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इंग्लैण्ड में ऐसे सज्जन हैं जो नगर-नगर चार घोड़ों की गाड़ी हाँकते हुए किसी को भी साथ न ले जाने का सामर्थ्य रखते हैं, और अपने ही मनोरंजन के लिए अपनी यात्राएँ करते हैं ; परन्तु मैं ऐसा कुछ भी करने में न तो सक्षम हूँ और न ही इच्छुक। जब तक मेरी गाड़ी स्वर्ग के यात्रियों से भरी हुई न हो, तब तक मैं यही चाहूँगा कि वह कभी चले ही न, और यह भी बेहतर होगा कि मेरे घोड़े अस्तबल में ही खड़े रह जाएँ। हमें कुछ प्राणों को स्वर्ग तक अवश्य पहुँचाना है, क्योंकि हमारा बुलावा ऊपर से है और हमारा समय इतना बहुमूल्य है कि उसे भलाई करने के मिथ्या आडम्बर में व्यर्थ नहीं फेंका जा सकता। हम प्रचार को खेल-तमाशा नहीं बना सकते ; हम अनंतकाल के लिए प्रचार करते हैं। हम केवल संवेदनहीन भीड़ों को, या अत्यंत सावधान श्रोताओं को प्रवचन सुना देने से ही संतुष्ट नहीं हो सकते। आरम्भ में हमारा जैसा भी स्वागत मुस्कानों से हो, और समाप्ति पर जैसा भी अभिवादन हमें मिले, हम तब तक संतुष्ट नहीं होते जब तक यीशु हमारे द्वारा उद्धार का कार्य नहीं करते। हमारी अभिलाषा यही है कि अनुग्रह की महिमा हो, और पापी उद्धार पाएँ।
लोग मूरफील्ड्स के टैबरनेकल और टॉटनहैम कोर्ट रोड वाले भवन का उपहास करते हुए उन्हें मि. व्हाइटफील्ड के 'प्राण-फंदे' कहा करते थे ;—आराधना-स्थल के लिए यह अत्यंत उत्तम नाम है ; यह टैबरनेकल (मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल) भी सदा ऐसा ही बना रहे !—सी. एच. एस., 19 अगस्त, 1877 को दिए गए एक प्रवचन में, उस रात जब टैबरनेकल सब आने वालों के लिए खुला था, क्योंकि नियमित मण्डली ने अपने स्थान छोड़ दिए थे।
मुझे विश्वास है कि यदि किसी सेवक को प्राण-परिवर्तन देखना है, तो उसे अपने लोगों के साथ अपने को एक करना होगा। आज ऐसे लोग हैं जो मूसा के इस्राएल के लिए की गई प्रार्थना पर आपत्ति उठाते हैं, " यदि तू उनका पाप क्षमा करे, तो ठीक ; और यदि नहीं, तो मुझे अपनी उस पुस्तक से जो तू ने लिखी है, मिटा दे ;" और वे पौलुस के इस विचार पर भी प्रश्न उठाते हैं कि वह अपने भाइयों, अपने शारीरिक सम्बन्धियों के लिए मसीह से अलग हो जाने को भी तैयार था। परन्तु इस बात में कोई कठिनाई नहीं है, यदि आप एक बार मनुष्यों के प्राणों के लिए ऐसा गहन प्रेम अनुभव करने लगें कि आप, जैसे कि, अपने ही उद्धार को दाँव पर रख दें, और उसे तनिक भी हानि न समझें, यदि इस प्रकार आप लोगों को उद्धारकर्ता के चरणों तक ले आ सकें ! जिस मनुष्य ने कभी ऐसी तैयारी अनुभव नहीं की, वह अभी तक पास्टर के हृदय की सच्ची धड़कन को नहीं जानता ; यदि वह आवश्यकता पड़ने पर भेड़ों के लिए अपना प्राण न्यौछावर करने को तैयार न हो, तो वह चरवाहा होने के लिए नियुक्त ही नहीं हुआ है।—सी. एच. एस., टैबरनेकल में 23 अगस्त, 1883 को दिए गए एक प्रवचन में।
जिसने वचन को सामर्थ्य के साथ हृदय तक पहुँचाया है, वह उसके लिए जिसने उसे सुना है, वैसा ही सम्बन्ध रखता है जैसा पिता का पुत्र से होता है। इस स्थान में बहुत से ऐसे हैं जिनसे मेरा यही परम पवित्र सम्बन्ध है। मैं जानता हूँ कि आप इसे पहचानते हैं, और मैं आप में से उन बहुतों के प्रति अपना गहन और उत्कट प्रेम व्यक्त करना चाहता हूँ जो यहाँ वचन के प्रचार द्वारा परमेश्वर के लिए नए जन्मे हैं। मुझे नहीं मालूम कि विश्वास के लिए इस घोर वाद-विवाद के समय में, बीते सप्ताह या दो सप्ताह के दौरान, मुझे किसी बात ने इतना सुख नहीं दिया जितना उन अनेक पत्रों को पाकर मिला, जो उन लोगों से आए जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं सुना था, और जिनमें लिखा था, "आप मुझे नहीं जानते, परन्तु आप मेरे आत्मिक पिता हैं ; और अब, जब आप पर परीक्षा की यह घड़ी आई है, तो मुझे आपको उत्साह का एक शब्द लिखकर भेजना ही होगा।" जब भी मेरी गवाही किसी खोजते हुए प्राण के प्राण-परिवर्तन के लिए धन्य ठहरती है, तो यह मेरे लिए सदा धन्यवाद का कारण होता है ; परन्तु जब मैं उन सैकड़ों और हजारों का विचार करता हूँ,—हाँ, मैं बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रहा जब मैं हजारों धर्म-परिवर्तितों की बात करता हूँ,—जिनसे मैं यहाँ पृथ्वी पर मिला हूँ, और उन अनेक अन्यों का भी, जो अभी मेरे लिए अपरिचित हैं, जिनसे मैं यहाँ या स्वर्ग में मिलने की आशा रखता हूँ, तो मैं आनन्दित होता हूँ, हाँ, और आनन्दित होता रहूँगा ; और मैं उन सब के प्रति अपना गहन प्रेम व्यक्त करने से स्वयं को रोक नहीं सकता जो उन वचनों के द्वारा जिन्हें मैंने प्रचार किया और प्रकाशित किया, उद्धारकर्ता के पास लाए गए हैं।— सी. एच. एस., टैबरनेकल में 6 नवम्बर, 1887 को दिए गए एक प्रवचन में।
