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मैं आपका ध्यान एक ऐसे पद की ओर दिलाना चाहता हूँ जो आपको उत्पत्ति के सातवें अध्याय के पहले पद में मिलेगा। जब परमेश्वर बोलता है, तो आपको और मुझे अवश्य सुनना चाहिए। यहाँ मनुष्य नहीं बोल रहा, परन्तु परमेश्वर बोल रहा है। “यहोवा ने नूह से कहा, तू अपने सारे घराने समेत जहाज़ में आ।”
शायद कोई संशयवादी इसे पढ़ रहा हो, और शायद कलीसिया का कोई सदस्य भी उसके साथ मिलकर कहे, “मैं आशा करता हूँ कि मिस्टर मूडी जहाज़ के विषय में प्रचार नहीं करने जा रहे। मैं तो समझता था कि सब समझदार लोग उस बात को कब का छोड़ चुके हैं।”
परन्तु मैं कहना चाहता हूँ कि मैंने उसे नहीं छोड़ा है। जिस दिन मैं उसे छोड़ूँगा, उस दिन मैं पूरी बाइबल को छोड़ दूँगा। पुराने नियम के पवित्रशास्त्र का शायद ही कोई भाग ऐसा हो जिस पर परमेश्वर के पुत्र ने, जब वह यहाँ इस संसार में था, अपनी मुहर न लगाई हो।
लोग कहते हैं, “मैं जल-प्रलय की कहानी पर विश्वास नहीं करता।”
मसीह ने इस संसार में अपने लौट आने को उसी जल-प्रलय से जोड़ा: “जैसा नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा। जिस दिन तक नूह जहाज़ पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उनमें ब्याह-शादी होती थी; तब जल-प्रलय ने आकर उन सब को नाश किया।”
मैं जल-प्रलय की कहानी पर उतना ही विश्वास करता हूँ जितना यूहन्ना के तीसरे अध्याय पर। मुझे हर उस मनुष्य पर तरस आता है जो इस पुरानी पुस्तक के टुकड़े-टुकड़े करने में लगा है। जिस क्षण हम इनमें से किसी एक बात को छोड़ देते हैं, उसी क्षण हम परमेश्वर के पुत्र के ईश्वरत्व पर हाथ डालते हैं। मैंने देखा है कि जब कोई मनुष्य बाइबल में से बातें छाँट-छाँटकर निकालना आरम्भ करता है, तो उसे पूरी बाइबल को चीर-फाड़ डालने में देर नहीं लगती। जो काम आप पाँच मिनट में कर सकते हैं, उसमें पाँच वर्ष लगाने से क्या लाभ?
एक गम्भीर सन्देश
मेरे इस पद के वचन कहने से एक सौ बीस वर्ष पहले परमेश्वर ने नूह को वह अत्यन्त भयानक सन्देश दिया था जो कभी स्वर्ग से पृथ्वी पर आया। उस समय तक किसी मनुष्य को, और मैं समझता हूँ कि उसके बाद भी किसी मनुष्य को, ऐसा सन्देश कभी नहीं मिला। परमेश्वर ने कहा कि संसार की दुष्टता के कारण वह संसार को जल से नाश करने पर है। जल-प्रलय से पहले की उस दुष्टता की सीमा और स्वरूप का हम कोई अनुमान नहीं लगा सकते। बाइबल उस पर ज़ोर देने के प्रयत्न में एक के ऊपर एक शब्द रखती चली जाती है। “यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है। और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ.... उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपनी-अपनी चाल-चलन बिगाड़ ली थी।” उन दिनों मनुष्य पाँच सौ वर्ष और उससे भी अधिक जीवित रहते थे, और उनके पास अपने पापों में पक जाने का पूरा समय था।
सन्देश किस प्रकार ग्रहण किया गया
एक सौ बीस वर्ष तक परमेश्वर जल-प्रलय से पहले के उन लोगों से संघर्ष करता रहा। वह बिना चेतावनी दिए कभी मार नहीं करता, और उन्हें भी चेतावनी मिली थी। हर बार जब नूह जहाज़ में कील ठोंकता था, तो वह उनके लिए एक चेतावनी थी। हथौड़े की हर चोट यही गूँजती थी, “मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ।” यदि वे पश्चाताप करते और नीनवे के लोगों की तरह दोहाई देते, तो मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर उनकी दोहाई सुनता और उन्हें बचा लेता। परन्तु दया के लिए कोई दोहाई नहीं उठी। मुझे कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने इस विचार की हँसी उड़ाई होगी कि परमेश्वर संसार को नाश करने पर है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि उनमें नास्तिक भी रहे होंगे जो कहते थे कि परमेश्वर तो है ही नहीं। कुछ समय पहले ऐसा ही एक व्यक्ति मेरे हाथ लगा। मैंने उससे कहा, “संसार की रचना को आप कैसे समझाते हैं?”
