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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
अब यदि हमें जय पानी है, तो हमें भीतर से आरम्भ करना होगा। परमेश्वर सदा वहीं से आरम्भ करता है। गढ़ के भीतर का शत्रु बाहर के शत्रु से कहीं अधिक खतरनाक होता है।
पवित्रशास्त्र सिखाता है कि हर एक विश्वासी में दो स्वभाव हैं जो एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। पौलुस रोमियों को लिखी अपनी पत्री में कहता है:—“क्योंकि हम जानते हैं कि व्यवस्था तो आत्मिक है, परन्तु मैं शरीरिक और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ। और जो मैं करता हूँ, उस को नहीं जानता, क्योंकि जो मैं चाहता हूँ, वह नहीं किया करता, परन्तु जिस से मुझे घृणा आती है, वही करता हूँ। और यदि, जो मैं नहीं चाहता वही करता हूँ, तो मैं मान लेता हूँ कि व्यवस्था भली है। तो ऐसी दशा में उसका करनेवाला मैं नहीं, वरन पाप है, जो मुझ में बसा हुआ है। क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझ में अर्थात मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते। क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ। परन्तु यदि मैं वही करता हूँ, जिस की इच्छा नहीं करता, तो उसका करनेवाला मैं न रहा, परन्तु पाप जो मुझ में बसा हुआ है। सो मैं यह व्यवस्था पाता हूँ कि जब भलाई करने की इच्छा करता हूँ, तो बुराई मेरे पास आती है। क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ। परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है, और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है।” फिर गलातियों को लिखी पत्री में वह कहता है: “क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।”
जब हम परमेश्वर से जन्म लेते हैं, तो हमें उसका स्वभाव मिलता है, परन्तु वह पुराने स्वभाव को तुरन्त पूरी तरह दूर नहीं कर देता। पशुओं और पक्षियों की हर एक जाति अपने स्वभाव के अनुसार चलती है। आप कबूतर या कैनरी पक्षी का स्वभाव बता सकते हैं। घोड़ा अपने स्वभाव के अनुसार चलता है, गाय अपने स्वभाव के अनुसार। परन्तु मनुष्य में दो स्वभाव होते हैं, और संसार या शैतान आपको यह न सोचने दे कि पुराना स्वभाव मिट गया है, क्योंकि वह मिटा नहीं है। “अपने आप को मरा समझो”; परन्तु यदि आप मर चुके होते, तो आपको अपने आप को मरा समझने की आवश्यकता न होती, है न? जो “मैं” मर चुका होता, वह तो हिसाब से ही बाहर हो जाता। “मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ”; यदि वह मर चुकी होती, तो पौलुस को उसे वश में लाने की आवश्यकता न होती। न्याय की दृष्टि से मैं मर चुका हूँ, परन्तु पुराना स्वभाव जीवित है, और इसलिये यदि मैं अपनी देह को वश में न रखूँ, और शरीर को उसकी लालसाओं समेत क्रूस पर न चढ़ाऊँ, तो यह निचला स्वभाव प्रबल हो जाएगा, और मैं बन्धन में पड़ जाऊँगा। बहुत से मनुष्य जीवन भर पुराने स्वभाव के बन्धन में जीते रहते हैं, जबकि यदि वे बस यह विजयी जीवन जीते, तो स्वतन्त्रता पा सकते थे। पुराना आदम कभी नहीं मरता। वह भ्रष्ट ही बना रहता है। “नख से सिर तक कहीं भी कुछ आरोग्यता नहीं, केवल चोट और कोड़े की मार के चिन्ह और सड़े हुए घाव हैं, जो न दबाये गए, न बाँधे गए, न तेल लगाकर नरमाये गए हैं।”
भारत में एक सज्जन ने एक बार बाघ का एक बच्चा पाया, और उसे ऐसा पालतू बना लिया कि वह घर का दुलारा जानवर बन गया। एक दिन, जब वह बड़ा हो गया था, उसने लहू चख लिया, और बाघ का पुराना स्वभाव एकाएक भड़क उठा, और उसे मार डालना पड़ा। विश्वासी में पुराने स्वभाव के साथ भी ऐसा ही है। वह दबा दिया जाने पर भी कभी नहीं मरता: और यदि विश्वासी चौकस और प्रार्थनाशील न रहे, तो वह प्रबल हो जाएगा, और उसे झपटकर पाप में गिरा देगा। किसी ने ध्यान दिलाया है कि (अंग्रेज़ी शब्द) S-I-N (पाप) के बीचोंबीच “I” (मैं) है। यही वह माध्यम है जिसके द्वारा शैतान काम करता है।
और इसलिये जिस सबसे बुरे शत्रु पर आपको जय पानी है, वह आखिरकार आप स्वयं हैं। जब लंदन में कैप्टन टी— का मन फिरा, तो वह ऊँचे समाज का एक बड़ा व्यक्ति था। जब उसे मसीही बने कुछ महीने हो गए, तो उससे पूछा गया: “जब से आप मसीही बने हैं, तब से आपने अपना सबसे बड़ा शत्रु किसे पाया है?”
