खण्ड 2 (12 में से)

पहली आज्ञा

डी. एल. मूडी · कोई दूसरा ईश्वर नहीं

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है। तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।

    मेरे मित्र, क्या आप इस आज्ञा के सामने तौले जाने के लिये तैयार हैं? क्या आपने इस व्यवस्था की सब माँगों को पूरा किया है, या क्या आप उन्हें पूरा करने के लिये तैयार हैं? इसे तराजू के एक पलड़े में रखिए, और दूसरे पलड़े में आप स्वयं चढ़िए। क्या आपका मन केवल परमेश्वर ही पर लगा है? क्या आपका कोई दूसरा ईश्वर नहीं है? क्या आप उससे पिता या माता से, अपनी प्राणप्रिय पत्नी से, अपने बच्चों से, घर या भूमि से, धन या सुख-विलास से बढ़कर प्रेम करते हैं?

    यदि मनुष्य इस आज्ञा के प्रति सच्चे होते, तो शेष नौ आज्ञाओं का पालन अपने आप होता। इसी में खोटे होने के कारण वे दूसरी आज्ञाओं को तोड़ते हैं।

    परमेश्वर को टटोलना

    दार्शनिक इस बात पर सहमत हैं कि मनुष्य-जाति की सबसे आदिम जातियाँ भी भौतिक जगत से परे किसी श्रेष्ठ सत्ता की ओर हाथ बढ़ाती हैं। मनुष्य के लिये परमेश्वर को टटोलना उतना ही स्वाभाविक है जितना किसी बेल के लिये सहारे को टटोलना। भूख और प्यास मनुष्य को भोजन ढूँढ़ने के लिये विवश करती हैं, और प्राण की भी एक भूख है जिसे तृप्त किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्य को आराधना करने की आज्ञा दिए जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सभ्यता की सीढ़ी पर इतनी ऊँची या इतनी नीची कोई जाति नहीं जिसका किसी न किसी प्रकार का कोई देवता न हो। उसे जिस बात की आवश्यकता है, वह यह है कि उसे ठीक दिशा दिखाई जाए।

    पहली आज्ञा इसी के लिये है। इससे पहले कि हम समझ-बूझकर आराधना कर सकें, हमें यह जानना चाहिए कि हम किस वस्तु की या किसकी आराधना करें। परमेश्वर हमें अज्ञानता में नहीं छोड़ता। जब पौलुस एथेंस गया, तो उसने एक वेदी पाई जो “अनजाने ईश्वर” को समर्पित थी, और वह उन्हें उसके विषय में बताने लगा जिसकी हम आराधना करते हैं। जब परमेश्वर ने मूसा को आज्ञाएँ दीं, तो उसने अपने ही स्वरूप की घोषणा से आरम्भ किया, और केवल अपने ही को माने जाने की माँग की।

    “मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है। तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।” (निर्गमन 20:2-3)