“ओह! बल और पदार्थ मिलकर काम करते हैं, और संयोग से संसार बन गया।”
मैंने कहा, “यह बड़ी अनोखी बात है कि यदि बल और पदार्थ ने आपको उसी ढंग से यूँ ही जोड़-जाड़ दिया, तो आपकी जीभ आपके सिर के ऊपर नहीं लगी।”
यदि मैं अपनी घड़ी निकालकर कहूँ कि बल और पदार्थ ने मिलकर काम किया और यह घड़ी बनकर निकल आई, तो आप कहेंगे कि मैं अव्वल दर्जे का पागल हूँ। कहेंगे न? और फिर भी वे कहते हैं कि यह पुराना संसार संयोग से बन गया! “यह अपने आप जुड़ गया!”
स्कॉटलैंड में मुझे एक मनुष्य मिला, जिसका पक्ष यह था कि परमेश्वर है ही नहीं। मैंने उससे पूछा, “सृष्टि को, इन सब चट्टानों को आप कैसे समझाते हैं?” (स्कॉटलैंड में चट्टानें बहुत हैं।) “क्यों!” उसने कहा, “इसे तो स्कूल का कोई भी लड़का समझा सकता है।”
“अच्छा, तो पहली चट्टान कैसे बनी?”
“रेत से।”
“पहली रेत कैसे बनी?”
“चट्टान से।”
देखिए, उसने सब कुछ कितनी सफ़ाई से सजा रखा था। रेत और चट्टान, चट्टान और रेत। मुझे कोई सन्देह नहीं कि नूह को भी ऐसे ही लोगों से जूझना पड़ा होगा।
फिर एक वर्ग अज्ञेयवादियों का था, और उनके बहुत-से नाती-पोते आज भी जीवित हैं। फिर एक और वर्ग था जो कहता था कि वे मानते हैं कि परमेश्वर है; वे अपने आप को यह विश्वास नहीं दिला सकते थे कि संसार संयोग से बन गया; परन्तु परमेश्वर इतना दयालु है कि वह पाप का दण्ड नहीं देगा। वह करुणा और प्रेम से इतना भरा है कि वह पाप का दण्ड दे ही नहीं सकता। पियक्कड़, वेश्या, जुआरी, हत्यारा, चोर और व्यभिचारी, सब के सब अन्त में पवित्र लोगों के साथ बराबर का भाग पाएँगे। मान लीजिए कि आपके राज्य का गवर्नर इतना कोमल-हृदय हो कि वह किसी मनुष्य को दुःख उठाते न सह सके, किसी मनुष्य को जेल में डाला जाता न देख सके, और वह जाकर सब क़ैदियों को छोड़ दे। वह कितने दिन गवर्नर रहेगा? सूरज डूबने से पहले ही आप उसे पद से हटा देंगे। यही लोग जो परमेश्वर की दया की बातें करते हैं, सबसे पहले उस गवर्नर के विरुद्ध आवाज़ उठाएँगे जो किसी मनुष्य को, उसके अपराध करने पर भी, जेल में न डलवाए।
फिर एक और वर्ग का पक्ष यह था कि परमेश्वर संसार को किसी भी प्रकार नाश नहीं कर सकता। हो सकता है कि कोई बड़ी बाढ़ आए जो चरागाहों और निचली भूमि तक चढ़ आए, परन्तु तब केवल इतना करना होगा कि पहाड़ियों और पहाड़ों पर चढ़ जाएँ। वह नूह के जहाज़ से सौ गुना अच्छा होगा। या यदि बात वहाँ तक पहुँच भी जाए, तो वे बेड़े बना सकते थे, जो उस जहाज़ से कहीं अच्छे होंगे। उन्होंने ऐसी भद्दी दिखने वाली चीज़ कभी नहीं देखी थी। वह लगभग पाँच सौ फ़ुट लम्बा, लगभग अस्सी फ़ुट चौड़ा और पचास फ़ुट ऊँचा था। उसमें तीन खण्ड थे, और केवल एक छोटी-सी खिड़की।
और फिर, मैं समझता हूँ कि एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसका पक्ष यह था कि नूह अवश्य ग़लत है क्योंकि वह इतने अल्पमत में है। आप जानते हैं, आज भी यह एक बड़ा तर्क है। नूह बहुत ही अल्पमत में था। परन्तु वह काम करता चला गया।
यदि उन दिनों शराबख़ाने थे, और मुझे सन्देह नहीं कि थे, क्योंकि हम पढ़ते हैं कि “पृथ्वी उपद्रव से भर गई थी,” और जहाँ कहीं शराब होती है वहाँ उपद्रव होता है। हम यह भी पढ़ते हैं कि नूह ने दाख की बारी लगाई और मदिरा के अति-सेवन के पाप में पड़ गया। वह एक धर्मी मनुष्य था, और यदि उसने ऐसा किया, तो दूसरों ने क्या कुछ न किया होगा? अच्छा, यदि उनके यहाँ शराबख़ाने थे, तो निस्सन्देह वे नूह और उसके जहाज़ के विषय में अश्लील गीत गाते होंगे, और यदि उनके यहाँ नाट्यशालाएँ थीं तो सम्भवतः वे उसका नाटक खेलते होंगे, और माताएँ अपने बच्चों को उसे दिखाने ले जाती होंगी।
और यदि उन दिनों अख़बार होते, तो रह-रहकर “नूह और उसकी मूर्खता” पर कोई व्यंग्य छपता। संवाददाता आकर उससे भेंटवार्ता करते, और यदि उनके यहाँ कोई एसोसिएटेड प्रेस होती, तो हर कुछ दिनों में एक समाचार भेजा जाता कि जहाज़ का काम कैसे आगे बढ़ रहा है।
और शायद वे सैर-सपाटे की यात्राएँ भी करवाते, और यह प्रलोभन देते कि लोग जहाज़ के भीतर घूमकर देख सकते हैं। और यदि नूह संयोग से आसपास होता तो वे एक-दूसरे को कोहनी मारकर कहते: “वह देखो नूह। क्या तुम्हें नहीं लगता कि उसकी आँखों में कुछ अजीब-सा भाव है?”
