अध्याय 40 / 40

व्यावहारिक धर्म

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

व्यावहारिक धर्म

अन्त में, यह "ऐसा होगा जैसे कोई आग में से होकर बच निकले" (1 कुरिन्थियों 3:15)।

जो कोई पौलुस की सलाह मानकर संसार में से निकलना और अलग होना चाहता है, उन सबके लिये मैं ये छः सामान्य सुझाव देता हूँ। इन्हें देते समय मैं अचूक होने का दावा नहीं करता; परन्तु मेरा विश्वास है कि ये विचार और ध्यान के योग्य हैं। मैं यह नहीं भूलता कि यह विषय कठिनाइयों से भरा है, और मसीही के मार्ग में निरन्तर ऐसे अनेक सन्देहपूर्ण मामले उठते रहते हैं जिनमें यह कहना बहुत कठिन होता है कि कर्तव्य का मार्ग कौन सा है और कैसा व्यवहार करना चाहिए। सम्भव है कि सलाह के ये कुछ अंश उपयोगी ठहरें।

1. सब सन्देहपूर्ण मामलों में हमें पहले बुद्धि और सही न्याय के लिये प्रार्थना करनी चाहिए। यदि प्रार्थना का कुछ भी मूल्य है, तो जब हम सही करना चाहते हैं परन्तु अपना मार्ग नहीं देख पाते, तब वह विशेष रूप से मूल्यवान होनी चाहिए।

2. सब सन्देहपूर्ण मामलों में हम बार-बार यह स्मरण करके अपने आप को परखें कि परमेश्वर की दृष्टि हम पर है। यदि मैं सचमुच विश्वास करता कि परमेश्वर मुझे देख रहा है, तो क्या मैं अमुक स्थान पर जाता, या अमुक काम करता? 3. सब सन्देहपूर्ण मामलों में हम मसीह के दूसरे आगमन और न्याय के दिन को कभी न भूलें। क्या मैं चाहूँगा कि मैं अमुक संगति में या अमुक कामों में लगा हुआ पाया जाऊँ?

4. अन्त में, सब सन्देहपूर्ण मामलों में हम यह पता लगाएँ कि इसी प्रकार की परिस्थितियों में सबसे पवित्र और सबसे उत्तम मसीहियों का आचरण कैसा रहा है। यदि हमें अपना मार्ग स्पष्ट दिखाई न दे, तो अच्छे उदाहरणों का अनुसरण करने में हमें लज्जित होने की आवश्यकता नहीं।

संसार से अलग होने के विषय में जो लोग विवादास्पद बातों को लेकर कठिनाई में हैं, उन सबके उपयोग के लिये मैं ये सुझाव रखता हूँ। मुझे लगता है कि ये अनेक गाँठें खोलने और अनेक समस्याएँ सुलझाने में सहायक हो सकते हैं।

IV. अब मैं सम्पूर्ण विषय का समापन यह दिखाने का प्रयत्न करके करता हूँ कि "संसार पर वास्तविक विजय के रहस्य क्या हैं।"

संसार में से निकल आना निश्चय ही सरल काम नहीं है। जब तक मानव स्वभाव जैसा है वैसा है, और एक व्यस्त शैतान सदा हमारे निकट है, तब तक यह सरल नहीं हो सकता। इसके लिये निरन्तर संघर्ष और परिश्रम चाहिए; इसमें लगातार युद्ध और आत्म-त्याग निहित है। यह प्रायः हमें अपने ही परिवार के सदस्यों, सम्बन्धियों और पड़ोसियों के ठीक विरोध में खड़ा कर देता है; कभी-कभी यह हमें ऐसे काम करने को विवश करता है जिनसे बड़ा अपराध माना जाता है, और जिनके कारण हमें उपहास और छोटी-मोटी सतावट सहनी पड़ती है। ठीक यही बात बहुतों को दृढ़ मसीही जीवन से पीछे हटाती और झिझकाती है। वे जानते हैं कि वे सही नहीं हैं; वे जानते हैं कि वे मसीह की सेवा में उतने "पूरे" नहीं हैं जितना उन्हें होना चाहिए, और वे बेचैन और असहज रहते हैं। परन्तु मनुष्य का भय उन्हें रोके रखता है। और इस प्रकार वे जीवन भर दुखते, असन्तुष्ट हृदय के साथ घिसटते रहते हैं—संसार में सुखी रहने के लिये उनमें धर्म बहुत अधिक है, और अपने धर्म में सुखी रहने के लिये उनमें संसार बहुत अधिक है। मुझे भय है कि यदि सच्चाई जानी जाए, तो यह बहुत सामान्य स्थिति है।

फिर भी प्रत्येक युग में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो संसार पर जय पाते दिखाई देते हैं। वे दृढ़ता से उसकी रीतियों में से निकल आते हैं और स्पष्टतः अलग होते हैं। वे उसकी राय से स्वतन्त्र रहते हैं और उसके विरोध से डगमगाते नहीं। वे ग्रहों के समान अपनी ही कक्षा में चलते रहते हैं, और संसार की मुस्कान और भृकुटि, दोनों से समान रूप से ऊपर उठे दिखाई देते हैं। और उनकी विजय के रहस्य क्या हैं? मैं उन्हें लिखता हूँ।

(क) संसार पर विजय का पहला रहस्य एक सही हृदय है। इससे मेरा तात्पर्य है एक ऐसा हृदय जो पवित्र आत्मा के द्वारा नया किया गया, बदला गया और पवित्र किया गया हो—ऐसा हृदय जिसमें मसीह वास करता है, जिसमें पुरानी बातें जाती रहीं और सब कुछ नया हो गया। ऐसे हृदय का प्रमुख चिह्न उसकी रुचियों और प्रेम-भावनाओं का झुकाव है। ऐसे हृदय का स्वामी अब संसार और संसार की बातों को पसन्द नहीं करता, और इसलिये उन्हें छोड़ देना उसे न कोई परीक्षा लगती है, न कोई बलिदान। जिस संगति, बातचीत, मनोरंजन, व्यवसायों और पुस्तकों से वह कभी प्रेम रखता था, उनके लिये अब उसमें कोई रुचि नहीं रहती, और उनमें से "निकल आना" उसे स्वाभाविक लगता है। सचमुच किसी नये सिद्धान्त की विस्फोटक शक्ति बड़ी होती है! जैसे बाड़ में नई कलियाँ पुराने पत्तों को धकेलकर चुपचाप भूमि पर गिरा देती हैं, वैसे ही विश्वासी का नया हृदय अनिवार्य रूप से उसकी रुचियों और पसन्दों को प्रभावित करता है, और उससे अनेक ऐसी बातें छुड़वा देता है जिनसे वह कभी प्रेम करता था और जिनमें जीता था, क्योंकि अब वे उसे अच्छी नहीं लगतीं। जो "संसार में से निकलकर अलग होना" चाहता है, वह सबसे पहले और सबसे बढ़कर यह निश्चित कर ले कि उसे नया हृदय मिल गया है। यदि हृदय सचमुच सही है, तो समय पाकर सब कुछ सही हो जाएगा। "यदि तेरी आँख ठीक हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा" (मत्ती 6:22)। यदि प्रेम-भावनाएँ सही नहीं हैं, तो कार्य कभी सही नहीं होगा।

(ख) संसार पर विजय का दूसरा रहस्य अनदेखी बातों में "जीवित और व्यावहारिक विश्वास" है।

पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "वह जीत जिससे संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है" (1 यूहन्ना 5:4)। अदृश्य बातों को ऐसे स्थिर होकर देखने की आदत पाना और बनाए रखना मानो वे दृश्य हों—अपनी आत्मा, परमेश्वर, मसीह, स्वर्ग, नरक, न्याय और अनन्तकाल को प्रतिदिन बड़ी वास्तविकताओं के रूप में अपने मन के सामने रखना, और यह स्थायी दृढ़ धारणा रखना कि जो हम नहीं देखते वह उतना ही वास्तविक है जितना जो हम देखते हैं, और दस हज़ार गुना अधिक महत्त्वपूर्ण—यही, यही संसार पर जय पाने का एक मार्ग है। यही वह विश्वास था जिसके कारण इब्रानियों के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित सन्तों की महान सेना को पवित्र आत्मा की ओर से ऐसी महिमामय गवाही मिली। वे सब इस दृढ़ विश्वास के साथ चलते थे कि उनका परमेश्वर वास्तविक है, उनका उद्धारकर्ता वास्तविक है, और स्वर्ग में उनका घर वास्तविक है, चाहे नश्वर आँखों से वह अदृश्य हो। इस विश्वास से सज्जित होकर मनुष्य इस संसार को आनेवाले संसार की तुलना में छाया समझता है, और उसकी प्रशंसा या निन्दा, उसके बैर या उसके प्रतिफल की बहुत चिन्ता नहीं करता। जो संसार में से निकलकर अलग होना चाहता है, पर दिखाई देनेवाली बातों के भय से झिझकता और पीछे हटता है, वह प्रार्थना करे और यत्न करे कि उसे यह विश्वास मिले। "विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है" (मरकुस 9:23)। मूसा के समान उसे भी अदृश्य को देखते हुए मिस्र को छोड़ देना सम्भव लगेगा। मूसा के समान उसे भी इसकी चिन्ता नहीं होगी कि वह क्या खोता है और कौन अप्रसन्न होता है, क्योंकि वह दूरबीन से देखनेवाले के समान दूर से ठोस प्रतिफल देखता है। (इब्रानियों 11:26)

(ग) संसार पर जय पाने का तीसरा और अन्तिम भेद यह है कि सब उचित अवसरों पर "मसीह को निडर होकर मान लेने की आदत" को प्राप्त किया जाए और उसे बढ़ाया जाए।

यह कहते हुए मैं नहीं चाहता कि मेरी बात का गलत अर्थ लिया जाए। मैं नहीं चाहता कि कोई अपने आगे तुरही बजवाए, और हर समय अपना मसीही धर्म दूसरों पर थोपता फिरे। परन्तु मैं उन सब को प्रोत्साहित करना चाहता हूँ जो संसार में से निकल आने का यत्न करते हैं कि वे अपने रंग प्रकट करें, और ऐसे मनुष्यों की नाई काम और बातचीत करें जो मसीह की सेवा करने में लज्जित नहीं होते। मसीही होने के नाते अपने सिद्धान्तों पर स्थिरता और शान्ति से दृढ़ रहना, संसार की सन्तानों को यह दिखाने के लिए सदा तैयार रहना कि हम उनसे भिन्न नियमों के अनुसार चलते हैं और उनसे हटने का हमारा कोई विचार नहीं, और हर मण्डली में अपने स्तर को शान्ति, दृढ़ता और शिष्टता से बनाए रखना, यह सब हमारे भीतर अनजाने ही एक आदत बना देगा, और अलग मनुष्य होना अपेक्षाकृत सरल कर देगा। निःसन्देह आरम्भ में यह कठिन होगा और हमें कई संघर्ष करने पड़ेंगे; परन्तु जितना आगे बढ़ेंगे, उतना ही यह सरल होता जाएगा। मसीह को मान लेने के बार-बार के कार्य आदतें उत्पन्न करेंगे। एक बार बन जाने पर आदतें स्थिर चरित्र उत्पन्न करेंगी। जब हमारा चरित्र एक बार जान लिया जाएगा, तो हमें बहुत झंझट से छुटकारा मिल जाएगा। लोग जान लेंगे कि हमसे क्या आशा रखनी है, और यदि वे हमें अलग और विशेष लोगों का जीवन जीते देखें तो उसे कोई अनोखी बात न मानेंगे। जब हमसे कोई ऐसा काम करने को कहा जाए जिसे हमारा विवेक गलत ठहराता है, तब दृढ़ता से परन्तु शिष्टता से "नहीं" कह सकना बड़ी बात है। जो आरम्भ से ही निडर होकर अपने रंग दिखाता है, और मनुष्यों को यह दिखाने में कभी लज्जित नहीं होता कि "वह किसका है और किसकी सेवा करता है," वह शीघ्र ही पाएगा कि वह संसार पर जय पा चुका है और उसे अकेला छोड़ दिया जाएगा। निडर होकर मान लेना जय की ओर एक लम्बा कदम है।

अब मुझे केवल यह करना है कि सारे विषय का समापन कुछ संक्षिप्त शब्दों में उपयोग बताकर करूँ। संसार के द्वारा आत्मा के नाश का भय, संसार से सच्चे अलगाव का स्वरूप, और संसार पर जय पाने के भेद, ये सब इस लेख के पाठक के सामने हैं। अब मैं उससे अन्तिम बार अपना ध्यान देने को कहता हूँ, जबकि मैं उसके व्यक्तिगत लाभ के लिए सीधे कुछ कहने का यत्न करता हूँ।

(1) मेरा पहला शब्द "एक प्रश्न" होगा।

क्या तुम संसार पर जय पा रहे हो, या संसार से हारे हुए हो? क्या तुम जानते हो कि संसार में से निकल आना और अलग होना क्या है, या तुम अब भी उसमें फँसे हुए हो और उसके अनुरूप बने हुए हो? यदि तुम में उद्धार पाने की कोई भी इच्छा है, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि इस प्रश्न का उत्तर दो।

यदि तुम "अलगाव" के विषय में कुछ नहीं जानते, तो मैं तुम्हें प्रेम से चेतावनी देता हूँ कि तुम्हारी आत्मा बड़े संकट में है। संसार मिटता जाता है; और जो संसार से लिपटे रहते हैं और केवल संसार की ही चिन्ता करते हैं, वे उसके साथ अनन्त विनाश में मिट जाएँगे। जागो और बहुत देर होने से पहले अपना संकट देखो। जागो और आनेवाले क्रोध से भागो। समय थोड़ा है। सब बातों का अन्त निकट है। परछाइयाँ लम्बी होती जा रही हैं। सूर्य अस्त हो रहा है। वह रात आती है जिसमें कोई काम नहीं कर सकता। बड़ा श्वेत सिंहासन शीघ्र ही स्थापित होगा। न्याय आरम्भ होगा। पुस्तकें खोली जाएँगी। जागो, और जब तक "आज" कहलाता है, संसार में से निकल आओ।

थोड़ी ही देर और, फिर न कोई सांसारिक धन्धे रहेंगे, न सांसारिक मनोरंजन, न धन कमाना, न धन उड़ाना, न खाना-पीना, न भोज, न वेश-भूषा, न नाच, न नाटकघर, न दौड़ें, न ताश, न जुआ। जब ये सब बातें सदा के लिए समाप्त हो जाएँगी तब तुम क्या करोगे? उस अनन्त स्वर्ग में तुम कैसे सुखी हो सकोगे जहाँ पवित्रता ही सब कुछ है और सांसारिकता के लिए कोई स्थान नहीं? अरे, इन बातों पर विचार करो और बुद्धिमान बनो! जागो, और संसार ने तुम्हारे चारों ओर जो जंजीरें डाली हैं उन्हें तोड़ डालो। जागो और आनेवाले क्रोध से भागो।

(2) मेरा दूसरा शब्द एक "परामर्श" होगा।

यदि तुम संसार में से निकलना चाहते हो, परन्तु नहीं जानते कि क्या करो, तो वह सम्मति मानो जो मैं आज तुम्हें देता हूँ। पश्चाताप करनेवाले पापी के रूप में सीधे हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास जाकर आरम्भ करो, और अपना मामला उसके हाथों में सौंप दो। उसके सामने अपना मन उँडेल दो। उसे अपनी सारी कहानी सुनाओ, और कुछ भी न छिपाओ। उससे कहो कि तुम एक पापी हो जो संसार, शरीर और शैतान से उद्धार पाना चाहते हो, और उससे विनती करो कि वह तुम्हारा उद्धार करे।

वही धन्य उद्धारकर्ता "जिस ने हमारे पापों के लिये अपने आप को दे दिया, ताकि हमें इस वर्तमान बुरे संसार से छुड़ाए" (गलातियों 1:4)। वह जानता है कि संसार क्या है, क्योंकि वह इसमें तैंतीस वर्ष रहा। वह जानता है कि मनुष्य की कठिनाइयाँ क्या हैं, क्योंकि वह हमारे लिए मनुष्य बना और मनुष्यों के बीच रहा। स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ पर विराजमान होकर वह उन सब का पूरा उद्धार करने में समर्थ है जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, हमें संसार की बुराई से बचाए रखने में समर्थ है जबकि हम अभी उसी में जीवित हैं, हमें परमेश्वर की सन्तान बनने का अधिकार देने में समर्थ है, हमें गिरने से बचाने में समर्थ है, और हमें जयवन्त से भी बढ़कर बनाने में समर्थ है। मैं फिर कहता हूँ, "विश्वास की प्रार्थना के साथ सीधे मसीह के पास जाओ, और अपने आप को पूरी तरह और बिना कुछ बचाए उसके हाथों में सौंप दो।" यद्यपि अब तुम्हें संसार में से निकलना और अलग होना कठिन लगता है, फिर भी तुम पाओगे कि यीशु के साथ कुछ भी असम्भव नहीं। तुम, हाँ तुम भी, संसार पर जय पाओगे।

(3) मेरा तीसरा और अन्तिम शब्द "प्रोत्साहन" होगा।

यदि तुमने अनुभव से सीखा है कि संसार में से निकलना क्या होता है, तो मैं तुमसे केवल यही कह सकता हूँ कि ढाढ़स बाँधो और डटे रहो। तुम सही मार्ग पर हो; तुम्हें डरने का कोई कारण नहीं। सनातन पहाड़ियाँ दिखाई दे रही हैं। तुम्हारा उद्धार उस समय से अधिक निकट है जब तुमने विश्वास किया था। ढाढ़स बाँधो और आगे बढ़ते जाओ।

निःसन्देह तुमने कई युद्ध लड़े हैं और कई गलत कदम उठाए हैं। तुम कभी-कभी थककर गिरने को हुए हो, और आधे मन से मिस्र लौट जाने को तैयार भी हुए हो। परन्तु तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें कभी पूरी तरह नहीं छोड़ा, और वह तुम्हें कभी तुम्हारी सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में पड़ने न देगा। इसलिए संसार से अपने अलगाव में दृढ़ता से डटे रहो, और अकेले खड़े होने में कभी लज्जित न हो। अपने मन में दृढ़ता से यह ठान लो कि सबसे समर्पित मसीही सदा सबसे सुखी होते हैं, और स्मरण रखो कि अपनी यात्रा के अन्त में किसी ने कभी यह नहीं कहा कि वह बहुत अधिक पवित्र रहा और परमेश्वर के बहुत निकट जिया।

अन्त में, सुनो कि सत्य के पवित्रशास्त्र में क्या लिखा है:

"जो कोई मनुष्यों के सामने मुझे मान लेगा, उसे मनुष्य का पुत्र भी परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने मान लेगा" (लूका 12:8)।

"ऐसा कोई नहीं जिसने मेरे और सुसमाचार के लिये घर या भाइयों या बहनों या माता या पिता या बाल-बच्चों या खेतों को छोड़ दिया हो, और अब इस समय सौ गुणा न पाए (घर, भाई, बहनें, माताएँ, बाल-बच्चे और खेत—और उनके साथ सताव भी), और आनेवाले युग में अनन्त जीवन।" (मरकुस 10:29-30)।

"इसलिये अपना हियाव न छोड़ो, क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है। तुम्हें धीरज धरना अवश्य है, ताकि जब तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी कर चुको, तो तुम प्रतिज्ञा का फल पाओ। क्योंकि अब बहुत ही थोड़ा समय रह गया है, जब आनेवाला आएगा, और देर न करेगा" (इब्रानियों 10:35-37)।

ये वचन हमारे ही लिये लिखे और कहे गए थे। आइए, हम इन्हें थामे रहें और कभी न भूलें। आइए, हम अन्त तक धीरज धरें, और संसार में से निकलने और अलग रहने में कभी लज्जित न हों। हम निश्चित रह सकते हैं कि इसका अपना प्रतिफल है।

धन और निर्धनता

"एक धनवान मनुष्य था जो बैंजनी कपड़े और मलमल पहनता और प्रतिदिन सुख-विलास के साथ रहता था। उसके फाटक पर लाज़र नाम का एक कंगाल पड़ा रहता था, जो घावों से भरा हुआ था, और धनवान की मेज़ से गिरे हुए टुकड़ों से अपना पेट भरना चाहता था। यहाँ तक कि कुत्ते भी आकर उसके घावों को चाटते थे। ऐसा हुआ कि वह कंगाल मर गया और स्वर्गदूतों ने उसे अब्राहम की गोद में पहुँचाया। वह धनवान भी मरा और गाड़ा गया। अधोलोक में, जहाँ वह पीड़ा में था, उसने आँख उठाकर दूर से अब्राहम को और उसकी गोद में लाज़र को देखा।" [लूका 16:19-23]

बाइबल के पाठकों में सम्भवतः बहुत कम ऐसे होंगे जो धनवान और लाज़र के दृष्टान्त से परिचित न हों। यह पवित्रशास्त्र के उन अंशों में से है जो मन पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त की तरह, एक बार पढ़ लेने पर इसे कभी भुलाया नहीं जाता।

इसका कारण स्पष्ट और सरल है। सारा दृष्टान्त एक अत्यन्त सजीव चित्र के समान है। कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, हमारी इन्द्रियों को अपार शक्ति से अपने साथ खींच ले जाती है। हम पाठक नहीं रहते, दर्शक बन जाते हैं। वर्णित सब घटनाओं के हम साक्षी हो जाते हैं। हम देखते हैं। हम सुनते हैं। हमें लगता है कि हम लगभग छू भी सकते हैं। धनवान की मेज़—बैंजनी वस्त्र—मलमल—फाटक—उसके पास पड़ा कंगाल—घाव—कुत्ते—धनवान की मेज़ से गिरे टुकड़े—दो मृत्युएँ—धनवान का गाड़ा जाना—सेवा करते स्वर्गदूत—अब्राहम की गोद—धनवान का भयानक रीति से जाग उठना—आग—वह बड़ी खाई—आशारहित पश्चात्ताप—सब कुछ हमारी आँखों के सामने स्पष्ट उभर आता है और हमारे मन पर अंकित हो जाता है। यही वाक्पटुता की उस प्रसिद्ध अरबी कसौटी की सिद्धि है—"सबसे अच्छा वक्ता वह है जो कान को आँख बना दे।"

परन्तु अन्ततः इस दृष्टान्त की उत्कृष्ट रचना की प्रशंसा करना एक बात है, और इसमें निहित आत्मिक शिक्षाओं को समझना बिलकुल दूसरी बात। बुद्धि की आँख प्रायः सुन्दरता देख लेती है, जबकि हृदय सोया रहता है और कुछ भी नहीं देखता। सैकड़ों लोग 'तीर्थयात्री की प्रगति' को गहरी रुचि से पढ़ते हैं, जिनके लिये स्वर्गीय नगर की ओर का संघर्ष मूर्खता है। हज़ारों लोग आज हमारे सामने के इस दृष्टान्त के एक-एक शब्द से परिचित हैं, पर कभी यह नहीं सोचते कि यह उनकी अपनी दशा पर कैसे लागू होता है। उनका विवेक उस पुकार के प्रति बहरा है जो पढ़ते समय उनके कानों में गूँजनी चाहिए, "तू ही वह मनुष्य है!" उनका हृदय कभी परमेश्वर की ओर मुड़कर यह गम्भीर प्रश्न नहीं करता, "हे प्रभु, क्या यह मेरा ही चित्र है? हे प्रभु, क्या यह मैं ही हूँ?"

आज मैं आपको आमन्त्रित करता हूँ कि इस दृष्टान्त की उन प्रमुख सच्चाइयों पर विचार करें जो यह हमें सिखाना चाहता है। मैं जानबूझकर इसके केवल उसी भाग की चर्चा करूँगा जो इस सन्देश का शीर्षक है: "धन और निर्धनता।" पवित्र आत्मा हमें सीखने को तैयार आत्मा और समझनेवाला हृदय दे, और इस प्रकार हमारी आत्माओं पर स्थायी प्रभाव उत्पन्न करे!

I. सबसे पहले हम यह देखें कि "परमेश्वर भिन्न-भिन्न लोगों को कितनी भिन्न-भिन्न दशाएँ ठहराता है।"

प्रभु यीशु दृष्टान्त का आरम्भ एक धनवान मनुष्य और एक कंगाल के वर्णन से करते हैं। वे न निर्धनता की प्रशंसा में एक शब्द कहते हैं, न धन की। वे एक धनी मनुष्य की परिस्थिति और एक निर्धन मनुष्य की परिस्थिति का वर्णन करते हैं; परन्तु न एक की सांसारिक स्थिति की निन्दा करते हैं, न दूसरे की प्रशंसा।

इन दोनों मनुष्यों का अन्तर पीड़ादायक रूप से स्पष्ट है। हमारे सामने के चित्र को ध्यान से देखिए।

यहाँ एक वह है जिसके पास इस संसार की अच्छी वस्तुओं की बहुतायत थी—"एक धनवान मनुष्य जो बैंजनी कपड़े और मलमल पहनता और प्रतिदिन सुख-विलास के साथ रहता था।"

और यहाँ दूसरा है जिसके पास सचमुच कुछ भी नहीं। वह मित्रहीन, रोगी, भूख से अधमरा निर्धन व्यक्ति है। "उस धनवान के फाटक पर लाज़र नाम का एक कंगाल पड़ा रहता था, जो घावों से भरा हुआ था," और टुकड़ों के लिये भीख माँगता है।

दोनों आदम की सन्तान हैं। दोनों एक ही मिट्टी से आए, और एक ही परिवार के हैं। दोनों एक ही देश में रहते हैं और एक ही शासन के अधीन हैं। फिर भी उनकी दशा में कितना अन्तर है!

परन्तु हमें सावधान रहना चाहिए कि हम इस दृष्टान्त से वे शिक्षाएँ न निकालें जो इसका उद्देश्य कभी नहीं थीं।

धनवान लोग सदा बुरे नहीं होते, और सदा नरक में नहीं जाते। निर्धन लोग सदा अच्छे नहीं होते, और सदा स्वर्ग में नहीं जाते। हमें इस अति में नहीं पड़ना चाहिए कि धनी होना पाप है। हमें इस विचार के साथ नहीं बह जाना चाहिए कि यहाँ वर्णित दशा के अन्तर में कोई बुराई है, और कि परमेश्वर का अभिप्राय था कि सब मनुष्य बराबर हों। हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों में ऐसे किसी निष्कर्ष का कोई आधार नहीं। वे केवल उन बातों का वर्णन करते हैं जैसी वे संसार में प्रायः देखी जाती हैं, और जैसी हमें देखने की अपेक्षा रखनी चाहिए।

सार्वभौमिक समानता एक अत्यन्त बनावटी अभिव्यक्ति है और स्वप्नदर्शी लोगों का प्रिय विचार।

हर युग में बहुतों ने निर्धनों को धनवानों के विरुद्ध भड़काकर, और इस लोकप्रिय सिद्धान्त का प्रचार करके कि सब मनुष्य बराबर होने चाहिए, समाज में उथल-पुथल मचाई है। परन्तु जब तक संसार वर्तमान व्यवस्था के अधीन है, यह सार्वभौमिक समानता प्राप्त नहीं की जा सकती। जो लोग मनुष्यों के भाग्य की भारी असमानता के विरुद्ध बोलते हैं, उन्हें निस्सन्देह श्रोताओं की कभी कमी न होगी; परन्तु जब तक मानव स्वभाव जैसा है वैसा है, इस असमानता को रोका नहीं जा सकता।

जब तक कुछ लोग बुद्धिमान और कुछ मूर्ख हैं—कुछ बलवान और कुछ निर्बल—कुछ स्वस्थ और कुछ रोगी—कुछ आलसी और कुछ परिश्रमी—कुछ विवेकी और कुछ लापरवाह; जब तक सन्तान अपने माता-पिता के बुरे आचरण का फल भोगती है; जब तक सूर्य, वर्षा, गर्मी, सर्दी, हवा, लहरें, सूखा, महामारी और आँधियाँ मनुष्य के वश से बाहर हैं—तब तक सदा कुछ लोग धनी और कुछ निर्धन रहेंगे। संसार की कोई भी राजनैतिक व्यवस्था इस सच्चाई को कभी नहीं मिटा सकेगी कि, "दरिद्र लोग देश में कभी न रहेंगे, ऐसा नहीं।" [व्यवस्थाविवरण 15:11]

आज ही अपने देश की सारी सम्पत्ति को बलपूर्वक छीन लो और उसे निवासियों में बराबर बाँट दो। बीस वर्ष से अधिक आयु के हर पुरुष को बराबर हिस्सा दे दो। सब बराबर-बराबर बाँट लें और संसार को फिर से आरम्भ करें। ऐसा करके देखो कि पचास वर्ष के अन्त में तुम कहाँ खड़े होगे। तुम घूमकर ठीक उसी स्थान पर लौट आओगे जहाँ से आरम्भ किया था। तुम पाओगे कि सब कुछ पहले ही के समान असमान है। कुछ ने परिश्रम किया होगा और कुछ ने आलस्य। कुछ सदा लापरवाह रहे होंगे और कुछ सदा चालाकी करनेवाले। कुछ ने बेचा होगा और कुछ ने मोल लिया होगा। कुछ ने उड़ा दिया होगा और कुछ ने बचाया होगा। और अन्त यह होगा कि कुछ धनी होंगे और कुछ निर्धन।

उन व्यर्थ और मूर्ख बकवादियों की बात कोई न सुने जो कहते हैं कि सब मनुष्य बराबर होने के लिए बनाए गए थे। वे यह भी कह सकते हैं कि सब मनुष्यों की ऊँचाई, तौल, बल और कौशल एक-सा होना चाहिए—या सब बांज के वृक्षों का आकार और माप एक-सा होना चाहिए—या घास की सब पत्तियाँ सदा एक ही लम्बाई की होनी चाहिए।

अपने मन में यह बात पक्की कर लो कि जो सारा दुःख तुम अपने चारों ओर देखते हो उसका मुख्य कारण पाप है।

पाप ही धनवानों की अपार विलासिता और निर्धनों की पीड़ादायक दुर्दशा का, ऊँचे वर्गों के निष्ठुर स्वार्थ और निम्नतम वर्ग की असहाय निर्धनता का बड़ा कारण है। पहले पाप को संसार से निकालना होगा। सब मनुष्यों के हृदय नए किए जाएँ और पवित्र ठहराए जाएँ। शैतान को बन्दी बनाया जाए। शान्ति का राजकुमार आकर अपनी बड़ी सामर्थ्य लेकर राज्य करे। यह सब होने के बाद ही कभी सार्वभौमिक सुख हो सकता है, या वह खाई भर सकती है जो अब धनी और निर्धन के बीच है।

यह आशा करने से सावधान रहो कि कोई शासन-प्रणाली, कोई शिक्षा-पद्धति या कोई राजनैतिक दल सहस्राब्दी का राज्य ले आएगा। सब मनुष्यों की भलाई करने के लिए कठिन परिश्रम करो। निर्धनों पर तरस खाओ और उन्हें दरिद्रता के जीवन से उठाने के हर उचित प्रयास में सहायता करो। ज्ञान बढ़ाने, नैतिकता को बढ़ावा देने और निर्धनों की सांसारिक दशा सुधारने में सहयोग देने का यत्न करो। परन्तु यह कभी न भूलो कि तुम एक गिरे हुए संसार में रहते हो, पाप तुम्हारे चारों ओर है, और शैतान तथा दुष्टात्माएँ सर्वत्र हैं। और यह निश्चय जानो कि धनवान और लाज़र दो वर्गों के प्रतीक हैं, जो प्रभु के लौटने तक संसार में सदा बने रहेंगे।

II. आगे हम यह देखें कि "किसी मनुष्य की सांसारिक दशा उसकी आत्मा की दशा की कसौटी नहीं है।"

दृष्टान्त का धनी मनुष्य संसार की दृष्टि में समृद्ध मनुष्य का आदर्श प्रतीत होता है। यदि यही वर्तमान जीवन सब कुछ होता, तो उसके पास वह सब कुछ था जो मन चाह सकता है। हम जानते हैं कि वह "बैंजनी कपड़े और बारीक सन के वस्त्र पहिनता और प्रतिदिन सुख-विलास के साथ रहता था।" हमें इसमें सन्देह नहीं कि जो कुछ धन से मोल लिया जा सकता था वह सब उसके पास था। सब मनुष्यों में बुद्धिमान ने उचित ही कहा था, "धन से सब कुछ प्राप्त होता है। धनी के मित्र बहुत होते हैं।" [सभोपदेशक 10:19; नीतिवचन 14:20]

परन्तु इस कथा को पूरा पढ़कर कौन यह नहीं देखेगा कि सर्वोच्च और सर्वोत्तम अर्थ में वह धनी मनुष्य अत्यन्त कंगाल था?

उसके जीवन की अच्छी वस्तुएँ हटा दो, तो उसके पास कुछ न बचा—मृत्यु के बाद कुछ नहीं—कब्र के पार कुछ नहीं—आनेवाले संसार में कुछ नहीं। अपने सारे धन के होते हुए भी उसके पास "स्वर्ग में जमा किया हुआ धन" न था। अपने सारे बैंजनी और बारीक वस्त्रों के होते हुए भी उसके पास धार्मिकता का वस्त्र न था। अपने सारे धनी और सफल मित्रों के होते हुए भी उसका कोई ऐसा मित्र और सहायक न था जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर हो। अपने सारे भव्य भोजन के होते हुए भी उसने जीवन की रोटी कभी नहीं चखी थी। अपने सारे शानदार महल के होते हुए भी अनन्त संसार में उसका कोई घर न था। परमेश्वर के बिना, मसीह के बिना, विश्वास के बिना, अनुग्रह के बिना, क्षमा के बिना, पवित्रता के बिना, वह थोड़े-से वर्ष अपने ही लिए जीता है, और फिर निराश होकर नरक के गड्ढे में जा गिरता है। उसकी सारी समृद्धि कितनी खोखली और अवास्तविक थी! मेरी बात को परखो—"वह धनी मनुष्य बहुत कंगाल था।"

ऐसा प्रतीत होता है कि लाज़र के पास संसार में सचमुच कुछ भी न था। उससे बढ़कर दुःख और अभाव की दशा की कल्पना करना कठिन है। न उसके पास घर था, न धन, न भोजन, न स्वास्थ्य, और सम्भवतः तन ढाँकने को वस्त्र भी नहीं। उसका चित्र ऐसा है जो कभी भुलाया नहीं जा सकता। "[धनी मनुष्य] के फाटक पर लाज़र नाम का एक कंगाल, घावों से भरा हुआ, छोड़ दिया जाता था।" वह "धनी के मेज़ की जूठन से" अपना पेट भरना चाहता था। इतना ही नहीं, "कुत्ते भी आकर उसके घावों को चाटते थे।" सचमुच बुद्धिमान ने ठीक कहा था, "निर्धन से उसका पड़ोसी भी घृणा करता है, परन्तु धनी के मित्र बहुत होते हैं। कंगालों की दरिद्रता उनके विनाश का कारण होती है।" [नीतिवचन 14:20; 10:15]

परन्तु जो कोई इस दृष्टान्त को अन्त तक पढ़ता है, वह यह देखे बिना नहीं रह सकता कि सर्वोच्च अर्थ में लाज़र कंगाल नहीं, परन्तु "धनी" था!

लाज़र परमेश्वर की सन्तान था। वह महिमा का उत्तराधिकारी था। उसके पास टिकनेवाला धन और धार्मिकता थी। उसका नाम जीवन की पुस्तक में था। उसके लिए स्वर्ग में स्थान तैयार किया गया था। उसके पास सबसे उत्तम वस्त्र था—उद्धारकर्ता की धार्मिकता। उसके पास सबसे उत्तम मित्र थे—स्वयं परमेश्वर उसका सहायक था। उसके पास सबसे उत्तम भोजन था—उसके पास खाने को ऐसा भोजन था जिसे संसार नहीं जानता था। और सबसे बढ़कर, ये वस्तुएँ उसके पास सदा के लिए थीं। इन्होंने जीवन भर उसे सम्हाला। मृत्यु की घड़ी में इन्होंने उसे नहीं छोड़ा। ये कब्र के पार भी उसके साथ गईं। ये अनन्तकाल में भी उसके साथ रहीं। निश्चय ही इस दृष्टि से हम "कंगाल लाज़र" नहीं, परन्तु "धनी लाज़र" कह सकते हैं।

हमारे लिए भला होगा कि हम सब मनुष्यों को परमेश्वर के मानदण्ड से नापें—उन्हें उनकी आमदनी की मात्रा से नहीं, परन्तु उनकी आत्मा की दशा से नापें।

जब प्रभु परमेश्वर स्वर्ग से झुककर मनुष्यों की सन्तानों को देखता है, तो वह बहुत सी उन बातों की ओर ध्यान नहीं देता जिन्हें संसार बहुमूल्य मानता है। वह मनुष्यों के धन, या भूमि, या पदवियों को नहीं देखता। वह केवल उनकी आत्माओं की दशा को देखता है, और उसी के अनुसार उनका न्याय करता है। आह, कि तुम भी ऐसा ही करने का यत्न करते! आह, कि तुम अनुग्रह को पदवियों, या बुद्धि-बल, या सोने से अधिक मूल्यवान समझते! प्रायः, बहुत अधिक बार, किसी मनुष्य के विषय में केवल यही पूछा जाता है, "उसके पास कितनी सम्पत्ति है?" हम सब के लिये यह स्मरण रखना भला होगा कि हर मनुष्य दयनीय रूप से कंगाल है, जब तक वह विश्वास में धनी और परमेश्वर की दृष्टि में धनी न हो जाए। [याकूब 2:5]

चाहे कुछ लोगों को यह कितना ही आश्चर्यजनक लगे, परन्तु संसार का सारा धन परमेश्वर के तराज़ू पर अनुग्रह की तुलना में तुच्छ है!

यह कथन चाहे कितना ही कठोर लगे, मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की दृष्टि में एक मन फिराया हुआ भिखारी एक मन न फिराए हुए राजा से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और सम्माननीय है। एक तो कुछ समय के लिये धूप में चमकती तितली के समान दमकता है, और अज्ञानी संसार से सराहा जाता है; परन्तु उसका अन्त सदा के लिये अन्धकार और दुःख है। दूसरा संसार में कीड़े के समान रेंगता है, और जो भी उसे देखता है उसे तुच्छ जानता है; परन्तु उसका अन्त एक महिमामय पुनरुत्थान और मसीह के साथ धन्य अनन्तकाल है। उसके विषय में प्रभु कहता है, "मैं तेरे क्लेश और दरिद्रता को जानता हूँ, परन्तु तू धनी है!" [प्रकाशितवाक्य 2:9]

राजा अहाब इस्राएल के दस गोत्रों का शासक था। ओबद्याह उसके घर में एक सेवक से अधिक कुछ न था। फिर भी इसमें कौन सन्देह कर सकता है कि परमेश्वर की दृष्टि में कौन अधिक मूल्यवान था, सेवक या राजा?

रिडले और लैटिमर को उनके सब पदों से हटा दिया गया, अपराधियों के समान बन्दीगृह में डाला गया, और अन्त में दाँव पर जला दिया गया। उनके सतानेवाले बोनर और गार्डिनर कलीसिया की सबसे ऊँची प्रतिष्ठा तक पहुँचाए गए, बड़ी आय का उपभोग करते रहे, और सन्तुष्ट तथा निश्चिन्त होकर अपने बिछौनों पर मरे। फिर भी इसमें कौन सन्देह कर सकता है कि दोनों पक्षों में से कौन प्रभु की ओर था?

बैक्स्टर, जो प्रसिद्ध पादरी था, पर क्रूर शत्रुता से अत्याचार किया गया, और एक अत्यन्त अन्यायपूर्ण निर्णय द्वारा उसे लम्बी कैद का दण्ड दिया गया। जेफ्रीज़, जिस मुख्य न्यायाधीश ने उसे दण्ड सुनाया, लज्जाजनक चरित्र का मनुष्य था, जिसमें न नैतिकता थी न धर्म। बैक्स्टर को बन्दीगृह भेजा गया और जेफ्रीज़ पर सम्मान लादे गए। फिर भी इसमें कौन सन्देह कर सकता है कि दोनों में से भला मनुष्य कौन था, मुख्य न्यायाधीश जेफ्रीज़ या मसीह का आदर करनेवाली पुस्तक "सन्तों का अनन्त विश्राम" का लेखक?

हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि धन और सांसारिक महानता परमेश्वर की कृपा के निश्चित चिह्न नहीं हैं।

इसके विपरीत, वे प्रायः मनुष्य की आत्मा के लिये फन्दा और बाधा होते हैं। वे उसे संसार से प्रेम करना और परमेश्वर को भूल जाना सिखाते हैं। सुलैमान क्या कहता है? "धनी होने के लिये परिश्रम न करना; अपनी समझ का भरोसा छोड़ दे।" [नीतिवचन 23:4] पौलुस क्या कहता है? "जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फन्दे, और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फँसते हैं, जो मनुष्यों को विनाश और विध्वंस के समुद्र में डुबा देती हैं।" [1 तीमुथियुस 6:9]

हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि दरिद्रता और परीक्षा परमेश्वर के क्रोध के निश्चित प्रमाण नहीं हैं।

वे प्रायः छिपे हुए आशीर्वाद होते हैं। वे सदा प्रेम और बुद्धि से भेजे जाते हैं। वे प्रायः मनुष्य को संसार से छुड़ाने का काम करते हैं। वे उसे ऊपर की वस्तुओं पर मन लगाना सिखाते हैं। वे प्रायः पापी को उसका अपना हृदय दिखाते हैं। वे प्रायः सन्त को भले कर्मों में फलवन्त बनाते हैं। अय्यूब की पुस्तक क्या कहती है? "देख, क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसको परमेश्वर ताड़ना देता है; इसलिये तू सर्वशक्तिमान की ताड़ना को तुच्छ न जान।" [अय्यूब 5:17] पौलुस क्या कहता है? "प्रभु जिससे प्रेम करता है, उसकी ताड़ना भी करता है, और जिसे पुत्र बना लेता है, उसको कोड़े भी लगाता है।" [इब्रानियों 12:6]

इस जीवन में सुख का एक बड़ा रहस्य धीरजवन्त और सन्तोषी आत्मा का होना है।

प्रतिदिन इस सत्य को समझने का यत्न करो कि यह जीवन प्रतिफल पाने का स्थान नहीं है। बदला और प्रतिफल का समय अभी आनेवाला है। उस समय से पहले किसी बात का शीघ्रता से न्याय न करो। बुद्धिमान की यह बात स्मरण रखो: "यदि तू किसी प्रदेश में निर्धन पर अन्धेर और न्याय और धार्मिकता को बिगड़ते देखे, तो इस बात से चकित न होना; क्योंकि एक अधिकारी पर दूसरा बड़ा अधिकारी दृष्टि रखता है, और उन दोनों के ऊपर और भी बड़े अधिकारी हैं।" [सभोपदेशक 5:8]

हाँ! न्याय का एक दिन अभी आनेवाला है। वह दिन हर एक को उसके ठीक स्थान पर रख देगा। उस समय "धर्मी और दुष्ट के बीच, और जो परमेश्वर की सेवा करता है और जो उसकी सेवा नहीं करता, उनके बीच" भेद दिखाई देगा। [मलाकी 3:18] लाज़र की सन्तान और धनी मनुष्य की सन्तान समय आने पर अपने सच्चे रूप में दिखाई देंगी, और हर एक को उसके कर्मों के अनुसार प्रतिफल मिलेगा।

III. अब आगे देखें कि "सब प्रकार के लोग अन्त में कब्र तक पहुँचेंगे।"

दृष्टान्त में धनी मनुष्य मरा, और लाज़र भी मरा। अपने जीवन में वे चाहे कितने ही भिन्न और अलग-अलग थे, अन्त में दोनों को एक ही कटोरे में से पीना पड़ा। दोनों कब्र में गए। दोनों उस स्थान में गए जहाँ धनी और निर्धन एक साथ मिलते हैं। वे मिट्टी थे, और मिट्टी में ही लौट गए। [उत्पत्ति 3:19]

यही सब मनुष्यों की दशा है। यदि प्रभु पहले महिमा में न लौट आए, तो हमारी भी यही दशा होगी। हमारी सारी युक्तियों, और योजनाओं, और विचारों के बाद, हमारे सब आविष्कारों, और खोजों, और वैज्ञानिक उपलब्धियों के बाद भी एक शत्रु बचा रहता है जिसे हम न जीत सकते हैं, न निहत्था कर सकते हैं, और वह है मृत्यु। उत्पत्ति का वह अध्याय जो मथूशेलह और जल-प्रलय से पहले जीनेवाले अन्य लोगों की लम्बी आयु का वर्णन करता है, हर एक की सीधी-सादी कथा को दो अर्थपूर्ण शब्दों में समाप्त करता है: "वह मर गया।" और अब हज़ारों वर्ष बाद, हममें से सबसे महान के विषय में इससे अधिक क्या कहा जा सकता है? मार्लबरो, और वाशिंगटन, और नेपोलियन, और वेलिंग्टन के इतिहास ठीक इसी दीन करनेवाले निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। हर एक का अन्त, उसकी सारी महानता के बाद, बस यही है--"वह मर गया।"

मृत्यु एक शक्तिशाली समतल करनेवाली है। वह किसी को नहीं छोड़ती और किसी की प्रतीक्षा नहीं करती। वह तब तक प्रतीक्षा नहीं करेगी जब तक तुम तैयार न हो जाओ। द्वार, और अर्गलाएँ, और ताले उसे बाहर नहीं रख सकते। मनुष्य घमण्ड करता है कि उसका घर उसका गढ़ है, परन्तु अपने सारे घमण्ड के बावजूद वह मृत्यु को बाहर नहीं रख सकता। एक ऑस्ट्रियाई रईस अपने सामने मृत्यु और चेचक का नाम तक नहीं लेने देता था। परन्तु नाम लिया जाए या न लिया जाए, इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता; परमेश्वर के ठहराए हुए समय पर मृत्यु आ ही जाएगी।

एक मनुष्य सबसे सुन्दर गाड़ी में, जो धन से मोल ली जा सकती है, सुगमता से सड़क पर चलता जाता है। दूसरा पैदल पगडण्डी पर कठिनाई से चलता है। फिर भी दोनों का अन्त में धरती के नीचे, कब्र में मिलना निश्चित है।

एक मनुष्य के पास अबशालोम की नाईं पचास सेवक होते हैं जो उसकी सेवा में खड़े रहते और उसकी आज्ञा मानते हैं। दूसरे के पास कोई नहीं जो उसकी सेवा में उंगली भी उठाए। परन्तु दोनों उस स्थान की ओर यात्रा कर रहे हैं जहाँ उन्हें अकेले लेटना होगा।

एक मनुष्य के पास लाखों डॉलर हैं। दूसरे के पास मुश्किल से एक पैसा है जिसे वह अपनी सम्पत्ति कह सके। फिर भी न एक, न दूसरा, अदृश्य संसार में एक पैसा भी अपने साथ ले जा सकता है।

एक मनुष्य किसी जिले की लगभग आधी खेती की भूमि का स्वामी है। दूसरे के पास एक छोटी सी बाड़ी भी नहीं। फिर भी मरने पर दोनों के लिए पृथ्वी के छः फुट पूरी तरह पर्याप्त होंगे।

एक मनुष्य अपने शरीर को हर सम्भव स्वादिष्ट पदार्थ से लाड़-प्यार करता है और उसे सबसे मूल्यवान और कोमल वस्त्र पहनाता है। दूसरे के पास खाने को मुश्किल से भोजन है और पहनने को कम ही वस्त्र। फिर भी दोनों उस दिन की ओर दौड़े जा रहे हैं जब उन पर "मिट्टी से मिट्टी, और धूल से धूल" का उच्चारण किया जाएगा, और पचास वर्ष बाद कोई यह न कह सकेगा, "ये धनवान की हड्डियाँ हैं, और ये कंगाल की," क्योंकि वे दोनों धूल के सिवाय कुछ न रहेंगे।

मैं जानता हूँ कि ये बातें जानी-पहचानी हैं। मैं एक क्षण के लिए भी इससे इनकार नहीं करता। मैं केवल वही पुरानी घिसी-पिटी बातें कह रहा हूँ जो सब जानते हैं। परन्तु मैं ऐसी बातें भी कह रहा हूँ जिन्हें सब "समझते" नहीं! नहीं, नहीं! यदि वे उन्हें समझते, तो वे वैसा न बोलते और न वैसा करते जैसा करते हैं।

तुम कभी-कभी सुसमाचार के सेवकों के लहजे और भाषा पर आश्चर्य करते हो। तुम चकित होते हो कि हम तुम पर तुरन्त निर्णय लेने का दबाव डालते हैं। तुम सोचते हो कि हम अपने विचारों में अति करनेवाले, अतिशयोक्ति करनेवाले और विचित्र हैं, क्योंकि हम तुमसे आग्रह करते हैं कि अपना सारा जीवन मसीह को सौंप दो, कुछ भी अनिश्चित न छोड़ो, और निश्चय कर लो कि तुम नया जन्म पा चुके हो और स्वर्ग के लिए तैयार हो। तुम सुनते तो हो, पर सहमत नहीं होते। तुम चले जाते हो और एक दूसरे से कहते हो, "वह मनुष्य भला तो चाहता है, पर कुछ अधिक ही आगे बढ़ जाता है।"

परन्तु क्या तुम नहीं देखते कि मृत्यु की सच्चाई हमें निरन्तर किसी और प्रकार से बोलने से रोकती है? हम देखते हैं कि मृत्यु धीरे-धीरे हमारी मण्डलियों को घटा रही है। हम अपनी सभाओं में एक के बाद एक मुख की कमी पाते हैं। हम नहीं जानते कि अगली बारी किसकी आएगी। हम केवल इतना जानते हैं कि वृक्ष जहाँ गिरेगा वहीं पड़ा रहेगा, और कि "मृत्यु के बाद न्याय होता है।" हमें अपने प्रचार में साहसी, दृढ़ और अटल होना चाहिए। हम कुछ को अप्रसन्न करने का जोखिम उठाना चाहेंगे, बजाय इसके कि किसी को खो दें। हम उस महान पुराने प्रचारक बैक्सटर के स्थापित आदर्श की ओर लक्ष्य रखते हैं, जिसने कहा, "मैं ऐसे प्रचार करूँगा मानो फिर कभी प्रचार न करूँगा, और मरते हुए मनुष्य की नाईं मरते हुए मनुष्यों से।"

एक साहसी और निडर प्रचारक के विषय में कहा गया था: "वह मनुष्य ऐसे प्रचार करता है मानो मृत्यु उसके ठीक पीछे चली आ रही हो। जब मैं उसे प्रचार करते सुनता हूँ तो मुझे नींद नहीं आ सकती।"

ओह, काश स्त्री-पुरुष इस बोध के साथ जीना सीखते कि एक दिन उन्हें मरना है! सचमुच एक मरते हुए संसार और उसके क्षणिक सुख-चैन पर मन लगाना, और क्षण भर के सुखों के लिए स्वर्ग की महिमामय अनन्तता को खो देना समय की बर्बादी है! यहाँ हम छोटी-छोटी बातों के लिए यत्न करते, परिश्रम करते और अपने को थका डालते हैं, और चींटी के टीले पर चींटियों की नाईं इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं, फिर भी कुछ वर्षों में हम सब चले जाएँगे, और दूसरी पीढ़ी हमारी जगह ले लेगी।

आओ, हम अनन्तता के लिए जिएँ। आओ, हम उसके राज्य और उसकी धार्मिकता को खोजें जो हमसे कभी छीनी नहीं जा सकती। और आओ, हम जॉन बनयन के सुनहरे नियम को कभी न भूलें: "जो भली रीति से जीना चाहता है, वह अपने मरण-दिन के विचारों को अपना प्रतिदिन का मित्र बना ले।"

4. अब आगे यह देखें कि "परमेश्वर की दृष्टि में विश्वासी की आत्मा कितनी बहुमूल्य है।"

दृष्टान्त में धनवान मरता है और गाड़ा जाता है। सम्भव है उसका अन्तिम संस्कार भव्य हुआ हो, जो उसके जीवित रहते हुए उसके धन और पद के अनुरूप था। परन्तु जब मृत्यु में उसकी आत्मा और शरीर अलग हो गए, तब हम उसके धन और सामर्थ्य के विषय में और कुछ नहीं सुनते। अगली बात जो हम सुनते हैं वह यह है कि वह नरक में है।

दृष्टान्त में कंगाल भी मरता है। हम नहीं जानते कि उसका अन्तिम संस्कार कैसा हुआ। आज एक कंगाल का अन्तिम संस्कार प्रायः दुःखद होता है। लाज़र का अन्तिम संस्कार भी शायद इससे अच्छा न था। परन्तु यह हम जानते हैं कि जिस क्षण लाज़र मरता है, स्वर्गदूत उसे अब्राहम की गोद में ले जाते हैं, अर्थात् विश्राम के उस स्थान में, जहाँ सब विश्वासी धर्मियों के पुनरुत्थान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

मेरे विचार में इस दृष्टान्त के इस चित्र में कुछ बहुत प्रभावशाली, बहुत हृदयस्पर्शी और बहुत सान्त्वना देनेवाला है। मैं इस पर आपका विशेष ध्यान चाहता हूँ। यह उन सब पापियों के, जो मसीह पर विश्वास करते हैं, अपने परमेश्वर और पिता से सम्बन्ध पर बड़ा प्रकाश डालता है। यह दिखाता है कि राजाओं का राजा मसीह के सबसे छोटे और सबसे दीन चेलों की कितनी देखभाल करता है।

विश्वासी के जैसे मित्र और सेवक किसी मनुष्य के पास नहीं, चाहे वह इसके विषय में कितना ही कम सोचे। जिस दिन वह आत्मा से नया जन्म पाता है, उस दिन स्वर्गदूत उसके कारण आनन्द करते हैं। स्वर्गदूत जीवन भर उसकी सेवा करते हैं। स्वर्गदूत इस संसार के जंगल में उसके चारों ओर डेरे डालते हैं। स्वर्गदूत उसकी मृत्यु की घड़ी में उसकी आत्मा का भार लेते हैं और उसे सुरक्षित घर पहुँचा देते हैं। हाँ! वह अपनी ही दृष्टि में चाहे कितना ही तुच्छ हो और अपनी नज़रों में कितना ही दीन हो, यीशु का सबसे कंगाल और सबसे नम्र विश्वासी भी स्वर्ग में अपने पिता की ऐसी देखभाल में है जो समझ से परे है। प्रभु उसका चरवाहा बन गया है, और उसे "घटी न होगी।" [भजन संहिता 23:1] बस इतना हो कि कोई मनुष्य सच्चाई और ईमानदारी से मसीह के पास आए और उससे जुड़ जाए, तब उसे जीवते परमेश्वर की सन्तान होने के सब लाभ मिलेंगे।

क्या वह बहुत से पापों के बोझ से दबा है? "चाहे उसके पाप लाल रंग के हों, वे हिम की नाईं उजले हो जाएँगे।"

क्या उसका हृदय कठोर और बुराई की ओर झुकनेवाला है? उसे नया हृदय दिया जाएगा, और उसके भीतर नई आत्मा डाली जाएगी।

क्या वह निर्बल और डरपोक है? जिसने पतरस को अपने शत्रुओं के सामने मसीह को मान लेने की सामर्थ्य दी, वही उसे साहसी बनाएगा।

क्या वह अज्ञानी है? जिसने थोमा की मन्दता के साथ धीरज रखा, वही उसके साथ भी धीरज रखेगा और उसे सारे सत्य में ले चलेगा।

क्या वह अपनी स्थिति में अकेला है? जो पौलुस के पास खड़ा रहा जब सब मनुष्यों ने उसे छोड़ दिया, वही उसके पक्ष में भी खड़ा रहेगा।

क्या वह विशेष परीक्षा की परिस्थितियों में है? जिसने नीरो के घराने में लोगों को सन्त बने रहने के योग्य किया, वही उसे भी अन्त तक स्थिर रखेगा।

उसके सिर का एक-एक बाल गिना हुआ है। परमेश्वर की अनुमति के बिना कोई भी बात उसे हानि नहीं पहुँचा सकती। जो उसे दुःख देता है, वह परमेश्वर की आँख की पुतली को छूता है, और मसीह ही के एक भाई और अंग को चोट पहुँचाता है।

उसकी सब परीक्षाएँ बुद्धिमानी से ठहराई गई हैं। शैतान उसे केवल तभी सता सकता है, जैसे उसने अय्यूब को सताया, जब परमेश्वर उसे अनुमति दे। उस पर कोई ऐसी परीक्षा नहीं पड़ सकती जो उसकी सहनशक्ति से बाहर हो। सब बातें मिलकर उसकी भलाई ही के लिये काम कर रही हैं।

उसके सब पग अनुग्रह से महिमा तक ठहराए गए हैं। वह पृथ्वी पर तब तक रखा जाता है जब तक वह स्वर्ग के लिये पक न जाए, और एक क्षण भी अधिक नहीं। प्रभु की फसल को धूप और हवा, ठण्ड और गर्मी, वर्षा और आँधी का अपना ठहराया हुआ भाग अवश्य मिलना चाहिए। और जब विश्वासी का काम पूरा हो जाता है, तब परमेश्वर के स्वर्गदूत उसे लेने आते हैं, जैसे वे लाज़र को लेने आए थे, और उसे सुरक्षित घर पहुँचा देते हैं।

नहीं, संसार के लोग यह बहुत कम सोचते हैं कि जब वे मसीह के लोगों का उपहास करते हैं, तब वे किसे तुच्छ जान रहे हैं। वे उनका उपहास कर रहे हैं जिनकी सेवा करने में स्वर्गदूत लज्जित नहीं होते। वे स्वयं मसीह के भाइयों और बहनों का उपहास कर रहे हैं। वे यह बहुत कम विचारते हैं कि यही वे लोग हैं जिनके कारण क्लेश के दिन घटाए जाते हैं। यही वे लोग हैं जिनकी मध्यस्थता की प्रार्थना से राजा शान्ति से राज्य करते हैं। वे यह बहुत कम विचारते हैं कि लाज़र जैसे मनुष्यों की प्रार्थनाओं का राष्ट्रों के कार्यों में लाखों सैनिकों से अधिक भार है।

मसीह में विश्वास करनेवालो, तुम अपने विशेषाधिकारों और अपनी सम्पत्ति की पूरी सीमा को कितना कम जानते हो। पाठशाला के बच्चों के समान, तुम यह भी नहीं जानते कि तुम्हारा पिता तुम्हारी भलाई के लिये आधा भी क्या कर रहा है। जितना तुमने अब तक किया है, उससे अधिक विश्वास से जीना सीखो। उस भण्डार की परिपूर्णता से परिचित हो जाओ जो अभी भी मसीह में तुम्हारे लिये रखा हुआ है। इसमें सन्देह नहीं कि जब तक हम शरीर में हैं, यह संसार सदा परीक्षा का स्थान रहेगा। फिर भी लाज़र के भाइयों और बहनों के लिये ऐसी सान्त्वनाएँ ठहराई गई हैं जिनका आनन्द बहुत से लोग कभी नहीं लेते।

5. अन्त में यह देखो कि "स्वार्थ का पाप कितना भयानक और आत्मा का नाश करनेवाला पाप है।"

दृष्टान्त में तुम धनवान को निराशाजनक दशा में पाते हो। सारी बाइबल में नरक में पड़ी हुई खोई हुई आत्मा का इससे अधिक स्पष्ट चित्र कहीं नहीं मिलता जितना यहाँ मिलता है। तुम उससे आरम्भ में मिलते हो, जब वह बैंजनी वस्त्र और बढ़िया मलमल पहने हुए है। तुम उससे अन्त में बिछड़ते हो, जब वह अनन्त आग में तड़प रहा है।

फिर भी ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया कि यह मनुष्य हत्यारा, या चोर, या व्यभिचारी, या झूठा था। यह कहने का कोई कारण नहीं कि वह नास्तिक, या अविश्वासी, या निन्दक था। जहाँ तक हम जानते हैं, वह यहूदी धर्म के सब नियमों का पालन करनेवाला था। परन्तु हम इतना जानते हैं कि वह सदा के लिये खो गया!

इस विचार में बड़ी गम्भीरता है। यहाँ एक ऐसा मनुष्य है जिसका बाहरी जीवन सम्भवतः ठीक था। हम उस पर कोई आरोप नहीं जानते। वह भड़कीले वस्त्र पहनता है, पर उसके पास वस्त्रों पर खर्च करने के लिये धन था। वह भव्य भोज और दावतें देता है, पर वह धनी था और भली-भाँति ऐसा कर सकता था। हम उसके विरुद्ध ऐसा कुछ लिखा हुआ नहीं पढ़ते जो आज के सैकड़ों-हज़ारों लोगों के विषय में न लिखा जा सके, जो आदरणीय और भले लोग माने जाते हैं। फिर भी इस मनुष्य का अन्त यह है कि वह नरक में जाता है। निश्चय ही यह गम्भीर ध्यान के योग्य है।

(क) मेरा विश्वास है कि इस खण्ड का उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि "केवल अपने ही लिये जीने से सावधान रहो।"

इतना कह सकना पर्याप्त नहीं कि "मैं नैतिक और आदरणीय जीवन जीता हूँ। मैं हर एक का हक़ चुकाता हूँ। मैं जीवन के सब कामों को खराई से निभाता हूँ। मैं कलीसिया जाता हूँ, बाइबल पढ़ता हूँ, परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ।" इसके पीछे एक और प्रश्न रह जाता है, जिसका उत्तर बाइबल माँगती है: "तू किसके लिये जीता है? अपने लिये या मसीह के लिये? तेरे जीवन का बड़ा लक्ष्य, उद्देश्य, ध्येय और प्रधान प्रेरणा क्या है?" चाहे लोग इस प्रश्न को अति कठोर कहें। मुझे तो पौलुस के इन शब्दों से कम कुछ नहीं दिखाई देता: "और वह इस निमित्त सब के लिये मरा कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएँ परन्तु उसके लिये जो उनके लिये मरा और फिर जी उठा।" [2 कुरिन्थियों 5:15] और मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि यदि हम धनवान के समान केवल अपने ही लिये जीएँ, तो हम अपनी आत्माओं का नाश कर लेंगे।

(ख) मेरा यह भी विश्वास है कि इस खण्ड का उद्देश्य हमें "भूल-चूक के पापों की दण्ड दिलानेवाली प्रकृति" सिखाना है।

ऐसा नहीं लगता कि धनवान के स्वर्ग से चूकने का कारण उसके किए हुए काम थे, बल्कि वे काम थे जो उसने अनकिए छोड़ दिए। लाज़र उसके फाटक पर था, और उसने उसे अनदेखा कर दिया। परन्तु क्या यह मत्ती के 25वें अध्याय में न्याय के वृत्तान्त से ठीक मेल नहीं खाता? वहाँ खोए हुए लोगों के किए हुए पापों का कुछ उल्लेख नहीं है। आरोप कैसे पढ़ा जाता है? — "मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को नहीं दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी नहीं पिलाया; मैं परदेशी था, और तुम ने मुझे अपने घर में नहीं ठहराया; मैं नंगा था, और तुम ने मुझे कपड़े नहीं पहनाए; बीमार और बन्दीगृह में था, और तुम ने मेरी सुधि नहीं ली।" [मत्ती 25:42-43]

उनके विरुद्ध आरोप केवल इतना है कि उन्होंने कुछ काम नहीं किए। इसी पर उनका दण्ड आधारित है। और मैं फिर यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि यदि हम सावधान न रहें, तो भूल-चूक के पाप हमारी आत्माओं का नाश कर सकते हैं। एक भक्त जन ने अपनी मृत्यु-शय्या पर जो कहा, वह सचमुच गम्भीर था: "हे प्रभु, मेरे सब पाप क्षमा कर, पर विशेष रूप से मेरे भूल-चूक के पाप" [उशर]।

(ग) मेरा यह भी विश्वास है कि इस खण्ड का उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि "धन अपने साथ विशेष खतरे लाता है।"

हाँ! धन, जिसकी खोज में अधिकांश मनुष्य सदा लगे रहते हैं, जिसके लिये वे अपना जीवन बिता देते हैं, और जिसे वे मूर्ति बना लेते हैं — वही धन अपने स्वामियों को भारी आत्मिक संकट में डाल देता है! धन का होना आत्मा पर बहुत कठोर करनेवाला प्रभाव डालता है। वह ठण्डा करता है। वह जमा देता है। वह भीतरी मनुष्य को पत्थर बना देता है। वह विश्वास की बातों के प्रति आँख बन्द कर देता है। वह अनजाने ही परमेश्वर को भूल जाने की प्रवृत्ति उत्पन्न कर देता है।

और क्या यह उसी विषय पर पवित्रशास्त्र की सारी भाषा के पूर्ण सामंजस्य में नहीं है? हमारे प्रभु क्या कहते हैं? "धनवानों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!" परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।" [मरकुस 10:23, 25] पौलुस क्या कहता है? "रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटककर अपने आप को नाना प्रकार के दुःखों से छलनी बना लिया है।" [1 तीमुथियुस 6:10]

इससे अधिक चौंकानेवाली बात और क्या हो सकती है कि बाइबल ने बार-बार धन [के लोभ] को पाप और बुराई का अत्यन्त फलदायी कारण बताया है। धन के लिये आकान ने इस्राएल की सेनाओं पर पराजय और अपने ऊपर मृत्यु ला दी। धन के लिये बिलाम ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया और परमेश्वर की प्रजा को श्राप देने का यत्न किया। धन के लिये दलीला ने शिमशोन को पलिश्तियों के हाथ पकड़वा दिया। धन के लिये गेहजी ने नामान और एलीशा से झूठ बोला और कोढ़ी हो गया। धन के लिये हनन्याह और सप्पीरा आरम्भिक कलीसिया के पहले कपटी बने और अपने प्राण खो बैठे। धन के लिये यहूदा इस्करियोती ने मसीह को बेच दिया और अनन्त काल के लिये नष्ट हो गया। निश्चय ही ये तथ्य ऊँचे स्वर में बोलते हैं।

सचमुच, धन सबसे "असन्तोषजनक सम्पत्तियों" में से एक है। निःसन्देह यह कुछ चिन्ताएँ दूर करता है; परन्तु जितनी चिन्ताएँ यह दूर करता है उतनी ही अपने साथ ले भी आता है। उसे पाने में कष्ट है। उसे सँभालकर रखने में व्याकुलता है। उसके उपयोग में परीक्षाएँ हैं। उसके दुरुपयोग में दोष है। उसके खो जाने में शोक है। उसके बाँटने में उलझन है। संसार के दो-तिहाई झगड़े, कलह और मुक़दमे एक ही साधारण कारण से उत्पन्न होते हैं—धन!

