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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
जब मसीह पृथ्वी पर था, तब यरूशलेम नगर में दो असाधारण मनुष्य रहते थे। उनमें से एक का नाम इतिहास में नहीं आया—हम नहीं जानते कि वह कौन था; दूसरे का नाम बताया गया है। एक केवल भिखारी ही नहीं, वरन् जन्म से अंधा भी था; दूसरा यरूशलेम के धनवानों में से एक था। फिर भी यूहन्ना रचित सुसमाचार में किसी भी दूसरे पात्र की अपेक्षा इस अंधे भिखारी को अधिक स्थान दिया गया है। इस मनुष्य के विषय में इतना कुछ लिखे जाने का कारण यह है कि वह यीशु मसीह के पक्ष में खड़ा हुआ।
यूहन्ना 9 में, पाँचवें पद से आरम्भ होनेवाला वृत्तान्त देखिए। इससे पहले के अध्याय में मसीह उनसे कह रहा था कि वह जगत की ज्योति है, और जो कोई उसके पीछे हो लेगा वह अंधकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा। इस प्रकार का कथन करने के बाद मसीह प्रायः कोई आश्चर्यकर्म करके अपनी कही हुई बात की
सच्चाई का प्रमाण
दिया करता था। यदि उसने कहा था कि वह जगत की ज्योति है, तो वह उन्हें दिखा देता था कि वह किस रीति से जगत की ज्योति है। यदि उसने कहा था कि वह जगत का जीवन है, तो वह मरे हुओं को जिलाकर और उठाकर प्रमाणित कर देता था कि वह वैसा ही है; ठीक वैसे ही जैसे उसने यह कहने के बाद कि पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ, बैतनिय्याह के कब्रिस्तान में जाकर लाज़र को बाहर बुलाया। जब लाज़र ने अपने मित्र का यह शब्द सुना, “हे लाज़र, निकल आ!” तो वह तुरन्त निकल आया।
परमेश्वर का पुत्र मनुष्यों से यह नहीं कहता कि वे बिना किसी कारण के उस पर विश्वास करें। हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। किसी मनुष्य से गवाही के बिना विश्वास करने को कहना वैसा ही है, जैसा उससे बिना प्रकाश या बिना आँखों के देखने को कहना।
उसने उन्हें अपने ऊपर विश्वास करने का उचित कारण दिया, और अपना मसीहा होना और अपना अधिकार प्रमाणित किया। उसने उनसे केवल यह ही नहीं कहा कि उसके पास सामर्थ्य है, वरन् उन्हें दिखा भी दिया कि उसके पास सामर्थ्य है।
तो ये दोनों मनुष्य यरूशलेम में थे। एक का पद नगर में किसी के भी पद जितना ऊँचा था, और दूसरे का किसी के भी पद जितना नीचा। एक सामाजिक सीढ़ी के सबसे ऊपर था, और दूसरा सबसे नीचे। फिर भी दोनों ने अच्छा अंगीकार किया; और यीशु को एक उतना ही ग्रहणयोग्य था जितना दूसरा।
1
इस अध्याय में जिस मनुष्य का उल्लेख है वह जन्म से अंधा था। हम देखते हैं कि प्रभु के चेलों ने उससे पूछा:
“हे रब्बी, किसने पाप किया था कि यह अंधा जन्मा, इस मनुष्य ने या उसके माता-पिता ने?”
यीशु ने उत्तर दिया, “न तो इसने पाप किया था, न इसके माता-पिता ने; परन्तु यह इसलिये हुआ कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों।”
यह कहकर उसने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी; और वह मिट्टी उस अंधे की आँखों पर लगाकर उससे कहा:
“जा, शीलोह के कुण्ड में धो ले।”
अंधे ने जाकर धोया, और उसकी दृष्टि लौट आई।
देखिए, उस मनुष्य ने क्या किया। उसने ठीक वही किया जो मसीह ने उससे करने को कहा था। उद्धारकर्ता की उसे आज्ञा यह थी कि शीलोह के कुण्ड में जाकर धो ले; और “उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।” आज्ञा मानने के कार्य में ही उसे आशीष मिली।
एक और विचार: परमेश्वर साधारणतः अपने आप को दोहराता नहीं। जितने अंधे मसीह के पृथ्वी पर रहते समय चंगे किए गए, उनमें से कोई भी दो ठीक एक ही रीति से चंगे नहीं किए गए। यीशु यरीहो के फाटकों के पास अंधे बरतिमाई से मिला, और उसे अपने पास बुलाकर कहा:
“तू क्या चाहता है कि मैं तेरे लिये करूँ?”