जैसा कोई स्कॉटलैंडवासी कहेगा, वे उसे थोड़ा सनकी समझते थे। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि मनुष्य पागल कहलाना सह सकता है। पागल मनुष्य अपने को छोड़ सब को पागल समझता है। पियक्कड़ जब अपनी सारी पूँजी पी जाता है, तब अपने आप को पागल नहीं कहता। वे लोग जो खड़े होकर मनुष्यों में मृत्यु और विनाश बाँटते हैं, पागल नहीं कहलाते; परन्तु जब कोई मनुष्य जहाज़ में प्रवेश करता है, और समय और अनन्तकाल दोनों के लिए उद्धार पाता है, तो वह पागल कहलाता है। और मैं समझता हूँ कि यदि उन दिनों “सनकी” शब्द चलन में होता, तो वे नूह को “बूढ़ा सनकी” कहते।
और इस प्रकार नूह और उसके जहाज़ का हर प्रकार से उपहास किया गया। और व्यापारी लोग ख़रीदते-बेचते रहे, और नूह प्रचार और परिश्रम करता रहा। शायद उनमें कुछ खगोलशास्त्री भी थे, और वे तारों की ओर ताकते हुए कहते थे, “तुम चिन्ता मत करो। आकाश में किसी आनेवाले तूफ़ान का कोई चिह्न नहीं है। हम बड़े बुद्धिमान लोग हैं, और यदि कोई तूफ़ान आनेवाला होता, तो हम उसे आकाश में पढ़ लेते।” और उनके भूगर्भशास्त्री खुदाई में लगे थे, और उन्होंने कहा, “पृथ्वी में कोई चिह्न नहीं है।” यहाँ तक कि जिन बढ़इयों ने जहाज़ बनाने में सहायता की, उन्होंने भी शायद उसका मज़ाक उड़ाया हो, परन्तु वे आज के बहुत-से लोगों के समान थे, जो गिरजाघर बनाने में सहायता तो करेंगे, और शायद उसके खर्च के लिए पैसा भी देंगे, परन्तु स्वयं उसमें कभी प्रवेश नहीं करेंगे।
अच्छा, सब कुछ सदा की तरह चलता रहा। हर वसन्त में छोटे-छोटे मेमने पहाड़ियों की ढलानों पर उछलते-कूदते रहे। मनुष्य धन के पीछे दौड़ते रहे, और यदि उनके यहाँ पट्टे होते थे, तो मैं समझता हूँ कि वे हमारे पट्टों से कहीं लम्बी अवधि के होते थे। हम निन्यानबे वर्ष को लम्बा समय समझते हैं, परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि उनके पट्टे नौ सौ निन्यानबे वर्ष के होते थे। और जब वे पट्टे पर हस्ताक्षर करने आते, तो आँखें मटकाते हुए कहते: “अरे, यह बूढ़ा नूह कहता है कि एक सौ बीस वर्ष में संसार का अन्त होने वाला है, और उसे यह कहानी शुरू किए बीस वर्ष हो चुके हैं। परन्तु मैं समझता हूँ कि मैं पट्टे पर हस्ताक्षर कर ही देता हूँ और जोखिम उठा लेता हूँ।”
किसी ने कहा है कि नूह अवश्य बहरा रहा होगा, नहीं तो वह अपने देशवासियों के ताने और उपहास सह न पाता। परन्तु यदि वह मनुष्यों की आवाज़ के लिए बहरा था, तो भी उसने परमेश्वर की आवाज़ सुनी जब उसने उससे जहाज़ बनाने को कहा।
मैं कल्पना कर सकता हूँ कि सौ वर्ष बीत गए हैं, और जहाज़ का काम रुक गया है। लोग कहते हैं, “उसने काम क्यों रोक दिया है?” वह प्रचार-यात्रा पर निकल गया है, कि लोगों को आनेवाले तूफ़ान के विषय में बताए—कि परमेश्वर पृथ्वी पर से हर मनुष्य को मिटा देने पर है, जब तक कि वह जहाज़ में न हो। परन्तु अपने ही परिवार को छोड़ वह एक भी मनुष्य को अपनी बात का विश्वास नहीं दिला पाता। कुछ बूढ़े लोग चल बसे हैं, और वे यह कहते हुए मरे: “नूह ग़लत है।” बेचारा नूह! उसे बड़ी कठिनाई झेलनी पड़ी होगी। मैं नहीं समझता कि मुझमें एक सौ बीस वर्ष तक एक भी मन फिराने वाले के बिना काम करते रहने का अनुग्रह होता। परन्तु वह परमेश्वर के वचन पर विश्वास करते हुए बस परिश्रम करता चला गया।