निश्चय ही धन सबसे अधिक "फँसानेवाली और मन को बदल देनेवाली" सम्पत्तियों में से एक है। दूर से यह चाहने योग्य लगता है। हाथ में आने पर यह प्रायः विष सिद्ध होता है। यदि किसी मनुष्य को अचानक बहुत धन मिल जाए, तो कोई नहीं बता सकता कि उसकी आत्मा पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। बहुत से लोग निर्धन होने पर परमेश्वर के निकट जीवन बिताते हैं, परन्तु धनी होने पर परमेश्वर को भूल जाते हैं।

मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि जिनके पास धन है, दृष्टान्त के उस धनवान की नाईं, उन्हें अपनी आत्माओं के विषय में बहुत सावधान रहना चाहिए। वे अत्यन्त अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहते हैं। उन्हें बहुत गम्भीरता से चौकस रहने की आवश्यकता है।

(घ) मेरा विश्वास है कि यह अंश इन अन्तिम दिनों में स्वार्थ के विषय में "विशेष सावधानी जगाने" के लिये है।

2 तीमुथियुस 3:1, 2 में तुम्हारे लिये एक विशेष चेतावनी है: "अन्तिम दिनों में कठिन समय आएँगे। मनुष्य स्वार्थी, लोभी, डींगमार, अभिमानी, निन्दक, माता-पिता की आज्ञा न माननेवाले, कृतघ्न और अपवित्र होंगे।" मेरा विश्वास है कि हम अन्तिम दिनों में आ पहुँचे हैं, और यदि हम अपनी आत्माओं से प्रेम रखते हैं तो हमें यहाँ बताए गए पापों से सावधान रहना चाहिए।

सम्भव है कि हम अपने ही समय के बुरे न्यायी हों। हम उसकी बुराइयों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगते हैं, केवल इसलिये कि हम उन्हें देखते और अनुभव करते हैं। परन्तु सब छूट देने के पश्चात् भी मुझे सन्देह है कि स्वार्थ के विरुद्ध चेतावनियों की आवश्यकता कभी आज के दिन से अधिक रही हो। मुझे निश्चय है कि कभी ऐसा समय नहीं था जब सब वर्गों के लोगों के पास इतनी सुख-सुविधाएँ और इतनी सांसारिक अच्छी वस्तुएँ रही हों। फिर भी मेरा विश्वास है कि मनुष्यों के अपने ऊपर किए गए व्यय और दान तथा मिशनों पर किए गए खर्च के बीच भारी असंतुलन है। मैं इसे उस दयनीय तुच्छ दान में देखता हूँ जो बहुत से धनवान लोग दान-कार्यों के लिये देते हैं। मैं इसे हमारे अनेक उत्तम मिशन-संगठनों की मुरझाई हुई दशा और उनकी वार्षिक आय की पीड़ादायक रूप से धीमी वृद्धि में देखता हूँ। मैं इसे किसी भी भले कार्य के दानदाताओं की थोड़ी संख्या में देखता हूँ। मेरा विश्वास है कि इस देश में हज़ारों धनी लोग ऐसे हैं जो सचमुच कुछ भी नहीं देते। मैं इसे इस प्रसिद्ध तथ्य में देखता हूँ कि जो देते भी हैं, उनमें से थोड़े ही अपनी सामर्थ्य के अनुपात में कुछ देते हैं। मैं यह सब देखता हूँ और इस पर शोक करता हूँ। मैं इसे उसी स्वार्थ और लोभ के रूप में देखता हूँ जिसके "अन्तिम दिनों" में उठ खड़े होने की भविष्यद्वाणी की गई थी।

मैं जानता हूँ कि यह पीड़ादायक और नाज़ुक विषय है। परन्तु इस कारण मसीह के सेवक को इससे बचना नहीं चाहिए। यह समय का विषय है, और इसे हृदय तक पहुँचाने की आवश्यकता है। मैं स्वयं से, और उन सब से बोलना चाहता हूँ जो किसी भी प्रकार मसीही होने का अंगीकार करते हैं। निश्चय ही मैं यह आशा नहीं कर सकता कि सांसारिक और पूर्णतः अभक्त लोग इस विषय को बाइबल के प्रकाश में देखें। उनके लिये बाइबल विश्वास और आचरण का नियम नहीं है। उन्हें पदों का हवाला देने से बहुत कम लाभ होगा।

परन्तु मैं सब मसीही कहलानेवालों से निवेदन करता हूँ कि वे ध्यान से विचार करें कि पवित्रशास्त्र लोभ और स्वार्थ के विरुद्ध और धन देने में उदारता के पक्ष में क्या कहता है। क्या यह व्यर्थ है कि प्रभु यीशु ने मूर्ख धनवान का दृष्टान्त कहा, और उसे इसलिये दोषी ठहराया कि वह "परमेश्वर की दृष्टि में धनी" न था? [लूका 12:21] क्या यह व्यर्थ है कि बोनेवाले के दृष्टान्त में उसने "धन के धोखे" का उल्लेख इस कारण के रूप में किया कि वचन का बीज फल नहीं लाता? [मत्ती 13:22] क्या यह व्यर्थ है कि वह कहता है, "अधर्म के धन से अपने लिये मित्र बना लो।" [लूका 16:9] क्या यह व्यर्थ है कि वह कहता है, "जब तू भोजन या प्रीतिभोज करे, तो अपने मित्रों, भाइयों, कुटुम्बियों या धनी पड़ोसियों को न बुला; कहीं ऐसा न हो कि वे भी तुझे बुलाएँ और तुझे बदला मिल जाए। परन्तु जब तू भोज करे तो कंगालों, टुण्डों, लंगड़ों और अन्धों को बुला, तो तू धन्य होगा। क्योंकि तेरे पास बदला देने को कुछ नहीं, इसलिये धर्मियों के पुनरुत्थान में तुझे प्रतिफल मिलेगा।" [लूका 14:12-14] क्या यह व्यर्थ है कि वह कहता है, "अपनी सम्पत्ति बेचकर दान कर दो; और अपने लिये ऐसे बटुए बनाओ जो पुराने नहीं होते, अर्थात् स्वर्ग में ऐसा धन जो घटता नहीं, जिसके निकट चोर नहीं आता और कीड़ा नष्ट नहीं करता।" [लूका 12:33]

क्या यह व्यर्थ है कि वह कहता है, "लेने से देना धन्य है"? [प्रेरितों के काम 20:35] क्या यह व्यर्थ है कि वह हमें उस याजक और लेवी के उदाहरण से सावधान करता है, जिन्होंने घायल यात्री को देखा, परन्तु कतराकर दूसरी ओर से निकल गए? क्या यह व्यर्थ है कि वह भले सामरी की प्रशंसा करता है, जिसने एक अजनबी पर दया दिखाने के लिये अपना सुख त्यागा?

[लूका 10:31] क्या यह व्यर्थ ही है कि पौलुस लोभ को घोर से घोर पापों की श्रेणी में रखता है, और उसे मूर्तिपूजा कहकर धिक्कारता है? [कुलुस्सियों 3:5] और क्या इस भाषा में और धन के विषय में समाज की आदतों और भावनाओं में एक चौंकानेवाला और दुःखद अन्तर नहीं है? मैं हर उस व्यक्ति से अपील करता हूँ जो संसार को जानता है। जो मैं कहता हूँ उसका निर्णय वही करे।

मैं केवल इतना ही कहता हूँ कि पवित्रशास्त्र के जिन खण्डों का मैंने उल्लेख किया है, उन पर शान्ति से विचार कीजिए। मैं यह नहीं मान सकता कि वे कुछ भी सिखाने के लिए नहीं थे। मैं खुले मन से मानता हूँ कि पूर्व की रीतियाँ और हमारी अपनी रीतियाँ भिन्न हैं। यह भी मैं खुले मन से मानता हूँ कि मेरे उद्धृत किए हुए कुछ पद अलंकारिक हैं। फिर भी, सब कुछ कहने के बाद, इन सब कथनों की तह में एक सिद्धान्त छिपा है। हम सावधान रहें कि इस सिद्धान्त की उपेक्षा न हो। मैं चाहता हूँ कि आज के बहुत से नाममात्र के मसीही, जिन्हें शायद मेरी बातें अच्छी न लग रही हों, इन खण्डों पर एक टीका लिखने का प्रयत्न करें, और अपने मन में समझाने का यत्न करें कि इनका अर्थ क्या है।

यह जानना अच्छा है कि गरीबों को धन देने से पाप का प्रायश्चित नहीं हो सकता। यह जानना उत्तम है कि हमारे भले कर्म हमें धर्मी नहीं ठहरा सकते। यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम अपनी सारी सम्पत्ति कंगालों को खिलाने में लगा दें, और अस्पताल और कलीसियाएँ बनवा दें, फिर भी सच्चे प्रेम से रहित हो सकते हैं। परन्तु सावधान रहें कि हम दूसरी अति पर न चले जाएँ, और यह सोचकर कि हमारा धन हमें बचा नहीं सकता, कुछ भी धन दान न करें।

क्या किसी के पास धन है? तो "देखो, सब प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो; क्योंकि किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति की बहुतायत से नहीं होता।" [लूका 12:15] स्मरण रखिए कि स्वर्ग की ओर की दौड़ में आप अतिरिक्त बोझ उठाए हुए हैं। सब मनुष्य स्वभाव से सदा के लिए नाश हो जाने के खतरे में हैं, परन्तु आप अपनी सम्पत्ति के कारण विशेष रूप से खतरे में हैं। आग पर मिट्टी डालने से जितनी जल्दी वह बुझती है, उतनी जल्दी और किसी बात से नहीं बुझती। मुझे निश्चय है कि मसीही जीवन की आग को बुझाने की जैसी प्रवृत्ति धन के होने में है, वैसी और किसी में नहीं। ब्यूकैनन ने अपनी मृत्यु-शय्या पर अपने एक पुराने शिष्य को जो सन्देश भेजा, वह गम्भीर था; उसने कहा कि "वह ऐसे स्थान को जा रहा है जहाँ बहुत कम राजा और बड़े लोग आएँगे।"

इसमें सन्देह नहीं कि धनवान भी दूसरों के समान बच सकते हैं। परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। अब्राहम, अय्यूब और दाऊद सब धनवान थे और फिर भी बचाए गए। परन्तु ओह, सावधान रहिए! धन एक अच्छा सेवक है, पर बुरा स्वामी। हमारे प्रभु का वह कथन आपके हृदय में गहरा उतर जाए: "धनवानों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!" [मरकुस 10:23] एक पुराने भक्त मसीही ने ठीक ही कहा था, "सोने की खानों के ऊपर की भूमि की ऊपरी सतह प्रायः बहुत बंजर होती है।" वृद्ध लैटिमर ने अपने एक उपदेश का आरम्भ प्रभु के इन वचनों को तीन बार दोहराकर किया: "चौकस रहो और लोभ से सावधान रहो," और फिर कहा, "यदि मैं अगले तीन-चार घण्टे और कुछ न कहूँ तो कैसा हो?" इस निवेदन से अधिक बुद्धिमानी और आवश्यकता की प्रार्थनाएँ कम ही हैं: "हमारी समृद्धि के समय, हे भले प्रभु, हमें बचा।"

क्या किसी ने, जिसके पास थोड़ा या कुछ भी धन नहीं, मेरी इन बातों को सुना है? तो जो आपसे अधिक धनी हैं उनसे डाह न कीजिए। उनके लिए प्रार्थना कीजिए। उन पर तरस खाइए। उनकी त्रुटियों के प्रति उदार रहिए। स्मरण रखिए कि ऊँचे स्थान डगमगाने वाले स्थान होते हैं, और उनके आचरण पर दोष लगाने में उतावली न कीजिए। सम्भव है कि उनकी कठिनाइयाँ आपको होतीं तो आप स्वयं भी उनसे अच्छा न करते। "धन के लोभ" से सावधान रहिए। यह "सब बुराइयों की जड़" है। [1 तीमुथियुस 6:10] कोई मनुष्य पास कुछ भी धन न होते हुए भी धन से बहुत प्रेम रख सकता है। स्वार्थ-प्रेम से सावधान रहिए; वह गरीब के घर में भी मिल सकता है और महल में भी। और इस विचार से सावधान रहिए कि केवल गरीबी ही आपको बचा देगी। यदि आप लाज़र के साथ महिमा में बैठना चाहते हैं, तो आपको केवल उसके साथ दुःख में ही नहीं, अनुग्रह में भी सहभागी होना होगा।

क्या कोई उस स्वार्थ-प्रेम का उपाय जानना चाहता है जिसने उस धनी मनुष्य की आत्मा को नाश किया, और जो स्वभाव से हम सब से हमारी त्वचा के समान चिपका हुआ है? मैं आपको साफ़ बताता हूँ कि केवल एक ही उपाय है, और मैं आपसे कहता हूँ कि भली भाँति ध्यान दीजिए कि वह उपाय क्या है। वह नरक का भय नहीं है। वह स्वर्ग की आशा नहीं है। वह कर्तव्य का कोई बोध नहीं है। ओह, नहीं! स्वार्थ का रोग इतनी गहराई तक जमा हुआ है कि ऐसे गौण उद्देश्यों के आगे नहीं झुकेगा। इसे कोई चीज़ चंगा नहीं करेगी सिवाय मसीह के छुटकारा देनेवाले प्रेम के व्यक्तिगत और घनिष्ठ ज्ञान के। आपको अपने पाप की दुर्दशा और दोष को जानना होगा। आपको अपने विवेक पर छिड़के गए और आपको चंगा करनेवाले मसीह के प्रायश्चित के लहू की सामर्थ्य का अनुभव करना होगा। आपको यीशु की मध्यस्थता के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल की मधुरता का स्वाद चखना होगा, और पवित्र आत्मा के द्वारा अपने हृदय में उँडेले गए मेल-मिलाप किए हुए पिता के प्रेम को अनुभव करना होगा।

तब, और उससे पहले नहीं, स्वार्थ की जड़ नष्ट होगी। तब, मसीह के प्रति अपने ऋण की विशालता को जानकर, आप अनुभव करेंगे कि उसे देने के लिए कुछ भी बहुत बड़ा या बहुत मूल्यवान नहीं। यह अनुभव करके कि जब आप कुछ भी पाने के योग्य न थे तब आपसे बहुत प्रेम किया गया, आप सहर्ष बदले में प्रेम करेंगे, और पुकार उठेंगे, "यहोवा ने मेरे जितने उपकार किए हैं, उनका बदला मैं उसको क्या दूँ?" [भजन संहिता 116:12] यह अनुभव करके कि आपने असंख्य दयाएँ मुफ़्त पाई हैं, आप उसे प्रसन्न करने के लिए कुछ भी करना सौभाग्य समझेंगे जिसके आप सब कुछ के ऋणी हैं। यह जानकर कि आप "दाम देकर मोल लिए गए" हैं, और अब अपने नहीं रहे, आप अपने शरीर और आत्मा से, जो उसी के हैं, परमेश्वर की महिमा करने का परिश्रम करेंगे। [1 कुरिन्थियों 6:20]

हाँ; मैं फिर कहता हूँ। स्वार्थ-प्रेम का कोई कारगर उपाय मैं नहीं जानता, सिवाय मसीह के प्रेम में दृढ़ विश्वास के। दूसरे उपाय रोग की पीड़ा को कम कर सकते हैं; पर यही उसे चंगा करेगा। दूसरे उपाय उसकी विकृति को छिपा सकते हैं; पर यही पूरी चंगाई करेगा।

एक सरल, भले स्वभाव का मनुष्य अपने स्वार्थ को ढके रख सकता है। प्रशंसा का प्रेम किसी दूसरे में उसे छिपा सकता है। आत्म-धार्मिकता से भरा आत्म-त्याग का भाव किसी तीसरे में उसे आँखों से ओझल रख सकता है। परन्तु स्वार्थ को जड़ से काट डालनेवाली एकमात्र वस्तु मसीह का वह प्रेम है जो पवित्र आत्मा के द्वारा मन में प्रकट होता है और सच्चे विश्वास के द्वारा हृदय में अनुभव किया जाता है। जब मनुष्य इन वचनों का पूरा अर्थ देख लेता है, "मसीह ने मुझसे प्रेम किया और अपने आप को मेरे लिये दे दिया," तब वह अपने आप को और अपना सब कुछ मसीह की सेवा में देने में आनन्दित होगा। वह उसके लिये जीएगा, इसलिये नहीं कि वह सुरक्षित हो जाए, परन्तु इसलिये कि वह पहले ही सुरक्षित है। वह उसके लिये काम करेगा, इसलिये नहीं कि उसे जीवन और शान्ति मिले, परन्तु इसलिये कि उसे जीवन और शान्ति पहले ही मिल चुकी है।

हे तुम सब जो स्वार्थ की शक्ति से छुटकारा पाना चाहते हो, मसीह के क्रूस के पास जाओ। जाकर देखो कि तुम्हारी आत्मा के छुटकारे के मूल्य के रूप में वहाँ कितना बड़ा दाम चुकाया गया। जाकर देखो कि वहाँ कैसा अद्भुत बलिदान चढ़ाया गया, कि तुम जैसे दीन पापियों के लिये अनन्त जीवन का खुला द्वार तैयार हो। जाकर देखो कि परमेश्वर के पुत्र ने किस प्रकार अपने आप को तुम्हारे लिये दे दिया, और तुम भी अपने आप को उसे दे दो।

जिस रोग ने दृष्टान्त के धनवान मनुष्य को नाश किया, उसका उपचार हो सकता है। परन्तु स्मरण रखो, सच्चा उपाय केवल एक ही है! तुम्हें अपने लिये नहीं, परन्तु मसीह के लिये जीना है। देखो कि यह उपाय केवल जाना ही न जाए, वरन् अपनाया भी जाए; केवल सुना ही न जाए, वरन् काम में भी लाया जाए।

(1) और अब मैं सब को आत्म-परीक्षा की बड़ी आवश्यकता का स्मरण दिलाकर समाप्त करता हूँ।

इस दृष्टान्त जैसा पवित्रशास्त्र का कोई अंश बहुतों को अपने हृदय को जाँचने के लिये प्रेरित करे, "मैं कौन हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? मैं क्या कर रहा हूँ? मृत्यु के बाद मेरा क्या होनेवाला है? क्या मैं संसार को छोड़ने के लिये तैयार हूँ? क्या आनेवाले संसार में मेरे लिये कोई घर है जिसकी मैं आशा रख सकूँ? क्या मैंने पाप के पुराने मनुष्यत्व को उतारकर मसीह में नया जीवन धारण कर लिया है? क्या मैं सचमुच मसीह के साथ एक हूँ, और क्षमा पाई हुई आत्मा हूँ?" धनवान और लाज़र की कथा सुन लेने के बाद ऐसे प्रश्न पूछे जाएँ तो यह उचित ही है। काश कि पवित्र आत्मा बहुतों के हृदयों को ये प्रश्न पूछने के लिये प्रेरित करे!

(2) इसके बाद, मैं हर उस व्यक्ति को न्योता देता हूँ जो उद्धार पाना चाहता है और जिसने जान लिया है कि वह अपने पापों में खोया हुआ है, कि जब तक उद्धार मिल सकता है तब तक उसे ढूँढ़ ले।

मैं तुमसे विनती करता हूँ कि उसी को ढूँढ़ो, जो अकेला मनुष्य के लिये स्वर्ग में प्रवेश करना और उद्धार पाना सम्भव बना सकता है, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह को। स्वर्ग की कुंजियाँ उसी के पास हैं। जो कोई उसके पास आएगा उसका उद्धारकर्ता होने के लिये पिता परमेश्वर ने उस पर मुहर लगाई है और उसे नियुक्त किया है। गम्भीर और तीव्र प्रार्थना में उसके पास जाओ और अपनी दशा उसे बताओ। उससे कहो कि तुमने सुना है कि "वह पापियों से मिलता है," और तुम उसके पास ऐसे ही पापी के रूप में आते हो। [लूका 15:2] उससे कहो कि तुम उसी की रीति से उसके द्वारा उद्धार पाना चाहते हो, और उससे विनती करो कि वह तुम्हारा उद्धार करे। काश कि तुम बिना देर किये यही मार्ग अपनाओ। उस धनवान मनुष्य के निराशाजनक अन्त को स्मरण रखो। जब मनुष्य एक बार मर जाता है, तो आत्मा के उद्धार का कोई अवसर शेष नहीं रहता।

(3) अन्त में, मैं सब मसीही कहलानेवालों से विनती करता हूँ कि वे सब प्रकार के दान और दया के कामों में उदारता की आदतें अपने में बढ़ाएँ।

स्मरण रखो कि तुम परमेश्वर के भण्डारी हो; इसलिये जब कभी अवसर मिले, उदारता से, सहर्ष और बिना कुड़कुड़ाए धन दो। तुम अपना धन सदा के लिये नहीं रख सकते। किसी दिन तुम्हें इसका लेखा देना होगा कि वह किस प्रकार खर्च हुआ। आह, जब तक तुम्हारे बस में है, उसे अनन्तकाल पर दृष्टि रखकर काम में लाओ!

मैं धनवानों से यह नहीं कहता कि वे अपनी जीवन-स्थिति छोड़ दें, अपनी सारी सम्पत्ति दे डालें और गन्दी बस्तियों में जाकर रहें। यह तो परमेश्वर के भण्डारी का पद निभाने से इनकार करना होगा। मैं किसी से यह नहीं कहता कि वह अपने सांसारिक कामकाज की उपेक्षा करे और अपने परिवार का पालन-पोषण करना छोड़ दे। व्यापार में परिश्रम करना मसीही का निश्चित कर्तव्य है। जो हम पर निर्भर हैं उनके लिये प्रबन्ध करना उचित मसीही बुद्धिमानी है। परन्तु मैं सब से कहता हूँ कि जीवन की यात्रा में आगे बढ़ते हुए निरन्तर चारों ओर देखते रहें, और कंगालों को स्मरण रखें, देह के कंगालों को भी और आत्मा के कंगालों को भी। हम यहाँ कुछ ही थोड़े वर्षों के लिये हैं। यहाँ रहते हुए हम अपने धन से सबसे अधिक भलाई कैसे कर सकते हैं? हम उसे ऐसे कैसे खर्च करें कि जब हम संसार से उठा लिये जाएँ तो हम इसे कुछ अधिक सुखी और कुछ अधिक पवित्र छोड़ जाएँ? क्या हम अपने कुछ विलास-साधनों पर रोक नहीं लगा सकते?

क्या हम अपने ऊपर कम खर्च करके मसीह के कार्य और मसीह के कंगालों को अधिक नहीं दे सकते? क्या कोई ऐसा नहीं जिसकी हम भलाई कर सकें? क्या कोई रोगी, कोई कंगाल, कोई दीन नहीं है जिसके दुःख हम घटा सकें और जिसके सुख हम बढ़ा सकें? ऐसे प्रश्नों का उत्तर किसी न किसी ओर से अवश्य मिलता है। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि मसीही अपनी सामर्थ्य के अनुपात में दें, तो हर धार्मिक और दान-संस्था की आय सहज ही दस गुनी बढ़ाई जा सकती है।

निश्चय ही ऐसी विनतियाँ किसी को इतनी शक्ति से नहीं छूनी चाहिए जितनी प्रभु यीशु में विश्वास का अंगीकार करनेवालों को। इस पाठ का दृष्टान्त स्वभाव से हमारी दशा और मसीह के प्रति हमारे ऋण का एक प्रभावशाली चित्र है। हम सब लाज़र की नाईं स्वर्ग के फाटक पर पड़े थे, मृत्यु की हद तक रोगी, असहाय और भूखे। परमेश्वर का धन्यवाद हो! हमारी उपेक्षा नहीं की गई, जैसी उसकी की गई थी। यीशु हमें राहत देने आया। यीशु ने अपने आप को हमारे लिये दे दिया कि हम आशा रखें और जीवित रहें। लाज़र जैसे कंगाल संसार के लिये वह स्वर्ग से उतरा, और अपने आप को दीन करके मनुष्य बना। लाज़र जैसे कंगाल संसार के लिये वह भलाई करता हुआ सब स्थानों में फिरा, और मनुष्यों की देह की भी वैसी ही चिन्ता की जैसी आत्मा की, जब तक कि उसने क्रूस पर हमारे लिये प्राण न दे दिए।

मेरा विश्वास है कि दान और दया के कामों के समर्थन में देकर हम वही कर रहे हैं जो मसीह के मन के अनुसार है, और मैं तुम सब से कहता हूँ कि यदि तुमने पहले कभी देना आरम्भ नहीं किया, तो अब देने की आदत डालो; और यदि तुम पहले से देते हो, तो और अधिक दो।

मेरा विश्वास है कि संसारिकता और लोभ के विरुद्ध चेतावनी देकर मैंने केवल वही चेतावनी सामने रखी है जिसकी इस समय विशेष आवश्यकता थी, और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह इस सन्देश के विचार को बहुत सी आत्माओं के लिये आशीषमय करे।

सबसे उत्तम मित्र

"यह मेरा मित्र है" [श्रेष्ठगीत 5:16]

मित्र पृथ्वी पर सबसे बड़ी आशीषों में से एक है। मुझसे धन की बात मत करो: प्रेम धन से उत्तम है; सहानुभूति सम्पत्ति के स्वामी होने से उत्तम है। जिसके कोई मित्र नहीं, वह कंगाल मनुष्य है।

यह संसार दुःख से भरा है क्योंकि यह पाप से भरा है। यह अन्धकारमय स्थान है। यह अकेलेपन का स्थान है। यह निराशा का स्थान है। मित्र वसन्त ऋतु के दिन में सूर्य की सबसे उज्ज्वल किरण के समान होता है। मित्रता हमारे आधे दुःख मिटा देती है और हमारे आनन्द को दुगुना कर देती है।

सच्चा मित्र दुर्लभ और विरल होता है। ऐसे बहुत हैं जो समृद्धि की धूप में हमारे साथ खाएँगे, पीएँगे और हँसेंगे। ऐसे थोड़े ही हैं जो अन्धकार के दिनों में हमारे साथ खड़े रहें—थोड़े ही हैं जो हमारे बीमार, असहाय और निर्धन होने पर हमसे प्रेम रखें—और सबसे बढ़कर, थोड़े ही हैं जो हमारी आत्माओं की चिन्ता करें।

क्या इस लेख के किसी पाठक को सच्चे मित्र की आवश्यकता है? मैं यह इसलिए लिखता हूँ कि आज आपको एक मित्र के विषय में बताऊँ। मैं एक ऐसे को जानता हूँ जो "ऐसा मित्र है जो भाई से भी अधिक निकट रहता है।" [नीतिवचन 18:24] मैं एक ऐसे को जानता हूँ जो समय और अनन्तकाल के लिए आपका मित्र होने को तैयार है, यदि आप उसे ग्रहण करें।

जिस मित्र से मैं आपका परिचय कराना चाहता हूँ वह यीशु मसीह है। वह परिवार धन्य है जिसमें मसीह को सबसे पहला स्थान मिला है! वह व्यक्ति धन्य है जिसका प्रमुख मित्र मसीह है!

I. क्या हमें "संकट के समय का मित्र" चाहिए? ऐसा मित्र प्रभु यीशु मसीह है।

मनुष्य परमेश्वर की पृथ्वी पर सबसे अधिक अभावग्रस्त प्राणी है, क्योंकि वह पापी है। पापियों की आवश्यकता के समान कोई आवश्यकता इतनी बड़ी नहीं: निर्धनता, भूख, प्यास, ठण्ड, रोग—ये सब उसकी तुलना में कुछ भी नहीं। पापियों को क्षमा चाहिए, और वे अपने लिए उसे जुटाने में सर्वथा असमर्थ हैं; उन्हें दोषी विवेक और मृत्यु के भय से छुटकारा चाहिए, और उसे पाने की उनमें अपनी कोई सामर्थ्य नहीं। यही वह आवश्यकता है जिसे दूर करने प्रभु यीशु मसीह संसार में आया। "मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया।" [1 तीमुथियुस 1:15]

हम सब स्वभाव से निर्धन और मरने वाले प्राणी हैं। सिंहासन पर बैठे राजा से लेकर झुग्गी-बस्ती के कंगाल तक, हम सब आत्मा के प्राणघातक रोग से ग्रस्त हैं। हम जानें या न जानें, हम अनुभव करें या न करें, हम सब प्रतिदिन मर रहे हैं। पाप की महामारी हमारे लहू में है। हम स्वयं को चंगा नहीं कर सकते: हम हर घड़ी बिगड़ते जा रहे हैं। प्रभु यीशु ने इस सबका उपचार करने का बीड़ा उठाया। वह संसार में "स्वास्थ्य और चंगाई लाने" आया; वह हमें "दूसरी मृत्यु" से छुड़ाने आया; वह "मृत्यु को नाश करने और सुसमाचार के द्वारा जीवन और अमरता को प्रकाश में लाने" आया। [यिर्मयाह 33:6; प्रकाशित वाक्य 2:11; 2 तीमुथियुस 1:10]

हम सब स्वभाव से बन्दीगृह में पड़े कर्जदार थे। हम अपने परमेश्वर के लाखों-करोड़ों के देनदार थे, और हमारे नाम पर एक पैसा भी न था। हम अभागे दिवालिए थे, जिन्हें स्वयं को छुड़ाने की कोई आशा न थी। हम अपने देनदारी के बोझ से कभी मुक्त नहीं हो सकते थे, और प्रतिदिन ऋण में और गहरे डूबते जाते थे। प्रभु यीशु ने यह सब देखा और हमारी सहायता का बीड़ा उठाया। उसने "हमें मोल लेकर छुड़ाने" का प्रण किया; वह "बन्दियों को छुटकारे का और कैदियों को अन्धकार से छूटने का प्रचार करने" आया; "उसने हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया।" [होशे 13:14; यशायाह 61:1; गलातियों 3:13]

हम सब स्वभाव से डूबते और ठुकराए हुए थे। हम अनन्त जीवन के बन्दरगाह तक कभी नहीं पहुँच सकते थे। हम लहरों के बीच डूब रहे थे, सुस्त, असहाय और निर्बल; अपने ही पापों की जंजीर में जकड़े हुए, अपने ही दोष के बोझ तले छटपटाते हुए, और शैतान का सहज शिकार बनने की स्थिति में। प्रभु यीशु ने यह सब देखा और हमारी सहायता का बीड़ा उठाया। वह स्वर्ग से उतरकर हमारा सामर्थी "योद्धा" बना; वह "खोए हुए को ढूँढ़ने और उसका उद्धार करने" आया; और "हमें गड्ढे में उतरने से बचाने" आया। [भजन संहिता 89:19; लूका 19:10; अय्यूब 33:24]

क्या प्रभु यीशु मसीह के स्वर्ग से उतरे बिना हमारा उद्धार हो सकता था? जहाँ तक हमारी आँखें देख सकती हैं, यह असम्भव था। मिस्र, यूनान और रोम के सबसे बुद्धिमान मनुष्यों ने भी परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप पाने का मार्ग कभी नहीं खोज पाया। मसीह की मित्रता के बिना हम सब नरक की पीड़ाओं और यातनाओं में सदा के लिए नष्ट हो जाते।

क्या प्रभु यीशु मसीह हमारा उद्धार करने के लिए नीचे आने को विवश था? अरे नहीं! नहीं! कदापि नहीं! यह उसका अपना स्वतन्त्र प्रेम, दया और करुणा थी जो उसे नीचे ले आई। वह बिना ढूँढ़े और बिना माँगे आया, क्योंकि वह अनुग्रहकारी था।

आइए इन बातों पर विचार करें। संसार के आरम्भ से सारे इतिहास को खोज लीजिए—जिन्हें आप जानते और प्रेम करते हैं उनके पूरे घेरे में दृष्टि डाल लीजिए: मनुष्यों के बीच ऐसी मित्रता की बात आपने कभी नहीं सुनी। हमारी घोर आवश्यकता के समय हमारी सहायता करने को तत्पर यीशु मसीह के समान ऐसा सच्चा मित्र कभी नहीं हुआ।

II. क्या आप ऐसा मित्र चाहते हैं जो आपकी सब आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्णतः समर्थ हो? ऐसा मित्र प्रभु यीशु मसीह है। मनुष्य की मित्रता का सच्चा माप उसके कामों से किया जाना चाहिए। मुझे यह न बताइए कि वह क्या कहता है, क्या अनुभव करता है और क्या चाहता है; मुझे उसके शब्दों और पत्रों की बात न बताइए: बल्कि मुझे बताइए कि वह करता क्या है। "सच्चे मित्र की पहचान इससे होती है कि सच्चा मित्र क्या करता है।"

प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्य के लिए जो किया है, वही मनुष्य के प्रति उसके मित्रभाव का सबसे बड़ा प्रमाण है। जैसे कृपा और आत्मत्याग के कार्य उसने हमारे लिए किए हैं वैसे कभी किसी ने नहीं किए। उसने हमसे केवल वचन में नहीं, बल्कि कर्म और कार्य में प्रेम किया है।

हमारे लिए उसने हमारा स्वभाव धारण किया, और स्त्री से जन्म लिया। जो स्वयं पूर्ण परमेश्वर था और पिता के बिलकुल बराबर था, उसने कुछ समय के लिए अपनी महिमा को एक ओर रख दिया और हमारे ही जैसा शरीर और लहू धारण किया। सब वस्तुओं का सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता हम में से किसी के समान एक नन्हा शिशु बना, और पाप को छोड़ हमारी सारी शारीरिक दुर्बलताओं और पीड़ाओं का अनुभव किया। "वह धनी होकर भी तुम्हारे लिये निर्धन बन गया, ताकि उसकी निर्धनता के द्वारा तुम धनी हो जाओ।" [2 कुरिन्थियों 8:9]

हमारे लिए उसने इस बुरे संसार में तैंतीस वर्ष बिताए, स्त्री-पुरुषों द्वारा तुच्छ जाना और ठुकराया गया, दुःखी पुरुष और रोग से परिचित। यद्यपि वह राजाओं का राजा था, फिर भी उसके पास सिर रखने की जगह न थी: यद्यपि वह प्रभुओं का प्रभु था, फिर भी वह प्रायः थका हुआ, भूखा, प्यासा और कंगाल रहा। "[उसने] अपने आप को शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रकट होकर अपने आप को दीन किया। . . ." [फिलिप्पियों 2:7-8]

हमारे लिये उसने सब मृत्युओं में सबसे अधिक पीड़ादायक मृत्यु सही—क्रूस पर चढ़ाए जाने की मृत्यु। निर्दोष और निष्कलंक होते हुए भी उसने अपने आप को दोषी ठहराए जाने और दण्ड पाने दिया। जो जीवन का सरदार था, वह मेम्ने के समान वध होने को ले जाया गया, और उसने अपने प्राण मृत्यु तक उण्डेल दिए। वह "हमारे लिये मरा।" [1 थिस्सलुनीकियों 5:10]

क्या उसके लिये ऐसा करना अनिवार्य था? अरे नहीं! वह स्वर्गदूतों की बारह सेनाओं से भी अधिक को अपनी सहायता के लिये बुला सकता था, और अपने मुँह के एक वचन से अपने शत्रुओं को तितर-बितर कर सकता था। उसने स्वेच्छा से और अपनी ही इच्छा से दुःख उठाया, ताकि हमारे पापों का प्रायश्चित हो। वह जानता था कि अपनी देह और लहू के बलिदान के सिवा और कोई उपाय पापी मनुष्य और पवित्र परमेश्वर के बीच मेल-मिलाप नहीं करा सकता। उसने हमारे छुटकारे का मूल्य चुकाने के लिये अपना प्राण दे दिया: वह मरा कि हम जीएँ; उसने दुःख सहा कि हम राज्य करें; उसने लज्जा उठाई कि हमें महिमा मिले। "मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए।" "जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिये पाप ठहराया कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।" [1 पतरस 3:18; 2 कुरिन्थियों 5:21]

ऐसी मित्रता मनुष्य की समझ से परे है। कभी-कभी हमने ऐसे मित्रों की बात सुनी होगी जो अपने प्रेम करनेवालों के लिये प्राण दे देते। परन्तु ऐसा मनुष्य कहाँ मिलेगा जो अपने बैरियों के लिये अपना प्राण दे? फिर भी यीशु ने हमारे लिये यही किया है। "परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।" [रोमियों 5:8]

संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक मनुष्यों की सब जातियों से पूछ लो, और तुम कहीं भी ऐसे कार्य के विषय में न सुनोगे। परमेश्वर के पुत्र यीशु के समान इतना ऊँचा होकर कभी कोई इतना नीचे नहीं झुका; किसी ने अपनी मित्रता का इतना महँगा प्रमाण कभी नहीं दिया; किसी ने दूसरों की भलाई के लिये इतना मूल्य नहीं चुकाया और इतना कुछ नहीं सहा। यीशु मसीह के समान मित्र कभी न हुआ!

III. क्या हमें "एक सामर्थी और शक्तिशाली मित्र" चाहिए? ऐसा मित्र यीशु मसीह है।

सहायता करने की सामर्थ्य ऐसी बात है जो इस संसार में थोड़े ही लोगों के पास होती है। बहुतों में दूसरों की भलाई करने की इच्छा तो होती है, पर सामर्थ्य नहीं। वे दूसरों के दुःखों को अनुभव करते हैं, और यदि कर सकें तो आनन्द से उन्हें दूर कर दें: वे संकट में पड़े अपने मित्रों के साथ रो तो सकते हैं, पर उनका शोक दूर नहीं कर सकते। परन्तु यद्यपि मनुष्य निर्बल है, मसीह बलवन्त है—यद्यपि हमारे सांसारिक मित्रों में सबसे अच्छा भी दुर्बल है, मसीह सर्वशक्तिमान है: यीशु ने कहा, "स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है।" [मत्ती 28:18] जिनकी वह सहायता करता है, उनके लिये यीशु मसीह के समान कोई इतना नहीं कर सकता। दूसरे उनके शरीर की थोड़ी सहायता कर सकते हैं: वह शरीर और आत्मा दोनों की सहायता कर सकता है। दूसरे कुछ समय तक उनके लिये थोड़ा कर सकते हैं: वह समय और अनन्तकाल दोनों के लिये मित्र हो सकता है।

(क) वह पापियों में सबसे बड़े पापी को भी "क्षमा करने" और बचाने में "समर्थ" है। वह सबसे दोषी विवेक को उसके सारे बोझों से छुड़ा सकता है और उसे परमेश्वर के साथ पूर्ण शान्ति दे सकता है। वह दुष्टता के सबसे घिनौने दागों को धो सकता है, और परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य की आत्मा को हिम से भी अधिक उजला बना सकता है। वह आदम की एक दीन, निर्बल सन्तान को सदा की धार्मिकता का वस्त्र पहना सकता है, और उसे स्वर्ग का ऐसा अधिकार दे सकता है जो कभी न छिनेगा। संक्षेप में, यदि हम केवल उस पर भरोसा रखें तो वह हम में से किसी को भी शान्ति, आशा, क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप दे सकता है। "उसके पुत्र यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।" [1 यूहन्ना 1:7]

(ख) वह सबसे कठोर हृदयों को भी "फेरने" में "समर्थ" है, और मनुष्य में नई आत्मा उत्पन्न कर सकता है। वह सबसे बेपरवाह और अभक्त लोगों को लेकर, अपनी दी हुई पवित्र आत्मा के द्वारा उन्हें दूसरा मन दे सकता है। वह पुरानी बातों को मिटा सकता है और सब कुछ नया बना सकता है। वह उन्हें उन बातों से प्रेम करा सकता है जिनसे वे कभी बैर रखते थे, और उन बातों से बैर करा सकता है जिनसे वे कभी प्रेम रखते थे। "[वह] परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दे सकता है।" "यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है; पुरानी बातें बीत गईं; देखो, वे सब नई हो गईं!" [यूहन्ना 1:12; 2 कुरिन्थियों 5:17]

(ग) वह उन सब को जो उस पर विश्वास करते और उसके चेले बनते हैं, अन्त तक "सुरक्षित रखने" में "समर्थ" है। वह उन्हें संसार, शरीर और शैतान पर जय पाने और अन्त तक अच्छी कुश्ती लड़ने के लिये अनुग्रह दे सकता है। वह हर परीक्षा के होते हुए भी उन्हें सुरक्षित आगे ले चल सकता है, हज़ारों संकटों में से उन्हें घर पहुँचा सकता है, और जब वे अकेले खड़े हों और उनकी सहायता करनेवाला कोई न हो तब भी उन्हें विश्वासयोग्य बनाए रख सकता है। "जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उनका पूरा-पूरा उद्धार कर सकता है।" [इब्रानियों 7:25]

(घ) वह अपने प्रेम रखनेवालों को सर्वोत्तम दान "देने" में "समर्थ" है। वह जीवन में उन्हें भीतरी शान्ति दे सकता है, जिसे धन कभी मोल नहीं ले सकता—निर्धनता में शान्ति, शोक में आनन्द, दुःख में धीरज। वह उन्हें मृत्यु में उज्ज्वल आशा दे सकता है, जिससे वे अँधेरी घाटी में से निडर होकर चल सकें। मृत्यु के बाद वह उन्हें महिमा का ऐसा मुकुट दे सकता है जो कभी मुरझाता नहीं, और ऐसा प्रतिफल जिसकी बराबरी पृथ्वी का कोई राजा या देश कभी नहीं कर सकता।

यही सच्ची सामर्थ्य है: यही सच्ची महानता है; यही वास्तविक बल है। जाकर उस दीन हिन्दू मूर्तिपूजक को देखो, जो अपनी देह को कष्ट देकर शान्ति ढूँढ़ता है पर व्यर्थ; पचास वर्ष के स्वयं ठहराए हुए कष्ट के बाद भी वह उसे नहीं पा सका। जाकर उस अन्धे रोमन कैथोलिक को देखो, जो अपनी आत्मा के लिये प्रार्थना करवाने को अपने पुरोहित को धन देता है, फिर भी उद्धार पाए बिना मर जाता है। जाकर उन धनवानों को देखो, जो सुख की खोज में हज़ारों उड़ा देते हैं, फिर भी सदा असन्तुष्ट और दुःखी रहते हैं। तब यीशु की ओर फिरो, और सोचो कि जो उस पर भरोसा रखते हैं उनके लिये वह क्या कर सकता है और प्रतिदिन क्या कर रहा है। सोचो कि वह कैसे सब टूटे मनवालों को चंगा करता है, सब रोगियों को शान्ति देता है, उस पर भरोसा रखनेवाले सब दीनों को हियाव देता है, और उनकी प्रतिदिन की सब आवश्यकताएँ पूरी करता है। मनुष्य का भय प्रबल है, इस बुरे संसार का विरोध भारी है, शरीर की अभिलाषाएँ उग्र हैं, मृत्यु का भय व्याकुल करता है, शैतान गरजते हुए सिंह के समान इस खोज में फिरता है कि किसे फाड़ खाए; परन्तु यीशु उन सब से बलवन्त है। यीशु हमें इन सब शत्रुओं पर जयवन्त बना सकता है। और अब मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या यह सच नहीं कि यीशु मसीह के समान सामर्थी मित्र कभी न हुआ?

IV. क्या हमें "एक प्रेमी और स्नेही मित्र" चाहिए? ऐसा मित्र यीशु मसीह है।

दयालुता ही सच्ची मित्रता का सार है। यदि धन, सलाह और सहायता प्रेम के साथ न दी जाए, तो उसका आधा भला भाव जाता रहता है। मनुष्य के प्रति प्रभु यीशु का प्रेम कैसा है? उसे "ज्ञान से परे प्रेम" कहा गया है। [इफिसियों 3:19]

प्रेम उसके "पापियों को ग्रहण करने" में प्रकट होता है। जो भी उद्धार के लिये उसके पास आता है, चाहे वह कितना ही अयोग्य क्यों न हो, वह उसे अस्वीकार नहीं करता। चाहे उनका जीवन अत्यन्त दुष्टता से भरा रहा हो, चाहे उनके पाप आकाश के तारों से भी अधिक हों, प्रभु यीशु उन्हें ग्रहण करने और क्षमा तथा शान्ति देने को तैयार है। उसकी करुणा का कोई अन्त नहीं; उसकी दया की कोई सीमा नहीं। जिन्हें संसार निराश जानकर त्याग देता है, उनका मित्र बनने और उनकी सहायता करने में उसे लज्जा नहीं आती। कोई भी इतना बुरा, इतना अशुद्ध और पाप से इतना रोगी नहीं कि उसके घर में आने से रोका जाए। वह किसी भी पापी का मित्र बनने को तैयार है; सबके लिये उसके पास कृपा, दया और चंगाई की औषधि है। उसने बहुत पहले से यही अपना नियम घोषित किया है: "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" [यूहन्ना 6:37]

प्रेम उसके "पापियों के साथ व्यवहार" में भी प्रकट होता है, जब वे उस पर विश्वास कर चुके और उसके मित्र बन गए हैं। वह उनके प्रति बहुत धीरज रखता है, यद्यपि उनका आचरण प्रायः बहुत कष्टदायक और खिझाने वाला होता है। वे चाहे कितनी ही बार उसके पास आएँ, वह उनकी शिकायतें सुनते हुए कभी नहीं थकता। वह उनके सब दुःखों में गहरी सहानुभूति रखता है। वह जानता है कि पीड़ा क्या है; वह "दुःख से परिचित" है। [यशायाह 53:3] उनके सब क्लेशों में वह भी क्लेशित होता है। वह उन्हें कभी उनकी सामर्थ्य से अधिक परखे जाने नहीं देता; उनके दैनिक संघर्ष के लिये वह उन्हें दैनिक अनुग्रह देता है। उनकी तुच्छ सेवाएँ भी उसे ग्रहणयोग्य हैं; जैसे माता-पिता अपने बच्चे के बोलने और चलने के प्रयासों से प्रसन्न होते हैं, वैसे ही वह उनसे प्रसन्न रहता है। उसने अपनी पुस्तक में लिखवाया है कि "यहोवा अपनी प्रजा से प्रसन्न रहता है," और कि "यहोवा अपने डरवैयों से प्रसन्न होता है।" [भजन संहिता 149:4; 147:11]

पृथ्वी पर कोई ऐसा प्रेम नहीं जिसकी तुलना इससे की जा सके! हम उनसे प्रेम करते हैं जिनमें हमें कुछ ऐसा दिखाई देता है जो हमारे स्नेह के योग्य है, या जो हमारे अपने रक्त-मांस के हैं; प्रभु यीशु उन पापियों से प्रेम करता है जिनमें कोई भलाई नहीं। हम उनसे प्रेम करते हैं जिनसे अपने स्नेह के बदले कुछ मिलता है; प्रभु यीशु उनसे प्रेम करता है जो उसके लिये बहुत कम या कुछ भी नहीं कर सकते, उसकी तुलना में जो वह उनके लिये करता है।

हम वहाँ प्रेम करते हैं जहाँ प्रेम करने का कोई कारण बता सकें; पापियों का वह महान मित्र अपने प्रेम के कारण अपनी ही अनन्त करुणा में से निकालता है। उसका प्रेम पूरी तरह निष्पक्ष, पूरी तरह निःस्वार्थ और पूरी तरह मुफ़्त है। यीशु मसीह के समान सच्चे प्रेम करनेवाला मित्र कभी, कभी नहीं हुआ।

५. क्या हमें "बुद्धिमान और विवेकी मित्र" चाहिए? ऐसा मित्र प्रभु यीशु मसीह है।

मनुष्य की मित्रता खेद की बात है कि अन्धी होती है। वह प्रायः अत्यधिक कृपा दिखाकर अपने प्रिय जनों को हानि पहुँचाता है; वह जो सलाह देता है उसमें प्रायः चूक जाता है; सहायता करने का इरादा रखते हुए भी वह बुरी सलाह देकर अपने मित्रों को प्रायः संकट में डाल देता है। कभी-कभी वह उन्हें जीवन के मार्ग से रोक देता है, और जब वे लगभग बच निकले होते हैं तब उन्हें संसार की व्यर्थताओं में उलझा देता है। प्रभु यीशु की मित्रता ऐसी नहीं है; वह सदा हमारा भला करती है, कभी बुरा नहीं।

प्रभु यीशु अपने मित्रों को अत्यधिक लाड़-प्यार देकर कभी "बिगाड़ता नहीं।" जो कुछ सचमुच उनके हित का है वह सब उन्हें देता है; जो सचमुच भला है उसमें से कुछ भी उनसे नहीं रोकता; परन्तु वह माँग करता है कि वे प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर उसके पीछे चलें। वह उन्हें आज्ञा देता है कि अच्छे सिपाहियों की नाईं कठिनाइयाँ सहें; वह उन्हें बुलाता है कि संसार, शरीर और शैतान के विरुद्ध अच्छी कुश्ती लड़ें। उसके लोगों को उस समय प्रायः यह अच्छा नहीं लगता और वे इसे कठिन समझते हैं; परन्तु जब वे स्वर्ग पहुँचेंगे तब देखेंगे कि सब कुछ भली रीति से किया गया था।

प्रभु यीशु अपने मित्र के कामों के संचालन में "कभी भूल नहीं करता।" वह उनके सब मामलों को पूर्ण बुद्धि से ठहराता है; उन पर सब कुछ ठीक समय पर और ठीक रीति से घटता है। उनकी आत्माओं को जितनी बीमारी की और जितने स्वास्थ्य की, जितनी निर्धनता की और जितनी धन-सम्पत्ति की, जितने शोक की और जितने आनन्द की आवश्यकता वह देखता है, उतनी ही देता है। वह उन्हें सही मार्ग से ले चलता है ताकि उस नगर में पहुँचाए जो उनका अनन्त घर होगा। एक बुद्धिमान वैद्य की नाईं वह उनके कड़वे से कड़वे प्याले को मिलाता है, और ध्यान रखता है कि उसमें न एक बूँद कम हो न एक बूँद अधिक। उसके लोग प्रायः उसके व्यवहार को समझ नहीं पाते; वे इतने नासमझ होते हैं कि कल्पना कर लेते हैं कि उनके जीवन का क्रम इससे अच्छा ठहराया जा सकता था; परन्तु पुनरुत्थान के दिन वे परमेश्वर का धन्यवाद करेंगे कि उनकी नहीं, मसीह की इच्छा पूरी हुई।

संसार में चारों ओर देखो कि लोग अपने मित्रों से निरन्तर कितनी हानि उठाते हैं। देखो कि मनुष्य प्रेम और भले कामों में एक-दूसरे को उभारने की अपेक्षा सांसारिकता और ओछेपन में एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने के लिये कितने अधिक तत्पर रहते हैं। सोचो कि वे कितनी बार एकत्र होते हैं, भलाई के लिये नहीं वरन् बुराई के लिये, स्वर्ग के मार्ग में एक-दूसरे की आत्माओं को जगाने के लिये नहीं, वरन् इस वर्तमान संसार के प्रेम में एक-दूसरे को पक्का करने के लिये। हाँ, हज़ारों हैं जो अपने मित्रों के घर में अचानक घायल होते हैं!

फिर पापियों के उस महान मित्र की ओर फिरो, और देखो कि उसकी मित्रता मनुष्य की मित्रता से कितनी भिन्न है। उसे अपने चेलों के साथ मार्ग में चलते हुए सुनो; ध्यान दो कि वह पूर्ण बुद्धि के साथ कैसे शान्ति देता, डाँटता और समझाता है। देखो कि वह अपने प्रिय जनों के पास जाने का समय कैसे ठहराता है, जैसे बैतनिय्याह में मरियम और मार्था के पास। सुनो कि गलील की झील के किनारे भोजन करते हुए वह कैसे बातचीत करता है: "हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" [यूहन्ना 21:16] उसकी संगति सदा पवित्र करनेवाली है। उसके दान सदा हमारी आत्मा के भले के लिये होते हैं; उसकी कृपा सदा बुद्धिमानी की है; उसकी सहभागिता सदा हमारी उन्नति करती है। मनुष्य के पुत्र के साथ एक दिन पृथ्वी के मित्रों की संगति के हज़ार दिनों से उत्तम है; उसके साथ एकान्त संगति में बिताया गया एक घण्टा राजाओं के महलों में बिताए गए एक वर्ष से उत्तम है। यीशु मसीह के समान बुद्धिमान मित्र कभी, कभी नहीं हुआ।

६. क्या हमें "परखा हुआ और जाँचा हुआ मित्र" चाहिए? ऐसा मित्र यीशु मसीह है।

प्रभु यीशु को मानव-जाति का मित्र बनने का अपना कार्य आरम्भ किए छः हज़ार वर्ष बीत चुके हैं। इस लम्बे समय में इस संसार में उसके बहुत से मित्र हुए हैं। दुर्भाग्य से अरबों लोगों ने उसके प्रस्तावों को ठुकरा दिया और दयनीय रूप से सदा के लिए खो गए; परन्तु करोड़ों-करोड़ लोगों ने उसकी मित्रता का महान सौभाग्य पाया और उनका उद्धार हुआ। पापियों का मित्र होने का उसे बहुत बड़ा अनुभव है।

(क) उसके मित्र जीवन के "हर पद और हर स्तर" के लोग रहे हैं। उनमें से कुछ राजा और धनवान थे, जैसे दाऊद, सुलैमान, हिजकिय्याह और अय्यूब; कुछ इस संसार में बहुत निर्धन थे, जैसे बैतलहम के चरवाहे, और याकूब, यूहन्ना और अन्द्रियास: परन्तु उनमें से हर एक मसीह का मित्र था।

(ख) उसके मित्र मनुष्य के जीवन की "हर आयु" के लोग रहे हैं। कुछ ने तो उसे तब तक नहीं जाना जब तक वे बड़ी आयु के न हो गए, जैसे मनश्शे, जक्कई, और सम्भवतः इथियोपिया का खोजा। कुछ अपने बचपन से ही उसके मित्र थे, जैसे यूसुफ, शमूएल, योशिय्याह और तीमुथियुस। परन्तु उनमें से हर एक मसीह का मित्र था।

(ग) उसके मित्र "हर प्रकार के स्वभाव और प्रकृति" के लोग रहे हैं। कुछ सीधे-सादे स्त्री-पुरुष थे, जैसे इसहाक; कुछ वचन और कर्म में सामर्थी थे, जैसे मूसा; कुछ उत्साही और कोमल हृदयवाले थे, जैसे पतरस; कुछ सौम्य और शान्त स्वभाव के थे, जैसे यूहन्ना; कुछ सक्रिय और उमंगवाले थे, जैसे मार्था; कुछ को उसके चरणों में चुपचाप बैठना भाता था, जैसे मरियम; कुछ अपने ही लोगों के बीच अनजाने रहे, जैसे शूनेमिन स्त्री; कुछ सब कहीं गए और संसार को उलट-पुलट कर दिया, जैसे पौलुस। परन्तु उनमें से हर एक मसीह का मित्र था।

(घ) उसके मित्र "जीवन की हर दशा" के लोग रहे हैं। कुछ विवाहित थे और उनके बेटे-बेटियाँ थीं, जैसे हनोक; कुछ अविवाहित जीए और मरे, जैसे दानिय्येल और यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला; कुछ प्रायः रोगी रहते थे, जैसे लाज़र और इपफ्रुदीतुस; कुछ बलवान थे और कठिन परिश्रम करते थे, जैसे पिरिसस, त्रूफैना और त्रूफोसा; कुछ स्वामी थे, जैसे अब्राहम और कुरनेलियुस; कुछ सेवक थे, जैसे नीरो के घराने के सन्त; कुछ के सेवक बुरे थे, जैसे एलीशा; कुछ के स्वामी बुरे थे, जैसे ओबद्याह; कुछ की पत्नियाँ और सन्तान बुरी थीं, जैसे दाऊद। परन्तु उनमें से हर एक मसीह का मित्र था।

(ङ) उसके मित्र "लगभग हर जाति, लोग और भाषा" के रहे हैं। उसके मित्र गर्म देशों में भी रहे हैं और ठण्डे देशों में भी; अति सभ्य जातियों में भी उसके मित्र हैं और अति सरल और असभ्य कबीलों में भी। उसकी जीवन की पुस्तक में यूनानियों और रोमियों के, यहूदियों और मिस्रियों के, दास और स्वतन्त्र के नाम लिखे हैं। उसकी सूचियों में संयमी अंग्रेज़ और सतर्क स्कॉट, आवेगी आयरिश और उग्र वेल्श, चंचल फ्रांसीसी और गरिमामय स्पेनी, परिष्कृत इतालवी और ठोस जर्मन, असभ्य अफ्रीकी और सुसंस्कृत भारतीय, शिक्षित चीनी और अर्द्ध-जंगली न्यूज़ीलैंडवासी पाए जाते हैं। परन्तु उनमें से हर एक मसीह का मित्र था।

इन सबने मसीह की मित्रता को परखा है और उसे भली पाया है। जब उन्होंने आरम्भ किया तो उन सबने किसी बात की घटी न पाई: जैसे-जैसे वे इस मित्रता में आगे बढ़े, तब भी किसी बात की घटी न पाई। यीशु मसीह में किसी एक ने भी कभी कोई कमी, कोई दोष, कोई अधूरापन नहीं पाया। हर एक ने अपनी आत्मा की आवश्यकताओं को पूरी रीति से पूरा होते पाया; हर एक ने प्रतिदिन पाया कि मसीह में पर्याप्त और बहुत कुछ बचा रहनेवाला है। यीशु मसीह के समान इतना पूरी रीति से जाँचा और परखा हुआ मित्र कभी कोई न हुआ।

7. अन्त में, पर कम महत्त्व का नहीं: क्या हमें "एक कभी न छोड़नेवाला मित्र" चाहिए? प्रभु यीशु मसीह ऐसा ही मित्र है।

पृथ्वी की सब अच्छी वस्तुओं का सबसे दुःखद पक्ष उनकी अस्थिरता है। धन अपने पंख लगाकर उड़ जाता है; जवानी और सुन्दरता केवल कुछ वर्षों की है; शरीर का बल शीघ्र ही घट जाता है; मन और बुद्धि शीघ्र ही थक जाती हैं। सब कुछ नाशमान है। सब कुछ मुरझा रहा है। सब कुछ बीतता जा रहा है। परन्तु इस सामान्य नियम का एक उत्तम अपवाद है, और वह है यीशु मसीह की मित्रता।

प्रभु यीशु "ऐसा मित्र है जो कभी नहीं बदलता।" उसमें कोई चंचलता नहीं: जिनसे वह प्रेम करता है, उनसे अन्त तक प्रेम करता है। पतियों ने अपनी पत्नियों को त्यागा है; माता-पिता ने अपनी सन्तान को छोड़ दिया है; विश्वासयोग्यता की मनुष्यों की शपथें और प्रतिज्ञाएँ प्रायः भुला दी गई हैं। हज़ारों ऐसे हैं जो अपनी निर्धनता और बुढ़ापे में उपेक्षित रहे, जबकि धनी और जवान होने पर सब उनका आदर करते थे। परन्तु मसीह ने अपने किसी भी मित्र के प्रति अपनी भावना कभी नहीं बदली। वह "कल और आज और युगानुयुग एकसा है।" [इब्रानियों 13:8]

प्रभु यीशु "अपने मित्रों को छोड़कर कभी नहीं जाता।" उसके और उसके लोगों के बीच कभी बिछोह और विदाई नहीं होती। जिस समय से वह पापी के हृदय में अपना घर बनाता है, उसके बाद वह उसमें सदा बना रहता है। संसार बिछोहों और विदाइयों से भरा है: मृत्यु और समय का बीतना सबसे एकजुट परिवार को भी तोड़ देता है; बेटे जीवन में अपना मार्ग बनाने के लिए आगे बढ़ जाते हैं; बेटियाँ ब्याही जाती हैं और अपने पिता का घर सदा के लिए छोड़ देती हैं। बिखरना, बिखरना, बिखरना, सबसे सुखी घर का भी वार्षिक इतिहास है। कितनों को हमने आँसू भरी आँखों से अपने द्वार से जाते देखा है, जिनके प्रिय चेहरे हमने फिर कभी नहीं देखे! कितनों के पीछे-पीछे हम शोक के साथ कब्र तक गए और फिर एक ठण्डे, सूने, अकेले घर में लौट आए! परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, एक ऐसा है जो अपने मित्रों को कभी नहीं छोड़ता! प्रभु यीशु वही है जिसने कहा है, "मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।" [इब्रानियों 13:5]

प्रभु यीशु "अपने मित्रों के साथ जहाँ कहीं वे जाते हैं, जाता है।" उसके और उसके प्रेम रखनेवालों के बीच कोई अलगाव सम्भव नहीं है। पृथ्वी पर या पृथ्वी के नीचे ऐसा कोई स्थान या पद नहीं जो उन्हें उनकी आत्मा के उस महान मित्र से अलग कर सके। जब कर्तव्य का मार्ग उन्हें घर से दूर बुलाता है, तब वही उनका साथी होता है; जब वे घोर कष्ट की आग और जल में से होकर निकलते हैं, तब वह उनके साथ रहता है; जब वे रोग-शय्या पर पड़ते हैं, तब वह उनके पास खड़ा होकर उनके सारे दुःख को भलाई के लिए उपजाता है; जब वे मृत्यु की छाया की तराई में उतरते हैं और मित्र और सम्बन्धी ठिठक जाते हैं और आगे नहीं जा सकते, तब वह उनके साथ-साथ उतरता है। जब वे स्वर्गलोक के अनजाने संसार में जागते हैं, तब भी वे उसी के साथ होते हैं; जब वे न्याय के दिन नई देह लेकर जी उठेंगे, तब वे अकेले न होंगे। वह उन्हें अपने मित्र स्वीकार करेगा और कहेगा, "ये मेरे हैं: इन्हें जाने दो।" वह अपने ही वचन को पूरा करेगा: "देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ।" [मत्ती 28:20]

संसार को चारों ओर देखो, और देखो कि मनुष्यों की सब योजनाओं पर असफलता कैसे लिखी है। उन बिछोहों, अलगावों, निराशाओं और शोकों का हिसाब जोड़ो जो तुमने झेले, सुने या देखे हैं। सोचो कि यह कितना बड़ा सौभाग्य है कि कम से कम एक ऐसा है जो कभी विफल नहीं होता, और जिसमें कोई कभी निराश नहीं हुआ! यीशु मसीह के समान अटल मित्र कभी, कभी नहीं हुआ।

और अब, मुझे इस लेख को कुछ सीधे-सादे शब्दों के उपयोग के साथ समाप्त करने की अनुमति दीजिए। मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं या आपकी आत्मा की दशा कैसी है; पर मुझे निश्चय है कि जो शब्द मैं कहने जा रहा हूँ वे आपके गम्भीर ध्यान के योग्य हैं। ओह, यह लेख आपको आत्मिक बातों के प्रति लापरवाह न पाए! ओह, आप मसीह के विषय में कुछ विचार कर सकें!

(1) तो पहली बात यह जान लीजिए कि मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि "गम्भीरता से विचार कीजिए कि मसीह आपका मित्र है और आप उसके हैं या नहीं।"

मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि करोड़ों ऐसे हैं जो मसीह के मित्र नहीं हैं। उसके नाम से बपतिस्मा पाए हुए, उसकी कलीसिया के बाहरी सदस्य, कलीसिया की सभाओं में आनेवाले, प्रभु-भोज में सम्मिलित होनेवाले, प्रार्थना करनेवाले, बाइबल पढ़नेवाले—पर वे मसीह के "मित्र" नहीं हैं।

क्या वे उन पापों से घृणा करते हैं जिनके लिए यीशु मरा? नहीं। क्या वे उस उद्धारकर्ता से प्रेम करते हैं जो उन्हें बचाने जगत में आया? नहीं। क्या उन्हें उन आत्माओं की चिन्ता है जो उसकी दृष्टि में इतनी मूल्यवान थीं? नहीं।

क्या वे मेल-मिलाप के वचन में आनन्दित होते हैं? नहीं।

क्या वे पापियों के मित्र से प्रार्थना में बातें करने का प्रयत्न करते हैं? नहीं।

क्या वे उसके साथ घनिष्ठ सहभागिता चाहते हैं? नहीं।

ओह, पाठक, क्या आपकी यही दशा है? आपकी क्या स्थिति है? क्या आप मसीह के मित्रों में से हैं या नहीं?

(2) फिर दूसरी बात यह जान लीजिए कि "यदि आप मसीह के मित्रों में से नहीं हैं, तो आप एक दीन और अभागे प्राणी हैं।"

मैं इसे सोच-समझकर लिख रहा हूँ। मैं यह बिना विचारे नहीं कहता। मैं कहता हूँ कि यदि मसीह आपका मित्र नहीं है, तो आप एक दीन और अभागे प्राणी हैं।

आप एक असफल और शोकभरे संसार के बीच हैं, और आपके पास न कोई सच्चा सांत्वना का स्रोत है, न आवश्यकता के समय कोई शरणस्थान। आप एक मरनहार प्राणी हैं, और मरने के लिए तैयार नहीं हैं। आपके पाप हैं, और वे क्षमा नहीं हुए। आपका न्याय होनेवाला है, और आप परमेश्वर से भेंट करने को तैयार नहीं हैं: आप तैयार हो सकते थे, पर आप उस एकमात्र मध्यस्थ और सहायक को काम में लेने से इनकार करते हैं। आप संसार से मसीह की अपेक्षा अधिक प्रेम रखते हैं। आप पापियों के उस महान मित्र को ठुकराते हैं, और स्वर्ग में आपके पक्ष में विनती करनेवाला कोई मित्र नहीं है। हाँ: यह दुःखद है पर सत्य है! आप एक दीन, अभागे प्राणी हैं। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आपकी आय कितनी है: मसीह की मित्रता के बिना आप अत्यन्त कंगाल हैं।

(3) फिर तीसरी बात यह जान लीजिए कि "यदि आप सचमुच एक मित्र चाहते हैं, तो मसीह आपका मित्र बनने को तैयार है।"

वह बहुत समय से चाहता है कि आप उसके लोगों में सम्मिलित हों, और अब वह मेरे हाथ से आपको निमन्त्रण देता है। आप चाहे अपने को कितना ही अयोग्य समझें, वह आपको ग्रहण करने और आपका नाम अपने मित्रों की सूची में लिखने को तैयार है। वह बीते समय की सब बातों को क्षमा करने, आपको धार्मिकता का वस्त्र पहनाने, आपको अपना आत्मा देने, और आपको अपनी प्यारी सन्तान बनाने को तैयार है। वह केवल इतना माँगता है कि आप उसके पास आएँ।

वह आज्ञा देता है कि आप अपने सब पापों के साथ आएँ; केवल अपनी दुष्टता को मानें और अंगीकार करें कि आप लज्जित हैं। जैसे आप हैं वैसे ही—किसी बात की प्रतीक्षा किए बिना—अपने भीतर किसी भी योग्यता के बिना—यीशु आज्ञा देता है कि आप आएँ और उसके मित्र बनें।

ओह, आइए और बुद्धिमान बनिए! आइए और सुरक्षित हो जाइए। आइए और सुखी हो जाइए। आइए और मसीह के मित्र बनिए।

(4) अन्त में यह जान लीजिए कि "यदि मसीह आपका मित्र है, तो आपको बड़े विशेषाधिकार प्राप्त हैं, और आपको उनके योग्य चलना चाहिए।"

प्रतिदिन उसके साथ, जो आपका मित्र है, और निकट की सहभागिता रखने का प्रयत्न कीजिए, और उसके अनुग्रह और सामर्थ्य को और अधिक जानिए। सच्ची मसीहियत केवल कुछ नीरस, निराकार कथनों पर विश्वास करना नहीं है: वह एक वास्तविक जीवित व्यक्ति—परमेश्वर के पुत्र यीशु—के साथ प्रतिदिन व्यक्तिगत सम्बन्ध में जीना है। पौलुस ने कहा, "मेरे लिए जीवित रहना मसीह है।" [फिलिप्पियों 1:21]

प्रतिदिन अपने सब व्यवहार में अपने प्रभु और उद्धारकर्ता की महिमा करने का प्रयत्न कीजिए। "जो मनुष्य मित्र रखता है उसे आप भी मित्रता दिखानी चाहिए" [नीतिवचन 18:24 - KJV], और निश्चय ही कोई मनुष्य ऐसे भारी दायित्व के अधीन नहीं जैसा मसीह का मित्र। हर उस बात से बचिए जो आपके प्रभु को दुःखी करे। उन पापों से जो सहज ही उलझा लेते हैं, असंगत आचरण से, और मनुष्यों के सामने उसे मानने में लज्जित होने से कठोर संघर्ष कीजिए। जब कभी आप कुछ बुरा करने के लिए परखे जाएँ, तो अपनी आत्मा से कहिए, "हे मेरी आत्मा, हे मेरी आत्मा, क्या अपने मित्र के प्रति तेरी यही कृपा है?"

सबसे बढ़कर उस दया का विचार कीजिए जो आप पर दिखाई गई है, और प्रतिदिन अपने मित्र में आनन्दित होना सीखिए! क्या हुआ यदि आपका शरीर रोग से झुक गया है? क्या हुआ यदि आपके जीवन की दरिद्रता और परीक्षाएँ भारी हैं? क्या हुआ यदि आपके सब सांसारिक मित्र आपको छोड़ दें और आप इस संसार में अकेले रह जाएँ? यह सब सच हो सकता है: पर यदि आप मसीह में हैं, तो आपका एक मित्र है, एक सामर्थी मित्र, एक प्रेमी मित्र, एक बुद्धिमान मित्र, एक ऐसा मित्र जो कभी विफल नहीं होता। ओह, अपने मित्र के विषय में सोचिए, नित्य सोचिए!

