यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
पुराने समयों से प्रकाश
एल्डम कॉमन पहुँचने पर, जहाँ उसे मृत्यु सहनी थी, उन्होंने उसे बताया कि वह कहाँ है। तब उसने कहा, "परमेश्वर का धन्यवाद हो, मैं तो घर ही पहुँच गया हूँ।" जब उसके वस्त्र उतारकर उसे केवल कमीज़ में खम्भे के लिए तैयार किया गया, तो उसने ऊँचे स्वर में कहा, "हे भले लोगो, मैंने तुम्हें परमेश्वर के पवित्र वचन के सिवाय और कुछ नहीं सिखाया, और उन्हीं शिक्षाओं को सिखाया जो मैंने बाइबल से ली हैं; और मैं यहाँ उसे अपने लहू से मुहर लगाने आया हूँ।" वह शायद और भी कहता, परन्तु सब अन्य शहीदों के समान उसे भी बोलने से कड़ाई से रोका गया, और इन थोड़े से शब्दों के लिए भी उसके सिर पर ज़ोर से मारा गया। तब उसने घुटने टेककर प्रार्थना की; और उस पल्ली की एक दीन स्त्री ने उसे रोकने के सब प्रयासों के बावजूद ज़िद करके उसके साथ घुटने टेके। इसके बाद उसे खम्भे से जंजीर से बाँधा गया, और वह 51वाँ भजन दोहराता हुआ और परमेश्वर को यह कहकर पुकारता हुआ, "हे दयालु पिता, यीशु मसीह के निमित्त मेरी आत्मा को अपने हाथों में ग्रहण कर," बिना चिल्लाए या हिले आग की लपटों के बीच शान्त खड़ा रहा, जब तक कि पहरेदारों में से एक ने कुल्हाड़ी-भाले से उसका सिर फोड़ न दिया। और इस प्रकार सफ़ोक का यह भला बूढ़ा पादरी चला गया। (4) मरियम के राज्यकाल में दुःख उठानेवाला चौथा प्रमुख धर्म-सुधारक वेल्स में सेंट डेविड्स का अध्यक्ष रॉबर्ट फेरार था। उसे 30 मार्च, 1555 को शुक्रवार के दिन कारमार्थेन में जलाया गया। इस भले मनुष्य के विषय में इसके सिवाय बहुत कम ज्ञात है कि उसका जन्म हैलिफ़ैक्स में हुआ था और वह यॉर्कशायर के नॉस्टल का अन्तिम प्रायर था, जिस पद को उसने 1540 में त्याग दिया। वह आर्चबिशप क्रैनमर और रक्षक सॉमरसेट का पुरोहित भी था, और इसी प्रभाव के कारण वह अध्यक्षों की पंक्ति में ऊँचा उठाया गया। एडवर्ड छठे के अन्तिम दिनों में, रक्षक सॉमरसेट के पतन के बाद, सांसारिक विषयों पर अनेक तुच्छ और हास्यास्पद आरोपों के कारण वह पहले बन्दी बनाया गया, और बाद में उसके सिद्धान्त जैसे कहीं अधिक गम्भीर विषय पर वह हूपर, रॉजर्स और ब्रैडफ़र्ड के साथ गार्डिनर के सामने लाया गया। उस पर लगाए गए आरोपों से स्पष्ट दिखता है कि विश्वास के सब प्रश्नों में वह अपने साथी शहीदों से एकमत था। हूपर और टेलर के समान उसे भी उसी स्थान में जलाए जाने का दण्ड मिला जहाँ वह सबसे अधिक जाना जाता था, और उसे लन्दन से कारमार्थेन भेजा गया। वहाँ उसकी मृत्यु के समय जो हुआ उसका वर्णन फ़ॉक्स ने बहुत संक्षेप में किया है; कदाचित् इसलिए कि रेलगाड़ी से पहले के उन दिनों में कारमार्थेन लन्दन से बहुत दूर था; और कदाचित् इसलिए भी कि जिन्होंने फेरार को जलते देखा उनमें से अधिकांश वेल्श के सिवाय और कुछ नहीं बोल सकते थे। केवल एक ही तथ्य दर्ज है जो इस भले अध्यक्ष के साहस और दृढ़ता को प्रभावशाली रूप में दिखाता है। उसने मृत्यु-दिवस से पहले एक मित्र से कहा था कि यदि तुम मुझे आग में जलने की पीड़ा से एक बार भी हिलता देखो, तो जो सिद्धान्त मैंने सिखाए हैं उन पर विश्वास न करना। जब वह भयानक घड़ी आई तो वह अपनी प्रतिज्ञा नहीं भूला, और परमेश्वर के अनुग्रह से उसने उसे भली भाँति निभाया। वह लपटों में अपने हाथ फैलाए खड़ा रहा जब तक कि वे जलकर ठूँठ न हो गए, और अन्त में एक दर्शक ने दया करके उसके सिर पर प्रहार करके उसके कष्टों का अन्त कर दिया। और इस प्रकार वेल्स का वह अध्यक्ष चला गया। (5) मरियम के राज्यकाल में दुःख उठानेवाला पाँचवाँ प्रमुख धर्म-सुधारक जॉन ब्रैडफ़र्ड था, जो सेंट पॉल्स का प्रीबेंडरी और बिशप रिडली का पुरोहित था। उसे 1 जुलाई, 1555 को सोमवार के दिन केवल पैंतीस वर्ष की अल्पायु में स्मिथफ़ील्ड में जलाया गया। अंग्रेज़ शहीदों में शायद ही कोई ब्रैडफ़र्ड से अधिक प्रसिद्ध हो, और निश्चय ही कोई अपनी प्रतिष्ठा के इतना योग्य नहीं। स्ट्राइप ने ब्रैडफ़र्ड, क्रैनमर, रिडली और लैटिमर को इंग्लैण्ड की सुधारवादी कलीसिया के "चार प्रधान स्तम्भ" कहा है। वह जन्म से मैनचेस्टर का रहनेवाला था, और जीवन के अन्त तक उस क्षेत्र में, जिससे वह जुड़ा था, उसकी गहरी रुचि बनी रही। छोटी ही आयु में उसकी उच्च प्रतिभा ने उसे बड़े पदाधिकारियों की दृष्टि में ला दिया, और वह उन छः शाही पुरोहितों में से एक नियुक्त हुआ जिन्हें धर्म-सुधार के सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए इंग्लैण्ड में भेजा गया। ब्रैडफ़र्ड को लंकाशायर और चेशायर में प्रचार करने का आदेश मिला, और ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अपना कर्तव्य अनुपम योग्यता और सफलता से निभाया। उसने मैनचेस्टर, लिवरपूल, बोल्टन, बरी, विगन, ऐशटन, स्टॉकपोर्ट, प्रेस्टविच, मिडलटन और चेस्टर में निरन्तर प्रचार किया, जिससे प्रोटेस्टेंट पक्ष को बड़ा लाभ हुआ और मनुष्यों की आत्माओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा। परिणाम वही हुआ जिसकी अपेक्षा थी। रानी मरियम के राज्यारोहण के एक मास के भीतर ही ब्रैडफ़र्ड बन्दीगृह में था, और जलाए जाने तक वह कभी बाहर न निकला। उसकी युवावस्था, पवित्रता और एक प्रचारक के रूप में उसकी असाधारण प्रतिष्ठा ने उसकी कैद के दिनों में उसे बड़े आकर्षण का पात्र बना दिया, और उसे प्रोटेस्टेंट विश्वास से फेरने के लिए बहुत प्रयास किए गए। परन्तु ये सब प्रयास व्यर्थ रहे। जैसा वह जिया, वैसा ही मरा। उसके मृत्यु-दिवस पर उसे प्रातः लगभग नौ बजे न्यूगेट से स्मिथफ़ील्ड ले जाया गया, ऐसी भीड़ के बीच जैसी न इससे पहले देखी गई न बाद में। एक श्रीमती हनीवुड, जो छियानवे वर्ष की आयु तक जीवित रहीं और लगभग 1620 में मरीं, उसे जलते देखने जाना और भीड़ के कारण अपने जूतों का पाँव से निकल जाना स्मरण करती थीं। वास्तव में, जब वह खम्भे के पास आया तो लन्दन के शेरिफ़ भीड़ से इतने घबरा गए कि उन्होंने उसे और उसके साथी दुःख उठानेवाले लीफ़ को जितनी देर वे चाहते थे उतनी देर प्रार्थना न करने दी। उन्होंने कहा, "उठो और अन्त करो; क्योंकि लोगों की भीड़ बहुत है।" फ़ॉक्स कहता है, "इस वचन पर वे दोनों अपने पाँवों पर खड़े हो गए, और तब मास्टर ब्रैडफ़र्ड ने हाथों में एक लकड़ी का गट्ठर लिया और उसे चूमा, और वैसे ही खम्भे को भी।" जब वह खम्भे के पास आया तो उसने अपने हाथ उठाए, और स्वर्ग की ओर देखकर कहा, "हे इंग्लैण्ड, इंग्लैण्ड, अपने पापों से मन फिरा! मूर्तिपूजा से सावधान रह; झूठे मसीह-विरोधियों से सावधान रह! चौकस रहो कि वे तुम्हें धोखा न दें!" इसके बाद उसने उस युवक लीफ़ की ओर, जो उसके साथ दुःख उठा रहा था, मुड़कर कहा, "हे भाई, ढाढ़स बाँध; क्योंकि आज रात हम प्रभु के साथ आनन्दमय भोजन करेंगे।" इसके बाद उसने और कुछ नहीं कहा जो कोई सुन सके, सिवाय इसके कि उसने सरकण्डों को गले लगाया और कहा, "सकेत फाटक और सकरा मार्ग है जो अनन्त जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े ही हैं जो उसे पाते हैं।" फ़ुलर कहता है, "उसने लपटों को ऐसे गले लगाया जैसे गर्मी के किसी तपते दिन में ताज़ी हवा का झोंका।" और इस प्रकार वह जीवन के पूर्वार्ध में ही चला गया। (6, 7) मरियम के राज्यकाल में दुःख उठानेवाले छठे और सातवें प्रमुख धर्म-सुधारक वे दो थे जिनके नाम हर अंग्रेज़ को परिचित हैं: लन्दन का अध्यक्ष निकोलस रिडली, और कभी वर्सेस्टर का अध्यक्ष रहा ह्यू लैटिमर। उन दोनों को 16 अक्टूबर, 1555 को ऑक्सफ़ोर्ड में एक ही खम्भे पर पीठ से पीठ लगाकर जलाया गया। रिडली का जन्म सीमा पर नॉर्थम्बरलैण्ड के विलिमण्डस्वाइक में हुआ था। लैटिमर का जन्म लेस्टरशायर के थरकैस्टन में हुआ था। इन दो महान अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंटों का इतिहास अधिकांश लोगों को इतना भली भाँति ज्ञात है कि मुझे उसके विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। इसमें कम ही सन्देह है कि क्रैनमर के बाद किसी और दो पुरुषों ने इंग्लैण्ड में धर्म-सुधार के सिद्धान्तों की स्थापना में इतना योगदान नहीं दिया। लैटिमर ने असाधारण लोकप्रिय प्रचारक के रूप में, और रिडली ने विद्वान तथा लन्दन महानगर के धर्म-प्रदेश के उत्कृष्ट प्रबन्धक के रूप में, ऐसी प्रतिष्ठा छोड़ी है जिसे कभी कोई पार नहीं कर सका। स्वाभाविक ही था कि जब मरियम सिंहासन पर बैठी तो बोनर और गार्डिनर ने जिन पर सबसे पहले प्रहार किया उनमें ये दोनों थे, और मृत्यु तक उन्हें निर्मम कठोरता से सताया गया। कैसे आयोग के सदस्यों ने प्रोटेस्टेंटों और रोम के बीच विवाद के मुख्य मुद्दों पर उनकी बार-बार जाँच की, कैसे हर प्रकार के अन्यायपूर्ण और अनुचित व्यवहार से उन्हें लज्जाजनक रूप से सताया, छेड़ा और यातना दी गई, कैसे उन्होंने वीरता से अन्त तक अच्छी लड़ाई लड़ी और अपने विरोधियों के सामने एक क्षण भी न झुके, इन बातों से मैं अपने पाठकों को कष्ट नहीं दूँगा। क्या ये सब भले पुराने फ़ॉक्स के पृष्ठों में भली भाँति दर्ज नहीं हैं? मैं केवल उनकी मृत्यु से जुड़ी कुछ परिस्थितियाँ बताऊँगा। उनके शहीद होने के दिन उन्हें अलग-अलग मृत्यु-स्थल पर लाया गया, जो ऑक्सफ़ोर्ड की ब्रॉड स्ट्रीट के छोर पर बैलिओल कॉलेज के निकट था। रिडली पहले मैदान में पहुँचा, और लैटिमर को बाद में आते देखकर दौड़कर उसके पास गया और उसे चूमकर कहा, "हे भाई, ढाढ़स बाँध; क्योंकि परमेश्वर या तो लपटों का प्रकोप शान्त करेगा, या हमें उसे सहने की सामर्थ्य देगा।" तब उन्होंने गम्भीरता से प्रार्थना की और आपस में बातें कीं, यद्यपि वे क्या कह रहे थे यह कोई नहीं सुन सका। इसके बाद उन्हें स्मिथ नामक एक नीच धर्मत्यागी धर्माचार्य का उपदेश सुनना पड़ा, और उत्तर देने से रोककर उन्हें मृत्यु के लिए तैयार होने की आज्ञा दी गई। आग लगाए जाने से पहले रिडली के अन्तिम शब्द ये थे, "हे स्वर्गीय पिता, मैं तेरा हार्दिक धन्यवाद करता हूँ कि तूने मुझे मृत्यु तक तेरा अंगीकार करने के लिए बुलाया। हे प्रभु परमेश्वर, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि इंग्लैण्ड के इस राज्य पर दया कर, और इसे इसके सब शत्रुओं से छुड़ा।" लैटिमर के अन्तिम शब्द तुरही की ध्वनि के समान थे जो आज तक गूँजते हैं, "हे मास्टर रिडली, ढाढ़स बाँधो और पुरुषार्थ दिखाओ; आज परमेश्वर के अनुग्रह से हम इंग्लैण्ड में ऐसी मोमबत्ती जलाएँगे जो, मुझे भरोसा है, कभी बुझाई न जा सकेगी।" जब लपटें उठने लगीं तो रिडली ने ऊँचे स्वर में लातीनी में पुकारा, "हे प्रभु, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ: हे प्रभु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर," और बाद में ये अन्तिम शब्द अंग्रेज़ी में दोहराए। लैटिमर ने खम्भे के दूसरी ओर उतने ही जोश से पुकारा, "हे स्वर्ग के पिता, मेरी आत्मा को ग्रहण कर।" लैटिमर शीघ्र ही मर गया। वह अस्सी वर्ष से अधिक आयु का वृद्ध था, उसकी आत्मा को उसके पार्थिव तम्बू से मुक्त करने के लिए थोड़ा ही पर्याप्त था। रिडली को मृत्यु-दण्ड के कार्यकर्ताओं द्वारा आग के बुरे प्रबन्ध के कारण देर तक और पीड़ादायक रूप से दुःख सहना पड़ा। अन्त में, लपटें उसके किसी प्राणाधार अंग तक पहुँचीं, और वह लैटिमर के चरणों में गिर पड़ा, और विश्राम में पहुँचा। और इस प्रकार वे दो महान प्रोटेस्टेंट अध्यक्ष चले गए। "वे अपने जीवन में प्रिय और सुहावने थे, और अपनी मृत्यु में वे अलग न हुए।" (8) मरियम के राज्यकाल में दुःख उठानेवाला आठवाँ प्रमुख अंग्रेज़ धर्म-सुधारक जॉन फ़िलपॉट था, जो विंचेस्टर का आर्चडीकन था। उसे 18 दिसम्बर, 1555 को बुधवार के दिन स्मिथफ़ील्ड में जलाया गया। फ़िलपॉट उन शहीदों में से एक है जिनके विषय में हम अपेक्षाकृत कम जानते हैं, सिवाय इसके कि उसका जन्म हैम्पशायर के कॉम्पटन में हुआ था, वह अच्छे कुल का और भली-भाँति सम्बद्ध था, और विद्वत्ता के लिए उसकी बहुत ऊँची प्रतिष्ठा थी। केवल यही तथ्य कि मरियम के राज्य के आरम्भ में वह कॉन्वोकेशन में हुए नकली वाद-विवादों में प्रोटेस्टेंट मत के प्रमुख पक्षधरों में से एक था, यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण मनुष्य न था। जिस निर्मम विद्वेष से गार्डिनर ने उसे सताया उसका कारण समझना कठिन नहीं, जब हम स्मरण करते हैं कि गार्डिनर, जब एडवर्ड षष्ठ के समय अपने पद से हटाया गया, विंचेस्टर का अध्यक्ष था, और स्वाभाविक रूप से अपने उत्तराधिकारी बिशप पोर्टर और उसके सब अधिकारियों को तीव्र घृणा से देखता था। पोप-पन्थी अध्यक्ष से यह आशा नहीं की जा सकती थी कि वह किसी प्रोटेस्टेंट आर्चडीकन को छोड़ देता। फ़िलपॉट की पोप-पन्थी अध्यक्षों के सामने तेरह जाँचें फ़ॉक्स ने बहुत विस्तार से दी हैं, और वे पार्कर सोसाइटी के एक खण्ड के पूरे एक सौ चालीस पृष्ठ भरती हैं। जितनी देर तक वे खिंचती रहीं इससे स्पष्ट है कि उसके न्यायाधीश उसे उसके सिद्धान्तों से फेरने के लिए कितने उत्सुक थे। जिस कौशल से आर्चडीकन ने अकेले और बिना सहायता के अपना पक्ष थामे रखा, वह उसकी विद्वत्ता का तथा उसके साहस और धैर्य का अत्यन्त अनुकूल प्रभाव छोड़ता है। उसके मृत्यु-दण्ड से पिछली रात, न्यूगेट में भोजन करते समय, उसे यह सन्देश मिला कि कल उसे जलाया जाएगा। उसने तुरन्त उत्तर दिया, "मैं तैयार हूँ: परमेश्वर मुझे सामर्थ्य और आनन्दमय पुनरुत्थान दे।" तब वह अपने शयन-कक्ष में गया, और परमेश्वर का धन्यवाद किया कि वह उसके सत्य के लिए दुःख उठाने के योग्य गिना गया। अगली सुबह आठ बजे शेरिफ़ों ने उसे बुलाया और स्मिथफ़ील्ड ले गए। मार्ग गन्दा और कीचड़ से भरा था, क्योंकि गहरी सर्दी थी, और अधिकारियों ने उसे अपनी बाँहों में उठाकर खम्भे तक पहुँचाया। तब उसने, सम्भवतः अपने आरम्भिक दिनों की यात्रा में रोम में जो कुछ देखा था उसकी ओर संकेत करते हुए, हँसी में कहा, "क्या, तुम मुझे पोप बनाओगे? मैं अपनी यात्रा के अन्त तक पैदल जाने में सन्तुष्ट हूँ।" जब वह स्मिथफ़ील्ड में पहुँचा, तो उसने घुटने टेककर कहा, "हे स्मिथफ़ील्ड, मैं तुझमें अपनी मन्नतें पूरी करूँगा।" तब उसने खम्भे को चूमा और कहा, "क्या मैं इस खम्भे पर दुःख उठाने से घृणा करूँ, जब मेरे छुड़ानेवाले ने मेरे लिए क्रूस पर अत्यन्त नीच मृत्यु सहने से इनकार नहीं किया?" इसके बाद उसने नम्रता से 106वाँ, 107वाँ और 108वाँ भजन दोहराया; और खम्भे से जंजीर से बाँधे जाने पर बहुत शान्ति से मर गया। और इस प्रकार वह भला आर्चडीकन चला गया। (9) मरियम के राज्यकाल में दुःख उठानेवाला नौवाँ और अन्तिम प्रमुख धर्म-सुधारक कैंटरबरी का आर्चबिशप थॉमस क्रैनमर था। उसे 21 मार्च, 1556 को ऑक्सफ़ोर्ड में जलाया गया। क्रैनमर का जन्म नॉटिंघमशायर के एसलैक्टन में हुआ था। इतिहास में अंग्रेज़ शहीदों में कोई नाम उसके नाम जितना प्रसिद्ध नहीं। हमारे धर्म-सुधारकों की सूची में निश्चय ही कोई ऐसा नहीं जिसका इंग्लैण्ड की कलीसिया, सब मिलाकर, इतना ऋणी हो। यह मानना होगा कि वह केवल नश्वर मनुष्य था, और उसमें भी निर्बलताएँ और दुर्बलताएँ थीं; फिर भी वह एक महान मनुष्य था, और एक भला मनुष्य था।
हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि क्रैनमर को अंग्रेज़ी धर्म-सुधार के तुलनात्मक रूप से आरम्भिक काल में ही प्रमुखता से आगे लाया गया, और उसे कैंटरबरी का आर्चबिशप उस समय बनाया गया जब उसके धार्मिक विचार, स्वयं उसके मानने के अनुसार, अधूरे और अपरिपक्व थे। जब कभी इंग्लैण्ड की कलीसिया में अर्ध-रोमवाद के समर्थक क्रैनमर के लेखों से उद्धरण प्रस्तुत करें, तो आपको सदा ध्यानपूर्वक पूछना चाहिए कि वे उद्धरण उसके जीवन के किस काल के हैं। क्रैनमर के विषय में अपना आकलन बनाते समय उसकी पृष्ठभूमि को न भूलें। वह ऐसा मनुष्य था जिसमें इतनी ईमानदारी थी कि टटोलते हुए पूर्ण प्रकाश की ओर बढ़ा, और अपने आरम्भिक मतों को त्यागकर यह मान लिया कि उसने अनेक विषयों में अपना मन बदल लिया है। कितने थोड़े लोगों में ऐसा करने का साहस होता है! क्रैनमर ने हेनरी अष्टम और एडवर्ड षष्ठ के राज्यकालों में, अत्यन्त नाज़ुक और कठिन परिस्थितियों में बार-बार रखे जाने पर भी, अपनी निष्कलंक प्रतिष्ठा बनाए रखी। उन दिनों एक भी मनुष्य ऐसा नहीं गिनाया जा सकता जो इतने कीचड़ में से गुज़रा हो और फिर भी इतना पूर्णतः निष्कलंक निकला हो। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारी वर्तमान प्रार्थना-पुस्तक और धर्म-अनुच्छेदों की नींव क्रैनमर ने ही डाली। यद्यपि वह शायद प्रतिभाशाली मनुष्य नहीं था, तथापि वह विद्वान था, विद्वानों से प्रेम रखता था, और अपने आसपास की हर बात को सुधारने का सदा प्रयत्न करता था। जब मैं उन विशाल कठिनाइयों पर विचार करता हूँ जिनसे उसे जूझना पड़ा, तो प्रायः आश्चर्य करता हूँ कि उसने जो कुछ किया वह कैसे कर पाया। सच तो यह है कि उसके अटल धैर्य के बिना और कोई बात हमारे आधिकारिक विधि-विधानों की नींव न रख पाती। ये सब बातें मैं इसलिए कह रहा हूँ कि उस बड़े और निर्विवाद तथ्य की कठोरता कुछ कम हो जाए कि वह अकेला अंग्रेज़ धर्म-सुधारक था जिसने कुछ समय के लिए कायरता दिखाई, और कुछ समय के लिए सत्य के लिए मरने से पीछे हट गया! मैं मानता हूँ कि वह बुरी तरह गिरा। मैं उसके पतन को हल्का दिखाने का दावा नहीं करता। वह इस बात का सदा का प्रमाण बनकर खड़ा है कि उत्तम से उत्तम मनुष्य भी अधिक से अधिक मनुष्य ही हैं। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे पाठक स्मरण रखें कि यदि क्रैनमर इस प्रकार विफल हुआ जैसा इंग्लैण्ड का कोई और धर्म-सुधारक विफल नहीं हुआ, तो उसने वह भी किया था जो निश्चय ही और किसी धर्म-सुधारक ने नहीं किया था।
जिस क्षण से मरियम इंग्लैण्ड के सिंहासन पर आई, उसी क्षण से क्रैनमर का विनाश तय हो गया। सम्भव है कि कोई अंग्रेज़ धर्माचार्य ऐसा न था जिसे उस अभागी रानी ने इतने द्वेष और घृणा से देखा हो। वह यह कभी न भूली कि उसकी माता का तलाक क्रैनमर की सलाह से हुआ था, और जब तक उसे जलाया न गया उसने चैन न लिया। क्रैनमर को भी रिडले और लैटिमर के समान ही बन्दीगृह में डाला गया और उसकी जाँच की गई। उनके समान ही वह भी आयुक्तों के सामने दृढ़ता से डटा रहा। उनके समान ही विवादित सभी बातों में तर्क में स्पष्टतः उसी का पलड़ा भारी रहा। परन्तु उनके समान ही उसे भी निस्सन्देह झूठी शिक्षा का दोषी ठहराया गया, दण्डित किया गया, पद से हटाया गया, और जला दिए जाने का दण्ड सुनाया गया। और अब वह पीड़ादायक बात आती है कि क्रैनमर के जीवन के अन्तिम महीने में उसका साहस जाता रहा, और उसे अपने प्रोटेस्टेंट मतों के खण्डन-पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मना लिया गया। चतुराई भरी कोमलता से फुसलाया और बहकाया जाकर, जलाए जाने जैसी भयानक मृत्यु की सम्भावना से डरकर, और शैतान के द्वारा परीक्षा में पड़कर और भटकाया जाकर, थॉमस क्रैनमर गिर पड़ा, और उसने एक पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसमें उसने धर्म-सुधार के उन सिद्धान्तों का खण्डन और परित्याग किया जिनके लिए उसने इतने समय तक परिश्रम किया था। इन समाचारों को सुनकर सब सच्चे प्रोटेस्टेंटों को कितना गहरा शोक हुआ! और सब पोप के अनुयायियों ने कितना उल्लास और विजय मनाया! यदि वे यहीं रुक जाते और अपने उस श्रेष्ठ शिकार को छोड़ देते, तो क्रैनमर का नाम सम्भवतः डूब जाता और फिर कभी न उभरता। परन्तु रोमी दल ने, जैसा परमेश्वर को मंज़ूर था, अपनी ही चाल में स्वयं को फँसा लिया। राक्षसी निर्दयता से उन्होंने ठान लिया कि क्रैनमर को उसके खण्डन-पत्र के बाद भी जलाया जाए। परमेश्वर के विधान से यही क्रैनमर की प्रतिष्ठा का मोड़-बिन्दु बन गया। परमेश्वर के भरपूर अनुग्रह से उसने अपने पतन से मन फिराया और दया पाई। उसी भरपूर अनुग्रह से उसने ठान लिया कि वह धर्म-सुधार के विश्वास में ही मरेगा। और अन्त में, उसी भरपूर अनुग्रह से, उसने ऑक्सफ़र्ड के सेंट मैरी में ऐसा निर्भीक अंगीकार किया कि उसने अपने शत्रुओं को निरुत्तर कर दिया, अपने मित्रों को धन्यवाद और स्तुति से भर दिया, और मसीह के सत्य के लिए विजयी शहीद के रूप में संसार को छोड़ गया। मुझे आपको शायद ही स्मरण दिलाना पड़े कि 21 मार्च को वह अभागा
आर्चबिशप को पलिश्तियों के हाथ में शिमशोन के समान बाहर लाया गया, कि वह अपने शत्रुओं के लिये तमाशा बने और ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट मैरी गिरजाघर में सारे जगत के लिये दर्शनीय वस्तु ठहरे। मुझे शायद ही स्मरण दिलाने की आवश्यकता है कि डॉ. कोल के उपदेश के पश्चात् उसे अपने विश्वास की घोषणा करने के लिये कैसे बुलाया गया, और यह पूरी आशा की गई थी कि वह सबके सामने अपने धर्म-परिवर्तन को स्वीकार करेगा और रोम की कलीसिया से अपने जुड़ाव को मान लेगा। मुझे शायद ही स्मरण दिलाने की आवश्यकता है कि गहन मानसिक पीड़ा के साथ आर्चबिशप ने सभा को बड़े विस्तार से सम्बोधित किया, और अन्त में अचानक अपने शत्रुओं को स्तब्ध कर दिया, क्योंकि उसने अपने पूर्व के सब पश्चात्तापपूर्ण इनकारों को त्याग दिया, पोप को मसीह-विरोधी घोषित किया, और पोप-सम्बन्धी "वास्तविक उपस्थिति" के सिद्धान्त को ठुकरा दिया। ऐसा दृश्य संसार की उत्पत्ति से लेकर आज तक किसी मनुष्य की आँखों ने निश्चय ही कभी नहीं देखा था! परन्तु तब क्रैन्मर की विजय की घड़ी आई। हल्के मन और शुद्ध विवेक के साथ उसने प्रसन्नता से स्वयं को खम्भे की ओर ले जाने दिया, जबकि उसके निराश शत्रु उन्मत्त होकर चिल्ला रहे थे। निर्भीक और अडिग होकर वह खम्भे पर खड़ा रहा, जबकि लपटें उसके चारों ओर लिपट रही थीं; उसने अपना दाहिना हाथ आग में स्थिर थामे रखा और पश्चात्तापपत्र पर हस्ताक्षर कर देने की बात का उल्लेख करते हुए कहा, "यह अयोग्य दाहिना हाथ," और अपना बायाँ हाथ स्वर्ग की ओर स्थिर उठाए रखा।5 आश्चर्य की बात है कि सब शहीदों में अन्तिम क्षण में क्रैन्मर से बढ़कर किसी ने शारीरिक साहस नहीं दिखाया। संक्षेप में, उसके सारे जीवन में कोई बात उसे उतनी शोभा नहीं देती जितनी उसके जीवन से विदा लेने की रीति। उसने बहुत पाप किया था, परन्तु उसने बहुत मन भी फिराया। पतरस के समान वह गिरा, पर पतरस ही के समान वह फिर उठ खड़ा हुआ। और इस प्रकार कैंटरबरी का प्रथम प्रोटेस्टेंट आर्चबिशप चला गया। मैं इन दुःखद और रोचक वृत्तान्तों पर कोई टिप्पणी करने का साहस नहीं करूँगा; मेरे पास समय नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे पाठक यह मानें कि इन पुरुषों की कहानियों का आधा भाग भी उन्हें नहीं सुनाया गया है, और पद-प्रतिष्ठा में कम प्रसिद्ध दर्जनों स्त्री-पुरुषों की कहानियाँ भी इनमें सहज ही जोड़ी जा सकती हैं, जो उतनी ही दुःखद और उतनी ही रोचक हैं।6 परन्तु मैं निर्भीकता से कहूँगा कि जो लोग इस प्रकार जलाए गए वे ऐसे नहीं हैं जिनकी स्मृति को हल्के में टाल दिया जाए, या जिनके विचारों को तुच्छ समझा जाए। जिन विचारों के लिये "शहीदों की एक सेना" ने प्राण दिए, उन्हें घृणा से ठुकरा देना उचित नहीं। इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया का अस्तित्व हम उनकी विश्वासयोग्यता के ऋणी हैं। उसकी नींव उनके लहू से जमाई गई थी। हमारी अंग्रेज़ी स्वतन्त्रता भी बहुत बड़े अंश में उनके साहस की देन है। उन्होंने देश को सिखाया कि स्वतन्त्र विचार के लिये मरना भी उचित है। धन्य है वह देश जिसके ऐसे नागरिक रहे हैं! धन्य है वह कलीसिया जिसके ऐसे धर्म-सुधारक रहे हैं! उन्हें सम्मान मिले जिन्होंने स्मिथफ़ील्ड, ऑक्सफ़ोर्ड, ग्लूस्टर, कार्मार्थन और हैडली में शहीदों के लिये स्मरण और स्मारक के पत्थर खड़े किए हैं!
III. परन्तु अब मैं एक ऐसी बात पर आता हूँ जिसे मैं आज के समय में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। मैं उस विशेष कारण की बात कर रहा हूँ जिसके लिये हमारे धर्म-सुधारक जलाए गए। यदि हम यह मान लें कि वे पोप की अधीनता से इनकार करने के अस्पष्ट आरोप के कारण, या इंग्लैंड की कलीसिया की स्वतन्त्रता बनाए रखने की इच्छा के कारण मरे, तो हमारी बड़ी भूल होगी। ऐसा कुछ भी नहीं! उनके जलाए जाने का मुख्य कारण यह था कि उन्होंने रोमी कलीसिया के एक विशिष्ट सिद्धान्त को स्वीकार करने से इनकार किया। लगभग हर मामले में उन्हीं के जीवन या मृत्यु का निर्णय उसी सिद्धान्त पर टिका था। यदि वे उसे मान लेते तो जीवित रह सकते थे; यदि अस्वीकार करते तो उन्हें मरना ही था। वह सिद्धान्त था प्रभु-भोज की अभिषिक्त की गई रोटी और दाखरस में मसीह की देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति। क्या वे विश्वास करते थे, या नहीं, कि मसीह की देह और लहू वास्तव में, अर्थात् शारीरिक रूप से, अक्षरशः, स्थान-विशेष में और भौतिक रूप से, पवित्रीकरण के शब्द कहे जाने के पश्चात् रोटी और दाखरस के रूपों के नीचे उपस्थित हैं? क्या वे विश्वास करते थे, या नहीं, कि कुँवारी मरियम से जन्मी मसीह की वास्तविक देह उस तथाकथित वेदी पर उसी क्षण उपस्थित हो जाती है जैसे ही याजक के होंठों से वे रहस्यमय शब्द निकलते हैं? क्या वे ऐसा विश्वास करते थे, या नहीं? प्रश्न बस इतना सीधा था। यदि वे ऐसा विश्वास न करते और उसे स्वीकार न करते, तो जला दिए जाते।7 इस विषय पर हमारे शहीदों की कहानियों में एक अद्भुत और विचित्र एकता है। उनमें से कुछ पर, निस्सन्देह, याजकों के विवाह के विषय में आक्रमण हुआ। कुछ पर कैथोलिक कलीसिया के स्वरूप के विषय में हमला हुआ। कुछ पर अन्य बातों में दोष लगाया गया।
परन्तु बिना किसी अपवाद के सबसे वास्तविक उपस्थिति के विषय में विशेष रूप से हिसाब माँगा गया, और हर मामले में उस सिद्धान्त को मानने से उनका इनकार उनके दण्ड का एक प्रमुख कारण बना।
(1) सुनिए रॉजर्स ने क्या कहा: —
"मुझसे पूछा गया कि क्या मैं विश्वास करता हूँ कि संस्कार वास्तव में और तत्त्वतः हमारे उद्धारकर्ता मसीह की वही देह और लहू है जो कुँवारी मरियम से जन्मा और क्रूस पर टाँगा गया। मैंने उत्तर दिया, 'मैं इसे झूठ मानता हूँ। मैं "वास्तव में और तत्त्वतः" का अर्थ "शारीरिक रूप से" के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझ सकता। परन्तु शारीरिक रूप से मसीह केवल स्वर्ग में है, और इसलिये मसीह आपके संस्कार में शारीरिक रूप से नहीं हो सकता।'" — फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 101, संस्करण 1684।
और इसी कारण उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया।
(2) सुनिए बिशप हूपर ने क्या कहा: —
"टन्स्टल ने उससे कहा कि वह बताए, 'क्या वह संस्कार में शारीरिक उपस्थिति में विश्वास करता है,' और मास्टर हूपर ने स्पष्ट कहा 'कि ऐसी कोई बात है ही नहीं, और न वह ऐसी किसी बात में विश्वास करता है।' इस पर उन्होंने लिपिकों से कहा कि वे लिख लें कि वह विवाहित है और अपनी पत्नी को छोड़ने को तैयार नहीं, और कि वह संस्कार में शारीरिक उपस्थिति में विश्वास नहीं करता; इसलिये वह अपने अध्यक्ष-पद से हटाए जाने के योग्य है।" — फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 123।
और इस प्रकार उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया।
(3) सुनिए रोलैंड टेलर ने क्या कहा: —
"मुझे विधर्मी ठहराए जाने का दूसरा कारण यह था कि मैंने पदार्थान्तरण और सहवर्तिता का इनकार किया — ये दो छलपूर्ण शब्द हैं, जिनके द्वारा पोप के अनुयायी मानते हैं कि मसीह की स्वाभाविक देह रोटी से बनती है और ईश्वरत्व तुरन्त उसके साथ जुड़ जाता है, ताकि पवित्रीकरण के शब्दों के तुरन्त बाद संस्कार में रोटी और दाखरस कुछ नहीं रह जाते, बल्कि केवल मसीह की देह और लहू का तत्त्व रह जाता है।"
"क्योंकि मैंने पूर्वोक्त पोप-सम्बन्धी सिद्धान्त का (वरन् सीधे-सीधे कहूँ तो घोर मूर्तिपूजा, निन्दा और झूठी शिक्षा का) इनकार किया, इसलिए मुझे विधर्मी ठहराया गया है।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 141।
और इसीलिए उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया।
(4) सुनिए कि अध्यक्ष फ़ेरर के साथ क्या किया गया। उसे बुलाकर कहा गया कि वह "प्रभु-भोज में रोटी और दाखरस के रूप में मसीह की स्वाभाविक उपस्थिति को स्वीकार करे," और क्योंकि उसने इस अनुच्छेद पर तथा अन्य अनुच्छेदों पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया, इसलिए उसे दोषी ठहराया गया। और दण्डादेश में अन्त में उस पर यह दोष लगाया गया कि वह यह मानता था कि "वेदी के संस्कार को वेदी पर नहीं परोसना चाहिए, न उसे ऊँचा उठाना चाहिए, न किसी प्रकार उसकी आराधना करनी चाहिए।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 178। और इस प्रकार उसे जला दिया गया।
(5) सुनिए कि पवित्र यूहन्ना ब्रैडफ़र्ड ने कारागार में रहते हुए लंकाशायर और चेशायर के लोगों को क्या लिखा: -
"मुझे विधर्मी ठहराए जाने का मुख्य कारण यह है कि मैं वेदी के संस्कार में (जो अब पोप के अनुयायियों द्वारा जैसे किया जाता है, वह मसीह का प्रभु-भोज नहीं, बल्कि उसका सीधा बिगाड़ है) मसीह की देह और लहू की रोटी और दाखरस के रूप और गुणों के अधीन वास्तविक, स्वाभाविक और शारीरिक उपस्थिति का इनकार करता हूँ: अर्थात् इसलिए कि मैं पदार्थान्तरण का इनकार करता हूँ, जो शैतान का लाड़ला और मसीह-विरोधी के धर्म की पुत्री और उत्तराधिकारी है।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 260।
और इस प्रकार उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया।
(6) सुनिए कि अध्यक्ष रिडली के विरुद्ध दण्डादेश के शब्द क्या थे: -
"उक्त निकोलस रिडली कुछ ऐसे मतों, कथनों और झूठी शिक्षाओं की पुष्टि करता है, उन्हें बनाए रखता है और हठपूर्वक उनका बचाव करता है, जो परमेश्वर के वचन और कलीसिया के ग्रहण किए हुए विश्वास के विरुद्ध हैं, जैसे कि वेदी के संस्कार में मसीह की सच्ची और स्वाभाविक देह और लहू की उपस्थिति का इनकार करना, और दूसरे, यह कहना कि प्रतिष्ठा के शब्दों के पश्चात् भी रोटी और दाखरस का सार-तत्त्व बना रहता है।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 426।
और इस प्रकार उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया।
(7) सुनिए कि अध्यक्ष लैटिमर के विरुद्ध कौन-से अनुच्छेद प्रस्तुत किए गए: -
"कि तूने खुलेआम यह कहा, इसका बचाव किया और इसे बनाए रखा कि याजक द्वारा प्रतिष्ठा किए जाने के पश्चात् भी मसीह की सच्ची और स्वाभाविक देह वेदी के संस्कार में वास्तव में उपस्थित नहीं है, और वेदी के संस्कार में रोटी और दाखरस का सार-तत्त्व अब भी बना रहता है।"
और इस अनुच्छेद के उत्तर में उस भले बूढ़े पुरुष ने कहा: -
"जिस शारीरिक सत्ता को रोमी कलीसिया प्रस्तुत करती है, उस प्रकार से मसीह की देह और लहू संस्कार में रोटी और दाखरस के रूपों के अधीन नहीं है।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 426।
और इस प्रकार उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया। (8) सुनिए कि अध्यक्ष बोनर ने आर्कडीकन फ़िलपॉट को क्या सम्बोधन किया: -
"तूने वेदी के संस्कार के विरुद्ध अपराध और उल्लंघन किया है, क्योंकि तू वहाँ मसीह की देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति का इनकार करता है, और यह भी कहता है कि संस्कार में भौतिक रोटी और भौतिक दाखरस है, मसीह की देह और लहू का सार-तत्त्व नहीं।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 495।
और क्योंकि वह भला पुरुष इस मत पर दृढ़ता से डटा रहा, इसलिए उसे दोषी ठहराया गया और जला दिया गया।
(9) अन्त में सुनिए कि क्रेनमर ने ऑक्सफ़ोर्ड के सन्त मरियम के गिरजाघर में लगभग अपनी अन्तिम साँस के साथ क्या कहा: -
"जहाँ तक संस्कार का प्रश्न है, मैं वही मानता हूँ जो मैंने विनचेस्टर के अध्यक्ष के विरुद्ध अपनी पुस्तक में सिखाया है; मेरी वह पुस्तक ऐसा सच्चा सिद्धान्त सिखाती है कि वह अन्तिम दिन परमेश्वर के न्याय के सामने स्थिर खड़ी रहेगी, जब उसके विपरीत पोप के अनुयायियों का सिद्धान्त अपना मुँह दिखाने में लज्जित होगा।" - फ़ॉक्स, उसी स्थान पर, खण्ड 3, पृ. 562।
यदि कोई जानना चाहे कि क्रेनमर ने इस पुस्तक में क्या कहा था, तो वह नमूने के रूप में यह वाक्य ले: -
"वे (पोप के अनुयायी) कहते हैं कि मसीह रोटी और दाखरस के रूप में या उसके अधीन शारीरिक रीति से उपस्थित है। हम कहते हैं कि मसीह वहाँ न शारीरिक रीति से है, न आत्मिक रीति से; परन्तु जो लोग योग्य रीति से रोटी और दाखरस खाते-पीते हैं, उनमें वह आत्मिक रीति से है, और शारीरिक रीति से स्वर्ग में है।" - "प्रभु-भोज पर क्रेनमर," पार्कर सोसाइटी संस्करण, पृ. 54।
और इस प्रकार उसे जला दिया गया।
अब, क्या अंग्रेज़ धर्म-सुधारक वास्तविक उपस्थिति के इस प्रश्न पर इतने कठोर और अडिग रहने में सही थे? क्या यह इतना अत्यावश्यक विषय था कि उन्हें उसे स्वीकार करने से पहले मर जाना उचित था? मुझे सन्देह है कि ये ऐसे प्रश्न हैं जो बहुत-से अविचारशील मनों को बड़ी उलझन में डालते हैं। मुझे भय है कि ऐसे मन वास्तविक उपस्थिति के पूरे विवाद में शब्दों के झगड़े के सिवाय और कुछ नहीं देख पाते। परन्तु मैं साहस के साथ कहता हूँ कि ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर देने में बाइबल का कोई भी सुशिक्षित पाठक एक क्षण को भी नहीं झिझकेगा। ऐसा व्यक्ति तुरन्त कहेगा कि वास्तविक उपस्थिति का रोमी सिद्धान्त सुसमाचार की जड़ पर ही प्रहार करता है, और पोप-तन्त्र का मुख्य गढ़ और दुर्ग है। लोग पहले-पहल यह न देख पाएँ, परन्तु यह ऐसी बात है जिसे ध्यानपूर्वक स्मरण रखना चाहिए। इससे उस मार्ग पर, जो धर्म-सुधारकों ने अपनाया, और उस अटल दृढ़ता पर, जिसके साथ वे मरे, स्पष्ट और व्यापक प्रकाश पड़ता है। लोग चाहे जो सोचें या कहें, वास्तविक उपस्थिति का रोमी सिद्धान्त, यदि उसे उसके न्यायसंगत परिणामों तक पहुँचाया जाए, तो सुसमाचार के हर प्रमुख सिद्धान्त को धुँधला कर देता है, और मसीह के सत्य की सारी व्यवस्था को हानि पहुँचाता है और उसमें बाधा डालता है। एक क्षण के लिए मान लीजिए कि प्रभु-
प्रभु-भोज एक बलिदान है, संस्कार नहीं — मान लीजिए कि जब भी प्रतिष्ठा के वचन कहे जाएँ, तब रोटी और दाखरस के रूपों में मसीह की स्वाभाविक देह और लहू प्रभु-भोज की मेज़ पर उपस्थित होते हैं — मान लीजिए कि जो कोई उस प्रतिष्ठित रोटी को खाता और उस प्रतिष्ठित दाखरस को पीता है, वह सचमुच मसीह की स्वाभाविक देह और लहू को खाता और पीता है — एक क्षण के लिए इन बातों को मान लीजिए, और फिर देखिए कि इन आधारों से कैसे गम्भीर परिणाम निकलते हैं। आप मसीह के उस पूर्ण किए हुए कार्य के धन्य सिद्धान्त को बिगाड़ देते हैं, जो उसने क्रूस पर मरकर पूरा किया। जिस बलिदान को दोहराने की आवश्यकता पड़े, वह सिद्ध और सम्पूर्ण नहीं हो सकता। — आप मसीह के याजकीय पद को बिगाड़ देते हैं। यदि उसके अतिरिक्त और भी याजक हैं जो परमेश्वर को ग्रहणयोग्य बलिदान चढ़ा सकते हैं, तो महान महायाजक की महिमा छीन ली जाती है। — आप मसीही सेवकाई के पवित्रशास्त्रीय सिद्धान्त को बिगाड़ देते हैं। आप पापी मनुष्यों को परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ के पद पर चढ़ा देते हैं। — आप संस्कार के तत्वों, रोटी और दाखरस, को ऐसा मान और आदर देते हैं जो उन्हें कभी मिलना नहीं था, और ऐसी मूर्तिपूजा उत्पन्न करते हैं जिससे सच्चे मसीहियों को घृणा होनी चाहिए। — अन्त में, पर कम महत्त्वपूर्ण नहीं, आप मसीह के मानव स्वभाव के सच्चे सिद्धान्त को उलट देते हैं। यदि कुँवारी मरियम से जन्मी देह एक ही समय में एक से अधिक स्थानों पर हो सकती है, तो वह हमारी अपनी देह के समान देह नहीं है, और यीशु हमारे स्वभाव की सच्चाई में "दूसरा आदम" नहीं ठहरता। मुझे एक क्षण के लिए भी सन्देह नहीं कि हमारे शहीद धर्म-सुधारकों ने इन बातों को हमसे भी अधिक स्पष्टता से देखा और अनुभव किया, और इन्हें देखते और अनुभव करते हुए उन्होंने वास्तविक उपस्थिति के सिद्धान्त को मानने की अपेक्षा मरना चुना। इन्हें अनुभव करते हुए वे एक क्षण के लिए भी झुककर समर्पित नहीं हुए, और आनन्द से अपने प्राण दे दिए। यह तथ्य हमारे मनों में गहराई से अंकित हो जाए। पृथ्वी पर जहाँ कहीं अंग्रेज़ी भाषा बोली जाती है, वहाँ इतिहास पढ़ने वाले प्रत्येक अंग्रेज़ को यह तथ्य भली-भाँति समझना चाहिए। रोटी और दाखरस के रूप में मसीह की स्वाभाविक देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति के सिद्धान्त को मानने की अपेक्षा इंग्लैंड की कलीसिया के धर्म-सुधारक जल जाने को तैयार थे।
IV. और अब मैं अपने पाठकों का विशेष ध्यान चाहता हूँ, जब मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँ कि यह सारा विषय हमारी अपनी स्थिति और हमारे अपने समय पर कैसे लागू होता है। मैं आपसे कहता हूँ कि मरे हुओं से जीवितों की ओर मुड़िए, 1555 के इंग्लैंड से आज के इस प्रबुद्ध और उन्नत युग के इंग्लैंड की ओर देखिए, और गम्भीरता से विचार कीजिए कि हमारे धर्म-सुधारकों के जलाए जाने से आज की इंग्लैंड की कलीसिया पर क्या प्रकाश पड़ता है। हम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समय में जी रहे हैं। चारों ओर कलीसिया का क्षितिज अन्धकारमय और घिरा हुआ है। अति-कर्मकाण्डवाद और कर्मकाण्डवादियों का निरन्तर उदय और बढ़ोतरी इंग्लैंड की कलीसिया को उसकी जड़ तक हिला रही है। यह समझना सबसे अधिक आवश्यक है कि इस सबका अर्थ क्या है। रोग का सही निदान सफल उपचार का पहला तत्त्व है। जो चिकित्सक यह नहीं देखता कि रोग क्या है, वह कभी किसी को चंगा नहीं कर सकता। अब मैं कहता हूँ कि इससे बड़ी कोई भूल नहीं हो सकती कि हमारे समय का यह महान विवाद केवल वस्त्रों और सजावट का प्रश्न है — चैज़्यबल और कोप का, कलीसिया की कम या अधिक सजावट का, कम या अधिक मोमबत्तियों और फूलों का, कम या अधिक झुकने, मुड़ने और क्रूस का चिह्न बनाने का, कम या अधिक भाव-भंगिमाओं और मुद्राओं का, कम या अधिक दिखावे और रूप का। जो मनुष्य यह समझता है कि सारा विवाद केवल सौन्दर्य-बोध का है, रुचि का प्रश्न है, जैसे फ़ैशन और टोपियों का, वह मुझे यह कहने की अनुमति दे कि वह पूरी तरह भ्रम में है। वह एपिक्यूरियन दार्शनिक की तरह तट पर बैठकर धर्म-सम्बन्धी तूफ़ानों पर मुस्कुरा सकता है और अपने आपको यह कहकर बहला सकता है कि हम केवल तुच्छ बातों पर झगड़ रहे हैं; परन्तु मैं उससे कहने का साहस करता हूँ कि उसका दर्शन बहुत उथला है, और आज के विवाद का उसका ज्ञान सचमुच बहुत सतही है। जिन बातों की मैंने चर्चा की है, वे तुच्छ हैं, यह मैं पूरी तरह मानता हूँ। परन्तु वे हानिकारक तुच्छ बातें हैं, क्योंकि वे भीतरी सिद्धान्त की बाहरी अभिव्यक्ति हैं। वे उस त्वचा-रोग के समान हैं जो अस्वस्थ शरीर का लक्षण है। वे उस महामारी के चिह्न हैं जो भीतर के विष की ओर संकेत करते हैं। वे उस उठते धुएँ के समान हैं जो छिपे हुए हानिकारक ज्वालामुखी से निकलता है। मैं तो कलीसिया के वस्त्रों, धूप या मोमबत्तियों के विषय में कभी कोई हलचल न मचाता, यदि मुझे लगता कि सतह के नीचे उनका कोई अर्थ नहीं है। परन्तु मेरा विश्वास है कि उनका अर्थ बहुत सारा भ्रम और झूठा सिद्धान्त है, इसलिए मैं सबके सामने उनका विरोध करता हूँ, और कहता हूँ कि जो उनका समर्थन करते हैं वे दोषी ठहराए जाने योग्य हैं।
मेरी सोची-समझी राय यह है कि सम्पूर्ण कर्मकाण्डवादी व्यवस्था की जड़ यह खतरनाक सिद्धान्त है कि प्रभु-भोज में प्रतिष्ठित रोटी और दाखरस के रूप में मसीह की स्वाभाविक देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति है। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो यह वास्तविक उपस्थिति ही कर्मकाण्डवाद का मूल सिद्धान्त है। इसी वास्तविक उपस्थिति को कर्मकाण्डवादी दल के उग्र सदस्य इंग्लैंड की कलीसिया में फिर से लाना चाहते हैं। और जैसे हमारे शहीद धर्म-सुधारकों ने वास्तविक उपस्थिति को मानने की अपेक्षा खम्भे पर जलना स्वीकार किया, वैसे ही मेरा मानना है कि हमें कोई भी बलिदान देना चाहिए और अन्त तक संघर्ष करना चाहिए, परन्तु प्रभु-भोज में मसीह की उपस्थिति के विषय में किसी भौतिकवादी सिद्धान्त को किसी भी रूप में अपनी सहभागिता में लौटने नहीं देना चाहिए। मैं अपने पाठकों को अपने कथन के प्रमाण में उद्धरणों से नहीं थकाऊँगा। उन्होंने उनके बारे में काफ़ी सुन लिया है, शायद आवश्यकता से अधिक। परन्तु मुझे दो छोटे अंश देने की अनुमति दीजिए। देखिए कि डॉ. प्यूज़ी "क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?" नामक उपदेश में क्या कहते हैं (पार्कर, 1867): —
"प्रभु की उपस्थिति के ढंग के विषय में किसी भी भौतिकवादी धारणा को अस्वीकार करते हुए, जैसी कि मेरे विश्वास में 'हमारे प्रभु के मांस और लहू की शारीरिक उपस्थिति' इस वाक्यांश में निन्दित है, अर्थात् मानो उसका बहुमूल्य शरीर और लहू किसी स्थूल या शारीरिक रीति से उपस्थित हो, न कि संस्कार के रूप में, यथार्थ में, आत्मिक रीति से — मैं यह विश्वास करता हूँ कि पवित्र प्रभु-भोज में मसीह का शरीर और लहू 'रोटी और दाखरस के रूपों में' संस्कार के रूप में, अलौकिक रीति से, अवर्णनीय किन्तु सचमुच और वास्तव में उपस्थित हैं; और यह कि 'जहाँ उसका शरीर है, वहीं मसीह है।'"
डॉ. लिटिलडेल 'वास्तविक उपस्थिति' नामक एक पुस्तिका में जो कहते हैं, उस पर ध्यान दीजिए: —
"1. मसीही कलीसिया यह सिखाती है, और सदा से सिखाती आई है, कि पवित्र सहभागिता में, प्रतिष्ठा के पश्चात्, प्रभु
यीशु मसीह का शरीर और लहू रोटी और दाखरस के रूपों में वेदी पर 'सचमुच और वास्तव में' उपस्थित होते हैं।
"2. कलीसिया यह भी सिखाती है कि यह उपस्थिति परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर है, मनुष्य के विश्वास पर नहीं, और इसलिए सहभागी होने में बुरे और भले लोग ठीक वही वस्तु पाते हैं, भले लोग अपनी भलाई के लिए, बुरे लोग अपने दण्ड के लिए।
"3. फिर यह कि जैसे मसीह परमेश्वर भी है और मनुष्य भी, और ये दोनों स्वभाव उसके एक ही व्यक्तित्व में सदा के लिए जुड़े हैं, इसलिए जहाँ उसका शरीर है वहाँ उसका ईश्वरत्व भी अवश्य होगा, और इसलिए उसके संस्कार में उसकी आराधना की जानी चाहिए।
"4. जो शरीर और लहू उपस्थित हैं वे वही शरीर और लहू हैं जो पवित्र आत्मा से गर्भ में आया, कुँवारी मरियम से जन्मा, पुन्तियुस पिलातुस के अधीन दुःख उठाया, और स्वर्ग पर चढ़ गया; परन्तु वे उस रीति से उपस्थित नहीं हैं जैसे वे तब थे जब मसीह पृथ्वी पर चलता था। वह, मनुष्य के रूप में, अब स्वाभाविक रीति से स्वर्ग में है, और अन्तिम दिन तक वहीं रहेगा, फिर भी वह पवित्र सहभागिता में किसी ऐसी रीति से अलौकिक रूप में, और उतनी ही सच्चाई से, उपस्थित है जिसे हम समझा नहीं सकते, केवल मान सकते हैं।"
हम देख सकते हैं कि इन दोनों उद्धरणों में "स्थूल और शारीरिक उपस्थिति" मानने के आरोप से बचने का प्रयत्न किया गया है। परन्तु यह प्रयत्न सफल नहीं होता। यह बड़ी विचित्र बात है कि रोमी पक्ष के विवादकर्ता, मि. हार्डिंग ने, जो बिशप ज्यूएल के विरोधी थे, 300 वर्ष पहले ठीक इतना ही कहा था। उन्होंने कहा:—
"मसीह का शरीर शारीरिक, या मांसिक, या स्वाभाविक रीति से नहीं, परन्तु अदृश्य, अवर्णनीय, चमत्कारिक, अलौकिक, आत्मिक, ईश्वरीय रीति से, और उस ढंग से उपस्थित है जो उसी को ज्ञात है।" — "ज्यूएल को हार्डिंग का उत्तर," पृ. 434. पार्कर सोसायटी संस्करण।
दोनों ही स्थितियों में हम इस बात को अनदेखा नहीं कर सकते कि वे ही शब्द प्रयोग किए गए हैं जिन्हें हमारे शहीदों ने दृढ़ता से अस्वीकार किया था: "रोटी और दाखरस के रूपों में उपस्थित।"
मेरे विचार में यह स्पष्ट है कि यदि डॉ. प्यूज़ी और डॉ. लिटिलडेल को तीन सौ वर्ष पहले गार्डिनर और बोनर के सामने लाया जाता, तो वे शानदार सफलता के साथ अदालत से निकलते, और किसी भी दशा में उन्हें जलाया न जाता। मैं अपने पाठकों को प्रभु-भोज पर हमारी कलीसिया के उच्च पदों पर बैठे पुरुषों के अन्य प्रकाशित उपदेशों की ओर संकेत कर सकता हूँ। मैं उन्हें सहभागियों के उपयोग के लिए बनी कई कर्मकाण्डवादी पुस्तिकाओं की ओर संकेत कर सकता हूँ। मैं उन्हें प्रसिद्ध पुस्तक "डायरेक्टोरियम एंग्लिकेनम" की ओर संकेत कर सकता हूँ। मैं केवल अपनी यह राय देता हूँ कि कोई भी सीधा-सादा, सचेत मनुष्य प्रभु-भोज के विषय में अतिवादी कर्मकाण्डवादियों के लेखों को पढ़कर उनके सिद्धान्त और सीधे-सीधे पोप-मत के बीच कोई वास्तविक भेद नहीं देख सकता। यह ऐसा भेद है जिसमें कोई अन्तर नहीं, और जिसे बारह ईमानदार पुरुषों की कोई भी जूरी तुरन्त कहेगी कि सिद्ध नहीं किया जा सकता। मैं पुस्तकों और उपदेशों से हटकर कलीसियाओं की ओर मुड़ता हूँ, और किसी भी विचारशील मन से कहता हूँ कि किसी भी पूरी तरह कर्मकाण्डवादी आराधना-स्थल में जो कुछ देखा जा सकता है, उसे ध्यान से देखे, विचारे और पचाए। मैं उससे कहता हूँ कि उस अन्धविश्वासी श्रद्धा और मूर्तिपूजक सम्मान पर ध्यान दे जिससे वेदी-क्षेत्र के भीतर, और प्रभु की मेज़ के चारों ओर और उस पर रखी हर वस्तु को देखा जाता है। मैं निर्भय होकर बारह ईमानदार और निष्पक्ष पुरुषों की किसी भी जूरी से कहता हूँ कि उस वेदी-क्षेत्र और प्रभु-भोज की मेज़ को देखें, और मुझे बताएँ कि वे इस सबका क्या अर्थ समझते हैं। मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या यह सारा कुछ वास्तविक उपस्थिति के रोमी सिद्धान्त और मिस्सा के बलिदान की गन्ध नहीं देता? मैं विश्वास करता हूँ कि यदि बोनर और गार्डिनर ने आज की कुछ कलीसियाओं के वेदी-क्षेत्र और प्रभु-भोज की मेज़ें देखी होतीं, तो उन्होंने हाथ उठाकर आनन्द मनाया होता; जबकि लन्दन के अध्यक्ष रिडले और ग्लूसेस्टर के अध्यक्ष हूपर धर्मी क्रोध के साथ मुँह फेरकर कहते, "यह मेज़ प्रभु की मेज़ पर प्रभु-भोज के लिए नहीं, बल्कि मूर्तिपूजक पोप-मत के मिस्सा की नकल करने के लिए है।" मैं क्षण भर के लिए भी अतिवादी कर्मकाण्डवादियों की धुन, गम्भीरता और सच्चाई से इनकार नहीं करता, यद्यपि यही बात फरीसियों या जेसुइटों के विषय में भी कही जा सकती है। मैं इससे इनकार नहीं करता कि हम एक अनोखे रूप से स्वतन्त्र देश में रहते हैं, और अंग्रेज़ों को आज के दिनों में आत्महत्या को छोड़कर हर प्रकार की मूर्खता करने की स्वतन्त्रता है। परन्तु मैं इससे अवश्य इनकार करता हूँ कि कोई भी पादरी, चाहे वह कितना ही धुनी और गम्भीर हो, इंग्लैंड की कलीसिया में पोप-मत को फिर से लाने का अधिकार रखता है। और सबसे बढ़कर, मैं इससे इनकार करता हूँ कि उसे वास्तविक उपस्थिति के उसी सिद्धान्त को थामे रखने का कोई अधिकार है जिसका विरोध करने के कारण उसकी कलीसिया के धर्म-सुधारक जलाए गए थे। सीधी सच्चाई यह है कि प्रभु-भोज के विषय में अतिवादी कर्मकाण्डवादी दल का सिद्धान्त हमारे शहीद धर्म-सुधारकों की मृत्यु के समय की सम्मतियों से कभी मेल नहीं खा सकता। इस दल के सदस्य ऊँचे स्वर में विरोध कर सकते हैं कि वे खरे कलीसियावादी हैं, परन्तु वे निश्चय ही मरियम के समय के शहीदों जैसी सम्मति रखनेवाले कलीसियावादी नहीं हैं। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो हूपर, रॉजर्स, रिडले, ब्रैडफोर्ड और उनके साथियों का वास्तविक उपस्थिति पर एक मत था, और अति-कर्मकाण्डवादियों का बिल्कुल दूसरा है। यदि वे सही थे, तो कर्मकाण्डवादी गलत हैं। दोनों दलों के बीच ऐसी खाई है जिसे पार नहीं किया जा सकता। ऐसा पूरा भेद है जिसे न मिलाया जा सकता है, न समझाकर टाला जा सकता है। यदि हम एक पक्ष के साथ हैं, तो दूसरे के साथ कदापि नहीं हो सकते। जहाँ तक मेरी बात है, मैं बिना हिचकिचाए कहता हूँ कि मुझे अति-कर्मकाण्डवादी दल के सब अगुवों से अधिक रिडले, हूपर और ब्रैडफोर्ड पर भरोसा है। परन्तु हम क्या करने जा रहे हैं? खतरा बहुत बड़ा है, मुझे डर है कि उससे कहीं बड़ा जितना अधिकतर लोग समझते हैं। इंग्लैंड की कलीसिया को प्रोटेस्टेंट न रहने देने के लिए बहुत समय से एक षड्यन्त्र चल रहा है, और रोम की सारी शक्तियाँ इस छोटे द्वीप पर केन्द्रित हैं। हमारे पाँवों तले बहुत समय से सेंध लगाने और सुरंग खोदने का काम चल रहा है, जिसका कुछ अंश हम अन्त में देखने लगे हैं। हम आगे चलकर इससे बहुत अधिक देखेंगे। जिस गति से हम जा रहे हैं, यदि पचास वर्ष के भीतर इंग्लैंड का मुकुट किसी प्रोटेस्टेंट के सिर पर न रहे, और वेस्टमिंस्टर एबे तथा सेंट पॉल्स में फिर से उच्च मिस्सा मनाया जाने लगे, तो मुझे कभी आश्चर्य न होगा। सीधे शब्दों में खतरा न अधिक है न कम: हमारी कलीसिया का प्रोटेस्टेंट न रहना और बाबुल तथा मिस्र को लौट जाना। हम रोम के साथ फिर से मिल जाने के निकट संकट में हैं। लोग चाहें तो ऐसी भाषा के कारण मुझे घबराहट फैलानेवाला कह सकते हैं। परन्तु मैं उत्तर देता हूँ कि इसका कारण है। इस देश के ऊँचे वर्ग इन्द्रिय-सुखकारी, नाटकीय, औपचारिक धर्म की रुचि से बहुत फैलकर ग्रसित हैं। निचले वर्ग उस सारे कर्मकाण्ड से दुखद रूप से परिचित होते जा रहे हैं जो पोप-मत की सीढ़ी है। मध्य वर्ग इंग्लैंड की कलीसिया से घृणा करने लगे हैं और पूछ रहे हैं कि इसका लाभ क्या है। बुद्धिजीवी वर्ग यह पता लगा रहे हैं कि सब धर्म या तो समान रूप से अच्छे हैं या समान रूप से बुरे। जब तक जनमत दबाव न डाले, हाउस ऑफ़ कॉमन्स कुछ नहीं करेगा। वहाँ अब हमारे पास कोई पिम या हैम्पडन नहीं हैं। और इस सारे समय कर्मकाण्डवाद बढ़ता और फैलता जा रहा है। जहाज़ चट्टानों के बीच है, आगे चट्टानें और पीछे चट्टानें, दाएँ चट्टानें और बाएँ चट्टानें। यदि हमें जहाज़ के डूबने से बचना है तो कुछ किया जाना चाहिए। इंग्लैंड की कलीसिया का जीवन ही दाँव पर है, इससे कम कुछ नहीं। किसी कलीसिया से सुसमाचार छीन लो, तो वह कलीसिया बचाए रखने के योग्य नहीं। बिना पानी का कुआँ, बिना तलवार की म्यान, बिना आग का भाप-इंजन, बिना दिशासूचक और पतवार का जहाज़, बिना मुख्य कमानी की घड़ी, बिना प्राण का भूसा भरा शव, ये सब व्यर्थ वस्तुएँ हैं। परन्तु बिना सुसमाचार की कलीसिया जैसी कोई वस्तु इतनी व्यर्थ नहीं। और यही वह प्रश्न है जो हमारे सामने खड़ा है: क्या इंग्लैंड की कलीसिया सुसमाचार को बनाए रखेगी या नहीं? उसके बिना हम अपने महा-अध्यक्षों और अध्यक्षों की ओर व्यर्थ मुड़ेंगे, और अपने गिरजाघरों और पल्ली-कलीसियाओं पर व्यर्थ घमण्ड करेंगे। हमारी दीवारों पर शीघ्र ही "ईकाबोद" लिखा जाएगा। परमेश्वर का सन्दूक हमारे साथ न होगा। निश्चय ही कुछ किया जाना चाहिए। परन्तु एक बात मेरे मन में बहुत स्पष्ट है। हमें इंग्लैंड की कलीसिया को हल्के में नहीं छोड़ना चाहिए। नहीं! जब तक उसके अनुच्छेद और विधि-ग्रन्थ अपरिवर्तित, अनिरस्त और अनबदले रहें, तब तक हमें उसे नहीं छोड़ना चाहिए। वह नाविक कायर और नीच है जो जहाज़ को बचाने की सम्भावना रहते हुए नाव उतारकर जहाज़ छोड़ दे। मैं कहता हूँ, वह प्रोटेस्टेंट कलीसियावादी कायर है जो इसलिए अलग हो जाने की बात करता है कि हमारी कलीसिया के जहाज़ पर अभी चीज़ें अस्त-व्यस्त हैं। तो क्या हुआ यदि चालक-दल में से कुछ विश्वासघाती हैं और कुछ सो रहे हैं! तो क्या हुआ यदि पुराने जहाज़ में कुछ रिसाव है और कुछ स्थानों पर उसकी रस्सियाँ टूट गई हैं! फिर भी मैं मानता हूँ कि बहुत कुछ करने को है। इस पुराने जहाज़ में अभी प्राण है। महान मार्गदर्शक ने अभी उसे नहीं छोड़ा है। बाइबल का दिशासूचक अभी भी डेक पर है। जहाज़ पर अभी कुछ विश्वासयोग्य और सक्षम नाविक शेष हैं। जब तक अनुच्छेद और विधि-ग्रन्थ रोमी नहीं बनाए जाते, आओ हम जहाज़ के साथ डटे रहें। जब तक उसके पास मसीह और बाइबल है, आओ हम अन्तिम तख़्ते तक उसके साथ खड़े रहें, अपने झण्डे मस्तूल पर कीलों से ठोंक दें, और उन्हें कभी नीचे न उतारें। मैं फिर कहता हूँ, आओ हम चापलूसी, धमकी, डराने, फुसलाने या उकसाने से इंग्लैंड की कलीसिया को छोड़ने पर न आएँ। प्रभु के नाम से आओ हम अपने झण्डे खड़े करें। यदि हम कभी दूसरे लोक में रिडले, लैटिमर और हूपर से बिना लज्जा के मिलना चाहते हैं, तो आओ हम उन सत्यों के लिए "मन लगाकर संघर्ष" करें जिन्हें बचाए रखने के लिए उन्होंने प्राण दिए। इंग्लैंड की कलीसिया आशा करती है कि हर प्रोटेस्टेंट कलीसियावादी अपना कर्तव्य निभाएगा। आओ हम केवल बातें न करें, कर्म करें। आओ हम केवल कर्म न करें, प्रार्थना भी करें। "जिस के पास तलवार न हो वह अपने कपड़े बेचकर एक मोल ले।" शहीदों के लहू में एक वाणी है। वह वाणी क्या कहती है? वह ऑक्सफ़ोर्ड, स्मिथफ़ील्ड और ग्लूसेस्टर से ऊँचे स्वर में पुकारती है, "प्रभु-भोज में पवित्र की गई रोटी और दाखमधु के रूपों के अधीन वास्तविक उपस्थिति के पोप-मतीय सिद्धान्त का मृत्यु तक विरोध करो!"
