VIII

प्रार्थना के विषय में पालन करने योग्य कुछ नियम, जैसे समय, दृढ़ता, मन की भावना

Of Prayer · John Calvin

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प्रार्थना के विषय में पालन करने योग्य कुछ नियम, जैसे समय, दृढ़ता, मन की भावना

VIII.

प्रार्थना के विषय में पालन करने योग्य कुछ नियम,

जैसे समय, दृढ़ता, मन की भावना

और विश्वास की निश्चयता

50. यद्यपि ऊपर (खण्ड 7, 27 आदि) कहा जा चुका है कि हमें सदैव अपने मन को परमेश्वर की ओर उठाए रखना और निरन्तर प्रार्थना करनी चाहिए, तथापि हमारी निर्बलता ऐसी है कि उसे सहारे की आवश्यकता है, और हमारी जड़ता ऐसी है कि उसे उकसाए जाने की आवश्यकता है; इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि इस अभ्यास के लिए कुछ विशेष घड़ियाँ ठहरा लें, ऐसी घड़ियाँ जो बिना प्रार्थना के बीतने न पाएँ, और जिनमें हमारे मन की समस्त भावनाएँ पूर्ण रूप से इसी में लगी रहें; अर्थात् जब हम प्रातः उठते हैं, जब हम दिन का काम आरम्भ करने से पहले होते हैं, जब हम भोजन करने बैठते हैं, जब परमेश्वर की आशीष से भोजन कर चुकते हैं, और जब हम विश्राम के लिए लेटने जाते हैं। फिर भी यह घड़ियों का अन्धविश्वासी पालन नहीं होना चाहिए, कि मानो परमेश्वर के प्रति एक कर्तव्य निभाकर हम यह समझ लें कि अन्य घड़ियों के विषय में हम छूट गए; वरन् इसे एक ऐसा अनुशासन समझा जाए जिसके द्वारा हमारी निर्बलता अभ्यास पाती और बार-बार उकसाई जाती रहे। विशेष रूप से यह हमारी चिन्ता होनी चाहिए कि जब कभी हम स्वयं किसी संकट से दबे हों, या दूसरों को दबा हुआ देखें, तो तुरन्त न केवल तेज़ कदमों से वरन् तत्पर मन से उसी की शरण लें; और फिर, चाहे हम पर या दूसरों पर कोई भी सुख-समृद्धि आए, हम स्तुति और धन्यवाद के द्वारा उसके हाथ को पहचानने की अपनी गवाही देना न भूलें। अन्त में, अपनी सब प्रार्थनाओं में हमें सावधानी से इससे बचना चाहिए कि हम परमेश्वर को कुछ परिस्थितियों में बाँधना चाहें, या उसके लिए कार्य करने का समय, स्थान अथवा रीति ठहराएँ। इसी प्रकार इस प्रार्थना से हमें यह सिखाया जाता है कि हम उस पर कोई नियम न थोपें और कोई शर्त न लगाएँ, वरन् यह पूर्णतः उसी पर छोड़ दें कि विधि, समय और स्थान के विषय में जो मार्ग उसे उत्तम लगे वही अपनाए। क्योंकि अपने लिए कोई विनती करने से पहले हम यह माँगते हैं कि उसकी इच्छा पूरी हो, और ऐसा करके अपनी इच्छा को उसकी इच्छा के अधीन कर देते हैं, मानो उस पर लगाम लगा दी हो, ताकि वह परमेश्वर को नियम देने का साहस करने के बजाय उसे अपनी सब कामनाओं का शासक और व्यवस्थापक माने।

51. यदि इस प्रकार आज्ञाकारिता के लिए ढले हुए मन से हम अपने आप को ईश्वरीय विधान के नियमों के द्वारा संचालित होने दें, तो हम सहज ही प्रार्थना में दृढ़ बने रहना सीख लेंगे, और अपनी कामनाओं को थामकर धीरज से प्रभु की बाट जोहेंगे, इस निश्चय के साथ कि चाहे इसका आभास कितना ही कम क्यों न हो, वह सदा हमारे साथ है, और अपने ही समय पर दिखा देगा कि वह प्रार्थनाओं की ओर कान बन्द करने से कितना दूर था, यद्यपि मनुष्यों की आँखों को वे अनसुनी-सी लगती हों। यह एक अत्यन्त निकट की सान्त्वना होगी, यदि कभी परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं का तुरन्त उत्तर न दे, क्योंकि यह हमें मूर्छित होने या निराशा में डूबने से रोकेगी, जैसा उन लोगों के साथ होता है जो परमेश्वर को पुकारते हुए अपने ही आवेश में ऐसे बह जाते हैं कि यदि वह उनके पहले ही आग्रह पर न झुके और तुरन्त सहायता न दे, तो वे तुरन्त कल्पना कर लेते हैं कि वह उन पर क्रोधित और अप्रसन्न है, और सफलता की सारी आशा छोड़कर प्रार्थना करना बन्द कर देते हैं। इसके विपरीत, अपनी आशा को सुसंयत धैर्य के साथ टालते हुए, हम उस दृढ़ता के साथ लगे रहें जिसकी पवित्रशास्त्र में हमें इतने ज़ोर से सिफ़ारिश की गई है। भजन संहिता में हम प्रायः देख सकते हैं कि दाऊद और अन्य विश्वासी प्रार्थना करते-करते लगभग थक जाने पर, और ऐसे परमेश्वर को पुकारते हुए जो सुनता नहीं, मानो हवा को पीटते-से प्रतीत होने पर भी, प्रार्थना करना नहीं छोड़ते; क्योंकि परमेश्वर के वचन को उचित अधिकार तभी मिलता है जब उस पर रखा गया विश्वास सब घटनाओं से ऊपर हो। फिर, हम परमेश्वर की परीक्षा न करें, और अपने आग्रह से उसे थकाकर अपने विरुद्ध उसका क्रोध न भड़काएँ। बहुतों की यह रीति है कि वे परमेश्वर के साथ कुछ शर्तों पर औपचारिक सौदा करते हैं, और मानो वह उनकी लालसा का सेवक हो, उसे कुछ बन्धनों में बाँधते हैं; और यदि वह तुरन्त उनका पालन न करे, तो वे क्रोधित और चिड़चिड़े हो जाते हैं, बड़बड़ाते, शिकायत करते और शोर मचाते हैं। इस प्रकार रुष्ट होकर वह प्रायः अपने क्रोध में ऐसे लोगों को वह दे देता है जो वह दूसरों को दया करके कृपापूर्वक नहीं देता। इसका प्रमाण हमें इस्राएलियों में मिलता है, जिनके लिए यह अच्छा होता कि प्रभु उनकी न सुनता, बजाय इसके कि वे उसके क्रोध को अपने मांस के साथ निगलें ( गिनती 11:18 , 33)।