फिर भी थोड़े ही समय में आपका मित्र आपको घर ले जाने आएगा, और आप सदा उसके साथ रहेंगे। थोड़ा ही समय और, और आप उसे वैसे ही देखेंगे जैसे उसने आपको देखा है, और उसे वैसे ही जानेंगे जैसे उसने आपको जाना है। और तब आप स्वर्ग में महिमा पाए हुए सन्तों को यह घोषणा करते सुनेंगे कि धनवान और सुखी मनुष्य वही है जिसका मित्र मसीह रहा है।

बीमारी

"जिससे तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।" यूहन्ना 11:3

जिस अध्याय से यह पद लिया गया है, उसे बाइबल पढ़नेवाले सब लोग भली-भाँति जानते हैं। जीवन्त वर्णन, हृदयस्पर्शी रुचि और उदात्त सरलता में संसार का कोई भी लेख उस अध्याय की बराबरी नहीं कर सकता। मेरे अपने मन में इस जैसा वृत्तान्त पवित्रशास्त्र की प्रेरणा के बड़े प्रमाणों में से एक है। जब मैं बैतनिय्याह की कथा पढ़ता हूँ, तो मुझे लगता है, "यहाँ कुछ ऐसा है जिसकी व्याख्या अविश्वासी कभी नहीं कर सकता।"—"यह परमेश्वर की उँगली के सिवा और कुछ नहीं है।" इस अध्याय में जिन शब्दों पर मैं विशेष रूप से ठहरता हूँ, वे अद्भुत रूप से मर्मस्पर्शी और शिक्षाप्रद हैं। वे उस सन्देश को दर्ज करते हैं जो मार्था और मरियम ने यीशु के पास तब भेजा जब उनका भाई लाज़र बीमार था: "हे प्रभु, देख, जिससे तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।" वह सन्देश छोटा और सीधा-सादा था। फिर भी उसका लगभग हर शब्द गहरे अर्थ से भरा है। इन पवित्र स्त्रियों के बच्चों जैसे विश्वास पर ध्यान दो। संकट की घड़ी में वे प्रभु यीशु की ओर वैसे ही मुड़ीं, जैसे डरा हुआ शिशु अपनी माँ की ओर मुड़ता है, या कुतुबनुमा की सुई ध्रुव की ओर। वे उसकी ओर अपने चरवाहे, अपने सर्वशक्तिमान मित्र और विपत्ति के लिये जन्मे अपने भाई के रूप में मुड़ीं। स्वभाव से भिन्न होते हुए भी इस बात में दोनों बहनें पूरी तरह एकमत थीं। संकट के दिन उनका पहला विचार मसीह की सहायता का था। मसीह ही वह शरण थे जिसकी ओर वे आवश्यकता की घड़ी में भागीं। धन्य हैं वे सब जो ऐसा ही करते हैं! लाज़र के विषय में उनकी भाषा की सरल दीनता पर ध्यान दो। वे उसे "जिससे तू प्रीति रखता है" कहती हैं। वे यह नहीं कहतीं, "जो तुझसे प्रीति रखता है, तुझ पर विश्वास करता है, तेरी सेवा करता है," परन्तु "जिससे तू प्रीति रखता है।" मार्था और मरियम को परमेश्वर ने गहरी शिक्षा दी थी। उन्होंने सीख लिया था कि हमारी आशा का सच्चा आधार और हमारी आशा की सच्ची नींव हमारे प्रति मसीह का प्रेम है, मसीह के प्रति हमारा प्रेम नहीं। धन्य हैं—फिर कहता हूँ—वे सब जिन्हें इसी प्रकार शिक्षा मिली है! मसीह के प्रति अपने प्रेम को भीतर झाँककर देखना पीड़ादायक रूप से असन्तोषजनक है; अपने प्रति मसीह के प्रेम को बाहर की ओर देखना शान्ति है। अन्त में उस हृदयस्पर्शी परिस्थिति पर ध्यान दो जो मार्था और मरियम का सन्देश प्रकट करता है: "जिससे तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।" लाज़र एक भला मनुष्य था—परिवर्तित, विश्वासी, नया किया हुआ, पवित्र किया हुआ, मसीह का मित्र और महिमा का उत्तराधिकारी। फिर भी लाज़र बीमार था! तो बीमारी इस बात का चिह्न नहीं कि परमेश्वर अप्रसन्न है। बीमारी हमारे लिये आशीष होने को ठहराई गई है, श्राप होने को नहीं। "जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए गए हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं।" "सब कुछ तुम्हारा है—जीवन, मरण, वर्तमान, भविष्य; और तुम मसीह के हो, और मसीह परमेश्वर का है।" (रोमियों 8:28; 1 कुरिन्थियों 3:22-23)। मैं फिर कहता हूँ, धन्य हैं वे जिन्होंने यह सीख लिया है! सुखी हैं वे जो बीमारी में कह सकते हैं, "यह मेरे पिता का काम है। यह भला ही होगा।" मैं अपने पाठकों का ध्यान बीमारी के विषय की ओर दिलाता हूँ। यह ऐसा विषय है जिसे हमें बार-बार सीधे देखना चाहिये। हम इससे बच नहीं सकते। यह देखने के लिये किसी भविष्यद्वक्ता की आँख नहीं चाहिये कि बीमारी हम में से हर एक पर एक दिन बारी-बारी से आनेवाली है। "जीवन के बीच हम मृत्यु में हैं।" आओ, कुछ क्षण के लिये एक ओर होकर मसीही की दृष्टि से बीमारी पर विचार करें। यह विचार उसके आने को शीघ्र नहीं करेगा, और परमेश्वर की आशीष से हमें बुद्धि सिखा सकता है। बीमारी के विषय पर विचार करते हुए तीन बातें ध्यान माँगती प्रतीत होती हैं। हर एक पर मैं थोड़ा कहूँगा। I. बीमारी और रोग का सार्वभौमिक प्रचलन। II. वे सामान्य लाभ जो बीमारी मनुष्यजाति को पहुँचाती है। III. वे विशेष कर्तव्य जिनके लिये बीमारी हमें बुलाती है।

I. बीमारी का सार्वभौमिक प्रचलन इस बात पर मुझे अधिक देर ठहरने की आवश्यकता नहीं। इसका प्रमाण विस्तार से देना केवल उन बातों को दोहराना होगा जो स्वयंसिद्ध हैं, और उन साधारण बातों का ढेर लगाना जिन्हें सब मानते हैं। बीमारी हर जगह है। यूरोप में, एशिया में, अफ्रीका में, अमेरिका में; गर्म देशों में और ठण्डे देशों में, सभ्य जातियों में और असभ्य कबीलों में—पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे बीमार पड़ते और मरते हैं।

बीमारी सब वर्गों के लोगों में पाई जाती है। अनुग्रह किसी विश्वासी को इसकी पहुँच से ऊपर नहीं उठा देता। धन से इससे छुटकारा नहीं खरीदा जा सकता। पद-प्रतिष्ठा इसके आक्रमणों को नहीं रोक सकती। राजा और प्रजा, स्वामी और सेवक, धनी और निर्धन, विद्वान और अनपढ़, शिक्षक और विद्यार्थी, वैद्य और रोगी, सेवक और सुननेवाले — सब के सब समान रूप से इस महाशत्रु के आगे गिर पड़ते हैं। "धनी का धन उसका दृढ़ नगर है।" (नीतिवचन 18:11।) अंग्रेज के घर को उसका गढ़ कहा जाता है; परन्तु ऐसे कोई द्वार और अर्गलाएँ नहीं जो रोग और मृत्यु को भीतर आने से रोक सकें। बीमारी हर प्रकार और हर रूप की होती है। सिर की चोटी से लेकर पाँव के तलवे तक हम रोग के शिकार हो सकते हैं। हमारे दुःख सहने की क्षमता पर विचार करना भी भयावह है। उन बीमारियों को कौन गिन सकता है जिनसे हमारा शरीर पीड़ित हो सकता है? रोगग्रस्त शरीर-रचना के किसी संग्रहालय में जाकर कौन काँप न उठा होगा? "आश्चर्य है कि हज़ार तारों की वीणा इतने समय तक सुर में बनी रहती है।" मेरे विचार में इतना आश्चर्य इस बात का नहीं कि मनुष्य इतनी जल्दी मर जाते हैं, जितना इस बात का कि वे इतने समय तक जीवित रहते हैं। बीमारी मनुष्य पर आनेवाली सबसे अधिक दीन करनेवाली और कष्टदायक परीक्षाओं में से प्रायः एक होती है। यह बलवान से बलवान को छोटे बच्चे जैसा बना सकती है, और उसे ऐसा अनुभव करा सकती है कि "टिड्डा भी भारी लगने लगता है।" (सभोपदेशक 12:5।) यह सबसे निडर को भी कमज़ोर कर सकती है, और उसे एक सुई के गिरने पर भी थरथरा देती है। हम "भयानक और अद्भुत रीति से रचे गए हैं।" (भजन संहिता 139:14।) शरीर और मन का सम्बन्ध विचित्र रूप से घनिष्ठ है। कुछ रोग स्वभाव और मनोबल पर बहुत भारी प्रभाव डाल सकते हैं। मस्तिष्क, यकृत और नसों के ऐसे रोग हैं जो बुद्धि में सुलैमान जैसे मनुष्य को भी एक शिशु से कुछ ही अच्छी दशा में ला सकते हैं। जो यह जानना चाहे कि बेचारा मनुष्य अपमान की कितनी गहराइयों में गिर सकता है, उसे बस थोड़े समय तक रोगियों की खाटों के पास रहना चाहिए। बीमारी को मनुष्य के किसी भी प्रयास से रोका नहीं जा सकता। जीवन की औसत अवधि निस्सन्देह कुछ बढ़ाई जा सकती है। वैद्यों की निपुणता निरन्तर नई औषधियाँ खोज सकती है और आश्चर्यजनक चंगाइयाँ कर सकती है। बुद्धिमानी से बनाए गए स्वच्छता-नियमों को लागू करने से किसी देश में मृत्यु-दर बहुत घट सकती है। परन्तु अन्त में — चाहे स्वस्थ स्थानों में हो या अस्वस्थ में, चाहे हल्की जलवायु में हो या ठण्डी में, चाहे होम्योपैथी से उपचार हो या ऐलोपैथी से — मनुष्य बीमार पड़ेंगे और मरेंगे। "हमारी आयु के दिन सत्तर वर्ष के होते हैं, और चाहे बल के कारण वे अस्सी वर्ष के भी हो जाएँ, तौभी उनका घमण्ड केवल क्लेश और शोक ही है; क्योंकि वह जल्द कट जाता है, और हम जाते रहते हैं।" (भजन संहिता 90:10।) यह साक्षी सचमुच सच्ची है। यह 3300 वर्ष पहले भी सच्ची थी, और आज भी सच्ची है। अब इस बड़े तथ्य — बीमारी के सर्वव्यापी होने — का हम क्या अर्थ निकालें? इसका कारण हम कैसे बताएँ? इसकी क्या व्याख्या दें? जब हमारे बच्चे पूछते हैं, "पिताजी, लोग बीमार क्यों पड़ते और मरते क्यों हैं?" तो हम उन्हें क्या उत्तर दें? ये गम्भीर प्रश्न हैं। इन पर कुछ शब्द कहना अनुचित न होगा। क्या हम क्षण भर के लिए भी यह मान सकते हैं कि परमेश्वर ने आरम्भ में ही बीमारी और रोग की सृष्टि की? क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि जिसने हमारे संसार को ऐसी सिद्ध व्यवस्था में रचा, वही व्यर्थ के दुःख और पीड़ा का रचनेवाला था? क्या हम सोच सकते हैं कि जिसने सब कुछ "बहुत अच्छा" बनाया, उसने आदम की सन्तान को बीमार पड़ने और मरने के लिए बनाया? मेरे विचार में यह धारणा घृणित है। यह परमेश्वर के सिद्ध कार्यों के बीच एक बड़ी त्रुटि ले आती है। मेरे मन के सन्तोष के लिए मुझे कोई और समाधान खोजना होगा। "पाप एक मनुष्य के द्वारा जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु।" (रोमियों 5:12।) पृथ्वी पर जितनी बीमारी, रोग, पीड़ा और दुःख फैला है, उन सब का कारण पाप है। ये सब उसी श्राप का भाग हैं जो उस समय संसार में आया जब आदम और हव्वा ने वर्जित फल खाया और गिर पड़े। यदि पतन न होता, तो कोई बीमारी न होती। यदि पाप न होता, तो कोई रोग न होता।

"एक परमेश्वर, परन्तु कोई बाइबल नहीं! — एक सृजनहार, परन्तु कोई मसीही धर्म नहीं!" यही ईश्वरवादी (डीइस्ट) का धर्ममत है।

अब क्या हम इस सिद्धान्त को सुनेंगे? मैं कहता हूँ, फिर जाओ, और किसी ईश्वरवादी (डीइस्ट) को अस्पताल में ले जाओ, और रोग की कुछ भयानक करतूतें उसे दिखाओ। उसे उस बिछौने के पास ले जाओ जहाँ कोई कोमल बालक पड़ा है, जो भले-बुरे को मुश्किल से पहचानता है, और जिसे असाध्य कैंसर है। उसे उस वार्ड में भेजो जहाँ एक बड़े परिवार की स्नेहमयी माता किसी भीषण रोग की अन्तिम दशा में पड़ी है। शरीर को विरासत में मिलनेवाली कुछ तड़पाने वाली पीड़ाएँ और वेदनाएँ उसे दिखाओ, और उससे उनका कारण पूछो। इस मनुष्य से पूछो, जो मानता है कि एक महान और बुद्धिमान परमेश्वर ने संसार को बनाया, परन्तु बाइबल पर विश्वास नहीं कर सकता — उससे पूछो कि अपने परमेश्वर की सृष्टि में इस अव्यवस्था और अपूर्णता के चिह्नों की व्याख्या वह कैसे करता है। इस मनुष्य से पूछो, जो मसीही धर्मविज्ञान की खिल्ली उड़ाता है और आदम के पतन पर विश्वास करने के लिए अपने को बहुत बुद्धिमान समझता है — उससे पूछो कि अपने मत के अनुसार वह संसार में पीड़ा और रोग के सर्वव्यापी होने को कैसे समझाता है। तुम व्यर्थ ही पूछोगे! तुम्हें कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिलेगा। बीमारी और दुःख ईश्वरवादी के मार्ग में ऐसी कठिनाइयाँ हैं जिन्हें वह पार नहीं कर सकता। मनुष्य ने पाप किया है, इसलिए मनुष्य दुःख भोगता है। आदम अपनी पहली दशा से गिर गया, इसलिए आदम की सन्तान बीमार पड़ती और मरती है। बीमारी का सर्वव्यापी होना इस बात के अप्रत्यक्ष प्रमाणों में से एक है कि बाइबल सच्ची है। बाइबल इसे समझाती है। बाइबल उन प्रश्नों का उत्तर देती है जो हर खोजी मन में उठेंगे। कोई और धर्म-प्रणाली ऐसा नहीं कर सकती। वे सब यहाँ असफल हो जाती हैं। वे चुप हैं। वे घबरा जाती हैं। केवल बाइबल ही इस विषय की आँखों में आँखें डालकर देखती है। वह निडर होकर घोषणा करती है कि मनुष्य एक गिरा हुआ प्राणी है, और उतनी ही निडरता से उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक विशाल उपचारी योजना की घोषणा भी करती है। मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचने को विवश हूँ कि बाइबल परमेश्वर की ओर से है। मसीही धर्म स्वर्ग से आया हुआ प्रकाशन है। "तेरा वचन सत्य है।" (यूहन्ना 17:17।) आओ, हम उस पुरानी भूमि पर दृढ़ खड़े रहें कि बाइबल, और केवल बाइबल ही, मनुष्य पर परमेश्वर का अपने विषय में प्रकाशन है। इस प्रेरित ग्रन्थ पर आधुनिक संशयवाद जो अनेक नये आक्रमण कर रहा है, उनसे विचलित न होओ। विश्वास के शत्रु बाइबल की कठिनाइयों के विषय में जो कठिन प्रश्न पूछना पसन्द करते हैं, और जिनका उत्तर देने में तुम प्रायः अपने को असमर्थ पाते हो, उन पर ध्यान न दो। अपनी आत्मा को इस सुरक्षित सिद्धान्त पर दृढ़ता से लंगर डालो कि सारी पुस्तक परमेश्वर का सत्य है। बाइबल के शत्रुओं से कहो कि उनके सब तर्कों के बावजूद संसार में कोई पुस्तक नहीं जो बाइबल की बराबरी कर सके — कोई ऐसी नहीं जो मनुष्य की आवश्यकता को इतनी पूरी तरह पूरा करे — कोई ऐसी नहीं जो मनुष्यजाति की दशा को इतना अधिक समझाए। बाइबल की कठिन बातों के विषय में उनसे कहो कि तुम प्रतीक्षा करने को सन्तुष्ट हो। इस पुस्तक में तुम्हें अपने विवेक को सन्तुष्ट करने और अपनी आत्मा को बचाने के लिए पर्याप्त सीधा सत्य मिल जाता है। कठिन बातें एक दिन स्पष्ट हो जाएँगी। जो तुम अभी नहीं जानते, उसे आगे चलकर जान लोगे। II. दूसरी बात जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ, वह उन सामान्य लाभों की है जो बीमारी मनुष्यजाति को पहुँचाती है। मैं "लाभ" शब्द जानबूझकर प्रयोग करता हूँ। मैं हमारे विषय के इस भाग को स्पष्ट रूप से देखना बहुत महत्त्वपूर्ण समझता हूँ। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बीमारी संसार पर परमेश्वर के शासन का एक कथित कमज़ोर पक्ष है, जिस पर संशयी मन टिकना पसन्द करते हैं। "क्या परमेश्वर प्रेम का परमेश्वर हो सकता है, जब वह पीड़ा को होने देता है? क्या परमेश्वर दया का परमेश्वर हो सकता है, जब वह रोग को सहन करता है? वह पीड़ा और रोग को रोक सकता है; पर नहीं रोकता। ये बातें कैसे हो सकती हैं?" ऐसा तर्क मनुष्य के मन में प्रायः उठता है। ऐसे सब तर्क करनेवालों को मैं उत्तर देता हूँ कि उनकी शंकाएँ और प्रश्न अत्यन्त अनुचित हैं। वे इसी प्रकार सृष्टिकर्ता के अस्तित्व पर भी सन्देह कर सकते हैं, क्योंकि भूकम्पों, आँधियों और तूफ़ानों से सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ती है। वे इसी प्रकार परमेश्वर के प्रबन्ध पर भी सन्देह कर सकते हैं, क्योंकि दिल्ली और कानपुर में भयंकर हत्याकांड हुए। यह सब उतना ही उचित होगा जितना संसार में बीमारी की उपस्थिति के कारण परमेश्वर की दया पर सन्देह करना। मैं उन सबसे, जिन्हें रोग और पीड़ा के प्रचलन का परमेश्वर के प्रेम से मेल बैठाना कठिन लगता है, कहता हूँ कि अपने आसपास के संसार पर दृष्टि डालें और देखें कि क्या हो रहा है। मैं उनसे कहता हूँ कि देखें कि मनुष्य भविष्य के लाभ के लिए वर्तमान हानि को, भविष्य के आनन्द के लिए वर्तमान दुःख को, भविष्य के स्वास्थ्य के लिए वर्तमान पीड़ा को कितना सहते रहते हैं। बीज भूमि में डाला जाता है और सड़ता है; पर हम भावी फसल की आशा में बोते हैं। लड़का बहुत आँसुओं के बीच पाठशाला भेजा जाता है; पर हम उसे इस आशा में भेजते हैं कि वह आगे बुद्धि प्राप्त करेगा। परिवार का पिता कोई भयानक शल्यक्रिया सहता है; पर वह भावी स्वास्थ्य की आशा में उसे सह लेता है। मैं मनुष्यों से कहता हूँ कि इस महान सिद्धान्त को संसार पर परमेश्वर के शासन पर लागू करें। मैं उनसे कहता हूँ कि विश्वास करें कि परमेश्वर पीड़ा, बीमारी और रोग को इसलिए होने देता है कि वह मनुष्य को सताना पसन्द करता है, नहीं, बल्कि इसलिए कि वह चाहता है कि मनुष्य के हृदय, मन, विवेक और आत्मा को अनन्तकाल तक लाभ पहुँचे। मैं एक बार फिर दोहराता हूँ कि मैं बीमारी के "लाभ" के विषय में जानबूझकर और सोच-समझकर कहता हूँ। मैं उस दुःख और पीड़ा को जानता हूँ जो बीमारी अपने साथ लाती है। मैं उस दुर्दशा और दयनीयता को मानता हूँ जो वह प्रायः अपने पीछे लाती है। पर मैं उसे केवल बुराई ही नहीं मान सकता। मैं उसमें परमेश्वर की एक बुद्धिमानी-भरी अनुमति देखता हूँ। मैं उसमें एक उपयोगी प्रबन्ध देखता हूँ, जो मनुष्यों की आत्माओं में पाप और शैतान के विनाश को रोकता है। यदि मनुष्य ने कभी पाप न किया होता तो मैं बीमारी के लाभ को पहचानने में असमर्थ होता। परन्तु जब संसार में पाप है, तो मैं देख सकता हूँ कि बीमारी एक भलाई है। वह श्राप के साथ-साथ उतना ही आशीर्वाद भी है। मानता हूँ कि वह एक कठोर शिक्षक है। पर वह मनुष्य की आत्मा का सच्चा मित्र है। (क) बीमारी मनुष्यों को मृत्यु की याद दिलाने में सहायता करती है। अधिकांश लोग ऐसे जीते हैं मानो वे कभी मरेंगे ही नहीं। वे व्यापार, या सुख-विलास, या राजनीति, या विज्ञान के पीछे ऐसे लगे रहते हैं मानो पृथ्वी ही उनका अनन्त घर हो। वे भविष्य के लिए योजनाएँ और युक्तियाँ बनाते हैं, दृष्टान्त के उस मूर्ख धनवान के समान, मानो उन्हें जीवन का लम्बा पट्टा मिला हो, और वे जब तक मालिक चाहे तब तक के किरायेदार न हों। कोई भारी बीमारी कभी-कभी इन भ्रमों को दूर करने में बहुत काम आती है। वह मनुष्यों को उनके दिवास्वप्नों से जगाती है, और उन्हें याद दिलाती है कि जीने के साथ-साथ मरना भी है। अब मैं बलपूर्वक कहता हूँ कि यह एक बड़ी भलाई है। (ख) बीमारी मनुष्यों को परमेश्वर, अपनी आत्माओं और आनेवाले संसार के विषय में गम्भीरता से सोचने में सहायता करती है। अधिकांश लोग अपने स्वास्थ्य के दिनों में ऐसे विचारों के लिए समय ही नहीं निकाल पाते। उन्हें ये विचार अच्छे नहीं लगते। वे उन्हें दूर हटा देते हैं। वे उन्हें कष्टदायक और अप्रिय समझते हैं। अब कोई गम्भीर रोग कभी-कभी इन विचारों को इकट्ठा करने और मनुष्य की आत्मा की आँखों के सामने ला खड़ा करने की अद्भुत शक्ति रखता है। बेन्हदद जैसा दुष्ट राजा भी, बीमार पड़ने पर, एलीशा को स्मरण कर सका (2 राजाओं 8:8)। यहाँ तक कि अन्यजाति के मल्लाह भी, जब मृत्यु सामने दिखाई दी, डर गए और "हर एक ने अपने-अपने देवता को पुकारा।" (योना 1:5।) निश्चय ही जो कुछ भी मनुष्यों को सोचने में सहायता करे, वह भलाई है। (ग) बीमारी मनुष्यों के हृदय को कोमल करने और उन्हें बुद्धि सिखाने में सहायता करती है। स्वाभाविक हृदय पत्थर के समान कठोर होता है। उसे हर उस बात में जो इस जीवन की नहीं है कोई भलाई नहीं दिखती, और इस संसार को छोड़ किसी सुख का पता नहीं चलता। कोई लम्बी बीमारी कभी-कभी इन विचारों को सुधारने में बहुत काम आती है। वह संसार जिन्हें "अच्छी" वस्तुएँ कहता है उनके खोखलेपन और निस्सारता को खोल देती है, और हमें सिखाती है कि उन्हें ढीले हाथ से पकड़ें। व्यापारी पाता है कि हृदय की सब आवश्यकताएँ केवल धन से पूरी नहीं होतीं। संसारी स्त्री पाती है कि कीमती वस्त्र, उपन्यास पढ़ना, और नाच-गानों और नाटकों के समाचार बीमार के कमरे में दुःखदायक सान्त्वना देनेवाले हैं। निश्चय ही जो कुछ हमें सांसारिक वस्तुओं के अपने तौल-माप बदलने को विवश करे, वह सच्ची भलाई है। (घ) बीमारी हमें समतल करने और नम्र बनाने में सहायता करती है। हम सब स्वभाव से घमण्डी और ऊँचे विचारवाले हैं। निर्धनतम लोगों में भी थोड़े ही इस संक्रमण से मुक्त हैं। ऐसे थोड़े ही मिलेंगे जो किसी दूसरे को हेय न समझते हों और मन ही मन अपने को यह कहकर न सराहते हों कि वे "और मनुष्यों के समान नहीं हैं।" बीमार का बिछौना ऐसे विचारों को वश में करने वाला बड़ा शक्तिशाली साधन है। वह हमें यह महान सत्य मानने को विवश करता है कि हम सब निर्धन कीड़े हैं, कि हम "मिट्टी के घरों में रहते हैं" और "पतंगे के समान पिस जाते हैं" (अय्यूब 4:19), और राजा और प्रजा, स्वामी और सेवक, धनी और निर्धन, सब मरनेवाले प्राणी हैं, और शीघ्र ही परमेश्वर के न्यायालय में साथ-साथ खड़े होंगे। ताबूत और कब्र को देखकर घमण्ड करना सरल नहीं। निश्चय ही जो कुछ यह पाठ सिखाए, वह भला है। (ङ) अन्त में, बीमारी मनुष्यों के धर्म को परखने में सहायता करती है कि वह किस प्रकार का है। पृथ्वी पर बहुत थोड़े ऐसे हैं जिनका कोई धर्म ही नहीं। फिर भी थोड़ों ही का धर्म ऐसा है जो जाँच में ठहर सके। अधिकांश लोग अपने बापदादों से मिली परम्पराओं से सन्तुष्ट हैं, और अपनी आशा का कोई कारण नहीं बता सकते। अब रोग कभी-कभी मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी होता है, क्योंकि वह उसकी आत्मा की नींव की सर्वथा निस्सारता को प्रकट कर देता है। वह उसे प्रायः दिखाता है कि उसके पाँवों के नीचे कुछ ठोस नहीं और उसके हाथ में कुछ दृढ़ नहीं। वह उसे पता लगवाता है कि चाहे उसने धर्म का ढाँचा अपनाया हो, फिर भी वह जीवन भर "एक अनजाने परमेश्वर" की आराधना करता रहा। बहुत-से विश्वास-वचन स्वास्थ्य के शान्त जल पर अच्छे दिखते हैं, जो बीमार के बिछौने की उथल-पुथल भरी लहरों पर सर्वथा निर्बल और निकम्मे निकलते हैं। जाड़े के तूफ़ान प्रायः मनुष्य के घर की त्रुटियाँ प्रकट कर देते हैं, और बीमारी प्रायः मनुष्य की आत्मा के अनुग्रहहीन होने को प्रकट कर देती है। निश्चय ही जो कुछ हमें अपने विश्वास का वास्तविक स्वरूप जान लेने में सहायता करे, वह भला है। मैं यह नहीं कहता कि बीमारी जिस-जिस पर आती है उन सब को ये लाभ पहुँचाती है। हाय, मैं ऐसा कुछ नहीं कह सकता! प्रतिवर्ष असंख्य लोग बीमारी से बिछौने पर पड़ जाते हैं और फिर स्वस्थ हो जाते हैं, जो स्पष्टतः अपने बीमार के बिछौने से कोई शिक्षा नहीं लेते, और फिर संसार में लौट जाते हैं। प्रतिवर्ष असंख्य लोग बीमारी में से होकर कब्र तक जाते हैं, और फिर भी उससे उतना भी आत्मिक प्रभाव नहीं पाते जितना नाश होनेवाले पशु। जब तक वे जीवित रहते हैं उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती, और जब वे मरते हैं तब "उनकी मृत्यु में कोई पीड़ा नहीं।" (भजन संहिता 73:4।) ये कहने में भयानक बातें हैं। पर ये सच हैं। मनुष्य का हृदय और विवेक जितनी मृतता तक पहुँच सकता है, उसकी गहराई नापने का मैं दावा नहीं कर सकता। परन्तु क्या बीमारी उन लाभों को, जिनके विषय में मैं कह रहा हूँ, केवल थोड़े ही लोगों को पहुँचाती है? मैं ऐसा कुछ नहीं मानूँगा। मैं विश्वास करता हूँ कि बहुत-से मामलों में बीमारी ऐसे प्रभाव उत्पन्न करती है जो कमोबेश उनके समान होते हैं जिनके विषय में मैं अभी कह रहा था। मैं विश्वास करता हूँ कि बहुत-से मनों में बीमारी परमेश्वर का "भेंट का दिन" है, और बीमार के बिछौने पर ऐसी भावनाएँ निरन्तर जगती हैं जो, यदि उनसे लाभ उठाया जाए, तो परमेश्वर के अनुग्रह से उद्धार तक पहुँचा सकती हैं। मैं विश्वास करता हूँ कि अन्यजातियों के देशों में बीमारी प्रायः मिशनरी के लिए मार्ग तैयार करती है, और बेचारे मूर्तिपूजक को सुसमाचार की आनन्दमय खबर पर सहर्ष कान लगाने वाला बना देती है। मैं विश्वास करता हूँ कि हमारे अपने देश में बीमारी सुसमाचार के सेवक की सबसे बड़ी सहायकों में से एक है, और रोग के दिन वे उपदेश और सम्मतियाँ प्रायः हृदय तक पहुँच जाती हैं जिनकी हमने स्वास्थ्य के दिन उपेक्षा की थी। मैं विश्वास करता हूँ कि बीमारी मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर के सबसे महत्त्वपूर्ण गौण साधनों में से एक है, और यद्यपि उससे जगी हुई भावनाएँ प्रायः क्षणिक होती हैं, तथापि वह प्रायः ऐसा साधन भी होती है जिसके द्वारा आत्मा हृदय पर प्रभावशाली रूप से कार्य करता है। संक्षेप में, मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि मनुष्यों के शरीरों की बीमारी ने परमेश्वर की अद्भुत व्यवस्था में प्रायः मनुष्यों की आत्माओं के उद्धार की ओर अगुवाई की है। मैं अपने विषय के इस भाग को यहीं छोड़ता हूँ। इस पर और टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। यदि बीमारी वे काम कर सकती है जिनके विषय में मैं कहता आया हूँ (और कौन इसका विरोध करेगा?), यदि दुष्ट संसार में बीमारी मनुष्यों को परमेश्वर और अपनी आत्माओं के विषय में सोचने में सहायता कर सकती है, तो बीमारी मनुष्यजाति को लाभ पहुँचाती है।

हमें बीमारी पर कुड़कुड़ाने और संसार में उसकी उपस्थिति पर खेद करने का कोई अधिकार नहीं है। हमें तो इसके लिये परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। यह परमेश्वर की साक्षी है। यह आत्मा की सलाहकार है। यह विवेक को जगानेवाली है। यह हृदय को शुद्ध करनेवाली है। निश्चय ही मुझे तुमसे यह कहने का अधिकार है कि बीमारी मनुष्य के लिये श्राप नहीं, आशीष है; हानि नहीं, सहायता है; घाटा नहीं, लाभ है; शत्रु नहीं, मित्र है। जब तक हमारा संसार ऐसा है जिसमें पाप है, तब तक यह दया की बात है कि वह ऐसा संसार भी है जिसमें बीमारी है।

III. तीसरा और अन्तिम विषय जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ, वह उन विशेष कर्तव्यों का है जो बीमारी का प्रचलन हम में से हर एक पर डालता है। मुझे खेद होगा कि बीमारी के विषय को छोड़ूँ और इस बात के बारे में कुछ न कहूँ। मैं इसे अत्यन्त आवश्यक समझता हूँ कि परमेश्वर का सन्देश आत्माओं तक पहुँचाने में हम केवल सामान्य बातों से सन्तुष्ट न रहें। मैं उत्सुक हूँ कि जिस किसी के हाथ में यह पत्र पहुँचे, उसके मन में इस विषय के सम्बन्ध में उसकी अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी बैठा दूँ। मैं सच्चे मन से चाहता हूँ कि कोई भी इस पत्र को इस दशा में न रखे कि इन प्रश्नों का उत्तर न दे सके: "मैंने कौन-सी व्यावहारिक शिक्षा पाई? रोग और मृत्यु से भरे इस संसार में मुझे क्या करना चाहिए?" (क) बीमारी का प्रचलन मनुष्य पर जो एक सर्वोपरि कर्तव्य डालता है, वह है नित्य परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार रहकर जीवन बिताना। बीमारी मृत्यु की स्मरण दिलानेवाली है। मृत्यु वह द्वार है जिससे होकर हम सब को न्याय के सामने जाना है। न्याय वह समय है जब हमें अन्त में परमेश्वर को आमने-सामने देखना है। निश्चय ही रोगी और मरते हुए संसार के निवासी को पहली शिक्षा यही लेनी चाहिए कि अपने परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार हो। तुम परमेश्वर से भेंट करने के लिए कब तैयार होते हो? तब तक कभी नहीं जब तक तुम्हारे अधर्म क्षमा न हो जाएँ और तुम्हारा पाप ढाँप न दिया जाए! तब तक कभी नहीं जब तक तुम्हारा हृदय नया न किया जाए और तुम्हारी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा में आनन्दित होना न सिखाया जाए! तुम्हारे बहुत से पाप हैं। यदि तुम कलीसिया में जाते हो, तो तुम्हारे अपने मुँह को हर रविवार यह मानना सिखाया जाता है। केवल यीशु मसीह का लहू ही उन पापों को धो सकता है। केवल मसीह की धार्मिकता ही तुम्हें परमेश्वर की दृष्टि में ग्रहणयोग्य बना सकती है। केवल विश्वास, सरल बालक-सा विश्वास, ही तुम्हें मसीह और उसके लाभों में भागी बना सकता है। क्या तुम जानना चाहते हो कि तुम परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार हो या नहीं? तो तुम्हारा विश्वास कहाँ है? तुम्हारा हृदय स्वभाव से परमेश्वर की संगति के योग्य नहीं है। उसकी इच्छा पूरी करने में तुम्हें कोई सच्चा आनन्द नहीं। पवित्र आत्मा को तुम्हें मसीह के स्वरूप में बदलना होगा। पुरानी बातें जाती रहें। सब बातें नई हो जाएँ। क्या तुम जानना चाहते हो कि तुम परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार हो या नहीं? तो तुम्हारा अनुग्रह कहाँ है? तुम्हारे मन फिराव और पवित्रीकरण के प्रमाण कहाँ हैं? मेरा विश्वास है कि परमेश्वर से भेंट करने की तैयारी यही है, इससे कम कुछ नहीं। पाप की क्षमा और परमेश्वर की उपस्थिति के योग्य होना,—विश्वास से धर्मी ठहराया जाना और हृदय का पवित्रीकरण,—हम पर छिड़का गया मसीह का लहू और हम में बसा हुआ मसीह का आत्मा,—ये ही मसीही धर्म की मुख्य आवश्यक बातें हैं। ये केवल शब्द और नाम नहीं हैं कि झगड़ालू धर्मशास्त्रियों के लिए विवाद की हड्डियाँ बनें। ये गम्भीर, ठोस और वास्तविक सच्चाइयाँ हैं। रोग और मृत्यु से भरे संसार में इन बातों के वास्तविक अधिकार में जीवन बिताना वह पहला कर्तव्य है जिसे मैं तुम्हारी आत्मा पर दबाव डालकर रखता हूँ। (ख) बीमारी का प्रचलन तुम पर एक और सर्वोपरि कर्तव्य डालता है, और वह है नित्य उसे धीरज से सहने के लिए तैयार रहकर जीवन बिताना। बीमारी निःसन्देह शरीर और लहू के लिए कठिन परीक्षा है। अपनी नसों को ढीला और अपनी स्वाभाविक शक्ति को घटा हुआ अनुभव करना,—चुपचाप बैठने और अपने सब सामान्य कामों से कट जाने को विवश होना,—अपनी योजनाओं को टूटते और अपने उद्देश्यों को निराश होते देखना,—थकान और पीड़ा के लम्बे घंटे, दिन और रातें सहना,—यह सब बेचारे पापी मानव स्वभाव पर कठिन बोझ है। तो आश्चर्य क्या कि रोग से चिड़चिड़ापन और अधीरता प्रकट हो! निश्चय ही ऐसे मरते हुए संसार में हमें धीरज सीखना चाहिए। जब बीमारी हमारी बारी में आए तो उसे धीरज से सहना हम कैसे सीखेंगे? हमें स्वस्थ दिनों में अनुग्रह का भण्डार जमा करना होगा। हमें अपने उग्र स्वभाव और प्रवृत्तियों पर पवित्र आत्मा के पवित्र करनेवाले प्रभाव को ढूँढ़ना होगा। हमें अपनी प्रार्थनाओं को सच्चा काम बनाना होगा, और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के साथ-साथ उसे सहने की शक्ति के लिए भी नियमित रूप से माँगना होगा। ऐसी शक्ति माँगने से मिलती है: "यदि तुम मेरे नाम से मुझ से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे करूँगा।" (यूहन्ना 14:14।) मैं इस बात पर ठहरना अनावश्यक नहीं समझता। मेरा विश्वास है कि मसीही जीवन के निष्क्रिय गुणों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना उन्हें मिलना चाहिए। नम्रता, कोमलता, धीरज, विश्वास, सहनशीलता—ये सब परमेश्वर के वचन में आत्मा के फल कहे गए हैं। ये निष्क्रिय गुण हैं जो विशेष रूप से परमेश्वर की महिमा करते हैं। ये अक्सर उन लोगों को भी सोचने पर विवश करते हैं जो मसीही चरित्र के सक्रिय पक्ष को तुच्छ जानते हैं। ये गुण रोगी के कमरे में जितने उजले चमकते हैं, उतने कहीं नहीं। ये बहुत से रोगियों को ऐसा मौन उपदेश देने योग्य बनाते हैं जिसे उनके आसपास के लोग कभी नहीं भूलते। क्या तुम अपने माने हुए सिद्धान्त को सुशोभित करना चाहते हो? क्या तुम अपने मसीही जीवन को दूसरों की दृष्टि में सुन्दर बनाना चाहते हो? तो आज मेरी यह सलाह मान लो। बीमारी के समय के लिए धीरज का भण्डार जमा करो। तब यदि तुम्हारी बीमारी मृत्यु की न हो, तो वह "परमेश्वर की महिमा" के लिए होगी। (यूहन्ना 11:4।) (ग) बीमारी का प्रचलन तुम पर एक और सर्वोपरि कर्तव्य डालता है, और वह है अपने संगी मनुष्य के साथ सहानुभूति रखने और उसकी सहायता करने के लिए नित्य तैयार रहना। बीमारी हम से कभी बहुत दूर नहीं होती। थोड़े ही परिवार हैं जिनमें कोई रोगी सम्बन्धी न हो। थोड़े ही गाँव या नगर हैं जहाँ कोई बीमार न मिले। पर जहाँ कहीं बीमारी है, वहाँ कर्तव्य की पुकार है। कहीं थोड़ी समय पर सहायता,—कहीं कृपापूर्ण भेंट,—मैत्रीपूर्ण पूछताछ,—केवल सहानुभूति का एक शब्द, बहुत भला कर सकता है। ऐसी ही बातें कठोरता को कोमल करती हैं, मनुष्यों को पास लाती हैं और सद्भाव बढ़ाती हैं। इन्हीं उपायों से तुम अन्त में मनुष्यों को मसीह तक पहुँचा सकते हो और उनकी आत्माओं को बचा सकते हो। ये ऐसे भले कर्म हैं जिनके लिए हर मसीही कहलानेवाले को तैयार रहना चाहिए। रोग और बीमारी से भरे संसार में हमें "एक दूसरे का भार उठाना" और "एक दूसरे पर कृपालु" होना चाहिए। (गलातियों 6:2; इफिसियों 4:32।) मैं कह सकता हूँ कि कुछ लोगों को ये बातें छोटी और तुच्छ लगेंगी। उन्हें तो कुछ बड़ा, भव्य, प्रभावशाली और वीरतापूर्ण करना होता है! मैं यह कहने की अनुमति लेता हूँ कि भाईचारे की इन छोटी-छोटी सेवाओं पर विवेकपूर्वक ध्यान देना "मसीह का मन" रखने के सबसे स्पष्ट प्रमाणों में से एक है। ये ऐसे कार्य हैं जिनमें हमारा धन्य स्वामी स्वयं बहुतायत से लगा रहा। वह रोगियों और दुखियों का "भला करता हुआ फिरता रहा।" (प्रेरितों के काम 10:38।) ये ऐसे कार्य हैं जिन पर वह पवित्रशास्त्र के उस अत्यन्त गम्भीर खण्ड में, अर्थात् अन्तिम न्याय के वर्णन में, बहुत महत्त्व देता है। वह वहाँ कहता है: "मैं बीमार था, और तुम ने मुझ से भेंट की।" (मत्ती 25:36।) क्या तुम अपने प्रेम की वास्तविकता को प्रमाणित करने की कोई इच्छा रखते हो,—उस धन्य अनुग्रह की, जिसकी बात बहुत लोग करते हैं और जिसे थोड़े ही निभाते हैं? यदि रखते हो, तो अपने रोगी भाइयों के प्रति निर्दयी स्वार्थ और उपेक्षा से सावधान रहो। उन्हें ढूँढ़ निकालो। यदि उन्हें सहायता चाहिए तो सहायता करो। उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करो। उनके बोझ हल्के करने का यत्न करो। सबसे बढ़कर, उनकी आत्माओं का भला करने का प्रयास करो। यदि उन्हें कोई लाभ न भी हो, तो तुम्हें लाभ होगा। यह तुम्हारे हृदय को कुड़कुड़ाने से बचाएगा। यह तुम्हारी अपनी आत्मा के लिए आशीष ठहर सकता है। मेरा पक्का विश्वास है कि हमारी पहुँच में आए बीमारी के हर मामले के द्वारा परमेश्वर हमें परख रहा है। पीड़ा को होने देकर वह जाँचता है कि मसीहियों में कोई संवेदना है या नहीं। सावधान रहो, ऐसा न हो कि तुम तराज़ू में तौले जाओ और घटी में पाए जाओ। यदि तुम रोगी और मरते हुए संसार में रह सकते हो और दूसरों के लिए कुछ अनुभव नहीं करते, तो तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है। मैं अपने विषय की इस शाखा को यहीं छोड़ता हूँ। मैंने जिन बातों का नाम लिया है उन्हें सुझाव के रूप में रखता हूँ, और परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे बहुत से मनों में काम करें। मैं फिर कहता हूँ कि परमेश्वर से भेंट करने की नित्य तैयारी,—धीरज से दुख सहने की नित्य तत्परता,—सच्चे मन से सहानुभूति रखने की नित्य इच्छा,—ये वे स्पष्ट कर्तव्य हैं जो बीमारी सब पर डालती है। ये कर्तव्य हर एक की पहुँच के भीतर हैं। इन्हें बताने में मैं कोई अतिशयोक्तिपूर्ण या अनुचित माँग नहीं करता। मैं किसी को मठ में जाकर अपने पद के कर्तव्यों की अनदेखी करने को नहीं कहता। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि लोग यह समझें कि वे एक रोगी और मरते हुए संसार में रहते हैं, और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ। और मैं साहस से कहता हूँ कि जो मनुष्य विश्वास, पवित्रता, धीरज और प्रेम का जीवन बिताता है, वह न केवल सबसे सच्चा मसीही है, बल्कि सबसे बुद्धिमान और विवेकशील मनुष्य भी है। और अब मैं व्यावहारिक प्रयोग के चार शब्दों के साथ सब कुछ समाप्त करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि इस पत्र का विषय किसी आत्मिक काम में लाया जाए। इसे इस पुस्तक में रखते हुए मेरे हृदय की इच्छा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यही है कि आत्माओं का भला हो। (1) पहले, मैं इस पत्र के सब पाठकों के सामने एक प्रश्न रखता हूँ, जिस पर परमेश्वर का राजदूत होकर मैं उनसे गम्भीरता से ध्यान देने की विनती करता हूँ। यह प्रश्न उस विषय से स्वाभाविक रूप से निकलता है जिस पर मैं लिखता रहा हूँ। यह प्रश्न सब से सम्बन्ध रखता है, चाहे किसी भी पद, वर्ग या दशा के हों। मैं तुम से पूछता हूँ, जब तुम बीमार पड़ोगे तब क्या करोगे? वह समय अवश्य आएगा जब तुम्हें भी, औरों के समान, मृत्यु की छाया की अँधेरी घाटी में उतरना होगा। वह घड़ी अवश्य आएगी जब तुम भी, अपने सब पूर्वजों के समान, बीमार पड़ोगे और मरोगे। वह समय निकट हो या दूर, यह परमेश्वर ही जानता है। पर जब कभी भी हो, मैं फिर पूछता हूँ, तुम क्या करोगे? तुम सांत्वना के लिए कहाँ जाओगे? तुम अपनी आत्मा को किस पर टिकाओगे? तुम अपनी आशा किस पर बनाओगे? तुम अपनी शान्ति कहाँ से लाओगे? मैं तुम से विनती करता हूँ कि इन प्रश्नों को टालो मत। इन्हें अपने विवेक पर काम करने दो, और तब तक चैन न लो जब तक इनका सन्तोषजनक उत्तर न दे सको। उस बहुमूल्य वरदान, अर्थात् अमर आत्मा, के साथ खिलवाड़ मत करो। इस विषय पर विचार करना किसी अधिक सुविधाजनक समय के लिए न टालो। मृत्यु-शय्या के मन फिराव की आशा पर भरोसा मत करो। सबसे बड़ा काम निश्चय ही अन्त के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। एक मरता हुआ चोर इसलिए बचाया गया कि लोग निराश न हों, पर केवल एक ही, ताकि कोई भरोसा न कर बैठे। मैं प्रश्न दोहराता हूँ। मुझे निश्चय है कि वह उत्तर के योग्य है। "जब तुम बीमार पड़ोगे तब क्या करोगे?" यदि तुम इस संसार में सदा जीवित रहनेवाले होते तो मैं तुम से इस प्रकार बात न करता। पर यह हो नहीं सकता। सारी मानव जाति के सामान्य भाग्य से बचने का कोई उपाय नहीं। हमारी जगह कोई नहीं मर सकता। वह दिन अवश्य आएगा जब हम में से हर एक को अपने अनन्त घर जाना होगा। उस दिन के लिए मैं चाहता हूँ कि तुम तैयार रहो। वह शरीर जो अब तुम्हारा इतना ध्यान लेता है—वह शरीर जिसे तुम अब इतनी देखभाल से पहनाते, खिलाते और गरमाते हो,—वह शरीर फिर मिट्टी में लौट जाएगा। आह, सोचो कि यह अन्त में कितनी भयानक बात होगी कि तुमने सब बातों का प्रबन्ध किया पर उस एक आवश्यक बात का नहीं,—शरीर का प्रबन्ध किया पर आत्मा की उपेक्षा की,—वास्तव में कार्डिनल बफ़र्ट की तरह मरे, और उद्धार पाने का कोई चिह्न न छोड़ा! मैं एक बार फिर अपना प्रश्न तुम्हारे विवेक पर दबाता हूँ: "जब तुम बीमार पड़ोगे तब क्या करोगे?"

(2) अगली बात यह कि जो लोग अनुभव करते हैं कि उन्हें सलाह की आवश्यकता है और उसे मानने को तैयार हैं, जो यह समझते हैं कि वे अभी परमेश्वर से मिलने के लिये तैयार नहीं हैं, उन सब को मैं यह सलाह देता हूँ। वह सलाह छोटी और सरल है। प्रभु यीशु मसीह से बिना विलम्ब परिचय कर लो। मन फिराओ, मनफिराओ, मसीह के पास भाग आओ, और उद्धार पाओ। या तो तुम्हारी आत्मा है, या नहीं है। तुम निश्चय ही कभी यह इनकार नहीं करोगे कि है। तो यदि तुम्हारी आत्मा है, तो उस आत्मा के उद्धार की खोज करो। संसार के सारे जुओं में उस मनुष्य के जुए से अधिक लापरवाही का कोई नहीं, जो परमेश्वर से मिलने के लिये बिना तैयार हुए जीता है और फिर भी मन फिराव को टालता रहता है। या तो तुम में पाप हैं, या नहीं हैं। यदि हैं (और कौन इससे इनकार करने का साहस करेगा?), तो उन पापों को छोड़ दो, अपने अपराधों को दूर फेंक दो, और बिना विलम्ब उनसे फिर जाओ। या तो तुम्हें एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता है, या नहीं है। यदि है, तो इसी दिन उस एकमात्र उद्धारकर्ता के पास भाग आओ, और उससे पुरज़ोर पुकार कर विनती करो कि वह तुम्हारी आत्मा का उद्धार करे। तुरन्त मसीह के पास जाओ। विश्वास के द्वारा उसे खोजो। अपनी आत्मा को उसकी रखवाली में सौंप दो। क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल के लिये उससे पुरज़ोर पुकार कर प्रार्थना करो। उससे विनती करो कि वह तुम पर पवित्र आत्मा उण्डेले, और तुम्हें सच्चा मसीही बना दे। वह तुम्हारी सुनेगा। चाहे तुम जैसे भी रहे हो, वह तुम्हारी प्रार्थना को अस्वीकार नहीं करेगा। उसने कहा है, "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" (यूहन्ना 6:37।) मैं तुमसे विनती करता हूँ, अस्पष्ट और अनिश्चित मसीहियत से सावधान रहो। केवल इस सामान्य आशा से सन्तुष्ट न हो जाओ कि सब ठीक है क्योंकि तुम पुरानी इंग्लैंड की कलीसिया के सदस्य हो, और अन्त में सब कुशल होगा क्योंकि परमेश्वर दयालु है। चैन न लो, चैन न लो, जब तक स्वयं मसीह के साथ तुम्हारा व्यक्तिगत मेल न हो जाए। चैन न लो, चैन न लो, जब तक तुम्हारे हृदय में आत्मा की यह गवाही न मिल जाए कि तुम धोए गए, पवित्र किए गए, धर्मी ठहराए गए, और मसीह के साथ एक हो, और मसीह तुम में है। चैन न लो जब तक तुम प्रेरित के साथ यह न कह सको, "मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली कर सकता है।" (2 तीमुथियुस 1:12।) अस्पष्ट, अनिश्चित और धुँधला धर्म स्वास्थ्य के समय में शायद काम चला दे। परन्तु बीमारी के दिन वह किसी काम का नहीं होगा। केवल औपचारिक, दिखावटी कलीसिया-सदस्यता मनुष्य को जवानी और समृद्धि की धूप में तो पार करा सकती है। परन्तु जब मृत्यु सामने दिखाई देती है तब वह पूरी तरह टूट जाती है। तब कुछ भी काम नहीं आएगा सिवाय सच्चे हृदय के मेल के जो मसीह से हो।

मसीह। हमारे लिए परमेश्वर के दाहिने हाथ पर मध्यस्थता करनेवाला मसीह, हमारे याजक, हमारे वैद्य और हमारे मित्र के रूप में जाना और माना गया मसीह—केवल मसीह ही मृत्यु का डंक छीन सकता है और हमें बिना भय के बीमारी का सामना करने के योग्य बना सकता है। केवल वही उन्हें छुड़ा सकता है जो मृत्यु के भय के कारण जीवन भर दासत्व में पड़े रहते हैं। मैं हर उस व्यक्ति से कहता हूँ जिसे सलाह की आवश्यकता है, मसीह से परिचित हो जाओ। यदि तुम चाहते हो कि बीमारी की शय्या पर तुम्हें आशा और शान्ति मिले, तो मसीह से परिचित हो जाओ। मसीह को खोजो। मसीह के पास जाओ। जब तुम उससे परिचित हो जाओ तो अपनी हर चिन्ता और कठिनाई उसी पर डाल दो। वह तुम्हें थामे रखेगा और सब कुछ में से पार निकाल ले जाएगा। जब तुम्हारा विवेक बोझ से दबा हो, तो अपना हृदय उसके सामने उँडेल दो। वही सच्चा पाप-स्वीकार सुननेवाला है। केवल वही तुम्हें क्षमा दे सकता है और बोझ उतार सकता है। मार्था और मरियम की नाईं बीमारी के दिन सबसे पहले उसी की ओर फिरो। अपने जीवन की अन्तिम साँस तक उसी की ओर देखते रहो। मसीह को जानना सार्थक है। जितना अधिक तुम उसे जानोगे, उतना ही अधिक उससे प्रेम करोगे। इसलिए यीशु मसीह से परिचित हो जाओ। (3) तीसरी बात, मैं उन सब सच्चे मसीहियों से जो यह लेख पढ़ते हैं, आग्रह करता हूँ कि वे स्मरण रखें कि बीमारी के समय वे परमेश्वर की कितनी महिमा कर सकते हैं, और बीमार होने पर पूरी तरह परमेश्वर के हाथ में पड़े रहें। मैं इस बात को छूना बहुत आवश्यक समझता हूँ। मैं जानता हूँ कि विश्वासी का हृदय कितनी जल्दी हताश हो जाता है, और जब किसी मसीही की देह दुर्बल होती है तब शैतान सन्देह और प्रश्न उठाने में कितना व्यस्त रहता है। परमेश्वर की सन्तानों पर कभी-कभी जो उदासी और विषाद आ जाता है, जब वे अचानक रोग के कारण काम से हटा दिए जाते हैं और चुपचाप बैठने को विवश हो जाते हैं, उसकी कुछ झलक मैंने देखी है। मैंने देखा है कि ऐसे समयों में कुछ भले लोग कैसे रोगग्रस्त विचारों से अपने आप को सताने लगते हैं और अपने मन में कहते हैं, "परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है; मैं उसकी दृष्टि से दूर निकाल दिया गया हूँ।" मैं सब बीमार विश्वासियों से बड़ी विनती करता हूँ कि वे स्मरण रखें कि वे धीरज से दुःख सहकर भी परमेश्वर का उतना ही आदर कर सकते हैं जितना सक्रिय सेवा से। प्रायः चुपचाप बैठे रहना इधर-उधर दौड़ने और बड़े-बड़े काम करने से अधिक अनुग्रह प्रकट करता है। मैं उनसे विनती करता हूँ कि वे स्मरण रखें कि मसीह को उनकी उतनी ही चिन्ता है जब वे बीमार हैं जितनी तब जब वे स्वस्थ हैं, और जिस ताड़ना को वे इतनी तीव्रता से अनुभव करते हैं वह प्रेम से भेजी गई है, क्रोध से नहीं। सबसे बढ़कर, मैं उनसे विनती करता हूँ कि वे यीशु की अपने सब दुर्बल अंगों के प्रति सहानुभूति को स्मरण रखें। उनकी वह सदा कोमलता से देखभाल करता है, परन्तु उनकी आवश्यकता के समय जितनी करता है उतनी और कभी नहीं। मसीह को बीमारी का बड़ा अनुभव रहा है। वह बीमार मनुष्य का हृदय जानता है। जब वह पृथ्वी पर था तो "हर प्रकार की बीमारी और हर प्रकार की दुर्बलता" देखा करता था। अपनी देह के दिनों में उसने विशेष रूप से बीमारों के लिए दया अनुभव की। वह अब भी उनके लिए विशेष रूप से दया अनुभव करता है। मैं प्रायः सोचता हूँ कि बीमारी और दुःख विश्वासियों को अनुभव में स्वास्थ्य की अपेक्षा अपने प्रभु के अधिक समान बनाते हैं। "उसने आप हमारी दुर्बलताओं को ले लिया और हमारी बीमारियों को उठा लिया।" (यशायाह 53:3; मत्ती 8:17।) प्रभु यीशु "दुःखी पुरुष था, रोगों से परिचित।" दुःख उठानेवाले उद्धारकर्ता का मन जानने का जैसा अवसर दुःख उठानेवाले चेलों को मिलता है, वैसा और किसी को नहीं मिलता। (4) मैं सब विश्वासियों के लिए एक उपदेश के साथ समाप्त करता हूँ, जिसे परमेश्वर से मैं हृदय से प्रार्थना करता हूँ कि वह उनकी आत्माओं पर अंकित कर दे। मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि मसीह के साथ घनिष्ठ सहभागिता की आदत बनाए रखो, और अपने धर्म में "बहुत आगे बढ़ जाने" से कभी मत डरो। यदि तुम चाहते हो कि बीमारी के समयों में तुम्हें "बड़ी शान्ति" मिले तो इसे स्मरण रखो। मुझे खेद के साथ दिखाई देता है कि कुछ क्षेत्रों में व्यावहारिक मसीही जीवन के स्तर को गिराने की, और मसीही के दैनिक चाल-चलन के विषय में तथाकथित "अतिवादी विचारों" की निन्दा करने की प्रवृत्ति है। मैं पीड़ा के साथ देखता हूँ कि धार्मिक लोग भी कभी-कभी उन पर ठण्डी दृष्टि डालते हैं जो संसारी समाज से अलग हो जाते हैं, और उन्हें "अलगाववादी, संकीर्ण-मन, अनुदार, निर्दय, कटु-स्वभाववाला" आदि कहकर दोषी ठहराते हैं। मैं मसीह के हर उस विश्वासी को, जो यह लेख पढ़ता है, चेतावनी देता हूँ कि ऐसी निन्दाओं के प्रभाव में आने से सावधान रहे। मैं उससे विनती करता हूँ कि यदि उसे मृत्यु की तराई में उजियाले की आवश्यकता है, तो वह "अपने आप को संसार से निष्कलंक रखे," "प्रभु के पीछे पूरी रीति से चले," और परमेश्वर के साथ बहुत निकटता से चले। (याकूब 1:27; गिनती 14:24।) मेरा विश्वास है कि बहुत लोगों के मसीही जीवन में "पूर्णता" का अभाव ही उनकी स्वास्थ्य और बीमारी दोनों में थोड़ी शान्ति का एक रहस्य है। मेरा विश्वास है कि वह "आधा-अधूरा", "सबके साथ निभानेवाला" धर्म, जो आज बहुतों को सन्तुष्ट करता है, परमेश्वर को अप्रिय है और मरते समय के तकियों में काँटे बोता है, जिन्हें सैकड़ों लोग बहुत देर होने से पहले कभी नहीं पहचानते। मेरा विश्वास है कि ऐसे धर्म की दुर्बलता और निर्बलता जैसी बीमारी की शय्या पर प्रकट होती है, वैसी और कहीं नहीं होती। यदि हम और तुम अपनी आवश्यकता के समय "दृढ़ शान्ति" चाहते हैं, तो हमें केवल मसीह के साथ नाममात्र के मेल से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। (इब्रानियों 6:18।) हमें उसके साथ हृदय की अनुभवजन्य सहभागिता को कुछ जानने का प्रयत्न करना चाहिए। हम कभी, कभी न भूलें कि "मेल" एक बात है और "सहभागिता" दूसरी। मुझे भय है कि हज़ारों लोग, जो जानते हैं कि मसीह के साथ "मेल" क्या है, "सहभागिता" के विषय में कुछ नहीं जानते। वह दिन आ सकता है जब रोग से लम्बे संघर्ष के बाद हम अनुभव करेंगे कि दवा अब और कुछ नहीं कर सकती, और मरने के सिवा कुछ शेष नहीं। मित्र पास खड़े होंगे, पर हमारी सहायता नहीं कर पाएँगे। सुनने की शक्ति, दृष्टि, यहाँ तक कि प्रार्थना करने की सामर्थ्य भी तेज़ी से घटती जाएगी। संसार और उसकी छायाएँ हमारे पाँवों के नीचे से पिघलती जाएँगी। अनन्तकाल अपनी वास्तविकताओं के साथ हमारे मन के सामने विशाल रूप में उभरेगा। उस कठिन घड़ी में हमें कौन थामेगा? कौन हमें यह कहने के योग्य बनाएगा, "मैं किसी विपत्ति से नहीं डरूँगा"? (भजन संहिता 23:4।) कोई नहीं, मसीह के साथ घनिष्ठ सहभागिता के सिवा और कुछ नहीं कर सकता। विश्वास के द्वारा हमारे हृदयों में बसा हुआ मसीह—हमारे सिरों के नीचे अपना दाहिना हाथ रखता हुआ मसीह—अपने पास बैठा हुआ अनुभव किया गया मसीह—केवल वही अन्तिम संघर्ष में हमें पूर्ण विजय दे सकता है। आओ हम मसीह से और निकटता से लिपटे रहें, उससे और हृदय से प्रेम करें, उसके लिए और पूरी रीति से जीएँ, उसका और ठीक-ठीक अनुकरण करें, उसे और निडरता से स्वीकार करें, उसके पीछे और पूरी रीति से चलें। ऐसा धर्म सदा अपना प्रतिफल लाएगा। संसारी लोग उस पर हँसें, दुर्बल भाई उसे अतिवाद समझें, परन्तु वह टिकाऊ होगा। साँझ के समय वह हमें उजियाला देगा। बीमारी में वह हमें शान्ति देगा। आनेवाले संसार में वह हमें महिमा का वह मुकुट देगा जो मुरझाता नहीं। समय थोड़ा है। इस संसार का स्वरूप बदलता जा रहा है। कुछ और बीमारियाँ, और सब समाप्त हो जाएगा। कुछ और अन्त्येष्टियाँ, और हमारी अपनी अन्त्येष्टि भी हो जाएगी। कुछ और आँधियाँ और थपेड़े, और हम बन्दरगाह में सुरक्षित होंगे। हम एक ऐसे संसार की ओर यात्रा कर रहे हैं जहाँ बीमारी नहीं है—जहाँ बिछुड़ना, पीड़ा, रोना और विलाप सदा के लिए समाप्त हो चुके हैं। स्वर्ग हर वर्ष अधिक भरता जा रहा है और पृथ्वी अधिक खाली होती जा रही है। आगे गए हुए मित्र पीछे रहे मित्रों से अधिक होते जा रहे हैं। "थोड़ा ही समय रह गया है, जब आनेवाला आएगा और देर न करेगा।" (इब्रानियों 10:37।) उसकी उपस्थिति में आनन्द की भरपूरी है। मसीह अपने लोगों की आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा। जो अन्तिम बैरी नष्ट किया जाएगा वह मृत्यु है। परन्तु वह नष्ट किया जाएगा। मृत्यु स्वयं भी एक दिन मर जाएगी। (प्रकाशित वाक्य 20:14।) इस बीच आओ हम परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास का जीवन जीएँ। आओ हम अपना सारा भार मसीह पर डाल दें, और इस विचार से आनन्दित हों कि वह युगानुयुग जीवित है। हाँ, परमेश्वर का धन्यवाद हो! मसीह जीवित है, चाहे हम मर जाएँ। मसीह जीवित है, चाहे मित्र और परिवार कब्र में पहुँचाए जाएँ। वह जीवित है जिसने मृत्यु को नाश किया, और जीवन तथा अमरता को सुसमाचार के द्वारा प्रकाश में ला दिया। वह जीवित है जिसने कहा, "हे मृत्यु, मैं तेरी मरियाँ ठहरूँगा; हे अधोलोक, मैं तेरा नाश ठहरूँगा।" (होशे 13:14।) वह जीवित है जो एक दिन हमारी दीन-हीन देह को बदलकर अपनी महिमामय देह के समान बना देगा। बीमारी में और स्वास्थ्य में, जीवन में और मृत्यु में, आओ हम पूरे भरोसे के साथ उसी पर टिके रहें। निश्चय ही हमें प्रतिदिन प्राचीनकाल के किसी जन के साथ कहना चाहिए, "यीशु मसीह के लिए परमेश्वर का धन्यवाद हो!"

परमेश्वर का परिवार

"उसका सारा परिवार, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर है।" [इफिसियों 3:15]

इस लेख का शीर्षक बनानेवाले ये शब्द सदा हमारे मन में कुछ भावनाएँ जगाएँ। पृथ्वी पर ऐसा कोई स्त्री-पुरुष नहीं जो किसी न किसी "परिवार" का सदस्य न हो। निर्धन से लेकर धनवान तक, हर किसी के अपने सगे-सम्बन्धी और कुटुम्बी हैं, और वह अपने "परिवार" के विषय में कुछ न कुछ बता सकता है।

हम सब जानते हैं कि वर्ष के कुछ विशेष समयों पर, जैसे बड़े दिन पर, पारिवारिक मिलन बहुत सामान्य हैं। यदि वर्ष के और किसी समय नहीं, तो उस समय हज़ारों घर भर जाते हैं। नगर में रहनेवाला जवान काम-धन्धे से कुछ दिन की छुट्टी निकालकर अपने माता-पिता से मिलने घर चला आता है। जवान स्त्री को थोड़े दिन का अवकाश मिलता है, और वह अपने पिता और माता से मिलने आती है। भाई-बहन कुछ घण्टों के लिए मिलते हैं। माता-पिता और बच्चे एक-दूसरे का मुँह देखते हैं। कहने को कितना कुछ होता है! पूछने को कितने प्रश्न! सुनाने को कितनी रोचक बातें! वह घर सचमुच सुखी है जो बड़े दिन पर अपने में "सारे परिवार" को इकट्ठा देखता है।

पारिवारिक मिलन स्वाभाविक, उचित और भले हैं। मैं पूरे मन से उनका समर्थन करता हूँ। उन्हें बनाए रखे जाते देखकर मुझे भला लगता है। वे उन मनभावनी बातों में से एक हैं जो मनुष्य के पतन के बाद भी बची रही हैं। परमेश्वर के अनुग्रह के बाद, मुझे ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं दिखता जो इस पापी संसार में लोगों को पारिवारिक भावनाओं जितना जोड़ता हो। रक्त का नाता एक अत्यन्त सामर्थी बन्धन है। एक अमेरिकी नौसैनिक अधिकारी ने बहुत अच्छी बात कही थी, जब उसके जवान चीन में ताकू के किलों से लड़ते हुए अंग्रेज़ नाविकों की सहायता करने पर अड़ गए थे: "मैं इसे रोक नहीं सकता: रक्त पानी से गाढ़ा होता है।" मैंने प्रायः देखा है कि लोग अपने सम्बन्धियों का पक्ष केवल इसलिए लेते हैं कि वे उनके सम्बन्धी हैं, और उनके विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं होते, चाहे उनकी रुचियों और चाल-चलन से उनका कोई मेल न हो। जो कुछ भी पारिवारिक भावना को बनाए रखने में सहायक हो, वह सराहने योग्य है। जहाँ हो सके, बड़े दिन पर "सारे परिवार" को एक साथ इकट्ठा करना बुद्धिमानी की बात है।

फिर भी पारिवारिक मिलन प्रायः दुःख-भरे होते हैं। इस जैसे संसार में यदि वे न होते तो आश्चर्य की बात होती। ऐसे परिवार थोड़े ही हैं जिनमें वर्षों के बीतने पर रिक्त स्थान और खाली जगहें न दिखाई दें। जैसे-जैसे समय बीतता है, परिवर्तन और मृत्यु भारी विनाश कर जाते हैं। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, उन चेहरों और आवाज़ों के विषय में, जो अब हमारे साथ नहीं हैं, ऐसे विचार हमारे भीतर उठते हैं जिन्हें बड़े दिन की कोई भी रौनक पूरी तरह दबा नहीं सकती। जब परिवार के युवा सदस्य एक बार संसार में निकलने लगते हैं, तब घोंसले के बिखर जाने के बाद भी बूढ़े सिर बहुत समय तक जीवित रह सकते हैं; परन्तु एक निश्चित समय के बाद ऐसा कम ही होता है कि आप "सारे परिवार" को एक साथ देखें।

एक बड़ा परिवार है जिसका सदस्य मैं इस लेख के सब पाठकों को देखना चाहता हूँ। यह ऐसा परिवार है जिसे बहुतेरे तुच्छ जानते हैं, और कुछ तो इसे जानते तक नहीं। परन्तु यह पृथ्वी के किसी भी परिवार से कहीं अधिक महत्त्व का परिवार है। इसका सदस्य होना मनुष्य को किसी राजा का पुत्र होने से कहीं बड़े विशेषाधिकार दिलाता है। यह वही परिवार है जिसकी चर्चा पौलुस इफिसियों से करता है, जब वह उन्हें "स्वर्ग और पृथ्वी के सारे परिवार" के विषय में बताता है। यह परमेश्वर का परिवार है।

मैं इस लेख के हर पाठक का ध्यान चाहता हूँ, जब मैं इस परिवार का वर्णन करने और उसे आपके सामने रखने का प्रयत्न करता हूँ। मैं आपको उन अद्भुत लाभों के विषय में बताना चाहता हूँ जो इस परिवार की सदस्यता से मिलते हैं। मैं चाहता हूँ कि जब यह परिवार अन्त में अन्तिम रूप से इकट्ठा किया जाएगा, तब आप इसके एक सदस्य पाए जाएँ—ऐसा मिलन जिसमें न बिछड़ना होगा, न शोक, न आँसू। मसीह के एक सेवक और आपकी आत्मा के मित्र के नाते मैं कुछ मिनट आपसे "उसके सारे परिवार, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर है," के विषय में बात करता हूँ, उसे सुनिए:

I. सबसे पहले, यह परिवार क्या है?

II. दूसरे, इसकी वर्तमान स्थिति क्या है?

III. तीसरे, इसके भविष्य की आशाएँ क्या हैं?

मैं इन तीनों बातों को आपके सामने खोलकर रखना चाहता हूँ, और आपसे आग्रह करता हूँ कि आप इन पर गम्भीरता से विचार करें। पृथ्वी पर हमारे पारिवारिक मिलन एक दिन समाप्त होंगे ही। हमारा अन्तिम सांसारिक बड़ा दिन अवश्य आएगा। वह बड़ा दिन सचमुच धन्य है जो हमें परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार पाए!

I. वह परिवार क्या है जिसे बाइबल "उसका सारा परिवार, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर है" कहती है? इसमें कौन-कौन हैं?

