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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
पवित्रशास्त्र में मनुष्यों के अन्त की अपेक्षा परमेश्वर के काम के लिए उनकी बुलाहट को कहीं अधिक स्थान दिया गया है। उदाहरण के लिए, हम नहीं जानते कि यशायाह कहाँ मरा, या कैसे मरा, परन्तु हम उस बुलाहट के विषय में बहुत कुछ जानते हैं जो परमेश्वर ने उसे दी, जब उसने परमेश्वर को ऊँचे पर, अपने सिंहासन पर विराजमान और ऊँचा उठा हुआ देखा। मेरा अनुमान है कि आज भी यह सच है कि सैकड़ों युवक और युवतियाँ, जो किसी बुलाहट की बाट जोह रहे हैं और सचमुच जानना चाहते हैं कि उनके जीवन का उद्देश्य क्या है, शायद इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी समस्या पाते हैं। कुछ लोग ठीक-ठीक नहीं जानते कि कौन-सा पेशा या कौन-सा काम अपनाएँ, और इसलिए मैं मूसा की बुलाहट को लेकर देखना चाहता हूँ कि क्या हम उससे कुछ शिक्षाएँ नहीं निकाल सकते।
आपको स्मरण होगा कि जब परमेश्वर जलती हुई झाड़ी के पास मूसा से मिला और उसे उतना बड़ा काम करने के लिए बुलाया जितने बड़े काम के लिए इस संसार में कभी किसी मनुष्य को बुलाया गया हो, तब
उसने सोचा कि प्रभु से भूल हो गई है,
कि वह उस काम के योग्य मनुष्य नहीं है। उसने कहा, “मैं कौन हूँ?” वह अपनी दृष्टि में बहुत छोटा था। चालीस वर्ष पहले उसने भी उसी प्रकार शुरुआत की थी जिस प्रकार बहुत से दूसरे लोग करते हैं। उसने सोचा था कि वह सेवा के लिए भली-भाँति सुसज्जित है। वह मिस्रियों की पाठशालाओं में पढ़ चुका था, मिस्र के राजमहलों में रह चुका था, वह उच्च कुलीन समाज में उठता-बैठता था। जब उसने शुरुआत की तब उसके पास वे सब सुविधाएँ थीं जो किसी मनुष्य के पास हो सकती हैं; निस्सन्देह उसने अब्राहम के परमेश्वर से बुद्धि और मार्गदर्शन माँगे बिना ही शुरुआत की, और फिर भी वह असफल हो गया।
कितने ही लोगों ने किसी पेशे में शुरुआत की और उसमें असफल हो गए! उन्होंने परमेश्वर की आवाज़ नहीं सुनी, उन्होंने शिक्षा पाने के लिए परमेश्वर की बाट नहीं जोही।
मेरा अनुमान है कि मूसा ने सोचा होगा कि इस्राएलियों को यह जानकर बड़ा सम्मान अनुभव होगा कि राज्य का एक राजकुमार उनका पक्ष लेने जा रहा है, परन्तु आपको स्मरण होगा कि कैसे उसने अपना आपा खो दिया और उस मिस्री को मार डाला, और अगले दिन जब उसने दो इब्रियों के झगड़े में हस्तक्षेप किया, तो वे जानना चाहते थे कि किसने उसे उन पर न्यायी और हाकिम ठहराया है, और उसे भागकर जंगल में जाना पड़ा, और वह वहाँ चालीस वर्ष तक छिपा रहा। उसने उस मिस्री को मार डाला और इसके कारण अपना प्रभाव खो बैठा। स्वतंत्रता के लिए हत्या; सही के लिए गलत; अत्याचारों को सुधारने का यह एक घटिया तरीका था, और मूसा को प्रशिक्षण की आवश्यकता थी।