और अब एक सौ बीस वर्ष पूरे हो गए हैं। उस वर्ष वसन्त ऋतु में नूह ने कुछ नहीं बोया, क्योंकि वह जानता था कि जल-प्रलय आ रहा है, और लोग कहते हैं: “इससे पहले हर वर्ष वह बोता रहा है, परन्तु इस वर्ष वह सोचता है कि संसार नाश होने वाला है, और उसने कुछ भी नहीं बोया।”
भीतर जाना
परन्तु मैं कल्पना कर सकता हूँ कि एक सुहावनी सुबह, जब कहीं एक भी बादल दिखाई नहीं देता, नूह को उसका सन्देश मिला है। उसने वही आवाज़ सुनी है जो उसने एक सौ बीस वर्ष पहले सुनी थी—वही पुरानी आवाज़। शायद एक सौ बीस वर्ष तक सन्नाटा रहा था। परन्तु वह आवाज़ एक बार फिर उसके प्राण में गूँज उठी, “नूह, तू अपने सारे घराने समेत जहाज़ में आ।”
कहा जाता है कि “आ” शब्द बाइबल में लगभग उन्नीस सौ बार आता है, और यह पहली बार है। इसका अर्थ था उद्धार। आप नूह और उसके सारे परिवार को जहाज़ में जाते देख सकते हैं। वे घर का सामान ला रहे हैं।
उसके कुछ पड़ोसी कहते हैं, “नूह, इतनी जल्दी क्या है? उस पुराने जहाज़ में घुसने के लिए तुम्हारे पास बहुत समय होगा। इतनी जल्दी क्या है? उसमें कोई खिड़कियाँ तो हैं नहीं, और तुम बाहर झाँककर देख भी नहीं सकोगे कि तूफ़ान कब आ रहा है।” परन्तु उसने वह आवाज़ सुनी और आज्ञा मानी।
उसके कुछ सम्बन्धियों ने शायद कहा हो, “पुश्तैनी घर-बार का तुम क्या करोगे?”
नूह कहता है, “मुझे उसकी आवश्यकता नहीं। तूफ़ान आ रहा है।” वह उनसे कहता है कि अनुग्रह का दिन समाप्त हो रहा है, कि सांसारिक धन का कोई मूल्य नहीं, और कि जहाज़ ही सुरक्षा का एकमात्र स्थान है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि ये रेल-मार्ग, जिनको हम इतना बड़ा समझते हैं, शीघ्र ही मिट जाएँगे; वे केवल समय के लिए चलते हैं, अनन्तकाल के लिए नहीं। आकाश में आग लगेगी, और तब सम्पत्ति, सम्मान और समाज में पद का क्या मूल्य रह जाएगा?
पहली बात जो उन्हें घबरा देती है, यह है कि वे एक सुबह उठते हैं, और देखो! आकाश पक्षियों से भरा है। वे दो-दो करके जहाज़ में उड़े जा रहे हैं। वे जंगल-बियाबान से आते हैं; वे पहाड़ों से आते हैं; वे संसार के सब भागों से आते हैं। वे जहाज़ में जा रहे हैं। वह अवश्य एक विचित्र दृश्य रहा होगा। मैं लोगों को चिल्लाते सुन सकता हूँ, “हे महान परमेश्वर! इसका क्या अर्थ है?” और वे नीचे पृथ्वी की ओर देखते हैं; और बड़े भय और आश्चर्य के साथ देखते हैं कि छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े दो-दो करके रेंगते हुए, संसार के सब भागों से आ रहे हैं। फिर देखो! गाय-बैल और पशु दो-दो करके आ रहे हैं। पड़ोसी चिल्ला उठते हैं, “इसका क्या अर्थ है?” वे अपने राजनेताओं और बुद्धिमानों के पास दौड़ते हैं, जिन्होंने उनसे कहा था कि किसी आनेवाले तूफ़ान का कोई चिह्न नहीं है, और उनसे पूछते हैं कि ये पक्षी, पशु और रेंगनेवाले जन्तु जहाज़ की ओर ऐसे क्यों जा रहे हैं, मानो किसी अदृश्य हाथ से चलाए जा रहे हों।