टिप्पणी — "वास्तविक उपस्थिति" के सिद्धान्त के विषय में निम्नलिखित उद्धरण आज के सब कलीसिया-जनों के विशेष ध्यान के लिए प्रस्तावित हैं: — (1) "चूँकि प्रभु-भोज की सेवा-विधि में यह ठहराया गया है कि सहभागी जन उसे घुटने टेककर ग्रहण करें; (जिस नियम का अभिप्राय भला है, कि इससे मसीह के उन लाभों के लिए हमारी दीन और कृतज्ञ स्वीकृति प्रकट हो जो उसमें सब योग्य ग्रहण करनेवालों को दिए जाते हैं, और पवित्र सहभागिता में उस अपवित्रता और अव्यवस्था से बचाव हो जो अन्यथा हो सकती है;) तो भी, ऐसा न हो कि घुटने टेकने का यही कार्य कोई जन, चाहे अज्ञान और दुर्बलता के कारण, चाहे द्वेष और हठ के कारण, उसका अर्थ बिगाड़ें या उसे विकृत करें; इसलिए यहाँ घोषित किया जाता है कि उससे न तो कोई आराधना अभिप्रेत है, न की जानी चाहिए, न संस्कार की रोटी या दाखरस की, जो शारीरिक रीति से ग्रहण किए जाते हैं, और न मसीह के स्वाभाविक शरीर और लहू की किसी देहधारी उपस्थिति की। क्योंकि संस्कार की रोटी और दाखरस अब भी अपने स्वाभाविक तत्त्व में ही रहते हैं, और इसलिए उनकी आराधना नहीं की जा सकती; (क्योंकि वह मूर्तिपूजा होगी, जिससे सब विश्वासी मसीही घृणा करें;) और हमारे उद्धारकर्ता मसीह का स्वाभाविक शरीर और लहू स्वर्ग में है, यहाँ नहीं: क्योंकि मसीह के स्वाभाविक शरीर के यथार्थ स्वरूप के विरुद्ध है कि वह एक ही समय में एक से अधिक स्थानों पर हो।" — सामान्य प्रार्थना की पुस्तक में प्रभु-भोज की सेवा के अन्त का नियम-निर्देश। (2) "जहाँ तक इंग्लैंड की इस कलीसिया में प्रभु-भोज के विषय में प्रयुक्त सिद्धान्त के रूप का सम्बन्ध है, कि मसीह की देह और लहू रोटी और दाखरस के रूपों के अधीन हैं, जब आप वह स्थान दिखाएँगे जहाँ शब्दों का यह रूप कहा गया है, तब आप अपने आपको उस बात से मुक्त करेंगे जिसे मैं तब तक स्पष्ट असत्य मानता हूँ।" — "गार्डिनर को क्रैन्मर का उत्तर," पृ. 52, 53, पार्कर संस्करण। (3) "मसीह की परम धन्य देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति को संस्कार में नहीं, वरन् संस्कार के योग्य ग्रहण करनेवाले में ढूँढ़ना चाहिए" — "हूकर की Eccles. Pol.," ग्रन्थ 5, पृ. 67। (4) "इंग्लैंड की कलीसिया ने अपने अधिकार से प्रकाशित सब पुस्तकों में 'वास्तविक उपस्थिति' शब्द का प्रयोग करने से बुद्धिमानी से परहेज़ किया है। न हम इसे सेवा-विधि में अनुशंसित पाते हैं, न धर्मलेखों में, न उपदेश-संग्रहों में, न कलीसिया की प्रश्नोत्तरी में, न नॉवेल की प्रश्नोत्तरी में। क्योंकि यद्यपि वह एक बार सेवा-विधि में और एक बार 1552 के धर्मलेखों में आया है, तो भी दोनों स्थानों में वह पोप के अनुयायियों के वाक्यांश के रूप में उल्लिखित है, और उनके दुरुपयोग के कारण अस्वीकार किया गया है। इसलिए यदि इंग्लैंड की कलीसिया का कोई जन उसका प्रयोग करे, तो वह कलीसिया के निर्देश से अधिक करता है; और यदि कोई उसे अस्वीकार करे, तो उसके पास कलीसिया का उदाहरण उसके औचित्य के रूप में है।" — "डीन ऑल्ड्रिच का उत्तर," पृ. 13, 1684। देखिए "गुडिन ऑन यूकैरिस्ट," पृ. 38।
पाद-टिप्पणियाँ
1 ये संख्याएँ सोम्स ने धर्म-सुधार के अपने इतिहास (खण्ड 4, पृ. 587) में दी हैं, और स्ट्राइप से ली गई हैं। अन्य इतिहासकार इनसे बड़ी संख्याएँ देते हैं।
2 एक उच्च पद की स्त्री ने फिलपॉट की मृत्यु के बाद बॉनर को एक पत्र में बताया कि उसकी क्रूरता से बारह महीनों में 20,000 पोप के अनुयायियों के मन उसके हाथ से जाते रहे।
3 फॉक्स की "Acts and Monuments" के मुद्रक डे को सम्बोधित, बन्दीगृह में कहे गए रॉजर्स के भविष्यवाणी-भरे शब्द उद्धृत करने योग्य हैं: "तू इस धर्म का परिवर्तन देखने और सुसमाचार को फिर स्वतन्त्रता से प्रचार होते देखने के लिए जीवित रहेगा। इसलिए मेरी ओर से मेरे भाइयों को, चाहे वे निर्वासन में हों चाहे यहाँ, नमस्कार कहना, और उनसे कहना कि पोप के अनुयायियों को हटाने और कलीसियाओं में भले सेवक नियुक्त करने में सावधान रहें, नहीं तो उनका अन्त हमारे अन्त से बुरा होगा।" — फॉक्स, खण्ड 3, पृ. 309 (1684 का संस्करण)।
4 ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रैडफोर्ड का उन कारणों के विषय में, जिनके लिए परमेश्वर ने मरियम के समय का उत्पीड़न होने दिया, बहुत दृढ़ विचार था। बन्दीगृह से अपनी माता को लिखते हुए वह कहता है: "तुम सब जानते हो कि परमेश्वर का ज्ञान कभी इतना अधिक और भक्तिपूर्ण जीवन तथा परमेश्वर की सच्ची सेवा कभी इतनी कम नहीं थी। इसलिए परमेश्वर अब आया है, और क्योंकि वह हमें संसार के साथ दोषी नहीं ठहराएगा, इसलिए वह हमें ताड़ना देता है।" — फॉक्स, खण्ड 3, पृ. 255।
5 क्रैन्मर के बाएँ हाथ के विषय में इस कथन के लिए मेरा आधार सोम्स है। मुझे यह और कहीं नहीं मिलता। वह यह भी बताता है, जो अन्य इतिहासकार भी लिखते हैं, कि जब आग जलकर राख हो गई, तो क्रैन्मर का हृदय बिना जला और अक्षत पाया गया। — सोम्स का "धर्म-सुधार का इतिहास," खण्ड 4, पृ. 544।
6 जिनके पास फॉक्स की शहीदों की पुस्तक है, उन सबको निम्नलिखित शहादतों पर विशेष ध्यान देने की अनुशंसा की जाती है: लॉरेंस सॉन्डर्स, जो कॉवेंट्री में जलाया गया; विलियम हंटर, ब्रेंटवुड में; रॉलिन्स व्हाइट, कार्डिफ में; जॉर्ज मार्श, चेस्टर में; टॉमस हॉक्स, कॉग्गेशॉल में; जॉन ब्लैंड, कैंटरबरी में; ऐलिस ड्राइवर, इप्सविच में; रोज़ ऐलन, कोलचेस्टर में; जोन वेस्ट, डर्बी में; रिचर्ड वुडमैन, लुईस में;
ऐग्नेस प्रेस्ट, एक्सेटर में; जूलियस पामर, न्यूबरी में; जॉन नॉयस, सफ़ोक के लैक्सफील्ड में।
7 "मिस्सा उन मुख्य कारणों में से एक थी जिनसे कलीसिया में इतनी उथल-पुथल मची, और इतने भक्तों का लहू बहा।" — फॉक्स की "Acts and Monuments" के खण्ड 3 की भूमिका। "वेदी का संस्कार प्रोटेस्टेंट बेचारों को पहचानने की मुख्य कसौटी था। संस्कार में मसीह की वास्तविक, देहधारी उपस्थिति का यह बिन्दु, कि वही देह जो क्रूस पर चढ़ाई गई, विपरीत मत रखनेवालों को पहचानने का संक्षिप्त उपाय था।" — फुलर, "कलीसिया का इतिहास," खण्ड 3, पृ. 399। टेग का संस्करण।
जॉन रॉजर्स: शहीद
जॉन रॉजर्स, जो 1555 में स्मिथफील्ड में जलाया गया, एक ऐसा व्यक्ति है जो एक सरल कारण से सब अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंटों के विशेष आदर का अधिकारी है। वह उन उदात्त मसीही वीरों के दल में पहला था जिन्होंने रानी मरियम के शासन में परमेश्वर के सत्य के लिए शहादत पाई। खम्भे पर अपने साहस और दृढ़ता से उसने अपने बाद आनेवाले सबके लिए एक महिमामय उदाहरण प्रस्तुत किया, और अंग्रेज़ धर्म-सुधार को बहुत आगे बढ़ाया। इस भले मनुष्य का कुछ वृत्तान्त किसी भी निष्ठावान कलीसिया-जन के लिए रुचिकर हुए बिना नहीं रह सकता। अंग्रेज़ शहीदों की उस महान सेना में वह विशेष रूप से ध्वजवाहक था।
रोजर्स का जन्म लगभग सन् 1500 ई. में डेरिटेन्ड में हुआ था, जो एस्टन के धर्मक्षेत्र का एक छोटा गाँव था और अब वर्तमान बर्मिंघम नगर-क्षेत्र के भीतर आता है। उसके पिता के कुल, पद या स्थिति के विषय में बहुत कम या कुछ भी ज्ञात नहीं है; और स्वयं उसके आरम्भिक इतिहास तथा उसके जीवन के पहले तीस वर्षों के विषय में भी उतना ही कम। केवल इतना निश्चित है कि उसने पेम्ब्रोक हॉल, कैम्ब्रिज में शिक्षा पाई और सन् 1525 में बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। हमें स्मरण रखना चाहिए कि पेम्ब्रोक हॉल वही महाविद्यालय था जिसके सदस्य रिडले और ब्रैडफोर्ड दोनों थे, और सब मानवीय सम्भावना के अनुसार रोजर्स इन भले पुरुषों का समकालीन और परिचित रहा होगा। यह परिस्थिति, और लैटिमर का वह प्रचार जिसने उसी समय के आसपास कैम्ब्रिज में हलचल मचाना आरम्भ किया, आगे चलकर रोजर्स के मन पर काफी प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकता था।
ऐसा प्रतीत होता है कि पेम्ब्रोक हॉल में रोजर्स ने कड़ा परिश्रम किया और अच्छी सफलता पाई। फॉक्स अपने इतिहास के एक संस्करण में केवल इतना कहता है कि उसने "उत्तम विद्या में लाभदायक परिश्रम किया"; और दूसरे में, कि वह बहुत समय तक कैम्ब्रिज में रहा, "विद्या की प्रतिष्ठित खोज में ध्यानपूर्वक और लगन से लगा हुआ।" फिर भी यह स्पष्ट है कि उसने उस युग के मानदण्ड के अनुसार एक अच्छे विद्वान और ज्ञानी पुरुष के रूप में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर ली थी। इसका भरपूर प्रमाण वह कार्य है जो उसने आगे चलकर पवित्रशास्त्र के अनुवाद में किया, और वे पद हैं जो अध्यक्ष रिडले ने उसे दिए, जो मनुष्यों को परखने में कोई साधारण न्यायी नहीं था। फिर भी एक विद्वान के रूप में उसके चरित्र का सबसे उत्तम प्रमाण यह था कि जब कार्डिनल वॉल्जी ने उस श्रेष्ठ संस्था की स्थापना आरम्भ की, तब उसे कार्डिनल्स कॉलेज का, जो क्राइस्ट्स चर्च, ऑक्सफ़ोर्ड के नाम से अधिक जाना जाता है, कनिष्ठ कैनन चुना गया। वॉल्जी स्वाभाविक रूप से अपने नए महाविद्यालय को दोनों विश्वविद्यालयों में से उन सर्वोत्तम पुरुषों से भरना चाहता था जिन्हें वह उसमें सम्मिलित होने के लिए मना सके, और उसने होनहार पुरुषों को सदस्य बनने के लिए हर प्रकार का प्रलोभन दिया। केवल यही तथ्य कि उसने अपने पहले कैननों में रोजर्स को चुना, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पेम्ब्रोक हॉल के उस युवा बी.ए. की ख्याति एक परिपक्व विद्वान की थी।
जॉन रोजर्स के जीवन के अगले बाईस वर्ष उसके इतिहास का वह काल है जो बहुत अन्धकार में पड़ा है, मुख्यतः इसलिए कि उसका अधिकांश समय यूरोप महाद्वीप पर बीता। जो मनुष्य परदेशियों के बीच रहता है, उसके कामों और बातों का वर्णन कभी उतना यथार्थ नहीं हो सकता जितना उस मनुष्य का जो अपने देशवासियों और मित्रों की आँखों के सामने रहता है। एक उलझे हुए सूत में से जो बातें निकलती हैं, सम्भवतः उसके कार्यों का यथार्थ विवरण निम्नलिखित तथ्य हैं।
कार्डिनल्स कॉलेज, ऑक्सफ़ोर्ड में जो कैननरी उसे मिली थी, उसकी नियुक्ति के शीघ्र बाद रोजर्स का अभिषेक हुआ, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सन् 1532 तक उसने आत्माओं की देखभाल का कोई पद नहीं सँभाला। तब उसे लन्दन नगर में ट्रिनिटी द लेस की वृत्ति दी गई, जो बड़ी आग के बाद सेंट माइकल्स, क्वीनहिथ के साथ जोड़ दी गई एक धर्मक्षेत्र थी, और उसने दो वर्ष तक उसे सँभाला, फिर सन् 1534 में त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वह थोड़े समय के लिए एंटवर्प में रहनेवाले अंग्रेज़ निवासियों की मण्डली का पुरोहित बना, और लगभग तेरह वर्ष इंग्लैंड से दूर रहा। उसके जीवन के इसी काल में वह प्रसिद्ध विलियम टिंडेल से घनिष्ठ रूप से परिचित हुआ, उसने प्रोटेस्टेंट मत के सिद्धान्त अपना लिए, और पवित्र शास्त्र के अनुवाद के महान कार्य में उसका सहकर्मी बन गया। सन् 1537 में, टिंडेल की शहादत के कुछ ही समय बाद, रोजर्स ने एंटवर्प की एक स्त्री से विवाह किया, जिसका नाम एड्रियाना डी वेयडन था, और शीघ्र ही सैक्सनी के विटेनबर्ग में जा बसा, जहाँ उसने कम से कम दस वर्ष तक एक जर्मन मण्डली की सेवकाई की। बहुत सम्भव है कि यह स्थानान्तरण सताव से बचने के लिए नितान्त आवश्यक था, और यदि रोजर्स बेल्जियम में रहता तो उसका प्राण सुरक्षित न होता। केवल यही बात कि वह टिंडेल जैसे पुरुष का मित्र था, और याजक होते हुए भी उसने विवाह कर लिया था, उसे एक चिह्नित पुरुष बना देने के लिए पर्याप्त थी। फिर भी इतना कह देना उचित है कि ये केवल अनुमान हैं। सब मानवीय सम्भावना के अनुसार विटेनबर्ग के ये शान्त दस वर्ष रोजर्स की आत्मा के लिए अत्यन्त लाभदायक काल थे। वह धर्म-सुधार के सिद्धान्तों में स्थिर हुआ, उसने अपने ही हृदय को पहचाना, विश्वास, ज्ञान और पवित्रता में बढ़ा, और उस भारी कार्य के योग्य बना जो उसे आगे करना था, और उस अग्निमय मृत्यु के योग्य जो उसे सहनी थी।
अंग्रेज़ी बाइबल के उस अनुवाद से, जो सामान्यतः "मैथ्यूज़ बाइबल" के नाम से जाना जाता है, रोजर्स का ठीक-ठीक कितना सम्बन्ध था, यह एक ऐसा विषय है जो शायद कभी पूरी तरह स्पष्ट न हो सकेगा। यह मानने का पर्याप्त कारण है कि अनुवाद से उसका सम्बन्ध उससे कहीं अधिक था जितना अधिकांश लोग जानते हैं, और वह टिंडेल तथा कवरडेल के साथ उसके रचनाकारों में गिने जाने के योग्य है। यह निश्चित है कि हाशिये की टिप्पणियों और "सामान्य स्थलों" की उन तालिकाओं का उत्तरदायी वही है जो उस अनुवाद के साथ दी गई थीं। यह भी उतना ही निश्चित है कि जब रोजर्स को जलाए जाने का दण्ड सुनाया गया, तब उसे "रोजर्स, उर्फ़ मैथ्यूज़" कहा गया; और हेनरी आठवें के समय में अधिकार से प्रकाशित उस प्रसिद्ध बाइबल के मुखपृष्ठ पर ये शब्द हैं, "पुराना और नया नियम, थॉमस मैथ्यूज़ द्वारा अंग्रेज़ी में सच्चाई और स्वतन्त्रता से अनूदित।" क्या रोजर्स को दोषी ठहराने वाले न्यायाधीश ने अपने दण्ड को उचित ठहराने के लिए अनुवाद-कार्य में उसके भाग को बढ़ा-चढ़ाकर बताया, यह कहना स्वाभाविक रूप से असम्भव है। परन्तु कुल मिलाकर यही अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि रोजर्स को हमारी अंग्रेज़ी बाइबल के अनुवाद के महान कार्य के सबसे पहले परिश्रमियों में से एक माना जा सकता है। मेरे अपने विचार में सारी बात का सार यह है: टिंडेल को वह श्रेय मिला है जिसका वह उचित रूप से अधिकारी है, कवरडेल को उसके योग्य से कुछ अधिक, और रोजर्स को बहुत कम।
सन् 1547 में एडवर्ड छठा इंग्लैंड की गद्दी पर बैठा, और कुछ ही समय बाद रोजर्स अपने देश लौट आया। जैसा उचित रूप से अपेक्षित था, उसे शीघ्र ही आगे लाया गया और एक प्रमुख पद पर बैठाया गया। उसके जैसे वरदानों और गुणों का पुरुष ठीक वही पुरुष था जिसे अंग्रेज़ धर्म-सुधार के अगुवे अपनी सेवा में लगाने को अत्यन्त आतुर थे। में
1550 में वह लंदन नगर के दो पल्लियों — सेंट मार्गरेट मोयसेस और सेंट सेपल्कर — का विकर बना। 1551 में उसे सेंट पॉल के महागिरजे में सेंट पैनक्रास के प्रीबेंडल आसन पर, और एस्सेक्स के चिग्वेल के रेक्टर पद पर भी नियुक्त किया गया। 1553 में वह सेंट पॉल का धर्मविज्ञान-व्याख्याता बनाया गया। बिशप रिडले के प्रति न्याय की बात यह है कि रोजर्स ने स्वयं स्वीकार किया है कि इन पदों के लिए वह उनका बहुत ऋणी था, और लंदन के भले बिशप ने भी अपने पुराने सहपाठी को भुलाया नहीं प्रतीत होता। वास्तव में उन्होंने सर डब्ल्यू. सेसिल को लिखे एक पत्र में ग्रिंडाल, ब्रैडफ़ोर्ड और रोजर्स के विषय में कहा है कि वे "राष्ट्र-हित में बाहर रहने के लिए ऐसे आवश्यक पुरुष हैं कि मैं उनमें से किसी को भी अपने घर में नहीं रख सकता।" इस भाषा से भली-भाँति स्पष्ट होता है कि रोजर्स उनके पादरी-सहायकों में से एक था।
1553 में एडवर्ड षष्ठ की मृत्यु और रानी मरियम के सिंहासनारूढ़ होने से रोजर्स की सक्रिय उपयोगिता समाप्त हो गई; और 1553 का वर्ष बीतने से पहले ही वह बन्दी बना लिया गया — पहले अपने ही घर में, और फिर न्यूगेट में, जहाँ उसे अन्ततः जनवरी 1554 में रखा गया। कारागार में उसकी दशा के विषय में हम बहुत कम जानते हैं, केवल यह कि उसकी पत्नी को उससे मिलने नहीं दिया गया, और उसके साथ व्यवहार बहुत कठोर प्रतीत होता है। जनवरी 1555 में बिशप गार्डिनर की अध्यक्षता में बैठे आयोग के सामने उसे हूपर और कार्डमेकर के साथ हठी विधर्मी के रूप में प्रस्तुत किया गया — एक ओर इसलिए कि उसने प्रभु-भोज में मसीह की वास्तविक उपस्थिति के सिद्धान्त का इनकार किया, और दूसरी ओर इसलिए कि याजक होते हुए भी उसने विवाह कर लिया था।
कारागार में उसके आचरण के विषय में, और उस दिन के विषय में जब वह जलाया गया, जॉन फॉक्स के विवरण से उत्तम वर्णन नहीं दिया जा सकता। इसलिए मैं उसे शहीद-चरित्र-लेखक के अपने ही शब्दों में दूँगा: —
"उसके विषय में कही गई जो बातें भविष्यद्वाणी के समान प्रतीत हो सकती हैं, उनमें यह भी जोड़ी जा सकती है, और यह भली-भाँति ध्यान देने योग्य है, कि कारागार में रहते हुए उसने इस वर्तमान पुस्तक के मुद्रक जॉन डे से, जो उन दिनों धर्म के कारण वैसे ही बन्दी था, कहा: 'तू इस धर्म का परिवर्तन देखने के लिए जीवित रहेगा, और सुसमाचार फिर स्वतन्त्रता से प्रचारित किया जाएगा; इसलिए मेरा प्रणाम मेरे भाइयों को, जो निर्वासन में हैं और जो अन्यत्र हैं, पहुँचा देना, और उनसे कहना कि पोप के अनुयायियों को पदच्युत करने और कलीसियाओं में भले सेवकों को बैठाने में सावधान रहें, नहीं तो उनका अन्त हमारे अन्त से भी बुरा होगा।' और कलीसियाओं के लिए भले सेवक न मिलने की स्थिति में उसकी युक्ति यह थी (और मास्टर हूपर भी इससे सहमत थे) कि प्रत्येक दस कलीसियाओं के लिए एक भला और विद्वान अधीक्षक ठहराया जाए, जिसके अधीन ऐसे विश्वासयोग्य पाठक हों जैसे भली-भाँति मिल सकें; ताकि पोप के याजक पूरी तरह निकाल दिए जाएँ, और अध्यक्ष वर्ष में एक बार पल्लियों की उन्नति का निरीक्षण करे। और यदि सेवक अपना कर्तव्य न निभाए — अर्थात् स्वयं अपने अध्ययन में उन्नति न करे, और अपने पल्लीवासियों को अच्छी शिक्षा न दे, जिससे वे धीरे-धीरे यह हिसाब देने के योग्य बन सकें कि वे कैसे उन्नति कर रहे हैं — तो उसे निकाल दिया जाए और उसके स्थान पर दूसरा रखा जाए, और अध्यक्ष अधीक्षक के साथ भी ऐसा ही करे। यही उसकी सम्मति और विनती थी; और उसने पूर्वोक्त मुद्रक के द्वारा अपने भाइयों को अपना प्रणाम भेजते हुए यह भी बताया और दृढ़ता से कहा कि यदि वे ऐसा न करेंगे तो उनका अन्त, उसने कहा, उनके अन्त से भी बुरा होगा।
"मास्टर रोजर्स के विषय में अनेक बातों के अतिरिक्त यह भी भूलने योग्य नहीं है कि राजा एडवर्ड षष्ठ के दिनों में याजकों की टोपियाँ पहनने और उस पद से सम्बन्धित अन्य पहनावे को लेकर बिशपों और पादरी-वर्ग में विवाद उठा था। मास्टर रोजर्स, जो उन लोगों में से था जो राजा एडवर्ड के पूरे समय में गोल टोपी के सिवा कुछ नहीं पहनते थे, ने कहा कि वह एकरूपता के उस आदेश से सहमत नहीं होगा, परन्तु इस शर्त पर कि यदि वे टोपी, गुलूबन्द आदि की ऐसी ही एकरूपता चाहते हैं, तो साथ ही यह भी ठहराया जाए कि पोप के अनुयायियों को, अपने और दूसरों के बीच भेद के लिए, अपनी आस्तीनों पर बलि की रोटी सहित एक कटोरा पहनने को विवश किया जाए। यदि वे इस पर सहमत होते, तो वह दूसरे पर सहमत हो जाता; नहीं तो, उसने कहा, वह न तो उसके प्रकाशित किए जाने पर सहमति देगा, न वह टोपी पहनेगा; और सचमुच उसने कभी नहीं पहनी।
"अपने कष्ट सहने से पहले के रविवार को उसने मास्टर हूपर के स्वास्थ्य के लिए जाम पिया, जो उस समय उसके नीचे की कोठरी में थे, और उनसे कहलवाया कि उनको मेरा प्रणाम कहना और बताना, 'कोई छोटा आदमी किसी मनुष्य का इतना अच्छा साथ कभी नहीं निभा सका जितना मैं उनका साथ निभाऊँगा;' यह मानते हुए कि वे दोनों साथ ही जलाए जाएँगे, यद्यपि हुआ दूसरी तरह, क्योंकि मास्टर रोजर्स अकेले ही जलाया गया।
"जब वह समय आया कि उसे शेरिफों के हाथ सौंपा जाए और न्यूगेट से निकालकर उसके वध-स्थान स्मिथफील्ड ले जाया जाए, तब पहले उपर्युक्त शेरिफों में से एक, मास्टर वुडरूफ़, उसके पास आया और मास्टर रॉजर्स को अपने पास बुलाकर पूछा कि क्या वह अपने घृणित सिद्धान्त और वेदी के संस्कार के विषय में अपने बुरे मत को त्यागेगा। मास्टर रॉजर्स ने उत्तर दिया, 'जो कुछ मैंने प्रचार किया है, उस पर मैं अपने लहू की मुहर लगाऊँगा।' तब मास्टर वुडरूफ़ ने कहा, 'तू विधर्मी है।' रॉजर्स ने कहा, 'यह न्याय के दिन पता चलेगा।' मास्टर वुडरूफ़ बोला, 'अच्छा, मैं तेरे लिए कभी प्रार्थना नहीं करूँगा।' 'पर मैं आपके लिए प्रार्थना करूँगा!' मास्टर रॉजर्स ने कहा; और इस प्रकार उसी दिन, जो सोमवार, 4 फरवरी था, शेरिफ उसे स्मिथफील्ड की ओर ले चले, और वह मार्ग में 'मिज़ेरेरे' भजन गाता रहा; सब लोग उसकी दृढ़ता से अद्भुत रीति से आनन्दित थे और उसके लिए परमेश्वर की बड़ी स्तुति और धन्यवाद कर रहे थे। और वहाँ रानी के घराने के नियन्त्रक मास्टर रोचेस्टर, सर रिचर्ड साउथवेल, दोनों शेरिफों और लोगों की अद्भुत भीड़ की उपस्थिति में उसमें आग लगाई गई; और जब आग उसकी टाँगों और कन्धों पर पकड़ चुकी, तब उसने मानो कोई पीड़ा न अनुभव करते हुए, अपने हाथ लपटों में ऐसे धोए जैसे ठण्डे पानी में धो रहा हो। फिर अपने हाथ स्वर्ग की ओर उठाकर, जब तक भस्म करनेवाली आग ने उन्हें जला न दिया, उन्हें नहीं हटाया; और इस धन्य शहीद ने बड़ी शान्ति से अपनी आत्मा अपने स्वर्गीय पिता के हाथों में सौंप दी। उसे खम्भे पर जलाए जाने से कुछ पहले उसकी क्षमा का आदेश लाया गया, यदि वह अपने मत से मुकर जाता; पर उसने बिलकुल इनकार कर दिया। रानी मरियम के समय में दुःख उठानेवाली उस धन्य मण्डली में वह पहला शहीद था, जिसने सबसे पहले आग का जोखिम उठाया। उसकी पत्नी और बच्चे, जो गिनती में ग्यारह थे—दस चलने योग्य और एक उसकी छाती से दूध पीता हुआ—स्मिथफील्ड की ओर जाते समय मार्ग में उससे मिले। अपने ही मांस और लहू का यह दुःखद दृश्य उसे ज़रा भी न डिगा सका; बल्कि उसने मसीह के सुसमाचार की रक्षा और उसके पक्ष में अद्भुत धीरज के साथ दृढ़ता और आनन्द से मृत्यु को स्वीकार किया।"
यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि जॉन रॉजर्स रानी मरियम के शासनकाल में जलाया जानेवाला पहला व्यक्ति था, और उसके खम्भे पर मरने से पहले इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया के किसी प्रोटेस्टेंट का अपने मत से मुकरने के बदले मृत्यु सहने का कोई उदाहरण नहीं था। यह रॉजर्स का सदा का श्रेय है कि वह पहला व्यक्ति था जिसने बर्फ़ तोड़ी, और इस बात का प्रमाण दिया कि परमेश्वर का अनुग्रह विश्वासी को आग में भी सम्भालने के लिए पर्याप्त है। जिस दिन वह जलाया गया, उसी दिन फ्रांस के राजदूत नोआइय ने मोंटमोरेंसी को ये शब्द लिखे: "आज पोप और इस राज्य के बीच की सन्धि की पुष्टि एक प्रचार करनेवाले डॉक्टर, रॉजर्स नामक व्यक्ति की सार्वजनिक और गम्भीर बलि के द्वारा की गई, जो लूथरवादी होने के कारण जीवित जलाया गया; पर वह अपने मत पर डटे रहकर मरा। इस आचरण से लोगों के अधिकांश भाग को ऐसा आनन्द हुआ कि वे उसका साहस बढ़ाने के लिए उसे अनेक जयकार करने से भी नहीं डरे। उसके बच्चे भी वहाँ उपस्थित थे, और उन्होंने उसे इस प्रकार शान्ति दी मानो उसे विवाह में ले जाया जा रहा हो।"
रोलैंड टेलर के समान रॉजर्स भी अपने पीछे कोई साहित्यिक रचना नहीं छोड़ गया, जब तक कि हम प्रसिद्ध "मैथ्यूज़ बाइबल" में उसके योगदान को न मानें। परन्तु वह अपने पीछे ऐसा नाम छोड़ गया जिसका आदर सभी प्रोटेस्टेंट कलीसिया-जनों को जब तक संसार रहेगा करना चाहिए।
जॉन हूपर: अध्यक्ष और
शहीद
धार्मिक विवाद के दिनों में अपनी पीढ़ी के लिए सबसे उपयोगी वही मनुष्य होता है जो थोड़ा-सा "प्रकाश" देता है। कलीसियाई युद्ध के कोलाहल और झगड़े के बीच, उत्तेजित वाद-विवादियों द्वारा उठाए गए कोहरे और धूल के बीच, दावों और प्रतिदावों के बीच, विचारशील मनुष्य अक्सर मरते हुए दार्शनिक के साथ पुकार उठता है—"मुझे और प्रकाश चाहिए: मुझे और प्रकाश दो।" जो मनुष्य वहाँ अनाज की दो बालें उगा सके जहाँ पहले केवल एक उगती थी, उसे ठीक ही मानव-जाति का उपकारी कहा गया है। जो मनुष्य आज के धर्मशास्त्रीय प्रश्नों पर नए प्रकाश की कुछ किरणें डाल सके, वह निश्चय ही कलीसिया और संसार की सेवा कर रहा है।
इस जीवनी-लेख का विषय चुनते समय मेरे मन में ऐसे ही विचार आए: "जॉन हूपर, ग्लॉस्टर के शहीद अध्यक्ष: उसका समय, जीवन, मृत्यु और मत।" मैंने इसे एक उद्देश्य से चुना। मैं बहुत समय से अनुभव करता आया हूँ कि इंग्लैंड के धर्म-सुधारकों के जीवन और मत आज के दिनों में ध्यानपूर्वक अध्ययन के योग्य हैं। मेरा विचार है कि जॉन हूपर का चित्र हमारे समय के गहरी रुचि के विषयों पर उपयोगी प्रकाश डालेगा।
हम ऐसे दिनों में जी रहे हैं जब रोमन कलीसिया इंग्लैंड में अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः पाने के लिए विशाल प्रयत्न कर रही है, और हज़ारों अंग्रेज़ उसकी सहायता कर रहे हैं। इंग्लैंड के कलीसिया-जनों की उस अनोखी मण्डली, अर्थात् अतिवादी कर्मकाण्डवादियों के समान कोई भी रोम का काम इतनी पूर्णता से नहीं कर रहा। जानते हुए या अनजाने, वे उसके आगे बढ़ने का मार्ग बना रहे हैं और उसकी रेलगाड़ियों के लिए पटरियाँ बिछा रहे हैं। वे हज़ारों के मन को रोमन रीति-रिवाज से परिचित करा रहे हैं—उसकी वेश-भूषा, उसके जुलूस, उसकी भाव-भंगिमाएँ, उसकी मुद्राएँ, उसकी नाटकीय, इन्द्रिय-सुखद आराधना-शैली। वे खुलेआम शुद्ध रोमन सिद्धान्त का प्रचार और प्रकाशन कर रहे हैं—वास्तविक उपस्थिति, सेवकाई का याजकीय स्वरूप, कान में पाप-स्वीकार की अनिवार्यता और याजकीय क्षमादान। वे ऊँचे स्वर में रोम की कलीसिया के साथ पुनर्मिलन की अपनी इच्छा घोषित कर रहे हैं। संक्षेप में, ऐसा प्रतीत होता है मानो धर्म-सुधार की लड़ाई को फिर से लड़ना पड़ेगा। अतः रोम की ओर लौटने से पहले हम भली-भाँति समझ लें कि अंग्रेज़ी रोमन मत क्या था। आइए, हम प्रकाश में लाएँ। हम "अँधेरे में छलाँग" न लगाएँ।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब बहुत से कलीसिया-जन हमारे धर्म-सुधार का खुलेआम उपहास करते हैं और हमारे धर्म-सुधारकों की हँसी उड़ाते हैं। जिन शहीदों का लहू हमारी कलीसिया का बीज था, उन्हें गालियाँ दी जाती हैं, उनकी निन्दा की जाती है, और यह घोषित किया जाता है कि वे शहीद थे ही नहीं। क्रैनमर को "कायर विश्वासघाती" कहा जाता है, और लैटिमर को "गँवार, अनपढ़ धौंसबाज़!" धर्म-सुधार को "एक पूर्ण विपत्ति" बताया जाता है और कहा जाता है कि वह "व्यभिचारियों, हत्यारों और चोरों के एक षड्यंत्र द्वारा हाथ में लिया गया परिवर्तन" था! (देखिए चर्च टाइम्स, 14 मार्च, 1867।) आइए, आज हम अपने एक प्रमुख धर्म-सुधारक का अध्ययन करें और देखें कि वह मनुष्य कैसा था। आइए, हम एक ऐसे व्यक्ति की समीक्षा करें जो क्रैनमर, रिडले और लैटिमर का मित्र और समकालीन था, और धर्म-सुधार के कार्य में एक प्रमुख सहकर्मी था। आइए, हम जानें कि वह कैसे जीया, उसने कैसे प्रचार किया, वह क्या सोचता था, और वह कैसे मरा। मैं फिर कहता हूँ, आइए, हम प्रकाश ले आएँ।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब इंग्लैंड की कलीसिया के सच्चे स्वरूप के विषय में अत्यन्त विचित्र भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। देश भर में बहुत से लोग प्रोटेस्टेंट नाम की ही निन्दा करने में नहीं लजाते, और लोगों से कहते हैं कि "इंजीली" कलीसिया-जन तो कलीसिया-जन हैं ही नहीं! वे तो, कहते हैं, कैल्विनवादी, प्यूरिटन, असहमतिवादी, मैथोडिस्ट, उन्मादी और ऐसे ही कुछ हैं, और उन्हें इंग्लैंड की कलीसिया छोड़कर अपनी जगह चले जाना चाहिए! आइए, इन दावों को कुछ सीधे-सादे तथ्यों की कसौटी पर परखें।
आइए, हम उन्हीं धर्मविज्ञानियों में से एक के लिखित मत और विचारों की जाँच करें, जिनके कारण हमें, बहुत थोड़े परिवर्तनों के साथ, हमारे उनतालीस धर्म-सूत्र और प्रार्थना-पुस्तक मिली है। आइए, हम सुनें कि अध्यक्ष हूपर ने क्या लिखा, क्या सोचा और क्या सिखाया। आइए, हम जल्दबाज़ी में यह न मान लें कि रिचुअलिस्ट और उच्च-कलीसियावादी ही इंग्लैंड की कलीसिया के सच्चे प्रतिनिधि हैं। "जो पहले अपना मुक़द्दमा बताता है वह धर्मी जान पड़ता है, परन्तु जब दूसरा पक्ष आकर उसे परखता है तब ही उसकी सच्चाई प्रकट होती है।" (नीतिवचन 18:17।) मैं फिर कहता हूँ, आइए, हम प्रकाश डालें।
I. मैं अध्यक्ष हूपर के समय का कुछ वर्णन देकर आरम्भ करूँगा। - धार्मिक दृष्टि से वे कैसे समय थे? फ़ॉक्स, स्ट्राइप, बर्नेट, सोम्स और ब्लंट के पृष्ठों में से मैं कुछ ऐतिहासिक संकलन प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा।
जॉन हूपर का जन्म 1495 में हुआ और मृत्यु 1555 में। उसने पहली बार प्रकाश हेनरी सप्तम के राज्य में देखा, और उसे रानी मरियम के राज्य में जलाया गया। वह हेनरी अष्टम और एडवर्ड षष्ठ के पूरे राज्यकाल में जीवित रहा, और उन दोनों राजाओं के शासन में जो कुछ हुआ उसका प्रत्यक्षदर्शी रहा। उसके जीवन के साठ वर्ष अंग्रेज़ी इतिहास के सबसे घटनापूर्ण कालों में से एक को समेटते हैं। 1495 के इंग्लैंड और 1555 के उसी इंग्लैंड के बीच जो अन्तर था, उसे बढ़ा-चढ़ाकर कहना असम्भव है। धार्मिक और नैतिक दृष्टि से सारा देश उलट-पुलट हो गया था। जब हूपर का जन्म हुआ, तब अंग्रेज़ी धर्म-सुधार आरम्भ नहीं हुआ था, और रोम की कलीसिया इंग्लैंड पर निर्बाध शासन करती थी। जब उसकी मृत्यु हुई, तब धर्म-सुधार इतनी गहरी जड़ पकड़ चुका था कि न तो तर्क और न ही अत्याचार उसे उखाड़ सकता था।
धर्म-सुधार से पहले अंग्रेज़ी धर्म की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? जिस भारी परिवर्तन को हूपर ने देखा और जिसे आगे बढ़ाने में उसने योगदान दिया, उसने हमारे पूर्वजों को किस दशा में पाया? एक शब्द में, पोप-मत के उस उन्मूलन और प्रोटेस्टेंट मत के उस प्रवेश के लिए, जिसमें हूपर एक प्रमुख साधन था, इंग्लैंड उसका कितना ऋणी है? मैं इन प्रश्नों का एक संक्षिप्त उत्तर देने का प्रयास करूँ। ये ऐसे विषय हैं, जिनके बारे में खेद है कि अधिकतर लोग कुछ भी नहीं जानते। मेरे देशवासियों की विशाल बहुसंख्या के मन तीन सौ वर्ष पहले के इतिहास के विषय में बिलकुल कोरे प्रतीत होते हैं। शिक्षा को लेकर इतनी हलचल के बावजूद, अपने ही देश के इतिहास की यह अज्ञानता शोचनीय, भयावह और निराशाजनक है। मैं यह कभी नहीं मान सकता कि अतिवादी रिचुअलिज़्म को इतने अनुयायी मिलते, यदि अंग्रेज़ लोग केवल यह जानते कि प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के प्रति हम कितने ऋणी हैं। वे पोप-मत के साथ खिलवाड़, छेड़छाड़ और हाथ-आज़माई कभी न करते, यदि वे केवल यह जानते कि पोप-मत क्या है।
(क) धर्म-सुधार से पहले अंग्रेज़ी धर्म की एक प्रमुख विशेषता घोर अज्ञानता थी। सब वर्गों में सच्ची मसीही शिक्षा के ज्ञान का स्पष्ट अभाव था। देश पर घना अंधकार छाया हुआ था, ऐसा अंधकार जिसे टटोला जा सकता था। सौ में से एक भी व्यक्ति मसीह के सुसमाचार के विषय में उतना नहीं बता सकता था जितना हम आज किसी समझदार रविवारीय पाठशाला के बच्चे से सीख सकते हैं।
इस अज्ञानता पर हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लोगों के पास न पाठशालाएँ थीं, न बाइबल। विक्लिफ़ का नया नियम, जो हेनरी अष्टम की बाइबल के छपने तक एकमात्र उपलब्ध अनुवाद था, हमारे आज के धन के हिसाब से £2 16s. 3d. का पड़ता था। कलीसिया की प्रार्थनाएँ लैटिन में थीं, और स्वाभाविक है कि लोग उन्हें समझ नहीं सकते थे। प्रचार तो लगभग था ही नहीं। पादरी-वर्ग के लिए त्रैमासिक उपदेश निर्धारित तो थे, पर उन पर ज़ोर नहीं दिया जाता था। लैटिमर कहता है कि जहाँ मिस्सा एक रविवार के लिए भी छोड़ी नहीं जाती थी, वहाँ उपदेश बीस रविवार तक छोड़े जा सकते थे, और किसी को दोष नहीं दिया जाता था। फिर भी, जब उपदेश होते थे, तो वे सर्वथा निष्फल होते थे; और अन्त के दिनों में तो प्रचारक होना विधर्मी होने का सन्देह उठाना था।
सब से बढ़कर, जब 1551 में हूपर को पहली बार अध्यक्ष नियुक्त किया गया, तब ग्लॉस्टर के धर्मप्रान्त से उसे जो विवरण मिला, वह धर्म-सुधार से पहले के समय की अज्ञानता का काफ़ी स्पष्ट चित्र देता है। उसके धर्मप्रान्त के 311 पादरियों में से 168 दस आज्ञाएँ दोहरा नहीं सकते थे; उन 168 में से 31 यह नहीं बता सकते थे कि वे पवित्रशास्त्र के किस भाग में पाई जाती हैं; 40 यह नहीं बता सके कि प्रभु की प्रार्थना कहाँ लिखी है; और उन 40 में से 31 यह भी नहीं जानते थे कि प्रभु की प्रार्थना का रचयिता कौन है!
यदि यह अज्ञानता नहीं है, तो मैं नहीं जानता कि अज्ञानता क्या है। यदि पासबान ऐसे थे, तो लोग कैसे रहे होंगे! यदि पादरियों में ज्ञान का यह स्तर था, तो लोगों में वह कैसा रहा होगा!
(ख) परन्तु बात यहीं समाप्त नहीं होती। धर्म-सुधार से पहले अंग्रेज़ी धर्म की एक और प्रमुख विशेषता निम्नतम और अत्यन्त पतित कोटि का अन्धविश्वास थी। मेरा अनुमान है कि बहुत कम लोगों को इस बात का ज़रा भी अनुमान है कि यह किस सीमा तक पहुँचा हुआ था।
उन दिनों स्त्री-पुरुषों का विवेक कभी-कभी उन्हें बेचैन कर देता था, और वे राहत चाहते थे। उन्हें भी हमारी ही तरह दुःख, रोग और मृत्यु में से होकर जाना पड़ता था। वे क्या करते? वे किधर मुड़ते? उन्हें परमेश्वर के प्रेम और मसीह की मध्यस्थता के बारे में, मुफ़्त, भरपूर और सम्पूर्ण उद्धार के आनन्द के समाचार के बारे में, विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के बारे में, अनुग्रह, विश्वास, आशा और मन फिराव के बारे में बतानेवाला कोई न था। वे केवल याजकों की ओर मुड़ सकते थे, जो स्वयं कुछ नहीं जानते थे और दूसरों को कुछ नहीं बता सकते थे। "अन्धा अन्धे को मार्ग दिखाए तो दोनों गड़हे में गिरेंगे।" एक शब्द में, हूपर के समय से पहले हमारे पूर्वजों का धर्म एक संगठित व्यवस्था से कुछ ही अच्छा था, जिसमें मरियम की आराधना, सन्तों की आराधना, मूर्तियों की आराधना, अवशेषों की आराधना, तीर्थयात्राएँ, दान-पुण्य, बाहरी रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, जुलूस, साष्टांग प्रणाम, झुकना, क्रूस का चिह्न बनाना, उपवास, पाप-स्वीकार, पापमुक्ति की घोषणाएँ, मिस्सा, प्रायश्चित और याजकों की अन्धी आज्ञाकारिता सम्मिलित थी। वह अज्ञानता और मूर्तिपूजा की एक बड़ी खिचड़ी थी, और एक अनजाने परमेश्वर की सेवा थी जो प्रतिनिधि के द्वारा की जाती थी। इसका एकमात्र व्यावहारिक परिणाम यह था कि याजक लोगों का धन ले लेते और उनके उद्धार का ज़िम्मा लेते, और लोग यह सोचकर अपने आपको बहलाते कि वे याजकों को जितना अधिक देंगे, उतना ही अधिक निश्चित होगा कि वे स्वर्ग जाएँगे।
याजकों ने लोगों के साथ जो घोर और हास्यास्पद धोखाधड़ियाँ कीं, उनकी सूची से एक पूरी पुस्तक भर जाएगी, और मैं निस्सन्देह कुछ नमूनों से अधिक नहीं दे सकता।
ग्लॉस्टरशायर के हेल्स मठ में याजक दान देनेवालों को एक शीशी दिखाते थे, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसमें मसीह का लहू है। राजा हेनरी अष्टम के समय जब जाँच की गई तो इस प्रसिद्ध शीशी में न कम न अधिक, केवल एक बत्तख का लहू मिला, जो हर सप्ताह बदला जाता था।
केण्ट के बेक्सली में एक क्रूस दिखाया जाता था, जिसे विशेष आदर और बड़ी भेंटें मिलती थीं, क्योंकि कहा जाता था कि उसके दिखाए जाने के समय एक निरन्तर चमत्कार होता है। जब लोग ताँबा चढ़ाते तो मूर्ति का चेहरा गम्भीर दिखता; जब चाँदी चढ़ाते तो उसकी कठोरता ढीली पड़ जाती; और जब सोना चढ़ाते तो वह खुलकर मुस्कुराती। हेनरी अष्टम के समय इस प्रसिद्ध क्रूस की जाँच की गई, तो उसके भीतर तार मिले, जिनसे याजक मूर्ति के चेहरे को हिला सकते थे और उसे जो भाव चाहें दे सकते थे।
बर्कशायर के रीडिंग मठ में अन्य बहुत-सी वस्तुओं के साथ ये अवशेष बड़ी श्रद्धा से पूजे जाते थे — एक पंख वाला स्वर्गदूत, वह भाले की नोक जिसने हमारे उद्धारकर्ता का पंजर बेधा, पवित्र क्रूस के दो टुकड़े, सन्त याकूब का हाथ, सन्त फिलिप्पुस का उत्तरीय, और मरियम मगदलीनी की एक हड्डी।
सफ़ॉक के बरी सेंट एडमण्ड्स में याजक वे कोयले दिखाते थे जिन पर सन्त लॉरेंस को भूना गया था, सन्त एडमण्ड के पैर के नाखूनों की कतरनें, थॉमस ए बेकेट का कलमतराश और जूते, और हमारे उद्धारकर्ता के क्रूस के इतने टुकड़े कि यदि उन्हें जोड़ दिया जाता तो एक पूरा बड़ा क्रूस बन जाता।
समरसेटशायर के मेडन ब्रैडली प्रायरी में आराधकों को यह विशेषाधिकार मिलता था कि वे मरियम का वस्त्र, प्रभु-भोज की मूल रोटी का एक अंश, और उस पत्थर की चरनी का एक टुकड़ा देख सकें जिसमें बैतलहम में हमारे प्रभु को लिटाया गया था।
समरसेटशायर के ब्रूटन प्रायरी में मरियम की एक कमरपट्टी रखी थी, जो लाल रेशम की बनी थी। यह गम्भीर अवशेष प्रसव-पीड़ा में पड़ी स्त्रियों के पास विशेष कृपा के रूप में भेजा जाता था, ताकि उनका प्रसव सुरक्षित हो। यही बात विल्टशायर के फ़ार्ले मठ में रखी मरियम मगदलीनी की सफ़ेद कमरपट्टी के साथ भी की जाती थी। हम निश्चित हो सकते हैं कि दोनों में से किसी भी स्थिति में वह अवशेष बिना धन लिए नहीं भेजा जाता था।*
ऐसे विवरण इतने मूर्खतापूर्ण और शोकजनक हैं कि मनुष्य को समझ नहीं आता कि हँसे या रोए। फिर भी इन्हें सामने रखना नितान्त आवश्यक है, ताकि लोग जान सकें कि धर्म-सुधार से पहले हमारे पूर्वजों का धर्म कैसा था। ये बातें हमारे कानों को कितनी ही अद्भुत क्यों न लगें, हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि उन दिनों अंग्रेज़ लोग इससे अच्छा कुछ जानते ही नहीं थे। घेराबन्दियों और नाकाबन्दियों में भूखा मनुष्य भूख से मरने के बदले चूहे और छछूँदर खाता देखा गया है। जो आत्मा परमेश्वर के वचन के अभाव में भूखी मर रही हो, यदि वह घोर अन्धविश्वास में भी शान्ति ढूँढ़ने का यत्न करे तो उसे बहुत कठोरता से नहीं आँकना चाहिए।
(ग) एक बात और शेष है। धर्म-सुधार से पहले अंग्रेज़ी धर्म की एक और प्रमुख विशेषता व्यापक अपवित्रता और अनैतिकता थी। पादरी-वर्ग का जीवन, सामान्य नियम के रूप में, केवल निन्दनीय था, और साधारण लोगों का नैतिक स्तर स्वाभाविक रूप से सबसे नीचे गिरा हुआ था। निश्चय ही काँटों में अंगूर नहीं लगते, न ऊँटकटारों में अंजीर। अज्ञानता और अन्धविश्वास की जो विशाल जड़ें हमारे देश में फैली थीं, उनसे भ्रष्ट फल के अतिरिक्त किसी और फल की आशा करना अनुचित और बेतुका होता। परन्तु रोमी मत के निर्बाध वैभव के दिनों में अंग्रेज़ पादरी-वर्ग से अधिक सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट समूह की कल्पना करना असम्भव है।
मैं आपको पेटूपन, मतवालेपन,
ऊपर बताए गए तथ्यों के लिए स्ट्राइप और बर्नेट मेरे प्रमाण हैं।
और जुए की उन आदतों के बारे में बता सकता हूँ, जिनके लिए गाँव-गाँव के याजक दुर्भाग्य से कुख्यात हो गए थे।
प्रोफ़ेसर जे. जे. ब्लण्ट धर्म-सुधार के अपने उत्कृष्ट इतिहास में कहते हैं, "प्रायः वे ऐसे लोग होते थे जो समाज के सबसे निचले वर्ग से लिए जाते थे, और उस वर्ग की सारी भद्दी आदतें अपने साथ रखते थे जिससे वे आए थे — शराबखाने की बेंच पर बैठे आलसी, पासा खेलनेवाले, जो अपनी 'हे हमारे पिता' की प्रार्थना भी रटकर मुश्किल से पढ़ पाते थे, प्रायः दस आज्ञाएँ भी दोहरा न सकते थे — मिस्सा करानेवाले याजक, जो बस अपनी प्रार्थना-पुस्तकें पढ़ लेते थे, और बस इतना ही — ऐसे लोग जिन्हें अक्सर 'सर जॉन लैक-लैटिन', 'सर जॉन मम्बल-मैटिन्स', या बकबकिया और अन्धे 'सर जॉन' जैसे अपमानजनक नामों से पुकारा जाता था। वास्तव में, धर्म-सेवकों का भोग-विलासी जीवन, उनके मोटे पेट और उनकी साधारण सांसारिकता धर्म-सुधार से पहले कहावत बन चुकी थी।"
मैं तुम्हें सुधार-पूर्व याजक-वर्ग की उस निर्लज्ज लोलुपता के विषय में बता सकता हूँ जो उसकी पहचान थी। जब तक कोई मनुष्य थॉमस ए बेकेट जैसे सन्तों की समाधि पर उदारता से भेंट चढ़ाता रहता, तब तक पादरी-वर्ग लगभग किसी भी पाप से उसे मुक्त घोषित कर देता था। जब तक कोई अपराधी या दुष्कर्मी भिक्षुओं को अच्छा धन देता रहता, तब तक वह किसी भी अपराध के बाद धार्मिक भवनों की सीमा में शरण का दावा कर सकता था, और कोई भी व्यवस्था उस तक मुश्किल से ही पहुँच पाती थी। फिर भी इसी बीच लोलार्डों और विक्लिफ के अनुयायियों के लिए कोई दया न थी! कुछ पुराने कलीसियाई भवनों में आज भी जो नक्काशियाँ बची हैं, वे पत्थर और लकड़ी में एक ऐसी कहानी कहती हैं जो आज भी बहुत कुछ बोलती है। साधुओं को प्रायः प्रचार करती हुई लोमड़ियों के रूप में दिखाया जाता था, जिनके पीछे लटकती टोपी में से चुराए हुए हंस की गर्दन झाँक रही होती थी, तो कहीं पाप-क्षमा सुनाते हुए भेड़ियों के रूप में, जिनके चोगे में एक भेड़ छिपी होती थी, और कहीं रोगी की खाट के पास बैठे वानरों के रूप में, जिनके एक हाथ में क्रूस होता और दूसरा हाथ रोगी की जेब में। जब सेवकों के दोष इस प्रकार खुलेआम तिरस्कार के लिए प्रदर्शित किए जाते थे, तब अवश्य ही दशा बहुत गिर चुकी होगी।
परन्तु इंग्लैंड के सुधार-पूर्व पादरी-वर्ग के चरित्र का सबसे काला धब्बा ऐसा है जिसके विषय में बोलना पीड़ादायक है। मेरा आशय उनके जीवन की अशुद्धता और सातवीं आज्ञा के प्रति उनके भयानक तिरस्कार से है। उन पुरुषों द्वारा, जो अपनी शपथ से कभी विवाह न करने के लिए बँधे थे, कान में किए जानेवाले पाप-स्वीकार के जो परिणाम निकले, उनमें मैं प्रवेश करने का साहस नहीं करता। भरी जवानी में पुरुषों और स्त्रियों के झुण्डों को मठों और ननालयों में बन्द कर देने के जो परिणाम हुए, उन पर रुककर मैं अपने पाठकों के मन को अशुद्ध नहीं करूँगा। इतना कहना पर्याप्त है कि हेनरी अष्टम के आयुक्तों ने बहुत-से तथाकथित "धार्मिक" भवनों की जो दशा खोज निकाली, उसका वर्णन करना असम्भव है। पाप और संसार से बचने के इन कथित "पवित्र" आश्रमों में बहुतेरे "पवित्र" पुरुषों और स्त्रियों के आचरण से अधिक अपवित्र कुछ और कल्पना में भी नहीं आ सकता! यदि कभी कोई तर्कसंगत लगनेवाला सिद्धान्त तराजू में तौला जाकर नितान्त हलका ठहरा है, तो वह यह प्रिय सिद्धान्त है कि अविवाहित रहना और मठवासी जीवन पवित्रता को बढ़ाते हैं। भावुक नवयुवक और संवेदनशील नवयुवतियाँ बैटल, ग्लास्टनबरी, बोल्टन, किर्कस्टॉल, फर्नेस, क्रॉयलैंड, बरी और टिंटर्न जैसे मठों के खण्डहरों पर शोक मना सकते हैं। परन्तु मैं निडर होकर कहता हूँ कि इन धार्मिक भवनों में से बहुत-से अधर्म के गड्ढे थे, और भिक्षु और भिक्षुणियाँ प्रायः मसीही विश्वास के लिए कलंक थे।
मैं सहर्ष मानता हूँ कि सब मठ और ननालय एक समान बुरे नहीं थे। मैं मानता हूँ कि ऑक्सफोर्ड के निकट गॉडस्टो ननालय जैसे कुछ धार्मिक भवन थे जिनकी प्रतिष्ठा निष्कलंक थी। परन्तु मुझे भय है कि ये उज्ज्वल अपवाद थे, जो नियम की सच्चाई को ही प्रमाणित करते हैं। धार्मिक भवनों के विघटन के अधिनियम की प्रस्तावना, जो हेनरी अष्टम के आयुक्तों के प्रतिवेदन पर आधारित थी, ऐसे व्यापक और सामान्य कथन रखती है जिन्हें टाला नहीं जा सकता। वह घोषणा करती है "कि भिक्षुओं, कैनन-पादरियों और भिक्षुणियों के मठों, आश्रमों और अन्य धार्मिक भवनों में प्रकट पाप, दुष्ट, शारीरिक और घृणित जीवन प्रतिदिन बरता और किया जाता है, और यद्यपि दो सौ वर्ष और उससे भी अधिक समय से ऐसे उड़ाऊ, शारीरिक और घृणित जीवन के ईमानदार और दयापूर्ण सुधार के लिए अनेक बार निरन्तर निरीक्षण होते रहे, तथापि अब तक उनमें कोई सुधार नहीं हुआ, या बहुत थोड़ा हुआ, वरन् उनका दुष्ट जीवन लज्जाजनक रीति से बढ़ता और फैलता ही गया।"
आख़िर, अनैतिकता को बढ़ावा देने का "पेट भर रोटी और आलस्य की बहुतायत" से अधिक पक्का नुस्खा कोई और नहीं है। (यहेजकेल 16:49।) किसी भी जाति, पद या वर्ग के पुरुषों और स्त्रियों की कोई भी संख्या ले लो, उन्हें अविवाहित रहने की शपथ से बाँध दो, उन्हें अलग भवनों में बन्द कर दो, उन्हें खाने-पीने को भरपूर दो और करने को कुछ न दो, और सबसे बढ़कर उन्हें न बाइबल पढ़ने को दो, न सच्चा धर्म, न सुसमाचार का प्रचार, न निरीक्षण, और न लोकमत का कोई अंकुश; यदि इस सबका परिणाम सातवीं आज्ञा का घृणित और भारी उल्लंघन न हो, तो मैं केवल यही कह सकता हूँ कि मैंने मानव स्वभाव को व्यर्थ ही पढ़ा है।
मैं इन बातों पर रुकने के लिए कोई क्षमा नहीं माँगता। यह चित्र चाहे कितना ही पीड़ादायक और दीन करनेवाला हो, इन दिनों में उसे ध्यान से देखा जाना चाहिए, न कि एक ओर फेंक दिया जाना चाहिए। इससे पहले कि हम उस ओछे कोलाहल में सम्मिलित हों जो कुछ आधुनिक कलीसियाई लोग धर्म-सुधार के विरुद्ध मचा रहे हैं, मैं चाहता हूँ कि अंग्रेज़ लोग समझें कि धर्म-सुधार ने हमें किस दशा से छुड़ाया। इससे पहले कि हम प्रोटेस्टेंट मत को त्यागने और पोप-तन्त्र तथा मठवाद को फिर से अपनाने का मन बनाएँ, हम भली-भाँति समझ लें कि जब पोप-तन्त्र की मनमानी चलती थी तब इंग्लैंड की दशा क्या थी। मेरा अपना विश्वास है कि धर्म-सुधार के समान किसी परिवर्तन की इतनी ऊँची माँग कभी नहीं हुई, और हूपर तथा उसके सहकर्मी धर्म-सुधारकों के समान किसी ने इंग्लैंड की इतनी भलाई की सेवा नहीं की। संक्षेप में, जब तक कोई मनुष्य फ़ॉक्स, फुलर, स्ट्राइप, बर्नेट, सोम्स और ब्लंट के पृष्ठों में अंकित स्पष्ट ऐतिहासिक तथ्यों को झुठला न सके, तब तक उसे या तो यह मानना पड़ेगा कि सुधार-पूर्व का समय बुरा समय था, या फिर पागल गिना जाने से सन्तोष करना पड़ेगा। इंग्लैंड हमारे प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधारकों का जितना ऋणी है उतना किसी और वर्ग का नहीं, और यदि हम कृतघ्न होकर वह ऋण चुकाने से इनकार करें तो यह घोर लज्जा की बात है।
निस्सन्देह उन कुछ साधनों के चरित्र में छेद ढूँढ़ना, जिन्हें परमेश्वर ने धर्म-सुधार में काम में लाना चाहा, सरल और सस्ता काम है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हेनरी अष्टम, जिसने बाइबल का अनुवाद करवाया, और क्रैनमर तथा लैटिमर को अध्यक्ष बनाया, और मठों को बन्द किया, एक क्रूर और बुरा मनुष्य था। मुझे उसका बचाव करने की कोई चिन्ता नहीं। परन्तु परमेश्वर ने प्रायः बहुत बुरे औज़ारों से भी अच्छा काम लिया है; और हमें मुख्यतः उसके महान परिणाम को देखना चाहिए। और आख़िरकार, हेनरी अष्टम चाहे कितना ही बुरा था, हमारे रोम की ओर झुके मित्र इस बात पर जितना कम बोलें उतना ही अच्छा है। उसका नैतिक चरित्र कम से कम बहुत-से पोपों के चरित्र की तुलना में अच्छा ही ठहरेगा। कम से कम वह एक विवाहित पुरुष तो था!
दूसरी ओर यह कहना सरल है कि हूपर और उसके साथी धर्म-सुधारकों ने अपना काम भली-भाँति नहीं किया, बहुत-सी बुराइयों को सहन किया, और बहुत-सी बातों को अधूरा तथा अपूर्ण छोड़ दिया। यह सब बहुत सच हो सकता है। परन्तु साधारण न्याय की दृष्टि से मनुष्यों को उन अनेक कठिनाइयों को स्मरण रखना चाहिए जिनका उन्हें सामना करना पड़ा, और कूड़े-कचरे के उन पहाड़ों को भी जिन्हें उन्हें हटाना पड़ा। मेरे विचार में आश्चर्य की बात यह नहीं कि उन्होंने इतना थोड़ा किया, वरन् यह है कि वे कुछ भी कर पाने में सफल हुए।
फिर भी, सब कुछ कह दिए जाने और हर आपत्ति उठा लिए जाने के बाद भी कुछ बड़े स्पष्ट तथ्य रह जाते हैं जिन्हें टाला नहीं जा सकता। मनुष्य चाहे जो कहें, या जहाँ चाहें वहाँ दोष ढूँढ़ें, वे इन तथ्यों को कभी झुठला न सकेंगे। अंग्रेज़ लोग धर्म-सुधार के ऋणी हैं कि उनके पास अंग्रेज़ी बाइबल है, और हर मनुष्य को उसे पढ़ने की स्वतंत्रता है। - धर्म-सुधार के कारण ही उन्हें परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप के मार्ग का ज्ञान मिला, और यह कि हर पापी को अधिकार है कि वह विश्वास के द्वारा सीधे मसीह के पास जाए, और बीच में कोई अध्यक्ष, याजक या सेवक बाधा न बने। - धर्म-सुधार के कारण ही उन्हें नैतिकता और पवित्रता का वह पवित्रशास्त्रीय स्तर मिला जिसकी हमारे पूर्वजों ने कभी कल्पना भी न की थी। - इन अनमोल दयाओं के लिए हम सदा धन्यवादी रहें! हम सदा इन्हें दृढ़ता से थामे रहें, और इन्हें कभी हाथ से जाने न दें! जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं मानता हूँ कि जो कोई हमसे ये अधिकार छीनकर हमें धर्म-सुधार से पहले की अज्ञानता, अन्धविश्वास और अपवित्रता में वापस खींचना चाहता है, वह इंग्लैंड का शत्रु है, और उसका दृढ़ता से विरोध होना चाहिए।
2. अब मैं हूपर के समय से हटकर स्वयं हूपर की ओर आता हूँ। उसके समय पर इतनी देर तक ठहरने के लिए मुझे लगता है कि क्षमा माँगना आवश्यक नहीं। जब तक हम उस समय को न जानें जिसमें कोई सार्वजनिक पुरुष जीया, तब तक हम उसका ठीक मूल्यांकन नहीं कर सकते। जब तक हम धर्म-सुधार से पहले इंग्लैंड की दशा को न समझें, तब तक हम किसी अंग्रेज़ धर्म-सुधारक का उचित आदर नहीं कर सकते। हमने देख लिया कि हूपर और उसके साथियों को किन परिस्थितियों से निपटना पड़ा। अब आइए स्वयं हूपर के विषय में कुछ जानें।
यूहन्ना हूपर का जन्म सन् 1495 में, हेनरी सप्तम के शासनकाल में, सॉमरसेट प्रदेश में हुआ। जिस पल्ली में उसका जन्म हुआ वह ज्ञात नहीं, और उसके विषय में कोई जनश्रुति तक नहीं बची। इस बात में हूपर और रॉलैंड टेलर अंग्रेज़ शहीदों में अकेले हैं। क्रैनमर, रिडले, लैटिमर, रोजर्स, ब्रैडफ़र्ड, फ़िलपॉट और फ़ेरर के जन्मस्थान सब पता लगाए जा चुके हैं। उस प्रदेश में उसके परिवार की क्या स्थिति थी, यह भी उतना ही अज्ञात है। फिर भी यह मानने का अच्छा कारण है कि उसका पिता साधारण किसान नहीं, वरन् बड़ी सम्पत्तिवाला पुरुष था।
इस महान धर्म-सुधारक का आरम्भिक इतिहास बहुत धुँधलेपन में लिपटा है। उसने सन् 1514 में उन्नीस वर्ष की आयु में ऑक्सफ़ोर्ड के मर्टन कॉलेज में प्रवेश किया, जहाँ वह अपने एक चाचा की देखरेख में रहा, जो उस समय उस कॉलेज का फ़ेलो था। उसने सन् 1518 में तेईस वर्ष की आयु में बी.ए. की उपाधि पाई, और उसके बाद कभी उच्चतर उपाधि तक नहीं बढ़ा। हूपर के जीवन के पहले तेईस वर्षों के विषय में वस्तुतः केवल यही तथ्य खोजे जा सके हैं। सन् 1518 से 1539 तक, अर्थात् पूरे इक्कीस वर्ष की इस अवधि में, हूपर के इतिहास के विषय में हम फिर लगभग पूरी तरह अँधेरे में हैं। फिर भी इसमें थोड़ा ही सन्देह हो सकता है कि यह उसके जीवन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संकटकाल था, और इसी ने उसके शेष जीवन भर के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को रंग और झुकाव दिया। जनश्रुति कहती है कि ऑक्सफ़ोर्ड में उपाधि लेने के बाद वह साधु बन गया - पहले सॉमरसेटशायर में वॉचेट के निकट ओल्ड क्लीव के सिस्टरशियन मठ में, और बाद में ग्लॉसेस्टर के एक अन्य सिस्टरशियन भवन में। जनश्रुति यह भी जोड़ती है कि वह मठवासी जीवन से थक गया और उकता गया, और ऑक्सफ़ोर्ड में रहने के लिए उसे छोड़ आया; यद्यपि ठीक किस तिथि को, यह ज्ञात नहीं। इन जनश्रुतियों की कुछ पुष्टि इससे होती है कि जब बाद में गार्डिनर ने उसे मृत्युदण्ड सुनाया, तब उसे "पहले क्लीव के मठ का, सिस्टरशियन सम्प्रदाय का, साधु" बताया गया। फिर भी यह मानना पड़ेगा कि उसके बचे हुए लेखों में साधु के रूप में उसके अनुभव का कोई उल्लेख प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता।
इतना तो किसी भी स्थिति में निश्चित है कि जीवन के इस चरण में हूपर के विषय में एक बात सत्य है। इन्हीं इक्कीस वर्षों के बीच, अर्थात् 1518 और 1539 के मध्य, उसकी आँखें पोप-तन्त्र की झूठी शिक्षाओं और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध प्रथाओं के प्रति खुलीं, यद्यपि कब और कहाँ, यह हम ठीक-ठीक नहीं बता सकते। वह स्वयं स्विट्ज़रलैंड के धर्म-सुधारक बुलिंगर को लिखे एक पत्र में कहता है कि "जब वह दरबारी था, और राजा के महल में दरबारी जीवन में बहुत अधिक डूबा हुआ था," तब उसे ज़्विंग्ली के कुछ लेख और पौलुस की पत्रियों पर बुलिंगर की कुछ टीकाएँ मिलीं, और इन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से उसे पोप-तन्त्र से छुटकारा और अपनी आत्मा का मन-परिवर्तन मिला। यह अत्यन्त रोचक पत्र पार्कर सोसाइटी द्वारा प्रकाशित "ज़्यूरिख़ से मूल पत्र" में मिलेगा। परन्तु "दरबारी जीवन" और "राजा के महल" के उल्लेख का अर्थ समझाने की कोई कुंजी यह पत्र, दुर्भाग्य से, नहीं देता।
इस काल में हूपर के विषय में एक और तथ्य भी उतना ही निश्चित है। सन् 1539 में, जब छह धाराओं का अर्ध-पोपवादी अधिनियम लागू किया गया, जिसके कारण लैटिमर को अपना बिशप-पद त्यागना पड़ा, तब हूपर को ऑक्सफ़ोर्ड छोड़ना पड़ा। शहीद-चरित्र के लेखक फ़ॉक्स स्पष्ट रूप से कहता है कि धर्म-सुधार के सिद्धान्तों के प्रति उसके जगजाहिर लगाव ने ऑक्सफ़ोर्ड के अधिकारियों का, और विशेषकर ईश्वरविज्ञान के प्राध्यापक डॉ. स्मिथ का, ध्यान आकर्षित किया। परिणाम यह हुआ कि उसे विश्वविद्यालय से हटना पड़ा, और ऐसा प्रतीत होता है कि वह फिर कभी वहाँ नहीं रहा।
1539 में ऑक्सफ़ोर्ड छोड़ने पर हूपर थोड़े समय के लिए सर थॉमस अरुंडेल के घराने में भण्डारी और पादरी बने। यहाँ भी उनके प्रोटेस्टेंट सिद्धान्तों ने उन्हें फिर से संकट में डाल दिया। उनका स्वामी उन्हें पसन्द तो करता था, परन्तु उनके मतों को पसन्द नहीं करता था। परिणाम यह हुआ कि उसने उन्हें एक निजी पत्र के साथ अध्यक्ष गार्डिनर के पास भेजा, जिसमें उसने प्रार्थना की कि वह "उसके पादरी का कुछ भला करे।" परन्तु गार्डिनर चार-पाँच दिन के वार्तालाप के बाद भी उस दृढ़ धर्म-सुधारक से कुछ न कर सका, और उनके मतों को डिगाने में सर्वथा असफल रहा। फ़ॉक्स कहता है कि बात का अन्त यह हुआ, "कि उसने सर थॉमस के सेवक को उसके पास लौटा दिया, उसकी विद्या और बुद्धि की भली-भाँति सराहना की, परन्तु मन में मास्टर हूपर के विरुद्ध बैर रखे रहा।" दुर्भाग्य से यह बैर भुलाया नहीं गया, और बहुत दिनों के बाद इसका कड़वा फल निकला।
इसके बाद हूपर और सर थॉमस अरुंडेल का सम्बन्ध अधिक दिन नहीं टिका। प्रोटेस्टेंट पादरी ने देखा कि इंग्लैंड में उसका प्राण सुरक्षित नहीं है, और अपने समय के बहुत-से भले मनुष्यों की नाईं वह यूरोप महाद्वीप चला गया। वहाँ वह कम से कम नौ वर्ष रहा प्रतीत होता है — पहले स्ट्रासबर्ग में, फिर बेसल में, और अन्त में ज्यूरिख में। निस्सन्देह उसके जीवन के इसी काल में वह उन स्पष्ट और सुनिश्चित विचारों में दृढ़ हुआ, जिनके सैद्धान्तिक सत्य को उसने आगे चलकर अपने देश में इतनी वीरता से थामे रखा। इसी काल में उसने बुलिंगर, बूसर, ए. लास्को और महाद्वीप के अन्य धर्म-सुधारकों से मित्रता की, जो सदा उसे गहरे स्नेह की दृष्टि से देखते रहे। इसी काल में, लगभग 1546 में, उसने अन्ना दे ट्ज़ेर्क्लास नामक एक कुलीन बर्गंडी महिला से विवाह किया, जो हर प्रकार से उसकी सहायक सिद्ध हुई।
1547 में हेनरी आठवें की मृत्यु हुई और एडवर्ड छठे का छोटा परन्तु महिमामय राज्य आरम्भ हुआ। इसके कुछ ही समय बाद हूपर ने अपना कर्तव्य जाना कि वह अपने देश में प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के कार्य में हाथ बँटाए, और ज्यूरिख के मित्रों से स्नेहपूर्वक विदा लेकर वह इंग्लैंड लौटने को चल पड़ा। विदा के उसके वचन पीड़ाजनक रूप से भविष्यसूचक और हृदय को छूनेवाले थे। उन्होंने उससे कहा कि हमें पूरी आशा है कि तू अपनी मातृभूमि में ऊँचे पद पर पहुँचेगा; हमारी आशा है कि तू अपने पुराने मित्रों को न भूलेगा; हमारी विनती है कि तू कभी-कभी हमें पत्र लिखा करना। उत्तर में हूपर ने उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं तुम्हारी अनेक कृपाओं को कभी न भूलूँगा; समय-समय पर तुम्हें पत्र लिखने की प्रतिज्ञा की; और इन अविस्मरणीय वचनों के साथ बात समाप्त की: "मास्टर बुलिंगर, अन्तिम समाचार मैं नहीं लिख सकूँगा। क्योंकि जहाँ मैं सबसे अधिक परिश्रम करूँगा, वहीं से तुम मेरे विषय में सुनोगे कि मैं जलाकर राख कर दिया गया। वही अन्तिम समाचार होगा, जिसे मैं तुम्हें लिख न सकूँगा। परन्तु तुम उसे मेरे विषय में सुनोगे।"
हूपर मई 1549 में लन्दन पहुँचा, और धर्म-सुधार के मित्रों ने उसका आनन्द से स्वागत किया; क्रैन्मर और रिडले अपार कठिनाइयों के सामने भी उस धर्म-सुधार को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहे थे। वह कठिन अभियान के बीच एक स्वागतयोग्य सहायक-दल की नाईं आया, और उसने प्रोटेस्टेंट पक्ष को बहुत बल दिया। निश्चय ही खरे, विद्वान और सामर्थी मनुष्य के रूप में उसकी ख्याति उससे पहले ही पहुँच चुकी थी। शीघ्र ही उसे रक्षक, सॉमरसेट के ड्यूक, का पादरी नियुक्त किया गया। अपने स्वभाव के अनुसार उसने तुरन्त अपने आपको शिक्षा के कार्य में लगा दिया, और प्रायः दिन में दो बार उपदेश देता था, और ऐसी स्पष्ट स्वीकृति के साथ कि उसे सुनने के लिए उमड़ती भीड़ को गिरजाघर समा न सकते थे। उसका शत्रु डॉ. स्मिथ भी मानता था कि "लोग उसकी इतनी प्रशंसा करते थे कि उसे भविष्यद्वक्ता समझते थे; वरन् वे उसे देवता की दृष्टि से देखते थे।"
शहीदों के इतिहासकार फ़ॉक्स ने, जो हूपर को भली-भाँति जानता था, उस समय उसके उच्च चरित्र के विषय में, वरदानों और गुणों दोनों में, यह साक्षी दी: "वह अपने सिद्धान्त में उत्साही, वाणी में वाक्पटु, पवित्रशास्त्र में निपुण, और परिश्रम में अथक था। उसका जीवन ऐसा शुद्ध और भला था कि निन्दा की साँस भी उस पर कोई दोष न लगा सकी। वह देह से बलवन्त था, उसका स्वास्थ्य पूर्ण और सुदृढ़ था, उसकी बुद्धि बहुत तीव्र थी, और उसका अजेय धीरज बुरे से बुरे भाग्य और विपत्ति को सह लेने में समर्थ था। वह निर्णय में स्थिर, भोजन में संयमी, वाणी में और भी संयमी, और समय के विषय में सबसे अधिक संयमी था। गृहस्थी में वह बड़ा उदार था, और कभी-कभी अपनी आय से भी अधिक खुले हाथ से देता था। संक्षेप में, पौलुस ने तीमुथियुस को लिखी अपनी पत्री में एक भले अध्यक्ष के लिए जिन गुणों और लक्षणों की माँग की है, उनमें से मैं नहीं जानता कि कौन-सा मास्टर हूपर में नहीं था।"
ऐसे साँचे और छाप का मनुष्य एडवर्ड छठे के दिनों में अध्यक्ष बनाए जाने के योग्य ठीक ही ठहराया गया। इंग्लैंड में उतरने के एक वर्ष के भीतर उसके ज्यूरिख के मित्रों की भविष्यवाणियाँ पूरी हो गईं। 1550 में राजा के सामने उपवास-काल के उपदेशों की एक शृंखला देने के बाद, बुलिंगर के मित्र, ज्यूरिख के निर्वासित और उस समय के सबसे लोकप्रिय प्रचारक जॉन हूपर को ग्लॉस्टर के रिक्त अध्यक्ष-पद के लिए नामित किया गया। इससे अधिक बुद्धिमानी का चुनाव नहीं हो सकता था। इंग्लैंड की कलीसिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण बहुत कम, अत्यन्त कम, मिलता है कि ठीक मनुष्य को ठीक स्थान पर रखा गया हो।
फिर भी हूपर के नामित होने से वह क्रैन्मर और रिडले के साथ एक अत्यन्त अप्रिय टकराव में आ गया, और वह भी एक बड़े असुविधाजनक विषय पर। उसने उस शपथ को लेने से, जो अब तक अध्यक्ष अपने अभिषेक के समय लेते आए थे, और उन अध्यक्षीय वस्त्रों को पहनने से, जो अब तक पहने जाते आए थे, दृढ़ता से इनकार कर दिया। शपथ पर उसकी आपत्ति यह थी कि वह स्पष्टतः पवित्रशास्त्र के विरुद्ध है, क्योंकि उसमें परमेश्वर के साथ सन्तों का भी उल्लेख था। वस्त्रों पर उसकी आपत्ति यह थी कि वे पोप-मत के अवशेष हैं, जिन्हें पूरी तरह दूर कर देना चाहिए।
हूपर और उसके दो महान सहकर्मियों के बीच तुरन्त एक विवाद उठ खड़ा हुआ, जिसने उसके अभिषेक को लगभग पूरे एक वर्ष तक टाल दिया और बहुत बड़ी हानि पहुँचाई। विवाद का मूल कारण जितना ही तुच्छ और महत्त्वहीन दिखाई देता था, विवाद करनेवाले उतने ही अधिक उत्तेजित और हठी होते गए। रिडले ने अपने विरोधी भाई से बहुत विचार-विमर्श किया और पत्र-व्यवहार किया, पर सब व्यर्थ गया। एडवर्ड छठे और उसकी राजकीय परिषद ने क्रेन्मर को लिखा और प्रस्ताव रखा कि यदि वह उस अध्यक्ष-नियुक्त व्यक्ति को अप्रिय लगनेवाली "कुछ रीतियों और विधियों को जाने दे", तो उसे दण्ड के सब जोखिम से मुक्त कर दिया जाएगा; परन्तु यह भी व्यर्थ रहा। विदेशी धर्म-सुधारकों ने लम्बे-लम्बे पत्र लिखे और दोनों पक्षों से विनती की कि कुछ झुकें और कुछ छोड़ें; यह भी व्यर्थ गया। झगड़ा इतना तीखा हो गया कि राजकीय परिषद हूपर के हठ से तंग आ गई और उसे फ्लीट कारागार में डाल दिया! अन्त में एक समझौता हुआ। हूपर ने शान्ति के लिए कुछ बातों में हार मान ली। वह कुछ सार्वजनिक अवसरों पर आपत्तिजनक वस्त्र पहनने को सहमत हो गया, अर्थात् अपने अभिषेक के समय, राजा के सामने और अपने महागिरजाघर में। अध्यक्षीय शपथ के आपत्तिजनक शब्द स्वयं राजा के हाथ से काट दिए गए। तब कारागार के फाटक खोल दिए गए, और सब सच्चे प्रोटेस्टेंटों के बड़े आनन्द के बीच हूपर 8 मार्च, 1551 को ग्लॉस्टर का अध्यक्ष अभिषिक्त किया गया।
हूपर और उसके दो महान विरोधियों के बीच का यह शोचनीय विवाद, भले लोगों के सब विवादों की तरह, एक दुःखद विषय है। निस्सन्देह इससे हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उत्तम से उत्तम मनुष्य भी अपनी उत्तम दशा में केवल मनुष्य ही होते हैं। यदि पौलुस और बरनबास आपस में ऐसा झगड़े कि अलग हो गए, और पतरस और पौलुस अन्ताकिया में खुले रूप से आमने-सामने आ गए, तो यदि हमारे अंग्रेज़ धर्म-सुधारक सदा एकमत न रहे तो हमें उन्हें अधिक कठोरता से नहीं आँकना चाहिए। परन्तु इस बात से इनकार करना व्यर्थ है कि इस प्रसिद्ध झगड़े ने उस समय बड़ी हानि की, और ऐसे बीज बोए जो आज तक हानिकारक फल ला रहे हैं।
मैं स्वतन्त्रता से मानता हूँ कि तीन सौ वर्ष की दूरी से हम पूरे मामले के बुरे न्यायी हैं। निस्सन्देह दोनों पक्ष कुछ-न-कुछ गलती पर थे, और प्रश्न केवल यह है कि अधिक दोष किस पक्ष का था। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि मनुष्यों का सामान्य निर्णय हूपर के विरुद्ध रहा है। फिर भी मैं ईमानदारी से कहता हूँ कि इस निर्णय से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हो सकता। सारे मामले को सावधानी से तौलने के बाद मेरी सोची-समझी धारणा यह है कि सम्भवतः हूपर ही सही था, और क्रेन्मर और रिडले ही सम्भवतः गलत थे।
मेरा विश्वास है कि सीधी-सादी सच्चाई यह है कि हूपर अपने उत्तम सहकर्मियों से कहीं अधिक दूरदर्शी था। वह उनसे आगे तक देखता था, और इंग्लैंड की कलीसिया में ऐसी बुराइयों के उठने की सम्भावना देखता था जिनकी उन्होंने अपने प्रेम के कारण कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसने भविष्यद्वक्ता की दृष्टि से अपनी सीमा के भीतर भावी रोमवाद के अण्डे छोड़ देने का भारी संकट देख लिया था। उसने वह समय देख लिया था जब पोप के मित्र हमारे सिय्योन की दीवारों में छोड़ी गई छोटी से छोटी दरार का भी लाभ उठाएँगे; और वह चाहता था कि हर दरार बन्द कर दी जाए। वह एक भी ऐसी खूँटी नहीं छोड़ता जिस पर रोमवादी मनोवृत्ति के कलीसियाई लोग मिस्सा के घृणित सिद्धान्त को फिर से टाँग सकें। मेरा दृढ़ मत है कि वह बिलकुल सही था। घटनाओं ने भरपूर प्रमाण दिया है कि उसकी विवेकपूर्ण शंकाएँ सुदृढ़ आधार पर थीं। मेरा विश्वास है कि यदि क्रेन्मर और रिडले ने शान्ति से उसकी आपत्तियाँ सुनी होतीं, और "वस्त्रों" के पूरे प्रश्न को पूरी तरह प्रोटेस्टेंट रीति से निपटाने का अवसर पकड़ लिया होता, तो यह इंग्लैंड की कलीसिया के लिए आशीष होता! एक शब्द में, यदि हूपर के विचारों को प्रबल होने दिया गया होता, तो हमारे अपने समय का आधा रीतिवादी विवाद कभी उठता ही नहीं *
इस शोचनीय विवाद से छुटकारा पाते ही हूपर ने बिना एक क्षण गँवाए अपने अध्यक्षीय कर्तव्य आरम्भ कर दिए। यद्यपि वह केवल 8 मार्च, 1551 को अभिषिक्त हुआ था, उसने तुरन्त ही ग्लॉस्टर के सारे धर्मप्रान्त में इतनी लगन से प्रचार करना आरम्भ कर दिया कि उसके स्वास्थ्य के विषय में चिन्ता होने लगी। उसकी पत्नी ने अप्रैल मास में बुलिंगर को लिखा, "मैं आपसे विनती करती हूँ कि आप श्रीमान हूपर को अपने परिश्रम में अधिक संयम बरतने की सलाह दें। वह प्रतिदिन चार, या कम से कम तीन बार प्रचार करते हैं, और मुझे डर है कि कहीं यह अत्यधिक परिश्रम उन्हें समय से पहले ही क्षीण न कर दे।" एडवर्ड के समय के सब अध्यक्षों में से किसी ने भी अपनी अध्यक्षीय सेवकाई का इतना पूरा प्रमाण नहीं दिया जितना उसने दिया। क्रेन्मर स्वभावतः उस महान धर्म-सुधार की योजना को पूरा करने में लीन था जिसका वह प्रमुख शिल्पी था। रिडले, लन्दन में रहने के कारण, जहाँ राजदरबार और लैम्बेथ महल निकट थे, राजा और प्रधान पादरी को परामर्श देने के लिए अनिवार्य रूप से प्रायः अलग खिंचता रहता था। किसी धर्मप्रान्त को सचमुच चलाने, और इंग्लैंड के प्रोटेस्टेंट अध्यक्ष कैसा होना चाहिए इसका उत्तम नमूना प्रस्तुत करने के लिए उस समय का पुरुष जॉन हूपर था। इसमें आश्चर्य नहीं कि सरकार ने शीघ्र ही ग्लॉस्टर के धर्मप्रान्त के साथ-साथ उसे वूस्टर का भार भी सौंप दिया। इच्छुक घोड़े से सदा काम लिया जाता है, और मनुष्य जितना अधिक करता है, उससे उतना ही अधिक करने को कहा जाता है।
यह एक सुखद तथ्य है कि बाद के समय में हूपर और रिडले के बीच पूरा मेल-मिलाप हो गया प्रतीत होता है, यदि कभी कोई सच्ची दरार थी भी। जब रिडले रानी मरियम के शासनकाल में कारागार में था, तो उसने हूपर को यह लिखा: "मेरे प्रिय भाई, जो बातें हमारे धर्म की नींव और मूल बिन्दु हैं, जिनके विरुद्ध आज संसार इतने क्रोध से उबल रहा है, उनमें हम पूरी तरह एकमत और सर्वथा सहमत हैं। बीते समय में धर्म की कुछ गौण बातों और परिस्थितियों को लेकर आपकी बुद्धि और मेरी सरलता में थोड़ी खटपट हुई थी, क्योंकि हम दोनों अपनी-अपनी समझ और निर्णय की अधिकता का अनुसरण कर रहे थे। परन्तु अब मैं कहता हूँ कि आप निश्चित रहें कि पूरे मन से, परमेश्वर मेरा साक्षी है, मैं आपसे सत्य में और सत्य के निमित्त प्रेम करता हूँ!"
हूपर के पादरियों की दशा से उसे स्पष्टतः बहुत कष्ट हुआ। हम पहले देख चुके हैं कि ग्लॉस्टर के धर्मप्रान्त के बहुत से पादरी दस आज्ञाएँ भी नहीं दोहरा सकते थे, और यह भी नहीं बता सकते थे कि प्रभु की प्रार्थना किसने रची। इसके अतिरिक्त वे केवल अज्ञानी ही नहीं थे, वरन् प्रायः धर्म-सुधार के सिद्धान्तों के विरोधी थे। फिर भी वे हर बात में सहमत होने और किसी भी बात पर हस्ताक्षर करने को तैयार थे, बशर्ते उन्हें अपनी वृत्तियाँ रखने दी जाएँ! इसलिए हूपर ने उनके लिए उत्तम स्वरूप के पचास अनुच्छेदों का एक संग्रह तैयार किया, और प्रत्येक पदाधिकारी से उन पर हस्ताक्षर कराए। उसने उन्हें उनके कर्तव्यों के विषय में उत्तम आदेशों की एक सूची भी दी। इसके अतिरिक्त उसने उनमें से कुछ अच्छे लोगों को शेष पर अधीक्षक नियुक्त किया, कि वे अपने भाइयों की देखरेख करें। यह समझना कठिन है कि इससे अधिक वह और क्या कर सकता था, चाहे परिस्थिति कितनी ही कष्टदायक और असन्तोषजनक रही हो। उत्तम से उत्तम अध्यक्ष भी, अपने सारे उत्साह के बावजूद, अनुग्रह नहीं दे सकते, और न पादरियों के हृदय बदल सकते हैं।
ग्लॉस्टर के धर्मप्रान्त में साधारण लोगों की दशा भी पादरियों की दशा जितनी ही असन्तोषजनक थी। यह स्वाभाविक ही था। "जैसे पासबान, वैसे लोग।" उनके विषय में वह अनिवार्यतः अधिक कुछ नहीं कर सकता था, केवल अनैतिकता को डाँट सकता था, और जहाँ सम्भव हो उसे रोक सकता था। इस प्रकार उसके दृढ़ और निष्पक्ष आचरण का एक उल्लेखनीय उदाहरण यूहन्ना अब उल्मिस ने ज्यूरिख के एक पत्र में दिया है। वह कहता है कि ग्लॉस्टरशायर के एक प्रतिष्ठित पुरुष सर एंथनी किंग्स्टन को अध्यक्ष ने व्यभिचार के आरोप में अपने सामने उपस्थित होने को बुलाया और कड़ी फटकार लगाई। उसने गाली-गलौज से उत्तर दिया, और अपने को इतना भूल गया कि न्यायालय में ही हिंसा की और मार-पीट की। परन्तु हूपर विचलित नहीं हुआ। उसने सारा मामला प्रिवी
काउंसिल को लन्दन में बताया, और परिणाम यह हुआ कि ग्लॉस्टरशायर के उस नाइट को उसकी अवज्ञा के लिए कड़ा दण्ड मिला, और उस पर पूरे £500 का जुर्माना हुआ, जो उन दिनों बहुत बड़ी राशि थी।
ग्लॉस्टर और वूस्टर के दोनों गिरजाघरों की दशा हूपर के लिए उतनी ही बड़ी परीक्षा प्रतीत होती है जितनी स्थानीय पादरियों और लोगों की दशा। विचित्र बात यह है कि 300 वर्ष पहले भी गिरजाघरों के मण्डल इंग्लैंड की कलीसिया के लिए सहायक होने से कोसों दूर प्रतीत होते हैं। इस विषय पर राजा के राज्य-सचिव सर विलियम सेसिल को लिखे एक पत्र में वह कहता है, "आह! श्रीमान् सचिव, यदि गिरजाघरों में अच्छे लोग होते! तो परमेश्वर की महिमा अब से कहीं अधिक होती, राजा की प्रजा अधिक आज्ञाकारी होती, और दीन लोगों को अधिक ज्ञान मिलता। परन्तु राज्य में ठीक उन्हीं कलीसियाओं में ज्योति की घटी है जहाँ उसे सबसे अधिक होना चाहिए।" फिर वह अपना पत्र इन मर्मस्पर्शी शब्दों से समाप्त करता है: "परमेश्वर हमें बुद्धि और बल दे कि हम अपने-अपने बुलाहट में बुद्धिमानी और दृढ़ता से सेवा करें। जो अपने माथे के पसीने की रोटी खाते हैं वे वही हैं जो सार्वजनिक पदों पर सेवा करते हैं। श्रीमान् सचिव, आपका कार्य अद्भुत है, परन्तु मेरा उससे भी बढ़कर है। अब मैं समझता हूँ कि निजी परिश्रम केवल खेल है, और निजी काम केवल आराम और चैन। परमेश्वर हमारा सहायक हो!"
