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अध्याय XIV. — युस्टीन प्रार्थना करता है कि यह विनती हो

अध्याय XIV. — युस्टीन प्रार्थना करता है कि यह विनती हो

अनुमति पाएँ कि वे उनसे परिचित हों, खेले गए रूप में भी और लिखे रूप में भी। अब से हम चुप रहेंगे, जितना हम कर सके उतना करके, और यह प्रार्थना जोड़कर कि सब जगह सब मनुष्य सत्य के योग्य गिने जाएँ। और क्या

प्रकाशित हो।

इसलिये हम तुम से प्रार्थना करते हैं कि इस छोटी पुस्तक को प्रकाशित करो, जो तुम्हें ठीक लगे उसे जोड़कर, ताकि हमारे विचार औरों को ज्ञात हों, और इन मनुष्यों को गलत धारणाओं से और भले की अनजान से छूटने का उचित अवसर मिले, जो अपनी ही गलती से अधीन हो गए हैं

कि आप भी, भक्ति के योग्य रीति से और दर्श-

न के योग्य,'* अपने निमित्त न्याय से न्याय करें !

3 [शमौन मागुस वह है जिससे युस्टीन पूरी तरह

पारिवारिक-, और इसलिए हम जल्दबाजी से यह न निष्कर्ष निकालें कि उसने सबाइन परमेश्वर के रूप में उसे दी गई दैवी प्रतिष्ठा के विषय में भूल की।]

' मनुष्यों में; फैलाया गया वचन। 2 अक्षरशः, दूर से धुँधला देखा गया।

* [.एक और सम्बोधन, और " पियस दार्शनिक" सम्राट पर सीधा प्रहार।]

[सन्त याकूब i. 21.]

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