अध्याय V

हमारे मध्यस्थ और सहायक के सिद्धान्त के विषय में एक भ्रम का खण्डन, और पवित्र लोगों की मध्यस्थता के पक्ष में दिए जानेवाले प्रमुख तर्कों के उत्तर

Of Prayer · John Calvin

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हमारे मध्यस्थ और सहायक के सिद्धान्त के विषय में एक भ्रम का खण्डन, और पवित्र लोगों की मध्यस्थता के पक्ष में दिए जानेवाले प्रमुख तर्कों के उत्तर

V.

हमारे मध्यस्थ और सहायक के सिद्धान्त के

विषय में एक भ्रम का खण्डन

20. इसके अतिरिक्त, विद्वत्तावादी निरी बकवास के दोषी हैं जब वे यह दावा करते हैं कि मसीह तो छुटकारे का मध्यस्थ है, परन्तु विश्वासी मध्यस्थता की प्रार्थना के मध्यस्थ हैं; मानो मसीह ने केवल एक अस्थायी मध्यस्थता पूरी की हो, और एक चिरस्थायी और अविनाशी मध्यस्थता अपने सेवकों के हाथ छोड़ दी हो। जो लोग केवल उसके आदर का एक तनिक-सा अंश ही छीनने का ढोंग करते हैं, उनके हाथों उसके साथ ऐसा ही व्यवहार तो होता है! पवित्रशास्त्र की भाषा इससे बहुत भिन्न है, जिसकी सरलता से हर भक्त मनुष्य सन्तुष्ट रहेगा, और इन धोखेबाज़ों की ओर ध्यान भी न देगा। क्योंकि जब यूहन्ना कहता है, “यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धार्मिक यीशु मसीह” (1 यूहन्ना 2:1), तो क्या उसका अर्थ केवल इतना है कि एक बार हमारा कोई सहायक था; क्या वह उसे सदा की मध्यस्थता का श्रेय नहीं देता? जब पौलुस घोषणा करता है कि वह “परमेश्वर के दाहिनी ओर है, और हमारे लिए विनती भी करता है” (रोमियों 8:32), तो उसका क्या अर्थ है? और जब दूसरे स्थान में वह घोषणा करता है कि वही परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एकमात्र मध्यस्थ है (1 तीमुथियुस 2:5), तो क्या वह उन विनतियों की ओर संकेत नहीं कर रहा जिनका उसने थोड़ा पहले उल्लेख किया था? पहले यह कह चुकने के बाद कि सब मनुष्यों के लिए प्रार्थनाएँ की जाएँ, वह तुरन्त उसी कथन की पुष्टि में यह जोड़ता है कि परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ भी एक ही है। अगस्तीन भी इससे भिन्न व्याख्या नहीं देते जब वे कहते हैं, “मसीही मनुष्य अपनी प्रार्थनाओं में एक-दूसरे को सौंपते हैं। परन्तु वह, जिसके लिए कोई मध्यस्थता नहीं करता, जबकि वह स्वयं सब के लिए मध्यस्थता करता है, वही एकमात्र सच्चा मध्यस्थ है। यद्यपि प्रेरित पौलुस सिर के अधीन एक प्रमुख अंग था, तथापि मसीह की देह का अंग होने के कारण, और यह जानते हुए कि कलीसिया का सबसे सच्चा महायाजक प्रतीक रूप में नहीं, वरन् दृढ़ और स्पष्ट सत्य के द्वारा, भीतरी परदे में होकर परमपवित्र स्थान में नहीं, बल्कि स्वर्ग के भीतरी पवित्रस्थान में पवित्रता के लिए प्रवेश कर चुका है, वह पवित्रता जो काल्पनिक नहीं वरन् अनन्त है, उसने भी अपने आप को विश्वासियों की प्रार्थनाओं के सुपुर्द किया। वह अपने आप को परमेश्वर और लोगों के बीच मध्यस्थ नहीं बनाता, परन्तु यह माँगता है कि मसीह की देह के सब अंग एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करें, क्योंकि अंग एक-दूसरे के दुःख में सहानुभूति रखते हैं: यदि एक अंग दुःख पाता है, तो सब उसके साथ दुःख पाते हैं। और इस प्रकार पृथ्वी पर अब भी परिश्रम करनेवाले सब अंगों की पारस्परिक प्रार्थनाएँ उस सिर तक पहुँचती हैं जो पहले ही स्वर्ग में जा चुका है, और जिसमें हमारे पापों का प्रायश्चित है। क्योंकि यदि पौलुस मध्यस्थ होता, तो अन्य प्रेरित भी होते, और इस प्रकार बहुत से मध्यस्थ होते, और पौलुस का यह कथन स्थिर न रह पाता, ‘परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में मध्यस्थ भी एक ही है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है;’ जिसमें हम भी एक हैं, यदि हम शान्ति के बन्धन में विश्वास की एकता को बनाए रखें” (अगस्तीन, Contra Parmenian, Lib. 2 cap. 8)। इसी प्रकार एक और स्थान में अगस्तीन कहते हैं, “यदि तू याजक चाहता है, तो वह आकाश से भी ऊपर है, जहाँ वह उनके लिए विनती करता है जो पृथ्वी पर तेरे लिए मरे” (अगस्तीन, भजन संहिता 94 पर); यह कल्पना न कर कि वह अपने पिता के घुटनों के सामने गिरकर दीनता से हमारे लिए विनती करता है; परन्तु हम प्रेरित के साथ यह समझते हैं कि वह परमेश्वर की उपस्थिति में प्रकट होता है, और उसकी मृत्यु की सामर्थ्य का प्रभाव हमारे लिए सदा की मध्यस्थता के समान है; कि ऊपरी पवित्रस्थान में प्रवेश करके, वही अकेला जगत के अन्त तक अपने उन लोगों की प्रार्थनाएँ प्रस्तुत करता रहता है, जो दूर बाहरी आँगन में खड़े हैं।