    डॉ. डेल कहते हैं कि इन शब्दों का बड़ा महत्त्व है। यहूदी “यहोवा को उस परमेश्वर के रूप में जानते थे जिसने लहरों को दीवार के समान रोक रखा था जब वे अपने शत्रुओं के प्रतिशोध से बचने के लिये समुद्र के पार भागे थे; वे उसे उस परमेश्वर के रूप में जानते थे जिसने मिस्रियों को दण्ड देने और उन्हें इस्राएलियों को जाने देने के लिये विवश करने को गर्जन, और बिजली, और ओले, पशुओं पर विपत्तियाँ, और मनुष्यों पर विपत्तियाँ भेजी थीं; वे उसे उस परमेश्वर के रूप में जानते थे जिसके दूत ने उनके अत्याचारियों के पहलौठों को मार डाला था, और देश को एक छोर से दूसरे छोर तक मृत्यु, और वेदना, और आतंक से भर दिया था। वह वही परमेश्वर था, जैसा मूसा और हारून ने उन्हें बताया था, जिसने बहुत पहले दर्शनों और वाणियों के द्वारा, प्रतिज्ञाओं और आज्ञाओं में, अपने आप को अब्राहम, इसहाक और याकूब पर प्रकट किया था। मनुष्य क्या हैं, यह हम उनकी कही हुई बातों और उनके किए हुए कामों से सीखते हैं। लूथर की एक जीवनी हमें उस मनुष्य का, उसके चरित्र और विश्वास-सिद्धान्त पर लिखे सबसे दार्शनिक निबन्ध से भी अधिक सजीव और विश्वसनीय ज्ञान देती है। उसके बन्दी बनाए जाने की और वर्म्स की उसकी यात्रा की कहानी, उसके पत्र, उसके उपदेश, और उसकी ‘टेबल टॉक’ (भोजन-मेज़ की बातें), उसके विषय में सबसे विस्तृत अटकलों से भी अधिक मूल्यवान हैं। यहूदियों ने यह नहीं सीखा कि परमेश्वर कैसा है ईश्वरीय गुणों पर धर्मविज्ञान के शोध-प्रबन्धों से, परन्तु एक ईश्वरीय इतिहास के तथ्यों से। वे उसे स्वयं उसके अपने कामों और उसके अपने वचनों में जानते थे।”

    किसी ने एक अरबी से पूछा: “तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर है?” उसने उत्तर दिया, “मैं कैसे जानता हूँ कि बीती रात मेरे तम्बू के पास से कोई मनुष्य गुज़रा या कोई ऊँट?” प्रकृति में और हमारे अपने अनुभव में परमेश्वर के पदचिह्न उसके अस्तित्व और उसके स्वरूप के सबसे अच्छे प्रमाण हैं।

    संकट से घिरे इस्राएली

    स्मरण कीजिए कि यह आज्ञा किन्हें दी गई थी, तब हम और भी देखेंगे कि यह कितनी आवश्यक थी। इस्राएलियों के पूर्वज, बहुत पीढ़ियाँ पहले नहीं, मूर्तियों की पूजा करते थे। वे हाल ही में मिस्र से छुड़ाए गए थे, जो बहुत से देवताओं का देश था। मिस्री सूर्य, चन्द्रमा, कीड़ों, पशुओं आदि की पूजा करते थे। दस विपत्तियाँ निःसन्देह परमेश्वर की ओर से उनकी बहुत सी पवित्र मानी जानेवाली वस्तुओं को लज्जित करने के लिये थीं। इस्राएली एक ऐसे देश पर अधिकार करने जा रहे थे जिसमें अन्यजाति लोग बसे थे, जो मूर्तियों की पूजा भी करते थे। इसलिये ऐसी आज्ञा की बड़ी आवश्यकता थी। उन दिनों में भी, आज के समान ही, परमेश्वर और मनुष्य के बीच कोई ठीक सम्बन्ध नहीं हो सकता था, जब तक मनुष्य यह न समझ ले कि उसे केवल परमेश्वर ही को मानना है, और उसे बँटा हुआ मन अर्पित नहीं करना है।

    यदि उसने हमें रचा, तो निश्चय ही हमारी श्रद्धा और भक्ति उसी की होनी चाहिए। क्या यह ठीक नहीं कि हमारे स्नेह में पहला और एकमात्र स्थान उसी का हो?