अन्ततः हूपर के अध्यक्षीय कर्तव्यों के निर्वाह का सबसे उत्तम वर्णन उस पुरानी उत्तम पुस्तक में मिलता है जो "फॉक्स की शहीद-कथाएँ" के नाम से प्रसिद्ध है। फॉक्स स्पष्टतः हूपर का मित्र और प्रशंसक था, और उसके विषय में बड़े प्रेम से लिखता है। परन्तु फॉक्स की सामान्य यथार्थता पर सदा भरोसा किया जा सकता है। उसके अनेक शत्रुओं ने उसकी महान् पुस्तक को बदनाम करने का कितना ही कटु प्रयत्न किया हो, वे उसके तथ्यों को कभी झुठला नहीं पाए। उन्होंने उस भले मनुष्य के चेहरे पर खरोंचें तो लगा दी होंगी, परन्तु उसकी हड्डियाँ कभी नहीं तोड़ पाए। फ्राउड ने, जो पूर्णतः निष्पक्ष साक्षी है, स्वेच्छा से फॉक्स की विश्वसनीयता पर अपना भरोसा प्रकट किया है। टाउनसेंड ने "कृत्य और स्मारक" के अपने उत्तम और सम्पूर्ण संस्करण की लम्बी भूमिका में फॉक्स के शत्रुओं के आक्षेपों का क्रम से उत्तर दिया है। संक्षेप में, हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि जो छिछोरे आधुनिक लेखक फॉक्स को "झूठा" कहते हैं, वे केवल अपनी अज्ञानता को, या सच्चे
प्रोटेस्टेंट मत के प्रति अपनी घृणा को प्रकट कर रहे हैं। अब सुनें कि जब तक हूपर का अध्यक्षपद रहा, फॉक्स अध्यक्ष के रूप में उसके आचरण का वर्णन कैसे करता है। वह कहता है:
"मास्टर हूपर ने अपने पद-वस्त्र और राजसी परिधानों को पहनने के विषय में इन सब हलचलों और कष्टों को सहने के बाद अन्ततः अपने धर्मप्रान्त में प्रवेश किया, और वहाँ राजा एडवर्ड के राज्यकाल में प्रभु ने जो समय उसे उधार दिया, उसे ऐसी लगन से काम में लगाया कि वह उसके बाद आनेवाले सब अध्यक्षों के लिए, केवल उसी स्थान पर नहीं, वरन् इंग्लैंड के सारे राज्य के प्रत्येक धर्मप्रान्त में, एक आदर्श बन सकता है। अपनी देखरेख में वह इतना सावधान था कि मसीह की भेड़-बकरियों को उद्धार के सच्चे वचन में प्रशिक्षित करने के लिए उसने न कोई परिश्रम छोड़ा, न कोई उपाय अनखोजा रखा, और निरन्तर उसी में लगा रहा। दूसरे लोग प्रायः लाभ या पदोन्नति के लोभ से अध्यक्ष-पदों की लालसा करते हैं, कुछ उनका पीछा करते हैं, और कुछ उन्हें ऐसे मोल लेते हैं जैसे लोग जागीरें मोल लेते हैं; और जब वे उन्हें पा जाते हैं तो छोड़ने से हिचकते हैं, और इसलिए ऐसा कोई काम करने से भी हिचकते हैं जिससे सांसारिक विधियों के अनुसार वे उन्हें खो दें।
"मास्टर हूपर इस प्रकार के लोगों से सर्वथा भिन्न था; वह लाभ से बढ़कर किसी वस्तु से घृणा नहीं करता था, और सदा अपनी भेड़-बकरियों की आत्माओं को बचाने और सुरक्षित रखने के लिए परिश्रम करता था। वह दो धर्मप्रान्तों का अध्यक्ष होकर भी दोनों को अलग-अलग और दोनों को एक साथ ऐसे संचालित और मार्गदर्शित करता था मानो उसके भार में केवल एक ही परिवार हो। न कोई पिता अपने घर में, न कोई माली अपनी बारी में, न कोई किसान अपने दाख की बारी में उससे अधिक या उससे अच्छे ढंग से लगा हुआ था जितना वह अपने धर्मप्रान्त में अपनी भेड़-बकरियों के बीच लगा हुआ था, और अपने नगरों और गाँवों में जाकर लोगों को शिक्षा देता और प्रचार करता था।
"प्रचार से जो समय उसे बचता, उसे वह या तो सार्वजनिक मुकद्दमों की सुनवाई में, या निजी अध्ययन, प्रार्थना और पाठशालाओं के दौरे में लगाता था। अपने निरन्तर सिद्धान्त-शिक्षण के साथ वह उचित और विवेकपूर्ण ताड़ना भी जोड़ता था, जो किसी के प्रति इतनी कठोर न थी जितनी उनके प्रति, जो धन की बहुतायत और सम्पन्न दशा के कारण समझते थे कि वे जो चाहें कर सकते हैं। और निस्सन्देह उसने किसी भी प्रकार के मनुष्य को नहीं छोड़ा, वरन् धनी और निर्धन सब लोगों के प्रति निष्पक्ष रहा; यह आज के अनेक लोगों के लिए बड़ी लज्जा की बात है। क्योंकि हम देखते हैं कि बहुत-से लोग बड़े और धनी मनुष्यों को प्रसन्न करने में इतने लगे रहते हैं कि इस बीच वे उन तुच्छ समझे जानेवाले निर्धन लोगों की कुछ भी परवाह नहीं करते, जिन्हें मसीह ने भी उतने ही मोल से मोल लिया है जितने से दूसरों को।"
"परन्तु अब हम फिर अपनी बात मास्टर हूपर की ओर लौटाएँगे, जिसका सारा जीवन अन्ततः ऐसा था कि कलीसिया और सब कलीसियाई जनों के लिए वह ज्योति और आदर्श था, और अन्य लोगों के लिए एक स्थायी शिक्षा और उपदेश। अन्त में, वह कैसा सद्गुणी और भला अध्यक्ष था, यह तुम इसी से भली-भाँति समझ और जान सकते हो कि जैसे उससे बैर रखनेवाले केवल बुरे लोग ही थे, वैसे ही उनमें से जो सबसे बुरे थे, वे भी उसके जीवन में एक बिन्दु भर भी दोष न निकाल सके।"
"अब तक मैंने कलीसिया के सार्वजनिक कार्यों में उसके बाहरी आचरण और व्यवहार का वर्णन किया है; और निश्चय ही घर में भी उसमें एक योग्य अध्यक्ष के जीवन का उदाहरण कुछ कम दिखाई नहीं दिया। क्योंकि यद्यपि उसने अपनी चिन्ता का अधिकतर भाग मसीह की सार्वजनिक भेड़-शाला और मण्डली के लिये लगा दिया, जिसके लिये उसने अपना लहू भी बहाया; तथापि अपनी सन्तान को विद्या और सुशीलता में पालने-पोसने की व्यवस्था में भी उससे कोई कमी न रही; यहाँ तक कि तुम यह भेद नहीं कर सकते थे कि घर में पिता-समान व्यवहार के लिये वह अधिक प्रशंसा का पात्र था या बाहर अध्यक्ष-समान कार्यों के लिये। क्योंकि वह सर्वत्र एक ही सिद्धान्त और खरेपन के साथ एक ही धर्म पर स्थिर रहा। इसलिये यदि तुम अध्यक्ष के भवन में प्रवेश करते, तो ऐसा समझते कि तुम किसी कलीसिया या मन्दिर में आ गए हो। उस भवन के हर कोने में सदाचार की, भले उदाहरण की, खरे चाल-चलन की और पवित्रशास्त्र के पाठ की कुछ न कुछ सुगन्ध थी। उसके घर में दरबारी ऐश-आराम या आलस्य कहीं दिखाई न देता था; कोई आडम्बर नहीं, कोई अशोभनीय बात नहीं, कोई शपथ सुनाई न देती थी!
"जहाँ तक उसके दोनों धर्माध्यक्षीय क्षेत्रों की आय का सम्बन्ध है, यद्यपि जिस रीति से वह सम्भाली जाती थी, उसमें वह बहुत अधिक न थी, तथापि यदि उसमें से कुछ बचता भी, तो वह उसे अपनी थैली में न रखता, परन्तु अतिथि-सत्कार में लगा देता था। जहाँ तक मुझे स्मरण है, मैं दो बार वुस्टर में उसके घर गया, जहाँ उसके सामान्य भोजन-कक्ष में मैंने एक मेज़ देखी, जिस पर भोजन की भरपूर सामग्री सजी थी और जिसके चारों ओर भिखारी और दरिद्र लोग बैठे थे। जब मैंने उसके सेवकों से पूछा कि इसका क्या अर्थ है, तो उन्होंने मुझे बताया कि उनके स्वामी और प्रभु की यह रीति है कि प्रतिदिन उस नगर के कुछ निर्धन लोगों को बारी-बारी से भोजन पर बुलाते हैं, जिन्हें चार-चार की टोली में भरपेट और पौष्टिक भोजन परोसा जाता है। और जब वे परोसे जा चुके होते (पहले उसके या उसके प्रतिनिधियों के द्वारा प्रभु की प्रार्थना, विश्वास के अनुच्छेदों और दस आज्ञाओं के विषय में उनकी परीक्षा ली जा चुकी होती), तब वह स्वयं भोजन करने बैठता था, उससे पहले नहीं*
"इसी रीति और प्रकार से मास्टर हूपर ने दो वर्ष से भी अधिक समय तक एक अत्यन्त सावधान और जागरूक पासबान के पद का निर्वाह किया, जब तक कि राजा एडवर्ड के समय में धर्म की दशा सुरक्षित रूप से फलती-फूलती और स्थापित रही। और परमेश्वर करे कि अन्य सब अध्यक्ष भी अपने कार्य में ऐसी ही लगन, चिन्ता और नियम-पालन का व्यवहार करें।"
III. हूपर की अत्यन्त उपयोगी अध्यक्षीय सेवाएँ सन् 1553 में रानी मरियम के सिंहासन पर बैठने के साथ पूरी तरह समाप्त हो गईं। हम देख सकते हैं कि वे दो वर्ष से अधिक न चलीं। शायद यह कहना अनुचित न होगा कि इंग्लैंड की कलीसिया के किसी भी अध्यक्ष ने दो वर्ष में अपनी कलीसिया और धर्मप्रान्त के लिए इतना कुछ नहीं किया, और इतने थोड़े समय में लोगों के मनों पर ऐसी गहरी छाप नहीं छोड़ी जैसी जॉन हूपर ने।
एडवर्ड छठा जुलाई 1553 में चल बसा; और ज्यों ही उसकी पोप-भक्त बहन मरियम भली-भाँति अपने सिंहासन पर बैठी, जॉन हूपर के संकट आरम्भ हो गए। सताव की तलवार एक बार म्यान से निकल जाने पर, ग्लॉस्टर के प्रसिद्ध प्रोटेस्टेंट अध्यक्ष पर प्रहार करने वाले लगभग पहले व्यक्ति वही थे। वे बोनर और गार्डिनर दोनों को व्यक्तिगत रूप से अप्रिय थे, और दोनों से उनकी टक्कर हो चुकी थी। वे सारे इंग्लैंड में धर्म-सुधार के सबसे निडर योद्धाओं में से एक और पोप-मत के सबसे पक्के विरोधियों के रूप में प्रसिद्ध थे। उनके मित्रों ने उन्हें चेताया कि संकट सिर पर है, परन्तु उन्होंने शान्त भाव से उत्तर दिया, "एक बार मैं भागा था और अपने पाँवों का सहारा लिया था। परन्तु अब, क्योंकि मैं इस स्थान और बुलाहट के लिए बुलाया गया हूँ, मुझे पूरा निश्चय है कि मैं ठहरा रहूँ और अपनी भेड़ों के साथ जीऊँ और मरूँ।" मण्डराता हुआ तूफ़ान शीघ्र ही फट पड़ा। 29 अगस्त को वे रिचमण्ड में रानी मरियम की सभा के सामने उपस्थित हुए; और 1 सितम्बर को उन्हें बन्दी बनाकर फ्लीट कारागार भेज दिया गया। उस दिन से 9 फरवरी, 1555 तक, सत्रह महीनों से भी अधिक समय तक, वे कड़े कारावास में रखे गए। उस दिन अन्त में मृत्यु ने उन्हें छुड़ा दिया, और वह उत्तम प्रोटेस्टेंट बन्दी स्वतंत्र हो गया।
हूपर के जीवन के इन दुःखद सत्रह महीनों का इतिहास इतना लम्बा है कि उसके लिए मेरे पास जितना स्थान है, उससे कहीं अधिक चाहिए। जो इसका विवरण जानना चाहें, उन्हें "फ़ॉक्स की शहीद-कथा" पढ़नी चाहिए। किस प्रकार ग्लॉस्टर और वॉर्सेस्टर के उस भले अध्यक्ष को लगभग डेढ़ वर्ष तक एक गन्दे कारागार में निर्दयता से बन्द रखा गया, जिससे उनके स्वास्थ्य को भारी हानि पहुँची, किस प्रकार गार्डिनर, बोनर, डे, हीथ और उनके साथियों जैसे न्यायियों के सामने तीन बार उनकी जाँच हुई, किस प्रकार बारी-बारी से उनका अपमान किया गया, उन्हें धमकाया गया, उन्हें बुरा-भला कहा गया, और उनसे विनती की गई कि वे अपना मत त्याग दें, किस प्रकार उन्होंने वीरता से अपने प्रोटेस्टेंट सिद्धान्तों पर दृढ़ता रखी और मसीह के सत्य का एक बाल भर भी छोड़ने से इन्कार किया, और अन्त में किस प्रकार याजकों के विवाह करने के अधिकार को मानने और पदार्थान्तरण के सिद्धान्त को अस्वीकार करने के कारण उन्हें दोषी ठहराया गया, ये सब बातें उस प्राचीन शहीद-लेखक ने पूरी तरह लिख रखी हैं। परन्तु वे इतनी लम्बी हैं कि पाठक के हाथ में जो इस प्रकार का जीवन-चरित्र विषयक निबन्ध है, उसमें उनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
अन्त आखिरकार आ पहुँचा। सोमवार, 4 फरवरी, 1555 को न्यूगेट कारागार के गिरजाघर में बिशप बोनर ने हूपर का विधिवत् पदच्युतीकरण किया और उसे सांसारिक सत्ता की निर्दय दया के हवाले कर दिया। उसी दिन सन्ध्या को उसे यह समाचार मिला, जिससे उसे बड़ा आनन्द हुआ, कि उसे ग्लॉस्टर भेजा जाएगा और उसके अपने ही गिरजाघरवाले नगर में सबके सामने जलाया जाएगा। मंगलवार, 5 तारीख को भोर के चार बजे छः पहरेदारों की निगरानी में उसने घोड़े पर अपनी यात्रा आरम्भ की। गुरुवार, 7 फरवरी की दोपहर के बाद वह कुशलतापूर्वक ग्लॉस्टर पहुँचा; सिरेन्सेस्टर मार्ग पर उससे भेंट करने आई लोगों की एक बड़ी भीड़ के आँसुओं और विलाप के बीच।
ग्लॉस्टर में उसे सेंट निकोलस के गिरजाघर के सामने इन्ग्राम नामक एक व्यक्ति के घर में ठहराया गया। वह घर अब भी खड़ा है, और देखने में बहुत बदला हुआ नहीं लगता। नगर के शेरिफ, जेनकिन्स और बॉन्ड नामक दो व्यक्ति, उसे नॉर्थगेट कारागार में डालना चाहते थे, पर लन्दन से उसे लानेवाले पहरेदारों की गम्भीर विनती पर उन्होंने यह इरादा छोड़ दिया। उस सन्त बन्दी के पहुँचने और उसके प्राणदण्ड के बीच केवल एक ही दिन बीतने दिया गया। इस थोड़े से अन्तराल का अधिकांश भाग उसने प्रार्थना में बिताया। फिर भी कुछ भेंटें हुईं, जो कुछ कम रोचक नहीं हैं, और जिनका विवरण फ़ॉक्स ने सुरक्षित रखा है।
सर एंथनी किंग्सटन, जिसे उसने कभी उसके पापों को डाँटकर अप्रसन्न किया था, उससे भेंट करने आया और बड़े स्नेह और बहुत आँसुओं के साथ उससे विनती की कि वह अपनी प्राण-रक्षा का विचार करे और अपना मत त्याग दे। उसने कहा, "विचार कीजिए कि जीवन मधुर है और मृत्यु कड़वी। आगे जीवित रहकर आप भलाई कर सकते हैं।" इस पर मसीह के उस उदार योद्धा ने यह सदा स्मरणीय उत्तर दिया: "आनेवाला जीवन अधिक मधुर है, और आनेवाली मृत्यु अधिक कड़वी।" उसे अटल देखकर किंग्सटन कड़वे आँसू बहाता हुआ उसे छोड़ गया, यह कहते हुए, "मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैंने आपको कभी जाना, क्योंकि परमेश्वर ने आपको ठहराया कि आप मुझे उसकी सन्तान होने के लिए बुलाएँ। आपकी भली शिक्षा से, जब मैं पहले व्यभिचारी और परस्त्रीगामी था, परमेश्वर ने मुझे उससे घृणा करना और उसे त्यागना सिखाया है।" हूपर ने बाद में कहा कि इस भेंट ने उससे उतने आँसू निकलवाए जितने उसने अपने सत्रह महीने के कारावास भर में नहीं बहाए थे।
अन्त में, सन्ध्या ढलते समय, महापौर श्री लवडे, ग्लॉस्टर के सभासद और शेरिफ उसके निवास पर आए और शिष्टाचार से उसका अभिवादन किया। उसने उनसे प्रसन्नतापूर्वक बातें कीं, उनकी कृपा के लिए धन्यवाद दिया, यह निवेदन किया कि उसके जलाए जाने के समय आग तेज़ी से जले, और यह घोषणा की कि वह रानी का सच्चा और आज्ञाकारी प्रजाजन होकर मरेगा, परन्तु "रोम के बिशप के उस दुष्ट पोप-सम्बन्धी धर्म को स्वीकार करने के बजाय अपना प्राण देने को तैयार है।"
ये भेंटें समाप्त होने पर उस सन्त बिशप ने अन्तिम शत्रु, अर्थात् मृत्यु, से जूझने की तैयारी आरम्भ की। वह बहुत जल्दी बिछौने पर चला गया, यह कहकर कि उसे बहुत सी बातें स्मरण करनी हैं, और एक नींद गहरी सोया। रात का शेष भाग उसने प्रार्थना में बिताया। उठने के बाद उसने कहा कि किसी को भी कोठरी में आने न दिया जाए, और प्राणदण्ड के समय तक उसे अकेला छोड़ दिया जाए। उस भयावह घड़ी में उसके मनन और विचार क्या थे, यह केवल परमेश्वर ही जानता है। परम्परा कहती है कि उसने अपनी कोठरी की दीवार पर कोयले से यह कविता लिखी:—
"धीरज से सन्तुष्ट रह,
मसीह के साथ दुःख का प्याला उठा: वह तुझे फल दे सकता है और देगा, हज़ार गुना आनन्द के साथ फिर से। कोई बात तेरे हृदय को हताश न करे: अपनी नाव को पानी में उतार, पाल चढ़ा,
किनारे से चल पड़; और निश्चित जान कि तू उस बन्दरगाह पर पहुँचेगा, जो सदा बना रहेगा।
"मृत्यु से मत डर, बन्धनों की चिन्ता न कर, केवल परमेश्वर पर अपना पूरा भरोसा रख; क्योंकि वह उनके हाथों से तेरे लहू का लेखा लेगा,
और तू जानता है कि एक बार तो तुझे मरना ही है, केवल इसी कारण यदि तू अपना जीवन दे दे,
तो मृत्यु मृत्यु नहीं, वरन् सदा जीवित रहने का मार्ग है।
निराश मत हो: किसी सांसारिक अत्याचारी से मत डर; तेरा दिशासूचक, जो परमेश्वर का वचन है, तुझे ले चलेगा, और पवन अनुकूल है।"
ये पंक्तियाँ 1559 में धर्म-सुधारकों की विविध रचनाओं के एक संग्रह में छपी थीं। मैं इन्हें जैसी हैं वैसी ही प्रस्तुत करता हूँ।
हूपर के जीवन का अन्तिम दृश्य अब आ पहुँचा था। जॉन फ़ॉक्स ने उसका वर्णन इतने सुन्दर और सरल ढंग से किया है कि मैं समझता हूँ उसे थोड़ी-बहुत काट-छाँट के साथ पूरा-का-पूरा वैसा ही दे दूँ जैसा उस योग्य पुराने शहीद-कथाकार ने लिखा था। वह कहता है, "शनिवार, 9 फरवरी की भोर में लगभग आठ बजे लॉर्ड चैन्डोस सर जॉन ब्रिजेज़ पुरुषों के एक बड़े दल के साथ आए, साथ में सर एंथनी किंग्सटन, सर एडमंड ब्रिजेज़ और प्राणदण्ड कराने के लिए नियुक्त अन्य आयुक्त थे। नौ बजे श्री हूपर से कहा गया कि वह तैयार हो जाए, क्योंकि समय निकट आ गया था। तुरन्त शेरिफ़ उसे उसकी कोठरी से नीचे ले आए, जिनके साथ बर्छे और हथियार लिये लोग थे। जब उसने हथियारों की भीड़ देखी, तो शेरिफ़ों से यों कहा: 'श्रीमान् शेरिफ़ो,' उसने कहा, 'मैं राजद्रोही नहीं हूँ, और न आपको मुझे उस स्थान तक ले जाने के लिए ऐसा आडम्बर करने की आवश्यकता थी जहाँ मुझे दुःख सहना है; क्योंकि यदि आप मुझसे कहते, तो मैं अकेला ही खम्भे तक चला जाता, और आप में से किसी को कष्ट न देता।' इसके बाद, इकट्ठी हुई लोगों की भीड़ को देखकर, जो अनुमान से सात हज़ार के लगभग थी (क्योंकि वह बाज़ार का दिन था, और बहुत से लोग यह देखने भी आए थे कि वह मृत्यु का सामना कैसे करता है), उसने अपने आसपास के लोगों से कहा, 'हाय! ये लोग क्यों इकट्ठे होकर आए हैं? सम्भव है वे समझते हों कि अब भी मुझसे कुछ सुनेंगे, जैसे पहले सुनते आए हैं; पर हाय! मुझे बोलने की मनाही है। तो भी मेरी मृत्यु का कारण उन्हें भली-भाँति मालूम है। जब मुझे यहाँ उनका पासबान ठहराया गया था, तब मैंने उन्हें परमेश्वर के वचन में से सच्ची और खरी शिक्षा सुनाई। क्योंकि मैं अब उसी को झूठी शिक्षा और असत्य कहकर स्वीकार नहीं करूँगा, इसलिए मेरे लिए इस प्रकार की मृत्यु ठहराई गई है।'
"इस प्रकार वह दोनों शेरिफों के बीच आगे बढ़ा (मानो वध के स्थान की ओर ले जाया जानेवाला मेमना हो), अपने मेज़बान का चोग़ा पहने, सिर पर टोपी रखे और सहारे के लिए हाथ में लाठी लिए; क्योंकि बन्दीगृह में उसे जो सायटिका का रोग लग गया था, उसकी पीड़ा के कारण वह कुछ लंगड़ाकर चलता था। पूरे मार्ग में उसे बोलने की कड़ी मनाही थी, इसलिए उसे एक बार भी मुँह खोलते नहीं देखा गया; परन्तु मार्ग भर लोगों को देखकर, जो उसके लिए बहुत शोक मना रहे थे, वह कभी-कभी अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाता था, और जिन्हें वह जानता था उनकी ओर बड़े प्रसन्न भाव से देखता था; और उनके बीच रहने के पूरे समय में कभी ऐसा नहीं देखा गया था कि उसका चेहरा इतना प्रफुल्ल और दमकता हुआ रहा हो जितना उस समय था। जब वह उस ठहराए हुए स्थान पर पहुँचा जहाँ उसे मरना था, तब उसने मुस्कुराते हुए खम्भे और अपने लिए की गई तैयारियों को देखा, जो पुरोहितों के महाविद्यालय के सामने उस बड़े एल्म वृक्ष के पास था जहाँ वह प्रचार किया करता था। आस-पास का सारा स्थान, घर और वृक्षों की डालियाँ लोगों से भरी हुई थीं; और महाविद्यालय के फाटक के ऊपर की कोठरी में महाविद्यालय के पुरोहित खड़े थे।* तब वह (क्योंकि उसे लोगों से बोलने की अनुमति नहीं दी गई) प्रार्थना के लिए घुटनों के बल बैठ गया, और एक जाने-पहचाने मनुष्य को छः-सात बार संकेत से बुलाया कि वह उस प्रार्थना को सुने और आगे चलकर उसका वृत्तान्त बताए (उसके कन्धों और छाती पर आँसू बरस रहे थे); उसने ध्यान लगाकर उसे सुना; वह प्रार्थना उसने पूरे प्रेरितों के विश्वास-वचन पर की, और आधे घण्टे तक उसमें लगा रहा। अब जब वह अपनी प्रार्थना में कुछ आगे बढ़ चुका था, तब एक डिब्बा लाकर उसके सामने एक तिपाई पर रखा गया, जिसमें रानी की ओर से उसकी क्षमा थी (या कम से कम उसे क्षमा बताया गया था), यदि वह फिर जाए। उसे देखते ही वह चिल्लाया, 'यदि तुम मेरी आत्मा से प्रेम रखते हो, तो इसे दूर ले जाओ! यदि तुम मेरी आत्मा से प्रेम रखते हो, तो इसे दूर ले जाओ!' डिब्बा हटा लिए जाने पर लॉर्ड चैंडोस ने कहा, 'जब कोई उपाय नहीं है, तो इसका काम जल्दी तमाम करो!' मास्टर हूपर ने कहा, 'भले महोदय, मुझे भरोसा है कि आप मुझे अपनी प्रार्थनाएँ पूरी करने की अनुमति देंगे।'
"तब लॉर्ड चैंडोस ने सर एडमंड ब्रिजेस के पुत्र से कहा, जिसने पहले उसके अनुरोध पर मास्टर हूपर की प्रार्थना ध्यान से सुनी थी: 'एडमंड, ध्यान रखना कि वह प्रार्थना के सिवा और कुछ न करे; यदि वह कुछ और करे तो मुझे बताना, और मैं तुरन्त उसका काम तमाम कर दूँगा।' जब यह बातचीत हो रही थी, तब एक-दो लोग बिना बुलाए आगे आ गए, जिन्होंने उसे ये शब्द कहते सुना: —
"'हे प्रभु,' उसने कहा, 'मैं नरक हूँ, पर तू स्वर्ग है; मैं पाप का कीचड़ और गन्दा नाला हूँ, पर तू अनुग्रहकारी परमेश्वर और दयालु छुड़ानेवाला है। इसलिए अपनी बड़ी दया के अनुसार और अपनी अनमोल भलाई के अनुसार मुझ अत्यन्त दीन और अभागे अपराधी पर दया कर। तू स्वर्ग पर चढ़ गया है; मुझ नरक को ग्रहण कर कि मैं तेरे आनन्द का भागी बनूँ, जहाँ तू अपने पिता के साथ बराबर महिमा में विराजमान है। क्योंकि हे प्रभु, तू भली-भाँति जानता है कि मैं यहाँ किसलिए दुःख उठाने आया हूँ, और दुष्ट लोग तेरे इस दीन दास को क्यों सताते हैं: इसलिए नहीं कि मैंने तेरे विरुद्ध पाप और अपराध किए हैं, परन्तु इसलिए कि मैं उनके दुष्ट कामों को स्वीकार नहीं करता, जिनसे तेरे लहू का अपमान होता है और तेरे सत्य के उस ज्ञान का इनकार होता है जो तूने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मुझे सिखाना चाहा; और उसे मैंने, जैसा एक तुच्छ मनुष्य कर सकता था, बुलाए जाने पर पूरे परिश्रम से तेरी महिमा के लिए प्रकट किया है। और हे मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर, तू भली-भाँति देखता है कि तेरे इस प्राणी के लिए कैसी भयानक पीड़ाएँ और कठोर यातनाएँ तैयार की गई हैं; ऐसी, हे प्रभु, कि तेरे बल के बिना कोई उन्हें सह नहीं सकता, न धीरज से पार कर सकता है। परन्तु जो बातें मनुष्य से नहीं हो सकतीं, वे तुझसे हो सकती हैं। इसलिए अपनी भलाई से मुझे ऐसा बल दे कि आग में मैं धीरज की मर्यादा न तोड़ूँ; अथवा पीड़ाओं की भयानकता को घटा दे, जैसा तेरी महिमा के लिए सबसे उचित लगे।'
"जैसे ही मेयर ने उन मनुष्यों को देखा जो ऊपर के वचनों का वृत्तान्त बता रहे थे, उन्हें वहाँ से हटा देने की आज्ञा दी गई, और उन्हें और कुछ सुनने नहीं दिया गया। प्रार्थना पूरी होने पर उसने खम्भे के लिए स्वयं को तैयार किया, अपने मेज़बान का चोग़ा उतारा और शेरिफों को सौंप दिया, और उनसे कहा कि उसे उसके स्वामी को लौटा दिया जाए; फिर अपने बाकी वस्त्र भी उतार दिए, केवल अंगरखा और पायजामा रहने दिया, जिनमें वह जलना चाहता था। परन्तु शेरिफों ने इसकी अनुमति न दी (ऐसा उनका लालच था),* और वह भला मनुष्य उनकी इच्छा के आगे बड़ी आज्ञाकारिता से झुक गया; और उसका अंगरखा, पायजामा और कमरी उतार ली गई। तब केवल कुरते में, और लोगों से यह कहकर कि वे उसके साथ प्रभु की प्रार्थना बोलें और उसके लिए प्रार्थना करें (जिन्होंने उसकी पीड़ा के पूरे समय आँसुओं के साथ ऐसा ही किया), वह खम्भे के पास चढ़ गया। अब जब वह खम्भे पर था, तब उसे खम्भे से बाँधने के लिए तीन लोहे के बन्धन लाए गए: एक गले के लिए, दूसरा कमर के लिए और तीसरा टाँगों के लिए। परन्तु उसने उन्हें अस्वीकार करते हुए कहा, 'तुम्हें इस प्रकार अपने आपको कष्ट देने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मुझे विश्वास है कि परमेश्वर मुझे आग की चरम पीड़ा सहने के लिए बिना बन्धन के भी पर्याप्त बल देगा; फिर भी, शरीर की दुर्बलता और निर्बलता के सन्देह के कारण, परन्तु परमेश्वर के बल पर पक्का भरोसा रखते हुए, मैं राज़ी हूँ कि तुम जैसा उचित समझो वैसा करो।' तब कमर के लिए तैयार किया गया लोहे का घेरा लाया गया, और जब उन्होंने उसके गले और टाँगों को दूसरे दो लोहे के घेरों से बाँधना चाहा, तो उसने उन्हें पूरी तरह अस्वीकार कर दिया और एक भी न लेने दिया, यह कहते हुए, 'मुझे पूरा निश्चय है कि मैं तुम्हें कष्ट नहीं दूँगा।'
"इस प्रकार तैयार होकर उसने लोगों की ओर दृष्टि की, जिन्हें वह भली भाँति देख सकता था (क्योंकि वह लम्बा भी था और एक ऊँचे तिपाई पर भी खड़ा था), और अपने चारों ओर देखा: और हर कोने में रोते और शोकित लोगों के सिवाय कुछ दिखाई न देता था। तब उसने अपनी आँखें और हाथ स्वर्ग की ओर उठाकर मन ही मन प्रार्थना की। थोड़ी देर में वह जो आग लगाने के लिये ठहराया गया था उसके पास आया, और उससे क्षमा माँगी। उसने उससे पूछा कि मैं तुझे क्यों क्षमा करूँ; और कहा कि मैं तो नहीं जानता कि तूने मेरे विरुद्ध कभी कोई अपराध किया है। उस मनुष्य ने कहा, 'हे महाशय, मुझे आग लगाने के लिये ठहराया गया है।' मिस्टर हूपर ने कहा, 'इसमें तो तू मुझे कुछ भी अप्रसन्न नहीं करता: परमेश्वर तेरे पापों को क्षमा करे, और मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू अपना काम कर।' तब सरकंडे ऊपर फेंके गए, और उसने उनके दो गट्ठे अपने ही हाथों में लिये, उन्हें गले लगाया, उन्हें चूमा, और एक-एक बाँह के नीचे एक-एक गट्ठा रख लिया, और हाथ से दिखाया कि शेष को कैसे रखा जाए, और उस स्थान की ओर संकेत किया जहाँ किसी चीज़ की कमी थी।
"शीघ्र ही आज्ञा दी गई कि आग लगाई जाए, और वैसा ही किया गया। परन्तु क्योंकि उसमें दो घोड़ों की पीठ पर जितने हरे लट्ठे लादे जा सकते हैं उससे कम नहीं डाले गए थे, इसलिये वह तुरन्त न सुलगी, और लट्ठों पर के सरकंडों को पकड़ने में भी कुछ देर लगी। अन्त में वह उसके चारों ओर जलने लगी, परन्तु उस स्थान पर हवा पूरे बल से चल रही थी (वह बादलों से घिरी और ठण्डी सुबह थी), इसलिये उसने लपट को उससे दूर उड़ा दिया, और वह एक प्रकार से आग से बस छुआ भर गया।
"कुछ देर बाद थोड़े-से सूखे लट्ठे लाए गए, और लट्ठों से नई आग जलाई गई (क्योंकि अब और सरकंडे न थे), और वह उसके निचले अंगों को जलाने लगी, परन्तु हवा के कारण ऊपर उसका बल थोड़ा ही था, केवल इतना कि उसके बाल जल गए और उसकी खाल कुछ झुलस गई। उस आग के समय भी, जैसे पहली लपट के समय, वह कोमलता से और बहुत ऊँचे स्वर में नहीं (वरन् ऐसे जैसे कोई बिना पीड़ा के हो) प्रार्थना करता रहा, 'हे यीशु, दाऊद के पुत्र, मुझ पर दया कर, और मेरी आत्मा को ग्रहण कर!' जब दूसरी आग बुझ चुकी, तो उसने अपने हाथों से अपनी दोनों आँखें पोंछीं, और लोगों की ओर देखकर मध्यम ऊँचे स्वर में कहा, 'परमेश्वर के प्रेम के लिये, हे भले लोगो, मुझे और आग दो!' और इस सारे समय उसके निचले अंग जलते रहे, क्योंकि लट्ठे इतने थोड़े थे कि लपट उसके ऊपरी अंगों पर प्रबल रूप से न जलती थी।
"कुछ देर बाद तीसरी आग जलाई गई, जो पहली दोनों से अधिक प्रचण्ड थी; और तब बारूद की थैलियाँ फट गईं, जिनसे उसे थोड़ा ही लाभ हुआ, क्योंकि वे ऐसी जगह रखी थीं और हवा का ऐसा बल था। उस आग में उसने कुछ ऊँचे स्वर में प्रार्थना की, 'हे प्रभु यीशु, मुझ पर दया कर! हे प्रभु यीशु, मुझ पर दया कर! हे प्रभु यीशु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर!' और ये ही अन्तिम शब्द थे जो उसके मुँह से सुने गए। परन्तु जब उसका मुँह काला पड़ गया और जीभ ऐसी सूज गई कि वह बोल न सका, तब भी उसके होंठ तब तक हिलते रहे जब तक वे सिकुड़कर मसूड़ों तक न पहुँच गए; और वह अपने हाथों से अपनी छाती पीटता रहा, यहाँ तक कि उसकी एक बाँह गिर पड़ी, और तब वह दूसरी से पीटता रहा, उस समय चर्बी, पानी और लहू उसकी उँगलियों के सिरों से टपक रहे थे, जब तक कि आग के फिर भड़कने से उसकी शक्ति जाती न रही, और छाती पर के लोहे से पीटते-पीटते उसका हाथ उसी से चिपक गया। तब तुरन्त आगे की ओर झुककर उसने अपनी आत्मा सौंप दी।
"इस प्रकार वह तीन चौथाई घण्टे या उससे अधिक आग में रहा। मेम्ने के समान उसने धीरज से उसकी प्रचण्डता सही, न आगे हिला, न पीछे, न किसी ओर; परन्तु अपने निचले अंग जल जाने और अन्तड़ियाँ निकल पड़ने पर भी वह ऐसी शान्ति से मरा जैसे कोई बालक अपने बिछौने में, और अब वह धन्य शहीद के रूप में स्वर्ग के उन आनन्दों में राज्य करता है जो जगत की उत्पत्ति से पहले मसीह में विश्वास रखनेवालों के लिये तैयार किए गए थे, जिसकी दृढ़ता के लिये सब मसीहियों पर परमेश्वर की स्तुति करना कर्तव्य है।" * (फॉक्स की "प्रेरितों के काम और स्मारक" में उसी स्थान पर।)
एक बहुत बड़े बलूत के खम्भे का ठूँठ, जो आग से काला और जला हुआ था, कुछ वर्ष पहले ठीक उसी स्थान पर खोदकर निकाला गया जहाँ हूपर जलाया गया था। बहुत-से लोग मानते हैं कि यह उस खम्भे का निचला सिरा है जिससे शहीद को उसकी अग्निमय मृत्यु के समय बाँधा गया था। निश्चय ही इस बात का कोई पक्का प्रमाण नहीं दिया जा सकता कि यह अनुमान सही है; परन्तु इस विचार में कोई असम्भावना या असम्भवता नहीं है। भली-भाँति सूखी हुई, जली हुई बलूत की लकड़ी का टुकड़ा भूमि में तीन शताब्दियों तक बिना सड़े सरलता से रह सकता है। मैंने इस ठूँठ को अपनी आँखों से ग्लूसेस्टर के निकट एक घर में काँच की पेटी के नीचे देखा, जहाँ वह यत्न से सुरक्षित रखा गया है।
मैं ग्लूसेस्टर के शहीद की कथा यहीं छोड़ता हूँ, क्योंकि उसके जीवन को पालने से लेकर उसकी अग्निमय कब्र तक का वृत्तान्त मैं कह चुका हूँ। वह जैसे बहुत समय से जीता आया था वैसे ही अपने झण्डे के प्रति सच्चा रहकर मरा; और उसकी मृत्यु हर प्रकार से उसके जीवन के योग्य थी।
मैं उस भयानक क्रूरता के विषय में कुछ कह सकता हूँ जिससे उसे और मरियम के राज्य में उसके साथी दुःख उठानेवालों को मार डाला गया। इसका कोई बहाना नहीं हो सकता। निःसन्देह उस समय का वातावरण कठोर और रूखा था। मृत्युदण्ड भयंकर रूप से सामान्य था। कथित झूठी शिक्षा के कारण लोगों को मार डालना दुर्भाग्य से कोई अनोखी बात न थी। परन्तु ये एक बड़े अपराध के लिये दुर्बल बचाव हैं। अंग्रेज़ शहीदों का लहू रोम की कलीसिया पर अमिट कलंक है। वह न्यायिक हत्या थी जिसकी कभी कोई सफ़ाई नहीं दी जा सकती।
मैं उस महिमामय धीरज और साहस के विषय में कुछ कह सकता हूँ जो हूपर ने अपने सारे कष्टों में दिखाया। जब तक संसार रहेगा, वह इस बात का आदर्श रहेगा कि मसीह अपने लोगों के लिये आवश्यकता की घड़ी में क्या कर सकता है। हम कभी यह न भूलें कि जिसने हूपर को सामर्थ्य दी वह कभी बदलता नहीं। वह "कल और आज और युगानुयुग एकसा है।"
मैं, और सबसे बढ़कर, इस बात के विषय में भी कुछ कह सकता हूँ कि हूपर और उसके साथियों को शहीद बनाकर रोम की कलीसिया ने कितनी घोर नीति-विरुद्ध भूल की। मेरा विश्वास है कि पोप-तन्त्र ने अपनी इतनी हानि कभी नहीं की जितनी हमारे धर्म-सुधारकों को जलाकर की। उनका लहू कलीसिया का बीज था। अपनी मृत्यु से उन्होंने जितनी भलाई की, वह उस भलाई से अधिक थी जो उन्होंने अपने सारे जीवन में की। उनके शहीद होने ने हज़ारों को सोचने पर विवश किया जिन तक उनके उपदेश कभी नहीं पहुँचे थे। हम निश्चय कर सकते हैं कि असंख्य लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जो कलीसिया ऐसा घृणित और क्रूर व्यवहार कर सकती है जैसा रोम ने किया, वह कभी परमेश्वर की एकमात्र सच्ची कलीसिया नहीं हो सकती; और जो पक्ष ऐसे धीरजवन्त और अटल दुःख उठानेवाले उत्पन्न कर सके, वह अवश्य ही मसीह और सत्य का पक्ष होगा।
परन्तु इन बातों को, चाहे वे कितनी ही रोचक क्यों न हों, मैं यहीं छोड़ता हूँ। मैं केवल यह आशा करता हूँ कि ये विचार के ऐसे बीज ठहरें जो बहुत दिनों के बाद मनुष्यों के मनों में फल लाएँ।
IV. अन्तिम बात जिसे मैं अपने पाठकों के सामने रखना चाहता हूँ, वह ऐसी है जिसे मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझता हूँ। मैंने हूपर के जीवन और मृत्यु के विषय में कुछ जानकारी दी है। अब मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे थोड़ी देर और मेरी ओर ध्यान दें, जब मैं हूपर के विचारों के विषय में कुछ कहूँ। मैंने आपको दिखाया कि वह कैसे जिया और कैसे मरा; अब मैं आपको ठीक-ठीक दिखाऊँ कि वह क्या सोचता था, क्या सिखाता था और किस बात का प्रचार करता था। मैंने उस मनुष्य को आपके सामने रखा; अब मैं उसके सिद्धान्त को आपके सामने रखूँ।
यदि मैं अपने पाठकों को इस धुँधली धारणा में छोड़ दूँ कि हूपर एक भला मनुष्य, एक उत्साही मनुष्य और एक सच्चे मन का मनुष्य था, पर उन्हें इससे अधिक कुछ न बताऊँ, तो मैं समझूँगा कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया। मैं चाहता हूँ कि लोग समझें कि ग्लॉस्टर के शहीद अध्यक्ष के धर्मशास्त्रीय विचार क्या थे। मैं चाहता हूँ कि लोग स्पष्ट रूप से देखें कि अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों द्वारा किस प्रकार का सिद्धान्त सिखाया जाता था। हूपर ने कैसी बातें कहीं, कैसी बातों का प्रचार किया, और क्या-क्या छपवाया और लिखा? तीन सौ वर्ष पहले कलीसिया के एक सदस्य का धर्म किस प्रकार का था?
इन प्रश्नों का उत्तर सौभाग्य से ढूँढ़ना कठिन नहीं है। पार्कर सोसाइटी द्वारा प्रकाशित हूपर की रचनाओं के दो खण्ड इस बात को दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट कर देते हैं। वहाँ लोग धर्म-सुधार के समय के एक प्रमुख अध्यक्ष के धर्मशास्त्रीय विचार असंदिग्ध भाषा में पढ़ सकते हैं। इन दोनों खण्डों के दो दस्तावेज़ों में से मैं कुछ उचित नमूने चुनूँगा।
जिस पहले दस्तावेज़ से मैं उद्धरण दूँगा, उसका शीर्षक है: "मसीही धर्म सम्बन्धी अनुच्छेद, जो मसीह में आदरणीय पिता जॉन हूपर, ग्लॉस्टर के अध्यक्ष ने ग्लॉस्टर धर्मप्रदेश के सब डीनों, पादरियों, प्रेबेन्डरियों, विकारों, क्यूरेटों और अन्य कलीसियाई सेवकों को दिए, कि वे परमेश्वर के वचन के सिद्धान्त के विषय में, और साथ ही परमेश्वर के वचन के अनुकूल रीतियों की एकरूपता के विषय में, एकता और सहमति के लिए इन्हें अपनाएँ, मानें और बनाए रखें।"
पहला अनुच्छेद आज्ञा देता है, "कि उपर्युक्त पादरी-वर्ग में से कोई भी मनुष्यों के उद्धार के लिए किसी भी ऐसी बात को आवश्यक न सिखाए और न उसका प्रचार करे, जो परमेश्वर के पवित्र वचन की उस पुस्तक में, जो पुराना और नया नियम कहलाती है, नहीं है; और वे पुराने अन्धविश्वासी और पोप-सम्बन्धी सिद्धान्तों के विषय में किसी भी प्रकार का सिद्धान्त स्थापित या दृढ़ करने से सावधान रहें, जिसे परमेश्वर के वचन के अधिकार से उचित और न्यायसंगत रीति से प्रमाणित न किया जा सके।"
चौथा अनुच्छेद आज्ञा देता है, "कि वे सब और उनमें से हर एक यत्नपूर्वक सिखाएँ और प्रचार करें कि परमेश्वर की कलीसिया विश्वासियों की वह मण्डली है, जिसमें परमेश्वर के वचन का सच्चा प्रचार होता है और संस्कार मसीह की ठहराई हुई विधि और उसके पवित्र वचन द्वारा हमें सिखाए गए सिद्धान्त के अनुसार ठीक रीति से दिए जाते हैं; और यह कि परमेश्वर की कलीसिया को परमेश्वर के वचन के अनुसार अध्यक्षों, याजकों और ऐसे ही अन्य लोगों की भीड़ या मण्डली नहीं समझा जाता, परन्तु वह उन सब मनुष्यों की मण्डली है जो परमेश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं; ऐसा न हो कि कोई मनुष्य बहकाया जाए और अपने आप को अध्यक्षों और याजकों की किसी नियमित परम्परा से बँधा हुआ माने, वरन् केवल परमेश्वर के वचन और संस्कारों के उचित उपयोग से।"
सातवाँ अनुच्छेद आज्ञा देता है, "कि वे सब और उनमें से हर एक यत्नपूर्वक सिखाएँ और प्रचार करें कि धर्मी ठहराया जाना केवल यीशु मसीह पर विश्वास से है, किसी मनुष्य के भले कर्मों के पुण्य से नहीं; यद्यपि भले कर्म धर्मी ठहराए जाने के पश्चात् अवश्य उत्पन्न होते हैं, जो धर्मी ठहराए जाने से पहले परमेश्वर की दृष्टि में किसी मूल्य या गिनती के नहीं हैं।"
नौवें अनुच्छेद में वह उन्हें आज्ञा देता है, "कि शुद्धिकरण-स्थान, क्षमा-पत्रों, इस संसार से चले गए लोगों के लिए प्रार्थना, तथा सन्तों या मूर्तियों के सम्मान, उनसे प्रार्थना और उनकी आराधना का सिद्धान्त हमारे एकमात्र मध्यस्थ और छुड़ानेवाले मसीह की महिमा के विरुद्ध और उसके लिए हानिकारक है, और परमेश्वर की पहली और दूसरी आज्ञा के सिद्धान्त के भी विरुद्ध है।"
दसवें अनुच्छेद में वह आज्ञा देता है, "कि मसीह की देह और लहू के संस्कार में रोटी और दाखरस का मसीह की देह और लहू में कोई रूपान्तरण नहीं होता, और न रोटी और दाखरस में, उनके नीचे या उनके साथ मसीह की किसी प्रकार की शारीरिक या स्थानीय उपस्थिति होती है, परन्तु वह विश्वास के द्वारा आत्मिक रीति से है।"
ग्यारहवें अनुच्छेद में वह आज्ञा देता है, "कि जो लोग अनुचित रीति से बपतिस्मे या प्रभु-भोज के लिए आते हैं, वे उन संस्कारों का सामर्थ्य और सच्चा प्रभाव प्राप्त नहीं करते, यद्यपि वे स्वाभाविक चिह्न और तत्त्व ग्रहण करते हैं।"
चौबीसवें अनुच्छेद में वह आज्ञा देता है, "कि संस्कार अपने किसी आन्तरिक कार्य के गुण या बल से प्रभावशाली नहीं होते, जिसे अन्धविश्वास में opus operatum कहा जाता है, परन्तु केवल पवित्र आत्मा के सामर्थ्य और माध्यम से, जो विश्वास के द्वारा उन्हें करनेवालों और ग्रहण करनेवालों के हृदयों में कार्य करता है।"
इकतालीसवें अनुच्छेद में वह आज्ञा देता है, "कि तुम में से कोई भी पोप के मिस्सा की नक़ल न करे, अर्थात् प्रभु की मेज़ को आशीष देना, सुसमाचार के पश्चात् या प्रभु-भोज ग्रहण करने के पश्चात् अपने हाथ या उँगलियाँ धोना, पुस्तक को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखना, प्रभु-भोज के पश्चात् प्याले को नीचे रखना और उसे चाटना, वितरण से पहले संस्कार को खुले रूप में दिखाना या उसे ऊँचा उठाना, पवित्र घण्टी बजाना, या प्रभु की मेज़ पर कोई दीया रखना।"
तैंतालीसवें अनुच्छेद में वह यह आज्ञा देता है, "चूँकि पवित्र स्थानों में कुछ लोग प्रभु की मेज़ को मेज़ के रूप में और कुछ वेदी के रूप में रखते हैं, जिससे अशिक्षित लोगों में फूट उत्पन्न होती दिखाई देती है, इसलिए हम अपने सब धर्मप्रान्तों में भक्तिपूर्ण एकता बनी रहे यह चाहते हुए, और इसलिए भी कि मेज़ का रूप अधिक प्रभावित करे और सीधे-सादे लोगों को पोप के मिस्सा की पुरानी अन्धविश्वासी धारणाओं से हटाकर प्रभु-भोज के सही उपयोग की ओर मोड़े, हम तुम्हें प्रोत्साहित करते हैं कि प्रभु की मेज़ को एक सीधी-सादी मेज़ के रूप में, शोभा से ढकी हुई, ऐसे स्थान पर स्थापित करो जो सबसे उचित समझा जाए, ताकि सेवक और भोज में सम्मिलित होनेवाले वहाँ उपस्थित सब लोगों को दिखाई दें, सुनाई दें और समझ में आएँ, और तुम सब वेदियों को हटाकर उनका अन्त कर दो। और यह भी कि सेवक सहभागिता और उसकी प्रार्थनाओं के समय अपना मुख लोगों की ओर रखे।" धर्म-सुधार के समय के एक अध्यक्ष के निरीक्षण-अनुच्छेद और आदेश ऐसे ही थे। मैं एक ही टिप्पणी करके उनसे आगे बढ़ता हूँ। पिछले 300 वर्षों में इंग्लैंड के अनेक धर्मप्रान्तों में यदि भले अध्यक्ष हूपर के आदेश पादरी-वर्ग में बाँटे जाते और उनके ध्यान में लाए जाते, तो बड़ा भला हो सकता था।
जिस अन्य दस्तावेज़ से मैं उद्धरण दूँगा, उसका नाम है "मसीही विश्वास का संक्षिप्त और स्पष्ट अंगीकार"। वह विशेष ध्यान का अधिकारी है, क्योंकि वह 1550 में प्रकाशित हुआ, उसी वर्ष जब लेखक ग्लॉस्टर का अध्यक्ष बनाया गया। "विश्वास-अंगीकार" से मैं अब ये चुने हुए अंश देता हूँ। मैं इन्हें बड़ी कठिनाई से चुनता हूँ। पूरा अंगीकार इतना उत्तम है कि यह कहना कठिन है कि क्या उद्धृत करें और क्या छोड़ दें। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि पाठक स्मरण रखें कि बोरे का अनाज वैसा ही अच्छा है जैसा नमूना।
अंगीकार के छब्बीसवें अनुच्छेद में हूपर कहता है, "मैं विश्वास करता और मानता हूँ कि मसीह का दण्ड पाना मेरा क्षमा पाना है; उसका क्रूस पर चढ़ाया जाना मेरा छुटकारा है; उसका नरक में उतरना मेरा स्वर्ग में चढ़ना है; उसकी मृत्यु मेरा जीवन है; उसका लहू मेरी शुद्धि और निर्मलता है, जिसी से मैं अपने सब पापों से धोया, पवित्र किया और शुद्ध किया जाता हूँ; इसलिए मैं न तो इस संसार में और न दूसरे में किसी और शुद्धिकरण-स्थान को ग्रहण करता या मानता हूँ जिससे मैं शुद्ध किया जाऊँ, केवल यीशु मसीह के लहू को, जिससे सब सदा के लिए शुद्ध और निर्मल किए जाते हैं।"
अंगीकार के अट्ठाईसवें अनुच्छेद में हूपर कहता है, "मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु का पवित्र भोज बलिदान नहीं है, वरन् यीशु मसीह के इस पवित्र बलिदान का केवल स्मरण और स्मारक है। इसलिए उसकी परमेश्वर के रूप में आराधना नहीं होनी चाहिए, और न मसीह के रूप में जो उसमें समाया हुआ माना जाए; क्योंकि उसकी आराधना केवल विश्वास से होनी चाहिए, किसी नाशमान वस्तु के सहारे नहीं। वैसे ही मैं विश्वास करता और मानता हूँ कि पोप का मिस्सा मनुष्य का गढ़ा हुआ विधान है, मसीह-विरोधी का बलिदान है, और यीशु मसीह के बलिदान को, अर्थात् उसकी मृत्यु और दुःख-भोग को, त्याग देना है; और यह एक दुर्गन्धयुक्त और दूषित कब्र है जो यीशु मसीह के लहू के पुण्य को छिपाती और ढकती है, इसलिए मिस्सा का अन्त होना चाहिए, और प्रभु का पवित्र भोज अपनी सम्पूर्णता में फिर से बहाल और स्थापित होना चाहिए।"
अंगीकार के चौवनवें अनुच्छेद में हूपर कहता है, "मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर का वचन कलीसिया से कहीं अधिक अधिकार रखता है; केवल यही वचन हमें वे सब बातें पर्याप्त रूप से दिखाता और सिखाता है जो किसी भी रीति से हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखती हैं, कि हमें क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। यही परमेश्वर का वचन सच्चा नमूना और सिद्ध नियम है, जिसके अनुसार सब विश्वासी लोगों को अपना जीवन चलाना और ढालना चाहिए, न दाहिने मुड़कर, न बाएँ मुड़कर, उसमें कुछ बदले बिना, उसमें कुछ जोड़े या उससे कुछ घटाए बिना, यह जानते हुए कि परमेश्वर के सब काम सिद्ध हैं, परन्तु सबसे बढ़कर उसका वचन।"
अंगीकार के चौंसठवें अनुच्छेद में हूपर कहता है, "मैं विश्वास करता हूँ कि पवित्र संस्कार में चिह्न, या प्रतीक, किसी भी बात में नहीं बदलते, वरन् वे अपने स्वभाव में पूरी तरह वैसे ही बने रहते हैं; अर्थात् रोटी बदलकर यीशु मसीह की देह में नहीं बदल जाती (जैसा कि मूर्ख पोप के अनुयायी और झूठे शिक्षक सिखाते हैं और बेचारे लोगों को धोखा देते हैं), और न दाखरस बदलकर
उसका लहू बन जाता है; परन्तु रोटी रोटी ही रहती है और दाखरस दाखरस ही रहता है, प्रत्येक अपने अपने उचित और मूल स्वभाव में।"
अंगीकार के पैंसठवें अनुच्छेद में हूपर कहता है, "मैं विश्वास करता हूँ कि यह सारा संस्कार उसके उपयोग में ही निहित है; इसलिए सही उपयोग के बिना रोटी और दाखरस उस साधारण रोटी और दाखरस से किसी बात में भिन्न नहीं जो आम तौर पर काम में लाए जाते हैं; और इसलिए मैं विश्वास नहीं करता कि मसीह की देह रोटी में, रोटी के नीचे या रोटी के साथ समाई, छिपी या बन्द हो सकती है, और न लहू दाखरस में, दाखरस के नीचे या दाखरस के साथ। परन्तु मैं विश्वास करता और मानता हूँ कि मसीह की ही देह स्वर्ग में पिता के दाहिने हाथ पर है (जैसा हम पहले कह चुके हैं), और जब जब हम इस रोटी और दाखरस को मसीह की विधि और स्थापना के अनुसार काम में लाते हैं, तब तब हम सचमुच और वास्तव में उसकी देह और लहू को ग्रहण करते हैं।"
अंगीकार के छियासठवें अनुच्छेद में हूपर कहता है, "मैं विश्वास करता हूँ कि यह ग्रहण करना शारीरिक या देह के रूप में नहीं होता, वरन् आत्मिक रूप से, सच्चे और जीवित विश्वास के द्वारा होता है; अर्थात् मसीह की देह और लहू मुँह और पेट को शरीर के पोषण के लिए नहीं दिए जाते, वरन् हमारे विश्वास को, आत्मा और भीतरी मनुष्य के अनन्त जीवन के लिए पोषण देने को दिए जाते हैं। और इसी कारण हमें इसकी आवश्यकता नहीं कि मसीह स्वर्ग से हमारे पास आए, परन्तु यह कि हम उसके पास चढ़ें, जीवित विश्वास के द्वारा अपने हृदय ऊपर पिता के दाहिने हाथ की ओर उठाएँ, जहाँ मसीह बैठा है, और जहाँ से हम अपने छुटकारे की बाट जोहते हैं।
ये इस बात का स्पष्ट प्रमाण देते हैं, जिसके लिए मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ, कि प्रोटेस्टेंट और सुसमाचारवादी कलीसियाई जन नई-नवेली और आधुनिक धारणाओं के लोग नहीं हैं, बल्कि धर्म-सुधार की छाप वाले कलीसियाई जन हैं—ऐसे कलीसियाई जन जिनके विचार तीन सौ वर्ष पहले एक प्रतिष्ठित कलीसियाई पुरुष के भी विचार थे। वे साहस रखें। जो कलीसियाई जन उनसे सहमत नहीं हैं, उनके व्यंग्य, ताने और कठोर वचनों से वे विचलित न हों। वे निर्भय होकर उत्तर दे सकते हैं कि उनके मार्ग ही पुराने मार्ग हैं, और वे ही इंग्लैंड की कलीसिया के सच्चे प्रतिनिधि हैं। यदि सुसमाचारवादी कलीसियाई जन गलत हैं, तो हूपर भी गलत थे। यदि हूपर सही थे, तो वे भी सही हैं। परन्तु जहाँ तक उनके विचारों और ग्लॉस्टर के शहीद अध्यक्ष के विचारों में किसी वास्तविक अन्तर का प्रश्न है, मैं किसी को भी चुनौती देता हूँ कि वह दिखाए कि ऐसा कोई अन्तर है भी।
मेरा कार्य पूरा हुआ। मैंने हमारे सबसे महान अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों में से एक के समय, जीवन, मृत्यु और विचारों को यथासम्भव संक्षेप में एकत्र कर प्रस्तुत किया है। परन्तु इस निबन्ध को पढ़नेवाले सब लोगों से दो व्यावहारिक सुझाव दिए बिना मैं समाप्त नहीं कर सकता। मैं प्रत्येक पाठक को व्यक्तिगत रूप से और सीधे सम्बोधित करता हूँ, और उससे विनती करता हूँ कि जो मैं कहता हूँ उस पर भली-भाँति विचार करे।
(1) पहली बात यह कि मैं सब निष्ठावान कलीसियाई जनों को आदेश देता हूँ कि इंग्लैंड को प्रोटेस्टेंट पहचान से वंचित करने और उसे फिर से पोप-तन्त्र की अधीनता में लाने के जो प्रयास अब हो रहे हैं, उनका साहसपूर्वक विरोध करें। हम अज्ञान, अन्धविश्वास, पुरोहितवाद और अनैतिकता की ओर न लौटें। हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले पोप-तन्त्र को आज़माया था, और घृणा तथा क्रोध के साथ उसे उतार फेंका था। हम घड़ी की सुइयों को पीछे न घुमाएँ और मिस्र को न लौटें। जब तक रोम अपनी भूलों का त्याग करके मसीह से मेल नहीं कर लेता, तब तक हम रोम से कोई मेल न रखें।
हम अपनी बाइबल पढ़ें, और पवित्रशास्त्र के तर्कों से सुसज्जित हों। बाइबल पढ़नेवाले साधारण विश्वासी किसी राष्ट्र को भ्रम से बचाने की सबसे सुनिश्चित रक्षा हैं। यदि साधारण विश्वासी केवल अपना कर्तव्य निभाएँ, तो मुझे अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंट मत के विषय में कोई भय नहीं है।
हम इतिहास पढ़ें, और देखें कि रोम ने बीते दिनों में क्या किया। पढ़ें कि उसने कैसे तुम्हारे देश की स्वतन्त्रताओं को रौंदा, तुम्हारे पूर्वजों की जेबें लूटीं, और पूरे राष्ट्र को अज्ञानी और अनैतिक बनाए रखा। फॉक्स, स्ट्राइप, बर्नेट, सोम्स और ब्लंट को पढ़ें। और यह न भूलें कि रोम कभी नहीं बदलता। यह उसका गर्व और गौरव है कि वह सदा एक-सा रहता है। उसे केवल इंग्लैंड में पूर्ण अधिकार दे दो, तो वह शीघ्र ही हमारे देश की आँखें फोड़ देगा, और उसे शिमशोन की तरह एक पतित दास बना देगा।
हम संसार के धरातल पर साफ़ दिखाई देनेवाले तथ्यों को पढ़ें। इटली को आज की दशा में किसने पहुँचाया? पोप-तन्त्र ने।—मेक्सिको और
दक्षिण अमेरिकी राज्यों को आज की दशा में किसने पहुँचाया? पोप-तन्त्र ने।—स्पेन और पुर्तगाल को आज की दशा में किसने पहुँचाया? पोप-तन्त्र ने।—आयरलैंड को आज की दशा में किसने पहुँचाया? पोप-तन्त्र ने।—स्कॉटलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका और हमारे अपने प्रिय इंग्लैंड को वे सामर्थी और समृद्ध देश किसने बनाया जो वे आज हैं, और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे लम्बे समय तक ऐसे ही बने रहें? मैं एक ही शब्द में उत्तर देता हूँ: प्रोटेस्टेंट मत—एक खुली बाइबल, एक प्रोटेस्टेंट सेवकाई, और धर्म-सुधार के सिद्धान्त। जिसे झूठे ही उदारवाद कहा जाता है, उसके मनभावने तर्कों पर कान देने से पहले हम दो बार सोचें। पोप-तन्त्र के शासन को लौटा लाने में सहायता करने से पहले हम दो बार सोचें।
(2) दूसरी बात यह कि मैं सब निष्ठावान कलीसियाई जनों को, और उन सबको जो शुद्ध सुसमाचारवादी धर्म से प्रेम रखते हैं, आदेश देता हूँ कि विभाजन के इन दिनों में वे एक साथ खड़े रहें, और सनकों तथा संकोचों को अपने बीच दूरी न डालने दें। जो लोग आराधना-पद्धति में सुधार के पक्षधर हैं, वे थोड़े समय के लिए अपनी प्रिय रामबाण औषधि को एक ओर रख दें, और इंग्लैंड की कलीसिया में सुसमाचार को बनाए रखने के कार्य में अपना कन्धा लगाएँ। जो लोग जागृतियों के पक्षधर हैं, वे रोम का विरोध करने में सहायता देने को समय का दुरुपयोग न समझें। यदि पोप-तन्त्र एक बार विजयी हो गया, तो जागृतियों के लिए कोई स्वतन्त्रता नहीं बचेगी। हम मित्रों को खोने का जोखिम नहीं उठा सकते। हमारी पंक्तियाँ पहले ही बहुत पतली हैं। इंग्लैंड की कलीसिया हर प्रोटेस्टेंट और सुसमाचारवादी कलीसियाई जन से माँग करती है कि वह अपना कर्तव्य निभाए।
मैं खुले मन से मानता हूँ कि हर दिशा में परिस्थितियाँ अन्धकारमय दिखती हैं। पर निराश होने का कोई कारण नहीं है। दिन अभी हारा नहीं गया है। लड़ाई जीतने का समय अभी है। जो भी हो, हम अपनी स्थिति न छोड़ें, और इस पुराने भले जहाज़ को अभी न त्यागें। अपनी तोपों में कील ठोककर और बिना लड़े अपने गढ़ से बाहर निकलकर हम अपने शत्रुओं को प्रसन्न न करें। बल्कि भले अध्यक्ष हूपर की तरह अपनी तोपों के पास डटे रहें, और परमेश्वर की सामर्थ्य से शत्रु के सामने निर्भय मोर्चा दिखाएँ। इंग्लैंड की कलीसिया ने बीते दिनों में कुछ भलाई की है, और कलीसिया आज भी सुरक्षित रखने योग्य है। यदि हम इस संघर्ष में गिर भी जाएँ, तो झण्डे लहराते हुए गिरें। पर हम पोम्पेई के उस वीर पहरेदार की तरह दृढ़ खड़े रहें; कोई भी अपना स्थान न छोड़े। मेरा अपना मन पूरी तरह स्थिर है। मैं कहता हूँ कि इंग्लैंड की कलीसिया का नष्ट हो जाना और टुकड़े-टुकड़े हो जाना इससे कहीं अच्छा है कि वह जॉन हूपर के सिद्धान्तों को छोड़ दे और मिस्सा के बलिदान तथा कान में किए जानेवाले पाप-स्वीकार को सहन करे।
टिप्पणी।
निम्नलिखित पत्र पढ़ने के योग्य है।
"मास्टर हूपर का एक पत्र, जो उन्होंने ग्लॉस्टर में अपने क्रूर दाह से तीन सप्ताह पहले बन्दीगृह से अपने कुछ मित्रों को लिखा।
"परमेश्वर का अनुग्रह तुम्हारे साथ रहे। आमीन।
"मैंने हाल ही में तुम्हें लिखा था, और बताया था कि धर्म के विषय में पार्लियामेंट ने कैसी चरम नीति ठहराई है — सत्य को दबाना और असत्य को आगे बढ़ाना, और बल-प्रयोग से सब मनुष्यों को अपनी शपथ तोड़ने पर विवश करना, कि वे फिर उसी को कलीसिया का सिर मान लें जो न उसका सिर है न अंग, परन्तु उसका पक्का शत्रु है, जैसा कि परमेश्वर का वचन और सब प्राचीन लेखक गवाही देते हैं; और व्यवस्था तथा अधिकार के अभाव में वे बल और अत्याचार का सहारा लेंगे, जो उस समय से, जब से यह अधिकार संसार में आरम्भ हुआ, पोप और पोप-तन्त्र के बचाव की दलीलें रहे हैं। परन्तु अब परीक्षा का समय है, कि देखा जाए हम परमेश्वर से डरते हैं या मनुष्य से। जब राजा और संसार मसीह के पक्ष में थे तब उसका साथ देना सरल था; पर अब संसार उससे बैर रखता है, अब सच्ची परीक्षा है कि उसके कौन हैं। इसलिए उसके पवित्र आत्मा के नाम, सामर्थ्य, बल और शक्ति से, हर हाल में दुःख और स्थिरता के लिए अपने आप को तैयार करो। जब लड़ने का समय सबसे निकट है, तब हम भाग न खड़े हों। स्मरण रखो, मुकुट उन्हीं को मिलेगा जो वीरता से लड़ते हैं; और जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा। अब तुम अपने सब विचार उस संकट से हटाओ जो तुम देखते हो, और उस सुख पर ध्यान दो जो संकट के पीछे आता है — या तो इस संसार में अपने शत्रुओं पर विजय, या फिर इस जीवन को सौंप देना ताकि अनन्त राज्य के उत्तराधिकारी बनो। इस संसार के सुख या दुःख को बहुत अधिक देखने से सावधान रहो; क्योंकि इन दोनों में से किसी का भी बहुत विचार करना, या उससे अति प्रेम या भय रखना, परमेश्वर से दूर खींच ले जाता है। इसलिए संसार के सुख के विषय में अपने मन में यह सोचो कि वह अच्छा तो है, परन्तु तभी तक जब तक वह परमेश्वर की कृपा के अनुसार हो। उसे रखना चाहिए, पर केवल इस सीमा तक कि उसे रखने में हम परमेश्वर को न खो दें। यहाँ अपने मित्रों के बीच ठहरे रहना अच्छा है; पर इस रीति से नहीं कि साथ ही हम परमेश्वर के अप्रसन्न रहते हुए यहीं पड़े रहें और आगे चलकर शैतान के दूतों के साथ अनन्त आग में वास करें। परमेश्वर के नीचे ऐसा कुछ नहीं जो रखा न जा सके, बशर्ते कि परमेश्वर, जो हमारी सब वस्तुओं से ऊपर है, खो न जाए।
"दुःख के विषय में भी ऐसा ही समझो। बन्दीगृह पीड़ादायक है; पर बुरी शर्तों पर पाई हुई स्वतन्त्रता उससे भी अधिक पीड़ादायक है। बन्दीगृहों में दुर्गन्ध है, पर उतनी नहीं जितनी उन सुन्दर घरों में, जहाँ परमेश्वर का भय और सच्चा आदर नहीं है। मुझे अकेला और एकान्त में रहना होगा; परमेश्वर को अपने साथ रखकर ऐसा रहना दुष्टों की संगति में रहने से अच्छा है। धन-सम्पत्ति की हानि बड़ी है; पर परमेश्वर के अनुग्रह और कृपा की हानि उससे भी बड़ी है। … अन्तिम दिन खरे परमेश्वर के सामने सारे स्वर्ग और पृथ्वी की दृष्टि में नंगे खड़े होने से यह कहीं अच्छा है कि दुष्ट मनुष्यों के ठाठ-बाट और घमण्ड के सामने उत्तर दिया जाए। मैं किसी निर्दयी मनुष्य के हाथ से मारा जाऊँगा: धन्य है वह जो मृत्यु के दुःखों से भरे इस जीवन को खोता है और अनन्त आनन्द से भरे जीवन को पाता है। धन और मित्रों से बिछुड़ना पीड़ा और शोक का कारण है; पर उतना नहीं जितना अनुग्रह और स्वर्ग से ही बिछुड़ जाना। इसलिए इस संसार का न कोई सुख और न कोई दुःख बड़ा ठहर सकता है, यदि उसे आने वाले संसार के आनन्दों या पीड़ाओं के साथ तौला जाए।
"मैं तुम्हारे लिए प्रार्थना करने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता; परमेश्वर के निमित्त तुम भी मेरे लिए यही करो। मेरी ओर से, स्वर्गीय पिता का धन्यवाद, मैंने अपना हिसाब कर लिया है, और अपने आप को स्वर्गीय पिता की इच्छा पर छोड़ दिया है; जैसा वह चाहे वैसा ही मैं चाहता हूँ, उसके अनुग्रह से। परमेश्वर के निमित्त, जितनी जल्दी हो सके, मेरी बेचारी पत्नी और बच्चों को अपनी ओर से कोई पत्र भेजो; और मेरा वह पत्र भी, जो मैंने हाल में D. को भेजा था। मुझे बताया गया कि जब से M. S. उसके पास आए हैं, तब से उसे मेरी कोई चिट्ठी नहीं मिली; इसमें संदेशवाहकों का दोष अधिक है, क्योंकि मैंने कई बार लिखा है। प्रभु उन्हें सान्त्वना दे और उनकी देखभाल करे; क्योंकि मैं सांसारिक बातों में कुछ भी करने में असमर्थ हूँ। वह भक्त और बुद्धिमान स्त्री है। यदि मेरा मनोरथ पूरा हो गया होता तो उसे आवश्यक वस्तुएँ मिलतीं; पर जो मैं चाहता था उसे परमेश्वर पूरा कर सकता है, जिसके हाथ मैं उसे और तुम सब को सौंपता हूँ। अब मैं एक बहुमूल्य रत्न हूँ, और बड़े जतन से रखा जाता हूँ, इतने जतन से कभी नहीं रखा गया; क्योंकि न मेरा अपना सेवक और न घर का कोई नौकर मेरे पास आ सकता है, केवल मेरा पहरेदार, जो परमेश्वर जानता है एक सीधा-सादा और गँवार मनुष्य है; पर मुझे इसकी कुछ चिन्ता नहीं। तुम्हारा कल्याण हो। 21 जनवरी, 1555।
"तुम्हारा कृतज्ञ, "जॉन हूपर।"
रोलैण्ड टेलर: शहीद।
रोलैण्ड टेलर, सफ़ोक के हेडली के रेक्टर, रानी मरियम के दिनों के प्रसिद्ध प्रोटेस्टेंट शहीदों में से एक थे; और कलीसिया के पास उनके विषय में बहुत ही कम जानकारी है। "शहीदों की पुस्तक" में जॉन फ़ॉक्स ने जो बातें लिखी हैं उनके सिवा हम उनके विषय में लगभग कुछ नहीं जानते। फिर भी जो कुछ अभिलेख में है वह यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि अंग्रेज़ी धर्म-सुधार के समय जिन उत्तम योद्धाओं ने मसीह के सत्य के लिए अपने विश्वास पर अपने लहू की मुहर लगाई, उनमें रोलैण्ड टेलर किसी से कम न थे।
इस जानकारी के अभाव के कारण सरलता से समझाए जा सकते हैं। एक तो यह कि वह भला मनुष्य लन्दन से पचास मील दूर एक छोटे देहाती नगर में जिया, परिश्रम किया और मरा। ऐसी स्थिति सारे संसार में प्रसिद्धि के लिए घातक है। यह तो बड़े नगरों के निवासी और राजधानी के मंचों के स्वामी हैं जिनके कार्यों का प्रशंसक वृत्तान्त लिखते हैं और जिनके जीवन-चरित्र ध्यानपूर्वक आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाए जाते हैं। दूसरी बात यह कि उसने कोई पुस्तक नहीं लिखी, न व्याख्या की, न वाद-विवाद की, न व्यावहारिक। हेडली के शहीद रेक्टर का एक भी उपदेश छपा हुआ नहीं है जो उसे मरने के बाद भी बोलने दे। जब वह मरा तो पुस्तकालयों में उसकी स्मृति को जीवित रखने के लिए अपने पीछे कुछ भी नहीं छोड़ गया। इन दोनों बातों को भूलना नहीं चाहिए।
टेलर का जो वृत्तान्त फॉक्स ने दिया है, वह इतना विशेष रूप से सजीव और स्पष्ट है कि कोई यह भी सोच सकता है कि वह शहीदों का इतिहासकार उस शहीद का निजी मित्र था, या उसके कष्टों का प्रत्यक्षदर्शी। परन्तु इसका कोई प्रमाण मुझे नहीं मिला। फिर भी यह बात ध्यान देने योग्य है कि रानी एलिज़ाबेथ के सिंहासन पर बैठने के बाद फॉक्स बहुत समय तक नॉर्विच के अध्यक्ष पार्कहर्स्ट के साथ रहा, जिनके धर्मप्रदेश में उस समय हैडली स्थित था। ऐसा भी प्रतीत होता है कि इप्सविच में, जो हैडली से केवल दस मील दूर है, उसके मित्र और परिचित थे। इसलिए बहुत सम्भव है कि उसे टेलर की पल्ली में बार-बार जाने के अवसर मिले, और यह भी बहुत सम्भव है कि उसने उन लोगों से बहुत जानकारी पाई जो उस महान शहीद के जलाए जाने के समय स्वयं उपस्थित थे, और उसकी सेवकाई तथा उसके कष्टों, दोनों का पूरा और सटीक विवरण दे सकते थे। फॉक्स के वृत्तान्त को संक्षिप्त करना, उसे आधुनिक भाषा में ढालना और अपने पाठकों के सामने सुविधाजनक रूप में प्रस्तुत करना—इन पृष्ठों का बस यही सीधा-सा उद्देश्य है।
स्ट्राइप के अनुसार रोलैण्ड टेलर का जन्म नॉर्थम्बरलैण्ड के रॉथबरी में हुआ था; स्मरण रहे, यह वही प्रदेश है जहाँ से अध्यक्ष रिडले आए थे। उसके जन्म की तिथि, उसके परिवार की श्रेणी या पद, उसके आरम्भिक जीवन और उसकी शिक्षा के स्थान के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। विविध स्रोतों से हम केवल इतना जान पाते हैं कि समय आने पर वह कैम्ब्रिज में विद्यार्थी हुआ और वहीं प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के सिद्धान्तों को ग्रहण किया। उसके जीवन के इस महत्त्वपूर्ण मोड़ पर जिन साधनों ने उसे प्रभावित किया, उनमें अध्यक्ष लैटिमर के उपदेशों का विशेष रूप से नाम लिया जाता है। उसके जीवन का पहला स्पष्ट तथ्य जो हमें ज्ञात है, वह है महाधर्माध्यक्ष क्रैन्मर के साथ उसकी घनिष्ठता। उस महापुरुष के घराने में वह किसी पद पर रहा प्रतीत होता है, और उसके साथ मिलकर अंग्रेज़ी धर्म-सुधार के उस विशाल भवन को आगे बढ़ाने में लगा रहा। वह क्रैन्मर के साथ कितने समय रहा, यह जानने का कोई साधन दुर्भाग्य से हमारे पास नहीं है। परन्तु इसके प्रबल आन्तरिक प्रमाण हैं कि वह उसके साथ इतने लम्बे समय और इतनी घनिष्ठता से जुड़ा रहा कि अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों में वह एक सुपरिचित व्यक्ति बन गया। किसी और धारणा पर हम उस विशेष शत्रुता की व्याख्या नहीं कर सकते जिसके साथ रानी मरियम के शासन में उसे ढूँढ़ निकाला गया और मृत्यु तक सताया गया। हैडली के उस पुराने पादरी ने एडवर्ड षष्ठ के दिनों में लन्दन में अवश्य ही एक आदरणीय ख्याति प्राप्त कर ली होगी।
सफ़ोक का हैडली ही वह पहला और एकमात्र पद था जिस पर रोलैण्ड टेलर के होने की बात हम जानते हैं। उसे इस पद पर उसके मित्र महाधर्माध्यक्ष क्रैन्मर ने नियुक्त किया, पर किस तिथि को, यह जानने का कोई साधन हमारे पास नहीं। केवल एक बात बिलकुल निश्चित है: हैडली में नियुक्त होते ही उसने लन्दन के अपने सब पद छोड़ दिए और स्वयं को पूरी तरह अपनी पल्ली के काम में समर्पित कर दिया।
हैडली सफ़ोक की दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर एक छोटा नगर है, जिसमें इस समय लगभग 4,000 लोग रहते हैं। एडवर्ड षष्ठ के दिनों में उस स्थान का चरित्र कैसा था और रोलैण्ड टेलर की सेवकाई का स्वरूप क्या था, इसका वर्णन फॉक्स ने अपनी "Acts and Monuments" में इतने सुन्दर और सजीव ढंग से किया है कि उसके शब्द उद्धृत करने से अच्छा मैं कुछ नहीं कर सकता: -
"हैडली नगर इंग्लैण्ड के उन पहले नगरों में से था जिन्होंने परमेश्वर का वचन ग्रहण किया, मास्टर थॉमस बिल्नी के प्रचार के द्वारा, जिनके परिश्रम से मसीह के सुसमाचार को ऐसी अनुग्रहपूर्ण सफलता मिली और वह वहाँ ऐसी जड़ पकड़ गया कि उस पल्ली के बहुत-से लोग—स्त्रियाँ भी और पुरुष भी—पवित्रशास्त्र में अत्यन्त निपुण हो गए; यहाँ तक कि उनमें बहुत-से ऐसे मिलते जिन्होंने पूरी बाइबल को कई बार पढ़ा था, और जो पौलुस की पत्रियों का बड़ा भाग कण्ठस्थ सुना सकते थे, और किसी भी विवादास्पद विषय में बहुत अच्छी तरह और तुरन्त कोई भक्तिपूर्ण, विद्वत्तापूर्ण निर्णय दे सकते थे।
"उनके बच्चों और सेवकों का भी परमेश्वर के वचन के सच्चे ज्ञान में परिश्रमपूर्वक पालन-पोषण और प्रशिक्षण किया जाता था, ऐसा कि पूरा नगर कपड़ा बुननेवाले या मज़दूर लोगों का नगर कम और विद्वानों का विश्वविद्यालय अधिक प्रतीत होता था; और जो सबसे अधिक सराहने योग्य है, वह यह कि वे अधिकतर अपने जीवन में परमेश्वर के वचन का पालन करनेवाले थे।
"हैडली नगर में डॉ. टेलर एक अच्छे चरवाहे थे, जो अपनी भेड़ों के बीच ही रहते और बसते थे। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह पवित्रशास्त्र के अध्ययन में लगा दिया, और अत्यन्त विश्वासयोग्यता से उस आज्ञा को पूरा करने का प्रयत्न किया जो प्रभु ने पतरस को दी थी, जब उसने कहा, 'हे पतरस, क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?' मेरे मेम्नों को चरा;' 'मेरी भेड़ों की रखवाली कर;' 'मेरी भेड़ों को चरा।' मसीह के इस प्रेम ने उनमें ऐसा काम किया कि कोई रविवार या पर्व का दिन न बीतता, और न कोई अन्य समय जब वे लोगों को इकट्ठा कर सकते, कि वे उन्हें परमेश्वर का वचन, उनके उद्धार का सिद्धान्त, न सुनाते।
"उनका वचन ही केवल उनके लिए प्रचार न था, बल्कि उनका सारा जीवन और आचरण निष्कपट मसीही जीवन और सच्ची पवित्रता का उदाहरण था। वे सब अभिमान से रहित थे, किसी बालक के समान दीन और नम्र; ऐसा कि कोई इतना निर्धन न था जो अपने पिता के समान निडर होकर उनके पास न आ सके। उनकी दीनता बचकानी या भीरुता से भरी भी न थी; बल्कि अवसर, समय और स्थान की माँग के अनुसार वे पापियों और कुकर्मियों को डाँटने में दृढ़ होते थे: इसलिए कोई इतना धनी न था कि वे उसे उसका दोष साफ़-साफ़ न बताते, और वह भी ऐसी गम्भीर और तीव्र ताड़ना के साथ जैसी एक अच्छे पल्ली-पुरोहित और पासबान को शोभा देती है। वे अत्यन्त कोमल स्वभाव के मनुष्य थे, सब प्रकार की कटुता, द्वेष या बैर से रहित, सब मनुष्यों का भला करने को तत्पर, अपने शत्रुओं को सहज ही क्षमा करनेवाले, और उन्होंने कभी किसी की हानि करने का यत्न नहीं किया।
"जो कंगाल अन्धे, रोगी, लँगड़े, बिस्तर पर पड़े हुए थे, या जिनके बहुत बच्चे थे, उनके लिए वे सचमुच पिता थे, चिन्ता करनेवाले संरक्षक, परिश्रमी प्रबन्धक, यहाँ तक कि उन्होंने पल्ली के लोगों से उनके लिए एक सामान्य व्यवस्था करवाई; और वे स्वयं भी (उस निरन्तर सहायता के अतिरिक्त जो उन्हें सदा उनके घर पर मिलती थी) प्रति वर्ष सामान्य दान-पेटी में एक उचित भाग दिया करते थे।
"उनकी पत्नी भी एक भली, विवेकी और संयमी गृहिणी थी; और उनके बच्चे भली-भाँति पाले गए थे और परमेश्वर के भय और अच्छी शिक्षा में बड़े हुए थे।
"अन्त में कहूँ तो वे उन सब सद्गुणों की, जिनका वर्णन पौलुस ने सच्चे अध्यक्ष के विषय में किया है, एक यथार्थ और जीवित प्रतिमा या नमूना थे—पृथ्वी के अच्छे नमक, जो स्वाद देनेवाले थे और बुरे लोगों के बिगड़े आचरण पर चुभनेवाले; परमेश्वर के भवन में दीवट पर रखी हुई ज्योति, जिसका अनुकरण और अनुसरण सब भले मनुष्य करें।"
हेडली में टेलर की सेवकाई कितने समय तक चली, यह हम ठीक-ठीक नहीं जानते। फॉक्स केवल इतना कहता है कि वह "सबसे निर्दोष और पवित्र राजा, धन्य स्मृतिवाले राजा एडवर्ड षष्ठ के सारे दिनों में" वहीं बना रहा। फिर भी हम निश्चिन्त होकर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वह वहाँ दस वर्ष से अधिक रहा। जब रानी मरियम के दिनों में उसे बन्दीगृह में डाला गया, तब वह नौ बच्चों का पिता था; और यह सम्भव नहीं लगता कि उसने क्रैनमर के घराने को छोड़कर अपना घर बसाने से पहले विवाह किया होगा, इसलिए जान पड़ता है कि उसके सब बच्चे हेडली में ही जन्मे थे। परन्तु यह सब केवल अनुमान की बात है। हमारे लिए इतना जान लेना पर्याप्त है कि वह स्पष्टतः इतने समय तक हेडली का रेक्टर रहा कि अपने अधिकांश पल्लीवासियों का प्रिय और सम्मानित बन गया।
जब रानी मरियम सिंहासन पर बैठी, तब हेडली में रोलैण्ड टेलर के शान्त दिन शीघ्र ही समाप्त हो गए। प्रोटेस्टेंट के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और ऊँचे यश के कारण यह निश्चित था कि पोप-समर्थक दल उसे नष्ट करने के लिए चिह्नित कर लेगा, और उसे बन्दीगृह में डालने का बहाना भी शीघ्र ही ढूँढ़ लिया गया।
सबसे अच्छी तरह सँभाली गई पल्लियों में और सुसमाचार के सबसे विश्वासयोग्य प्रचार के अधीन भी सदा बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो जीवित धर्म से बैर रखते हैं और कठोर, मन न फिरानेवाले तथा अविश्वासी बने रहते हैं। प्रेरितों के दिनों में ऐसा ही था। आज हमारी अपनी पल्लियों में भी ऐसा ही है। हेडली में, जब रोलैण्ड टेलर रेक्टर था, तब भी ऐसा ही था। कुछ लोग उससे बैर रखते थे, क्योंकि उसकी शिक्षा उनके अपने जीवन और मतों को दोषी ठहराती थी; और जैसे ही उन्हें उसे हानि पहुँचाने का अवसर मिला, उन्होंने उसे उत्सुकता से पकड़ लिया। इनमें से दो मनुष्यों, फॉस्टर और क्लार्क, ने मिलकर षड्यन्त्र रचा कि उस भले रेक्टर को ऊँचे अधिकारियों से टकराव में डाल दें; उन्होंने अल्डहम के रेक्टर जॉन एव्रेथ को किराये पर लिया कि वह हेडली की कलीसिया में आकर पोप-मत का मिस्सा मनाए। परिणाम उनकी आशा के अनुसार ही निकला। जब मिस्सा आरम्भ होने ही वाला था, रोलैण्ड टेलर धर्मी क्रोध से भरकर कलीसिया में दौड़ पड़ा और पूरी कार्यवाही का यह कहकर तीव्र विरोध किया कि वह अवैध और मूर्तिपूजा है। इसके बाद अशोभनीय वाद-विवाद हुआ, हेडली के रेक्टर को उसकी अपनी कलीसिया से बलपूर्वक निकाल दिया गया, विश्वासी पल्लीवासियों में बड़ी हलचल मच गई, कलीसिया के भीतर पत्थर फेंके गए, और लोगों में सामान्य उथल-पुथल मच गई। यह सब विधिवत् विनचेस्टर के अध्यक्ष और इंग्लैण्ड के लॉर्ड चांसलर स्टीफन गार्डिनर को बताया गया; और इस मामले का परिणाम, जैसा उन दुष्टों ने पहले से सोच रखा था, यह निकला कि गार्डिनर ने डॉ. टेलर को आदेश भेजा कि वह बिना विलम्ब लन्दन में उसके सामने उपस्थित हो। उस वीर धर्म-सुधारक ने तुरन्त इस आदेश का पालन किया और हेडली को छोड़ दिया, फिर अपनी मृत्यु के दिन से पहले वहाँ कभी न लौटा।
जब आदेश पहुँचा, तब रोलैण्ड टेलर के बहुत से मित्रों ने उसे समझाने का व्यर्थ प्रयत्न किया कि वह अपने प्राण बचाने के लिए यूरोप महाद्वीप भाग जाए, जैसा कि और बहुत से विश्वासयोग्य प्रोटेस्टेंट कर चुके थे। परन्तु उन्होंने उस भले बूढ़े मनुष्य पर उससे अधिक प्रभाव न डाला जितना पौलुस के मित्रों ने उस प्रेरित पर डाला था, जब उन्होंने उससे यरूशलेम न जाने की विनती की थी। उसका उत्तर यह था: "तुम मुझसे क्या करवाना चाहते हो? मैं अब बूढ़ा हूँ, और इन भयानक और अत्यन्त दुष्ट दिनों को देखने के लिए पहले ही बहुत जी चुका हूँ। तुम भाग जाओ, और जैसा तुम्हारा विवेक तुम्हें चलाए वैसा करो। मैंने परमेश्वर के अनुग्रह से पक्का निश्चय कर लिया है कि इस अध्यक्ष के पास जाऊँगा और उसके मुँह पर कह दूँगा कि वह बुरा करता है। परमेश्वर आगे अपने लोगों के लिए ऐसे शिक्षक अवश्य खड़े करेगा जो मुझसे कहीं अधिक परिश्रम और फल के साथ उन्हें सिखाएँगे। क्योंकि परमेश्वर अपनी कलीसिया को नहीं त्यागेगा, यद्यपि अभी कुछ समय के लिए वह हमारी परीक्षा लेता और हमें ताड़ना देता है, और वह भी बिना उचित कारण के नहीं।
"जहाँ तक मेरी बात है, मैं परमेश्वर के सामने विश्वास करता हूँ कि मैं परमेश्वर की इतनी अच्छी सेवा कभी न कर सकूँगा जितनी अब कर सकता हूँ, न मुझे कभी ऐसा महिमामय बुलावा मिलेगा जैसा अब मिला है, न परमेश्वर की ओर से इतनी बड़ी दया मुझे दी जाएगी जैसी इस समय दी जा रही है। क्योंकि कौन-सा मसीही मनुष्य पोप और उसके अनुयायियों के विरुद्ध प्रसन्नता से प्राण न देगा? मैं जानता हूँ कि पोप-तन्त्र मसीह-विरोधी का राज्य है, जो पूरी तरह झूठों से भरा है; इसलिए उनकी सारी शिक्षा मूर्तिपूजा, अन्धविश्वास, भ्रम, पाखण्ड और झूठ के सिवा कुछ नहीं।
"इसलिए मैं तुमसे और अपने सब अन्य मित्रों से विनती करता हूँ कि मेरे लिए प्रार्थना करो, और सन्देह न करो कि परमेश्वर मुझे सामर्थ्य और अपना पवित्र आत्मा देगा, ताकि मेरे सब विरोधी अपने कामों पर लज्जित हों।"
इसी मनोदशा से सुसज्जित होकर रोलैण्ड टेलर अपनी इच्छा से लन्दन गया और अपने वचन को पूरे साहस के साथ निभाया। गार्डिनर के साथ उसकी पहली भेंट का आरम्भ फॉक्स ने इस प्रकार वर्णित किया है: -
"जब गार्डिनर ने डॉ. टेलर को देखा, तब अपनी सामान्य रीति के अनुसार उसने उसे बुरा-भला कहा, उसे दुष्ट, देशद्रोही, विधर्मी कहा और बहुत-सी अन्य नीच गालियाँ दीं। डॉ. टेलर ने यह सब धीरज से सुना, और अन्त में कहा, 'मेरे प्रभु, मैं न देशद्रोही हूँ न विधर्मी, परन्तु एक सच्चा प्रजाजन और विश्वासयोग्य मसीही मनुष्य हूँ; और मैं आपकी आज्ञा के अनुसार यह जानने आया हूँ कि आपने मुझे किस कारण बुलाया है।'
"तब अध्यक्ष ने कहा, 'क्या तू इस प्रकार आया है, नीच? तुझे लज्जा नहीं कि मेरे मुँह की ओर देखता है? क्या तू नहीं जानता कि मैं कौन हूँ?'