21. जहाँ तक उन पवित्र लोगों की बात है जो देह में मरकर मसीह में जीवित हैं, यदि हम उन्हें प्रार्थना का श्रेय दें, तो यह कल्पना न करें कि परमेश्वर से विनती करने का उनके पास कोई और मार्ग है सिवाय मसीह के, जो अकेला मार्ग है, या यह कि उनकी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के यहाँ किसी और नाम से ग्रहण की जाती हैं। इसलिए जब पवित्रशास्त्र हमें सब दूसरों से हटाकर केवल मसीह की ओर बुलाता है, जब हमारा स्वर्गीय पिता सब कुछ को उसी में एकत्र करके प्रसन्न होता है, तो दूसरों के द्वारा पहुँच पाने का प्रयत्न करना, और इस प्रकार उसी से दूर खिंच जाना जिसके बिना पहुँच पाई ही नहीं जा सकती, घोर मूर्खता है, उन्माद कहे बिना भी। परन्तु कौन इनकार कर सकता है कि कई युगों तक यही प्रचलन रहा, और जहाँ-जहाँ पोप-तन्त्र का बोलबाला है, वहाँ आज भी यही प्रचलन है? परमेश्वर की कृपा पाने के लिए बार-बार मनुष्यों की योग्यताएँ सामने रखी जाती हैं, और बहुधा मसीह को छोड़कर उन्हीं के नाम से परमेश्वर से विनती की जाती है। मैं पूछता हूँ कि क्या यह उस एकमात्र मध्यस्थता का कार्य उन्हें सौंप देना नहीं है जिसे हमने ऊपर मसीह का अधिकार ठहराया है? फिर कौन-सा स्वर्गदूत या दुष्ट आत्मा कभी किसी मनुष्य को उनकी उस कल्पित मध्यस्थता के विषय में एक अक्षर भी बता पाया है? पवित्रशास्त्र में इस विषय पर एक शब्द भी नहीं है। तो इस गढ़ी हुई बात का आधार क्या था? निश्चय ही जब मनुष्य का मन इस प्रकार अपने लिए ऐसी सहायता खोजता है जिसकी स्वीकृति परमेश्वर के वचन में नहीं है, तब वह अपना अविश्वास स्पष्ट प्रकट करता है (देखिए खण्ड 27)। परन्तु यदि हम उन सब की अन्तरात्माओं से अपील करें जो पवित्र लोगों की मध्यस्थता से प्रसन्न होते हैं, तो हम पाएँगे कि इसका उनका एकमात्र कारण यही है कि वे चिन्ता से भरे हैं, मानो वे समझते हों कि मसीह अपर्याप्त या अत्यन्त कठोर है। इस चिन्ता के द्वारा वे मसीह का अनादर करते हैं, और उसकी एकमात्र मध्यस्थ की उपाधि उससे छीन लेते हैं, वह उपाधि जो पिता ने उसे विशेष अधिकार के रूप में दी है, और जो किसी और को सौंपी नहीं जानी चाहिए। ऐसा करके वे उसके जन्म की महिमा को धुँधला करते और उसके क्रूस को व्यर्थ ठहराते हैं; संक्षेप में, उसने जो कुछ किया या सहा, उस सब को उचित प्रशंसा से वंचित और ठगा हुआ कर देते हैं, क्योंकि जो कुछ उसने किया और सहा वह सब यही दिखाता है कि वह एकमात्र मध्यस्थ है और उसे ऐसा ही माना जाना चाहिए। साथ ही वे परमेश्वर की उस कृपा को ठुकराते हैं जिसमें वह अपने आप को उन पर पिता के रूप में प्रकट करता है, क्योंकि यदि वे मसीह को अपना भाई नहीं मानते, तो वह उनका पिता नहीं है। यदि वे यह नहीं समझते कि वह उनके लिए भाई का-सा स्नेह रखता है, तो वे ऐसा करने से स्पष्ट इनकार करते हैं; वह स्नेह जिससे अधिक कोमल या सुकुमार कोई स्नेह नहीं हो सकता। इसलिए पवित्रशास्त्र केवल उसी को प्रस्तुत करता है, हमें उसी के पास भेजता है, और हमें उसी में स्थिर करता है। अम्ब्रोस कहते हैं, “वही हमारा मुख है जिससे हम पिता से बातें करते हैं; हमारी आँख है जिससे हम पिता को देखते हैं; हमारा दाहिना हाथ है जिससे हम अपने आप को पिता के सामने अर्पित करते हैं।