52. परन्तु यदि हमारी इन्द्रियाँ लम्बी प्रतीक्षा के बाद ही यह जान पाती हैं कि प्रार्थना का परिणाम क्या है, या उससे कोई लाभ अनुभव कर पाती हैं, तो भी हमारा विश्वास हमें उस बात का निश्चय दिलाएगा जो इन्द्रियों से जानी नहीं जा सकती, अर्थात् यह कि हमने वही पाया है जो हमारे लिए उचित था, क्योंकि प्रभु ने इतनी बार और इतने निश्चय के साथ वचन दिया है कि जिस क्षण से हमारे सब क्लेश उसकी गोद में रख दिए जाएँ, उसी क्षण से वह उन सब में रुचि लेगा। इस प्रकार हम दरिद्रता में भी भरपूरी, और क्लेश में भी शान्ति पाएँगे। क्योंकि चाहे सब कुछ जाता रहे, परमेश्वर हमें कभी न त्यागेगा, और वह अपने लोगों की आशा और धीरज को निष्फल नहीं कर सकता। वही अकेला सब कुछ के लिए पर्याप्त होगा, क्योंकि उसमें सब भलाई समाई हुई है, और वह उसे अन्त में न्याय के दिन हमारे सामने प्रकट करेगा, जब उसका राज्य स्पष्ट रूप से प्रगट होगा। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि यद्यपि परमेश्वर हमारी विनती पूरी करता है, तो भी वह सदा हमारी प्रार्थनाओं के ठीक शब्दों में उत्तर नहीं देता; वरन् प्रत्यक्ष में हमें अधर में रखता हुआ भी अज्ञात रीति से दिखा देता है कि हमारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं गईं। यूहन्ना के इन शब्दों का यही अर्थ है, “यदि हम जानते हैं कि वह हमारी सुनता है, जो कुछ हम माँगें, तो हम जानते हैं कि जो कुछ हम ने उस से माँगा, वह हमें मिल गया है,” ( 1 यूहन्ना 5:15 )। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यहाँ शब्दों की बड़ी अधिकता है, परन्तु यह घोषणा अत्यन्त उपयोगी है, अर्थात् यह कि परमेश्वर, जब वह हमारी विनतियाँ पूरी नहीं भी करता, तब भी हमारी प्रार्थनाओं को सुनता और उन पर अनुग्रह करता है, जिससे उसके वचन पर टिकी हमारी आशा कभी निराश नहीं होती। परन्तु विश्वासियों को इस धीरज के सहारे की सदा आवश्यकता रहती है, क्योंकि यदि वे उस पर टेक न लगाएँ तो अधिक समय तक खड़े न रह सकेंगे। क्योंकि जिन परीक्षाओं से प्रभु हमें परखता और अभ्यास कराता है वे कठिन हैं; वरन् वह प्रायः हमें अति की सीमा तक ले जाता है, और ले जाकर हमें देर तक कीचड़ में धँसे रहने देता है, तब कहीं अपनी मिठास का कोई स्वाद चखाता है। जैसा हन्ना कहती है, “यहोवा मारता और जिलाता भी है; वह अधोलोक में उतारता और उसमें से निकालता भी है,” ( 1 शमूएल 2:6 )। यदि वे दुःखी, उजाड़ और अधमरे होकर भी इस विचार से सान्त्वना न पाएँ कि परमेश्वर उन पर दृष्टि रखता है और उनकी वर्तमान विपत्तियों का अन्त होगा, तो वे यहाँ और क्या करते सिवाय इसके कि हताश होकर निराशा में जा गिरें? परन्तु उनकी आशाएँ चाहे कितनी ही सुरक्षित क्यों न टिकी हों, वे इस बीच प्रार्थना करना नहीं छोड़ते, क्योंकि दृढ़ता के बिना की गई प्रार्थना का कोई परिणाम नहीं निकलता।

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मोनर्जिज़्म बुक्स

जॉन कैल्विन कृत प्रार्थना के विषय में, कॉपीराइट © 2019

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