"डॉ. टेलर ने कहा, 'हाँ! मैं जानता हूँ कि आप कौन हैं: आप डॉ. स्टीफन गार्डिनर हैं, विनचेस्टर के अध्यक्ष और लॉर्ड चांसलर, तो भी केवल एक नश्वर मनुष्य। यदि मैं आपकी रोबीली दृष्टि से डरूँ, तो आप हम सबके प्रभु परमेश्वर से क्यों नहीं डरते? आप लज्जा के बिना किसी मसीही मनुष्य के मुँह की ओर कैसे देख सकते हैं, जबकि आपने सत्य को त्याग दिया है, हमारे उद्धारकर्ता मसीह और उसके वचन का इन्कार किया है, और अपनी शपथ के विरुद्ध काम किया है? आप मसीह के न्याय-आसन के सामने किस मुख से खड़े होंगे, और राजा हेनरी अष्टम के प्रति, और फिर उसके पुत्र राजा एडवर्ड षष्ठ के प्रति, ली हुई अपनी शपथ का क्या उत्तर देंगे?'"
जो भेंट इस असाधारण ढंग से आरम्भ हुई, उसका अन्त वैसा ही हुआ जैसी आशा की जा सकती थी। कई तीखे तर्क-वितर्क और झगड़ों के बाद, जिनमें सफ़ोक का रेक्टर विनचेस्टर के अध्यक्ष से कहीं अधिक सिद्ध हुआ, टेलर को किंग्स बेंच के बन्दीगृह में भेज दिया गया। अपनी कैद का आदेश सुनकर वह घुटनों के बल बैठ गया और दोनों हाथ उठाकर बोला, "हे भले प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। रोम के अध्यक्ष के अत्याचार से और उसकी सब घृणित भूलों, मूर्तिपूजाओं और घिनौने कामों से, हे भले प्रभु, हमें छुड़ा। और भले राजा एडवर्ड के लिए परमेश्वर की स्तुति हो।"
रोलैण्ड टेलर दो वर्ष तक बन्दीगृह में पड़ा रहा, और उसने अपना अधिकांश समय प्रार्थना, पवित्रशास्त्र के पाठ और लेखन में बिताया। उसे कैदियों को समझाने और उनसे बातें करने के अवसर भी मिले। उसी समय बन्दीगृह में पड़े अन्य धर्म-सुधारकों से उसकी कितनी भेंट हुई, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। फिर भी यह निश्चित है कि वह प्रसिद्ध जॉन ब्रैडफ़ोर्ड की संगति में बहुधा रहा, और उसने अपने मित्रों से कहा कि परमेश्वर ने उसे ऐसे बन्दीगृह में भेजा है जहाँ उसने "अपने को शान्ति देनेवाला परमेश्वर का एक स्वर्गदूत पाया।" यह भी बहुत सम्भव है कि उसकी कभी-कभी उन विख्यात धर्म-सुधारकों—हूपर, रोजर्स, फ़ेरर और सॉण्डर्स—से भी भेंट हुई हो, जो अन्त में उसी के समान खम्भे से बाँधकर जला दिए गए।
रोलैण्ड टेलर के थका देनेवाले कारावास का अन्त अन्ततः आ पहुँचा। 22 जनवरी, 1555 को उसे लॉर्ड चांसलर, बिशप गार्डिनर और अन्य आयुक्तों के सामने लाया गया और उसकी लम्बी जाँच-पड़ताल की गई। उस अवसर पर जो कुछ कहा गया उसके सारे ब्योरे में जाना उबाऊ और निष्फल होगा। सारी कार्यवाही उसी घोर अन्याय और पक्षपात से चलाई गई जो अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों के विरुद्ध की गई सब कार्यवाहियों की पहचान थी, और परिणाम स्वाभाविक रूप से उस भले मनुष्य को दोषी ठहराना ही था। उसके अपने शब्दों में, जैसा उसने एक मित्र को लिखे पत्र में कहा, वह इसलिए विधर्मी घोषित किया गया कि उसने याजकों के विवाह का समर्थन किया और रोटी-दाखरस के रूपान्तर के सिद्धान्त का इनकार किया। इन दिनों में यह कभी न भुलाया जाए कि प्रभु-भोज में रोटी और दाखरस के तत्वों में मसीह के शरीर और लहू की किसी शारीरिक उपस्थिति का इनकार ही वह निर्णायक बिन्दु था जिसने हमारे शहीद धर्म-सुधारकों का भाग्य तय किया। यदि वे उस बात में झुक जाते तो जीवित रह सकते थे। क्योंकि उन्होंने किसी शारीरिक उपस्थिति को स्वीकार नहीं किया, इसलिए वे मारे गए। ये बातें हमारी शिक्षा के लिए लिखी गई हैं। [उसने कहा,] 'परमेश्वर तुझे आशीष दे और तुझे अपना सेवक बनाए;' और एलिज़ाबेथ को चूमकर उसने कहा, 'परमेश्वर तुझे आशीष दे। मैं तुम सब से विनती करता हूँ कि मसीह और उसके वचन पर दृढ़ और अटल बने रहो, और अपने को मूर्तिपूजा से दूर रखो।' तब उसकी पत्नी ने कहा, 'परमेश्वर तेरे साथ रहे, प्रिय रोलैण्ड: मैं परमेश्वर के अनुग्रह से हैडली में तुझ से मिलूँगी।'
जनवरी, 1555 के अन्तिम दिन टेलर को ब्रैडफ़ोर्ड और सॉण्डर्स के साथ विनचेस्टर, नॉर्विच, लन्दन, सैलिस्बरी और डरहम के बिशपों के सामने उपस्थित होने के लिए बुलाया गया। तीनों पर झूठी शिक्षा और फूट का आरोप लगाया गया, और उनसे माँग की गई कि वे निश्चित उत्तर दें कि क्या वे अपने आपको रोम के बिशप के अधीन करेंगे और अपने भ्रमों को छोड़ देंगे। उनके इनकार करने पर उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। फ़ॉक्स कहता है, "इसके लिए उन्होंने परमेश्वर का धन्यवाद किया, और बिशपों से निडर होकर कहा, 'हमें सन्देह नहीं कि धर्मी न्यायी परमेश्वर तुम्हारे हाथों से हमारा लहू माँगेगा, और तुम में जो सबसे अधिक घमण्डी है वह भी मसीह-विरोधी को फिर से ग्रहण करने और मसीह की भेड़-बकरियों के विरुद्ध तुम्हारे इस अत्याचार पर, जो तुम अब दिखा रहे हो, पछताएगा।'" उसी दिन सन्ध्या को टेलर को कॉम्प्टर बन्दीगृह भेजा गया, और वह अपने भाइयों से अलग हो गया।
4 फरवरी को लन्दन का बिशप बोनर कॉम्प्टर बन्दीगृह में आया, और अनेक बेतुके रीति-रिवाज़ों के साथ टेलर को औपचारिक रूप से याजक के पद से गिरा दिया; फ़ॉक्स ने इनका हास्यास्पद वर्णन दिया है। पदच्युत किए जाने की रात उसकी पत्नी और उसके पुत्र थॉमस को उससे मिलने और उसके साथ भोजन करने की अनुमति मिली, और भोजन के बाद वे बड़े स्नेह और अनेक आँसुओं के साथ बिछुड़े। अगले दिन, 5 फरवरी को, वह हैडली की यात्रा पर निकला, ताकि अपने सदस्यों के सामने जलाया जाए। लन्दन से उसके प्रस्थान की परिस्थितियों का वर्णन फ़ॉक्स ने इतने मर्मस्पर्शी ढंग से किया है कि मैं सोचता हूँ कि उस पुराने इतिहासकार को ही अपनी बात स्वयं कहने दूँ।
"जिस दिन डॉ. टेलर ने कॉम्प्टर बन्दीगृह में अपनी पत्नी के साथ भोजन किया था, उसके अगले प्रभात, अर्थात् 5 फरवरी को, लन्दन का शेरिफ़ अपने अधिकारियों के साथ रात के दो बजे कॉम्प्टर पहुँचा, और डॉ. टेलर को बाहर लाकर बिना किसी प्रकाश के उसे अल्डगेट के बाहर की एक सराय 'वूलसैक' तक ले गया। डॉ. टेलर की पत्नी को शंका हुई कि उसके पति को उसी रात ले जाया जाएगा, इसलिए वह अल्डगेट के पास सेंट बोटोल्फ़ के गिरजाघर के बरामदे में अपने दो बच्चों के साथ सारी रात पहरा देती रही; उनमें एक का नाम एलिज़ाबेथ था, जो तेरह वर्ष की थी, और जिसे पिता-माता से विहीन होने पर डॉ. टेलर ने तीन वर्ष की आयु से दान के सहारे पाला था; दूसरी मरियम थी, जो डॉ. टेलर की अपनी पुत्री थी।
"जब शेरिफ़ और उसके साथी सेंट बोटोल्फ़ के गिरजाघर के सामने पहुँचे, तो एलिज़ाबेथ चिल्ला उठी, 'हाय मेरे प्यारे पिता! माँ, माँ: देखो, मेरे पिता को ले जाया जा रहा है!' तब उसकी पत्नी ने पुकारा, 'रोलैण्ड, रोलैण्ड: तू कहाँ है?' क्योंकि प्रभात बहुत अँधेरा था, इतना कि एक दूसरे को देख नहीं सकता था। डॉ. टेलर ने उत्तर दिया, 'प्रिय पत्नी, मैं यहाँ हूँ,' और रुक गया। शेरिफ़ के लोग उसे आगे ले जाना चाहते थे, पर शेरिफ़ ने कहा, 'महाशयो, मैं आप से विनती करता हूँ, थोड़ा रुकिए, और उसे अपनी पत्नी से बात करने दीजिए;' और वे रुक गए।
"तब वह उसके पास आई, और उसने अपनी पुत्री मरियम को गोद में उठा लिया, और उसने, उसकी पत्नी ने और एलिज़ाबेथ ने घुटने टेककर प्रभु की प्रार्थना की। यह देखकर शेरिफ़ बहुत रोया, और साथियों में से अनेक भी रोए। प्रार्थना कर चुकने के बाद वह उठा और अपनी पत्नी को चूमा, और उसका हाथ पकड़कर हिलाया, और कहा, 'प्रिय पत्नी, विदा: ढाढ़स रख, क्योंकि मेरा विवेक शान्त है। परमेश्वर मेरे बच्चों के लिए एक पिता उठाएगा।' और फिर उसने अपनी पुत्री मरियम को चूमा, और कहा, 'परमेश्वर
"और इस प्रकार उसे वूलसैक तक ले जाया गया, और उसकी पत्नी उसके पीछे-पीछे गई। वूलसैक पहुँचते ही उसे एक कोठरी में रखा गया, जहाँ उसे राजकीय रक्षक-दल के चार सिपाहियों और शेरिफ़ के लोगों के साथ रखा गया। डॉ. टेलर कोठरी में पहुँचते ही घुटनों के बल गिर पड़ा, और अपने आपको पूरी तरह प्रार्थना में लगा दिया। तब शेरिफ़ ने डॉ. टेलर की पत्नी को वहाँ देखकर, किसी भी प्रकार उसे अपने पति से और बात करने की अनुमति नहीं दी; परन्तु कोमलता से उससे कहा कि वह उसके घर जाए और उसे अपना ही घर समझे, और उससे प्रतिज्ञा की कि उसे किसी वस्तु की घटी न होगी, और दो अधिकारियों को उसे वहाँ पहुँचाने के लिए भेजा। फिर भी उसने अपनी माता के यहाँ जाने की इच्छा की, जहाँ अधिकारी उसे ले गए, और उसकी माता को आज्ञा दी कि जब तक वे फिर न आएँ, उसे वहीं रखे।"
फॉक्स ने रोलैंड टेलर की लंदन से हैडली तक की यात्रा का बारीकी से वर्णन किया है। उस समय की रीति के अनुसार वह घोड़े पर चला, और ब्रेंटवुड, चेम्सफ़ोर्ड तथा लैवनहैम में रुका। "सारे मार्ग में वह आनन्दित और प्रसन्न रहा, मानो वह किसी अति सुखद भोज या विवाह-उत्सव में जा रहा हो।" परन्तु हमें उस योग्य शहीद के जीवन के अन्तिम दृश्य के वर्णन से ही सन्तोष करना होगा, जो फॉक्स के अपने ही शब्दों में दिया जाएगा: -
"9 फरवरी, 1555 को (उसी दिन जब बिशप हूपर ग्लॉस्टर में जलाया गया), शेरिफ़ और उसके साथी डॉ. टेलर को हैडली की ओर ले चले; और जब हैडली से दो मील की दूरी पर पहुँचे, तो उसने थोड़ी देर के लिए घोड़े से उतरने की इच्छा प्रकट की; जो किया गया तो वह कूदा, और एक-दो बार ऐसे उछला जैसे लोग साधारणतः नाचते समय उछलते हैं। शेरिफ़ ने कहा, 'क्यों, मास्टर डॉक्टर, अब आपका क्या हाल है?' उसने उत्तर दिया, 'भला है, परमेश्वर का धन्यवाद हो, भले मास्टर शेरिफ़, इससे अच्छा कभी न था; क्योंकि अब मैं जानता हूँ कि मैं घर के लगभग निकट पहुँच गया हूँ। मुझे दो सीढ़ीदार बाड़ों से अधिक पार नहीं करने, और मैं ठीक अपने पिता के घर पर हूँ। परन्तु, मास्टर शेरिफ़,' उसने कहा, 'क्या हम हैडली से होकर न जाएँगे?' शेरिफ़ ने कहा, 'हाँ, आप हैडली से होकर जाएँगे।' तब उसने कहा, 'हे भले प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ! मैं मरने से पहले एक बार अपने झुण्ड को देखूँगा, जिनसे, हे प्रभु, तू जानता है कि मैंने सच्चे मन से प्रेम किया और जिन्हें सच्चाई से सिखाया। हे भले प्रभु, उन्हें आशीष दे, और उन्हें अपने वचन और सत्य में स्थिर रख।'
"जब वे हैडली पहुँचे और पुल के ऊपर से घोड़े पर आ रहे थे, तो पुल के छोर पर पाँच छोटे बच्चों के साथ एक कंगाल पुरुष प्रतीक्षा कर रहा था; जब उसने डॉ. टेलर को देखा, तो वह और उसके बच्चे घुटनों के बल गिर पड़े, हाथ उठाए, और ऊँचे स्वर से पुकारकर कहा, 'हे प्रिय पिता और भले चरवाहे, डॉ. टेलर, परमेश्वर तेरी सहायता और रक्षा करे, जैसे तूने बहुत बार मेरी और मेरे दीन बच्चों की सहायता की है।' परमेश्वर के इस सेवक के जीवन-काल में किए गए उसके सद्गुणी और दयालु दानों की ऐसी गवाही थी; क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि अब कंगाल लोग उसके भले कामों की गवाही दें, कि उसे विशेष सान्त्वना मिले, औरों के लिए उदाहरण हो, और उसके सतानेवाले तथा अत्याचारी विरोधियों की लज्जा हो। क्योंकि शेरिफ़ और जो और लोग उसे मृत्यु की ओर ले जा रहे थे, वे इस पर अत्यन्त चकित हुए, और शेरिफ़ ने उस कंगाल को ऐसे चिल्लाने पर कड़ी फटकार लगाई। हैडली की गलियों में मार्ग के दोनों ओर नगर और देहात के स्त्री-पुरुष उसे देखने की प्रतीक्षा में खड़े थे; और जब उन्होंने उसे इस प्रकार मृत्यु की ओर ले जाते देखा, तो आँसू भरी आँखों और विलाप-भरे स्वरों में एक दूसरे से कहने लगे, 'हाय, हे भले प्रभु, वह जा रहा है हमारा भला चरवाहा, जिसने हमें इतनी विश्वासयोग्यता से सिखाया, पिता के समान हमारी चिन्ता की, और भक्ति से हमारी अगुवाई की। हे दयालु परमेश्वर! अब हम बिखरे हुए दीन मेमने क्या करेंगे? इस अति दुष्ट संसार का क्या होगा? हे भले प्रभु, उसे सामर्थ्य दे और उसे शान्ति दे।' ऐसे ही और अनेक अत्यन्त करुण और दयनीय स्वर उठे। इसलिए शेरिफ़ और उसे ले जानेवाले उसके सिपाहियों ने लोगों को कड़ी फटकार लगाई। और डॉ. टेलर लोगों से निरन्तर यही कहता रहा, 'मैंने तुम्हें परमेश्वर का वचन और सत्य सुनाया है, और आज उस पर अपने लहू की मुहर लगाने आया हूँ।'
"भिक्षागृहों के सामने आकर, जिन्हें वह भली-भाँति जानता था, उसने अच्छे लोगों की ओर वह धन फेंका जो उन भले लोगों के द्वारा उसके बन्दीगृह के दिनों में उसे दिया गया था और बचा रह गया था। जहाँ तक उसकी जीविका का सम्बन्ध है, उन्होंने उसके बन्दीगृह में जाते ही उसे उससे छीन लिया था, इसलिए बन्दीगृह के सारे समय वह उन भले लोगों के दयालु दानों से पलता रहा जो उससे भेंट करने आते थे। इसलिए जो धन अब बचा था उसे उसने इसी उद्देश्य से एक दस्ताने में तैयार रखा, और, जैसा कहा जाता है, उसे उन कंगाल भिक्षुओं को दे दिया जो उसे देखने के लिए अपने द्वार पर खड़े थे। और जब वह भिक्षागृहों के अन्तिम घर पर आया, और वहाँ रहनेवाले कंगालों को, औरों के समान, अपने द्वारों पर तैयार न देखा, तो उसने पूछा, 'क्या वह अन्धा पुरुष और अन्धी स्त्री, जो यहाँ रहते थे, जीवित हैं?' उत्तर मिला, 'हाँ, वे भीतर हैं।' तब उसने दस्ताने समेत वह धन खिड़की से भीतर फेंक दिया, और आगे चल दिया।
"अन्त में, ऑल्डहैम कॉमन पर पहुँचकर, जो उसके दुःख सहने के लिए ठहराया हुआ स्थान था, और वहाँ लोगों की बड़ी भीड़ इकट्ठी देखकर उसने पूछा, 'यह कौन-सी जगह है, और इसका क्या अर्थ है कि इतने लोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं?' उत्तर मिला, 'यह ऑल्डहैम कॉमन है, वह स्थान जहाँ आपको दुःख उठाना है, और लोग आपको देखने आए हैं।' तब उसने कहा, 'परमेश्वर का धन्यवाद हो, मैं ठीक अपने घर पर हूँ;' और घोड़े से उतरकर उसने अपने सिर से टोप फाड़ दिया। [उसकी पत्नी] ने उसके साथ प्रार्थना की, परन्तु उन्होंने उसे धकेल दिया, और घोड़ों से कुचल देने की धमकी दी; फिर भी वह न हटी, वरन् वहीं रही और उसके साथ प्रार्थना करती रही। जब वह प्रार्थना कर चुका, तो खूँटे के पास गया और उसे चूमा, और एक तारकोल के पीपे में खड़ा हो गया जो उसके खड़े होने के लिए रखा गया था, और इस प्रकार अपनी पीठ खूँटे से सीधी लगाए, हाथ जोड़े और आँखें स्वर्ग की ओर उठाए खड़ा रहा, और निरन्तर प्रार्थना करता रहा।"
"अब उसके सिर के बाल बुरी तरह गाँठे हुए और ऐसे कटे थे जैसे कोई किसी मूर्ख का सिर काटे; यह वह भलाई थी जो भले बिशप बॉनर ने उसे पदच्युत करते समय उस पर की थी। परन्तु जब लोगों ने उसका आदरणीय और वृद्ध मुख, लम्बी सफ़ेद दाढ़ी सहित, देखा, तो वे फूट-फूटकर रो पड़े, और चिल्लाकर कहने लगे, 'परमेश्वर तेरी रक्षा करे, भले डॉ. टेलर! यीशु मसीह तुझे सामर्थ्य दे; पवित्र आत्मा तुझे शान्ति दे,' और ऐसी ही अन्य भक्तिपूर्ण शुभकामनाएँ। तब वह लोगों से कुछ कहना चाहता था, परन्तु अंगरक्षक सिपाही उसके चारों ओर इतने व्यस्त थे कि ज्यों ही वह मुँह खोलता, उनमें से कोई न कोई उसके मुँह में डण्डा ठूँस देता, और किसी भी प्रकार उसे बोलने की अनुमति न देता।
"डॉ. टेलर ने यह देखकर कि उसे बोलने की अनुमति नहीं दी जाएगी, बैठ गया, और सॉयस नामक एक व्यक्ति को देखकर उसे बुलाया, और कहा, 'सॉयस, मैं तुझसे विनती करता हूँ, आकर मेरे जूते उतार दे, और अपनी मेहनत के बदले उन्हें रख ले। तू बहुत समय से इनकी बाट जोह रहा था, अब इन्हें ले ले।' तब वह उठा, और अपने कुर्ते तक के सब वस्त्र उतारकर दे दिए; यह करके उसने ऊँचे शब्द से कहा, 'हे भले लोगो, मैंने तुम्हें परमेश्वर के पवित्र वचन को छोड़ और कुछ नहीं सिखाया, और केवल वे ही पाठ सिखाए जो मैंने परमेश्वर की धन्य पुस्तक—पवित्र बाइबल—से लिए हैं; और मैं आज यहाँ उसे अपने लहू से मुहर लगाने आया हूँ।' इस बात पर रक्षक-दल के एक सैनिक ने, जिसने मार्ग भर डॉ. टेलर के साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार किया था, एक लकड़ी की तलवार से उसके सिर पर ज़ोर का प्रहार किया, और कहा, 'क्या यही तेरी प्रतिज्ञा का निभाना है, अरे विधर्मी?' तब उसने यह देखकर कि वे उसे बोलने नहीं देंगे, घुटने टेककर प्रार्थना की, और लोगों में खड़ी एक दीन स्त्री आगे बढ़कर आई और
कुछ पीड़ादायक विलम्ब के बाद, और सहायता कर रहे पोप के अनुयायियों के कुछ दयनीय अपमानों के बाद, आग जलाई गई। तब फ़ॉक्स कहता है, "डॉ. टेलर ने दोनों हाथ उठाकर परमेश्वर को पुकारा, और कहा, 'हे स्वर्ग के दयालु पिता, मेरे उद्धारकर्ता यीशु मसीह के निमित्त, मेरी आत्मा को अपने हाथों में ग्रहण कर।' इस प्रकार वह बिना चिल्लाए या हिले-डुले चुपचाप खड़ा रहा, जब तक कि किसी ने उसके सिर पर बरछी से ऐसा प्रहार न किया कि उसका मस्तिष्क बाहर निकल पड़ा, और उसकी निर्जीव देह आग में गिर पड़ी।"
इस प्रकार अंग्रेज़ शहीदों में से एक सबसे उत्तम और साहसी व्यक्ति की मृत्यु हुई। एक पुराना, अनगढ़ पत्थर आज भी उस स्थान को चिह्नित करता है जहाँ उसे जलाया गया था, एक घिरे हुए खेत के बीच में, जो कभी एल्डहैम कॉमन का भाग था। उस पर यह अनोखा परन्तु सारगर्भित लेख खुदा है:—
"डॉ. टेलर ने उसकी रक्षा करते हुए जो
भला था, इस
स्थान पर अपना लहू छोड़ा।"
सन् 1819 में उसी स्थान पर एक और अधिक आडम्बरपूर्ण स्मारक बनाया गया, जिस पर हैडली के रेक्टर का लिखा एक लम्बा काव्यात्मक लेख है। परन्तु शहीद का इतिहास पत्थरों और स्मारकों की सहायता के बिना भी उस इलाके में याद किया जाता है। "मरने पर भी वह अब तक बोलता है।"
टेलर की अपनी पत्नी, परिवार और सदस्यों के प्रति अन्तिम विदा की इच्छाएँ एक पुस्तक में लिखी गई थीं, जो उसने अपने शहीद होने से केवल पाँच दिन पहले अपने पुत्र को विदाई की विरासत के रूप में दी। पाठक को ये अवश्य ही रुचिकर लगेंगी।
"मैं अपनी पत्नी और अपने बच्चों से कहता हूँ, प्रभु ने तुम्हें मुझे दिया, और प्रभु ने मुझे तुमसे और तुम्हें मुझसे ले लिया: प्रभु का नाम धन्य हो! मैं विश्वास करता हूँ कि वे धन्य हैं जो प्रभु में मरते हैं। परमेश्वर गौरैयों की और हमारे सिर के बालों की भी चिन्ता करता है। मैंने उसे सदा किसी भी पिता या पति से अधिक विश्वासयोग्य और कृपालु पाया है। इसलिए हमारे प्रिय उद्धारकर्ता मसीह के पुण्य के द्वारा उस पर भरोसा रखो। उस पर विश्वास करो, उससे प्रेम रखो, उसका भय मानो, और उसकी आज्ञा मानो; उससे प्रार्थना करो, क्योंकि उसने सहायता करने की प्रतिज्ञा की है। मुझे मरा हुआ न समझना, क्योंकि मैं निश्चय जीवित रहूँगा और कभी नहीं मरूँगा। मैं आगे जाता हूँ, और तुम पीछे-पीछे हमारे अनन्त घर में आओगे। मैं अपने अन्य बच्चों के पास जाता हूँ—सूसन, जॉर्ज, एलन, रॉबर्ट और ज़कारी के पास। मैंने तुम्हें उस एकमात्र सर्वशक्तिमान को सौंप दिया है।
"मैं हैडली के अपने प्रिय मित्रों से, और उन सब से जिन्होंने मुझे प्रचार करते सुना है, कहता हूँ कि मैं अपने सिद्धान्त के विषय में शान्त विवेक के साथ यहाँ से विदा होता हूँ, जिसके लिए मैं तुम से विनती करता हूँ कि मेरे साथ परमेश्वर का धन्यवाद करो। क्योंकि मैंने अपनी छोटी सी योग्यता के अनुसार दूसरों को वे ही पाठ बताए हैं जो मैंने परमेश्वर की पुस्तक, धन्य बाइबल, से इकट्ठे किए। 'इसलिए यदि मैं, या स्वर्ग से कोई दूत भी, तुम्हें उस सुसमाचार को छोड़ कोई और सुसमाचार सुनाए जो तुम ने ग्रहण किया है,' तो परमेश्वर का बड़ा शाप उस प्रचारक पर हो!
"परमेश्वर के निमित्त चौकस रहो कि तुम परमेश्वर का इन्कार न करो, और न विश्वास के वचन से फिरो, ऐसा न हो कि परमेश्वर तुम से फिर जाए, और तुम सदा के लिए नाश हो जाओ। परमेश्वर के निमित्त पोप-तन्त्र से सावधान रहो, क्योंकि यद्यपि उसमें एकता दिखाई देती है, तौभी वह व्यर्थ है, और मसीह-विरोधी है, और मसीह के विश्वास और सत्य में नहीं है।
"इतना प्रकाश इतनी स्पष्टता और सरलता से, सच्चाई और पूर्णता से, और सारे इंग्लैंड के लिए खोला जाने के बाद, पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप से सावधान रहो।
"प्रभु सब मनुष्यों को अपनी भली और पवित्र आत्मा, अपनी बुद्धि में बढ़ती, दुष्ट संसार का तिरस्कार, और परमेश्वर तथा स्वर्गीय मण्डली के साथ रहने की हार्दिक लालसा प्रदान करे; यीशु मसीह के द्वारा, जो हमारा एकमात्र मध्यस्थ, पक्षसमर्थक, धार्मिकता, जीवन, पवित्रीकरण और आशा है। आमीन। आमीन। प्रार्थना करो। प्रार्थना करो।
"रोलैंड टेलर, अनन्त उद्धार की निश्चित आशा के साथ, बिना किसी सन्देह के यहाँ से विदा होता है। मैं अपने स्वर्गीय पिता परमेश्वर का, यीशु मसीह के द्वारा जो मेरा निश्चित उद्धारकर्ता है, धन्यवाद करता हूँ। आमीन। 5 फरवरी, सन् 1555।
"'यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है, मैं किस से डरूँ? परमेश्वर ही धर्मी ठहरानेवाला है: कौन है जो दोषी ठहराए?' 'हे यहोवा, मैं ने तुझ पर भरोसा रखा है: मुझे कभी लज्जित न होने दे।'"
क्या कोई जानना चाहता है कि रोम की कलीसिया अचूक है या नहीं? वह रोलैंड टेलर जैसे शहीदों के इतिहास का ध्यानपूर्वक अध्ययन करे। रोमी कलीसिया ने जितनी भी मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती भूलें कीं, उनमें सबसे बड़ी भूल धर्म-सुधारकों को जलाना थी। इसने धर्म-सुधार के कार्य को दृढ़ कर दिया, और हज़ारों अंग्रेज़ों को प्रोटेस्टेंट बना दिया। जब साधारण अंग्रेज़ों ने देखा कि रोम की कलीसिया कितनी क्रूर और दुष्ट है और प्रोटेस्टेंट कितने साहसी हैं, तो उन्हें सन्देह न रहा कि सत्य किस ओर है। हमारे शहीद किए गए धर्म-सुधारकों की स्मृति इंग्लैंड में तब तक कभी न मिटे जब तक प्रभु न आए!
ह्यू लैटिमर: अध्यक्ष और शहीद
बिशप लैटिमर का नाम अंग्रेज़ी कलीसिया के इतिहास के सभी पाठकों को भली-भाँति ज्ञात है। सम्भवतः ऐसे लोग थोड़े ही होंगे जिन्होंने यह न सुना या पढ़ा हो कि तीन सौ वर्ष पहले इंग्लैंड की एक रानी "ख़ूनी मरियम" हुई थी, — और उसके शासनकाल में लोग जीवित जला दिए गए क्योंकि उन्होंने प्रोटेस्टेंट मत को त्यागने से इनकार किया, — और इन लोगों में से एक बिशप लैटिमर थे। परन्तु मैं चाहता हूँ कि आज के दिनों में अंग्रेज़ लोग इन बातों को और अच्छी तरह जानें। मैं चाहता हूँ कि वे अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों के प्रमुख जनों के जीवन, कार्यों और विचारों से पूरी तरह परिचित हो जाएँ। उनके नाम केवल घिसे-पिटे अलंकार बनकर न रह जाएँ जो किसी मंच के भाषण को सजाने और एक्सेटर हॉल की तालियाँ बटोरने की वक्तृत्व-चाल के काम आते हैं। उनके सिद्धान्त अब दूर क्षितिज पर मँडराती अस्पष्ट, धुँधली छायाएँ न रहें, बल्कि हमारे मन की आँखों के सामने साफ़, सुस्पष्ट और भली-भाँति परिभाषित हों। मेरी इच्छा है कि लोग समझें कि इस देश का सर्वोत्तम हित प्रोटेस्टेंट मत से जुड़ा हुआ है। मेरी अभिलाषा है कि लोग अपने हृदयों पर यह लिख लें कि इंग्लैंड की भलाई व्यापार, चतुर राजनीतिज्ञों, भाप, सेनाओं, जहाज़ी बेड़ों, सोने, लोहे, कोयले या अनाज पर नहीं, बल्कि अंग्रेज़ धर्म-सुधार के सिद्धान्तों को बनाए रखने पर निर्भर है। हमारा समय अंग्रेज़ कलीसिया के इतिहास के ज्ञान के प्रसार की ज़ोरदार माँग करता है। आजकल ऐसे चौंका देनेवाले विचार निडर होकर प्रस्तुत किए जाते हैं कि मनुष्य आँखें मलकर कहता है, "मैं कहाँ हूँ?" रोमन मत और प्रोटेस्टेंट मत के विषय में हमारे बीच एक ऐसी भावना पनप रही है जो, कम से कम कहें तो, अत्यन्त अस्वस्थ है। वह बढ़ी है, बढ़ रही है, और उसे घटाया जाना चाहिए। इस भावना को रोकने के लिए कुछ सीधे-सादे तथ्यों को सामने रखने से बढ़कर कोई उपाय नहीं। कहते हैं कि यदि किसी स्कॉटलैंडवासी को कायल करना हो तो उसे लम्बा तर्क देना चाहिए; और यदि किसी अंग्रेज़ को कायल करना हो तो उसे सीधे-सादे तथ्य देने चाहिए। इस जीवन-वृत्तान्त में मैंने मुख्यतः तथ्य ही एकत्र किए हैं। यदि कोई इन पन्नों में निजी अटकलें या वक्तृत्व का प्रदर्शन खोजने की आशा रखता है, तो मुझे डर है कि वह निराश होकर लौटेगा; परन्तु यदि किसी को सीधे-सादे तथ्य अच्छे लगते हैं, तो मुझे लगता है कि मैं उसे कुछ तथ्य दे सकूँगा। क्या किसी पाठक को सन्देह है कि इंग्लैंड की कलीसिया का सच्चा सदस्य कौन है? क्या आप उस बात के उदय और प्रसार से उलझन में हैं जिसे मूर्खतापूर्वक "कलीसिया-मत" कहा जाता है? तो आज मेरे साथ चलिए, और अंग्रेज़ कलीसिया के एक पिता से भेंट कीजिए। आइए, अंग्रेज़ धर्म-सुधार के दिनों के सबसे ईमानदार और खरे बोलनेवाले एक बिशप को गवाह के कटघरे में खड़ा करें। आइए, भले बूढ़े लैटिमर के जीवन और विचारों की जाँच करें। क्या किसी पाठक को सन्देह है कि रोम की कलीसिया का सच्चा स्वरूप क्या है? क्या आप उन चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाले सज्जनों से घबराए हुए हैं जो आपसे कहते हैं कि इंग्लैंड की कलीसिया और रोम की कलीसिया के बीच कोई मौलिक भेद नहीं है? क्या आप तथाकथित "कैथोलिक" सिद्धान्तों की उस तीव्र लालसा से हैरान हैं जो कुछ भटके हुए कलीसिया-जनों की पहचान है, और जो "कैथोलिक" शिक्षा, "कैथोलिक" रीति-रिवाज़ों, "कैथोलिक" भक्ति-पुस्तकों और "कैथोलिक" वास्तुकला में प्रकट होती है? तो आज मेरे साथ चलिए, और अंग्रेज़ इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटिए। आइए देखें कि जब रोमी शिक्षक अंग्रेज़ों को सिखाते थे और सब कुछ अपनी मनमानी से चलाते थे, तब इंग्लैंड की वास्तव में कैसी दशा थी। आइए देखें कि रोम की कलीसिया जब उसके हाथ में पूरा अधिकार होता है तब क्या करती है। आइए देखें कि वह खुली बाइबल, निजी निर्णय और विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के मित्रों के साथ कैसा व्यवहार करती है। आइए देखें कि रोम की कलीसिया ने बिशप लैटिमर के साथ क्या किया। बिशप लैटिमर के इतिहास की जाँच करते समय, जिस समय में वे जिए, उस पर ध्यानपूर्वक विचार आवश्यक है। किसी मनुष्य के आचरण का उचित मूल्यांकन तब तक सम्भव नहीं जब तक हम यह न जानें कि वह किन परिस्थितियों में रखा गया था और उसे किन कठिनाइयों से जूझना पड़ा। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि जब अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों ने अपना काम आरम्भ किया तब इंग्लैंड की वास्तविक दशा क्या थी, और वह काम कितनी भारी प्रतिकूलताओं के बीच किया गया, वह इस उत्तम मण्डली के प्रति हमारे ऋण की पूरी सीमा को नहीं जान सकता।
लैटिमर का जन्म हेनरी सप्तम के शासनकाल में हुआ था। वह हेनरी अष्टम और एडवर्ड षष्ठ के शासनकाल में जीवित रहा, और रानी मरियम के शासनकाल में उसे मृत्युदण्ड दिया गया। उसने अपना जीवन उस समय आरम्भ किया जब इस देश में पोप-तन्त्र का निर्विवाद शासन था। उसने हेनरी अष्टम और रोम के बीच फूट का आरम्भ और इंग्लैंड में धर्म की एक संक्रमणकालीन अवस्था की स्थापना देखी। वह एडवर्ड षष्ठ के अधीन प्रोटेस्टेंट मत का पूर्ण विकास और एक प्रार्थना-विधि तथा धर्म-सूत्रों का संकलन देखने के लिए जीवित रहा, जो उन प्रार्थना-विधि और धर्म-सूत्रों से जो आज हमारे पास हैं बहुत थोड़ा ही भिन्न थे। इन तीनों कालों में से प्रत्येक के विषय में मुझे कुछ शब्द कहने हैं। लैटिमर के जीवन का वह काल, जब इंग्लैंड में पोप-तन्त्र सर्वोपरि था, पूर्ण आत्मिक अन्धकार का काल था। अन्धविश्वास की जिस गहराई में हमारे आदरणीय पूर्वज डूबे हुए थे, वह रोंगटे खड़े कर देने के लिए पर्याप्त है। इसमें सन्देह नहीं कि सारे देश में बिखरे हुए बहुत से लॉलार्ड और विक्लिफ़ के अनुयायी थे, जो सत्य को थामे हुए थे और राष्ट्र के नमक थे। परन्तु जिस प्रचण्ड सताव से इन भले मनुष्यों पर प्रायः आक्रमण किया जाता था, उसने उन्हें अधिक उन्नति करने से रोके रखा। वे मुश्किल से अपनी ही भूमि बचाए रख सके। और जहाँ तक जनसाधारण का सम्बन्ध है, घोर अन्धकार ने उनके मनों को ढाँप रखा था। अधिकांश याजक और धर्म के शिक्षक स्वयं उन सब बातों में गहरे अज्ञानी थे जिन्हें उन्हें जानना चाहिए था। उन्हें प्रायः विद्या या चरित्र की किसी उचित जाँच के बिना ही नियुक्त कर दिया जाता था। उनमें से बहुत से, यद्यपि अपनी प्रार्थना-पुस्तकें पढ़ सकते थे, बाइबल के विषय में कुछ भी नहीं जानते थे। इतिहासकार स्ट्राइप के अनुसार कुछ तो प्रभु की प्रार्थना भी मुश्किल से बोल पाते थे, और कितने ही दस आज्ञाएँ भी दोहरा नहीं सकते थे। कलीसिया की प्रार्थनाएँ लैटिन भाषा में थीं, जिसे शायद ही कोई समझता था। प्रचार तो लगभग था ही नहीं, और जो था वह घोर पवित्रशास्त्र-विरुद्ध और शिक्षा-रहित था। नियुक्त किए हुए पुरुषों के विशाल झुण्ड मठों और आश्रमों के रूप में इंग्लैंड भर में बिखरे हुए थे। इन सुन्दर भवनों के निवासी कदाचित् ही कभी बहुत पवित्र और आत्मत्यागी होते थे, और प्रायः अत्यन्त दुराचारी और बदनाम जीवन बिताने वाले मनुष्य होते थे। उनका चरित्र ठीक वैसा ही था जैसा "रोटी की बहुतायत और आलस्य की अधिकता" से अपेक्षित था। उन्होंने विद्या की उन्नति के लिए लगभग कुछ नहीं किया। सच्चे धर्म के प्रसार के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। वे केवल दो बातों की चिन्ता करते थे: अपनी जेबें भरना और अपनी सत्ता बनाए रखना। पहले उद्देश्य के लिए वे निर्बल और मरणासन्न लोगों को समझाते थे कि वे कलीसिया को धन और भूमि दें, इस दिखावटी बहाने से कि इस प्रकार वे शुद्धिकरण-स्थान से छुड़ाए जाएँगे, और उनका विश्वास उनके भले कर्मों से प्रमाणित होगा। दूसरे उद्देश्य के लिए वे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ अपने पास होने का दावा करते थे। पापों का अंगीकार उन्हीं के सामने करना होता था। उनके पूर्ण पापमोचन और अन्तिम अभिषेक के बिना कोई मनुष्य उद्धार नहीं पा सकता था। उनके मिस्सा-विधानों के बिना कोई आत्मा शुद्धिकरण-स्थान से छुड़ाई नहीं जा सकती थी। संक्षेप में, वे व्यवहार में मसीह और मनुष्य के बीच मध्यस्थ थे; और उन्हें हानि पहुँचाना सबसे बड़ा अपराध और पाप माना जाता था। उदाहरण के लिए, पुराना लेखक फुलर हमें बताता है कि 1489 में एक इतालवी ने इंग्लैंड में बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त की, क्योंकि उसके पास पोप की ओर से यह अधिकार था कि वह लोगों को सूदखोरी, पद-विक्रय, चोरी, हत्या, व्यभिचार और जारकर्म, और पादरी-वर्ग पर प्रहार करने तथा पोप के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने को छोड़कर सब प्रकार के अपराधों से मुक्त कर दे। (i. 532. टेग का संस्करण।) लैटिमर की युवावस्था में, जब इंग्लैंड में पोप-तन्त्र का आखिरी बार बोलबाला था, रोमी याजक ऐसे ही थे। यह कहना कि वे सामान्यतः अज्ञानी, लोभी, विषयासक्त और मनुष्यों की आत्माओं और शरीरों पर निरंकुश अत्याचारी थे, सत्य से रत्ती भर भी अधिक कहना नहीं है। जब लैटिमर की युवावस्था में याजक इसी प्रकार के मनुष्य थे, तो यह सुनकर हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लोग सच्चे धर्म से पूर्णतः अनजान थे। यदि ऐसा न होता तो सचमुच चमत्कार होता, क्योंकि उनके पास न सुनने के लिए खरा प्रचार था, न पढ़ने के लिए बाइबल। एक नया नियम £2 16s. 3d. से कम में नहीं खरीदा जा सकता था, और खरीदने वाले को उसे खरीदने के कारण विधर्मी समझे जाने का खतरा रहता था। इसलिए बहुत बड़े बहुमत का मसीही धर्म स्वाभाविक रूप से केवल एक नाम और रूप था। सब्त का दिन खेल और मनोरंजन का दिन था, गम्भीर आराधना का दिन नहीं। शायद सौ में एक भी इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे सकता था कि "उद्धार पाने के लिए मैं क्या करूँ," या धर्मी ठहराया जाना, नया जन्म, पवित्रीकरण, मसीह का पद, या उसके कार्य का ज़रा-सा भी वर्णन नहीं कर सकता था।
आत्मा। स्वर्ग के मार्ग के विषय में मनुष्य की सामान्यतः एकमात्र धारणा यह थी कि जैसा याजक कहे वैसा करे, और "सच्ची कलीसिया" का सदस्य बना रहे! इस प्रकार अन्धे ने अन्धे को मार्ग दिखाया, और सब मिलकर एक ही गड्ढे में लोटते रहे। साधारण सामान्य जन के पास जो भी व्यावहारिक धर्म था, वह इतना ही था: कुँवारी मरियम और सन्तों से प्रार्थनाएँ, याजकों को मिस्सा कराने के लिए धन देना, पवित्र स्थानों की तीर्थयात्राएँ, और मूर्तियों तथा अवशेषों की आराधना। उनके अन्धविश्वासी रीति-रिवाजों की सूची भयावह होगी। वे आँधी-तूफ़ान से पहले पवित्र जल लेने कलीसिया की ओर दौड़ते थे। महामारी के दिनों में वे सन्त रूक की शरण लेते थे। जूड़ी-बुखार में वे सन्त पर्नेल से प्रार्थना करते थे। विवाह की इच्छा रखनेवाली युवतियाँ सन्त निकोलस की सहायता माँगती थीं। अपने पतियों से ऊबी हुई पत्नियाँ सन्त अनकम्बर के पास जाती थीं। एक ही वर्ष में एक लाख तीर्थयात्री कैन्टरबरी में सन्त थॉमस अ'बेकेट की कब्र पर गए, ताकि उनकी आत्मा को स्वर्ग की ओर सहायता मिले। एक ही वर्ष में कैन्टरबरी के गिरजाघर में मसीह की वेदी पर 3 पाउण्ड 2 शिलिंग 6 पेंस चढ़ाए गए; कुँवारी मरियम की वेदी पर 63 पाउण्ड 5 शिलिंग 6 पेंस; और थॉमस अ'बेकेट की वेदी पर 832 पाउण्ड 12 शिलिंग 3 पेंस। जिन मूर्तियों की आराधना होती थी वे प्रायः मूर्तियाँ होने के साथ-साथ घोर धोखा भी थीं। जिन अवशेषों की आराधना होती थी वे भी मूर्तियों के समान ही विकृत और निरर्थक थे। सन्तों की हड्डियों के पूरे-के-पूरे ढेर, जिनका वर्षों से आदर होता आया था, अन्त में हिरनों और सूअरों की हड्डियाँ निकलीं। ये बातें कहना भयंकर है, परन्तु इन्हें जानना आवश्यक है। रोम की कलीसिया ये सब बातें जानती थी, इनकी ओर से आँखें मूँदे रही, इन्हें स्वीकृति दी, इनका बचाव किया, इन्हें सिखाया, और अपने सदस्यों पर थोपा। तीन सौ पचास वर्ष पहले जब अंग्रेज़ धर्म-सुधारक उठाए गए, तब इंग्लैंड में धर्म की यही दशा थी। ह्यू लैटिमर के बचपन और जवानी में अंग्रेज़ों का मसीही धर्म यही था! लैटिमर के जीवन का दूसरा काल, जब इंग्लैंड रोमवाद और प्रोटेस्टेंटवाद के बीच संक्रमण की अवस्था में था, अनेक विचित्र बातें प्रस्तुत करता है। एक ओर हम देखते हैं कि धर्म का सुधार एक ऐसे राजा के द्वारा आरम्भ हुआ जिसके उद्देश्य, कम-से-कम कहें तो, आत्मिक नहीं थे। यह मान लेना हास्यास्पद होगा कि हेनरी अष्टम जैसे विलासी अत्याचारी ने पोप से सम्बन्ध इसलिए तोड़ा कि पोप ने उसकी इच्छा के आड़े आ गया था, किसी और कारण से नहीं। हम देखते हैं कि अरागोन की कैथरीन से अपने विवाह के विषय में उसकी दिखावटी आपत्तियाँ उसे क्रैन्मर और लैटिमर के सम्पर्क में लाती हैं। हम देखते हैं कि एक समय वह इन भले पुरुषों की सलाह से इतना मार्गदर्शित होता है कि हेरोदेस के समान वह बहुत-सी ऐसी बातें करता है जो उचित हैं और सुसमाचार के कार्य को आगे बढ़ाने के योग्य हैं। वह क्रैन्मर को कैन्टरबरी का आर्कबिशप बनाता है, और जीवन के अन्त तक उस पर कृपा रखता है। वह बाइबल को अंग्रेज़ी में छपने और कलीसियाओं में रखे जाने देता है। वह मूर्तियों को तोड़ने की आज्ञा देता है, और अनेक घोर अन्धविश्वासों को दबा देता है। वह पोप की सर्वोच्चता के सिद्धान्त को निडरता से अस्वीकार करता है। वह मठों को भंग करता है, और उनके निवासियों की दुष्टता को सबके सामने लज्जित करता है। यह सब हम देखते हैं, और धन्यवाद करते हैं। फिर हम दूसरे समय उसे पोप के मतों का बचाव करते और ऐसे लोगों को जलाते देखते हैं जिन्होंने, शहीद लैम्बर्ट के समान, उनका इनकार किया। हम उसे प्रसिद्ध छह अनुच्छेद प्रकाशित करते देखते हैं, जिन्होंने पदार्थान्तरण, निजी मिस्सा, पादरियों के अविवाहित रहने, ब्रह्मचर्य की शपथों, कान में पाप-स्वीकार, और सामान्य जनों को प्याला न देने के सिद्धान्तों की फिर से पुष्टि की। सबसे बुरी बात यह कि हम उसमें जीवन भर एक घमण्डी, हठी और विलासी मनुष्य के चिह्न देखते हैं, और इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि उसका हृदय कभी परमेश्वर की दृष्टि में ठीक था। ऐसी असंगतियों के दोषी मनुष्य को परमेश्वर के कार्य के लिए काम में लाया जाना परमेश्वर के विधान की गहरी बातों में से है। हम इसे समझ नहीं सकते। हमें प्रतीक्षा करनी होगी। दूसरी ओर, हेनरी अष्टम से मुड़कर जब हम पहले अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों को देखते हैं, तो उनमें उस बात के प्रबल लक्षण दिखाई देते हैं जिसे फुलर "गोधूलि का धर्म" कहता है। हम देखते हैं कि वे हेनरी अष्टम के शासन में ऐसी पुस्तकें निकालते हैं, जो रोमी शिक्षा की तुलना में बहुत बड़ा सुधार और आगे का कदम होने पर भी, अब भी कुछ ऐसी बातें रखती हैं जो पवित्रशास्त्र के अनुसार नहीं हैं। ऐसी थीं "आवश्यक शिक्षा" और "एक मसीही मनुष्य की शिक्षा-विधि"। फिर भी हम देखते हैं कि वे धीरे-धीरे आत्मिक ज्ञान में बढ़ते जाते हैं, शायद स्वयं उन्हें जाने बिना, और विशेषकर पदार्थान्तरण के भ्रम के विषय में। हम देखते हैं कि वे निरन्तर रोके और पीछे थामे जाते हैं—कुछ तो राजा के मनमाने व्यवहार से, कुछ कलीसिया के भीतर पोप के पक्ष के लोगों के साथ मिलकर काम करने की भारी कठिनाई से, और कुछ स्थानीय पादरी-वर्ग की घोर अज्ञानता से। तो भी हेनरी अष्टम के शासन के अन्त की तुलना उसके आरम्भ से करने पर हमें स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि बहुत भूमि जीती गई। हम परमेश्वर की सर्वोपरि सामर्थ्य की प्रशंसा करना सीखते हैं, जो हेनरी अष्टम को वैसे ही काम में ला सकता है जैसे उसने नबूकदनेस्सर या सन्हेरीब को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए काम में लाया। और अन्त में, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, हम धर्म-सुधारकों के धैर्यपूर्ण दृढ़ परिश्रम की प्रशंसा करना सीखते हैं। यद्यपि उनके पास थोड़ा ही बल था, उन्होंने उसे काम में लगाया। यद्यपि उनके लिए केवल एक छोटा-सा द्वार खुला था, वे उसमें से भीतर गए। यद्यपि उनके पास केवल एक ही तोड़ा था, उन्होंने उसे पूरे मन से परमेश्वर के लिए लगाया, और भूमि में गाड़ न दिया। यद्यपि उनके पास थोड़ा ही प्रकाश था, वे उसके अनुसार पूरी रीति से जिए। यदि वे जो चाहते थे वह न कर सके, तो जो कर सकते थे वह किया, और अपने कार्य में आशीष पाई। लैटिमर के जीवन का दूसरा काल ऐसा ही था। यह कभी न भूला जाए कि इसी समय इंग्लैंड की कलीसिया की नींव खोदी गई, और कूड़े-कचरे के विशाल ढेर उन निर्माताओं के मार्ग से हटाए गए जो आगे आनेवाले थे। इस दृष्टि से देखने पर कलीसिया के इतिहास के विद्यार्थी के लिए यह सदा एक रोचक काल रहेगा। लैटिमर के जीवन का अन्तिम काल, जिसमें एडवर्ड षष्ठ का शासन आता है, अनेक बातों में उन दो कालों से बहुत भिन्न है जिनका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ। एडवर्ड के छोटे परन्तु उल्लेखनीय शासनकाल में अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंटवाद का कार्य बहुत आगे बढ़ा। हूकर ने उसके विषय में सच ही कहा कि "वह जवानी में मरा, परन्तु बहुत जिया, यदि जीवन कर्म ही है।" एक अत्याचारी राजा के हस्तक्षेप की दासता से छूटकर क्रैन्मर और उसके मित्र धर्म-सुधार के कार्य में तेज़ी से बढ़ते गए। बोनर और गार्डिनर अब उन्हें पीछे रोक न सके। इस भले कार्य में भाग लेने से इनकार करने पर पोप के ये दोनों अध्यक्ष पदच्युत किए गए और उनका मुँह बन्द कर दिया गया। रिडले और हूपर जैसे विश्वासयोग्य पुरुष अध्यक्ष के आसन पर बैठाए गए। पोप-सम्बन्धी रीतियों की बड़ी सफ़ाई की गई। एक प्रार्थना-पद्धति रची गई, जो हमारी वर्तमान प्रार्थना-पुस्तक से बहुत थोड़ी ही भिन्न थी। धर्म के बयालीस अनुच्छेद तैयार किए गए, जो हमारे अपने उनतालीस अनुच्छेदों का आधार हैं। प्रचारकों की कमी पूरी करने के लिए उपदेशों की पहली पुस्तक प्रकाशित की गई। सैद्धान्तिक कथन में ऐसी यथार्थता और स्पष्टता प्राप्त हुई जो अब तक अज्ञात थी।
बूसर और पीटर मार्टिर जैसे विद्वान विदेशियों को इंग्लैंड आने का निमन्त्रण दिया गया, और उन्हें ऑक्सफ़ोर्ड तथा कैम्ब्रिज में रीजियस प्रोफ़ेसर ऑफ़ डिविनिटी नियुक्त किया गया। यदि धर्म-सुधारकों को और समय मिलता तो वे सुधार के कार्य को कितना आगे ले जाते, इसका अनुमान लगाना अब व्यर्थ है। बहुत थोड़े वर्षों में उन्होंने जो परिवर्तन किए, उन्हें देखते हुए यह सम्भव था कि यदि एडवर्ड की असामयिक मृत्यु ने उन्हें न रोका होता, तो वे हमारी कलीसिया को उतना सिद्ध बना देते जितनी कोई दृश्य कलीसिया हो सकती है। फिर भी एक बात ऐसी थी जिसे एडवर्ड षष्ठ के शासनकाल के धर्म-सुधारक पूरा न कर सके। वे स्थानीय पादरियों के हृदय नहीं बदल सके। हज़ारों पादरी इंग्लैंड की कलीसिया में पद पर बने रहे, जिन्हें क्रैन्मर और उसके दल के कार्यों से कोई सहानुभूति न थी। इन भले मानुषों से छुटकारा पाने का कोई उपाय न था, क्योंकि वे अपनी वृत्तियाँ बचाए रखने के लिए कुछ भी प्रण करने, कुछ भी हस्ताक्षर करने और कुछ भी शपथ खाने को तैयार थे। परन्तु जहाँ वे ऊपर से क्रैन्मर के आदेशों और आज्ञाओं का पालन करते थे, वहाँ अन्तर में वे अनुग्रहहीन, अज्ञानी और आधे पोप के अनुयायी ही थे। बिशप हूपर ने अपनी पहली यात्रा में ग्लॉस्टर धर्मप्रान्त के डीन, प्रीबेन्डरियों और पादरियों से जो प्रश्न पूछना आवश्यक समझा, और उन्हें जो उत्तर मिले, वे एडवर्ड षष्ठ के समय के अंग्रेज़ पादरियों की दशा का एक दुःखद उदाहरण हमारे सामने रखते हैं। ऐसी बातें पीड़ा देनेवाली और चकित करनेवाली हैं; परन्तु यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम उन्हें जानें। वे तुरन्त समझा देती हैं कि जब खूनी मरियम सिंहासन पर आई तो उसने पोप-मत को इतनी सरलता से कैसे पुनः स्थापित कर दिया। जैसे पादरियों का अभी वर्णन किया गया, वे उसकी इच्छा का कोई विरोध करनेवाले नहीं थे। ऐसी बातें क्रैन्मर और एडवर्ड षष्ठ के दिनों के धर्म-सुधारकों की स्थिति पर बहुत प्रकाश डालती हैं। सम्भवतः हमें इस बात का बहुत कम अनुमान है कि भीतर और बाहर से उन पर कितनी भारी कठिनाइयाँ टूट पड़ी थीं। सबसे बढ़कर, ऐसी बातें हमें लैटिमर के समय के सबसे उज्ज्वल भाग में भी इंग्लैंड में धर्म की दशा का कुछ अनुमान देती हैं। यदि लैटिमर के बूढ़े होने पर भी ऐसी बातें देखी जाती थीं, तो जब वह जवान था तब क्या कुछ देखा गया होगा? यदि एडवर्ड के शासन में भी ऐसा अज्ञान फैला हुआ था
छठे के राज्य में भी, तो हेनरी आठवें के राज्य में अन्धकार कितना घना रहा होगा! अब मुझे लैटिमर के समय के विषय पर और नहीं ठहरना चाहिए। यह विषय हूपर की जीवनी में पहले ही पूरी तरह निपटाया जा चुका है, और मैं तथ्यों की नीरस और उबाऊ पुनरावृत्ति से अपने पाठकों को थकाना नहीं चाहता। परन्तु मेरा पक्का विश्वास है कि इंग्लैंड के धर्म-सुधार को ठीक-ठीक समझने के लिए इन तथ्यों का ज्ञान नितान्त आवश्यक है, इसलिए मैं आशा करता हूँ कि जो थोड़े-से तथ्य मैंने दिए हैं वे व्यर्थ न ठहरेंगे। शान्त मन से विचार करने पर मुझे भरोसा है कि मेरे पाठक मुझसे सहमत होंगे कि जैसा आजकल कुछ लोग कहते हैं कि इस देश ने पोप-मत से छुटकारा पाकर कुछ खोया ही है, यह बात निरी मूर्खता की चरम सीमा है। "पुराने समय के आनन्दमय इंग्लैंड," "मध्य-युगीन भक्ति," "विश्वास के युगों" और "हमारे कैथोलिक पूर्वजों की श्रद्धापूर्ण आदतों" के विषय में जो बकवास कही जाती है, उसे सुनकर सचमुच आश्चर्य होता है। वाल्टर स्कॉट की मनमोहक रचनाओं और प्यूजिन की सुन्दर वास्तुकला की रूपरेखाओं ने इंग्लैंड में रोमी मत पर झूठी चमक चढ़ा दी है और बहुतों को यह सन्देह करने पर विवश कर दिया है कि हमारा धर्म-सुधार वास्तव में कोई लाभ भी था या नहीं। इंग्लैंड के समाज की जो दशा स्कॉट ने कभी अपनी लेखनी से और प्यूजिन ने अपनी तूलिका से इतनी रोचक बना दी है, वह कविताओं और चित्रों में कहीं अधिक सुन्दर लगती है, जबकि सच्चाई में वह कभी वैसी नहीं थी। निश्चय जानिए कि "दूरी दृश्य में मोहकता भर देती है।" हम इस बात से सन्तुष्ट रह सकते हैं कि नेटली, ग्लास्टनबरी, बरी, फाउंटेन्स, मेलरोज़ और बोल्टन के मठ अब खण्डहर होकर हेनरी सातवें के दिनों की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी हैं। बहुत कम अंग्रेज़ों को शायद इसका तनिक भी अनुमान होगा कि धर्म-सुधार से हमने कितना कुछ पाया है। हमने ज्योति, ज्ञान, नैतिकता और धार्मिक स्वतन्त्रता पाई है। बहुत कम लोगों को इसका स्पष्ट विचार है कि जब पोप-मत इंग्लैंड में अन्तिम बार फल-फूल रहा था, तब उस वृक्ष पर कौन-से फल लगते थे। वे फल थे: अज्ञान, अन्धविश्वास, दुराचार और याजकों का अत्याचार। परमेश्वर क्रोधित हुआ। आत्माएँ नाश हुईं और शैतान प्रसन्न हुआ। मुझे फिर भरोसा है कि मेरे पाठक मेरे साथ यह अनुभव करेंगे कि हेनरी आठवें के समय में इंग्लैंड के धर्म-सुधारकों के कामों और लेखों को उनके परिपक्व विचारों की कोई सच्ची कसौटी मान लेना सबसे अनुचित बात है। यह वैसा ही अनुचित है जैसे किसी पूर्ण-विकसित मनुष्य के चरित्र को उसकी बाल्यावस्था की बातों और कामों से नापना। हेनरी आठवें के समय में क्रैन्मर और उसके सहयोगी आत्मिक बाल्यावस्था में थे। वे धर्म की कई बातों को धुँधले शीशे में से देखते थे। एडवर्ड छठे के राज्य में पहुँचकर ही उन्होंने बचपन की बातें त्यागीं। इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि कोई मनुष्य इंग्लैंड के धर्म-सुधार के आरम्भ में छपी रचनाओं से चतुराई से चुने हुए उद्धरण देकर हमें धोखा न दे। यदि आप चाहें तो धर्म-सुधारकों को एडवर्ड छठे के राज्य में लिखे उनके लेखों से परखिए, परन्तु हेनरी आठवें के राज्य के लेखों से नहीं। अन्त में, मुझे भरोसा है कि मेरे पाठक मुझसे सहमत होंगे कि आरम्भिक अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों को यह कहकर नीचा दिखाना सबसे अनुचित है कि वे पर्याप्त दूर तक नहीं गए। ऐसे आरोप लगाना सरल है, परन्तु लगानेवाले शायद ही कभी उन भारी बाधाओं पर विचार करते हैं जिन्हें धर्म-सुधारकों को पार करना था, और उन भारी बुराइयों पर जिन्हें उन्हें दूर करना था। यह सोचना निरी मूर्खता है कि उन्हें बस किसी पुरानी इमारत से काई खुरचकर उस पर फिर चूना पोतना था। उन्हें तो एक पुराने जर्जर घर को ढाकर उसे नींव से फिर बनाना था। उनके कामों की आलोचना ऐसे करना मूर्खता है मानो उन्होंने शान्त समुद्र पर, अनुकूल हवा में, साफ़ मार्ग पर यात्रा की हो। इसके विपरीत, उन्हें धारा, पवन और ज्वार के विरुद्ध एक सँकरी और कठिन खाड़ी में से धर्म की नाव खेनी पड़ी। उनकी सारी कठिनाइयों को एक साथ रखिए: हेनरी आठवें का मनमाना और दुराचारी स्वभाव, और एडवर्ड छठे की कच्ची आयु; जनसाधारण का सामान्य अज्ञान; अपनी सम्पत्ति से वंचित किए गए साधुओं और फ़कीरों की कड़वी शत्रुता; बहुत-से अध्यक्षों का खुला विरोध, और पादरी-वर्ग के एक बहुत बड़े भाग की गुप्त उदासीनता; इन सब बातों को एक साथ रखकर भली-भाँति तौलिए, तब मैं समझता हूँ कि आप आरम्भिक धर्म-सुधारकों के काम को हल्के में नहीं लेंगे। जहाँ तक मेरा अपना सम्बन्ध है, मुझे यह आश्चर्य नहीं कि उन्होंने इतना कम किया, बल्कि यह आश्चर्य है कि उन्होंने इतना अधिक कर दिखाया। मैं उनकी दृढ़ता पर चकित हूँ। मैं उनकी सफलता पर विस्मित हूँ। मैं देखता हूँ कि अपेक्षाकृत निर्बल साधनों से बहुत बड़े परिणाम उत्पन्न हुए, और इसका एकमात्र कारण मैं यही बता सकता हूँ कि "परमेश्वर सचमुच उनके साथ था।"
लैटिमर का जीवन।
मेरे विषय की अगली शाखा, जिसकी ओर मैं अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, बिशप लैटिमर के जीवन की कथा है। ह्यू लैटिमर का जन्म लगभग सन् 1485 में लेस्टरशायर प्रदेश में माउण्ट सोरेल के पास थर्कैस्टन में हुआ था। राजा एडवर्ड षष्ठ के सामने दिए गए अपने एक उपदेश में उसने अपने पिता और परिवार का ऐसा सजीव वर्णन किया है कि न्याय यही है कि मैं उसे उसी के शब्दों में दूँ। वह कहता है, "मेरे पिता एक किसान थे, और उनके पास अपनी कोई भूमि न थी। उनके पास अधिक से अधिक तीन-चार पाउण्ड वार्षिक की एक जोत थी, और उसी पर वे इतनी खेती करते थे कि आधा दर्जन आदमियों का निर्वाह होता था। उनके पास सौ भेड़ों के चरने की जगह थी, और मेरी माता तीस गायें दुहती थीं। वे इस योग्य थे कि जब राजा के वेतन लेने के स्थान पर पहुँचना होता, तो राजा के लिए कवच-सामग्री लेकर स्वयं और अपने घोड़े के साथ जाते, और जाते भी थे। मुझे स्मरण है कि जब वे ब्लैकहीथ के मैदान को गए, तब मैंने उनका कवच कसा था। उन्होंने मुझे पाठशाला में पढ़ाया, नहीं तो मैं अब राजा महाराज के सामने प्रचार करने के योग्य न होता। उन्होंने मेरी बहनों का विवाह पाँच-पाँच पाउण्ड देकर किया, और उन्हें भक्ति और परमेश्वर के भय में पाला। वे अपने कंगाल पड़ोसियों का आतिथ्य करते थे, और कुछ दान भी कंगालों को देते थे।" (Works, i. 101. Parker's Soc. edition.) भले बिशप ने अपने ही परिवार का यह सादा वर्णन ऐसा ही दिया है। यह कहना भी उचित है कि लैटिमर उन हज़ारों उदाहरणों में से एक है जो इस बात के साक्षी हैं कि इंग्लैण्ड अपनी सब त्रुटियों के होते हुए भी ऐसा देश है जहाँ मनुष्य बहुत नीचे से आरम्भ करके भी बहुत ऊँचे तक पहुँच सकता है। लैटिमर चौदह वर्ष की आयु में कैम्ब्रिज भेजा गया, और सन् 1509 में क्लेयर हॉल का फेलो चुना गया। उसके आरम्भिक इतिहास के विषय में हम बहुत कम जानते हैं, केवल यह उल्लेखनीय बात, जो उसने स्वयं हमें बताई है, कि तीस वर्ष की आयु तक वह अत्यन्त उग्र और कट्टर पोप का अनुयायी था। जैसे पौलुस मनुष्यों को यह बताने में लज्जित न हुआ कि एक समय वह "निन्दा करनेवाला, और सतानेवाला, और अन्धेर करनेवाला" था, वैसे ही इस पुराने प्रोटेस्टेंट बिशप ने भी बहुधा बताया कि वह भी कभी रोम का दास था। वह अपने एक उपदेश में कहता है, "मैं इंग्लैण्ड के किसी भी पोप के अनुयायी के समान हठीला पोप-भक्त था, यहाँ तक कि जब मुझे ईश्वरविज्ञान का स्नातक बनाया जाना था, तब मेरा सारा भाषण फिलिप मेलांख्थन और उसके मतों के विरुद्ध था।" (Works, i., 334.) एक और उपदेश में वह कहता है, "सब पोप के अनुयायी समझते हैं कि वे व्यवस्था से उद्धार पाएँगे, और मैं स्वयं तीस वर्ष की आयु तक उसी खतरनाक, जोखिम-भरे और विनाशकारी मत का था। इतने समय तक मैं अन्धकार और मृत्यु की छाया में चलता रहा।" (i., 137.) वह सर एडवर्ड बेण्टन को लिखे एक पत्र में कहता है, "मैंने पहले समय में सोचा था कि यदि मैं एक भिक्षु होता और चोगा पहनता, तो मैं नरक में न पड़ता और न मृत्यु से डरता; और इसी कारण मैंने बहुत बार भिक्षु बनने का विचार किया, विशेषकर जब मैं बहुत बीमार या रोगी था। अब मैं अपनी उस अन्धविश्वास-भरी मूर्खता से घृणा करता हूँ।" (i., 332.) लैटिमर की अपने विषय में यह साक्षी दूसरों से भी पुष्ट होती है। लिखा है कि वह धर्म-सुधारकों के विषय में ऐसा बुरा सोचता था कि कहता था कि अन्तिम समय, न्याय का दिन और जगत का अन्त निकट होगा। उसने कहा, "अधर्म तेज़ी से बढ़ रहा है, और जब मनुष्य पोप की अचूकता पर भी प्रश्न उठाने लगे हैं, तो क्या ठिकाना कि वे कहाँ तक जा पहुँचें।" बेकन लिखता है कि जब ईश्वरविज्ञान के व्याख्याता स्टैफर्ड कैम्ब्रिज में बाइबल पर व्याख्यान देते थे, तब लैटिमर विद्यार्थियों को डराकर भगाने के लिए वहाँ अवश्य उपस्थित रहता था। वास्तव में पोप-तन्त्र के प्रति उसका उत्साह इतना प्रसिद्ध था कि वह विश्वविद्यालय के धार्मिक जुलूसों में क्रूस उठानेवाला चुना गया, और उसने यह कर्तव्य सात वर्ष तक उचित गम्भीरता से निभाया। परमेश्वर ने ऐसी ही मिट्टी से अपने काम के लिए एक बहुमूल्य पात्र गढ़ा! अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों में से एक सबसे अच्छे और सबसे उपयोगी व्यक्ति का आरम्भ ऐसा ही था! इस उग्र पोप-भक्त को मसीह के सत्य का ज्ञान कराने के लिए परमेश्वर ने जिस साधन का उपयोग किया, वह बिल्नी नामक एक विद्यार्थी था। बिल्नी कैम्ब्रिज में लैटिमर का समकालीन था, जिसने कुछ समय से धर्म-सुधार के सिद्धान्तों को अपना लिया था, और अन्त में नॉरविच में शहीद होकर जलाया गया। उसने देखा कि लैटिमर एक सच्चा और ईमानदार मनुष्य है, और दयालुता से सोचा कि सम्भव है पोप-तन्त्र के प्रति उसका उत्साह ज्ञान की कमी से उत्पन्न हुआ हो। इसलिए मेलांख्थन पर उसके सार्वजनिक आक्रमण के पश्चात् वह निडर होकर उसके पास गया, और नम्रता से प्रार्थना की कि उसे अपने विश्वास का एक निजी अंगीकार करने दिया जाए। इस साहसी कदम की सफलता पूर्ण रही। वृद्ध लैटिमर हमें बताता है, "मैंने उसके अंगीकार से उतना सीखा जितना पहले बहुत वर्षों में नहीं सीखा था।
मैं स्वयं तीस वर्ष की आयु तक उसी खतरनाक, जोखिम-भरे और विनाशकारी मत का था। इतने समय तक मैं अन्धकार और मृत्यु की छाया में चलता रहा।" (i., 137.) वह सर एडवर्ड बेण्टन को लिखे एक पत्र में कहता है, "मैंने पहले समय में सोचा था कि यदि मैं एक भिक्षु होता और चोगा पहनता, तो मैं नरक में न पड़ता और न मृत्यु से डरता; और इसी कारण मैंने बहुत बार भिक्षु बनने का विचार किया, विशेषकर जब मैं बहुत बीमार या रोगी था। अब मैं अपनी उस अन्धविश्वास-भरी मूर्खता से घृणा करता हूँ।" (i., 332.) लैटिमर की अपने विषय में यह साक्षी दूसरों से भी पुष्ट होती है। लिखा है कि वह धर्म-सुधारकों के विषय में ऐसा बुरा सोचता था कि कहता था कि अन्तिम समय, न्याय का दिन और जगत का अन्त निकट होगा। उसने कहा, "अधर्म तेज़ी से बढ़ रहा है, और जब मनुष्य पोप की अचूकता पर भी प्रश्न उठाने लगे हैं, तो क्या ठिकाना कि वे कहाँ तक जा पहुँचें।" बेकन लिखता है कि जब ईश्वरविज्ञान के व्याख्याता स्टैफर्ड कैम्ब्रिज में बाइबल पर व्याख्यान देते थे, तब लैटिमर विद्यार्थियों को डराकर भगाने के लिए वहाँ अवश्य उपस्थित रहता था। वास्तव में पोप-तन्त्र के प्रति उसका उत्साह इतना प्रसिद्ध था कि वह विश्वविद्यालय के धार्मिक जुलूसों में क्रूस उठानेवाला चुना गया, और उसने यह कर्तव्य सात वर्ष तक उचित गम्भीरता से निभाया। परमेश्वर ने ऐसी ही मिट्टी से अपने काम के लिए एक बहुमूल्य पात्र गढ़ा! अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों में से एक सबसे अच्छे और सबसे उपयोगी व्यक्ति का आरम्भ ऐसा ही था! इस उग्र पोप-भक्त को मसीह के सत्य का ज्ञान कराने के लिए परमेश्वर ने जिस साधन का उपयोग किया, वह बिल्नी नामक एक विद्यार्थी था। बिल्नी कैम्ब्रिज में लैटिमर का समकालीन था, जिसने कुछ समय से धर्म-सुधार के सिद्धान्तों को अपना लिया था, और अन्त में नॉरविच में शहीद होकर जलाया गया। उसने देखा कि लैटिमर एक सच्चा और ईमानदार मनुष्य है, और दयालुता से सोचा कि सम्भव है पोप-तन्त्र के प्रति उसका उत्साह ज्ञान की कमी से उत्पन्न हुआ हो। इसलिए मेलांख्थन पर उसके सार्वजनिक आक्रमण के पश्चात् वह निडर होकर उसके पास गया, और नम्रता से प्रार्थना की कि उसे अपने विश्वास का एक निजी अंगीकार करने दिया जाए। इस साहसी कदम की सफलता पूर्ण रही। वृद्ध लैटिमर हमें बताता है, "मैंने उसके अंगीकार से उतना सीखा जितना पहले बहुत वर्षों में नहीं सीखा था।