हमारे सामने का यह परिवार सब सच्चे मसीहियों से बना है—उन सबसे जिनके भीतर पवित्र आत्मा वास करता है—मसीह में सब सच्चे विश्वासियों से—हर युग, कलीसिया, जाति और भाषा के सब पवित्र लोगों से। इसमें सब विश्वासयोग्य लोगों की धन्य मण्डली सम्मिलित है। यह वही है जो परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं—विश्वास का घराना—मसीह की रहस्यमय देह—दुल्हिन—जीवित मन्दिर—वे भेड़ें जो कभी नष्ट नहीं होतीं—पहिलौठों की कलीसिया—पवित्र सार्वभौमिक कलीसिया। ये सब वाक्यांश "परमेश्वर का परिवार" ही हैं, केवल दूसरे नामों से।

"परमेश्वर के परिवार" की सदस्यता किसी सांसारिक सम्बन्ध पर निर्भर नहीं है। यह स्वाभाविक जन्म से नहीं, परन्तु नए जन्म से मिलती है। सेवक इसे अपने सुननेवालों को नहीं दे सकते। माता-पिता इसे अपने बच्चों को नहीं दे सकते। आप देश के सबसे भक्त परिवार में जन्म ले सकते हैं, और अनुग्रह की ऐसी मधुरतम सहभागिता का आनन्द ले सकते हैं जो कोई भी कलीसिया दे सके, फिर भी कभी परमेश्वर के परिवार के नहीं हो सकते। उसका होने के लिए आपका नए सिरे से जन्म लेना अवश्य है। पवित्र आत्मा के सिवा और कोई आपको इस परिवार का जीवित अंग नहीं बना सकता। उन सब को, जिनका उद्धार होगा, सच्ची कलीसिया में लाना उसी का विशेष कार्य और अधिकार है। जो नए सिरे से जन्मे हैं, वे "न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।" [यूहन्ना 1:13]

क्या आप जानना चाहते हैं कि बाइबल सब सच्चे मसीहियों को यह नाम क्यों देती है? क्या आप जानना चाहेंगे कि उन्हें "एक परिवार" क्यों कहा जाता है? सुनिए, मैं आपको बताता हूँ।

(क) सच्चे मसीही "एक परिवार" इसलिए कहलाते हैं कि उन सबका एक ही पिता है।

वे सब मसीह यीशु में विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सन्तान हैं। वे सब एक ही आत्मा से जन्मे हैं। वे सब सर्वशक्तिमान प्रभु के पुत्र और पुत्रियाँ हैं। उन्होंने लेपालकपन की आत्मा पाई है, जिससे वे पुकारते हैं, "हे अब्बा, हे पिता।" [गलातियों 3:26; यूहन्ना 3:8; 2 कुरिन्थियों 6:18; रोमियों 8:15] वे परमेश्वर को ऐसे डरपोक भय से नहीं देखते, जैसे किसी कठोर हस्ती को देखा जाता है जो उन्हें दण्ड देने को सदा तैयार रहती हो। वे कोमल भरोसे के साथ उसकी ओर देखते हैं, जैसे मेल-मिलाप किए हुए और प्रेम करनेवाले माता-पिता की ओर देखा जाता है, जैसे उसकी ओर जो यीशु पर विश्वास करनेवाले सब लोगों के अधर्म और पाप को क्षमा करता है, और छोटे से छोटे और निर्बल से निर्बल पर भी तरस से भरा है। सच्चे मसीहियों के मुँह में "हे हमारे स्वर्गीय पिता" ये शब्द केवल प्रार्थना का कोई रूप-मात्र नहीं हैं। तब यह आश्चर्य की बात नहीं कि वे परमेश्वर का "परिवार" कहलाते हैं।

(ख) सच्चे मसीही "एक परिवार" इसलिए कहलाते हैं कि वे सब एक ही नाम में आनन्दित होते हैं।

वह नाम उनके महान सिर और बड़े भाई का नाम है, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह का। जैसे एक साझा पारिवारिक नाम किसी कुल के सब सदस्यों को जोड़नेवाली कड़ी होता है, वैसे ही यीशु का नाम सब विश्वासियों को एक विशाल परिवार में बाँध देता है। बाहरी दृश्य कलीसियाओं के सदस्य होने के नाते उनके अलग-अलग नाम और विभाजन हैं। परन्तु मसीह के जीवित अंग होने के नाते वे सब एक मन और एक चित्त होकर एक ही उद्धारकर्ता में आनन्दित होते हैं। उनमें से हर एक का हृदय यीशु की ओर, एकमात्र आशा के आधार के रूप में, खिंचा चला जाता है। उनमें से हर एक की जीभ तुम्हें बताएगी कि "मसीह ही सब कुछ है।" उन सब के लिए क्रूस पर उनके निमित्त मसीह की मृत्यु का विचार मधुर है। परमेश्वर के दाहिने हाथ पर उनके लिए मसीह की मध्यस्थता का विचार मधुर है। मसीह के फिर आने का विचार मधुर है, कि वह उन्हें अपने साथ एक महिमामय सहभागिता में सदा के लिए मिला लेगा। सच तो यह है कि विश्वासियों से मसीह का नाम छीन लेना वैसा ही है जैसे आकाश से सूर्य को हटा देना। संसार के लिए उसके नाम का शायद अधिक अर्थ न हो, परन्तु विश्वासियों के लिए वह शान्ति, आशा, विश्राम और कुशल से भरा है। तब यह आश्चर्य की बात नहीं कि वे "एक परिवार" कहलाते हैं।

(ग) सबसे बढ़कर, सच्चे मसीही "एक परिवार" इसलिए कहलाते हैं कि उनमें पारिवारिक समानता इतनी प्रबल है।

वे सब एक ही आत्मा की अगुवाई में चलते हैं, और जीवन, हृदय, रुचि और चरित्र के एक-से सामान्य लक्षणों से पहचाने जाते हैं। जैसे किसी परिवार के भाई-बहनों में एक सामान्य शारीरिक समानता होती है, वैसे ही सर्वशक्तिमान प्रभु के सब पुत्रों और पुत्रियों में एक सामान्य आत्मिक समानता होती है। वे सब पाप से घृणा करते और परमेश्वर से प्रेम रखते हैं। वे सब उद्धार की अपनी आशा मसीह पर टिकाते हैं, और अपने आप पर कोई भरोसा नहीं रखते। वे सब "निकल आने और अलग रहने" का, अर्थात् संसार की रीतियों से अलग होने का, और ऊपर की वस्तुओं पर मन लगाने का प्रयत्न करते हैं। वे सब स्वभाव से उसी बाइबल की ओर मुड़ते हैं, जो उनकी आत्मा का एकमात्र भोजन और स्वर्ग की ओर उनकी यात्रा का एकमात्र निश्चित पथ-प्रदर्शक है: वे उसे "अपने पाँव के लिए दीपक और अपने मार्ग के लिए उजियाला" पाते हैं। [भजन संहिता 119:105] वे सब प्रार्थना में अनुग्रह के उसी सिंहासन के पास जाते हैं, और परमेश्वर से बातें करना उन्हें साँस लेने जितना ही आवश्यक लगता है। वे सब एक ही नियम, अर्थात् परमेश्वर के वचन, के अनुसार जीते हैं, और अपने दैनिक जीवन को उसकी आज्ञाओं के अनुरूप बनाने का यत्न करते हैं। उन सब का भीतरी अनुभव एक-सा है। वे सब, भिन्न-भिन्न मात्रा में, मन फिराव, विश्वास, आशा, प्रेम, दीनता और भीतरी संघर्ष से परिचित हैं। तब यह आश्चर्य की बात नहीं कि वे "एक परिवार" कहलाते हैं।

सच्चे विश्वासियों में यह पारिवारिक समानता विशेष ध्यान देने योग्य बात है। मेरे अपने विचार में यह मसीही विश्वास की सच्चाई के सबसे सुदृढ़ अप्रत्यक्ष प्रमाणों में से एक है। यह पवित्र आत्मा के कार्य की वास्तविकता के सबसे बड़े प्रमाणों में से एक है। कुछ सच्चे मसीही सभ्य देशों में रहते हैं, और कुछ मूर्तिपूजक देशों के बीच। कुछ बहुत पढ़े-लिखे हैं, और कुछ वर्णमाला का एक अक्षर भी नहीं पढ़ सकते। कुछ धनी हैं और कुछ निर्धन। कुछ बूढ़े हैं और कुछ जवान। फिर भी इन सब भिन्नताओं के होते हुए उनके हृदय और चरित्र में एक आश्चर्यजनक एकता पाई जाती है। उनके सुख और दुःख, उनका प्रेम और घृणा, उनकी पसन्द और नापसन्द, उनके झुकाव और विरोध, उनकी आशाएँ और भय, सब आश्चर्यजनक रूप से एक-से हैं। दूसरे जो चाहें सोचें, मैं इन सब में परमेश्वर की उँगली देखता हूँ। उसकी रचना सदा एक ही जैसी होती है। तब यह आश्चर्य की बात नहीं कि सच्चे मसीहियों की तुलना "एक परिवार" से की जाती है।

एक परिवर्तित अंग्रेज़ और एक परिवर्तित हिन्दू को लीजिए, और उन्हें अचानक पहली बार मिलने दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यदि वे एक-दूसरे की भाषा समझ सकें, तो शीघ्र ही उन्हें अपने बीच साझी भूमि मिल जाएगी, और वे अपनापन अनुभव करेंगे। एक का पालन-पोषण ऑक्सफ़ोर्ड में हुआ हो सकता है, और उसने अंग्रेज़ी सभ्यता के हर लाभ का आनन्द उठाया होगा। दूसरे का प्रशिक्षण घोर मूर्तिपूजा के बीच हुआ हो सकता है, और वह ऐसी आदतों, रीतियों और व्यवहारों का अभ्यस्त रहा होगा जो अंग्रेज़ की आदतों से उतने ही भिन्न हैं जितना अन्धकार उजियाले से भिन्न है। फिर भी अब आधे घण्टे में वे अनुभव करते हैं कि वे मित्र हैं! अंग्रेज़ पाता है कि इस हिन्दू भाई के साथ उसकी साझी बातें उसके अपने अनेक पुराने कॉलेज-साथियों से भी अधिक हैं। इसका कारण कौन बता सकता है? इसकी व्याख्या कैसे हो सकती है? पवित्र आत्मा की शिक्षा की एकता के सिवा और कुछ इसे नहीं समझा सकता। यह अनुग्रह का (स्वभाव का नहीं) "एक ही स्पर्श" है, जो "सारे संसार को एक परिवार बना देता है।" परमेश्वर के लोग सबसे उज्ज्वल अर्थ में "एक परिवार" हैं।

यही वह परिवार है जिसकी ओर मैं इस लेख में अपने पाठकों का ध्यान दिलाना चाहता हूँ। यही वह परिवार है जिसके सदस्य मैं आपको बनते देखना चाहता हूँ। यदि आपने पहले कभी इस पर विचार नहीं किया, तो मैं आज आपसे कहता हूँ कि इस पर ध्यानपूर्वक विचार करें। मैंने आपको इस परिवार का पिता दिखाया है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता। मैंने आपको इस परिवार का सिर और बड़ा भाई दिखाया है, अर्थात् स्वयं प्रभु यीशु। मैंने आपको इस परिवार के लक्षण और विशेषताएँ दिखाई हैं। इसके सब सदस्यों में समानता के बड़े चिह्न हैं। मैं फिर कहता हूँ, इस पर भली-भाँति विचार करें।

ध्यान रहे, इस परिवार से बाहर कोई उद्धार नहीं है। बाइबल के अनुसार जो इसके सदस्य नहीं हैं, उनमें से कोई भी उस मार्ग पर नहीं है जो स्वर्ग को पहुँचाता है। हमारी आत्माओं का उद्धार किसी एक कलीसिया से जुड़ने या दूसरी से अलग होने पर निर्भर नहीं करता। जो लोग ऐसा सोचते हैं वे बुरी तरह धोखे में हैं, और यदि वे जाग न उठे तो किसी दिन अपनी हानि से इसे जानेंगे। नहीं! हमारी आत्माओं का जीवन किसी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बात पर निर्भर है। अनन्त जीवन यही है कि हम "स्वर्ग और पृथ्वी के सारे परिवार" के सदस्य हों।

II. अब मैं उस दूसरी बात पर आता हूँ जिस पर विचार करने की मैंने प्रतिज्ञा की थी। स्वर्ग और पृथ्वी के सारे परिवार की वर्तमान स्थिति क्या है?

जिस परिवार की ओर मैं आज अपने पाठकों का ध्यान दिला रहा हूँ, वह दो बड़े भागों में बँटा हुआ है। प्रत्येक भाग का अपना निवास स्थान है। परिवार का एक भाग स्वर्ग में है और एक भाग पृथ्वी पर। इस समय दोनों भाग एक दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। फिर भी परमेश्वर की दृष्टि में, दो स्थानों में रहने पर भी, वे एक ही देह हैं; और उनका मिलन किसी दिन निश्चय ही होगा।

स्मरण रखो, परमेश्वर के परिवार के सदस्य दो स्थानों में हैं, और केवल दो में। बाइबल हमें किसी तीसरे निवास स्थान के विषय में नहीं बताती। शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) जैसी कोई बात है ही नहीं, चाहे कुछ लोग झूठ ही क्यों न सिखाएँ! जो लोग मरते समय सच्चे मसीही नहीं होते, उनके लिए शुद्ध किए जाने, प्रशिक्षण पाने या परखे जाने का कोई घर नहीं है। नहीं! परिवार के केवल दो भाग हैं: वह भाग जो दिखाई देता है और वह जो दिखाई नहीं देता, वह जो "स्वर्ग" में है और वह जो "पृथ्वी" पर है। परिवार के जो सदस्य स्वर्ग में नहीं हैं वे पृथ्वी पर हैं, और जो पृथ्वी पर नहीं हैं वे स्वर्ग में हैं। दो भाग, और केवल दो! दो स्थान, और केवल दो! इसे कभी न भूलना।

परमेश्वर के परिवार के कुछ सदस्य स्वर्ग में सुरक्षित हैं। वे उस स्थान में विश्राम कर रहे हैं जिसे प्रभु यीशु ने स्पष्ट रूप से "स्वर्गलोक" कहा है। [लूका 23:43] उन्होंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है। उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ ली है। उन्होंने अपना ठहराया हुआ काम पूरा कर लिया है। उन्होंने अपने पाठ सीख लिए हैं। उन्होंने अपना क्रूस उठा लिया है। वे इस कष्टदायक संसार की लहरों में से होकर बन्दरगाह तक पहुँच गए हैं। उनके विषय में हम बहुत कम जानते हैं, फिर भी इतना जानते हैं कि वे सुखी हैं। अब पाप और परीक्षा उन्हें नहीं सताते। उन्होंने निर्धनता और चिन्ता को, पीड़ा और रोग को, शोक और आँसुओं को सदा के लिए विदा कह दिया है। वे स्वयं मसीह के साथ हैं, जिसने उनसे प्रेम किया और उनके लिए अपने आप को दे दिया, और उसकी संगति में वे सचमुच बहुत सुखी हैं। [फिलिप्पियों 1:23] अतीत की ओर देखने में उन्हें कुछ भय नहीं। आनेवाली बातों की ओर देखने में उन्हें कुछ डर नहीं। उनके सुख को पूरा करने के लिए केवल तीन बातों की कमी है: मसीह का महिमा में दूसरी बार आना, उनकी अपनी देहों का पुनरुत्थान, और सब विश्वासियों का एकत्र किया जाना।

परमेश्वर के परिवार के कुछ सदस्य अभी पृथ्वी पर हैं। वे दुष्ट संसार के बीच सब ओर बिखरे हुए हैं, कुछ एक स्थान में और कुछ दूसरे में। सब अपने-अपने अनुग्रह के परिमाण के अनुसार न्यूनाधिक एक ही प्रकार से लगे हुए हैं। सब दौड़ दौड़ रहे हैं, काम कर रहे हैं, लड़ाई लड़ रहे हैं, क्रूस उठा रहे हैं, पाप से जूझ रहे हैं, शैतान का सामना कर रहे हैं, शरीर को क्रूस पर चढ़ा रहे हैं, संसार से संघर्ष कर रहे हैं, मसीह की गवाही दे रहे हैं, अपने मन के कारण विलाप कर रहे हैं, और अपनी आत्माओं के जीवन के लिए, चाहे कितनी ही निर्बलता से, सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं और प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें से हर एक प्रायः यही सोचता है कि उसके क्रूस जैसा भारी कोई क्रूस नहीं, उसके काम जैसा कठिन कोई काम नहीं, उसके मन जैसा कठोर कोई मन नहीं। फिर भी हर एक अपने मार्ग पर दृढ़ बना रहता है; आसपास के अज्ञानी संसार के लिए आश्चर्य की बात, और प्रायः अपने लिए भी आश्चर्य की बात।

परन्तु परमेश्वर का परिवार इस समय पृथ्वी पर चाहे कितना ही बँटा हुआ क्यों न हो, फिर भी वह एक ही परिवार है। इसके दोनों भाग अब भी चरित्र में एक हैं, अधिकार में एक हैं, और परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में एक हैं। स्वर्ग में रहनेवाले भाग को पृथ्वी पर रहनेवाले भाग से उतनी श्रेष्ठता प्राप्त नहीं जितनी पहली दृष्टि में दिखाई देती है। दोनों के बीच का अन्तर केवल मात्रा का है।

(क) परिवार के दोनों भाग एक ही उद्धारकर्ता से प्रेम करते हैं, और परमेश्वर की एक ही सिद्ध इच्छा में आनन्दित होते हैं। परन्तु पृथ्वी पर रहनेवाला भाग बहुत अपूर्णता और निर्बलता के साथ प्रेम करता है, और देखकर नहीं, विश्वास से जीता है। स्वर्ग में रहनेवाला भाग बिना निर्बलता, सन्देह या भटकाव के प्रेम करता है। वह विश्वास से नहीं, देखकर चलता है, और जिस पर पहले विश्वास करता था उसे अब देखता है।

(ख) परिवार के दोनों भाग पवित्र लोग हैं। परन्तु पृथ्वी के पवित्र लोग प्रायः दीन थके हुए यात्री हैं, जो पाते हैं कि "शरीर आत्मा के विरोध में और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं, इसलिए जो तुम करना चाहते हो वह नहीं करते।" [गलातियों 5:17] वे बुरे संसार के बीच जीते हैं, और प्रायः अपने आप से और अपने आसपास के पाप से ऊब जाते हैं। इसके विपरीत स्वर्ग के पवित्र लोग संसार, शरीर और शैतान से छुड़ाए जा चुके हैं और महिमामय स्वतंत्रता का आनन्द लेते हैं। वे "सिद्ध किए हुए धर्मियों की आत्माएँ" कहलाते हैं। [इब्रानियों 12:23]

(ग) परिवार के दोनों भाग समान रूप से परमेश्वर की सन्तान हैं। परन्तु स्वर्ग में रहनेवाली सन्तान ने अपने सब पाठ सीख लिए हैं, अपने ठहराए हुए काम पूरे कर लिए हैं, और अनन्त छुट्टी आरम्भ कर दी है। पृथ्वी पर रहनेवाली सन्तान अब भी पाठशाला में है। वे प्रतिदिन बुद्धि सीख रहे हैं, यद्यपि धीरे-धीरे और बहुत कठिनाई से, और अपने पिछले पाठों को याद दिलाने के लिए उन्हें प्रायः ताड़ना और छड़ी की आवश्यकता पड़ती है। उनके दीक्षान्त का दिन अभी आना है।

(घ) परिवार के दोनों भाग समान रूप से परमेश्वर के सैनिक हैं। परन्तु पृथ्वी के सैनिक अब भी युद्ध में लगे हैं। उनकी लड़ाई समाप्त नहीं हुई। उन्हें प्रतिदिन परमेश्वर के सारे हथियार बाँधने की आवश्यकता है। स्वर्ग के सैनिक सब विजयी हैं। अब कोई शत्रु उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता। शैतान का कोई जलता हुआ तीर उन तक नहीं पहुँच सकता। उन्होंने टोप और ढाल दोनों उतार दी हैं। वे अन्त में आत्मा की तलवार से कह सकते हैं, "विश्राम कर और शान्त रह।" अन्ततः वे बैठ सकते हैं, और उन्हें जागते रहने और चौकसी में खड़े रहने की आवश्यकता नहीं।

(इ) अन्तिम बात, परन्तु कम महत्त्व की नहीं, यह कि परिवार के दोनों भाग समान रूप से सुरक्षित और निरापद हैं। यह चाहे कितना ही अद्भुत सुनाई दे, परन्तु सत्य है। मसीह को अपने पृथ्वी के परिवार-जनों की उतनी ही चिन्ता है जितनी स्वर्ग के परिवार-जनों की। तुम आकाश से तारों को तोड़ लाने की बात भी सोच सकते हो, पर मसीह के हाथ से किसी एक सन्त को, चाहे वह कितना ही निर्बल क्यों न हो, छीन लेने की बात न सोचो। परिवार के दोनों भाग "एक सदा की वाचा" के द्वारा, जो "सब बातों में अच्छी रीति से स्थिर और पक्की की गई है," समान रूप से सुरक्षित हैं। [2 शमूएल 23:5] पृथ्वी के सदस्य अपने शरीर की निर्बलता और अपने विश्वास की थोड़ाई के कारण हो सकता है अपनी सुरक्षा को न देखें, न जानें, न अनुभव करें। परन्तु वे सुरक्षित हैं, चाहे वे इसे न देख पाएँ। सारा परिवार "परमेश्वर की सामर्थ्य से उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाला है, विश्वास के द्वारा रखा जाता है।" [1 पतरस 1:5] पिता के घर की ओर यात्रा करनेवाले परिवार-जन उतने ही सुरक्षित हैं जितने वे जो घर पहुँच चुके हैं। अन्तिम दिन कोई भी खोया हुआ न पाया जाएगा। मसीही कवि के ये शब्द सत्य ठहरेंगे:

"अधिक सुखी, परन्तु अधिक सुरक्षित नहीं,

स्वर्ग में महिमा पाए हुए सन्त हैं।"

अब इस विषय के इस भाग को छोड़ने से पहले, मैं इस लेख के प्रत्येक पाठक से आग्रह करता हूँ कि वह परमेश्वर के परिवार की वर्तमान स्थिति को भली-भाँति समझे और उसका सही अनुमान लगाए। उसकी संख्या या उसके विशेषाधिकारों को उससे मत नापो जो तुम अपनी आँखों से देखते हो। इस समय तुम विश्वासियों की केवल एक छोटी सी मण्डली देखते हो। परन्तु तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक बड़ी संख्या पहले ही सकुशल स्वर्ग पहुँच चुकी है, और जब अन्तिम दिन सब इकट्ठे होंगे तो "एक ऐसी बड़ी भीड़ होगी जिसे कोई गिन नहीं सकता।" [प्रकाशित वाक्य 7:9]

तुम परिवार के केवल उसी भाग को देखते हो जो पृथ्वी पर संघर्ष कर रहा है। तुम्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि परिवार का बड़ा भाग पहले ही घर पहुँच चुका है और स्वर्ग में विश्राम कर रहा है। तुम संघर्षरत भाग को देखते हो, पर विजयी भाग को नहीं। तुम उस भाग को देखते हो जो क्रूस उठाए हुए है, पर उसे नहीं जो परादीस में सुरक्षित है। परमेश्वर का परिवार उससे कहीं अधिक धनी और महिमामय है जितना तुम सोचते हो। मेरी मानो, "स्वर्ग और पृथ्वी के सारे परिवार" का सदस्य होना कोई छोटी बात नहीं है।

III. अब मैं उस अन्तिम बात की ओर बढ़ता हूँ जिस पर विचार करने की मैंने प्रतिज्ञा की थी—स्वर्ग और पृथ्वी के सारे परिवार का भविष्य क्या है?

किसी परिवार का भविष्य! जब हम संसार में दिखाई देनेवाले किसी भी परिवार को देखते हैं तो ये शब्द कितनी अनिश्चितता को खोल देते हैं! हम में से किसी पर आनेवाली बातों के विषय में हम कितना कम जानते हैं! यह कैसी दया है कि हमारे संसार से चले जाने के बाद हमारे प्रिय बच्चों को जिन दुःखों, परीक्षाओं और बिछोड़ों का अनुभव करना पड़ेगा, उन्हें हम नहीं जानते! यह दया है कि हम नहीं जानते कि "एक दिन में क्या होगा," और इससे भी बड़ी दया यह है कि हम नहीं जानते कि आनेवाले बीस वर्षों में क्या हो सकता है। [नीतिवचन 27:1] निश्चय ही, अपने घराने के भविष्य का पूर्वज्ञान अनेक पारिवारिक सभाओं का आनन्द बिगाड़ देता और सारी मण्डली को उदासी से भर देता!

सोचो, कितने ही सुन्दर बालक, जो अब अपने माता-पिता के आनन्द का कारण हैं, समय आने पर किसी लापरवाह पुत्र के मार्ग पर चलेंगे और कभी घर नहीं लौटेंगे! सोचो, कितनी ही सुन्दर पुत्रियाँ, जो माता के हृदय का आनन्द हैं, कुछ ही वर्षों में अपनी हठीली इच्छा के पीछे चलेंगी और किसी अत्यन्त दुःखदायी भूल-भरे विवाह पर अड़ जाएँगी! सोचो, रोग और पीड़ा कितनी बार परिवार के सबसे प्यारे सदस्य को गिरा देती है और उसके जीवन को उसके अपने लिये, यदि दूसरों के लिये नहीं तो, बोझ और थकानेवाला बना देती है! सोचो, धन-सम्बन्धी बातों से कितने अनगिनत मतभेद और फूट उत्पन्न होते हैं! हाँ, एक छोटी सी रकम को लेकर उन लोगों के बीच, जो कभी एक ही बच्चों के कमरे में आनन्द से खेले थे, कितने ही जीवन-भर के झगड़े चलते हैं! इन बातों पर विचार करो। हर बड़े दिन पर इकट्ठा होनेवाले अनेक परिवारों का "भविष्य" एक गम्भीर और गहन विषय है। कम से कम सैकड़ों ऐसे हैं जो अन्तिम बार इकट्ठे हो रहे हैं: जब वे बिछड़ेंगे तो फिर कभी नहीं मिलेंगे।

परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि एक ऐसा बड़ा परिवार है जिसका "भविष्य" बहुत भिन्न है। यह वही परिवार है जिसकी चर्चा मैं इस लेख में कर रहा हूँ और जिस पर तुम्हारा ध्यान दिलाता हूँ। परमेश्वर के परिवार का भविष्य अनिश्चित नहीं है। वह उत्तम है, केवल उत्तम; सुखद है, केवल सुखद। मेरी सुनो, और मैं उसे तुम्हारे सामने क्रम से रखने का प्रयत्न करूँगा।

(अ) परमेश्वर के परिवार के सब सदस्य एक दिन सकुशल घर पहुँचा दिए जाएँगे।

यहाँ पृथ्वी पर वे बिखरे हुए, परखे हुए, जीवन की आँधियों से डगमगाते और क्लेशों से झुके हुए हो सकते हैं। परन्तु उनमें से एक भी नाश न होगा। [यूहन्ना 10:28] सबसे निर्बल मेम्ना भी जंगल में नाश होने के लिये न छोड़ा जाएगा: अन्तिम दिन जब नाम पुकारा जाएगा तो सबसे दुर्बल सन्तान भी अनुपस्थित न होगी। संसार, शरीर और शैतान के होते हुए भी सारा परिवार घर पहुँचेगा। "क्योंकि बैरी होने की दशा में जब उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप हुआ, तो मेल-मिलाप हो जाने पर हम उसके जीवन के कारण और भी क्यों न उद्धार पाएँगे!" [रोमियों 5:10]

(आ) परमेश्वर के परिवार के सब सदस्यों की देह एक दिन महिमामय होगी।

जब प्रभु यीशु मसीह दूसरी बार आएगा, तब मरे हुए सन्त सब जिलाए जाएँगे और जीवित सब बदल दिए जाएँगे। उनकी देह फिर निकम्मी नश्वर देह न रहेगी जो निर्बलताओं और दुर्बलताओं से भरी है: उनकी देह अपने जी उठे प्रभु की देह के समान होगी, जिसमें रोग और पीड़ा की कोई सम्भावना नहीं। जब वे परमेश्वर की सेवा करना चाहेंगे तब वे दुखती हुई देह से रुकावट और बोझ न पाएँगे: वे बिना किसी थकान के रात-दिन उसकी सेवा कर सकेंगे और बिना किसी विघ्न के उसकी ओर ध्यान लगा सकेंगे। पहली बातें जाती रहेंगी। यह वचन पूरा होगा, "देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!" [प्रकाशित वाक्य 21:5]

(इ) एक दिन परमेश्वर के परिवार के सब सदस्य एक ही मण्डली में इकट्ठे किए जाएँगे।

इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कहाँ रहे या कहाँ मरे। समय और स्थान दोनों के कारण वे एक-दूसरे से अलग रहे होंगे। कोई अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ तम्बुओं में रहा होगा, तो कोई हमारे आज के युग के आधुनिक यातायात के साधनों से यात्रा करता रहा होगा। किसी की अस्थियाँ ऑस्ट्रेलिया के किसी रेगिस्तान में विश्राम कर रही होंगी, तो किसी को इंग्लैंड के किसी कब्रिस्तान में दफ़नाया गया होगा। इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता। सब के सब उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम से इकट्ठे किए जाएँगे और एक आनन्दित सभा में मिलेंगे, और फिर कभी अलग न होंगे। परमेश्वर के परिवार का पृथ्वी पर बिछुड़ना केवल कुछ दिनों के लिए है। उनका मिलन अनन्तकाल के लिए है। हम कहाँ रहते हैं, इसका बहुत कम महत्त्व है। यह अभी बिखरने का समय है, इकट्ठा होने का नहीं। हम कहाँ मरते हैं, इसका भी बहुत कम महत्त्व है। सब क़ब्रें स्वर्गलोक से समान दूरी पर हैं। परन्तु यह बहुत महत्त्व रखता है कि हम परमेश्वर के परिवार के हैं या नहीं। यदि हैं, तो अन्त में हमारा फिर मिलना निश्चित है।

(घ) एक दिन परमेश्वर के परिवार के सब सदस्य मन और विचार में एक हो जाएँगे।

वे अभी बहुत-सी छोटी-छोटी बातों में बँटे हुए हैं। उद्धार के लिए आवश्यक बातों के विषय में उनके बीच अद्भुत एकता है। धर्म के बहुत-से अनुमान-आधारित विषयों में, आराधना के रूपों और कलीसिया के संचालन के विषय में, वे अकसर दुःखद रूप से असहमत होते हैं। परन्तु एक दिन उनके बीच कोई असहमति न रहेगी। एप्रैम फिर यहूदा को न सताएगा, और न यहूदा एप्रैम को। अधूरा ज्ञान और धुँधला दर्शन सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। फूट और अलगाव, ग़लतफ़हमियाँ और ग़लत व्याख्याएँ, सब दफ़न होकर भुला दी जाएँगी। जैसे वहाँ एक ही भाषा होगी, वैसे ही एक ही मत होगा। अन्त में, हज़ारों वर्षों के संघर्ष और टकराव के बाद, पूर्ण एकता और मेल पाया जाएगा। अन्ततः स्वर्गदूतों और मनुष्यों को एक ऐसा परिवार दिखाया जाएगा जिसके सब सदस्य एक मन के हैं।

(ङ) एक दिन परमेश्वर के परिवार के सब सदस्य पवित्रता में सिद्ध किए जाएँगे।

वे अभी अक्षरशः सिद्ध नहीं हैं, यद्यपि वे "मसीह में परिपूर्ण किए गए हैं।" [कुलुस्सियों 2:10] यद्यपि वे नया जन्म पा चुके हैं और मसीह के स्वरूप में नए किए गए हैं, फिर भी वे बहुत बातों में लड़खड़ाते और चूक जाते हैं। [याकूब 3:2] यह बात वे स्वयं सबसे अच्छी तरह जानते हैं। यह उनके लिए दुःख और शोक की बात है कि वे परमेश्वर से अधिक सच्चे मन से प्रेम नहीं करते और उसकी अधिक विश्वासयोग्यता से सेवा नहीं करते। परन्तु एक दिन वे सब प्रकार की भ्रष्टता से पूरी तरह मुक्त कर दिए जाएँगे। वे मसीह के दूसरे आगमन पर उन रोगों और बीमारियों के बिना जी उठेंगे जो अभी उनके जीवन में उनसे चिपकी हुई हैं। उनमें न कोई बुरा स्वभाव पाया जाएगा, न कोई भ्रष्ट प्रवृत्ति। उनका प्रभु और पति उन्हें पिता के सामने ऐसा उपस्थित करेगा कि उनमें न कोई दाग़ होगा, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु; वे पूर्ण रूप से पवित्र और निर्दोष होंगे, चन्द्रमा के समान सुन्दर और सूर्य के समान निर्मल। [इफिसियों 5:27, श्रेष्ठगीत 5:10]

अनुग्रह अभी भी एक सुन्दर वस्तु है, जब वह अपूर्णता के बीच जीवित रहता, चमकता और फलता-फूलता है। परन्तु जब वह शुद्ध, बिना मिलावट, बिना मेल और अकेला दिखाई देगा, तब वह और कितना अधिक सुन्दर प्रतीत होगा! और वह तब ऐसा ही दिखाई देगा जब मसीह अन्तिम दिन अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने के लिए आएगा।

(च) अन्तिम बात, परन्तु कम महत्त्व की नहीं: एक दिन परमेश्वर के परिवार के सदस्यों के लिए अनन्तकाल तक प्रबन्ध किया जाएगा।

जब इस पापमय संसार के सब कामों का अन्तिम रूप से निपटारा हो जाएगा, तब सर्वशक्तिमान प्रभु के सब पुत्रों और पुत्रियों के लिए सदा का प्रतिफल होगा। उनमें से सबसे निर्बल भी अनदेखा और भुलाया हुआ न रहेगा। हर एक के लिए उसकी विश्वासयोग्यता के अनुसार कुछ न कुछ होगा। अनुग्रह का सबसे छोटा पात्र भी, सबसे बड़े पात्र के समान, महिमा से लबालब भर दिया जाएगा। उस महिमा और प्रतिफल के ठीक स्वरूप का वर्णन करने का दावा करना निरी मूर्खता होगी। यह ऐसी वस्तु है जिसे "न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी मन में समाई।" [1 कुरिन्थियों 2:9] हमारे लिए इतना जानना पर्याप्त है कि परमेश्वर के परिवार का हर सदस्य, जब वह क़ब्र से अपने स्वामी के स्वरूप में जागेगा, "तृप्त" होगा। [भजन संहिता 17:15] सबसे बढ़कर, यह जानना पर्याप्त होगा कि उनका आनन्द, उनकी महिमा और उनका प्रतिफल सदा के लिए होगा। जो कुछ उन्हें प्रभु के दिन मिलेगा, उसे वे कभी न खोएँगे। उनके सयाने होने पर उनके लिए जो मीरास रखी गई है, वह "ऐसी मीरास है जो कभी नाश नहीं होती, कभी मैली नहीं होती और कभी मुर्झाती नहीं।" [1 पतरस 1:4]

परमेश्वर के परिवार की ये आशाएँ बड़ी वास्तविकताएँ हैं। ये मनुष्य की गढ़ी हुई अस्पष्ट, छायामयी बातें नहीं हैं। ये सच्ची और यथार्थ बातें हैं, और थोड़े ही समय में वैसी ही दिखाई देंगी। ये आपके गम्भीर विचार के योग्य हैं। इन्हें भली-भाँति जाँचिए।

संसार के उन परिवारों पर दृष्टि डालिए जिन्हें आप जानते हैं—सबसे धनी, सबसे बड़े, सबसे कुलीन और सबसे सुखी। क्या उन सबमें आप कोई ऐसा परिवार पाएँगे जो उन आशाओं की तुलना में ठहर सके जिनके विषय में आपने अभी सुना? पृथ्वी का धन अनेक मामलों में सौ वर्ष या उसके आसपास में समाप्त हो जाएगा। कुलीन रक्त अनेक मामलों में किसी लज्जाजनक कर्म को परिवार के नाम पर कलंक लगाने से नहीं रोकेगा। सुख अनेक मामलों में खोखला और भ्रामक पाया जाएगा। सचमुच ऐसे घर बहुत थोड़े हैं जिनमें कोई गुप्त दुःख, या अलमारी में छिपा हुआ कंकाल न हो। वर्तमान सम्पत्ति की दृष्टि से हो या भविष्य की आशाओं की दृष्टि से, कोई भी परिवार "स्वर्ग और पृथ्वी पर परमेश्वर के सारे परिवार" के समान सम्पन्न नहीं है। चाहे आप यह देखें कि उनके पास अभी क्या है, या यह कि स्वर्ग में उनके पास क्या होगा, परमेश्वर के परिवार जैसा कोई परिवार नहीं है।

मेरा काम पूरा हुआ। मेरा लेख समाप्ति पर आ रहा है। अब केवल इतना शेष है कि इसे व्यावहारिक उपयोग के कुछ शब्दों के साथ समाप्त करूँ। अन्तिम बार मेरी ओर ध्यान दीजिए। परमेश्वर करे कि जो मैं कहने जा रहा हूँ उस पर आपकी आत्मा की भलाई के लिए आशीष दे!

(1) मैं आपसे एक सीधा-सा प्रश्न पूछता हूँ। वर्ष के किसी भी समय जिस किसी पारिवारिक सभा में आप जाएँ, इसे अपने साथ ले जाइए। इसे साथ ले जाइए, और अपने सारे आनन्द के बीच इस पर सोचने के लिए समय निकालिए। यह प्रश्न सीधा-सा है, परन्तु गम्भीर है: क्या आप सचमुच परमेश्वर के परिवार के हैं?

परमेश्वर के परिवार से, स्मरण रखो! मेरे प्रश्न का यही मुख्य बिन्दु है। यह कहना कोई उत्तर नहीं कि तुम प्रोटेस्टेंट हो, या अमुक सम्प्रदाय के सदस्य हो, या इंजीलवादी हो। मैं इससे कुछ अधिक और उत्तम सुनना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे पास ऐसा धर्म हो जो आत्मा को तृप्त करे और आत्मा का उद्धार करे। ऐसा धर्म जो जीवित रहते हुए तुम्हें शान्ति दे, और मरते समय आशा दे। ऐसी शान्ति और आशा पाने के लिए तुम्हें प्रोटेस्टेंट, या अमुक सम्प्रदाय का सदस्य, या इंजीलवादी होने से कुछ अधिक होना चाहिए। तुम्हें "परमेश्वर के परिवार" का होना चाहिए। मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि तुम्हारे आस-पास हज़ारों लोग उस परिवार के नहीं हैं। परन्तु यह कोई कारण नहीं कि तुम भी उसके न हो।

यदि तुम अभी तक परमेश्वर के परिवार के नहीं हो, तो मैं आज ही तुम्हें निमंत्रण देता हूँ कि बिना विलम्ब उसमें सम्मिलित हो जाओ। अपनी आँखें खोलो कि अपनी आत्मा का मूल्य, पाप की भयानकता, परमेश्वर की पवित्रता, तुम्हारी वर्तमान दशा का वर्तमान संकट, और एक सामर्थी परिवर्तन की पूर्ण आवश्यकता देख सको। इन बातों को देखने के लिए अपनी आँखें खोलो, और आज ही मन फिराओ। अपनी आँखें खोलो कि परमेश्वर के परिवार के महान शिरोमणि, अर्थात् यीशु मसीह को देख सको, जो तुम्हारी आत्मा का उद्धार करने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है। देखो कि उसने तुमसे कैसा प्रेम किया, तुम्हारे लिए जीवन बिताया, तुम्हारे लिए प्राण दिया, तुम्हारे लिए फिर जी उठा, और तुम्हारे लिए पूर्ण छुटकारा प्राप्त किया। देखो कि यदि तुम केवल उस पर विश्वास करो तो वह तुम्हें मुफ़्त, पूर्ण और तुरन्त क्षमा देता है। इन बातों को देखने के लिए अपनी आँखें खोलो। तुरन्त मसीह को खोजो। आओ और उस पर विश्वास करो, और आज ही अपनी आत्मा को उसकी देखरेख में सौंप दो।

मैं तुम्हारे परिवार या तुम्हारे बीते जीवन के विषय में कुछ नहीं जानता। मैं नहीं जानता कि तुम छुट्टियाँ बिताने कहाँ जाते हो, या किनकी संगति में रहनेवाले हो। परन्तु मैं निःसंकोच कहता हूँ कि यदि तुम परमेश्वर के परिवार में सम्मिलित हो जाओ तो उसे संसार का सबसे उत्तम और सबसे सुखी परिवार पाओगे।

(2) यदि तुम सचमुच स्वर्ग और पृथ्वी के सम्पूर्ण परिवार के हो, तो अपने विशेषाधिकारों को गिनो, और अधिक धन्यवादी होना सीखो। स्मरण करो कि यह कितनी बड़ी दया है कि तुम्हारे पास ऐसी वस्तु है जिसे संसार न दे सकता है, न छीन सकता है—ऐसी वस्तु जो तुम्हें बीमारी और निर्धनता से स्वतन्त्र कर देती है—ऐसी वस्तु जो सदा के लिए तुम्हारी अपनी है। पुराना पारिवारिक घर शीघ्र ही खाली होकर बिकने को होगा। पुराने पारिवारिक मिलन शीघ्र ही बीतकर सदा के लिए चले जाएँगे। जिन प्रिय मुखों को हम अब निहारकर आनन्दित होते हैं, वे तेज़ी से हमें छोड़ते जा रहे हैं। जो प्रसन्न स्वर अब हमारा स्वागत करते हैं, वे कब्र में मौन हो जाएँगे। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, यदि हम मसीह के परिवार के हैं तो एक इससे उत्तम मिलन अभी आने को है। हम उसके विषय में बार-बार सोचें, और धन्यवादी हों!

परमेश्वर के सब लोगों का पारिवारिक मिलन उस सब की भरपाई कर देगा जो उनका धर्म उन्हें अब चुकाना पड़ता है। ऐसा मिलन जिसमें कोई अनुपस्थित नहीं—ऐसा मिलन जिसमें कोई रिक्त स्थान या खाली जगह नहीं—ऐसा मिलन जिसमें कोई आँसू नहीं—ऐसा मिलन जिसमें कोई बिछड़ना नहीं—ऐसा मिलन संघर्ष और युद्ध के योग्य है। और ऐसा मिलन "स्वर्ग और पृथ्वी के सम्पूर्ण परिवार" के लिए अभी आनेवाला है।

इस बीच हम उस परिवार के योग्य जीवन बिताने का प्रयत्न करें जिसके हम हैं। हम परिश्रम करें कि कुछ ऐसा न करें जिससे हमारे पिता के घर की निन्दा हो। हम अपने स्वभाव, आचरण और बातचीत से अपने स्वामी के नाम को शोभायमान करने का यत्न करें। हम भाइयों के समान प्रेम रखें, और सब झगड़ों से घृणा करें। हम ऐसा व्यवहार करें मानो "परिवार" का आदर हमारे व्यवहार पर निर्भर हो।

ऐसा जीवन बिताते हुए, परमेश्वर के अनुग्रह से, हम अपने बुलाए जाने और चुने जाने को अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी पक्का करेंगे। ऐसा जीवन बिताते हुए, "हमें अपने प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्त राज्य में भरपूर स्वागत पाने की पक्की आशा होगी।" [2 पतरस 1:11] ऐसा जीवन बिताते हुए, हम अपने पिता के परिवार की सिफ़ारिश दूसरों से करेंगे, और परमेश्वर की आशीष से शायद उन्हें यह कहने को प्रेरित करेंगे, "हम तुम्हारे साथ चलेंगे।"

हमारा घर

"हे प्रभु, तू पीढ़ी से पीढ़ी तक हमारा आश्रय रहा है।" [भजन संहिता 90:1]

दो कारण हैं कि इस लेख के शीर्ष का यह पद हमारे हृदयों में विशेष सामर्थ के साथ गूँजना चाहिए। यह एक अत्यन्त गम्भीर भजन का पहला पद है—आत्मिक संगीत की एक अद्भुत रचना की पहली पंक्ति। मैं नहीं कह सकता कि दूसरे लोग नब्बेवाँ भजन पढ़कर कैसा अनुभव करते हैं। मुझे तो यह सदा अपनी कुर्सी पर पीछे टिककर सोच में डुबो देता है।

एक तो यह कि यह नब्बेवाँ भजन "परमेश्वर के जन मूसा" का रचा हुआ एकमात्र भजन है। यह उस पवित्र जन की भावनाओं को प्रकट करता है, जब उसने उस सारी पीढ़ी को जिसे वह मिस्र से निकाल लाया था, जंगल में मरते देखा। वर्ष-प्रतिवर्ष उसने उस भयानक दण्ड को पूरा होते देखा जो इस्राएल ने अविश्वास के कारण अपने ऊपर बुला लिया था: "इस जंगल में तुम सब की लोथें पड़ी रहेंगी; अर्थात् तुम सब में से बीस वर्ष या उससे अधिक अवस्था के जितने गिने गए थे, और जिन्होंने मुझ पर बुड़बुड़ाया है। उनमें से कोई भी उस देश में प्रवेश न करने पाएगा।" [गिनती 14:29-30]

एक के बाद एक उसने उन कुलों के मुखियाओं की हड्डियाँ जंगल में पड़ी देखीं जिन्हें वह मिस्र से निकाल लाया था। चालीस लम्बे वर्षों तक उसने बलवान, फुर्तीले, बुद्धिमान, कोमल और सुन्दर लोगों को, जो उसके साथ विजय पाते हुए लाल समुद्र पार कर आए थे, घास के समान कटते और मुरझाते देखा। चालीस वर्षों तक उसने अपने साथियों को निरन्तर बदलते, निर्बल होते और विदा होते देखा। इसमें आश्चर्य क्या कि उसने कहा, "हे प्रभु, तू हमारा आश्रय रहा है।" हम सब पृथ्वी पर यात्री और परदेशी हैं, और हमारे रहने के लिए कोई स्थान नहीं। "हे प्रभु, तू ही हमारा घर है।"

इसके अतिरिक्त, नब्बेवाँ भजन इंग्लैंड की कलीसिया की अन्त्येष्टि-विधि का एक भाग है। प्रार्थना-पुस्तिका में लोग चाहे जो दोष निकालें, मेरे विचार से अन्त्येष्टि-विधि की अनुपम सुन्दरता से कोई इनकार नहीं कर सकता। वे वचन कितने सुन्दर हैं जो सेवक के मुँह में रखे गए हैं, जब वह कब्रिस्तान के फाटक पर ताबूत से मिलता है और शोक करनेवालों को कलीसिया के भीतर ले जाता है। देह के पुनरुत्थान के विषय में 1 कुरिन्थियों की पत्री का अध्याय कितना सुन्दर है। वे वाक्य और प्रार्थनाएँ कितनी सुन्दर हैं जो इसलिए ठहराई गई हैं कि जब देह पृथ्वी के नीचे उसके घर में रखी जाए तब पढ़ी जाएँ। परन्तु मेरी दृष्टि में विशेष रूप से सुन्दर वे भजन हैं जो उस समय पढ़ने के लिए चुने गए हैं जब शोक करनेवाले कलीसिया में अपने स्थान ग्रहण कर चुके होते हैं। उस कठिन घड़ी में मनुष्य की आत्मा को इतना शान्ति देनेवाला, आदर देनेवाला, हृदय को छूनेवाला और झकझोरनेवाला कोई और वचन मैं नहीं जानता, जितना उस प्राचीन प्रेरित व्यवस्था-दाता का यह अद्भुत कथन: "हे प्रभु, तू पीढ़ी से पीढ़ी तक हमारा निवासस्थान रहा है।" "हे प्रभु, तू ही हमारा घर है।"

मैं इन वचनों से दो विचार निकालना चाहता हूँ जो इस लेख के पाठकों के लिए कुछ भला कर सकें। इंग्लैंड का घर सारे संसार में अपने सुख और आराम के लिए प्रसिद्ध है। वह पृथ्वी पर छोड़ा गया स्वर्ग का एक छोटा-सा टुकड़ा है। फिर भी इंग्लैंड का घर भी सदा के लिए नहीं है। परिवार का नीड़ निश्चय ही उजाड़ा जाएगा, और उसके निवासी निश्चय ही तितर-बितर हो जाएँगे। कुछ थोड़े मिनट मेरे साथ धीरज रखिए, जब मैं आपके सामने सबसे उत्तम, सबसे सच्चा और सबसे सुखी घर रखने का प्रयत्न करता हूँ।

I. पहला विचार जो मैं आपके सामने रखता हूँ यह है: मैं आपको दिखाऊँगा कि संसार क्या है।

मैं खुले मन से मानता हूँ कि यह अनेक बातों में एक सुन्दर संसार है। इसके समुद्र और नदियाँ, इसके सूर्योदय और सूर्यास्त, इसके पर्वत और घाटियाँ, इसकी फसलें और वन, इसके फल और फूल, इसके दिन और रातें, सब के सब अपने ढंग से सुन्दर हैं। वह हृदय कितना ठण्डा और संवेदनहीन होगा जिसे वर्ष में एक दिन भी प्रकृति की किसी वस्तु की प्रशंसा करने को न मिले! परन्तु संसार चाहे जितना सुन्दर हो, इसमें बहुत सी बातें हमें स्मरण दिलाती हैं कि यह घर नहीं है। यह एक सराय है, एक तम्बू है, एक डेरा है, एक अस्थायी निवास है, एक प्रशिक्षण-पाठशाला है। परन्तु यह घर नहीं है।

(क) यह एक बदलता हुआ संसार है।

हमारे चारों ओर की हर वस्तु निरन्तर चलती, बदलती और मिटती जा रही है। परिवार, सम्पत्तियाँ, भूस्वामी, किरायेदार, किसान, मजदूर, व्यापारी, सब निरन्तर चलायमान हैं। लगातार तीन पीढ़ियों तक एक ही नाम को एक ही घर में पाना इतना असाधारण है कि वह नियम नहीं, अपवाद है। परिवर्तन से इतना भरे हुए संसार को घर नहीं कहा जा सकता।

(ख) यह एक कठिन और निराश करनेवाला संसार है।

जो कोई पचास वर्ष का होने तक जीवित रहा है, उसने इसका मूल्य चुकाया है और जानता है कि यह सच है। विवाहित जीवन की परीक्षाएँ और अविवाहित जीवन की परीक्षाएँ, सन्तान के विषय की परीक्षाएँ और भाई-बहनों के विषय की परीक्षाएँ, धन-सम्बन्धी परीक्षाएँ और स्वास्थ्य-सम्बन्धी परीक्षाएँ, ये कितनी हैं! इनका नाम तो सेना है। और इनमें से दसवाँ भाग भी कभी प्रकट नहीं होता। सच तो यह है कि ऐसे परिवार कम ही हैं जिनकी अलमारी में कोई "कंकाल" छिपा न हो। परीक्षा और निराशा से इतना भरे हुए संसार को घर नहीं कहा जा सकता।

(ग) यह एक मरता हुआ संसार है।

मृत्यु निरन्तर हमारे चारों ओर और हमारे निकट है, और हर मोड़ पर हमसे आ मिलती है। ऐसे पारिवारिक मिलन कम ही हैं, जब बड़ा दिन आता है, जिनमें कुछ कुर्सियाँ खाली और कुछ स्थान सूने न हों। प्रौढ़ अवस्था के निकट पहुँचे ऐसे स्त्री-पुरुष कम ही हैं जो नामों की एक लम्बी सूची न गिना सकें, ऐसे नाम जो उनके हृदय में सदा के लिए गहरे खुदे हैं, उन प्रियजनों के नाम जो अब मर चुके और चले गए। कहाँ हैं हमारे माता-पिता? कहाँ हैं हमारे सेवक और शिक्षक? कहाँ हैं हमारे भाई-बहन? कहाँ हैं हमारे पति और पत्नियाँ? कहाँ हैं हमारे पड़ोसी और मित्र? कहाँ हैं वे पक्के बालोंवाले बूढ़े आराधक, जिनके श्रद्धा-भरे मुख हमें इतने भली-भाँति स्मरण हैं जब हम पहली बार कलीसिया में आए थे? कहाँ हैं वे लड़के-लड़कियाँ जिनके साथ हम पाठशाला जाते समय खेला करते थे? कितनों को यह उत्तर देना पड़ेगा, "मर गए, मर गए, मर गए! उनकी कब्रों पर गुलबहार उग रहे हैं, और हम अकेले रह गए हैं।" निश्चय ही मृत्यु से इतना भरे हुए संसार को कभी घर नहीं कहा जा सकता।

(घ) यह एक बिखेरनेवाला और बाँटनेवाला संसार है।

परिवार निरन्तर टूटते और भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाते रहते हैं। जब जीवित बचे माता या पिता कब्र में रख दिए जाते हैं, उसके बाद परिवार के सदस्य फिर कितनी कम बार एक साथ मिलते हैं! मिलाप की डोर टूटी हुई-सी लगती है, और कोई चीज़ उसे फिर नहीं जोड़ती। ऐसा लगता है मानो भवन के भागों में से गारा निकाल लिया गया हो, और जोड़े रखने का सारा नियम जाता रहा। कितनी बार गहनों के विषय का कोई तुच्छ झगड़ा, या धन के विषय की कोई दयनीय कहा-सुनी, ऐसी दरार डाल देती है जो कभी नहीं भरती, और चीनी के बरतन की दरार की तरह, जोड़ने पर भी, कभी ठीक नहीं होती! सच तो यह है कि जो एक ही बच्चों के कमरे में खेले थे, वे बहुत कम ही एक ही कब्रिस्तान की कब्रों में लेटते हैं, या मरते दम तक एक-दूसरे से मेल रखते हैं। फूट से इतना भरा हुआ संसार कभी घर नहीं हो सकता।

ये बातें पुरानी हैं। इन पर आश्चर्य करना व्यर्थ है। ये पाप के कड़वे फल और पतन के शोकपूर्ण परिणाम हैं। परिवर्तन, परीक्षा, मृत्यु और फूट, सब के सब तब संसार में आ गए जब आदम और हव्वा ने पाप किया। हमें कुड़कुड़ाना नहीं चाहिए। हमें चिढ़ना नहीं चाहिए। हमें शिकायत नहीं करनी चाहिए। जिस दशा में हम अपने को पाते हैं उसे हमें स्वीकार करना चाहिए। हममें से हर एक को अपनी स्थिति के दुःखों को हलका करने और सुखों को बढ़ाने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। हमें दृढ़ता से निश्चय करना चाहिए कि अपने आस-पास के हर व्यक्ति और हर वस्तु से जो उत्तम हो सके वही लेंगे। परन्तु हमें कभी, कभी, कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि संसार घर नहीं है।

क्या आप जवान हैं? क्या आपके चारों ओर और आपके सामने सब कुछ उज्ज्वल, आनन्दित और सुखी दिखाई देता है? क्या आप मन ही मन सोचते हैं कि मैं संसार को बहुत अँधेरी दृष्टि से देखता हूँ? सावधान रहिए। जैसे-जैसे समय बीतेगा, आप यह नहीं कहेंगे। बुद्धिमान बनिए। अपनी अपेक्षाओं को संयम में रखना सीखिए। विश्वास रखिए, यहाँ नीचे लोगों और वस्तुओं से आप जितनी कम आशा रखेंगे, उतने ही अधिक सुखी रहेंगे।

क्या तुम संसार में समृद्ध हो? क्या मृत्यु, रोग, निराशा, निर्धनता और पारिवारिक संकट अब तक तुम्हारे द्वार के पास से गुज़र गए हैं और भीतर नहीं आए? क्या तुम मन ही मन कहते हो, "कोई वस्तु मुझे अधिक हानि नहीं पहुँचा सकती। मैं अपने बिछौने पर चैन से मरूँगा और कोई दुःख न देखूँगा।" सावधान रहो। तुम अभी बन्दरगाह में नहीं पहुँचे हो। अनपेक्षित संकट का कोई अचानक तूफ़ान तुम्हारा सुर बदल सकता है। नीचे की वस्तुओं पर अपना मन मत लगाओ। उन्हें बहुत ढीली पकड़ से थामो, और क्षण भर की सूचना पर उन्हें छोड़ देने को तैयार रहो। जब तक तुम्हारी समृद्धि है, उसका भली-भाँति उपयोग करो; पर अपना सारा भार उस पर मत डालो, ऐसा न हो कि वह अचानक टूट जाए और तुम्हारे हाथ को छेद दे।

क्या तुम्हारा घर सुखी है? क्या तुम बड़े दिन का पर्व परिवार की उस अँगीठी के चारों ओर मनाने जा रहे हो जहाँ रोग, मृत्यु, निर्धनता, बिछोह और झगड़े अब तक कभी नहीं देखे गए? इसके लिए धन्यवादी हो; हाँ, इसके लिए सचमुच धन्यवादी हो! सचमुच सुखी मसीही घर पृथ्वी पर स्वर्ग के सबसे निकट की वस्तु है। पर सावधान रहो। यह स्थिति सदा नहीं रहेगी। इसका अन्त होना अवश्य है; और यदि तुम बुद्धिमान हो तो इसे कभी न भूलोगे! "हे भाइयो, मैं यह कहता हूँ कि समय कम किया गया है। इसलिये चाहिए कि जिन के पत्नी हों, वे ऐसे हों मानो उन के पत्नी नहीं; और रोनेवाले ऐसे हों मानो रोते नहीं; और आनन्द करनेवाले ऐसे हों मानो आनन्द नहीं करते; और मोल लेनेवाले ऐसे हों मानो उन के पास कुछ है नहीं; और संसार के साथ व्यवहार करनेवाले ऐसे हों कि संसार ही के न हो लें; क्योंकि इस संसार की रीति और व्यवहार बदलते जाते हैं।" [1 कुरिन्थियों 7:29-31]

II. दूसरा विचार जो मैं तुम्हारे सामने रखता हूँ यह है: मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि इस जीवन में भी सच्चे मसीहियों के लिए मसीह क्या है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि स्वर्ग वह अन्तिम घर है जिसमें सच्चा मसीही अन्त में सदा रहेगा। उसी ओर वह प्रतिदिन यात्रा कर रहा है; हर दिन वह उस स्थान के और निकट आ रहा है। "क्योंकि हम जानते हैं कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा जो हाथों से बना हुआ घर नहीं, parantu सनातन है।" [2 कुरिन्थियों 5:1] देह और आत्मा फिर एक होकर, नए, महिमामय और सिद्ध किए हुए, पिता के स्वर्ग के उस बड़े घर में सदा-सर्वदा रहेंगे। उस घर में हम अभी नहीं पहुँचे हैं। हम अभी स्वर्ग में नहीं हैं।

परन्तु क्या इस बीच हमारी आत्माओं के लिए कोई घर नहीं है? क्या इस उजाड़ संसार में कोई आत्मिक निवास-स्थान नहीं जहाँ हम निरन्तर जा सकें और वहाँ जाकर विश्राम और शान्ति पाएँ? परमेश्वर का धन्यवाद हो कि इस प्रश्न का उत्तर पाना कठिन नहीं है। सब परिश्रमी और बोझ से दबी आत्माओं के लिए एक घर ठहराया गया है, और वह घर मसीह है। विश्वास के द्वारा मसीह को जानना, उसमें विश्वास का जीवन जीना, विश्वास के द्वारा प्रतिदिन उसमें बने रहना, विवेक के हर तूफ़ान में उसकी ओर भागना, संकट के हर दिन उसे अपना शरणस्थान बनाना, और अपने जीवन की हर सुबह और हर साँझ उसे अपना याजक, पापस्वीकार सुननेवाला, पापमोचक और आत्मिक मार्गदर्शक ठहराना—यही मरने से पहले ही आत्मिक रीति से घर में होना है। मनुष्य जाति के जो पापी विश्वास से मसीह का इस प्रकार उपयोग करते हैं, उनके लिए मसीह सबसे ऊँचे अर्थ में निवास-स्थान है। वे सच्चाई से कह सकते हैं, "हम सब पृथ्वी पर परदेशी और यात्री हैं, तौभी हमारा एक घर है।"

उन सब प्रतीकों और उपमाओं में से जिनके अधीन मसीह को मनुष्य के सामने रखा गया है, मैं ऐसी बहुत कम उपमाएँ जानता हूँ जो इससे अधिक उत्साह और सांत्वना देनेवाली हों जो हमारे सामने रखी गई है। घर अंग्रेज़ी भाषा के सबसे मधुर और कोमल शब्दों में से एक है। घर वह स्थान है जिससे हमारे सबसे सुखद विचार घनिष्ठता से जुड़े हैं। उत्तम और सबसे सुखी घर अपने निवासियों के लिए जो कुछ है, मसीह उस आत्मा के लिए वही है जो उस पर विश्वास करती है। मरते, बदलते और निराश करनेवाले संसार के बीच सच्चे मसीही के पास सदा कुछ ऐसा होता है जिसे पृथ्वी की कोई शक्ति छीन नहीं सकती। सुबह, दोपहर और साँझ, उसके निकट एक जीवित शरणस्थान है—उसकी आत्मा के लिए एक जीवित घर। तुम उससे उसका प्राण, स्वतन्त्रता और धन छीन सकते हो; तुम उससे स्वास्थ्य, भूमि, मकान और मित्र ले सकते हो; परन्तु चाहे जो करो, उसका घर उससे नहीं छीन सकते। परमेश्वर के उन सबसे दीन प्राणियों के समान जो अपना खोल अपनी पीठ पर लिए फिरते हैं, चाहे वे जहाँ कहीं हों, वैसे ही मसीही जहाँ कहीं जाता है, अपना घर साथ लिए जाता है। इसमें आश्चर्य नहीं कि वह पवित्र प्रचारक बैक्स्टर गाता है,

"क्या हुआ यदि बन्दीगृह में मुझे रहना पड़े, क्या तब भी मैं तुझसे बातें न कर सकूँगा? मुझे पाप, अपने क्रोध और नरक से बचा, मुझे अपना बच्चा कह, और मैं स्वतन्त्र हूँ!"

(क) मसीह जैसा कोई घर नहीं! उसमें सब के लिए स्थान है, और सब प्रकार के लोगों के लिए स्थान है।

कोई अतिथि या आगन्तुक अनचाहा नहीं, और किसी को भीतर आने से मना नहीं किया जाता। द्वार सदा खुला रहता है, कभी बन्द नहीं होता। सबसे उत्तम वस्त्र, पाला हुआ बछड़ा, अँगूठी और जूतियाँ आनेवाले हर एक के लिए सदा तैयार हैं। क्या हुआ यदि बीते समय में तुम नीचों में सबसे नीच, पाप के दास, सब धार्मिकता के बैरी, फरीसियों में फरीसी, सदूकियों में सदूकी, चुंगी लेनेवालों में चुंगी लेनेवाले रहे हो? इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता: अब भी आशा है। सब पाप क्षमा किए जा सकते हैं, मिटाए और भुलाए जा सकते हैं। एक घर और शरणस्थान है जिसमें तुम्हारी आत्मा आज ही प्रवेश पा सकती है। वह घर मसीह है। "मेरे पास आओ,"

वह पुकारता है: "खटखटाओ तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।" [मत्ती 11:28; 7:7]

(ख) मसीह जैसा कोई घर नहीं! उसमें सब के लिए असीम और अथक दया है, भीतर आ जाने के बाद भी।

परखकाल के बाद किसी को इसलिए अस्वीकार करके बाहर नहीं निकाला जाता कि वह ठहरने के लिए बहुत निर्बल और बुरा है। नहीं, कदापि नहीं! जिसे वह ग्रहण करता है, उसे सदा थामे रखता है। जहाँ वह आरम्भ करता है, वहाँ अच्छे अन्त तक पहुँचाता है। जिसे वह भीतर लेता है, उसे तुरन्त पूरी रीति से धर्मी ठहराता है। जिसे वह धर्मी ठहराता है, उसे पवित्र भी करता है। जिसे वह पवित्र करता है, उसे महिमा भी देता है। उसके घर से कभी किसी निराशाजनक चरित्रवाले को निकाला नहीं जाता। कोई स्त्री-पुरुष ऐसा नहीं पाया जाता जो चंगा और नया होने के लिए बहुत बुरा हो। जिसने जगत को शून्य से बनाया, उसके लिए कुछ भी करना कठिन नहीं है। जो स्वयं घर है, उसने यह कहा है और इसकी ज़मानत देगा: "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" [यूहन्ना 6:37]

(ग) मसीह जैसा कोई घर नहीं! उसमें सब के लिए अपरिवर्तनीय कृपा, धीरज और कोमल व्यवहार है।

वह "कठोर मनुष्य" नहीं, परन्तु "नम्र और मन में दीन" है। [मत्ती 11:29] जो कोई उसके पास आता है, उसके साथ कभी कठोर व्यवहार नहीं किया जाता, और न उसे यह जताया जाता है कि उसकी उपस्थिति अवांछित है। उनके लिए सदा उत्तम से उत्तम भोजन का भोज तैयार रहता है। पवित्र आत्मा उनके हृदयों में रखा गया है और उनमें मन्दिर की नाईं वास करता है। उनके लिए प्रतिदिन अगुवाई, मार्गदर्शन और शिक्षा का प्रबन्ध है। यदि वे पाप करें, तो सही मार्ग पर लौटा लाए जाते हैं; यदि गिरें, तो फिर उठाए जाते हैं; यदि जानबूझकर पाप करें, तो उन्हें सुधारने के लिए ताड़ना दी जाती है। क्योंकि इस पूरे घराने का नियम प्रेम है।

(घ) मसीह के समान कोई घर नहीं! उसमें कोई बदलाव नहीं।

सबसे छोटे से लेकर सबसे बड़े तक, जो भी उसके पास आता है, वह उन सब से प्रेम रखता है और उनका भला करते-करते कभी नहीं थकता। मुझे खेद है कि सांसारिक घर चंचलता और अनिश्चितता से भरे हैं। कृपा छलावा है। लोगों के होंठों पर अक्सर शिष्टाचार और सौजन्य होता है, जबकि भीतर से वे आपकी संगति से ऊब चुके होते हैं और चाहते हैं कि आप चले जाएँ। आप शायद ही कभी जान पाते हैं कि आपकी उपस्थिति कब तक स्वागत योग्य है, और आपके मित्र सचमुच आपको देखना कितना चाहते हैं। परन्तु मसीह के साथ ऐसा नहीं है। "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एकसा है।" [इब्रानियों 13:8]

(ङ) मसीह के समान कोई घर नहीं! उसके साथ एक बार आरम्भ हुई सहभागिता कभी नहीं टूटेगी।

एक बार विश्वास के द्वारा प्रभु से जुड़ जाने पर, आप अनन्त काल के लिए उसी से जुड़ जाते हैं। सांसारिक घर देर-सबेर समाप्त हो ही जाते हैं: बहुमूल्य पुराना सामान बिककर बिखर जाता है; परिवार के प्रिय बुज़ुर्ग अपने पूर्वजों के पास पहुँचा दिए जाते हैं; प्यारा पुराना नीड़ तिनका-तिनका बिखर जाता है। परन्तु मसीह के साथ ऐसा नहीं है। विश्वास समय आने पर दृष्टि में समा जाएगा: आशा अन्त में निश्चय में बदल जाएगी। हम एक दिन अपनी आँखों से देखेंगे, और फिर हमें विश्वास करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। हम निचली कोठरी से ऊपरी कोठरी में, और बाहरी आँगन से परमपवित्र स्थान में पहुँचाए जाएँगे। परन्तु एक बार मसीह में आ जाने पर, हम कभी मसीह से बाहर नहीं होंगे। जब हमारा नाम मेम्ने की जीवन की पुस्तक में लिख दिया जाता है, तो हम ऐसे घर के हो जाते हैं जो सदा-सर्वदा बना रहेगा।

(1) और अब, समाप्त करने से पहले, मैं इस लेख के प्रत्येक पाठक से एक सीधा-सा प्रश्न पूछना चाहता हूँ। क्या आपकी आत्मा के लिए कोई घर है?

क्या वह सुरक्षित है? क्या वह क्षमा पा चुकी है? क्या वह धर्मी ठहराई गई है? क्या वह परमेश्वर से मिलने के लिए तैयार है? मैं पूरे हृदय से आपके सुखी घर की कामना करता हूँ। परन्तु मेरा प्रश्न स्मरण रखिए। घर के अभिवादनों और स्वागत के बीच, मिलने और बिछुड़ने के बीच, हँसी और आनन्द-उल्लास के बीच, सुख, सहानुभूति और स्नेह के बीच, मेरे प्रश्न पर विचार कीजिए, विचार कीजिए—क्या आपकी आत्मा के लिए कोई घर है?

