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पवित्रीकरण (क्रमशः)
कि वे "पवित्रीकरण" के विषय में कुछ नहीं जानते। एक सच्चा पवित्र जन, हिजकिय्याह के समान, पूरे मन से लगा रहेगा। वह सब बातों के विषय में परमेश्वर की आज्ञाओं को ठीक मानेगा और "हर एक झूठे मार्ग से घृणा" करेगा (2 इतिहास 31:21; भजन संहिता 119:104)।
6. सच्चा पवित्रीकरण इस रूप में प्रकट होगा कि मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था का नित्य आदर करे और उसे जीवन का नियम मानकर उसके अनुसार चलने का नित्य प्रयत्न करे। इससे बड़ी भूल कोई नहीं कि कोई यह समझ ले कि मसीही का व्यवस्था और दस आज्ञाओं से कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि वह उनके पालन से धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। वही पवित्र आत्मा, जो विश्वासी को व्यवस्था के द्वारा पाप का कायल करता है और धर्मी ठहराए जाने के लिये उसे मसीह के पास ले जाता है, पवित्रीकरण की खोज में व्यवस्था को एक मित्र-मार्गदर्शक के रूप में आत्मिक रीति से काम में लाने की ओर भी उसे सदा ले चलेगा। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने दस आज्ञाओं को कभी हल्का नहीं जाना; इसके विपरीत, अपने पहले सार्वजनिक प्रवचन, अर्थात् पहाड़ी उपदेश में, उसने उनकी व्याख्या की और उनकी माँगों की गहराई दिखाई। पौलुस ने भी व्यवस्था को कभी हल्का नहीं जाना; इसके विपरीत वह कहता है, "यदि कोई उसे व्यवस्था की रीति पर काम में लाए तो व्यवस्था भली है।" "मैं भीतरी मनुष्यत्व से परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ" (1 तीमुथियुस 1:8; रोमियों 7:22)। जो पवित्र जन होने का दावा करता है, और साथ ही दस आज्ञाओं की खिल्ली उड़ाता है और झूठ, कपट, ठगी, क्रोधी स्वभाव, निन्दा, मतवालेपन और सातवीं आज्ञा के उल्लंघन को कुछ नहीं समझता, वह भयानक भ्रम में पड़ा है। अन्तिम दिन में यह सिद्ध करना उसके लिये कठिन होगा कि वह "पवित्र जन" है!
7. सच्चा पवित्रीकरण इस रूप में प्रकट होगा कि मनुष्य मसीह की इच्छा पूरी करने और उसके व्यावहारिक उपदेशों के अनुसार जीवन बिताने का नित्य प्रयत्न करे। ये उपदेश चारों सुसमाचारों में जगह-जगह बिखरे हुए मिलते हैं, और विशेष करके पहाड़ी उपदेश में। जो यह समझता है कि वे पवित्रता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नहीं कहे गए थे और मसीही को अपने प्रतिदिन के जीवन में उन पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं, वह वास्तव में पागल से बहुत अच्छा नहीं, और किसी भी दशा में घोर अज्ञानी मनुष्य है। कुछ लोगों की बातें सुनकर और कुछ लोगों के लेख पढ़कर कोई यह सोच सकता है