उसकी मध्यस्थता के बिना न हमारा और न किसी पवित्र जन का परमेश्वर से कोई सम्बन्ध है” (अम्ब्रोस, Lib. de Isaac et Anima)। यदि वे यह आपत्ति करें कि कलीसियाओं में चढ़ाई जानेवाली सार्वजनिक प्रार्थनाएँ इन शब्दों के साथ समाप्त होती हैं, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा,” तो यह एक तुच्छ बहाना है; क्योंकि मसीह की मध्यस्थता को मृतकों की प्रार्थनाओं और योग्यताओं में मिला देने से उसका उतना ही अपमान होता है जितना उसे बिलकुल छोड़ देने और केवल मृतकों का उल्लेख करने से। फिर उनकी सब प्रार्थना-पद्धतियों, भजनों और गीतों में, जहाँ मृत पवित्र लोगों को हर प्रकार का आदर दिया जाता है, मसीह का उल्लेख है ही नहीं।

22. परन्तु यहाँ मूर्खता इस सीमा तक बढ़ गई है कि वह अन्धविश्वास की उस प्रवृत्ति को प्रकट करती है, जो एक बार लगाम से छूट जाने पर बिना किसी सीमा के उछल-कूद करने की आदी है। जब मनुष्य पवित्र लोगों की मध्यस्थता की ओर ताकने लगे, तो धीरे-धीरे हर एक को एक विशेष कार्यभार सौंप दिया गया, ताकि कार्य की भिन्नता के अनुसार कभी एक, कभी दूसरे मध्यस्थ को पुकारा जाए। फिर व्यक्तियों ने विशेष पवित्र लोगों को अपना लिया, और उन पर विश्वास रखने लगे, मानो वे संरक्षक देवता हों। और इस प्रकार केवल नगरों की गिनती के अनुसार देवता ही खड़े नहीं किए गए (वह आरोप जो भविष्यद्वक्ता ने प्राचीन काल में इस्राएल पर लगाया था, यिर्मयाह 2:28; 11:13), वरन् व्यक्तियों की गिनती के अनुसार भी। परन्तु जबकि पवित्र लोग अपनी सब इच्छाओं में केवल परमेश्वर की इच्छा को देखते हैं, उसी की ओर निहारते हैं, और उसी में सन्तुष्ट रहते हैं, फिर भी उन्हें परमेश्वर के राज्य के आगमन की लालसा के सिवाय कोई और प्रार्थना सौंपना उनके विषय में मूर्खतापूर्ण, शारीरिक, बल्कि अपमानजनक ढंग से सोचना है। इस विचार से अधिक दूर कुछ नहीं हो सकता कि हर एक निजी भावना के वश में आकर अपने ही आराधकों पर सबसे अधिक कृपालु होने को तैयार रहता है। अन्ततः बड़ी संख्या में लोग इस भयानक निन्दा में पड़ गए हैं कि उन्हें केवल सहायक ही नहीं, वरन् अपने उद्धार का अधिष्ठाता मानकर पुकारते हैं। देखिए, अभागे मनुष्य कितनी गहराई में गिरते हैं जब वे अपने उचित स्थान, अर्थात् परमेश्वर के वचन को छोड़ देते हैं। मैं उस अधर्म के और भी भयावह नमूनों की चर्चा नहीं करता, जिनमें, यद्यपि वे परमेश्वर, स्वर्गदूतों और मनुष्यों के लिए घिनौने हैं, वे स्वयं कोई पीड़ा या लज्जा अनुभव नहीं करते। बारबरा या कैथरीन आदि की किसी मूर्ति या चित्र के सामने दण्डवत् होकर वे “पातेर नोस्तेर” बुदबुदाते हैं; और उनके चरवाहे इस उन्मत्त चाल को सुधारने या रोकने से इतनी दूर हैं कि लाभ की गन्ध से लुभाए जाकर वे उसे अनुमोदन और सराहना देते हैं। परन्तु इस घिनौनी और अपराधपूर्ण कार्यविधि की निन्दा से अपने आप को बचाने का प्रयत्न करते हुए, वे किस बहाने से इस प्रथा का बचाव कर सकते हैं कि एलोय (एलिजियस) या मेदार्द को पुकारें कि वे उनके सेवकों की ओर दृष्टि करें और स्वर्ग से उन्हें सहायता भेजें, या पवित्र कुँवारी को पुकारें कि वह अपने पुत्र को आज्ञा दे कि वह उनकी माँगी हुई बात पूरी करे? कार्थेज की महासभा ने वेदी पर पवित्र लोगों से सीधे प्रार्थना करने पर रोक लगाई थी। सम्भव है कि इन पवित्र पुरुषों ने, बिगड़ी हुई रीति के बल को पूरी तरह दबा न पाकर, यह रोक इसलिए लगाई कि सार्वजनिक प्रार्थनाएँ “हे सन्त पतरस, हमारे लिए प्रार्थना कर” (Sancte Petre, ora pro nobis) जैसे वाक्यांशों से दूषित न हों। परन्तु यह शैतानी अतिशयता कितनी आगे बढ़ गई है जब मनुष्य मृतकों को मसीह और परमेश्वर की विशेष विशेषताएँ सौंपने में हिचकिचाते तक नहीं!