अपने पास्टरीय रजत-जयंती के अवसर पर दिए गए प्रवचनों में से एक में, मि. स्पर्जन ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया कि लंदन में अपनी पच्चीस वर्षों की सेवकाई के दौरान नौ हजार से अधिक व्यक्ति कलीसिया में सम्मिलित हुए थे ; जबकि, सम्भवतः, इससे बराबर या और भी अधिक संख्या में लोग उनके प्रवचन सुनकर या पढ़कर प्राण-परिवर्तित हुए थे, यद्यपि वे टैबरनेकल के सदस्य नहीं बने थे। पूर्व के अध्यायों में इन परिवर्तितों के विषय में बहुत-सी
p. 28संदर्भ और उनके उद्धार के साधनों के अभिलेख सम्मिलित रहे हैं ; परन्तु प्रिय पास्टर की सेवा के इस अत्यंत महत्वपूर्ण भाग को यथोचित रूप से प्रस्तुत करने के लिए, और यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर की कृपा इसके आरम्भ से अंत तक इस पर किस प्रकार भरपूर बनी रही, इस खण्ड में इसी विषय पर दो अध्याय समर्पित करना आवश्यक प्रतीत होता है। यह भक्तिपूर्ण धन्यवाद का विषय है कि बहुत बड़े परिमाण में, उनके प्रकाशित वचनों के साथ अब भी वैसा ही आशीष जुड़ा हुआ है, चाहे वह हमारी अपनी भाषा में हो, या उन अनेक भाषाओं में जिनमें उनका अनुवाद हुआ है। इस वृत्तान्त का पहला भाग मि. स्पर्जन के अपने ही शब्दों में दिया गया है ; बाकी भाग उन उपयोगिता के दृष्टान्तों से बना है जिन्हें विभिन्न मित्रों ने वर्णित किया है ; और अध्यायों को यथासम्भव विविध और सम्पूर्ण बनाने के लिए, उनमें इस प्रिय प्राण-विजेता की उन विधियों के भी कुछ नमूने सम्मिलित किए गए हैं जिनसे वे व्याकुल जिज्ञासुओं और उद्धारकर्ता को खोजते पापियों से व्यवहार करते थे। यहाँ दर्ज किए गए आशीष के प्रसंग उनकी सम्पूर्ण लंदन सेवकाई से चुने गए हैं ; और इसलिए, वे 1853 से 1892 तक के इस लम्बे काल में प्रभु के लिए किए गए उनके कार्य की निरंतर उपयोगिता के और भी अधिक प्रतिनिधि हैं।
पवित्रशास्त्र के कुछ ऐसे अंश हैं जो अन्यों की तुलना में प्राणों के परिवर्तन के लिए अधिक भरपूर रूप से आशीषित हुए हैं ; उन्हें उद्धार के वचन कहा जा सकता है। हम यह पता नहीं लगा सकते कि यह कैसे या क्यों है ; परन्तु यह निश्चित सत्य है कि परमेश्वर ने अपने वचन के कुछ चुने हुए पदों का उपयोग मनुष्यों को मसीह के क्रूस तक लाने के लिए अन्य किसी भी पद से अधिक किया है। वे बाइबल के अन्य भागों से अधिक प्रेरित नहीं हैं ; परन्तु मेरा अनुमान है कि वे अपनी स्थिति या अपनी विशेष भाषा-शैली के कारण अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं, पाठक की दृष्टि को अधिक सरलता से पकड़ लेते हैं, और व्यापक रूप से प्रचलित आत्मिक अवस्था के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं। आकाश के सब तारे अत्यंत तेज चमकते हैं, परन्तु उनमें से केवल कुछ ही नाविक की दृष्टि को पकड़ते और उसकी दिशा निर्धारित करते हैं ; इसका कारण यह है कि वे कुछ तारे अपने विशेष समूहन के कारण अधिक सरलता से पहचाने जाते हैं, और दृष्टि सुगमता से उन्हीं पर टिक जाती है। मेरा अनुमान है कि परमेश्वर के वचन के उन अंशों के साथ भी ऐसा ही है जो विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं और पापी को मसीह के क्रूस की ओर निर्देशित करते हैं। उन प्रमुख वचनों में से एक है यशायाह 43:25 : " मैं ही हूँ, मैं ही हूँ जो अपने ही निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूँ, और तेरे पापों को स्मरण न रखूँगा।" मैंने इसे अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते पाया है ; क्योंकि जो हजारों व्यक्ति अपने प्राण-परिवर्तन और आत्मिक अनुभव का वर्णन करने मेरे पास आए हैं, उनमें से मैंने एक बहुत बड़े भाग को पाया है जिन्होंने अपने हृदयों में हुए उस दिव्य परिवर्तन का सूत्र इस अनमोल सार्वभौम दया की घोषणा को सुनने और पवित्र आत्मा द्वारा उसे उनके प्राणों पर सामर्थ्य के साथ लागू किए जाने से जोड़ा है।
जो लोग कलीसिया में सम्मिलित होने के विचार से मुझसे मिलने आते हैं, उनमें से कुछ बहुत कुछ नहीं कह पाते, और वे सोचते हैं कि मैं उनसे बहुत असंतुष्ट होऊँगा, क्योंकि वे
p. 29अपने वृत्तान्त को बहुत उलझा देते हैं ; परन्तु जिन लोगों से मैं सबसे कम संतुष्ट रहता हूँ, वे वे हैं जो अपनी कहानी को धड़ाधड़ बोल जाते हैं ; उनके पास सब कुछ दोहराने के लिए पहले से तैयार होता है, और सब कुछ यथासम्भव सुन्दरता से सजाया हुआ होता है। जब मैं इसे सुनता हूँ, तो मुझे पता चल जाता है कि किसी ने उन्हें बता दिया है कि क्या कहना है, और उन्होंने वह सब मुझे सुनाने के लिए सीख लिया है।
मुझे वह गवाही कहीं अधिक प्रिय है जिसे मुझे थोड़ा-थोड़ा करके निकालना पड़ता है, परन्तु जिसके विषय में मैं जानता हूँ कि वह काँपते हुए परिवर्तित व्यक्ति के हृदय से ताज़ा निकली है। कभी-कभी इसमें उस बेचारे प्राण को आँसू या सचमुच का रो देना पड़ता है, और मुझे उस कहानी को किसी भी प्रकार से जान पाने के लिए चारों ओर घूमना पड़ता है ; परन्तु यही यह दिखाता है कि वह सच्ची है, और उस व्यक्ति ने उसे कहीं से उधार नहीं लिया है। मुझे एक विश्वासी का अनुभव सुनना प्रिय लगता है, जब वह सीधे संसार से, और पाप के मार्गों से निकलकर मसीह में अपने विश्वास को अंगीकार करने आता है।