“अच्छा,” राजनेता और बुद्धिमान कहते हैं, “हम इसे समझा नहीं सकते; परन्तु तुम अपने आप को परेशान मत करो; परमेश्वर संसार को नाश करने वाला नहीं है। व्यापार इतना अच्छा कभी नहीं रहा जितना अब है। क्या तुम समझते हो कि यदि परमेश्वर संसार को नाश करने वाला होता, तो वह हमें इस प्रकार फलने-फूलने देता जैसा उसने दिया है? किसी आनेवाले तूफ़ान का कोई चिह्न नहीं है। इन रेंगनेवाले कीड़ों और वन के इन जंगली पशुओं को किस बात ने जहाज़ में जाने को प्रेरित किया, हम नहीं जानते। हम इसे समझ नहीं पाते; यह बड़ा विचित्र है। परन्तु किसी अनहोनी के होने का कोई चिह्न नहीं है। तारे चमक रहे हैं, और सूरज सदा की तरह चमक रहा है। सब कुछ वैसे ही चल रहा है जैसे बीते सारे युगों से चलता आया है। आप सड़कों पर बच्चों को खेलते सुन सकते हैं। आप देश में दूल्हे और दुल्हन का शब्द सुन सकते हैं, और सब कुछ सदा की तरह आनन्दमय है।”
मैं कल्पना करता हूँ कि वह घबराहट जाती रही, और वे अपने नित्य के कामों में लग गए। नूह बाहर आकर कहता है: “द्वार बन्द होने वाला है। भीतर आ जाओ। परमेश्वर संसार को नाश करने पर है। इन पशुओं को देखो, वे कैसे आ गए हैं। उन्हें सीधे स्वर्ग से सन्देश मिला है।” परन्तु लोग ठट्ठा ही करते रहे।
क्या आप जानते हैं कि जब एक सौ बीस वर्ष पूरे हो गए, तो परमेश्वर ने संसार को सात दिन का अनुग्रह-काल और दिया? क्या आपने कभी इस पर ध्यान दिया? यदि उन सात दिनों में कोई दोहाई उठती, तो मैं विश्वास करता हूँ कि वह सुनी जाती। परन्तु कोई दोहाई नहीं उठी।
अन्त में अन्तिम दिन आ पहुँचा, अन्तिम घड़ी, अन्तिम मिनट, हाँ! अन्तिम क्षण। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने नीचे आकर उस जहाज़ का द्वार बन्द कर दिया। किसी स्वर्गदूत ने नहीं, किसी मनुष्य ने नहीं, परन्तु स्वयं परमेश्वर ने वह द्वार बन्द किया, और जब घर का स्वामी एक बार उठकर द्वार बन्द कर चुका, तो संसार के विनाश पर मुहर लग जाती है; और उस पुराने संसार के विनाश पर सदा के लिए मुहर लग गई। उस पुराने संसार की महिमा पर सूरज अन्तिम बार डूब चुका था। आप दूर कहीं तूफ़ान की गड़गड़ाहट सुन सकते हैं। आप बादलों का गरजना सुन सकते हैं। बिजली चमकने लगती है, और पुराना संसार डगमगाने लगता है। तूफ़ान उन पर टूट पड़ता है, और नूह का वह पुराना जहाज़ उनके लिए सारे संसार से बढ़कर मूल्यवान हो गया होता।
जो कोई ठट्ठा करने वाला इसे पढ़ रहा है, उससे मैं कहना चाहता हूँ कि आप बाइबल पर हँस सकते हैं, आप अपनी माता के परमेश्वर का ठट्ठा उड़ा सकते हैं, आप पादरियों और मसीहियों पर हँस सकते हैं, परन्तु वह घड़ी आ रही है जब उस पुरानी पुस्तक की एक प्रतिज्ञा आपके लिए ऐसे दस हज़ार संसारों से बढ़कर मूल्यवान होगी।
आकाश के झरोखे खुल गए हैं और बड़े गहिरे समुद्र के सब सोते फूट निकले हैं। जल उबलता हुआ ऊपर आता है, और समुद्र अपनी सीमाएँ तोड़कर अपनी दीवारों के ऊपर से उछल पड़ता है। नदियाँ उमड़ने लगती हैं। निचली भूमि में रहने वाले लोग पहाड़ों और ऊँचे स्थानों की ओर भागते हैं। वे पहाड़ियों की ढलानों पर चढ़ते भागते हैं। और एक विलाप ऊपर उठ रहा है: “नूह! नूह! नूह! हमें भीतर आने दे।”
अब वे अपने घर छोड़कर जहाज़ के पास आते हैं। वे जहाज़ को पीटते हैं। उन्हें चिल्लाते सुनिए: “नूह! हमें भीतर आने दे। नूह! हम पर दया कर।”
“मैं तेरा भतीजा हूँ।”
“मैं तेरी भतीजी हूँ।”
“मैं तेरा चाचा हूँ।”
आह, भीतर से एक आवाज़ आती है, जो कहती है: “मैं तुम्हें भीतर आने देना चाहता हूँ; परन्तु परमेश्वर ने द्वार बन्द कर दिया है, और मैं उसे खोल नहीं सकता!”
