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पुराने समयों से प्रकाश (क्रमशः)
उसकी सम्पदा का। परन्तु यदि "लोगों की भीड़" किसी कलीसिया की महिमा है, जैसे किसी राजकुमार की, तो इंग्लैंड की कलीसिया की महिमा सदा के लिए जाती रहेगी। खाली मध्य-भागों और गायक-स्थलों पर "ईकाबोद" लिखा जाएगा। यह स्थापित कलीसिया टूटकर बिखर जाएगी, या स्कॉटलैंड की एपिस्कोपल कलीसिया की तरह एक सम्प्रदाय-मात्र बन जाएगी, और इतिहास के पन्ने यह दर्ज करेंगे कि उसने प्रोटेस्टेंट मत से पीछे हटने और पोप-मत को फिर से लाने के आत्मघाती प्रयास में अपनी सारी महानता का जहाज़ डुबो दिया। नहीं! यदि मैं मध्यम वर्गों और समझदार निम्न वर्गों के विषय में कुछ भी जानता हूँ, तो वे या तो प्रोटेस्टेंट स्थापित कलीसिया चाहते हैं, या कोई स्थापित कलीसिया ही नहीं। वे शायद बहुत पढ़नेवाले या गहरे विचारक न हों। परन्तु वे जानते हैं कि साढ़े तीन सौ वर्ष पहले रोमन मत क्या था, और वे उसे वापस नहीं चाहते। वे जानते हैं कि धर्म-सुधार से पहले याजकीय अत्याचार, मिस्सा के बलिदान और घृणित पाप-स्वीकार-स्थान ने क्या किया था। इन बातों की ओर लौटने के ज़रा-से लक्षण के प्रति भी उनमें एक जन्मजात, सहज और हितकारी अरुचि है। वे बारीक भेद नहीं कर पाते; वे कुदाल को कुदाल कहने और वस्तुओं को उनके सही नाम देने के आदी हैं। और यदि वे हमारी कलीसियाओं में रोमन मत की नक़ल करने और रोमी रीतियों का स्वाँग रचने का कोई प्रयास देखते हैं, तो उनके सन्देह तुरन्त जाग उठते हैं। जो पादरी ये सन्देह जगाता है, मैं निडर होकर कहता हूँ, चाहे वह कितना ही निष्ठावान, सच्चे मन का, भले इरादोंवाला और उदार हो, वह इंग्लैंड की कलीसिया का मित्र नहीं है, और बहुत भारी हानि कर रहा है। 2. इस विषय की दूसरी शिक्षा यह है। लॉड का इतिहास हमें दिखाता है कि एक बहुत छोटा दल भी किसी कलीसिया को कितनी हानि पहुँचा सकता है। जब कोई अल्पसंख्यक दल मिलकर काम करता और एकजुट रहता है, तो उसकी शक्ति बड़ी होती है। थोड़े-से दृढ़ निश्चयी लोगों का प्रभाव बड़ा होता है, जब वे बुराई के लिए एक हो जाते हैं, अपने उद्देश्य को स्पष्ट देखते हैं, और उसे पूरा करने का निरन्तर और निर्लज्जता से प्रयत्न करते हैं। ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट जॉन्स में लॉड का आरम्भ बहुत छोटा था, परन्तु उसका अन्त बहुत बढ़ गया। मैं कहने का साहस करता हूँ कि यह ऐसी बात है जिसे बहुत अधिक अनदेखा किया जाता है। पिछले तीस वर्षों में इंग्लैंड की कलीसिया को जितनी हानि ट्रैक्टेरियन आन्दोलन को तुच्छ समझने और उसकी उपेक्षा करने की आदत से हुई है, उतनी किसी और बात से नहीं। जब यह न्यूमैन, प्यूज़ी, कीबल और रिचर्ड फ्रूड के अधीन आरम्भ हुआ, तब यह कितना छोटा दिखता था। यह एक ऐसा बादल था जो मनुष्य की हथेली से बड़ा न दिखता था! अब तुलनात्मक रूप से यह कैसे भयावह आकार तक बढ़ गया है। ऐसा लगता है मानो आधे आकाश पर काली आँधी-तूफ़ान छा गया हो। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि मेरे एक प्रिय ऑक्सफ़ोर्ड-मित्र, जो अब जीवित नहीं हैं, पचास वर्ष पहले एक निजी बातचीत में चेस्टर के अध्यक्ष समनर और चांसलर रेक्स का ध्यान इस विषय की ओर दिलाते थे। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि उन आदरणीय पुरुषों ने अविश्वास की शान्त मुस्कान के साथ कैसे सुना, और स्पष्ट ही हमें कम आयु के, अदूरदर्शी, घबरानेवाले लोग समझा। "यह तो बस एक क्षणिक भ्रम था; शीघ्र ही बीत जाएगा।" Nubecula est; transibit। मैंने तब सोचा था कि वे संकट की सीमा का ठीक अनुमान नहीं लगा रहे। मुझे सन्देह है कि वे दोनों जीवित रहते हुए अपना विचार बदल चुके थे। इसलिए आइए, हम रिचुअलिज़्म की शक्ति को इसलिए कम न आँकें कि उसके अनुयायी एक छोटे दल जैसे दिखते हैं, और जिन कलीसियाओं में वे पोप-मत का खेल खेलते हैं वे अपेक्षाकृत थोड़ी हैं। यह दल उतना छोटा नहीं जितना दिखता है। देशभर में इसके बहुत-से सहानुभूति रखनेवाले हैं, जो केवल उस समय की प्रतीक्षा में हैं जब वे अपने रंग दिखा सकें, और हवा का पहला रुख बदलते ही जहाज़ खोल देंगे। इसे छोटा होने के कारण तुच्छ न समझा जाए। अल्पसंख्यक अन्त में प्रायः विजयी निकलते हैं। नहीं? हमें महान ड्यूक ऑफ़ वेलिंग्टन की यह सीख स्मरण रखनी चाहिए कि शत्रु को कम आँकना युद्ध में बुनियादी भूल है और बड़ी विपत्तियों का कारण है। हमें यह मान लेना चाहिए कि इस समय का रिचुअलिस्ट आन्दोलन बहुत गम्भीर विषय है, और इंग्लैंड की कलीसिया को नष्ट होने से बचाने के लिए सच्चे कलीसियाई लोगों के अधिकतम प्रयत्न आवश्यक हैं। जब हम बारूद के भण्डार में पड़ी एक नन्ही चिंगारी, समुद्री बाँध में एक नन्ही दरार, जहाज़ में एक नन्हे रिसाव, लंगर की ज़ंजीर में एक नन्ही खोट, या गढ़ की सेना में कुछ विश्वासघातियों को तुच्छ समझ सकें, तभी, और उससे पहले नहीं, रिचुअलिज़्म को इसलिए हल्के में लेने का समय होगा कि उसके खुले अनुयायी, आरम्भ में लॉड के दल की तरह, अभी तुलनात्मक रूप से थोड़े प्रतीत होते हैं।
