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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ न लेना; क्योंकि जो यहोवा का नाम व्यर्थ ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा।
कुछ समय पहले मैं एक ऐसे मनुष्य से बातें कर रहा था जो अपने आप को मसीही समझता था, और यह जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि कभी-कभी, जब उसे क्रोध आ जाता, तो वह कसम खाकर गाली-गलौज करने लगता था। मैंने कहा: “मेरे मित्र, मेरी समझ में नहीं आता कि जो कुछ आप एक हाथ से बनाने का यत्न कर रहे हैं उसे दूसरे हाथ से कैसे ढा सकते हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि आप परमेश्वर की सन्तान होने का दावा कैसे कर सकते हैं और फिर भी ऐसे शब्द अपने होंठों से निकलने दे सकते हैं।”
उसने उत्तर दिया: “मिस्टर मूडी, यदि आप मुझे जानते तो समझ जाते। मेरा स्वभाव बहुत गुस्सैल है। यह मुझे अपने पिता और माता से विरासत में मिला है, और यह वश से बाहर है; परन्तु मेरी गाली-गलौज केवल होंठों से ही निकलती है।”
जब परमेश्वर ने कहा, “जो मेरा नाम व्यर्थ ले, मैं उसको निर्दोष न ठहराऊँगा,” तो उसका अर्थ वही था जो उसने कहा, और मैं नहीं मानता कि जो कोई परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेता है वह परमेश्वर की सच्ची सन्तान हो सकता है। परमेश्वर का अनुग्रह किस लिये है, यदि वह मुझे अपने स्वभाव पर ऐसा वश नहीं देता कि मैं अपना आपा न खोऊँ और अपने ऊपर परमेश्वर का शाप न ले आऊँ? जब कोई मनुष्य परमेश्वर से जन्म लेता है, तो परमेश्वर उसके भीतर से “कसम और गाली” निकाल देता है। सोते को अच्छा कर दीजिए, तो धारा भी अच्छी होगी। मन ठीक हो जाए; तब भाषा भी ठीक होगी; सारा जीवन ठीक होगा। परन्तु जब तक कोई मनुष्य परमेश्वर से जन्म न ले, तब तक वह न परमेश्वर की सेवा कर सकता है और न उसकी व्यवस्था का पालन कर सकता है। यहीं हम नये जन्म की आवश्यकता देखते हैं।
परमेश्वर का नाम “व्यर्थ” लेने का अर्थ है या तो (1) हलके ढंग से, बिना सोचे, छिछोरेपन से; या (2) अपवित्रता से, छल-कपट से।
परमेश्वर का नाम बिना श्रद्धा के लेना
मेरे विचार में परमेश्वर का नाम इतनी कम श्रद्धा के साथ लेना, जैसा आजकल आम बात हो गई है, यहाँ तक कि मसीही कहलानेवालों में भी, बड़ी चौंका देनेवाली बात है। हमें बताया जाता है कि यहूदी उसे इतना पवित्र मानते थे कि उनके बीच परमेश्वर का वाचा का नाम कभी उच्चारित नहीं किया जाता था, केवल वर्ष में एक बार प्रायश्चित के दिन महायाजक उसे लेता था, जब वह परमपवित्र स्थान में जाता था। मसीही लोग सार्वजनिक और निजी आराधना में उसका जिस बेतकल्लुफ़ी से प्रयोग करते हैं, उससे यह कितना भिन्न है! हम परमेश्वर की उपस्थिति में दौड़ते हुए घुस जाते हैं और फिर दौड़ते हुए बाहर निकल आते हैं, और उस श्रद्धा और भय का हमें कोई सच्चा बोध नहीं होता जो उसके योग्य है। हम भूल जाते हैं कि हम पवित्र भूमि पर खड़े हैं।
क्या आप जानते हैं कि बाइबल में “भययोग्य” शब्द कितनी बार आता है? केवल एक बार। और वह किसके सम्बन्ध में प्रयोग हुआ है? परमेश्वर के नाम के सम्बन्ध में। भजन संहिता 111:9: “उसका नाम पवित्र और भययोग्य है।”
यहूदी रब्बी इस आज्ञा को इतना महत्वपूर्ण मानते थे कि वे कहते थे कि जब यह पहली बार सीनै पर्वत पर घोषित की गई तो सारा संसार काँप उठा।
परमेश्वर का नाम अपवित्रता से लेना
परन्तु यद्यपि परमेश्वर के नाम का यह ओछा, बेतकल्लुफ़ प्रयोग बहुत अधिक होता है, तौभी यह आज्ञा कहीं अधिक अपवित्र कसमों और गालियों के द्वारा तोड़ी जाती है। परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेना निन्दा है। क्या कोई कसम खानेवाला मनुष्य इसे पढ़ रहा है? यदि आपको पवित्रस्थान के तराजू में रखा जाए, यदि आपको इस तीसरी आज्ञा के सामनेवाले पलड़े में चढ़ना पड़े, तो आप क्या करेंगे? क्षण भर सोचिए। क्या आपने आज परमेश्वर का नाम व्यर्थ लिया है?