परमेश्वर ने वह द्वार बन्द किया! जब द्वार बन्द हो जाता है, तब कोई आशा नहीं रहती। दया के लिए उनकी दोहाई बहुत देर से उठी; उनका अनुग्रह का दिन समाप्त हो चुका था। उनकी अन्तिम घड़ी आ चुकी थी। परमेश्वर ने उनसे विनती की थी; परमेश्वर ने उन्हें भीतर आने का निमन्त्रण दिया था; परन्तु उन्होंने उस निमन्त्रण का ठट्ठा किया था। उन्होंने जल-प्रलय के विचार का उपहास और मज़ाक उड़ाया था। अब बहुत देर हो चुकी है।
परमेश्वर ने किसी को जीवित नहीं बचने दिया कि वह हमें बताए कि वे कैसे नाश हुए। जब अय्यूब ने अपना परिवार खोया, तो एक दूत उसके पास आया: परन्तु जल-प्रलय से पहले के लोगों की ओर से कोई दूत नहीं आया; स्वयं नूह भी संसार को नाश होते नहीं देख सका। यदि वह देख पाता, तो वह देखता कि पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे उस जहाज़ से टकरा रहे हैं; लहरें ऊँची और ऊँची उठ रही हैं, और बाहर के लोग नाश हो रहे हैं, अविश्वास में मर रहे हैं। कुछ लोग पेड़ों पर चढ़कर बच निकलने की सोचते हैं, और सोचते हैं कि तूफ़ान जल्दी थम जाएगा; परन्तु वर्षा दिन और रात, चालीस दिन और चालीस रात होती रहती है, और लहरों के थपेड़ों से वे बह जाते हैं। राजनेता और खगोलशास्त्री और बड़े-बड़े लोग दया की दोहाई देते हैं; परन्तु बहुत देर हो चुकी है। उन्होंने दया के परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानी थी। उसने बुलाया था, और उन्होंने इनकार किया था। उसने उनसे विनती की थी, परन्तु वे हँसे थे और ठट्ठा किया था। परन्तु अब दया के स्थान पर न्याय का समय आ पहुँचा है।
न्याय
फिर वह समय आ रहा है जब परमेश्वर संसार के साथ न्याय से व्यवहार करेगा। अब थोड़ा ही समय रह गया है; हम नहीं जानते कि कब, परन्तु वह निश्चय आएगा। परमेश्वर का वचन निकल चुका है कि यह संसार पत्री की नाईं लपेटा जाएगा, और उसमें आग लगेगी। तब आपके प्राण का क्या होगा? यह प्रेम भरा बुलावा है, “अब तू अपने सारे घराने समेत जहाज़ में आ।” वर्षा आरम्भ होने से चौबीस घण्टे पहले, यदि नूह का जहाज़ नीलाम किया जाता, तो उसका दाम उतना भी न मिलता जितना जलाने की लकड़ी के रूप में उसका मूल्य होता। परन्तु वर्षा आरम्भ होने के चौबीस घण्टे बाद, नूह का जहाज़ सारे संसार से बढ़कर मूल्यवान था। तब ऐसा कोई मनुष्य जीवित न था जो जहाज़ में एक स्थान पाने के लिए अपना सब कुछ न दे देता। आप मुँह फेरकर हँस सकते हैं।
“मैं मसीह पर विश्वास करूँ!” आप कहते हैं; “मैं उसे पाने से अच्छा उसके बिना रहना पसन्द करूँगा।”
परन्तु ध्यान रखिए, वह समय आ रहा है जब मसीह आपके लिए ऐसे दस हज़ार संसारों से बढ़कर मूल्यवान होगा। ध्यान रखिए कि वह अभी आपको दिया जा रहा है। यह अनुग्रह का दिन है; यह दया का दिन है। यदि आप अपनी बाइबल ध्यान से पढ़ेंगे, तो आप पाएँगे कि परमेश्वर न्याय से पहले सदा अनुग्रह भेजता है। अनुग्रह न्याय का अग्रदूत है। उसने नूह के दिनों में उन लोगों को प्रेम से बुलाया। यदि वे उन एक सौ बीस वर्षों में पश्चाताप करते तो उद्धार पा जाते। जब मसीह यरूशलेम के लोगों से विनती करने आया, तो वह उनका अनुग्रह का दिन था; परन्तु उन्होंने उसका ठट्ठा किया और उस पर हँसे। उसने कहा: “हे यरूशलेम, हे यरूशलेम; तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैंने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठा कर लूँ, परन्तु तुम ने न चाहा!” चालीस वर्ष बाद, हज़ारों लोगों ने गिड़गिड़ाकर अपने प्राणों की भीख माँगी; और उस नगर में ग्यारह लाख लोग नाश हुए।
1857 में इस देश पर एक जागृति फैल गई, पूर्व में आरम्भ होकर पश्चिमी नगरों तक, और ठेठ प्रशान्त महासागर के तट तक। यह परमेश्वर था जो राष्ट्र को अपनी ओर बुला रहा था। उस समय पाँच लाख लोग कलीसिया से जुड़े। फिर युद्ध छिड़ गया। 1857 में हमें पवित्र आत्मा का बपतिस्मा मिला, और 1861 में हमें लहू का बपतिस्मा मिला। वह दया का बुलावा था, जो न्याय से पहले आया।
क्या आपके बच्चे सुरक्षित हैं?