उसी समय से मैं परमेश्वर के वचन की सुगन्ध पाने लगा, और मैंने विद्यालयों के पण्डितों और ऐसी मूर्खताओं को छोड़ दिया।" (i., 335.) इस अवसर पर बिल्नी का आचरण अत्यन्त सराहनीय प्रतीत होता है। उसे देखकर हर किसी को अपने पड़ोसी का भला करने का यत्न करने का प्रोत्साहन मिलना चाहिए। यह इस कहावत की सच्चाई का एक उज्ज्वल प्रमाण है, "अवसर पर कहा हुआ वचन क्या ही भला होता है!" ह्यू लैटिमर कोई काम आधे मन से करनेवाला मनुष्य नहीं था। ज्यों ही वह उत्साही पोप-भक्त न रहा, वह तुरन्त उत्साही प्रोटेस्टेंट बन गया, और उसने तन, आत्मा और मन से अपने आपको भलाई के कार्य में लगा दिया। वह बिल्नी के साथ रोगियों और बन्दियों से भेंट करने जाता था। उसने विश्वविद्यालय के मंचों से ऐसी शैली में प्रचार करना आरम्भ किया जो कैम्ब्रिज में अब तक अज्ञात थी, और शीघ्र ही वह उस समय के सबसे प्रभावशाली और सामर्थी प्रचारकों में से एक के रूप में प्रसिद्ध हो गया। उसने अपने सैकड़ों श्रोताओं को पवित्रशास्त्र में खोजने और उद्धार के मार्ग के विषय में पूछताछ करने के लिए उभारा। बीकन, जो बाद में क्रैन्मर का पादरी बना, और ब्रैडफोर्ड, जो बाद में रिडले का पादरी बना, दोनों ने अपने मन-परिवर्तन का श्रेय उसके उपदेशों को दिया। बीकन ने उसके प्रचार के प्रभावों का एक उल्लेखनीय वर्णन हमारे लिए छोड़ा है। वह कहता है, "हठीले और मन के खतनारहित लोगों को छोड़, कोई भी उसे सुनकर ऐसे नहीं गया कि उसके मन में पाप के प्रति गहरी घृणा न उपजी हो, और वह सब प्रकार की भक्ति और सद्गुण की ओर प्रेरित न हुआ हो।" (बीकन की रचनाएँ, खण्ड ii. 224. पार्कर सोसाइटी संस्करण।) सेवकाई के कर्तव्य के इस विश्वासयोग्य निर्वाह के परिणाम ठीक वही थे जिनकी अपेक्षा सारा अनुभव हमसे करवाता है। लैटिमर के विरुद्ध सताव का एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। जब वह पोप-भक्त के रूप में क्रूस उठाए चलता था तब जिन भिक्षुओं और पण्डितों ने उसकी प्रशंसा की थी, वे ही सब एक साथ उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए जब उसने पौलुस के समान क्रूस का प्रचार किया। एली के अध्यक्ष ने उसे कैम्ब्रिज के विश्वविद्यालयीय मंचों से और प्रचार करने से रोक दिया; और यदि डॉ. बार्न्स से उसे ऑगस्टिनियन भिक्षुओं के गिरजे में प्रचार करने की अनुमति न मिलती, जो अध्यक्षीय अधिकार-क्षेत्र से मुक्त था, तो शायद उसे पूरी तरह चुप करा दिया जाता। परन्तु उसके शत्रुओं की द्वेष-भावना यहीं नहीं रुकी। उसके विरुद्ध कार्डिनल वोल्जी के सामने शिकायतें की गईं, और उसे एक से अधिक बार झूठी शिक्षा के आरोपों पर उसके और लंदन के अध्यक्ष टन्स्टॉल के सामने उपस्थित होना पड़ा। सच तो यह है कि उस समय की परिस्थितियों पर विचार करें तो आश्चर्य होता है कि लैटिमर को अपने जीवन के इस काल में बिल्नी का भाग्य न मिला और वह दाँव पर जलाकर मार न डाला गया। परन्तु प्रभु, जिसके हाथ में हमारे समय हैं, लैटिमर से अभी और काम लेना चाहता था, और उसने उसके लिए ऊँचे स्थानों में अनपेक्षित मित्र खड़े कर दिए। हेनरी अष्टम के कैथरीन ऑफ़ अरागॉन से तलाक़ के पक्ष में उसके दृढ़ मत ने उसे राजा के चिकित्सक डॉ. बट्स के सम्पर्क में लाया, और अन्ततः उसे स्वयं राजा का अनुग्रह और संरक्षण प्राप्त हुआ। सन् 1530 में वह राजकीय पादरियों में से एक बनाया गया, और उसने राजा के सामने कई बार प्रचार किया। सन् 1531 में राजकीय कृपा से उसे विल्टशायर में चिपनहम के निकट वेस्ट किंगटन की पासबानी मिली; और अपने मित्र डॉ. बट्स के विरोध के बावजूद वह तुरन्त दरबार छोड़कर अपने सेवा-क्षेत्र में रहने चला गया। वेस्ट किंगटन में लैटिमर ठीक वही मनुष्य था जो वह कैम्ब्रिज में अपने पिछले दिनों में रहा था, और उसने पाया कि शैतान विल्टशायर में भी उतना ही व्यस्त विरोधी था जितना विश्वविद्यालय में। पासबानी के कामों में वह बहुत परिश्रमी था। प्रचार में वह समय और असमय तत्पर रहता था, अपने गाँव के भीतर भी और बाहर भी। ऐसा करने का उसे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक सामान्य अनुज्ञापत्र के बल पर पूरा अधिकार था। परन्तु वह जितना अधिक करता, वेस्ट किंगटन के आसपास के आलसी पोप-भक्त पादरी उतने ही अधिक क्रोधित होते, और उसे रोकने के लिए उतना ही अधिक यत्न करते। इससे सिद्ध होता है कि मानव स्वभाव हर युग में एक-सा है। अनुग्रहहीन सेवक में प्रायः चरनी के कुत्ते की-सी प्रवृत्ति होती है। वह न स्वयं भलाई करता है, न चाहता है कि कोई और उसके लिए करे। फरीसियों का भी यही हाल था: उन्होंने "ज्ञान की कुंजी को ले तो लिया, परन्तु न तो आप ही प्रवेश किया, और जो प्रवेश करनेवाले थे उन्हें भी रोक दिया।" (लूका 11:52.) और जैसा फरीसियों के दिनों में था, वैसा ही लैटिमर के दिनों में भी था। एक अवसर पर ब्रिस्टल के महापौर और दण्डाधिकारियों ने, जो उसके बहुत मित्र थे, उसे ईस्टर के दिन अपने सामने प्रचार करने को ठहराया। सार्वजनिक सूचना दे दी गई थी, और सब लोग उस उपदेश की प्रतीक्षा आनन्द के साथ कर रहे थे, क्योंकि लैटिमर ब्रिस्टल में बहुत लोकप्रिय था। अचानक अध्यक्ष की ओर से यह आदेश निकला कि उसके अनुज्ञापत्र के बिना ब्रिस्टल में कोई प्रचार न करे। उस स्थान के पादरी लैटिमर के पास गए, और उसे अध्यक्ष के आदेश की सूचना दी, और फिर, यह भली-भाँति जानते हुए कि उसके पास ऐसा कोई अनुज्ञापत्र नहीं है, उससे कहा "कि उन्हें अत्यन्त खेद है कि वे उसके मुख से एक उत्तम प्रवचन सुनने के आनन्द से वंचित हो गए।" उनकी कपटपूर्ण प्रशंसा और खेद दुर्भाग्य से बेमौके थे। लैटिमर ने सारा वृत्तान्त सुन रखा था। और वह भली-भाँति जानता था कि ये मीठी जीभवाले सज्जन ही वे लोग थे जिन्होंने उसे प्रचार करने से रोकने के लिए अध्यक्ष को लिखा था। चार वर्ष तक, जब वह वेस्ट किंगटन का पासबान था, उस भले मनुष्य पर छोटे-छोटे तंग करनेवाले आक्रमणों और उसे भलाई करने से रोकने के प्रयासों का निरन्तर क्रम चलता रहा। उसे लंदन बुलाया गया, और आर्चबिशप वारहम के सामने लाया गया, और कई महीने घर से दूर रोके रखा गया। उसे धर्म-महासभा के सामने बुलाया गया, और कुछ समय के लिए उसे बहिष्कृत और कारावास में रखा गया। परन्तु परमेश्वर की रक्षक देखभाल सदा उसके चारों ओर बनी रही प्रतीत होती है। उसके शत्रुओं को अपने द्वेष को चरम सीमा तक ले जाने से आश्चर्यजनक रूप से रोके रखा गया। अन्ततः सन् 1535 में राजा ने उसे वूस्टर का अध्यक्ष बनाकर उनके सताव को अचानक रोक दिया। कि ऐसा मनुष्य ऐसी नियुक्ति करे, यह निश्चय ही बहुत आश्चर्य की बात है। किसी ने इसका श्रेय लॉर्ड क्रॉमवेल के प्रभाव को दिया; किसी ने रानी ऐन बोलिन के; किसी ने डॉ. बट्स के; किसी ने क्रैन्मर के, जो सदा लैटिमर का पक्का मित्र था। ऐसी अटकलें, अधिक-से-अधिक कहें तो, व्यर्थ हैं। "राजा का मन यहोवा के हाथ में जल की धाराओं के समान है; वह जिधर चाहता उधर उसको फेरता है।" (नीतिवचन 21:1.) जब परमेश्वर किसी भले मनुष्य को कोई ऊँचा पद देना चाहता है, तो वह सदा दारा जैसे किसी को खड़ा कर सकता है जो उसे वह पद दे दे। लैटिमर की अध्यक्षता का इतिहास छोटा और सीधा-सादा है, क्योंकि वह केवल चार वर्ष चली। अध्यक्ष के भवन में भी वह वही मनुष्य था जो वह किसी देहाती पासबानी में, या कैम्ब्रिज के मंच पर रहा था। पदोन्नति ने उसे बिगाड़ा नहीं। मुकुट सुसमाचार के लिए उसके उत्साह को बुझाने वाला सिद्ध न हुआ। वह सदा विश्वासयोग्य रहा, सदा सरल मन का, सदा अपने पिता के काम में लगा हुआ, सदा आत्माओं की भलाई के लिए परिश्रम करता हुआ। इतिहासकार फॉक्स उसके "परिश्रम, अध्ययन, तत्परता, और सिखाने, प्रचार करने, समझाने, भेंट करने, सुधारने, और संशोधन करने में निरन्तर सावधानी की, जहाँ तक उसकी सामर्थ्य साथ दे सकती थी, या दशमांश सहन कर सकते थे," बहुत प्रशंसा करता है। परन्तु वह जोड़ता है, "उन दिनों समय ऐसा संकटपूर्ण और अस्थिर था कि वह सब बातों में जो चाहता था वह नहीं कर सकता था। फिर भी जो वह कर सकता था, उसे उसने अपनी पूरी सामर्थ्य से किया, ताकि यद्यपि वह पुराने अन्धविश्वास के सब चमकते अवशेषों को पूरी तरह बुझा न सका, फिर भी उसने ऐसा काम किया कि यदि वे हटाए न जा सकें, तो भी उनका उपयोग यथासम्भव कम हानि और अधिकतम लाभ के साथ हो।" सन् 1536 में हम पाते हैं कि आर्चबिशप क्रैन्मर ने अध्यक्ष लैटिमर को पादरी-वर्ग की धर्म-महासभा के सामने प्रचार करने के लिए नियुक्त किया। निःसन्देह यह नियुक्ति सोच-समझकर की गई थी। क्रैन्मर भली-भाँति जानता था कि लैटिमर इस अवसर के लिए ठीक वही मनुष्य है। जो उपदेश उसने दिए वे आज भी उपलब्ध हैं, और आर्चबिशप के चुनाव को पूरी तरह उचित ठहराते हैं। दीक्षित पुरुषों की किसी सभा को शायद ही कभी इनसे अधिक विश्वासयोग्य और विवेक को झकझोरनेवाले दो प्रवचन सुनाए गए होंगे। ध्यानपूर्वक पढ़ने पर वे लाभ देंगे। एक स्थान पर उसने कहा, "हे भले भाइयो और पिताओ, जब हम यहाँ एकत्र हुए हैं, तो परमेश्वर के प्रेम के लिए आओ हम कुछ ऐसा करें जिससे हम ज्योति की सन्तान ठहरें। आओ हम कुछ करें, कहीं ऐसा न हो कि हम, जो अब तक संसार की सन्तान ठहराए गए हैं, अब भी वैसे ही निकलें। सब लोग हमें प्रधान पादरी कहते हैं; तो जब हम महासभा में हैं, तो आओ हम अपने आपको ऐसा संयमित करें कि हम मान और पद में प्रधान पादरी होने के साथ-साथ पवित्रता, उदारता, परिश्रम और सच्चाई में भी प्रधान पादरी हों। "हे भाइयो, अपने सिर उठाओ, और अपनी आँखों से चारों ओर देखो, और पहचानो कि इंग्लैण्ड की कलीसिया में कौन-कौन सी बातें सुधारी जानी चाहिए। क्या तुम्हारे लिए पादरी-वर्ग में बहुत-सी कुरीतियाँ और सामान्य जनों में बहुत-सी कुरीतियाँ देख लेना इतना कठिन, इतनी बड़ी बात है?" फिर उसने कई स्पष्ट कुरीतियों के नाम लिए: आर्चेस की अदालत और अध्यक्षों की विचार-सभाओं की दशा—अन्धविश्वासी रीतियों और छुट्टियों की संख्या—मूर्तियों की पूजा और अवशेषों और सन्तों के दर्शन—झूठे चमत्कार और मिस्सा की बिक्री—और उनसे आग्रह किया कि वे इन पर विचार करें और सुधारें। अन्त में उसने अध्यक्षों के प्रसिद्ध कुरीतियों की उपेक्षा करने के परिणाम की एक गम्भीर चेतावनी देकर बात समाप्त की। "परमेश्वर आएगा," उसने कहा। "परमेश्वर आएगा: वह अधिक देर तक दूर न रहेगा। वह ऐसे दिन आएगा जब हम उसकी बाट न जोहते हों, और ऐसी घड़ी में जिसे हम नहीं जानते। वह आएगा और हमें टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा। वह हमें वैसा ही प्रतिफल देगा जैसा वह कपटियों को देता है। वह हमें वहाँ रखेगा जहाँ रोना होगा, मेरे भाइयो—जहाँ दाँत पीसना होगा, मेरे भाइयो। संसार के प्यारे बच्चों के लिए तैयार किए गए ये ही स्वादिष्ट पकवान हैं। सांसारिक प्रधान पादरियों के लिए रखी गई ये ही मिठाइयाँ और मेवे हैं: रोना और दाँत पीसना।" "हे भाइयो, तुम देखते हो कि यदि तुम सांसारिक हुए तो तुम्हारे लिए कैसा शोक और दण्ड ठहराया गया है। यदि तुम नहीं चाहते कि दुःख पाओ, तो संसार की सन्तान मत बनो। यदि तुम संसार की सन्तान नहीं बनना चाहते, तो सांसारिक वस्तुओं के प्रेम से मारे न जाओ; उन पर टेक न लगाओ। यदि तुम अनन्तकाल तक मरना नहीं चाहते, तो सांसारिक रीति से न जियो। आओ, चलो; अपने लाभ का प्रेम छोड़ो: मसीह की महिमा और लाभ के लिए अध्ययन करो; अपनी सम्मतियों में वे बातें खोजो जो मसीह से सम्बन्ध रखती हैं, और अन्त में कुछ ऐसा सामने लाओ जो मसीह को भाए। मसीह की भेड़-बकरियों को पूरे यत्न से कोमलता के साथ चराओ। परमेश्वर का वचन सच्चाई से प्रचार करो। ज्योति से प्रेम रखो, ज्योति में चलो, और इस संसार में रहते हुए ज्योति की सन्तान बनो, ताकि आनेवाले संसार में तुम तारों के समान चमक सको, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के साथ।" (रचनाएँ, खण्ड i., पृ. 50.) लैटिमर का धर्म-महासभा के सामने उपदेश ऐसा था। सन् 1587 में हम पाते हैं कि अध्यक्ष लैटिमर को धर्मविज्ञानियों के उस आयोग में रखा गया जो धर्म के सत्य को प्रकट करनेवाली एक पुस्तक प्रकाशित करने के लिए था; इस आयोग का परिणाम "एक मसीही मनुष्य की शिक्षा" थी। उसी वर्ष हम उसे वूस्टर के मठ के प्रधान को कुछ आदेश देते हुए पाते हैं, जो एक ऐसा मठ-भवन था जो अभी तक भंग नहीं हुआ था, जिनमें अन्य बातों के साथ वह प्रधान को आज्ञा देता है कि गिरजे में पूरी अंग्रेज़ी बाइबल जंजीर से बँधी रखी जाए। वह मठ के हर सदस्य को आदेश देता है कि वह अपने लिए अंग्रेज़ी नया नियम प्राप्त करे; वह निर्देश देता है कि मठ में प्रतिदिन पवित्रशास्त्र का पाठ पढ़ा जाए, और दोपहर और सायंकाल के भोजन के समय भी पवित्रशास्त्र पढ़ा जाए। इसके कुछ ही समय बाद उसने अपने धर्म-प्रदेश के पादरियों के लिए आदेश प्रकाशित किए, जिनमें वह उनमें से हर एक को आज्ञा देता है कि वह अपने लिए पूरी बाइबल, या कम-से-कम एक नया नियम, प्राप्त करे, और प्रतिदिन कम-से-कम एक अध्याय पढ़े और उसका अध्ययन करे। वह उन्हें किसी भी प्रकार के पालन, रीति-रिवाज, या जुलूस के लिए प्रचार को एक ओर रखने से भी मना करता है, और आज्ञा देता है कि वे अपने-अपने गाँवों के बच्चों को शिक्षा दें। ये सारे छोटे-छोटे तथ्य बहुत शिक्षाप्रद हैं। वे हमें दिखाते हैं कि हेनरी अष्टम के दिनों में अंग्रेज़ी धर्म-प्रदेश कैसा गन्दा अस्तबल था, और सुधार करनेवाले अध्यक्ष को कितनी भारी कठिनाइयों पर विजय पानी पड़ती थी। सन् 1538 में हम लैटिमर को लॉर्ड क्रॉमवेल से विनती करते हुए पाते हैं कि ग्रेट माल्वर्न का मठ पूरी तरह भंग न किया जाए। वह सुझाव देता है कि उसे बनाए रखा जाए, "मठवासी जीवन के लिए नहीं," जिसके विषय में वह कहता है, "परमेश्वर न करे," परन्तु "शिक्षा, प्रचार, अध्ययन और प्रार्थना को बनाए रखने के लिए;" और वह पूछता है कि क्या हर काउण्टी में दो-तीन पुराने मठ-भवनों को ऐसे उद्देश्यों के लिए अलग रखना अच्छी नीति न होगी। यह बहुत बुद्धिमानी की योजना थी, और देश की आवश्यकताओं की दूरदर्शिता दिखाती है। यदि यह कार्यान्वित हो जाती, तो डरहम, सेंट बीज़, लैम्पेटर, किंग्स कॉलेज, लंदन, और लंदन कॉलेज ऑफ़ डिवीनिटी अनावश्यक होते। हेनरी अष्टम के दरबारियों के लोभ ने, जिन्हें भंग किए गए मठों की सम्पत्ति की अद्भुत भूख थी, इस सुझाव को व्यर्थ कर दिया। सन् 1539 में अध्यक्ष लैटिमर की अध्यक्षता का अन्त उन छह अनुच्छेदों के पारित होने से हुआ जिनका पहले उल्लेख हो चुका है, जिनमें रोमी मत के कुछ प्रमुख सिद्धान्तों को अधिकारपूर्वक बनाए रखा गया। उसने राजा और संसद के विरोध में इस अधिनियम के पारित होने का डटकर विरोध किया; और परिणाम यह हुआ कि उसे अपना अध्यक्ष-पद त्यागने के लिए विवश किया गया। कहा जाता है कि जिस दिन यह हुआ, जब वह लॉर्ड सभा से अपने आवास लौटा, तो उसने अपने चोग़े उतार फेंके, और उछलकर अपने आसपास खड़े लोगों से कहा कि वह अपने आपको कुछ समय से अधिक हल्का अनुभव कर रहा है। लैटिमर के अगले आठ वर्ष विवश मौन और एकान्त में बीते प्रतीत होते हैं। उसने कुछ किया हो, इसका हम बहुत कम पढ़ते हैं। हम ठीक-ठीक नहीं जानते कि उसने अपना समय कहाँ बिताया, और वह अपनी पुरानी पासबानी वेस्ट किंगटन लौटा या नहीं। सम्भावना यह है कि उसे एक खतरनाक और संदिग्ध मनुष्य माना जाता था, और अपने प्राण बचाए रखने में उसे बहुत कठिनाई हुई। एकमात्र निश्चित तथ्य जो हम जानते हैं यह है कि अन्ततः उसे विधर्मी के रूप में बन्दीगृह में डाल दिया गया, और उसने हेनरी अष्टम के शासन का अन्तिम वर्ष टॉवर में कैद में बिताया। जब सन् 1547 में एडवर्ड षष्ठ सिंहासन पर बैठा, तो लैटिमर को तुरन्त बन्दीगृह से छुड़ा दिया गया, और उसके साथ हर प्रकार के सम्मान का व्यवहार किया गया। उसे उसका पुराना वूस्टर का अध्यक्ष-पद देने का प्रस्ताव रखा गया, और हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने रक्षक सोमरसेट को एक प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया जिसमें आग्रहपूर्वक अनुरोध किया गया कि उसे फिर से नियुक्त किया जाए। वृद्धावस्था और बढ़ती दुर्बलताओं ने लैटिमर को प्रस्तावित पद अस्वीकार करने पर विवश किया, और उसने अपने जीवन के अगले छह वर्ष बिना किसी पद के बिताए, परन्तु निश्चय ही आलसी मनुष्य के रूप में नहीं। इन छह वर्षों में उसका मुख्य निवास उसके पुराने मित्र और सहयोगी आर्चबिशप क्रैन्मर के साथ लैम्बेथ महल की आतिथ्यशील छत के नीचे था। यहाँ रहते हुए उसने प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार को आगे बढ़ाने के लिए अपनाए गए सब उपायों में सक्रिय भाग लिया। उसने क्रैन्मर की उपदेशों की पहली पुस्तक की रचना में सहायता की, और कलीसियाई व्यवस्था के सुधार के लिए नियुक्त धर्मविज्ञानियों में भी वह एक था, जो कार्य कभी पूरा नहीं हुआ। इस पूरे समय वह प्रायः प्रत्येक रविवार को दो बार प्रचार करता था। एडवर्ड षष्ठ के शासन के पहले भाग में वह निरन्तर राजा के सामने प्रचार करता रहा। बाद के भाग में वह इंग्लैण्ड के मध्य के प्रदेशों में इधर-उधर घूमता रहा, जहाँ-जहाँ उसकी सेवा की सबसे अधिक आवश्यकता प्रतीत होती थी वहाँ प्रचार करता हुआ, और विशेषकर लिंकनशायर में। शायद यही उसके जीवन का सबसे उपयोगी काल था। धर्म-सुधारकों में से किसी ने भी शायद ही खरे प्रोटेस्टेंट सिद्धान्त के बीज मध्यम और निम्न वर्गों में इतने व्यापक और प्रभावी रूप से बोए जितने लैटिमर ने। स्वर्गीय श्री साउदी इसकी गवाही देते हैं: वे कहते हैं, "लैटिमर ने, किसी भी अन्य मनुष्य से अधिक, अपने प्रचार के द्वारा धर्म-सुधार को आगे बढ़ाया।" एडवर्ड षष्ठ की असामयिक मृत्यु और सन् 1553 में रानी मरियम के अंग्रेज़ी सिंहासन पर बैठने से सुसमाचार के पक्ष में लैटिमर के सक्रिय प्रयासों का अन्त हो गया। अब से उसे करने के द्वारा नहीं, वरन् दुःख उठाने के द्वारा मसीह की महिमा करने के लिए बुलाया गया। उसके दुःखों की कहानी, और जिस उदात्त साहस के साथ उसने उन्हें सहा, उसका उत्तम वर्णन "फॉक्स के शहीद" में किया गया है—एक ऐसी पुस्तक जिसका अध्ययन आज के दिनों में सब कलीसिया-जनों को करना चाहिए।
रानी मरियम के राजसिंहासन पर बैठते ही उसकी सरकार का एक पहला काम इंग्लैंड के प्रमुख धर्म-सुधारकों को पकड़ना था; और जिनके लिए सबसे पहले वारंट जारी हुआ उनमें लैटिमर भी थे। रानी का दूत उन्हें वारविकशायर में एक प्रचारक के रूप में अपने स्वामी का कार्य करते हुए मिला, परन्तु वे बन्दीगृह के लिए पूरी तरह तैयार थे। दूत के पहुँचने से छः घण्टे पहले कैरलेस नामक एक भले मनुष्य से उन्हें आनेवाली बात की सूचना मिल चुकी थी, और वे सरलता से भाग निकल सकते थे; परन्तु उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, "मैं इस समय अपने राजा के बुलाने पर अपने सिद्धान्त का लेखा देने के लिए जितनी प्रसन्नता से लन्दन जा रहा हूँ, उतनी प्रसन्नता से मैं संसार में कभी कहीं नहीं गया। और मुझे कोई सन्देह नहीं कि जिस परमेश्वर ने मुझे दो उत्तम राजाओं को अपना वचन सुनाने के योग्य ठहराया, वही मुझे तीसरे के सामने भी उसकी गवाही देने की सामर्थ्य देगा।" इसी मनोभाव से वे प्रसन्नतापूर्वक घोड़े पर सवार होकर लन्दन पहुँचे, और स्मिथफील्ड से होकर जाते समय, जहाँ आमतौर पर विधर्मी जलाए जाते थे, उन्होंने कहा, "स्मिथफील्ड बहुत समय से मेरे लिए कराह रहा है।" लैटिमर को तुरन्त क्रैन्मर, रिडले और ब्रैडफर्ड के साथ टावर में डाल दिया गया, और स्थान की कमी के कारण चारों को एक ही कोठरी में रखा गया। वहाँ इन चारों शहीदों ने, बूढ़े लैटिमर के शब्दों में, "बड़े सोच-विचार और कठिन परिश्रम से साथ मिलकर नया नियम पढ़ा," और सर्वसम्मति से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उसमें ट्रान्सबस्टैंशिएशन की शिक्षा कहीं नहीं पाई जाती। 1554 में तीनों अध्यक्षों को टावर से ऑक्सफ़ोर्ड ले जाया गया; और वहीं 1555 में लैटिमर और रिडले को हठीले विधर्मी ठहराकर खूँटे से बाँधकर जीवित जला दिया गया। बन्दीगृह में बूढ़े अध्यक्ष का आचरण उनके पिछले जीवन के अनुरूप था। पूरे दो लम्बे वर्षों तक उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी, और उनका विश्वास और धीरज कभी डगमगाया नहीं। उनका बहुत-सा समय बाइबल पढ़ने में बीतता था। वे स्वयं कहते हैं, "बन्दीगृह में रहते हुए मैंने नया नियम सात बार पढ़ा।" उनका बहुत-सा समय प्रार्थना में बीतता था। उनका विश्वासयोग्य सेवक ऑगस्टीन बर्नर हमें बताता है कि वे प्रायः इतनी देर तक घुटनों के बल बैठे रहते थे कि बिना सहायता के उठ नहीं पाते थे। इस समय वे अपनी प्रार्थनाओं में विशेष रूप से तीन बातों का उल्लेख करते थे। एक यह कि जैसे परमेश्वर ने उन्हें अपने वचन का प्रचारक और प्रवक्ता ठहराया है, वैसे ही वह उन्हें अनुग्रह दे कि वे मृत्यु तक उसके सिद्धान्त पर स्थिर रहें। दूसरी यह कि परमेश्वर अपनी दया से मसीह के सुसमाचार को इस राज्य में एक बार फिर स्थापित करे; वे "एक बार फिर" इन दो शब्दों को प्रायः दोहराते थे। तीसरी यह कि परमेश्वर राजकुमारी एलिज़ाबेथ की रक्षा करे और उसे इंग्लैंड के लिए सांत्वना का कारण बनाए। यह एक उल्लेखनीय बात है कि ये तीनों प्रार्थनाएँ पूरी तरह स्वीकार हुईं। अपने पोप-समर्थक सतानेवालों के सामने विभिन्न मुकदमों और पूछताछ में लैटिमर का आचरण कुछ बातों में अन्य शहीदों से अधिक बुद्धिमानी और उत्तमता का था। वे भली-भाँति जानते थे कि उनकी मृत्यु निश्चित हो चुकी है, और वे सही थे। विनचेस्टर के पोप-समर्थक अध्यक्ष गार्डिनर ने खुलकर कहा था कि "मैं चाहता हूँ कि कुल्हाड़ी वृक्ष की जड़ पर रखी जाए: अध्यक्षों और सबसे प्रभावशाली प्रचारकों को अवश्य मरना चाहिए।" लन्दन के पोप-समर्थक अध्यक्ष बोनर ने कहा था, "यदि कोई भी विधर्मी मुझसे बच निकले, तो परमेश्वर बोनर के साथ वैसा ही करे, बल्कि उससे भी अधिक।" इसी धारणा के अनुसार लैटिमर ने मुकदमे से पहले रिडले से कहा कि उन्हें कम बोलना चाहिए। उन्होंने कहा, "वे खुले वाद-विवाद की बात करते हैं, परन्तु उनका तर्क वही होगा जो उनके पूर्वजों का था: 'हमारे पास एक व्यवस्था है, और उस व्यवस्था के अनुसार वह मरने के योग्य है।'" इसी धारणा के अनुसार उन्होंने अपने विभिन्न मुकदमों में अपने विश्वास की सीधी-सादी घोषणा करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं किया। उन्होंने क्रैन्मर और रिडले की तरह प्राचीन पिताओं के मतों पर लम्बी बहसों में बह जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने न्यायियों से साफ़ कह दिया कि "प्राचीन पिता कुछ बातों में भूल कर सकते थे;" और वे उन्हें तभी मानते हैं जब वे सत्य कहते हैं और पवित्रशास्त्र उनके साथ है! प्राचीन पिताओं के विषय में इससे अधिक बुद्धिमानी और सच्चाई की बात शायद कभी नहीं कही गई। बूढ़े लैटिमर की मृत्यु का वर्णन फ़ॉक्स ने इतनी सुन्दरता से किया है कि मैं उसे यथासम्भव उसी के शब्दों में देने से उत्तम कुछ नहीं कर सकता। मैं अपनी ओर से कुछ जोड़कर उसे बिगाड़ने का प्रयत्न नहीं करूँगा, यद्यपि मुझे उसे काफ़ी संक्षिप्त करना पड़ेगा। "फाँसी का स्थान (फ़ॉक्स कहता है) ऑक्सफ़ोर्ड के उत्तर की ओर, बैलिओल कॉलेज के सामने की खाई में निश्चित किया गया था। जलाए जाने में बाधा डालने वाली किसी भी गड़बड़ी के भय से, रानी के पत्र द्वारा लॉर्ड विलियम्स और नगर के गृहस्थों को आदेश दिया गया कि वे पर्याप्त शस्त्रों से सुसज्जित होकर सहायता करें; और जब सब कुछ तैयार हो गया, तो 16 अक्टूबर, 1555 को बन्दियों को एक साथ बाहर लाया गया। "रिडले पहले आया, रोएँदार काला चोगा पहने हुए, जैसा वह अध्यक्ष के रूप में पहना करता था। उसके पीछे लैटिमर आया, ब्रिस्टल के मोटे कपड़े का एक पुराना घिसा हुआ कुर्ता पहने, बटनदार टोपी और सिर पर रूमाल बाँधे, और घुटनों के नीचे तक पैरों पर लटकता हुआ एक लम्बा नया कफ़न ओढ़े हुए। "रिडले ने पीछे देखा तो लैटिमर को आते देखा, और उससे कहा, 'अरे, क्या तुम वहाँ हो?' 'हाँ!' लैटिमर महोदय ने कहा, 'जितनी जल्दी हो सके मैं पीछे-पीछे चला आ रहा हूँ।' अन्त में वे एक के बाद एक खूँटे के पास पहुँचे। रिडले पहले उस स्थान में गया, और दोनों हाथ उठाकर गम्भीरता से स्वर्ग की ओर देखा। थोड़ी देर बाद लैटिमर को देखकर वह उसके पास दौड़ा, उसे गले लगाया और चूमा, और कहा, 'हियाव बाँधो, भाई, क्योंकि परमेश्वर या तो आग की लपटों का प्रकोप शान्त करेगा, या हमें उसे सहने की सामर्थ्य देगा।' "फिर वह खूँटे के पास गया, उसके पास घुटने टेके, उसे चूमा, और प्रार्थना की; और उसके पीछे लैटिमर घुटने टेककर गम्भीरता से परमेश्वर को पुकारता रहा। उठने के बाद वे दोनों थोड़ी देर आपस में बातें करते रहे, परन्तु उन्होंने क्या कहा, यह फ़ॉक्स किसी से जान नहीं पाया। "तब उन्हें स्मिथ नामक एक धर्मत्यागी पुरोहित का उपदेश सुनने को विवश किया गया, जिसका पाठ यह था, 'यदि मैं अपनी देह जलाए जाने को दे दूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं।' उन्होंने इस अभागे प्रवचन के झूठे कथनों का उत्तर देने का प्रयत्न किया, परन्तु उन्हें अनुमति नहीं दी गई। रिडले ने कहा, 'अच्छा, तो मैं अपना मामला सर्वशक्तिमान परमेश्वर को सौंपता हूँ, जो सबका निष्पक्ष न्याय करेगा।' लैटिमर ने अपनी ओर से यह वचन जोड़ा: 'ऐसा कुछ भी छिपा नहीं जो प्रगट न किया जाएगा;' और कहा, 'यदि मुझे अनुमति मिलती तो मैं स्मिथ को भली-भाँति उत्तर दे सकता था।' "इसके बाद उन्हें तुरन्त तैयार होने का आदेश दिया गया, और उन्होंने पूरी नम्रता से आज्ञा मानी। रिडले ने अपने कपड़े और जो कुछ उसके पास था, वह पास खड़े लोगों को दे दिया, और जो उसका एक चीथड़ा भी पा सका वह धन्य समझा गया। लैटिमर ने कुछ नहीं दिया, पर चुपचाप अपने रखवाले को अपने मोज़े और अन्य वस्त्र, जो बहुत साधारण थे, उतारने दिए। और अब कफ़न मात्र में खड़ा वह पास खड़े लोगों को उतना ही सुन्दर पुरुष दिखाई दिया जितना कोई देखना चाहे। और यद्यपि अपने कपड़ों में वह एक मुरझाया हुआ, झुका हुआ बूढ़ा दिखाई देता था, अब वह बिल्कुल सीधा खड़ा था। "तब लुहार ने लोहे की एक ज़ंजीर लेकर रिडले और लैटिमर दोनों की कमर में एक ही खूँटे से बाँध दी। जब वह एक कील ठोक रहा था, तो रिडले ने ज़ंजीर हाथों में लेकर लुहार से कहा, 'भले आदमी, इसे ज़ोर से ठोको, क्योंकि शरीर अपना काम करेगा।' हर एक की गर्दन में बारूद की एक थैली बाँधी गई। उनके चारों ओर लकड़ियों के गट्ठे सजाए गए, और भयंकर तैयारियाँ पूरी हो गईं। "तब वे आग से जलता हुआ एक गट्ठा लाए, और उसे रिडले के पाँवों के पास रख दिया, और तब लैटिमर ने उससे इस प्रकार कहा: 'हियाव बाँधो, भाई रिडले, और पुरुषार्थ दिखाओ; परमेश्वर के अनुग्रह से हम आज इंग्लैंड में ऐसी मोमबत्ती जलाएँगे जो, मुझे भरोसा है, कभी बुझाई न जा सकेगी।' "और इस प्रकार आग जल उठी, और जब रिडले ने लपटों को अपनी ओर उठते देखा, तो ऊँचे स्वर से पुकारा, 'हे प्रभु, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ: हे प्रभु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर!' और उसने उत्तरार्द्ध भाग को बार-बार दोहराया। खूँटे की दूसरी ओर से लैटिमर ने उतने ही ज़ोर से पुकारा, 'हे स्वर्गीय पिता, मेरे प्राण को ग्रहण कर!' और उसने लपटों को ऐसे ग्रहण किया मानो उन्हें गले लगा रहा हो। अपने हाथों से अपना मुँह सहलाकर और मानो उन्हें थोड़ी देर आग में नहलाकर, वह शीघ्र ही मर गया, जैसा दिखाई दिया, बहुत ही कम पीड़ा के साथ।" "और परमेश्वर के इस वृद्ध धन्य सेवक, अध्यक्ष लैटिमर के अन्त के विषय में बस इतना ही," फ़ॉक्स कहता है, "जिसकी परिश्रमी सेवा, फलवन्त जीवन और अटल मृत्यु के लिए सारे राज्य को सर्वशक्तिमान परमेश्वर का बड़ा धन्यवाद करना चाहिए।"
लैटिमर अविवाहित ही जिया और अविवाहित ही मरा, और मुझे ज्ञात नहीं कि आज इंग्लैंड का कोई परिवार उससे अपना कोई सम्बन्ध जताता हो। परन्तु वह अपने पीछे ऐसा नाम छोड़ गया जो बेटे-बेटियों के नाम से कहीं उत्तम है, ऐसा नाम जिसका आदर संसार के बने रहने तक सब सच्चे अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंट करते रहेंगे। फुलर कहता है, "मरियम के समय के सब शहीदों में श्रीमान फिल्पॉट सबसे कुलीन जन्म के सज्जन थे, अध्यक्ष रिडले सबसे गहरे विद्वान थे, श्रीमान ब्रैडफ़ोर्ड सबसे पवित्र और भक्त पुरुष थे, महाधर्माध्यक्ष क्रैन्मर सबसे सौम्य और नम्र स्वभाव के थे, अध्यक्ष हूपर सबसे कठोर और कड़े स्वभाव के थे, डॉक्टर टेलर में सबसे अधिक विनोदी और सुखद चतुराई थी, परन्तु श्रीमान लैटिमर का हृदय सबसे सीधा और सरल था।"
लैटिमर के विचार।
अब मैं लैटिमर के जीवन-वृत्तान्त से उसके विचारों की ओर मुड़ता हूँ। मैंने उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक का इतिहास संक्षेप में बताया है। मेरे पाठक सहज ही मान लेंगे कि मैंने बहुत-सी बातें अनकही छोड़ दी हैं। मैं इस भले मनुष्य के प्रचार पर रुक सकता था। शायद ही किसी ने इंग्लैंड की मण्डली को उतने प्रभाव से सम्बोधित किया हो जितना उसने किया। इसमें सन्देह नहीं कि उसके जो उपदेश आज उपलब्ध हैं वे आधुनिक रुचि के अनुकूल न होंगे। उनमें बहुत-सी अनोखी, विचित्र और खुरदरी बातें हैं। वे अत्यन्त घरेलू, इधर-उधर भटकने वाले और विषय से हट जाने वाले हैं, और अक्सर गपशप की कहानियों से भरे हैं। फिर भी, आज के दिनों में हम यह परखने में बहुत कच्चे हैं कि उपदेश कैसा होना चाहिए। आधुनिक उपदेश अक्सर एक नीरस, फीका, बिना धार का धार्मिक निबन्ध होता है, जो नपे-तुले गोल वाक्यों, जॉन्सनी अंग्रेज़ी, नंगी सामान्य बातों, डरी-सहमी उक्तियों और बड़े यत्न से बनाए गए पानी मिले दूध से भरा होता है। वह सीसे की तलवार है, जिसकी न नोक है न धार; एक भारी हथियार, जिससे कुछ विशेष कटने की आशा कम ही है। परन्तु यदि खरे सुसमाचार के सिद्धान्त, सीधी सादी भाषा, साहस, जीवन्तता, सीधेपन और सरलता का मेल ही एक प्रचारक को गढ़ता है, तो मुझे लगता है कि पुराने लैटिमर की बराबरी शायद ही किसी ने की हो। मैं एक सेवक के रूप में उसके साहस और विश्वासयोग्यता के बहुत से प्रमाण दे सकता था। वह किसी के पापों पर प्रहार करने से नहीं हिचकता था, चाहे वे किसी राजा के ही पाप क्यों न हों। जब हेनरी अष्टम ने बाइबल के प्रसार को रोका, तो लैटिमर ने, अध्यक्ष बनने से बहुत पहले, उसे स्पष्टवादी पत्र लिखकर उसके आचरण पर आपत्ति जताई। वह परमेश्वर का भय मानता था, और किसी और का भय नहीं मानता था। "लैटिमर, लैटिमर," उसने अपने एक उपदेश के आरम्भ में पुकारकर कहा, "तू महाप्रतापी राजा हेनरी अष्टम के सामने बोलने जा रहा है, जो चाहे तो तेरे प्राण ले सकता है। सावधान रह कि तू क्या कहता है। परन्तु लैटिमर, लैटिमर, यह भी स्मरण रख कि तू राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु के सामने बोलने जा रहा है। चौकस रह कि तू उसे अप्रसन्न न कर बैठे।" मैं उसकी संसार से विरक्ति के विषय में भी कह सकता था। उसने एक धनी अध्यक्ष-पद को विवेक के कारण बिना किसी बड़बड़ाहट के त्याग दिया और निजी जीवन में लौट गया। उसी अध्यक्ष-पद को उसने दोबारा ठुकरा दिया, क्योंकि उसे लगा कि उसके कर्त्तव्य निभाने के लिए वह बहुत बूढ़ा हो चुका है, जबकि "हाँ" कह देने भर से वह उसे पा सकता था। मैं उसके हृदय की सच्ची कोमलता के विषय में भी कह सकता था। वह सदा कंगालों और दुखियों का मित्र रहा। लैम्बेथ में रहते हुए उसका बहुत-सा समय उन लोगों के मामलों की जाँच-पड़ताल में बीतता था जो सहायता माँगने उसके पास आते थे। मैं उसके परिश्रम के विषय में भी कह सकता था। अपने जीवन के अन्त तक वह भोर के दो बजे उठकर पढ़ना और अध्ययन आरम्भ कर देता था। यह सब, और इससे भी बहुत कुछ, मैं बता सकता था, यदि मैं इस जीवनी में अधिक विस्तार में जाता। फिर भी मुझे भरोसा है कि मैंने इतने तथ्य दे दिए हैं कि वह मनुष्य कैसा था इसका कुछ धुँधला-सा चित्र मिल जाए। मुझे आशा है कि मेरे पाठक मुझसे सहमत होंगे कि वह इस देश के सबसे उत्तम अध्यक्षों में से एक था, और यह इंग्लैंड की कलीसिया के लिए भला होता कि उसके और अधिक अध्यक्ष अध्यक्ष लैटिमर जैसे होते। उसके जीवन के इतिहास पर विचार करते हुए हम यह कभी न भूलें कि वह उन चमत्कारों का एक महिमामय उदाहरण है जो परमेश्वर का अनुग्रह कर सकता है। पवित्र आत्मा एक हठी, उग्र पोप के अनुयायी को एक विश्वासयोग्य प्रोटेस्टेंट बना सकता है। जहाँ प्रभु का हाथ है, वहाँ कुछ भी असम्भव नहीं। हम कभी यह न सोचें कि कोई मित्र, सम्बन्धी या साथी सुसमाचार का इतना विरोधी है कि वह सच्चा मसीही नहीं बन सकता। यह विचार दूर हो! सुसमाचार के अधीन कोई मामला निराशाजनक नहीं है। आइए हम स्मरण रखें
लैटिमर, और कभी निराश न हो। इन सभी विषयों से, चाहे वे कितने ही रोचक क्यों न हों, मैं उस विषय की ओर मुड़ता हूँ जो आज के समय में इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है। वह विषय है लैटिमर के धर्मवैज्ञानिक मतों का स्वरूप। इस विषय पर कुछ विस्तार से लिखने के लिए मैं कोई क्षमा-याचना नहीं करूँगा। जिस समय में हम जी रहे हैं, उसकी परिस्थितियाँ इस विषय को साधारण से कहीं अधिक महत्व प्रदान करती हैं। हम ऐसे दिनों में जी रहे हैं जब कुछ लोगों की ओर से इंग्लैंड की कलीसिया के सच्चे सिद्धान्तों के विषय में बड़े विचित्र कथन किए जाते हैं। विश्वास के नियम के विषय में, धर्मी ठहराए जाने के विषय में, नया जन्म के विषय में, संस्कारों के विषय में, प्रचार के विषय में अर्द्ध-पोपवादी मत मण्डलियों के सामने निरन्तर रखे जा रहे हैं, और इन मतों के पक्षधर और शिक्षक बड़ी निश्चिन्तता से यह श्रेय अपने ही लिए हड़प रहे हैं कि केवल वे ही खरे कलीसियाई जन हैं। जो लोग इन अर्द्ध-पोपवादी मतों को अस्वीकार करते हैं, वे जब इनके पक्षधरों को चुनौती देते हैं कि इन्हें पवित्रशास्त्र से प्रमाणित करें, तो इसका कोई लाभ नहीं होता। तुरन्त यही उत्तर दे दिया जाता है कि ये मत पवित्रशास्त्र के अनुसार हों या न हों, इसमें कोई सन्देह नहीं कि ये "कलीसिया के मत" हैं। जब हम यह कहते हैं कि इंग्लैंड की कलीसिया के धर्म-सूत्रों, प्रार्थना-विधि और उपदेश-संग्रहों में, ईमानदारी और संगति के साथ अर्थ लेने पर, ये मत कहीं नहीं मिलते, तब भी कुछ लाभ नहीं होता। हमें शान्ति से बता दिया जाता है कि हम इस विषय में कुछ नहीं जानते। हम मूर्ख हैं! हम मन्दबुद्धि हैं! हम अन्धे हैं! हम अज्ञानी हैं! हम साफ़ अंग्रेज़ी भी नहीं समझते! वे ही सच्चे लोग हैं! उनके मत ही सच्चे "कलीसिया के मत" हैं; और यदि हम उनसे असहमत हैं, तो हम बिलकुल ग़लत हैं! संक्षेप में, हमें यह निष्कर्ष निकालने के लिए छोड़ दिया जाता है कि यदि हम ईमानदार और संगत हैं, तो हमें अपनी प्यारी पुरानी कलीसिया को छोड़कर उसे कर्मकाण्डवादियों के हवाले कर देना चाहिए। मैं हर उस व्यक्ति के अनुभव की दुहाई देता हूँ जो आँखें खोलकर जीता है और समय के लक्षणों को देखता है। मेरे पाठक भली-भाँति जानते हैं कि मैं उन बातों का वर्णन कर रहा हूँ जो देश के हर भाग में हो रही हैं। अब, जब बात यहाँ तक आ पहुँची है, तो आइए देखें कि 300 वर्ष पीछे मुड़कर देखने से क्या हम इस विषय पर थोड़ा प्रकाश डाल सकते हैं। आइए पूछें कि उन लोगों के मत क्या थे जिन्होंने इंग्लैंड की कलीसिया की नींव डाली, और जो सर्वविदित रूप से धर्म-सूत्रों, उपदेश-संग्रहों और प्रार्थना-विधि के रचयिता थे। आज पुराने लैटिमर को गवाह के कठघरे में खड़ा करें, और देखें कि विवादित बातों पर उसके मत क्या थे। वह उस समय इंग्लैंड की कलीसिया का एक सम्मानित सदस्य था जब कलीसिया के सिद्धान्तों को पहली बार आकार और रूप दिया गया था; वह आर्चबिशप क्रेन्मर का निकट और प्रिय मित्र तथा सलाहकार था; उपदेश-संग्रह की पहली पुस्तक की रचना में सहायक था; एक ऐसा अध्यक्ष जिसकी रूढ़िवादिता और खरेपन पर उसके समकालीनों ने एक क्षण के लिए भी प्रश्न नहीं उठाया। यदि कोई व्यक्ति जानता है कि एक सच्चे कलीसियाई जन को क्या मानना चाहिए, तो अध्यक्ष लैटिमर निश्चय ही वही व्यक्ति होगा। यदि उसके मत सच्चे "कलीसिया" के मत नहीं हैं, तो मैं नहीं जानता कि किसके हैं। इसलिए मैं अपने पाठकों से कुछ मिनट धैर्य रखने को कहता हूँ, जब मैं लैटिमर की रचनाओं से कुछ अंश प्रस्तुत करूँगा। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि पुराने लेखकों के उद्धरण बहुत उबाऊ होते हैं और कम ही पढ़े जाते हैं। परन्तु मैं आज के महत्वपूर्ण प्रश्न पर अंग्रेज़ों के मन को जानकारी देना चाहता हूँ: सच्चा कलीसियाई जन कौन है, और कौन नहीं? (1) सबसे पहले, पवित्रशास्त्र के विषय में अध्यक्ष लैटिमर क्या सोचता था? यह वह बिन्दु है जिससे सच्चे धर्म का अस्तित्व ही जुड़ा हुआ है। आजकल कुछ कलीसियाई जन हमसे कहते हैं, छठे धर्म-सूत्र के होते हुए भी, कि अकेली बाइबल विश्वास का नियम नहीं है, और मनुष्य को उद्धार के लिए बुद्धिमान बनाने में समर्थ नहीं है। नहीं! वह बाइबल और प्राचीन पिता होना चाहिए, या बाइबल और सार्वभौमिक परम्परा, या बाइबल और कलीसिया, या प्रार्थना-पुस्तक द्वारा समझाई गई बाइबल, या किसी अध्यक्ष-पद से अभिषिक्त पुरुष द्वारा समझाई गई बाइबल, पर अकेली बाइबल नहीं। अब आइए अध्यक्ष लैटिमर को सुनें। वह एडवर्ड VI के सामने एक उपदेश में कहता है, "मैं तुम्हें बताता हूँ कि इस राज्य के एक अध्यक्ष ने मुझसे एक बार क्या कहा। उसने मुझे बुलवाया, और आश्चर्य किया कि मैं उन परम्पराओं से सहमत क्यों नहीं होता जो ठहराई गई थीं। और मैंने उसे उत्तर दिया कि मैं परमेश्वर की पुस्तक के अनुसार चलूँगा, और उससे एक बिन्दु भी हटने के बदले मैं जंगली घोड़ों से चिरवा दिया जाना स्वीकार करूँगा। हमारी बातचीत में संयोग से मैंने प्रभु-भोज का नाम ले लिया। छि! अध्यक्ष ने कहा। तुम प्रभु-भोज किसे कहते हो? यह कौन-सा नया शब्द है? उसके पास डॉ. डबर खड़ा था। उसने तुरन्त हाँ में हाँ मिलाई और कहा कि यह शब्द आचार्यों के लेखों में कम ही पढ़ने को मिलता है। और मैंने उत्तर दिया कि मैं उनके शब्दों की अपेक्षा पौलुस के शब्दों का प्रयोग करना पसन्द करूँगा, चाहे सारे आचार्य उनके पक्ष में हों।" (रचनाएँ, i., 121.) वह रिडले के साथ अपनी बातचीत में फिर कहता है: "परमेश्वर का भय माननेवाला एक साधारण जन पवित्रशास्त्र को समझने के लिए किसी भी घमण्डी या अभिमानी याजक से बहुत अधिक योग्य है; हाँ, अध्यक्ष से भी, चाहे वह अपने याजकीय वस्त्रों में कितना ही बड़ा और चमकता-दमकता क्यों न हो। परन्तु प्राचीन पिताओं के विषय में क्या कहना चाहिए? उन्हें कैसा माना जाना चाहिए? सन्त ऑगस्टीन यह नियम देकर उत्तर देता है कि हमें उनकी किसी बात को केवल इसलिए सच नहीं मान लेना चाहिए कि उन्होंने कही है, चाहे वे पवित्रता और विद्या में कितने ही बढ़े-चढ़े क्यों न हों; परन्तु यदि वे अपनी बात को प्रामाणिक पवित्रशास्त्र से या अच्छे सम्भाव्य तर्कों से सिद्ध कर सकें; और मेरी समझ में सम्भाव्य तर्क से उसका आशय वह है जो पवित्रशास्त्र से सही रीति से निकाले और इकट्ठे किए गए निष्कर्ष के क्रम में आता है। "पोप के अनुयायियों को अपने लम्बे विश्वास के साथ जाने दो। तुम सन्तों के उस छोटे विश्वास से सन्तुष्ट रहो जो हम पर परमेश्वर के लिखित वचन में प्रकट किया गया है। सब पोपवादी कल्पनाओं को विदा। आमीन! क्योंकि पवित्रशास्त्र और अच्छे तर्क को अपने पक्ष में रखनेवाला अकेला एक मनुष्य उनके जैसे हज़ार लोगों से अधिक मूल्यवान माना जाना चाहिए, चाहे वे इकट्ठे हों या एक के बाद एक आते जाएँ। प्राचीन पिताओं में जड़ी-बूटियाँ भी हैं और खरपतवार भी, और पोप के अनुयायी साधारणतः खरपतवार बटोरते हैं और जड़ी-बूटियाँ छोड़ देते हैं।" (रिडले की रचनाएँ, पृ. 114. पार्कर संस्करण।) मैं इन अंशों पर कोई टिप्पणी नहीं करता, ये स्वयं बोलते हैं। (2) अगली बात यह कि विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के विषय में अध्यक्ष लैटिमर क्या सोचता था? यही वह सिद्धान्त है जिसे लूथर ने ठीक ही कलीसिया के बने रहने या गिर पड़ने की कसौटी कहा था। यही वह सिद्धान्त है जिसे, हमारी कलीसिया के ग्यारहवें धर्म-सूत्र के होते हुए भी, बहुत से लोग अब बपतिस्मा, प्रभु-भोज, अपने कर्मों और न जाने किस-किस चीज़ को इसके साथ मिलाकर धुँधला करने का प्रयत्न कर रहे हैं। अब आइए अध्यक्ष लैटिमर को सुनें।
वह लिंकनशायर के ग्रिम्सथोर्प में दिए गए एक उपदेश में कहता है, "मसीह उन सब को परमेश्वर के सामने धर्मी, पवित्र और ग्रहणयोग्य ठहराता है, जो उस पर विश्वास करते हैं, जो अपनी आशा, भरोसा और निर्भरता उसी पर रखते हैं। अपने उस दुःखभोग के द्वारा, जो उसने सहा, उसने यह कमाया कि जितने उस पर विश्वास करें, वे उसके द्वारा ऐसे धर्मी ठहराए जाएँ मानो उन्होंने कभी कोई पाप किया ही न हो, और मानो उन्होंने व्यवस्था को पूरी रीति से पूरा किया हो। क्योंकि हम उसके बिना व्यवस्था के श्राप के अधीन हैं। व्यवस्था हमें दोषी ठहराती है। व्यवस्था हमारी सहायता नहीं कर सकती। फिर भी अपूर्णता व्यवस्था में नहीं, हम में है। व्यवस्था स्वयं पवित्र और भली है, परन्तु हम उसका पालन नहीं कर सकते, और इसलिए व्यवस्था हमें दोषी ठहराती है। परन्तु मसीह ने अपनी मृत्यु के द्वारा हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ा लिया है। उसने हमें स्वतंत्र किया है, और प्रतिज्ञा की है कि जब हम उस पर विश्वास करेंगे तो नाश न होंगे, व्यवस्था हमें दोषी न ठहराएगी। इसलिए आओ, हम मसीह पर विश्वास करने का यत्न करें। आओ, हम अपनी सारी आशा, भरोसा और निर्भरता केवल उसी पर रखें। आओ, हम उसके साथ किसी और बात को न जोड़ें, क्योंकि, जैसा मैं ने तुम से पहले कहा, हमारे पुण्य अनन्त जीवन के योग्य ठहरने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। वह मनुष्य के द्वारा कमाए जाने के लिए बहुत मूल्यवान वस्तु है। यह केवल उसी का काम है। परमेश्वर ने उसे हमें दे दिया है कि वह हमारा छुड़ानेवाला हो, और हमें अनन्त जीवन दे।" (ii. 125.) वह एक और उपदेश में फिर कहता है, "पोप के अनुयायियों के सबसे घृणित और खतरनाक विष से घृणा करना सीखो, जो मसीह को उसके पद से बाहर धकेलने का प्रयत्न करते हैं। मैं कहता हूँ, सीखो कि सारे पोप-मत को छोड़ दो, और केवल परमेश्वर के वचन से जुड़े रहो, जो सिखाता है कि मसीह केवल न्यायी ही नहीं परन्तु धर्मी ठहरानेवाला, उद्धार का देनेवाला और पाप को दूर करनेवाला है। उसने अपनी पीड़ादायक मृत्यु के द्वारा हमारा उद्धार मोल लिया, और हम उसी को उस पर विश्वास करने के द्वारा पाते हैं, जैसा कि पौलुस हमें सिखाता है, कि तुम सेंतमेत धर्मी ठहरे हो विश्वास के द्वारा। पौलुस के इन शब्दों में सब पुण्य और कर्मों का मूल्यांकन बहिष्कृत और पूरी तरह दूर कर दिया गया है। क्योंकि यदि यह हमारे कर्मों के कारण होता, तो सेंतमेत न होता, परन्तु पौलुस कहता है सेंतमेत। अब तुम किस की मानोगे, पौलुस की या पोप के अनुयायियों की?" (ii. 147.) वह एक और उपदेश में फिर कहता है: "केवल मसीह ने, और किसी मनुष्य ने नहीं, उन सब के लिए जो इस पर विश्वास करेंगे, पापों की क्षमा, धर्मी ठहराया जाना और अनन्त सुख कमाया। जो इस पर विश्वास न करेंगे, वे इसे न पाएँगे; क्योंकि बात बस इतनी है, कि विश्वास करो और पाओ।" (i. 421.) मैं फिर कहता हूँ, इन अंशों को मेरी किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। वे स्वयं बोलते हैं। (3) अगली बात, नया जन्म के विषय में बिशप लैटिमर क्या सोचता था? जैसा आप सब जानते हैं, यह आज के बड़े विवादों में से एक का विषय है। सत्रहवें अनुच्छेद और व्हिट-सण्डे के होमिली के होते हुए भी, कलीसिया के अनेक लोग यह मानते हैं कि सब बपतिस्मा पाए हुए लोग अनिवार्य रूप से नया जन्म पाए हुए हैं, और बपतिस्मा के क्षण में ही अनुग्रह और पवित्र आत्मा पाते हैं। एक शब्द में, वे हमें बताते हैं कि हर पुरुष, स्त्री और बच्चा, जिसने बपतिस्मा लिया है, उसने नया जन्म भी पा लिया है, और इंग्लैण्ड की कलीसिया की हर मण्डली को नया जन्म पाए हुए लोगों की सभा के रूप में सम्बोधित किया जाना चाहिए। अब आइए बिशप लैटिमर को सुनें। वह लिंकनशायर में दिए गए एक उपदेश में कहता है, "दो प्रकार के मनुष्य होते हैं। कुछ ऐसे हैं जो धर्मी नहीं ठहराए गए, जिनका नया जन्म नहीं हुआ, जो अभी उद्धार की दशा में नहीं हैं, अर्थात् परमेश्वर के सेवक नहीं हैं। उनमें नवीनीकरण, अर्थात् नया जन्म, की घटी है। वे अभी मसीह के पास नहीं आए।" (ii. 7.) एडवर्ड छठे के सामने दिए गए एक उपदेश में वह कहता है, "मसीह कहता है, जब तक कोई ऊपर से न जन्मे, वह परमेश्वर का राज्य नहीं देख सकता। उसका नया जन्म होना अवश्य है। और यह नया जन्म क्या है? यह केवल जल में नामकरण पाना नहीं है, जैसा वे अंगारे इसकी व्याख्या करते हैं, और कुछ नहीं। तो फिर इसकी व्याख्या कैसे की जाए? पतरस दिखाता है कि पवित्रशास्त्र का एक स्थान दूसरे की व्याख्या करता है। पवित्रशास्त्र को स्पष्ट करनेवाली बात स्थानों का संदर्भ और संकलन है। पतरस कहता है, हम नए सिरे से जन्मे हैं, और कैसे? नाशमान बीज से नहीं, पर अविनाशी से? वह अविनाशी बीज क्या है? जीवते परमेश्वर के वचन के द्वारा: परमेश्वर के वचन के प्रचार और खोले जाने के द्वारा। इस प्रकार हमारा नया जन्म होता है।" (i. 202.) वह लिंकनशायर के एक और उपदेश में कहता है, "प्रचार परमेश्वर का वह साधन है जिसके द्वारा वह हमारे हृदयों में विश्वास उत्पन्न करता है। हमारा उद्धारकर्ता नीकुदेमुस से कहता है, जब तक कोई नए सिरे से न जन्मे, वह परमेश्वर का राज्य नहीं देख सकता। परन्तु यह नया जन्म कैसे होता है? परमेश्वर का वचन सुनने और उस पर विश्वास करने से: क्योंकि पतरस ऐसा ही कहता है।" (i. 471.)
मैं फिर कहता हूँ कि इन अंशों पर मेरी किसी टीका की आवश्यकता नहीं। वे स्वयं ही बोलते हैं। (4) अब दूसरी बात यह कि प्रभु-भोज के विषय में बिशप लैटिमर क्या सोचते थे? इस विषय में आजकल प्रायः ऐसी शिक्षा दी जाती है जो प्रोटेस्टेंट शिक्षा से बहुत दूर है, और यह बात मुझे कहने की शायद ही आवश्यकता हो। हमारे आसपास कुछ लोग अट्ठाईसवें अनुच्छेद के विरुद्ध इस संस्कार की चर्चा ऐसे ढंग से करते हैं कि उनकी शिक्षा और पोप-मत के रोटी के तत्त्वान्तरण, अर्थात् मिस्सा के बलिदान, की शिक्षा में अन्तर देख पाना कठिन हो जाता है। अब आइए, हम बिशप लैटिमर की सुनें। ऑक्सफ़ोर्ड में अपने वाद-विवाद में वे कहते हैं, "संस्कार में मसीह की आत्मिक उपस्थिति के सिवा किसी और उपस्थिति की आवश्यकता नहीं। और यह उपस्थिति मसीही मनुष्य के लिए पर्याप्त है, क्योंकि इसी उपस्थिति के द्वारा हम मसीह में और मसीह हम में बना रहता है, ताकि यदि हम सच्चे सुसमाचार में स्थिर रहें तो अनन्त जीवन पाएँ। और इसी उपस्थिति को वास्तविक उपस्थिति भी कहा जा सकता है, क्योंकि सच्चे विश्वासी के लिए मसीह की वास्तविक और आत्मिक देह वहाँ उपस्थित है।" (ii. 252.) उसी वाद-विवाद में वे कहते हैं, "मसीह ने बलिदान चढ़ाने या मिस्सा कहने के विषय में कभी एक शब्द भी नहीं कहा; और न उसने सुननेवालों को मूर्तिपूजकों के बीच शैतान और उसके दूतों के साथ दण्ड के सिवा कोई प्रतिफल देने की प्रतिज्ञा की, जब तक कि वे शीघ्र मन न फिराएँ। इसलिए बलिदान चढ़ानेवाले याजकों को अब सदा के लिए समाप्त हो जाना चाहिए; क्योंकि अब सब मनुष्यों को अपनी देह को जीवित बलिदान करके चढ़ाना चाहिए, जो परमेश्वर के सामने पवित्र और ग्रहणयोग्य हो। प्रभु-भोज इसलिए ठहराया गया कि वह हमें धन्यवाद के लिए उभारे, और सुसमाचार के प्रचार के द्वारा हमें उसकी मृत्यु को स्मरण करने के लिए जगाए, जब तक वह फिर न आए।" (ii. 256.) अपनी अन्तिम पूछताछ में वे कहते हैं, "रोटी और दाखरस में परिवर्तन होता है, और ऐसा परिवर्तन जो परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के सिवा कोई सामर्थ्य नहीं कर सकती, कि जो पहले रोटी थी उसे अब मसीह की देह को प्रस्तुत करने की गरिमा मिल गई। फिर भी रोटी अब भी रोटी ही है, और दाखरस अब भी दाखरस ही है। क्योंकि परिवर्तन स्वभाव में नहीं, गरिमा में है।" (ii. 286.) लिंकनशायर के अपने एक उपदेश में वे कहते हैं, "जो कोई प्रभु की विधि के अनुसार योग्य रीति से उस रहस्यमय रोटी को खाता और उस रहस्यमय दाखरस को पीता है, वह निश्चय ही मसीह की देह और लहू को आत्मिक रीति से ग्रहण करता है, जो उसकी आत्मा के लिए अत्यन्त सांत्वनादायक होगा। वह अपनी आत्मा के मुँह से खाता है, और अपनी आत्मा के पेट से मसीह की देह को पचाता है। और संक्षेप में, जो कोई मसीह पर विश्वास करता है, अपनी आशा, भरोसा और निर्भरता उसी पर रखता है, वह उसे खाता और पीता है। क्योंकि अनन्त जीवन के लिए सच्चा खाना आत्मिक खाना है, शारीरिक खाना नहीं।" (i. 459.) मैं फिर कहता हूँ कि इन अंशों पर मैं कोई टीका नहीं करता। वे स्वयं ही बोलते हैं। यदि आवश्यक या वांछनीय होता तो इस प्रकार के उद्धरण अनन्त लम्बाई तक बढ़ाना सरल होता। आज के समय में ऐसा शायद ही कोई विवादित विषय हो जिस पर मैं बिशप लैटिमर की कोई सीधी, पवित्रशास्त्र-सम्मत, विवेकपूर्ण और खरी राय न दे सकूँ। क्या मेरे पाठक जानना चाहेंगे कि वे प्रचार की विधि के विषय में क्या सोचते थे? क्या वे उसे तुच्छ समझते थे, जैसा आजकल कुछ लोग करते हैं, और उसे संस्कारों और धर्म-विधियों के सामने बहुत गौण अनुग्रह का साधन मानते थे? नहीं! वास्तव में ऐसा नहीं था। वे उसे "उद्धार का कार्य, और नया जन्म देने का कार्य" कहते हैं। वे कहते हैं, "प्रचार को हटा दो तो उद्धार को हटा दो।" वे कहते हैं, "प्रचार का यह कार्य ही वह एकमात्र साधारण मार्ग है जो परमेश्वर ने हम सबको बचाने के लिए ठहराया है। आइए, हम इसी को थामे रहें, क्योंकि मैं और कोई मार्ग नहीं जानता।" वे घोषणा करते हैं कि "प्रचार वह वस्तु है जिसके विरुद्ध शैतान सबसे अधिक लड़ा। इस कार्य को बदनाम करना उसका सारा अध्ययन रहा है। वह जितना हो सके उसके विरुद्ध काम करता है। उसने प्रचार न करनेवाले बिशप खड़े किए हैं, और उन्हें झुण्ड के झुण्ड उकसाया है कि वे झूठी शिक्षा के नाम पर इस कार्य को सताएँ।" (i. 203, 155, 306, 349, 302.) क्या मेरे पाठक जानना चाहेंगे कि वे कलीसियाओं में भव्य रस्मों और मोमबत्तियों के विषय में क्या सोचते थे? वे साफ़ कहते हैं कि ये बातें शैतान की ओर से आती हैं। "जहाँ शैतान निवास करता है और उसका हल चलता है, वहाँ पुस्तक को हटाओ और मोमबत्तियाँ उठाओ; बाइबल को हटाओ और मालाएँ उठाओ; सुसमाचार की ज्योति को हटाओ और मोमबत्तियों की ज्योति उठाओ, हाँ, दोपहर में भी। जहाँ शैतान निवास करता है, वहाँ वह प्रबल हो सके इसलिए सब अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा उठा ली जाती है: धूप जलाना, मूर्तियाँ रँगना, मोमबत्तियाँ, खजूर की डालियाँ, राख, पवित्र जल, और मनुष्य की गढ़ी हुई नई-नई उपासना-विधियाँ।" (i. 71.)
क्या मेरे पाठक जानना चाहेंगे कि विदेशी धर्म-सुधारकों के विषय में उसका क्या विचार था? क्या वह उन्हें तुच्छ समझता था, जैसा आजकल कुछ लोग करते हैं, क्योंकि उन्होंने अध्यक्ष-पद्धति को नहीं रखा? नहीं! सचमुच नहीं। वह कहता है, "मैंने सुना है कि मेलांकथॉन, वह महान विद्वान, यहाँ आनेवाला है। मैं चाहूँगा कि उसे, और उसके जैसे लोगों को, प्रति वर्ष £200 मिलें। राजा को इसकी कभी कमी न होगी। हमारे बीच अब भी दो बड़े विद्वान हैं, पीटर मार्टिर और बर्नार्ड ओकिन, जिन्हें सौ-सौ मार्क मिलते हैं। मैं चाहता हूँ कि राजा ऐसे लोगों को एक हज़ार पौंड दे।" (i. 141.) क्या मेरे पाठक जानना चाहेंगे कि एकता के विषय में उसका क्या विचार था? क्या वह यह मानता था, जैसा आज कुछ लोग मानते हैं, कि एकता ही एकमात्र आवश्यक बात है, और उसे पाने के लिए हमें सब कुछ त्याग देना चाहिए? नहीं, सचमुच नहीं! वह कहता है, "एकता परमेश्वर के पवित्र वचन के अनुसार होनी चाहिए, नहीं तो शान्ति से युद्ध ही भला है। हमें एकता को इतना महत्त्व कभी न देना चाहिए कि उसके लिए परमेश्वर के वचन को त्याग दें।" (i. 487.) क्या मेरे पाठक जानना चाहेंगे कि महासभाओं और धर्म-सभाओं के विषय में उसका क्या विचार था? क्या वह उन्हें कलीसिया की सब बीमारियों की रामबाण औषधि मानता था, जैसे हमारे आस-पास के वे लोग जिनकी पुकार है, "हमें धर्म-सभा की कार्रवाई दो, नहीं तो हम मरे"? वह रिडले से कहता है, "महासभाओं और धर्म-सभाओं के विषय में, मैं तुम्हें तुम्हारे अपने अनुभव की ओर संकेत करता हूँ; हमारे अपने देश की संसदों और धर्म-सभाओं पर विचार करो। मेरे समय में अधिकांश ने छः धाराएँ निकालीं। फिर अधिकांश ने उन्हें रद्द कर दिया। वही धाराएँ अब फिर बहाल कर दी गई हैं। ओह, यह कैसी अनिश्चितता है!" और एक दूसरे स्थान पर वह कहता है, "जिस एक मनुष्य के पक्ष में परमेश्वर का पवित्र वचन है, उस पर दस हज़ार ऐसे लोगों से अधिक विश्वास करना चाहिए जिनके पास वचन नहीं। यदि वह परमेश्वर के वचन से मेल खाता है, तो उसे ग्रहण करना चाहिए। यदि मेल नहीं खाता, तो उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए, चाहे महासभा ने ही उसे ठहराया हो।" (Ridley, 130; Latim. i. 288.) क्या मेरे पाठक जानना चाहेंगे कि सच्चे और पूर्ण प्रोटेस्टेंट प्रचार के विषय में उसका क्या विचार था? क्या वह यह मानता था, जैसा आज कुछ लोग मानते हैं, कि यदि किसी उपदेश में बहुत-सा सत्य हो, तो थोड़ी-सी झूठी शिक्षा क्षमा और स्वीकार की जा सकती है? नहीं! सचमुच नहीं। वह कहता है, "बहुत-से लोग परमेश्वर का वचन सुनाते हैं, और एक बहुत अच्छा और भक्तिपूर्ण उपदेश देंगे, पर अन्त में वे एक छीले हुए बादाम की तरह पोप-मत का एक छोटा-सा टुकड़ा जोड़ देंगे, अपने लाभ और अपनी बड़ाई के लिए अपनी बात को मसालेदार बनाने को। वे परमेश्वर के मार्ग और मनुष्य के मार्ग को मिला देते हैं, एक खिचड़ी, जैसे मेरे देश में सूअरों को खिलाते हैं।" (i. 290.) मैं इन उद्धरणों को और नहीं बढ़ाऊँगा, यद्यपि ऐसा करना सरल होता। जिन्होंने पार्कर सोसाइटी द्वारा प्रकाशित लैटिमर की रचनाओं का अध्ययन नहीं किया, उन्हें अपनी हानि का अनुमान तक नहीं। वे सारगर्भित, तीखे प्रोटेस्टेंट सत्यों से लबालब भरी हैं। मैं अपने पाठकों से केवल इतना कहूँगा कि भली-भाँति स्मरण रखें कि मैं किसके शब्द उद्धृत कर रहा हूँ, और वे कब कहे गए थे। ये शब्द पिछले वर्ष नहीं कहे गए। ये आज के किसी इंजीलवादी या निम्न कलीसिया के पादरी के मुँह से नहीं निकले। ये पार्क चैपल, चेल्सी; या पोर्टमैन चैपल; या लॉक; या बेल्ग्रेव चैपल के सेवकों ने नहीं कहे, न ही एक्सेटर हॉल के किसी मंच-वक्ता ने। नहीं: जो शब्द मैंने उद्धृत किए हैं वे तीन सौ वर्ष पुराने हैं। वे इंग्लैंड की कलीसिया के अब तक हुए सबसे उत्तम अध्यक्षों में से एक के शब्द हैं। वे उस मनुष्य के शब्द हैं जिसने हमारी प्रथम होमिली-पुस्तक की रचना में सहायता की। वे आर्चबिशप क्रैन्मर के मित्र और सलाहकार के शब्द हैं। वे उस मनुष्य के शब्द हैं जिसका आदर करने में राजा और संसद प्रसन्न थे। तो इन शब्दों के बोलनेवाले को इंग्लैंड की कलीसिया से निकाला क्यों न गया? उसे डाँटा क्यों न गया? उसे निम्न और कलीसिया-विरोधी विचारों वाला कहकर बदनाम क्यों न किया गया? उसके विचारों के कारण उस पर मुकदमा और अत्याचार क्यों न हुआ? ऐसा क्यों हुआ कि उसे केवल पोप के अनुयायियों ने सताया, पर प्रोटेस्टेंटों ने सदा उसका आदर किया? बॉनर, गार्डिनर और खूनी मरियम ने उसे सताया; पर क्रैन्मर, रिडले और एडवर्ड VI ने उसका आदर किया? मैं इन प्रश्नों का सीधा उत्तर दूँगा। मेरा उत्तर यह है कि तीन सौ वर्ष पहले कोई भी विवेकशील मनुष्य इसमें सन्देह नहीं करता था कि लैटिमर के विचार ही इंग्लैंड की कलीसिया के वास्तविक विचार थे। मैं आगे यह भी दृढ़ता से कहता हूँ कि सबसे सच्चे और उत्तम सदस्य
इंग्लैंड की कलीसिया में आज के दिन वे लोग हैं जिनके विचार भले अध्यक्ष लैटिमर के विचारों से सबसे अधिक मेल खाते हैं। और मैं कहता हूँ कि जो लोग इंग्लैंड की कलीसिया से गहरा प्रेम रखते हैं, उनसे यह कहना कि वे खरे कलीसिया-जन नहीं हैं, केवल इसलिए कि वे लॉड के नहीं बल्कि लैटिमर के साथ सहमत हैं, उन पर सबसे अधिक अन्यायपूर्ण और अनुचित दोष लगाना है। और अब मैं लैटिमर के इस जीवन-चरित्र का अन्त दो व्यावहारिक बातों के साथ करता हूँ। पहली बात यह कि मैं अपने पाठकों से व्यक्तिगत रूप से गम्भीरता से आग्रह करता हूँ कि इंग्लैंड की कलीसिया के भीतर जिन्हें इंजीलवादी विचार कहा जाता है, उन्हें रखने में कभी लज्जित न हों। एक ओर के उन घमण्डी सज्जनों की मत सुनो जो तुम्हें यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि यदि तुम उनके समान उच्च कलीसिया-जन नहीं हो, तो तुम कलीसिया-जन ही नहीं हो। दूसरी ओर के उन अत्यन्त दयालु मित्रों की भी मत सुनो जो तुम्हें समझाने का यत्न करते हैं कि स्थापित कलीसिया पूरी तरह पोप-मत का ही एक ढाँचा है और उसे तुरन्त छोड़ देना चाहिए। ये दोनों पुरानी चालें हैं। इन दोनों चालों से सावधान रहो। उच्च कलीसिया-जन के इस दावे से डरकर इंग्लैंड की कलीसिया को मत छोड़ो कि तुम केवल सहन किए जानेवाला एक दल हो और उसके पास तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। निःसन्देह तुम ऐसी सहभागिता में रहते हो जहाँ विचारों की बड़ी स्वतन्त्रता दी जाती है। परन्तु इंजीलवादी विचार रखनेवालों से यह कहना कि उन्हें केवल सहन किया जाता है, धर्म-सुधारकों की स्मृति का सीधा अपमान है। जो लोग हमसे ऐसा कहते हैं, उन्हें हम यह उत्तर दें कि यदि वे लैटिमर को और तीन सौ वर्ष पहले की बातों को भूल गए हैं, तो हम नहीं भूले। हम कहें कि हम लैटिमर की कलीसिया को उन लोगों को प्रसन्न करने के लिए नहीं छोड़ेंगे जो परमेश्वर की निज भाग पर प्रभुता जताना और सब कुछ अपनी ही रीति से चलाना चाहते हैं। मुझे निश्चय है कि यदि कभी बल अधिकार पर जीत पाए, और लैटिमर के मित्र बलपूर्वक कलीसिया से निकाल दिए जाएँ, और हाउस ऑफ कॉमन्स इसकी स्वीकृति देने की पागलपन-भरी भूल करे, तो निकाले गए लोग पीछे रह गए लोगों से कहीं अच्छे कलीसिया-जन होंगे। और बाहर के उन लोगों के तर्कों से भी बहलाए मत जाओ जो शायद भीतर आकर प्रसन्न होते यदि उन्हें केवल मार्ग दिखाई देता। पुरानी कथा में जब लोमड़ी अंगूरों तक नहीं पहुँच सकी, तो उसने कहा कि वे खट्टे हैं। दूसरी कथा में जब एक लोमड़ी ने जाल में अपनी पूँछ गँवा दी, तो उसने अपने साथियों को समझाने का यत्न किया कि लोमड़ियाँ बिना पूँछ के कहीं अच्छी रहती हैं, और उन्हें अपनी-अपनी पूँछ कटवा देने की सलाह दी। उस कथा की शिक्षा को मत भूलो; अपनी ही पूँछ काट डालने के लिए फुसलाए मत जाओ। निश्चिन्त रहो कि अपनी सारी भूलों और दोषों के होते हुए भी इंग्लैंड की कलीसिया के पास अपने सदस्यों को देने के लिए बहुत ऊँचे विशेषाधिकार हैं। इन विशेषाधिकारों पर भली-भाँति विचार करो। सदा दोषों ही में मत उलझे रहो। ठान लो कि तुम इन विशेषाधिकारों को सहज ही नहीं त्यागोगे। सबसे बढ़कर यह कभी, कभी न भूलो कि इंजीलवादी विचार केवल सिद्धान्त की दृष्टि से खरे और धर्म-सुधारकों के मन के अनुकूल ही नहीं हैं, वरन् वे इंग्लैंड की कलीसिया के अस्तित्व के लिए भी प्राणदायक महत्त्व रखते हैं। हमारी प्रिय कलीसिया इस देश में कभी इतनी नीची दशा में नहीं रही जितनी तब, जब इंजीलवादी विचार शून्य तक पहुँच गए थे और लगभग भुला दिए गए थे। वह कभी इतनी ऊँची नहीं रही जितनी तब, जब लैटिमर और धर्म-सुधारकों के विचारों का सच्चाई से प्रचार किया गया और उन्हें व्यवहार में लाया गया। इंजीलवादी मतों से लज्जित होने के बजाय तुम इस बात से सन्तुष्ट हो सकते हो कि उनका बना रहना अब तुम्हारी अपनी सहभागिता के लिए जीवन और मृत्यु का प्रश्न बनता जा रहा है। लैटिमर के विचार हटा दो, तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि सारी स्थापित कलीसिया बाहर के दबाव के आगे ढह जाएगी और भूमि पर आ गिरेगी। दूसरी बात यह कि मैं इस जीवन-चरित्र के सब अंग्रेज पाठकों से विनती करता हूँ कि इस देश में रोम की कलीसिया की ओर किसी भी पीछे हटने वाले आन्दोलन का समर्थन करने से सावधान रहें, और ऐसे आन्दोलन का, चाहे वह किसी भी ओर से आए, हर सम्भव उपाय से विरोध करें। मुझे निश्चय है कि यह चेतावनी ऐसी है जिसकी आज के समय को ऊँचे स्वर में आवश्यकता है। रोम की कलीसिया पिछले कुछ वर्षों में नए बल के साथ हमारे बीच उठ खड़ी हुई है। वह अपनी इस आशा को छिपाती नहीं कि इंग्लैंड, वह खोया हुआ ग्रह, शीघ्र ही तथाकथित कैथोलिक व्यवस्था में अपनी कक्षा फिर ग्रहण करेगा, और एक बार फिर वेटिकन के केन्द्र के चारों ओर अन्धी आज्ञाकारिता से घूमने लगेगा। वह अज्ञानी लोगों की आँखों को अपने असली स्वरूप के विषय में अन्धा करने में सफल हुई है। वह हमारी अपनी स्थापित कलीसिया के भीतर के भटके हुए लोगों की अप्रत्याशित सहायता पाने में भी सफल हुई है। हमारे चारों ओर के सैकड़ों छोटे-छोटे लक्षण बताते हैं कि संकट कितना सच्चा है। लॉड और शपथ न लेनेवालों की बड़ाई की जाती है, जबकि लैटिमर और धर्म-सुधारकों की निन्दा की जाती है। ऐसी ऐतिहासिक पुस्तकें परिश्रमपूर्वक फैलाई जा रही हैं जिनमें खूनी मरियम की प्रशंसा और प्रोटेस्टेंट एलिज़ाबेथ की निन्दा है। रोमन मत माननेवालों के प्रति रोगी कोमलता और असहमत लोगों के प्रति विषैली कटुता साथ-साथ उत्पन्न हो गई हैं। जिसे मध्यकालीन रुचि कहा जाता है, उस पर अस्वस्थ ध्यान दिया जा रहा है। हजारों पर्चे देश भर में खुले हाथ बिखेरे जाते हैं, जिनमें सामान्यतः तीन प्रमुख शब्द दिखाई देते हैं: "याजक", "कैथोलिक" और "कलीसिया", जो अपशकुन-भरे हैं। जपमाला का प्रयोग, कान में पाप-स्वीकार, मरे हुओं के लिए प्रार्थनाएँ और "प्रणाम मरियम" अंग्रेज कलीसिया के सदस्यों को जान-बूझकर सुझाए जा रहे हैं। मुझे भय है कि धीरे-धीरे पोप-मत के विषय में अंग्रेजों की भावना की धार कुन्द और मन्द होती जा रही है। निश्चय ही मेरे पास अपने पाठकों से यह कहने का उचित कारण है कि रोम की कलीसिया से सावधान रहो। स्मरण रखो कि जब रोम को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त था, तब उसने इंग्लैंड को कैसे अन्धकार में रखा। अध्यक्ष लैटिमर की युवावस्था में जो घोर अज्ञान और गिरानेवाले अन्धविश्वास फैले थे, उन्हें याद करो। क्षण भर के लिए भी यह मत सोचो कि वे पुरानी बातें हैं और रोम बदल गया है। ट्रीयर का पवित्र कोट, रिमिनी का पलकें झपकानेवाला चित्र, वह मानसिक दासता जिसमें पोप के राज्य रखे गए हैं, और पवित्र नगर में आज तक होनेवाले कुख्यात आचरण, ये सब इस बात के गवाह हैं कि जब रोम के पास अधिकार होता है, तब वह बिलकुल नहीं बदला है। यह स्मरण रखो और सावधान रहो। उन भयानक अत्याचारों को स्मरण करो जो रोम ने सच्चे धर्म के विरुद्ध तब किए जब इस देश में उसका अनियन्त्रित शासन था। खूनी मरियम के दिनों को कलंकित करनेवाले अत्याचारों और अध्यक्ष लैटिमर के जलाए जाने को याद करो। क्षण भर के लिए भी यह मत सोचो कि रोम बदल गया है। मदीरा में बाइबल पढ़नेवालों का उत्पीड़न और मदियाई दम्पति का कारावास स्पष्ट प्रमाण हैं कि तीन सौ वर्ष के बाद भी रोम की पुरानी उत्पीड़क आत्मा पहले जैसी ही प्रबल बनी हुई है। इसे भी स्मरण रखो, और सावधान रहो।
क्या हम ऐसे तथ्यों के सामने उस दासत्व में लौट जाएँ जिसमें हमारे पूर्वज रखे गए थे? क्या हम अपनी बाइबलें छोड़ दें, या उन्हें पढ़ने के लिए याजकों से अनुमति माँगकर ही सन्तुष्ट हो जाएँ? क्या हम इतालवी पादरियों के आगे नम्रता से सिर झुका दें? क्या हम पाप-स्वीकार के कक्षों और मिस्सा के मूर्तिपूजक बलिदान की ओर लौट जाएँ? परमेश्वर न करे! मैं तो अपनी ओर से कहता हूँ, परमेश्वर न करे! कुत्ता अपनी छाँट की ओर लौटे। नहलाई हुई सूअरनी फिर कीचड़ में लोटने लगे। मूर्ख बन्दी फिर अपनी बेड़ियों में लौट जाए। परन्तु परमेश्वर न करे कि इस्राएल फिर मिस्र को लौटे! परमेश्वर न करे कि इंग्लैंड फिर रोम की गोद में चला जाए! परमेश्वर न करे कि बूढ़े लैटिमर की मोमबत्ती कभी बुझाई जाए! यदि हम ऐसे शोचनीय अन्त को रोकना चाहते हैं, तो हम में से हर एक काम करे। स्वदेश और विदेश में शुद्ध, पवित्रशास्त्रीय और सुसमाचारीय धर्म के प्रसार के लिए हम जी-जान से परिश्रम करें। हम उसे यहूदियों में, रोमन कैथोलिकों में और अन्यजातियों में फैलाने का यत्न करें। और कम से कम इतना तो अवश्य करें कि अपनी ही कलीसिया में हर संवैधानिक उपाय से उसे सुरक्षित रखें और बनाए रखें। यदि हम रोमवाद की वृद्धि को रोकना चाहते हैं, तो हम में से हर एक सब सच्चे प्रोटेस्टेंटों के प्रति, वे जिस नाम से भी पुकारे जाते हों, भाईचारे का भाव रखे। उस पुरानी निरर्थक धारणा को दूर करो कि इंग्लैंड की कलीसिया असहमतों और रोम के बीच एक मध्य स्थान, एक मध्य मार्ग (via media) पर खड़ी है। उसे त्याग दो, क्योंकि वह झूठी है। यह तो वैसा ही है जैसे कोई कहे कि वाइट द्वीप इंग्लैंड और फ्रांस के ठीक बीच में है। हमारे और रोम के बीच एक खाई है, और वह चौड़ी और गहरी खाई है। हमारे और सच्चे प्रोटेस्टेंट असहमतों के बीच केवल एक पतली विभाजक दीवार है। हमारे और रोम के बीच मतभेद मूल सिद्धान्तों के विषय में हैं, और उन बातों के विषय में जो उद्धार के लिए नितान्त आवश्यक हैं। हमारे और असहमतों के बीच विभाजन उन बातों के विषय में है जो महत्त्वहीन हैं, जिनमें मनुष्य चूक भी जाए तो भी उद्धार पा सकता है। रोम तो खुला और सीधा शत्रु है, जो हमारे धर्म की नींव ही पर आक्रमण करता है। असहमतों को हमारा मित्र और सहयोगी होना चाहिए; भले ही वे हमारी वर्दी नहीं पहनते, और जैसा हम समझते हैं, हमारे जितने सुसज्जित भी नहीं हैं, तो भी वे सहयोगी हैं और उसी पक्ष में लड़ रहे हैं। यह संकेत व्यर्थ न जाए! जो लोग हमारी तरह उसी उद्धारकर्ता से प्रेम रखते हैं, उन्हीं सिद्धान्तों पर विश्वास करते हैं और उसी बाइबल का आदर करते हैं, उन सबके प्रति हम दयालु और भाईचारे का भाव बनाए रखें। अन्त में, यदि हम रोमवाद की वृद्धि को रोकना चाहते हैं, तो हम में से हर एक प्रार्थना करे; हम रात-दिन प्रार्थना करें कि परमेश्वर इस देश को पोप-मत से बचाए रखे और इसके पापों के अनुसार इसके साथ व्यवहार न करे। यह एक उल्लेखनीय बात है कि भले राजा एडवर्ड षष्ठ ने अपनी मृत्यु-शय्या पर जो अन्तिम प्रार्थनाएँ कीं, उनमें से एक प्रार्थना यह थी: "हे मेरे प्रभु परमेश्वर, इस राज्य को पोप-मत से बचा, और अपने सच्चे धर्म को बनाए रख।" सन् 1549 की हमारी प्रार्थना-पुस्तक की लिटनी में एक प्रार्थना थी, जिसे मैं समझता हूँ कभी उसमें से निकाला नहीं जाना चाहिए था: "सब राजद्रोह और गुप्त षड्यन्त्र से, रोम के अध्यक्ष के अत्याचार और उसकी सब घृणित दुष्टताओं से, सब झूठी शिक्षा और झूठे मत से, मन की कठोरता से, और तेरे वचन और आज्ञाओं के तिरस्कार से, हे भले प्रभु, हमें छुड़ा!" इस प्रार्थना पर हम सदा सच्चे मन से आमीन और आमीन कह सकें!