उसे मसीही लोगों के प्रयुक्त शब्दों के विषय में कुछ भी नहीं मालूम, उसने हमारे मुहावरे नहीं सीखे हैं ; और उसे सर्वथा ताज़ा और नया सुनना बड़े आनन्द की बात है। तौभी उसके सब आवश्यक अंशों में सदा वही कहानी होती है ; वह उसे जितना भी विचित्र ढंग से क्यों न कहे, वह मुख्य बातों में अन्यों की कहानी से मेल खाती है। एक ऐसे मसीही व्यक्ति के अनुभव को लीजिए जो बचपन से ही पवित्रस्थान में पला-बढ़ा हो, और उसका मूल तत्त्व निकाल लीजिए। अब एक ऐसे व्यक्ति के अनुभव को लीजिए जो घोड़ों की दौड़ लगाने वाला, पियक्कड़, और गाली-गलौज करने वाला रहा हो, परन्तु जो सचमुच प्राण-परिवर्तित हो गया हो, और उसका सार निकाल लीजिए। राज्य के किसी उच्चकुलीन व्यक्ति से बातें कीजिए जो स्वर्ग के राज्य का उत्तराधिकारी बन गया हो, और उसके अनुभव का तत्त्व ग्रहण कीजिए। अब किसी चिमनी-सफाईकर्मी से बात कीजिए जो प्रभु के पास लाया गया हो, और उसके अनुभव का सार लीजिए ; इन सब को एक साथ रखकर देखिए, और आप एक को दूसरे से पहचान नहीं पाएँगे।
सदा वही आवश्यक चिह्न होते हैं,—मृत्यु, जन्म, जीवन, भोजन,—मृत्यु में, जन्म में, जीवन में, भोजन में मसीह,—पश्चाताप, विश्वास, आनन्द,—परमेश्वर के आत्मा का कार्य। परन्तु परिवर्तितों द्वारा अपनी कहानी को इतने भिन्न-भिन्न ढंगों से कहते सुनना अत्यंत मधुर लगता है। अनुग्रह की सच्ची सन्तान हृदय में सदा एक-सी रहती है, यद्यपि बाहरी रूप निरंतर बदलता रह सकता है।
उन हजारों प्राणों में से जो मेरे माध्यम से प्रभु को जानने के लिए लाए गए हैं, मैंने अक्सर देखा है कि इनमें से एक बड़ा भाग, और हमारी कलीसिया के सबसे उत्तम सदस्यों में से भी बहुत, व्यवस्था के भय से नहीं, वरन कोमल साधनों से उद्धारकर्ता की ओर जीते गए। एक बार जिज्ञासुओं से भेंट करते हुए मैंने पाया कि तेईस में से लगभग बारह ऐसे थे जिनके पाप का दोष व्यवस्था के भय से स्पष्ट रूप से चिह्नित नहीं था। मैंने एक उत्तम युवती से पूछा, "वह पहला विचार क्या था जिसने वास्तव में आपको उद्धारकर्ता को खोजने पर उकसाया?" "अरे महोदय!" उसने उत्तर दिया, "यह मसीह का प्रिय स्वभाव ही था जिसने पहले-पहल मुझे उनका शिष्य बनने के लिए लालायित किया। मैंने देखा कि वे कितने दयालु, कितने भले, कितने निःस्वार्थ, कितने आत्म-बलिदानी थे, और इससे मुझे अनुभव हुआ कि मैं कितनी भिन्न थी। मैंने सोचा, 'हाय!
मैं यीशु के समान नहीं हूँ !' और इसी ने मुझे मेरे कमरे में भेज दिया, और मैंने प्रार्थना करना आरम्भ किया, और इस प्रकार मैं उन पर भरोसा रखने लगी।" "पहली धार्मिक छाप जो मुझ पर कभी पड़ी," दूसरी ने कहा,
p. 30" जिसने मुझे उद्धारकर्ता को खोजने पर उकसाया, वह यह था ; मेरा एक युवा साथी पाप में गिर गया, और मुझे मालूम था कि यदि मुझसे बलवन्त किसी ने मुझे थाम न रखा तो मैं भी वैसा ही कर सकती थी। इसलिए मैंने प्रभु को खोजा, आरम्भ में इतना अपने बीते हुए अपराध के कारण नहीं जितना आने वाले किसी बड़े पाप के भय के कारण। परमेश्वर ने मुझसे भेंट की, और तब मुझे पाप का दोष अनुभव हुआ, और मैं मसीह के पास लाई गई।" यह भी विचित्र बात है कि मुझे बहुत से ऐसे लोग मिले हैं जिन्होंने मसीह पर भरोसा रखा, और फिर विश्वास करने से पहले की तुलना में बाद में अपने पापों पर अधिक विलाप किया। मसीह में अपना भाग जान लेने के बाद उनका पाप का दोष आरम्भ की अपेक्षा और भी भयानक हो गया। उन्होंने उस बुराई की भीषणता को उससे बचने के बाद ही देखा ; वे दलदल की मिट्टी से खींचे गए, और उनके पाँव चट्टान पर स्थिर किए गए ; और तब बाद में उन्होंने उस भयानक गड्ढे की गहराई को, जिससे वे छीने गए थे, कहीं अधिक पूर्णता से देखा। यह सत्य नहीं है कि जितने भी उद्धार पाते हैं, उन सबको वैसा ही दोष और भय सहना पड़ता है जैसा हम में से किसी-किसी को सहना पड़ा ; बहुत से ऐसे भी हैं जो मनुष्य की रस्सियों और प्रेम के बन्धनों से खींचे जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो लुदिया के समान, अपने हृदय को दोष की सब्बल से नहीं, वरन दिव्य अनुग्रह की कुंजी से खुलवाते हैं। यीशु की सुन्दरता से मधुरता से खींचे गए, प्रायः चुपचाप मोहित होकर, वे कहते हैं, "मुझे अपनी ओर खींच ले, हम तेरे पीछे दौड़ेंगी।"