कुछ मिनट गहराई से सोचने के बाद उसने कहा, “मेरे विचार में तो वह मैं स्वयं हूँ।”
“आह!” उस महिला ने कहा, “राजा ने आपको अपनी उपस्थिति में ले लिया है, क्योंकि ये सच्चाइयाँ हमें केवल उसी की उपस्थिति में सिखाई जाती हैं।”
मेरे मार्ग में आए किसी भी दूसरे मनुष्य से अधिक परेशानी मुझे डी. एल. मूडी से हुई है। यदि मैं बस उसे ठीक रख सकूँ, तो मुझे दूसरे लोगों से कोई परेशानी नहीं होती। बहुत से लोगों को अपने नौकरों से परेशानी होती है। क्या आपने कभी सोचा है कि परेशानी नौकरों में नहीं, आप में है? यदि परिवार का एक सदस्य हर समय झल्लाता रहता है, तो वह सारे परिवार को झल्लाने वाला बना देगा। आप इसे मानें या न मानें, यह सच है। आप लोगों से जल्दबाज़ी और झल्लाहट से बोलिए, तो वे भी आपसे वैसा ही करेंगे।
भूख-लालसा
अब भूख-लालसा को लीजिए। यह एक भीतरी शत्रु है। कितने जवान मदिरा की लालसा से बर्बाद हो जाते हैं! कितने ही जवान बड़े होकर अपने माता-पिता के लिये आशीष के बदले श्राप बन गए हैं। कुछ समय पहले हमारे एक बड़े नगर में आत्महत्या करनेवाले एक जवान की लाश मिली। उसकी जेब में एक पर्चा मिला, जिस पर उसने लिखा था: “यह मैंने स्वयं किया है। किसी को मत बताना। यह सब शराब के कारण है।” समाचारपत्रों में इन बातों की सूचना छपने पर दो सौ छियालीस परिवारों से दो सौ छियालीस पत्र आए, जिनमें से हर एक का एक उड़ाऊ पुत्र था, जिसके विषय में यह भय था कि कहीं आत्महत्या करनेवाला वही न हो।
मदिरा देह और आत्मा दोनों की शत्रु है। बताया जाता है कि लंदन के प्रसिद्ध चिकित्सक सर एंड्रयू क्लार्क ने एक बार यह कथन कहा था: “अब मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं गम्भीरता और सावधानी से बोल रहा हूँ, जब मैं आपसे कहता हूँ कि मैं वास्तविकता से काफ़ी कम ही कह रहा हूँ, जब मैं कहता हूँ कि आज मेरे अस्पताल के वार्डों के चक्कर में, वहाँ अपने बिस्तरों पर पड़े हर दस में से सात लोगों की बीमारी का कारण शराब है। मैं यह नहीं कहता कि हर सौ में से सत्तर पियक्कड़ हैं; मैं नहीं जानता कि उनमें से एक भी पियक्कड़ है; परन्तु वे शराब का सेवन करते हैं। ज्योंही कोई मनुष्य एक बूँद लेना आरम्भ करता है, तो उसमें उत्पन्न हुई लालसा उसके स्वभाव का अंग बन जाती है, और वह स्वभाव, जो उसके कामों से बना है, जब उसके बाद आनेवाली पीढ़ियों को उनके अस्तित्व के अभिन्न अंग के रूप में सौंपा जाता है, तो अकथनीय श्राप लाता है। जब मैं इस पर विचार करता हूँ, तो मेरा मन करता है कि अपना पेशा छोड़ दूँ—सब कुछ छोड़ दूँ—और एक पवित्र धर्मयुद्ध पर निकल पड़ूँ, और सब मनुष्यों को यह प्रचार करूँ, ‘मानव जाति के इस शत्रु से सावधान रहो!’”