जॉन ब्रैडफ़र्ड: शहीद
जॉन ब्रैडफ़र्ड, प्रसिद्ध अंग्रेज धर्म-सुधारक, जो रानी मरियम के दिनों में मसीह के सत्य के लिए स्मिथफ़ील्ड में जलाए गए थे, लेखक के रूप में उतने नहीं जितने शहीद के रूप में जाने जाते हैं। उनकी मृत्यु की भव्यता ने उनकी लेखनी के कार्य को ढक दिया है। बहुत कम लोगों को शायद यह अनुमान है कि अंग्रेजी धर्मविज्ञान का कैसा समृद्ध भण्डार उनकी साहित्यिक रचनाओं में सँजोया हुआ है।
ऐसा नहीं होना चाहिए। पार्कर सोसाइटी द्वारा प्रकाशित अनेक उत्तम ग्रन्थों में से कितने ही, मुझे सन्देह है, पुस्तकालयों के पटलों पर चुपचाप पड़े रहते हैं, न खुले हुए, न पन्ने काटे हुए। प्राचीन युद्धास्त्रों के समान वे हमारे युग की रुचि के लिए बहुत भारी हैं। वूलविच शस्त्रागार की तोपों और गोलों के समान वे ऐसे भण्डार समझे जाते हैं जिनका उपयोग केवल विशेष आवश्यकता के समय ही होता है। फिर भी इनमें से कुछ ग्रन्थ उन्नीसवीं सदी में भी ध्यानपूर्वक पढ़े जाने पर भरपूर प्रतिफल देंगे। लैटिमर, हूपर और ज्यूएल की कभी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इन तीनों के साथ-साथ मैं ब्रैडफ़र्ड की रचनाओं और अवशेषों (Works and Remains) के दो खण्डों को भी रखना चाहता हूँ, जिनमें से कुछ चुने हुए अंश मैं इस निबन्ध के अन्त में देना चाहता हूँ।
ब्रैडफ़र्ड के जीवन और मृत्यु का कुछ वर्णन उनकी रचनाओं से दिए जानेवाले उद्धरणों की उपयुक्त भूमिका होगा। बहुतों के लिए यह एक पुरानी और भली-भाँति ज्ञात कहानी है; फिर भी ऐसे दिनों में अंग्रेजी धर्म-सुधार के वीरों का स्मरण दिलाकर लोगों के मन को जगाना अच्छा है। जो जानकारी मैं दे रहा हूँ, उसके एक बड़े भाग के लिए मैं रेवरेंड ऑब्रे टाउनसेंड द्वारा लिखित ब्रैडफ़र्ड की जीवनी का ऋणी हूँ, जो पार्कर सोसाइटी द्वारा प्रकाशित ब्रैडफ़र्ड की रचनाओं के संस्करण के आरम्भ में दी गई है।
जॉन ब्रैडफ़र्ड, सेंट पॉल के प्रीबेंडरी और बिशप रिडले के पुरोहित, लगभग सन् 1520 में मैनचेस्टर के निकट ब्लैकली में जन्मे, और उनकी आरम्भिक शिक्षा मैनचेस्टर ग्रामर स्कूल में हुई। फ़ॉक्स लिखता है कि वे "अपने बचपन ही से सद्गुण और उत्तम विद्या में पाले गए; और अपनी उत्तम शिक्षा के अन्य फलों के साथ उन्होंने सबसे बड़े वरदान के रूप में लिखने की कुशलता और तत्परता पाई, जो ज्ञान न केवल उनके लिए आभूषण था, वरन् उनकी जीविका के लिए आवश्यक सहारा भी था।" लंकाशायर के इतिहासकार बेन्स ने भी यह टिप्पणी की है कि ब्रैडफ़र्ड ने मैनचेस्टर के उस निःशुल्क ग्रामर स्कूल में, जिसकी स्थापना बिशप ओल्डहम ने की थी (जिनकी मृत्यु 1519 में हुई), उदार शिक्षा पाई और वहाँ लैटिन और गणित में अच्छी निपुणता प्राप्त की।
"अपने जीवन के इस आरम्भिक काल का उल्लेख ब्रैडफ़र्ड ने मरियम के दिनों में कारागार से लिखते हुए भावपूर्वक किया है: —
"मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि अपने माता-पिता, शिक्षकों और अन्य लोगों के लिए, जिनकी देखरेख में तूने मुझे रखा, मेरे पास तेरा धन्यवाद करने का सबसे बड़ा कारण है। कोई लेखनी उन विशेष उपकारों को लिखने में समर्थ नहीं जो मैंने अपनी शैशवावस्था, बाल्यावस्था, तरुणाई, प्रौढ़ावस्था और अब तक सदा पाए हैं। ... मैं अपने पीछे असंख्य उपकार गिन सकता हूँ, और अपने आगे थोड़े ही, क्योंकि अब तक मेरी जितनी चिन्ता और देखभाल की गई है, उतनी बहुत कम की जाती है।"
"फॉक्स लिखता है कि ब्रैडफ़ोर्ड बाद के समय में 'रटलैंडशायर के एक्सटन के नाइट सर जॉन हैरिंगटन का सेवक बन गया, जिसके हाथ में हेनरी अष्टम और राजा एडवर्ड षष्ठ के बड़े-बड़े कार्य थे, जब वह राजा के शिविरों और भवनों का कोषाध्यक्ष था और समय-समय पर बूलोन में रहता था। उसे ब्रैडफ़ोर्ड की लिखने में फुर्ती, लेखा-परीक्षकों की कला में उसकी निपुणता और उसकी विश्वासयोग्य निष्ठा का ऐसा अनुभव हुआ कि न केवल उन कार्यों में, वरन् अपने बहुत से निजी कामकाज में भी उसने ब्रैडफ़ोर्ड पर ऐसा भरोसा रखा कि सब लोगों से बढ़कर उसी की विश्वासयोग्य सेवा ली।' विशेष रूप से 1544 ई. में ड्यूक ऑफ़ नॉरफ़ोक के अधीन अंग्रेज़ी सेना द्वारा किए गए मॉन्ट्रेउइल के घेराव में ब्रैडफ़ोर्ड ने सर जॉन हैरिंगटन के अधीन वेतन-अधिकारी का कार्य निभाया।
"तीन वर्ष बाद, एडवर्ड षष्ठ के राज्यारोहण के कुछ ही समय पश्चात्, 8 अप्रैल, 1547 को ब्रैडफ़ोर्ड ने सामान्य विधि के विद्यार्थी के रूप में इनर टेम्पल में प्रवेश किया। तब उसके चरित्र में पूरा परिवर्तन आ गया। सत्ताईस वर्ष बाद उसके मित्र और टेम्पल के सहपाठी सैम्पसन ने, जिसके विषय में कहा गया है कि उस महान परिवर्तन में परमेश्वर की सामर्थ्य के अधीन वही मनुष्य-रूप साधन था, ब्रैडफ़ोर्ड की रचनाओं की भूमिका में लिखा: 'मैं जानता हूँ कि कब, और कुछ-कुछ किस प्रकार, परमेश्वर ने प्रभावशाली बुलाहट के द्वारा उसके हृदय को हमारे उद्धारकर्ता मसीह के परम पवित्र सुसमाचार के सच्चे ज्ञान और आज्ञाकारिता की ओर फेर दिया; परमेश्वर ने उसे ऐसी स्वर्गीय पकड़ और जीवित अनुभूति दी कि जैसे वह तब जान गया कि उसके बहुत से पाप क्षमा किए गए हैं, वैसे ही उसने कर्मों से निश्चय ही प्रकट किया कि उसने 'बहुत प्रेम किया।' क्योंकि जहाँ उसमें सांसारिक और लौकिक कामों में लाभकारी रीति से लगे रहने की योग्यता और बुलाहट दोनों थीं, वहाँ मसीह के प्रति उसका प्रेम और उसके महिमामय सुसमाचार को बढ़ाने की उसकी धुन ऐसी थी कि उसने न केवल अपने पहले जीवन का मार्ग बदल दिया, जैसा उस स्त्री ने किया (लूका 7), वरन् अपनी पहली पढ़ाई भी बदल दी, जैसे पौलुस ने अपना पहला पेशा और अध्ययन बदला।
"'पहली बात के विषय में, जब परमेश्वर ने उस पवित्र और प्रभावशाली बुलाहट से उसके हृदय को छुआ, तो उसने अपनी जंजीरें, अँगूठियाँ, ब्रोच और सोने के गहने, जिन्हें वह पहले पहना करता था, बेच डाले, और अपनी उस पहली व्यर्थता से मिले दाम को मसीह के कंगाल अंगों की आवश्यक सहायता में लगा दिया, जिन्हें वह रोगी या दरिद्रता में तड़पता हुआ सुन या पा सकता था। दूसरी बात के विषय में, प्रभु यीशु की महिमा बढ़ाने के लिए उसने अपना ऐसा बड़ा उत्साह और प्रेम प्रकट किया, जिसकी भलाई और उद्धार-दायक कुशल का स्वाद उसने चखा था, कि परमेश्वर के राज्य को उसके पवित्र वचन की सेवकाई के द्वारा आगे बढ़ाने की अद्भुत कृपा-भरी लालसा से उसने अपने आप को पूरी रीति से पवित्रशास्त्र के अध्ययन में लगा दिया। इस अपने उद्देश्य को और अच्छी रीति से पूरा करने के लिए वह लंदन के टेम्पल से, जहाँ लौकिक विधि पढ़ाई जाती है, चला गया और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुँचा, ताकि परमेश्वर की व्यवस्था से यह सीखे कि प्रभु के मन्दिर के निर्माण को कैसे आगे बढ़ाया जाए।'
"जब वह लंदन में था, तब एक घटना हुई जिससे उसे गहरी चिन्ता हुई। उसने 'वह उपदेश सुना जो उस प्रसिद्ध प्रचारक मास्टर लैटिमर ने राजा एडवर्ड षष्ठ के सामने दिया था, जिसमें उसने झूठ से प्राप्त की गई वस्तुओं की क्षतिपूर्ति करने के विषय में गम्भीरता से कहा।' इससे उसके हृदय को ऐसा आघात लगा, क्योंकि उसके स्वामी सर जॉन हैरिंगटन ने एक छल किया था, जो 'राजा को धोखा देने के लिए था' और जिसे, जान पड़ता है, ब्रैडफ़ोर्ड ने छिपा रखा था; इसलिए 'जब तक उसी मास्टर लैटिमर की सलाह से क्षतिपूर्ति न कर दी गई, तब तक उसे कभी चैन न मिला।' कि वह स्वयं इस छल में भागीदार नहीं था, यह बिशप गार्डिनर से 30 जनवरी, 1555 को कहे गए उसके शब्दों से प्रकट होता है: 'महोदय, जो कोई भी हो, यदि वह आगे आकर मेरे मुँह पर ठीक-ठीक यह प्रमाणित कर सके कि मैंने कभी अपने स्वामी को धोखा दिया, तो मैं उसके साथ खड़ा होने को तैयार हूँ; और आप पद के अनुसार इंग्लैंड के मुख्य न्यायाधीश हैं, इसलिए मैं उन लोगों के विरुद्ध न्याय चाहता हूँ जो मुझ पर ऐसा झूठा दोष लगाते हैं, क्योंकि वे इसे सिद्ध नहीं कर सकते।' यह एक ऐसी चुनौती थी जो वह शायद ही देने का साहस करता, यदि उसने स्वयं सरकार के साथ छल किया होता। वस्तुतः उसी की दृढ़ता के कारण सर जॉन हैरिंगटन को 1549 और 1550 के दो लगातार वर्षों में झूठ से प्राप्त की गई राशियों को राजा को लौटाना पड़ा।"
सन् 1548 में ब्रैडफ़ोर्ड कैम्ब्रिज में विद्यार्थी बना, पहले कैथरीन हॉल में और फिर पेम्ब्रोक हॉल में, जहाँ वह फ़ेलो बन गया। अपनी फ़ेलोशिप का वर्णन करनेवाला उसका पत्र रोचक और दिलचस्प है। "'मैं अब पेम्ब्रोक हॉल का फ़ेलो हूँ; इसके लिए न मैंने और न मेरी ओर से किसी और ने कभी कोई निवेदन किया; वरन् कैथरीन हॉल के मास्टर (सैंडिस) और रोचेस्टर के बिशप में, जो पेम्ब्रोक हॉल का मास्टर है, इस बात पर विवाद हुआ कि मुझे कौन रखे। . . . यहाँ मेरी फ़ेलोशिप का मूल्य वर्ष में सात पाउंड है; क्योंकि मुझे प्रति सप्ताह अठारह पेंस मिलते हैं, और वर्ष में तैंतीस शिलिंग चार पेंस के बराबर धन भी, इसके अतिरिक्त मेरा कमरा, धोबी, नाई आदि; और मुझ पर वर्ष में एक-दो बार एक विचार-विषय पर वाद-विवाद करने के सिवा कोई बन्धन नहीं है। देखिए, परमेश्वर प्रभु मुझ पर कितना भला है।'
"उसके मित्र सैम्पसन ने उस समय परमेश्वर के साथ ब्रैडफ़र्ड के पवित्र जीवन का सजीव चित्र खींचा है: 'उसकी रीति यह थी कि वह अपने लिए उन सब सबसे घोर और भारी पापों की एक सूची बनाता था जो उसने अपने अज्ञानता के जीवन में किए थे; और एकान्त में प्रार्थना करने जाते समय उसे अपनी आँखों के सामने रखता था, ताकि उन्हें देखने और स्मरण करने से वह परमेश्वर के सामने खेदित मन का बलिदान चढ़ाने के लिए प्रेरित हो, विश्वास के द्वारा मसीह में उद्धार की निश्चयता खोजे, दुष्टता के मार्गों से अपने बुलाए जाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करे, और परमेश्वर को ग्रहणयोग्य और प्रसन्न करनेवाले पवित्र जीवन में चलाए जाने के लिए अनुग्रह की बढ़ती माँगे। एकान्त की प्रार्थना में वह विवेक का ऐसा निरन्तर अभ्यास करता था कि जब तक उसने भीतर ही भीतर पाप के लिए हृदय में कुछ चोट न अनुभव की हो, और विश्वास के द्वारा उस घाव की कुछ चंगाई न पाई हो, मसीह के उद्धारकारी स्वास्थ्य को न अनुभव किया हो, और मन में पाप से घृणा तथा परमेश्वर की भली इच्छा के पालन के प्रेम की ओर कुछ परिवर्तन न हुआ हो, तब तक वह यह नहीं मानता था कि उसने सन्तोषजनक प्रार्थना की है। . . . प्रार्थना के ऐसे भीतरी अभ्यास के बिना हमारा ब्रैडफ़र्ड पूरे सन्तोष से प्रार्थना नहीं करता था, जैसा इससे प्रकट हुआ: वह प्रातःकाल जिस कॉलेज में रहता था वहाँ की सामूहिक प्रार्थना में जाता, और उसके बाद अपने कमरे में अपने शिष्यों के साथ कुछ प्रार्थना करता; पर इससे सन्तुष्ट न होकर वह फिर अपनी निजी गुप्त प्रार्थना और अकेले प्रार्थना के अभ्यास के लिए चला जाता, मानो उसने अभी तक अपने मन के अनुसार प्रार्थना नहीं की हो; क्योंकि वह अपने घनिष्ठ मित्रों से कहा करता था, "मैंने अपने शिष्यों के साथ प्रार्थना की है, पर अभी तक अपने साथ प्रार्थना नहीं की।"
"'उसका एक और अभ्यास यह था: वह अपने लिए एक दैनन्दिनी या रोज़नामचा बनाता था, जिसमें वह हर बीते दिन में जो-जो उल्लेखनीय बातें देखता या सुनता था, सब लिख लेता था। परन्तु जो कुछ वह सुनता या देखता, उसे इस प्रकार लिखता था कि उस पुस्तक में कोई भी उसके खेदित हृदय के चिह्न देख सकता था। क्योंकि यदि वह किसी मनुष्य में कोई भलाई देखता या सुनता, तो उसे देखकर वह अपने में उसकी कमी पाता और उसे लिख लेता, और सुधरने के लिए दया और अनुग्रह माँगती हुई एक छोटी प्रार्थना जोड़ देता। यदि वह कोई विपत्ति या दुःख देखता या सुनता, तो उसे अपने ही पापों से उत्पन्न हुई बात मानकर लिखता, और सदा यह जोड़ देता, Domine miserere mei, अर्थात् "हे प्रभु, मुझ पर दया कर।" उसी पुस्तक में वह अपने मन में उठनेवाले बुरे विचार भी लिखता था; जैसे दूसरों की भलाई से डाह के विचार, कृतघ्नता के विचार, परमेश्वर के कार्यों में उसका ध्यान न करने के विचार, और जब वह दूसरों को प्रभावित और द्रवित होते देखता तब अपने हृदय की कठोरता और संवेदनहीनता के विचार। इस प्रकार उसने अपने लिए और अपने ही विषय में मन फिराव के दैनिक अभ्यासों की एक पुस्तक बना ली थी।'"
कैम्ब्रिज में ब्रैडफ़र्ड की घनिष्ठता बूसर, सैंडिस और रिडले से हो गई, और वह व्हिटगिफ्ट का शिक्षक था, जो आगे चलकर कैण्टरबरी का आर्कबिशप बना। उसे रिडले ने 1550 में अभिषिक्त किया, और उसकी उच्च योग्यता और भक्ति के कारण राजा एडवर्ड छठे से उसकी बहुत सिफ़ारिश की गई। इसके कुछ ही समय बाद रिडले की सलाह पर राजा ने उसे उन छः शाही पुरोहितों में से एक नियुक्त किया जो धर्म-सुधार की शिक्षाओं का प्रचार करने के लिए एक प्रकार के घुमन्तु अधिकार-पत्र के साथ इंग्लैंड में भेजे गए थे। ब्रैडफ़र्ड का कार्य लंकाशायर और चेशायर में प्रचार करना था, क्योंकि उसका सम्बन्ध उन्हीं ज़िलों से था; और ऐसा जान पड़ता है कि उसने अपना कर्तव्य अद्भुत योग्यता और सफलता से निभाया। उसने मैनचेस्टर, लिवरपूल, बोल्टन, बरी, विगन, ऐशटन, स्टॉकपोर्ट, मिडिलटन और चेस्टर में निरन्तर प्रचार किया, जिससे प्रोटेस्टेंट पक्ष को बड़ा लाभ हुआ और मनुष्यों की आत्माओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा।
"1552 के अन्त में, जब ब्रैडफ़र्ड मैनचेस्टर में था, तब उसने 'नूह के जलप्रलय की चर्चा की,' और लोगों को उन 'विपत्तियों' के विषय में बार-बार चेतावनी दी जो 'आनेवाली' थीं। और 26 दिसम्बर को, जो सन्त स्तिफनुस का दिन है, 'जब वह अन्तिम बार उनके साथ था,' उसने मत्ती के तेईसवें अध्याय पर एक उल्लेखनीय उपदेश दिया। उस दिन का सुसमाचार-पाठ अन्तिम छः पद थे, और निस्सन्देह उसने उस अवसर पर वही पाठ चुना होगा, - ऐसा खण्ड जो उस गम्भीर और भविष्यसूचक चेतावनी का अत्यन्त उपयुक्त संकेत देता है जो उसने तब दी। स्थानीय परम्परा आज भी ब्लैकली में उस स्थान की ओर संकेत करती है, जहाँ गाँव के लोग कहते हैं कि मैनचेस्टर की उस अन्तिम यात्रा में ब्रैडफ़र्ड ने घुटने टेककर सर्वशक्तिमान परमेश्वर से गम्भीर विनती की थी। अनुग्रह के सिंहासन के सामने उसकी याचना यह थी कि ब्लैकली में अनन्त सुसमाचार युगान्त तक ऐसे सेवकों द्वारा प्रचारित होता रहे जो परमेश्वर से सिखाए गए हों और झुण्ड को बुद्धि और ज्ञान से चराएँ। कहा जाता है कि इस शहीद की प्रार्थना का उत्तर इस रूप में मिला है कि उस स्थान में प्रायः बिना किसी अपवाद के विश्वासयोग्य जन बने रहे हैं।
"सैम्पसन हमें बताता है कि लन्दन में और पॉल्स क्रॉस पर, तथा देहात के अनेक स्थानों में, और विशेषकर लंकाशायर में प्रायः प्रचार करने के अतिरिक्त, ब्रैडफ़र्ड ने राजा एडवर्ड छठे के सामने उसके राज्यकाल के अन्तिम वर्ष में लेंट के दिनों में भजन संहिता के दूसरे भजन पर प्रचार किया; और वहाँ एक ही उपदेश में उसने सुसमाचार के तिरस्कार के कारण परमेश्वर के निकट आते हुए न्याय के चिह्न दिखाए, जैसे कि कुछ सज्जन सब्त के दिन एक छोटी नाव में पेरिस गार्डन में भालू-लड़ाई देखने जाते हुए डूब गए, और लुडगेट में एक कुत्ता अपने मुँह में किसी मरे हुए बच्चे का टुकड़ा लिए हुए मिला, तब उसने प्रबल और भविष्यद्वाणी की आत्मा में भरकर कहा,
"मैं तुम सब को, तुम में से हर एक माँ के बेटे को, परमेश्वर के न्याय के लिये बुलाता हूँ, क्योंकि वह निकट है:" जैसा कि राजा एडवर्ड की मृत्यु में शीघ्र ही उसके बाद घटित हुआ।' शायद यही वह अवसर था जिसका वर्णन जॉन नॉक्स ने अपने 'भक्तिपूर्ण पत्र' (1554) में इतनी अच्छी तरह किया है: 'मास्टर ब्रैडफ़र्ड ... ने सबसे अभिमानी को भी नहीं छोड़ा, परन्तु निडर होकर घोषणा की कि परमेश्वर का प्रतिशोध शीघ्र ही उन पर पड़ेगा जो उस समय अधिकार में थे, क्योंकि उन्होंने अनन्त परमेश्वर के सच्चे वचन से घृणा और अरुचि की; और अन्य बहुत सी बातों के बीच उन्हें चेताया कि वे सॉमरसेट के भूतपूर्व ड्यूक से शिक्षा लें, जो परमेश्वर का वचन सुनने में इतना ठण्डा हो गया था कि अपनी अन्तिम गिरफ़्तारी से एक वर्ष पहले वह अपने राजमिस्त्रियों को देखने तो चला जाता था, परन्तु उपदेश सुनने के लिये अपनी दीर्घा से उठकर बड़े कक्ष तक जाना भी नहीं चाहता था। उस भक्त प्रचारक ने कहा, "परमेश्वर ने उसे दण्ड दिया, और वह भी अचानक: तो क्या वह तुम्हें छोड़ देगा जो उससे दुगुने दुष्ट हो? नहीं, वह नहीं छोड़ेगा। चाहे तुम चाहो या न चाहो, तुम्हें प्रभु के क्रोध का प्याला पीना ही पड़ेगा। Judicium Domini, judicium Domini! प्रभु का न्याय, प्रभु का न्याय!" वह दुखभरी आवाज़ में और आँसू बहाते हुए विलाप के साथ पुकार उठा।'
"बिशप रिडले ने मरियम के शासनकाल में बन्दीगृह से लिखते हुए, ब्रैडफ़र्ड, लैटिमर, लीवर और नॉक्स की चर्चा करते हुए, उस साहस और सच्चाई की सबसे दृढ़ गवाही दी है जिसके साथ उन्होंने एडवर्ड के दरबारियों को सम्बोधित किया: 'उनकी जीभें इतनी तीखी थीं, वे उनकी घायल पीठों पर इतनी गहराई तक चीरा लगाते थे कि निःसन्देह वे उस गन्दगी को निकाल दें जो उनके हृदयों में सड़ रही थी — अतृप्त लोभ की, घृणित शारीरिक वासना और भोग-विलास की, असह्य महत्वाकांक्षा और अभिमान की, और गरीबों के मुकद्दमे तथा परमेश्वर का वचन सुनने के प्रति अभक्तिपूर्ण अरुचि की; इसलिये ये मनुष्य, अन्य सब से बढ़कर, उन दिनों के इन न्यायाधिकारियों को कभी सहन नहीं हो सके।'
"सैम्पसन ने ब्रैडफ़र्ड की निजी जीवन की आदतों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है: —
"'जो लोग उसके परिचित थे वे देख सकते थे कि वह साथियों के बीच बैठे-बैठे प्रायः अचानक गहरे मनन में डूब जाता था, जिसमें वह स्थिर मुखमुद्रा और उद्वेलित मन के साथ बैठा रहता, पर बहुत देर तक कुछ बोलता नहीं था। और कभी-कभी इसी मौन बैठक में उसके गालों पर आँसुओं की धारा बह निकलती: कभी वह उसी में बैठा रहता और मुस्कराते चेहरे के साथ उससे बाहर निकलता। मैं बहुत बार उसके साथ भोजन और रात्रि-भोजन पर बैठा हूँ, उस भक्त मास्टर एल्सिंग के घर में, जो बहुत से प्रचारकों और प्रभु यीशु के सेवकों को आश्रय देनेवाला था, जब या तो किसी बातचीत के कारण, या परमेश्वर की वर्तमान आशीषों को देखकर, या अपने ही किसी भीतरी चिन्तन और विचार से वह इन गहरे मननों में डूब जाता: और अन्त में वह मुझे उनके विषय में ऐसी बातें बताता कि मैं समझ जाता कि कभी-कभी उसकी आँखों से आँसू आनन्द के लिये भी बहते थे और दुःख के लिये भी। वह केवल स्वयं मन फिराव का अभ्यास करनेवाला ही नहीं था, परन्तु दूसरों को भी उसके लिये निरन्तर प्रेरित करता था, न केवल सार्वजनिक प्रचार में, वरन् निजी बातचीत और संगति में भी। क्योंकि जिस किसी संगति में वह जाता, वहाँ किसी भी व्यक्ति में दिखाई देनेवाले पाप और अनुचित व्यवहार को, विशेषकर शपथ खानेवालों, गन्दी बातें करनेवालों और पोप के पक्ष में बकवास करनेवालों को, वह निःसंकोच डाँटता था। ऐसा कोई भी उसकी संगति से बिना डाँट खाए नहीं गया। और यह वह ऐसी ईश्वरीय अनुग्रहशीलता और मसीही गरिमा के साथ करता था कि विरोधियों के मुँह सदा बन्द हो जाते थे। क्योंकि वह सामर्थ्य के साथ बोलता था, फिर भी इतनी मधुरता से, कि वे देख सकते थे कि उनकी बुराई बुराई ही है और उनके लिये हानिकारक है, और समझ सकते थे कि जिस बात की ओर वह उन्हें परमेश्वर में खींचने का परिश्रम करता था वह सचमुच भली थी।'"
जैसे ही एडवर्ड षष्ठ की मृत्यु हुई, धर्म-सुधार के सिद्धान्त के प्रति ब्रैडफ़र्ड की धुन के परिणाम ठीक वही हुए जिनकी आशा की जा सकती थी। रानी मरियम के सिंहासन पर बैठने के एक महीने के भीतर ही उसे क्रैनमर, रिडले, लैटिमर और हूपर की तरह बन्दीगृह में डाल दिया गया, और जलाए जाने तक वह वहाँ से कभी बाहर नहीं निकला। उसकी युवावस्था, उसकी अनुपम पवित्रता, और एक प्रचारक के रूप में उसकी महान ख्याति के कारण वह अपने कारावास के दिनों में बड़ी रुचि का विषय बना रहा, और उसे तर्क द्वारा उसके प्रोटेस्टेंट विश्वास से हटाने और रोमी कलीसिया की ओर फेरने के लिये बहुत बड़े प्रयत्न किए गए। परन्तु ये सारे प्रयत्न व्यर्थ रहे। जैसा वह जिया, वैसा ही वह मरा।
दण्ड की आज्ञा 31 जनवरी 1555 को सुनाई गई। पहले यह विचार था कि उसे तुरन्त डर्बी के अर्ल को सौंप दिया जाए, जो उसे लंकाशायर ले जाए और वहाँ मैनचेस्टर नगर में, जहाँ वह जन्मा था, जलाया जाए। बाद में यह मूल उद्देश्य छोड़ दिया गया। रोमी बिशपों ने, चाहे ब्रैडफ़र्ड के मित्रों के गुप्त भय से (क्योंकि ब्रैडफ़र्ड अपने ही लोगों में लोकप्रिय था), या उसकी राय को हरा देने के किसी और गुप्त भरोसे से, उसे कई महीनों तक लन्दन में रखा, और उस बीच बार-बार की वार्ताओं और दूतमण्डलों से उस पर दबाव डालते रहे। और उसकी पूछताछ-विवरणियों से, जिनके कुछ पृष्ठ उसकी रचनाओं के पिछले खण्ड में पहली बार पुनः छापे गए, ऐसा प्रतीत होता है कि डर्बी के अर्ल ने उसके मामले में बड़ी रुचि ली, और (ऐसा कहा गया) रानी से यह रियायत प्राप्त की कि उसे 'अपनी पुस्तकें, और उन्हें पढ़ने के लिये पर्याप्त समय मिले।'
ब्रैडफ़र्ड के प्राणदण्ड के दिन, 1 जुलाई 1555 को सुबह लगभग नौ बजे, उसे न्यूगेट से स्मिथफ़ील्ड ले जाया गया, ऐसी भीड़ के बीच जैसी न पहले कभी देखी गई थी न बाद में। एक श्रीमती हनीवुड, जो छियानवे वर्ष की आयु तक जीवित रहीं और लगभग 1620 में मरीं, अपने मित्रों से अक्सर कहती थीं कि उन्हें याद है कि वे उसे जलते हुए देखने गई थीं, और भीड़ में उनके जूते कुचलकर उतर गए थे, इसलिये उन्हें नंगे पाँव लुडगेट हिल तक चलना पड़ा।
उसकी शहादत का वृत्तान्त, जैसा कि फॉक्स ने वर्णन किया है, इतना हृदयस्पर्शी है कि मैं उसे शहीद-गाथा-लेखक के अपने ही शब्दों में दूँगा। 30 जून की दोपहर के बाद, "अचानक रखवाले की पत्नी ऊपर आई, मानो अचम्भे में हो और बहुत व्याकुल दिखती थी, लगभग हाँफती हुई बोली, "हे मास्टर ब्रैडफर्ड, मैं आपके लिए भारी समाचार लाई हूँ।" उसने कहा, "वह क्या है?" उसने कहा, "सच कहती हूँ, कल आपको जलाया जाएगा, और आपके लिए जंजीर अभी खरीदी जा रही है, और आपको शीघ्र ही न्यूगेट ले जाया जाएगा।" यह सुनकर मास्टर ब्रैडफर्ड ने अपनी टोपी उतारी, और आँखें स्वर्ग की ओर उठाकर कहा, "इसके लिए मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ; मैं बहुत समय से इसकी बाट जोह रहा था, इसलिए यह मुझ पर अचानक नहीं आया, वरन् ऐसी बात की तरह आया है जिसकी मैं हर दिन और हर घड़ी प्रतीक्षा करता था; प्रभु मुझे इसके योग्य बनाए:" और उसकी कोमलता के लिए उसे धन्यवाद देकर वह अपने कमरे में ऊपर चला गया, और अपने मित्र को अपने साथ बुलाया; जब वह वहाँ आया, तो वह स्वयं बहुत देर तक अकेला एकान्त में जाकर प्रार्थना करता रहा। जब यह हो चुका, तो वह फिर उसके पास आया जो उसके कमरे में था, और उसे अनेक लेख और कागज़ात दिए, और उन बातों में अपनी इच्छा बताई कि वह क्या करवाना चाहता है; और जब उन्होंने दोपहर के बाद से रात तक ऐसी ही अनेक और विविध बातों में समय बिताया, तो अन्त में उसके कोई छः और मित्र उसके पास आए, जिनके साथ उसने सारी सन्ध्या प्रार्थना और अन्य भले कार्यों में ऐसी अद्भुत रीति से बिताई कि उसके कार्यों को देखना और सुनना आश्चर्यजनक था।
"कम्प्टर से बाहर निकलने से कुछ पहले, उसने अपनी विदाई की एक अनोखी प्रार्थना की, इतने आँसुओं के साथ, और प्रार्थना की ऐसी भरपूर आत्मा के साथ, कि उसने सुननेवालों के मन मोह लिए। और जब उसने अपने जलाए जाने के लिए बनी स्वच्छ कमीज़ पहनी (जो मास्टर वाल्टर मार्लर की पत्नी ने बनाई थी, जो उसकी अच्छी सेविका और उसकी बहुत भली मित्र थी), तो उसने विवाह के वस्त्र के विषय में ऐसी प्रार्थना की कि वहाँ उपस्थित कुछ लोग इतने चकित हुए कि जितना उनके कान उसकी प्रार्थना सुनने में लगे थे, उतनी ही उनकी आँखें उसे देखने में लगी थीं। कमरे से निकलते समय भी उसने प्रार्थना की, और घर के हर सेवक और कर्मचारी को धन दिया, और उन्हें उपदेश दिया कि परमेश्वर का भय मानें और उसकी सेवा करें, और सब प्रकार की बुराई से बचने का निरन्तर प्रयत्न करें। यह करके वह दीवार की ओर मुड़ा, और तीव्र भाव से प्रार्थना की कि उसके वचन व्यर्थ न जाएँ, परन्तु प्रभु अपने मसीह के लिए उनमें उन्हें प्रभावशाली रीति से पूरा करे। फिर जब वह नीचे आँगन में पहुँचा तो सब कैदी उसे पुकारकर विदा कहने लगे, जैसा घर के बाकी लोग पहले ही रोते हुए कर चुके थे।
"जिस समय वे उसे न्यूगेट ले गए वह रात के लगभग ग्यारह या बारह बजे का समय था, जब सोचा गया था कि कोई बाहर न होगा; फिर भी, इस विषय में उनकी आशा के विपरीत, चीपसाइड में और कम्प्टर तथा न्यूगेट के बीच अन्य स्थानों में लोगों की एक बड़ी भीड़ उसे देखने आई थी, जिन्होंने अत्यन्त कोमलता से उसे विदा कहा, और बहुत विलाप और दयनीय आँसुओं के साथ उसके लिए प्रार्थना की; और उसने भी उतनी ही कोमलता से उन्हें विदा कहा, और पूरे मन से उनके और उनकी भलाई के लिए प्रार्थना की। अब यह रानी और उसकी परिषद की आज्ञा थी, या बोनर और उसके पक्षपातियों की, या केवल लन्दन के लॉर्ड मेयर, एल्डरमैनों और शेरिफों की युक्ति थी, या नहीं, मैं नहीं कह सकता; परन्तु रात को नगर में अनेक लोगों के बीच बड़ी चर्चा थी कि ब्रैडफर्ड को अगले दिन भोर के चार बजे स्मिथफील्ड में जलाया जाएगा, इससे पहले कि यह किसी को अधिक ज्ञात हो ... परन्तु ... लोगों ने सन्देहित युक्ति को विफल कर दिया: क्योंकि अगले दिन,' सोमवार, 1 जुलाई को,'उसी चार बजे के घण्टे पर, स्मिथफील्ड में स्त्री-पुरुषों की ऐसी भीड़ थी कि बहुत से लोगों ने आश्चर्य करके सोचा कि इतने थोड़े समय में इतनी बड़ी संख्या को उसकी मृत्यु की चेतावनी मिलना सम्भव नहीं था, जब तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विशेष विधान न हो। "परन्तु यह वैसा सफल न हुआ जैसा लोगों ने सोचा था; क्योंकि उस सुबह नौ बजे तक मास्टर ब्रैडफर्ड स्मिथफील्ड में नहीं लाया गया; और न्यूगेट से उस ओर जाते समय उसने अपने एक मित्र को देखा जिसे वह प्रेम करता था, जो रखवाले के घर की ओर जाने वाले मार्ग के एक किनारे खड़ा था, उसने लोगों के ऊपर से उसकी ओर हाथ बढ़ाया, और उसे अपनी ओर खींचा, और अपने सिर से अपनी मखमली रात्रि-टोपी उतारकर और अपना रूमाल, और अन्य वस्तुएँ भी उसे दीं ... उसके साथ थोड़ी गुप्त बात करके, और दोनों के एक दूसरे से अलग होते ही, तुरन्त उसका एक साला, जिसका नाम रोजर बेसविक था, उसके पास आया, और ज्यों ही उसने ब्रैडफर्ड का हाथ पकड़ा, लन्दन का एक शेरिफ, जिसका नाम वुडरोफ था, अपनी छड़ी लेकर आया, और उस रोजर का सिर फोड़ दिया, जिससे लहू उसके कन्धों पर बह निकला; इस दृश्य को ब्रैडफर्ड ने दुःख से देखकर अपने साले को विदा कहा, और कहा कि वह उसकी ओर से उसकी माता और अन्य मित्रों को नमस्कार कहे, और जल्दी किसी शल्य-चिकित्सक के पास जाए: और इस प्रकार वे अलग हुए, और आपस में बहुत कम या कोई बात न हुई। फिर उसे स्मिथफील्ड ले जाया गया, शस्त्रधारी पुरुषों की एक बड़ी टोली उसे वहाँ ले जाने के लिए साथ थी, ऐसी कि किसी के जलाए जाने पर वैसी कभी नहीं देखी गई: क्योंकि स्मिथफील्ड के हर कोने में कोई न कोई था, उनके अतिरिक्त जो खम्भे के चारों ओर खड़े थे। तब ब्रैडफर्ड उस स्थान पर पहुँचकर भूमि पर मुँह के बल गिर पड़ा, और गुप्त रूप से सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रार्थना करने लगा।' और वह 'खम्भे के एक ओर औंधे मुँह पड़ा था,' और एक जवान, एक प्रशिक्षु, जॉन लीफ, जिसने उसके साथ दुःख उठाया, 'दूसरी ओर, वे अपने मुँह के बल पड़े हुए लगभग एक घड़ी के एक मिनट तक अपने मन में प्रार्थना करते रहे। तब शेरिफों में से एक ने मास्टर ब्रैडफर्ड से कहा, "उठो, और इसे समाप्त करो; क्योंकि लोगों की भीड़ बहुत है।"
"' उसी वचन पर वे दोनों अपने पाँवों पर खड़े हो गए; और तब मास्टर ब्रैडफ़ोर्ड ने हाथ में एक लकड़ी का गट्ठा लिया, उसे चूमा, और वैसे ही खूँटे को भी चूमा। और जब वह ऐसा कर चुका, तो उसने शेरिफ़ों से विनती की कि उसका सेवक उसके वस्त्र ले ले; "क्योंकि," उसने कहा, "मेरे पास उसे देने को और कुछ नहीं है, और वह वैसे भी एक कंगाल मनुष्य है।" और शेरिफ़ ने कहा कि वह उसे मिल जाएगा। तब तुरन्त मास्टर ब्रैडफ़ोर्ड ने अपने वस्त्र उतार दिए और खूँटे के पास गया; और हाथ उठाकर, तथा अपना मुख स्वर्ग की ओर करके उसने यों कहा, "हे इंग्लैंड, हे इंग्लैंड, अपने पापों से मन फिरा, अपने पापों से मन फिरा। मूर्तिपूजा से सावधान रह, झूठे मसीह-विरोधियों से सावधान रह: चौकस रहो कि वे तुम्हें धोखा न दें।" और जब वह ये बातें कह रहा था, तो शेरिफ़ ने आज्ञा दी कि यदि वह चुप न रहे तो उसके हाथ बाँध दिए जाएँ। "हे मास्टर शेरिफ़," मास्टर ब्रैडफ़ोर्ड ने कहा, "मैं तो शान्त हूँ: परमेश्वर आपको यह क्षमा करे, मास्टर शेरिफ़।" और आग लगानेवाले अधिकारियों में से एक ने, जब मास्टर ब्रैडफ़ोर्ड को शेरिफ़ से यों बोलते सुना, तो कहा, "यदि तुम्हारे पास इससे अच्छी विद्या नहीं है, तो तुम केवल मूर्ख हो, और तुम्हारे लिए चुप रहना ही उत्तम है।" इन बातों का मास्टर ब्रैडफ़ोर्ड ने कोई उत्तर न दिया, परन्तु सारे संसार से क्षमा माँगी, और सारे संसार को क्षमा किया, और लोगों से विनती की कि वे उसके लिये प्रार्थना करें, और अपना सिर उस जवान की ओर फेरा जो उसके साथ दुःख उठा रहा था, और कहा, "हे भाई, ढाढ़स बाँध; क्योंकि आज रात हम प्रभु के साथ आनन्द का भोज करेंगे;" और इसके बाद उसने कोई बात नहीं कही जो किसी मनुष्य ने सुनी हो, परन्तु सरकंडों को गले लगाकर यों कहा: "सकेत है वह मार्ग, और सकरा है वह फाटक, जो अनन्त उद्धार की ओर ले जाता है, और थोड़े ही हैं जो उसे पाते हैं।"'"
ब्रैडफ़ोर्ड के चरित्र में कुछ ऐसा विशेष रूप से सुन्दर और मनोहर प्रतीत होता है, जो किसी भी अन्य धर्म-सुधारक से बढ़कर है। "फ़ुलर टिप्पणी करता है: 'मेरे लिये यह इस बात का प्रमाण है कि वह मधुर स्वभाव का था, क्योंकि पार्सन्स, जो किसी प्रोटेस्टेंट के लिये शायद ही कोई भला शब्द कहे, कहता है "कि वह अपने अनेक साथियों से अधिक कोमल और सौम्य स्वभाव का प्रतीत होता था।" सचमुच वह अत्यन्त पवित्र और संयमी मनुष्य था, जो अपनी कोठरी में गुप्त रूप से अपने पापों के लिये ऐसा रोता था कि देखनेवाला सोचता कि वह फिर कभी न मुस्कराएगा; और फिर जब वह लोगों के सामने आता, तो ऐसा निर्दोष रूप से प्रसन्न रहता कि कोई सोचता कि वह पहले कभी रोया ही नहीं।'
"यह सुपरिचित कथा कि अपराधियों को वध-स्थान की ओर ले जाते देखकर वह प्रायः कहा करता था, 'यदि परमेश्वर का अनुग्रह न होता तो जॉन ब्रैडफ़ोर्ड भी वहीं जाता,' एक सर्वमान्य परम्परा है, जिसने समय के बीतने को भी पार कर लिया है। और वेनिंग ने, 1653 में लिखते हुए, यह दिखाने की इच्छा से कि 'दूसरों के पापों को देखकर मनुष्य अपनी ही पापमयता और हृदय की भ्रष्टता पर विलाप करना सीख सकते हैं,' ब्रैडफ़ोर्ड का उदाहरण दिया है, जो 'जब किसी को नशे में देखता या किसी को शपथ खाते सुनता, इत्यादि, तो दुखी होकर कहता, "हे प्रभु, मेरा सिर तो मतवाला है; हे प्रभु, मेरा हृदय तो शपथ खानेवाला है।"'
"उसका व्यक्तिगत रूप-रंग और दैनिक आदतें फ़ॉक्स ने सजीव रूप में वर्णित की हैं। 'वह डील-डौल में लम्बा, दुबला, छरहरे शरीर का, कुछ हल्के लाल रंग का, और भूरी-लाल दाढ़ी वाला मनुष्य था। वह साधारणतः रात में चार घंटे से अधिक नहीं सोता था; और अपने बिछौने में, जब तक नींद न आती, उसकी पुस्तक उसके हाथ से न छूटती थी.... उसके परिश्रमी अध्ययन, पठन और प्रार्थना को मैं लगभग उसका पूरा जीवन ही कह सकता हूँ। वह दिन में एक ही बार भोजन करता था, और जब करता भी था तो बहुत थोड़ा; और उसका निरन्तर अध्ययन घुटनों पर होता था। भोजन के बीच वह प्रायः टोपी को आँखों पर झुकाकर अपने मन में विचार में डूब जाता था, जिससे प्रायः बहुत आँसू निकलकर उसकी थाली पर टपकते थे। वह पुरुषों और बच्चों के प्रति बहुत कोमल था.... उसका मुख्य मनोरंजन किसी खेल या अन्य विनोद में नहीं, केवल भले संग और शोभनीय बातचीत में था, जिसमें वह भोजन के बाद मेज़ पर थोड़ा अवकाश बिताता, और फिर प्रार्थना और अपनी पुस्तक की ओर लौट जाता। वह उस घड़ी को व्यर्थ गया मानता था जिसमें उसने अपनी लेखनी, अध्ययन या दूसरों को समझाने-बुझाने से कुछ भलाई न की हो।" मिस्टर टाउनसेंड अपनी उत्तम जीवनी का अन्त निम्नलिखित अंश से करते हैं, जो इतना सच्चा और अच्छा है कि मैं उसे पूरा देता हूँ। "कहा जा सकता है कि उसने थोड़े समय में लम्बा जीवन जिया। डीकन के पद पर नियुक्त होने से लेकर शहादत की घड़ी तक उसे केवल पाँच वर्ष सेवकाई का काम करने दिया गया, जिनमें से पूरे दो वर्ष बन्दीगृह में बीते। जब तक उस बड़े दिन तक, जब सब हृदयों के भेद प्रगट किए जाएँगे, यह पूरी रीति से नहीं जाना जा सकता कि इंग्लैंड इस समर्पित मनुष्य के परिश्रम और प्रार्थनाओं का कितना ऋणी है। 'निश्चय ही वह इंग्लैंड की कलीसिया के पिताओं में न सबसे कम योग्य था और न सबसे कम विद्वान।' उसमें न्याय-बुद्धि का 'विद्या, वाक्पटुता, स्वभाव की मधुरता और परमेश्वर के प्रति गहरी भक्ति' के साथ सुखद मेल था.... और उसकी योग्यता को पोप के अनुयायी भी इतना समझते थे कि उन्होंने उसे विश्वास के अंगीकार से डिगाने में किसी भी अन्य से अधिक परिश्रम किया।' यदि एडवर्ड इंग्लैंड के सिंहासन पर और अधिक समय रहता तो ब्रैडफ़ोर्ड अध्यक्ष के आसन पर उठाया जाता। उसने प्राणों के महान अध्यक्ष से इससे ऊँची पदोन्नति पाई। अपने जीवन की पवित्रता और अपने लेखों की साक्षी से 'वह अब भी बोलता है।' शहादत की ज्वालाओं से 'ब्रैडफ़ोर्ड और लैटिमर, क्रैन्मर और रिडले, इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया के ये चार प्रधान स्तम्भ,' ने परमेश्वर के अनुग्रह से इस देश में ऐसा दीपक जलाया है जो कभी बुझाया न जा सकेगा।"
ब्रैडफ़ोर्ड की साहित्यिक रचनाएँ लगभग 1100 पृष्ठों में समाई हैं, और पार्कर सोसाइटी की श्रृंखला के दो 8vo खण्डों को भरती हैं। इनमें मुख्यतः उपदेश, छोटे ग्रन्थ, मनन, प्रार्थनाएँ, घोषणाएँ, उपदेश-वचन और पत्र हैं। सभी अच्छी हैं, और सभी पढ़ने योग्य हैं। यदि मुझे उनकी रचनाओं में से किसी को विशेष रूप से उत्तम चुनना पड़े, तो मैं उनके विवादात्मक ग्रन्थों का नाम लूँगा, जिनके शीर्षक हैं, "रोमी सिद्धान्तों में से कुछ का खण्डन" और "मिस्सा सुनने की हानि"; उनके मन फिराव और प्रभु-भोज पर दिए गए उपदेश; मृत्यु के भय के विरुद्ध लिखे गए उनके ग्रन्थ; और लन्दन, कैम्ब्रिज, लंकाशायर, चेशायर आदि को दिए गए उनके विदाई-वचन। सबसे बढ़कर, मैं मित्रों को लिखे उनके 100 पत्रों की सिफ़ारिश करता हूँ। जो कोई ऊपर बताई गई किसी भी रचना को पढ़कर अपनी आत्मा को भीतर से उभरता हुआ अनुभव न करे, वह अवश्य ही असन्तोषजनक दशा में होगा। मेरी दृष्टि में, ब्रैडफ़ोर्ड जो कुछ लिखते हैं उसमें न केवल पवित्रशास्त्र के अनुसार खरापन है, बल्कि एक विशेष अग्नि, अभिषेक, गर्मजोशी और सीधापन है, जो उन्हें मसीही लेखकों में बहुत ऊँचा स्थान दिलाता है। यदि वे और अधिक जीवित रहते और और अधिक लिखते, तो कोई सोचता है कि कलीसिया के लिए यह एक अपार आशीष होती।
मेरा पहला उद्धरण ब्रैडफ़ोर्ड के "मृत्यु के भय के विरुद्ध ग्रन्थ" से लिया जाएगा। (खण्ड 1, पृष्ठ 342, पार्कर सोसाइटी का संस्करण।)
"कोई मनुष्य कहेगा, हे महोदय, यदि मुझे निश्चय होता कि मैं इस दुःखमय जीवन से निकलकर उस इतने बड़े आनन्द में पहुँचूँगा, तो मैं सचमुच बहुत प्रसन्न होता, और जैसा आप चाहते हैं वैसा आनन्द मनाता, और मृत्यु का स्वागत करता। परन्तु मैं पापी हूँ; मैंने भारी अपराध किया है और परमेश्वर की इच्छा को तोड़ा है; इसलिए मुझे भय है कि मैं अनन्त विपत्ति, विनाश और दुःख में भेजा जाऊँगा।
"यहाँ, मेरे भाई, तू भला करता है कि तू अपने आप को पापी मानता है, और यह भी कि तू अनन्त मृत्यु के योग्य ठहरा है; क्योंकि निःसन्देह 'यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो हम झूठे हैं, और सत्य हम में नहीं है।' एक रात का जन्मा बालक भी परमेश्वर की दृष्टि में शुद्ध नहीं। हम पाप में जन्मे; और 'जन्म से (अर्थात् स्वभाव से) हम क्रोध की सन्तान' और नरक के अंगारे हैं: इसलिए हमें अपने आप को पापी मानना ही पड़ता है; क्योंकि 'यदि प्रभु किसी मनुष्य के अधर्म का हिसाब रखे, तो कोई भी ठहर न सकेगा:' हाँ, हम सब को यही पुकारना पड़ेगा, 'हे प्रभु, न्याय में प्रवेश न कर; क्योंकि तेरी दृष्टि में कोई प्राणी या जीवित मनुष्य उद्धार नहीं पा सकता।' इसलिए इस बात में तूने भला किया कि अपने आप को पापी स्वीकार किया।
"परन्तु अब जब तू अपने पापों की क्षमा के विषय में सन्देह में खड़ा है, और इस कारण दण्ड के भय से डरता है, तो मेरे प्रिय भाई, मैं चाहता हूँ कि तू मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे, - अर्थात् 'क्या तू क्षमा चाहता है या नहीं; क्या तू मन फिराता है या नहीं; क्या तू सच्चे मन से यह ठानता है कि यदि तू जीवित रहे तो अपना जीवन सुधारेगा या नहीं?' यदि तू परमेश्वर के सामने सचमुच ऐसा ठानता है, और उसकी दया की ऐसी लालसा रखता है, तो हे मेरे भले भाई, सुन कि प्रभु तुझ से क्या कहता है: -
"'मैं वही हूँ, जो अपने ही लिए तेरे अपराधों को मिटा देता हूँ।' 'यदि तेरे पाप लाल रंग के भी हों, तो वे हिम के समान उजले हो जाएँगे;' क्योंकि 'मुझे पापी की मृत्यु से कुछ भी प्रसन्नता नहीं।' 'मेरे जीवन की शपथ, मैं तेरी मृत्यु नहीं चाहता; परन्तु यह कि तू जीवित रहे और फिरे।' मैंने 'जगत से ऐसा प्रेम रखा,' कि अपने प्रिय पुत्र को भी न रख छोड़ा, जो मेरे तत्व की छाप और मेरी महिमा का प्रकाश है, 'जिसके द्वारा सब वस्तुएँ बनीं,' जिसके द्वारा सब कुछ दिया गया; परन्तु उसे तेरे लिए दे दिया, केवल मनुष्य होने के लिए ही नहीं, वरन् तेरा स्वभाव अपनाने और उसे मरणशीलता, पाप और सब भ्रष्टता से शुद्ध करने, और उसे अमरता और अनन्त महिमा से सजाने और पहनाने के लिए, केवल अपने ही व्यक्तित्व में नहीं, परन्तु तुझ में और तेरे लिए भी: जिसके विषय में अब मैं चाहता हूँ कि तू विश्वास के द्वारा निश्चित रहे, क्योंकि सचमुच अन्त में तू उसे अनुभव करेगा और सदा के लिए पूरी रीति से भोगेगा। इस मेरे पुत्र को मैंने तेरे लिए मृत्यु के हाथ सौंप दिया, और वह भी अत्यन्त लज्जाजनक मृत्यु, 'अर्थात् क्रूस की,' 'मृत्यु का नाश करने' और तेरे पापों के लिए मेरे न्याय को सन्तुष्ट करने के लिए; इसलिए 'विश्वास कर,' और 'तेरे विश्वास के अनुसार तेरे लिए हो।'
"सुन, मेरा पुत्र स्वयं तुझ से क्या कहता है: 'हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे लोगो, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा;' 'मैं जगत को दोषी ठहराने नहीं, परन्तु उसे बचाने आया हूँ।' 'मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिए बुलाने आया हूँ।' वह कहता है, 'मैं केवल इन मेरे प्रेरितों के लिए ही विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए भी जो उनके प्रचार के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे।' अब उसने ऐसे लोगों के लिए क्या प्रार्थना की? वह कहता है, 'हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं हूँ वहाँ वे भी हों, कि वे उस महिमा को देखें और भोगें जो मेरी है, और जो मेरी तेरे साथ सदा से रही है। हे पिता, उन्हें बचा और अपने सत्य में बनाए रख।' वह कहता है, 'हे पिता, मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, और उनके लिए अपने आप को अर्पित करता हूँ।' देख, इस प्रकार तू सुनता है कि मेरा पुत्र तेरे लिए कैसे प्रार्थना करता है।
अब देखो मेरा प्रेरित पौलुस क्या कहता है: वह कहता है, 'हम जानते हैं कि हमारे उद्धारकर्ता मसीह की प्रार्थनाएँ सुनी गईं;' और यह भी, 'यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया।' सुनो वह दारोगा से क्या कहता है, 'प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा;' क्योंकि उसने स्वयं ही 'हमारे पापों को धो डाला है।' पतरस कहता है, 'उसके विषय में सब भविष्यद्वक्ता गवाही देते हैं कि जो कोई उस पर विश्वास करेगा, उसको उसके नाम के द्वारा पापों की क्षमा मिलेगी।' हे मनुष्य, 'विश्वास' कर। प्रार्थना कर, 'हे प्रभु, मेरे अविश्वास का उपाय कर;' 'हे प्रभु, हमारा विश्वास बढ़ा।' 'माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा।' सुनो संत यूहन्ना क्या कहता है: 'यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है; और हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है;' क्योंकि वह कहता है, 'यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धार्मिक यीशु मसीह; और वही हमारे पापों का प्रायश्चित्त है।' सुनो मसीह का नाम क्या रखा गया: स्वर्गदूत कहता है, 'तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा:' ताकि 'जहाँ पाप बहुत हुआ, वहाँ अनुग्रह उससे भी कहीं अधिक हुआ।' प्रभु का नाम इसलिये है कि तू, जो मृत्यु से किसी और कारण से नहीं, केवल अपने पापों के कारण डरता है, उनकी क्षमा का निश्चय पाए; और मृत्यु को प्रिय मित्र के समान गले लगाए, और उसके भय, डंक और सामर्थ्य को ललकारकर कहे, 'हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ? हे नरक, तेरी जय कहाँ?' संसार में कोई बात प्रभु को इतनी अप्रिय नहीं जितनी यह कि उसकी दया पर सन्देह किया जाए। दो या तीन गवाहों के मुँह से हमें सन्तुष्ट हो जाना चाहिए; इसलिये जब तूने इतने गवाहों की बात सुनी है कि जो सचमुच प्रभु से दया चाहता है, वह खाली हाथ नहीं लौटाया जाता, तो इस पर विश्वास कर, और भली कुँवारी मरियम के साथ कह, 'देख, हे प्रभु, मैं तेरा दास हूँ; मेरे लिये तेरे वचन के अनुसार हो।'
"इसलिये कह, 'परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर ही तो है जो धर्मी ठहराता है; तब मुझे कौन दोषी ठहराएगा? मसीह वही है जो मेरे पापों के लिये मरा, वरन् जी भी उठा, और पिता के दाहिने हाथ पर विराजमान है, और मेरे लिये प्रार्थना भी करता है।' इसलिये अपने पापों की क्षमा के विषय में निश्चित और निःसन्देह रह; अनन्त जीवन के विषय में निश्चित और निःसन्देह रह। अपने मन में यह न कह, 'अथाह कुण्ड में कौन उतरेगा?' अर्थात् अपने पापों की क्षमा पर सन्देह न कर, क्योंकि यह तो मसीह को ऊपर लाना है। और यह भी न कह, 'स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा?' अर्थात् अनन्त सुख पर सन्देह न कर, क्योंकि यह तो मसीह को स्वर्ग से बाहर निकालना है। परन्तु सुन कि प्रभु तुझसे क्या कहता है, 'वचन तेरे निकट है, तेरे मुँह में और तेरे मन में है; और यह वही विश्वास का वचन है जो हम प्रचार करते हैं: यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर मान ले, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा।' यदि तू 'विश्वास करता है कि यीशु मसीह मरा और जी भी उठा,' तो तुझे निश्चय हो जाएगा, प्रभु परमेश्वर कहता है कि 'जो मसीह के साथ मरे हैं, उन्हें मैं उसके साथ फिर ले आऊँगा।'
"इस प्रकार, प्रिय भाई, मैंने उचित जाना कि तुझे लिखूँ,
मेरा दूसरा उद्धरण ब्रैडफ़ोर्ड के "लंकाशायर और चेशायर को विदाई" से लिया जाएगा। (खण्ड 1, पृ. 449।)
"जब मैं अपने दण्ड के कारण पर विचार करता हूँ, तो मुझे शोक होता है कि मैं जितना आनन्दित हूँ उससे अधिक आनन्दित क्यों नहीं, क्योंकि यह परमेश्वर की सच्चाई और सत्य है। यह दण्ड केवल ब्रैडफ़ोर्ड का दण्ड नहीं है, वरन् मसीह और उसके सत्य का दण्ड है। ब्रैडफ़ोर्ड तो मात्र एक साधन है, जिसमें मसीह और उसके सिद्धान्त को दोषी ठहराया जा रहा है; इसलिये, मेरे प्रिय जनो, आनन्दित हो, आनन्दित हो, और मेरे साथ और मेरे लिये धन्यवाद दो, कि परमेश्वर ने हमारे देश पर ऐसा बड़ा उपकार करना चाहा कि सबसे अयोग्य को (मेरा अभिप्राय स्वयं से है) चुना, जिसमें उसकी इच्छा हुई कि कोई भी क्लेश सहा जाए, और विशेषकर यह हिंसक मृत्यु, जो, मैं देखता हूँ, उसके नाम के लिये तुम्हारे साथ मेरे लिये तैयार की गई है। मुझ पर इस अपनी अत्यन्त बड़ी दया के लिये हमारे पिता परमेश्वर की, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, सारी महिमा और स्तुति हो। आमीन।
"परन्तु हो सकता है तुम मुझसे कहो, 'आपको किस कारण दण्ड मिला है? हमने सुना है कि आप उसके पवित्र भोज में मसीह की उपस्थिति को पूरी तरह नकारते हैं, और उसे केवल एक चिह्न और साधारण रोटी बना देते हैं, और कुछ नहीं।' मेरे प्रिय जनो, मेरे विषय में क्या कहा जाता है और क्या कहा जाएगा, यह मैं नहीं बता सकता। मुझे बताया गया है कि मास्टर पेंडलटन तुम्हारे बीच प्रचार करने गया है, इस रूप में नहीं कि जैसे उसने एक बार अपना मत त्यागा था (क्योंकि तुम सब जानते हो कि मेरे तुम्हारे बीच आने से पहले वह जो प्रचार करता आया था उसके विरुद्ध उसने कैसा प्रचार किया है), परन्तु इसलिये कि जो उसने त्यागा था उसे फिर त्याग दे। वह मेरे विषय में कैसे बोलेगा, और मेरे आने से पहले, आने पर, और जलाए जाने पर क्या कहेगा, इसकी मुझे अधिक चिन्ता नहीं; क्योंकि जो इतना अस्थिर है और अपने ही विरुद्ध बार-बार बोलता है, मैं नहीं सोच सकता कि वह मेरे विषय में अच्छा बोलेगा, जब तक उसके स्वार्थ और लाभ की बात न हो: परन्तु इस विषय में इतना ही बहुत है।
"सच तो यह है कि मुझे विधर्मी ठहराकर दण्ड देने का मुख्य कारण यह है कि मैं वेदी के संस्कार को नकारता हूँ, जो मसीह का भोज नहीं, वरन् उसका सीधा-सीधा बिगाड़ा हुआ रूप है (क्योंकि पोप के अनुयायी अब उसे इस रूप में बरतते हैं कि रोटी और दाखमधु के रूप और गुणों के नीचे मसीह की देह और लहू की वास्तविक, प्राकृतिक और शारीरिक उपस्थिति मानी जाती है): अर्थात् मैं पदार्थान्तरण को नकारता हूँ, जो शैतान का प्रिय है, और मसीह-विरोधी के धर्म की पुत्री और उत्तराधिकारी है, जिसके द्वारा मिस्सा चलाई जाती है, मसीह का भोज बिगाड़ा जाता है, सेवकाई छीन ली जाती है, मन फिराव ठुकराया जाता है, और सारी सच्ची भक्ति त्याग दी जाती है।
"अपने प्रभु के भोज में, या मसीह की देह और लहू के संस्कार में, मैं मानता और विश्वास करता हूँ कि ग्रहण करनेवाले के विश्वास के लिये (पर पास खड़े रहनेवाले या देखनेवाले के लिये नहीं) सम्पूर्ण मसीह, परमेश्वर और मनुष्य, की सच्ची और यथार्थ उपस्थिति है, जैसे उसमें भागी होनेवाले की इन्द्रियों के लिये रोटी और दाखमधु की बहुत सच्ची उपस्थिति है। यह विश्वास, यह सिद्धान्त, जो परमेश्वर के वचन से और मसीह की कलीसिया की सच्ची गवाही से मेल खाता है, और जिसे पोप की कलीसिया सताती है, मैं नहीं छोड़ूँगा; और इसीलिये मुझे विधर्मी ठहराकर दण्ड दिया गया है, और मैं जलाया जाऊँगा।
"परन्तु मेरे प्रिय भाइयो, यह सत्य (जो मैंने सिखाया और जिसे तुमने ग्रहण किया, जिस पर मैं विश्वास करता था और अब भी करता हूँ, और जिसके लिये अपना प्राण देता हूँ), मुझे परमेश्वर में आशा है कि कभी जलाया, बाँधा या दबाया न जा सकेगा, वरन् परमेश्वर के सब विरोधियों के प्रधान के चाहे कितना ही बुरा मानने पर भी, वह जयवन्त होगा, विजय पाएगा और स्वतन्त्र रहेगा। क्योंकि प्रभु के विरुद्ध कोई युक्ति नहीं, और मनुष्य की कोई चाल सत्य को पराजित नहीं कर सकती, सिवाय उनके जो 'अविश्वास की सन्तान' हैं, जिन्हें 'सत्य से प्रेम' नहीं, और इसलिये झूठ पर विश्वास करने के लिये छोड़ दिए गए हैं। इस विपत्ति से दया के प्रभु तुम्हें और इस सारे राज्य को छुड़ाए, प्रभु में मेरे प्रिय हृदयो, मैं दीनता से उसकी दया की बिनती करता हूँ। आमीन।"
मेरा तीसरा और अन्तिम उद्धरण ब्रैडफ़ोर्ड द्वारा सन् 1551 में बेडफ़ोर्ड के अर्ल फ्रांसिस रसेल को लिखे गए एक पत्र से लिया जाएगा। (ब्रैडफ़ोर्ड की रचनाएँ, खण्ड 2, पृ. 79।)
"मेरे भले प्रभु, आपके पास धन्यवादी होने का कारण है। क्योंकि अपने बुलाए जाने पर दृष्टि कीजिए, और मुझे बताइए कि इंग्लैण्ड के इस राज्य में कितने कुलीनों, अर्लों के पुत्रों, सामन्तों, शूरवीरों और प्रतिष्ठित पुरुषों के साथ परमेश्वर ने ऐसा व्यवहार किया है। मुझे विश्वास है कि आप यह नहीं सोचते कि आपने इसके योग्य कुछ किया है। केवल मसीह में परमेश्वर की दया ने ही आप पर यह किया है, जैसा उसने यिर्मयाह के समय में एबेदमेलेक पर, अहाब के समय में ओबद्याह पर, मसीह के समय में अरिमतियाह के यूसुफ़ पर, और प्रेरितों के समय में सिरगियुस पौलुस और कन्दाके रानी के खोजे पर किया। अब केवल धन्यवादी बने रहिए, और मेरे भले प्रभु, बने रहिए, बने रहिए, बने रहिए, मसीह को मानते रहिए। मनुष्यों के सामने उससे लज्जित न हों, क्योंकि तब वह भी आपसे लज्जित न होगा। अब वह आपको परखेगा: उससे लिपटे रहिए, तो वह आपसे लिपटा रहेगा; वह संकट में आपके साथ होगा और आपको छुड़ाएगा। परन्तु तब आपको उसकी दुहाई देनी होगी, क्योंकि ऐसा ही होता है: 'उसने मुझे पुकारा, और मैंने उसकी सुनी: संकट में मैं उसके साथ था।'
"लूत की पत्नी को स्मरण कीजिए, जिसने पीछे फिरकर देखा; फ्रांसिस स्पाइरा को स्मरण कीजिए; स्मरण कीजिए कि 'जब तक कोई नियम के अनुसार न लड़े, उसे मुकुट नहीं दिया जाता।' स्मरण कीजिए कि जो कुछ आपके पास है, वह सब मसीह की आज्ञा के अधीन है।
स्मरण कीजिए कि आपके लिये उसने जितना खोया, वह उससे अधिक है जितना आप उसके लिये खो सकते हैं। स्मरण कीजिए कि जो उसके लिये खोया जाता है उसे आप खोते नहीं, क्योंकि यहाँ और अन्यत्र आप कहीं अधिक पाएँगे। स्मरण कीजिए कि आप मरेंगे; और कब, कहाँ और कैसे, यह आप नहीं जानते। स्मरण कीजिए कि पापियों की मृत्यु अत्यन्त भयानक है। स्मरण कीजिए कि परमेश्वर के सन्तों की मृत्यु उसकी दृष्टि में बहुमूल्य है। स्मरण कीजिए कि भीड़ चौड़े मार्ग पर चलती है, जो विनाश की ओर जाता है। स्मरण कीजिए कि सकरा फाटक, जो महिमा की ओर ले जाता है, उसके थोड़े ही यात्री हैं। स्मरण कीजिए कि मसीह आपको आज्ञा देता है कि उसमें प्रवेश करने का यत्न कीजिए। स्मरण कीजिए कि जो प्रभु पर भरोसा रखता है, वह अपने सब शत्रुओं के आक्रमणों के सामने खड़े रहने का बल पाएगा।
"निश्चय जानिए कि आपके सिर का एक एक बाल गिना हुआ है। निश्चय जानिए कि आपके भले पिता ने सीमाएँ ठहरा दी हैं, जिन पर शैतान आँख उठाने का साहस नहीं करता। अपने आपको उसे सौंप दीजिए; वह आपका रखवाला है, रहा है और रहेगा; अपनी चिन्ता उस पर डाल दीजिए, और वह आपकी चिन्ता करेगा। मसीह को अपना लक्ष्य और निशाना बनाइए; उसे अपना नमूना बनाइए कि उसके अनुसार काम करें; उसे अपना आदर्श बनाइए कि उसका अनुसरण करें: जैसे अपना हृदय, वैसे ही अपना हाथ, जैसे अपना मन, वैसे ही अपनी जीभ, जैसे अपना विश्वास, वैसे ही अपने पाँव उसे दीजिए; और धर्म की सब बातों में उसका वचन आपके आगे चलनेवाला दीपक हो।
"धन्य है वह जो इन पोपवादी प्रार्थनाओं में न चलता, न उनके पास खड़ा होता, न उनके पास बैठता है। परमेश्वर की महिमा आत्मा और शरीर दोनों में कीजिए। जो मसीह के साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है। प्रार्थना कीजिए; परमेश्वर की सहायता की बाट जोहिए, जो उनके निकट है जो माँगते हैं और उसके बाद निश्चय के साथ आशा रखते हैं। उस प्रार्थना में मैं हृदय से चाहता हूँ कि आपका प्रभुत्व हमें स्मरण रखे, जो परमेश्वर का धन्यवाद हो, बड़े आनन्द से आपके साथ चल रहे हैं, और आपके आगे जाने की आशा रखते हैं, यह भरोसा करते हुए कि यदि परमेश्वर की इच्छा हुई तो आप हमारे पीछे आएँगे।"
मेरे विचार में, मेरे पाठक सहमत होंगे कि इन उद्धरणों पर टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। वे अपने आप बोलते हैं। यदि स्थान होता तो ऐसे ही अनेक अंश चुने जा सकते थे। परन्तु जितना है वही पर्याप्त है, जैसे भोज के लिये पर्याप्त भोजन। शायद इतना उद्धृत किया जा चुका है कि सिद्ध हो जाए कि ब्रैडफ़ोर्ड की लिखित रचनाएँ पढ़ने के योग्य हैं।
आइए हम परमेश्वर का धन्यवाद करें कि इंग्लैण्ड की सुधारवादी कलीसिया की नींव यूहन्ना ब्रैडफ़ोर्ड जैसे लोगों ने डाली। आइए हम स्पष्ट रूप से समझें कि हमारे शहीद धर्म-सुधारक किस प्रकार के पुरुष थे, वे किन सिद्धान्तों को मानते थे, और उन्होंने कैसा जीवन बिताया। आइए हम प्रार्थना करें कि इंग्लैण्ड की कलीसिया के लिये उनके किए हुए काम को कभी तुच्छ या कम न समझा जाए। सबसे बढ़कर, आइए हम प्रार्थना करें कि हमारे बीच अंग्रेज़ पादरियों की निरन्तर परम्परा कभी न टूटे, जो शहीदों के दीपक को उज्ज्वल जलाए रखें और धर्म-सुधार के सच्चे सिद्धान्त हमारे बच्चों की सन्तानों तक पहुँचाते रहें।
निकोलस रिडली: अध्यक्ष और
शहीद
उनका जीवन, उनका समय और उनकी रचनाएँ।
निकोलस रिडली, अध्यक्ष और शहीद, ऐसे पुरुष हैं जिनका नाम सच्चे हृदयवाले हर अंग्रेज़ कलीसिया-सदस्य के घर घर में सुना जाना चाहिए। अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों की महान सेना में रिडली से ऊँचे स्थान का अधिकारी कोई नहीं। क्रैनमर, लैटिमर और हूपर के साथ वे हमारे धन्य धर्म-सुधार के प्रमुख महापुरुषों में प्रथम पंक्ति में स्थान रखते हैं, और सच्चे गुण में किसी से कम नहीं। रिडली का जन्म लगभग सन् 1500 में नॉर्थम्बरलैण्ड के विलीमोंट्सविक में हुआ, जो स्कॉटलैण्ड की सीमा से अधिक दूर नहीं। उनकी आरम्भिक शिक्षा न्यूकैसल-ऑन-टाइन के एक विद्यालय में हुई, और सन् 1518 में वे कैम्ब्रिज के पेम्ब्रोक कॉलेज में भेजे गए। यहाँ वे शीघ्र ही असाधारण परिश्रम और योग्यता के विद्यार्थी के रूप में प्रसिद्ध हुए, और विश्वविद्यालय में शीघ्रता से एक प्रमुख स्थान पर पहुँचे। वे सन् 1524 में पेम्ब्रोक के फ़ेलो, 1533 में वरिष्ठ प्रॉक्टर, 1534 में विश्वविद्यालय के पादरी और सार्वजनिक वक्ता, और 1540 में पेम्ब्रोक के मास्टर बने।
रिडले के दृढ़ प्रोटेस्टेंट बनने का आरम्भ कुछ अस्पष्टता में छिपा है। क्रैन्मर के समान वह भी धीरे-धीरे पवित्रशास्त्र के सत्य के पूरे प्रकाश में आया, और विश्वास की पूर्ण परिपक्व खराई एक ही बार में उसे प्राप्त नहीं हुई। उसने 1534 में पोप की सर्वोच्चता के विरुद्ध आदेश पर हस्ताक्षर किए। 1537 में वह आर्चबिशप क्रैन्मर का पादरी-सहायक बना, और उसी के द्वारा 1538 में पूर्वी केंट के हीम के पल्ली-पुरोहित-पद पर नियुक्त किया गया। यहाँ, एक शान्त देहाती पासबानी-निवास के एकान्त में, उसने पहले प्रभु-भोज के विषय में रैट्रम, अर्थात् बर्ट्रम, का प्रसिद्ध ग्रन्थ पढ़ा, और उसी से प्रेरित होकर पवित्रशास्त्र को खोजने और प्राचीन पिताओं की रचनाओं को पहले से अधिक ध्यान से जाँचने लगा। परिणाम यह हुआ कि प्रभु-भोज के विषय में रोमी सिद्धान्त की सच्चाई पर उसे गम्भीर शंकाएँ होने लगीं। ये शंकाएँ उसने अपने मित्र और संरक्षक आर्चबिशप को बताईं। अन्तिम परिणाम यह हुआ कि क्रैन्मर और रिडले दोनों को विश्वास हो गया कि प्रचलित ट्रांसबस्टैंशिएशन की मान्यता पवित्रशास्त्र-विरुद्ध, नई और भ्रमपूर्ण है। फिर भी 1545 तक रिडले ने संस्कार में मसीह के देह और लहू की शारीरिक उपस्थिति के सिद्धान्त को पूरी तरह नहीं त्यागा था। उसी समय के लगभग फ्रिथ, लैम्बर्ट और अन्य लोगों के तर्कों और दुःख-भोग ने हीम में पड़े उसके प्रभावों को पक्का कर दिया, और उसने बिना किसी हिचकिचाहट के प्रभु-भोज के उस सिद्धान्त को अपना लिया जो अब इंग्लैंड की कलीसिया में माना जाता है, और अपनी मृत्यु तक उससे कभी नहीं डिगा।
1540 में रिडले हेनरी अष्टम का पादरी-सहायक बना, और फिर तेज़ी से एक के बाद एक प्रतिष्ठा और प्रभाव के पदों पर चढ़ता गया। 1541 में वह कैन्टरबरी का प्रेबेंडरी बना, और 1545 में वेस्टमिन्स्टर का प्रेबेंडरी। 1547 में उसे सोहम का पल्ली-पुरोहित नियुक्त किया गया, और उसी वर्ष हेनरी अष्टम ने उसे रोचेस्टर का अध्यक्ष नामित किया। 1550 में एडवर्ड षष्ठ ने उसे लन्दन का अध्यक्ष बनाया, और 1553 में उसे डरहम का अध्यक्ष नामित किया गया। परन्तु यह अन्तिम परिवर्तन कभी हुआ ही नहीं। युवा राजा एडवर्ड की शोकपूर्ण मृत्यु ने रिडले के सांसारिक सम्मानों को पूरी तरह रोक दिया। 1553 में खूनी रानी मरियम ने, जिसे उससे विशेष घृणा थी, क्षमादान से उसे नाम लेकर अलग कर दिया और उसे टावर में बन्दी बना दिया।
एडवर्ड षष्ठ की मृत्यु से पहले जिन परिस्थितियों में रिडले का रानी मरियम से सीधा टकराव हुआ, उनका वर्णन फॉक्स ने इतने सजीव ढंग से किया है कि मैं उचित समझता हूँ कि उन्हें उस शहीद-इतिहासकार के अपने ही शब्दों में दूँ: -
"लगभग 8 सितम्बर, 1552 को डॉक्टर रिडले, जो उस समय लन्दन का अध्यक्ष था और हर्टफ़र्डशायर में अपने हैडम के घर में ठहरा हुआ था, लेडी मरियम से भेंट करने गया, जो वहाँ से दो मील दूर हन्सडन में ठहरी थीं। सर थॉमस हार्टन और उनके अन्य अधिकारियों ने उसका विनम्रता से स्वागत किया, और लगभग ग्यारह बजे तक वह वहीं रहा, जब लेडी मरियम अपने दर्शन-कक्ष में आईं। तब उस अध्यक्ष ने वहाँ उन्हें प्रणाम किया और कहा कि वह उनकी महिमा के प्रति अपना कर्तव्य निभाने आया है। तब उन्होंने उसके कष्ट के लिए उसे धन्यवाद दिया, और पन्द्रह मिनट तक उससे बड़ी प्रसन्नता से बातचीत की, और कहा कि जब वह उनके पिता का पादरी-सहायक था तब वे उसे दरबार में जानती थीं, और उस उपदेश को भली-भाँति याद कर सकती थीं जो उसने राजा हेनरी, उनके पिता, के सामने वर्तमान लेडी क्लिंटन के सर एंथनी ब्राउन से विवाह के अवसर पर दिया था, इत्यादि; और इस प्रकार उसे अपने अधिकारियों के साथ भोजन करने के लिए विदा किया। भोजन समाप्त होने के बाद, लेडी मरियम ने अध्यक्ष को बुलवाया, और वह फिर उनके पास गया, और उन दोनों के बीच यह बातचीत हुई। पहले अध्यक्ष ने इस प्रकार आरम्भ किया: 'महोदया, मैं केवल आपकी महिमा से भेंट करने का कर्तव्य निभाने ही नहीं आया, वरन् यह भी कि यदि आपको सुनना भाए तो अगले रविवार को आपके सामने उपदेश देने का प्रस्ताव रखूँ।'
"इस पर उनके मुख का भाव बदल गया, और कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने यों उत्तर दिया: 'मेरे स्वामी, इस अन्तिम बात के विषय में, मैं चाहती हूँ कि आप इसका उत्तर स्वयं ही दें।'
"रिडले। - 'महोदया, अपने पद और बुलाहट को देखते हुए मैं बाध्य हूँ कि आपकी महिमा के सामने उपदेश देने का यह प्रस्ताव रखूँ।'
"मरियम। - 'अच्छा, मैं आपसे कहती हूँ कि जैसा मैंने कहा, इस बात का उत्तर आप स्वयं दें, क्योंकि आप उत्तर भली-भाँति जानते हैं; पर यदि इसके सिवाय कोई उपाय नहीं कि मुझे ही आपको उत्तर देना पड़े, तो आपका उत्तर यह होगा: साथ की पल्ली-कलीसिया का द्वार आपके लिए खुला रहेगा, यदि आप आएँ तो जी चाहे तो उपदेश दे सकते हैं, परन्तु न मैं और न मेरे लोगों में से कोई आपको सुनेगा।'
"रिडले। - 'महोदया, मुझे भरोसा है कि आप परमेश्वर के वचन को अस्वीकार नहीं करेंगी।'
"मरियम। - 'मैं नहीं जानती कि आप किसे परमेश्वर का वचन कहते हैं; जो मेरे पिता के दिनों में परमेश्वर का वचन था, वह अब परमेश्वर का वचन नहीं है।'
"रिडले। - 'परमेश्वर का वचन सब समयों में एक ही है, परन्तु कुछ युगों में वह दूसरों की अपेक्षा अधिक अच्छी रीति से समझा और माना गया है।'