एक दिन, सभा के बाद, एक युवती मेरे पास यह पूछने आई कि जब मैंने कहा था कि जो कोई प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता है वह उसी क्षण उद्धार पा जाता है, तो क्या मैं सचमुच वैसा ही अर्थ रखता था। "हाँ," मैंने उत्तर दिया ; और मैंने उसे इस कथन के लिए पवित्रशास्त्र का आधार भी बताया। "क्यों!" उसने चिल्लाकर कहा, "मेरे दादा ने मुझे बताया था कि जब उन्हें धर्म मिला, तो उसमें छह महीने लग गए, और उन्हें पागलखाने में लगभग भेजना ही पड़ गया था, वे मन की इतनी भयानक अवस्था में थे।" "अच्छा, अच्छा," मैंने उत्तर दिया, "ऐसा कभी-कभी होता है ; परन्तु उनकी वह पीड़ा उन्हें उद्धार नहीं दिला सकी। वह तो केवल उनका विवेक और शैतान मिलकर उन्हें मसीह से दूर रखे हुए थे। जब उन्हें उद्धार मिला, तो वह उनकी गहरी भावनाओं के कारण नहीं मिला ; वह प्रभु यीशु मसीह पर उनके विश्वास करने के कारण मिला।"
तब मैंने उसके सामने उद्धारकर्ता को भीतरी भावनाओं के विरोध में हमारी आशा के एकमात्र आधार के रूप में प्रस्तुत किया। "मैं इसे समझ गई," उसने कहा ; और मैं आनन्दित हुआ जब मैंने उसके मुख पर वह उज्ज्वल प्रकाश देखा, स्वर्गीय सूर्य की वह किरण जिसे मैंने अक्सर उन लोगों के मुखों पर देखा है जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास किया है, जब शान्ति प्राण को किनारे तक भर देती है, और मुख को एक छोटे से रूपान्तरण से चमका देती है। बहुत बार, जब मैं उन लोगों से बातें करता रहा हूँ जो पाप के भार के नीचे पूर्णतः झुके हुए थे, वे भीतरी शोक से पागलखाने के योग्य होते-से दिखाई पड़ते थे ; परन्तु जैसे ही उन्हें यह विचार पकड़ में आया, "मसीह मेरे स्थान पर प्रतिनिधि बनकर खड़े हुए ; और यदि मैं उन पर भरोसा रखूँ, तो मेरे पास इसका प्रमाण है कि उन्होंने ऐसा किया, और मैं निर्दोष हूँ," उनके मुख स्वर्ग की महिमा से ही चमक उठे।
कुछ व्यक्ति आत्मिक मार्गदर्शन के लिए मेरे पास इसलिए आए हैं क्योंकि उन्हें अन्यों ने भ्रमित कर दिया था। एक महिला, जो मुझसे भेंट करने आई, ने बताया कि उसने मुझे
p. 3प्रचार करते नहीं सुना था, परन्तु वह मेरे प्रवचन पढ़ती रही थी, और परमेश्वर को यह भाया था कि उन्हें उसके लिए आशीषित करे, न केवल उसके दोष-बोध के लिए, वरन उसके प्राण-परिवर्तन के लिए भी। वह उद्धारकर्ता को पा लेने के आनन्द से भरी हुई अपने पल्ली के पादरी के पास गई, और उसे अपनी प्रसन्नता बताने लगी, और यह कि वह कैसे आनन्दित थी कि उसके सब पाप मिटा दिए गए हैं।
उसने उसे रोक दिया, और कहा, "भली महिला, यह सब भ्रम है ; जब तक आप कई वर्षों तक भक्ति और समर्पण का जीवन न बिता लें, तब तक आपको यह विश्वास करने का कोई अधिकार नहीं है कि आपके पाप क्षमा हो गए हैं।" वह उदास होकर चली गई, और मेरे पास यह पूछने आई कि क्या पादरी ने जो कहा वह सच था ; और जब मैंने वह पद सुनाया, "जिस क्षण पापी विश्वास करता है, और अपने क्रूसित परमेश्वर पर भरोसा रखता है, उसी क्षण उसे क्षमा मिल जाती है, उसके लोहू से पूर्ण छुटकारा मिल जाता है ;" "ओह!" उसने कहा, "अब मैं इसे स्पष्ट रूप से समझ गई हूँ ;" और जब मैंने आगे उसे बताया कि जिन बहुतों ने मसीह पर विश्वास किया था, वे एक क्षण घोर पापी थे, और अगले ही क्षण, केवल मसीह पर अपने को डाल देने से, हिम के समान श्वेत हो गए, और उन्हें तुरन्त शान्ति मिल गई, तो वह मसीह की उन अनमोल प्रतिज्ञाओं को अपने हृदय में ग्रहण करने से रुक न सकी, और यीशु पर विश्वास करके, विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरकर, उसे परमेश्वर की वह शान्ति मिल गई जो सारी समझ से परे है, और वह यीशु में आनन्दित होकर चली गई।
एक बार मैं देहात में प्रचार करने जा रहा था ; और जाने से पहले मुझे एक युवक का लिखा हुआ एक पत्र मिला :— "महोदय,—जब आप इस नगर में आएँ, तो कृपया एक ऐसा प्रवचन दें जो मुझ पर ठीक बैठे ; क्योंकि मैंने सुना है कि हमें सबको अपने को संसार का सबसे दुष्ट प्राणी मानना चाहिए, अन्यथा हमारा उद्धार नहीं हो सकता। मैं ऐसा सोचने की कोशिश करता हूँ, परन्तु नहीं कर पाता, क्योंकि मैं सबसे दुष्ट नहीं रहा हूँ। मैं उद्धार पाना चाहता हूँ, परन्तु मुझे नहीं मालूम कि पर्याप्त पश्चाताप कैसे करूँ।" स्वाभाविक रूप से, मैंने उसे बताया कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य से यह अपेक्षा नहीं रखता कि वह अपने को संसार का सबसे दुष्ट माने, क्योंकि यह कभी-कभी असत्य मान लेना होगा, क्योंकि कुछ मनुष्य दूसरों की अपेक्षा उतने पापी नहीं होते। परमेश्वर जो अपेक्षा रखता है वह यह है कि मनुष्य यह कहे, "मैं अपने बारे में दूसरों के बारे में जितना जानता हूँ उससे अधिक जानता हूँ ; और अपने बारे में जो देखता हूँ, न केवल अपने कर्मों के बारे में, वरन अपने हृदय के बारे में भी, मुझे लगता है कि मुझसे बुरा शायद ही कोई हो। वे प्रकट रूप में अधिक दुष्ट हो सकते हैं ; परन्तु तब मुझे अधिक ज्योति, अधिक सुविधाएँ, अधिक अवसर, अधिक चेतावनियाँ मिली हैं, और इसलिए मैं, कम-से-कम अपनी दृष्टि में, उनसे अधिक दोषी हूँ।" कुछ मित्रों ने वास्तव में उसी बात को बाधा बना लिया है जिसके लिए उन्हें सबसे अधिक धन्यवादी होना चाहिए था। एक उत्तम और सौम्य युवती ने, जब परमेश्वर की ओर परिवर्तित हुई, तो मुझसे कहा, "आप जानते हैं महोदय, मैं लगभग यह चाहती थी कि मैं उन्हीं अत्यंत बुरे पापियों में से एक होती जिन्हें आप यीशु के पास आने के लिए इतनी बार आमंत्रित करते हैं, क्योंकि मुझे लगता था कि तब मैं अपनी आवश्यकता को अधिक अनुभव करती ; मेरी यही कठिनाई थी, मैं मसीह की आवश्यकता का अनुभव नहीं कर पाती थी।" यह खेद की बात है कि कोई इस विषय को बाधा बना ले ; तौभी लोग ऐसा करते हैं, और कुछ अन्य विपरीत कारण से कठिनाई उठाते हैं ; वे कहते हैं, "ओह! यदि हम पाप से बचाए गए होते, तो हम मसीह पर भरोसा रख सकते।"