जो पद मैंने चुना है वह मसीही लोगों और माता-पिता पर विशेष रूप से लागू होता है। पवित्रशास्त्र की यह आज्ञा नूह को केवल उसकी अपनी सुरक्षा के लिए नहीं, परन्तु उसके घराने की सुरक्षा के लिए भी दी गई थी, और जो प्रश्न मैं हर पिता और हर माता से पूछता हूँ वह यह है: “क्या आपके बच्चे परमेश्वर के जहाज़ में हैं?” आप इसका ठट्ठा कर सकते हैं, परन्तु यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या आपके सब बच्चे भीतर हैं? क्या आपके सब नाती-पोते भीतर हैं? जब तक आप अपने बच्चों को भीतर न ले आएँ, तब तक दिन-रात चैन से न बैठिए। मैं विश्वास करता हूँ कि जहाँ मेरे सामने एक परीक्षा थी, वहाँ मेरे बच्चों के सामने पचास परीक्षाएँ हैं। मैं उन लोगों में से हूँ जो मानते हैं कि बड़े नगरों में हर सड़क के कोने पर हमारे बेटे-बेटियों के लिए एक फन्दा बिछा है; और मैं नहीं मानता कि हमारा काम अपना समय बॉण्ड और शेयर जमा करने में बिताना है। क्या मैंने अपने बच्चों को भीतर लाने के लिए जो कुछ मैं कर सकता हूँ, सब किया है? बात यही है।
अब, मैं एक और प्रश्न पूछता हूँ: जब परमेश्वर ने नूह को जहाज़ में बुलाया, तब यदि उसके बच्चे उसके साथ न जाते, तो नूह के मन पर क्या बीतती? यदि उसने ऐसा झूठा जीवन जिया होता कि उसके बच्चों को उसकी बात पर कोई विश्वास न रहता, तो उसे कैसा लगता? वह कहता: “वह रहा मेरा बेचारा बेटा पहाड़ पर। भला होता कि मैं उसके बदले मर जाता! उसके नाश होने से अच्छा तो यह होता कि मैं नाश हो जाता।” दाऊद अपने बेटे के लिए रोया: “हाय मेरे बेटे अबशालोम! मेरे बेटे, हाय! मेरे बेटे अबशालोम! भला होता कि मैं आप तेरी सन्ती मरता!” नूह अपने बच्चों से प्रेम करता था, और उन्हें उस पर भरोसा था।
कई वर्ष पहले किसी ने मुझे एक समाचार-पत्र भेजा, जिसमें एक लेख पर निशान लगा था। उसका शीर्षक था: “क्या सब बच्चे भीतर आ गए?” एक बूढ़ी पत्नी मरणासन्न पड़ी थी। उसकी आयु लगभग सौ वर्ष थी, और उसका पति, जिसने जीवन-यात्रा उसके साथ तय की थी, उसके पास बैठा था। वह बस धीमे-धीमे साँस ले रही थी, परन्तु अचानक उसमें जान-सी आ गई, उसने आँखें खोलीं, और कहा: “अरे! अँधेरा है।”
“हाँ, जैनेट, अँधेरा है।”
“क्या रात हो गई?”
“हाँ! आधी रात है।”
“क्या सब बच्चे भीतर आ गए?”
वह बूढ़ी माँ फिर से अपना जीवन जी रही थी। उसकी सबसे छोटी सन्तान को क़ब्र में गए बीस वर्ष हो चुके थे, परन्तु वह पुराने दिनों में लौट रही थी, और यह पूछते हुए वह मसीह में सो गई, “क्या सब बच्चे भीतर आ गए?”
प्रिय मित्र, क्या वे सब भीतर हैं? अभी अपने आप से यह प्रश्न कीजिए। क्या जॉन भीतर है? क्या जेम्स भीतर है? या वह व्यापार और भोग-विलास में डूबा है? क्या वह दोहरा और बेईमानी का जीवन जी रहा है? बताइए! हे माता, आपका लड़का कहाँ है? आपका बेटा, आपकी बेटी कहाँ है? क्या आपके बच्चे कुशल से हैं? क्या आप कह सकती हैं कि हैं?
शिकागो में कई वर्षों तक एक सण्डे स्कूल का अधीक्षक रहने के बाद—एक हज़ार से अधिक सदस्यों का स्कूल, ऐसे बच्चे जो भक्तिहीन घरों से आते थे, जिनकी माताएँ और पिता मेरे विरुद्ध काम करते थे, रविवार को बच्चों को सैर-सपाटे पर ले जाते थे, और जो काम मैं करने का प्रयत्न कर रहा था उसे तोड़ने के लिए जो कुछ कर सकते थे सब करते थे—मैं सोचा करता था कि यदि मैं कभी किसी श्रोतागण के सामने खड़ा हुआ, तो मैं माता-पिता को छोड़ और किसी से बात न करूँगा; यही मेरा मुख्य काम होगा। एक पुरानी कहावत है—“मेमने को पकड़ो, तो भेड़ भी पकड़ में आ जाएगी।” मैंने बरसों पहले उस बात को छोड़ दिया। मुझे भेड़ दो, तब मेरे पास मेमने की देखभाल करने वाला कोई होगा; परन्तु किसी मेमने को पकड़कर उसका मन फिराओ, और यदि उसके पिता और माता भक्तिहीन हैं, तो उस बच्चे के साथ आपकी सफलता की सम्भावना बहुत कम रहेगी। हमें जिसकी आवश्यकता है वह है भक्तिपूर्ण घर। घर की स्थापना कलीसिया से बहुत पहले हुई थी।
मैं इस विचार से कोई सहमति नहीं रखता कि हमारे बच्चों को मन फिराने से पहले बड़ा हो जाना चाहिए। एक बार मैंने एक महिला को देखा जिसके साथ उसकी तीन बेटियाँ थीं, और मैंने उसके पास जाकर पूछा कि क्या वह मसीही है।