"मरियम। - 'आप अपने कानों की सौगन्ध भी उस बात को परमेश्वर का वचन कहने का साहस नहीं कर सकते थे जिसे आप अब कहते हैं, यदि मेरे पिता के दिन होते; और जहाँ तक आपकी नई पुस्तकों का प्रश्न है, मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि मैंने उनमें से कभी कोई नहीं पढ़ी, न कभी पढ़ी है और न कभी पढ़ूँगी।'
"और तब के स्थापित धर्म-रूप के विरुद्ध, तथा राज्य के शासन के विरुद्ध, और अपने भाई के बाल्यकाल में बनाई गई व्यवस्थाओं के विरुद्ध, जिनके विषय में उन्होंने कहा कि जब तक उनका भाई पूर्ण आयु का न हो जाए, तब तक वे उनका पालन करने को बाध्य नहीं हैं, और तब वे उनका पालन करेंगी, बहुत कड़वे शब्द कहने के बाद, उन्होंने अध्यक्ष से पूछा कि क्या वह महासभा का सदस्य है? उसने उत्तर दिया, 'नहीं।' 'आप हो सकते थे,' उन्होंने कहा, 'जैसी आजकल महासभा चलती है।' और इस प्रकार उन्होंने इन शब्दों के साथ अन्त किया: 'मेरे स्वामी, मुझसे भेंट करने आने की आपकी शिष्टता के लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूँ, परन्तु मेरे सामने उपदेश देने के आपके प्रस्ताव के लिए मैं आपको रत्ती भर भी धन्यवाद नहीं देती।'
"तब उक्त अध्यक्ष को सर थॉमस वार्टन उस स्थान पर ले आए जहाँ उन्होंने भोजन किया था, और उनसे पीने का आग्रह किया गया; और पीने के बाद वे कुछ देर रुके, बहुत उदास दृष्टि से देखते रहे, और अचानक ये शब्द बोल उठे, — 'निश्चय ही मुझसे भूल हुई है।' सर थॉमस वार्टन ने पूछा, 'वह कैसे?' उन्होंने कहा, 'क्योंकि मैंने उस स्थान पर पिया है जहाँ परमेश्वर का वचन प्रस्तुत किया गया और ठुकरा दिया गया; यदि मुझे अपना कर्तव्य स्मरण रहता, तो मुझे तुरन्त वहाँ से चले जाना और इस घर के विरुद्ध गवाही के लिये अपने जूतों की धूल झाड़ देनी चाहिए थी।' उक्त अध्यक्ष ने ये शब्द ऐसे आवेश से कहे कि सुननेवालों में से कुछ ने बाद में मान लिया कि उनके सिर के बाल खड़े हो गए थे। यह करके उक्त अध्यक्ष चले गए, और अपने घर लौट आए।"
टावर से रिडले को 1554 में ऑक्सफ़र्ड भेजा गया, ताकि एक दिखावटी वाद-विवाद में उन्हें सताया और अपमानित किया जाए; और अन्त में दो वर्ष कारावास भोगने के बाद वे 16 अक्टूबर, 1555 को वृद्ध लैटिमर के साथ ऑक्सफ़र्ड में जला दिए गए। आश्चर्य की बात है कि उन्हें अपनी मृत्यु के प्रकार का पूर्वाभास सा हो गया था। ह्यूम्फ़्रे ने अपनी "ज्यूएल की जीवनी" में यह घटना लिखी है: "एक बार रिडले ने, जब वे भीषण तूफ़ान में डगमगा रहे थे, अपने भयभीत साथियों को इन शब्दों में समझाया, 'ढाढ़स बाँधो, और अपने चप्पुओं पर झुको; इस नाव में एक अध्यक्ष है जो डूबने के लिये नहीं, वरन् जलाए जाने के लिये है।'"
जिस दिन से रिडले अध्यक्ष बने, ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूरी तरह आर्चबिशप क्रैन्मर की सहायता में लग गए ताकि इंग्लैंड की कलीसिया का धर्म-सुधार स्थापित और सुदृढ़ किया जा सके। इस विशाल और कठिन कार्य के लिये वे अपनी सर्वमान्य विद्वत्ता के कारण विशेष रूप से योग्य थे। धर्म-सुधारकों में शायद ही किसी का हम पर उतना ऋण हो जितना रिडले का, हमारे उत्तम धर्मसूत्रों और आराधना-विधि के विषय में। यह निस्सन्देह सत्य है कि महारानी एलिज़ाबेथ के समय में उनमें कुछ परिवर्तन और सुधार हुआ, परन्तु हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि अपने आरम्भिक रूप में उन्हें पहली बार एडवर्ड के समय के धर्म-सुधारकों से ही आकार और दृढ़ता मिली; और एडवर्ड के समय के धर्म-सुधारकों में सम्भवतः किसी ने भी अध्यक्ष रिडले से अधिक काम नहीं किया। वास्तव में अंग्रेज़ी धर्म-सुधार में उनके कार्य का महत्त्व उनके एक प्रमुख विरोधी के इस कथन से जाना जा सकता है: "लैटिमर क्रैन्मर का सहारा लेता है, क्रैन्मर रिडले का सहारा लेता है, और रिडले अपनी ही अनोखी बुद्धि का सहारा लेता है।" निश्चय ही एडवर्ड षष्ठ के मन पर रिडले से अधिक प्रभाव किसी का नहीं रहा। उन्हीं के सुझाव पर उस उदार-हृदय युवा राजा ने क्राइस्ट्स हॉस्पिटल सहित सोलह व्याकरण-विद्यालय स्थापित किए; और यदि उनका जीवन बचा रहता तो वे युवकों की शिक्षा के लिये बारह महाविद्यालय बनवाने का विचार रखते थे। इसके अतिरिक्त, स्मिथफ़ील्ड में सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल की उत्तम संस्था को भी पहली बार रिडले की सलाह से राजा ने धन देकर अस्तित्व में लाया।
अपने ग्रन्थ "रिडले की रचनाएँ" के आरम्भ में दी गई जीवनी में श्री क्रिसमस ने जो वर्णन दिया है कि किन परिस्थितियों में एडवर्ड षष्ठ ने सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल की स्थापना की, वह इतना रोचक है कि मैं उसे पूरा-पूरा दे रहा हूँ: —
"रिडले की सलाह के हितकारी प्रभाव का एक उल्लेखनीय उदाहरण एडवर्ड षष्ठ के राज्यकाल में तीन संस्थाओं की स्थापना में दिखाई देता है, जिन्हें तिथि की दृष्टि से धर्म-सुधार के पहले फल कहा जा सकता है। इस प्रतिष्ठित अध्यक्ष ने परिषद-भवन में भी और मंच पर भी अपने समय की धर्म-विरोधी प्रवृत्ति का सामना किया; और यद्यपि युवा राजा भ्रष्टाचार की लहर का केवल आंशिक विरोध कर सका, फिर भी उसने रिडले के सुझाव पर सोलह व्याकरण-विद्यालय स्थापित किए, और यदि उसका जीवन बचा रहता तो युवकों की शिक्षा के लिये बारह महाविद्यालय बनवाने का विचार रखता था। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले उसने अध्यक्ष को बुलवाया, और एक उपदेश के लिये उनका धन्यवाद करते हुए, जिसमें उन्होंने अपने संगी मनुष्यों की दरिद्रता और अज्ञान के निवारण के कर्तव्य पर बल दिया था, कहा: 'मैंने अनुभव किया कि आपके वचनों ने मुझे विशेष रूप से छुआ, उन योग्यताओं के कारण भी जो परमेश्वर ने मुझे दी हैं, और उस उदाहरण के कारण भी जो वह मुझसे चाहेगा; क्योंकि जैसे राज्य में मैं परमेश्वर के अधीन अगले स्थान पर हूँ, वैसे ही मुझे भलाई और दया में उसके सबसे निकट पहुँचना चाहिए; क्योंकि जैसे हमारी दुर्दशाओं को उसकी सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता है, वैसे ही हम सबसे बड़े ऋणी हैं — उन सब के ऋणी जो दुखी हैं, और इस विषय में अपने प्रबन्ध का सबसे बड़ा लेखा हमें ही देना होगा; इसलिये, मेरे प्रभु, जैसे आपने मुझे यह सामान्य उपदेश दिया है, जिसके लिये मैं आपका धन्यवाद करता हूँ, वैसे ही मुझे (मेरी विनती है) बताइए कि किन विशेष कार्यों से मैं इस विषय में अपना कर्तव्य सबसे अच्छी रीति से निभा सकता हूँ।' अध्यक्ष ऐसे अनुरोध के लिये तैयार नहीं थे; उन्होंने विचार करने और उन लोगों से परामर्श करने के लिये समय माँगा जो निर्धनों की दशा से अधिक परिचित थे। लन्दन के लॉर्ड मेयर और अल्डरमैनों की सलाह लेकर वे शीघ्र ही राजा के पास लौटे, और उन्होंने बताया कि निर्धन तीन प्रकार के दिखाई देते हैं। कुछ स्वभाव की असमर्थता के कारण निर्धन हैं, जैसे पितृहीन छोटे बच्चे, वृद्ध अशक्त जन, मूढ़, अपंग, और ऐसे ही अन्य; इन्हें शिक्षा और पालन-पोषण की आवश्यकता थी; इनके लिये राजा ने न्यूगेट मार्केट के निकट ग्रे फ्रायर्स की कलीसिया दे दी, जो अब क्राइस्ट्स हॉस्पिटल कहलाती है। अन्य, जैसा उन्होंने देखा, शक्ति के अभाव में निर्धन हैं, जैसे घायल सैनिक, रोगी और बीमार लोग जिन्हें चंगा करने और राहत देने की आवश्यकता थी; इनके उपयोग के लिये राजा ने स्मिथफ़ील्ड के निकट सेंट बार्थोलोम्यू दे दिया; तीसरे प्रकार के निर्धन आलस्य या फ़िज़ूलख़र्ची के कारण निर्धन हैं, जैसे आवारा, निठल्ले, आदि, जिन्हें दण्ड देकर सुव्यवस्था में लाना चाहिए; इनके लिये राजा ने ब्राइडवेल में अपना भवन नियुक्त किया, जो अनेक अंग्रेज़ राजाओं का प्राचीन निवास था।"
अपने अध्यक्ष-काल की संक्षिप्त अवधि में रिडले के आन्तरिक जीवन और आदतों का इतना सुन्दर वर्णन फ़ॉक्स ने अपनी "काम और स्मारक" में किया है कि मैं उस अंश को पूरा देने के लिये कोई क्षमा नहीं माँगता: —
"अपने पद और सेवकाई में उसने मसीह के सच्चे और हितकारी सिद्धान्त का प्रचार करने और उसकी शिक्षा देने में ऐसा परिश्रम किया और अपने आपको उसमें ऐसा लगाए रखा, कि कभी किसी भले बालक को उसके प्रिय माता-पिता ने उतना विशेष प्रेम न किया होगा जितना उसकी भेड़-बकरियों और उसके धर्म-प्रान्त के लोगों ने उससे किया। हर पर्व के दिन और हर रविवार को वह किसी न किसी स्थान पर प्रचार करता था, जब तक कि भारी कामकाज और व्यस्तता के कारण वह रोका न जाता। उसके उपदेशों में लोग मधुमक्खियों की भाँति उसके चारों ओर झुण्ड बाँधकर उमड़ आते थे, और उस फलदायी सिद्धान्त के मधुर फूलों और हितकारी रस की लालसा करते थे, जिसका वह केवल प्रचार ही नहीं करता था, वरन् अपने जीवन से भी उसे दिखाता था, मानो अन्धों की आँखों और इन्द्रियों के लिये एक चमकती हुई लालटेन, और वह भी ऐसे शुद्ध आचरण और पवित्र जीवन के साथ (बुरी अभिलाषाओं और कामनाओं से दूर रहकर), कि उसके शत्रु भी उसमें एक बिन्दु भर दोष नहीं निकाल सकते थे।
"इसके अतिरिक्त वह अत्यन्त विद्वान था। उसकी स्मरण-शक्ति बड़ी थी, और उसका अध्ययन ऐसा था कि वह उचित रूप से हमारे इस युग के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों के समकक्ष गिने जाने के योग्य था; इसकी साक्षी उसकी अनेक उल्लेखनीय रचनाएँ, सारगर्भित उपदेश और दोनों विश्वविद्यालयों में हुए अनेक वाद-विवाद देते हैं, और उसके विरोधी भी, जो स्वयं इससे कम कुछ नहीं कहेंगे।
"इन सब के अतिरिक्त वह परामर्श में बुद्धिमान, तीक्ष्ण बुद्धि का और अपने सब कामों में बड़ा चतुर था। वह हठी पोप के अनुयायियों को उनके भ्रमपूर्ण मतों से लौटा लाने में, और कोमलता से उन्हें सत्य की ओर जीतने में कितना दयालु और सावधान था, यह बात राजा एडवर्ड के समय में यॉर्क के पूर्व महाअध्यक्ष डॉक्टर हीथ के साथ, जो एक वर्ष तक उसके घर में उसके बन्दी रहे, उसके सौम्य व्यवहार और शिष्टाचार से भली-भाँति प्रकट होती है। सारांश यह कि वह ऐसा अध्यक्ष था, और सब बातों में ऐसा भला, भक्त और आत्मिक मनुष्य था, कि इंग्लैण्ड ऐसे योग्य रत्न की हानि पर उचित रूप से शोक कर सकता है। और सार्वजनिक बातों के विषय में अब तक इतना ही।
"अब मैं उसके व्यक्तित्व और स्वभाव के विषय में कुछ और विशेष रूप से कहूँगा। वह एक सुन्दर पुरुष था, और रंग-रूप तथा देह के अंगों में सब प्रकार से सुडौल था। वह सब बातों को भले अर्थ में लेता था, अपने हृदय में न द्वेष रखता था न कड़वाहट, और अपने विरुद्ध किए गए सब अपराधों और अन्यायों को तुरन्त भूल जाता था। वह अपने कुटुम्बियों के प्रति बहुत दयालु और स्नेही था, तौभी उनके पक्ष में न्याय की माँग से अधिक कुछ नहीं करता था, और उन्हें (यहाँ तक कि अपने सगे भाई और बहन को भी) सदा यह सामान्य नियम देता था, कि यदि वे बुराई करें तो उससे कुछ भी अपेक्षा न रखें, वरन् उसके लिये परदेशी और पराए ठहरें, और वही उसका भाई या बहन माना जाए जो ईमानदारी और भक्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करे।
"वह अपने आपको वश में रखने के लिये सब प्रकार के उपाय करता था, और बहुत प्रार्थना और मनन में लगा रहता था; क्योंकि प्रतिदिन प्रातःकाल, वस्त्र पहनते ही वह तुरन्त अपने शयनकक्ष में जाता और वहाँ घुटनों के बल आधे घण्टे तक प्रार्थना करता था; और उसके पूरा होते ही वह तुरन्त अपने अध्ययन-कक्ष में चला जाता (यदि कोई अन्य काम उसे रोकने न आता), और वहाँ दस बजे तक रहता, फिर सामूहिक प्रार्थना में आता, जो उसके घर में प्रतिदिन होती थी। प्रार्थना के पश्चात् वह भोजन करने जाता, जहाँ वह बहुत कम बातें करता था, जब तक कि किसी के द्वारा कोई प्रसंग न उठाया जाए, और तब उसकी बातचीत गम्भीर, विवेकपूर्ण और बुद्धिमानी की होती थी, और कभी-कभी अवसर के अनुसार हँसी-विनोद की भी।
"भोजन समाप्त होने पर, जो बहुत लम्बा नहीं होता था, वह एक घण्टे या उसके लगभग बैठकर बातचीत करता या शतरंज खेलता था। उसके बाद वह अपने अध्ययन-कक्ष में लौट जाता, और वहाँ सायं पाँच बजे तक रहता, जब तक कि निवेदन करनेवाले या बाहर का कोई काम इसके विपरीत कारण न बन जाए, और तब पूर्वाह्न की भाँति सामूहिक प्रार्थना में आता, जिसके समाप्त होने पर वह रात्रि-भोजन करने जाता, और वहाँ भी वैसा ही व्यवहार रखता जैसा दोपहर के भोजन में। रात्रि-भोजन के बाद एक घण्टे तक शतरंज खेलकर मन बहलाता, फिर वह अपने अध्ययन-कक्ष में लौट जाता; और रात के ग्यारह बजे तक वहीं रहता, जो उसके सोने जाने का सामान्य समय था, तब प्रातःकाल उठने के समय की भाँति घुटनों के बल प्रार्थना करता। जब वह फुलहम की अपनी जागीर में होता, जैसा वह कई बार हुआ करता था, तब वह सामूहिक प्रार्थना के समय अपने परिवार को प्रतिदिन एक पाठ पढ़कर सुनाता, प्रेरितों के काम से आरम्भ करके पौलुस की सब पत्रियों तक चलता हुआ, और जो कोई पढ़ सकता था उस हर एक को एक नया नियम देता, और इसके अतिरिक्त उन्हें धन देकर कुछ मुख्य अध्याय कण्ठस्थ करवाता, विशेषकर प्रेरितों के काम का तेरहवाँ अध्याय; और वह अपने घराने को प्रायः एक सौ एकवाँ भजन भी पढ़कर सुनाता था, अपने परिवार की ऐसी अद्भुत चिन्ता रखते हुए कि वे दूसरों के लिये सब सद्गुण और सच्चाई का नमूना बनें। संक्षेप में, जैसा वह स्वयं भक्त और सद्गुणी था, वैसे ही उसके घर में सद्गुण और भक्ति के सिवाय और कुछ राज्य नहीं करता था, और वह उन्हें हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह के भोजन से पोषण देता था।"
"अब श्रीमती बोनर नामक एक वृद्धा के प्रति उसके कोमल स्वभाव और दयालु करुणा के विषय में एक-दो बातें कहना शेष है; वह डॉक्टर बोनर की माता थी, जो किसी समय लंदन का अध्यक्ष था। मैंने इसकी चर्चा करना उचित समझा, एक ओर डॉक्टर रिडले की दुर्लभ उदारता के कारण, और दूसरी ओर डॉक्टर बोनर की अयोग्य निर्दयता और कृतघ्न स्वभाव के कारण। अध्यक्ष रिडले जब अपनी फुलहम की हवेली में रहता था, तो अपने घर के पास के एक मकान में रहनेवाली उस श्रीमती बोनर को, श्रीमती मुंगे के साथ, जो बोनर की बहन थी, भोजन और रात्रि-भोज के लिए सदा बुलवा भेजता था, यह कहकर, 'जाओ, मेरी माता बोनर को बुला लाओ;' और वह जब आती तो सदा मेज़ के सिरे की कुर्सी पर बिठाई जाती थी, और उसके साथ ऐसा कोमल व्यवहार, स्वागत और आदर किया जाता था मानो वह उसी की अपनी कोख से जन्मा हो; और राजा की परिषद के सदस्य भी उपस्थित होते, तब भी वह अपने आसन से कभी हटाई नहीं जाती थी, और जब कभी उनमें से कोई वहाँ होता (जैसा कि अनेक बार हुआ), तो वह कहता, 'आप महानुभावों की कृपा से, यह स्थान अधिकार और रीति के अनुसार मेरी माता बोनर का है।' परन्तु उसकी इस अनुपम कोमलता और दयालु करुणा का बदला उसे बाद में उसी डॉक्टर बोनर के हाथों कैसा मिला, यह धरती पर चलनेवाला प्रायः छोटे से छोटा बच्चा भी बता सकता है। क्योंकि इसके बाद रिडले का बोनर और उसके लोगों से बढ़कर शत्रु कौन था? उसके विनाश की खोज में बोनर से अधिक कौन लगा रहा, जिसने उसकी कोमलता का बदला अत्यन्त क्रूरता से चुकाया? यह रिडले की सगी बहन और उसके पति जॉर्ज शिपसाइड के साथ समय-समय पर किए गए कठोर व्यवहार से भली-भाँति प्रकट हुआ। रिडले की कोमलता ने बोनर की माता, बहन और अन्य सम्बन्धियों को न केवल वह सब शान्ति से भोगने दिया जो उन्हें बोनर से मिला था, वरन् उसने उन्हें अपने घर में भी रखा और प्रतिदिन उनके प्रति बड़ी शिष्टता और मित्रता दिखाई। दूसरी ओर अध्यक्ष बोनर ने अपना पद फिर पा लेने पर अध्यक्ष रिडले के भाई, उसकी सगी बहन और उसके अन्य मित्रों को न केवल वह भोगने न दिया जो उन्हें उनके भाई अध्यक्ष रिडले के द्वारा प्राप्त हुआ था, वरन् कुत्ते जैसी नीचता से, सब व्यवस्था और सभ्यता को ताक पर रखकर, बलपूर्वक अत्याचार से उनकी सारी जीविका उनसे छीन ली।
"और इतने से भी सन्तुष्ट न होकर, उसने पूर्वोक्त शिपसाइड की मृत्यु कराने के सब उपाय खोजे, और कहा कि मैं बारह 'धर्मपिता' उसके विरुद्ध खड़े कर दूँगा; और यह सचमुच पूरा हो जाता, जब वह ऑक्सफ़ोर्ड में बन्दी था, यदि परमेश्वर ने उस समय के वॉर्सेस्टर के अध्यक्ष डॉक्टर हीथ के द्वारा उसका छुटकारा दूसरी रीति से न कर दिया होता।
"इससे सब निष्पक्ष और भले पाठक भली-भाँति समझ सकते हैं कि इन दोनों के स्वभावों में कितना बड़ा भेद था। जैसे एक दया और करुणा में श्रेष्ठ था, वैसे ही दूसरा कठोर कृतघ्नता और द्वेषपूर्ण घृणा में उतना ही, या उससे भी अधिक, बढ़ा हुआ था। परन्तु इस विषय में इतना ही बहुत है।"
रिडले के जीवन का अन्तिम दृश्य, अर्थात् 16 अक्टूबर, 1555 को उसकी प्रसिद्ध शहादत, फ़ॉक्स ने ऐसी हृदयस्पर्शी और निपुण सादगी से वर्णित की है कि मैं उचित समझता हूँ कि अपने पाठकों को वह वर्णन शहीद-चरित्र के लेखक के अपने ही शब्दों में दूँ: -
"ऑक्सफ़ोर्ड नगर के उत्तर की ओर, बैलियोल कॉलेज के सामने की खाई में, प्राणदण्ड का स्थान ठहराया गया; और किसी उपद्रव की आशंका से, उनके जलाए जाने में बाधा न पड़े, इसलिए लॉर्ड विलियम्स को रानी के पत्रों द्वारा, तथा नगर के गृहस्थों को, आज्ञा दी गई कि वे पूरी तैयारी के साथ वहाँ सहायक बनकर उपस्थित रहें। और जब सब कुछ तैयार हो गया, तो बन्दियों को महापौर और सिपाही बाहर ले आए।
"मास्टर रिडले एक सुन्दर काला चोगा पहने हुए थे, जिस पर फर लगा था और किनारों पर पशु-रोम की झालर थी — जैसा वे अध्यक्ष होते हुए पहनने के आदी थे; उनके गले में मखमल का, उसी प्रकार फर लगा हुआ पट्टा था, सिर पर मखमल की रात्रि-टोपी थी और उसी के ऊपर कोनेदार टोपी थी; वे खड़ाऊँ-सी चप्पलें पहने हुए, महापौर और एक नगर-पार्षद के बीच में चलते हुए खम्भे की ओर जा रहे थे।
"उनके बाद मास्टर लैटिमर आए, जो ब्रिस्टल के मोटे ऊनी कपड़े का एक साधारण, पूरी तरह घिसा हुआ चोगा पहने थे; सिर पर बटनदार टोपी और रूमाल था, और वे आग के लिए पूरी तरह तैयार थे; उनके मोज़ों के ऊपर से पाँवों तक एक नया लम्बा कफ़न लटक रहा था। यह सब पहली ही दृष्टि में लोगों के हृदयों को उन पर तरस खाने के लिए उभार देता था, क्योंकि एक ओर वे उस सम्मान को देखते थे जो कभी उन्हें प्राप्त था, और दूसरी ओर उस विपत्ति को जिसमें वे अब आ पड़े थे।
"तब मास्टर रिडले ने पीछे मुड़कर देखा तो मास्टर लैटिमर को अपने पीछे आते पाया, और उनसे कहा, 'अरे, क्या आप वहाँ हैं?' मास्टर लैटिमर ने कहा, 'हाँ, मैं जितनी शीघ्रता से हो सके आपके पीछे-पीछे चला आ रहा हूँ।' इस प्रकार वे कुछ दूरी पर पीछे चलते रहे, और अन्त में दोनों एक के बाद एक खम्भे के पास पहुँचे; वहाँ डॉ. रिडले ने पहले उस स्थान में प्रवेश करके अत्यन्त उत्कट भाव से दोनों हाथ ऊपर उठाए और स्वर्ग की ओर देखा। फिर थोड़ी ही देर बाद मास्टर लैटिमर को देखकर वे अद्भुत प्रसन्न मुद्रा के साथ उनकी ओर दौड़े, उन्हें गले लगाया और चूमा; और जो लोग पास खड़े थे उन्होंने बताया कि उन्होंने उन्हें यह कहकर ढाढ़स बँधाया, 'भाई, ढाढ़स रखो, क्योंकि परमेश्वर या तो आग की प्रचण्डता को शान्त कर देगा, या हमें उसे सहने की सामर्थ्य देगा।'
"इसके बाद वे खम्भे के पास गए, उसके निकट घुटने टेके, उसे चूमा और मन लगाकर प्रार्थना की; और उनके पीछे मास्टर लैटिमर ने घुटने टेके और उतनी ही उत्कटता से परमेश्वर को पुकारा। फिर वे उठे और एक-दूसरे से थोड़ी बातें कीं, तब तक जिन्हें दण्ड के निष्पादन की देख-रेख सौंपी गई थी वे धूप से हटकर दूसरी जगह चले गए। उन्होंने क्या कहा, यह मैं किसी से नहीं जान सका।
"स्मिथ नामक एक धर्मत्यागी प्रचारक के उपदेश के बाद, जिसका उत्तर देने की उन्हें अनुमति नहीं दी गई, उन्हें आज्ञा हुई कि वे स्वयं को तैयार करें, और उन्होंने पूरी नम्रता से उसका पालन किया। मास्टर रिडले ने अपना चोगा और पट्टा उतारकर अपने बहनोई मास्टर शिपसाइड को दे दिया, जो उनके बन्दीगृह के सारे समय में, यद्यपि उन्हें उनके पास आने की अनुमति नहीं थी, अपने ही खर्च पर वहीं ठहरे रहे ताकि उनके लिए आवश्यक वस्तुओं का प्रबन्ध करें, जिन्हें वे समय-समय पर उनके रखवाले सार्जेंट के हाथ भेजते थे। उनके कुछ और कपड़े, जो थोड़े ही मूल्य के थे, उन्होंने बाँट दिए; शेष बेलिफ़ों ने ले लिए।
"उसने पास खड़े सज्जनों को और भी कई छोटी-छोटी वस्तुएँ दीं, और उनमें से बहुत से दयनीय रूप से रो रहे थे। सर हेनरी ली को उसने एक नया ग्रोट दिया; और मेरे स्वामी विलियम्स के कई सज्जनों को कुछ रूमाल, कुछ जायफल, और अदरक की गाँठें दीं; अपनी धूप-घड़ी, और जो अन्य वस्तुएँ उसके पास थीं, वे सब अपने पास खड़े हर एक को दीं। किसी ने उसके मोज़ों की डोरियाँ खींच लीं। धन्य था वह जो उसकी कोई चिन्दी भी पा जाता।
"मास्टर लैटिमर ने कुछ न दिया, पर चुपचाप अपने रखवाले को अपने मोज़े और अपने अन्य वस्त्र उतारने दिए, जो देखने में बहुत साधारण थे; और जब वह कफ़न-मात्र वस्त्र में रह गए, तो वहाँ उपस्थित लोगों को वह ऐसे शोभायमान पुरुष दिखे जैसा कोई सहज ही कम देखे; और जबकि अपने वस्त्रों में वह एक सूखे, झुके हुए, दुर्बल बूढ़े दिखाई देते थे, अब वह सीधे तनकर खड़े थे, ऐसे शोभायमान पिता जैसा कोई सहज ही कम देखे।
"तब मास्टर रिडली, जो अब तक अपने कसे हुए वस्त्र में खड़े थे, अपने भाई से बोले, 'मेरे लिए यही अच्छा होगा कि मैं अपने इसी वस्त्र में रहूँ।' 'नहीं,' उनके भाई ने कहा, 'इससे आपको और अधिक पीड़ा होगी; और यह वस्त्र किसी निर्धन के काम आएगा।' इस पर मास्टर रिडली ने कहा, 'ऐसा ही हो, परमेश्वर के नाम में;' और अपने वस्त्र की डोरियाँ खोल दीं। तब केवल कमीज़ में वे उसी पूर्वकथित पत्थर पर खड़े हुए, और अपना हाथ ऊपर उठाकर कहा, 'हे स्वर्गीय पिता, मैं तेरा हार्दिक धन्यवाद करता हूँ, कि तूने मुझे मृत्यु तक अपना अंगीकार करनेवाला होने के लिए बुलाया है। हे प्रभु परमेश्वर, मैं तुझसे विनती करता हूँ, इंग्लैंड के इस राज्य पर दया कर, और इसे इसके सब शत्रुओं से छुड़ा।'
"तब लोहार ने लोहे की एक जंजीर ली, और उसे डॉ. रिडली और मास्टर लैटिमर दोनों की कमर के चारों ओर लपेटा; और जब वह एक कील ठोक रहा था, तो डॉ. रिडली ने जंजीर को अपने हाथ में लेकर हिलाया, क्योंकि वह उनके पेट में कस रही थी, और लोहार की ओर देखकर कहा, 'भले मनुष्य, इसे ज़ोर से ठोक दे, क्योंकि शरीर तो अपनी करके रहेगा।' तब उनका भाई बारूद की एक थैली लाया, और उसे उनकी गर्दन के चारों ओर बाँधना चाहता था। मास्टर रिडली ने पूछा कि यह क्या है। उनके भाई ने कहा, 'बारूद।' 'तो,' उन्होंने कहा, 'मैं इसे परमेश्वर की ओर से भेजा हुआ मानूँगा; इसलिए इसे उसी का भेजा हुआ जानकर ग्रहण करूँगा। और क्या मेरे भाई के लिए भी तुम्हारे पास है?' उनका संकेत मास्टर लैटिमर की ओर था। 'हाँ, श्रीमान, है,' उनके भाई ने कहा। 'तो उसे समय रहते दे दो,' उन्होंने कहा, 'कहीं ऐसा न हो कि तुम बहुत देर से पहुँचो।' तब उनका भाई गया, और उसी बारूद में से मास्टर लैटिमर के पास ले गया।
"तब वे आग से सुलगाई हुई एक लकड़ियों की पूली लाए, और उसे डॉ. रिडली के पाँवों के पास रख दिया। मास्टर लैटिमर ने उनसे इस प्रकार कहा: 'हे मास्टर रिडली, ढाढ़स बाँधो, और पुरुषार्थ दिखाओ। आज हम परमेश्वर के अनुग्रह से इंग्लैंड में ऐसा दीया जलाएँगे, जो, मुझे भरोसा है, कभी बुझाया न जा सकेगा।'
"और जब उन्हें आग लगा दी गई, तो डॉ. रिडली ने आग की लपट को अपनी ओर उठते देखकर आश्चर्यजनक ऊँचे स्वर से पुकारा, 'हे प्रभु, मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों में सौंपता हूँ: हे प्रभु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर।' और इसके बाद इस पिछले भाग को अंग्रेज़ी में बार-बार दोहराया, 'हे प्रभु, हे प्रभु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर;' और मास्टर लैटिमर दूसरी ओर से उतने ही आवेश से पुकार रहे थे, 'हे स्वर्ग के पिता, मेरी आत्मा को ग्रहण कर!' और उन्होंने लपट को ऐसे ग्रहण किया मानो उसे गले लगा रहे हों।
"उसके बाद उन्होंने अपने हाथ से अपना मुँह सहलाया, और मानो अपने हाथों को आग में थोड़ा सा नहलाया, और शीघ्र ही (जैसा दिखाई दिया) बहुत कम पीड़ा से, या बिना पीड़ा के, उनके प्राण निकल गए। और परमेश्वर के इस वृद्ध और धन्य दास, मास्टर लैटिमर, के अन्त के विषय में बस इतना ही; जिनके परिश्रमी यात्रा-कष्टों, फलवन्त जीवन, और दृढ़ मृत्यु के लिए सारे राज्य को सर्वशक्तिमान परमेश्वर का बड़ा धन्यवाद करने का कारण है।
"परन्तु मास्टर रिडली के लिए आग बुरी रीति से लगाई गई थी, क्योंकि लकड़ी की पूलियाँ झाड़ी के चारों ओर रखी गई थीं, और बहुत ऊँची बनाई गई थीं, इसलिए आग पहले नीचे जली, और लकड़ी के कारण दबी रही; जब उन्होंने यह अनुभव किया, तो उन्होंने उनसे मसीह के नाम पर विनती की कि आग को उनके पास आने दें। जब उनके बहनोई ने यह सुना, पर भली-भाँति समझा नहीं, और उन्हें पीड़ा से छुड़ाना चाहा (जिस कारण वह वहाँ सेवा में उपस्थित था), तो ऐसे शोक में पड़े हुए मनुष्य की भाँति, जो भली-भाँति नहीं सोच पाता कि वह क्या कर रहा है, उसने उन पर और पूलियाँ ढेर कर दीं, यहाँ तक कि उन्हें पूरी तरह ढक दिया, जिससे नीचे आग और भी प्रचण्ड हो गई, और उनके निचले अंग पूरी तरह जल गए, इससे पहले कि वह ऊपरी भाग को छूती; और इससे वे पूलियों के नीचे उछल-कूद करते रहे, और बार-बार उनसे विनती करते रहे कि आग को उनके पास आने दें, यह कहते हुए, 'मैं जल नहीं रहा।' और यह सचमुच प्रत्यक्ष हुआ; क्योंकि जब उनकी टाँगें जल चुकीं, तो पीड़ा के कारण उनके छटपटाने से (जिससे उन्हें कोई छुटकारा न था, केवल परमेश्वर में उनका सन्तोष ही था) उन्होंने अपना वह भाग हमारी ओर पूरा कर दिखाया, कमीज़ समेत, लपट से अछूता। फिर भी इस सारी यातना में वे परमेश्वर को पुकारना न भूले, उनके मुँह में यह था, 'हे प्रभु, मुझ पर दया कर,' और बीच-बीच में यह पुकार, 'आग को मेरे पास आने दो, मैं जल नहीं रहा।' इन पीड़ाओं में वे तब तक तड़पते रहे जब तक पास खड़े लोगों में से एक ने अपने हँसिए से ऊपर की पूलियाँ खींच न लीं, और जहाँ उसने आग की लपट उठती देखी, वहाँ वे अपने को उसी ओर मोड़ने लगे। और जब लपट बारूद को छू गई, तो उन्हें फिर हिलते नहीं देखा गया, पर वे दूसरी ओर जलते रहे, और मास्टर लैटिमर के पाँवों पर गिर पड़े; जिसके विषय में कुछ ने कहा कि ऐसा जंजीर के खुल जाने से हुआ; दूसरों ने कहा कि वे अपने शरीर के भार और निचले अंगों की दुर्बलता के कारण जंजीर के ऊपर से गिर पड़े।
"कुछ लोगों ने कहा कि खम्भे से गिरने से पहले उसने उनसे विनती की कि वे अपनी बर्छियों से उसे उस से सटाए रखें। जो भी हो, इस भयानक दृश्य को देखकर सैकड़ों लोग अवश्य रो पड़े; क्योंकि मेरे विचार में ऐसा कोई न था जिसने सारी मनुष्यता और दया को पूरी रीति से त्याग न दिया हो और जो उनके शरीरों पर आग का ऐसा प्रचण्ड रूप देखकर विलाप न करता। चारों ओर शोक के चिह्न थे। कुछ को उनकी मृत्यु देखकर गहरा दुःख हुआ, जिनके जीवन को वे बहुत प्रिय मानते थे; कुछ ने उनके शरीर पर तरस खाया, जो समझते थे कि उनकी आत्मा को इसकी कोई आवश्यकता नहीं। उसके भाई ने, जो उसकी यह दयनीय दशा देख रहा था, बहुत से लोगों को द्रवित किया — मैं कहता हूँ, उसे ऐसी दुर्दशा में पड़ा देखकर, जिसमें उसने सोचा कि उसकी सबसे बड़ी सेवा तभी होगी जब वह उसका अन्त शीघ्र कर दे। कुछ लोग भाग्य को पुकार उठे, कि जिसने उससे सबसे अधिक प्रेम किया और उसके छुटकारे का यत्न किया, उसका वही प्रयत्न उसके अधिक कष्ट और पीड़ा की बढ़ती का कारण बन गया। परन्तु जो कोई उनके बीते दिनों की पदोन्नतियों को, इस राष्ट्र-मण्डल में उनके द्वारा कभी धारण किए गए सम्मान के पदों को, अपने राजाओं की दृष्टि में उनके अनुग्रह को, और जिस विश्वविद्यालय में उन्होंने अध्ययन किया था वहाँ उनकी विद्वत्ता की प्रतिष्ठा को ध्यान में लाता, वह आँसुओं के साथ शोक किए बिना न रह सकता कि इतनी बड़ी गरिमा, सम्मान और प्रतिष्ठा, कभी इतने आवश्यक माने गए सदस्य, इतने भक्तिपूर्ण गुण, इतने वर्षों का अध्ययन और ऐसी उत्कृष्ट विद्या आग में डाल दी गई और एक ही क्षण में भस्म हो गई। अच्छा, वे मर गए हैं, और इस संसार का प्रतिफल उन्हें पहले ही मिल चुका है। स्वर्ग में उनके लिये कौन-सा प्रतिफल रखा है, यह प्रभु की महिमा का वह दिन, जब वह अपने पवित्र लोगों के साथ आएगा, मेरे विश्वास में शीघ्र ही प्रकट कर देगा।"
अब केवल रिडले की रचनाओं का कुछ वर्णन करना शेष है। वे गिनती में थोड़ी हैं, और पार्कर सोसाइटी की श्रृंखला का केवल एक ही खण्ड उनसे भरता है। उनमें मुख्यतः ये हैं: पदार्थान्तरण (ट्रांसब्स्टैंशिएशन) और मूर्तिपूजा के विरुद्ध छोटे ग्रन्थ; लैटिमर और बॉर्न के साथ वार्तालाप; 1549 में संस्कार के विषय में हुआ एक वाद-विवाद; उसकी शहादत से कुछ पहले ऑक्सफ़ोर्ड में हुए वाद-विवाद और परीक्षण; लन्दन के धर्म-प्रदेश के लिये आदेश; और पैंतीस पत्र, जो अधिकतर उसके बन्दीगृह के दिनों में लिखे गए। इतने बड़े धर्मविज्ञानी की ओर से ये साहित्यिक अवशेष भले ही थोड़े हैं, फिर भी वे उसकी लेखनी के योग्य हैं, और हमें यह चाह होती है कि उसने और लिखा होता। परन्तु निस्सन्देह उस योग्य अध्यक्ष के पास लिखने का समय बहुत कम था। परमेश्वर के सत्य के लिये काम करना, प्रचार करना, परामर्श देना, गवाही देना, दुःख उठाना और मरना — यही उसका ठहराया हुआ भाग था। और कौन यह कहने का साहस करेगा कि उसके छोटे जीवन और महिमामय मृत्यु ने इंग्लैंड में मसीह के सत्य के लिये पचास बड़े ग्रन्थों की रचनाओं से अधिक नहीं किया?
मेरा विचार है कि रिडले की रचनाओं से लिये गए ये आगे के उद्धरण रुचिकर लगेंगे।
(1) मेरा पहला उद्धरण रिडले के लैटिमर के साथ वार्तालाप से लिया जाएगा (पार्कर सोसाइटी का संस्करण, पृ. 145):—
"टाइनडेल में, जहाँ मेरा जन्म हुआ, स्कॉटलैंड की सीमा के निकट, मैंने अपने देशवासियों को रात-दिन अपने कवच में पहरा देते देखा है, जैसे भी उनके पास थे, अर्थात् अपनी जैकेटों में और हाथों में भाले लिये (तुम उन्हें उत्तर के गैड्स कहते हो), विशेषकर जब उन्हें स्कॉटों के आने की कोई गुप्त चेतावनी मिलती थी। और ऐसा करते हुए, यद्यपि ऐसी हर झड़प में उनमें से कुछ अपने प्राण गँवा देते थे, फिर भी ऐसे उपायों से वे साहसी पुरुषों की नाईं अपने देश की रक्षा करते थे। और जो इस प्रकार मरे, उनके विषय में मैं समझता हूँ कि परमेश्वर के सामने वे एक अच्छे उद्देश्य के लिये मरे, और उनकी सन्तान और वंशजों को, सारा देश उनके पिताओं के कारण अधिक प्रेम करता था।
"और हमारे उद्धारकर्ता मसीह के उद्देश्य में, उसकी अपनी दिव्य विधियों की रक्षा में, जिनके द्वारा वह हमें जीवन और अमरता देता है, हाँ, विश्वास और मसीही धर्म के उद्देश्य में, जिस पर हमारा अनन्त उद्धार टिका है, क्या हम पहरा न देंगे? क्या हम सदा शस्त्र बाँधे न रहेंगे, यह देखते हुए कि हमारा विरोधी (जो गर्जनेवाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है कि किसे फाड़ खाए) हमारे आलस्य के कारण कब हम पर आ पड़े? हाँ, और हम पर हाय, यदि वह हमें अचानक दबोच ले, जो निस्सन्देह वह करेगा, यदि वह हमें सोता पाए। इसलिये आओ, हम जागें; क्योंकि यदि घर का स्वामी जानता कि चोर किस घड़ी आएगा, तो वह अवश्य जागता रहता और अपने घर में सेंध न लगने देता। इसलिये, मैं कहता हूँ, आओ हम जागें, और अपने घर में सेंध न लगने दें। याकूब कहता है, 'शैतान का साम्हना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।' इसलिये आओ, हम पुरुषार्थ के साथ उसका साम्हना करें, और क्रूस को अपने कन्धों पर उठाकर अपने सेनानायक मसीह के पीछे चलें, जिसने अपने ही लहू से उस मार्ग को समर्पित और पवित्र किया है जो पिता तक, अर्थात् उस ज्योति तक ले जाता है जिसके निकट कोई मनुष्य नहीं पहुँच सकता — अनन्त आनन्द के सोते तक। मैं कहता हूँ, आओ हम उसके पीछे चलें, जहाँ वह हमें बुलाता और खींचता है, ताकि इन क्लेशों के पश्चात्, जो केवल क्षण-भर के हैं और जिनके द्वारा वह हमारे विश्वास को आग में सोने की नाईं परखता है, हम पिता की महिमा में उसके साथ सदा राज्य करें और जय मनाएँ, और यह उसी हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के द्वारा हो, जिसकी, पिता और पवित्र आत्मा के साथ, अब और सदा सारा आदर और महिमा होती रहे। आमीन। आमीन।"
(2) मेरा दूसरा उद्धरण रिडले के लन्दन के धर्म-प्रदेश के लिये 1550 में दिए गए आदेशों से लिया जाएगा। (पार्कर सोसाइटी का संस्करण, पृ. 319):—
"यह आज्ञा दी जाती है कि कोई सेवक प्रभु की मेज़ को चूमकर, सुसमाचार के पश्चात् या प्रभु-भोज ग्रहण करते समय अपने हाथ या उंगलियाँ धोकर, पुस्तक को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाकर, प्रभु-भोज के पश्चात् कटोरे को नीचे रखकर उसे चाटकर, उसके सुदारी या थाल से अपनी आँखों को आशीष देकर, अथवा उसी से अपने सिर पर क्रूस का चिह्न बनाकर, संस्कार ग्रहण करने के पश्चात् अपनी तर्जनियों और अंगूठों को जोड़कर अपने माथे की कनपटियों की ओर रखकर, रोटी या कटोरे पर फूँक मारकर, प्रभु-भोज से पहले 'अग्नुस' कहकर, बाँटने से पहले संस्कार को खुले रूप में दिखाकर या उसे ऊपर उठाकर, पूजा की घण्टी बजाकर, अथवा प्रभु की मेज़ पर कोई दीपक रखकर पोप-मत की मिस्सा की नक़ल न करे। और अन्त में यह कि सेवक प्रभु-भोज के समय केवल उन्हीं रीतियों और मुद्राओं का प्रयोग करे जो सामान्य प्रार्थना की पुस्तक में ठहराई गई हैं, अन्य किसी का नहीं, जिससे उनमें पोप-मत की मिस्सा की कोई नक़ल दिखाई न दे।
"और चूँकि कई स्थानों में कुछ लोग प्रभु की मेज़ को मेज़ के रूप में और कुछ वेदी के रूप में काम में लाते हैं, जिससे अनपढ़ लोगों में मतभेद उत्पन्न होता देखा गया है; इसलिए हम अपने सारे धर्मप्रान्त में भक्तिपूर्ण एकता बनाए रखने की इच्छा से, और इस कारण भी कि मेज़ का रूप भोले लोगों को पोप-मत की मिस्सा की पुरानी अन्धविश्वासी धारणाओं से अधिक फेर सकेगा और प्रभु-भोज के सही प्रयोग की ओर ले जाएगा, यहाँ उपस्थित पादरियों, गिरजे के अभिभावकों और पंचों को समझाते हैं कि वे प्रभु की मेज़ को एक सादी मेज़ के रूप में, उचित रीति से ढककर, गायक-मण्डली के स्थान या वेदी-कक्ष में ऐसी जगह स्थापित करें जो उनके विवेक और आपसी सहमति से सबसे उपयुक्त ठहरे, ताकि सेवक और सहभागी लोगों का स्थान शेष लोगों से अलग रहे; और अन्य सब गौण वेदियों या मेज़ों को हटाकर समाप्त कर दें।"
(3) मेरा तीसरा उद्धरण रिडली के उस पत्र से लिया जाएगा जो उसने बिशप हूपर को लिखा था, जब वे दोनों बन्दीगृह में थे और मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह एक उल्लेखनीय पत्र है, जब हम यह स्मरण करते हैं कि इन दोनों प्रसिद्ध धर्म-सुधारकों में एक समय वस्त्रों के विषय में बहुत मतभेद था। (पार्कर सोसाइटी का संस्करण, पृ. 355): -
"मेरे प्रिय भाई और सहप्राचीन, जिनका मैं प्रभु में आदर करता हूँ, मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे क्षमा करें कि आपकी और मेरी बन्दीदशा के समय से अब तक मैंने आपको अपनी पत्रियों द्वारा नमस्कार नहीं भेजा; यद्यपि मैं मानता हूँ कि आपकी कोमलता के कारण मुझे आपसे अलग-अलग समयों पर दो पत्रियाँ मिलीं, पर वे ऐसे समयों पर मिलीं जब मुझे आपको उत्तर लिखने की अनुमति नहीं थी; और यदि लिख भी पाता, तो मुझे बड़ा सन्देह रहता कि मेरी पत्रियाँ आपके हाथों तक सुरक्षित पहुँचेंगी भी या नहीं। परन्तु अब, मेरे प्रिय भाई, आपके उन कार्यों से, जिन्हें मैंने अब तक केवल ऊपर-ऊपर से ही देखा है, मैं जान गया हूँ कि हमारे धर्म के उन मूल और सारभूत विषयों में, जिनके विरुद्ध संसार आजकल इतने क्रोध से उग्र हो रहा है, हम पूरी तरह एकमत और एकचित्त हैं; यद्यपि बीते समय में धर्म की छोटी बातों और परिस्थितियों में आपकी बुद्धि और मेरी सरलता (मैं मानता हूँ) कुछ बातों में भिन्न रही है: अब, मैं कहता हूँ, आप निश्चित जानें कि मैं पूरे हृदय से (परमेश्वर मेरा साक्षी है) मसीह की ममता में आपसे प्रेम रखता हूँ, और सच्चाई से, उस सत्य के कारण जो हम में बना रहता है, और (जैसा मुझे विश्वास है) परमेश्वर के अनुग्रह से सदा हमारे साथ बना रहेगा। और क्योंकि, हे भाई, मैं देखता हूँ कि संसार अपना खेल खेलना नहीं छोड़ता, और हमारे उद्धारकर्ता मसीह के विरुद्ध पूरी सम्भव शक्ति और सामर्थ्य से व्यस्त होकर षड्यन्त्र रचता है, और परमेश्वर के ज्ञान के विरुद्ध ऊँची बातें खड़ी करता है, इसलिए आइए, हम मसीह में हाथ मिला लें; और यदि हम उन्हें गिरा न सकें, तो भी अपनी सामर्थ्य भर, और जहाँ तक हमसे हो सके, उन्हें हिला दें, शारीरिक नहीं, वरन् आत्मिक हथियारों से; और साथ ही, हे भाई, आइए हम अपने प्रस्थान के दिन के लिए अपने आप को तैयार करें; ताकि इस देह के क्लेश के थोड़े समय के बाद, हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से, हम उसके साथ अनन्त महिमा में जयवन्त हों।"
(4) मेरा अन्तिम उद्धरण मसीह के लिए बन्दी बनाए गए लोगों के नाम रिडले की विदाई पत्री से लिया जाएगा। (पार्कर सोसाइटी का संस्करण, पृ. 425):—
"हम मसीहियों को मृत्यु से क्यों डरना चाहिए? क्या मृत्यु हमें मसीह से वंचित कर सकती है, जो हमारा सारा सुख, हमारा आनन्द और हमारा जीवन है? निश्चय ही नहीं। वरन् इसके विपरीत, मृत्यु हमें इस नश्वर देह से छुड़ाएगी, जो आत्मा पर बोझ डालती और उसे दबाए रखती है, जिससे वह स्वर्गीय बातों को भली-भाँति नहीं समझ पाती; और जब तक हम इसमें रहते हैं, हम परमेश्वर से दूर हैं।
"इसलिए, अपनी दशा को समझते हुए कि हम मसीही हैं, कि यदि हमारी नश्वर देह, जो हमारा पार्थिव घर है, नष्ट हो जाए, तो हमारे पास एक भवन है, एक ऐसा घर जो हाथों से बना नहीं, वरन् स्वर्ग में सदा बना रहनेवाला है, इत्यादि; इसलिए हम ढाढ़स बाँधे रहते हैं, और जानते हैं कि जब तक हम देह में हैं, परमेश्वर से दूर हैं; क्योंकि हम रूप को देखकर नहीं, वरन् विश्वास से चलते हैं। तो भी हम निडर हैं, और देह से अलग होकर परमेश्वर के साथ रहना अधिक चाहते हैं। इसलिए हम यत्न करते हैं, चाहे घर में हों या परदेश में, कि हम सदा उसे प्रसन्न करें।
"और जिसे हमारे उद्धारकर्ता मसीह पर सच्चा विश्वास है, जिसके द्वारा वह कुछ सचमुच जानता है कि हमारा उद्धारकर्ता मसीह कौन है, कि वह परमेश्वर का अनन्त पुत्र है, जीवन है, ज्योति है, पिता की बुद्धि है, सब भलाई है, सब धार्मिकता है, और जो कुछ भी भला है जिसकी हृदय कामना कर सकता है, वरन् इन सब की अपार प्रचुरता है, उससे कहीं अधिक जो मनुष्य का हृदय समझ या सोच सके (क्योंकि उसमें ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है), और यह भी कि वह पिता की ओर से हमें दिया गया है, 'और परमेश्वर की ओर से हमारे लिये बुद्धि, और धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा ठहरा है;' तो मैं पूछता हूँ, ऐसा कौन है जो सचमुच यह विश्वास करे और फिर अपने स्वामी मसीह के साथ होना सहर्ष न चाहे? पौलुस इसी ज्ञान के कारण देह से छूटकर मसीह के साथ होने की लालसा रखता था, क्योंकि वह इसे अपने लिये कहीं उत्तम समझता था, और जीवित रहने से छूट जाना उसे अधिक प्रिय था। इसलिये मसीह के वे वचन, जो उसने क्रूस पर उस चोर से कहे जिसने उससे दया माँगी थी, सान्त्वना और शान्ति से भरे थे: 'आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।' मसीह के सुसमाचार की रक्षा में मरना मसीह के प्रति और अपने पड़ोसी के प्रति हमारा अनिवार्य कर्तव्य है। मसीह के प्रति, 'क्योंकि वह हमारे लिये मरा और फिर जी उठा, कि वह सब का प्रभु हो।' और जब वह हमारे लिये मरा, तो 'हमें भी (यूहन्ना कहता है) अपने भाइयों के लिये अपने प्राण जोखिम में डालने चाहिए, वरन् दे देने चाहिए।' और इस प्रकार देना और खोना सचमुच पाना और जीतना है; क्योंकि जो इस रीति से अपना प्राण देता या खोता है, वह उसे सदा के लिये पाता और जीतता है। 'इसलिये धन्य हैं वे जो प्रभु में मरते हैं;' और यदि वे प्रभु के काम में मरें, तो वे सब से अधिक धन्य हैं।
"इसलिये हम मृत्यु से न डरें, जो हमारी कुछ हानि नहीं कर सकती, केवल एक क्षण के लिये शरीर को पीड़ा पहुँचाती है; क्योंकि हमारा विश्वास, जो परमेश्वर के वचन से दृढ़ता से बँधा और जमा हुआ है, हमें बताता है कि मृत्यु के तुरन्त बाद हम परमेश्वर के हाथों में शान्ति, आनन्द और सान्त्वना में होंगे, और मृत्यु से सीधे जीवन में जाएँगे। क्योंकि यूहन्ना कहता है, 'जो जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक कभी न मरेगा।' और दूसरे स्थान पर, 'वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।' और इसलिये मसीही की इस मृत्यु को मृत्यु नहीं कहना चाहिए, वरन् अनन्त जीवन का द्वार या प्रवेश-मार्ग कहना चाहिए। इसीलिये पौलुस इसे केवल विच्छेद और छुटकारा कहता है; और पतरस और पौलुस दोनों इसे इस तम्बू या निवास-स्थान का उतार देना कहते हैं, जिसका अर्थ नश्वर देह है, जिसमें आत्मा इस जगत में थोड़े समय के लिये वास करती है। वरन् मसीही के लिये इस मृत्यु को सब दुःखों का अन्त कहा जा सकता है। क्योंकि जब तक हम यहाँ जीते हैं, 'हमें बहुत क्लेश उठाकर स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना होगा।' और अब, जब मृत्यु अपना तीर चला चुकी, तो मसीही के सब शत्रु अपना सारा बल लगा चुके, और उसके बाद उनके पास करने को कुछ नहीं रहता। 'धनवान के फाटक पर पड़े' उस बेचारे 'लाज़र' को क्या हानि या चोट पहुँच सकती थी? उसकी पहले की दरिद्रता और कंगाली, उसकी दयनीय भिखारी दशा, और भयानक घाव और रोग? क्योंकि जैसे ही मृत्यु ने उस पर अपना तीर मारा, वैसे ही स्वर्गदूत आकर उसे सीधे अब्राहम की गोद में ले गए। उसने मृत्यु से क्या खोया, जो दुःख और पीड़ा से निकलकर स्वर्गदूतों की सेवा से आनन्द और सान्त्वना के स्थान में पहुँचा दिया गया?
"प्रिय भाइयो, विदा! विदा! और आओ हम सब क्लेशों में, और मृत्यु में भी, परमेश्वर के वचन से अपने हृदय को शान्ति दें: क्योंकि आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु प्रभु का वचन सदा बना रहेगा।
सैमुअल वार्ड
सैमुअल वार्ड, सफ़क का एक प्रसिद्ध पादरी और सत्रहवीं शताब्दी के सबसे विख्यात प्यूरिटनों में से एक, ऐसा व्यक्ति है जिसका नाम अंग्रेज़ी धर्मविज्ञान के अधिकांश पाठकों को अपेक्षाकृत अज्ञात है। इसका कारण सहज ही समझ में आता है। उसने बहुत कम लिखा, और जो लिखा वह हाल ही तक पुनः नहीं छापा गया। ओवेन, बैक्सटर, गर्नल, चार्नॉक, गुडविन, एडम्स, ब्रुक्स, वॉटसन, ग्रीनहिल, सिब्स, जेनकिन, मैंटन, बरोज़, बोल्टन और अन्य के ग्रन्थ पूर्णतः या अंशतः पुनः छप चुके हैं। सैमुअल वार्ड का, जहाँ तक मैं पता लगा सका हूँ, दो सौ से अधिक वर्षों से एक शब्द भी पुनः नहीं छपा। सैमुअल वार्ड के उपदेश इस उपेक्षा के कितने योग्य रहे हैं, यह मैं उन सब धर्मविज्ञान-विद्यार्थियों के निर्णय पर छोड़ता हूँ जिनके हाथ में उसके उपदेश पड़ें। परन्तु मैं यह राय देने का साहस करता हूँ कि पुराने धर्मविज्ञान के पुनः प्रकाशकों की विवेकशीलता पर यह बात कुछ अच्छा प्रभाव नहीं डालती कि वार्ड जैसे लेखक की इतने समय तक अनदेखी की गई। फिर भी उसका मामला अकेला नहीं है। जब स्विननॉक की रचनाएँ, यूहन्ना 1 पर ऐरोस्मिथ, इब्रानियों पर गूज, फिलिप्पियों पर ऐरे, 1 पतरस पर जॉन रॉजर्स, 1 यूहन्ना पर हार्डी, नामान सूरी पर डैनियल रॉजर्स (मैंटन और ब्रुक्स की कुछ सर्वोत्तम कृतियों की तो बात ही छोड़िए) अभी हाल ही में पुनः प्रकाशन के योग्य समझी गईं, तब वार्ड के साथ हुए व्यवहार पर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। सफ़क के एक सेवक और प्यूरिटन धर्मविज्ञान के सच्चे प्रेमी के रूप में, मैं इस जीवनी-लेख में वार्ड के विषय में कुछ जानकारी देना चाहता हूँ। यदि मेरे लिये उसके जीवन और सेवकाई का पूरा वृत्तान्त लिखना सम्भव होता तो मुझे विशेष प्रसन्नता होती। परन्तु मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि जिन सामग्रियों से उसका कोई वृत्तान्त संकलित किया जा सकता है वे अत्यन्त अल्प हैं, और उसके विषय में ज्ञात तथ्य अपेक्षाकृत थोड़े हैं। न ही, दुर्भाग्य से, यही एकमात्र कठिनाई है जिससे मुझे जूझना पड़ा। यह एक अत्यन्त विचित्र बात है कि 'एस.' नाम के कम से कम तीन पादरी हैं।
वार्ड" सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए, और तीनों ही कैम्ब्रिज के सिडनी कॉलेज के सदस्य थे! ये तीनों थे: डॉ. सैमुअल वार्ड, जो सिडनी कॉलेज के प्रधान थे, डॉर्ट की महासभा में इंग्लैंड के आयुक्तों में से एक थे और आर्चबिशप अशर के पत्र-मित्र थे; सेठ वार्ड, जो क्रमशः एक्सेटर और सैलिसबरी के अध्यक्ष हुए; और इप्सविच के सैमुअल वार्ड, जिनके उपदेश अब पुनः छापे जा रहे हैं। इन तीनों में से दोनों "सैमुअल" निःसन्देह सबसे उल्लेखनीय पुरुष थे; परन्तु उनके नामों की समानता के कारण अब तक उनकी जीवनियाँ बड़ी उलझन में पड़ी रही हैं। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि इन सब जमा हुई कठिनाइयों के होते हुए भी मैंने अपनी ओर से पूरा यत्न किया है कि इस उलझे हुए सूत को सुलझाऊँ और पाठक को सही जानकारी दूँ। सैमुअल वार्ड के जीवन की कथा शीघ्र ही कह दी जाती है। उनका जन्म सन् 1577 में सफ़ोक के हैवरहिल में हुआ था, और वे उस नगर में सुसमाचार के सेवक, रेवरेंड जॉन वार्ड के ज्येष्ठ पुत्र थे। सैमुअल वार्ड के पिता जॉन वार्ड एक सेवक और प्रचारक के रूप में बड़ी प्रतिष्ठा के पुरुष प्रतीत होते हैं। फुलर ने (अपनी सफ़ोक की विभूतियाँ नामक पुस्तक में) कहा है कि तीनों पुत्रों की योग्यताएँ मिलकर भी उनके पिता की योग्यता के बराबर न होंगी। हैवरहिल की कलीसिया में उनकी समाधि पर लिखा यह लेख पढ़ने के योग्य है:
योहानेस वार्ड।
Quo si quis scivit scitius, Aut si quis docuit doctius, At rarus vixit sanctius, Et nullus tonuit fortius.
गर्जन का पुत्र, कपोत का पुत्र, उग्र उत्साह से भरा, सच्चे प्रेम से भरा;
सत्य का प्रचार करते हुए, धार्मिकता से जीवन बिताते हुए — वह जलता हुआ दीपक, चमकती हुई ज्योति था।
यहाँ ज्योति। आगे चलकर तारे।
जॉन वार्ड ने आत्मा के बड़े प्रमाण और सामर्थ्य के साथ, और बहुत फल के साथ, सफ़ोक में हेवरिल और बरी में 25 वर्ष तक सुसमाचार का प्रचार किया, और फिर यहाँ अपने पुरखाओं में जा मिला। उसकी विधवा सूसन का विवाह वेदर्सफ़ील्ड के उस योग्य पासबान रोजर्स से हुआ। उसने अपने पीछे तीन पुत्र छोड़े — सैमुअल, नथानिएल और जॉन — जो प्रचारक हैं, और जो अपने तथा अपनों के लिए इससे बड़ी आशीष नहीं चाहते कि वे मसीह के आने तक उसी सुसमाचार पर विश्वास करते और उसका प्रचार करते रहें। हे प्रभु यीशु, आ, शीघ्र आ।
जागते रहो। मृत्यु हमारे लिए जीवन में प्रवेश है। वार्ड।
सैमुअल वार्ड, जिसका यह जीवन-वृत्तान्त है, नवम्बर 6, 1594 को लॉर्ड बर्ले के मनोनयन पर लेडी मार्गरेट की स्थापना के अन्तर्गत कैम्ब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में विद्यार्थी के रूप में भर्ती हुआ, और 1596 में उसी कॉलेज से बी.ए. करके निकला। 1599 में वह सिडनी ससेक्स कॉलेज के प्रथम फ़ेलोज़ में से एक नियुक्त हुआ, 1600 में एम.ए. की उपाधि पाई, 1604 में विवाह होने पर उसकी फ़ेलोशिप छूट गई, और 1607 में उसने बी.डी. की उपाधि पाई। वार्ड के बचपन और युवावस्था के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। उसने सेवकाई के कार्य में कब प्रवेश किया, किस अध्यक्ष ने उसे अभिषिक्त किया, अभिषेक की तिथि क्या थी, और प्रचारक के रूप में उसने मसीह का कार्य पहले कहाँ आरम्भ किया — इन सब बातों का कोई अभिलेख प्रतीत नहीं होता। एक सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में उसका पहला दिखाई देना अपने जन्म-नगर हेवरिल में लेक्चरर के पद पर है। हेवरिल में उसकी सफलता के विषय में सैमुअल क्लार्क (अपनी "प्रतिष्ठित व्यक्तियों की जीवनियाँ", पृ. 154, संस्करण 1683 में), सफ़ोक के केडिंगटन के प्रसिद्ध सेवक सैमुअल फ़ेयरक्लो के जीवन-वर्णन में, यह रोचक उदाहरण देता है: — "परमेश्वर ने प्रसन्न होकर सैमुअल के हृदय में अनुग्रह का कार्य आरम्भ किया।"
फेयरक्लफ को बहुत पहले ही, व्यवस्था के भय से उसके विवेक को जगाकर, उसे सच्चा मन फिराव प्रदान करके और उसमें प्रभावशाली विश्वास उत्पन्न करके; और यह सब श्रीमान सैमुअल वार्ड के प्रचार किए गए परमेश्वर के वचन की सेवकाई द्वारा हुआ, जो उस समय हैवरहिल के व्याख्याता थे। श्रीमान वार्ड ने बपतिस्मा में उसके लिए उत्तर दिया था, और वे सदा उससे हार्दिक प्रेम रखते थे। एक दिन जक्कई के मन फिराव पर प्रचार करते हुए, और लूट-खसोट तथा जबरन वसूली के मामलों में उसके चौगुना लौटाने की चर्चा करते हुए, श्रीमान वार्ड ने यह बात, जो वे प्रायः कहा करते थे, दोहराई कि कोई मनुष्य परमेश्वर से किसी दूसरे की सम्पत्ति के प्रति किए गए अन्याय की क्षमा की आशा नहीं कर सकता, जब तक कि वह उस अन्याय सहे हुए व्यक्ति को, यदि किसी भी प्रकार सम्भव हो, पूरी क्षतिपूर्ति न करे। यह बात परमेश्वर के हाथ से चलाए गए तीर की नाईं युवा फेयरक्लफ के हृदय में लगी, जिसने, जॉन ट्रिग के साथ, जो आगे चलकर लन्दन का एक प्रसिद्ध चिकित्सक हुआ, उससे ठीक पिछले सप्ताह उस नगर के गुडमैन जूड के बगीचे से चोरी की थी, और एक पके नाशपाती के पेड़ के फलों से अपने पेट ही नहीं, अपनी जेबें भी भर ली थीं। "उपदेश के समय और उसके बाद, युवा फेयरक्लफ बहुत शोकित हुआ, और उसे उस पूरी रात नींद नहीं आई; और सोमवार की सुबह उठकर वह अपने साथी ट्रिग के पास गया और उससे कहा कि वह गुडमैन जूड के पास जा रहा है, उसे तीन पैसे की नाशपातियों के अन्याय के बदले क्षतिपूर्ति के रूप में बारह पैसे देने। ट्रिग को डर था कि यदि यह बात जूड से स्वीकार की गई, तो वह उनके स्वामी रोबोथम को इसकी सूचना दे देगा, और शारीरिक दण्ड मिलेगा; इसलिए उसने उस बेचारे बालक को क्षतिपूर्ति के उसके इरादे से हटाने का भरसक यत्न किया। परन्तु फेयरक्लफ ने उत्तर दिया कि जब तक क्षतिपूर्ति न की जाए, परमेश्वर पाप क्षमा नहीं करेगा। इस पर ट्रिग ने यों उत्तर दिया: 'तू मूर्खों की सी बात करता है, सैम; परमेश्वर हमें दस बार क्षमा कर देगा, पर बूढ़ा जूड हमें एक बार भी क्षमा नहीं करेगा।' परन्तु हमारे सैमुअल का विचार कुछ और ही था, इसलिए वह जूड के घर गया, और वहाँ उसे अपने आने का कारण बताया, और उसे एक शिलिंग देने लगा; जूड ने उसे लेने से मना कर दिया (यद्यपि उसने कहा कि उसने उस अन्याय को क्षमा कर दिया), परन्तु उस युवक के घाव में ऐसी पीड़ा बनी रही कि जब तक वह अपने आत्मिक पिता श्रीमान वार्ड के पास न गया और उन्हें अपनी आत्मा की पूरी दशा न बता दी, उसे चैन नहीं मिला; यह इस विशेष पाप के कारण भी था और अनेक अन्य पापों के कारण भी, और विशेषकर पापों के पाप, अर्थात् मूल पाप और अपने स्वभाव के बिगाड़ के कारण। श्रीमान वार्ड ने उसे बड़े स्नेह और कोमलता से ग्रहण किया, और उसके लिए भला सामरी सिद्ध हुए, उसके घावों पर दाखरस और तेल उण्डेलते हुए, उसके सब प्रश्नों का उत्तर देते हुए, उसके भय दूर करते हुए, और उसे यीशु का ऐसा पूर्ण और प्रभावशाली प्रचार सुनाते हुए कि वह सच्चा और निष्कपट मन फिरानेवाला बन गया, और उसने अपने उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाले के प्रति अपने आप को जीवन भर के लिए समर्पित और अर्पित कर दिया।" 1603 में, केवल छब्बीस वर्ष की अल्पायु में, सैमुअल वार्ड हैवरहिल से हटाकर उस समय के एक बहुत महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किए गए। इप्सविच की नगर-परिषद ने उन्हें इप्सविच के नगर-प्रचारक का पद सौंपा, और उन्होंने उस नगर के सेंट मेरी-ले-टावर के मंच को लगभग तीस वर्ष तक, थोड़े ही अन्तराल के साथ, सम्भाला। यह स्मरण रखना चाहिए कि इप्सविच और नॉर्विच ढाई सौ वर्ष पहले आज की तुलना में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान थे। वे इंग्लैंड के दो सबसे धनी और सघन आबादी वाले प्रान्तों के प्रमुख नगर थे। विशेषकर सफ़ोक एक ऐसा प्रान्त था जहाँ धर्म-सुधार के प्रोटेस्टेंट और सुसमाचारीय सिद्धान्तों ने विशेष रूप से गहरी जड़ पकड़ी थी। कुछ सबसे प्रतिष्ठित प्यूरिटन सफ़ोक के सेवक थे। ढाई सौ वर्ष पहले इप्सविच जैसे स्थान का नगर-प्रचारक चुना जाना बहुत बड़ा सम्मान था, और इससे प्रकट होता है कि सैमुअल वार्ड के सेवक-चरित्र का मूल्य इतना ऊँचा आँका गया था, जबकि वे केवल छब्बीस वर्ष के थे। यह उल्लेखनीय है कि मैथ्यू लॉरेंस और स्टीफन मार्शल, जो उनके उत्तराधिकारियों में से थे, दोनों सत्रहवीं शताब्दी के धर्मशास्त्रियों में अग्रणी व्यक्ति थे। इप्सविच में वार्ड का जो प्रभाव था, वह बहुत अधिक प्रतीत होता है। फुलर कहता है, "वह इप्सविच में, या यों कहें इप्सविच का सेवक नियुक्त हुआ, उस घनी आबादी वाले स्थान के सब पल्लियों की देखरेख उसके हाथ में थी, और उन सबसे उसे प्रेम मिला। वास्तव में, उसमें लोगों के स्नेह को खींचने का एक चुम्बकीय गुण था (मानो उसने इसे चुम्बक-पत्थर से सीखा हो, जिसके गुणों का उसे इतना ज्ञान था)।" इप्सविच नगर में उनकी तीस वर्ष की सेवकाई का इतिहास निःसन्देह रोचक विवरणों से भरा होता, यदि हम उन्हें खोज पाते। दुर्भाग्य से, मैं पाठक को केवल ये नीरस तथ्य ही दे सकता हूँ, जो मुझे एक पर्याप्त मूल्यवान पुरातत्त्व-विषयक प्रकाशन में मिले, जिसका शीर्षक है
"वॉडरस्पून की इप्सविच की स्मृतियाँ।" वे स्पष्टतः प्राचीन अभिलेखों से संकलित हैं और वार्ड के जीवन-वृत्तान्त के कुछ बिन्दुओं पर उपयोगी प्रकाश डालती हैं। वॉडरस्पून कहता है — "सन् 1603 में, सब सन्तों के दिन, एक अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यक्ति, श्रीमान् सैमुएल वार्ड, प्रचारक चुना गया। निगम ने उसके साथ बड़ी उदारता का व्यवहार किया प्रतीत होता है; उसके वेतन के लिये सौ मार्क ठहराए गए, और इसके अतिरिक्त मकान के किराये के लिये प्रति तिमाही £6 13s. 4d. भी दिए गए। "नगर के अधिकारियों ने (सम्भवतः इसलिये कि उन्हें इतना योग्य धर्माचार्य मिला था) श्रीमान् वार्ड की नियुक्ति की शर्तें बड़े विस्तार से घोषित कीं। उसकी बीमारी या अनुपस्थिति में उसे यह प्रबन्ध करना था कि सप्ताह में तीन बार नियत स्थान पर कोई सेवक उपलब्ध हो, 'जैसा सदा से होता आया है।' 'वह बिना अनुमति के एक वर्ष में चालीस दिन से अधिक नगर से बाहर न रहेगा; और यदि वह किसी पासबानी का भार स्वीकार करे, तो निगम द्वारा उसकी नियुक्ति रद्द हो जाएगी। उसे दी गई वृत्ति न्यास या चिकित्सालय की भूमि पर नहीं लादी जाएगी।' "राजा जेम्स प्रथम के सातवें वर्ष में निगम ने प्रचारक के लिये, अर्थात् वस्तुतः श्रीमान् वार्ड के लिये, एक मकान खरीदा। यह मकान इस प्रकार खरीदा गया कि नगर ने £120 दिए, और शेष धन स्वेच्छा से दिए गए दान से पूरा किया गया, इस समझौते पर कि जब श्रीमान् वार्ड प्रचारक न रहे, तब भवन फिर बेच दिया जाए, और एकत्र की गई विभिन्न राशियाँ दानदाताओं को, तथा निगम द्वारा अग्रिम दिया गया धन भी, लौटा दिया जाए। "जेम्स प्रथम के आठवें वर्ष में निगम ने श्रीमान् वार्ड का वेतन बढ़ाकर £90 प्रति वर्ष कर दिया, 'यहाँ रहने में उसके होनेवाले व्यय के कारण।' "जेम्स प्रथम के चौदहवें वर्ष में श्रीमान् सैमुएल वार्ड की वृत्ति £90 से बढ़ाकर £100 प्रति वर्ष कर दी गई। "इस धर्माचार्य का प्रचार, जो इतना स्वतन्त्र और प्यूरिटन स्वभाव का था, चुगलखोरों की दृष्टि से अधिक समय तक छिपा न रहा
दरबार की; और कुछ समय बातचीत में बीतने के बाद श्रीमान् वार्ड को उसके पद का कार्य करने से रोक दिया गया। सन् 1623 में, 6 अगस्त को, नगर की बहियों में यह अभिलेख मिलता है कि 'श्रीमान् वार्ड को प्रचार करने से रोकने के लिये राजा का एक पत्र नगर की परिषद् को सौंपा गया है।'" वार्ड के जीवन के शेष भाग के विषय में वॉडरस्पून कोई जानकारी नहीं देता। हम इसके बारे में जो थोड़ा-बहुत जानते हैं, वह अन्य स्रोतों से बीना गया है। हैकेट द्वारा लिखित लॉर्ड कीपर बिशप विलियम्स की जीवनी (पृ. 95, संस्करण 1693) से स्पष्ट है कि यद्यपि 1623 में बिशप हार्सनेट ने उस पर अनुरूपता न मानने का अभियोग चलाया, फिर भी वार्ड को प्रचारक के पद से केवल अस्थायी रूप से ही निलम्बित किया गया, यदि निलम्बित किया भी गया हो। ब्रुक (अपनी "प्यूरिटनों की जीवनियाँ", खण्ड 2, पृ. 452 में), हैकेट का अनुसरण करते हुए, कहता है कि "नॉरविच के धर्माधिकरण में अपने ऊपर अभियोग चलाए जाने पर उसने बिशप के निर्णय के विरुद्ध राजा से अपील की; राजा ने उसके विरुद्ध प्रस्तुत किए गए अभियोगों की जाँच लॉर्ड कीपर विलियम्स को सौंप दी। लॉर्ड कीपर ने बताया कि श्रीमान् वार्ड "पूर्णतः निर्दोष तो नहीं, परन्तु ऐसा व्यक्ति है जिसे भली रीति से व्यवहार करके सरलता से मनाया जा सकता है; और उसने बिशप हार्सनेट को समझाया कि वह उसका समर्पण स्वीकार कर ले और उसे इप्सविच से न हटाए। सच्चाई यह है कि लॉर्ड कीपर ने पाया कि श्रीमान् वार्ड में इतनी सरलता है, और वह कलीसिया के हितों को आगे बढ़ाने के लिये इतना तत्पर है, कि वह ऐसे विद्वान और परिश्रमी धर्माचार्य की कठिनाइयों का समाधान कराए बिना न रह सका। इसलिये वह अभियोग से मुक्त कर दिया गया, और सम्भवतः कुछ समय तक बिना किसी बाधा के शान्तिपूर्वक अपनी सेवकाई करता रहा।" ब्रुक यहाँ हैकेट द्वारा अभिलिखित एक तथ्य और जोड़ सकता था कि वार्ड इंग्लैंड की कलीसिया का ऐसा भला मित्र था कि वह कई ऐसे व्यक्तियों को, जो अनुरूपता के विषय में डगमगा रहे थे, एपिस्कोपल संगति की सीमा के भीतर बनाए रखने का साधन बना। ग्यारह वर्ष की सापेक्ष शान्ति के बाद आर्चबिशप लॉड के उकसाने पर वार्ड पर फिर अनुरूपता न मानने के कथित अभियोग में मुकदमा चलाया गया। प्रिन, लॉड के मुकदमे के अपने वृत्तान्त (पृ. 361) में, हमें बताता है कि सन् 1635 में उस पर उच्च आयोग-न्यायालय में यह अभियोग लगाया गया कि उसने यीशु के नाम पर सिर झुकाने के विरुद्ध, और "खेलों की पुस्तक" के विरुद्ध प्रचार किया, और यह कहा कि "इंग्लैंड की कलीसिया धर्म में परिवर्तन करने को तैयार बैठी है," और "सुसमाचार पंजों के बल खड़ा है, जाने को तैयार।" वह दोषी ठहराया गया; उसे आदेश दिया गया कि न्यायालय जो रूप ठहराए उसी में सार्वजनिक रूप से अपने कथन को वापस ले, और मुकदमे का खर्च भी उसी पर डाला गया। जब उसने कथन वापस लेने से इनकार किया, तो उसे बन्दीगृह में डाल दिया गया, जहाँ वह बहुत समय तक रहा। इस लज्जाजनक घटना के ब्रुक के वृत्तान्त की एक टिप्पणी में, जिसे उसने "रशवर्थ के संग्रह" और वार्टन की "लॉड की विपत्तियाँ" से बटोरा प्रतीत होता है, वह वार्ड के जीवन के इस मोड़ पर एक उल्लेखनीय तथ्य बताता है, जो दिखाता है कि इप्सविच में उसका कितना बड़ा सम्मान था। प्रतीत होता है कि उसके निलम्बन के बाद नॉरविच का बिशप उसके लोगों को उसके स्थान पर दूसरा सेवक देने को तैयार था; परन्तु उन्होंने कहा, "हम श्रीमान् वार्ड को ही लेंगे, नहीं तो किसी को नहीं!"