p. 32सच तो यह है कि अविश्वासी प्राण चाहे जिस भी ढंग से जीवन बिता चुके हों, मसीह पर भरोसा नहीं रखेंगे ; क्योंकि किसी न किसी दिशा से वे संदेह का कोई कारण ढूँढ ही लेंगे ; परन्तु जब प्रभु आत्मा उन्हें विश्वास देता है, तो बड़े पापी उतनी ही सरलता से मसीह पर भरोसा रखते हैं जितना वे जो प्रकट रूप से बड़े अपराधी नहीं रहे ; और जो प्रकट पाप से बचाए गए हैं, वे उतने ही आनन्द से उन पर भरोसा रखते हैं जितना सबसे नीच अपराधी।
टैबरनेकल में हमें ऐसे बहुत ही उल्लेखनीय उदाहरण मिले हैं कि परमेश्वर आज भी बहिष्कृत लोगों और सबसे बड़े पापियों को कैसे आशीषित करता है। एक व्यक्ति था, जिसे उस गाँव में, जहाँ वह रहता था, शैतान के नाम से जाना जाता था, क्योंकि वह इतना पूर्ण रूप से भ्रष्ट था। वह एक नाविक था, और चूँकि उस स्थान का एक और नाविक बन्दरगाह के किसी जलपोत के सब नाविकों के प्राण-परिवर्तन का साधन बन गया था, इसलिए यह व्यक्ति उसके साथ यात्रा करना चाहता था कि उसका धर्म उसमें से पीट-पीटकर निकाल दे। उसने अपनी पूरी कोशिश की,—या यों कहें, अपनी पूरी बुराई की,—परन्तु वह बुरी तरह असफल रहा ; और जब जलपोत लंदन पहुँचा, तो उस मसीही व्यक्ति ने उस ईश्वरहीन व्यक्ति से पूछा कि क्या वह टैबरनेकल आएगा। उसे मुझे सुनने आने में कोई आपत्ति नहीं थी, क्योंकि, जैसा हुआ, मैं उस स्थान के निकट ही पला-बढ़ा था जहाँ वह रहता था। यह "शैतान" प्रभु के दिन की सुबह आया, जब वचन प्राण-हत्या के विषय में था ; और पवित्र आत्मा द्वारा वचन को उसके हृदय पर कृपापूर्वक लागू किए जाने से, वह प्रवचन के दौरान इस प्रकार बैठकर सिसकियाँ भरने और रोने लगा कि वह केवल यही कह सका, "लोग मुझ पर ध्यान दे रहे हैं, मुझे बाहर चले जाना चाहिए" परन्तु उसके साथी ने उसे बाहर जाने नहीं दिया ; और उस दिन से, वह मसीह यीशु में एक नई सृष्टि बन गया, और वह सत्य में जीवित और चलता हुआ है, एक सच्चा विश्वासी, अपने सिद्धान्तिक ज्ञान में अद्भुत रूप से स्पष्ट, और मसीह के राज्य के प्रसार के लिए जो कुछ भी वह कर सकता है वह करता है।
एक अन्य अवसर पर, प्रभु के दिन की सुबह, मैंने उस कोढ़ी के वचनों पर प्रचार किया, जिसने यीशु से कहा था, "प्रभु, यदि तू चाहे, तो तू मुझे शुद्ध कर सकता है।"
अगले गुरुवार की सुबह, मुझे यह पत्र मिला :— "महोदय,— मुझे आपको यह बताते हुए बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि प्रभु ने समाज की एक बेचारी बहिष्कृत को क्षमा कर दिया है। मैं भीड़ में आपके स्थान में इस आशा से घुस गई कि कोई मुझे न देखे। मैं पूरी रात बाहर रही थी, और अत्यंत दुखी थी। जब आप कोढ़ी के विषय में प्रचार कर रहे थे, तो मेरा सारा पापमय जीवन मेरे सामने उठ आया। मैंने अपने को उस कोढ़ी से भी बदतर पाया, सबके द्वारा त्यागी हुई ; कोई ऐसा पाप नहीं था जिसकी मैं दोषी न रही होऊँ। जैसे-जैसे आप आगे बढ़े, मैंने सीधे यीशु की ओर देखा। एक कृपापूर्ण उत्तर आया, 'तेरे पाप, जो बहुत हैं, क्षमा किए गए हैं।' मैंने आपके प्रवचन का बाकी भाग फिर कभी नहीं सुना, मुझे इतना आनन्द हुआ यह सोचकर कि यीशु एक बेचारी वेश्या के लिए भी मरे। इस पत्र के आपके हाथ में पहुँचने से बहुत पहले, मुझे विश्वास है कि मैं अपने उस प्रिय घर की ओर जा रही होऊँगी जिससे मैं भाग गई थी। कृपया मेरे लिए प्रार्थना करें कि मैं परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से सुरक्षित रखी जाऊँ। मैं आपको यीशु के पास लाने के लिए कभी पर्याप्त धन्यवाद नहीं दे सकती।" यदि घर जाने के उस वाक्य का उल्लेख न होता, तो मुझे उसके प्राण-परिवर्तन के विषय में कुछ सन्देह हो सकता था ; परन्तु जब कोई पतित लड़की अपने पिता और माता के घर लौट जाती है, तो यह निश्चित प्रमाण है। इस पत्र ने मुझे बड़ा आनन्द दिया ; प्राणों को उद्धार पाते देखना मेरे लिए स्वर्ग के समान है।
p. 4मेरी सेवकाई के दौरान न केवल परिवर्तितों में महान विविधता रही है, वरन उनके प्राण-परिवर्तन के लिए आशीषित साधन भी अत्यंत विविध रहे हैं। एक भाई ने, जब वह कलीसिया में सम्मिलित होने आया, हमें बताया कि एक ईश्वरहीन अजनबी के रूप में वह ठीक उस समय एक्सेटर हॉल में जा रहा था जब मैंने चार्ल्स वेस्ली का भजन "यीशु, मेरे प्राण के प्रियतम" आरम्भ करवाया। उसने अपने से कहा, "क्या यीशु सचमुच मुझसे प्रेम करते हैं? तो फिर मुझे उनके साथ शत्रुता में क्यों जीना चाहिए?" वहीं और उस समय, वह प्रभु की ओर फिर गया ; और कुछ ही समय बाद, वह निडरता से सामने आया, और मसीह में अपने विश्वास को अंगीकार किया, और अन्यों को उद्धारकर्ता के पास ले जाने के लिए यथासम्भव प्रयास किया।