    कोई समझौता नहीं

    यह एक ऐसा विषय है जिसमें कोई सहनशीलता नहीं दिखाई जा सकती। धार्मिक स्वतंत्रता, कुछ सीमाओं के भीतर, एक अच्छी बात है। परन्तु जो लोग मूल बातों पर सहमत हैं उनके प्रति सहनशीलता दिखाना एक बात है, और जो मौलिक विश्वासों में भिन्न हैं उनके प्रति सहनशीलता दिखाना दूसरी बात। रोमी लोग किसी भी देवता को रोम के पैन्थियन (सब देवताओं के मन्दिर) में स्थान देने को तैयार थे। आरम्भिक मसीहियों के सताए जाने का एक कारण यह था कि उन्होंने वहाँ यीशु मसीह के लिये स्थान स्वीकार नहीं किया। कहा जाता है कि नेपोलियन के मन में यह विचार था कि पेरिस में हर ज्ञात धर्म के लिये अलग-अलग मन्दिर हों, ताकि जो भी परदेशी उस नगर की ओर आकर्षित हो, उसे आराधना के लिये कोई स्थान मिल सके। ऐसी योजनाएँ ईश्वरीय योजना के बिल्कुल विपरीत हैं। परमेश्वर ने इस आज्ञा में कोई अनिश्चित स्वर नहीं निकाला। यह स्पष्ट, असंदिग्ध और समझौता-रहित है।

    एक किसान सेब के पेड़ के तने के चारों ओर उग आनेवाले छोटे-छोटे अंकुरों के साथ जैसा व्यवहार करता है, उससे हम एक शिक्षा ले सकते हैं। वे आशाजनक दिखते हैं, और जिसने इससे अधिक नहीं सीखा, वह उनके बढ़ने का स्वागत कर सकता है। परन्तु किसान जानता है कि वे मुख्य पेड़ का जीवन-रस खींच लेंगे, और उसकी सम्भावनाओं को ऐसी हानि पहुँचाएँगे कि वह घटिया फल देगा। इसलिये वह अपनी कुल्हाड़ी और अपनी कुदाल लेता है, और इन फालतू अंकुरों को काट डालता है। तब पेड़ अधिक भरपूर और उत्तम उपज देता है।

    परमेश्वर की छँटाई की छुरी

    “तू ... न करना” वह छँटाई की छुरी है जिसे परमेश्वर काम में लाता है। आदि से अन्त तक, बाइबल उसके प्रति सम्पूर्ण मन से निष्ठा की माँग करती है। दूसरे देवताओं के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

    इस्राएलियों के मन पर यह शिक्षा अंकित करने में परमेश्वर को बहुत वर्ष लगे। उसने उन्हें एक चुनी हुई जाति होने के लिये बुलाया। उसने उन्हें अपनी निज प्रजा बनाया। परन्तु आप बाइबल के इतिहास में देखेंगे कि वे निरन्तर उससे फिर जाते थे, और विपत्ति, मरी, युद्ध और अकाल से दण्डित किए जाते थे। उनका पाप यह नहीं था कि उन्होंने परमेश्वर को पूरी रीति से त्याग दिया, परन्तु यह कि वे उसके साथ-साथ दूसरे देवताओं की भी उपासना करना चाहते थे। सारी जाति के उदाहरण के रूप में सुलैमान को ही ले लीजिए। उसने अन्यजाति पत्नियों से विवाह किया जिन्होंने उसके मन को दूसरे देवताओं की ओर फेर दिया, और उसने उनकी मूर्तियों के लिये ऊँचे स्थान बनाए, और उनकी उपासना को बढ़ावा दिया। यही सारी जाति के बार-बार परमेश्वर से फिर जाने का इतिहास था, यहाँ तक कि अन्त में उसने उन्हें बन्धुआई में बाबुल भेज दिया और सत्तर वर्ष तक उन्हें वहीं रखा। तब से यहूदी कभी दूसरे देवताओं की ओर नहीं फिरे।