यह आज संसार में सबसे अधिक विनाश करनेवाली शक्ति है। यह सबसे खूनी युद्धों से भी अधिक लोगों को मारती है। यह अपराध और आलस्य और दरिद्रता और रोग की उपजाऊ जननी है। यह मनुष्य को इस संसार के लिये निकम्मा कर देती है, और आनेवाले संसार के लिये उसे नरक का भागी बना देती है। परमेश्वर के वचन ने इसकी घोषणा की है: “धोखा न खाओ, न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी,... न पियक्कड़... परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।”
हम इस शत्रु पर कैसे जय पा सकते हैं? कड़वा अनुभव यह सिद्ध करता है कि मनुष्य अपने बल पर इतना सामर्थी नहीं है। उस शापित लालसा का एकमात्र उपचार नया जन्म है—एक नया जीवन—हमारे भीतर जी उठे मसीह की सामर्थ्य। जो मनुष्य मदिरा का आदी है, वह सहायता के लिये परमेश्वर की ओर देखे, और परमेश्वर उसे उसकी लालसा पर विजय देगा। यीशु मसीह शैतान के कामों को नाश करने आया, और यदि आप उसे करने दें, तो वह उस लालसा को दूर कर देगा।
क्रोधी स्वभाव
फिर क्रोधी स्वभाव की बात है। मैं उस मनुष्य को अधिक महत्व नहीं दूँगा जिसके स्वभाव में ताव न हो। फौलाद में यदि ताव (पानी) न हो, तो वह किसी काम का नहीं। परन्तु जब स्वभाव का ताव मुझ पर प्रभुता करने लगता है, तब मैं उसका दास हूँ, और वह निर्बलता का कारण बन जाता है। वह मेरे सारे जीवन में भलाई के लिये एक बड़ी शक्ति बनाया जा सकता है, और मेरी सहायता कर सकता है; या वह भीतर से मेरा सबसे बड़ा शत्रु बन सकता है, और मेरी सामर्थ्य छीन सकता है। कुछ नदियों में धारा इतनी प्रबल होती है कि वे नौका चलाने के लिये बेकार हो जाती हैं।
किसी ने कहा है कि जब कोई प्रचारक क्रोधी स्वभाव के विषय में बोलता है, तो उसकी बात कभी लोगों पर चूकती नहीं। यह आश्चर्य की बात है कि मसीही होने का दावा करनेवाले भी इस पर कितना कम नियन्त्रण रखते हैं। इंग्लैण्ड में मेरा एक मित्र कहीं मिलने गया हुआ था, और बैठक में बैठे-बैठे उसने दालान में एक भयानक शोर सुना। उसने पूछा कि यह क्या है, और उसे बताया गया कि यह तो बस डॉक्टर साहब अपने जूते सीढ़ियों से नीचे फेंक रहे हैं, क्योंकि उन पर ठीक से पॉलिश नहीं की गई थी। एक पुराने धर्मशास्त्री ने कहा, “बहुत से मसीही, जिन्होंने किसी बच्चे की मृत्यु या अपनी सारी सम्पत्ति की हानि को अत्यन्त वीरतापूर्ण मसीही धैर्य के साथ सह लिया, एक थाली के टूट जाने या किसी नौकर की भूलों से पूरी तरह हार जाते हैं।”
लोगों ने मुझसे कहा है, “मि. मूडी, मैं अपने क्रोध पर नियन्त्रण कैसे पाऊँ?”