उत्तर यह था: “हे प्रभु, यह कि मैं देखने लगूँ।”
अब देखिए उसने क्या किया। उसने बरतिमाई को बीस मील दूर यरूशलेम में शीलोह के कुण्ड में धोने के लिये नहीं भेजा। उसने भूमि पर थूककर मिट्टी नहीं सानी, न उसकी आँखों पर लगाई; परन्तु एक ही वचन से उसे चंगा कर दिया, और कहा:
“चला जा, तेरे विश्वास ने तुझे चंगा कर दिया है।”
मान लीजिए कि बरतिमाई यरीहो से चलकर यरूशलेम नगर के फाटक पर उस दूसरे अंधे भिखारी से मिलता, और उससे पूछता कि उसने दृष्टि कैसे पाई; मान लीजिए कि वे आपस में अपने-अपने अनुभव मिलाने लगते—एक अपना अनुभव बताता, और दूसरा अपना। कल्पना कीजिए कि पहला कहता:
“मैं नहीं मानता कि तुझे दृष्टि मिली है, क्योंकि तूने उसे उस रीति से नहीं पाया जिस रीति से मैंने अपनी पाई।”
क्या प्रभु यीशु ने उन्हें जिन भिन्न-भिन्न रीतियों से चंगा किया, उनके कारण उनकी घटनाएँ कुछ कम सच्ची हो जातीं? फिर भी आज कुछ लोग ठीक इसी प्रकार की बातें करते हैं। क्योंकि परमेश्वर कुछ लोगों के साथ ठीक वैसा व्यवहार नहीं करता जैसा दूसरों के साथ करता है, इसलिये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर उनके साथ कुछ भी व्यवहार नहीं कर रहा है। परमेश्वर शायद ही कभी अपने आप को दोहराता है। जहाँ तक मेरा अनुभव है, कोई भी दो व्यक्ति कभी ठीक एक ही समान रीति से मन फिराकर परमेश्वर की ओर नहीं आए। हर एक का अपना निजी अनुभव होना चाहिए। प्रभु को अपनी ही रीति से दृष्टि देने दीजिए।
हज़ारों लोग ऐसे हैं जो
मसीह से दूर रहते हैं
क्योंकि वे किसी प्रिय मित्र या संबंधी के जैसे अनुभव की बाट जोह रहे हैं। उन्हें अपने मन फिराने को दूसरों के अनुभवों से नहीं परखना चाहिए। उन्होंने किसी को यह बताते सुना है कि बीस वर्ष पहले उसका मन कैसे फिरा था, और वे आशा करते हैं कि उनका मन भी उसी रीति से फिरेगा। लोगों को कभी यह भरोसा नहीं रखना चाहिए कि उनका अनुभव ठीक किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति के अनुभव के समान होगा जिसके विषय में उन्होंने सुना या पढ़ा है। उन्हें सीधे प्रभु ही के पास जाना चाहिए, और जो वह उनसे करने को कहे वही करना चाहिए। यदि वह कहता है, “शीलोह के कुण्ड में जाकर धो ले,” तो उन्हें जाना ही चाहिए। यदि वह कहता है, “जैसे हो वैसे ही आ जाओ,” और दृष्टि देने की प्रतिज्ञा करता है, तो उन्हें आना ही चाहिए, और उसे अपना काम अपनी ही रीति से करने देना चाहिए, ठीक जैसे इस अंधे मनुष्य ने किया। किसी मनुष्य को दृष्टि देने का यह एक अनोखा ढंग था; परन्तु यह प्रभु का ढंग था; और उस मनुष्य को दृष्टि मिल गई। हम सोच सकते हैं कि किसी की आँखों में मिट्टी भर देना तो उसे अंधा बना देने के लिये काफ़ी है। यह सच है कि अब वह दुगुना अंधा था; क्योंकि यदि वह पहले देख भी सकता, तो वह मिट्टी उसकी दृष्टि छीन लेती। परन्तु प्रभु लोगों को यह दिखाना चाहता था कि वे न केवल स्वभाव से आत्मिक रूप से अंधे हैं, वरन् उन्होंने अपने आप को इस संसार की उस मिट्टी से भी अंधा हो जाने दिया है जो उनकी आँखों पर लीप दी गई है। परन्तु परमेश्वर की गति हमारी गति नहीं है। यदि वह काम करने जा रहा है, तो हमें उसे अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने देना चाहिए।
क्या हम सर्वशक्तिमान को आदेश देंगे? क्या मिट्टी कुम्हार से कहेगी, “तू ने मुझे ऐसा क्यों बनाया?” हे मनुष्य, भला तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है? परमेश्वर को अपनी ही रीति से काम करने दीजिए; और जब पवित्र आत्मा आए, तो उसे अपने लिये मार्ग ठहराने दीजिए। हमें बिना कोई भी प्रश्न उठाए अधीन होने और जो कुछ प्रभु हमसे कहे उसे करने के लिये तैयार रहना चाहिए।
“अतः उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया। तब पड़ोसी और जिन्होंने पहले उसे अंधा देखा था, कहने लगे, ‘क्या यह वही नहीं, जो बैठा भीख माँगा करता था?’”
“कुछ लोगों ने कहा, ‘यह वही है’; औरों ने कहा, ‘यह उसके समान है।’”
अब, यदि वह आज के बहुत से लोगों के समान होता, तो मुझे डर है कि वह चुप ही रहता। वह कहता:
“अच्छा, अब मुझे दृष्टि मिल गई है, और मैं इसके विषय में चुप ही रहूँगा। इसका अंगीकार करना मेरे लिये आवश्यक नहीं। मैं कुछ क्यों कहूँ? इस यीशु मसीह नामक मनुष्य का बहुत विरोध हो रहा है। यरूशलेम में उसके विरुद्ध बहुत सी कड़वी बातें कही जाती हैं। उसके बहुत से शत्रु हैं। मुझे लगता है कि यदि मैं उसके विषय में बोलूँगा तो संकट आएगा; इसलिये मैं कुछ नहीं कहूँगा।”
कुछ लोगों ने कहा, “यह वही है”; औरों ने कहा, “यह उसके समान है।” परन्तु उसने कहा, “मैं वही हूँ।” उसकी न केवल आँखें खुलीं, परन्तु, परमेश्वर का धन्यवाद हो, उसका मुँह भी खुल गया!
निश्चय ही, जब हमारी आँखें खुल जाती हैं, तो उसके बाद अगला काम यह है कि हम अपने होंठ खोलें और उसके लिये गवाही देना आरम्भ करें।
लोगों ने उससे पूछा, “तेरी आँखें कैसे खुल गईं?”