परमेश्वर के लिए उसे अपनी पाठशाला में रखने का यह एक लम्बा समय था, और एक मनुष्य के लिए अपने जीवन के सबसे अच्छे वर्षों में, चालीस से अस्सी वर्ष की आयु तक, प्रतीक्षा करना भी एक लम्बा समय था। मूसा का पालन-पोषण उन सब विलासिताओं के बीच हुआ था जो मिस्र उसे दे सकता था, और अब वह एक चरवाहा था, और मिस्रियों की दृष्टि में चरवाहा घृणित था। मेरा विचार है कि जब मूसा ने शुरुआत की थी तब उसका सिर उसके हृदय से कहीं बड़ा था। मैं मानता हूँ कि इतने सारे लोगों के असफल होने का यही कारण है; उनके
बड़े सिर और छोटे हृदय होते हैं
यदि किसी मनुष्य का हृदय सिकुड़ा हुआ और सिर बड़ा हो, तो वह एक दानव है। शायद मूसा इब्रियों को नीची दृष्टि से देखता था। बहुत से लोग इस विचार के साथ शुरुआत करते हैं कि वे बड़े हैं और दूसरे लोग छोटे हैं, और वे उन्हें उठाकर अपने ऊँचे स्तर तक ले आएँगे। परमेश्वर ने आज तक ऐसे स्वभाव के मनुष्य को कभी काम में नहीं लिया। शायद मूसा परमेश्वर की पाठशाला में धीमा विद्यार्थी था, और इसलिए परमेश्वर को उसे वहाँ चालीस वर्ष तक रखना पड़ा।
परन्तु अब वह तैयार है; वह ठीक वैसा ही मनुष्य है जैसा परमेश्वर चाहता है, और परमेश्वर उसे बुलाता है। मूसा ने कहा, “मैं कौन हूँ?” वह अपनी दृष्टि में बहुत छोटा था—ठीक इतना छोटा कि परमेश्वर उसे काम में ले सके। यदि आप मिस्रियों से पूछते कि वह कौन है, तो वे कहते कि वह
संसार का सबसे बड़ा मूर्ख है
वे कहते, “अरे, देखो तो उस मनुष्य के पास कैसा अवसर था! वह मिस्र की सेना का सेनापति हो सकता था, वह सिंहासन पर बैठकर सारे संसार पर राजदण्ड चला सकता था, यदि उसने अपने आपको उन कंगाल, अभागे इब्रियों के साथ न जोड़ा होता! सोचो तो, उसने कैसा अवसर खो दिया, और कैसा विशेषाधिकार फेंक दिया!”
चालीस वर्ष तक वह लोगों के मन से ओझल रहा, और वे नहीं जानते थे कि उसका क्या हुआ, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि उस पर लगी थी। सब लोगों में वही ठीक वह मनुष्य था जिसे परमेश्वर चाहता था, और जब वह उस प्रश्न के साथ परमेश्वर के सामने आया, “मैं कौन हूँ?” तो इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता था कि वह कौन था, परन्तु इससे कि उसका परमेश्वर कौन था। जब मनुष्य यह पाठ सीख लेते हैं कि वे कुछ भी नहीं हैं और परमेश्वर ही सब कुछ है, तब ऐसा कोई पद नहीं रहता जिसमें परमेश्वर उन्हें काम में न ले सके। छुटकारे का वह महान काम मूसा ने पूरा नहीं किया, क्योंकि वह तो परमेश्वर के हाथ में केवल एक साधन था। परमेश्वर मूसा के बिना भी फ़िरौन से बात कर सकता था। यदि वह चाहता तो गर्जन की आवाज़ में बोल सकता था, और एक ही बात से फ़िरौन का हृदय तोड़ सकता था, परन्तु उसने नीचे झुककर एक मानवीय माध्यम को अपनाया और उसे काम में लिया। वह जिब्राईल को नीचे भेज सकता था, परन्तु वह जानता था कि सब लोगों में मूसा ही वह मनुष्य है जिसकी आवश्यकता