मैं नहीं मानता कि यदि परमेश्वर ने कसम खाने को मना न किया होता तो मनुष्य कभी इसके दोषी होते। वे अपने मित्रों की, अपने पिता या माता की, अपनी पत्नियों या बच्चों की कसम नहीं खाते। वे दिखाना चाहते हैं कि वे परमेश्वर की व्यवस्था को कितना तुच्छ समझते हैं।
बहुत से लोग सोचते हैं कि कसम खाने में कोई बात नहीं है। स्मरण रखिए कि परमेश्वर उसमें कुछ बुराई देखता है, और वह कहता है कि वह मनुष्यों को निर्दोष न ठहराएगा, चाहे समाज उन्हें निर्दोष ठहरा दे।
कुछ समय पहले मुझे एक मनुष्य मिला जिसने मुझसे कहा कि उसने अपने जीवन में कभी पाप नहीं किया। मैंने सोचा कि उससे कुछ प्रश्न करूँ, और मैं उसे व्यवस्था से नापने लगा। मैंने उससे पूछा: “क्या आपको कभी क्रोध आता है?”
“हाँ,” उसने कहा, “कभी-कभी आता है; परन्तु मुझे ऐसा करने का अधिकार है। यह धार्मिक रोष है।”
“जब आपको क्रोध आता है तो क्या आप कसम खाते और गालियाँ देते हैं?”
उसने स्वीकार किया कि कभी-कभी ऐसा करता है।
“तो फिर,” मैंने पूछा, “क्या आप परमेश्वर से मिलने के लिये तैयार हैं?”
“हाँ,” उसने उत्तर दिया, “क्योंकि जब मैं कसम खाता हूँ तो मेरा कोई अभिप्राय नहीं होता।”
मान लीजिए कि मैं किसी मनुष्य की घड़ी चुरा लेता हूँ और वह मेरे पीछे आता है।
“हाँ,” मैं कहता हूँ, “मैंने आपकी घड़ी चुराई और उसे गिरवी रख दिया, परन्तु मेरा कोई बुरा अभिप्राय नहीं था। मैंने उसे गिरवी रखा और पैसे खर्च कर दिए, परन्तु मेरा कोई बुरा अभिप्राय नहीं था।”
आप ऐसी बात की हँसी उड़ाएँगे।
आह, मित्रो! आप परमेश्वर के साथ इस प्रकार खिलवाड़ नहीं कर सकते। यदि आप बिना किसी अभिप्राय के भी कसम खाते हैं, तौभी परमेश्वर ने उसे वर्जित किया है। मसीह ने कहा: “जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन वे हर एक उस बात का लेखा देंगे। क्योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों ही के कारण दोषी ठहराया जाएगा।” (मत्ती 12:36, 37)
आपके शब्द चाहे निकम्मे हों या निन्दा से भरे, आपको उनका लेखा देना पड़ेगा।
एक मूर्खतापूर्ण आदत
कसम खाने और गाली देने की आदत को सब समझदार लोग बुरा ठहराते हैं। इसे “सब पापों में सबसे अकारण पाप” कहा गया है, क्योंकि इससे किसी को कोई लाभ नहीं होता; यह “न केवल पापपूर्ण, बल्कि निरर्थक भी” है। एक पुराने लेखक ने कहा कि जब दोष लगानेवाला स्वर्गदूत, जो मनुष्यों के शब्दों को लिखता है, कोई कसम लेकर स्वर्ग को उड़ता है, तो उसे सौंपते समय वह लज्जा से लाल हो जाता है।
जब कोई मनुष्य परमेश्वर की निन्दा करता है, तो वह परमेश्वर के प्रति पूरा तिरस्कार दिखाता है। युद्ध के समय मैं सेना में था, और मैंने लोगों को शाप देते और कसमें खाते सुना। जब कोई भक्त स्त्री अपने घायल बेटे को खोजती हुई पंक्तियों के बीच से गुज़रती, तो एक भी कसम सुनाई न देती। वे अपनी माताओं, या अपनी पत्नियों, या अपनी बहनों के सामने कसम नहीं खाते थे; उनके मन में उनके लिये परमेश्वर से अधिक आदर था!