    क्या आज कलीसिया को भी इसी कठिनाई से संघर्ष नहीं करना पड़ता? बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अपने मन में परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, परन्तु वे जो नहीं करेंगे वह यह है कि उसे पूरा और एकमात्र अधिकार दें। मिशनरी हमें बताते हैं कि यदि वे लोगों से बपतिस्मा लेने, और इस प्रकार सबके सामने अपनी मूर्तियों को त्यागने की माँग न करें, तो वे सहज ही लोगों को धर्मान्तरित कर सकते हैं। हमारे देश में बहुत से लोग मसीही बन जाते, यदि फाटक इतना सकेत न होता। मसीही धर्म उनके लिये बहुत कठोर है। वे केवल परमेश्वर ही के प्रति पूरी निष्ठा की प्रतिज्ञा करने के लिये तैयार नहीं हैं। मसीही होने का दावा करनेवाले बहुत से लोग ठोकर का कारण बनते हैं, क्योंकि उनकी आराधना बँटी हुई है। रविवार को वह परमेश्वर की आराधना करता है; सप्ताह के दूसरे दिनों में उसके विचारों में परमेश्वर का बहुत कम स्थान होता है, या कोई स्थान नहीं होता।

    आज अमेरिका में झूठे देवता

    आज झूठे देवताओं को ढूँढ़ने के लिये आपको अन्यजाति देशों में जाने की आवश्यकता नहीं। अमेरिका उनसे भरा पड़ा है। आप जिस वस्तु को सबसे अधिक महत्त्व देते हैं, वही आपका देवता है। आप जिस किसी वस्तु से परमेश्वर से बढ़कर प्रेम करते हैं, वही आपकी मूर्ति है। बहुत से मनुष्यों का मन कुछ काफ़िर (दक्षिण अफ़्रीकी) कबीलों की झोपड़ियों के समान है, जो मूर्तियों से इतनी भरी होती हैं कि मुड़ने तक की जगह नहीं रहती। धनी और निर्धन, पढ़े-लिखे और अनपढ़, सब वर्गों के पुरुष और स्त्रियाँ इस पाप के दोषी हैं।

    “साधारण मनुष्य झुकता है, और बड़ा मनुष्य अपने आप को नीचा करता है।” (यशायाह 2:9)

    मनुष्य अपने आप को, किसी बच्चे को, किसी माता को, या परमेश्वर के दिए हुए किसी बहुमूल्य वरदान को देवता बना सकता है। वह देनेवाले को भूल सकता है और अपने मन को उस दान की आराधना में लगा सकता है।

    बहुत से लोग सुख-विलास को अपना देवता बना लेते हैं; उनका मन उसी पर लगा रहता है। यदि कोई प्राचीन यूनानी या रोमी फिर से जी उठे और मनुष्य को नशे की रंगरलियों में देखे, तो क्या वह विश्वास करेगा कि बैकस की पूजा समाप्त हो गई है? यदि वह हमारे बड़े नगरों की सड़कों को वेश्याओं से भरी देखे, तो क्या वह विश्वास करेगा कि वीनस की पूजा बन्द हो गई है?

    दूसरे लोग फ़ैशन को अपना देवता मान लेते हैं। वे अपना समय और अपना ध्यान पहनावे में लगाते हैं। वे डरते हैं कि दूसरे उनके विषय में क्या सोचेंगे। आइए हम अपने आप को इस भ्रम में न रखें कि सब मूर्तिपूजक अन्यजाति देशों में ही हैं।