यदि आप सचमुच नियन्त्रण पाना चाहते हैं, तो मैं आपको बताऊँगा कि कैसे, परन्तु वह दवा आपको पसन्द नहीं आएगी। उसे पाप समझिए और उसका अंगीकार कीजिए। लोग उसे एक प्रकार का दुर्भाग्य समझते हैं, और एक महिला ने मुझसे कहा कि यह उसे अपने माता-पिता से विरासत में मिला है। मान लीजिए कि ऐसा ही था। तो भी यह उसके लिये कोई बहाना नहीं।
जब आपको फिर क्रोध आए और आप किसी से कठोरता से बोलें, और जब आपको इसका एहसास हो, तो जाकर उस व्यक्ति से क्षमा माँगिए। अगले चौबीस घंटे तक आप उस व्यक्ति पर क्रोधित नहीं होंगे। शायद लगभग अड़तालीस घंटे में आप फिर ऐसा कर बैठें, परन्तु दूसरी बार भी जाइए, और जब आप लगभग आधा दर्जन बार ऐसा कर चुकेंगे, तो आप यह धंधा छोड़ देंगे, क्योंकि इससे पुराना शरीर जल उठता है।
एक बार एक महिला ने मुझसे कहा, “मुझे बढ़ा-चढ़ाकर बोलने की ऐसी आदत पड़ गई है कि मेरे मित्र मुझ पर बढ़ा-चढ़ाकर बोलने का दोष लगाते हैं, यहाँ तक कि वे मेरी बात समझते ही नहीं।”
उसने कहा, “क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं? मैं इस पर जय पाने के लिये क्या करूँ?”
मैंने कहा, “देखिए, अगली बार जब आप अपने आप को झूठ बोलते हुए पकड़ें, तो सीधे उस व्यक्ति के पास जाइए और कहिए कि आपने झूठ बोला है, और उससे कहिए कि आपको खेद है। कहिए कि वह झूठ है; उसे जड़ और शाखा समेत कुचल डालिए; आपको यही करना है।”
उसने कहा, “ओह, मुझे इसे झूठ बोलना कहना अच्छा नहीं लगेगा।” परन्तु वह था तो वही।
यदि मसीहियत आपके चरित्र को सीधा नहीं करती, तो वह एक चुटकी के बराबर भी मूल्य नहीं रखती। मैं निरी भावुकता और भावनाओं के उफान से ऊब गया हूँ। यदि लोग यह न बता सकें कि आप कब सच बोल रहे हैं, तो कहीं कोई मूल गड़बड़ी है, और अच्छा होगा कि आप उसे तुरन्त सुधार लें। अब, क्या आप यह करने को तैयार हैं? आप चाहें या न चाहें, अपने आप को इसके लिये तैयार कीजिए। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो आपके किसी काम से ठेस खाया हुआ है? सीधे उसके पास जाइए और उससे कहिए कि आपको खेद है। आप कहते हैं कि दोष आपका नहीं है। कोई बात नहीं, सीधे उसके पास जाइए, और कहिए कि आपको खेद है। मुझे बहुत बार ऐसा करना पड़ा है। मेरे जैसे आवेगी मनुष्य को अक्सर ऐसा करना पड़ता है, परन्तु जब मैं बातें सुधार लेता हूँ, तो रात को और भी मीठी नींद सोता हूँ। अंगीकार कभी आशीष लाए बिना नहीं रहता। कभी-कभी मुझे प्रचार जारी रखने से पहले मंच से उतरकर नीचे जाना और किसी मनुष्य से क्षमा माँगनी पड़ी है। मसीही मनुष्य को हर समय सज्जन होना चाहिए; परन्तु यदि वह ऐसा नहीं है, और उसे पता चलता है कि उसने किसी को घायल किया या ठेस पहुँचाई है, तो उसे जाकर तुरन्त बात सुधार लेनी चाहिए। आप जानते हैं कि बहुत से लोग ऐसे हैं जो बस इतनी ही मसीहियत चाहते हैं जिससे वे प्रतिष्ठित दिखें। वे इस विजयी जीवन के विषय में सोचते ही नहीं जो हर समय विजय पाता है। उनके उदासी के दिन और चिड़चिड़ेपन के दिन होते हैं, और बच्चे कहते हैं, “आज माँ चिड़चिड़ी है, तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा।”
हमें ये तुनकमिज़ाज उदास दिन नहीं चाहिए; ये उतार-चढ़ाव नहीं चाहिए। यदि हम जय पा रहे हैं, तो दूसरों पर हमारे जीवन का यही प्रभाव पड़ेगा: उन्हें हमारी मसीहियत पर भरोसा होगा। बहुत से मनुष्यों में सामर्थ्य न होने का कारण यह है कि कोई शापित पाप छिपाकर रखा गया है। जब तक वह पाप प्रकाश में नहीं लाया जाता, तब तक ओस की एक बूँद भी नहीं पड़ेगी। भीतर से ठीक हो जाइए। तब, यदि भीतर सब कुछ ठीक है, तो हम दानवों के समान निकलकर संसार को जीत सकते हैं।