मुझे याद है एक मित्र मेरे पास आया, और बड़ी गम्भीरता से कहा, "महोदय, मैं टैबरनेकल में एक स्थान लेना चाहूँगा।" मैंने उत्तर दिया, "अच्छा, अवश्य ऐसा करो ; मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है जब लोग ऐसा करते हैं।" "परन्तु," उसने कहा, "मैं वह पूरा न कर सकूँ जो आप मुझसे आशा रखते हैं, क्योंकि मैंने सुना है कि यदि मैं यहाँ स्थान लूँ, तो आप आशा रखेंगे कि मैं प्राण-परिवर्तित हो जाऊँ, और मैं इसकी प्रतिज्ञा नहीं कर सकता।" "नहीं," मैंने उत्तर दिया, "मैं तुमसे इसकी प्रतिज्ञा नहीं चाहता ; मेरा 'आशा' शब्द का अर्थ उस भाव में बिल्कुल नहीं है ; परन्तु मुझे आशा तो है कि ऐसा ही होगा।" "ओह!" उसने पुकार कर कहा, "और मुझे भी वैसी ही आशा है ; मैं ठीक उसी उद्देश्य से स्थान लेने जा रहा हूँ।" और वैसा ही हुआ ; निःसन्देह वैसा ही हुआ। जब उस व्यक्ति ने ऐसी इच्छा की, तो परमेश्वर ने उस इच्छा को स्वीकार किया, और प्रार्थना सुनी, और वह मसीह के पास लाया गया, और कलीसिया में सम्मिलित हो गया।
एक भाई ने, बपतिस्मा लेने से पहले अपनी गवाही देते हुए, कहा : "जब मैं पहली बार टैबरनेकल में मि. स्पर्जन को सुनने आया, तो यदि आप मुझसे मेरे विषय में पूछते, तो मैं आपको बताता कि मैं न्यूइंग्टन में रहने वाले किसी भी व्यक्ति जितना ही धर्मात्मा हूँ, और निश्चय ही, किसी भी मण्डली का भाग बने किसी भी व्यक्ति जितना ही भला हूँ ; परन्तु जब मैंने उस दिन सुसमाचार सुना तो यह सब उलट गया। मैं उस भवन से इस अवस्था में बाहर निकला जैसे मेरा हर पंख उखाड़ लिया गया हो। मैंने अपने को पृथ्वी पर हो सकने वाला सबसे दुःखी पापी अनुभव किया, और मैंने कहा, 'मैं उस व्यक्ति को फिर कभी सुनने नहीं जाऊँगा, क्योंकि उसने मुझे पूरी तरह बिगाड़ दिया है।' परन्तु यही वह सबसे उत्तम बात थी जो मेरे साथ हो सकती थी ; मुझे अपने आप से और अपनी सब सामर्थ्य से मुँह मोड़कर परमेश्वर की ओर, और उसके सर्वशक्तिमान अनुग्रह की ओर देखने पर विवश किया गया, और यह समझने पर कि मुझे अपने सृष्टिकर्ता के हाथ के नीचे से फिर से गुज़रना होगा, अन्यथा मैं आनन्द के साथ उनका मुख कभी नहीं देख सकता। मैंने अपनी धार्मिकता को गन्दे कपड़ों के समान घृणित मानना सीखा, जो केवल आग के योग्य है, और तब मैंने मसीह की सिद्ध धार्मिकता से वस्त्रधारी होने की खोज की।"
एक अन्य व्यक्ति, जो हमारे साथ कलीसियाई सहभागिता में सम्मिलित होने आया, अपने प्राण-परिवर्तन का श्रेय अप्रत्यक्ष रूप से एक यहूदी को देता था। वह टैबरनेकल के पास से गुज़रने वाली एक बस में एक * आशीष के उन रुचिकर उदाहरणों में से, जिन्हें मि. स्पर्जन ने स्वयं दर्ज नहीं किया, यह भी था, जिसे एक मित्र ने बताया :— "मि. स्पर्जन एक प्रमुख चैपल में प्रचार करने गए, और परिवार के डीकन के घर पर चाय पीने के बाद, वे घराने के पुत्र के मार्गदर्शन में आराधना-स्थल की ओर पैदल चले। 'क्या तुम मेरे स्वामी से प्रेम करते हो?' यह वह प्रश्न था जो पास्टर ने अपने स्पष्ट, पुरुषोचित ढंग से अपने युवा साथी से पूछा। उत्तर देने से पहले, वह गली में ठहर गया, और अपने प्रश्नकर्ता की आँखों में सीधे देखते हुए बोला, 'मि. स्पर्जन, मैं कई वर्षों से सेवकों के साथ इस चैपल तक पैदल आता रहा हूँ, और उनमें से किसी ने भी मुझसे पहले कभी ऐसा प्रश्न नहीं पूछा।' वह विश्वासयोग्य शब्द एक नए जीवन का आरम्भ बन गया ; और परमेश्वर को खोजते हुए, उसने मसीह के द्वारा क्षमा और शान्ति पाई।"
रविवार को, यात्रा कर रहा था, और सदा की भाँति बाहर एक भीड़ खड़ी थी, द्वार खुलने की प्रतीक्षा में। उसके पास बैठा व्यक्ति एक भलीभाँति जाना-पहचाना यहूदी था। "अरे!" उस व्यक्ति ने कहा, "वह पाखण्डी सदा लोगों को खींच लाता है।" यहूदी ने उसकी ओर मुड़कर पूछा, "क्या तुम्हें ऐसी ही भीड़ अपनी दुकान के आस-पास देखना अच्छा नहीं लगेगा? मैं तो उन्हें अपने व्यापार-स्थल पर सहर्ष स्वागत करता। मैं यहाँ से इन अट्ठाईस वर्षों में कई बार गुज़रा हूँ, और सदा ठीक वैसी ही भीड़ भीतर जाने की प्रतीक्षा करते देखी है।
अब, यदि तुम्हारी दुकान अट्ठाईस वर्षों से इस प्रकार भरी रहती, और कोई कहता कि तुम अच्छा माल नहीं बेचते, तो तुम क्या उत्तर देते? तुम सम्भवतः यही उत्तर देते कि वे लोग अच्छे परखने वाले हैं, और यदि तुम संतोषजनक माल न देते, तो वे आते ही न रहते। अब, मैं एक यहूदी हूँ, तौभी मेरा मन भीतर जाकर यह सुनने को हो रहा है कि मि. स्पर्जन क्या कहते हैं, क्योंकि मैं देखता हूँ कि लोगों की ऐसी भीड़ उन्हें सुनने जाती है।" जिस व्यक्ति ने पहले वह अपमानजनक टिप्पणी की थी, वह अपने साथी की बात से बहुत प्रभावित हुआ, और हमें यह बताते हुए कि इसका उस पर कैसा प्रभाव पड़ा, उसने कहा, "मुझे पता चला कि मैं गलत माल खरीद रहा था, और मुझे लगा कि यहूदी ने बहुत बुद्धिमानी की बात कही है, इसलिए मैंने निश्चय किया कि मैं जाकर स्वयं देखूँगा और सुनूँगा।" वह आया, जो माल बिक्री के लिए प्रस्तुत था उसकी जाँच की, और सुसमाचार की शर्तों पर उसे खरीद लिया, "बिना पैसे और बिना दाम के।"