23. यह सिद्ध करने का प्रयत्न करने में कि ऐसी मध्यस्थता को पवित्रशास्त्र से कुछ सहारा मिलता है, वे व्यर्थ परिश्रम करते हैं। (वे कहते हैं) हम अकसर स्वर्गदूतों की प्रार्थनाओं के विषय में पढ़ते हैं, और केवल इतना ही नहीं, वरन् कहा गया है कि विश्वासियों की प्रार्थनाएँ उन्हीं के हाथों परमेश्वर की उपस्थिति में पहुँचाई जाती हैं। परन्तु यदि वे इस जीवन से विदा हो चुके पवित्र लोगों की तुलना स्वर्गदूतों से करना चाहें, तो उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि पवित्र लोग सेवा करनेवाली आत्माएँ हैं, जिन्हें हमारे उद्धार की देखरेख का कार्य सौंपा गया है, जिन्हें हमारे सब मार्गों में हमारी अगुवाई करने, हमें घेरे रखने, चेतावनी देने और सान्त्वना देने, और हमारी चौकसी करने का क्षेत्र दिया गया है। ये सब कार्य स्वर्गदूतों को सौंपे गए हैं, परन्तु इनमें से कोई भी पवित्र लोगों को नहीं। वे दिवंगत पवित्र लोगों को स्वर्गदूतों से कितने बेतुके ढंग से मिला देते हैं, यह उन बहुत-से भिन्न-भिन्न कार्यों से भली-भाँति प्रकट है जिनके द्वारा पवित्रशास्त्र एक को दूसरे से अलग करता है। कोई भी, जब तक उसे अनुमति न दी जाए, किसी सांसारिक न्यायी के सामने पक्ष रखने का कार्य करने का साहस न करेगा; तो फिर कीड़ों को यह छूट कहाँ से मिली कि वे अपने आप को परमेश्वर पर मध्यस्थों के रूप में थोपें, जबकि उन्हें ऐसा कोई कार्य सौंपा ही नहीं गया? परमेश्वर ने स्वर्गदूतों को हमारी सुरक्षा का भार देना चाहा है। इसी कारण वे हमारी पवित्र सभाओं में उपस्थित रहते हैं, और कलीसिया उनके लिए एक रंगमंच है जिसमें वे परमेश्वर की नाना प्रकार की बुद्धि को देखते हैं (इफिसियों 3:10)। जो लोग उनका यह विशेष कार्य दूसरों को सौंप देते हैं, वे निश्चय ही उस व्यवस्था को बिगाड़ते और उलझाते हैं जो परमेश्वर ने स्थापित की है और जिसे अटल रहना चाहिए। इसी प्रकार की चतुराई से वे अन्य अंश उद्धृत करने लगते हैं। परमेश्वर ने यिर्मयाह से कहा, “चाहे मूसा और शमूएल भी मेरे सामने खड़े होते, तौभी मेरा मन इन लोगों की ओर न फिरता” (यिर्मयाह 15:1)। (वे पूछते हैं) वह मृतकों के विषय में ऐसा कैसे कह सकता था, सिवाय इसके कि वह जानता था कि वे जीवितों के लिए मध्यस्थता करते हैं? इसके विपरीत मेरा निष्कर्ष यह है: चूँकि इससे यह प्रकट होता है कि न मूसा ने और न शमूएल ने इस्राएल के लोगों के लिए मध्यस्थता की, इसलिए मृतकों की कोई मध्यस्थता थी ही नहीं। क्योंकि पवित्र लोगों में से किसके विषय में यह सोचा जा सकता है कि वह जातियों के उद्धार के लिए परिश्रम कर रहा है, जबकि मूसा, जिसने जीवित रहते हुए इस विषय में सब से बहुत आगे बढ़कर कार्य किया, कुछ नहीं करता? इसलिए यदि वे इस तुच्छ कुतर्क पर अड़े रहें कि मृतक जीवितों के लिए मध्यस्थता करते हैं, क्योंकि प्रभु ने कहा, “यदि वे मेरे सामने खड़े होते” (intercesserint), तो मैं कहीं अधिक युक्तिसंगत रीति से इस प्रकार तर्क करूँगा: मूसा, जिसके विषय में कहा गया है, “यदि वह मध्यस्थता करता,” उसने लोगों की अत्यन्त आवश्यकता में उनके लिए मध्यस्थता नहीं की; इसलिए सम्भावना यही है कि कोई और पवित्र जन भी मध्यस्थता नहीं करता, क्योंकि सब मनुष्यता, भलाई और पितृ-तुल्य चिन्ता में मूसा से बहुत पीछे हैं। इस प्रकार अपने कुतर्कों से उन्हें इतना ही मिलता है कि वे उन्हीं शस्त्रों से घायल हो जाते हैं जिनसे वे अपने आप को भली-भाँति सुरक्षित समझते हैं। परन्तु इस सीधे-सादे वाक्य को इस प्रकार तोड़ना-मरोड़ना अत्यन्त हास्यास्पद है; क्योंकि प्रभु केवल यह घोषणा करता है कि वह लोगों के अधर्म को न छोड़ेगा, चाहे कोई मूसा या शमूएल, जिनकी प्रार्थनाओं के प्रति उसने अपने आप को इतना उदार दिखाया था, उनके लिए मध्यस्थता करे। यह अर्थ यहेजकेल के एक समान अंश से अत्यन्त स्पष्ट रूप से निकलता है: “यदि ये तीन पुरुष, अर्थात् नूह, दानिय्येल और अय्यूब उसमें होते, तो वे केवल अपनी धार्मिकता के द्वारा अपने ही प्राण बचा सकते, प्रभु यहोवा की यही वाणी है” (यहेजकेल 14:14)। यहाँ इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि इन शब्दों को इस प्रकार समझना चाहिए मानो कहा गया हो, यदि नामित व्यक्तियों में से दो फिर जी उठते; क्योंकि तीसरा तो अब भी जीवित था, अर्थात् दानिय्येल, जिसने, जैसा सब जानते हैं, तब यौवन के खिलते समय अद्वितीय भक्ति का प्रदर्शन किया था। इसलिए जिनके विषय में पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि उन्होंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, उन्हें हम छोड़ दें। इसी कारण जब पौलुस दाऊद के विषय में कहता है, तो यह नहीं कहता कि उसने अपनी प्रार्थनाओं से आगे आनेवाली पीढ़ियों की सहायता की, परन्तु केवल यह कि उसने “अपने समय के लोगों की सेवा की” (प्रेरितों के काम 13:36)।