पौलुस कहता है कि हमें विश्वास में, धीरज में, और प्रेम में पक्का होना चाहिए। यदि कोई मनुष्य अपने विश्वास (सिद्धान्त) में कच्चा है, तो पादरी लोग कलीसियाई तलवार उठाकर उसे तुरन्त काट देते हैं। परन्तु वह प्रेम में, धीरज में चाहे कितना भी कच्चा क्यों न हो, इस विषय में कुछ नहीं कहा जाता। यदि हमें परमेश्वर के प्रति सच्चा रहना है, तो हमें विश्वास में, प्रेम में और धीरज में पक्का होना ही होगा।
ऐसे मनुष्य से मिलना कितना आनन्ददायक है जो अपने क्रोध पर नियन्त्रण रख सकता है! विल्बरफोर्स के विषय में कहा जाता है कि एक बार उसके एक मित्र ने उसे बड़ी बेचैनी की दशा में पाया; वह एक सरकारी पत्र ढूँढ़ रहा था जिसे उसने कहीं रखकर भूल गया था, और जिसकी राजपरिवार का एक सदस्य प्रतीक्षा कर रहा था। ठीक उसी समय, मानो बात को और भी कठिन बनाने के लिये, बच्चों के कमरे से हल्ला-गुल्ला सुनाई दिया।
मित्र ने सोचा, “अब तो निश्चय ही इसका धीरज टूट जाएगा।”
यह विचार उसके मन से गुज़रा ही था कि विल्बरफोर्स ने उसकी ओर मुड़कर कहा: “उन प्यारे बच्चों की आवाज़ सुनना कैसी आशीष है! ज़रा सोचिए, दूसरी भाग-दौड़ के बीच उनकी आवाज़ें सुनना और यह जानना कि वे कुशल से हैं, कैसी राहत की बात है।”
लोभ
लोभ के पाप को लीजिए। बाइबल में मतवालेपन से अधिक इसके विरोध में कहा गया है। मुझे इसे अपने भीतर से निकाल फेंकना है—इसे जड़ और शाखा समेत नष्ट करना है—और इसे अपने ऊपर प्रभुता नहीं करने देना है। हम सोचते हैं कि जो मनुष्य मतवाला होता है, वह एक घिनौना राक्षस है, परन्तु एक लोभी मनुष्य, जो परमेश्वर की दृष्टि में किसी भी पियक्कड़ के समान नीच और काला है, अक्सर कलीसिया में ग्रहण कर लिया जाता है, और किसी पद पर भी रख दिया जाता है।
इस पाप के विषय में सबसे खतरनाक बात यह है कि इसे आम तौर पर बहुत घोर पाप नहीं समझा जाता। निस्सन्देह हम सब कंजूसों को तुच्छ समझते हैं, परन्तु सब लोभी मनुष्य कंजूस नहीं होते। इसके विषय में ध्यान देने योग्य एक और बात यह है कि यह जवानों की अपेक्षा बूढ़ों को अधिक जकड़ता है।
आइए, देखें कि बाइबल लोभ के विषय में क्या कहती है:— “इसलिये अपने अंगों को मार डालो... लोभ को जो मूर्ति पूजा के बराबर है।”
“किसी लोभी मनुष्य की परमेश्वर के राज्य में कोई मीरास नहीं।”
“जो धनी होना चाहते हैं (अर्थात धनी होने की लालसा रखते हैं), वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरी व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फँसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डुबा देती हैं।
क्योंकि रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटककर अपने आप को नाना प्रकार के दुःखों से छलनी बना लिया है।”
“दुष्ट लोभी को धन्य कहता है, जिस से यहोवा घृणा करता है।”
लोभ ने लूत को सदोम में फुसला लिया। उसी के कारण आकान और उसके सारे घराने का नाश हुआ। वह बिलाम का अधर्म था। वह शमूएल के पुत्रों का पाप था। उसी ने गेहजी को कोढ़ी बना दिया। उसी ने उस धनी जवान सरदार को उदास करके लौटा दिया। उसी ने यहूदा को अपने स्वामी और प्रभु को बेचने पर उभारा। उसी के कारण हनन्याह और सफीरा की मृत्यु हुई। वह फेलिक्स के चरित्र का कलंक था। हर युग में इसने कितने लोगों को अपना शिकार बनाया है!