सैमुएल वार्ड के अन्तिम दिन।
वार्ड के जीवन के अन्तिम चार वर्ष बहुत अपूर्ण रूप से ज्ञात हैं — लॉड द्वारा चुप कराए जाने के बाद रॉटरडैम चले जाना — इप्सविच लौटना — 1639 में टॉवर कलीसिया में दफनाया जाना — उसकी पत्नी का नाम — उसके अन्त्येष्टि-उपदेश का वृत्तान्त — उसके प्रचार का वर्णन — उसके उपदेशों से उद्धरण।
वार्ड के जीवन के अन्तिम चार वर्ष ऐसा विषय हैं जिसमें मुझे सत्य का पता लगाना अत्यन्त कठिन लगता है। ब्रुक कहता है कि बन्दीगृह से छूटने के बाद वह हॉलैंड चला गया और यारमाउथ के प्रसिद्ध इंडिपेंडेंट सेवक विलियम ब्रिज का सहयोगी बन गया, जो रॉटरडैम में बस गया था। वह यह अफवाह भी बताता है कि उसने और श्रीमान् ब्रिज ने अपनी एपिस्कोपल नियुक्ति का त्याग कर दिया और पुनः नियुक्त हुए: "श्रीमान् ब्रिज ने श्रीमान् वार्ड को नियुक्त किया, और श्रीमान् वार्ड ने बदले में यही शिष्टाचार लौटाया।" वह एक और अफवाह जोड़ता है कि वार्ड को रॉटरडैम में उसके पासबानी पद से अन्यायपूर्वक हटा दिया गया, और थोड़े अन्तराल के बाद वह पुनः बहाल किया गया।
मेरा विचार है कि इस वृत्तान्त को कुछ सन्देह की दृष्टि से देखना चाहिए। कम से कम मुझे इस में सन्देह है कि ब्रुक ने जिस घटना का उल्लेख किया है उसके सारे तथ्य हमारे पास हैं। यह बहुत सम्भव है कि जेल से छूटने के बाद वार्ड हॉलैंड चला गया। स्टुअर्ट राजाओं के दिनों में बहुतों को शान्ति और विवेक की स्वतन्त्रता के लिए यही कदम उठाना पड़ा। यह भी मुझे बहुत सम्भव लगता है कि वह रॉटरडम की एक कलीसिया का पासबान था, और ब्रिज उसका सहयोगी था, उन दोनों के बीच मतभेद उठे, और उसे कुछ समय के लिए पद से हटा दिया गया और फिर बहाल कर दिया गया। उसका पुनः अभिषेक मुझे सन्देहास्पद लगता है। एक तो यह मुझे अत्यन्त असम्भव लगता है कि वार्ड जैसी आयु और प्रतिष्ठा का मनुष्य पहले ब्रिज से, जो उससे तेईस वर्ष छोटा था, पुनः अभिषिक्त हो, और फिर स्वयं ब्रिज को पुनः अभिषिक्त करे! दूसरे, यह बहुत विचित्र प्रतीत होता है कि जिस मनुष्य ने अपने एपिस्कोपल अभिषेक का त्याग कर दिया था, उसे सन् 1639 में इप्सविच की एक कलीसिया के मध्य मार्ग में आदरपूर्वक दफनाया गया। केवल एक बात स्पष्ट है। रॉटरडम में वार्ड का ठहराव बहुत लम्बा नहीं हो सकता। वह सन् 1635 तक कारागार में डाला नहीं गया था और 1639 में उसे दफनाया गया। प्रिन के अनुसार वह "बहुत समय तक कारागार में पड़ा रहा।" कम से कम इतने समय तक तो वह वहाँ रहा कि उसने "ए रैप्चर" नामक एक लैटिन रचना लिख डाली, जिसके विषय में स्पष्ट कहा गया है कि वह "गेट हाउस" में उसके कारावास के समय लिखी गई थी। सन् 1638 में हम उसे इप्सविच में एक घर खरीदते हुए पाते हैं। इस हिसाब से स्पष्ट है कि वह हॉलैंड में बहुत लम्बे समय तक नहीं रह सकता था। फिर भी, जहाँ तक वार्ड का सम्बन्ध है, रॉटरडम की सारी घटनाएँ कुछ अन्धकार में लिपटी हुई हैं। सत्रहवीं शताब्दी में प्रमुख प्यूरिटनों के विरुद्ध कहानियाँ आसानी से गढ़ी जाती थीं और लोग उन्हें लालच से निगल लेते थे। ब्रुक का यह कथन कि वार्ड की मृत्यु सन् 1640 के लगभग हॉलैंड में हुई, इतना निराधार है कि वह वार्ड के अन्तिम दिनों के उसके वर्णन के मूल्य को घटा देता है। फिर भी, यदि मान लें कि कारागार से छूटने के बाद वार्ड हॉलैंड गया, तो विश्वास करने का हर कारण प्रतीत होता है कि वह सन् 1638 के आरम्भ में इप्सविच लौट आया। इप्सविच की नगर-पुस्तकों से (वुडरस्पून के अनुसार) प्रकट होता है कि अप्रैल 1638 में उसने नगर की ओर से उसके लिए जुटाया गया घर 140 पाउंड में खरीद लिया, और चन्दा देनेवालों को उनका दिया हुआ धन लौटा दिया। मार्च 1639 के महीने में 62 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई; और उस महीने की 8 तारीख को उसे इप्सविच के सेंट मेरी-ले-टावर में दफनाया गया। पल्ली-पंजिका में उसके दफन की प्रविष्टि की एक प्रमाणित प्रति मेरे पास है। कलीसिया के मध्य मार्ग में उसके जीवनकाल में बिछाए गए एक पत्थर पर ये शब्द (क्लार्क की इप्सविच के इतिहास के अनुसार) अब भी विद्यमान हैं:
"चौकसी कर, वार्ड! थोड़ा ही समय और, और जो आनेवाला है वह आएगा।"
यह माना जाता है कि इसी पत्थर के नीचे उस भले बूढ़े प्यूरिटन प्रचारक की अस्थियाँ रखी गईं; और आज तक इप्सविच में जो लोग उसका नाम जानते हैं वे उसे इसी नाम से याद करते हैं:
"चौकसी वार्ड।"
अब केवल यह जोड़ना शेष है कि वार्ड ने सन् 1604 में कैम्ब्रिज के इस्लेहम की डेबोरा बोल्टन नामक एक विधवा से विवाह किया, और उससे उसके परिवार हुआ। इप्सविच की नगर-पुस्तकों में दर्ज यह एक रोचक तथ्य है कि उसकी मृत्यु के बाद आदर-चिह्न के रूप में उसकी विधवा और उसके ज्येष्ठ पुत्र सैमुएल को जीवन भर वही वृत्ति मिलती रही जो उनके पिता को मिलती थी, अर्थात् प्रतिवर्ष 100 पाउंड। यह भी उल्लेखनीय है कि उसके दो भाई थे जो सेवक थे, जॉन और नैथनियल। जॉन वार्ड इप्सविच के सेंट क्लेमेंट्स के रेक्टर रहकर ही जिया और मरा; और उस कलीसिया में उसके विषय में एक पट्टिका और छोटा सा अभिलेख है। नैथनियल वार्ड हर्ट्स के स्टैंडन का सेवक था, सन् 1634 में अमेरिका गया, सन् 1646 में इंग्लैंड लौटा, और सन् 1653 में एसेक्स के शेनफील्ड में उसकी मृत्यु हुई। वार्ड का एक उत्तम चित्र इप्सविच में अब भी विद्यमान है, जो वकील श्री हंट के पास है। उसमें वह दाहिने हाथ में खुली पुस्तक लिए, गले में झालरदार कॉलर पहने, नुकीली दाढ़ी और मूँछों सहित दिखाया गया है। एक ओर तट पर जलती हुई चेतावनी-ज्योति है; और एक अभिलेख है -
"चौकसी वार्ड।"
निम्नलिखित अंश, जो "द टॉम्बस्टोन; अर्थात् सफ़ोक के ब्रैम्फ़ोर्ड और बेल्स्टेड के पासबान, उस योग्य जन श्री जॉन कार्टर का एक संस्मरण और अपूर्ण स्मारक" (1653) नामक एक दुर्लभ ग्रन्थ से लिया गया है, सम्भवतः यहाँ सम्मिलित करने योग्य समझा जाएगा, क्योंकि यह इस बात का आकस्मिक प्रमाण है कि इप्सविच के आस-पास के क्षेत्र में वार्ड का कितना ऊँचा सम्मान था। यह ग्रन्थ श्री कार्टर के पुत्र ने लिखा था; और यह अंश उनके पिता के अन्तिम संस्कार के समय घटी बात का वर्णन करता है। वह कहता है (पृष्ठ 26, 27 पर), "4 फ़रवरी, 1634 की दोपहर के बाद, मेरे पिता को मिट्टी देते समय, आस-पास के सब स्थानों से लोगों की बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई थी, और सेवक तथा अन्य लोग इस्राएल के राजा योआश का वह वचन दोहरा रहे थे, 'हे मेरे पिता! हे मेरे पिता! इस्राएल के रथ और उसके सवार!' वृद्ध श्री सैमुएल वार्ड, वह प्रसिद्ध धर्मशास्त्री और इप्सविच की शोभा, अन्तिम संस्कार में आए, अपने साथ शोक का चोगा लाए, और यह देखकर कि ऐसे अवसर पर इतनी बड़ी मण्डली इकट्ठी हुई है, बड़े आदर के साथ अन्तिम संस्कार का उपदेश देने का प्रस्ताव रखा। परन्तु मेरी बहन और मैं इसकी अनुमति देने का साहस न कर सके; क्योंकि हमारे पिता ने अपने जीवनकाल में बार-बार हमें आज्ञा दी थी, और अपने आशीर्वाद की शपथ देकर कहा था, कि उनके गाड़े जाने के समय कोई सभा न हो। 'क्योंकि,' उन्होंने कहा था, 'इससे मेरे विषय में कुछ अच्छी बातें कहने का अवसर मिलेगा जिनके योग्य मैं नहीं हूँ, और इस प्रकार इस मंच से झूठी बातें कही जाएँगी।' श्री वार्ड सन्तुष्ट हो गए और रुक गए। परन्तु अगले शुक्रवार को इप्सविच में उन्होंने अपना पूरा व्याख्यान मेरे पिता के अन्तिम संस्कार का उपदेश बना दिया, जिसमें उन्होंने उनके लिए शोक भी किया और उनका सम्मान भी किया, जिससे सारी श्रोता-मण्डली को बड़ा सन्तोष हुआ।" मैंने अब सैमुएल वार्ड के जीवन के विषय में जो कुछ मैं खोज सका, वह सब एक स्थान पर रख दिया है। मुझे सच्चे मन से खेद है कि कुल मिलाकर यह इतना थोड़ा है, और उनके विषय में दर्ज तथ्य इतने कम हैं। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वार्ड के जीवन का सर्वोत्तम भाग सफ़ोक में बीता, और वे अपने प्रिय सेंट मेरी-ले-टावर, इप्सविच के मंच को शायद ही कभी छोड़ते थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अपनी ख्याति के कारण वे अपने ही प्रान्त की सीमाओं के बाहर भी भली-भाँति जाने जाते थे। 1616 में सेंट पॉल क्रॉस पर प्रचारक के रूप में उनका चुना जाना इसका प्रमाण है। परन्तु यह मान लेना व्यर्थ है कि किसी प्रान्तीय नगर में जीने और मरनेवाले प्रचारक की ख्याति, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसके पीछे बहुत समय तक बनी रहेगी। जीवनी का विषय बनने और अपने जीवन के तथ्यों को निरन्तर लिखे जाते देखने के लिए मनुष्य को किसी महानगर में रहना पड़ता है। वार्ड के भाग्य में यह नहीं था; और इसी कारण दो सौ वर्ष बीतने पर हम उनके विषय में बहुत कम जानते प्रतीत होते हैं। अब केवल वार्ड के उपदेशों और ग्रन्थों के विषय में कुछ कहना शेष है, जो हाल ही में पहली बार पुनर्मुद्रित हुए हैं और आधुनिक धर्मशास्त्र-पाठक के लिए सुलभ किए गए हैं। यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि ये पुनर्मुद्रण वार्ड की सम्पूर्ण रचनाओं को सम्मिलित नहीं करते। इन उपदेशों और ग्रन्थों के अतिरिक्त, उन्होंने येट्स के साथ मिलकर मॉन्टेग्यू की प्रसिद्ध पुस्तक "अपेलो सीज़रेम" का उत्तर लिखा था। यह मानने का भी कारण है कि उन्होंने इनके अतिरिक्त एक-दो और अलग उपदेश प्रकाशित किए थे जो अब पुनर्मुद्रित नहीं हुए। फिर भी मुझे लगता है कि इसमें कम ही सन्देह हो सकता है कि जो नौ उपदेश और ग्रन्थ हाल ही में श्री निकोल द्वारा पुनः प्रकाशित किए गए हैं, वे ही सैमुएल वार्ड की एकमात्र रचनाएँ हैं जिन्हें पुनर्मुद्रित करना सार्थक होता, और सम्भवतः वे ही एकमात्र रचनाएँ हैं जिनके पुनः प्रकाशित होने की इच्छा वे स्वयं करते। इन उपदेशों की गुणवत्ता के विषय में अब पढ़नेवाली जनता अपनी राय बना सकेगी। बीते समय में इन्हें बहुत ऊँचा समझा गया था, और अत्यन्त योग्य निर्णायकों की सराहना इन्हें मिली है। फ़ुलर साक्षी देता है कि वार्ड में "एक पवित्र की हुई कल्पना-शक्ति थी, जो अर्थपूर्ण चित्र रचने में कुशल थी और थोड़े-से ढाँचे में बहुत-सा विषय प्रस्तुत कर देती थी।" डॉड्रिज कहता है कि वार्ड की "रचनाएँ आरम्भ से अन्त तक पढ़ने योग्य हैं। उनकी भाषा सामान्यतः उचित, सुरुचिपूर्ण और सशक्त है। उनके विचार भली-भाँति पचाए हुए और सुखद रीति से स्पष्ट किए हुए हैं। उनमें व्यंग्य और चुटीलेपन की अनेक उल्लेखनीय धाराएँ हैं। भाषा-अलंकारों के अनेक साहसिक प्रयोग उनमें मिलते हैं, जो किसी भी अंग्रेज़ लेखक में नहीं मिलते, विशेषकर सम्बोधन, चेतन-आरोपण, संवाद और रूपक।" यह प्रशंसा पहली दृष्टि में अतिशयोक्ति लग सकती है। फिर भी, यदि जो लोग वार्ड की रचनाएँ पढ़ने का कष्ट उठाएँ वे इसे भली-भाँति उचित न समझें, तो मुझे निराशा होगी। सैमुएल वार्ड के प्रति न्याय की दृष्टि से उनकी रचनाओं के पाठकों को यह स्मरण दिला देना भी उचित है कि अब पुनर्मुद्रित नौ उपदेशों और ग्रन्थों में से कम-से-कम तीन मूल रूप में प्रकाशन के उद्देश्य से रचे नहीं गए थे। "वेदी से एक अंगारा," "विवेक को स्वस्थ करने के लिए गिलाद का बलसान," और "यित्रो का शान्ति-न्यायाधीश" शीर्षक वाले उपदेश ऐसे प्रतीत होते हैं जिन्हें मित्रों और सम्बन्धियों ने छापाखाने तक पहुँचाया। इनमें उन रचनाओं के सभी लक्षण हैं जो आँखों के लिए नहीं बल्कि कानों के लिए, पाठकों के लिए नहीं बल्कि श्रोताओं के लिए बनी हों। फिर भी मैं कहने का साहस करता हूँ कि सब नौ में से ये तीन वार्ड के वरदानों और सामर्थ्य के सबसे प्रभावशाली उदाहरणों में से हैं। विशेषकर विवेक पर उपदेश का उपसंहार मुझे अंग्रेज़ी भाषा में पढ़े गए किसी भी उपदेश के सबसे सामर्थी और प्रभावशाली समापनों में से एक लगता है। वार्ड के उपदेशों का सिद्धान्त सदा पूरी तरह सुसमाचारीय है। वे मन फिराव के विषय में कभी उस अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा में नहीं पड़ते जो कुछ प्यूरिटनों की रचनाओं को कुरूप बना देती है। वे हमें धर्मशास्त्र के उन लम्बे, पवित्रशास्त्र से परे, व्यवस्थित कथनों से कभी नहीं थकाते जो औरों के पन्नों को अन्धकारमय कर देते हैं। वे सदा सीधे विषय पर रहते हैं, सदा धर्मविज्ञान की मुख्य बातों के विषय में, और सामान्यतः अपने पाठ पर टिके रहते हैं। प्रभु यीशु मसीह को यथासम्भव सबसे ऊँचा उठाना, मनुष्य के घमण्ड को गिराना, पाप की पापमयता को प्रकट करना, सुसमाचार के उपाय को चौड़ाई और पूर्णता से फैलाकर रखना, अपरिवर्तित पापी को जगाना और चेताना, सच्चे मसीही को सुदृढ़ करना और उसे शान्ति देना, — ये ही वे उद्देश्य प्रतीत होते हैं जो वार्ड ने अपने हर उपदेश में अपने सामने रखे। और क्या वे सही नहीं थे? कलीसियाओं के लिए कितना भला होता यदि हमारे पास उन जैसे और प्रचारक होते! वार्ड के उपदेशों की शैली सदा अत्यन्त सरल है। उदाहरणों में असाधारण रूप से समृद्ध, — अपने विषय पर निरन्तर दैनिक जीवन को लगाते हुए, — मानवीय विद्या के सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने स्वामी की सेवा में खींचते हुए, — सृष्टि की हर वस्तु से अलंकार और उपमाएँ उधार लेते हुए, — परिचित भाषा का प्रयोग करने से न डरते हुए जिसे सब समझ सकें, — अपने वाक्यों को इस प्रकार गढ़ते हुए कि एक अनपढ़ मनुष्य भी सरलता से उनका अनुसरण कर सके, — साहसी, सीधे, उत्साही, नाटकीय, और ऐसे बोलते हुए मानो परमेश्वर के सिवा किसी से न डरते हों, — वे ठीक वही व्यक्ति थे जो ध्यान खींच सके और खींचने के बाद उसे बनाए रखे, लोगों को सोचने पर विवश करे, और उन्हें फिर से उनकी सुनने के लिए उत्सुक बना दे। उनकी अनेक उक्तियों में निस्सन्देह अनोखापन है। परन्तु उन्होंने ऐसे युग में प्रचार किया जब सभी अनोखे थे, और उनका अनोखापन सम्भवतः किसी को विशेष नहीं लगा। रुचि में वे निस्सन्देह दोषपूर्ण हैं। परन्तु कोई ऐसा लोकप्रिय प्रचारक कभी नहीं हुआ जिस पर यही आरोप न लगा हो। फिर भी उनके दोष उनकी उत्कृष्टताओं के सामने कुछ भी नहीं थे। एक बार फिर मैं कहता हूँ, कलीसियाओं के लिए कितना भला होता यदि हमारे पास उन जैसे और प्रचारक होते! वार्ड के उपदेशों की भाषा पर बिना टिप्पणी किए आगे बढ़ जाना उचित नहीं। मैं कहने का साहस करता हूँ कि सत्रहवीं शताब्दी की बहुत कम रचनाओं में इतने रोचक, पुराने ढंग के और सशक्त शब्द मिलेंगे जितने वार्ड के उपदेशों में। इनमें से कुछ शब्द दुर्भाग्य से अप्रचलित हो गए हैं और जन-साधारण के लिए अबोधगम्य हैं, जो अंग्रेज़ी साहित्य की बड़ी हानि है। मैं अपनी यह तीव्र आशा प्रकट किए बिना नहीं रह सकता कि पुनर्प्रकाशन की यह योजना, जो श्री निकोल के कारण अस्तित्व में आई है, उस सफलता को पाए जिसकी वह अधिकारी है, और सैमुएल वार्ड जैसे लोगों की रचनाएँ पूरे देश में पढ़ी और बाँटी जाएँ। मैं यह प्यूरिटन धर्मशास्त्रियों के निमित्त चाहता हूँ। ग्रेट ब्रिटेन में हम पर उनका एक ऐसा ऋण है जो अभी तक पूरी तरह चुकाया नहीं गया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिस आदर के वे अधिकारी हैं वह उन्हें इसीलिए नहीं मिलता क्योंकि वे बहुत कम जाने जाते हैं।
मैं यह अपने ही देश की प्रोटेस्टेंट कलीसियाओं के लिए, हर नाम और हर सम्प्रदाय की कलीसियाओं के लिए चाहता हूँ। इससे इनकार करना व्यर्थ है कि मसीही विश्वास के लिए हम कठिन परीक्षा के समय में आ पड़े हैं। अत्यन्त भयावह प्रकार की झूठी शिक्षाएँ उन स्थानों में फैलाई जा रही हैं जहाँ उनकी सबसे कम आशा थी। धर्मविज्ञान के जो सिद्धान्त कभी पूरी तरह स्थापित माने जाते थे, उन्हें अब संदिग्ध विषय कहा जाता है। ऐसे समय में मेरा विश्वास है कि कुछ महान प्यूरिटन धर्मविज्ञानियों का अध्ययन, परमेश्वर की कृपा से, भलाई करने और इस महामारी को रोकने के लिए अत्यन्त उपयुक्त है। मैं इस अध्ययन की सिफ़ारिश विशेष रूप से सब युवा सेवकों से करता हूँ। यदि वे जानना चाहते हैं कि सामर्थी मन और प्रबल बुद्धि गहन धर्मवैज्ञानिक विषयों पर कैसे विचार कर सकते हैं, निश्चित निष्कर्षों तक कैसे पहुँच सकते हैं, और फिर भी बाइबल के प्रति पूर्ण श्रद्धा कैसे रख सकते हैं, तो वे प्यूरिटन धर्मविज्ञान को पढ़ें।
मुझे भय है कि यह पढ़ने का युग नहीं है। बड़ी पुस्तकों के पढ़े जाने की तो विशेषकर बहुत कम आशा रहती है। हड़बड़ी, छिछलापन और भाग-दौड़ हमारे समय की पहचान हैं। आजकल के उपदेशों की मुख्य विशेषताएँ प्रायः दुर्बलता, दुबलापन और उथलापन ही होती हैं। फिर भी, वर्तमान बुराइयों को रोकने के लिए कुछ प्रयत्न तो करना ही होगा। कलीसियाओं को स्मरण दिलाना होगा कि गहरे विचार के बिना कोई सचमुच सामर्थी प्रचार नहीं हो सकता, और कठिन अध्ययन के बिना गहरा विचार नहीं हो सकता। हमारे सर्वोत्तम प्यूरिटन धर्मशास्त्रियों के ग्रन्थों का पुनः प्रकाशन मैं कलीसिया और संसार के लिए एक निश्चित वरदान मानता हूँ, और हृदय से परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह इसे सफल करे। वार्ड के उपदेशों से लिए गए ये अंश कदाचित् यह कुछ आभास दे सकें कि यह प्रसिद्ध धर्मशास्त्री एक प्रचारक के रूप में कैसा था। पहला अंश "मसीह सब में सब है" नामक उपदेश से है। — "वह हमारे सब विचारों और वचनों में सब कुछ हो। कितना धन्य होता यदि वह कभी हमारी दृष्टि और मन से दूर न होता, वरन् हमारी आत्माएँ उसी की ओर मुड़ी रहतीं और उसी पर टिकी रहतीं, जैसे सूरजमुखी सूर्य की ओर, लोहा चुम्बक की ओर, और चुम्बक ध्रुवतारे की ओर। क्या उसने इसी उद्देश्य से अपने आप को सब परिचित और सामने की वस्तुओं के समान नहीं ठहराया: ज्योति के समान, कि जितनी बार हम आँखें खोलें उसे निहार सकें; रोटी, जल और दाखरस के समान, कि हर भोजन में हम उसी का आहार करें; द्वार के समान, कि हर आते-जाते समय हम उसे स्मरण रख सकें? कितना धन्य होता यदि हमारी जीभें सदा उसी नाम पर चलतीं, जो मुँह में मधु, कान में संगीत और हृदय में आनन्दोत्सव है। नाविक को पवनों की बातें करने दो, व्यापारी को अपने लाभ की, किसान को अपने बैलों की। तू सारे संसार के लिए पाइथागोरस का शिष्य और मसीह के लिए पेरिपैटेटिक बन; सब व्यर्थ बातों के लिए मौन, और केवल मसीह के लिए, जिसने मनुष्य को जीभ और वाणी दी, वाक्पटु। पौलुस को इसे लिखने में कैसा आनन्द आता है, और दस पदों में ग्यारह बार इसी की धुन बजाता है, जिसे सबसे पहले क्रिसोस्टम ने देखा। (1 कुरिन्थियों 1:10।) और योग्य फॉक्स को कैसा दुःख होता है कि वह उस बात को पहले से देखे और बताए जिसे हम अब घटित होते सुनते और देखते हैं, कि मनुष्यों की बातचीत तुच्छ और निरर्थक विषयों में लग जाएगी, मानो सारा धर्म किसी एक परिस्थिति या मत के पीछे भागने और उससे बचने में निहित हो; वह कितने हृदय से प्रार्थना करता और कितनी उत्कटता से चाहता है कि मनुष्य रीति-विधियों पर झगड़ना छोड़ दें, और अपनी बातचीत उस पर लगाएँ जो सार-तत्त्व है; कि विद्वान मसीह के विषय में लिखें, अनपढ़ लोग उसका अध्ययन करें, और प्रचारक उसी को अपने सारे प्रचार का लक्ष्य और विषय बनाएँ। और वास्तव में हमारी सेवकाई और क्या है, सिवाय इसके कि हम रोमी पुरोहितों के समान रोटी का एक टुकड़ा नहीं, वरन् अपने सिद्धान्त में मसीह को ऊँचा उठाएँ; प्रसव-पीड़ा सहते रहें जब तक कि वह किसी जाति में रूप न धारण कर ले, और उसकी मृत्यु और दुःख-भोग का जीवन्त प्रचार करके उसे उनकी आँखों के सामने क्रूस पर चढ़ाएँ। सन्त क्रिस्टोफर का पुराना प्रतीक उत्तम है, जो प्रचारक को ऐसा दिखाता है मानो वह इस संसार के समुद्र में से चलता हुआ, विश्वास की लाठी का सहारा लिए, मसीह को ऊँचा उठाए हुए है कि मनुष्य उसे देखें। यूहन्ना ने 'धर्मविज्ञानी' की उपाधि, और पौलुस ने बुद्धिमान राजमिस्त्री की, और किस कारण पाई, सिवाय इसके कि उसने, जैसा आजकल का चलन है, अपने पठन, स्मरणशक्ति और वक्तृत्व की नहीं, वरन् मसीह के जाने जाने और उसी के क्रूस पर चढ़ाए जाने की चिन्ता की, और इस चट्टान पर नींव डालकर कलीसिया को कुशलता से बनाया; और यदि हम चुप रहें तो चट्टानें ही पुकार उठेंगी। मसीह की सहायता से मसीह का सुसमाचार मसीह की स्तुति के लिए सुनाना ही हमारी कला और कर्तव्य का सार है; उसके बिना उपदेश उपदेश नहीं, और प्रचार प्रचार नहीं। "सारों का सार यह है कि सब मनुष्यों का पूरा कर्तव्य यह है कि वे अपने आप को पूरी रीति से मसीह को सौंप दें; एक टाँग, या एक भुजा, या कोई और अंग नहीं, वरन् आत्मा, प्राण और शरीर, और जो कुछ हमारे भीतर है, चर्बी, अंतड़ियाँ, सिर और खुर, सब कुछ उसके लिए सर्वांग-होम की भेंट के रूप में चढ़ाएँ, अपने जीवन के सब दिन और घड़ियाँ उसी की सेवा में समर्पित और अर्पित करें, कि हमारे सब दिन प्रभु के दिन हों। और जब हम ऐसा कर चुकें, तब भी हमें जानना चाहिए कि हमने उसे उसके अधिकार से उतना ही कम दिया है जितने कीड़े और अभागे पापी हम परमेश्वर के पुत्र से, जो पाप से अनजान था, छोटे हैं। इसलिए हम उसी के लिए जीएँ, और उसी के लिए मरें। हम उसी के लिए ऐसे जीएँ कि उसी में मरें, और अपने प्राण बड़ी प्रसन्नता से उसके हाथों में सौंप दें, उसी भाव से जैसे अलेक्जेंड्रिया के यूहन्ना ने, जिसे उसकी उदारता के कारण दानाध्यक्ष कहा जाता था, किया बताया जाता है; जब उसने अपना सब कुछ कंगालों में बाँट दिया, और अपनी आय का हिसाब चुकता कर लिया, जैसा कि वह अपनी सर्वोत्तम स्वास्थ्य-अवस्था में प्रतिवर्ष किया करता था, तो उसने परमेश्वर का धन्यवाद किया कि अब उसके पास अपने प्रभु और स्वामी मसीह के सिवाय कुछ नहीं बचा, जिसके साथ रहने की उसे लालसा थी, और जिसके पास अब वह बिना चिपकी और बिना उलझी पंखों से उड़ जाएगा: या जैसे पुराने समय में पतरस और बाद के समय में लैम्बर्ट ने थोड़े शब्दों में कहा, 'मसीह के सिवाय कुछ नहीं, मसीह के सिवाय कुछ नहीं।'" (वार्ड के उपदेश, पृ. 10। निकोल का संस्करण।) दूसरा अंश विवेक पर एक उपदेश से है, जिसका शीर्षक "गिलाद का बलसान" है। — "हे विवेको! सुनो, प्रभु का वचन सुनो। मैं आज तुम्हें साक्षी ठहराता हूँ कि हमारे उपदेशों को फिर से सुनाना तुम्हारा कार्य है, नहीं तो हमारे सब उपदेश और परिश्रम व्यर्थ हैं। तुम आत्मा की जुगाली हो, जिसे फिर से चबाना है। तुम्हारी डाँट के विरुद्ध, और तुम्हारी गुप्त और विश्वासयोग्य चेतावनियों के विरुद्ध कोई क्या आपत्ति कर सकता है? तुम्हारा बलसान बहुमूल्य है; तुम्हारे प्रहार सिर नहीं फोड़ते, न कोई अपमान लाते हैं। परमेश्वर ने तुम्हें एकान्त और अकेलेपन में आश्चर्यकर्म करने की सामर्थ्य दी है। इसलिए उनके पीछे घर तक जाओ, उनके कानों और हृदयों में ऊँचे स्वर से पुकारो, और जो कुछ अभी और अन्य समयों में सुनाया गया है उसे लागू करो। "हे विवेक, यदि वह घर और उसका स्वामी, जहाँ तू रहता है, शान्ति का पुत्र हो, तो तेरी शान्ति और तेरे स्वामी की शान्ति उस पर ठहरी और बनी रहे; वह शान्ति जिसे संसार न जानता है, न दे सकता है, न छीन सकता है। तू कृपालु और दयालु हो, भली बातें कह, अनुग्रह की छोटी से छोटी चिंगारी और धुएँ को सँजोकर रख; यदि तू सच्चाई और सब बातों में अभिलाषा पाए, तो उनसे कह कि वे अपने चुने जाने और बुलाए जाने के विषय में न डरें, न सन्देह करें। जो ईमानदारी से चलना चाहते हैं उनके साथ तू सांत्वना देता हुआ चल। कोमल और डरपोक लोगों के साथ कोमलता और मधुरता से व्यवहार कर; उनके साथ कठोर और निर्दय न हो। टूटे मनवालों के घाव बाँध। उनसे कह, तू क्यों इतना व्याकुल और उदास है? जब तू उन्हें हानियों और कष्टों के कारण उदास देखे, तो उनसे प्रसन्न होकर कह, जैसे एल्काना ने हन्ना से कहा, 'तुझे किस बात की घटी है? क्या मैं तेरे लिए हज़ार मित्रों, पत्नियों और बच्चों के समान नहीं हूँ?' "उनकी पीठ थपथपा, भलाई करने में उनका हियाव बढ़ा, आगे बढ़ने के लिए उन्हें उकसा; हाँ, उन्हें उत्कृष्टता के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा, और तब उनकी सराहना कर। पृथ्वी के उत्कृष्ट लोगों में आनन्दित हो। "अन्धों और सन्देह करनेवालों के लिए ज्योति बन। "मन्दों की पसलियों में अंकुश बन। "सोनेवालों और स्वप्न देखनेवालों के लिए न्याय की चेतावनी और तुरही बन। "परन्तु कपटी को तो पित्त के समान जला और उसके हृदय में चुभा। वह भली-भाँति जान ले कि तू उसके भीतर परमेश्वर का भेदिया, एक गुप्त संवाददाता है, और परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहेगा। "कपटी से कह कि वह 'सब बातों में' चले। "सभ्य मनुष्य से कह कि वह प्रेम के साथ भक्ति भी जोड़े। "डगमगाने वाले, अस्थिर और स्वेच्छाचारी से कह कि वह 'स्थिरता से चले।' "गुनगुने और नाममात्र के प्रोटेस्टेंट से कह कि वह लज्जा के कारण सुधरे, उत्साही हो, और 'ईमानदारी से चले।' "परन्तु बलियाल के पुत्रों, अर्थात् अधर्मी ठट्ठा करनेवालों के साथ तो कठोरता से चल, उनका पीछा कर और उन्हें सता, जब तक वे मन न फिराएँ उन्हें चैन न दे, उनके लिए कड़वाहट का पित्त बन। जब वे छककर पी रहे हों, तब उनके साथ वैसा कर जैसा अबशालोम के सेवकों ने अम्नोन के साथ किया, उसके हृदय में कटार भोंक दे। फिर भी स्मरण रख कि जब तक कोई आशा है, तेरा कार्य मसीह की ओर ले जानेवाला शिक्षक बनना है, घायल करना और मारना केवल इसलिए कि वे मसीह में जीएँ, उन्हें डराना और भयभीत करना उतना नहीं जितना उसकी ओर ले जाना; और इसी उद्देश्य से समय और असमय तत्पर रह, कि वे विश्वास करें और मन फिराएँ। "परन्तु यदि वे सुनने से इन्कार करें, और तेरे विरुद्ध, और पवित्र आत्मा के विरुद्ध भी पाप करें, तो अपने पाँवों की धूल झाड़ दे, और या तो समय से पहले उन्हें यातना देने और निराशा में धकेलने लग; या यदि तू यहाँ उन्हें चैन दे, तो उनसे कह कि सुनवाई के दिन तू उनके गले पड़ेगा, जब तुझे बोलना है और उन्हें सुनना है। "हे विवेक, तुझे राजाओं के कक्षों और मन्त्रणा-सभाओं में जाने का अधिकार मिला है; उनकी मन्त्रणा में एक विश्वासयोग्य मनुष्य बन। हाय, यदि वे मसीही जगत् के सब दरबारों में नीति को तेरे नीचे रखते, और तुझे अपनी सभाओं का अध्यक्ष बनाते, और तेरी वाणी सुनते, न कि टर्राने वाले येसुइटों, चापलूसों और झूठों की। तू उनसे बोल सकता है, प्रजा को उनके लिए प्रार्थना करनी है, और तेरे कारण प्रभु में उनका आदर और आज्ञापालन करना है। "दरबारियों को आदेश दे कि वे राजाओं की अनिश्चित कृपा पर भरोसा न रखें, वरन् नहेम्याह, दानिय्येल और यूसुफ के समान भरोसेमन्द और विश्वासयोग्य हों; उनसे विनती कर कि वे इनके वृत्तान्त पढ़ें, इनका अनुकरण करें और इन पर मैकियावेली की भविष्यवाणियों से अधिक विश्वास करें। "उन लोमड़ियों और राजनीतिज्ञों से कह, जो मुख्य को गौण और गौण को मुख्य बना देते हैं, कि बुरे विवेक ने अहीतोपेल को फाँसी दी, हामान, शेबना आदि को गिराया। उनसे कह कि सबसे अच्छी नीति, और सुलैमान की भी, जो सबसे अच्छी नीति जानता था, यही है कि तेरी कृपा पाएँ और बनाए रखें; तुझे ऊँचा करें, और तू उन्हें ऊँचा करेगा, उनके लिए ढाल बनेगा, और संकट के दिन उन्हें सिंह के समान निडर बनाएगा, वन के सब पशुओं की डाह से, यहाँ तक कि धर्म के कार्यों में सिंह की गर्जन से भी न डरनेवाला। "हे विवेक, तू न्यायियों का न्यायी है, और किसी दिन उनका न्याय करेगा; इस बीच यदि वे न परमेश्वर से डरें न मनुष्य से, तो तू उस हठीली विधवा के समान बन, और उनसे न्याय कराने का आग्रह कर। हाय, यदि तू सब न्यायालयों में, विशेषकर उन न्यायालयों में जो तेरे अधिकार-क्षेत्र के हैं और तुझ ही से नाम पाते हैं, सबसे ऊँचे आसन पर बैठता, अपने आप को निर्वासित न होने दे, फेलिक्स को थरथरा दे, उनसे न्याय की चर्चा कर। "खरे न्यायियों से कह कि वे परमेश्वर को और तुझे प्रसन्न करें, और किसी और भय से न डरें; उन्हें विश्वास दिला कि पक्षपात या लोकप्रियता के लिए वे जो कुछ करेंगे, उसमें तू उन्हें संकट में छोड़ देगा; परन्तु जो कुछ तेरे आग्रह और आज्ञा पर करेंगे, उसमें तू उनका साथ देगा, और उनका अत्यन्त बड़ा प्रतिफल ठहरेगा।
"यदि तू उन न्यायालयों में अपने किसी परिचित या अनुयायी वकील को पाए और उनसे भेंट करे, तो उनका शुल्क और उनका प्रवर्तक बन; उनसे कह कि यदि वे तुझ पर भरोसा करने का साहस करें, तो रविवार के कामों को, दोनों पक्षों से घूस लेने को, चुप्पी बेचने को, बुरे मुकद्दमों की पैरवी करने को और व्यवस्था को मोम की नाक बनाने को छोड़ दें; यदि वे केवल और सब धर्म के मुकद्दमों की पैरवी करने का साहस करें, तो तेरे एक हाथ में धन है और दूसरे में आदर, जो तू उन्हें देगा। "जहाँ तक लेवी के गोत्र का सम्बन्ध है, वहाँ तू कुछ अधिक निडर हो सकता है, क्योंकि वे अपने पेशे से परमेश्वर के जन और विवेक के जन हैं। उनसे आग्रह कर कि वे अपने ज्ञान में विवेक को जोड़ें, जैसे शून्यों के आगे कोई अंक लगा दिया जाता है, जिससे उनका कुछ मूल्य बन जाए। उनसे कह कि वे प्रचार करें, घिनौने लाभ या व्यर्थ घमण्ड के लिए नहीं, परन्तु तेरे लिए; उनसे कामना कर कि वे तुझे शुद्ध रखें, और तुझ में विश्वास के भेद को सुरक्षित रखें; उन्हें विश्वास दिला कि तू ही खरे विश्वास का एकमात्र जहाज़ और मंजूषा है, जिसका यदि वे आलस्य और लोभ के कारण जहाज़ डुबो दें, तो वे पोप-मत और आर्मीनियसवाद के हाथ सौंप दिए जाएँगे, और विश्वास खो बैठेंगे, और तब विश्वास के पतन और विश्वास तथा शुद्ध विवेक की मध्यस्थता पर पुस्तकें लिखेंगे, जिनसे वे कभी परिचित ही न थे, और जिनका दिखावा तक उनमें से कुछ पियक्कड़ों ने कभी नहीं किया।" (वार्ड के उपदेश, पृ. 109. निकोल्स का संस्करण।) मैंने जो अंश दिए हैं, उन पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करता। मेरा मानना है कि वे स्वयं अपनी बात कहते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि उपदेशों के विषय में रुचि और मत बहुत भिन्न होते हैं। परन्तु मेरा अपना सोचा-समझा निर्णय यह है कि जो मनुष्य वार्ड की शैली में प्रचार करेगा, उसे सुननेवालों की कभी कमी नहीं होगी।
आर्चबिशप लॉड और उसका
युग
कैंटरबरी के आर्चबिशप विलियम लॉड का सिर 1645 में लन्दन की टावर हिल पर काटा गया। ऐतिहासिक काल में जिन पाँच आर्चबिशपों की हिंसक मृत्यु हुई, वह उनमें से एक था। एल्फेज को 1009 में, एथेलरेड के शासनकाल में, डेनों ने मार डाला। थॉमस ए बेकेट की हेनरी द्वितीय के शासनकाल में कैंटरबरी के गिरजाघर में अचानक हत्या कर दी गई। साइमन सडबरी का सिर रिचर्ड द्वितीय के शासनकाल में वॉट टायलर ने कटवाया। क्रैनमर को रानी मेरी के दिनों में ऑक्सफ़ोर्ड में पोप के अनुयायियों ने जला दिया। केवल लॉड ही प्रोटेस्टेंट हाथों से मरा, चार्ल्स प्रथम के समय में, लॉन्ग पार्लियामेंट के आरम्भ में। अब इस वर्तमान शताब्दी में हमें आर्चबिशप लॉड से क्या लेना-देना है? मुझे सन्देह है कि बहुत से लोग यही प्रश्न पूछने को तैयार होंगे। लॉड को मरे दो शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। भाप, बिजली, रेलमार्ग, मुक्त व्यापार, सुधार, शिक्षा और विज्ञान ने इंग्लैंड में सब कुछ बदल दिया है। अर्द्ध-बर्बर युग में किए गए एक बर्बर कार्य की उदास कहानी को क्यों कुरेदें? हमारे लिए लॉड क्या है, या लॉड के लिए हम क्या हैं, कि हम उसके और उसके इतिहास के विषय में कष्ट उठाएँ? मैं साहस के साथ कहता हूँ कि ऐसे प्रश्न बल्कि अदूरदर्शी और अविचारपूर्ण हैं। इतिहास के विषय में बुद्धिमानी से कहा गया है कि वह "उदाहरणों द्वारा सिखानेवाला दर्शन" है, और यह कथन किसी इतिहास पर उतना सत्य नहीं बैठता जितना कलीसिया के इतिहास पर। यह भी कहा गया है कि इतिहास में "अपने को दोहराने की विचित्र प्रवृत्ति" होती है, और अतीत के इतिहास का गहन अध्ययन हमें यह अनुमान लगाने में बहुत सहायता देगा कि भविष्य में क्या होगा। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमें लॉड से बहुत कुछ लेना-देना है, और लॉड के समय का ज्ञान आज के दिनों में बड़े महत्व का है। मैं और आगे बढ़ता हूँ। मैं मानता हूँ कि लॉड का इतिहास इंग्लैंड की कलीसिया की वर्तमान स्थिति पर व्यापक और स्पष्ट प्रकाश डालता है।
मुझे सबसे पहले अपने पाठकों की कृपापूर्ण सहनशीलता का सहारा लेना चाहिए और उनसे बहुत धीरज और विचार की प्रार्थना करनी चाहिए। मेरा विषय ऐतिहासिक है। फ्राउड और मैकॉले को छोड़कर कम ही लोग इतिहास को नीरस और उबाऊ होने से बचा पाते हैं। जब राजा क्षयर्ष को नींद नहीं आती थी, तब उसके अपने समय का इतिहास-वृत्तान्त उसे पढ़कर सुनाया गया था। — इसके अतिरिक्त मेरा विषय विशेष रूप से कठिनाइयों से घिरा हुआ है। लॉड के चरित्र जैसा कोई चरित्र इतने भिन्न-भिन्न ढंग से कभी नहीं आँका गया। कुछ लोगों के अनुसार वह पोप का अनुयायी और अधर्म का राक्षस था; दूसरों के अनुसार वह धन्य शहीद और ज्योतिर्मय स्वर्गदूत था। एक ओर प्रिन की उग्र निन्दा और दूसरी ओर हेलिन, व्हार्टन, लॉसन, और यहाँ तक कि ले बा की बेतुकी प्रशंसा के बीच सत्य को खोज निकालना अत्यन्त कठिन है। संक्षेप में, यह विषय उलझा हुआ सूत है, और इतने समय की दूरी पर इसे सुलझाना कठिन है। — फिर भी मैं साहस के साथ अपने पाठकों के सामने "वस्तु को जैसी वह है" वैसी रखने का प्रयत्न करूँगा। सावधानी से जाँच-पड़ताल करने के बाद मेरा अपना मन पूरी तरह निश्चित हो चुका है। मेरा मत है कि जानते हुए या अनजाने में, अर्थ समझते हुए या न समझते हुए, इरादे से या बिना इरादे के, लॉड ने इंग्लैंड की कलीसिया को उतनी हानि पहुँचाई जितनी किसी भी कलीसियाई जन ने कभी नहीं पहुँचाई। उसने ऐसा घाव दिया जो कभी नहीं भरेगा; उसने ऐसी हानि की जिसकी भरपाई कभी नहीं होगी। लॉड का जन्म सन् 1573 में हुआ, अर्थात् धर्म-सुधार के आरम्भ के लगभग पैंतीस वर्ष बाद, रानी एलिज़ाबेथ के राज्यकाल के मध्य में, और वह सन् 1603 में जेम्स प्रथम के राज्यारोहण के लगभग समय सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में सामने आया। मैं इन तिथियों पर विशेष ध्यान देने को कहता हूँ। क्षण भर का विचार दिखा देगा कि वह इंग्लैंड की कलीसिया के इतिहास के मंच पर एक अत्यन्त संकटपूर्ण काल में प्रकट हुआ: अर्थात् महिमामय अंग्रेज़ी धर्म-सुधार के आरम्भ से पहले पचहत्तर वर्षों के भीतर। केवल पचहत्तर वर्ष! वह कितना थोड़ा समय लगता है! फिर भी हम सबके लिए गहरी रुचि की कितनी घटनाएँ उस अवधि में समा गईं। उन्हीं पचहत्तर वर्षों के भीतर हेनरी अष्टम ने प्रोटेस्टेंट मत का बीज पहली बार बोया, यद्यपि मैं पूरी तरह मानता हूँ कि वह नीच, शारीरिक और सांसारिक उद्देश्यों से था। — फिर एडवर्ड षष्ठ का छोटा पर महिमामय राज्यकाल आया, जब क्रैनमर, रिडली, लैटिमर और हूपर की पोषक देखरेख में वह कोमल पौधा गरम-घर की तेज़ी से बढ़ा। — फिर मरियम का रक्तपूर्ण राज्य आया, जब बोनर और गार्डिनर की क्रूर कार्यवाहियों से वह जड़ तक काट डाला गया। — फिर एलिज़ाबेथ के सिंहासन पर बैठने पर सुखद प्रतिक्रिया आई, और इंग्लैंड की कलीसिया की उस आधार पर अन्तिम पुनःस्थापना हुई जिस पर वह अब खड़ी है। परन्तु दुःख के साथ कहना पड़ता है कि एलिज़ाबेथ का काल भी इंग्लैंड की कलीसिया के लिए केवल भलाई का काल नहीं था। इस विषय में सत्य कहा जाना चाहिए। एलिज़ाबेथ ने जो भलाई की उसके लिए धन्यवाद करते हुए हम प्रायः उस हानि को अनदेखा कर देते हैं जो उसके राज्य में हुई। जो काम किए जाने चाहिए थे वे अनकिए रह गए, और जो नहीं किए जाने चाहिए थे वे किए गए। एक ओर रानी के विशिष्ट ट्यूडर-स्वभाव के सत्ता-प्रेम और अध्यक्षों के प्रति उसकी ईर्ष्या के कारण, और दूसरी ओर पोप के अनुयायियों को मनाने और अपनी ओर करने की उसकी चिन्ता भरी इच्छा के कारण, धर्म-सुधार का कार्य उतनी तत्परता से आगे नहीं बढ़ाया गया जितना बढ़ाया जा सकता था। पार्कर सोसाइटी द्वारा प्रकाशित ज़्यूरिख के पत्रों में इसके बारे में बहुत संकेत मिलते हैं। यदि ज्यूएल और उसके साथियों को राजकीय हस्तक्षेप से निरन्तर रोका और बाँधा न गया होता, तो हमारी कलीसिया की आराधना और संगठन सम्भवतः आज से कहीं अच्छे बनाए गए होते। यदि "भविष्यवाणी-सभाओं" के विषय में ग्रिन्डल को डाँटकर रोका न गया होता, तो अंग्रेज़ पादरी-वर्ग वैसा न रहता जैसा था, बल्कि कहीं अधिक उत्तम निकाय होता। उस पीड़ादायक अवसर पर रानी को लिखा गया उसका पत्र निःसंकोच प्रशंसा के योग्य है। फिर एक भाग में, सब दलों में फैली हुई सहिष्णुता की सार्वभौमिक अनभिज्ञता के कारण, ईमानदार लोग प्रायः छोटे-छोटे अपराधों के लिए सताए गए, और आगे के समय में असहमति की प्रचुर उपज के लिए भूमि तैयार हो गई। इतिहासकार फुलर ने सेसिल और अन्य प्रिवी काउंसिल के सदस्यों तथा अध्यक्ष व्हिटगिफ्ट के बीच इस विषय पर कुछ रोचक पत्र-व्यवहार लिखा है। मुझे एलिज़ाबेथ को छोटा दिखाते हुए दुःख होता है। परन्तु सत्य सत्य है, और उसे जाना जाना चाहिए; और जब तक हम उन समयों को न समझें जो लॉड से ठीक पहले के थे, हम लॉड को ठीक से नहीं समझ सकते।1 फिर भी एलिज़ाबेथ के राज्यकाल का मूल्यांकन करते समय एक उज्ज्वल बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। इंग्लैंड की कलीसिया में सिद्धान्त का स्तर खरा, स्पष्ट, पवित्रशास्त्र-सम्मत और असन्दिग्ध था। सही हो या गलत, मंचों पर ऐसी कोई बात सहन नहीं की जाती थी जो पूरी तरह प्रोटेस्टेंट और उनतालीस धाराओं के पूर्णतः अनुकूल न हो। जो पादरी रोटी और दाखरस के रूपों के अन्तर्गत मसीह की देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति का प्रचार करता, — या किसी याजक के सामने निजी पाप-स्वीकार की प्रथा की सिफ़ारिश करता, — या कुँवारी मरियम से प्रार्थना का समर्थन करता, — या प्रभु-भोज में पवित्र किए हुए तत्त्वों को अपने सिर के ऊपर उठाकर उनकी आराधना करता, — या बपतिस्मा के द्वारा नया जन्म की स्थूल, "ओपस ऑपेराटुम" वाली धारणा सिखाता, — या पूर्वनियति के सिद्धान्त, या आरोपित धार्मिकता, या विश्वास से धर्मी ठहराए जाने का सार्वजनिक रूप से खण्डन करता, — या क्रैनमर, रिडली और लैटिमर की स्मृति की निन्दा करता, — या एडवर्ड षष्ठ को "बाघ का बच्चा" कहता, — या धाराओं का "एक कम चालीस कोड़े" कहकर उपहास करता, — या रोम की कलीसिया से पुनर्मिलन की सिफ़ारिश करता, — या पोप को मसीह-विरोधी कहने में हिचकता, — ऐसा मनुष्य, मैं निर्भीकता से कहता हूँ, यदि वह अत्यन्त नगण्य व्यक्ति न होता, तो भली रानी बेस के दिनों में उसका समय बहुत कठिन बीतता! "प्रधान अधिकारी" उस पर बिजली की तरह टूट पड़ते। ये ऐसे विषय थे जिन पर बहस की भी मुश्किल से अनुमति थी; आपको या तो इनके विषय में दृढ़ प्रोटेस्टेंट मत रखना पड़ता, या चुप रहना पड़ता। संक्षेप में, अनेक बातों में दोषपूर्ण और अपूर्ण होते हुए भी, रानी एलिज़ाबेथ के समय में इंग्लैंड की कलीसिया सैद्धान्तिक रूप से पूरी तरह प्रोटेस्टेंट और सुसमाचारीय थी। अपनी शैशवावस्था के कारण कलीसिया निर्बल रही होगी; हमारे प्रकाश के अनुसार आँकने पर वह अनेक बातों में अधूरी अवश्य थी; मूर्खतापूर्ण असहिष्णुता से वह निश्चय ही बिगड़ी और हानि उठा चुकी थी; परन्तु किसी भी काल में उसके सिद्धान्त का सामान्य स्तर एलिज़ाबेथ के दिनों जितना पवित्रशास्त्र-सम्मत और प्रोटेस्टेंट नहीं रहा। ऐसे स्त्री-पुरुष अभी जीवित थे जिन्होंने रॉजर्स और ब्रैडफ़ोर्ड को स्मिथफ़ील्ड में जलाए जाते देखा था, — जिन्होंने बूढ़े लैटिमर को खम्भे पर रिडली से यह कहते सुना था, "हियाव बाँधो, हम आज ऐसी बत्ती जलाएँगे जो कभी बुझाई न जाएगी," — जिन्होंने वीर हूपर को ग्लॉस्टर के गिरजाघर की छाया में पौन घण्टे तक आग में धीरज के साथ तड़पते देखा था। इंग्लैंड के स्त्री-पुरुष इन बातों को अभी भूले नहीं थे। एक व्यापक भावना थी कि पोप-मत झूठा धर्म है और प्रोटेस्टेंट मत परमेश्वर का सत्य है; कि पोप-मत का हर रूप का सिद्धान्त घृणा के योग्य माना जाए, और धर्म-सुधार के सिद्धान्त कभी त्यागे न जाएँ। बहुत थोड़े अपवादों को छोड़कर सभी वर्ग यही मानते थे, मन्त्रणा-कक्ष में बैठे राजनेता से लेकर दुकान के प्रशिक्षु लड़के तक। संक्षेप में, एलिज़ाबेथ के दिन अपनी सब त्रुटियों के होते हुए भी प्रोटेस्टेंट दिन थे। राष्ट्र खुले रूप से प्रोटेस्टेंट राष्ट्र था और इस नाम पर गर्व करता था। यह ऐसी बात है जिसे कभी भूलना नहीं चाहिए। यदि एलिज़ाबेथ-कालीन प्रोटेस्टेंट मत उतना ही वास्तविक और गहरा होता जितना वह दिखता था, तो हमारे देश के लिए कितना अच्छा होता। ऐसे संकटपूर्ण समयों में विलियम लॉड को परमेश्वर ने आगे आने और इंग्लैंड में एक शक्ति बनने दिया। हमारी कलीसिया में उसने स्थिति ऐसी ही पाई। कैसे उसने जानबूझकर अपने दिनों की प्रचलित धर्मविज्ञान का विरोध करने की ठानी, — कैसे उसने चालीस वर्ष तक "काम किया और सफल हुआ," कैसे उसने अपने उद्देश्य पूरे करने के लिए रात-दिन परिश्रम किया, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में लॉर्ड स्ट्रैफ़र्ड के समान "पूरे मन से," — कैसे उसने हर उस कलीसियाई जन को जो धर्म-सुधार के सिद्धान्तों से असन्तुष्ट था, आर्मीनियन अदुल्लाम की गुफ़ा में अपने चारों ओर इकट्ठा कर लिया, कैसे उसने धीरे-धीरे हमारी कलीसिया में सच्चे प्रोटेस्टेंट मत के प्रति अरुचि और उस वस्तु के प्रति घृणा का ख़मीर भर दिया जिसे वह "कैल्विनवाद" कहना पसन्द करता था, — कैसे अपनी नीति से कलीसिया और राज्य दोनों को बरबाद करके भी वह अपने पीछे कलीसियाई जनों का ऐसा पन्थ छोड़ गया जिसने हमारी कलीसिया को अपार हानि पहुँचाई है, — ये सब ऐतिहासिक तथ्य हैं, जिनका पूरा वर्णन एक ग्रन्थ भर देगा। वर्तमान जैसे लेख में उन्हें केवल संक्षेप में दर्शाया जा सकता है। मैं अधिक से अधिक यही करने का प्रयत्न करूँगा कि लॉड के जीवन की एक संक्षिप्त रूपरेखा और उसके चरित्र का संक्षिप्त मूल्यांकन दूँ, और दिखाऊँ कि उसकी दृष्टि में कौन-सी नीति थी, उसने उसे किस प्रकार चलाया, और वह किन परिणामों तक पहुँची। फिर अपने लिए कुछ व्यावहारिक शिक्षाएँ पूरे लेख का उचित समापन होंगी। (क) विलियम लॉड का जन्म सन् 1573 में रीडिंग में हुआ, और वह मध्यम वर्ग के सम्मानित माता-पिता का पुत्र था। उसने अपनी आरम्भिक शिक्षा अपने गृह-नगर के व्याकरण-विद्यालय में पाई, और सन् 1589 में ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज में प्रविष्ट हुआ। उसके बचपन और जवानी के बारे में थोड़ा ही ज्ञात है, सिवाय इसके कि वह शारीरिक रूप से निर्बल और दुबला था, परन्तु बौद्धिक रूप से सशक्त, और अथक परिश्रम और लगन वाला युवक था। रीडिंग स्कूल में उसके शिक्षक को अवलोकन से इतना विश्वास था कि वह उन लड़कों में से है जो संसार में अवश्य ऊँचे उठते हैं, कि वह कहा करता था, "जब तुम एक बड़े छोटे आदमी बन जाओ, तब रीडिंग स्कूल को याद रखना।" ऑक्सफ़ोर्ड में उसने धीरे-धीरे, यद्यपि मन्द गति से, अपनी पहचान और प्रभाव बनाया। सन् 1593 में वह अपने कॉलेज का फ़ेलो चुना गया, और बीमारी के कारण दो वर्ष गँवाने के बाद सन् 1598 में एम.ए. बना, और सन् 1600 में रोचेस्टर के अध्यक्ष यंग द्वारा डीकन, और सन् 1601 में याजक ठहराया गया। उसके ऑक्सफ़ोर्ड-जीवन के पहले दस वर्षों के रहन-सहन और कार्यों के बारे में बहुत कम ज्ञात है, सिवाय इस संदिग्ध तथ्य के कि बकरिज, जो कुख्यात रूप से अविश्वसनीय धर्मविज्ञानी था, उसका शिक्षक था। स्पष्ट है कि वह समयों का सावधान निरीक्षक था, और ऐसा व्यक्ति जो अपने लिए स्वयं सोचता था। अपने अभिषेक के समय ही वह धर्मविज्ञान की अपनी एक अलग राह पकड़ चुका था। कहा जाता है कि अध्यक्ष यंग ने टिप्पणी की थी कि उसका अध्ययन जेनेवा की साधारण पद्धति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसका धर्मविज्ञान "प्राचीन पिताओं, महासभाओं और कलीसियाई इतिहासकारों की उत्तम नींव" पर बना है। ऐसी प्रशंसा संदिग्ध है। जब कोई मनुष्य प्राचीन पिताओं और महासभाओं को मूर्ति बना ले और धर्म-सुधार के धर्मविज्ञान को तुच्छ ठहराए, तो हम निश्चित हो सकते हैं कि उसके धर्मविज्ञान में कोई पेंच ढीला है। "एथेनी ऑक्सोनिएन्सिस" के लेखक वुड का कहना है कि ऑक्सफ़ोर्ड के अपने पहले दस वर्षों में भी वह "अत्यन्त अग्रसर, आत्मविश्वासी और उत्साही मनुष्य" माना जाता था। अध्यक्ष यंग और वुड की टिप्पणियों को मिला दें, तो आपके पास एक अत्यन्त ख़तरनाक कलीसियाई जन के पहले तत्त्व हैं। मैं अनुमान से कहता हूँ कि ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट जॉन्स में बिताए ये ग्यारह शान्त वर्ष ही वह बोने का समय थे जिससे लॉड की की हुई सारी हानि उपजी, और उन्होंने वह दुर्भाग्यपूर्ण झुकाव जमा दिया जो उसके पूरे जीवन की विशेषता बना। सन् 1602 में सेंट जॉन्स में धर्मविज्ञान पर व्याख्यान देने की उसकी नियुक्ति पहला अवसर था जब लॉड लोकप्रिय प्रोटेस्टेंट मत के विरोधी और धर्मविज्ञान की एक नई शैली के घोषित पक्षधर के रूप में सामने आया। उसने जो मत रखे उनका ठीक स्वरूप दर्ज नहीं है, परन्तु हेलिन के अनुसार वह कुछ ऐसा था जैसे "मसीह की कलीसिया की सतत दृश्यता, जो प्रेरितों से रोम की कलीसिया तक उतरी और धर्म-सुधार तक उसी कलीसिया में चलती रही।" उसने ठीक-ठीक क्या कहा यह हम नहीं जानते; परन्तु यह बहुत स्पष्ट है कि उसने रोम की कलीसिया के विषय में ऐसी भूमि ली जो होमिलियों, ज्यूएल और धर्म-सुधारकों के विचारों के सर्वथा विरुद्ध थी, और विश्वविद्यालय के सच्चे प्रोटेस्टेंटों को अत्यन्त अप्रिय थी। तत्काल परिणाम यह हुआ कि व्याख्याता का टकराव किसी और से नहीं, बल्कि डॉ. जॉर्ज एबट से हुआ, जो उस समय ऑक्सफ़ोर्ड के उप-कुलपति, यूनिवर्सिटी कॉलेज के प्रधान, और आगे चलकर कैंटरबरी के आर्चबिशप हुए — बड़ी योग्यता और उचित रूप से उच्च चरित्र के व्यक्ति। बाद के परिणाम यह रहे कि उस दिन से एबट लॉड को ख़तरनाक मनुष्य मानने लगा, और लॉड एक बहुत उदासीन प्रोटेस्टेंट के रूप में, यदि पोप-मत का मित्र और मसीह के शुद्ध सुसमाचार का खुला शत्रु नहीं, तो चिह्नित और जाना जाने लगा। सन् 1603 में प्रॉक्टर का पद सँभालने के बाद लॉड ने सन् 1604 में बी.डी. की उपाधि ली। उस उपाधि के लिए अपने अभ्यासों में उसने जिन प्रस्थापनाओं का बचाव करने का बीड़ा उठाया, उन्होंने उसकी धर्मवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का और प्रमाण दिया, और उसके प्रति सन्देह बढ़ा दिया। उसके जीवनीकारों के अनुसार उसने पहले, "बपतिस्मा की आवश्यकता" का, और दूसरे, यह कि "धर्म-प्रदेशीय अध्यक्षों के बिना कोई सच्ची कलीसिया नहीं हो सकती" का समर्थन किया। उसके कथनों का ठीक स्वरूप फिर ज्ञात नहीं है; परन्तु उन अभ्यासों से जो हलचल मची उससे स्पष्ट है कि प्रोटेस्टेंट कलीसियाई जन उन्हें अब तक पवित्रशास्त्र-विरुद्ध और अविश्वसनीय मानते थे। सबसे अधिक सम्भावना यही है कि "टैªक्ट्स फ़ॉर द टाइम्स" के प्रवर्तकों की तरह उसने प्रेरितीय उत्तराधिकार और बपतिस्मा के द्वारा नया जन्म का समर्थन किया। उसने जो भी कहा हो, तथ्य है कि उस पर एक्सेटर के रेक्टर डॉ. हॉलैंड ने, जो उस समय धर्मविज्ञान के रीजियस प्रोफ़ेसर थे, कठोर आक्रमण किया। सदा की तरह उस आक्रमण से कुछ न निकला, और लॉड अपनी भूमि पर डटा रहा। किसी मनुष्य की धर्मवैज्ञानिक अविश्वसनीयता का नैतिक प्रमाण, और उसका कानूनी सबूत, सर्वथा भिन्न वस्तुएँ हैं। सन् 1605 में अर्ल ऑफ़ एसेक्स और लेडी रिच के अत्यन्त अपयशकारी विवाह का समर्थन करने और उसे सम्पन्न कराने से स्वयं को गम्भीर क्षति पहुँचाने के बाद, लॉड सन् 1606 में ऑक्सफ़ोर्ड में एक और धर्मवैज्ञानिक कठिनाई में पड़ा। उसने सेंट मैरी में ऐसा उपदेश दिया जो इतनी रोमी प्रवृत्ति का था कि उस समय के उप-कुलपति, क्वीन्स के प्रोवोस्ट डॉ. एयरे ने उससे उसका स्पष्टीकरण माँगा। फिर उस उपदेश के स्वरूप के विषय में हमें अँधेरे में रखा गया है, और फिर हम केवल यही जानते हैं कि सदा की तरह लॉड सार्वजनिक निन्दा से बच निकलने में सफल रहा। परन्तु अनेक अन्य लोगों की भाँति, जो ऐसी स्थिति में होते हैं, यद्यपि कानूनी रूप से दोषी नहीं ठहराया गया, उसने अनेक मनों में यह गहरी धारणा जमा दी कि वह पूरी तरह अविश्वसनीय धर्मविज्ञानी है और रोमी मतों से गहराई तक रँगा हुआ है। संक्षेप में, इस प्रवचन से ऐसा कलंक उठा कि प्रसिद्ध जोसेफ़ हॉल, जो आगे चलकर नॉरविच का अध्यक्ष हुआ, ने प्रचारक को चेताने के लिए एक उल्लेखनीय पत्र लिखा, जो उस समय लॉड के चरित्र के विषय में बनी धारणा का संकेत होने के कारण पूरा उद्धृत करने योग्य है। वह कहता है: "काश मैं जान पाता कि आपको कहाँ पाऊँ; तब मैं जान पाता कि सीधा निशाना कैसे साधूँ। जबकि अब मुझे घूर-घूरकर अनुमान लगाना पड़ता है। आज आप रोमियों के तम्बुओं में हैं, कल हमारे में, परसों दोनों के बीच और दोनों के विरुद्ध। हमारे विरोधी आपको हमारा समझते हैं। हम आपको उनका समझते हैं। आपका विवेक आपको दोनों के साथ पाता है और किसी के साथ नहीं। मैं आपकी चापलूसी नहीं करता। यह तो सभी स्वभावों में सबसे बुरा है। गरमी और ठण्ड के अपने उपयोग हैं। गुनगुनापन पेट को परेशान करने के सिवा किसी काम का नहीं। जो आत्मिक रूप से गरम हैं वे स्वीकार किए जाते हैं। जो एकदम ठण्डे हैं उनका हिसाब कम है। दोनों के बीच का मार्ग कहीं अधिक बुरा है, क्योंकि वह भलाई के निकट आता है पर उसे पाता नहीं। आप इस उदासीनता में कब तक रहेंगे? एक ओर निश्चय कीजिए, और अन्ततः जानिए कि आप क्या मानते हैं, क्या मानना चाहिए। या तो अपने पंख त्याग दीजिए या अपने दाँत; और इस चमगादड़-जैसे स्वभाव को छोड़कर या तो पक्षी बनिए या पशु। डगमगाते या अनिश्चित मरना, आप स्वयं मानेंगे, भयानक है। यदि आपको स्थिर होना ही है, तो आरम्भ कब करेंगे? यदि आरम्भ करना ही है, तो अभी क्यों नहीं? उस वस्तु को टालना ख़तरनाक है जिसकी कमी घातक है और जिसका अवसर अनिश्चित। परमेश्वर येहू के साथ पुकारता है, 'मेरी ओर कौन है? कौन?' अन्ततः अपनी खिड़की से उसकी ओर देखिए, और दृढ़ साहस के साथ उस ईज़ेबेल को नीचे फेंक दीजिए जिसने आपको मोह लिया है। क्या कोई बाधा है जिसे देरी घटा देगी? क्या कोई ऐसी है जिसे उचित उत्तर दूर न कर सके? यदि आप डाँवाडोल रहना ही चाहें, तो आपको कौन स्थिर कर सकता है? परन्तु यदि आप अस्थिरता से प्रेम नहीं करते, तो हमें बताइए कि आप क्यों लड़खड़ाते हैं? स्पष्ट बोलिए, नहीं तो आप कभी दृढ़ न होंगे।"2 सन् 1607 में, अपनी आयु के चौंतीसवें वर्ष में, लॉड ने अन्ततः कलीसियाई पदोन्नति की सीढ़ी पर चढ़ना आरम्भ किया। उसके जैसा मनुष्य, जो प्रोटेस्टेंट और सुसमाचारीय धर्मविज्ञान के विरोधी के रूप में सामने आया था, संरक्षकों से वंचित नहीं रह सकता था। ऐसे लोग "संसार की बातें बोलते हैं, और संसार उनकी सुनता है।" (1 यूहन्ना 4:5) वास्तव में इस तिथि से लेकर अध्यक्ष बनने तक मुझे शायद ही तीन वर्ष ऐसे मिलते हैं जिनमें लॉड को कोई पदोन्नति न मिली हो। सन् 1607 में वह नॉर्थैम्प्टनशायर के स्टैमफ़र्ड का विकर बना; सन् 1608 में लेस्टरशायर के नॉर्थ किब्वर्थ का रेक्टर और रोचेस्टर के अध्यक्ष नील का धर्मगुरु; सन् 1609 में एसेक्स के वेस्ट टिलबरी का रेक्टर; सन् 1610 में केंट के कक्स्टन का रेक्टर, और फिर उसी काउन्टी के नॉर्टन का; सन् 1611 में ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज का अध्यक्ष और राजा का धर्मगुरु; सन् 1614 में लिंकन धर्म-प्रदेश के बक्डन का प्रीबेन्डरी; सन् 1615 में हंटिंगडन का आर्चडीकन; सन् 1616 में ग्लॉस्टर का डीन; सन् 1618 में लेस्टरशायर के इब्स्टॉक का रेक्टर; सन् 1620 में वेस्टमिन्स्टर का कैनन; और सन् 1622 में नॉर्थैम्प्टनशायर के क्रिक का रेक्टर।3 इतने क्रमिक पद सम्भवतः एक मनुष्य पर इतने थोड़े समय में कभी नहीं लादे गए! उनमें से कितने वह एक साथ धारण करता था, यह मैं निश्चित नहीं कर पा रहा। अपने विभिन्न पदों पर उसने क्या किया, क्या वह बहुत निवास करता था, क्या बहुत प्रचार करता था, क्या उसने भलाई के लिए कोई आत्मिक चिह्न छोड़े, इन सब बातों पर कोई जानकारी नहीं बची। इस तथ्य के सिवाय कि हर पल्ली में वह सदा बारह निर्धन लोगों को वार्षिक भत्ता देता था, अपनी आय का पाँचवाँ भाग दान के कामों के लिए अलग रखता था, ग्लीब-गृह की मरम्मत करवाता था, और देखता था कि गिरजाघर में शोभनीय साज-सामान हो, मुझे और कुछ दर्ज नहीं मिलता। स्टैमफ़र्ड, नॉर्थ किब्वर्थ, वेस्ट टिलबरी, कक्स्टन, नॉर्टन, इब्स्टॉक या क्रिक में मनुष्यों की आत्माओं में फल लानेवाले किसी सुसमाचारीय कार्य के विषय में हम पूरी तरह अँधेरे में छोड़ दिए गए हैं। सच तो यह है कि कोई प्रमाण नहीं कि इस प्रकार का काम कभी भी लॉड की रुचि का रहा हो। सन् 1607 और 1620 के बीच के तेरह वर्षों में लॉड के जीवन की दो सार्वजनिक घटनाएँ विशेष ध्यान के योग्य हैं। एक इस बात पर तीव्र प्रकाश डालती है कि जिस स्थान पर वह सबसे अच्छी तरह जाना जाता था, अर्थात् ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में, वहाँ उसके बारे में क्या धारणा बनी थी; दूसरी एक उल्लेखनीय उदाहरण देती है कि इंग्लैंड की कलीसिया को अप्रोटेस्टेंट बनाने की अपनी योजनाओं को उसने किस पूरी तरह अटल शैली में आगे धकेला, और विरोध के सामने उन्हें लोगों के गले उतार दिया। इनमें से पहली घटना ऑक्सफ़ोर्ड में उसे दी गई सार्वजनिक फटकार है, जो उस उपदेश के कारण मिली जो उसने सन् 1614 में श्रोव मंगलवार को विश्वविद्यालय के सामने दिया। इस उपदेश में प्रोटेस्टेंट कलीसियाई जनों को इतनी आपत्तिजनक बातें थीं कि उप-कुलपति रॉबर्ट एबट ने, जो कैंटरबरी के आर्चबिशप का भाई, आगे चलकर सैलिस्बरी का अध्यक्ष, और बड़ी भक्ति और विद्या का मनुष्य था, उचित समझा कि अगले ईस्टर रविवार को सेंट मैरी में उपदेश देकर उसका सार्वजनिक उत्तर दे। एबट के उपदेश का निम्नलिखित अंश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह दिखाता है कि लॉड के धर्मवैज्ञानिक मत वास्तव में क्या थे: "कुछ लोग," एबट ने अपने उपदेश में कहा, "आंशिक रूप से रोमी और आंशिक रूप से अंग्रेज़ हैं, जैसा अवसर उन्हें अनुकूल लगे; ताकि कोई उनसे कह सके, 'तू हमारी ओर है या हमारे विरोधियों की ओर?' वे ऐसे लोग हैं जो सत्य के बहाने और प्यूरिटनों के विरुद्ध प्रचार करने के बहाने उस विश्वास और धर्म के हृदय और जड़ पर प्रहार करते हैं जो अब हमारे बीच स्थापित है। प्यूरिटनों के विरुद्ध यह प्रचार करना जेसुइट पार्सन्स और कैम्पियन का अभ्यास था, जब वे युवा विद्यार्थियों को बहकाने इंग्लैंड आए थे। जब उनमें से अनेक को डर था कि यदि वे खुले रूप से ऐसे प्रकट हुए तो अपने पद खो देंगे, तब उन्हें जो सलाह दी गई वह यह थी कि वे प्यूरिटनों के विरुद्ध खुलकर बोलें, और वही पर्याप्त होगा। ये लोग यह बहाना नहीं कर सकते कि उन्हें पोप का अनुयायी केवल इसलिए माना जाता है कि वे प्यूरिटनों के विरुद्ध बोलते हैं, बल्कि इसलिए कि वे पोप के अनुयायियों के विरुद्ध कुछ नहीं बोलते। यदि वे कभी पोप के अनुयायियों के विरुद्ध कुछ बोलते भी हैं, तो झाड़ी को केवल पीटते हैं; और वह भी धीरे से, कहीं उसमें के पक्षी जाग न जाएँ और उनकी शान्ति भंग न हो। वे केवल वही कहते हैं जिसमें एक पोप-अनुयायी दूसरे के विरुद्ध बोलेगा, या दुहरे अर्थवाली बातों और पोप के सांसारिक अधिकार के विरुद्ध, और ऐसी ही बातें; और शायद उनके कुछ निन्दापूर्ण मतों के विरुद्ध भी। परन्तु स्वतन्त्र इच्छा, धर्मी ठहराए जाने, बपतिस्मा के बाद लालसा के पाप होने, अन्तर्निहित धार्मिकता, और उद्धार की निश्चयता के विषयों पर समुद्र पार के पोप-अनुयायी कह सकते हैं कि वे पूरी तरह उनके हैं, और घर में रहनेवाले असहमत जन उन पर डींग मारते हैं। और सब बातों में वे किनारे के इतने निकट रहते हैं कि किसी भी अवसर पर वे उनकी ओर कदम बढ़ा सकते हैं।" मैं इस अंश पर कोई टिप्पणी नहीं करता: वह स्वयं बोलता है। मेरे पाठक सम्भवतः मुझसे सहमत होंगे कि अच्छा होता यदि ऑक्सफ़ोर्ड के उप-कुलपति सदा रॉबर्ट एबट की तरह स्पष्ट और विश्वासयोग्य रूप से बोलते, और यह कि केवल लॉड ही नहीं है जिसे ऐसी सार्वजनिक फटकार की आवश्यकता पड़ी हो। इसलिए मैं केवल यह कहता हूँ कि इस अंश में लॉड के विरुद्ध जो आरोप हैं उन्हें ध्यान से देखिए। वह स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से दिखाता है कि ऑक्सफ़ोर्ड का आकलन क्या था, और लॉड के धर्मविज्ञान का वास्तविक स्वरूप क्या था। लॉड के जीवन के इस काल की दूसरी घटना, जिस पर मैं ध्यान चाहता हूँ, वह टकराव है जो सन् 1616 में ग्लॉस्टर के डीन-पद पर नियुक्त होते ही उसके और ग्लॉस्टर के अध्यक्ष के बीच हुआ। गिरजाघर में पद सँभालते ही उसका पहला काम यह था कि प्रभु-भोज की मेज़ को उस स्थान से हटा दिया जहाँ वह बहुत समय से गायक-मण्डली के मध्य में रखी थी, और पूर्वी छोर की दीवार के पास रखवा दिया, जहाँ उसने आदेश दिया कि वह वेदी की तरह खड़ी रहे। यह परिवर्तन अब अनेक लोगों को तुच्छ लग सकता है, क्योंकि हम 200 वर्षों से मेज़ को इसी स्थिति में देखने के अभ्यस्त रहे हैं; परन्तु मेज़ की पुरानी स्थिति की सही समझ प्रसिद्ध वाक्यांश, "उत्तर की ओर," पर विस्तृत प्रकाश डालती है। सन् 1616 में सब भले प्रोटेस्टेंटों को यह परिवर्तन बहुत गम्भीर बात लगा, क्योंकि वह वेदी की पोप-सम्बन्धी धारणा को लौटाने और प्रभु-भोज में बलिदान, याजक और मिस्सा की धारणा को प्रोत्साहन देने की ओर ले जाता था। ग्लॉस्टर के लोग सब अंग्रेज़ नागरिकों में पोप-मत की ओर झुकाव की ज़रा-सी झलक को भी सबसे कम पसन्द करनेवाले थे। वे भले अध्यक्ष हूपर को, और अपनी शहादत से पहले प्रभु-भोज के विषय में उसके बार-बार दिए गए उपदेश को, भूले नहीं थे। ग्लॉस्टर का अध्यक्ष माइल्स स्मिथ, जो पवित्र और विद्वान मनुष्य और बाइबल के अधिकृत अनुवाद के प्रमुख अनुवादकों में से एक था, इस परिवर्तन से किसी भी अन्य से अधिक अप्रसन्न हुआ, और उसने घोषणा की कि यदि वह