क्या यह भयानक दोष की बात नहीं कि कसम खाने की आदत तब तक बनी रही जब तक वह एक असभ्य बात, समाज के विरुद्ध एक पाप न मानी जाने लगी? तब लोगों ने उसे छोड़ दिया, जिन्होंने कभी यह सोचा तक नहीं था कि वह परमेश्वर के विरुद्ध पाप है।
परमेश्वर के राज्य में कोई कसम खानेवाला मनुष्य न होगा। परमेश्वर के राज्य को देखने से पहले उन्हें उस पाप को छोड़ना होगा, और उससे पश्चाताप करना होगा।
कसम खाने से कैसे बचें
लोग अक्सर पूछते हैं: “मैं कसम खाने से कैसे बचूँ?” मैं आपको बताता हूँ। यदि परमेश्वर अपना प्रेम आपके हृदय में डाल दे, तो आपमें उसे कोसने की कोई इच्छा न रहेगी। यदि आपके मन में परमेश्वर के लिये बहुत आदर है, तो आप उसे कोसने की बात उतनी ही कम सोचेंगे जितनी कि अपनी प्रिय माता के विषय में हलकी या अपमानजनक बात कहने की। परन्तु स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर से बैर रखता है और उसकी व्यवस्था को पूरी तरह तुच्छ समझता है। जब वह व्यवस्था उसके हृदय पर लिख दी जाती है, तब उसका पालन करने में कोई कठिनाई न होगी।
लगभग तीस वर्ष पहले जब मैं पश्चिम में था, एक दिन मैं खुले मैदान में प्रचार कर रहा था, कि एक मनुष्य एक शानदार घोड़ा-गाड़ी में वहाँ आ पहुँचा, और थोड़ी देर मेरी बातें सुनने के बाद उसने अपने सुन्दर घोड़े को चाबुक लगाया, और चला गया। मुझे आशा न थी कि मैं उसे फिर देखूँगा, परन्तु अगली रात वह फिर आया, और वह रात के बाद रात नियमित रूप से आता रहा।
मैंने देखा कि उसका माथा खुजला रहा था—आपने ऐसे लोगों को देखा होगा जो बार-बार अपने माथे पर हाथ रखते रहते हैं?—वह नहीं चाहता था कि कोई उसे आँसू बहाते देखे—बेशक नहीं! धार्मिक सभा में आँसू बहाना मर्दानगी की बात थोड़े ही है!
सभा के बाद मैंने एक सज्जन से कहा: “वह मनुष्य कौन है जो हर रात यहाँ गाड़ी में आता है? क्या उसकी रुचि जाग रही है?”
“रुचि! मैं तो ऐसा नहीं समझता! आपको सुनना चाहिए था कि आज वह आपके विषय में कैसी बातें कर रहा था।”
“अच्छा,” मैंने कहा, “यही इस बात का चिह्न है कि उसकी रुचि जाग रही है।”
यदि कोई कभी आपके विरुद्ध कुछ न कहे, तो आपकी मसीहियत का अधिक मूल्य नहीं। लोगों ने स्वामी के विषय में कहा, “उसमें दुष्टात्मा है,” और यीशु ने कहा कि यदि उन्होंने घर के स्वामी को बालजबूल कहा, तो उसके घरवालों को क्यों न कहेंगे।
मैंने पूछा कि यह मनुष्य कहाँ रहता है, परन्तु मेरे मित्र ने मुझसे कहा कि उससे मिलने न जाऊँ, क्योंकि वह केवल मुझे कोसेगा। मैंने कहा: “किसी मनुष्य को शाप देना परमेश्वर ही का काम है; मनुष्य तो केवल अपने ही सिर पर शाप ला सकता है।”
मैंने पता लगाया कि वह कहाँ रहता है और उससे मिलने गया। वह उस स्थान से सौ मील के भीतर सबसे धनी मनुष्य था, और उसकी एक पत्नी और सात सुन्दर बच्चे थे। जैसे ही मैं उसके फाटक पर पहुँचा, मैंने उसे सामने के दरवाज़े से बाहर आते देखा। मैं उसके पास गया और कहा: “मेरे विचार से आप श्रीमान ~ हैं?”
