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पवित्रीकरण (क्रमशः)
प्रमाण, जब बड़ा श्वेत सिंहासन लगाया जाएगा, जब पुस्तकें खोली जाएँगी, जब क़ब्रें अपने निवासियों को लौटा देंगी, जब मृतक परमेश्वर के न्यायालय के सामने खड़े किए जाएँगे, तब एकमात्र आवश्यक वस्तु प्रमाण ही होगा। यदि हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण न हो कि मसीह में हमारा विश्वास सच्चा और वास्तविक था, तो हम केवल दोषी ठहराए जाने के लिये ही जी उठेंगे। मुझे ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिखाई देता जो उस दिन स्वीकार किया जाएगा, सिवाय पवित्रीकरण के। प्रश्न यह नहीं होगा कि हमने कैसी बातें कीं और क्या अंगीकार किया, परन्तु यह कि हम कैसे जीए और हमने क्या किया। कोई इस विषय में अपने आप को धोखा न दे। यदि भविष्य के विषय में कुछ भी निश्चित है, तो यह निश्चित है कि न्याय होगा; और यदि न्याय के विषय में कुछ भी निश्चित है, तो यह निश्चित है कि मनुष्यों के "कर्मों" और "कामों" पर उसमें विचार और जाँच की जाएगी (यूहन्ना 5:29; 2 कुरिन्थियों 5:10; प्रकाशित वाक्य 20:13)। जो यह समझता है कि कर्म महत्त्वहीन हैं क्योंकि वे हमें धर्मी नहीं ठहरा सकते, वह बहुत अज्ञानी मसीही है। यदि उसने अपनी आँखें न खोलीं, तो उसे अपनी हानि उठाकर यह जानना पड़ेगा कि यदि वह अनुग्रह के किसी प्रमाण के बिना परमेश्वर के न्यायालय के सामने आया, तो उसके लिये अच्छा होता कि वह कभी जन्मा ही न होता।
12. अन्तिम बात यह है कि पवित्रीकरण हमें स्वर्ग के लिये प्रशिक्षित करने और तैयार करने के लिये नितान्त आवश्यक है। अधिकतर लोग आशा करते हैं कि मरने पर वे स्वर्ग जाएँगे; परन्तु भय है कि थोड़े ही यह विचार करने का कष्ट उठाते हैं कि यदि वे वहाँ पहुँच भी गए तो क्या उन्हें स्वर्ग में आनन्द मिलेगा। स्वर्ग अपने स्वभाव से ही एक पवित्र स्थान है; उसके सब निवासी पवित्र हैं; उसके सब कार्य पवित्र हैं। स्वर्ग में सचमुच सुखी होने के लिये यह स्पष्ट और सीधी बात है कि जब तक हम पृथ्वी पर हैं, तब तक हमें कुछ-न-कुछ स्वर्ग के लिये प्रशिक्षित और तैयार किया जाना चाहिए। मृत्यु के बाद किसी शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) की धारणा, जो पापियों को सन्त बना दे, मनुष्य की गढ़ी हुई झूठी बात है और बाइबल में कहीं नहीं सिखाई गई। यदि हमें आगे महिमा में सन्त होना है, तो मरने से पहले ही हमें सन्त होना चाहिए। बहुतों का प्रिय विचार यह है कि मरते हुए मनुष्यों को अपने इस बड़े परिवर्तन के योग्य होने के लिये क्षमा और पापों के मोचन के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए; यह एक गहरा भ्रम है। हमें मसीह के कार्य के साथ-साथ पवित्र आत्मा के कार्य की भी आवश्यकता है; हमें प्रायश्चित्त करनेवाले लहू के साथ-साथ हृदय के नए किए जाने की भी आवश्यकता है; हमें धर्मी ठहराए जाने के साथ-साथ पवित्र किए जाने की भी आवश्यकता है।