उसने उत्तर दिया: “यीशु नामक एक व्यक्ति ने मिट्टी सानी, और मेरी आँखों पर लगाकर मुझ से कहा, ‘शीलोह के कुण्ड में जाकर धो ले’; तो मैं गया, और धोकर देखने लगा।”
उसने एक सीधी-सादी कहानी सुनाई, ठीक वही जो प्रभु ने उसके लिये किया था। बस इतना ही। एक गवाह को यही करना चाहिए—जो वह जानता है वह बताए, न कि वह जो वह नहीं जानता। उसने लम्बा भाषण देने का प्रयत्न नहीं किया। जूरी पर सबसे अधिक प्रभाव उस गवाह का नहीं पड़ता जो सबसे अधिक चंचल और धाराप्रवाह बोलनेवाला हो।
इस मनुष्य की गवाही को मैं “अनुभव” कहता हूँ। आज सुसमाचार की उन्नति में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक यह है कि कलीसिया के अनुभव सुनाने को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। बहुत से पुरुष और स्त्रियाँ कलीसिया में आते हैं, और हम उनके अनुभवों के विषय में, या प्रभु ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया इसके विषय में, कभी कुछ नहीं सुनते। यदि हम सुन पाते, तो इससे दूसरों को बड़ी सहायता मिलती। इससे विश्वास को प्रेरणा मिलती और झुण्ड के निर्बल सदस्यों का साहस बढ़ता।
प्रेरित पौलुस का अनुभव
तीन बार लिखा गया है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि वह जहाँ कहीं गया वहाँ उसने इसे सुनाया: कि परमेश्वर ने उससे कैसे भेंट की; परमेश्वर ने कैसे उसकी आँखें और उसका हृदय खोला; और परमेश्वर ने कैसे उसे आशीष दी। निश्चय जानिए, अनुभव का अपना स्थान है; आज जो बड़ी भूल की जा रही है वह दूसरी अति पर है। कुछ स्थानों पर और कुछ समयों में इसकी अति हो गई थी—सब कुछ अनुभव ही अनुभव था; और अब हमने लोलक (पेंडुलम) को दूसरी ओर बहुत दूर तक झूल जाने दिया है।
मैं समझता हूँ कि हमारा अपना अनुभव सुनाना न केवल उचित है, वरन् अत्यन्त लाभदायक भी है। इस मनुष्य ने गवाही दी कि प्रभु ने उसके लिये क्या किया था।
“जिस दिन यीशु ने मिट्टी सानकर उसकी आँखें खोली थीं वह सब्त का दिन था। फिर फरीसियों ने भी उससे पूछा कि उसने दृष्टि कैसे पाई। उसने उनसे कहा, ‘उसने मेरी आँखों पर मिट्टी लगाई, फिर मैंने धो लिया, और अब देखता हूँ।’ इस पर कई फरीसी कहने लगे, ‘यह मनुष्य परमेश्वर की ओर से नहीं, क्योंकि वह सब्त का दिन नहीं मानता।’ औरों ने कहा, ‘पापी मनुष्य ऐसे आश्चर्यकर्म कैसे कर सकता है?’ अतः उनमें फूट पड़ी।
उन्होंने उस अंधे से फिर कहा, ‘उसने जो तेरी आँखें खोलीं, तू उसके विषय में क्या कहता है?’”
प्रश्नों को टाल देने का उसके पास कैसा अवसर था! वह कह सकता था: “अरे, मैंने तो उसे कभी देखा ही नहीं। जब वह मुझसे मिला तब मैं अंधा था; मैं उसे देख नहीं सकता था। जब मैं लौटकर आया तो वह मुझे मिला नहीं; और मैंने अभी तक कोई राय नहीं बनाई है।” वह उन्हें इस प्रकार टाल सकता था, परन्तु उसने कहा:
“वह भविष्यद्वक्ता है।”
उसने उन्हें अपनी राय बता दी। वह रीढ़ वाला मनुष्य था। उसमें नैतिक साहस था। वह यीशु मसीह के शत्रुओं, अर्थात् फरीसियों, के बीच सीधा खड़ा हो गया, और उन्हें बता दिया कि वह उसके विषय में क्या सोचता है—
“वह भविष्यद्वक्ता है।”
यदि आप नये मसीहियों को अपने विषय में नहीं, परन्तु मसीह के विषय में बोलने के लिये तैयार कर सकें, तो उनकी गवाही में सामर्थ्य होगी। बहुत से नये विश्वासी पूरी तरह अपने ही अनुभव की बातें करते रहते हैं—“मैं,” “मैं,” “मैं,” “मैं।” परन्तु यह अंधा मनुष्य अपने से हटकर स्वामी की ओर पहुँच गया, और कहा, “वह भविष्यद्वक्ता है।” उसने विश्वास किया, और जो उसने विश्वास किया वह उन्हें बता दिया।
“परन्तु यहूदियों को विश्वास न हुआ कि यह अंधा था और अब देखता है, जब तक उन्होंने उसके माता-पिता को जिसकी आँखें खुल गई थीं, बुलाकर उनसे न पूछा, ‘क्या यह तुम्हारा पुत्र है, जिसे तुम कहते हो कि अंधा जन्मा था? फिर अब वह कैसे देखता है?’ उसके माता-पिता ने उत्तर दिया, ‘हम तो जानते हैं कि यह हमारा पुत्र है, और अंधा जन्मा था; परन्तु हम यह नहीं जानते कि अब कैसे देखता है; और न यह जानते हैं कि किसने उसकी आँखें खोलीं; वह सयाना है; उसी से पूछ लो; वह अपने विषय में आप कह देगा।’ ये बातें उसके माता-पिता ने इसलिये कहीं क्योंकि वे यहूदियों से डरते थे; क्योंकि यहूदी एका कर चुके थे कि यदि कोई कहे कि वह मसीह है, तो आराधनालय से निकाला जाए। इसी कारण उसके माता-पिता ने कहा, ‘वह सयाना है; उसी से पूछ लो।’”
उन माता-पिता के प्रति मेरे मन में सदा बड़ी घृणा रही है। उनका एक श्रेष्ठ पुत्र था, और प्रभु यीशु मसीह ने उनके पुत्र के लिये जो किया था, उसका वहीं और उसी समय अंगीकार करने के नैतिक साहस की कमी उन्हें उस पुत्र के अयोग्य ठहराती है। वे कहते हैं, “हम नहीं जानते कि इसने यह कैसे पाई,” जिससे ऐसा लगता है मानो वे अपने ही पुत्र का विश्वास नहीं करते थे। “वह सयाना है; उसी से पूछ लो।”