है, इसलिए उसने उसे बुलाया। परमेश्वर मनुष्यों से बात करने के लिए मनुष्यों को काम में लेता है: वह मध्यस्थों के द्वारा काम करता है। वह पलक झपकते ही इस्राएलियों का मिस्र से निकलना पूरा कर सकता था, परन्तु इसके बदले उसने एक अकेले और तुच्छ समझे गए चरवाहे को भेजना चुना कि वह पीड़ा और निराशा के बीच से उसके उद्देश्य को पूरा करे। पुराने नियम में परमेश्वर का यही तरीका था, और नये नियम में भी। उसने अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में भेजा कि वह परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ हो।
मूसा बहाने बनाता चला गया और बोला, “जब मैं वहाँ जाऊँगा, तो मैं क्या कहूँगा कि मुझे किसने भेजा है?” मेरा अनुमान है कि उसे स्मरण था कि कैसे उस पिछली बार वह भेजे जाने से पहले ही चल पड़ा था, और उसे फिर से असफल होने का डर था। जो मनुष्य एक बार असफल हो चुका हो, वह सदा डरता रहता है कि कहीं फिर असफल न हो जाए। वह अपने ऊपर से भरोसा खो बैठता है। अपने ऊपर से भरोसा खो देना अच्छी बात है, जिससे कि हम परमेश्वर पर भरोसा पा सकें।
प्रभु ने कहा, “उनसे यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है, उसी ने मुझे भेजा है।’”
किसी ने कहा है कि परमेश्वर ने उसे
एक कोरा चेक दे दिया,
और उस समय से उसे बस इतना ही करना था कि उसे भर दे। जब वह चट्टान से पानी निकालना चाहता, तो उसे बस चेक भरना होता; जब उसे रोटी चाहिए होती, तो उसे बस चेक भरना होता और रोटी आ जाती; उसका साहूकार धनी था। परमेश्वर ने उसे अपना साझेदार बना लिया था। परमेश्वर ने उसे अपना वारिस बना लिया था, और उसे बस इतना करना था कि उसकी ओर दृष्टि उठाए, और जो कुछ वह चाहता वह उसे मिल जाता।
फिर भी वह पीछे हटता हुआ दिखाई दिया, और एक और बहाना बनाने लगा, और बोला:
“वे मेरी प्रतीति न करेंगे।”
वह फ़िरौन से ही नहीं, इस्राएलियों से भी डरता था: वह जानता था कि अपने मित्रों तक से अपने ऊपर विश्वास करवाना कितना कठिन होता है।
अब, यदि परमेश्वर ने आपको और मुझे कोई सन्देश देकर भेजा है, तो यह कहना हमारा काम नहीं कि दूसरे उस पर विश्वास करेंगे या नहीं। हम मनुष्यों से विश्वास नहीं करवा सकते। यदि परमेश्वर ने मुझे मनुष्यों से विश्वास करवाने के लिए भेजा है, तो वह मुझे उनसे विश्वास करवाने की सामर्थ भी देगा। यीशु मसीह के पास वह सामर्थ नहीं थी; यह पवित्र आत्मा का काम है; जब तक हम पवित्र आत्मा और सामर्थ से बपतिस्मा न पाएँ, तब तक हम मनुष्यों को कायल नहीं कर सकते और सन्देहवाद तथा अविश्वास पर विजय नहीं पा सकते।
परमेश्वर ने मूसा से कहा कि वे अवश्य उसकी प्रतीति करेंगे, कि वह सफल होगा, और इस्राएलियों को दासत्व से निकाल लाएगा। परन्तु ऐसा लगता है कि मूसा उस परमेश्वर पर भी अविश्वास कर रहा था जिसने उससे बात की थी।
तब प्रभु ने कहा, “तेरे हाथ में वह क्या है?”