हमारे सांसारिक घर शीघ्र ही सदा के लिए बन्द हो जाएँगे। समय विशाल डगों से आगे बढ़ रहा है। बहुत वर्ष बीतने से पहले ही बुढ़ापा और मृत्यु हम पर आ पड़ेंगे। ओह, अपने उस उत्तम अंश के लिए, जो कभी नहीं मरता, एक स्थायी घर ढूँढ़िए! बहुत देर होने से पहले अपनी आत्मा के लिए घर ढूँढ़िए।

मसीह को ढूँढ़िए, कि आप सुरक्षित रहें। हाय उस मनुष्य पर जो उस समय जहाज़ से बाहर पाया जाए जब परमेश्वर के क्रोध की बाढ़ अन्ततः पापी संसार पर फूट पड़ेगी! मसीह को ढूँढ़िए, कि आप सुखी हों। जिनके पास अपनी आत्मा के लिए घर है, उनके सिवा किसी को भी प्रसन्न, आनन्दित, निश्चिन्त और चैन से रहने का सच्चा अधिकार नहीं है। मैं फिर कहता हूँ, बिना देर किए मसीह को ढूँढ़िए।

(2) यदि मसीह आपकी आत्मा का घर है, तो एक मित्रवत् चेतावनी स्वीकार कीजिए। किसी भी स्थान या संगति में अपने घर पर लज्जित होने से सावधान रहिए। जो मनुष्य अपने जन्म के घर से लज्जित हो, अपने उन माता-पिता से लज्जित हो जिन्होंने उसे शैशव से पाला, अपने उन भाई-बहनों से लज्जित हो जो उसके साथ खेले—उसे, सामान्य नियम के रूप में, नीच और घृणित व्यक्ति माना जा सकता है। परन्तु उस मनुष्य के विषय में हम क्या कहेंगे जो उससे लज्जित हो जो उसके लिए क्रूस पर मरा? उस मनुष्य के विषय में हम क्या कहेंगे जो अपने धर्म से लज्जित हो, अपने स्वामी से लज्जित हो, अपने घर से लज्जित हो?

सावधान रहिए कि आप वह मनुष्य न हों। आपके आसपास के लोग चाहे जो सोचें, आप कभी मसीही होने पर लज्जित न हों। यदि वे चाहें तो हँसें, ठट्ठा करें, मज़ाक उड़ाएँ और उपहास करें। मृत्यु की घड़ी में और न्याय के दिन वे उपहास नहीं करेंगे। अपना झण्डा ऊँचा कीजिए; अपने रंग दिखाइए; उन्हें मस्तूल से ठोंक दीजिए। शराब पीने, जुआ खेलने, झूठ बोलने, शपथ खाने, आलस्य, घमण्ड, और प्रभु के दिन कलीसिया न जाने पर आप अवश्य लज्जित हो सकते हैं। परन्तु बाइबल पढ़ने, प्रार्थना करने और मसीह का होने पर आपके पास लज्जित होने का कोई कारण नहीं है। जिन्हें हँसना हो हँसें। अच्छा सिपाही अपने देश के झण्डे के रंगों और अपनी वर्दी पर कभी लज्जित नहीं होता। सावधान रहिए कि आप अपने स्वामी पर कभी लज्जित न हों। अपने घर पर कभी लज्जित न हों।

(3) यदि मसीह आपकी आत्मा का घर है, तो मित्रवत् सलाह का एक अंश स्वीकार कीजिए। कोई भी बात आपको घर से भटकने के लिए न लुभाए।

संसार और शैतान अक्सर पूरा ज़ोर लगाएँगे कि आप थोड़ी देर के लिए अपने धर्म को छोड़कर उनके साथ चलें। आपका अपना शरीर कानों में कहेगा कि उनके साथ थोड़ी दूर चलने में कोई खतरा नहीं, और इससे आपकी कोई वास्तविक हानि नहीं होगी। मैं कहता हूँ, सावधान रहिए: जब आपको इस प्रकार प्रलोभन दिया जाए तब सावधान रहिए। लूत की पत्नी की नाईं पीछे मुड़कर देखने से सावधान रहिए। अपने घर को मत छोड़िए।

इसमें सन्देह नहीं कि पाप में सुख हैं, परन्तु वे असली और सन्तोषजनक नहीं हैं। संसार की रीतियों में निस्सन्देह उत्तेजना और क्षणिक आनन्द है, परन्तु वह ऐसा आनन्द है जो अन्त में कड़वा स्वाद छोड़ जाता है। ओह, नहीं! केवल बुद्धि के मार्ग ही सुखदायक हैं, और केवल बुद्धि की डगरें ही शान्ति की डगरें हैं। उनसे दृढ़ता से चिपके रहिए और इधर-उधर न मुड़िए। मेम्ना जहाँ-जहाँ जाए, उसके पीछे चलिए। चाहे लोग आपके विषय में हर प्रकार की बुरी बातें कहें, फिर भी मसीह और उसकी व्यवस्था से लगे रहिए। आप जितना अधिक जिएँगे, उसकी सेवा को उतना ही अधिक सुखद पाएँगे: आप उतने ही अधिक तैयार होंगे कि सर्वोच्च अर्थ में गा सकें, "घर जैसी कोई जगह नहीं।"

(4) यदि मसीह आपकी आत्मा का घर है, तो अपने कर्तव्य के विषय में एक संकेत स्वीकार कीजिए।

निश्चय कीजिए कि आप दूसरों को अपने सुख के विषय में बताने का हर अवसर उठाएँ। जहाँ कहीं भी हों, उन्हें यही बताइए। उन्हें बताइए कि आपका एक सुखी घर है।

उनसे कहिए, यदि वे आपकी सुनें, कि आपने मसीह को एक भला स्वामी पाया है, और मसीह की सेवा एक सुखद सेवा है। उनसे कहिए कि उसका जूआ सहज और उसका बोझ हलका है। उनसे कहिए कि शैतान चाहे जो कहे, आपके घर के नियम कठोर नहीं हैं, और आपका स्वामी संसार से कहीं अधिक अच्छी मजदूरी देता है! जहाँ कहीं भी हों, थोड़ा भला करने का यत्न कीजिए। अपने इस सुखद घर के लिए और निवासी जुटाने का यत्न कीजिए। अपने मित्रों और सम्बन्धियों से, यदि वे सुनें, वैसे ही कहिए जैसे सदियों पहले एक ने कहा था, "हमारे संग चल, और हम तेरी भलाई करेंगे; क्योंकि यहोवा ने इस्राएल के विषय में भला होने का वचन दिया है।" [गिनती 10:29]

परमेश्वर के वारिस

"क्योंकि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे सब परमेश्वर के पुत्र हैं।" (रोमियों 8:14)

"क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो; परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम \"हे अब्बा, हे पिता\" कहकर पुकारते हैं।" (रोमियों 8:15)

"आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।" (रोमियों 8:16)

"और यदि सन्तान हैं तो वारिस भी, बरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुःख उठाएँ कि उसके साथ महिमा भी पाएँ।" (रोमियों 8:17)

प्रेरित पौलुस आज हमारे सामने के इन पदों में जिन लोगों की चर्चा करता है, वे पृथ्वी के सबसे धनी लोग हैं। ऐसा होना ही चाहिए। वे "परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस" कहलाते हैं।

इन लोगों की मीरास ही एकमात्र ऐसी मीरास है जो सचमुच पाने योग्य है; अन्य सब मीरासें असन्तोषजनक और निराशाजनक हैं। उनके साथ बहुत सी चिन्ताएँ आती हैं। वे दुखते हृदय को चंगा नहीं कर सकतीं, न भारी विवेक को हलका कर सकती हैं; वे पारिवारिक कष्टों को नहीं रोक सकतीं; वे बीमारियों, दुर्भाग्यों, बिछोहों और मृत्युओं को नहीं रोक सकतीं। परन्तु "परमेश्वर के वारिसों" में कोई निराशा नहीं है।

जिस मीरास की मैं बात कर रहा हूँ, वही एकमात्र मीरास है जो सदा बनी रह सकती है; अन्य सब को मृत्यु की घड़ी में छोड़ना ही पड़ता है, यदि वे पहले ही छीन न ली गई हों। जो अत्यन्त धनवान हैं, वे भी कब्र के पार अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकते। परन्तु "परमेश्वर के वारिसों" के साथ ऐसा नहीं है। उनकी मीरास अनन्त है।

जिस मीरास की मैं बात कर रहा हूँ, वही एकमात्र मीरास है जो हर किसी की पहुँच के भीतर है। अधिकांश मनुष्य धन और बड़ाई कभी प्राप्त नहीं कर पाते, चाहे वे जीवन भर उसके लिए कठिन परिश्रम करें; परन्तु महिमा, आदर और अनन्त जीवन हर मनुष्य को सेंतमेंत दिए जाते हैं, जो उन्हें परमेश्वर की शर्तों पर स्वीकार करने को तैयार हो। "जो कोई चाहे" वह "परमेश्वर का वारिस और मसीह का संगी वारिस" हो सकता है।

यदि इस लेख का कोई पाठक इस मीरास में से भाग पाना चाहता है, तो वह जान ले कि उसे पृथ्वी पर उस एक परिवार का सदस्य होना होगा जिसका यह है, और वह सब सच्चे मसीहियों का परिवार है। यदि आप स्वर्ग में महिमा पाना चाहते हैं, तो आपको पृथ्वी पर परमेश्वर की सन्तानों में से एक बनना होगा। मैं यह लेख इसलिए लिखता हूँ कि आपको मना सकूँ कि यदि आप अब तक परमेश्वर की सन्तान नहीं हैं, तो आज ही बन जाएँ। मैं इसे इसलिए लिखता हूँ कि यदि अभी आपके पास केवल एक धुँधली आशा है, और इससे अधिक कुछ नहीं, तो आप पूरी तरह निश्चित हो जाएँ कि आप उनमें से एक हैं। सच्चे मसीहियों के सिवा कोई परमेश्वर की सन्तान नहीं है! परमेश्वर की सन्तानों के सिवा कोई परमेश्वर का वारिस नहीं है! जब मैं इन बातों को आपके सामने खोलने का और इस लेख के शीर्ष पर दिए गए पदों में निहित शिक्षाएँ दिखाने का यत्न करता हूँ, तो मेरी ओर ध्यान दीजिए।

I. पहले मैं परमेश्वर के साथ सब सच्चे मसीहियों का सम्बन्ध दिखाऊँगा। वे "परमेश्वर के पुत्र" हैं।

II. फिर मैं इस सम्बन्ध के विशेष प्रमाण दिखाऊँगा। सच्चे मसीही "आत्मा के चलाए चलते हैं।" उनमें "लेपालकपन की आत्मा" है। उनके पास "आत्मा की गवाही" है। वे "मसीह के दुःखों में सहभागी" होते हैं।

III. अन्त में मैं इस सम्बन्ध के विशेषाधिकार दिखाऊँगा। सच्चे मसीही "परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस" हैं।

I. पहले मैं परमेश्वर के साथ सब सच्चे मसीहियों का सम्बन्ध दिखाऊँ। वे परमेश्वर के "पुत्र" हैं।

मैं नहीं जानता कि इससे बड़ा और अधिक अद्भुत कोई शब्द चुना जा सकता था। परमेश्वर के सेवक होना, प्रजा, सैनिक, चेले, मित्र होना, ये सब उत्तम पदवियाँ हैं; परन्तु परमेश्वर के "पुत्र" होना तो उससे भी श्रेष्ठ पदवी है। पवित्रशास्त्र कहता है, "दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है।" (यूहन्ना 8:35)

इस संसार के धनवान और कुलीन लोगों का पुत्र होना, पृथ्वी के राजकुमारों और राजाओं का पुत्र होना, इसे सामान्यतः एक बड़ा अस्थायी लाभ और विशेषाधिकार माना जाता है। परन्तु राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु का पुत्र होना, उस परम पवित्र का पुत्र होना जो अनन्तकाल में वास करता है, यह तो इससे कहीं बड़ी बात है। और फिर भी यह हर सच्चे मसीही का विशेषाधिकार है।

सांसारिक माता-पिता का पुत्र स्वभावतः अपने पिता से स्नेह, सहारा, पालन-पोषण और शिक्षा की आशा रखता है। उसके लिए सदा एक घर खुला रहता है। वहाँ ऐसा प्रेम होता है जिसे, सामान्यतः कहें तो, कितना ही बुरा आचरण भी पूरी तरह बुझा नहीं सकता। ये सब बातें सामान्यतः इस संसार के सब पुत्रों की होती हैं। तब सोचिए कि उस दीन पापी मनुष्य का विशेषाधिकार कितना बड़ा है जो परमेश्वर के विषय में कह सकता है, "वह मेरा पिता है।"

परन्तु हम जैसे पापी मनुष्य परमेश्वर के पुत्र कैसे बन सकते हैं? हम इस महिमामय सम्बन्ध में कब प्रवेश करते हैं? हम स्वभाव से परमेश्वर के पुत्र नहीं हैं। जब हम संसार में आए तो हम "परमेश्वर के पुत्र" के रूप में जन्मे नहीं थे। किसी मनुष्य को यह स्वाभाविक अधिकार नहीं कि वह परमेश्वर को अपना पिता समझे। यह कहना कि उसे यह अधिकार है, एक घृणित झूठी शिक्षा है। कहा जाता है कि मनुष्य जन्म से कवि और चित्रकार होते हैं—परन्तु मनुष्य कभी जन्म से परमेश्वर के पुत्र नहीं होते। इफिसियों की पुस्तक हमें बताती है, "हम भी और सब लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।" (इफिसियों 2:3) यूहन्ना की पहली पत्री कहती है, "इसी से परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान जाने जाते हैं: जो कोई धार्मिकता का काम नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं।" (1 यूहन्ना 3:10) इंग्लैंड की कलीसिया का सिद्धान्त बुद्धिमानी से बाइबल की शिक्षाओं का अनुसरण करता है और सिखाता है, "स्वभाव से हम पाप में जन्मे हैं, और क्रोध की सन्तान हैं।" हाँ: अपनी स्वाभाविक दशा में हम सब परमेश्वर की सन्तान होने के बजाय शैतान की सन्तान हैं! पाप सचमुच वंशानुगत है, और आदम के घराने में चलता आया है। अनुग्रह वंशानुगत नहीं है, और पवित्र मनुष्यों के पुत्र अपने आप पवित्र नहीं होते। तो फिर यह महान परिवर्तन और रूपान्तरण कैसे और कब होता है? पापी कब और किस रीति से "सर्वशक्तिमान प्रभु के बेटे और बेटियाँ" (2 कुरिन्थियों 6:18) बनते हैं?

मनुष्य उसी दिन परमेश्वर के पुत्र बनते हैं जिस दिन पवित्र आत्मा उन्हें उद्धार के लिये यीशु मसीह पर विश्वास करने की ओर ले चलता है, उससे पहले नहीं। (टिप्पणी: पाठक स्वयं समझ लेंगे कि मैं उन बच्चों की बात नहीं कर रहा जो शैशवावस्था में मर जाते हैं, या उन लोगों की जो इतनी मानसिक दुर्बलता में जीते और मरते हैं कि सुसमाचार को समझना आरम्भ भी नहीं कर सकते) गलातियों की पुस्तक क्या कहती है? "तुम सब उस विश्वास करने के द्वारा जो मसीह यीशु में है, परमेश्वर के पुत्र हो।" (गलातियों 3:26) 1 कुरिन्थियों की पुस्तक क्या कहती है? "उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो।" (1 कुरिन्थियों 1:30) यूहन्ना की पुस्तक क्या कहती है? "परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें, जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं, परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार (या सौभाग्य) दिया।" (यूहन्ना 1:12) विश्वास पापी को परमेश्वर के पुत्र से जोड़ता है और उसे उसके अंगों में से एक बना देता है। विश्वास उसे उन लोगों में से एक बनाता है जिनमें पिता कोई दाग नहीं देखता, और जिनसे वह प्रसन्न रहता है।

विश्वास उसे परमेश्वर के प्रिय पुत्र के साथ ब्याह देता है और उसे पुत्रों में गिने जाने का अधिकारी बनाता है। विश्वास उसे पिता और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ सहभागिता देता है।" (1 यूहन्ना 1:3) विश्वास उसे पिता के परिवार में कलम की भाँति लगाता है, और उसके लिये पिता के घर में एक स्थान खोल देता है। विश्वास उसे मृत्यु के बदले जीवन देता है, और सेवक होने के बदले उसे पुत्र बनाता है। मुझे ऐसा मनुष्य दिखाओ जिसमें यह विश्वास है, तो चाहे वह किसी भी कलीसिया में जाता हो, मैं कहूँगा कि वह परमेश्वर का पुत्र है।

यह उन बातों में से एक है जिन्हें हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। जब तक कोई मनुष्य विश्वास नहीं करता, तब तक तुम और मैं उसके पुत्र होने के विषय में कुछ नहीं जानते। निस्सन्देह परमेश्वर के पुत्र अनादिकाल से पहले से जाने गए और चुने गए हैं, और लेपालकपन के लिये पहले से ठहराए गए हैं। परन्तु स्मरण रखो, जब तक वे ठीक समय पर बुलाए नहीं जाते और विश्वास नहीं करते—तब तक तुम और मैं निश्चय से नहीं कह सकते कि वे पुत्र हैं। जब तक वे मन फिराकर विश्वास नहीं करते, तब तक परमेश्वर के स्वर्गदूत उन पर आनन्द नहीं मनाते। स्वर्गदूत परमेश्वर के चुनाव की पुस्तक नहीं पढ़ सकते: वे नहीं जानते कि पृथ्वी पर "उसके प्रियजन" कौन हैं। (भजन संहिता 83:3) वे किसी मनुष्य पर तब तक आनन्द नहीं मनाते जब तक वह विश्वास नहीं करता। परन्तु जब वे किसी बेचारे पापी को मन फिराते और विश्वास करते देखते हैं, तब उनमें आनन्द होता है—इस बात का आनन्द कि आग में से एक और जलती लकड़ी खींच ली गई, और स्वर्ग के पिता के लिये एक और पुत्र और वारिस नया जन्म पाया। (आमोस 4:11; लूका 15:10) परन्तु मैं फिर कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य मसीह पर विश्वास नहीं करता, तब तक तुम और मैं उसके परमेश्वर के पुत्र होने के विषय में कुछ भी निश्चित नहीं जानते।

मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि इस भ्रामक धारणा से सावधान रहो कि सब स्त्री-पुरुष परमेश्वर की सन्तान हैं, चाहे उनमें मसीह पर विश्वास हो या न हो। यह एक मनमाना सिद्धान्त है जिससे आजकल बहुत लोग चिपके हुए हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन से इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता। यह एक खतरनाक स्वप्न है, जिससे बहुत लोग अपने आपको सान्त्वना देने का प्रयत्न कर रहे हैं, परन्तु अन्तिम दिन इससे भयानक रीति से जागना पड़ेगा।

मैं यह दिखावा नहीं करता कि इससे इनकार करूँ कि परमेश्वर एक अर्थ में सारी मानवजाति का पिता है। वह सब वस्तुओं का महान आदि कारण है। वह सारी मानवजाति का सृजनहार है, और उसी में सब मनुष्य, चाहे मसीही हों या अन्यजाति, "जीवित रहते, चलते-फिरते और अस्तित्व रखते हैं।" यह सब निःसन्देह सत्य है। इसी अर्थ में पौलुस ने एथेंस के लोगों से कहा कि उन्हीं के कवि ने कहा है, "हम तो उसी के वंश हैं।" (प्रेरितों के काम 17:28) परन्तु यह "वंश" होना किसी मनुष्य को स्वर्ग पर कोई अधिकार नहीं देता। सृष्टि के द्वारा जो "वंश" की पदवी हमें मिली है, वह जैसी हमारी है वैसी ही पत्थरों, वृक्षों, पशुओं, या दुष्टात्माओं तक की भी है। (अय्यूब 1:6)

मैं इससे इनकार नहीं करता कि परमेश्वर सारी मानवजाति से तरस और करुणा के प्रेम से प्रेम करता है। "उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है।" "वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, वरन् यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।" "मैं किसी के मरने से प्रसन्न नहीं होता।" यह सब मैं पूरी रीति से मानता हूँ। इसी अर्थ में हमारे प्रभु यीशु ने हमें बताया है, "परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।" (भजन संहिता 145:9; 2 पतरस 3:9; यहेजकेल 18:32; यूहन्ना 3:16)

मैं उस सिद्धान्त को पूरी तरह अस्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर उनके सिवाय किसी और के लिये मेल करनेवाला और क्षमा करनेवाला पिता है जिन्होंने अपने आपको उसके पुत्र यीशु मसीह से जोड़ लिया है, और कि कोई मनुष्य यीशु मसीह से तब तक जुड़ नहीं सकता जब तक वह उद्धार के लिये उस पर विश्वास न करे। परमेश्वर की पवित्रता और न्याय

ऐसे सिद्धान्त के विरुद्ध खड़े हैं। वे पापी मनुष्यों के लिये मध्यस्थ के बिना परमेश्वर के पास पहुँचना असम्भव बना देते हैं। वे हमें बताते हैं कि जो लोग मसीह के बिना हैं, उनके लिये परमेश्वर "भस्म करनेवाली आग" है। (इब्रानियों 12:29) सारा नया नियम इस सिद्धान्त के विरुद्ध है। वह सिखाता है कि कोई मनुष्य मसीह में अपना भाग तब तक नहीं जता सकता जब तक वह उसे अपना मध्यस्थ करके ग्रहण न करे और अपने उद्धारकर्ता के रूप में उस पर विश्वास न करे। जहाँ मसीह पर विश्वास नहीं है, वहाँ यह कहना कि मनुष्य परमेश्वर में अपने पिता के रूप में सान्त्वना पा सकता है, एक खतरनाक भ्रम है। परमेश्वर उनके सिवाय किसी और के लिये मेल करनेवाला पिता नहीं है जो मसीह से जुड़े हैं।

जिस दृष्टिकोण का मैं अब समर्थन कर रहा हूँ, उसे संकीर्ण और कठोर कहना अनुचित है। सुसमाचार हर मनुष्य के सामने एक खुला द्वार रखता है। उसकी प्रतिज्ञाएँ विस्तृत और परिपूर्ण हैं। उसके निमन्त्रण सच्चे और कोमल हैं। उसकी माँगें सरल और स्पष्ट हैं, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।" परन्तु यह कहना कि घमण्डी लोग, जो मसीह के सरल जूए के नीचे अपनी गर्दन नहीं झुकाएँगे, और संसारी लोग, जो अपनी ही इच्छा और अपने पापों पर अड़े हुए हैं—ऐसे लोगों को मसीह में हिस्सा माँगने का और अपने आप को परमेश्वर की सन्तान कहने का अधिकार है, वह बात कहना है जो पवित्रशास्त्र से कभी प्रमाणित नहीं की जा सकती। परमेश्वर उनका पिता होने को तैयार है; परन्तु वह कुछ स्पष्ट शर्तों पर ऐसा करता है—उन्हें मसीह के द्वारा उसके निकट आना होगा। मसीह उनका उद्धारकर्ता होने को तैयार है; परन्तु ऐसा करते हुए वह एक सीधी माँग रखता है—उन्हें अपनी आत्मा उसे सौंपनी होगी और अपना हृदय उसे देना होगा। वे शर्तें ठुकराते हैं, फिर भी परमेश्वर को अपना पिता कहने का साहस करते हैं! वे माँग को तुच्छ जानते हैं, फिर भी आशा रखने का साहस करते हैं कि मसीह उन्हें बचाएगा! परमेश्वर उनका पिता होगा—पर उन्हीं की शर्तों पर! मसीह उनका उद्धारकर्ता होगा—पर उन्हीं की शर्तों पर! इससे अधिक अनुचित क्या हो सकता है? इससे अधिक घमण्डी क्या हो सकता है? ऐसे सिद्धान्त से अधिक अपवित्र क्या हो सकता है? आओ, हम इससे सावधान रहें, क्योंकि इन पिछले दिनों में यह एक आम सिद्धान्त है। इससे सावधान रहें, क्योंकि यह प्रायः झूठे रूप में प्रस्तुत किया जाता है और कवियों, उपन्यासकारों, भावुक लोगों और कोमल हृदय की स्त्रियों के मुँह में सुन्दर और प्रेमपूर्ण लगता है। इससे सावधान रहें, जब तक कि हम अपनी बाइबल को पूरी तरह त्याग देने और अपने आप को परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान ठहराने का इरादा न रखते हों। आओ, हम पवित्रशास्त्र की पुरानी भूमि पर दृढ़ खड़े रहें: मसीह के बिना परमेश्वर की सन्तान होना नहीं! विश्वास के बिना मसीह में हिस्सा नहीं!

मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रकार की चेतावनी देने की आवश्यकता ही न होती। परन्तु मेरे पास यह सोचने के हर कारण हैं कि ये चेतावनियाँ स्पष्ट और असन्दिग्ध रूप से दी जानी चाहिए। आज के दिनों में धर्मविज्ञान का एक ऐसा पंथ उठ रहा है, जो मुझे अविश्वासिता को बढ़ावा देने, शैतान की सहायता करने और आत्माओं को नाश करने के लिए अत्यन्त उपयुक्त जान पड़ता है। वह हमारे पास योआब के अमासा के पास आने के समान आता है—दया, उदारता और प्रेम के ऊँचे से ऊँचे दावों के साथ। इस धर्मविज्ञान के अनुसार परमेश्वर केवल दया और प्रेम है—उसकी पवित्रता और न्याय को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है! इस धर्मविज्ञान में नरक की चर्चा कभी नहीं होती—वह केवल स्वर्ग की बात करता है! दण्ड की आज्ञा का कभी उल्लेख नहीं होता—उसे असम्भव बात माना जाता है—वे कहते हैं कि सब पुरुष और स्त्रियाँ बचाए जाएँगे! विश्वास और पवित्र आत्मा का कार्य घिस-घिसकर बिलकुल कुछ नहीं रह जाता! "जो कोई कुछ भी मानता है, उसमें विश्वास है! जो कोई कुछ भी सोचता है, उसमें आत्मा है! हर कोई सही है! कोई गलत नहीं! कोई अपने किसी भी काम के लिए दोषी नहीं! वह तो उसकी जीवन-स्थिति का परिणाम है। वह उसकी परिस्थितियों के कारण है! वह अपने विचारों के लिए उतना ही उत्तरदायी नहीं, जितना अपनी त्वचा के रंग के लिए! उसे वैसा ही होना है जैसा वह है! बाइबल एक अधूरी पुस्तक है! वह पुराने ढंग की है! वह अप्रचलित हो चुकी है! हम उसका उतना ही मानें जितना हमें भाए, उससे अधिक नहीं!" मैं गम्भीरता से लोगों को चेतावनी देता हूँ कि इस प्रकार के सारे धर्मविज्ञान से सावधान रहें। "उदारता", "दयालुता", "खुलापन", "कट्टरता से मुक्ति" आदि जैसे सारे फैशनेबल शब्दों के बावजूद, मैं सचमुच मानता हूँ कि यह ऐसा धर्मविज्ञान है जो लोगों को सीधे नरक में ले जाता है।

(क) तथ्य इस धर्मविज्ञान के शिक्षकों के सीधे विरुद्ध बोलते हैं।

वे मेसोपोटामिया जाकर देखें कि जहाँ कभी नीनवे और बाबुल खड़े थे, वहाँ कैसा उजाड़ छाया है। वे मृत सागर के तट पर जाएँ और उसके रहस्यमय कड़वे जल में झाँकें। वे फिलिस्तीन में घूमें और पूछें कि किस बात ने उस उपजाऊ देश को वीराना बना दिया। वे भटकते यहूदियों को देखें, जो संसार भर में बिखरे हैं, जिनकी अपनी कोई भूमि नहीं, फिर भी जो अन्य जातियों में कभी विलीन नहीं हुए। और तब वे हमें बताएँ, यदि उनमें साहस हो, कि परमेश्वर पूरी तरह दया और प्रेम का ऐसा परमेश्वर है कि वह पाप को न कभी दण्ड देता है और न कभी देगा।

(ख) मनुष्य का विवेक इन शिक्षकों के सीधे विरुद्ध बोलता है।

वे किसी मरते हुए बालक के बिछौने के पास जाएँ और अपने सिद्धान्तों से उसे सान्त्वना देने का प्रयत्न करें। वे देखें कि क्या उनके फूले हुए सिद्धान्त भविष्य के विषय में उसकी कुतरती, बेचैन चिन्ता को शान्त कर सकते हैं और उसे शान्ति से मरने योग्य बना सकते हैं। यदि वे कर सकें, तो हमें दिखाएँ कि बाइबल की प्रतिज्ञाओं के बिना—मन फिराव के बिना, और मसीह के लहू पर उस विश्वास के बिना जिसकी पुराने ढंग का धर्मविज्ञान आज्ञा देता है—मृत्यु में आनन्द और सुख के कुछ भलीभाँति प्रमाणित उदाहरण कौन-से हैं। हाँ, जब मनुष्य इस संसार से विदा लेते हैं, तब इन पिछले दिनों में प्रचारित धर्मविज्ञान की नई प्रणालियों का विवेक बुरा हाल कर देता है। मृत्यु की घड़ी में विवेक को यह मनवा लेना सरल नहीं कि नरक जैसा कोई स्थान है ही नहीं।

(ग) भावी अवस्था की जो भी तर्कसंगत धारणा हम बना सकते हैं, वह इन शिक्षकों के सीधे विरुद्ध बोलती है।

ऐसे स्वर्ग की कल्पना कीजिए जिसमें सारी मानव-जाति समाए! ऐसे स्वर्ग की कल्पना कीजिए जिसमें पवित्र और अपवित्र, शुद्ध और अशुद्ध, भले और बुरे, सब एक उलझी हुई भीड़ में इकट्ठे हों! ऐसी मण्डली में मिलन का बिन्दु क्या होगा? मेल और भाईचारे का साझा बन्धन क्या होगा? कौन-सी एकता, कौन-सा मेल, कौन-सी शान्ति, आत्मा की कौन-सी एकमनता सम्भव हो सकती है? निश्चय ही मन ऐसे स्वर्ग की धारणा के विरुद्ध विद्रोह करता है जिसमें धर्मी और दुष्ट के बीच कोई भेद न हो—फ़िरौन और मूसा के बीच, अब्राहम और सदोमियों के बीच, पौलुस और नीरो के बीच, पतरस और यहूदा इस्करियोती के बीच, उस मनुष्य के बीच जो हत्या या मतवालेपन के कार्य में मरता है, और बैक्सटर तथा मैक्चेन जैसे लोगों के बीच! निश्चय ही ऐसी दयनीय रूप से उलझी भीड़ में अनन्तकाल बिताना सर्वनाश से भी बुरा होगा! निश्चय ही ऐसा स्वर्ग नरक से किसी तरह बेहतर न होगा!

(घ) पवित्रता और नैतिकता इन शिक्षकों के सीधे विरुद्ध बोलती हैं।

यदि सब स्त्री-पुरुष परमेश्वर की सन्तान हैं, चाहे उनके जीवन में कितना ही अन्तर क्यों न हो—और उनमें से हर एक स्वर्ग जा रहा है, चाहे वे यहाँ संसार में एक-दूसरे से कितने ही भिन्न क्यों न हों, तो फिर पवित्रता के पीछे प्रयत्न करने का क्या लाभ? संयम, धार्मिकता और भक्ति से जीवन बिताने का कौन-सा कारण शेष रहा? इससे क्या अन्तर पड़ता है कि लोग कैसा आचरण करते हैं, यदि हर कोई स्वर्ग जाता है और कोई नरक नहीं जाता? निश्चय ही यूनान और रोम के अन्यजाति कवि और दार्शनिक भी हमें इससे अच्छी और बुद्धिमानी की बात बता सकते थे! निश्चय ही जो सिद्धान्त पवित्रता और नैतिकता को नष्ट करता है, और शुद्ध होने की खोज के सब कारण छीन लेता है, उसके माथे पर ही उसके मूल की मुहर लगी है। वह पृथ्वी का है, स्वर्ग का नहीं। वह शैतान का है, परमेश्वर का नहीं।

(ङ) बाइबल आदि से अन्त तक इन शिक्षकों के विरुद्ध बोलती है।

सैकड़ों पद उद्धृत किए जा सकते हैं जो उनके सिद्धान्तों से सर्वथा विपरीत हैं। यदि बाइबल को उनके विचारों से मेल खाना है, तो इन पदों को पूरी तरह ठुकराना पड़ेगा। उनके धर्मविज्ञान के अनुकूल होने के लिए बाइबल के इन सत्यों को फेंक देना पड़ेगा! इस गति से तो पूरी बाइबल का अधिकार शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। और इसके स्थान पर लोग हमें क्या देते हैं? कुछ भी नहीं, बिलकुल कुछ भी नहीं! वे हमसे जीवन की रोटी छीन लेते हैं, और उसकी जगह एक पत्थर तक नहीं देते।

एक बार फिर मैं हर उस व्यक्ति को चेतावनी देता हूँ जिसके हाथ में यह लेख आए कि वह इस धर्मविज्ञान से सावधान रहे। मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि इस लेख में मैं जिस सिद्धान्त को थामे रखने का प्रयत्न करता आया हूँ, उसे दृढ़ता से पकड़े रहो। जो मैंने कहा है उसे स्मरण रखो, और उसे कभी हाथ से न जाने दो। परमेश्वर की सन्तान होने के बिना महिमा का कोई उत्तराधिकार नहीं! मसीह में भाग पाए बिना परमेश्वर की सन्तान होना नहीं! तुम्हारे अपने व्यक्तिगत विश्वास के बिना मसीह में भाग नहीं! यह परमेश्वर का सत्य है। इसे कभी न छोड़ो।

इस लेख के पाठकों में अब कौन यह जानना चाहता है कि वह परमेश्वर का पुत्र है या नहीं? अपने आप से यह प्रश्न पूछो, और आज ही पूछो—और परमेश्वर की दृष्टि में पूछो—कि क्या तुमने मन फिराया और विश्वास किया है। अपने आप से पूछो कि क्या तुम मसीह को व्यक्तिगत रूप से जानते हो, और हृदय से उससे जुड़े हो। यदि नहीं, तो निश्चय जान लो कि तुम परमेश्वर के पुत्र नहीं हो। तुम अभी नया जन्म नहीं पाए हो। तुम अब भी अपने पापों में हो। परमेश्वर तुम्हारा सृजनहार हो सकता है, परन्तु वह तुम्हारा मेल किया हुआ और क्षमा करनेवाला पिता नहीं है।

हाँ! चाहे कलीसिया और संसार तुम्हें इसके विपरीत बताने पर सहमत हों—चाहे पादरी-वर्ग और सामान्य जन मिलकर तुम्हारी चापलूसी करें—परमेश्वर की दृष्टि में तुम्हारे पुत्र होने का मूल्य बहुत कम है या कुछ भी नहीं। परमेश्वर सच्चा ठहरे और हर एक मनुष्य झूठा। मसीह में विश्वास के बिना तुम परमेश्वर के पुत्र नहीं हो: तुमने नया जन्म नहीं पाया है।

इस लेख के पाठकों में कौन परमेश्वर का पुत्र बनना चाहता है? वह अपने पापों को देखे और अनुभव करे, और उद्धार के लिए मसीह की ओर भागे, और आज ही वह सन्तानों में गिना जाएगा। बस अपने अधर्म को मान लो, और उस हाथ को थाम लो जो यीशु आज तुम्हारी ओर बढ़ाता है, और पुत्र होना, अपने सब विशेषाधिकारों सहित, तुम्हारा है। बस अपने पाप मान लो, और उन्हें मसीह के पास ले आओ, और परमेश्वर "विश्वासयोग्य और धर्मी है, कि हमारे पापों को क्षमा करे और हमें सब अधर्म से शुद्ध करे।" (1 यूहन्ना 1:9) आज ही पुरानी बातें जाती रहेंगी, और सब कुछ नया हो जाएगा। आज ही तुम क्षमा किए जाओगे, "उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसे उसने हमें उस प्यारे में सेंत-मेंत दिया।" (इफिसियों 1:6) आज ही स्वर्ग में तुम्हें एक नया नाम दिया जाएगा। तुमने यह लेख पढ़ना क्रोध की सन्तान के रूप में आरम्भ किया था। आज रात तुम परमेश्वर की सन्तान के रूप में लेटोगे। इसे ध्यान में रखो: यदि पुत्र बनने की तुम्हारी घोषित इच्छा सच्ची है—यदि तुम सचमुच अपने पापों से थक गए हो, और स्वतन्त्र होने की इच्छा केवल आलसी कामना से कहीं बढ़कर है—तो तुम्हारे लिए सच्ची सान्त्वना है। यह सब सच है। यह सब पवित्रशास्त्र में वैसा ही लिखा है जैसा मैंने इस लेख में लिखा है। मैं तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई बाधा खड़ी करने का साहस नहीं करता। आज मैं कहता हूँ, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर," और तुम "पुत्र" बन जाओगे, और उद्धार पाओगे।

इस लेख के पाठकों में कौन सचमुच परमेश्वर का पुत्र है? मैं कहता हूँ, आनन्द करो, और अपने विशेषाधिकारों के लिए अत्यन्त धन्यवादी और आनन्दित रहो। आनन्द करो, क्योंकि तुम्हारे पास धन्यवाद करने का उचित कारण है। प्रिय प्रेरित के शब्द स्मरण करो: "देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ!" (1 यूहन्ना 3:1) कैसी अद्भुत बात है कि स्वर्ग पृथ्वी की ओर झुककर देखे—कि पवित्र परमेश्वर पापी मनुष्य पर अपना स्नेह लगाए, और उसे अपने परिवार में ले ले! चाहे संसार तुम्हें न समझे! चाहे इस संसार के लोग तुम पर हँसें, और तुम्हारे नाम को बुरा जानकर ठुकरा दें! वे चाहें तो हँसें। परमेश्वर तुम्हारा पिता है। तुम्हें लज्जित होने की कोई आवश्यकता नहीं। रानी किसी को सामन्त बना सकती है। बिशप पादरियों को नियुक्त कर सकते हैं। परन्तु रानी, बिशप, याजक और डीकन—सब मिलकर भी अपने बल से एक को भी परमेश्वर का पुत्र नहीं बना सकते, या किसी को परमेश्वर के पुत्र से अधिक प्रतिष्ठित नहीं कर सकते। जो मनुष्य परमेश्वर को अपना पिता, और मसीह को अपना बड़ा भाई कह सकता है—वह मनुष्य चाहे दीन और नम्र हो, उसे कभी लज्जित होने की आवश्यकता नहीं।

II. दूसरे स्थान पर, मुझे यह दिखाने दो कि सच्चे मसीही का परमेश्वर से सम्बन्ध होने के विशेष प्रमाण क्या हैं।

मनुष्य अपने पुत्र होने के विषय में निश्चित कैसे हो सकता है? वह कैसे जान सकता है कि वह उन में से है जो विश्वास के द्वारा मसीह के पास आए हैं और नया जन्म पाया है? वे कौन-से चिह्न और लक्षण हैं जिनसे "परमेश्वर के पुत्र" पहचाने जा सकते हैं? यह ऐसा प्रश्न है जो अनन्त जीवन से प्रेम रखनेवाले सब को पूछना चाहिए। यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर पवित्रशास्त्र के वे पद देते हैं जिन पर विचार करने को मैं तुमसे कह रहा हूँ, और कई अन्य पद भी।

(1) परमेश्वर के पुत्र, एक बात यह कि, सब उसके आत्मा की अगुवाई में चलते हैं।

इस लेख के शीर्ष पर जो पवित्रशास्त्र का पद है, वह क्या कहता है? "जितने परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।" (रोमियों 8:14)

वे सब एक ऐसी शक्ति की अगुवाई और शिक्षा के अधीन हैं जो सर्वशक्तिमान है, यद्यपि अदृश्य है—पवित्र आत्मा की शक्ति। वे अब अपने ही मार्ग की ओर नहीं मुड़ते, न अपनी ही आँखों के प्रकाश में चलते हैं, न अपने स्वाभाविक मन की अभिलाषा के पीछे चलते हैं। आत्मा उनकी अगुवाई करता है। आत्मा उन्हें मार्ग दिखाता है। उनके हृदय, जीवन और भावनाओं में एक हलचल है, जिसे वे अनुभव करते हैं, चाहे उसे समझा न सकें, और वह हलचल सदा न्यूनाधिक एक ही दिशा में होती है।

वे पाप से दूर, अपनी धार्मिकता के भरोसे से दूर, और संसार से दूर ले जाए जाते हैं। यही वह मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा परमेश्वर की सन्तानों को ले चलता है। जिन्हें परमेश्वर गोद लेता है उन्हें वह सिखाता और साधता है। वह उन्हें उनका अपना हृदय दिखाता है। वह उन्हें उनके अपने मार्गों से थका देता है। वह उनके मन में भीतरी शान्ति की लालसा उत्पन्न करता है।

वे मसीह के पास ले जाए जाते हैं। वे बाइबल के पास ले जाए जाते हैं। वे प्रार्थना की ओर ले जाए जाते हैं। वे पवित्रता की ओर ले जाए जाते हैं। यही वह चला-चलाया मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा उन्हें चलाता है। जिन्हें परमेश्वर गोद लेता है उन्हें वह सदा पवित्र भी करता है। वह पाप को उनके लिए बहुत कड़वा बना देता है। वह पवित्रता को उनके लिए बहुत मीठी बना देता है।

पवित्र आत्मा ही उन्हें सीनै पर्वत पर ले जाता है और पहले उन्हें व्यवस्था दिखाता है, ताकि उनके हृदय टूट जाएँ। वही उन्हें कलवरी पर ले जाता है और क्रूस दिखाता है, ताकि उनके हृदय चंगे हो जाएँ। वही उन्हें ढलानों पर चढ़ाकर पिसगा की चोटी पर ले जाता है और प्रतिज्ञा किए हुए देश का स्पष्ट दर्शन कराता है, ताकि उनके हृदय प्रफुल्लित हों। जब उन्हें जंगल में ले जाया जाता है और अपनी रिक्तता देखना सिखाया जाता है, तो यह पवित्र आत्मा की अगुवाई है। जब उन्हें ताबोर पर्वत या हेर्मोन पर्वत पर ले जाया जाता है और आनेवाली महिमा की झलकों से ऊँचा उठाया जाता है, तो यह भी पवित्र आत्मा की अगुवाई है। परमेश्वर का हर एक पुत्र इन अगुवाइयों का पात्र होता है। हर एक "[परमेश्वर के] सामर्थ्य के दिन अपनी इच्छा से" आ जाता है, और अपने आप को उसके अधीन कर देता है। और हर एक सीधे मार्ग से ऐसे नगर की ओर ले जाया जाता है जहाँ वे बस सकें। (भजन संहिता 110:3 KJV); 107:7 NIV)

इस बात को अपने हृदय में बैठा लो और इसे हाथ से जाने न दो। परमेश्वर के पुत्र ऐसे लोग हैं जो "परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में चलते हैं," और कमोबेश सदा एक ही रीति से चलाए जाते हैं। जब वे स्वर्ग में अपने अनुभव मिलाकर देखेंगे तो वे आश्चर्यजनक रूप से एक-दूसरे से मेल खाएँगे। यह पुत्रत्व का एक चिह्न है।

(2) इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सब पुत्रों में स्वर्ग में अपने पिता के प्रति गोद लिए हुए बच्चों की-सी भावनाएँ होती हैं।

इस लेख के शीर्ष पर जो पवित्रशास्त्र का वचन है, वह क्या कहता है? "तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली कि फिर भयभीत हो, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं।" (रोमियों 8:15)

परमेश्वर के पुत्र परमेश्वर के उस दबे-सिमटे भय से छुड़ाए गए हैं जिसे पाप स्वाभाविक हृदय में उत्पन्न करता है। वे दोष की उस भावना से छुड़ाए गए हैं जिसके कारण आदम "यहोवा परमेश्वर से छिपकर बाटिका के वृक्षों में" जा छिपा, और कैन "यहोवा के सामने से" चला गया। (उत्पत्ति 3:8; 4:16) अब वे परमेश्वर की पवित्रता, न्याय और प्रताप से नहीं डरते। अब वे यह अनुभव नहीं करते कि उनके और परमेश्वर के बीच कोई बड़ी खाई और रुकावट है। अब वे यह अनुभव नहीं करते कि परमेश्वर उनसे क्रुद्ध है, और उनके पापों के कारण क्रुद्ध होना ही उसके लिए अनिवार्य है। परमेश्वर के पुत्र आत्मा की इन बेड़ियों और जंजीरों से छुड़ाए गए हैं।

अब परमेश्वर के प्रति उनकी भावनाएँ शान्ति और भरोसे की हैं। वे उसे ऐसा पिता देखते हैं जो यीशु मसीह में मेल कर चुका है। वे उसे ऐसा परमेश्वर मानते हैं जिसका न्याय और पवित्रता उनके महान मध्यस्थ और मेल करानेवाले, प्रभु यीशु, के द्वारा सन्तुष्ट हो चुकी है। वे उसे ऐसा परमेश्वर देखते हैं जो "आप भी धर्मी रहे, और जो यीशु पर विश्वास करे उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो।" (रोमियों 3:26) पिता के रूप में वे साहस के साथ उसके पास आते हैं; पिता के रूप में वे उससे निःसंकोच बातें कर सकते हैं। उन्होंने दासत्व की आत्मा के बदले स्वतंत्रता की आत्मा पाई है, और भय की आत्मा के बदले प्रेम की आत्मा। वे जानते हैं कि परमेश्वर पवित्र है, फिर भी वे डरते नहीं; वे जानते हैं कि वे पापी हैं, फिर भी वे डरते नहीं। परमेश्वर पवित्र है, फिर भी वे विश्वास करते हैं कि वह पूरी रीति से मेल कर चुका है; वे पापी हैं, फिर भी वे विश्वास करते हैं कि वे पूरी रीति से यीशु मसीह को पहने हुए हैं। परमेश्वर के पुत्रों की भावना ऐसी ही होती है।

मैं मानता हूँ कि इनमें से कुछ में यह भावना दूसरों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट होती है। उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपनी मृत्यु के दिन तक दासत्व की पुरानी आत्मा के टुकड़े और अवशेष अपने साथ लिए फिरते हैं। उनमें से बहुतों के जीवन में अब भी ऐसे क्षण आते हैं जब वे अपने पुराने पापी स्वभाव के जी उठे भयों से काँप उठते हैं। परन्तु परमेश्वर के पुत्रों में से अत्यधिक बहुसंख्यक, यदि उनसे जिरह की जाए, तो यही कहेंगे कि जब से वे मसीह को जान गए हैं तब से परमेश्वर के प्रति उनकी भावनाएँ उससे बहुत भिन्न हैं जो पहले कभी थीं। उन्हें ऐसा लगता है मानो उनके और स्वर्ग में उनके पिता के बीच प्राचीन रोमी रीति का-सा गोद लेना हो चुका हो। उन्हें ऐसा लगता है मानो उसने उनमें से हर एक से कहा हो, "क्या तू मेरा पुत्र होगा?" और उनके हृदयों ने उत्तर दिया हो, "हाँ, होऊँगा।"

आओ, हम इसे भी समझने का यत्न करें और इसे दृढ़ता से थामे रहें। परमेश्वर के पुत्र ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के प्रति ऐसी भावना रखते हैं जैसी संसार की सन्तानें नहीं रखतीं। परमेश्वर की सन्तानें अब परमेश्वर का दबा-सिमटा भय नहीं मानतीं; वरन् उसके प्रति उनकी भावनाएँ मेल किए हुए पिता के प्रति-सी होती हैं। तो यह पुत्रत्व का एक और चिह्न है।

(3) फिर, परमेश्वर के पुत्रों के विवेक में पवित्र आत्मा की गवाही होती है।

इस लेख के शीर्ष पर जो पवित्रशास्त्र का वचन है, वह क्या कहता है? "आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।" (रोमियों 8:16)

परमेश्वर के पुत्रों के हृदय में कुछ ऐसा है जो उन्हें बताता है कि उनके और परमेश्वर के बीच एक सम्बन्ध है। वे कुछ ऐसा अनुभव करते हैं जो उनसे कहता है कि पुरानी बातें बीत गईं और सब कुछ नया हो गया है: कि दोष मिट गया, शान्ति लौट आई, स्वर्ग का द्वार खुल गया और नरक का द्वार बन्द हो गया। संक्षेप में, उनके पास वह है जो संसार की सन्तानों के पास नहीं—एक अनुभव की हुई, निश्चित और तर्कसंगत आशा। उनके पास वही है जिसे पौलुस पवित्र आत्मा की "मुहर" और "बयाना" कहता है। (2 कुरिन्थियों 1:22; इफिसियों 1:13)

मैं एक क्षण के लिए भी इस बात का इनकार नहीं करता कि आत्मा की यह गवाही उसी अनुपात में भिन्न-भिन्न होती है जिस अनुपात में परमेश्वर के पुत्रों के पास वह होती है। कुछ लोगों के लिए यह विवेक की एक ऊँची, स्पष्ट, गूँजती हुई और सुनिश्चित गवाही है: "मैं मसीह का हूँ, और मसीह मेरा है।" दूसरों के लिए यह एक छोटी, क्षीण, हकलाती हुई फुसफुसाहट है, जिसे शैतान और शरीर अकसर सुने जाने से रोक देते हैं। परमेश्वर की कुछ सन्तानें पूरे निश्चय के साथ स्वर्ग की ओर अपनी दौड़ में दौड़ती चली जाती हैं। दूसरे अपनी यात्रा में इधर-उधर थपेड़े खाते रहते हैं और मुश्किल से ही मान पाते हैं कि उन्हें विश्वास मिला है। परन्तु परमेश्वर के पुत्रों में से सबसे छोटे और सबसे निचले को लीजिए: उससे पूछिए कि क्या वह उस थोड़ी-सी धार्मिक आशा को छोड़ देगा जो उसे मिली है? उससे पूछिए कि क्या वह अपने हृदय को, अपने सारे सन्देहों और संघर्षों, अपनी कुश्तियों और भयों समेत, उस घोर संसारी और लापरवाह मनुष्य के हृदय से बदल लेगा? उससे पूछिए कि क्या वह मुड़कर उन बातों को जिन्हें उसने थामा है फेंक देने और संसार में लौट जाने से सन्तुष्ट होगा? उत्तर क्या होगा, इस पर कौन सन्देह कर सकता है? वह कहेगा, "मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं नहीं जानता कि मुझमें विश्वास है या नहीं, और मुझे निश्चय नहीं कि मुझे अनुग्रह मिला है; परन्तु मेरे भीतर कुछ ऐसा है जिसे मैं छोड़ना नहीं चाहूँगा।" और वह "कुछ" क्या है? मैं आपको बताता हूँ—वह आत्मा की गवाही है।

आइए, हम यह भी समझने का यत्न करें कि परमेश्वर के पुत्रों के विवेक में आत्मा की गवाही होती है। यह पुत्रत्व का एक और चिह्न है।

(4) मैं एक बात और जोड़ता हूँ। परमेश्वर के सब पुत्र मसीह के साथ दुःख में सहभागी होते हैं।

इस लेख के शीर्ष का पवित्रशास्त्र-वचन क्या कहता है? "यदि हम सन्तान हैं तो वारिस भी हैं—परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस, यदि हम उसके साथ दुःख उठाएँ।" (रोमियों 8:17)

परमेश्वर की सब सन्तानों को एक क्रूस उठाना पड़ता है। उन्हें सुसमाचार के कारण परीक्षाओं, क्लेशों और दुःखों से होकर गुज़रना पड़ता है। उन पर संसार की ओर से परीक्षाएँ आती हैं, शरीर की ओर से परीक्षाएँ आती हैं, और शैतान की ओर से परीक्षाएँ आती हैं। उन पर अपने सम्बन्धियों और मित्रों की ओर से भावनाओं को ठेस पहुँचने की परीक्षाएँ आती हैं—कठोर वचन, रूखा व्यवहार और निर्दय न्याय। उन पर चरित्र के विषय में परीक्षाएँ आती हैं; निन्दा, झूठा चित्रण, उपहास, और बुरे उद्देश्यों का आरोप—ये सब प्रायः उन पर भारी पड़ते हैं। उन पर सांसारिक हितों के विषय में परीक्षाएँ आती हैं। उन्हें प्रायः यह चुनना पड़ता है कि वे मनुष्य को प्रसन्न करके परमेश्वर की महिमा खोएँगे, या परमेश्वर की महिमा पाकर मनुष्य को अप्रसन्न करेंगे। उन पर अपने ही हृदय की ओर से परीक्षाएँ आती हैं। सामान्यतः हर एक का अपना शरीर में काँटा होता है—उसका अपना भीतर बसा हुआ शैतान, जो उसका सबसे बुरा शत्रु है। परमेश्वर के पुत्रों का यही अनुभव है।

उनमें से कुछ अधिक दुःख उठाते हैं और कुछ कम। कुछ एक रीति से दुःख उठाते हैं और कुछ दूसरी रीति से। परमेश्वर एक बुद्धिमान वैद्य की नाईं उनका भाग नापकर देता है और भूल नहीं कर सकता। परन्तु मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की ऐसी कोई सन्तान कभी नहीं हुई जो बिना क्रूस के स्वर्गलोक तक पहुँची हो।

दुःख प्रभु के परिवार का प्रतिदिन का भोजन है। "प्रभु जिससे प्रेम करता है उसकी ताड़ना करता है।" "यदि तुम ताड़ना नहीं सहते (और सब ताड़ना सहते हैं), तो तुम औरस नहीं, बल्कि व्यभिचार की सन्तान ठहरे।" "हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।" "जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं, वे सब सताए जाएँगे।" (इब्रानियों 12:6, 8; प्रेरितों के काम 14:22; 2 तीमुथियुस 3:12) जब भक्त लैटिमर से उसके मकान-मालिक ने कहा कि उसने अपने जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं देखा, तो लैटिमर ने कहा, "तब परमेश्वर यहाँ नहीं हो सकता।"

दुःख उस प्रक्रिया का एक भाग है जिससे परमेश्वर के पुत्र पवित्र किए जाते हैं। उनकी ताड़ना इसलिए होती है कि वे संसार से छूट जाएँ और परमेश्वर की पवित्रता में सहभागी हो जाएँ। उनके उद्धार का अगुवा "दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध" किया गया, और वे भी वैसे ही किए जाते हैं। (इब्रानियों 2:10; 12:10) ऐसा कोई महान सन्त कभी नहीं हुआ जिसने या तो बड़े कष्ट या बड़े सतावों का अनुभव न किया हो। आरम्भिक कलीसिया के एक पिता, मेलांकथॉन ने कहा, "जहाँ चिन्ताएँ नहीं होतीं वहाँ सामान्यतः प्रार्थनाएँ भी नहीं होतीं।"

आइए, हम इसे अपने हृदयों में भी स्थिर कर लें। परमेश्वर के सब पुत्रों को एक क्रूस उठाना पड़ता है। दुःख उठानेवाले उद्धारकर्ता के चेले प्रायः दुःख उठानेवाले ही होते हैं। दूल्हा दुःखी पुरुष था। इसलिए दुल्हन सुख-विलास में रहनेवाली और शोक से अनजान स्त्री नहीं होनी चाहिए। धन्य हैं वे जो शोक करते हैं! आइए, हम क्रूस के विषय में कुड़कुड़ाएँ नहीं। यह भी पुत्रत्व का एक चिह्न है।

मैं लोगों को चेतावनी देता हूँ कि जब तक उनमें पुत्रत्व के पवित्रशास्त्रीय चिह्न न हों, वे कभी यह न मान लें कि वे परमेश्वर के पुत्र हैं। प्रमाणों के बिना पुत्रत्व से सावधान रहो। मैं फिर कहता हूँ, सावधान रहो। जब किसी मनुष्य के पास मुझे दिखाने के लिए आत्मा की अगुवाई नहीं, बताने के लिए लेपालकपन की आत्मा नहीं, विवेक में आत्मा की गवाही नहीं, और अनुभव में क्रूस नहीं—तो क्या यह मनुष्य परमेश्वर का पुत्र है? दूसरे चाहे जो सोचें, मैं तो यह कहने का साहस नहीं करूँगा कि वह है! यह उसकी लज्जा की बात है कि वह परमेश्वर की सन्तानों में से नहीं है। (व्यवस्थाविवरण 32:5) वह महिमा का वारिस नहीं है।

मुझसे यह न कहो कि तुम्हारा बपतिस्मा हुआ है और तुम्हें कलीसिया का प्रश्नोत्तरी-पाठ सिखाया गया है, इसलिए तुम परमेश्वर की सन्तान होगे। मैं तुमसे कहता हूँ कि कलीसिया का पंजीयन-बही जीवन की पुस्तक नहीं है। मैं तुमसे कहता हूँ कि परमेश्वर की सन्तान ठहराकर नामकरण पाना और शिशु-अवस्था में नया जन्म पाया हुआ कहलाना एक बात है; परन्तु वास्तव में परमेश्वर की सन्तान होना बिलकुल दूसरी बात है। जाकर उस प्रश्नोत्तरी-पाठ को फिर से पढ़ो। यह "पाप के लिए मरना और धार्मिकता के लिए नया जन्म" ही है जो लोगों को अनुग्रह की सन्तान बनाता है। जब तक तुम इन बातों को अनुभव से नहीं जानते, तुम परमेश्वर के पुत्र नहीं हो।

मुझसे यह न कहो कि तुम मसीह की कलीसिया के सदस्य हो और इसलिए तुम पुत्र ही होगे। मैं उत्तर देता हूँ कि कलीसिया के पुत्र अनिवार्यतः परमेश्वर के पुत्र नहीं होते। ऐसा पुत्रत्व रोमियों के आठवें अध्याय का पुत्रत्व नहीं है। वही वह पुत्रत्व है जो तुम्हारे पास होना चाहिए यदि तुम्हें उद्धार पाना है।

और अब, मुझे सन्देह नहीं कि इस लेख का कोई पाठक जानना चाहेगा कि क्या वह आत्मा की गवाही के बिना उद्धार पा सकता है।

मैं उत्तर देता हूँ: यदि पवित्र आत्मा की गवाही से तुम्हारा तात्पर्य आशा की पूर्ण निश्चयता से है — तो निःसन्देह तुम उद्धार पा सकते हो। परन्तु यदि तुम यह जानना चाहते हो कि क्या कोई मनुष्य उद्धार के किसी भी भीतरी बोध, या ज्ञान, या आशा के बिना उद्धार पा सकता है, तो मेरा उत्तर है कि साधारणतः वह नहीं पा सकता। मैं तुम्हें स्पष्ट चेतावनी देता हूँ कि परमेश्वर के सामने अपनी दशा के विषय में सारी अनिश्चितता को दूर फेंक दो, और अपने बुलाए जाने को पक्का करो। अपनी स्थिति और सम्बन्ध को स्पष्ट कर लो। यह मत सोचो कि सदा सन्देह करते रहने में कोई प्रशंसा की बात है। उसे रोमन कैथोलिकों के लिए छोड़ दो। एक भक्त प्यूरिटन ने कहा, "निश्चयता प्राप्त की जा सकती है; और यदि हमने उसे प्राप्त नहीं किया, तो मसीही बनने के बाद से हम अपने सारे जीवन में क्या करते रहे हैं?"

मुझे सन्देह नहीं कि इस लेख को पढ़नेवाले कुछ सच्चे मसीही यह सोचेंगे कि पुत्र होने का उनका प्रमाण इतना थोड़ा है कि वह भला नहीं ठहर सकता, और वे अपने विषय में बुरी बातें सोचेंगे। मुझे उन्हें ढाढ़स बँधाने का प्रयत्न करने दो। जो भावनाएँ तुम में हैं, वे तुम्हें किसने दीं? तुम्हें पाप से घृणा करना किसने सिखाया? तुम्हें मसीह से प्रेम करना किसने सिखाया? तुम्हारे मन में पवित्रता की लालसा और उसके लिए प्रयत्न किसने उत्पन्न किया? ये भावनाएँ कहाँ से आईं? क्या ये स्वभाव से आईं? स्वाभाविक मनुष्य के हृदय में ऐसी भावनाएँ नहीं होतीं। क्या ये शैतान से आईं? वह तो हर मूल्य पर ऐसी भावनाओं को रोकने का यत्न करेगा। ढाढ़स बाँधो और साहस रखो। मत डरो, और उदास न हो। आगे बढ़ो, और चलते रहो। तुम्हारे लिए अब भी आशा है। प्रयत्न करो। परिश्रम करो। खोजो। माँगो। खटखटाओ। आगे बढ़ते रहो। तुम अवश्य देखोगे कि तुम "परमेश्वर के पुत्र" हो।

3. अब अन्त में मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि सच्चे मसीही के परमेश्वर के साथ सम्बन्ध के विशेषाधिकार क्या हैं।

परमेश्वर के पुत्रों की आशाओं से अधिक महिमामय कुछ भी सोचा नहीं जा सकता। इस लेख के आरम्भ में दिए गए पवित्रशास्त्र के शब्दों में भली और सुखदायक बातों की एक समृद्ध खान है। पौलुस कहता है, "यदि हम सन्तान हैं, तो वारिस भी हैं, वरन् परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, यदि हम उसके साथ दुःख उठाएँ, ताकि उसके साथ महिमा भी पाएँ।" (रोमियों 8:17)

तब सच्चे मसीही "वारिस" हैं। उनमें से प्रत्येक के लिए कुछ तैयार किया गया है, जो अभी प्रकट होना है।

वे "परमेश्वर के वारिस" हैं। पृथ्वी पर किसी धनवान के वारिस होना भी बड़ी बात है। तो राजाओं के राजा के पुत्र और वारिस होना कितना बड़ा है!

वे "मसीह के संगी वारिस" हैं। वे उसके प्रताप में सहभागी होंगे, और उसकी महिमा में हिस्सा लेंगे। वे उसके साथ महिमा पाएँगे।

और हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह परमेश्वर की सब सन्तानों के लिए है। अब्राहम ने अपनी सब सन्तानों के लिए प्रबन्ध करने का ध्यान रखा, और परमेश्वर अपनी सन्तानों के लिए प्रबन्ध करने का ध्यान रखता है। उनमें से कोई भी विरासत से वंचित नहीं किया जाता। कोई भी निकाला नहीं जाएगा। कोई भी काटा नहीं जाएगा। जिस दिन प्रभु बहुत से पुत्र-पुत्रियों को महिमा में पहुँचाएगा, उस दिन प्रत्येक अपने स्थान पर खड़ा होगा और उसका भाग पाएगा।

सन्तों की विरासत का पूरा स्वरूप हमें कौन बता सकता है? उस महिमा का वर्णन कौन कर सकता है जो परमेश्वर की सन्तानों पर अभी प्रकट और दी जानेवाली है? शब्द कम पड़ जाते हैं। भाषा अपर्याप्त रह जाती है। सर्वशक्तिमान प्रभु के पुत्र-पुत्रियों पर आनेवाली महिमा में जो कुछ समाया है, उसे न मन पूरी रीति से सोच सकता है, न जीभ पूर्णता से कह सकती है। ओह, प्रेरित यूहन्ना का यह कथन सचमुच सत्य है: "अब तक यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या कुछ होंगे।" (1 यूहन्ना 3:2)

स्वयं बाइबल भी इस विषय पर पड़े परदे को केवल थोड़ा ही उठाती है। इससे अधिक वह कर भी कैसे सकती थी? यदि हमें और बताया जाता, तब भी हम उसे भली-भाँति समझ न पाते। हमारी मानसिक क्षमता अभी बहुत सांसारिक है — हमारी समझ अभी बहुत शारीरिक है कि उससे अधिक को ग्रहण कर सके। बाइबल प्रायः इस विषय को निषेधात्मक शब्दों में बताती है, सकारात्मक कथनों में नहीं। वह बताती है कि उस महिमामय विरासत में क्या-क्या नहीं होगा, ताकि हमें कुछ धुँधला-सा अनुमान हो जाए कि वहाँ क्या होगा। वह कुछ बातों की अनुपस्थिति का चित्र खींचती है, ताकि हम वहाँ की उपस्थित बातों के आशीर्वाद का कुछ अंश पी सकें।

वह हमें बताती है कि वह विरासत "अविनाशी, निर्मल और अजर" है। वह हमें बताती है कि "महिमा का मुकुट कभी मुरझाएगा नहीं"। वह हमें बताती है कि शैतान "बाँधा" जाएगा, कि "वहाँ रात न होगी" और "फिर श्राप न होगा", कि "मृत्यु और अधोलोक आग की झील में डाले गए", कि "हर एक आँसू उनकी आँखों से पोंछ दिया जाएगा", और कि वहाँ का निवासी कभी न कहेगा, "मैं रोगी हूँ।" और ये सचमुच महिमामय बातें हैं। कोई सड़ाहट नहीं! कोई मुरझाना नहीं! कोई कुम्हलाना नहीं! कोई शैतान नहीं! पाप का कोई श्राप नहीं! कोई शोक नहीं! कोई आँसू नहीं! कोई रोग नहीं! कोई मृत्यु नहीं! निश्चय ही परमेश्वर की सन्तानों का कटोरा लबालब भर जाएगा! (1 पतरस 1:4; 5:4; प्रकाशितवाक्य 20:2; 21:25; 22:3; 20:14; 21:4; यशायाह 33:24)

परन्तु परमेश्वर के वारिसों पर आनेवाली महिमा के विषय में हमें कुछ सकारात्मक बातें भी बताई गई हैं, जिन्हें छिपाकर नहीं रखना चाहिए। उनकी भावी विरासत में बहुत-से मधुर, सुखद और अवर्णनीय सांत्वनाएँ हैं, जिन पर सब सच्चे मसीहियों को विचार करना भला होगा। पवित्रशास्त्र के बहुत-से शब्दों और कथनों में थके हुए यात्रियों के लिए आनन्ददायक ताज़गी है, जिन्हें तुम्हें और मुझे आवश्यकता के समय के लिए संजोकर रखना चाहिए।

(क) क्या ज्ञान अभी हमें प्रिय लगता है?

क्या परमेश्वर, मसीह और बाइबल के विषय में जो थोड़ा हम जानते हैं, वह हमारी आत्माओं को बहुमूल्य लगता है, और क्या हम और अधिक के लिए तरसते हैं? स्वर्ग में हमें पूर्ण ज्ञान मिलेगा। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "तब मैं ऐसे पूरी रीति से जानूँगा, जैसे मैं पूरी रीति से जाना गया हूँ।" (1 कुरिन्थियों 13:12) परमेश्वर का धन्यवाद हो, विश्वासियों में फिर कोई मतभेद न रहेगा! अन्त में सब आँख से आँख मिलाकर देखेंगे। पहले की अज्ञानता जाती रहेगी। यह देखकर हम चकित होंगे कि हम कितने बालक-समान और अन्धे थे।

(ख) क्या पवित्रता अभी हमें प्रिय लगती है?

क्या पाप ही हमारे जीवन का बोझ और कड़वाहट है? क्या हम परमेश्वर के स्वरूप के पूर्ण अनुरूप होने की लालसा रखते हैं? स्वर्ग में हमारी पवित्रता सिद्ध होगी। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "मसीह ने कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया," केवल इसलिये नहीं कि वह उसे पृथ्वी पर पवित्र करे, वरन् इसलिये भी कि "उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बनाकर अपने पास खड़ी करे, जिस में न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, वरन् पवित्र और निर्दोष हो।" (इफिसियों 5:27) आह! पाप से सदा के लिये विदा लेने की कैसी धन्यता है! आह! हम में से सर्वोत्तम जन भी अभी कितना कम कर पाते हैं! आह! हमारे सब उद्देश्यों, सब विचारों, सब वचनों और सब कामों से कैसी अकथनीय बुराई गोंद के समान चिपकी रहती है! आह! हम में से कितने ही अपने वचनों में भक्त हैं, पर अपने कर्मों में कितने निर्बल! परमेश्वर का धन्यवाद हो, यह सब बदल जाएगा।

(ग) क्या विश्राम हमें अभी प्रिय लगता है?

क्या हम प्रायः "थके हुए, तौभी पीछा करते हुए" (न्यायियों 8:4) अनुभव करते हैं? क्या हम ऐसे संसार की लालसा रखते हैं जहाँ हमें सदा चौकसी करने और युद्ध करने की आवश्यकता न रहेगी? महिमा में हमें पूर्ण विश्राम मिलेगा। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "इसलिये जान लो कि परमेश्वर के लोगों के लिये सब्त का विश्राम बाकी है।" (इब्रानियों 4:9) संसार, शरीर और शैतान के साथ दिन-प्रतिदिन, घड़ी-घड़ी का संघर्ष अन्त में समाप्त हो जाएगा। शत्रु वश में कर लिया जाएगा। युद्ध समाप्त हो जाएगा। दुष्ट लोग अन्त में हमें सताना छोड़ देंगे। थके-माँदे लोग अन्त में विश्राम पाएँगे। वहाँ बड़ी शान्ति होगी।

(घ) क्या सेवा हमें अभी प्रिय लगती है?

क्या हम मसीह के लिये काम करना मधुर पाते हैं, फिर भी ऐसे दुर्बल शरीर के बोझ से कराहते हैं? क्या हमारी आत्मा प्रायः तैयार तो होती है, पर बेचारे निर्बल शरीर से बाधित और जकड़ी हुई? क्या मसीह के नाम से एक कटोरा ठंडा पानी देने का अवसर मिलने पर हमारे हृदय हमारे भीतर जल उठे हैं, और क्या हमने यह सोचकर आह भरी है कि हम कैसे निकम्मे दास हैं? आओ, हम ढाढ़स बाँधें। महिमा में हम सिद्ध रीति से और बिना थके सेवा कर सकेंगे। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "वे उसके मन्दिर में दिन रात उसकी सेवा करते हैं।" (प्रकाशित वाक्य 7:15)

(ङ) क्या तृप्ति हमें अभी प्रिय लगती है?