    बहुतों के लिये धन ही देवता है। हम अभी तक सोने के बछड़े की पूजा से छूटे नहीं हैं। यदि कोई मनुष्य सोने के लिये अपने सिद्धान्त बेच दे, तो क्या वह उसे देवता नहीं बना रहा? यदि वह अभाव से बचने और अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये अपने धन पर भरोसा रखता है, तो क्या धन उसका देवता नहीं है? बहुत से मनुष्य कहते हैं, “मुझे धन दो, और मैं तुम्हें स्वर्ग दे दूँगा। स्वर्ग की सारी महिमा और सारे भण्डार की मुझे क्या परवाह? मुझे यहीं भण्डार दो! मुझे स्वर्ग की परवाह नहीं! मैं एक सफल व्यापारी बनना चाहता हूँ।” अय्यूब के ये शब्द कितने सच्चे हैं: “यदि मैं ने सोने का भरोसा किया होता, वा कुन्दन को अपना आसरा कहा होता, यदि मैं अपने बहुत से धन वा अपनी बड़ी कमाई के कारण आनन्द करता, वा सूर्य को चमकते वा चन्द्रमा को महाशोभा से चलते हुए देखकर, मैं मन ही मन मोहित हो जाता, और अपने मुँह से अपना हाथ चूम लेता; तो यह भी न्यायियों से दण्ड पाने के योग्य अधर्म का काम होता; क्योंकि ऐसा करके मैं ने सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर का इन्कार किया होता।” (अय्यूब 31:24-28) परन्तु सब झूठे देवता इतने भद्दे नहीं होते। नास्तिक को लीजिए। वह कहता है कि वह परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता; वह उसके अस्तित्व का इन्कार करता है, परन्तु वह उसके स्थान पर कोई दूसरा देवता खड़ा किए बिना नहीं रह सकता। वॉल्टेयर ने कहा, “यदि कोई परमेश्वर न होता, तो एक का आविष्कार करना आवश्यक होता।” इसलिये नास्तिक ‘महान अज्ञात’, ‘आदि कारण’, ‘अनन्त मन’ आदि की बातें करता है। फिर देववादी (डीइस्ट) है। वह ऐसा मनुष्य है जो एक परमेश्वर पर विश्वास करता है जिसने सब वस्तुओं को उत्पन्न किया; परन्तु वह ईश्वरीय प्रकाशन पर विश्वास नहीं करता। वह केवल उन्हीं सच्चाइयों को स्वीकार करता है जो तर्क-बुद्धि के द्वारा खोजी जा सकती हैं। वह न यीशु मसीह पर विश्वास करता है, न बाइबल के ईश्वर-प्रेरित होने पर। फिर सर्वेश्वरवादी है, जो कहता है: “मैं विश्वास करता हूँ कि सारा ब्रह्माण्ड ही परमेश्वर है। वह वायु में, जल में, सूर्य में, तारों में है,” और झूठा और चोर भी इसमें सम्मिलित हैं।

    मूसा का विदाई-सन्देश

    मैं आपका ध्यान व्यवस्थाविवरण के बत्तीसवें अध्याय के इकतीसवें पद की ओर दिलाना चाहता हूँ: “क्योंकि जैसी हमारी चट्टान है वैसी उनकी चट्टान नहीं है, चाहे हमारे शत्रु ही क्यों न न्यायी हों।”

    ये शब्द मूसा ने इस्राएल को दिए अपने विदाई-भाषण में कहे थे। वह चालीस वर्ष उनके साथ रहा था। वह उनका अगुवा और शिक्षक था। स्वर्ग की सारी आशीषें उसी के द्वारा उन तक पहुँची थीं। और अब वह बूढ़ा पुरुष उन्हें छोड़कर जानेवाला है। यदि आपने उसका यह भाषण कभी नहीं पढ़ा, तो पढ़िए। यह छपे हुए सबसे उत्तम उपदेशों में से एक है। पुराने या नये नियम में मैं ऐसे थोड़े ही उपदेश जानता हूँ जो इसकी बराबरी कर सकें।

    मैं मूसा को यह भाषण देते हुए देख सकता हूँ। उसकी स्वाभाविक स्फूर्ति घटी नहीं है। उसमें अब भी जवानी का बल है। उसके लम्बे श्वेत बाल उसके कन्धों पर लहरा रहे हैं, और उसकी आदरणीय दाढ़ी उसकी छाती को ढाँपे हुए है। वह चुनौती देता है: “जैसी हमारी चट्टान है वैसी उनकी चट्टान नहीं है, चाहे हमारे शत्रु ही क्यों न न्यायी हों।”