एक सब्त की सन्ध्या, टैबरनेकल में प्रचार करते हुए, मुझे यह कहने की प्रेरणा हुई : "प्रिय माता, यदि आपने अपनी बेटी से कभी उसके प्राण के विषय में बात नहीं की है, तो आज ही रात यह करें। 'परन्तु,' आप कहेंगी, 'जब मैं घर पहुँचूँगी, तब वह सो रही होगी।' यदि ऐसा है, तो उसे जगा दें, परन्तु आज रात उससे बात और प्रार्थना करें ; और फिर उसे फिर से सो जाने दें ; यदि आज तक इसे टालती रही हैं, तो अभी इस पवित्र सेवा को आरम्भ कर दें।" एक भली महिला, जो उपस्थित थी, सीधे घर गई, और ठीक वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था ; उसने अपनी बेटी को जगाया, और उसे उद्धारकर्ता के विषय में बताना आरम्भ किया। उस प्रिय लड़की ने कहा, "ओह, माँ! मुझे प्रसन्नता है कि आपने मुझसे यीशु के विषय में बात की ; मैं महीनों से यही चाहती रही हूँ कि आप ऐसा करें।" इसके कुछ ही समय बाद माँ अपनी बेटी को कलीसिया में सम्मिलित होने के विषय में मुझसे मिलाने लाई, और तब मुझे बताया कि यह आशीष उसे किस प्रकार मिली।
विभिन्न अवसरों पर, प्रभु ने मेरी मण्डली से की गई एक अत्यंत सरल विनती पर अपनी मुहर लगाई है। मैंने उपस्थित लोगों से कहा कि जब वे पहुँच जाएँ अपने
घरों में, कुछ समय शान्ति और एकान्त में बिताएँ, और तब, जब उन्होंने परमेश्वर की दृष्टि में अपनी अवस्था पर निष्ठापूर्वक विचार कर लिया हो, तो पेन्सिल और कागज़ उठाएँ, और दो शब्दों में से एक लिखें। यदि उन्हें ऐसा लगे कि वे प्रभु यीशु मसीह में विश्वासी नहीं हैं, तो मैंने उन्हें 'दण्डित' शब्द लिखने को कहा ; परन्तु यदि वे उद्धार के लिए केवल उन्हीं पर भरोसा रखते हों, तो कागज़ पर 'क्षमा-प्राप्त' शब्द लिखें। इस प्रकार कई मित्र मसीह के लिए निश्चय करने पर लाए गए ; उनमें से एक युवक था, जिसने पहले 'दण्डित' शब्द लिखा ; परन्तु जब उसने उसे देखा, तो उसके आँसू बहने लगे, और उसका हृदय टूटने लगा ; और थोड़ी ही देर में, वह मसीह की ओर भाग गया, कागज़ को आग में डाल दिया, दूसरा टुकड़ा लिया, उस पर 'क्षमा-प्राप्त' शब्द लिखा, और तुरन्त मुझे यह
p. 35शुभ समाचार बताने और यह विनती करने आया कि उसे कलीसियाई सहभागिता में सम्मिलित किया जाए। एक अन्य घटना में, एक व्यक्ति घर गया, और अपनी पत्नी को बताया कि वह 'दण्डित' शब्द लिखने जा रहा है ; उसने उससे व्यर्थ विनती की, क्योंकि उसने पेन्सिल उठा ली, और अभी 'द' अक्षर बनाने ही जा रहा था ; परन्तु उसकी छोटी बेटी, जो एक मसीही लड़की थी, ने उसका हाथ थाम लिया, और कहा, "नहीं, पिता, आप इसे नहीं लिखेंगे ;" और उसकी पत्नी और बच्ची की संयुक्त विनतियों से, वह व्यक्ति उद्धारकर्ता के पास लाया गया, और बाद में उनके साथ टैबरनेकल में सदस्य बन गया।
मेरा अनुभव यह दिखाता है कि ऐसे भी व्यक्ति परमेश्वर की ओर परिवर्तित हुए हैं जिन सिद्धान्तों के द्वारा, जिन्हें कुछ लोग ऐसा परिणाम उत्पन्न करने के लिए सर्वथा असम्भावित मानते।
मैंने पुनरुत्थान के सिद्धान्त को पापियों को मसीह के पास लाते देखा है ; मैंने सुना है कि बहुत से लोग चुनाव के सिद्धान्त पर दिए गए किसी प्रवचन से उद्धारकर्ता के पास लाए गए,—ठीक वैसे ही लोग, जो, जितना मैं देख सकता हूँ, कभी न पहुँचे होते यदि वह सत्य संयोग से ऐसा नुकीला सिद्धान्त न होता जिसने उनके हृदय पर ठीक सही जगह चोट की, और उनकी प्रकृति की दरारों में जा बैठा। मैंने अक्सर व्यवस्था पर एक भयानक प्रवचन दिया है, और बाद में पाया है कि पापियों को उससे शान्ति मिली है। परमेश्वर अक्सर वचन को ठीक उसके विपरीत ढंग से आशीषित करता है जैसा मैंने सोचा था कि वह आशीषित होगा, और वह बहुत, बहुत से लोगों को उन सिद्धान्तों के द्वारा उनकी स्वाभाविक अवस्था जानने के लिए लाता है जिनके विषय में मैंने सोचा होता कि वे विश्वासियों को शान्ति देने के अधिक अनुकूल होंगे न कि अपरिवर्तितों को जगाने के। मैं निरंतर परमेश्वर की सर्वसत्ता के महान मूल सत्य की ओर लौटने पर विवश हो जाता हूँ, और मुझे यह अनुभव करना पड़ता है कि, अनुग्रह में और विधान में समान रूप से, "परमेश्वर रहस्यमय ढंग से चलता है, अपने आश्चर्यकर्मों को सिद्ध करने के लिए।" एक दिन मैं एक वृद्ध सेवक से बातें कर रहा था ; और मैंने देखा कि उन्होंने अपने कोट की भीतरी जेब में हाथ डाला, और एक पत्र निकाला जो लगभग टुकड़ों में फटा हुआ था।