क्या हम संसार को खोखला पाते हैं? क्या हम अपने हृदयों के हर खाली स्थान के भरे जाने की लालसा रखते हैं? महिमा में हमें पूर्ण तृप्ति मिलेगी। तब हमें अपने सब मिट्टी के बर्तनों की दरारों पर, अपने सब गुलाबों के काँटों पर, और अपने सब मधुर प्यालों की कड़वी तलछट पर विलाप नहीं करना पड़ेगा। तब हम योना के साथ मुरझाए हुए कद्दू के लिये विलाप न करेंगे। तब हम सुलैमान के साथ यह न कहेंगे, "ये सब व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है।" तब हम बूढ़े दाऊद के साथ यह न पुकारेंगे, "मैं ने देखा है कि सब सिद्धता की सीमा होती है।" पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "जब मैं जागूँगा तब तेरे स्वरूप से तृप्त हूँगा।" (सभोपदेशक 1:14; भजन संहिता 119:96; भजन संहिता 17:15)

(च) क्या पवित्र लोगों की सहभागिता हमें अभी प्रिय लगती है?

क्या हम अनुभव करते हैं कि हम "तेजस्वी जनों" के संग जितने सुखी होते हैं उतने कभी नहीं होते? क्या हम उनकी संगति में सबसे अधिक अपने घर जैसा अनुभव करते हैं? (भजन संहिता 16:3) स्वर्ग में हमें पूर्ण सहभागिता मिलेगी। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करनेवालों को उसके राज्य में से इकट्ठा करेंगे।" "वह तुरही के बड़े शब्द के साथ अपने दूतों को भेजेगा, और वे उसके चुने हुओं को चारों दिशाओं से इकट्ठा करेंगे।" (मत्ती 13:41; 24:31) परमेश्वर की स्तुति हो! हम उन सब पवित्र लोगों को देखेंगे जिनके विषय में हमने बाइबल में पढ़ा है, और जिनके पदचिह्नों पर चलने का हमने प्रयत्न किया है। हम प्रेरितों, भविष्यद्वक्ताओं, कुलपतियों, शहीदों, धर्म-सुधारकों, मिशनरियों और सेवकों को देखेंगे, जिनके योग्य संसार न था। हम उन लोगों के मुख देखेंगे जिन्हें हमने पृथ्वी पर मसीह में जाना और प्रेम किया, और जिनके चले जाने पर हमने कड़वे आँसू बहाए। हम उन्हें पहले से कहीं अधिक उज्ज्वल और महिमामय देखेंगे। और सबसे उत्तम यह कि हम उन्हें बिना हड़बड़ी और चिन्ता के देखेंगे, और यह अनुभव किये बिना कि हम केवल फिर बिछड़ने के लिये मिल रहे हैं। आनेवाली महिमा में न मृत्यु है, न बिछोह, न विदाई।

(छ) क्या मसीह की सहभागिता हमें अभी प्रिय लगती है?

क्या हम उसके नाम को अपने लिये बहुमूल्य पाते हैं? क्या उसके मरते हुए प्रेम का विचार करके हमारे हृदय हमारे भीतर जल उठते हैं? स्वर्ग में हमें उसके साथ पूर्ण सहभागिता मिलेगी। "हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17) हम उसके साथ स्वर्गलोक में होंगे। (लूका 23:43) हम राज्य में उसका मुख देखेंगे। हमारी ये आँखें उन हाथों और पाँवों को देखेंगी जो कीलों से छेदे गए थे, और उस सिर को जिस पर काँटों का मुकुट रखा गया था। जहाँ वह है, वहीं परमेश्वर के पुत्र भी होंगे। जब वह आएगा, तो वे उसके साथ आएँगे। जब वह अपनी महिमा में बैठेगा, तो वे उसके पास बैठेंगे। यह सचमुच धन्य आशा है! मैं एक मरते हुए संसार में एक मरता हुआ मनुष्य हूँ। मेरे आगे सब कुछ अन्धकारमय है। आनेवाला संसार एक अनजाना बन्दरगाह है। परन्तु मसीह वहाँ है, और यही बहुत है। निश्चय यदि पृथ्वी पर विश्वास से उसके पीछे चलने में विश्राम और शान्ति है, तो जब हम उसे आमने-सामने देखेंगे तब कहीं अधिक विश्राम और शान्ति होगी। यदि हमने जंगल में बादल और आग के खम्भे के पीछे चलना अच्छा पाया है, तो प्रतिज्ञा किये हुए देश में अपने यहोशू के साथ अपने अनन्त भाग में बैठना हजार गुना अच्छा लगेगा।

यदि इस लेख के पाठकों में से कोई अब तक पुत्रों और उत्तराधिकारियों में नहीं है, तो मैं पूरे हृदय से तुझ पर तरस खाता हूँ! तू कितना कुछ खो रहा है! तू सच्ची शान्ति का कितना थोड़ा आनन्द ले रहा है! तू वहाँ संघर्ष कर रहा है, आग में परिश्रम कर रहा है, और केवल सांसारिक उद्देश्यों के लिये अपने आप को खपा रहा है—विश्राम ढूँढ़ता है और पाता नहीं—छायाओं का पीछा करता है और कभी पकड़ नहीं पाता—सोचता है कि मैं सुखी क्यों नहीं, फिर भी कारण देखने से इनकार करता है—भूखा, प्यासा और खाली, फिर भी अपनी पहुँच के भीतर की भरपूरी के प्रति अन्धा! आह, कि तू बुद्धिमान होता! आह, कि तू यीशु की वाणी सुनता और उससे सीखता!

यदि तुम उनमें से हो जो पुत्र और वारिस हैं, तो तुम उचित रूप से आनन्दित और सुखी हो सकते हो। तुम 'पिलग्रिम्स प्रोग्रेस' के बालक धीरज के समान आनन्द के साथ प्रतीक्षा कर सकते हो: तुम्हारी सबसे उत्तम वस्तुएँ अभी आनेवाली हैं। तुम बिना बड़बड़ाए सहजता से क्रूस उठा सकते हो: तुम्हारा हल्का सा क्लेश तो बस पल भर का है। 'इस समय के दुःख उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं।' 'जब मसीह, जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा में प्रगट किए जाओगे।' (रोमियों 8:18; कुलुस्सियों 3:4) तुम्हें पापी और उसकी समृद्धि से डाह करने की आवश्यकता नहीं। तुम ही सचमुच धनी हो। मेरी अपनी कलीसिया के एक मरते हुए विश्वासी ने ठीक ही कहा था: 'मैं अपने पूरे जीवन में कभी इतना धनी नहीं था जितना अब हूँ।' तुम वैसे ही कह सकते हो जैसे मपीबोशेत ने दाऊद से कहा था: 'वह सब कुछ ले ले, क्योंकि मेरा प्रभु राजा कुशल से अपने घर आ गया है।' (2 शमूएल 19:30) तुम वैसे ही कह सकते हो जैसे सिकन्दर ने कहा था, जब उसने अपनी सारी सम्पत्ति बाँट दी और उससे पूछा गया कि अपने लिए क्या रखा है: 'मेरे पास आशा है।' तुम्हें बीमारी से हताश होने की आवश्यकता नहीं: तुम्हारा जो भाग अनन्त है वह सुरक्षित है और उसका प्रबन्ध हो चुका है, चाहे तुम्हारे शरीर का कुछ भी हो। तुम मृत्यु को शान्ति से देख सकते हो: वह तुम्हारे और तुम्हारी मीरास के बीच का द्वार खोल देती है। तुम्हें संसार की वस्तुओं के लिए—बिछोड़ों और शोक के लिए, हानियों और क्रूसों के लिए—अत्यधिक शोक करने की आवश्यकता नहीं: एकत्र होने का दिन तुम्हारे सामने है। तुम्हारा धन हानि की पहुँच से बाहर है। प्रति वर्ष स्वर्ग तुम्हारे प्रियजनों से अधिक भरता जा रहा है, और पृथ्वी अधिक खाली होती जा रही है। अपनी मीरास पर गर्व करो। यदि तुम परमेश्वर के पुत्र हो तो यह सब तुम्हारा है: 'यदि हम सन्तान हैं तो वारिस भी हैं।'

(1) और अब, इस निबन्ध को समाप्त करते हुए, मैं इसके हर पढ़नेवाले से पूछता हूँ, तुम किसकी सन्तान हो?

क्या तुम स्वभाव की सन्तान हो या अनुग्रह की सन्तान? क्या तुम शैतान की सन्तान हो या परमेश्वर की सन्तान? तुम एक ही समय में दोनों नहीं हो सकते। तुम कौन से हो?

इस प्रश्न को बिना देर किए सुलझा लो, क्योंकि अन्त में तुम्हें इनमें से किसी एक के रूप में ही मरना होगा। इसे सुलझा लो, क्योंकि यह सुलझाया जा सकता है, और इसे संदेह में छोड़ना मूर्खता है। इसे सुलझा लो, क्योंकि समय थोड़ा है, संसार बूढ़ा होता जा रहा है, और तुम तेज़ी से मसीह के न्याय-आसन के निकट पहुँच रहे हो। इसे सुलझा लो, क्योंकि मृत्यु निकट है, प्रभु निकट है, और कौन जानता है कि एक दिन क्या ले आए? ओह, कि तुम तब तक चैन न लो जब तक यह प्रश्न सुलझ न जाए! ओह, कि तुम तब तक कभी सन्तुष्ट न हो जब तक यह न कह सको, 'मैं नया जन्म पा चुका हूँ: मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ!'

(2) यदि तुम परमेश्वर के पुत्र और वारिस नहीं हो, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि बिना देर किए एक बन जाओ।

क्या तुम धनी होना चाहते हो? मसीह में अगम्य धन है। क्या तुम ऊँचा उठाया जाना चाहते हो? तुम राजा बनोगे। क्या तुम सुखी होना चाहते हो? तुम्हें ऐसी शान्ति मिलेगी जो समझ से परे है, जिसे संसार कभी दे नहीं सकता और कभी छीन नहीं सकता। ओह, बाहर निकल आओ और क्रूस उठाकर मसीह के पीछे हो लो! असावधान और संसारी लोगों के बीच से बाहर निकल आओ, और प्रभु का वचन सुनो: 'मैं तुम्हारा पिता हूँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ होगे, यह सर्वशक्तिमान प्रभु का वचन है।' (2 कुरिन्थियों 6:18)

(3) यदि तुम परमेश्वर के पुत्र हो, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि अपने पिता के घराने के योग्य चाल चलो।

मैं तुम्हें गम्भीरता से आदेश देता हूँ कि अपने जीवन से उसका आदर करो; और सबसे बढ़कर उसकी सब आज्ञाओं के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता द्वारा उसका आदर करो, और उसकी सब सन्तानों से सच्चा प्रेम रखो। संसार में से परमेश्वर की सन्तान और महिमा के वारिस के समान चलने का प्रयत्न करो। लोग तुम्हारे और तुम्हारे स्वर्गीय पिता के बीच पारिवारिक समानता को पहचान सकें। स्वर्गीय जीवन जियो। ऊपर की वस्तुओं की खोज में रहो। ऐसा न लगे कि तुम यहाँ नीचे अपना घोंसला बना रहे हो। उस मनुष्य के समान व्यवहार करो जो उस नगर की खोज में है जो दिखाई नहीं देता, जिसकी नागरिकता स्वर्ग में है, और जो घर पहुँचने तक बहुत कष्टों में भी सन्तुष्ट रहेगा।

जिस भी परिस्थिति में तुम रखे जाओ, उसमें परमेश्वर के पुत्र जैसा अनुभव करने का परिश्रम करो। यह कभी न भूलो कि जब तक तुम यहाँ पृथ्वी पर हो, तुम अपने पिता की भूमि पर हो। यह कभी न भूलो कि पिता का हाथ ही तुम्हारे पास तुम्हारी सब दयाएँ और क्रूस भेजता है। अपनी सारी चिन्ता उस पर डाल दो। उसमें सुखी और प्रसन्न रहो। सचमुच, यदि तुम राजा के पुत्र हो तो उदास क्यों रहो? जब लोग तुम्हें देखें तो वे कभी यह सन्देह क्यों करें कि परमेश्वर की सन्तान होना सुखद बात है या नहीं?

दूसरों के प्रति परमेश्वर के पुत्र के समान व्यवहार करने का परिश्रम करो। अपनी पीढ़ी में निर्दोष और भोले बने रहो। 'मेल करानेवाले' बनो। (मत्ती 5:9) अपनी सन्तान के लिए सबसे बढ़कर परमेश्वर का पुत्र होना चाहो: उनके लिए और जो कुछ भी करो, स्वर्ग में मीरास चाहो। कोई मनुष्य अपनी सन्तान के लिए उतना अच्छा प्रबन्ध नहीं छोड़ जाता जितना वह जो उन्हें परमेश्वर के पुत्र और वारिस बनाकर छोड़ जाता है।

यदि तुम परमेश्वर के पुत्र हो, तो अपनी मसीही बुलाहट में दृढ़ रहो और और अधिक आगे बढ़ते जाओ। हर बोझ को और उस पाप को जो सहज ही उलझा लेता है, उतार फेंकने में सावधान रहो। अपनी आँखें स्थिर रूप से यीशु पर लगाए रखो। उसमें बने रहो। स्मरण रखो कि यीशु के बिना तुम कुछ नहीं कर सकते और यीशु के साथ सब कुछ कर सकते हो। (यूहन्ना 15:5; फिलिप्पियों 4:13) प्रतिदिन जागते और प्रार्थना करते रहो। दृढ़, अटल और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते रहो। अपने हृदय में यह निश्चय कर लो कि ठण्डे पानी का एक कटोरा भी, जो इसलिए दिया जाए कि तुम यीशु के चेले हो, अपना प्रतिफल कभी न खोएगा, और हर वर्ष तुम स्वर्ग में अपने घर के और निकट आ रहे हो।

'क्योंकि थोड़ा ही और समय है, फिर जो आनेवाला है वह आएगा, और देर न करेगा।' (इब्रानियों 10:37)

तब सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुड़ाई जाएगी और परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतन्त्रता प्राप्त करेगी। (रोमियों 8:19, 21) तब संसार मान लेगा कि परमेश्वर की सन्तान ही सचमुच बुद्धिमान थी। तब परमेश्वर के पुत्र अन्ततः वयस्क हो जाएँगे, और अपनी मीरास की प्रतीक्षा नहीं करते रहेंगे, वरन् सचमुच उसके अधिकारी होंगे। तब वे अत्यन्त आनन्द के साथ वे सांत्वनादायक वचन सुनेंगे, 'हे मेरे पिता के धन्य लोगो, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ जो जगत की उत्पत्ति से तुम्हारे लिए तैयार किया हुआ है।' (मत्ती 25:34) निश्चय ही वह दिन सब कुछ की भरपाई कर देगा!

महासभा का एकत्र होना

'हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने और उसके पास हमारे इकट्ठे होने के विषय में' [2 थिस्सलुनीकियों 2:1]

इस पृष्ठ के शीर्ष पर लिखे पद में एक ऐसा वाक्यांश है जो हमारे अत्यन्त सावधान ध्यान के योग्य है। वह वाक्यांश है—'हमारा इकट्ठा होना।'

"हमारा इकट्ठा किया जाना।" ये तीन शब्द पृथ्वी के हर भाग में प्रतिध्वनि पाने चाहिए। मनुष्य स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी है; उसे अकेला रहना अच्छा नहीं लगता। पृथ्वी पर जहाँ चाहे जाओ, तुम पाओगे कि लोग प्रायः एक-दूसरे से मिलना और एक-दूसरे के चेहरे देखना पसंद करते हैं। आदम की सन्तानों में ऐसे लोग अपवाद हैं, नियम नहीं, जिन्हें "इकट्ठा होना" अच्छा नहीं लगता।

उदाहरण के लिए, बड़ा दिन ऐसा समय माना जाता है जब अंग्रेज़ लोग "इकट्ठा होते" हैं। यह वह ऋतु है जब पारिवारिक मिलन लगभग एक राष्ट्रीय परम्परा बन गए हैं। नगरों में और देहातों में, धनवानों में और निर्धनों में, राजमहल से लेकर कंगाल की झोपड़ी तक, बड़े दिन का उल्लास और बड़े दिन की दावतें सर्वत्र देखी जाती हैं। बहुतों के लिए पूरे वर्ष में अपने मित्रों से मिलने का यही एकमात्र अवसर होता है। पुत्र व्यापारिक क्षेत्र से कुछ दिन चुराकर अपने माता-पिता से मिलने दौड़े चले आते हैं; भाई अपनी मेज़ की नौकरी से छुट्टी लेकर अपनी बहनों के साथ एक सप्ताह बिताते हैं; मित्र अपने मित्रों के यहाँ जाने के लम्बे समय से पड़े निमंत्रण स्वीकार करते हैं; विद्यार्थी पाठशाला से घर की ओर दौड़ पड़ते हैं, और अपने माता-पिता के घर की गर्मजोशी और सुख-चैन में आनन्दित होते हैं। थोड़ी देर के लिए व्यापार थम जाता है; निरन्तर परिश्रम का चरखा मानो कुछ घण्टों के लिए घूमना बन्द कर देता है। संक्षेप में, सारे राष्ट्र में "इकट्ठा होने" की एक सामान्य भावना व्याप्त रहती है।

वह देश धन्य है जहाँ ऐसी स्थिति पाई जाती है! हमारे देश में यह बहुत समय तक बनी रहे, और कभी समाप्त न हो! वह दर्शन तुच्छ और उथला है जो बड़े दिन के मिलनों पर व्यंग्य करता है। वह धर्म ठण्डा और कठोर है जो उन पर त्योरी चढ़ाता है और उन्हें दुष्ट ठहराता है। पारिवारिक स्नेह सुव्यवस्थित समाज की जड़ में है। यह उन थोड़ी-सी भली वस्तुओं में से एक है जो पतन के बाद भी बची रह गईं, और जो स्त्री-पुरुषों को निरे दानव बन जाने से रोकती हैं। यह हमारी सामाजिक व्यवस्था के पहियों का वह गुप्त तेल है जो पूरे यन्त्र को चलाए रखता है, और जिसके बिना यन्त्र की शक्ति व्यर्थ है। ऐसा बड़ा दिन कभी न आए जब कोई पारिवारिक मिलन न हो!

पर जो मैंने अभी कहा, उसके होते हुए भी, सांसारिक मिलनों में कुछ ऐसा भी है जो उदास और शोकपूर्ण है। सबसे सुखी दावतों में भी कभी-कभी अप्रिय सदस्य होते हैं। सबसे आनन्दमय बड़े दिन की दावतें भी केवल थोड़े समय की होती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे वर्ष बीतते जाते हैं, मृत्यु का हाथ पारिवारिक घेरे में पीड़ादायक रिक्तियाँ बना देता है। बड़े दिन के उल्लास के बीच भी हम उन्हें याद किए बिना नहीं रह सकते जो चले गए हैं। जितना अधिक हम जीते हैं, उतना ही अधिक अनुभव करते हैं कि हम अकेले खड़े हैं। पुराने चेहरे हमारे मन की आँखों के सामने उभर आएँगे, और पुरानी आवाज़ें हमारे कानों में गूँजेंगी, उत्सव की प्रसन्नता और हँसी के बीच भी। लोग ऐसी बातों की चर्चा अधिक नहीं करते, पर थोड़े ही हैं जो उन्हें अनुभव नहीं करते। हमें अपने अन्तरतम विचार दूसरों पर थोपने की आवश्यकता नहीं, विशेषकर तब जब हमारे चारों ओर सब प्रसन्न और खिले हुए हों; पर मुझे सन्देह है कि जो लोग अधेड़ अवस्था को पहुँचे हैं, उनमें से बहुत-से, यदि सच्चाई से बोलें, तो मानेंगे कि बड़े दिन की दावत के साथ कुछ शोकपूर्ण बातें अटूट रूप से जुड़ी हुई हैं। संक्षेप में, किसी भी सांसारिक "मिलन" में निरा आनन्द नहीं है।

पर क्या इससे उत्तम कोई "मिलन" आने वाला नहीं? क्या हमारी क्षितिज-रेखा पर किसी ऐसी सभा की उज्ज्वल आशा नहीं है जो बड़े दिन और नववर्ष की सभाओं से कहीं अधिक प्रकाशमान होगी—ऐसी सभा जिसमें दुःख रहित आनन्द होगा और आँसू रहित उल्लास? मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दे सकता हूँ; और उत्तर देना ही इस लेख का सीधा-सा उद्देश्य है। मैं अपने पाठकों से कुछ मिनट का ध्यान चाहता हूँ, और मैं शीघ्र ही उन्हें दिखाऊँगा कि मेरा अभिप्राय क्या है।

I. सच्चे मसीहियों का एक "मिलन" होना अभी शेष है। वह क्या है, और कब होगा?

जिस मिलन की मैं बात कर रहा हूँ, वह संसार के अन्त में होगा, उस दिन जब मसीह दूसरी बार पृथ्वी पर लौटेगा। वह स्वर्ग के बादलों में गया था, और स्वर्ग के बादलों में ही लौटेगा। वह दृश्य रूप में, देह में लौटेगा। और मसीह जो सबसे पहला काम करेगा, वह अपने लोगों को "इकट्ठा" करना होगा। "वह अपने स्वर्गदूतों को बड़े नरसिंगे के साथ भेजेगा, और वे उसके चुने हुओं को चारों दिशाओं से, आकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक इकट्ठा करेंगे।" (मत्ती 24:31)

इस "मिलन" की रीति पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से प्रकट की गई है। मरे हुए सब सन्त जिलाए जाएँगे, और जीवित सब सन्त बदल दिए जाएँगे। लिखा है, "समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उसमें थे दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने उन मरे हुओं को जो उनमें थे दे दिया।" "जो मसीह में मरे हैं वे पहले जी उठेंगे। तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उनके साथ बादलों पर उठा लिए जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें।" "हम सब तो नहीं सोएँगे, परन्तु सब बदल जाएँगे, और वह भी क्षण भर में, पलक मारते ही, अन्तिम तुरही फूँकते ही। क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी, और मरे हुए अविनाशी दशा में जिलाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे।" (प्रकाशित वाक्य 20:13; 1 थिस्सलुनीकियों 4:16, 17; 1 कुरिन्थियों 15:51, 52) और तब जब मसीह का एक-एक अंग पाया जाएगा, और एक भी पीछे न छूटेगा, जब आत्मा और शरीर, वे पुराने साथी, फिर एक बार मिल जाएँगे, तब वह महान "मिलन" होगा।

पवित्रशास्त्र में इस "इकट्ठे किए जाने" का उद्देश्य भी उतना ही स्पष्ट प्रकट किया गया है जितना इसकी रीति। एक ओर यह मसीह के लोगों के अन्तिम प्रतिफल के लिये है: ताकि समस्त सृष्टि के सामने यह घोषित हो जाए कि वे सब दोष से पूरी रीति से धर्मी ठहराए गए हैं; ताकि वे "महिमा का वह मुकुट" पाएँ "जो मुर्झाने का नहीं," और वह "राज्य जो जगत की उत्पत्ति से उनके लिये तैयार किया गया है;" ताकि वे सब के सामने अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश पाएँ! दूसरी ओर यह मसीह के लोगों की सुरक्षा के लिये है, कि जैसे नूह जहाज़ में और लूत सोअर में छिप गए थे, वैसे ही वे भी दुष्टों पर परमेश्वर के न्याय की आँधी उतरने से पहले छिपा और ढाँप लिए जाएँ; कि जब प्रभु के शत्रुओं पर अन्तिम विपत्तियाँ पड़ रही हों, तब वे ऐसे अछूते रहें जैसे यरीहो के गिरने में राहाब का घराना, और ऐसे सुरक्षित जैसे आग के बीच वे तीनों बालक। इकट्ठे किए जाने के दिन पवित्र लोगों के डरने का कोई कारण नहीं, चाहे उसके साथ आनेवाले चिन्ह कितने ही भयानक क्यों न हों। सब वस्तुओं के अन्तिम विनाश के आरम्भ होने से पहले वे परमप्रधान के गुप्त स्थान में छिपा लिए जाएँगे। यह महान इकट्ठा किया जाना उनकी सुरक्षा और उनके प्रतिफल के लिये है। इकट्ठा करनेवाले स्वर्गदूत कहेंगे, "तुम मत डरो; क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम यीशु को जो क्रूस पर चढ़ाया गया था, ढूँढ़ते हो।" उनका स्वामी कहेगा: "हे मेरे लोगो, आओ, अपनी कोठरियों में प्रवेश करके किवाड़ बन्द कर लो; और थोड़ी देर तक छिपे रहो, जब तक कि मेरा क्रोध टल न जाए।" (मत्ती 28:5; यशायाह 26:20)

(क) यह इकट्ठा किया जाना एक महान घटना होगी।

परमेश्वर की सब सन्तानें जो कभी जीवित रही हैं, प्रथम पवित्र जन आदम से लेकर उस दिन जन्मे अन्तिम जन तक जब हमारा प्रभु आएगा—हर युग, हर जाति, हर कलीसिया, हर लोग और हर भाषा का एक-एक जन—सब इकट्ठे किए जाएँगे। कोई भी अनदेखा या भुलाया नहीं जाएगा। सबसे निर्बल और दुर्बल भी पीछे नहीं छूटेगा। अब, "बिखरे हुए" होने की दशा में सच्चे मसीही एक छोटे झुण्ड के समान दिखाई देते हैं; तब, "इकट्ठे" होने पर, वे एक ऐसी भीड़ ठहरेंगे जिसे कोई गिन नहीं सकता।

(ख) यह इकट्ठा किया जाना एक अद्भुत घटना होगी।

दूर देशों के वे पवित्र लोग, जिन्होंने शरीर में एक-दूसरे को कभी नहीं देखा और मिलने पर एक-दूसरे की बोली भी नहीं समझ सकते थे, सब एक सामंजस्यपूर्ण सहभागिता में एक साथ लाए जाएँगे। जो ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं वे पाएँगे कि वे भी स्वर्ग के उतने ही निकट हैं और वहाँ उतनी ही शीघ्र पहुँचेंगे जितना इंग्लैंड में रहनेवाले। जो विश्वासी पाँच हज़ार वर्ष पहले मरे और जिनकी हड्डियाँ मात्र धूल हैं, वे पाएँगे कि उनकी देह उतनी ही शीघ्रता से जिलाई और नई की गई है जितनी उनकी जो तुरही के बजने के समय जीवित होंगे। सबसे बढ़कर, अनुग्रह के चमत्कार प्रकट होंगे। हम स्वर्ग में कुछ ऐसे लोगों को देखेंगे जिनके बारे में हमने कभी आशा ही नहीं की थी कि उनका उद्धार होगा। भाषाओं का घालमेल अन्त में उलट दिया जाएगा और मिटा दिया जाएगा। इकट्ठी हुई वह भीड़ एक हृदय और एक भाषा में पुकारेगी, "देखो, परमेश्वर ने क्या किया है!" (गिनती 23:23)

(ग) यह इकट्ठा किया जाना मन को दीन करनेवाली घटना होगी।

यह कट्टरता और संकीर्ण-मनस्कता का सदा के लिये अन्त कर देगा। एक सम्प्रदाय के मसीही अपने आपको दूसरे सम्प्रदाय के मसीहियों के साथ-साथ पाएँगे; यदि उन्होंने पृथ्वी पर उन्हें सहन नहीं किया, तो उन्हें स्वर्ग में सहना पड़ेगा। वे

मसीही, जो अब न साथ प्रार्थना करेंगे और न साथ आराधना, लज्जित होकर जान लेंगे कि उन्हें अनन्तकाल तक साथ-साथ स्तुति करनी होगी। वही लोग जो अब हमें अपने साथ प्रभु-भोज की मेज़ पर बैठने नहीं देते, तब अपने स्वामी के सामने हमें स्वीकार करने और हमें अपने पास बैठने देने को विवश होंगे। संसार ने कभी सम्प्रदायवाद, दलबन्दी, भाईचारे के अभाव, धार्मिक डाह और धार्मिक घमण्ड का ऐसा सम्पूर्ण पतन नहीं देखा होगा। अन्त में हम सब पूरी रीति से "दीनता का वस्त्र" पहने हुए होंगे। (1 पतरस 5:5)

यह "उसके पास इकट्ठा किया जाना" वह महान और अद्भुत इकट्ठा होना है जिसे मनुष्यों के विचारों में सबसे आगे होना चाहिए। यह विचार करने योग्य है; यह ध्यान की माँग करता है। दूसरी तरह की सभाएँ हमारे मन को निरन्तर घेरे रहती हैं: राजनीतिक सभाएँ, वैज्ञानिक सभाएँ, आमोद-प्रमोद की सभाएँ, लाभ के लिये सभाएँ। परन्तु वह घड़ी आती है, और शीघ्र ही आ पहुँचेगी, जब इस प्रकार की सभाएँ पूरी तरह भुला दी जाएँगी। केवल एक ही विचार मनुष्यों के मन को निगल लेगा; वह विचार यह होगा, "क्या मैं मसीह के लोगों के साथ सुरक्षा और सम्मान के स्थान में इकट्ठा किया जाऊँगा, या अनन्त पीड़ा के लिये पीछे छोड़ दिया जाऊँगा?" सावधान रहें कि हम पीछे न छूट जाएँ।

II. सच्चे मसीहियों का यह "इकट्ठा किया जाना" क्यों अभिलाषा के योग्य है? आइए, इस प्रश्न का उत्तर पाने का यत्न करें।

पौलुस ने स्पष्ट ही समझा था कि अन्तिम दिन का इकट्ठा किया जाना बड़े आनन्द की बात है जिसे मसीहियों को अपनी आँखों के सामने रखना चाहिए। वह इसे हमारे प्रभु के दूसरे आगमन के साथ गिनता है, जिससे, जैसा वह अन्यत्र कहता है, विश्वासी प्रेम रखते और जिसकी लालसा करते हैं। वह इसे दूर क्षितिज पर उन "आनेवाली अच्छी वस्तुओं" में से एक के रूप में ऊँचा उठाता है, जो हर यात्री के विश्वास को सकरी राह पर चलने के लिये उत्साहित करें। वह मानो कहता है कि परमेश्वर के हर सेवक को न केवल विश्राम, राज्य और मुकुट मिलेगा, वरन् "उसके पास इकट्ठा किए जाने" से वह सचमुच धन्य भी ठहरेगा। तो इस इकट्ठा किए जाने की विशेष धन्यता कहाँ है? यह ऐसी बात क्यों है जिसकी हमें आनन्द से बाट जोहनी और प्रसन्नता से आशा रखनी चाहिए? आइए देखें।

(क) एक बात तो यह है कि जब सब सच्चे मसीही "उसके पास इकट्ठे किए जाएँगे" तब यह दशा उनकी वर्तमान दशा से बिलकुल भिन्न होगी।

बिखरे हुए रहना, इकट्ठा न होना—यही अब मनुष्य के अस्तित्व का नियम जान पड़ता है। हर वर्ष संसार में जन्म लेनेवाले करोड़ों लोगों में से कितने थोड़े हैं जो मरते दम तक साथ रहते हैं! जो बच्चे अपने आरम्भिक दिन एक ही छत के नीचे बिताते हैं और एक ही बैठक में खेलते हैं, वे बड़े होते-होते निश्चय ही एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, और अपनी अन्तिम साँस एक-दूसरे से बहुत दूर किसी स्थान पर लेते हैं। यही नियम परमेश्वर के लोगों पर भी लागू होता है। वे नमक की नाईं चारों ओर फैले हुए हैं—कोई एक स्थान में, कोई दूसरे में—और उन्हें एक-दूसरे के पास बहुत देर तक रहने नहीं दिया जाता। निःसन्देह संसार की भलाई के लिये यही ठीक है। यदि सारी बत्तियाँ एक ही कमरे में ठूँस दी जाएँ, तो रात को नगर बहुत अँधेरा हो जाएगा। परन्तु संसार के लिये चाहे यह कितना ही अच्छा हो, विश्वासियों के लिये यह एक बड़ी परीक्षा है। ऐसे बहुत दिन आते हैं जब वे अपने आपको सूना और अकेला पाते हैं; बहुत बार वे अपने भाइयों के साथ थोड़ी और सहभागिता के, और प्रभु से प्रेम रखनेवालों के साथ थोड़ी और संगति के लिये तरसते हैं! तो वे आशा और सान्त्वना के साथ आगे की ओर दृष्टि करें, क्योंकि वह घड़ी आ रही है जब उन्हें साथियों की कोई घटी न रहेगी। वे अपने सिर उठाएँ और आनन्द करें, क्योंकि शीघ्र ही वे "उसके पास इकट्ठे" किए जाएँगे।

(ख) दूसरी बात यह है कि जब सब सच्चे मसीही "उसके पास इकट्ठे" किए जाएँगे, तब वह एक ऐसी सभा होगी जो पूरी तरह एक मन की होगी।

अब ऐसी कोई सभा नहीं है, क्योंकि कपट और झूठा अंगीकार हर कहीं घुस आता है। जहाँ कहीं गेहूँ है, वहाँ जंगली दाने भी अवश्य होंगे। जहाँ कहीं अच्छी मछलियाँ हैं, वहाँ बुरी भी अवश्य होंगी। जहाँ कहीं समझदार कुँवारियाँ हैं, वहाँ मूर्ख कुँवारियाँ भी अवश्य होंगी। अब कोई सिद्ध कलीसिया नहीं है। प्रत्येक प्रभु-भोज की मेज़ पर एक यहूदा इस्करियोती होता है, और एक देमास भी जो संसार के प्रेम के कारण कलीसिया को छोड़ जाएगा; और जहाँ कहीं "परमेश्वर के पुत्र" इकट्ठे होते हैं, वहाँ शैतान भी उनके बीच अवश्य आ उपस्थित होता है। (अय्यूब 1:6) परन्तु यह सब एक दिन समाप्त हो जाएगा। हमारा प्रभु अन्त में पिता के सम्मुख एक सिद्ध कलीसिया प्रस्तुत करेगा, "जिसमें न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु होगी।" (इफिसियों 5:27) ऐसी कलीसिया कितनी महिमामय होगी! अब तो आधे दर्जन विश्वासियों का एक साथ मिलना किसी मसीही के वर्ष में एक दुर्लभ घटना है, और ऐसी घटना जो उसे जाड़े की धूप भरे दिन के समान आनन्दित करती है; उसे ऐसा लगता है कि उसके भीतर उसका हृदय जल रहा है, जैसा चेलों को इम्माऊस के मार्ग पर लगा था। परन्तु "ऐसी बड़ी भीड़ जिसे कोई गिन नहीं सकता" से मिलना कितना अधिक आनन्दमय होगा! और यह भी पाना कि जिससे भी हम मिलें, वह अन्ततः एक ही मत और एक ही निर्णय का है, और सब बातों को एक ही दृष्टि से देखता है—यह जान लेना कि हमारे सारे दुःखद विवाद सदा के लिये गाड़ दिए गए हैं, और मसीहियों का एक दल अब दूसरे मसीही दलों से झगड़ता नहीं—मसीहियों की ऐसी मण्डली में सम्मिलित होना जिसमें न कलह है, न फूट, और जहाँ हर मनुष्य सम्पूर्ण पवित्रता में है, और उसके सारे पूर्व पाप, जो पृथ्वी पर उसे इतनी सरलता से उलझा लेते थे, शरद ऋतु में वृक्ष के पत्तों की नाईं झड़ गए हैं—यह सब सचमुच आनन्द ही होगा! कोई आश्चर्य नहीं कि पौलुस हमें आगे की ओर दृष्टि करने के लिये कहता है।

(ग) तीसरी बात यह है कि जब सब सच्चे मसीही "उसके पास इकट्ठे" किए जाएँगे, तब वह ऐसी सभा होगी जिसमें कोई अनुपस्थित न होगा।

सबसे दुर्बल मेम्ना भी जंगल में पीछे न छोड़ा जाएगा; संसार में साँस लेनेवाला सबसे छोटा शिशु भी न अनदेखा किया जाएगा, न भुलाया जाएगा। हम अपने उन प्रिय मित्रों और सम्बन्धियों को फिर से देखेंगे जो मसीह में सो गए और हमें शोक और आँसुओं में छोड़ गए, और वे पृथ्वी पर जैसे हमने उन्हें पाया था, उससे कहीं उत्तम, कहीं उज्ज्वल, कहीं सुन्दर और कहीं मनोहर होंगे। हम परमेश्वर के उन सब पवित्र लोगों के साथ सहभागिता करेंगे जिन्होंने संसार के आदि से अन्त तक हमसे पहले अच्छी कुश्ती लड़ी है। कुलपति और भविष्यद्वक्ता, प्रेरित और प्राचीन पिता, शहीद और मिशनरी, धर्म-सुधारक और प्यूरिटन—परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सारी सेना वहाँ होगी। यदि उनके शब्दों और कार्यों को पढ़ना सुखद रहा है, तो उन्हें देखना कितना अधिक उत्तम होगा! यदि उन्हें सुनना और उनके उदाहरण से उभारा जाना लाभदायक रहा है, तो उनसे बातें करना और उनसे प्रश्न पूछना कितना अधिक आनन्ददायक होगा! अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ बैठकर यह सुनना कि उन्होंने बिना बाइबल के विश्वास को कैसे थामे रखा—मूसा, शमूएल, दाऊद, यशायाह और दानिय्येल से बातें करना और सुनना कि वे उस मसीह पर, जो अभी आनेवाला था, कैसे विश्वास कर सके—पतरस, पौलुस, लाज़र, मरियम और मार्था से बातें करना और उनसे यह अद्भुत कथा सुनना कि उनके स्वामी ने उनके लिये क्या किया—यह सब सचमुच मधुर होगा! कोई आश्चर्य नहीं कि पौलुस हमें आगे की ओर दृष्टि करने के लिये कहता है।

(घ) अन्तिम बात यह है कि जब सब सच्चे मसीही "उसके पास इकट्ठे" किए जाएँगे, तब वह ऐसी सभा होगी जिसके बाद बिछड़ना न होगा।

अब ऐसी कोई भेंट नहीं होती। हम अनन्त जल्दबाज़ी के समय में जीते जान पड़ते हैं, और बैठकर साँस लेने भी नहीं पाते कि फिर चल पड़ते हैं। "फिर मिलेंगे" "कैसे हो?" की एड़ी पर पाँव रखता आता है। इस संसार की चिन्ताएँ, जीवन के आवश्यक कर्तव्य, हमारे परिवारों की माँगें, जीवन में हमारे अनेक व्यवसायों का काम—ये सब बातें हमारे दिनों को खा जाती जान पड़ती हैं, और परमेश्वर के लोगों के साथ सहभागिता के लम्बे शान्त समय को असम्भव बना देती हैं। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, सदा ऐसा न रहेगा। वह घड़ी आ रही है और शीघ्र ही आ पहुँचेगी, जब "विदा" और "अलविदा" ऐसे शब्द होंगे जो अलग रख दिए और सदा के लिये गाड़ दिए जाएँगे; जब हम ऐसे संसार में मिलेंगे जहाँ पहली बातें जाती रही हैं, जहाँ न और पाप होगा, न और शोक—न और दरिद्रता, न और धन—न शरीर का और श्रम, न बुद्धि का और श्रम—परिवारों के लिये और चिन्ता की आवश्यकता न रहेगी—न और रोग, न और पीड़ा, न और बुढ़ापा, न और मृत्यु, और न और कोई परिवर्तन। जब हम उस अनन्त अवस्था में मिलेंगे—शान्त, विश्रामपूर्ण और बिना जल्दबाज़ी के—तब कौन कह सकता है कि वह कैसा धन्य परिवर्तन होगा? कोई आश्चर्य नहीं कि पौलुस हमें ऊपर देखने और आगे की ओर दृष्टि करने के लिये कहता है।

ये बातें मैं उन सब के सामने रखता हूँ जो यह लेख पढ़ते हैं, और उनसे विनती करता हूँ कि इस पर गम्भीरता से ध्यान दें। यदि मैं एक मसीही के अनुभव के विषय में कुछ भी जानता हूँ, तो मुझे निश्चय है कि इनमें मनन के लिए भोजन है। कम से कम इतना तो मैं पूरे भरोसे से कहता हूँ: जो मनुष्य मसीह के दूसरे आगमन और मसीह के लोगों के खुले रूप से "इकट्ठे किए जाने" में कुछ विशेष नहीं देखता—न कुछ सुखद, न कुछ आनन्दमय, न कुछ मनभावना, न कुछ वांछनीय—ऐसे मनुष्य के पास यह सन्देह करने का पूरा कारण है कि वह स्वयं सच्चा मसीही है भी या नहीं।

(1) मैं तुमसे एक सीधा प्रश्न पूछता हूँ। इससे मुँह न मोड़ो, और इसे आँख से आँख मिलाकर देखने से इनकार न करो। जब प्रभु लौटेगा, तब क्या तुम स्वर्गदूतों द्वारा परमेश्वर के घर में इकट्ठे किए जाओगे, या पीछे छोड़ दिए जाओगे?

एक बात तो किसी भी प्रकार से अत्यन्त निश्चित है। उस अन्तिम बड़े दिन मनुष्यों के केवल दो दल होंगे: वे जो मसीह की दाहिनी ओर हैं, और वे जो बाईं ओर हैं—वे जो धर्मी गिने गए, और वे जो दुष्ट हैं—वे जो जहाज़ के भीतर सुरक्षित हैं, और वे जो बाहर हैं—वे जो गेहूँ की नाईं परमेश्वर के खत्ते में इकट्ठे किए गए, और वे जो जलाए जाने के लिए जंगली पौधों की नाईं पीछे छोड़ दिए गए। अब बताओ, तुम किस दल में होगे?

सम्भव है कि तुम अभी नहीं जानते। तुम कह नहीं सकते। तुम्हें निश्चय नहीं है। तुम सबसे अच्छे की आशा रखते हो। तुम्हें भरोसा है कि अन्त में सब ठीक हो जाएगा; परन्तु तुम कोई राय देने का साहस नहीं करते। तो ठीक है, मैं केवल यही आशा करता हूँ कि जब तक तुम जान न लो, तब तक तुम कभी चैन न लोगे। बाइबल तुम्हें साफ़ बता देगी कि वे कौन हैं जो "उसके पास इकट्ठे किए जाएँगे।" तुम्हारा अपना हृदय, यदि तुम अपने साथ सच्चे हो, तुम्हें बता देगा कि तुम उस गिनती में हो या नहीं। चैन न लो, चैन न लो, जब तक तुम जान न लो!

यदि मनुष्यों के पास इससे उत्तम किसी बात की आशा नहीं, तो वे इस जीवन के बिछोहों और अलगावों को कैसे सह सकते हैं—यदि अन्तिम दिन मसीह में सुरक्षित "इकट्ठे होने" की कोई आशा नहीं, तो वे अपने बेटे-बेटियों को "अलविदा" कहकर इस संसार की कष्टदायक लहरों में कैसे उतार सकते हैं—वे अपने परिवार के प्रिय सदस्यों से कैसे बिछड़ सकते हैं, और उन्हें पृथ्वी के दूसरे छोर तक यात्रा करने कैसे दे सकते हैं, जबकि वे नहीं जानते कि इस जीवन में या आनेवाले जीवन में वे कभी सुख से फिर मिलेंगे या नहीं—यह कैसे हो सकता है, यह मेरी समझ से बिलकुल परे है। मैं केवल यही मान सकता हूँ कि अधिकतर लोग कभी सोचते नहीं, विचार नहीं करते, आगे की ओर नहीं देखते। जब मनुष्य सोचने लगता है, तब वह तब तक कभी सन्तुष्ट नहीं होगा जब तक उसे मसीह न मिल जाए और वह सुरक्षित न हो जाए।

(2) यदि तुम यह जानना चाहते हो कि परमेश्वर के घर में इकट्ठे किए जाने की तुम्हारी अपनी सम्भावना क्या है, तो मैं तुम्हें अपनी आत्मा की दशा परखने का एक सरल उपाय बताता हूँ। अपने आप से पूछो कि पृथ्वी पर तुम्हें किस प्रकार की सभाएँ सबसे अधिक प्रिय हैं? अपने आप से पूछो कि क्या तुम सचमुच परमेश्वर के लोगों के साथ इकट्ठा होना पसन्द करते हो?

जो मनुष्य पृथ्वी पर सच्चे मसीहियों से मिलने में आनन्द नहीं पाता, वह स्वर्ग में सच्चे मसीहियों की सभा का आनन्द कैसे ले सकेगा? वह हृदय जो पूरी तरह दावतों, खेल-तमाशों, मनोरंजन और संसारी जमावड़ों में लगा हुआ है, और जो समझता है कि पृथ्वी पर की आराधना निरी उबाऊ बात है—ऐसा हृदय सन्तों की, और केवल सन्तों की संगति के योग्य कैसे हो सकता है? यह असम्भव है। ऐसा हो ही नहीं सकता।

यह बात कभी, कभी न भुलाई जाए कि पृथ्वी पर हमारी रुचियाँ हमारे हृदय की दशा का निश्चित प्रमाण हैं; और यहाँ हमारे हृदय की दशा हमारे अनन्त भाग्य का निश्चित संकेत है। स्वर्ग तैयार किए हुए लोगों के लिए तैयार किया हुआ स्थान है। जो यह आशा रखता है कि वह स्वर्ग में सन्तों के साथ इकट्ठा किया जाएगा, जबकि वह केवल पृथ्वी पर पापियों के जमावड़े को ही चाहता है, वह अपने आप को धोखा दे रहा है। यदि वह इसी मनोदशा में जीए और मरे, तो अन्त में वह पाएगा कि उसके लिए अच्छा होता कि वह कभी जन्मा ही न होता।

(3) यदि तुम सच्चे मसीही हो, तो मैं तुम्हें समझाता हूँ कि बार-बार आगे की ओर देखते रहो।

तुम्हारी अच्छी वस्तुएँ अभी आनेवाली हैं। तुम्हारा छुटकारा निकट आ रहा है। रात प्रायः बीत चुकी है। दिन निकट है। क्योंकि बहुत ही थोड़े समय में जो आनेवाला है वह आएगा और देर न करेगा। जब वह आएगा, तब वह सन्तों को स्वर्ग से अपने साथ लाएगा और पृथ्वी पर जो अब तक जीवित हैं उन्हें बदल देगा। आगे की ओर देखो! एक "इकट्ठा होना" अभी आनेवाला है।

जहाज़ डूबने के बाद की सुबह शोक का समय होता है। आधे डूबे हुए बचे हुए लोगों का आनन्द, जो सकुशल किनारे पहुँच गए हैं, प्रायः उन साथी यात्रियों की स्मृति से दुःखद रूप से फीका पड़ जाता है जो डूब गए और फिर कभी न उठेंगे। जब विश्वासी मेम्ने के सिंहासन के चारों ओर इकट्ठे होंगे, तब ऐसा कोई शोक न होगा। जहाज़ के दल में से एक भी अनुपस्थित न पाया जाएगा। कुछ लोग तख़्तों पर, और कुछ जहाज़ के टुकड़ों पर "पहुँचे . . . . और इस रीति से सब कोई भूमि पर बच निकले।" (प्रेरितों के काम 27:44) महासागर और उफनती लहरें परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से किसी को भी निगल न सकेंगी। जब सूर्य उदय होगा, तब हर एक जन सुरक्षित और "इकट्ठा" दिखाई देगा।

बड़ी विजय के अगले दिन भी शोक का समय होता है। विजेताओं की जय की भावनाएँ प्रायः उन लोगों के लिए कड़वे पछतावे से मिली होती हैं जो युद्ध में गिरे और रणभूमि में मर गए। "मारे गए, घायल और लापता" की सूची कितने ही हृदयों को तोड़ती है, कितने ही घरों को मातम से भर देती है, और कितने ही पके बालोंवाले सिरों को शोक करते हुए क़ब्र तक पहुँचाती है। महान ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन प्रायः कहा करता था, "विजय से भी बुरी केवल एक ही वस्तु है, और वह है पराजय।" परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, स्वर्ग में ऐसा कोई शोक न होगा! हमारे उद्धार के महान सेनापति के सैनिक अन्त में जब उनके नाम पुकारे जाएँगे तब सब उत्तर देंगे। युद्ध के बाद की हाज़िरी भी वैसी ही पूरी होगी जैसी युद्ध से पहले थी। उस बड़े "इकट्ठे होने" में एक भी विश्वासी "लापता" न होगा।

उदाहरण के लिए, क्या क्रिसमस अपने साथ दुःखभरी भावनाएँ और पीड़ादायक स्मृतियाँ लाता है? जब आप भोजन की मेज़ के चारों ओर खाली स्थानों को देखते हैं तो क्या आपकी आँखों में आँसू भर आते हैं? जब आप उन प्रिय पुराने चेहरों और बहुत चाहे गए स्वरों को याद करते हैं जो कब्र में सो रहे हैं, तो क्या अपने बच्चों के उत्सव के बीच भी गम्भीर विचार आपके मन में उमड़ आते हैं? तो ऊपर देखिए और आगे की ओर देखिए! समय थोड़ा है। संसार बूढ़ा होता जा रहा है। प्रभु का आगमन निकट आ रहा है। अभी एक ऐसी भेंट होनी है जिसमें बिछुड़ना न होगा, और एक ऐसा मेल जिसमें अलगाव न होगा। जिन विश्वासियों को आपने बहुत आँसुओं के साथ कब्र में रखा, वे अच्छे हाथों में हैं; आप उन्हें फिर आनन्द के साथ देखेंगे। मैं एक बार फिर कहता हूँ, ऊपर देखिए! "हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन और उसके पास हमारे इकट्ठे किए जाने" को विश्वास से थाम लीजिए। इस पर विश्वास कीजिए, इसके बारे में सोचिए, इस पर भरोसा रखिए। यह सब सच है।

क्या हर दिसम्बर के आने पर आप अकेलापन और परित्यक्त होने का अनुभव करते हैं? क्या आपको साथ प्रार्थना करने, साथ स्तुति करने, अपना मन खोलने और अनुभव बाँटने के लिए बहुत कम लोग मिलते हैं? क्या आप अधिकाधिक यह सीख रहे हैं कि स्वर्ग हर वर्ष और भरता जा रहा है और पृथ्वी और खाली होती जा रही है? तो यह कोई नई बात नहीं, यह पुरानी कहानी है। आप केवल वही प्याला पी रहे हैं जिसे असंख्य लोग पहले पी चुके हैं। ऊपर देखिए और आगे की ओर देखिए। अकेलेपन का यह समय शीघ्र ही बीत जाएगा; भविष्य में आपके पास बहुत संगति होगी। "जब मैं जागूँगा तब तेरे स्वरूप से सन्तुष्ट हूँगा।" (भजन संहिता 17:15) थोड़ी देर और, तब आप ऐसी मण्डली देखेंगे जो कभी भंग न होगी, और ऐसा विश्राम का दिन जो कभी समाप्त न होगा। "हमारे प्रभु यीशु मसीह का आगमन और उसके पास हमारा इकट्ठा किया जाना" हर बात की भरपाई कर देगा।

महान पृथक्करण

"सूप उसके हाथ में है, और वह अपना खलिहान अच्छी रीति से साफ करेगा, और अपने गेहूँ को तो खत्ते में इकट्ठा करेगा, परन्तु भूसी को उस आग में जलाएगा जो बुझने की नहीं।" (मत्ती 3:12)

पवित्रशास्त्र का यह पद, जो अब हमारी आँखों के सामने है, उन शब्दों को लिए हुए है जो यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने कहे थे। ये हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में एक भविष्यद्वाणी हैं, और ऐसी भविष्यद्वाणी जो अभी पूरी नहीं हुई। यह वह भविष्यद्वाणी है जिसे हम एक दिन पूरी होते देखेंगे, और परमेश्वर ही जानता है कि कितनी शीघ्र।

मैं इस लेख के हर पाठक को आमंत्रित करता हूँ कि वह इस पद में निहित महान सत्यों पर गम्भीरता से विचार करे। मैं आपसे अपना ध्यान देने का आग्रह करता हूँ, जब मैं उन्हें खोलकर क्रम से आपके सामने रखूँ। क्या जाने यह पाठ आपकी आत्मा के लिए समय पर कहा गया वचन ठहरे? कौन जानता है, शायद यह पाठ इस दिन को आपके जीवन का सबसे सुखी दिन बनाने में सहायक हो?

I. पहले, मैं आपको वे दो बड़े वर्ग दिखाता हूँ जिनमें मनुष्य जाति बाँटी जा सकती है।

परमेश्वर की दृष्टि में संसार में केवल दो ही वर्ग के लोग हैं, और दोनों का उल्लेख उस पाठ में है जिससे यह लेख आरम्भ होता है। एक वे हैं जो गेहूँ कहलाते हैं, और दूसरे वे जो भूसी कहलाते हैं।

मनुष्य की दृष्टि से देखें तो पृथ्वी पर कई प्रकार के निवासी हैं। परमेश्वर की दृष्टि से देखें तो केवल दो हैं। मनुष्य की आँख बाहरी रूप को देखती है—वह बस इसी की सोचता है। परमेश्वर की आँख मन को देखती है—वही एकमात्र भाग है जिसका वह लेखा लेता है। और मन की दशा की कसौटी पर, लोग केवल दो वर्गों में बाँटे जा सकते हैं—या तो वे गेहूँ हैं, या भूसी।

संसार में गेहूँ कौन हैं? यह ऐसी बात है जिस पर विशेष विचार की आवश्यकता है।

गेहूँ से तात्पर्य उन सब स्त्री-पुरुषों से है जो प्रभु यीशु मसीह के विश्वासी हैं—वे सब जो पवित्र आत्मा की अगुवाई में चलते हैं—वे सब जिन्होंने अपने आप को पापी अनुभव किया है और सुसमाचार में दिए गए उद्धार की शरण में भागे हैं—वे सब जो प्रभु यीशु से प्रेम रखते हैं और प्रभु यीशु के लिए जीते हैं और प्रभु यीशु की सेवा करते हैं—वे सब जिन्होंने मसीह को अपना एकमात्र भरोसा और बाइबल को अपना एकमात्र मार्गदर्शक माना है, और पाप को अपना सबसे घातक शत्रु समझते हैं, और स्वर्ग को अपना एकमात्र घर मानकर उसकी ओर देखते हैं। ऐसे सब लोग, हर कलीसिया, नाम, जाति, लोग और भाषा के—हर पद, व्यवसाय और दशा के—ऐसे सब लोग परमेश्वर के "गेहूँ" हैं।

ऐसे लोगों को मुझे कहीं भी दिखा दीजिए, और मैं जान लेता हूँ कि वे क्या हैं। मैं नहीं जानता कि वे और मैं सब बातों में एकमत हैं या नहीं, परन्तु मैं उनमें राजाओं के राजा के हाथ का काम देखता हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं माँगता। मैं नहीं जानता कि वे कहाँ से आए और उन्हें अपना धर्म कहाँ मिला; परन्तु मैं जानता हूँ कि वे कहाँ जा रहे हैं, और मेरे लिए यही काफी है। वे स्वर्ग में मेरे पिता की सन्तान हैं। वे उसके "गेहूँ" का भाग हैं।

ऐसे सब लोग, चाहे वे पापी और नीच हों और अपनी ही दृष्टि में अयोग्य हों, मनुष्य जाति का बहुमूल्य भाग हैं। वे परमेश्वर पिता के पुत्र-पुत्रियाँ हैं। वे परमेश्वर पुत्र के आनन्द हैं। वे परमेश्वर पवित्र आत्मा के निवास-स्थान हैं। पिता उनमें कोई अधर्म नहीं देखता—वे उसके प्रिय पुत्र की रहस्यमय देह के अंग हैं; उसमें वह उन्हें देखता है और प्रसन्न होता है। प्रभु यीशु उनमें अपने ही कष्ट और क्रूस पर किए गए अपने कार्य का फल देखता है और सन्तुष्ट होता है। पवित्र आत्मा उन्हें आत्मिक मन्दिर समझता है, जिन्हें उसने स्वयं रचा है, और उन पर आनन्दित होता है। एक शब्द में, वे पृथ्वी के "गेहूँ" हैं।

संसार में भूसी कौन हैं? यह भी ऐसी बात है जिस पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

भूसी से तात्पर्य उन सब स्त्री-पुरुषों से है जिनमें मसीह पर उद्धार देनेवाला विश्वास नहीं है, और आत्मा द्वारा पवित्रीकरण नहीं है। उनमें से कुछ नास्तिक हैं, और कुछ केवल नाम के "मसीही" हैं। कुछ उपहास करनेवाले सदूकी हैं, और कुछ अपनी धार्मिकता पर भरोसा रखनेवाले फरीसी। उनमें से कुछ रविवार का एक प्रकार का धर्म निभाने का ध्यान रखते हैं, और अन्य अपने सुख और संसार को छोड़ हर बात से बेपरवाह हैं। परन्तु उनमें से हर एक में वे दो बड़े चिह्न हैं जिनका ऊपर उल्लेख हुआ—न विश्वास और न पवित्रीकरण—उनमें से हर एक "भूसी" है। जो कलीसिया में जाते हैं पर बाहरी रीतियों के सिवा कुछ और नहीं सोच सकते—उपदेशों के अपरिवर्तित प्रशंसक—सब परमेश्वर के सामने एक ही वर्ग में खड़े हैं: उनमें से हर एक "भूसी" है।

वे परमेश्वर पिता की महिमा नहीं करते, क्योंकि "जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का, जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता।" (यूहन्ना 5:23) वे उस महान उद्धार की उपेक्षा करते हैं जिस पर करोड़ों स्वर्गदूत चकित होते हैं। वे उस वचन की आज्ञा नहीं मानते जो उनकी समझ के लिए कृपापूर्वक लिखा गया था। वे उसकी वाणी नहीं सुनते जिसने स्वर्ग को छोड़कर उनके पापों के लिए मरने की दीनता दिखाई। वे उसकी सेवा नहीं करते और न उससे प्रेम रखते हैं जिसने उन्हें "जीवन और श्वास और सब कुछ" दिया। इसलिए परमेश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता। वह उन पर तरस खाता है, परन्तु उन्हें "भूसे" से बढ़कर कुछ नहीं समझता।

हाँ! तुम्हारे पास दुर्लभ बौद्धिक वरदान और बड़ी मानसिक उपलब्धियाँ हो सकती हैं; तुम अपनी सम्मति से राज्यों को चला सकते हो, अपनी लेखनी से करोड़ों को प्रभावित कर सकते हो, या अपनी वाणी से भीड़ को साँस रोके सुनने पर विवश कर सकते हो; परन्तु यदि तुमने कभी अपने आपको मसीह के शासन के अधीन नहीं किया, और उसके सुसमाचार को हृदय से ग्रहण करके कभी उसका आदर नहीं किया, तो तुम उसकी दृष्टि में कुछ भी नहीं हो। धूल में रेंगनेवाला सबसे तुच्छ कीड़ा भी तुमसे श्रेष्ठ प्राणी है; वह सृष्टि में अपना स्थान भरता है और अपनी पूरी सामर्थ्य से अपने सृजनहार की महिमा करता है, पर तुम नहीं करते। तुम हृदय, इच्छा और बुद्धि से, और अपने शरीर के अंगों से, जो सब उसी के हैं, परमेश्वर का आदर नहीं करते। तुम उसकी व्यवस्था और रचना को उलट देते हो, और ऐसे जीते हो मानो पृथ्वी पर तुम्हारा समय अनन्तकाल से अधिक महत्त्वपूर्ण हो, और शरीर आत्मा से उत्तम हो। तुम परमेश्वर के सबसे बड़े दान, अर्थात् उसके देहधारी पुत्र की उपेक्षा करने का साहस करते हो। जिस विषय से स्वर्ग हल्लिलूय्याह के गान से गूँज उठता है, उसके प्रति तुम ठण्डे हो। और जब तक यह दशा है, तब तक तुम मनुष्यजाति के उस निकम्मे भाग में हो। तुम पृथ्वी के "भूसे" हो।

इस पत्र के प्रत्येक पाठक के मन में यह बात गहराई से अंकित हो जाए, चाहे वह और सब कुछ भूल जाए। स्मरण रखो कि संसार में केवल दो प्रकार के लोग हैं। एक गेहूँ हैं, और दूसरे भूसा।

यूरोप में अनेक जातियाँ हैं। हर एक दूसरी से भिन्न है। हर एक की अपनी भाषा, अपने नियम और अपनी अनोखी रीतियाँ हैं। परन्तु परमेश्वर की दृष्टि यूरोप को दो बड़े दलों में बाँटती है: गेहूँ और भूसा।

इंग्लैण्ड में अनेक वर्ग हैं। अमीर-उमराव हैं और साधारण प्रजा है; किसान हैं और दुकानदार हैं; स्वामी हैं और सेवक हैं; धनी हैं और निर्धन हैं। परन्तु परमेश्वर की दृष्टि केवल दो वर्ग देखती है: गेहूँ और भूसा।

आराधना के लिए एकत्र होनेवाली हर मण्डली में अनेक प्रकार के मन होते हैं। कुछ केवल औपचारिकता के लिए आते हैं, और कुछ सचमुच मसीह से मिलने की इच्छा रखते हैं; कुछ दूसरों को प्रसन्न करने आते हैं, और कुछ परमेश्वर को प्रसन्न करने; कुछ के हृदय खुले होते हैं और वे सन्देश के प्रति बहुत सचेत रहते हैं, और कुछ ने अपने हृदय बन्द कर रखे हैं और सारी आराधना को बोझ समझते हैं। परन्तु प्रभु यीशु की दृष्टि मण्डली में केवल दो विभाग देखती है: गेहूँ और भूसा।

1851 की महान प्रदर्शनी में लाखों दर्शक आए। यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से, उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम से, भीड़ की भीड़ यह देखने आई कि कौशल और परिश्रम क्या कर सकते हैं। संसार के कोने-कोने के लोग, जिन्होंने एक-दूसरे को पहले कभी नहीं देखा था, एक ही छत के नीचे आमने-सामने मिले। परन्तु प्रभु की दृष्टि ने उस विशाल काँच-महल में उमड़ती भीड़ में केवल दो समूह देखे: गेहूँ और भूसा।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि संसार को मसीही कहलानेवालों का यह विभाजन अच्छा नहीं लगता। संसार हमें समझाने का बहुत प्रयत्न करता है कि लोगों के दो नहीं, तीन वर्ग हैं। पहला वर्ग बहुत भले और बहुत कठोर आचरणवालों का है; परन्तु यह संसार को नहीं भाता: वे सन्त नहीं बन सकते और न बनेंगे। फिर भी तीसरा वर्ग, जिसमें कोई धर्म ही नहीं है, वह भी संसार को नहीं भाता: वह प्रतिष्ठित नहीं होगा। वे कहेंगे, "परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हम उनके जैसे बुरे नहीं हैं।" तब दूसरा वर्ग है, जिसे संसार एक सुरक्षित मध्य वर्ग समझता है, और अधिकांश मनुष्य अपने आपको समझा लेते हैं कि वे इसी वर्ग के हैं। इस वर्ग में मनुष्य को उद्धार पाने भर का धर्म चाहिए, और फिर भी अति न हो; कम से कम भला हो, और फिर भी असाधारण न हो; एक शान्त, सुविधाजनक, संयत प्रकार की मसीहियत रखे, और मरने पर आराम से स्वर्ग चला जाए। यही संसार का प्रिय वर्ग है।

मैं मध्य वर्ग की इस धारणा को एक भारी और आत्मा का नाश करनेवाला भ्रम कहकर धिक्कारता हूँ। मैं तुम्हें दृढ़ता से चेताता हूँ कि इसके बहाव में न बहो। यह रोमन कैथोलिकों के शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) के समान ही निरर्थक कल्पना है। यह झूठ का शरणस्थान है, हवा में बना किला है, रूस का बर्फ़ का महल है, एक विशाल असत्य है, एक खोखला स्वप्न है। मसीहियों का यह मध्य वर्ग ऐसा वर्ग है जिसकी चर्चा बाइबल में कहीं नहीं है।

नूह के जलप्रलय के दिनों में दो वर्ग थे: वे जो जहाज़ के भीतर थे, और वे जो बाहर थे; सुसमाचार के जाल के दृष्टान्त में दो हैं: जो अच्छी मछलियाँ कहलाती हैं, और जो बुरी कहलाती हैं; दस कुँवारियों के दृष्टान्त में दो हैं: जिन्हें बुद्धिमान बताया गया है, और जिन्हें मूर्ख बताया गया है; न्याय के दिन के वर्णन में दो हैं: भेड़ें और बकरियाँ; सिंहासन के दो ओर हैं: दाहिना हाथ और बायाँ; अन्तिम दण्डाज्ञा सुनाए जाने पर दो निवासस्थान हैं: स्वर्ग और नरक।

और जैसे पृथ्वी की दृश्य कलीसिया में केवल दो वर्ग हैं, अर्थात् वे जो अपनी स्वाभाविक अविश्वास और पाप की दशा में हैं, और वे जो अनुग्रह की दशा में हैं; वे जो सकरे मार्ग पर हैं, और वे जो चौड़े मार्ग पर चल रहे हैं; वे जिनमें विश्वास है, और वे जिनमें विश्वास नहीं है; वे जिनका मन फिराव हुआ है, और वे जिनका नहीं हुआ; वे जो मसीह के साथ हैं, और वे जो उसके विरुद्ध हैं; वे जो उसके साथ इकट्ठा करते हैं, और वे जो बिखेरते हैं; वे जो "गेहूँ" हैं, और वे जो "भूसा" हैं, इन्हीं दो वर्गों में मसीह की सारी स्वीकार करनेवाली कलीसिया बाँटी जा सकती है। इन दोनों के सिवा कोई तीसरा वर्ग नहीं है।

तुम्हें अपने आपको जाँचना चाहिए! क्या तुम गेहूँ में हो, या भूसे में? तटस्थता असम्भव है। तुम या तो एक वर्ग में हो, या दूसरे में। दोनों में से कौन-सा है?

शायद आप कलीसिया जाते हैं। आप प्रभु-भोज में सम्मिलित होते हैं। आप भले लोगों को पसन्द करते हैं। आप अच्छे और बुरे प्रचार में भेद कर सकते हैं। आप समझते हैं कि रोमन कैथोलिक मत एक झूठा धर्म है, और पूरे मन से उसका विरोध करते हैं। आप समझते हैं कि प्रोटेस्टेंट मत सच्चा है और उत्साह से उसका समर्थन करते हैं। आप मसीही सभाओं में जाते हैं। आप कभी-कभी मसीही पुस्तकें पढ़ते हैं। यह अच्छा है: यह सब बहुत अच्छा है। यह तो बहुतों के विषय में नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह मेरे प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं है—क्या आप गेहूँ हैं या भूसा?