यह दुःखद सत्य है कि आज हमारे बीच सैकड़ों और हज़ारों ऐसे लोग हैं जो यीशु मसीह के चेले होने का दावा करते हैं, परन्तु जब वह समय आता है कि उन्हें उसके पक्ष में खड़े होकर उसके लिये स्पष्ट गवाही देनी चाहिए, तब वे उसके विरुद्ध गवाही देते हैं। आप सदा पहचान सकते हैं कि कौन लोग सचमुच मन फिराकर परमेश्वर की ओर आए हैं। नया मनुष्यत्व सदा परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होता है; और पुराना मनुष्यत्व उसके विरोध में खड़ा होता है। इन माता-पिता के पास प्रभु यीशु मसीह का अंगीकार करने, और उसके लिये बड़े-बड़े काम करने का अवसर था; परन्तु उन्होंने अपने सुनहरे अवसर को खो दिया।
यदि वे अपने श्रेष्ठ पुत्र के साथ खड़े होकर इतना ही कहते, “यह हमारा पुत्र है। हमने सब वैद्यों को आज़मा लिया, और अपनी सामर्थ्य भर सब उपाय किए, पर उसके लिये कुछ न कर सके; परन्तु अब कृतज्ञता के साथ हम अंगीकार करते हैं कि उसने गलील के भविष्यद्वक्ता, नासरत के यीशु से दृष्टि पाई है,” तो वे बहुतों को उस पर विश्वास करने की ओर ले आते। परन्तु ऐसा करने के बदले उन्होंने कहा, “हम तो जानते हैं कि यह हमारा पुत्र है, और अंधा जन्मा था; परन्तु हम यह नहीं जानते कि अब कैसे देखता है।”
क्या आप जानते हैं कि वे क्यों नहीं बताना चाहते थे कि उसने दृष्टि कैसे पाई? केवल इसलिये कि ऐसा करना
उन्हें बहुत महँगा पड़ता
वे उन मसीहियों के प्रतीक हैं जो मसीह की सेवा नहीं करना चाहते यदि उसमें उनका कुछ भी खर्च होता हो; यदि उन्हें समाज, पद या सांसारिक सुख-विलास छोड़ना पड़े। वे बाहर निकलकर खुलकर सामने आना नहीं चाहते। यही बात सैकड़ों और हज़ारों लोगों को मसीही बनने से रोकती है।
उन दिनों आराधनालय से निकाला जाना एक गम्भीर बात थी। आज इसका बहुत महत्त्व नहीं है। यदि किसी मनुष्य को एक कलीसिया से निकाल दिया जाए, तो दूसरी उसे ग्रहण कर सकती है; परन्तु जब वह आराधनालय से निकल जाता था तो उसे अपनाने के लिये कोई दूसरा नहीं था। वह राज्य का धर्म-संस्थान था: उनके पास केवल वही एक था। यदि उसे उससे निकाल दिया जाता, तो वह समाज, पद और बाकी सब कुछ से भी निकाल दिया जाता था; और उसके व्यापार को भी हानि उठानी पड़ती थी।
तब यहूदियों ने उस मनुष्य को जो अंधा था फिर बुलाया, “और उससे कहा, ‘परमेश्वर की स्तुति कर; हम तो जानते हैं कि वह मनुष्य पापी है।’”
अब ऐसा लगता है मानो वे उसके मन में मसीह के विरुद्ध पूर्वाग्रह भरने का प्रयत्न कर रहे थे: परन्तु उसने “उत्तर दिया, ‘मैं नहीं जानता कि वह पापी है या नहीं; मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अंधा था और अब देखता हूँ।’”
वहाँ कोई अविश्वासी या दार्शनिक नहीं था जो उसे इस बात से डिगा सके। यरूशलेम में इतने लोग नहीं थे जो उसे यह विश्वास दिला सकें कि उसकी आँखें नहीं खुलीं। क्या वह नहीं जानता था कि बीस वर्ष से अधिक समय तक वह टटोल-टटोलकर यरूशलेम में इधर-उधर फिरता रहा था; कि बच्चे और मित्र उसका हाथ पकड़कर उसे ले जाते थे; और कि उन सारे वर्षों में उसने न सूर्य को उसके तेज में देखा था, न प्रकृति की किसी सुन्दरता को? क्या वह नहीं जानता था कि ठीक उसी दिन तक वह जीवन में टटोल-टटोलकर मार्ग ढूँढ़ता आया था?
और क्या हम नहीं जानते कि हम परमेश्वर से जन्मे हैं, और हमारी आत्मा की आँखें खुल गई हैं? क्या हम नहीं जानते कि पुरानी बातें बीत गई हैं और सब बातें नई हो गई हैं, और अनन्त ज्योति हमारी आत्मा पर उदय हुई है? क्या हम नहीं जानते कि जिन जंज़ीरों ने कभी हमें जकड़ रखा था वे टूटकर अलग हो गई हैं, कि अंधकार चला गया है, और ज्योति आ गई है? जहाँ कभी हम बन्धन में थे, क्या वहाँ अब हमें स्वतंत्रता नहीं मिली? क्या हम इसे नहीं जानते? यदि जानते हैं, तो आइए हम चुप न रहें। आइए हम परमेश्वर के पुत्र के लिये गवाही दें, और जैसे उस अंधे ने यरूशलेम में कहा था वैसे ही कहें, “मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अंधा था और अब देखता हूँ। मेरे पास एक नई सामर्थ्य है। मेरे पास एक नई ज्योति है। मेरे पास एक नया प्रेम है। मेरा एक नया स्वभाव है। मेरे भीतर कुछ ऐसा है जो परमेश्वर की ओर बढ़ता है। विश्वास की आँख से मैं उस पार के स्वर्ग को देख सकता हूँ। मैं मसीह को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देख सकता हूँ। आगे चलकर, जब मेरी यात्रा पूरी हो जाएगी, मैं वह शब्द सुनूँगा जो कहेगा, ‘इधर आ,’ और तब मैं परमेश्वर के राज्य में बैठूँगा।”
“उन्होंने उससे फिर कहा, ‘उसने तेरे साथ क्या किया? और किस तरह तेरी आँखें खोलीं?’ उसने उनसे कहा, ‘मैं तो तुम से कह चुका, और तुम ने न सुना; अब दूसरी बार क्यों सुनना चाहते हो? क्या तुम भी उसके चेले होना चाहते हो?’”