क्या आप कहते हैं: “मैं लोभ को कैसे रोकूँ?”
देखिए,—मैं नहीं समझता कि इसमें कोई कठिनाई है। यदि आप पाते हैं कि आप बहुत लोभी होते जा रहे हैं—बहुत कंजूस—जो कुछ भी मिल सके उस सब को अपने अधिकार में कर लेना चाहते हैं—तो बस बाँटना आरम्भ कर दीजिए। बस लोभ से कह दीजिए कि आप उसका गला घोंट देंगे, और उसे अपने स्वभाव में से निकाल फेंकेंगे।
न्यूयॉर्क राज्य का एक धनी किसान, जो प्रसिद्ध कंजूस और बहुत ही स्वार्थी मनुष्य था, मन फिराकर मसीह के पास आया। उसके मन फिराने के कुछ ही समय बाद एक दिन एक गरीब मनुष्य उसके पास सहायता माँगने आया। उसका घर जल गया था, और उसके पास खाने-पीने की कोई वस्तु नहीं थी। इस नए विश्वासी ने सोचा कि वह उदारता दिखाएगा, और अपने धुआँघर में से उसे एक सूअर की सुखाई हुई जाँघ (हैम) देगा। वह धुआँघर की ओर चला, और मार्ग में परखनेवाले ने कहा, “जो सबसे छोटी हो, वही उसे देना।”
सारे मार्ग वह इसी उधेड़बुन में संघर्ष करता रहा कि बड़ी दे या छोटी। अपने स्वार्थ पर जय पाने के लिये उसने सबसे बड़ी हैम उतारी और उस मनुष्य को दे दी।
परखनेवाले ने कहा, “तू मूर्ख है।”
परन्तु उसने उत्तर दिया, “यदि तू चुप न रहा, तो मैं धुआँघर की सारी की सारी हैम उसे दे दूँगा।”
यदि आप पाते हैं कि आप स्वार्थी हैं, तो कुछ दे दीजिए। ठान लीजिए कि आप स्वार्थ की उस आत्मा पर जय पाएँगे, और अपनी देह को वश में रखेंगे, चाहे इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
मि. ड्यूरेंट ने मुझे बताया कि गुडईयर ने रबर के पेटेंट का मुकदमा लड़ने के लिये उन्हें नियुक्त किया था, और यदि वे सफल होते, तो पेटेंट से आनेवाले धन का आधा भाग उन्हें मिलना था। एक दिन वे जागे तो पाया कि वे धनी हो गए हैं, और उन्होंने कहा कि तब उनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष हुआ कि वे धन को अपना स्वामी बनने देंगे, या स्वयं धन के स्वामी बनेंगे; कि वे उसके दास बनेंगे, या उसे अपना दास बनाएँगे। अन्त में उन्होंने विजय पाई, और इसी प्रकार वेलेस्ली कॉलेज बना।
क्या आप ईर्ष्यालु, डाही हैं?