24. वे फिर आपत्ति करते हैं, क्या तब जिन्होंने अपने जीवन भर भक्ति और दया के सिवाय कुछ और साँस में न लिया, उन्हें हर भक्तिपूर्ण इच्छा से वंचित कर दिया जाएगा? मैं यह कुतूहलपूर्वक खोजना नहीं चाहता कि वे क्या करते या सोचते हैं; परन्तु सम्भावना यही है कि वे भिन्न-भिन्न और निजी इच्छाओं के आवेग के अधीन होने के बजाय, एक स्थिर और अटल इच्छा से परमेश्वर के राज्य की लालसा करते हैं, जो जितना विश्वासियों के उद्धार में है उतना ही दुष्टों के विनाश में भी है। यदि ऐसा है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनका प्रेम मसीह की देह की सहभागिता तक ही सीमित है, और उतनी ही दूर तक फैलता है जितनी दूर तक उस सहभागिता की प्रकृति से मेल खाता है। परन्तु यद्यपि मैं मान लूँ कि इस रीति से वे हमारे लिए प्रार्थना करते हैं, फिर भी वे अपनी विश्रान्ति को इस प्रकार नहीं खोते कि सांसारिक चिन्ताओं से विचलित हो जाएँ; इसलिए हमारे द्वारा उन्हें पुकारा जाना तो और भी दूर की बात है। और न इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ऐसा पुकारना अपनाया जाना चाहिए, इस कारण कि जब मनुष्य पृथ्वी पर जीवित हैं तो वे अपने आप को एक-दूसरे की प्रार्थनाओं में सौंप सकते हैं। जब वे मानो एक-दूसरे की आवश्यकताओं में सहभागी होते और एक-दूसरे का बोझ उठाते हैं, तब यह प्रेम की भावना को जीवित रखने का काम करता है। यह वे प्रभु की आज्ञा से करते हैं, और बिना प्रतिज्ञा के नहीं; प्रार्थना में ये ही दो बातें सर्वोपरि महत्त्व की हैं। परन्तु ऐसे सब कारण मृतकों पर लागू नहीं होते, जिनसे प्रभु ने हमारी संगति से उन्हें हटाकर हमारे लिए कोई मेल-जोल का साधन नहीं छोड़ा (सभोपदेशक 9:5, 6), और जिनके लिए, जहाँ तक हम अनुमान लगा सकते हैं, उसने हमारे साथ कोई मेल-जोल का साधन नहीं छोड़ा। परन्तु यदि कोई यह कहे कि वे निश्चय ही हमारे प्रति वही प्रेम रखते होंगे, क्योंकि वे एक ही विश्वास में हमारे साथ एक हैं, तो हमें किसने बताया है कि उनके कान हमारी आवाज़ की ध्वनि सुनने के योग्य हैं, या उनकी आँखें इतनी साफ़ हैं कि हमारी आवश्यकताओं को पहचान सकें? हमारे विरोधी तो अपने पाठशालाओं की छाया में किसी प्रकार के प्रकाश की बात करते हैं जो परमेश्वर के मुख से दिवंगत पवित्र लोगों पर चमकता है, और जिसमें, जैसे दर्पण में, वे अपने ऊँचे निवास से मनुष्यों के कार्य देखते हैं; परन्तु इसे उस आत्मविश्वास के साथ कहना जो ये लोग करने का साहस करते हैं, ठीक यही चाहना है कि हम अपने मस्तिष्क के अनर्गल स्वप्नों के सहारे, और बिना किसी अधिकार के, परमेश्वर के गुप्त न्यायों में झाँकें और घुसें, और उस पवित्रशास्त्र को रौंद डालें जो इतनी बार घोषणा करता है कि हमारे शरीर की बुद्धि परमेश्वर की बुद्धि से बैर रखती है, हमारे मन की व्यर्थता को सर्वथा दोषी ठहराता है, और हमारी बुद्धि को नम्र करके हमें केवल परमेश्वर की इच्छा की ओर देखने का आदेश देता है।