क्या आपने नया जन्म पाया है? क्या आप नई सृष्टि हैं? क्या आपने पुराने मनुष्यत्व को उतार कर नया मनुष्यत्व पहिन लिया है? क्या आपने कभी अपने पापों का कायल होकर उनसे मन फिराया है? क्या आप अपने पापों की क्षमा और अनन्त जीवन के लिये केवल मसीह की ओर देख रहे हैं? क्या आप मसीह से प्रेम करते हैं? क्या आप मसीह की सेवा करते हैं? क्या आप अपने पापों से घृणा करते हैं और उनसे लड़ते हैं? क्या आप सिद्ध पवित्रता की लालसा रखते हैं और उसके लिये प्रयत्न करते हैं? क्या आप संसार में से निकल आए हैं? क्या आप बाइबल से आनन्दित होते हैं? क्या आप प्रार्थना में संघर्ष करते हैं? क्या आप मसीह के लोगों से प्रेम करते हैं? क्या आप संसार की भलाई करने का प्रयत्न करते हैं? क्या आप अपनी ही दृष्टि में तुच्छ हैं और सबसे नीचा स्थान लेने को तैयार हैं? क्या आप काम पर, सप्ताह के दिनों में, और अपने घर की एकान्तता में भी मसीही के समान जीवन बिताते हैं? ओह, इन बातों पर सोचिए, सोचिए, सोचिए, तब शायद आप अपनी आत्मा की दशा को भली-भाँति जान सकेंगे।

मैं आपसे विनती करता हूँ कि मेरे प्रश्न से मुँह न मोड़िए, चाहे वह कितना ही अप्रिय क्यों न हो। उसका उत्तर दीजिए, चाहे वह आपके विवेक को चुभे और आपके हृदय को कायल करे। उसका उत्तर दीजिए, चाहे वह आपको दोषी ठहराए और आपके भयानक संकट को प्रकट कर दे। चैन न लीजिए, चैन न लीजिए, जब तक आप यह न जान लें कि आपके और परमेश्वर के बीच क्या सम्बन्ध है। यह जान लेना कि आप पाप का बुरा जीवन जी रहे हैं, और तुरन्त मन फिराना, अनिश्चितता में जीते रहने और अन्त में सदा के लिये नाश हो जाने से हज़ार गुना अच्छा है।

II. दूसरे, मैं आपको वह समय दिखाऊँ जब मनुष्यों के इन दो बड़े वर्गों को अलग किया जाएगा।

इस लेख के आरम्भ में दिया गया पद एक आनेवाले अलगाव की बात कहता है। वह कहता है कि मसीह एक दिन अपनी मानी हुई कलीसिया के साथ वही करेगा जो किसान अपने अनाज के साथ करता है। वह उसे फटकेगा। वह "अपना खलिहान अच्छी रीति से साफ़ करेगा।" और तब गेहूँ और भूसा अलग-अलग किए जाएँगे।

अभी कोई अलगाव नहीं है। भले और बुरे अभी मसीह की दृश्य कलीसिया में सब मिले-जुले हैं। विश्वासी और अविश्वासी—मन फिराए हुए और मन न फिराए हुए—पवित्र और अपवित्र—सब वे लोग जो अपने आप को मसीही कहते हैं, उनके बीच मिलते हैं। वे हमारी कलीसियाओं में साथ-साथ बैठते हैं। वे प्रार्थना में साथ-साथ घुटने टेकते हैं। वे हमारे उपदेश साथ-साथ सुनते हैं। वे प्रभु-भोज में साथ-साथ बैठते हैं और हमारे हाथों से वही रोटी और दाखरस पाते हैं।

परन्तु सदा ऐसा नहीं रहेगा। मसीह दूसरी बार आएगा, और सूप उसके हाथ में होगा। वह अपनी कलीसिया को शुद्ध करेगा, जैसे उसने मन्दिर को शुद्ध किया था। और तब गेहूँ और भूसा अलग किए जाएँगे, और प्रत्येक अपने-अपने स्थान को जाएगा।

(क) मसीह के आने से पहले अलगाव असम्भव है।

यह अलगाव करना मनुष्य के वश में नहीं है। पृथ्वी पर कोई ऐसा सेवक नहीं जो अपनी मण्डली के हर व्यक्ति का हृदय पढ़ सके। वह कुछ के विषय में निश्चय से बोल सकता है, पर सबके विषय में नहीं। किसके दीपक में तेल है और किसके में नहीं—किसमें अनुग्रह भी है और दिखावा भी, और किसमें केवल दिखावा है, अनुग्रह नहीं—कौन परमेश्वर की सन्तान है और कौन शैतान की सन्तान—ये सब ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हम बहुत बार ठीक-ठीक नहीं दे सकते। सूप हमारे हाथों में नहीं दिया गया।

कुछ मसीही ऐसे हैं जिनका अनुग्रह कभी-कभी इतना निर्बल और क्षीण होता है कि वे अविश्वासियों जैसे दिखाई देते हैं। अविश्वासी कभी-कभी इतने विश्वासयोग्य और सजे-सँवरे होते हैं कि वे मसीहियों जैसे दिखाई देते हैं। मेरा विश्वास है कि हम में से बहुतों ने कहा होता कि यहूदा प्रेरितों में किसी से कम नहीं है; फिर भी वह विश्वासघाती निकला। मेरा विश्वास है कि जब पतरस ने अपने प्रभु का इन्कार किया तब हम उसे निकम्मा ठहरा देते; फिर भी उसने तुरन्त मन फिराया। हम चूकनेवाले मनुष्य हैं। "क्योंकि हमारा ज्ञान अधूरा है, और हमारी भविष्यद्वाणी अधूरी।"

(1 कुरिन्थियों 13:9) हम अपने ही हृदय को मुश्किल से समझते हैं। तो क्या यह कोई बड़े आश्चर्य की बात है कि हम दूसरों के हृदय नहीं पढ़ सकते?

परन्तु सदा ऐसा नहीं रहेगा। एक आनेवाला है जो न्याय में कभी भूल नहीं करता और जिसका ज्ञान सिद्ध है। यीशु अपना खलिहान साफ़ करेगा। यीशु भूसे को गेहूँ से अलग करेगा। मैं इसकी बाट जोहता हूँ। तब तक मैं अपने निर्णयों में प्रेम की ओर झुका रहूँगा। मैं कलीसिया में बहुत-सा भूसा सह लेना पसन्द करूँगा, बनिस्बत इसके कि गेहूँ का एक दाना भी बाहर फेंक दूँ। वह शीघ्र आएगा, "उसके हाथ में सूप" लिये हुए, और तब हर एक की पहचान प्रकट हो जाएगी।

(ख) मसीह के आने से पहले एक सिद्ध कलीसिया देखने की आशा रखना व्यर्थ है।

कोई सिद्ध कलीसिया नहीं हो सकती। इस जीवन में गेहूँ और भूसा सदा साथ-साथ पाए जाएँगे। मुझे उन पर तरस आता है जो कुछ दोषों और संदिग्ध सदस्यों के कारण एक कलीसिया को छोड़कर दूसरी में जा मिलते हैं। मुझे उन पर तरस आता है क्योंकि वे ऐसे विचारों को पाल रहे हैं जो कभी पूरे नहीं हो सकते। मुझे उन पर तरस आता है क्योंकि वे उसे ढूँढ़ रहे हैं जो मिल ही नहीं सकता। मैं हर कहीं "भूसा" देखता हूँ। मैं पृथ्वी की हर मण्डली में अपूर्णताएँ और निर्बलताएँ देखता हूँ। मेरा विश्वास है कि प्रभु-भोज की मेज़ें, यदि कोई हैं भी, तो बहुत थोड़ी हैं जहाँ सब सहभागी मन फिराए हुए हों। मैं प्रायः ऊँचे स्वर में बोलनेवाले मसीहियों को सन्तों के रूप में ऊँचा उठाया जाता देखता हूँ। मैं प्रायः पवित्र और टूटे मनवाले विश्वासियों को ऐसा समझा जाता देखता हूँ मानो उनमें अनुग्रह है ही नहीं। मेरा विश्वास है कि जो सिद्ध कलीसिया की माँग करते हैं वे नूह की कबूतरी के समान जीवन भर फड़फड़ाते फिरेंगे और कभी विश्राम न पाएँगे।

क्या इस लेख का कोई पाठक सिद्ध कलीसिया चाहता है? आपको मसीह के दूसरे आगमन की बाट जोहनी होगी। तब, और उससे पहले नहीं, आप "एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया, जिस में न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो" देखेंगे। (इफिसियों 5:27) तब, और उससे पहले नहीं, खलिहान साफ़ किया जाएगा।

(ग) मसीह के लौटने से पहले संसार के मन फिराने की आशा रखना व्यर्थ है।

यदि बाइबल कहती है कि मसीह अपने दूसरे आगमन के दिन गेहूँ और भूसे को साथ-साथ बढ़ते हुए पाएगा, तो सारा संसार कैसे परिवर्तित हो सकता है? मेरा विश्वास है कि कुछ मसीही यह आशा रखते हैं कि मिशन-कार्य पृथ्वी को मसीह के ज्ञान से भर देगा, और समय आने पर पाप मिट जाएगा और सिद्ध पवित्रता की दशा धीरे-धीरे प्रकट हो जाएगी। मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता। मेरी समझ में वे परमेश्वर के उद्देश्यों को ग़लत समझ रहे हैं और अपने लिए कड़वी निराशा बो रहे हैं। मैं ऐसी कोई आशा नहीं रखता। न बाइबल में, न अपने आसपास के संसार में मुझे ऐसी आशा रखने का कोई कारण दिखाई देता है। मैंने इंग्लैंड या स्कॉटलैंड की एक भी मण्डली के विषय में नहीं सुना जो पूरी की पूरी परमेश्वर की ओर फिरी हो — तो फिर संसार के अन्य देशों में सुसमाचार के प्रचार से मैं भिन्न परिणाम की आशा क्यों करूँ? मैं केवल इतनी आशा रखता हूँ कि अन्य जातियों में थोड़े-से लोग मसीह के गवाह होने के लिए खड़े किए जाएँगे, कुछ एक स्थान में और कुछ दूसरे में। तब मैं आशा रखता हूँ कि प्रभु यीशु महिमा में आएगा और उसके हाथ में उसका सूप होगा। और जब वह अपने खलिहान को शुद्ध कर चुकेगा, तभी, उससे पहले नहीं, उसका राज्य आरम्भ होगा।

जब तक मसीह न आए, न कोई अलगाव, न कोई सिद्धता! यही मेरा विश्वास-वचन है। जब अविश्वासी मुझसे पूछता है, "यदि सारा संसार परिवर्तित नहीं हुआ है तो मसीही धर्म सच्चा कैसे हो सकता है?" तब मैं विचलित नहीं होता। मैं उत्तर देता हूँ, "यह प्रतिज्ञा कभी नहीं की गई थी कि मसीह के लौटने से पहले सारा संसार उद्धार पा लेगा।" बाइबल मुझे बताती है कि विश्वासी सदा थोड़े ही रहेंगे, और बुराई, फूट और झूठी शिक्षाएँ सदा बहुतायत से रहेंगी, और जब मेरा प्रभु पृथ्वी पर लौटेगा तो वह भूसा बहुत पाएगा।

जब तक मसीह न आए, कोई सिद्धता नहीं! जब लोग कहते हैं, "विदेश में अन्यजातियों के पास मिशनरी भेजने से पहले तुम्हें घर के सब लोगों को अच्छा मसीही बनाना चाहिए," तब मैं विचलित नहीं होता। मैं उत्तर देता हूँ, "यदि मुझे इसकी प्रतीक्षा करनी है, तो मैं सदा प्रतीक्षा ही करता रह जाऊँगा।" जब हम घर में वह सब कर चुकेंगे जो हम कर सकते हैं, तब भी कलीसिया एक मिली-जुली देह ही रहेगी — उसमें कुछ गेहूँ और बहुत-सा भूसा होगा।

परन्तु मसीह फिर आएगा। देर-सबेर दृश्य कलीसिया दो दलों में अलग की जाएगी; वह अलगाव भयानक होगा। गेहूँ एक दल बनेगा। भूसा दूसरा दल बनेगा। एक दल पूरी तरह भक्तों का होगा। दूसरा दल पूरी तरह अभक्तों का होगा। प्रत्येक अलग-अलग होगा, और उनके बीच एक ऐसी बड़ी खाई होगी जिसे कोई पार नहीं कर सकेगा। उस दिन धर्मी सचमुच धन्य होंगे! वे तारों के समान चमकेंगे, अब बादलों से धुँधले नहीं रहेंगे। वे सोसन के फूल के समान सुन्दर होंगे, अब काँटों से दबे नहीं रहेंगे। (श्रेष्ठगीत 2:2) अभागे लोग सबसे अधिक अभक्त होंगे! जब भ्रष्टता को स्वादिष्ट बनाने के लिए नमक का एक कण भी न बचेगा, तब वह कितनी भ्रष्ट होगी! जब अन्धकार में प्रकाश की एक चिंगारी भी न बचेगी, तब वह कितना काला होगा! हाँ, प्रभु के लोगों का आदर करना और उनकी प्रशंसा करना ही काफ़ी नहीं है! तुम्हें उन्हीं में से होना चाहिए, नहीं तो एक दिन तुम उनसे सदा के लिए अलग कर दिए जाओगे। स्वर्ग में भूसा नहीं होगा। बहुत-बहुत से परिवार हैं जिनमें एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। (लूका 17:34)

इस लेख के पाठकों में कौन है जो यीशु मसीह से सच्चे मन से प्रेम रखता है? यदि मैं मसीही के हृदय के विषय में कुछ भी जानता हूँ, तो तुम्हारी सबसे बड़ी परीक्षाएँ तब होती हैं जब तुम संसारी लोगों की संगति में होते हो, और तुम्हारे सबसे बड़े आनन्द तब होते हैं जब तुम सन्तों की संगति में होते हो। हाँ! ऐसे बहुत-से दिन होते हैं जब तुम्हारी आत्मा अपने चारों ओर के सब लोगों की "संसारिकता" से टूटी और कुचली हुई अनुभव करती है — ऐसे दिन जब तुम दाऊद के साथ पुकार उठते हो, "हाय, हाय, कि मैं मेशेक में परदेशी होकर रहता, और केदार के तम्बुओं में बसा हूँ!" (भजन संहिता 120:5) फिर भी ऐसे घण्टे भी होते हैं जब परमेश्वर की किसी प्रिय सन्तान से मिलकर तुम्हारी आत्मा ऐसी ताज़ा और जीवित हो उठती है कि वह पृथ्वी पर स्वर्ग जैसा लगता है। क्या मैं तुम्हारे हृदय की बात नहीं कह रहा? क्या ये बातें सच नहीं हैं? तो तुम्हें उस समय की लालसा करनी चाहिए जब मसीह लौटेगा। तुम्हें प्रतिदिन प्रार्थना करनी चाहिए कि प्रभु अपने आनेवाले राज्य को शीघ्र लाए, और उससे कहना चाहिए, "हे प्रभु यीशु, आ।" (प्रकाशित वाक्य 22:20) तब, और केवल तब, शुद्ध और अमिश्रित सहभागिता होगी। तब, और केवल तब, सन्त सब एक साथ होंगे और एक-दूसरे की उपस्थिति से फिर कभी बाहर न जाएँगे। थोड़ी देर और ठहरो। थोड़ी देर और ठहरो। तिरस्कार और घृणा शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी। हँसी और उपहास शीघ्र ही थम जाएगा। निन्दा और झूठा चित्रण शीघ्र ही बन्द हो जाएगा। तुम्हारा उद्धारकर्ता आएगा और तुम्हारा मुक़दमा लड़ेगा। और तब, जैसा मूसा ने कोरह से कहा, "यहोवा दिखा देगा कि कौन उसका है।" (गिनती 16:5)

इस लेख के पाठकों में क्या कोई है जो जानता है कि उसका हृदय परमेश्वर की दृष्टि में ठीक नहीं है? तुम्हें मसीह के प्रकट होने के विचार से डरना और काँपना चाहिए। हाँ, जो मनुष्य धर्म के बहाने से बढ़कर किसी और वस्तु के बिना जीता और मरता है, उसका सच्चा रूप उस दिन प्रकट हो जाएगा जब मसीह आकर भूसे को गेहूँ से अलग करेगा। तुम सेवकों, मित्रों और पड़ोसियों को धोखा दे सकते हो — परन्तु मसीह को धोखा नहीं दे सकते। हृदयहीन मसीही जीवन का रंग-रोगन उस दिन की आग का सामना कभी नहीं कर सकेगा। प्रभु ज्ञान का परमेश्वर है, और वह हर काम को परखेगा और उसका न्याय करेगा। तुम पाओगे कि जिस आँख ने आकान और गेहजी के पापों को देखा था, उसने तुम्हारे भेद भी पढ़ लिए हैं और तुम्हारे हृदय की छिपी बातों को भी खोज निकाला है। तुम वह भयानक वचन सुनोगे, "हे मित्र, तू विवाह का वस्त्र पहने बिना यहाँ क्योंकर आ गया?" और तुम भी निरुत्तर हो जाओगे। (मत्ती 22:12) ओह, छँटाई और अलग किए जाने के उस दिन के विचार से काँप उठो! निश्चय ही कपट घाटे का सौदा है। निश्चय ही वास्तविकता के बिना मसीही का अभिनय करना विफल होगा। निश्चय ही तुम हनन्याह और सफीरा के समान दुःख उठाओगे, जिन्होंने परमेश्वर को कुछ देने का दिखावा किया और फिर भी अपना हृदय रोके रखा। अन्त में यह सब विफल हो जाता है। तुम्हारा आनन्द केवल एक क्षण का होगा। तुम्हारी आशाएँ एक स्वप्न से बढ़कर न होंगी। ओह, काँपो, काँपो: काँपो और मन फिराओ!

III. अब मैं तीसरे स्थान पर यह दिखाता हूँ कि जब मसीह अपने खलिहान को शुद्ध करने आएगा, तब उसके लोगों को कौन-सी मीरास मिलेगी।

इस लेख के आरम्भ का पाठ हमें सांत्वना के शब्दों में बताता है कि मसीह "अपने गेहूँ को खत्ते में इकट्ठा करेगा।"

जब प्रभु यीशु दूसरी बार आएगा, तब वह अपने विश्वासी लोगों को सुरक्षित स्थान में इकट्ठा करेगा। वह अपने स्वर्गदूतों को भेजकर उन्हें चारों दिशाओं से इकट्ठा करेगा। समुद्र अपने मृतकों को छोड़ देगा, कब्रें अपने मृतकों को छोड़ देंगी, और जो जीवित होंगे वे बदल दिए जाएँगे। मनुष्यजाति का एक भी दीन पापी, जिसने कभी यीशु मसीह पर विश्वास किया है, उस मण्डली में अनुपस्थित न होगा। जब दुष्ट संसार पर दण्ड पड़ेंगे, तब गेहूँ का एक भी दाना छूटकर बाहर न रह जाएगा। पृथ्वी के गेहूँ के लिए एक खत्ता होगा, और उसी खत्ते में सारा गेहूँ इकट्ठा किया जाएगा।

यह कितना मधुर और सांत्वनादायक विचार है कि "यहोवा अपने लोगों से प्रसन्न रहता है" और "अपने शरणागतों को जानता है।" (भजन संहिता 149:4; नहूम 1:7) परन्तु मुझे भय है कि इस बात की जानकारी बहुत कम है, और केवल धुँधली दिखाई देती है, कि प्रभु उनकी कितनी चिन्ता करता है। निःसन्देह विश्वासियों पर बहुत सी परीक्षाएँ आती हैं। शरीर दुर्बल है। संसार फन्दों से भरा है। क्रूस भारी है। मार्ग सकरा है। साथी थोड़े हैं। फिर भी उनके पास बड़ी सांत्वनाएँ हैं, यदि उनकी आँखें उन्हें देखने के लिए खुली हों। हाजिरा के समान, जंगल में भी उनके निकट जल का एक सोता है, चाहे वे उसे प्रायः नहीं देखते। मरियम के समान, यीशु उनके पास खड़ा है, चाहे अपने ही आँसुओं के कारण वे प्रायः इसे नहीं जानते। (उत्पत्ति 21:19; यूहन्ना 20:14)

मुझे सहने दीजिए, जब मैं आपको यह बताने का प्रयत्न करूँ कि मसीह उन दीन पापियों की कितनी चिन्ता करता है जो उस पर विश्वास करते हैं। हम निर्बल और शक्तिहीन प्रचार के दिनों में जी रहे हैं। मनुष्य की स्वाभाविक दशा का खतरा फीके ढंग से प्रकट किया जाता है। अनुग्रह की दशा के विशेषाधिकार फीके ढंग से बताए जाते हैं। डगमगाती आत्माओं को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। चेलों को स्थिर और दृढ़ नहीं किया जाता। जो मनुष्य मसीह के बिना है, उसे ठीक से चेताया नहीं जाता। जो मनुष्य मसीह में है, उसकी ठीक से उन्नति नहीं की जाती। एक सोता रहता है और उसके विवेक को कभी-कभार ही चुभन होती है। दूसरा जीवन भर रेंगता और घिसटता रहता है और अपनी मीरास की सम्पत्ति को पूरी तरह कभी नहीं समझता। निश्चय यह एक पीड़ादायक रोग है, और मैं इसे दूर करने में सहर्ष सहायता करना चाहूँगा। निश्चय यह एक दुःखद बात है कि परमेश्वर के लोग कभी पिसगा पर्वत पर नहीं चढ़ते, और इसलिए अपनी सम्पत्ति की लम्बाई-चौड़ाई कभी नहीं जान पाते। मसीह के भाई और लेपालकपन से परमेश्वर के पुत्र होना—पूरा और सिद्ध क्षमा पाना और पवित्र आत्मा द्वारा नया किया जाना—जीवन की पुस्तक में स्थान और स्वर्ग में महान महायाजक की सीनाबन्द पर नाम होना—ये सब निश्चय ही महिमामय बातें हैं। फिर भी विश्वासी को जो कुछ मिलेगा, वह सब यही नहीं है।

(क) प्रभु अपने विश्वासी लोगों से प्रसन्न रहता है।

यद्यपि वे अपनी ही दृष्टि में दागदार और कलंकित हैं, फिर भी उसकी दृष्टि में वे सुन्दर और आदरणीय हैं। वे सब मनोहर हैं। वह उनमें "कोई दोष" नहीं देखता। (श्रेष्ठगीत 4:7) उनकी निर्बलताएँ और कमियाँ उसके और उनके बीच के सम्बन्ध को नहीं तोड़तीं। उसने उनके हृदय की हर बात जानते हुए उन्हें चुना। उसने उनके सारे ऋणों, दायित्वों और निर्बलताओं को पूरी तरह समझकर उन्हें अपना लिया, और वह अपनी वाचा को कभी न तोड़ेगा और उन्हें न त्यागेगा। जब वे गिरते हैं, तब वह उन्हें फिर उठाता है। जब वे भटकते हैं, तब वह उन्हें लौटा लाता है। उनकी प्रार्थनाएँ उसे प्रिय हैं। जैसे पिता को अपने बच्चे के बोलने के पहले तुतलाते प्रयासों से प्रेम होता है, वैसे ही प्रभु अपने लोगों की दीन और निर्बल विनतियों से प्रेम करता है। वह उन पर अपनी सामर्थी मध्यस्थता की प्रार्थना की मुहर लगाता है और उन्हें ऊपर सामर्थ्य देता है। उनकी सेवा के काम उसे प्रिय हैं। जैसे पिता उस पहले फूल से आनन्दित होता है जो उसका बच्चा तोड़कर उसके पास लाता है, वैसे ही प्रभु अपने लोगों के उसकी सेवा करने के निर्बल प्रयासों से प्रसन्न होता है। ठण्डे पानी का एक कटोरा भी अपना प्रतिफल कभी न खोएगा। प्रेम से कहा गया एक भी शब्द कभी भुलाया न जाएगा। पवित्र आत्मा ने इब्रानियों के लेखक को नूह के विश्वास के विषय में लिखने की प्रेरणा दी, परन्तु उसके मतवालेपन के विषय में नहीं—राहाब के विश्वास के विषय में, परन्तु उसके झूठ के विषय में नहीं। परमेश्वर का गेहूँ होना कितनी धन्य बात है!

(ख) प्रभु अपने विश्वासी लोगों के जीवन में उनकी चिन्ता करता है।

उनका निवासस्थान भली-भाँति जाना हुआ है। "सीधी" नामक गली, जहाँ यहूदा रहता था और पौलुस ठहरा था—समुद्र के किनारे का वह घर जहाँ पतरस ने प्रार्थना की थी, ये सब उनके प्रभु को परिचित थे। किसी के पास ऐसे सेवक नहीं हैं जैसे उनके पास हैं: जब वे नये सिरे से जन्म लेते हैं तब स्वर्गदूत आनन्दित होते हैं; स्वर्गदूत उनकी सेवा करते हैं; और स्वर्गदूत उनके चारों ओर डेरा डालते हैं। किसी के पास ऐसा भोजन नहीं है—उनकी रोटी उन्हें दी जाती है और उनका जल निश्चित है, और उनके पास खाने के लिए ऐसा भोजन है जिसके विषय में संसार कुछ नहीं जानता। किसी की ऐसी संगति नहीं है जैसी उनकी है: पवित्र आत्मा उनके भीतर वास करता है; पिता और पुत्र उनके पास आते हैं और उनके साथ अपना निवास बनाते हैं। (यूहन्ना 14:23) उनके पग अनुग्रह से महिमा तक सब ठहराए हुए हैं: जो उन्हें सताते हैं वे स्वयं मसीह को सताते हैं, और जो उन्हें हानि पहुँचाते हैं वे प्रभु की आँख की पुतली को हानि पहुँचाते हैं। एक बुद्धिमान वैद्य उनकी सब परीक्षाओं और प्रलोभनों को नाप-तौलकर देता है: उनके कटोरे में कड़वाहट का एक कण भी नहीं मिलाया जाता जो उनकी आत्मा के स्वास्थ्य के लिए भला न हो। उनके प्रलोभन, अय्यूब के प्रलोभनों के समान, सब परमेश्वर के वश में हैं। शैतान उनके प्रभु की अनुमति के बिना उनके सिर का एक बाल भी नहीं छू सकता, और न उन्हें उनकी सामर्थ्य से बाहर प्रलोभन में डाल सकता है। "जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।" "वह मनुष्यों को अपनी इच्छा से न तो दुःख देता है और न शोक कराता है।" (भजन संहिता 103:13; विलापगीत 3:33) वह उन्हें सही मार्ग पर ले चलता है। जो कुछ उनके भले के लिए हो, वह उसे रोक नहीं रखता। चाहे कुछ भी हो, उन पर आनेवाली हर पीड़ा सदा आवश्यक होगी। जब वे भट्ठी में डाले जाते हैं, तो इसलिए कि वे शुद्ध किए जाएँ। जब उन्हें ताड़ना दी जाती है, तो इसलिए कि वे और अधिक पवित्र हों। जब उनकी छँटाई की जाती है, तो इसलिए कि वे और अधिक फलवन्त हों। जब वे एक स्थान से दूसरे स्थान में लगाए जाते हैं, तो इसलिए कि वे और अधिक उजियाले से खिलें। सब बातें निरन्तर उनके भले के लिए मिलकर काम करती हैं। मधुमक्खी के समान, वे अत्यन्त कड़वे फूलों से भी मिठास निकाल लेते हैं।

(ग) प्रभु अपने विश्वासी लोगों की मृत्यु में उनकी चिन्ता करता है।

उनके समय सब प्रभु के हाथ में हैं। उनके सिर के सब बाल गिने हुए हैं और उनमें से एक भी उनके पिता की अनुमति के बिना भूमि पर नहीं गिर सकता। वे पृथ्वी पर तब तक रखे जाते हैं जब तक वे महिमा के लिए पक कर तैयार नहीं हो जाते, और एक क्षण भी अधिक नहीं। जब उन्हें पर्याप्त धूप और वर्षा, पर्याप्त हवा और आँधी, पर्याप्त ठण्ड और गर्मी मिल चुकती है—जब फल पक जाता है—तब, और उससे पहले नहीं, वे काट लिए जाते हैं। जब तक उनका काम पूरा नहीं हो जाता, वे सब अमर हैं। ऐसा कोई रोग नहीं जो उनके प्राण ले सके, जब तक प्रभु आज्ञा न दे। उनके दाहिने हाथ पर हज़ार गिर सकते हैं, पर कोई महामारी उन्हें तब तक छू नहीं सकती जब तक प्रभु उचित न समझे। कोई वैद्य उन्हें जीवित नहीं रख सकता जब प्रभु उन्हें घर बुलाने की आज्ञा दे। जब वे अपनी मृत्युशय्या पर पहुँचते हैं, तब सनातन भुजाएँ उन्हें चारों ओर से थामे रहती हैं। जब वे मरते हैं, तो मूसा की नाईं मरते हैं, "यहोवा के वचन के अनुसार," और ठीक समय पर और ठीक रीति से। (व्यवस्थाविवरण 34:5) और जब वे अन्तिम साँस लेते हैं, तो मसीह में सो जाते हैं और तुरन्त लाज़र की नाईं अब्राहम की गोद में पहुँचा दिए जाते हैं। हाँ! मसीह का गेहूँ होना धन्य बात है! जब दूसरे लोगों का सूर्य अस्त हो रहा होता है, तब विश्वासी का सूर्य उदय हो रहा होता है। जब दूसरे लोग अपना मान-सम्मान उतार रहे होते हैं, तब वह अपना धारण कर रहा होता है। मृत्यु अविश्वासी के लिए द्वार बन्द करके उसे आशा से बाहर कर देती है; परन्तु विश्वासी के लिए मृत्यु द्वार खोल देती है और उसे स्वर्गलोक में पहुँचा देती है।

(घ) प्रभु अपने आगमन के भयानक दिन में अपने विश्वासी लोगों की चिन्ता करेगा।

वह धधकती आग उनके निकट नहीं आएगी। प्रधान स्वर्गदूत का शब्द और परमेश्वर की तुरही उनके कानों में कोई भय नहीं सुनाएगी। सोते हों या जागते, जीवित हों या मरे हुए, ताबूत में सड़ रहे हों या अपने दैनिक कर्तव्यों में लगे हों—विश्वासी सुरक्षित और अडिग रहेंगे। जब वे छुटकारे को निकट आते देखेंगे, तो आनन्द से अपने सिर उठाएँगे। वे बदल जाएँगे और पल भर में अपने सुन्दर स्वर्गीय वस्त्र पहन लेंगे। वे "हवा में प्रभु से मिलने के लिये" उठा लिए जाएँगे। (1 थिस्सलुनीकियों 4:17) जब तक उसके सब लोग सुरक्षित न हो जाएँ, यीशु पाप के बोझ से दबे संसार के साथ कुछ नहीं करेगा। जब जल-प्रलय आरम्भ हुआ, तब नूह के लिए जहाज़ था। जब सदोम पर आग बरसी, तब लूत के भागने के लिए सोअर नगर था। जब यरूशलेम घेर लिया गया, तब आरम्भिक मसीहियों के लिए शरण का स्थान था। जब रोमन कैथोलिक मत की समर्थक मरियम गद्दी पर बैठी, तब अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों के लिए ज़्यूरिख था। और अन्तिम दिन पृथ्वी के सारे गेहूँ के लिए एक सुरक्षित और निरापद खत्ता होगा। हाँ! मसीह का गेहूँ होना धन्य बात है!

हम में से जो विश्वासी हैं, उनके शोचनीय अविश्वास पर मुझे प्रायः आश्चर्य होता है। अपरिवर्तित मन की कठोरता के बाद, मैं इसे संसार के सबसे बड़े आश्चर्यों में से एक कहता हूँ। मैं चकित हूँ कि भरोसा रखने के इतने सामर्थी कारणों के होते हुए भी हम सन्देहों से इतने भरे रह सकते हैं। सबसे अधिक मुझे इस पर अचम्भा होता है कि कोई इस सिद्धान्त का खण्डन कैसे कर सकता है कि मसीह के लोग अन्त तक स्थिर रहते हैं, और यह कैसे सोच सकता है कि जिसने उनसे इतना प्रेम किया कि उनके लिए क्रूस पर प्राण दिए, वह कभी उन्हें त्याग देगा। मैं इसे सम्भव नहीं समझता। मुझे विश्वास नहीं कि प्रभु यीशु अपने झुण्ड में से कभी किसी एक को भी खोएगा। वह शैतान को अपने पास से एक रोगी मेमने को भी छीनने नहीं देगा। वह अपनी रहस्यमय देह की एक हड्डी भी टूटने नहीं देगा। वह अपने मुकुट से एक रत्न भी गिरने नहीं देगा। वह और उसकी दुल्हन एक सनातन वाचा में जुड़े हैं और वे कभी, कभी अलग नहीं किए जाएँगे। सांसारिक विजेताओं की जीती हुई निशानियाँ प्रायः उनसे छीनकर ले जाई गई हैं; परन्तु उसकी निशानियों के विषय में यह कभी नहीं कहा जाएगा जिसने क्रूस पर हमारे लिए जय पाई। वह कहता है, "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी।" (यूहन्ना 10:28) मैं इसी वचन पर दृढ़ खड़ा हूँ। मैं नहीं जानता कि इससे कैसे बचा जा सकता है। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो निश्चय ही मसीह के लोगों का अन्त तक स्थिर रहना वहीं है।

मुझे विश्वास नहीं होता कि जब दाऊद ने मेमने को सिंह के पंजों से छुड़ाया, तो उसने उसे निर्बल और घायल दशा में जंगल में मरने को छोड़ दिया। मैं यह नहीं मान सकता कि जब प्रभु यीशु किसी आत्मा को शैतान के फन्दे से छुड़ा लेता है, तो वह कभी उस आत्मा को उसके भाग्य पर छोड़ देगा कि वह अपनी ही दुर्बलता में पाप, शैतान और संसार से जूझता रहे।

मुझे पूरा निश्चय है कि यदि आप किसी जहाज़ के डूबने के समय वहाँ होते और किसी असहाय बच्चे को लहरों पर उछलते देखते, तो आप समुद्र में कूदकर अपने प्राण जोखिम में डालकर भी उसे बचाते। मुझे पूरा निश्चय है कि आप केवल उस बच्चे को सुरक्षित किनारे तक पहुँचाकर सन्तुष्ट न होते। आप किनारे पहुँचकर उसे यों ही लिटाकर यह न कहते, "अब मैं और कुछ नहीं करूँगा। वह कमज़ोर है—वह बेहोश है—उसे ठण्ड लग रही है: कोई बात नहीं। मैंने काफ़ी कर दिया—मैंने उसे पानी से निकाल लिया: वह डूबा नहीं।" आप ऐसा नहीं करते। आप ये बातें न कहते। आप उस बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार न करते। आप उसे अपनी बाँहों में उठाते; उसे निकटतम घर में ले जाते; उसका स्वास्थ्य और बल लौटाने के लिए हर उपाय करते: और जब तक उसका स्वस्थ होना निश्चित न हो जाता, उसे कभी न छोड़ते।

अब क्या आप सोच सकते हैं कि प्रभु यीशु मसीह कम दयालु और कम करुणामय है? क्या आप सोच सकते हैं कि वह क्रूस पर दुःख उठाएगा और मरेगा, फिर भी यह अनिश्चित छोड़ देगा कि उस पर विश्वास करनेवाले उद्धार पाएँगे या नहीं? क्या आप सोच सकते हैं कि वह मृत्यु और नरक से जूझेगा और हमारे लिए कब्र में उतरेगा, फिर भी हमारे अनन्त जीवन को हमारे तुच्छ, दयनीय प्रयासों जैसे पतले धागे पर लटकता छोड़ देगा?

अरे नहीं! वह ऐसा नहीं करता! वह सिद्ध और पूर्ण उद्धारकर्ता है। जिनसे वह प्रेम करता है, उनसे अन्त तक प्रेम करता है। जिन्हें वह अपने लहू से धोता है, उन्हें कभी नहीं छोड़ता और न त्यागता है। वह अपना भय उनके मन में डाल देता है ताकि वे उससे अलग न हों। जहाँ वह कोई काम आरम्भ करता है, वहाँ उसे पूरा भी करता है। जिन्हें वह पृथ्वी पर अपनी बारी में लगाता है, उन सब को वह देर-सवेर स्वर्गलोक में रोप देता है। जिन्हें वह अपनी आत्मा से जिलाता है, उन सब को वह अपने राज्य में प्रवेश करते समय अपने साथ ले जाएगा। गेहूँ के हर दाने के लिए एक खत्ता है। सब सिय्योन में परमेश्वर के सामने उपस्थित होंगे।

मनुष्य झूठे अनुग्रह से गिर सकता है। मैंने इस पर कभी सन्देह नहीं किया। मैं इसका प्रमाण निरन्तर देखता हूँ। मनुष्य सच्चे अनुग्रह से कभी नहीं गिरते। वे कभी नहीं गिरे, और कभी नहीं गिरेंगे। यदि वे पतरस के समान पाप कर बैठें, तो वे मन फिराएँगे और फिर उठ खड़े होंगे। यदि वे दाऊद के समान सही मार्ग से भटक जाएँ, तो वापस लाए जाएँगे। उन्हें धर्मत्याग से बचाए रखनेवाली कोई शक्ति या सामर्थ्य उनकी अपनी नहीं है। वे त्रिएकता की सामर्थ्य, प्रेम और प्रतिज्ञाओं के कारण सुरक्षित रखे जाते हैं। परमेश्वर पिता का चुनाव निष्फल नहीं होगा; परमेश्वर पुत्र की मध्यस्थता की प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी; परमेश्वर पवित्र आत्मा का प्रेम व्यर्थ परिश्रम नहीं करेगा। प्रभु "अपने भक्तों के पाँवों की रखवाली करेगा।" (1 शमूएल 2:9) वे सब उसके द्वारा जिसने उनसे प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर होंगे। वे सब जय पाएँगे, और कोई भी सदा के लिए नहीं मरेगा।

"उस माता की सन्तान सदा सर्वदा धन्य है जिसके विश्वास ने उसे परमेश्वर की सन्तान बना दिया है। पृथ्वी हिल जाए, संसार के खम्भे हमारे नीचे काँप उठें, आकाश का मुख भयभीत हो जाए, सूर्य अपना प्रकाश खो दे, चन्द्रमा अपनी शोभा, और तारे अपनी महिमा: परन्तु जो मनुष्य परमेश्वर पर भरोसा रखता है, उसके विषय में— संसार में ऐसा क्या है जो उसका मन बदल दे, उसके विश्वास को उलट दे, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को, या उसके प्रति परमेश्वर के प्रेम को बदल दे?" रिचर्ड हूकर, 1585।

यदि तुमने अब तक क्रूस नहीं उठाया है और मसीह के चेले नहीं बने हो, तो तुम बहुत कम जानते हो कि तुम किन अधिकारों से वंचित हो रहे हो। अब परमेश्वर के साथ मेल और आगे महिमा—तुम्हारा मार्गदर्शन और रक्षा करनेवाली सनातन भुजाएँ जो तुम्हें स्वर्ग के मार्ग में थामे रहें, और अन्त में सुरक्षा का आश्रय—ये सब तुम्हें बिना दाम, बिना मूल्य सेंतमेंत दिए जाते हैं। तुम कह सकते हो कि मसीहियों पर परीक्षाएँ आती हैं—तुम भूल जाते हो कि उनके पास सांत्वनाएँ भी हैं। तुम कह सकते हो कि उनके अपने विशेष दुःख हैं—तुम भूल जाते हो कि उनके अपने विशेष आनन्द भी हैं। तुम मसीही जीवन का केवल आधा भाग देखते हो। तुम सब कुछ नहीं देखते। तुम युद्ध को देखते हो, परन्तु प्रतिदिन के पोषण और प्रतिफल को नहीं देखते। तुम मसीही जीवन के बाहरी पक्ष के संघर्षों और टकराव को देखते हो, परन्तु उन छिपे हुए खज़ानों को नहीं देखते जो भीतर गहराई में रखे हैं। एलीशा के सेवक के समान तुम परमेश्वर की सन्तानों के शत्रुओं को देखते हो, परन्तु एलीशा के समान उन आग के रथों और घोड़ों को नहीं देखते जो उनकी रक्षा करते हैं। अरे, बाहरी रूप देखकर न्याय मत करो! निश्चय जानो कि "जीवन के जल" की सबसे छोटी बूँद भी संसार की सब नदियों से उत्तम है। आश्रय-स्थान और मुकुट को स्मरण रखो। इस पृथ्वी पर जीते हुए बुद्धिमान बनो।

यदि तुम अनुभव करते हो कि तुम एक निर्बल चेले हो, तो यह मत सोचो कि निर्बलता तुम्हें उन किसी भी अधिकारों से वंचित कर देती है जिनकी मैं चर्चा करता आया हूँ। निर्बल विश्वास भी सच्चा विश्वास है, और निर्बल अनुग्रह भी सच्चा अनुग्रह है, और दोनों उसी की देन हैं जो कभी व्यर्थ नहीं देता। मत डरो और हताश मत हो। सन्देह न करो, और निराश भी न हो। यीशु कभी "कुचले हुए नरकट को न तोड़ेगा, और न धुआँ देती हुई बत्ती को बुझाएगा।"

(यशायाह 42:3) परिवार के शिशुओं से भी उतना ही प्रेम किया जाता है और उनकी उतनी ही चिन्ता की जाती है जितनी बड़े भाई-बहनों की। बगीचे के कोमल पौधों की भी उतनी ही लगन से देखभाल की जाती है जितनी पुराने वृक्षों की। भेड़-बकरियों के झुण्ड में मेमनों की भी भला चरवाहा उतनी ही सावधानी से देखभाल करता है जितनी बूढ़ी भेड़ों की। अरे, निश्चिन्त रहो कि मसीह के परिवार में, मसीह के बगीचे में, मसीह के झुण्ड में भी ठीक ऐसा ही है! सब से प्रेम किया जाता है। सब की कोमलता से चिन्ता की जाती है। सब की देखभाल होती है। और अन्त में सब उसके खत्ते में पाए जाएँगे।

IV. अन्त में मैं यह दिखाऊँ कि उन सब के लिए क्या भाग शेष है जो मसीह के लोग नहीं हैं।

इस लेख के आरम्भ का पद इसे ऐसे शब्दों में बताता है जो हमारे कानों को झनझना दें: मसीह "भूसी को उस आग में जलाएगा जो कभी बुझनेवाली नहीं।"

जब प्रभु यीशु मसीह अपना खलिहान साफ़ करने आएगा, तब वह उन सब को जो उसके चेले नहीं हैं भयानक दण्ड देगा। वे सब जो मन न फिरानेवाले और अविश्वासी पाए जाएँगे—वे सब जिन्होंने अपनी दुष्टता से सत्य को दबा रखा है—वे सब जो पाप से चिपके रहे, संसार से प्रेम रखा, और अपना मन नीचे की वस्तुओं में लगाया—वे सब जो मसीह के बिना हैं— उन सब का अन्त भयानक होगा। मसीह "भूसी को जला देगा।"

उनका दण्ड अत्यन्त कठोर होगा। जलने जैसी पीड़ा और कोई नहीं। यदि तुम्हें इसमें सन्देह हो, तो क्षण भर के लिए अपनी उँगली मोमबत्ती की लौ में डालकर देखो। आग सब तत्त्वों में सबसे अधिक विनाशकारी और भस्म करनेवाली है। किसी धमन-भट्ठी के मुँह में झाँको और सोचो कि उसके भीतर होना कैसा होगा। सब तत्त्वों में आग जीवन की सबसे बड़ी विरोधी है। प्राणी हवा में, धरती पर और पानी में जी सकते हैं; परन्तु आग में कुछ भी जीवित नहीं रह सकता; फिर भी वही आग वह दण्ड है जिसमें मसीह से रहित और अविश्वासी लोग पड़ेंगे। मसीह "भूसी को आग में जला देगा।"

उनका दण्ड अनन्त होगा। लाखों युग बीत जाएँगे और जिस आग में भूसी डाली गई है वह फिर भी जलती रहेगी। वह आग कभी मन्द होकर बुझने नहीं लगेगी। उस आग का ईंधन कभी चुकेगा नहीं। वह "कभी न बुझनेवाली आग" है।

ये बातें कहने में दुःख और पीड़ा होती है! इन पर ठहरने में मुझे कोई आनन्द नहीं। मैं तो लिखते हुए प्रेरित पौलुस के साथ यही कहना चाहूँगा, "मेरे मन में बड़ा शोक और निरन्तर पीड़ा रहती है।" (रोमियों 9:2) परन्तु ये बातें हमारी शिक्षा के लिए लिखी गई हैं और इन पर विचार करना अच्छा है। ये उस पवित्रशास्त्र का भाग हैं जो "लाभदायक" है, और इन्हें सुना जाना चाहिए। नरक का विषय चाहे कितना ही पीड़ादायक हो, यह ऐसा विषय है जिसके बारे में मैं चुप रहने का साहस नहीं कर सकता, न चुप रह सकता हूँ, न मुझे चुप रहना चाहिए। यदि परमेश्वर ने नरक की आग के विषय में न कहा होता, तो कौन उसकी चर्चा करना चाहता? जब परमेश्वर ने इसके विषय में इतना स्पष्ट कहा है, तब उसकी चर्चा किए बिना कौन सुरक्षित रह सकता है?

मैं इस तथ्य की ओर से आँखें बन्द करने का साहस नहीं कर सकता कि नरक के विषय में मनुष्यों के मन में एक गहरी जमी हुई उदासीनता छिपी है। मैं इसे कुछ लोगों की पूर्ण उदासीनता में रिसते हुए देखता हूँ: वे ऐसे खाते, पीते और सोते हैं मानो आनेवाला कोई क्रोध है ही नहीं। मैं इसे दूसरों की उस ठण्डक में रेंगते हुए देखता हूँ जो वे अपने पड़ोसियों की आत्माओं के प्रति दिखाते हैं: वे जलती हुई लकड़ियों को आग से खींच निकालने की कोई चिन्ता नहीं दिखाते। मैं ऐसी उदासीनता की अपनी पूरी शक्ति से निन्दा करता हूँ; यह विश्वास करते हुए कि जैसे "प्रतिफल देना" है, वैसे ही "प्रभु का भय" भी है, मैं उन सब से जो बाइबल पर विश्वास करने का दावा करते हैं, आग्रह करता हूँ कि वे सावधान रहें।

(क) मैं जानता हूँ कि कुछ लोग नहीं मानते कि नरक का अस्तित्व है।

वे समझते हैं कि ऐसा कोई स्थान हो ही नहीं सकता। वे उसे परमेश्वर की दया के विरुद्ध कहते हैं। वे कहते हैं कि यह विचार इतना भयानक है कि सचमुच सत्य नहीं हो सकता। शैतान तो ऐसे लोगों के विचारों से अवश्य ही प्रसन्न होता है। वे उसके राज्य की बड़ी सहायता करते हैं। वे उसी के प्रिय सिद्धान्त का प्रचार कर रहे हैं: "तुम निश्चय न मरोगे।" (उत्पत्ति 3:4)

(ख) इसके अतिरिक्त, मैं जानता हूँ कि कुछ लोग नहीं मानते कि नरक अनन्त है।

वे हमसे कहते हैं कि यह विश्वास के योग्य नहीं कि दयालु परमेश्वर मनुष्यों को सदा के लिये दण्ड देगा; वह किसी दिन बन्दीगृह के द्वार अवश्य खोल देगा। यह भी शैतान के पक्ष की बड़ी सहायता है। वह पापियों के कान में कहता है, "निश्चिन्त रहो; यदि तुमसे कोई चूक हो भी गई तो कोई बात नहीं, यह सदा के लिये तो है नहीं।"

लन्दन की गलियों में एक दुष्ट स्त्री को अपनी बुरी संगिनी से यह कहते सुना गया, "चलो, डरो मत। सच तो यह है कि कुछ प्रचारक कहते हैं कि नरक है ही नहीं।"

(ग) मैं यह भी जानता हूँ कि कुछ लोग मानते तो हैं कि नरक है, परन्तु यह नहीं मानते कि कोई वहाँ जा रहा है।

वे मानते हैं कि मरते ही सब लोग, उनके साथ-साथ, "भले" घोषित कर दिए जाते और बना दिए जाते हैं, क्योंकि सब सच्चे थे, सबका उद्देश्य अच्छा था, और सब, उनकी आशा के अनुसार, स्वर्ग पहुँच गए। ओह, यह कितना सामान्य भ्रम है! मैं उस छोटी लड़की की भावना को भली-भाँति समझ सकता हूँ जिसने अपनी माँ से पूछा था कि सब दुष्ट लोग कहाँ गाड़े जाते हैं, "क्योंकि कब्रिस्तान की सब समाधियों पर तो लिखा है कि ये भले लोग थे।"

(घ) और मैं भली-भाँति जानता हूँ कि कुछ लोग मानते हैं कि नरक है, पर वे नहीं चाहते कि उसकी चर्चा कभी की जाए।

उनके मत में यह ऐसा विषय है जिससे सदा बचना चाहिए। उन्हें इसे उठाने में कोई लाभ नहीं दिखता, और जब इसकी चर्चा होती है तो वे चौंक जाते हैं। यह भी शैतान की बहुत बड़ी सहायता है। शैतान कहता है, "चुप, चुप! नरक के विषय में कुछ मत कहो।" शिकारी जब अपने फन्दे लगाता है तो कोई आवाज़ नहीं करना चाहता। भेड़िया चाहता है कि जब वह भेड़शाला के चारों ओर घूमे तो चरवाहा सोता रहे। जब मसीही नरक के विषय में चुप रहते हैं तो शैतान आनन्दित होता है।

ये सब धारणाएँ मनुष्य की राय हैं। परन्तु इससे आपको और मुझे क्या कि धर्म के विषय में मनुष्य क्या सोचता है? अन्तिम दिन मनुष्य हमारा न्याय नहीं करेगा। इस जीवन में मनुष्य के विचार और परम्पराएँ हमारी मार्गदर्शक न हों। निपटाने की बात केवल एक ही है: "परमेश्वर का वचन क्या कहता है?"

(क) क्या आप बाइबल पर विश्वास करते हैं? तो निश्चय जानिए कि नरक वास्तविक और सत्य है।

वह स्वर्ग के समान सत्य है—विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के समान सत्य—इस तथ्य के समान सत्य कि मसीह क्रूस पर मरा—मृत सागर के समान सत्य। यदि आप नरक पर सन्देह करते हैं तो बाइबल में कोई ऐसा तथ्य या सिद्धान्त नहीं जिस पर आप सन्देह न कर सकें। नरक पर अविश्वास कीजिए और आप पवित्रशास्त्र की हर बात के पेच ढीले कर देंगे और उसे डगमगा देंगे। आप अपनी बाइबल फेंक भी दें तो अच्छा, क्योंकि "नरक नहीं" से "परमेश्वर नहीं" तक केवल कुछ ही कदम हैं।

(ख) क्या आप बाइबल पर विश्वास करते हैं? तो निश्चय जानिए कि नरक में निवासी होंगे।

दुष्ट लोग निश्चय ही नरक में भेजे जाएँगे, और वे सब जो परमेश्वर को भूल जाते हैं। "वे अनन्त दण्ड भोगेंगे।" (मत्ती 25:46) वही धन्य उद्धारकर्ता जो अब अनुग्रह के सिंहासन पर बैठा है, एक दिन न्याय के सिंहासन पर बैठेगा, और लोग देखेंगे कि "मेम्ने का प्रकोप" भी कोई वस्तु है। (प्रकाशित वाक्य 6:16) वही होंठ जो अब कहते हैं, "आओ: मेरे पास आओ!" एक दिन कहेंगे, "हे श्रापित लोगो, मेरे सामने से चले जाओ!" मसीह के ही द्वारा दोषी ठहराए जाने, उद्धारकर्ता के द्वारा न्याय पाने, और मेम्ने के द्वारा दुःख की आज्ञा पाने का विचार कितना भयानक है!

(ग) क्या आप बाइबल पर विश्वास करते हैं? तो निश्चय जानिए कि नरक तीव्र और अकथनीय दुःख होगा।

नरक के सब वर्णनों को केवल अलंकार कहना व्यर्थ है। गड्ढा, बन्दीगृह, कीड़ा, आग, प्यास, कालिमा, अन्धकार, रोना, दाँत पीसना, दूसरी मृत्यु—ये सब यदि आप चाहें तो अलंकार हो सकते हैं। परन्तु निस्सन्देह बाइबल में अलंकारों का कुछ अर्थ होता है, और यहाँ उनका अर्थ ऐसा है जिसे मनुष्य का मन कभी पूरी तरह नहीं समझ सकता। मन और विवेक की पीड़ा शरीर की पीड़ा से कहीं अधिक बुरी है। नरक का सम्पूर्ण विस्तार—वर्तमान कष्ट, अतीत की कड़वी स्मृति, भविष्य की आशाहीन संभावना—उन्हीं को पूरी तरह ज्ञात होगा जो वहाँ जाएँगे।

(घ) क्या आप बाइबल पर विश्वास करते हैं? तो निश्चय जानिए कि नरक अनन्त है।

वह अनन्त होना ही चाहिए, नहीं तो शब्दों का कोई अर्थ ही नहीं रहता। सदा सर्वदा—अनन्त—अबुझ—अनन्तकालीन—ये सब नरक के विषय में प्रयुक्त शब्द हैं और ऐसे शब्द हैं जिनकी व्याख्या करके उन्हें टाला नहीं जा सकता। वह अनन्त होना ही चाहिए, नहीं तो स्वर्ग की नींव ही नष्ट हो जाती है। यदि नरक का अन्त है, तो स्वर्ग का भी अन्त है। दोनों साथ-साथ खड़े रहते या गिरते हैं। वह अनन्त होना ही चाहिए, नहीं तो सुसमाचार का हर सिद्धान्त खोखला हो जाता है। यदि मसीह में विश्वास या आत्मा के पवित्रीकरण के बिना भी मनुष्य नरक से बच सकता है, तो पाप अब असीम बुराई नहीं रहता और मसीह के प्रायश्चित करने की कोई बड़ी आवश्यकता नहीं थी। और बाइबल में कहाँ यह कहने का आधार है कि नरक कभी किसी हृदय को बदल सकता है या उसे स्वर्ग के योग्य बना सकता है? वह अनन्त होना ही चाहिए, नहीं तो नरक नरक रहेगा ही नहीं। मनुष्य को आशा दीजिए, तो वह सब कुछ सह लेगा। छुटकारे की आशा चाहे कितनी ही दूर की क्यों न हो, नरक केवल पानी की एक बूँद है। ओह, ये गम्भीर बातें हैं! ठीक ही कहा गया है कि "सदा के लिये" पवित्रशास्त्र का सबसे गम्भीर वचन है। क्योंकि नरक के एक दिन का कोई कल नहीं होगा। वह ऐसा स्थान होगा जहाँ मनुष्य मृत्यु को ढूँढ़ेंगे पर न पाएँगे, और मरना चाहेंगे, परन्तु मृत्यु उनसे भागेगी! "हम में से कौन भस्म करनेवाली आग में रह सकता है? हम में से कौन अनन्त जलन में रह सकता है?" (प्रकाशित वाक्य 9:6; यशायाह 33:14) (ङ) क्या आप बाइबल पर विश्वास करते हैं? तो निश्चय जानिए कि नरक ऐसा विषय है जिसे छिपाकर नहीं रखना चाहिए।

पवित्रशास्त्र में नरक के विषय में कितने ही पद हैं, यह स्पष्ट ही देखा जा सकता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह—उस अनुग्रहकारी और दयालु उद्धारकर्ता—तथा प्रेरित यूहन्ना, जिसका हृदय प्रेम से भरा हुआ प्रतीत होता है, इन दोनों से बढ़कर नरक के विषय में किसी ने इतना नहीं कहा। सच तो यह है कि इसमें सन्देह है कि हम सेवक लोग इसकी चर्चा उतनी करते भी हैं जितनी करनी चाहिए। एक मरते हुए व्यक्ति के वे शब्द मैं भूल नहीं सकता जो उसने अपने सेवक से कहे थे, "महोदय, आपने मुझे मसीह और उद्धार के विषय में तो बहुत बार बताया, परन्तु आपने मुझे नरक और संकट की याद बार-बार क्यों नहीं दिलाई?"

यदि दूसरे लोग चाहें तो नरक के विषय में चुप रहें—मैं ऐसा करने का साहस नहीं कर सकता। मैं इसे पवित्रशास्त्र में स्पष्ट देखता हूँ, इसलिए मुझे इसके विषय में बोलना ही होगा। मुझे डर है कि हज़ारों लोग उस चौड़े मार्ग पर हैं जो वहीं पहुँचाता है, और मैं उन्हें उनके सामने खड़े संकट का बोध कराने के लिए जगाना चाहता हूँ। उस मनुष्य के विषय में तुम क्या कहोगे जिसने अपने पड़ोसी के घर में आग लगी देखी और फिर भी अपनी आवाज़ न उठाई और "आग!" कहकर न चिल्लाया? यदि हम सेवक, जो अपने आप को आत्माओं के पहरुए कहते हैं, दूर नरक की आग को धधकते देखें और कभी चेतावनी न दें, तो हमारे विषय में क्या कहा जाएगा? चाहो तो नरक की चर्चा करने को अरुचिकर कह लो। चाहो तो सुखद बातें करने, मीठी-मीठी बातें बोलने और शान्ति की निरन्तर लोरी सुनाकर मनुष्यों को सुला देने को ही प्रेम कह लो। परमेश्वर करे कि मैं रुचि और प्रेम की ऐसी धारणाओं से सदा बचा रहूँ! मेरी धारणा में प्रेम यह है कि मनुष्यों को संकट की स्पष्ट चेतावनी दी जाए। सेवकाई के पद में रुचि की मेरी धारणा यह है कि परमेश्वर की पूरी युक्ति सुनाई जाए। यदि मैं कभी नरक की चर्चा न करूँ, तो मैं कोई लाभदायक बात रोके रखूँगा और अपने आप को शैतान का सहभागी समझूँगा।

इस पत्र के हर पाठक से मैं पूरे कोमल स्नेह के साथ विनती करता हूँ कि जिस विषय पर मैं ठहरा रहा हूँ, उसके विषय में झूठे विचारों से सावधान रहो। नरक और अनन्त दण्ड के विषय में नये और अनोखे सिद्धान्तों से सावधान रहो। अपने मन से एक ऐसा परमेश्वर गढ़ लेने से सावधान रहो—जो केवल दया ही दया हो, परन्तु न्यायी न हो—जो केवल प्रेम ही प्रेम हो, परन्तु पवित्र न हो—जिसके पास सब के लिए स्वर्ग हो, पर किसी के लिए नरक न हो—जो पृथ्वी पर भले और बुरे को साथ-साथ रहने दे सकता हो, और अनन्तकाल में भले और बुरे में कोई भेद न करे। ऐसा परमेश्वर तुम्हारा अपना गढ़ा हुआ मूर्ति है, जो बृहस्पति या मोलेक के समान ही वास्तविक है—मिस्र के किसी मन्दिर के साँप या मगरमच्छ के समान ही सच्ची मूर्ति है—पीतल या मिट्टी से ढाली गई किसी भी मूर्ति के समान सच्ची मूर्ति है। तुम्हारी अपनी धारणाओं और भावनाओं के हाथों ने उसे बनाया है। वह बाइबल का परमेश्वर नहीं है; और बाइबल के परमेश्वर को छोड़ कोई परमेश्वर है ही नहीं। तुम्हारा स्वर्ग कोई स्वर्ग ही न होगा। सब प्रकार के बिना भेद किए चरित्रों से भरा स्वर्ग निश्चय ही दुखद कलह का स्थान होगा। ओह, ऐसा स्वर्ग कैसा दुखद अनन्तकाल होगा—उसमें और नरक में बहुत कम अन्तर होगा! नरक है! भूसे के लिए आग है! सावधान रहो कि कहीं तुम उसे बहुत देर से न जानो—अपनी ही हानि के साथ।

जो कुछ परमेश्वर के वचन में लिखा है, उससे अपने आप को अधिक बुद्धिमान समझने से सावधान रहो। अपने ही मनगढ़न्त सिद्धान्त बनाकर फिर बाइबल को उनके अनुसार ढालने का प्रयत्न करने से सावधान रहो। अपनी रुचि के अनुसार अपनी बाइबल में से चुन-चुनकर लेने से सावधान रहो—बिगड़े हुए बच्चे की तरह जिसे तुम कड़वा समझो उसे अस्वीकार करते हुए, और बिगड़े हुए बच्चे की तरह जिसे तुम मीठा समझो उसे हथियाते हुए। यह सब यहोयाकीम के उस चाकू को लेकर पवित्रशास्त्र के अंश काट डालने और उन्हें आग में फेंक देने के समान नहीं तो और क्या है? (यिर्मयाह 36:23) यह परमेश्वर से यह कहने के सिवा और क्या है कि तू, एक तुच्छ अल्पायु कीड़ा, अपना भला उससे अधिक जानता है। यह नहीं चलेगा; यह नहीं चलेगा। तुम्हें बाइबल को जैसी वह है वैसी ही मानना होगा। तुम्हें उसे सारी पढ़ना और सारी पर विश्वास करना होगा। तुम्हें उसे छोटे बच्चे के मन से पढ़ना होगा। यह कहने का साहस न करो, "मैं इस पद को मानता हूँ, क्योंकि यह मुझे अच्छा लगता है। उसको मैं नहीं मानता, क्योंकि वह मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं इस पद को स्वीकार करता हूँ, क्योंकि मैं इसे समझ सकता हूँ। उसको मैं अस्वीकार करता हूँ, क्योंकि मैं उसे अपने विचारों के साथ मिला नहीं सकता।" ऐसा कभी न हो! "हे मनुष्य, भला तू कौन है, जो परमेश्वर का सामना करता है?" (रोमियों 9:20) तू किस अधिकार से इस प्रकार बोलता है? निश्चय ही यह कहना कहीं उत्तम होगा कि वचन के हर अध्याय के ऊपर लिखा हो, "हे यहोवा, बोल, क्योंकि तेरा दास सुनता है।" यदि मनुष्य ऐसा करें, तो वे नरक, भूसे और आग का कभी इनकार न करेंगे।

और अब, अन्त में मैं चार बातें कहूँगा, और फिर समाप्त करूँगा। मैंने मनुष्यजाति के दो बड़े वर्ग दिखाए हैं, गेहूँ और भूसा। मैंने उस पृथक्करण को दिखाया है जो एक दिन होगा। मैंने प्रभु के लोगों की सुरक्षा दिखाई है। मैंने अविश्वासियों—मसीह से रहित लोगों—की भयानक दशा दिखाई है। परमेश्वर की दृष्टि में मैं इन बातों को इस पत्र के हर पाठक के विवेक के सामने रखता हूँ।

(1) सबसे पहले, अपने मन में यह ठान लो कि जिन बातों की चर्चा मैं करता आया हूँ, वे वास्तविक और सत्य हैं।

मैं मानता हूँ कि बहुत से लोग धर्म के बड़े सत्यों को कभी इस दृष्टि से नहीं देखते। मुझे दृढ़ विश्वास है कि बहुत से लोग सेवकों से सुनी हुई बातों को कभी वास्तविकता के रूप में नहीं सुनते। वे इस सब को केवल "नाम और शब्द" मात्र समझते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं; एक विशाल छाया—एक औपचारिक अभिनय—एक बड़ा ढोंग। नवीनतम उपन्यास, फ्रांस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, तुर्की या न्यूयॉर्क से आया हुआ सबसे ताज़ा समाचार—ये सब बातें वे समझते हैं: इनमें उन्हें रुचि और उत्तेजना होती है। परन्तु बाइबल, स्वर्ग, मसीह के राज्य और न्याय के दिन के विषय में—ये ऐसे विषय हैं जो उनके हृदय को नहीं छूते: वे वास्तव में इन पर विश्वास नहीं करते। यदि किसी पुरातत्त्ववेत्ता ने नीनवे की खुदाई में कोई ऐसी वस्तु निकाल दी होती जो पुराने नियम के पवित्रशास्त्र की सच्चाई और अधिकार को हानि पहुँचाती, तो भी उससे उनकी शान्ति में एक क्षण के लिए भी बाधा न पड़ती।

यदि आपके मन की दशा यही है, तो मैं आपसे विनती करता हूँ कि इसे सदा के लिए त्याग दीजिए। इस बात का पूरा कायल होकर जाग उठिए कि जो बातें मैंने इस लेख में आपके सामने रखी हैं वे वास्तविक और सत्य हैं। गेहूँ, भूसा, अलग किया जाना, खत्ता, आग—ये सब बड़ी वास्तविकताएँ हैं—उतनी ही वास्तविक जितना आकाश में सूर्य, उतनी ही वास्तविक जितना यह कागज़ जिसे आपकी आँखें देख रही हैं। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं स्वर्ग को मानता हूँ, और मैं नरक को मानता हूँ। मैं आनेवाले न्याय को मानता हूँ। मैं छाने जाने के दिन को मानता हूँ। यह कहने में मुझे लज्जा नहीं। मैं इन सब को मानता हूँ, और इसीलिए ऐसा लिखता हूँ। ओह, एक मित्र की सलाह मानिए—ऐसे जीवन बिताइए मानो ये बातें सच हैं।

(2) दूसरी बात, अपने मन में यह ठान लीजिए कि मैं जिन बातों के विषय में लिख रहा हूँ वे आपसे व्यक्तिगत रूप से सम्बन्ध रखती हैं। वे आपका ही काम हैं, आपका ही मामला हैं, और आपकी ही चिन्ता का विषय हैं।

मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग धर्म को ऐसी बात नहीं समझते जिसका उनसे कोई सरोकार हो। वे उसके बाहरी रूप का शिष्ट और उचित ढंग से निर्वाह करने में तो सावधान रहते हैं। वे उपदेश सुनते हैं। वे धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं। वे अपने बच्चों का नामकरण संस्कार कराते हैं। परन्तु इस सारे समय वे अपने आप से कभी नहीं पूछते, "इस सब का मेरे लिए वास्तव में क्या अर्थ है?" वे हमारे गिरजाघरों में ऐसे बैठते हैं जैसे रंगशाला या न्यायालय में दर्शक। वे हमारे लेख ऐसे पढ़ते हैं जैसे किसी रोचक मुक़दमे का ब्योरा, या किसी दूर की घटना का समाचार पढ़ रहे हों। परन्तु वे कभी अपने से नहीं कहते, "वह मनुष्य मैं ही हूँ।"

यदि आपके मन में ऐसी भावना है, तो निश्चय जानिए कि इससे कभी काम नहीं चलेगा। यदि आपको कभी उद्धार पाना है, तो इस प्रकार की सारी सोच का अन्त होना ही चाहिए। मैं उस व्यक्ति को लिख रहा हूँ जो यह लेख पढ़ रहा है—वह व्यक्ति आप ही हैं। मैं विशेष रूप से धनवानों को नहीं लिख रहा। मैं विशेष रूप से कंगालों को भी नहीं लिख रहा। मैं हर उस व्यक्ति को लिख रहा हूँ जो पढ़ेगा, चाहे उसका पद कुछ भी हो। मैं आपकी ही आत्मा के लिए विनती कर रहा हूँ, किसी और की नहीं। आप ही वह व्यक्ति हैं जिसकी चर्चा इस लेख के आरम्भ के पद में है। आप आज ही या तो "गेहूँ" में हैं या "भूसे" में। आपका भाग्य किसी दिन या तो खत्ता होगा या आग। ओह, काश मनुष्य बुद्धिमान होते और इन बातों को मन में रखते! काश वे खिलवाड़ न करते, टाल-मटोल न करते, देर न लगाते, या झूठे मसीही बने न जीते रहते—मन में तो भला चाहते, पर कभी साहस और निर्णय के साथ कदम न उठाते, और अन्त में यह जानते कि अब बहुत देर हो चुकी है!

(3) तीसरी बात, अपने मन में यह ठान लीजिए कि यदि आप पृथ्वी के गेहूँ में से एक होने को तैयार हैं, तो प्रभु यीशु मसीह आपको ग्रहण करने को तैयार हैं।

क्या कोई यह समझता है कि यीशु अपने खत्ते को भरा हुआ देखने को तैयार नहीं? क्या आप सोचते हैं कि वह बहुतों को महिमा में नहीं पहुँचाना चाहता? ओह, यदि आप ऐसा विचार कर सकते हैं तो आप उसकी दया और करुणा की गहराई के विषय में बहुत कम जानते हैं! वह अविश्वासी यरूशलेम पर रोया। वह आज भी उन पर विलाप करता है जो मन नहीं फिराते और उदासीन रहते हैं। वह इसी घड़ी मेरे मुँह से आपके पास निमन्त्रण भेज रहा है। वह आपको बुलाता है कि सुनिए और जीवित रहिए, मूर्खों का मार्ग छोड़िए और समझ के मार्ग पर चलिए। सर्वशक्तिमान प्रभु घोषणा करता है, "मैं किसी के मरने से प्रसन्न नहीं होता। इसलिए मन फिराओ और जीवित रहो!" (यहेजकेल 18:32)

ओह, यदि आप जीवन के लिए पहले कभी मसीह के पास नहीं आए, तो आज ही उसके पास आइए! पश्चाताप करनेवाले पापी की दया और अनुग्रह की प्रार्थना लेकर उसके पास आइए। बिना देर किए उसके पास आइए। उसके पास तब आइए जब इस लेख का विषय अभी आपके मन में ताज़ा है। पृथ्वी पर दूसरा सूर्य उगने से पहले उसके पास आइए, और भोर आपको नई सृष्टि के रूप में पाए।

यदि आप संसार और संसार की वस्तुओं को—उसके सुखों और उसके प्रतिफलों को—उसकी मूर्खताओं और उसके पापों को—पाने पर अड़े हैं; यदि आपको अपनी ही मनमानी करनी है, और मसीह तथा अपनी आत्मा के लिए कुछ भी छोड़ नहीं सकते; यदि आपकी यही दशा है, तो आपके लिए केवल एक ही अन्त है। मैं आपको सच्चाई से चेतावनी देता हूँ—मैं आपसे साफ़-साफ़ कहता हूँ: आप देर-सबेर अनन्त आग में डाले जाएँगे।

परन्तु यदि कोई उद्धार पाने को तैयार है, तो प्रभु यीशु मसीह उसे बचाने को तैयार खड़ा है। वह कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" ओह, दोषी और पापी आत्मा, आ; मैं तुझे मुफ़्त क्षमा दूँगा। आ, खोई हुई और नष्ट हुई आत्मा, मैं तुझे अनन्त जीवन दूँगा। (मत्ती 11:28)

वह पद आपकी आत्मा के लिए समय पर कहा गया वचन हो। जाग उठिए और प्रभु को पुकारिए। परमेश्वर के स्वर्गदूत एक और बचाई गई आत्मा पर आनन्दित हों। स्वर्ग के दरबार यह शुभ समाचार सुनें कि एक और खोई हुई भेड़ मिल गई।

(4) अन्त में, अपने मन में यह ठान लीजिए कि यदि आपने अपनी आत्मा मसीह को सौंप दी है, तो मसीह आपकी आत्मा को कभी नाश न होने देगा।

सनातन बाहें आपके चारों ओर हैं। उनमें सहारा लेकर अपनी सुरक्षा को जानिए। वही हाथ जो क्रूस पर कीलों से ठोंका गया था, आपको थामे हुए है। वही बुद्धि जिसने आकाश और पृथ्वी को रचा, आपके पक्ष का समर्थन करने को लगी है। वही सामर्थ्य जिसने बारह गोत्रों को दासत्व के घर से छुड़ाया, आपकी ओर है। वही प्रेम जिसने इस्राएल को मिस्र से कनान तक सँभाला और उठाए रखा, आपकी रक्षा करने को वचनबद्ध है। हाँ! जिन्हें मसीह सँभालता है वे भली-भाँति सँभाले जाते हैं! हमारा विश्वास मसीह की सर्वशक्तिमत्ता जैसे आधार पर शान्ति से टिक सकता है। हे सन्देह करनेवाले विश्वासी, ढाढ़स बाँध। तू क्यों उदास है? यीशु का प्रेम उथला जल नहीं है: किसी मनुष्य ने आज तक उसकी थाह नहीं देखी। यीशु की करुणा ऐसी आग है जो कभी मन्द नहीं पड़ी: उस आग की ठंडी, धूसर राख कभी किसी ने नहीं देखी। ढाढ़स बाँध। अपने ही हृदय में तुझे आनन्दित होने का कारण कम मिल सकता है, परन्तु तू प्रभु में सदा आनन्दित रह सकता है।

आप कहते हैं कि आपका विश्वास छोटा है। परन्तु कहाँ लिखा है कि केवल वही उद्धार पाएँगे जिनका विश्वास बड़ा है? और आख़िरकार, "यह विश्वास आपको किसने दिया?" यही बात कि आपमें थोड़ा-सा भी विश्वास है, परमेश्वर के अनुग्रह का चिह्न है।

आप कहते हैं कि आपके पाप बहुत हैं। परन्तु वह पाप या पापों का ढेर कहाँ है जिसे यीशु का लहू धो नहीं सकता? आख़िरकार, "आपको किसने बताया कि आपमें कोई पाप है?" वह भावना आप से तो कभी नहीं आई।

वह व्यक्ति अत्यन्त धन्य है जो सचमुच जानता और अनुभव करता है कि वह पापी है।

मैं फिर कहता हूँ, यदि तुम सचमुच मसीह के पास आ चुके हो, तो ढाढ़स बाँधो। ढाढ़स बाँधो और अपने विशेषाधिकारों को पहचानो। अपनी हर चिन्ता यीशु पर डाल दो। अपनी हर आवश्यकता यीशु को बताओ। हर बोझ यीशु पर लाद दो: पाप, अविश्वास, सन्देह, भय, चिन्ताएँ — सब मसीह पर रख दो। वह तुम्हें ऐसा करते देखना चाहता है। उसे अपने महायाजक के रूप में काम में लाया जाना भाता है। उसे यह भाता है कि उस पर भरोसा किया जाए। उसे यह देखना भाता है कि उसके लोग अपने बोझ स्वयं उठाने के व्यर्थ प्रयास को छोड़ दें।

मैं ये बातें हर उस व्यक्ति के ध्यान में लाता हूँ जिसके हाथ में यह पत्र पहुँचे। अभी मसीह के "गेहूँ" में गिने जाओ, तब बड़े अलग किए जाने के दिन, जैसा कि बाइबल सच्ची है, तुम सदा के लिए मसीह के "खत्ते" में होगे।

अनन्तकाल!

"देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं।" (2 कुरिन्थियों 4:18)

इस पद के ऊपर ही एक विषय उभरकर सामने आता है, जो बाइबल के सबसे गम्भीर और हृदय को परखनेवाले विषयों में से एक है। वह विषय अनन्तकाल है।

यह ऐसा विषय है जिसे सबसे बुद्धिमान मनुष्य भी एक समय में थोड़ा-सा ही समझ सकता है। हमारे पास इसे पूरी तरह देखने की आँखें नहीं हैं, और न इसे ग्रहण करने का मन; फिर भी हमें इस पर विचार करने से इनकार नहीं करना चाहिए। हमारे ऊपर आकाश में तारों की ऐसी गहराई है जिसे सबसे शक्तिशाली दूरबीन भी भेद नहीं सकती; फिर भी उन्हें देखना और कुछ सीखना उचित है, चाहे हम सब कुछ न सीख सकें। अनन्तकाल के विषय में ऐसी ऊँचाइयाँ और गहराइयाँ हैं जिन्हें नश्वर मनुष्य कभी नहीं समझ सकता; परन्तु परमेश्वर ने इसके विषय में कहा है, और हमें इससे पूरी तरह मुँह मोड़ने का कोई अधिकार नहीं है।

यह ऐसा विषय है जिसके निकट हमें बाइबल हाथ में लिए बिना कभी नहीं जाना चाहिए। जिस क्षण हम अनन्तकाल और मनुष्य की भावी दशा पर विचार करते हुए "परमेश्वर के लिखित वचन" से हट जाते हैं, उसी क्षण हमारे भ्रम में पड़ने की सम्भावना होती है। इन बातों की जाँच में हमें इस विषय में पहले से बनी धारणाओं से कोई सरोकार नहीं रखना है कि परमेश्वर का स्वभाव कैसा है, और हमारी समझ में परमेश्वर को कैसा होना चाहिए, या मृत्यु के बाद मनुष्य के साथ क्या करना चाहिए। हमें केवल यह जानना है कि क्या लिखा है। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? प्रभु क्या कहता है? यह कहना मूर्खता है कि हमें पवित्रशास्त्र से स्वतन्त्र और उससे ऊपर "परमेश्वर के विषय में उच्च विचार" रखने चाहिए। परमेश्वर के विषय में जो उच्चतम विचार रखने का हमें अधिकार है, वे वही हैं जिन्हें उसने अपने "लिखित वचन" में हम पर प्रकट करना चाहा है।

मैं हर उस व्यक्ति का ध्यान चाहता हूँ जिसके हाथ में यह पत्र पहुँचे, जब मैं अनन्तकाल के विषय में कुछ विचार प्रस्तुत करता हूँ। एक नश्वर मनुष्य होने के कारण मैं इस विषय को सँभालने में अपनी अयोग्यता को गहराई से अनुभव करता हूँ। परन्तु मैं प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर पवित्र आत्मा, जिसकी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है, मेरे कहे हुए शब्दों को आशीष दे और उन्हें बहुतों के मन में अनन्त जीवन के बीज बना दे।

I. पहला विचार जो मैं आपके ध्यान में लाता हूँ यह है: हम ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ सब वस्तुएँ अस्थायी हैं और मिटती जा रही हैं।

निश्चय ही वह मनुष्य अन्धा होगा जो इसे न समझ सके। हमारे चारों ओर सब कुछ क्षीण हो रहा है, मर रहा है और अन्त की ओर बढ़ रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि एक अर्थ में "पदार्थ" अनन्त है। एक बार रचे जाने के बाद वह कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। परन्तु साधारण व्यावहारिक अर्थ में, हमारी आत्माओं को छोड़कर हमारे आसपास सब कुछ मर रहा है। तभी तो कवि कहता है:

"मैं अपने चारों ओर परिवर्तन और क्षय देखता हूँ: हे तू जो नहीं बदलता, मेरे साथ रह!"

हम सब जा रहे हैं, जा रहे हैं, जा रहे हैं, चाहे प्रतिष्ठित हों या साधारण, कोमल हों या क्रूर, धनी हों या निर्धन, बूढ़े हों या जवान। हम सब जा रहे हैं और शीघ्र ही चले जाएँगे।

सुन्दरता केवल थोड़े दिन की है। सारा कभी स्त्रियों में सबसे सुन्दर थी और मिस्र के दरबार की प्रशंसा का पात्र थी; फिर भी एक दिन ऐसा आया कि उसके पति अब्राहम ने भी कहा, "मुझे यहाँ कब्रिस्तान के लिए भूमि बेच दो कि मैं अपने मृतक को गाड़ूँ।" (उत्पत्ति 23:4) शरीर का बल केवल थोड़े दिन का है। दाऊद कभी महान पराक्रमी था, सिंह और रीछ का मारनेवाला, और गोलियात के विरुद्ध इस्राएल का वीर; फिर भी एक दिन ऐसा आया कि दाऊद की भी बुढ़ापे में बच्चे की तरह सेवा-टहल करनी पड़ी। बुद्धि और मस्तिष्क की शक्ति केवल थोड़े दिन की है। सुलैमान कभी ज्ञान का आश्चर्य था, और पृथ्वी के सब राजा उसकी बुद्धि सुनने आते थे, फिर भी सुलैमान ने अपने अन्तिम दिनों में मूर्खता की, और अपनी स्त्रियों को "अपने मन को उनके देवताओं की ओर फेरने" दिया। (1 राजाओं 11:2)

ये सत्य चाहे कितने ही दीन करनेवाले और पीड़ादायक लगें, हम सबके लिए अच्छा है कि इन्हें समझें और मन में बैठा लें। जिन घरों में हम रहते हैं, जिन परिवारों से हमें प्रेम है, जो धन हम जमा करते हैं, जिन पेशों को हम अपनाते हैं, जो योजनाएँ हम बनाते हैं, जो सम्बन्ध हम जोड़ते हैं — ये सब केवल कुछ समय के लिए हैं। "देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं।" "इस संसार का बाहरी रूप मिटता जा रहा है।" (2 कुरिन्थियों 4:18; 1 कुरिन्थियों 7:31)

यह विचार ऐसा है जो हर उस व्यक्ति को जगा दे जो केवल इस संसार के लिए जी रहा है। यदि उसका विवेक पूरी तरह सुन्न नहीं हो गया है, तो यह उसके हृदय में गहरी खोज जगाए। ओह, सावधान रहो कि तुम क्या कर रहे हो! बहुत देर होने से पहले जागो और बातों को उनके सच्चे रूप में देखो। जिन वस्तुओं के लिए तुम अब जी रहे हो वे सब अस्थायी हैं और मिटती जा रही हैं। वे सुख-विलास, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद, लाभ, और सांसारिक व्यवसाय, जो अब तुम्हारे सारे हृदय को समेटे हुए हैं और तुम्हारे सारे मन को सोख रहे हैं, शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे। वे तुच्छ, क्षणभंगुर वस्तुएँ हैं जो टिक नहीं सकतीं। ओह, उनसे अत्यधिक प्रेम न करो; उन्हें बहुत कसकर न पकड़ो; उन्हें अपनी मूरतें न बनाओ! तुम उन्हें रख नहीं सकते, और तुम्हें उन्हें छोड़ना ही पड़ेगा। पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करो, तब और सब कुछ तुम्हें दिया जाएगा। "पृथ्वी की नहीं, परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ।" ओह, तुम जो संसार से प्रेम रखते हो, बुद्धि प्राप्त करो! यह कभी, कभी न भूलो कि लिखा है, "संसार और उसकी अभिलाषाएँ मिटती जाती हैं, परन्तु जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है वह सर्वदा बना रहेगा।" (कुलुस्सियों 3:2; 1 यूहन्ना 2:17)

यही विचार हर सच्चे मसीही को आनन्द और शान्ति देनेवाला होना चाहिए। तुम्हारे क्लेश, क्रूस और संघर्ष सब अस्थायी हैं। वे शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे; और अभी भी वे तुम्हारे लिए "एक ऐसी अनन्त महिमा उत्पन्न कर रहे हैं जो उन सब से कहीं अधिक भारी है।" (2 कुरिन्थियों 4:17) उन्हें धीरज से स्वीकार करो; उन्हें चुपचाप सहो; ऊपर, आगे और उनसे बहुत परे देखो। अपनी प्रतिदिन की लड़ाई इस दृढ़ विश्वास के साथ लड़ो कि यह केवल थोड़े समय के लिए है, और विश्राम दूर नहीं है। अपना प्रतिदिन का क्रूस उठाते हुए सदा यह स्मरण रखो कि "जो वस्तुएँ दिखाई देती हैं वे क्षणिक हैं।" यह क्रूस शीघ्र ही मुकुट से बदल दिया जाएगा, और तुम परमेश्वर के राज्य में अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ बैठोगे।

II. दूसरा विचार जिस पर मैं तुम्हारा ध्यान दिलाता हूँ, यह है: हम सब एक ऐसे संसार की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ सब कुछ अनन्त है।

अस्तित्व की वह महान अदृश्य अवस्था, जो क़ब्र के पार है, सदा के लिए है। चाहे वह सुखी हो या दुःखी, चाहे वह आनन्द की दशा हो या शोक की, हम जानते हैं कि एक बात में वह इस संसार के किसी भी अनुभव से बिलकुल भिन्न होगी—वह सदा के लिए होगी। वहाँ न कोई परिवर्तन और क्षय होगा, न अन्त, न विदाई, न सुबह और शाम, न कोई बदलाव, और न कोई विनाश। क़ब्र के पार जो कुछ भी है, जब अन्तिम तुरही फूँकी जाएगी और मरे हुए जिलाए जाएँगे, तब हम जानते हैं कि वह अन्तहीन, सनातन और अनन्त होगा। "जो अनदेखी वस्तुएँ हैं वे अनन्त हैं।"

हम इस दशा को पूरी तरह समझ नहीं सकते। अभी और तब के बीच, इस संसार और आनेवाले संसार के बीच का अन्तर इतना बड़ा है कि हमारे दुर्बल मन उसे पूरी तरह ग्रहण नहीं कर सकते। इस संसार में हम जैसा जीवन जीते हैं उसके परिणाम आनेवाले संसार में इतने भयंकर होते हैं कि वे हमारी साँस रोक देते हैं, और हम उन्हें देखने से पीछे हट जाते हैं। परन्तु जब बाइबल स्पष्ट बोलती है तो हमें किसी विषय से मुँह मोड़ने का अधिकार नहीं है, और हाथ में बाइबल लेकर हमारे लिए यही अच्छा होगा कि हम "उन अनदेखी वस्तुओं को देखें जो अनन्त हैं।"

तो आओ, पहले यह बात अपने मन में बैठा लें कि जो लोग उद्धार पाते हैं उनका भावी सुख अनन्त है। हम उसे चाहे जितना कम समझें, वह ऐसी वस्तु है जिसका कभी अन्त न होगा: वह कभी समाप्त न होगी, कभी पुरानी न होगी, कभी नष्ट न होगी, और कभी न मरेगी। "तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सदा के लिए सुख हैं।" (भजन संहिता 16:11) जब परमेश्वर के सन्त एक बार स्वर्ग में पहुँच जाएँगे, तो वे उस अद्भुत स्थान को फिर कभी न छोड़ेंगे। उनकी विरासत "जो न बिगड़ सकती है, न मलिन हो सकती है, न मुर्झा सकती है।" वे "महिमा का वह मुकुट पाएँगे जो कभी मुर्झाने का नहीं।" (1 पतरस 1:4; 5:4) उनका युद्ध समाप्त हो चुका; उनकी लड़ाई पूरी हुई; उनका काम पूरा हुआ। "वे फिर कभी भूखे न होंगे, और फिर कभी प्यासे न होंगे।" वे उस "अनन्त महिमा" की ओर यात्रा कर रहे हैं जो उनके सब संघर्षों से कहीं अधिक भारी है; उस घर की ओर जो कभी न टूटेगा, ऐसे मिलन की ओर जिसमें बिछुड़ना नहीं, ऐसे पारिवारिक मिलन की ओर जिसमें अलगाव नहीं, ऐसे दिन की ओर जिसमें रात नहीं। विश्वास दर्शन में समा जाएगा, और आशा निश्चितता में। वे वैसे ही देखेंगे जैसे वे देखे गए हैं, और वैसे ही जानेंगे जैसे वे जाने गए हैं, और "सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" मुझे आश्चर्य नहीं कि प्रेरित पौलुस आगे कहता है, "इसलिए इन बातों से एक दूसरे को शान्ति दिया करो।" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17, 18)

दूसरी बात, आओ हम यह भी अपने मन में बैठा लें कि जो अविश्वासी खो जाते हैं उनका भावी दुःख अनन्त है। मैं जानता हूँ कि यह एक भयानक सत्य है, और मानव स्वभाव स्वाभाविक रूप से इस पर विचार करने से सिकुड़ता है। परन्तु मैं उन लोगों में से हूँ जो मानते हैं कि यह पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से प्रकट किया गया है, और मैं इसे मंच से छिपाने का साहस नहीं कर सकता। मेरी दृष्टि में अनन्त भावी सुख और अनन्त भावी दुःख साथ-साथ खड़े दिखाई देते हैं। मैं नहीं समझ पाता कि तुम एक की अवधि को दूसरे की अवधि से कैसे अलग कर सकते हो। यदि विश्वासी का आनन्द सदा के लिए है, तो अविश्वासी का शोक भी सदा के लिए है। यदि स्वर्ग अनन्त है, तो नरक भी वैसा ही अनन्त है। यह मेरी अज्ञानता हो सकती है, परन्तु मैं नहीं जानता कि इस निष्कर्ष से कैसे बचा जा सकता है।

मैं "अनन्त न होनेवाले" दण्ड की धारणा को बाइबल की भाषा के साथ मेल नहीं करा सकता। इसके समर्थक प्रेम और कोमलता की बड़ी बातें करते हैं, और कहते हैं कि यह परमेश्वर के दयालु और करुणामय स्वभाव से मेल नहीं खाता। परन्तु पवित्रशास्त्र क्या कहता है? हमारे प्रभु यीशु मसीह से बढ़कर प्रेम और दया के वचन किसने कहे? फिर भी उन्हीं के होंठ हैं जो पाप से मन फिराने से इनकार करने के परिणाम का तीन बार वर्णन करते हैं: "जहाँ उनका कीड़ा नहीं मरता और आग नहीं बुझती।" वही हैं जो एक ही वाक्य में दुष्टों के "अनन्त दण्ड" में जाने और धर्मियों के "अनन्त जीवन" में जाने की बात कहते हैं। (मरकुस 9:43-48; मत्ती 25:46) प्रेम के विषय में प्रेरित पौलुस के शब्द किसे याद नहीं? फिर भी वही प्रेरित कहता है कि दुष्ट लोग "अनन्त विनाश का दण्ड पाएँगे।" (2 थिस्सलुनीकियों 1:9) यूहन्ना के सुसमाचार और पत्रियों में जो प्रेम की भावना बहती है, उसे कौन नहीं जानता? फिर भी वही प्रिय प्रेरित नए नियम का वह लेखक है जो प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में भावी पीड़ा की वास्तविकता और अनन्तता पर सबसे अधिक बल देता है। इन सब बातों के विषय में हम क्या कहेंगे? क्या हम लिखे हुए से अधिक बुद्धिमान बनेंगे? क्या हम इस खतरनाक सिद्धान्त को स्वीकार करेंगे कि पवित्रशास्त्र के शब्दों का वह अर्थ नहीं जो वे प्रतीत होते हैं? क्या यह कहीं अच्छा नहीं कि हम अपने मुँह पर हाथ रखकर कहें, "परमेश्वर ने जो कुछ लिखा है वह अवश्य सच होगा।" "हाँ, हे सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर, तेरे निर्णय सच्चे और धर्ममय हैं।" (प्रकाशित वाक्य 16:7)

मैं "अनन्त नहीं" दण्ड की धारणा को अपनी कलीसिया की अपनी प्रार्थना-पुस्तक की भाषा से मेल नहीं करा सकता। हमारी अनुपम लिटनी की पहली ही विनती में यह वाक्य है, "हे भले प्रभु, हमें अनन्त नरकदण्ड से छुड़ा।" प्रश्नोत्तरी हर उस बालक को, जो उसे सीखता है, सिखाती है कि जब-जब हम प्रभु की प्रार्थना दोहराते हैं, तब-तब हम चाहते हैं कि हमारा स्वर्गीय पिता "हमें हमारे आत्मिक शत्रु से और अनन्त मृत्यु से बचाए रखे।" यहाँ तक कि हमारी अन्त्येष्टि-विधि में भी कब्र के किनारे हम प्रार्थना करते हैं, "हमें अनन्त मृत्यु की कड़वी पीड़ाओं के हवाले न कर।" मैं फिर पूछता हूँ, "हम इन बातों के विषय में क्या कहें?" क्या हमारी मण्डलियों को यह सिखाया जाए कि जब लोग पाप में जीते और मरते हैं, तब भी हम मृत्यु के बाद उनके सुख की आशा रख सकते हैं? निश्चय ही हमारे बहुत-से आराधकों की सामान्य समझ यही उत्तर देगी कि यदि ऐसा है तो प्रार्थना-पुस्तक के शब्दों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता।

मैं पवित्रशास्त्र के किसी असाधारण ज्ञान का दावा नहीं करता। मैं प्रतिदिन अनुभव करता हूँ कि मैं रोम के बिशप से अधिक अचूक नहीं हूँ। परन्तु परमेश्वर ने मुझे जो ज्योति दी है, उसी के अनुसार मुझे बोलना चाहिए; और यदि मैं इस विषय पर चेतावनी का स्वर न उठाऊँ और मसीहियों को सावधान करने का यत्न न करूँ, तो मैं नहीं समझता कि मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँगा। छः हज़ार वर्ष पहले शैतान के साहसी झूठ के द्वारा संसार में पाप आया—"तुम निश्चय न मरोगे।" (उत्पत्ति 3:4) छः हज़ार वर्ष के अन्त में भी मनुष्यजाति का वह बड़ा शत्रु अपने उसी पुराने हथियार का प्रयोग कर रहा है, और मनुष्यों को समझाने का यत्न कर रहा है कि वे पाप में जी और मर सकते हैं, फिर भी भविष्य में किसी दूर के समय में अन्ततः उनका उद्धार हो जाएगा। हम उसकी युक्तियों से अनजान न रहें। आओ, हम पुराने मार्गों में दृढ़ता से चलें। आओ, हम पुराने सत्य को दृढ़ता से थामे रहें, और विश्वास करें कि जैसे उद्धार पाए हुओं का सुख अनन्त है, वैसे ही खोए हुओं का दुःख भी अनन्त है।

"शैतान इससे अधिक कुछ नहीं चाहता कि हम यह विश्वास करें कि वह है ही नहीं, और नरक जैसा कोई स्थान नहीं, और अनन्त पीड़ाएँ जैसी कोई बात नहीं। वह यह सब हमारे कानों में फुसफुसाता है, और जब वह किसी साधारण जन को, और उससे भी अधिक जब किसी पादरी को, इन बातों का इनकार करते सुनता है, तब वह आनन्दित होता है, क्योंकि तब उसे आशा होती है कि वह उन्हें और दूसरों को अपना शिकार बना लेगा।" - वर्ड्सवर्थ के उपदेश, भावी प्रतिफल और दण्ड पर, पृ. 36।

(क) आओ, मसीही धर्म में प्रकट किए गए सत्यों के कारण हम विश्वासयोग्य बने रहें।

यदि मनुष्य उस पर विश्वास किए बिना ही अन्ततः उद्धार पा सकते हैं, तो परमेश्वर के पुत्र का देहधारी होना, गतसमनी में तड़पना और प्रायश्चित करने के लिये क्रूस पर मरना किस काम का था? इसका ज़रा-सा भी प्रमाण कहाँ है कि मसीह के लहू पर उद्धार देनेवाला विश्वास मृत्यु के बाद भी कभी प्राप्त किया जा सकता है? यदि पापी मन-परिवर्तन और हृदय के नए होने के बिना स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हैं, तो पवित्र आत्मा की क्या आवश्यकता है? इसका छोटे-से-छोटा प्रमाण भी कहाँ मिलता है कि जो मनुष्य नया जन्म पाए बिना मरता है, वह बाद में फिर भी नया जन्म पा सकता है और नया हृदय पा सकता है? यदि कोई मनुष्य मसीह पर विश्वास या आत्मा के पवित्रीकरण के बिना अनन्त दण्ड से बच सकता है, तो पाप अब अनन्त बुराई नहीं रहा और मसीह के प्रायश्चित करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।

(ख) आओ, पवित्रता और नैतिकता के कारण हम विश्वासयोग्य बने रहें।

मैं हमारे शरीर और लहू के लिये इस भरमानेवाले सिद्धान्त से अधिक सुखद कुछ कल्पना नहीं कर सकता कि हम पाप में जी सकते हैं और फिर भी अनन्त दण्ड से बच सकते हैं; और यद्यपि जब तक हम यहाँ हैं तब तक हम "तरह-तरह की अभिलाषाओं और सुखविलास के दास" हैं, तो भी किसी-न-किसी रीति से हम सब अन्त में स्वर्ग पहुँच ही जाएँगे! उस जवान से, जिसने "लुचपन में अपनी सम्पत्ति उड़ा दी," बस इतना कह दो कि स्वर्ग उनके लिये भी उपलब्ध है जो पाप में जीते और मरते हैं, फिर उसके उससे फिरने की कोई सम्भावना नहीं रहेगी। जब वह मन फिराए बिना ही अन्त में स्वर्ग पहुँच सकता है, तो वह मन क्यों फिराए और क्रूस क्यों उठाए?

(ग) अन्त में, आओ, परमेश्वर के सब पवित्र लोगों की साझी आशाओं के कारण हम विश्वासयोग्य बने रहें।

आओ, हम स्पष्ट समझ लें कि अनन्त दण्ड पर किया गया हर प्रहार स्वर्ग के सुख की अनन्तता पर भी उतना ही भारी प्रहार है। इन दोनों बातों को अलग करना असम्भव है। कोई चतुर धर्मवैज्ञानिक परिभाषा इन्हें बाँट नहीं सकती। वे साथ खड़ी रहती हैं और साथ ही गिरती हैं। जब बाइबल दोनों में से किसी भी दशा के विषय में बोलती है, तो वही भाषा और वही अलंकार प्रयोग करती है। नरक की अवधि पर हर आक्रमण स्वर्ग की अवधि पर भी आक्रमण है। यह सच है कि यदि हम पापियों से नरक का भय हटा दें, तो हमने अपनी ही आशा भी छीन ली।

मैं अपने विषय के इस भाग से गहरी पीड़ा के साथ मुड़ता हूँ। मैं रॉबर्ट मैक्चेन से पूरी तरह सहमत हूँ कि "यह प्रेम से सँभालने के लिये कठिन विषय है।" परन्तु मैं इतने ही गहरे विश्वास के साथ इससे मुड़ता हूँ कि यदि हम बाइबल पर विश्वास करते हैं, तो उसमें जो कुछ है उसमें से कुछ भी हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हे प्रिय यीशु, हमें कठोर, रूखे और निर्दय धर्मविज्ञान से छुड़ा! यदि मनुष्यों का उद्धार नहीं होता, तो इसलिये कि वे "मसीह के पास आना नहीं चाहते।" (यूहन्ना 5:40) परन्तु हमें लिखे हुए से बढ़कर बुद्धिमान नहीं बनना चाहिए। तथाकथित उदारता का कोई रोगी प्रेम हमें इस बात से मुकरने के लिये प्रेरित न करे जो परमेश्वर ने अनन्तकाल के विषय में प्रकट किया है। मनुष्य कभी-कभी केवल परमेश्वर की दया, प्रेम और करुणा की ही बातें करते हैं, मानो उसके और कोई गुण ही न हों, और उसकी पवित्रता और शुद्धता, उसका न्याय और अपरिवर्तनशीलता, और पाप से उसकी घृणा को छोड़ देते हैं। आओ, हम इस भ्रम में पड़ने से सावधान रहें। इन अन्तिम दिनों में यह बढ़ती हुई बुराई है। पाप की पूर्ण नीचता और घिनौनेपन के विषय में, और अनन्त परमेश्वर की अवर्णनीय शुद्धता के विषय में निम्न और अपर्याप्त विचार मनुष्य की भावी दशा के विषय में भ्रम के उपजाऊ स्रोत हैं। आओ, हम उस सामर्थी सत्ता के विषय में सोचें जिसके अधीन हम हैं, जैसा उसने मूसा पर अपना स्वभाव प्रकट करते हुए कहा, "और यहोवा उसके सामने से होकर यह प्रचार करता हुआ चला, 'यहोवा, यहोवा, परमेश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त और अत्यन्त करुणामय और सत्य, हज़ारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा करनेवाला।'" परन्तु आओ, हम उस गम्भीर उपवाक्य को न भूलें जो वाक्य को समाप्त करता है: "परन्तु वह दोषी को किसी रीति से निर्दोष न ठहराएगा।" (निर्गमन 34:6, 7) पश्चात्ताप-रहित पाप अनन्त बुराई है, और कभी पाप न रहना बन्द नहीं हो सकता; और जिसके अधीन हम हैं वह अनन्त परमेश्वर है।

भजन संहिता 145 के शब्द अत्यन्त सुन्दर हैं: "यहोवा अनुग्रहकारी और दयालु है, वह विलम्ब से क्रोध करनेवाला और बड़ा करुणामय है। यहोवा सब के लिये भला है, और उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है। जो गिरते हैं उन सब को यहोवा संभालता है, और सब झुके हुओं को उठा खड़ा करता है। यहोवा अपनी सब गतिविधियों में धर्मी और अपने सब कामों में करुणामय है। यहोवा उन सब के निकट रहता है जो उसे पुकारते हैं, उन सब के जो उसे सच्चाई से पुकारते हैं। यहोवा अपने सब प्रेमियों की रक्षा करता है।" इस भाषा की दयालुता से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता! परन्तु यह कितनी विचारणीय बात है कि यह अंश आगे यह गम्भीर निष्कर्ष भी जोड़ता है, "परन्तु वह सब दुष्टों को सत्यानाश करेगा।" (भजन संहिता 145:8-20)

III. तीसरी बात जो मैं आपके ध्यान में लाता हूँ वह यह है: अनदेखे अनन्त लोक में हमारी भावी दशा पूरी रीति से इस पर निर्भर करती है कि हम वर्तमान में कैसे हैं।

पृथ्वी पर हम जो जीवन जीते हैं वह छोटा है और शीघ्र बीत जाता है। "हमारे वर्ष आह भरते हुए बीत जाते हैं।"—"तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो भाप के समान हो जो थोड़ी देर दिखाई देती है और फिर लोप हो जाती है।" (भजन संहिता 90:9; याकूब 4:14) इस संसार को छोड़ने पर हमारे सामने जो जीवन है वह एक अन्तहीन अनन्तकाल है, ऐसा समुद्र जिसकी कोई थाह नहीं, और ऐसा महासागर जिसका कोई किनारा नहीं। "प्रभु के यहाँ एक दिन हज़ार वर्ष के समान है, और हज़ार वर्ष एक दिन के समान।" (2 पतरस 3:8) उस लोक में समय नहीं रहेगा। परन्तु यहाँ हमारा जीवन चाहे कितना ही छोटा हो और अनन्तकाल में वह चाहे कितना ही अन्तहीन होगा, फिर भी जो जीवन हम अब जी रहे हैं उसका अनन्तकाल पर भारी प्रभाव पड़ेगा। मनुष्य की दृष्टि से कहें तो मृत्यु के बाद हमारा भाग्य इस पर निर्भर करता है कि जीवित रहते हुए हम कैसे हैं। लिखा है, परमेश्वर "हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा। जो लोग भले काम में स्थिर रहकर महिमा, आदर और अमरता की खोज में रहते हैं, उन्हें वह अनन्त जीवन देगा। परन्तु जो स्वार्थी हैं और सत्य को नहीं मानते बरन् अधर्म को मानते हैं, उन पर क्रोध और कोप पड़ेगा।" (रोमियों 2:6-8)

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम में से प्रत्येक जब तक जीवित है, परीक्षा की दशा में है। हम निरन्तर ऐसे बीज बो रहे हैं जो उगेंगे और फल लाएँगे, अपने जीवन के हर दिन और हर घड़ी। हमारे सब विचारों, शब्दों और कामों के अनन्त परिणाम होते हैं, जिन पर हम बहुत कम ध्यान देते हैं। "मनुष्य जो-जो निकम्मी बातें कहेंगे, न्याय के दिन उन सब का लेखा देंगे।" (मत्ती 12:36) हमारे सब विचार गिने हुए हैं; हमारे कामों को तौला जाता है। इसमें आश्चर्य नहीं कि पौलुस कहता है, "जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।" (गलातियों 6:8) एक शब्द में, जो हम जीवन में बोते हैं उसे हम मृत्यु के बाद काटेंगे, और सारे अनन्तकाल तक काटते रहेंगे।

इससे बड़ा कोई धोखा नहीं है कि यह सामान्य धारणा बना ली जाए कि दुष्टता का जीवन जीकर भी महिमा के साथ जी उठना सम्भव है—इस संसार में मसीह के बिना रहकर भी आनेवाले संसार में सन्त बन जाना। जब पिछली शताब्दी में उस महान प्रचारक जॉर्ज व्हाइटफ़ील्ड ने मन-परिवर्तन के सिद्धान्त को फिर से जगाया, तो कहा जाता है कि उसका एक श्रोता एक उपदेश के बाद उसके पास आया और बोला, "महाशय, यह सब बिलकुल सच है। मुझे आशा है कि मैं किसी दिन मन फिराकर नया जन्म पाऊँगा, परन्तु मरने के बाद ही।" मुझे डर है कि उसके जैसे बहुत से लोग हैं। मुझे डर है कि रोमन कैथोलिक शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) की झूठी शिक्षा के आज सच्ची कलीसिया की सीमाओं के भीतर भी बहुत से गुप्त मित्र हैं! मनुष्य जीवित रहते चाहे कितने ही लापरवाह बने रहें, वे भीतर ही भीतर इस आशा से चिपके रहते हैं कि मरने पर वे सन्तों के बीच पाए जाएँगे। ऐसा लगता है कि वे यह विचार अपनाए हुए हैं कि मृत्यु में कोई शुद्ध करने और पवित्र करनेवाला प्रभाव है, और कि इस जीवन में वे जैसे भी हों, आनेवाले जीवन में वे "सन्तों के भाग के योग्य" ठहरेंगे। परन्तु यह सब एक धोखा है।

"पवित्रशास्त्र भावी दुःख की दशा को कभी शुद्धिकरण और पवित्रीकरण की दशा के रूप में, या परीक्षा की दशा जैसी किसी चीज़ के रूप में प्रस्तुत नहीं करता, जहाँ मनुष्य अपने आप को ढालकर किसी बेहतर अस्तित्व के योग्य बना सकें; बल्कि सदा उसे प्रतिफल, दण्ड और धर्मी बदले की दशा के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें परमेश्वर का न्याय (एक ऐसा गुण जिसका कुछ मनुष्य कोई हिसाब नहीं रखते) अपनी महिमा, अपने शासन और अपने प्रेम की सामर्थ्य को उन लोगों को दण्ड देकर प्रमाणित करता है जिन्होंने उनका तिरस्कार किया।"— हॉर्बरी, खण्ड II, पृ. 183।

"जीवन प्रभु की सेवा करने का समय है, महान प्रतिफल को पक्का करने का समय है।"

बाइबल स्पष्ट सिखाती है कि मरते समय हम जैसे होते हैं, चाहे मन फिराए हुए या मन न फिराए हुए, विश्वासी या अविश्वासी, भक्त या अभक्त, अन्तिम तुरही की ध्वनि पर जी उठने के समय भी हम वैसे ही होंगे। कब्र में कोई मन फिराव नहीं है: अन्तिम साँस लेने के बाद कोई मन-परिवर्तन नहीं है। अब मसीह पर विश्वास करने और अनन्त जीवन को थाम लेने का समय है। अब अन्धकार से ज्योति की ओर फिरने और अपने बुलाए जाने तथा चुने जाने को निश्चित करने का समय है। वह रात आती है जिसमें कोई काम नहीं कर सकता। जैसे पेड़ गिरता है, वैसे ही वह पड़ा रहेगा। यदि हम मन फिराने और विश्वास करने से इनकार करते हुए इस संसार से चले जाएँ, तो पुनरुत्थान की भोर में हम उसी दशा में जी उठेंगे, और पाएँगे कि हमारे लिये "भला होता कि हमारा जन्म ही न होता।"

"यह जीवन हमारी भावी दशा के लिये तैयारी का समय है। हमारी आत्माएँ अनन्तकाल तक वैसी ही रहेंगी जैसी हम उन्हें इस संसार में बनाते हैं। मनुष्य इस जीवन से जैसी रुचि और मनोवृत्ति अपने साथ ले जाता है, वैसी ही वह आनेवाले जीवन में रखेगा। यह बिलकुल सच है कि स्वर्ग उन पवित्र और सद्गुणी प्रवृत्तियों को सिद्ध करता है जो यहाँ आरम्भ हुई हैं; परन्तु दूसरा संसार किसी मनुष्य की मुख्य दशा को नहीं बदलता। जो मलिन है वह मलिन ही रहेगा; और जो अधर्मी है वह अधर्मी ही रहेगा।" – फिलिप्पियों 3:20 पर टिलॉटसन का उपदेश। (देखें हॉर्बरी, खण्ड II, पृ. 133)

मैं इस लेख के पाठकों को दृढ़ता से सलाह देता हूँ कि वे इसे स्मरण रखें और अपने समय का सदुपयोग करें। इसे उस सामग्री के रूप में देखें जिससे जीवन बना है, और इसे कभी व्यर्थ न गँवाएँ और न फेंक दें। आपके घंटे, दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष, सब के सब कब्र से परे आपकी अनन्त दशा के विषय में कुछ कहते हैं। इस पृथ्वी के जीवन में आप जो बोते हैं, आने वाले जीवन में उसी को काटेंगे, यह निश्चित है। जैसा कि उस पवित्र प्रचारक रिचर्ड बैक्सटर ने कहा है, "अभी या कभी नहीं।" धर्म के विषय में हमें जो कुछ भी करना है, वह अभी करना है।

अनुग्रह के सब साधनों का उपयोग करते समय, छोटे से छोटे से लेकर बड़े से बड़े तक, इसे स्मरण रखें। उनके विषय में कभी लापरवाह न हों। वे आपको अनन्त संसार की ओर बढ़ने में सहायता देने के लिए दिए गए हैं, और उनमें से किसी को भी बिना सोचे-समझे, या हल्के और अनादर के भाव से बरतना उचित नहीं। आपकी दैनिक प्रार्थना और बाइबल पढ़ना, प्रभु के दिन आपका साप्ताहिक व्यवहार, सार्वजनिक आराधना में आपके सम्मिलित होने का ढंग, इनमें से हर एक बात महत्वपूर्ण है। इन सबको उस व्यक्ति की तरह बरतें जो अनन्तकाल को स्मरण रखता है।

जब कभी आपको बुराई करने का प्रलोभन हो, तब इसे सबसे आगे रखें। जब पापी आपको फुसलाएँ और कहें, "यह तो केवल एक छोटा सा पाप है।" जब शैतान आपके हृदय में कानाफूसी करे, "कोई बात नहीं; इसमें इतनी बड़ी हानि क्या है? सब लोग ऐसा करते हैं," तब समय से परे उस अनदेखे संसार की ओर देखें, और प्रलोभन के सामने अनन्तकाल का विचार रखें। शहीद धर्म-सुधारक बिशप हूपर का एक महान कथन है। जब किसी ने उन्हें जलाए जाने से पहले अपना विश्वास त्याग देने के लिए समझाया और कहा, "जीवन मीठा है और मृत्यु कड़वी," तब उस भले बिशप ने कहा, "सच है, बिलकुल सच! परन्तु अनन्त जीवन उससे भी अधिक मीठा है, और अनन्त मृत्यु उससे भी अधिक कड़वी।"

IV. अन्तिम विचार जो मैं अपने पाठकों के सामने रखता हूँ, वह यह है: प्रभु यीशु मसीह वह महान मित्र हैं जिनकी ओर हम सबको सहायता के लिए देखना चाहिए, इस जीवन के लिए भी और अनन्तकाल के लिए भी।

परमेश्वर का अनन्त पुत्र संसार में क्यों आया, इसे कभी बहुत अधिक पूर्णता से नहीं बताया जा सकता, और न बहुत ऊँचे स्वर में घोषित किया जा सकता है। वह इसलिए आया कि जब तक हम "देखी हुई क्षणिक वस्तुओं" के बीच जीते हैं, तब तक हमें आशा और शान्ति दे, और जब हम "अनदेखी अनन्त वस्तुओं" में प्रवेश करें, तब महिमा और आशीष दे। वह "जीवन और अमरता को प्रकाश में लाने" के लिए आया, और "उन्हें छुड़ाने के लिए जो मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फँसे थे।" (2 तीमुथियुस 1:10; इब्रानियों 2:15) उसने हमारी खोई हुई और दिवालिया दशा को देखा और हम पर तरस खाया। और अब, उसका नाम धन्य हो, एक नश्वर मनुष्य "क्षणिक वस्तुओं" में से सान्त्वना के साथ गुज़र सकता है, और "अनन्त वस्तुओं" की ओर बिना भय के देख सकता है।

हमारे प्रभु यीशु मसीह ने ये महान अधिकार हमारे लिए अपने ही बहुमूल्य लहू की कीमत पर मोल लिए हैं। वह हमारा स्थानापन्न बना, और अपनी देह में क्रूस पर हमारे पापों को उठा लिया, और फिर हमें धर्मी ठहराने के लिए जी उठा। "मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए।" "जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिए पाप ठहराया," ताकि हम पापी और दीन प्राणी जब तक जीवित हैं तब तक क्षमा और धर्मी ठहराए जाने का लाभ पाएँ, और मरने पर महिमा और आशीष पाएँ। (1 पतरस 2:24; 3:18; 2 कुरिन्थियों 5:21)

और जो कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल लिया है, वह उसे हर उस व्यक्ति को सेंतमेंत देता है जो अपने पापों से फिरे, उसके पास आए, और विश्वास करे। वह कहता है, "जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।" "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" और शर्तें उतनी ही सरल हैं जितना कि यह प्रस्ताव मुफ़्त है: "प्रभु यीशु पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।" "जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।" (यूहन्ना 8:12; मत्ती 11:28; यूहन्ना 7:37; 6:37; प्रेरितों के काम 16:31; यूहन्ना 3:16)

जिसके पास मसीह है, उसके पास जीवन है। वह "क्षणिक वस्तुओं" पर दृष्टि डाल सकता है, और हर जगह परिवर्तन और क्षय देखकर भी निर्भय रह सकता है। उसने स्वर्ग में धन इकट्ठा किया है, "जहाँ न कीड़ा, न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं।" वह "अनन्त वस्तुओं" की ओर शान्त और स्थिर मन से देख सकता है। उसका उद्धारकर्ता जी उठा है, और उसके लिए स्थान तैयार करने गया है। जब वह इस संसार से जाएगा, तब उसे महिमा का मुकुट मिलेगा, और वह सदा अपने प्रभु के साथ रहेगा। वह कब्र में भी, जैसा यूनान और रोम के बड़े से बड़े ज्ञानी भी कभी न कर पाए, दृष्टि डालकर कह सकता है, "हे मृत्यु, तेरी जय कहाँ रही? हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ रहा?" (1 कुरिन्थियों 15:55)

आइए हम सब अपने मन में यह दृढ़ता से ठान लें कि "देखी हुई वस्तुओं" में से सान्त्वना के साथ गुज़रने और "अनदेखी वस्तुओं" की ओर बिना भय के देखने का एकमात्र मार्ग यह है कि मसीह हमारा उद्धारकर्ता और मित्र हो, हम विश्वास के द्वारा मसीह को थाम लें, मसीह के साथ एक हो जाएँ और मसीह हम में हो, और जब तक हम शरीर में जीवित हैं, तब तक परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करते हुए जीवन बिताएँ। (गलातियों 2:20)

जिसे मसीह पर विश्वास है और जिसे नहीं है, उन दोनों की दशा में कितना बड़ा अन्तर है! वह पुरुष या स्त्री सचमुच धन्य है जो सच्चाई से कह सकता है, "मैं यीशु पर भरोसा रखता हूँ; मैं विश्वास करता हूँ।" जब रोमन कैथोलिक कार्डिनल ब्यूफ़ोर्ट मृत्युशय्या पर पड़ा था, तब हमारे महान कवि ने राजा हेनरी के मुँह से कहलवाया है, "वह मरता है, पर [सान्त्वना का] कोई चिह्न नहीं देता।" जब स्कॉटलैंड के धर्म-सुधारक जॉन नॉक्स अपने अन्त के निकट थे और बोल नहीं सकते थे, तब एक विश्वासयोग्य सेवक ने उनसे कहा कि वे हाथ उठाकर इस बात का प्रमाण दें कि जो सुसमाचार उन्होंने जीवन भर सुनाया, वह मृत्यु में भी उन्हें सान्त्वना दे रहा है। उन्होंने सुना, और अपना हाथ तीन बार स्वर्ग की ओर उठाया, और फिर चल बसे। मैं फिर कहता हूँ, धन्य है वह जो विश्वास करता है! केवल वही धनी, स्वतंत्र और हर हानि की पहुँच से परे है। यदि हमें और आपको क्षणिक वस्तुओं में कोई सान्त्वना नहीं और अनन्त वस्तुओं के विषय में कोई आशा नहीं, तो यह पूरी तरह हमारा ही दोष है। इसका कारण यह है कि हम "जीवन पाने के लिए मसीह के पास आना नहीं चाहते।" (यूहन्ना 5:40)

अनन्तकाल के विषय को मैं यहीं छोड़ता हूँ, और प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर इसे अनेक आत्माओं के लिए आशीष का कारण बनाए। अन्त में, मैं इस पुस्तक को पढ़ने वाले हर एक व्यक्ति के सामने विचार करने के लिए कुछ बातें और आत्म-परीक्षा की कुछ सामग्री रखता हूँ।

(1) सबसे पहले, आप अपने समय का उपयोग कैसे कर रहे हैं?

जीवन छोटा है और बहुत अनिश्चित है। तुम नहीं जानते कि एक दिन क्या लेकर आएगा। व्यापार और आनन्द, धन कमाना और धन खर्च करना, खाना-पीना, ब्याह करना और ब्याह देना—सब, सब कुछ शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा और सदा के लिए बीत जाएगा। और तुम, तुम अपनी अमर आत्मा के लिए क्या कर रहे हो? क्या तुम समय को व्यर्थ गँवा रहे हो, या बुद्धिमानी से उसका उपयोग कर रहे हो? क्या तुम परमेश्वर से भेंट करने की तैयारी कर रहे हो?

(2) दूसरा, अनन्तकाल में तुम कहाँ होगे?

वह आ रहा है, आ रहा है, बहुत तेज़ी से हमारी ओर आ रहा है। तुम जा रहे हो, जा रहे हो, बहुत तेज़ी से उसमें प्रवेश करते जा रहे हो। परन्तु न्याय के दिन तुम कहाँ होगे—दाहिनी ओर या बाईं ओर? क्या तुम खोए हुओं में हो या उद्धार पाए हुओं में? ओह, चैन से मत बैठो; तब तक चैन से मत बैठो जब तक तुम्हारी आत्मा सुरक्षित न हो जाए! तैयार रहो: कुछ भी अनिश्चित मत छोड़ो। बिना तैयारी के मरना और जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है।

(3) तीसरा, क्या तुम अभी और अनन्तकाल में भी सुरक्षित रहना चाहते हो?

तो मसीह को खोजो और उस पर विश्वास करो। जैसे हो वैसे ही उसके पास आओ। जब तक वह मिल सकता है उसे खोजो, जब तक वह निकट है उसे पुकारो। अब भी अनुग्रह का सिंहासन है। अभी देर नहीं हुई है। मसीह अनुग्रह करने के लिए ठहरा हुआ है: वह तुम्हें अपने पास आने का निमन्त्रण देता है। द्वार के बन्द होने और न्याय के आरम्भ होने से पहले, मन फिराओ, विश्वास करो और उद्धार पाओ।

(4) अन्त में, क्या तुम सुखी होना चाहते हो?

मसीह से लिपटे रहो और उस पर विश्वास का जीवन जियो। उसमें बने रहो और उसके निकट जियो। पूरे मन, पूरी आत्मा, पूरी बुद्धि और पूरी शक्ति से उसके पीछे चलो, और प्रतिदिन उसे और अच्छी तरह जानने का प्रयत्न करो। ऐसा करने से, जब तुम "अस्थायी वस्तुओं" में से होकर गुज़रोगे तब तुम्हें बड़ी शान्ति मिलेगी, और मरते हुए संसार के बीच तुम "कभी न मरोगे।" (यूहन्ना 11:26) ऐसा करने से तुम पूरे अटल भरोसे के साथ "अनन्त वस्तुओं" की ओर देख सकोगे, और अनुभव कर सकोगे और "जान सकोगे कि यदि हमारा यह पार्थिव तम्बू जिसमें हम रहते हैं, गिराया भी जाए, तो हमारे पास परमेश्वर की ओर से एक भवन है, अर्थात् स्वर्ग में एक अनन्त घर जो हाथों से बनाया हुआ नहीं।" (2 कुरिन्थियों 5:1)

पुनश्च: ऊपर का उपदेश देने के बाद मैंने कैनन फ़ैरार की पुस्तक "अनन्त आशा" (Eternal Hope) पढ़ी है। उस पुस्तक की अधिकांश बातों से मैं सहमत नहीं हो सकता। ऐसे प्रसिद्ध लेखक की कलम से जो कुछ भी निकले, वह स्वाभाविक रूप से आदरपूर्वक विचार के योग्य है। परन्तु मुझे ईमानदारी से मानना पड़ता है कि "अनन्त आशा" पढ़ने के बाद मुझे अपने "अनन्तकाल" विषयक उपदेश में कही हुई किसी भी बात को वापस लेने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। मैंने फ़ैरार की पुस्तक खेद और असन्तोष के साथ नीचे रख दी है; अपने मतों के विषय में मैं न तो कायल हुआ हूँ और न डिगा हूँ।

कैनन फ़ैरार के कथनों में मुझे कुछ भी नया नहीं मिलता। उन्होंने शायद ही कोई ऐसी बात कही है जो पहले न कही गई हो और जिसका पहले खण्डन न हो चुका हो। जो कोई भविष्य के दण्ड की वास्तविकता और अनन्तता के विषय की पूरी जाँच करना चाहता है, उसे मैं कुछ ऐसी रचनाएँ सुझाने का साहस करता हूँ जो जितनी जानी जानी चाहिए उससे बहुत कम जानी जाती हैं, और जो मुझे "अनन्त आशा" की अपेक्षा कहीं अधिक खरी और पवित्रशास्त्र के अनुसार जान पड़ती हैं। ये हैं: "होरबरी की भविष्य के दण्ड की अवधि विषयक पवित्रशास्त्रीय सिद्धान्त की जाँच," "गर्डलस्टोन की डीज़ ईरे," रेव. सी. एफ़. चाइल्ड की "असुरक्षित लंगर," और रेव. फ़्लावेल कुक की "धर्मी न्याय।" साथ ही "पुनरुत्थान" शीर्षक के अन्तर्गत "धर्म-सिद्धान्त पर बिशप पियर्सन," और "हॉज की सिस्टेमैटिक थियोलॉजी," खण्ड 3, पृ. 868।

सीधी सच्चाई यह है कि दुष्टों की भावी दशा के विषय के साथ बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें कैनन फ़ैरार, मुझे लगता है, छुए बिना छोड़ देते हैं। परमेश्वर की अद्भुत दयालुता और इस कल्पना की भयावहता कि हमारे आस-पास के बहुत से लोग सदा के लिए खो जाएँगे—इन्हें उन्होंने अपनी विशिष्ट वाक्पटुता के साथ पूरी तरह से सँभाला है। निःसन्देह परमेश्वर की करुणा अवर्णनीय है। वह "नहीं चाहता कि कोई नाश हो।" वह "चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो।" पापियों के लिए मरने को मसीह को जगत में भेजने में उसका प्रेम एक अक्षय विषय है। परन्तु यह परमेश्वर के चरित्र का केवल एक पक्ष है, जैसा कि वह पवित्रशास्त्र में प्रकट किया गया है। उसके चरित्र और गुणों को सम्पूर्णता से देखना आवश्यक है। अनन्त परमेश्वर की असीम पवित्रता और न्याय—बुराई से उसकी घृणा, जो नूह के जलप्रलय में, सदोम में, और कनान की सात जातियों के विनाश में प्रकट हुई—परमेश्वर की दृष्टि में पाप की अवर्णनीय नीचता और दोष—स्वाभाविक मनुष्य और उसके सिद्ध सृजनहार के बीच की चौड़ी खाई—वह भारी आत्मिक परिवर्तन जिसमें से आदम की हर सन्तान को गुज़रना होगा, यदि उसे सदा परमेश्वर की उपस्थिति में रहना है—और बाइबल में इस बात का कोई संकेत तक न होना कि यह परिवर्तन मृत्यु के बाद हो सकता है—इनमें से हर एक बात को कैनन फ़ैरार की पुस्तक में, मुझे लगता है, कुछ अंश तक एक किनारे कर दिया गया है या अछूता छोड़ दिया गया है। "अनन्त आशा" में पक्ष लिए गए विचारों को स्वीकार करने से पहले मेरा मन इन बातों में सन्तोष माँगता है, और मुझे वह सन्तोष उस पुस्तक में नहीं मिलता।

ओरिजन ने, जो मसीह के बाद तीसरी शताब्दी में रहनेवाला कलीसिया का एक प्राचीन पिता था, सबसे पहले औपचारिक रूप से उस मत का समर्थन किया जिसे कैनन फ़ैरार ने अपनाया है। उसने साहसपूर्वक यह विचार प्रस्तुत किया कि भविष्य का दण्ड केवल अस्थायी होगा; परन्तु उसके लगभग सभी समकालीनों ने उसके विचार को अस्वीकार कर दिया। बिशप वर्ड्सवर्थ कहते हैं, "ओरिजन के समय में और उसके बाद की शताब्दियों में कलीसिया के पिताओं ने, जिनमें बहुत से ऐसे थे जिनकी मातृभाषा नए नियम की मूल भाषा थी और जिन्हें अनुवाद भटका नहीं सकते थे, ओरिजन के मत और कथनों की बारीकी से जाँच की और अधिकांशतः उन्हें अस्वीकार और निन्दित करने में एकमत हुए। पूर्वी कलीसिया के इरेनियस, यरूशलेम के सिरिल, क्रिसोस्तोम, बेसिल, सिकन्दरिया के सिरिल और अन्य, तथा पश्चिमी कलीसिया के टर्टुलियन, साइप्रियन, लैक्टेंशियस, ऑगस्टीन, ग्रेगरी महान, बीड और बहुत से अन्य इस शिक्षा में एकमत थे कि धर्मियों का आनन्द और दुष्टों का दण्ड अस्थायी नहीं, परन्तु सनातन होगा।"

"और बात इतनी ही नहीं थी। सम्राट जस्टिनियन के अधीन कुस्तुन्तुनिया में सन् 553 ई. में हुई पाँचवीं महासभा ने ओरिजन के सिद्धान्तों की जाँच की, और उनकी निन्दा करनेवाला एक धर्मसभीय आदेश पारित किया। और उस समय के बाद एक हज़ार वर्ष तक मसीही जगत में उस निन्दा को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता रहा।" (बिशप वर्ड्सवर्थ के "उपदेश": पृ. 34।)

इस कथन में मैं यह तथ्य और जोड़ता हूँ कि भविष्य के दण्ड की अनन्तता को धर्म-सुधार के समय से लेकर आज तक के लगभग सभी महानतम धर्मविज्ञानियों ने माना है। यह ऐसा विषय है जिस पर लूथरवादी, कैल्विनवादी और आर्मीनियसवादी, एपिस्कोपल, प्रेस्बिटेरियन और इंडिपेंडेंट सभी, कुछ अपवादों को छोड़कर, सदा एकमत रहे हैं। सबसे प्रतिष्ठित और विद्वान धर्म-सुधारकों के लेखों को खोजिए, प्यूरिटन लोगों की रचनाओं को खोजिए, उन थोड़े से पुरुषों की बची-खुची साहित्यिक कृतियों को खोजिए जिन्होंने अठारहवीं शताब्दी में अंग्रेज़ी मसीही विश्वास को पुनर्जीवित किया, और नियम के रूप में आपको सदा एक ही सामंजस्यपूर्ण उत्तर मिलेगा। निःसन्देह पिछले कुछ वर्षों में "भविष्य के दण्ड की अनन्तता न होने" के सिद्धान्त को कई उत्साही समर्थक मिले हैं। परन्तु अपेक्षाकृत आधुनिक काल तक, मैं निःसंकोच कहता हूँ, कैनन फ़ैरर के विचारों के समर्थक रूढ़िवादी मसीहियों के बीच सदा अत्यन्त छोटे अल्पसंख्यक रहे हैं। यह तथ्य, किसी भी दशा में, स्मरण रखने योग्य है।

भविष्य के दण्ड के विषय में पुराने या प्रचलित विचारों को घेरनेवाली कठिनाइयों के बारे में मैं मानता हूँ कि वे हैं, और मैं उन्हें समझा देने का दावा नहीं करता। परन्तु मैं मसीही विश्वास में अनेक रहस्य पाने की अपेक्षा सदा रखता हूँ, और उनके कारण मैं ठोकर नहीं खाता। संसार में मुझे और भी कठिनाइयाँ दिखाई देती हैं जिन्हें मैं सुलझा नहीं सकता, और मैं उनके समाधान की प्रतीक्षा करने में सन्तुष्ट हूँ। जिसे एक महान धर्मविज्ञानी ने "परमेश्वर का रहस्य, वह महान रहस्य कि वह दुष्टता और गड़बड़ी को बढ़ने देता है" कहा है—बुराई का उद्गम—क्रूरता, अत्याचार, निर्धनता और रोग की अनुमति—शिशुओं के भले-बुरे को जानने से पहले ही उनकी बीमारी और मृत्यु की अनुमति—उन अन्यजातियों का अनन्त दण्ड जिन्होंने कभी सुसमाचार नहीं सुना—अज्ञान के वे समय जिन्हें परमेश्वर ने जान-बूझकर अनदेखा किया—पिछले 1800 वर्षों से चीन, भारत और मध्य अफ़्रीका की दशा—ये सब बातें मेरे मन में ऐसी बड़ी गाँठें हैं जिन्हें मैं खोल नहीं सकता, और ऐसी गहराइयाँ हैं जिनकी थाह मैं नहीं ले सकता। परन्तु मैं ज्योति की प्रतीक्षा करता हूँ, और मुझे कोई सन्देह नहीं कि सब कुछ स्पष्ट कर दिया जाएगा। मैं इस विचार में विश्राम पाता हूँ कि मैं एक दीन अज्ञानी नश्वर प्राणी हूँ, और परमेश्वर अनन्त बुद्धि का स्वामी है और सब कुछ ठीक कर रहा है। "क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?" (उत्पत्ति 18:25) बटलर का यह कथन बुद्धिमानी का है: "परमेश्वर की व्यवस्था में जो कुछ अन्यायपूर्ण और क्रूर दिखाई देता है, वह सब समझ में आ जाएगा और स्पष्ट हो जाएगा, यदि हम यह स्मरण रखें कि हर दयापूर्ण छूट दी जाएगी, और किसी से उससे अधिक नहीं माँगा जाएगा जितनी उससे उन परिस्थितियों में अपेक्षा की जा सकती थी जिनमें वह रखा गया था, न कि उतनी जितनी अन्य परिस्थितियों में रखे जाने पर की जा सकती थी।" ("एनालॉजी," भाग 2, अध्याय 6, पृ. 425, विल्सन का संस्करण।) अय्यूब की पुस्तक में एलीहू का यह कथन महान है, "सर्वशक्तिमान हमारी पहुँच से बाहर है और सामर्थ्य में महान है; वह न्याय और बड़ी धार्मिकता के कारण किसी पर अत्याचार नहीं करता।" (अय्यूब 37:23)

यह पूर्णतः सत्य हो सकता है कि अनेक रोमन कैथोलिक धर्मविज्ञानियों ने, और कुछ प्रोटेस्टेंट लोगों ने भी, दूसरे लोक में खोए हुओं के शारीरिक कष्टों के विषय में अतिरंजित और आपत्तिजनक कथन किए हैं। यह भी सत्य हो सकता है कि अनन्त दण्ड पर विश्वास करनेवालों ने कभी-कभी पदों को ग़लत समझा या उनका ग़लत अनुवाद किया है, और अलंकारिक भाषा को आवश्यकता से अधिक खींचा है। परन्तु मसीही विश्वास को उसके समर्थकों की भूलों के लिए उत्तरदायी ठहराना उचित नहीं है। यह एक पुरानी कहावत है कि

"मसीहियों की भूलें अविश्वासियों के तर्क बन जाती हैं।" थॉमस एक्विनास, दांते, मिल्टन, थॉमस बॉस्टन और जोनाथन एडवर्ड्स न तो प्रेरित थे और न अचूक, और खोए हुओं की शारीरिक यातनाओं के विषय में जो कुछ उन्होंने लिखा हो उसके लिए मैं उत्तरदायी होने से इनकार करता हूँ। परन्तु हर छूट, स्वीकृति और कटौती के बाद भी, मेरी विनम्र सम्मति में, अनन्त दण्ड के सिद्धान्त के समर्थन में पवित्रशास्त्र के प्रमाणों का एक ऐसा भण्डार शेष रहता है जिसे कभी समझाकर दूर नहीं किया जा सकता, और जिसे अंग्रेज़ी बाइबल का कोई संशोधन या नया अनुवाद कभी उलट नहीं सकेगा। यह निर्विवाद है कि भावी अवस्था में दुःख की श्रेणियाँ भी हैं और महिमा की श्रेणियाँ भी, और कुछ खोए हुओं के अनन्त कष्ट दूसरों के कष्ट से कहीं अधिक भयंकर होंगे। परन्तु यह कि दुष्टों के दण्ड का कभी अन्त होगा, या यह कि केवल समय की लम्बाई ही किसी हृदय को बदल देगी, या यह कि पवित्र आत्मा मरे हुओं के उद्धार के लिए कार्य करता रहता है, या यह कि कब्र के पार कोई शुद्धि की प्रक्रिया है जिससे दुष्ट लोग नरक की आग में अन्ततः बचाए जाएँगे और स्वर्ग में पहुँचा दिए जाएँगे, ये ऐसी मान्यताएँ हैं जिन्हें मैं कहता हूँ कि पवित्रशास्त्र से सिद्ध करना सर्वथा असम्भव है। बल्कि पवित्रशास्त्र के ऐसे पद हैं जो बिलकुल भिन्न सिद्धान्त सिखाते हैं। हॉर्बरी कहता है, "यह आश्चर्य की बात है कि यदि नरक शुद्धि की ऐसी अवस्था है, तो पवित्रशास्त्र में उसे सदा दण्ड के स्थान के रूप में क्यों बताया गया है।" (खण्ड 2, पृ. 223) गर्डलस्टोन कहता है, "पवित्रशास्त्र के स्पष्ट कथनों के सिवा और कोई बात हमें अधर्मी मनुष्यों को मृत्यु के बाद मन फिराव के सिद्धान्त पर विश्वास करने या उसका प्रचार करने का अधिकार नहीं दे सकती; और इस विषय पर एक भी स्पष्ट कथन नहीं मिलता।" ("डीज़ इरे," पृ. 269) एक बार जब हम ऐसे सिद्धान्त गढ़ने लगें जिन्हें हम बाइबल से सिद्ध नहीं कर सकते, या पवित्रशास्त्र के पदों के प्रमाण को इसलिए ठुकराने लगें कि वे हमें ऐसे निष्कर्षों तक पहुँचाते हैं जो हमें पसन्द नहीं, तो फिर हम अपनी बाइबलों को फेंक भी दें तो हर्ज नहीं।

कुछ लोगों का प्रिय तर्क यह है कि कोई भी धार्मिक सिद्धान्त सत्य नहीं हो सकता जिसे मनुष्यों की "सामान्य राय" और लोकप्रिय भावना अस्वीकार करती है; कि जो वचन इस सामान्य लोकप्रिय भावना के विपरीत हैं, उनकी व्याख्या अवश्य ही गलत की गई है; और इसलिए अनन्त दण्ड सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि जनसमूह का अन्तःकरण उसके विरुद्ध विद्रोह करता है—यह तर्क मुझे अत्यन्त खतरनाक और अनुचित प्रतीत होता है। यह खतरनाक है, क्योंकि यह पवित्रशास्त्र के अधिकार पर सीधा प्रहार करता है, जो विश्वास का एकमात्र नियम है। यदि नश्वर मनुष्य की "सामान्य राय" का वज़न परमेश्वर के वचन की घोषणाओं से अधिक है, तो बाइबल का क्या लाभ? यह अनुचित है, क्योंकि यह मसीही विश्वास के उस महान मूलभूत सिद्धान्त की उपेक्षा करता है कि मनुष्य एक गिरा हुआ प्राणी है, जिसका हृदय और समझ भ्रष्ट हैं, और आत्मिक बातों में उसका निर्णय निकम्मा है। हमारे हृदयों पर एक परदा पड़ा है, "परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं।" (1 कुरिन्थियों 2:14) ऐसे वचन के सामने यह कहना कि जो भी सिद्धान्त अधिकांश मनुष्यों को अप्रिय लगता है, जैसे अनन्त दण्ड, वह इसी कारण असत्य होना चाहिए, केवल बेतुकी बात है! "सामान्य राय" के सही होने की अपेक्षा गलत होने की सम्भावना अधिक है!

आखिर, इस विषय में बड़ा सन्देह है कि भावी दण्ड की अवधि के सम्बन्ध में मनुष्यजाति के बहुमत की "सामान्य भावना" या राय क्या है। निश्चय ही उसे जानने का हमारे पास कोई साधन नहीं; और दोनों में से जो भी हो, उससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता। ऐसे विषय में एकमात्र प्रश्न यह है कि पवित्रशास्त्र क्या कहता है? परन्तु मुझे दृढ़ सन्देह है कि यदि संसार का मत लिया जा सके, तो हम पाएँगे कि मनुष्यजाति के अधिकांश लोग अनन्त दण्ड में विश्वास करते थे! अनन्त दण्ड के विषय में यूनानियों और रोमियों की राय के बारे में कोई विशेष विवाद नहीं है। यदि उनकी पौराणिक कथाओं में कुछ स्पष्ट रूप से सिखाया गया है, तो वह दुष्टों के कष्टों का अन्तहीन स्वरूप है। बटलर कहता है, "अन्यजातीय लेखक, चाहे नीतिशास्त्री हों या कवि, दुष्टों के भावी दण्ड के विषय में, अवधि और मात्रा दोनों के सम्बन्ध में, वैसी ही अभिव्यक्ति और वर्णन की शैली में बोलते हैं जैसी पवित्रशास्त्र की है।" ("एनालॉजी," भाग 1, अध्याय 2, पृ. 218) तान्तालस, सिसिफस, इक्सियोन, प्रोमेथियस और दानाइदों की विचित्र और भयावह कथाओं में एक सामान्य विशेषता है—हर एक में दण्ड अनन्त है! यह तथ्य ध्यान देने योग्य है। इसलिए अनन्त दण्ड का विरोध करनेवालों को "मनुष्यजाति की सामान्य राय" के विषय में इतने आत्मविश्वास से नहीं बोलना चाहिए।

जहाँ तक दुष्टों के सर्वनाश के सिद्धान्त की बात है, जिसे बहुत से लोग मानते हैं, वह मुझे हमारे प्रभु यीशु मसीह के उन वचनों से सर्वथा अमेल प्रतीत होता है जिसमें उसने कहा, "जिन्होंने बुराई की है वे दण्ड के पुनरुत्थान के लिये जी उठेंगे," और "जहाँ उन का कीड़ा नहीं मरता और आग नहीं बुझती," और साथ ही "दुष्टों के पुनरुत्थान" के विषय में पौलुस के वचनों से भी (यूहन्ना 5:29; मरकुस 9:43-48; प्रेरितों के काम 24:15)। जब तक वे वचन प्रेरित पवित्रशास्त्र के पन्नों से हटाए नहीं जा सकते, तब तक मुझे इस विषय पर तर्क करना केवल समय की बर्बादी प्रतीत होता है।

इस सिद्धान्त के समर्थकों का प्रिय तर्क कि "मृत्यु, मरना, नाश होना, विनाश" और ऐसे ही अन्य शब्दों का अर्थ केवल "अस्तित्व का समाप्त हो जाना" ही हो सकता है, इतना हास्यास्पद रूप से निर्बल है कि उस पर ध्यान देना भी कठिन है। बाइबल का हर पाठक जानता है कि परमेश्वर ने आदम से वर्जित फल के विषय में कहा था, "जिस दिन तू उसे खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।" (उत्पत्ति 2:17) परन्तु हर मसीही जानता है कि जब आदम ने आज्ञा तोड़ी तब उसका "अस्तित्व समाप्त" नहीं हो गया। वह आत्मिक रीति से मर गया, परन्तु उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ! पतरस भी जलप्रलय के विषय में कहता है: "इन्हीं के द्वारा उस समय का संसार जल में डूबकर नाश हो गया।" (2 पतरस 3:6) फिर भी, यद्यपि वह कुछ समय के लिये डूब गया, निश्चय ही उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ; और जब जल सूख गया तो नूह फिर पृथ्वी पर जीवित रहा।

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