उसके पास एक लाठी या छड़ी थी, चरवाहे की एक प्रकार की टेढ़ी लाठी, जिसे उसने यों ही काट लिया था जब उसे किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता पड़ी थी जो जंगल में उसके काम आए।
“यह तो केवल एक लाठी है।”
“इसी से तू इस्राएलियों को छुड़ाएगा; इसी लाठी से तू इस्राएल को विश्वास दिलाएगा कि मैं तेरे साथ हूँ।”
जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अपने आपको उस लाठी से जोड़ दिया, तब उसका मूल्य उन सब सेनाओं से अधिक हो गया जो संसार ने कभी देखी थीं। देखिए और विचार कीजिए कि उस लाठी ने अपना काम कैसे किया। उसी से डाँसों की विपत्ति आई, और गर्जन-भरी आँधी आई, और जल लहू में बदल गया। फिर भी यह काम न तो मूसा ने किया, न मूसा की लाठी ने, परन्तु उस लाठी के परमेश्वर ने, मूसा के परमेश्वर ने किया। जब तक परमेश्वर उसके साथ था, वह असफल नहीं हो सकता था।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि परमेश्वर के दास असफल हो जाते हैं। जब हेरोदेस ने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का सिर कटवाया, तो ऐसा लगा कि यूहन्ना की सेवकाई असफल हो गई। परन्तु क्या वह असफल हुई? जो आवाज़ यरदन की घाटी में गूँजी थी, वह आज सारे संसार में गूँज रही है। आप आज भी पहाड़ों और घाटियों में उसकी प्रतिध्वनि सुन सकते हैं, “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।” उसने यीशु मसीह को ऊँचा उठाया और संसार से उसका परिचय कराया, और जब तक उसके जीवन का काम पूरा नहीं हो गया, तब तक हेरोदेस के पास उसका सिर कटवाने की सामर्थ नहीं थी। जहाँ तक हम जानते हैं, स्तिफनुस ने केवल एक ही उपदेश दिया, और वह महासभा के सामने था; परन्तु वह उपदेश सारे संसार में कैसे बार-बार सुनाया गया है! सम्भवतः उसी की मृत्यु में से पौलुस निकला, जो मसीह के इस पृथ्वी को छोड़ने के बाद से संसार का सबसे बड़ा प्रचारक हुआ है। यदि कोई मनुष्य यहोवा का भेजा हुआ है, तो असफलता नाम की कोई वस्तु नहीं है। क्या मसीह का जीवन असफल था? देखिए, आज उसके दृष्टान्त पृथ्वी भर में कैसे फैल रहे हैं। ऐसा लगता था कि प्रेरित असफल हो गए, परन्तु देखिए कितना कुछ पूरा हुआ है। यदि आप प्रेरितों के काम की पुस्तक पढ़ें, तो आप देखेंगे कि प्रेरितों के काम में हर एक दिखाई देनेवाली असफलता एक बड़ी विजय में बदल गई। मूसा असफल होनेवाला नहीं था, यद्यपि फ़िरौन ने तिरस्कार से कहा, “परमेश्वर कौन है कि मैं उसकी बात मानूँ?” उसने जान लिया कि परमेश्वर कौन है। उसने जान लिया कि एक परमेश्वर है।
परन्तु मूसा ने एक और बहाना बनाया, और कहा, “मैं बोलने में धीमा हूँ, मैं मुँह और जीभ का भद्दा हूँ।” उसने कहा कि वह
वक्ता नहीं है
मेरे मित्रो, हमारे पास वक्ता बहुत अधिक हैं। मैं आपके “चाँदी जैसी जीभवाले वक्ताओं” से ऊब गया हूँ और थक गया हूँ। मैं इस बात पर शोक किया करता था कि मैं वक्ता नहीं बन सकता। मैं सोचता था, ओह, काश, मुझमें भी कुछ लोगों के समान बोलने का वरदान होता! मैंने ऐसे लोगों को सुना है जिनकी धाराप्रवाह भाषा श्रोताओं को मोहित कर लेती थी, परन्तु वे आए और चले गए, उनकी आवाज़ हवा के समान थी, उसके पीछे कोई सामर्थ नहीं थी; वे अपनी वाक्पटुता और अपने सुन्दर भाषणों पर भरोसा रखते थे। पौलुस के मन में यही बात थी जब उसने कुरिन्थियों को लिखा:—“और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभानेवाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ का प्रमाण था: इसलिए कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो।”
अदालत में किसी गवाह को लीजिए और उसे गवाह के कठघरे में अपनी भाषण-कला आज़माने दीजिए, और देखिए कि न्यायाधीश कितनी जल्दी उसे बाहर कर देता है। जूरी पर सबसे अधिक प्रभाव उसी मनुष्य का पड़ता है जो सीधा-सादा, सरल सत्य बताता है।