यह एक अत्यन्त असाधारण मनुष्य था। यहाँ यरूशलेम में एक नया विश्वासी था, जो अभी एक दिन का भी नहीं हुआ था, और वह
चेले बनाने का प्रयत्न कर रहा था
—इन फरीसियों में से, उन लोगों में से जो लगभग तीन वर्ष से मसीह से लड़ते आ रहे थे! उसने उनसे पूछा कि क्या वे भी उसके चेले बनना चाहते हैं। जो कोई उसका अनुभव सुनने को तैयार था, उन सब को वह उसे सुनाने के लिये तैयार था। यदि उसने आरम्भ में ही उसे छिपा लिया होता, और तुरन्त खुलकर सामने न आया होता, तो उसे इस प्रकार गवाही देने का सौभाग्य न मिलता, और न वह आत्माओं को जीतनेवाला बनता। यह मनुष्य आत्माओं को जीतनेवाला बनने जा रहा था।
मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि वह यरूशलेम के सबसे अच्छे कार्यकर्ताओं में से एक बन गया। मुझे कोई सन्देह नहीं कि पिन्तेकुस्त के दिन, जब पतरस ने प्रचार किया, और जब छिदे हुए हृदयवाले लोग उसके चारों ओर थे, तब वह आगे-आगे खड़ा रहा होगा; वह काम में लग गया और बताने लगा कि प्रभु ने उसे कैसे आशीष दी थी, और वह उन्हें कैसे आशीष देगा। वह कार्यकर्ता था, आलसी नहीं, और उसने अपने होंठ खुले रखे।
यह बड़ी दुःख की बात है कि परमेश्वर की इतनी सारी सन्तानें गूँगी हैं; फिर भी यह सच है। माता-पिता अपने बच्चों के गूँगे जन्म लेने को बड़ी विपत्ति समझेंगे; वे उस पर शोक करेंगे, और रोएँगे; और ऐसा करना उचित भी है; परन्तु क्या आपने कभी परमेश्वर की उन बहुत सी गूँगी सन्तानों के विषय में सोचा है? कलीसियाएँ उनसे भरी पड़ी हैं; वे कभी मसीह के लिये नहीं बोलते। वे राजनीति, कला और विज्ञान के विषय में बातें कर सकते हैं; वे आजकल के फ़ैशन के विषय में भी भली-भाँति और तेज़ी से बोल सकते हैं; परन्तु उनके पास
परमेश्वर के पुत्र के लिये कोई आवाज़ नहीं है
प्रिय मित्र, यदि वह आपका उद्धारकर्ता है, तो उसका अंगीकार कीजिए। यीशु के हर एक अनुयायी को उसके लिये गवाही देनी चाहिए। हर एक को समाज में और व्यापार में यीशु मसीह के लिये एक वचन कहने के कितने अवसर मिलते हैं! प्रतिदिन कितने अवसर आते हैं जिनमें हर एक मसीही यीशु की ओर से विनती करने में “समय और असमय तैयार” रह सकता है! ऐसा करने से हम स्वयं आशीष पाते हैं, और दूसरों के लिये भी आशीष का माध्यम बनते हैं।
यह मनुष्य उन फरीसियों को चेला बनाना चाहता था, जिनके हाथ थोड़ी ही देर पहले पत्थरों से भरे थे, और जो परमेश्वर के पुत्र को मार डालने को तैयार थे, और अब भी जिनके हृदय में हत्या बसी थी। उन्होंने उसे बुरा-भला कहकर कहा, “तू ही उसका चेला है, हम तो मूसा के चेले हैं। हम जानते हैं कि परमेश्वर ने मूसा से बातें कीं; परन्तु इस मनुष्य को नहीं जानते कि कहाँ का है।”
अब, वह मनुष्य जो कभी अंधा था, कह सकता था, “बहुत विरोध हो रहा है, और मैं अब कुछ नहीं कहूँगा; मैं चुप रहूँगा, और उन्हें छोड़कर चला जाऊँगा।” परन्तु, परमेश्वर का धन्यवाद हो, वह पौलुस जैसे साहस के साथ सीधा खड़ा रहा! उसने उनको उत्तर दिया:
“यह तो अचम्भे की बात है कि तुम नहीं जानते कि वह कहाँ का है, तौभी उसने मेरी आँखें खोल दीं! हम जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता; परन्तु यदि कोई परमेश्वर का भक्त हो, और उसकी इच्छा पर चलता है, तो वह उसकी सुनता है।”
अब, मैं इसे तर्क कहता हूँ। यदि वह किसी धर्मविज्ञान विद्यालय से पढ़कर निकला होता, तब भी इससे अच्छा उत्तर न दे सकता। यह खरी शिक्षा है, और उन लोगों के लिये जो मसीह के काम का विरोध कर रहे थे एक अच्छा उपदेश था। “यदि यह व्यक्ति परमेश्वर की ओर से न होता, तो कुछ भी नहीं कर सकता।” यह इस बात का बहुत प्रबल प्रमाण है कि प्रभु यीशु कौन था, इस विषय में उस मनुष्य का दृढ़ निश्चय क्या था। मानो वह कह रहा हो: “मैं, जो जन्म से अंधा हूँ, और वह मुझे दृष्टि दे सकता है। और वह पापी!” अरे, यह तो तर्क के विरुद्ध है! यदि यीशु मसीह केवल एक मनुष्य होता, तो वह उस मनुष्य को दृष्टि कैसे दे सकता था?
दार्शनिक, संशयवादी और अविश्वासी इस प्रश्न का उत्तर दें,
न ही उसे चश्मा लगाना पड़ा। उसे अच्छी दृष्टि मिली, न कि कम दूरी तक देखनेवाली या कमज़ोर दृष्टि, परन्तु यरूशलेम के किसी भी मनुष्य जितनी अच्छी दृष्टि, और शायद उससे भी कुछ अच्छी। वे सब उसे देखकर स्वयं परख सकते थे। उसकी गवाही विवाद से परे थी।
मसीह के ईश्वरत्व और सामर्थ्य के उसके इस शानदार अंगीकार के बाद, “उन्होंने उसको उत्तर दिया, ‘तू तो बिलकुल पापों में जन्मा है, तू हमें क्या सिखाता है?’ और उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया।” वे उसके तर्क का सामना न कर सके, इसलिये उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया। आज भी ऐसा ही है। यदि हम मसीह के लिये स्पष्ट गवाही देंगे, तो संसार हमें बाहर निकाल देगा। मसीह के लिये अपनी गवाही इतनी स्पष्टता से देना कि संसार उसे नापसन्द करे, एक अच्छी बात है; यह एक अच्छी बात है जब मसीह के लिये ऐसी गवाही के कारण संसार हमें बाहर निकाल देता है।