    क्या मनुष्य का मन कभी इन झूठे देवताओं से तृप्त हुआ है? क्या सुख-विलास या धन उस प्राण को भर सकता है जो परमेश्वर से खाली है? नास्तिक, देववादी और सर्वेश्वरवादी के विषय में क्या कहें? वे किस बात की बाट जोहते हैं? कुछ भी नहीं! मनुष्य का जीवन दुःखों से भरा है; परन्तु जब क्लेश और निराशा की लहरें उठती हैं और उनके ऊपर से होकर बहती हैं, तब उनके पास पुकारने के लिये कोई परमेश्वर नहीं होता। वे “जिन देवताओं के लिये वे धूप जलाते हैं, उनकी दोहाई देंगे, परन्तु वे उनकी विपत्ति के समय उनको कभी न बचा सकेंगे” (यिर्मयाह 11:12)। इसलिये मैं दृढ़ता से कहता हूँ, “जैसी हमारी चट्टान है वैसी उनकी चट्टान नहीं है।”

    मेरे मित्रो, जब क्लेश की घड़ी आती है, तो वे सान्त्वना देने के लिये किसी पादरी को बुलाते हैं। जब मैं शिकागो में बसा हुआ था, तब मुझे बहुत सी अन्त्येष्टियों में बुलाया जाता था। मैं पूछताछ करता कि वह मनुष्य किस विश्वास का था। यदि मुझे पता चलता कि वह नास्तिक, या देववादी, या सर्वेश्वरवादी था, तो जब मैं अन्त्येष्टि में जाता और उसके मित्रों की उपस्थिति में उस मनुष्य के सिद्धान्त के विषय में एक भी शब्द कहता, तो वे अपना अपमान समझते। ऐसा क्यों है कि कठिन घड़ी में, जब वे सारे समय परमेश्वर के विरुद्ध बोलते रहे हैं—ऐसा क्यों है कि क्लेश के अन्धकार में वे सान्त्वना देने के लिये उसी परमेश्वर पर विश्वास करनेवालों को बुलाते हैं? नास्तिक क्लेश की घड़ी में यह प्रचार क्यों नहीं करता कि न कोई परलोक है, न कोई स्वर्ग, न कोई परमेश्वर? यही तथ्य इस बात की स्वीकृति है कि “जैसी हमारी चट्टान है वैसी उनकी चट्टान नहीं है, चाहे हमारे शत्रु ही क्यों न न्यायी हों।”

    देववादी कहता है कि प्रार्थना करने से कोई लाभ नहीं, क्योंकि ईश्वर के आदेशों को कोई भी वस्तु बदल नहीं सकती; परमेश्वर कभी प्रार्थना का उत्तर नहीं देता। क्या उसकी चट्टान हमारी चट्टान के समान है?

    बाइबल सच्ची है। परमेश्वर केवल एक ही है। कितने ही मनुष्यों ने मुझ से कहा है: “मि. मूडी, यदि मुझे आपका विश्वास, आपकी सान्त्वना, और वह आशा मिल जाए जो आपके धर्म के साथ आपके पास है, तो मैं सारा संसार दे दूँ।”

    क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि जैसी हमारी चट्टान है वैसी उनकी चट्टान नहीं है?

    कुछ वर्ष पहले मैं एक मनुष्य के घर गया, और जब मैंने धर्म के विषय में बात करना आरम्भ किया, तो वह अपनी बेटी की ओर मुड़कर बोला: “अच्छा होगा कि तुम कमरे से बाहर चली जाओ। मैं मि. मूडी से कुछ बातें कहना चाहता हूँ।” जब वह चली गई, तो उसने मुझ पर अविश्वास की बातों की मानो पूरी बौछार कर दी। मैंने पूछा, “यह सब कहने से पहले आपने अपनी बेटी को कमरे से बाहर क्यों भेज दिया?” उसने उत्तर दिया, “बात यह है कि मैंने नहीं सोचा कि मेरी कही बातें सुनने से उसका कुछ भला होगा।”

    क्या उसकी चट्टान हमारी चट्टान के समान है? यदि वह सचमुच अपनी कही बातों पर विश्वास करता, तो क्या वह अपनी बेटी को बाहर भेजता?