25. पवित्रशास्त्र के जो अन्य अंश वे अपने भ्रम के बचाव में प्रयोग करते हैं, उन्हें दयनीय रीति से तोड़ा-मरोड़ा गया है। (वे कहते हैं) याकूब यूसुफ के पुत्रों के लिए माँगता है, “मेरा नाम, और मेरे पितरों अब्राहम और इसहाक का नाम उनसे पुकारा जाए” (उत्पत्ति 48:16)। पहले हम देखें कि इस्राएलियों में इस पुकारने का स्वरूप क्या था। वे अपने पितरों से यह विनती नहीं करते कि वे उनकी सहायता को आएँ, परन्तु वे परमेश्वर से विनती करते हैं कि वह अपने सेवकों अब्राहम, इसहाक और याकूब को स्मरण करे। इसलिए उनका उदाहरण उन लोगों को कोई समर्थन नहीं देता जो स्वयं पवित्र लोगों को सम्बोधित करते हैं। परन्तु इन लोगों की बुद्धि इतनी जड़ है कि वे समझते ही नहीं कि याकूब का नाम पुकारने का अर्थ क्या है, और उसे क्यों पुकारा जाता है; इसलिए यदि वे उसे करने की रीति के विषय में इतनी बचकानी भूल करें तो आश्चर्य नहीं। यह अभिव्यक्ति पवित्रशास्त्र में बार-बार आती है। यशायाह उन स्त्रियों की चर्चा करता है जो पुरुषों के नाम से पुकारी जाती हैं, जब वे उन्हें अपना पति बनाती हैं और उनकी शरण में रहती हैं (यशायाह 4:1)। इस्राएलियों पर अब्राहम का नाम पुकारे जाने का अर्थ यही है कि उनकी जाति का मूल उसी में ठहराया जाए, और उसे उनके कर्ता और पिता के रूप में विशेष स्मरण में रखा जाए। याकूब ऐसा अपने नाम की प्रसिद्धि बढ़ाने की किसी चिन्ता से नहीं करता, परन्तु इसलिए कि वह जानता है कि उसके वंशजों का सारा सुख उस वाचा की मीरास में था जो परमेश्वर ने उनके साथ बाँधी थी। यह देखकर कि इससे उन्हें सब आशीषों का सार मिलेगा, वह प्रार्थना करता है कि वे उसके वंश के गिने जाएँ, और यह उन्हें वाचा का उत्तराधिकार सौंप देने के सिवाय और कुछ नहीं है। वे भी, जब अपनी प्रार्थनाओं में इस विषय का उल्लेख करते हैं, तो मृतकों की मध्यस्थता की शरण नहीं लेते, परन्तु उस वाचा को स्मरण करते हैं जिसमें उनका परम दयालु पिता अब्राहम, इसहाक और याकूब के कारण उन पर कृपालु और प्रसन्न होने का वचन देता है। दूसरी बातों में पवित्र लोग अपने पितरों की योग्यताओं पर कितना कम भरोसा रखते थे, यह कलीसिया की सार्वजनिक वाणी भविष्यद्वक्ताओं में प्रकट करती है: “निश्चय तू हमारा पिता है, यद्यपि अब्राहम हमें नहीं जानता और इस्राएल हमें नहीं पहचानता; हे यहोवा, तू हमारा पिता है, हमारा छुड़ानेवाला है” (यशायाह 63:16)। और कलीसिया इस प्रकार कहते हुए साथ ही यह भी जोड़ती है, “अपने दासों के कारण लौट आ,” वह मध्यस्थता जैसी किसी बात का विचार नहीं करती, केवल वाचा के लाभ की ओर ध्यान दिलाती है। अब जबकि हमारे पास प्रभु यीशु है, जिसके हाथ में दया की अनन्त वाचा न केवल बाँधी गई वरन् स्थिर भी की गई, तो अपनी प्रार्थनाओं में हम अपने सामने इससे उत्तम और कौन-सा नाम रख सकते हैं? और चूँकि वे भले उपदेशक इन शब्दों से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि कुलपिता मध्यस्थ हैं, मैं चाहूँगा कि वे मुझे बताएँ कि इतनी बड़ी भीड़ में कलीसिया के पिता अब्राहम को कोई स्थान क्यों नहीं दिया गया? हम भली-भाँति जानते हैं कि वे अपने मध्यस्थों को कैसे दल में से चुनते हैं। तो वे मुझे बताएँ कि अब्राहम को, जिसे परमेश्वर ने सब से बढ़कर चुना और सर्वोच्च आदर की पदवी तक पहुँचाया, उपेक्षित और अस्वीकृत करने में कौन-सी संगति है। इसका एकमात्र कारण यही है कि जब यह स्पष्ट था कि प्राचीन कलीसिया में ऐसी कोई प्रथा नहीं थी, तो उन्होंने कुलपिताओं के विषय में चुप रहकर इस प्रथा की नवीनता को छिपाना उचित समझा: मानो केवल नामों की भिन्नता से वे एक ऐसी प्रथा का बचाव कर सकते हों जो नई भी है और अशुद्ध भी। वे कभी-कभी यह आपत्ति भी करते हैं कि परमेश्वर से विनती की जाती है कि वह अपने लोगों पर “दाऊद के कारण” दया करे (भजन संहिता 132:10; देखिए कैल्विन की टीका)। यह उनके भ्रम का समर्थन करना तो दूर, उसका सबसे प्रबल खण्डन है। हमें विचार करना चाहिए कि दाऊद की भूमिका क्या थी। उसे समस्त विश्वासी समुदाय में से अलग किया गया था कि वह उस वाचा को स्थापित करे जो परमेश्वर ने उसके हाथ में बाँधी थी। इस प्रकार ध्यान व्यक्ति पर नहीं, वरन् वाचा पर है। उसके अधीन, एक पूर्वरूप के रूप में, मसीह की एकमात्र मध्यस्थता की पुष्टि की गई है। परन्तु जो दाऊद की मसीह के पूर्वरूप होने की विशेषता थी, वह निश्चय ही दूसरों पर लागू नहीं होती।