आइए देखें कि जब उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया तब क्या हुआ। “यीशु ने सुना,” अगली बात यही है। जैसे ही उन्होंने उसे बाहर निकाला, यीशु ने उसके विषय में सुन लिया। यीशु मसीह के कारण संसार ने कभी किसी मनुष्य को बाहर नहीं निकाला जिसके विषय में उसने न सुना हो; वास्तव में, वही सबसे पहले उसके विषय में सुनेगा। “यीशु ने सुना कि उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया है; और जब उससे भेंट हुई तो कहा, ‘क्या तू परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है?’ उसने उत्तर दिया, ‘हे प्रभु, वह कौन है कि मैं उस पर विश्वास करूँ?’ यीशु ने उससे कहा, ‘तू ने उसे देखा भी है, और जो तेरे साथ बातें कर रहा है वही है।’ उसने कहा, ‘हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ!’ और उसे दण्डवत् किया।”
वह
उसे छोड़ने के लिये एक अच्छा स्थान था
—यीशु के चरणों में। आगे चलकर हम उससे परमेश्वर के राज्य में मिलेंगे।
उसकी गवाही इन पिछले उन्नीस सौ वर्षों से युगों-युगों में गूँजती चली आई है। जहाँ कहीं परमेश्वर का वचन जाना गया है, वहाँ इसकी चर्चा हुई है। उस मनुष्य ने परमेश्वर के पुत्र के लिये एक दिन में अद्भुत काम किया; निःसन्देह अनन्तकाल में बहुत से लोग होंगे जो मसीह के विषय में उसके अंगीकार के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करेंगे।
इस प्रकार खुलकर सामने आकर और मसीह का अंगीकार करके अपनी कृतज्ञता प्रगट करने से, उसने एक ऐसा लेखा छोड़ा है जिसने तब से परमेश्वर की कलीसिया को उभारा है। वह उन पात्रों में से एक है जिनके विषय में पढ़ते समय मनुष्य सदा उभर उठता है, और उसे नया जीवन और नई आग, नया साहस और नई हिम्मत मिलती है। आज हमें पहले की तरह ही इसी की आवश्यकता है—परमेश्वर के पुत्र के पक्ष में खड़े होने की। फरीसी हमारे विरुद्ध चाहे जितना क्रोध करें; संसार चाहे ठट्ठा करता रहे, ताने मारता रहे, और उपहास करता रहे; हम साहस के साथ परमेश्वर के पुत्र के पक्ष में खड़े रहेंगे। यदि वे हमें बाहर निकाल देंगे, तो सीधे उसी की गोद में डाल देंगे। वह हमें अपनी प्रेम भरी बाँहों में ले लेगा। मसीह यीशु में ऐसा भक्तिपूर्ण जीवन जीना कि संसार आपको न चाहे—कि वे आपको बाहर निकाल दें—एक धन्य बात है।
2
अब हम अरिमतिया के यूसुफ पर आते हैं।
मैं नहीं समझता कि वह उतनी श्रेष्ठता से खुलकर सामने आया जितना यह अंधा भिखारी आया; परन्तु वह सामने आया तो सही, और इसके लिये हम परमेश्वर का धन्यवाद करेंगे। हम यूहन्ना में पढ़ते हैं कि यहूदियों के डर के कारण वह खुलकर अंगीकार करने से रुका रहा।
“इन बातों के बाद अरिमतिया के यूसुफ ने, जो यीशु का चेला था, परन्तु यहूदियों के डर से गुप्त रूप से, पिलातुस से विनती की कि मैं यीशु की लोथ को ले जाऊँ; और पिलातुस ने उसकी विनती सुनी। अतः वह आकर यीशु की लोथ ले गया।”
चारों सुसमाचारों में अरिमतिया के यूसुफ के विषय में दिए गए चारों वृत्तान्त पढ़िए। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी बात का उल्लेख चारों सुसमाचार-लेखकों ने किया हो। यदि मत्ती और मरकुस किसी घटना का उल्लेख करते हैं तो प्रायः लूका और यूहन्ना उसे छोड़ देते हैं; और यदि वह बाद वालों में आती है, तो हो सकता है कि पहले वालों में न हो। अधिकांश उदाहरणों में यूहन्ना का सुसमाचार उन्हीं बातों से बना है जो दूसरों में नहीं हैं—जैसे ऊपर बताए गए अंधे मनुष्य की घटना में। परन्तु चारों ने लिखा है कि यूसुफ ने मसीह के लिये क्या किया। उसके सब चेले उसे छोड़ चुके थे। एक ने उसे बेच दिया था, और दूसरे ने उसका इनकार किया था। वह उदासी और अंधकार में अकेला छोड़ दिया गया था, तब अरिमतिया का यूसुफ सामने आया और उसने उसका अंगीकार किया।
यीशु मसीह की मृत्यु ही थी जिसने अरिमतिया के यूसुफ को सामने आने को प्रेरित किया। सम्भवतः वह उन लोगों में से एक था जो उस समय क्रूस के पास खड़े थे जब सूबेदार ने अपनी छाती पीटी और पुकार उठा, “सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था,” और निःसन्देह उसी समय उसे भी निश्चय हो गया। वह पहले से ही चेला था, क्योंकि हम पढ़ते हैं कि मुकदमे की रात उसने मसीह की मृत्यु के लिये अपनी सहमति नहीं दी थी। उस अवसर पर महासभा-भवन में कुछ आश्चर्य अवश्य फैला होगा, जब अरिमतिया का यूसुफ, एक धनवान मनुष्य, खड़ा हुआ और बोला:
“मैं उसकी मृत्यु के लिये कभी अपनी सहमति नहीं दूँगा।”
वे सत्तर लोग थे, परन्तु हमारे पास यह विश्वास करने का बहुत अच्छा कारण है कि उनमें से दो ऐसे थे जिनमें, प्राचीनकाल के कालेब और यहोशू की तरह, यीशु मसीह के पक्ष में खड़े होने का साहस था—ये थे अरिमतिया का यूसुफ और नीकुदेमुस: उनमें से किसी ने भी मसीह की मृत्यु के लिये अपनी सहमति नहीं दी। परन्तु मुझे डर है कि यूसुफ ने खुलकर सामने आकर यह नहीं कहा कि वह चेला है—क्योंकि क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद तक उसके चेला होने के विषय में हमें एक भी शब्द नहीं मिलता।
