देशभक्त हो गए हैं? कदापि नहीं। फिर भी लोग ऐसे बात करते हैं मानो आज्ञाएँ मसीहियों पर इसलिये लागू नहीं होतीं कि वे परमेश्वर से प्रेम करने लगे हैं। पौलुस ने कहा: “तो क्या हम व्यवस्था को विश्वास के द्वारा व्यर्थ ठहराते हैं? कदापि नहीं! वरन् व्यवस्था को स्थिर करते हैं।” (रोमियों 3:31)
वह अब भी लागू है। आज्ञाएँ आवश्यक हैं। जब तक हम उनका पालन करते हैं, वे हम पर भारी नहीं पड़तीं; परन्तु जैसे ही हम उनसे छूट निकलने का प्रयत्न करते हैं, हम पाते हैं कि वे बाड़ों के समान हैं जो हमें सीमाओं के भीतर रखती हैं। घोड़ों को भली-भाँति सधा लिए जाने के बाद भी लगाम की आवश्यकता होती है।
“पर हम जानते हैं कि यदि कोई व्यवस्था को व्यवस्था की रीति पर काम में लाए तो वह भली है। यह जानकर कि व्यवस्था धर्मी जन के लिये नहीं, पर अधर्मियों, निरंकुशों, भक्तिहीनों, पापियों, अपवित्रों और अशुद्धों, माँ-बाप के घात करनेवालों, हत्यारों, व्यभिचारियों, पुरुषगामियों, मनुष्य के बेचनेवालों, झूठों, और झूठी शपथ खानेवालों, और इनको छोड़ खरे उपदेश के सब विरोधियों के लिये ठहराई गई है।” (1 तीमुथियुस 1:8-10)
अब, मेरे मित्र, क्या आप परमेश्वर की इस व्यवस्था से तौले जाने के लिये तैयार हैं? बहुत से लोग कहते हैं कि यदि वे आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो उन्हें मसीह के द्वारा क्षमा पाने और उद्धार पाने की आवश्यकता नहीं। परन्तु क्या आपने उनका पालन किया है? मैं मान लूँगा कि यदि आप आज्ञाओं का पूर्ण रूप से पालन करते हैं, तो आपको मसीह के द्वारा उद्धार पाने की आवश्यकता नहीं; परन्तु क्या इस विशाल संसार में कोई ऐसा मनुष्य है जो सच्चाई से कह सके कि उसने ऐसा किया है? हे युवती, क्या आप कह सकती हैं: “मैं व्यवस्था से तौले जाने के लिये तैयार हूँ।”?
हे युवक, क्या आप कह सकते हैं? क्या आप तराजू के पलड़े में चढ़ेंगे और एक-एक करके दस आज्ञाओं से तौले जाएँगे?
अब इन दस आज्ञाओं का सामना ईमानदारी से और प्रार्थना के साथ कीजिए। देखिए कि क्या आपका जीवन ठीक है, और क्या आप परमेश्वर के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं। परमेश्वर की विधियाँ न्यायपूर्ण हैं, हैं न?
यदि वे ठीक हैं, तो आइए देखें कि क्या हम ठीक हैं। आइए, हम परमेश्वर के साथ एकान्त में जाएँ और उसकी व्यवस्था पढ़ें—उसे ध्यान से और प्रार्थना के साथ पढ़ें, और उससे विनती करें कि वह हमारे पाप को क्षमा करे और हमें बताए कि वह हम से क्या करवाना चाहता है।