जाइए और उस व्यक्ति का कोई भला कीजिए जिससे आप ईर्ष्या करते हैं। ईर्ष्या का इलाज यही है; यह उसे मार डालेगा। ईर्ष्या एक शैतान है, वह एक घिनौना राक्षस है। कवियों ने कल्पना की कि डाह एक अंधेरी गुफा में रहती है; वह पीली और दुबली है, भेंगी दृष्टि से देखती है, दूसरों के दुर्भाग्य को छोड़ कभी किसी बात से आनन्दित नहीं होती, और लगातार अपने आप को ही हानि पहुँचाती रहती है।
एक उकाब की कहानी है जो दूसरे उकाब से अधिक ऊँचा और तेज़ उड़ सकता था, और दूसरे को यह अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उस दूसरे ने एक शिकारी को देखा, और उससे कहा, “मैं चाहता हूँ कि तुम उस उकाब को मार गिराओ।”
शिकारी ने उत्तर दिया कि यदि उसके पास तीर में लगाने के लिये कुछ पंख होते, तो वह ऐसा कर देता। तब उस उकाब ने अपने डैने में से एक पंख नोच निकाला। तीर चलाया गया, परन्तु वह प्रतिद्वन्द्वी उकाब तक पूरा नहीं पहुँचा; वह बहुत ऊँचा उड़ रहा था। डाही उकाब ने और पंख नोच निकाले, और निकालता ही गया, यहाँ तक कि उसने इतने पंख खो दिए कि वह उड़ न सका, और तब शिकारी ने मुड़कर उसी को मार डाला। मेरे मित्र, यदि आप ईर्ष्यालु हैं, तो आप केवल एक ही मनुष्य को हानि पहुँचा सकते हैं, और वह आप स्वयं हैं।
दो व्यापारी थे—सौदागर—और उनके बीच बड़ी प्रतिद्वन्द्विता थी, बहुत कड़वाहट थी। उनमें से एक का मन फिरा। वह अपने पादरी के पास गया और कहा, “मुझे अब भी उस मनुष्य से ईर्ष्या है, और मैं नहीं जानता कि इस पर कैसे जय पाऊँ।”
उसने कहा, “देखो, यदि कोई मनुष्य तुम्हारी दुकान में सामान खरीदने आए, और तुम उसे वह सामान न दे सको, तो उसे सीधे अपने पड़ोसी के पास भेज दो।”
उसने कहा कि उसे ऐसा करना अच्छा नहीं लगेगा।
पादरी ने कहा, “अच्छा, तुम ऐसा करो, तो तुम ईर्ष्या को मार डालोगे।”
उसने कहा कि वह ऐसा करेगा, और जब कोई ग्राहक उसकी दुकान में ऐसा सामान लेने आता जो उसके पास नहीं होता, तो वह उससे कहता कि सड़क पार अपने पड़ोसी की दुकान पर चले जाओ। कुछ समय बाद दूसरा भी अपने ग्राहकों को इस मनुष्य की दुकान पर भेजने लगा, और उनके बीच की दरार भर गई।
घमण्ड
फिर घमण्ड है। यह भी उन पापों में से एक है जिनकी बाइबल इतनी कड़ी निन्दा करती है, परन्तु जिसे संसार शायद ही पाप समझता है। “चढ़ी आँखें और घमण्डी मन पाप हैं।” “सब मन के घमण्डियों से यहोवा घृणा करता है; मैं दृढ़ता से कहता हूँ, ऐसे लोग निर्दोष न ठहरेंगे।” मसीह ने घमण्ड को उन बुरी बातों में गिना जो मनुष्य के मन से निकलकर उसे अशुद्ध करती हैं।
लोगों का विचार है कि केवल धनवान ही घमण्डी होते हैं। परन्तु कुछ पिछली गलियों में जाइए, तो आप पाएँगे कि कुछ अत्यन्त गरीब लोग भी उतने ही घमण्डी हैं जितने सबसे धनी। आप जानते हैं, यह मन की बात है। जिनके पास कोई धन नहीं, वे भी उतने ही घमण्डी होते हैं जितने धनवाले। हमें इसे कुचल डालना है। यह एक शत्रु है। आपको अपने चेहरे पर घमण्ड करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि ऐसा कोई नहीं जिसकी देह को कब्र में दस दिन रहने के बाद कीड़े न खा रहे हों। घमण्ड करने की कोई बात ही नहीं—है न? आइए, हम परमेश्वर से विनती करें कि वह हमें घमण्ड से छुड़ाए।
आप हाथ पर हाथ धरकर यह नहीं कह सकते, “प्रभु, इसे मुझ में से निकाल दे”; बल्कि जाइए और उसके साथ मिलकर काम कीजिए।
दीनता को बढ़ाकर अपने घमण्ड को मार डालिए। पौलुस कहता है, “इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं, जो पवित्र और प्रिय हैं,... दीनता धारण करो।” पतरस कहता है, “दीनता से कमर बाँधे रहो।” “धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं।”