उसने कहा, “हाँ, महाशय; मेरा यही नाम है।” फिर वह तनकर खड़ा हो गया और पूछा—“आप क्या चाहते हैं?”
“अच्छा,” मैंने कहा, “यदि आप क्रोधित न हों, तो मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ।”
“अच्छा, क्या बात है?”
“मुझे बताया गया है कि परमेश्वर ने इस क्षेत्र के सब लोगों से बढ़कर आपको आशीष दी है; कि उसने आपको धन, एक सुन्दर मसीही पत्नी, और सात प्यारे बच्चे दिए हैं। मैं नहीं जानता कि यह सच है या नहीं, परन्तु मैंने सुना है कि बदले में उसे आपसे केवल कोसना और निन्दा ही मिलती है।” उसने कहा, “भीतर आइए; भीतर आइए।” मैं भीतर गया।
“अब,” उसने कहा, “जो आपने वहाँ बाहर कहा, वह सच है। यदि किसी की पत्नी अच्छी है तो मेरी है, और मेरे प्यारे-प्यारे बच्चों का परिवार है, और परमेश्वर मुझ पर भला रहा है। परन्तु क्या आप जानते हैं, उस दिन रात को हमारे यहाँ मेहमान आए थे, और मैंने भोजन की मेज़ पर अपनी पत्नी को गाली दी और मुझे पता भी न चला, जब तक मेहमान चले न गए। जब मेरी पत्नी ने मुझे इसके विषय में बताया तब मैंने अपने जीवन में अपने आप को जितना नीच और घृणित अनुभव किया, उतना कभी नहीं किया था। उसने कहा कि वह चाहती थी कि फ़र्श फट जाए और वह अपनी कुर्सी समेत उसमें समा जाए। मैंने कसम खाना छोड़ने का यत्न एक बार नहीं, सौ बार किया है। आप प्रचारक लोग इसके विषय में कुछ नहीं जानते।”
“जी हाँ,” मैंने कहा, “मैं इसके विषय में सब कुछ जानता हूँ; मैं घूम-घूमकर माल बेचनेवाला विक्रेता रह चुका हूँ।”
“परन्तु,” उसने कहा, “आप एक व्यापारी की परेशानियों के विषय में कुछ नहीं जानते। जब वह हर समय परेशान और सताया जाता है, तो वह कसम खाए बिना नहीं रह सकता।”
“अरे, नहीं,” मैंने कहा, “वह रह सकता है। मैं इसके विषय में कुछ जानता हूँ। मैं स्वयं कसमें खाया करता था।”
“क्या! आप कसमें खाया करते थे?” उसने पूछा। “आपने कैसे छोड़ीं?”
“मैंने कभी नहीं छोड़ीं।”
“क्यों, आप अब तो कसम नहीं खाते, खाते हैं क्या?”
“नहीं; मैंने वर्षों से कसम नहीं खाई।”
“आपने कैसे छोड़ीं?”
“मैंने कभी नहीं छोड़ीं। वे अपने आप छूट गईं।”
उसने कहा, “यह बात मेरी समझ में नहीं आती।”
“नहीं,” मैंने कहा, “मैं जानता हूँ कि आपकी समझ में नहीं आती। परन्तु मैं आपसे बात करने इसलिये आया हूँ कि आप जीवन भर फिर कभी कसम खाना न चाहें।”
मैं उसे हृदय में वास करनेवाले मसीह के विषय में बताने लगा; कि किस प्रकार वह मनुष्य के भीतर से कसम खाने की परीक्षा को निकाल देगा।
“अच्छा,” उसने कहा, “मैं मसीह को कैसे पाऊँ?”