26. परन्तु कुछ लोग इस बात से प्रभावित होते दिखाई देते हैं कि पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के सुने जाने की बात अकसर कही गई है। क्यों? इसलिए कि उन्होंने प्रार्थना की थी। भजनकार कहता है, “उन्होंने तुझे पुकारा और बच निकले; उन्होंने तुझ पर भरोसा रखा और लज्जित न हुए” (भजन संहिता 22:5)। हम भी उनके उदाहरण के अनुसार प्रार्थना करें, कि उनकी तरह हमारी भी सुनी जाए। इसके विपरीत वे लोग बेतुके ढंग से यह तर्क करते हैं कि केवल उन्हीं की सुनी जाएगी जिनकी पहले सुनी जा चुकी है। याकूब कितना अच्छा तर्क करता है, “एलिय्याह भी हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था; और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की कि मेंह न बरसे, और साढ़े तीन वर्ष तक भूमि पर मेंह नहीं बरसा। फिर उसने प्रार्थना की, तो आकाश से वर्षा हुई, और भूमि फलवन्त हुई” (याकूब 5:17, 18)। क्या? क्या वह यह निष्कर्ष निकालता है कि एलिय्याह के पास कोई विशेष अधिकार था, और उसके उपयोग के लिए हमें उसकी शरण लेनी चाहिए? कदापि नहीं। वह एक शुद्ध और भक्तिपूर्ण प्रार्थना की सदा की प्रभावशीलता दिखाता है, ताकि हम भी उसी प्रकार प्रार्थना करने को प्रेरित हों। क्योंकि दूसरों की सुनने में परमेश्वर की कृपा और तत्परता का दुर्भावनापूर्ण अर्थ निकाला जाता है, यदि उनका उदाहरण हमें उसकी प्रतिज्ञा पर और दृढ़ भरोसा नहीं देता, क्योंकि उसकी घोषणा यह नहीं है कि वह एक-दो, या थोड़े से व्यक्तियों की ओर कान लगाएगा, परन्तु उन सब की ओर जो उसका नाम लेकर पुकारते हैं। इस अज्ञानता में वे और भी कम क्षमा के योग्य हैं, क्योंकि वे मानो खुलेआम पवित्रशास्त्र की अनेक चेतावनियों का तिरस्कार करते दिखाई देते हैं। दाऊद बार-बार परमेश्वर की सामर्थ्य से छुड़ाया गया। क्या यह इसलिए था कि वह सामर्थ्य उसे दे दी जाए, ताकि हम उसके कहने पर छुड़ाए जाएँ? उसकी घोषणा बहुत भिन्न है: “धर्मी लोग मेरे चारों ओर आएँगे; क्योंकि तू मुझ पर उदार रहेगा” (भजन संहिता 142:7)। फिर, “धर्मी लोग भी देखकर डरेंगे, और उस पर हँसेंगे” (भजन संहिता 52:6)। “इस दीन जन ने पुकारा, तो यहोवा ने सुन लिया, और उसको उसके सब संकटों से बचा लिया” (भजन संहिता 34:6)। भजन संहिता में ऐसी बहुत-सी प्रार्थनाएँ हैं, जिनमें दाऊद परमेश्वर को पुकारता है कि जो वह माँगता है उसे दे, इस कारण से कि धर्मी लज्जित न हों, वरन् उसके उदाहरण से आशा रखने को प्रोत्साहित हों। यहाँ एक अंश पर्याप्त हो: “इस कारण हर एक भक्त तुझ से ऐसे समय में प्रार्थना करे जब तू मिल सकता है” (भजन संहिता 32:6, कैल्विन की टीका)। मैंने यह अंश और भी तत्परता से इसलिए उद्धृत किया कि वे बकवादी, जो अपनी भाड़े की जीभों को पोप-तन्त्र के बचाव में लगाते हैं, इसे मृतकों की मध्यस्थता के प्रमाण में प्रस्तुत करने में लजाते नहीं। मानो दाऊद का अभिप्राय उस लाभ को दिखाने के सिवाय कुछ और था जो उसकी सुने जाने पर परमेश्वर की दया और कृपालुता से उसे मिलेगा। सामान्यतः हमें यह मानना चाहिए कि परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव, चाहे वह हमारे प्रति हो या दूसरों के प्रति, उसकी प्रतिज्ञाओं में हमारे विश्वास को दृढ़ करने में कम काम नहीं करता। मैं उन बहुत-से अंशों को उद्धृत नहीं करता जिनमें दाऊद परमेश्वर की करुणा को अपने भरोसे का आधार ठहराता है, क्योंकि वे भजन संहिता के हर पाठक को सहज ही सूझ जाएँगे। याकूब ने इससे पहले अपने उदाहरण से यही बात सिखाई थी, “मैं तेरी सब दया और सच्चाई के योग्य जो तूने अपने दास के साथ की है, कुछ भी नहीं हूँ; क्योंकि मैं अपनी लाठी ही लेकर इस यरदन के पार गया था, और अब मेरे दो दल हो गए हैं” (उत्पत्ति 32:10)। वह प्रतिज्ञा का हवाला तो देता है, परन्तु केवल प्रतिज्ञा का नहीं; क्योंकि वह साथ ही परिणाम भी जोड़ता है, ताकि परमेश्वर की आगामी कृपा में उसे और अधिक भरोसा मिले। परमेश्वर उन मनुष्यों के समान नहीं है जो अपनी उदारता से थक जाते हैं, या जिनके पास उसे दिखाने के साधन चुक जाते हैं; परन्तु उसे उसके अपने स्वभाव के अनुसार आँका जाना चाहिए, जैसा दाऊद ठीक ही करता है जब वह कहता है, “हे यहोवा, सत्य के परमेश्वर, तूने मुझे छुड़ा लिया है” (भजन संहिता 31:5)। अपने उद्धार की स्तुति परमेश्वर को देने के बाद वह जोड़ता है कि वह सच्चा है: क्योंकि यदि वह सदा अपने समान न रहे, तो उसका बीता हुआ अनुग्रह भरोसे और प्रार्थना का अचूक आधार न होता। परन्तु जब हम जानते हैं कि जितनी बार वह हमारी सहायता करता है, उतनी बार वह हमें अपनी भलाई और सच्चाई का नमूना और प्रमाण देता है, तब इसका कोई कारण नहीं कि हम डरें कि हमारी आशा लज्जित या निष्फल होगी।