“हाँ, महाशय।”
फिर मैंने सबसे बड़ी बेटी से पूछा कि क्या वह मसीही है। उसकी ठोड़ी काँपने लगी, और उसकी आँखों में आँसू आ गए, और उसने कहा, “काश मैं होती।”
माँ ने बड़े क्रोध से मेरी ओर देखा और कहा, “मैं नहीं चाहती कि आप मेरे बच्चों से इस विषय पर बात करें। वे नहीं समझतीं।” और बड़े रोष में वह उन सब को मेरे पास से ले गई। एक बेटी चौदह वर्ष की थी, एक बारह की, और तीसरी दस की, परन्तु वे इतनी बड़ी नहीं थीं कि उनसे धर्म के विषय में बात की जाए। उन्हें संसार में बह जाने दीजिए और सांसारिक मनोरंजन में डूब जाने दीजिए, और फिर देखिए कि उन तक पहुँचना कितना कठिन है। आज बहुत-सी माताएँ शोक कर रही हैं क्योंकि उनका लड़का उनकी पहुँच से बाहर चला गया है, और उन्हें अपने साथ प्रार्थना नहीं करने देता। वह उसके लिए प्रार्थना कर सकती है, परन्तु वह उसे अपने साथ प्रार्थना या बात नहीं करने देता। उन आरम्भिक दिनों में जब उसका मन कोमल और कच्चा था, वह उसे मसीह के पास ला सकती थी। उन्हें भीतर ले आइए। “बालकों को मेरे पास आने दो।” क्या कोई प्रार्थनाहीन पिता इसे पढ़ रहा है? परमेश्वर करे कि यह तीर आपके प्राण में उतर जाए! मन में ठान लीजिए कि परमेश्वर की सहायता से आप बच्चों को भीतर ले आएँगे। परमेश्वर का क्रम यह है कि पहले पिता की ज़िम्मेदारी है, परन्तु यदि वह अपने कर्तव्य के प्रति सच्चा न हो, तो माता को सच्चा होना चाहिए, और बच्चों को विनाश से बचाना चाहिए। उसे करने का समय अभी है, जब तक वे आपकी छत के नीचे हैं। उन पर अपने माता-पिता होने के प्रभाव का प्रयोग कीजिए।
जब भी मैं माता-पिता से बात करता हूँ, मुझे दो पिताओं का स्मरण हो आता है, जिनमें से एक मिसिसिपी के किनारे रहता था, और दूसरा न्यूयॉर्क में। पहले ने अपना सारा समय धन बटोरने में लगा दिया। उसका एक बेटा था जिससे वह बहुत प्रेम करता था, और एक दिन वह लड़का बुरी तरह घायल होकर घर लाया गया। पिता को बताया गया कि लड़का थोड़ी ही देर जीवित रह सकता है, और उसने जितनी कोमलता से हो सका, यह समाचार अपने बेटे को सुनाया।
“आप कहते हैं कि मैं जीवित नहीं रह सकता, पिताजी? ओह! तो मेरे प्राण के लिए प्रार्थना कीजिए,” लड़के ने कहा।
उन सारे वर्षों में उस पिता ने उस लड़के के लिए कभी एक भी प्रार्थना नहीं की थी, और उसने उससे कहा कि वह नहीं कर सकता। थोड़ी ही देर बाद लड़का मर गया। तब से वह पिता कहता आया है कि यदि वह उस लड़के को केवल उसके लिए एक छोटी-सी प्रार्थना करने के लिए वापस बुला सकता, तो वह अपना सब कुछ दे देता।
दूसरे पिता का एक लड़का था जो कुछ समय से बीमार था, और एक दिन वह घर आया तो उसने अपनी पत्नी को रोते पाया। उसने कहा: “मैं यह माने बिना नहीं रह सकती कि यह बीमारी प्राणघातक सिद्ध होगी।”
वह आदमी चौंक उठा, और बोला: “यदि तुम ऐसा समझती हो, तो अच्छा हो कि तुम उसे बता दो।”
परन्तु माँ अपने लड़के को बता न सकी। पिता बीमार के कमरे में गया, और उसने देखा कि मृत्यु जीवन के तारों को टटोल रही है, और उसने कहा: “मेरे बेटे, क्या तुम जानते हो कि तुम जीवित नहीं रहोगे?”
नन्हे बालक ने ऊपर देखकर कहा: “नहीं; क्या यह मृत्यु है जो मुझ पर चुपके से छाती जा रही है? क्या मैं आज मर जाऊँगा?”
“हाँ, मेरे बेटे, तुम आज का दिन पूरा नहीं कर पाओगे।”
और नन्हा बालक मुस्कुराया और बोला: “अच्छा, पिताजी, तो मैं आज रात यीशु के साथ रहूँगा, है न?”
“हाँ, तुम आज की रात प्रभु के साथ बिताओगे,” और पिता का मन भर आया और वह रो पड़ा।
नन्हे बालक ने आँसू देखे, और कहा: “मेरे लिए मत रोइए। मैं यीशु के पास जाकर उससे कहूँगा कि जब से मुझे याद है, आप मेरे लिए प्रार्थना करते आए हैं।”
मेरे तीन बच्चे हैं, और यदि परमेश्वर उन्हें मुझसे ले ले, तो मैं सारे संसार का धन पाने से बढ़कर यह चाहूँगा कि वे ऐसा ही सन्देश लेकर उसके पास घर जाएँ। ओह! भला होता कि मैं कुछ ऐसा कह पाता जो आपको, हे पिताओ और माताओ, अपने बच्चों को जहाज़ में ले आने के लिए उभार दे।