“यहीं घुटने टेकिए और उसे बताइए कि आप क्या चाहते हैं।”
“परन्तु,” उसने कहा, “मैंने अपने जीवन में कभी घुटने नहीं टेके। मैं दिन भर कोसता रहा हूँ, और मैं नहीं जानता कि कैसे प्रार्थना करूँ या किस बात के लिये प्रार्थना करूँ।”
“अच्छा,” मैंने कहा, “जब आपने कसमों को छोड़ उसका नाम कभी लिया ही न हो, तब दया के लिये परमेश्वर को पुकारना लज्जा की बात तो है; परन्तु वह आपको लौटाएगा नहीं। यदि आप क्षमा पाना चाहते हैं तो परमेश्वर से माँगिए कि वह आपको क्षमा करे।”
तब उस मनुष्य ने घुटने टेके और प्रार्थना की—केवल थोड़े से वाक्य, परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, आखिरकार छोटी प्रार्थनाएँ ही सबसे जल्दी उत्तर पाती हैं। प्रार्थना करने के बाद वह उठा और बोला: “अब मैं क्या करूँ?”
मैंने कहा, “कलीसिया में जाइए और वहाँ के लोगों को बताइए कि आप पूरी रीति से, सच्चे मसीही बनना चाहते हैं।”
“मैं ऐसा नहीं कर सकता,” उसने कहा; “मैं किसी अन्तिम संस्कार के सिवा कभी गिरजे में नहीं जाता।”
“तो फिर अब बड़ा समय आ गया है कि आप किसी और काम के लिये जाएँ,” मैंने कहा।
कुछ देर बाद उसने जाने का वचन दिया, परन्तु वह नहीं जानता था कि लोग क्या कहेंगे। कलीसिया की अगली प्रार्थना सभा में वह मनुष्य वहाँ था, और मैं ठीक उसके सामने बैठा था। वह खड़ा हुआ और उसने अपने हाथ बेंच पर रखे, और वह इतना काँप रहा था कि मैं बेंच को हिलता हुआ अनुभव कर सकता था।
उसने कहा: “मेरे मित्रो, आप मेरे विषय में सब कुछ जानते हैं। यदि परमेश्वर मुझ जैसे अभागे पापी का उद्धार कर सकता है, तो मैं चाहता हूँ कि आप मेरे उद्धार के लिये प्रार्थना करें।”
यह तीस वर्ष से भी अधिक पहले की बात है। कुछ समय पहले मैं फिर उस नगर में गया था, और उसे नहीं देखा; परन्तु जब मैं कैलिफ़ोर्निया में था, तो एक मनुष्य ने मुझसे अपने साथ भोजन करने को कहा। मैंने उससे कहा कि मैं नहीं आ सकता, क्योंकि मेरा एक और कार्यक्रम है। तब उसने पूछा कि क्या मुझे उसकी याद है, और अपना नाम बताया। “ओह,” मैंने कहा, “मुझे बताइए, उस रात के बाद से जब आपने अपनी बैठक में घुटने टेककर परमेश्वर से क्षमा माँगी थी, क्या आपने कभी कसम खाई है?”
“नहीं,” उसने उत्तर दिया, “तब से मुझमें कसम खाने की कभी इच्छा ही नहीं हुई। वह सब जाती रही।”
उसका न केवल मन फिरा, बल्कि वह एक उत्साही, सक्रिय मसीही बन गया, और इन सब वर्षों में परमेश्वर की सेवा करता रहा है। जब कोई मनुष्य ईश्वरीय स्वभाव से जन्म लेता है तो यही होता है।
क्या कोई कसम खानेवाला मनुष्य इस आज्ञा को तराजू में रखने और तौले जाने के लिये पलड़े पर चढ़ने को तैयार है? मान लीजिए कि आप छः महीने या एक वर्ष में केवल एक बार कसम खाते हैं—मान लीजिए कि आप दस वर्ष में केवल एक बार कसम खाते हैं—क्या आप सोचते हैं कि परमेश्वर उस काम के लिये आपको निर्दोष ठहराएगा? यह दिखाता है कि परमेश्वर की दृष्टि में आपका हृदय शुद्ध नहीं है। हे निन्दा करनेवाले, आप क्या करने जा रहे हैं? क्या आप हलके न पाए जाएँगे? आप तराजू में एक पंख के समान होंगे।