मान लीजिए कि मूसा ने फ़िरौन के लिए एक भाषण तैयार किया होता, और अपने बाल अच्छी तरह चिकने करके सँवारे होते, और दर्पण के सामने खड़ा हुआ होता, या किसी भाषण-कला सिखानेवाले के पास गया होता कि वह उसे सिखाए कि ओजस्वी भाषण कैसे दिया जाता है और हाव-भाव कैसे किए जाते हैं। मान लीजिए कि उसने अपना कोट बन्द किया होता, एक हाथ अपनी छाती पर रखा होता, एक मुद्रा बनाई होती और आरम्भ किया होता:
“हमारे पूर्वजों के परमेश्वर, अब्राहम, इसहाक और याकूब के परमेश्वर ने मुझे आज्ञा दी है कि मैं मिस्र के महान राजा की उपस्थिति में आऊँ।”
मैं सोचता हूँ कि वे तुरन्त उसका सिर उड़ा देते! उनके पास ऐसे मिस्री थे जो मूसा जितने ही वाक्पटु हो सकते थे। उन्हें वाक्पटुता की आवश्यकता नहीं थी। जब आप किसी मनुष्य को मंच पर अपनी वाक्पटुता का प्रदर्शन करने का प्रयत्न करते देखते हैं, तो वह अपने आपको मूर्ख बना रहा है और लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न कर रहा है। मूसा बोलने में धीमा था, परन्तु उसके पास एक सन्देश था, और परमेश्वर यही चाहता था कि वह उस सन्देश को पहुँचाए। परन्तु वह बहाना बनाने पर अड़ा रहा। वह जाना नहीं चाहता था; स्वर्ग का सन्देशवाहक बनने के लिए, परमेश्वर का हरकारा बनने के लिए उत्सुक होने के बदले, वह अपने आपको छुड़ाना चाहता था। प्रभु ने उसकी बात रख ली और उसे एक दुभाषिया दे दिया, उसे हारून दे दिया।
अब, यदि संसार में कोई मूर्खता की बात है, तो वह दुभाषिये के द्वारा बात करना है। मैंने एक बार पेरिस में ऐसा करके देखा। मैं दुभाषिये के साथ एक छोटे-से डिब्बे जैसे मंच पर चढ़ गया—उसमें मुश्किल से एक ही व्यक्ति के लिए जगह थी। मैं एक वाक्य बोलता और वह एक ओर दूर तक झुक जाता, और फिर जब वह उसे फ़्रांसीसी भाषा में दोहराता तो मैं झुक जाता। क्या आप इससे अधिक मूर्खता की बात की कल्पना कर सकते हैं कि मूसा फ़िरौन के सामने जाए और हारून के द्वारा बात करे!
परन्तु बोलने में धीमा यही मनुष्य वाक्पटु बन गया। ग्लैडस्टन की भाषण-शक्ति की बात करते हो! यहाँ एक सौ बीस वर्ष का एक मनुष्य है, और वह वाक्पटु हो उठा, जैसा कि हम व्यवस्थाविवरण 32:1-4 में देखते हैं:
हे आकाश, कान लगा, कि मैं बोलूँ; और हे पृथ्वी, मेरे मुँह की बातें सुन। मेरा उपदेश मेंह की नाईं बरसेगा, और मेरी बातें ओस की नाईं टपकेंगी, जैसे कि हरी घास पर झींसी, और पौधों पर झड़ियाँ। मैं तो यहोवा नाम का प्रचार करूँगा: तुम अपने परमेश्वर की महिमा को मानो। वह चट्टान है, उसका काम खरा है: और उसकी सारी गति न्याय की है: वह सच्चा ईश्वर है, उसमें कुटिलता नहीं, वह धर्मी और सीधा है।
वह संसार के सबसे वाक्पटु मनुष्यों में से एक निकला। यदि परमेश्वर मनुष्यों को भेजता है और वे उसका सन्देश पहुँचाते हैं, तो वह उनके मुँह के संग रहेगा। यदि परमेश्वर ने आपको कोई सन्देश दिया है, तो जाइए और उसे लोगों को वैसे ही दीजिए जैसे परमेश्वर ने उसे आपको दिया है। किसी मनुष्य का वाक्पटु बनने का प्रयत्न करना मूर्खता की बात है।
अपने सन्देश को, न कि अपने आपको,
सबसे प्रमुख बनाइए। अपने आप पर ध्यान मत लगाइए। जो काम परमेश्वर ने आपको करने के लिए दिया है उस पर अपना मन लगाइए, और ऐसी मूर्खता मत कीजिए कि अपनी कठिनाइयों या अपनी योग्यताओं को मार्ग में आड़े आने दें। कहा जाता है कि लोग सिसरो को सुनने जाते और लौटकर कहते, “क्या तुमने कभी ऐसा कुछ सुना है? क्या वह अद्भुत नहीं था? क्या वह भव्य नहीं था?” परन्तु जब वे डेमोस्थनीज़ को सुनने जाते, तो वह उन्हें अपने विषय से ऐसा जोश से भर देता कि वे तुरन्त जाकर लड़ना चाहते। वे डेमोस्थनीज़ को तो बिलकुल भूल जाते, परन्तु उसके सन्देश से उत्तेजित हो उठते; उन दोनों मनुष्यों में यही अन्तर था।
इसके बाद मूसा ने कहा: “हे मेरे प्रभु, जिसको तू चाहे उसी के हाथ से भेज।”
क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि यदि परमेश्वर मूसा की बात मान लेता और कहता, तो मूसा क्या खो देता:
“बहुत अच्छा, मूसा; तू यहीं जंगल में रह, और मैं हारून को, या यहोशू को, या कालेब को भेज दूँगा!”