27. कुल मिलाकर, चूँकि पवित्रशास्त्र आराधना का मुख्य भाग परमेश्वर को पुकारने में रखता है (यही वह भक्ति का कार्य है जो वह सब बलिदानों से बढ़कर हमसे चाहता है), इसलिए दूसरों से प्रार्थना करना स्पष्ट रूप से परमेश्वर के पवित्र वस्तुओं की चोरी है। इसी से भजन में कहा गया है: “यदि हम अपने परमेश्वर का नाम भूल गए, या पराए देवता की ओर अपने हाथ फैलाए हों, तो क्या परमेश्वर इसका पता न लगाएगा?” (भजन संहिता 44:20, 21)। फिर, चूँकि परमेश्वर केवल विश्वास में ही पुकारा जाना चाहता है, और वह स्पष्ट आज्ञा देता है कि हम अपनी प्रार्थनाएँ उसके वचन के नियम के अनुसार ढालें: अन्ततः, चूँकि विश्वास की नींव वचन पर है और वही सच्ची प्रार्थना का जनक है, इसलिए जिस क्षण हम वचन से हट जाते हैं, हमारी प्रार्थनाएँ अशुद्ध हो जाती हैं। परन्तु हम पहले दिखा चुके हैं कि यदि हम पवित्रशास्त्र की सम्पूर्ण पुस्तक से परामर्श लें, तो पाएँगे कि परमेश्वर यह आदर अकेले अपने लिए माँगता है। मध्यस्थता के कार्य के विषय में भी हम देख चुके हैं कि वह मसीह का विशेष कार्य है, और कोई प्रार्थना परमेश्वर को प्रिय नहीं है जिसे वह मध्यस्थ के रूप में पवित्र न करे। और यद्यपि विश्वासी अपने भाइयों के लिए परमेश्वर से पारस्परिक प्रार्थनाएँ चढ़ाते हैं, हम दिखा चुके हैं कि इससे मसीह की एकमात्र मध्यस्थता की किसी भी रीति से हानि नहीं होती, क्योंकि सब अपने आप को और दूसरों को परमेश्वर को सौंपने में उसी मध्यस्थता पर भरोसा रखते हैं। इसके अतिरिक्त, हम दिखा चुके हैं कि यह अज्ञानता से मृतकों को सौंप दिया गया है, जिनके विषय में हम कहीं नहीं पढ़ते कि उन्हें हमारे लिए प्रार्थना करने की आज्ञा दी गई थी। पवित्रशास्त्र हमें बार-बार पारस्परिक प्रार्थनाएँ चढ़ाने का उपदेश देता है; परन्तु मृतकों के विषय में एक शब्द भी नहीं कहता; बल्कि याकूब मृतकों को मौन रूप से बाहर रखता है जब वह इन दो बातों को जोड़ता है, “एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो, और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करो” (याकूब 5:16)। इसलिए इस भ्रम को दोषी ठहराने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि सच्ची प्रार्थना का आरम्भ विश्वास से होता है, और विश्वास परमेश्वर के वचन के सुनने से आता है, जिसमें कल्पित मध्यस्थता का कोई उल्लेख नहीं है, क्योंकि अन्धविश्वास ने उतावली से ऐसे मध्यस्थ अपना लिए हैं जो परमेश्वर द्वारा नियुक्त नहीं किए गए। जबकि पवित्रशास्त्र प्रार्थना के नाना रूपों से भरपूर है, हमें इस मध्यस्थता का कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसके बिना पोप के अनुयायी समझते हैं कि कोई प्रार्थना होती ही नहीं। इसके अतिरिक्त यह प्रकट है कि यह अन्धविश्वास अविश्वास का परिणाम है, क्योंकि वे या तो मसीह को मध्यस्थ के रूप में पर्याप्त नहीं मानते, या उन्होंने उससे यह आदर बिलकुल छीन लिया है। यह अन्तिम बात इसी से सरलता से सिद्ध होती है कि वे पवित्र लोगों की मध्यस्थता के पक्ष में अपने सब तर्कों में सबसे प्रबल तर्क के रूप में निर्लज्जता से यह कहते हैं कि हम परमेश्वर तक घनिष्ठ पहुँच के योग्य नहीं हैं। यह तो हम सचमुच अत्यन्त सत्य मानते हैं, परन्तु इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वे मसीह के लिए कुछ नहीं छोड़ते, क्योंकि वे उसकी मध्यस्थता को कुछ नहीं समझते, जब तक कि उसकी पूर्ति जॉर्ज और हिपोलिट तथा ऐसे ही प्रेतों की मध्यस्थता से न की जाए।

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