मुझे डर है कि
आज भी बहुत से यूसुफ हैं,
ऊँचे पद वाले लोग, जिनके विषय में कहा जा सकता है कि वे गुप्त चेले हैं। ऐसे लोग आज शायद कहेंगे, “मुझे मसीह के पक्ष में खड़े होने की आवश्यकता नहीं। मुझे और क्या चाहिए? मेरे पास सब कुछ है।” हम पढ़ते हैं कि वह एक धनवान और प्रतिष्ठित मंत्री था, एक धर्मी और भला मनुष्य, और राष्ट्र के शासन में ऊँचे पद पर था। वह परोपकारी मनुष्य भी था, और भक्त मनुष्य भी। उसे और क्या चाहिए था? परमेश्वर यूसुफ के अच्छे जीवन और ऊँचे पद से कुछ अधिक चाहता है। एक मनुष्य वह सब कुछ हो सकता है जो यूसुफ था, और फिर भी मसीह के बिना हो सकता है।
परन्तु उसके जीवन में एक संकट की घड़ी आई। यदि उसे मसीह के पक्ष में खड़ा होना था, तो उसके लिये अब ही वह समय था। मैं समझता हूँ कि किसी भी मनुष्य ने जो कार्य कभी किए हैं उनमें यह सबसे महान, सबसे श्रेष्ठ कार्यों में से एक है, कि वह मसीह के पक्ष में ऐसे समय खड़ा हुआ जब मानवीय दृष्टि से ऐसा लगता था कि मसीह के पास उसे देने के लिये कुछ भी नहीं है। यूसुफ को पुनरुत्थान के विषय में कोई आशा नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे प्रभु के चेलों में से किसी ने भी यह नहीं समझा था कि वह फिर जी उठेगा; पतरस, याकूब और यूहन्ना ने भी, बाकी सब की तरह, जब वह उन पर प्रगट हुआ तब मुश्किल से ही विश्वास किया कि वह जी उठा है। उन्होंने आशा की थी कि वह अपना राज्य स्थापित करेगा, परन्तु उसके हाथ में कोई राजदण्ड नहीं था; और जहाँ तक वे देख सकते थे, कोई राज्य भी दृष्टि में नहीं था। वास्तव में, वह क्रूस पर मरा हुआ था, और उसके हाथों और पाँवों में कीलें ठुकी थीं। वह वहाँ तब तक लटका रहा जब तक उसकी आत्मा उड़ न गई; जिस बात ने उसे इतना महान, इतना महिमामय और इतना श्रेष्ठ बनाया था, वह अब उस देह को छोड़ चुकी थी।
यूसुफ कह सकता था, “अब उसके पक्ष में खड़े होने से मुझे कोई लाभ नहीं होगा। यदि मैं खुलकर सामने आऊँ और उसका अंगीकार करूँ, तो सम्भवतः मैं समाज में और महासभा में अपना पद, और अपना प्रभाव खो दूँगा। अच्छा होगा कि मैं जहाँ हूँ वहीं बना रहूँ।”
उसके लिये कोई सांसारिक प्रतिफल नहीं था; मानवीय दृष्टि से ऐसा कुछ भी नहीं था जो उसे खुलकर सामने आने के लिये प्रेरित कर सकता; फिर भी मरकुस हमें बताता है कि वह हियाव करके पिलातुस के न्याय-भवन में गया और यीशु की लोथ माँगी। मैं समझता हूँ कि यह
सबसे उदात्त, सबसे महान कार्यों में से एक था
जो किसी भी मनुष्य ने कभी किया। उस अंधकार और उदासी में, जब उसके सब चेले उसे छोड़ चुके थे; यहूदा उसे चाँदी के तीस सिक्कों में बेच चुका था; प्रमुख प्रेरित पतरस श्राप देते हुए और शपथ खाकर कि वह उसे कभी जानता ही नहीं था, उसका इनकार कर चुका था; महायाजक उसे परमेश्वर की निन्दा का दोषी ठहरा चुके थे; महासभा उसे मृत्यु-दण्ड दे चुकी थी; और जब सारे यरूशलेम से घृणा की फुफकार स्वर्ग तक उठ रही थी, तब यूसुफ धारा के ठीक विपरीत, अपने सब मित्रों के प्रभाव के ठीक विरुद्ध चला, और उसने यीशु की लोथ माँगी।
धन्य कार्य! निःसन्देह उसने अपने आप को धिक्कारा होगा कि जब मसीह पर मुकदमा चला, और उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने का दण्ड मिलने से पहले, उसने उसके बचाव में और अधिक साहस क्यों नहीं दिखाया। पवित्रशास्त्र कहता है कि वह एक प्रतिष्ठित मनुष्य, एक प्रतिष्ठित मंत्री, एक धनवान मनुष्य था, फिर भी हमारे पास केवल उस एक बात का लेखा है—यीशु की लोथ माँगने का वह एक कार्य। परन्तु मैं आपसे कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के पुत्र के लिये, उसके प्रति शुद्ध प्रेम से, जो किया वह सदा जीवित रहेगा; अरिमतिया के यूसुफ ने जो कुछ भी कभी किया, उन सब से ऊपर वह एक कार्य उठ खड़ा होता है। हो सकता है उसने विभिन्न संस्थाओं को बड़ी-बड़ी धनराशियाँ दी हों, हो सकता है वह कंगालों के प्रति बहुत भला रहा हो, हो सकता है उसने अनेक प्रकार से ज़रूरतमन्दों पर बड़ी दया की हो; परन्तु उस स्मरणीय, उस अंधकारमय तीसरे पहर यीशु मसीह के लिये किया गया वह एक कार्य उन श्रेष्ठतम कार्यों में से एक था जो किसी मनुष्य ने कभी किए। वह अवश्य ही बड़े प्रभाव वाला मनुष्य रहा होगा, नहीं तो पिलातुस उसे लोथ न देता।
और अब आप एक और गुप्त चेले, नीकुदेमुस, को देखते हैं। नीकुदेमुस और यूसुफ क्रूस के पास जाते हैं। यूसुफ वहाँ पहले पहुँचता है, और जब वह नीकुदेमुस के आने की बाट जोह रहा होता है, तब वह पहाड़ी के नीचे की ओर देखता है; और मैं उसके आनन्द की कल्पना कर सकता हूँ जब वह अपने मित्र को सौ पाउंड सुगन्ध-द्रव्य लिये आते देखता है। यद्यपि यीशु मसीह ने इतना दीन जीवन बिताया था, फिर भी उसका राजसी अभिषेक और राजसी गाड़ा जाना होना था। परमेश्वर ने इन दोनों श्रेष्ठ मनुष्यों के हृदयों को छू लिया था, और उन्होंने कीलें निकालीं, और लोथ को नीचे उतारा, और उन घावों से लहू धोया जो कोड़ों से उसकी पीठ पर और काँटों के मुकुट से उसके सिर पर हुए थे; फिर उन्होंने उस निर्जीव देह को लेकर उसे धोकर स्वच्छ किया, और महीन मलमल में लपेटा, और यूसुफ ने उसे अपनी निज कब्र में रखा।