जैसे ही उन्होंने उसे खोला, वे बोले, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपको आशीष दे, महोदय! सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपको आशीष दे, महोदय!" मैंने कहा, "धन्यवाद, प्रिय महोदय, इस आशीर्वचन के लिए, परन्तु आप मुझे यह क्यों दे रहे हैं?" उस भले व्यक्ति ने उत्तर दिया, "मेरा एक पुत्र था, जिसे मैं अपने बुढ़ापे का सहारा समझता था ; परन्तु उसने अपने को लज्जित किया, और घर से भाग गया, और मुझे नहीं मालूम था कि वह कहाँ गया, केवल यह कि उसने कहा था कि वह अमेरिका जा रहा है।"
जब सेवक ने मुझे अपनी कथा इतनी सुना दी, तो उन्होंने मुझसे वह पत्र पढ़ने को कहा जो इस प्रकार था :— "प्रिय पिता,— मैं यहाँ अमेरिका में हूँ : मुझे एक नौकरी मिल गई है, और परमेश्वर ने मुझे समृद्ध किया है। मैं आपसे उन बहुत से अन्यायों के लिए क्षमा माँगने के लिए लिख रहा हूँ जो मैंने आपके साथ किए हैं, और उस दुःख के लिए भी जो मैंने आपको दिया है ; और यह बताने के लिए कि परमेश्वर धन्य हो, मुझे उद्धारकर्ता मिल गए हैं। मैं यहाँ की कलीसिया में सम्मिलित हो गया हूँ, और आशा रखता हूँ कि अपना जीवन छुड़ानेवाले की सेवा में बिताऊँगा। यह महान परिवर्तन इस प्रकार हुआ। जिस दिन मैं प्रस्थान करने की आशा रखता था, उस दिन मैं अमेरिका के लिए नहीं जा सका ; और, एक खाली घण्टा पाकर, मैं यह देखने टैबरनेकल गया कि वह कैसा है, और वहाँ
p. 36परमेश्वर मुझसे मिले। अपने प्रवचन में मि. स्पर्जन ने कहा, 'सम्भव है यहाँ कोई भगोड़ा पुत्र बैठा हो। प्रभु उसे अपने अनुग्रह से बुलाए!' और उन्होंने मुझे बुलाया।" "अब," सेवक ने कहा, जैसे ही उन्होंने पत्र को मोड़कर फिर से अपनी जेब में रख लिया, "मेरा यह पुत्र अब मर चुका है, और वह स्वर्ग जा चुका है ; और मैं आपसे प्रेम करता हूँ, और जीवनभर करता रहूँगा, क्योंकि आप ही उसे मसीह के पास लाने का साधन बने।" यह कहना बहुत कठिन है कि इस भटकते हुए पुत्र के, जो इस प्रकार प्रभु के पास लाया गया, आनन्द में साथ हो लेते हुए, हम दोनों में से कौन अधिक आनन्दित था।
एक अन्य अवसर पर, एक लड़का, जो अभी समुद्री यात्रा पर जाने ही वाला था, टैबरनेकल आया, और प्राण-परिवर्तित हुआ ; और कुछ ही घण्टों बाद, वह स्वर्ग में था। उसने अपने माता-पिता को यह बताने के लिए लिखा कि उसे उद्धारकर्ता मिल गए हैं ; और ठीक जब वे उसका पत्र पढ़ रहे थे, तभी उन्हें यह समाचार मिला कि जिस जलपोत पर वह गया था, उसकी टक्कर हो गई थी, और वह डूब गया था।
दो जिज्ञासु व्यक्ति मेरी विश्रामिका में मेरे पास आए। वे थोड़े ही समय से मुझसे सुसमाचार सुन रहे थे, परन्तु वे उससे गहराई से प्रभावित हुए थे। उन्होंने यह खेद व्यक्त किया कि वे दूर जाने वाले थे, परन्तु यह धन्यवाद भी दिया कि उन्हें मुझे सुनने का अवसर मिला। मैं उनके कृपापूर्ण धन्यवाद से प्रसन्न हुआ, परन्तु मुझे यह चिन्ता हुई कि उनमें एक और अधिक प्रभावी कार्य होना चाहिए, इसलिए मैंने उनसे पूछा, "क्या आपने सचमुच प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास किया है? क्या आप उद्धार पा चुके हैं?" उनमें से एक ने उत्तर दिया, "मैं विश्वास करने की पूरी कोशिश कर रही हूँ।" मैं यह कथन अक्सर सुनता आया हूँ, परन्तु मैं इसे बिना चुनौती दिए कभी नहीं जाने देता। "नहीं," मैंने कहा, "यह काम नहीं चलेगा। क्या आपने कभी अपने पिता से कहा है कि आप उन पर विश्वास करने की कोशिश कर रही हैं?" कुछ देर इस विषय पर ठहरने के बाद, उन्होंने माना कि ऐसी बात उनके पिता का अपमान होती। तब मैंने उनके सामने सुसमाचार को यथासम्भव सरल भाषा में स्पष्टता से प्रस्तुत किया, और उनसे विनती की कि वे यीशु पर विश्वास करें, जो सबसे उत्तम पिता से भी अधिक विश्वास के योग्य हैं।
उनमें से एक ने उत्तर दिया, "मुझे यह अनुभव नहीं होता ; मुझे यह अनुभव नहीं होता कि मैं उद्धार पा चुकी हूँ।" तब मैंने आगे कहा, "परमेश्वर अपने पुत्र के विषय में गवाही देता है, कि जो कोई प्रभु यीशु मसीह पर भरोसा रखता है वह उद्धार पाता है। क्या आप अब उसे झूठा बनाएँगी, या उसके वचन पर विश्वास करेंगी?" जब मैं ऐसा कह ही रहा था, तो उनमें से एक चौंक उठी जैसे विस्मित हो गई हो, और उसने चिल्लाकर हम सबको चौंका दिया, "ओह महोदय, मैं यह सब समझ गई ; मैं उद्धार पा चुकी हूँ! मेरे लिए यीशु को धन्य कहिए ; उन्होंने मुझे मार्ग दिखाया है, और उन्होंने मुझे उद्धार दिया है। मैं यह सब समझ गई।" जो आदरणीय बहन इन मित्रों को मेरे पास लाई थी, वह उनके साथ घुटने टेककर बैठ गई, जबकि हम सब ने अपने पूरे हृदय से एक प्राण को ज्योति में लाए जाने के लिए प्रभु को धन्य कहा और उसकी महिमा की। परन्तु दूसरी युवती अपनी साथी की भाँति सुसमाचार को नहीं समझ सकी, यद्यपि मुझे विश्वास है कि वह भी शीघ्र ऐसा करेगी ; परन्तु यह विचित्र लगा कि दोनों ने वही शब्द सुने, तथापि एक स्पष्ट ज्योति में आ गई, और दूसरी अन्धकार में ही रह गई।