यदि परमेश्वर आपको किसी सेवा के लिए बुलाए तो छुटकारा पाने का प्रयत्न मत कीजिए। यदि बारह चेलों ने यीशु की बुलाहट को अस्वीकार कर दिया होता तो वे क्या कुछ खो देते! मुझे उन दूसरे चेलों पर सदा तरस आया है जिनके विषय में हम पढ़ते हैं कि वे उल्टे फिर गए, और उसके बाद यीशु के साथ न चले। सोचिए, ओर्पा ने क्या खोया और रूत ने नाओमी के परमेश्वर से लिपटे रहकर क्या पाया! उसकी कहानी
इन तीन हज़ार वर्षों से सुनाई जा रही है
पिता, माता, बहनें, भाई, अपने पति की कब्र—उसने इन सब से मुँह मोड़ लिया। रूत, लौट आओ, और हमें बताओ कि क्या तुम्हें अपने चुनाव पर पछतावा है! नहीं: उसका नाम उन सब स्त्रियों में, जो कभी जीवित रहीं, सबसे उज्ज्वल नामों में से एक होकर चमकता है। मसीहा उसके वंशजों में से एक था।
मूसा, तुम लौट आओ और हमें बताओ कि क्या बाद में तुम्हें इस बात का दुःख हुआ कि परमेश्वर ने तुम्हें बुलाया? मैं सोचता हूँ कि जब वह अपनी महिमामय देह में रूपान्तरण के पहाड़ पर यीशु और एलिय्याह के साथ खड़ा था, तब उसे इसका पछतावा नहीं था।
मेरे प्रिय मित्रो, परमेश्वर किसी एक ही सन्देशवाहक तक सीमित नहीं है। हमें बताया गया है कि वह पत्थरों से भी सन्तान उत्पन्न कर सकता है। किसी ने कहा है कि लोग तीन प्रकार के होते हैं: “करूँगा” वाले, “नहीं करूँगा” वाले, और “नहीं कर सकता” वाले; पहले वाले सब कुछ पूरा कर लेते हैं, दूसरे वाले हर बात का विरोध करते हैं, और तीसरे वाले हर बात में असफल होते हैं। यदि परमेश्वर आपको बुलाए, तो इसे एक बड़ा सम्मान समझिए। किसी भी बात में उसके साथ साझेदारी पाना एक बड़ा सौभाग्य समझिए। उसे प्रसन्नता से, आनन्द से कीजिए। उसे अपने सारे मन से कीजिए, और वह आपको आशीष देगा। झूठी नम्रता या कपट, स्वार्थ, या कोई भी निजी विचार आपको कर्तव्य और बलिदान के मार्ग से भटकाने न पाए। यदि हम परमेश्वर की आवाज़ पर कान लगाएँ, तो हम बुलाहट सुनेंगे; और यदि वह हमें बुलाता और भेजता है, तो असफलता नाम की कोई वस्तु नहीं होगी, परन्तु हर मोर्चे पर सफलता ही होगी। मूसा को महिमामय सफलता मिली क्योंकि वह आगे बढ़ा और उसने वही किया जिसके लिए परमेश्वर ने उसे बुलाया था।