जब सब कुछ अंधकारमय और उदास था, जब उसका उद्देश्य नष्ट हुआ सा दिखाई देता था, और कलीसिया की आशा उस नई कब्र में गड़ी हुई थी, तब यूसुफ उस “तुच्छ जाने गए और मनुष्यों के त्यागे हुए” के पक्ष में खड़ा हुआ। यह उसके जीवन का सबसे बड़ा कार्य था; और, मेरे पाठक, यदि आप महिमा में प्रभु यीशु मसीह के साथ खड़े होना चाहते हैं; यदि आप चाहते हैं कि यहाँ नीचे सेवा के लिये परमेश्वर की सामर्थ्य आपको प्रदान की जाए, तो आपको सब मनुष्यों में सबसे अधिक तुच्छ जाने गए—मनुष्य मसीह यीशु—के पक्ष में हियाव और मर्दानगी के साथ खड़े होने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। उसका उद्देश्य लोकप्रिय नहीं है। भक्तिहीन उसके नाम का उपहास करते हैं। परन्तु यदि आप अपनी आत्मा पर स्वर्ग की आशीषें चाहते हैं, और यह सुनना चाहते हैं कि “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो,” तो तुरन्त उसके पक्ष में खड़े हो जाइए; आपका पद चाहे जो हो, और आपके मित्र चाहे कितने ही आपके विरुद्ध हों। क्रूस पर चढ़ाए गए परन्तु जी उठे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह, के लिये निर्णय कीजिए। छावनी से बाहर निकलकर उसकी निन्दा अपने ऊपर उठाइए। अपना क्रूस उठाकर उसके पीछे हो लीजिए, और आगे चलकर आप उसे नीचे रखेंगे और सदा पहनने के लिये मुकुट ग्रहण करेंगे।
मुझे याद है कि एक स्थान पर कुछ सभाएँ हो रही थीं जहाँ ज्वार बहुत शीघ्र नहीं उठ रहा था, और उस काम के विषय में कड़वी और निन्दा भरी बातें कही जा रही थीं। परन्तु एक दिन, उस स्थान के सबसे प्रमुख लोगों में से एक खड़ा हुआ और बोला:
“मैं चाहता हूँ कि यह सब को मालूम हो जाए कि मैं यीशु मसीह का चेला हूँ, और यदि उसके उद्देश्य पर कोई कलंक लगाया जाना है, तो मैं उसमें अपना भाग उठाने को तैयार हूँ।”
यह बात सभा में बिजली की धारा के समान दौड़ गई, और तुरन्त उसकी अपनी आत्मा पर और दूसरों की आत्माओं पर आशीष उतरी।
निश्चय जानिए,
क्रूस के बिना कोई मुकुट नहीं है
हमें यहाँ अपना उचित स्थान ग्रहण करना चाहिए, जैसा यूसुफ ने किया। अपना क्रूस उठाने में उसे कुछ मूल्य चुकाना पड़ा। मुझे कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने उसे महासभा से और आराधनालय से बाहर निकाल दिया। उसने अपनी प्रतिष्ठा, और शायद अपना धन भी खो दिया: मसीह के अन्य विश्वासयोग्य अनुयायियों की तरह, वह भी उस समय से एक तुच्छ जाना जानेवाला और अप्रिय मनुष्य बन गया।
अंधा मनुष्य वह नहीं कर सकता था जो यूसुफ ने किया। कुछ मनुष्य वह कर सकते हैं जो दूसरे नहीं कर सकते। परमेश्वर हमें हमारे अपने प्रभाव के लिये उत्तरदायी ठहराएगा। आइए हम में से हर एक वह करे जो वह कर सकता है। यद्यपि हमारे प्रभु के कहलानेवाले अनुयायियों का आचरण उन लोगों के लिये कुछ भी सहायक नहीं था, जिनमें यूसुफ की तरह प्रभु के पक्ष में खुलकर आने का बहुत थोड़ा ही साहस था, फिर भी वह अपना पक्ष लेने से पीछे नहीं हटा।
चाहे हमें कुछ भी मूल्य चुकाना पड़े, आइए हम सच्चे मसीही बनें, और दृढ़ता से खड़े रहें। परमेश्वर ने हमारे लिये जो रख छोड़ा है, उसकी तुलना में यह पलड़े पर की धूल के समान है। यदि हम उसके साथ सदा राज्य करनेवाले हैं, तो थोड़े समय के लिये उसके साथ दुःख उठाना हम सह सकते हैं। ऐसी उज्ज्वल आशा सामने रखकर, हम क्रूस उठाकर उसके पीछे चलना, और संसार के द्वारा तुच्छ जाने जाना और त्यागे जाना सह सकते हैं। यदि स्वर्ग की महिमाएँ वास्तविक हैं, तो अभी उसके त्यागे जाने में सहभागी होना उसकी स्तुति के लिये और हमारे लाभ के लिये होगा।
प्रभु हमें डगमगाने से बचाए रखे; और जब हम तराजू में तौले जाएँ, तो हल्के न पाए जाएँ! परमेश्वर हर एक पाठक की सहायता करे कि वह वह सब करे जो उस बेचारे अंधे भिखारी ने किया, और वह सब जो यूसुफ ने किया!
आइए हम हर समय और हर स्थान पर उसका अंगीकार करें। आइए हम अपने मित्रों को दिखा दें कि हम पूरी तरह से उसके पक्ष में हैं। हर एक का एक ऐसा दायरा होता है जिसे वह प्रभावित कर सकता है, और परमेश्वर हमें उस प्रभाव के लिये उत्तरदायी ठहराएगा जो हमारे पास है। अरिमतिया के यूसुफ और उस अंधे मनुष्य के ऐसे दायरे थे जिनमें उनका प्रभाव शक्तिशाली था। मैं ऐसे लोगों को प्रभावित कर सकता हूँ जिन तक दूसरे नहीं पहुँच सकते; और वे, अपनी बारी में, ऐसे वर्ग तक पहुँच सकते हैं जिसे मैं छू भी नहीं सकता। हम केवल थोड़े ही समय के लिये उसका अंगीकार और उसके लिये काम कर सकते हैं। यह केवल कुछ महीनों या वर्षों के लिये है; और फिर अनन्त युग बीतते चले जाएँगे, और आनेवाले मुकुट के दिन हमारा प्रतिफल बड़ा होगा। तब हम स्वामी को अपने से यह कहते सुनेंगे:
“धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो।”
परमेश्वर करे कि ऐसा ही हो!