    परमेश्वर को छोड़ कहीं सान्त्वना नहीं

    नहीं। बाइबल के परमेश्वर को छोड़ प्राण के लिये कहीं तृप्ति नहीं है। हम पौलुस के शब्दों की ओर लौटते हैं और समय और अनन्तकाल दोनों के लिये सान्त्वना पाते हैं: “हम जानते हैं, कि मूरत जगत में कोई वस्तु नहीं, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं। यद्यपि आकाश में और पृथ्वी पर बहुत से ईश्वर कहलाते हैं, (जैसा कि बहुत से ईश्वर और बहुत से प्रभु हैं), तौभी हमारे निकट तो एक ही परमेश्वर है: अर्थात् पिता जिस की ओर से सब वस्तुएँ हैं, और हम उसी के लिये हैं, और एक ही प्रभु है, अर्थात् यीशु मसीह जिस के द्वारा सब वस्तुएँ हुईं, और हम भी उसी के द्वारा हैं।” (1 कुरिन्थियों 8:4-6) मेरे मित्र, क्या आप यह सच्चे मन से कह सकते हैं? क्या आपकी सारी आशा मसीह में प्रकट परमेश्वर पर केन्द्रित है? क्या आप केवल उसी पर भरोसा रख रहे हैं? क्या आप तराजू के पलड़े में चढ़कर इस पहली आज्ञा के सामने तौले जाने के लिये तैयार हैं?

    सम्पूर्ण मन से निष्ठा

    परमेश्वर बँटे हुए मन को स्वीकार नहीं करेगा। उसे ही एकछत्र राजा होना चाहिए। आपके मन में दो सिंहासनों के लिये जगह नहीं है। मसीह ने कहा: “कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, वा एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा; तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।” (मत्ती 6:24)

    ध्यान दीजिए, उसने यह नहीं कहा, “कोई मनुष्य सेवा न करे... तुम सेवा न करना” परन्तु यह कहा, “कोई मनुष्य सेवा नहीं कर सकता...तुम सेवा नहीं कर सकते।” इसका अर्थ एक आज्ञा से भी अधिक है; इसका अर्थ यह है कि आप सच्चे परमेश्वर की आराधना को किसी दूसरे देवता की आराधना के साथ उतना ही नहीं मिला सकते जितना तेल और पानी को नहीं मिला सकते। यह हो ही नहीं सकता। यदि मसीह मन में है, तो वहाँ किसी दूसरे सिंहासन के लिये जगह नहीं है। यदि सांसारिकता भीतर आए, तो भक्ति बाहर चली जाएगी।

    स्वर्ग का मार्ग और नरक का मार्ग अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। आप किस स्वामी के पीछे चलना चुनेंगे? पूरी रीति से, खरे मसीही बनिए। केवल उसी की सेवा आप करें। केवल इसी प्रकार आप परमेश्वर को भा सकते हैं। यहूदियों को सत्तर वर्ष की बन्धुआई का दण्ड इसलिये मिला कि उन्होंने झूठे देवताओं की पूजा की। उन्होंने उन्नीस सौ वर्ष तक दुःख उठाया है क्योंकि उन्होंने मसीहा को अस्वीकार किया। क्या आप भी मसीह को अस्वीकार करके परमेश्वर की अप्रसन्नता मोल लेंगे? वह आपको बचाने के लिये मरा। अपने सम्पूर्ण मन से उस पर भरोसा रखिए, क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है।

    मेरा विश्वास है कि जब हमारे मनों में मसीह को पहला स्थान मिलता है—जब हर बात में परमेश्वर का राज्य पहले होता है—तब हमें सामर्थ मिलेगी, और जब तक हम उसे उसका उचित स्थान नहीं देते, तब तक हमें सामर्थ नहीं मिलेगी। यदि हम किसी झूठे देवता को भीतर आने दें और वह स्वर्ग के परमेश्वर से हमारा प्रेम चुरा ले जाए, तो हमें न शान्ति मिलेगी, न सामर्थ।

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