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मुझे भय है कि हज़ारों लोग इस वर्णन पर ठीक बैठते हैं। (जारी)
हज़ारों लोग इस वर्णन पर ठीक बैठते हैं। कभी-कभी, यदि उनका मन हो, तो वे किसी कलीसिया में जाकर धार्मिक आराधना में सम्मिलित हो जाते हैं; और अन्य समयों में वे घर पर रहकर समाचार-पत्र पढ़ते हैं, या यूँ ही समय बिताते हैं, या अपना हिसाब-किताब देखते हैं, या कोई मनोरंजन ढूँढ़ते हैं। "क्या यही हर प्रकार का प्रयत्न करना है?" मैं समझदार मनुष्यों से बात कर रहा हूँ। मैं जो कहता हूँ उसे वे स्वयं परखें।
2. उन लोगों के विषय में मैं क्या कहूँ जो नियमित रूप से आराधना-स्थल में आते तो हैं, परन्तु केवल औपचारिकता के लिए आते हैं?
हमारे देश के हर भाग में ऐसी दशा में पड़े हुए बहुत से लोग हैं। उनके पिताओं ने उन्हें आना सिखाया था; आना उनकी सदा की रीति रही है; न आना शोभा नहीं देता। परन्तु जब वे आते हैं तब भी उन्हें परमेश्वर की आराधना की कोई चिन्ता नहीं होती। वे व्यवस्था सुनें या सुसमाचार, सत्य सुनें या भ्रम, उनके लिए सब एक समान है। बाद में उन्हें कुछ भी स्मरण नहीं रहता। वे अपने रविवार के वस्त्रों के साथ अपना धर्म का दिखावा भी उतार देते हैं और संसार में लौट जाते हैं। और "क्या यही हर प्रकार का प्रयत्न करना है?" मैं समझदार मनुष्यों से बात कर रहा हूँ। मैं जो कहता हूँ उसे वे स्वयं परखें।
3. उन लोगों के विषय में मैं क्या कहूँ जो बाइबल को कभी-कभार ही पढ़ते हैं, या कभी नहीं पढ़ते?
मुझे भय है कि हज़ारों लोग इस वर्णन पर ठीक बैठते हैं। वे इस पुस्तक को नाम से जानते हैं; वे जानते हैं कि इसे सामान्यतः वही एकमात्र पुस्तक माना जाता है जो हमें सिखाती है कि कैसे जीना और कैसे मरना है; परन्तु उसे पढ़ने के लिए उन्हें कभी समय नहीं मिलता। समाचार-पत्र, समीक्षाएँ, उपन्यास, कथाएँ वे पढ़ सकते हैं, परन्तु बाइबल नहीं। और क्या भीतर प्रवेश करने के लिए "हर प्रकार का प्रयत्न करना" यही है? मैं समझदार मनुष्यों से बात कर रहा हूँ। मैं जो कहता हूँ उसे वे स्वयं परखें।
4. उन लोगों के विषय में मैं क्या कहूँ जो कभी प्रार्थना नहीं करते? मुझे दृढ़ विश्वास है कि ऐसी दशा में बहुत बड़ी भीड़ है। वे परमेश्वर के बिना सवेरे उठते हैं, और परमेश्वर के बिना रात को लेट जाते हैं। वे कुछ नहीं माँगते; कुछ अंगीकार नहीं करते; किसी बात के लिए धन्यवाद नहीं देते; कुछ नहीं खोजते। वे सब मरणहार प्राणी हैं, फिर भी वे अपने सृजनहार और अपने न्यायी से बोलचाल तक नहीं रखते! और "क्या यही हर प्रकार का प्रयत्न करना है?" मैं समझदार मनुष्यों से बात कर रहा हूँ। मैं जो कहता हूँ उसे वे स्वयं परखें।
सुसमाचार का सेवक होना एक गम्भीर बात है। मनुष्यों की आत्मिक विषयों में चाल को देखना और ध्यान देना एक पीड़ादायक बात है। हम अपने हाथों में परमेश्वर की वह महान व्यवस्था-पुस्तक थामे हुए हैं, जो घोषित करती है कि मन फिराव, और परिवर्तन, और मसीह में विश्वास, और पवित्रता के बिना कोई भी जीवित मनुष्य उद्धार नहीं पा सकता। अपने पद का निर्वाह करते हुए हम मनुष्यों से आग्रह करते हैं कि मन फिराओ, विश्वास करो और उद्धार पाओ; परन्तु हमारे दुःख की बात है कि हमें कितनी बार यह विलाप करना पड़ता है कि हमारा परिश्रम सब व्यर्थ ही जान पड़ता है। लोग हमारी कलीसियाओं में आते हैं, सुनते हैं, और सराहते हैं, परन्तु उद्धार पाने के लिए "हर प्रकार का प्रयत्न नहीं करते।" हम पाप की पापमयता दिखाते हैं; हम मसीह की मनोहरता खोलकर बताते हैं; हम संसार की व्यर्थता प्रकट करते हैं; हम मसीह की सेवा का आनन्द सामने रखते हैं; हम थके हुए और बोझ से दबे परिश्रमी लोगों को जीवन का जल देते हैं; परन्तु हमारी निराशा यह है कि हम कितनी ही बार मानो हवाओं से बातें करते जान पड़ते हैं। रविवार को हमारी बातें धीरज से सुनी जाती हैं; हमारे तर्कों का खण्डन नहीं होता; परन्तु सप्ताह में हम साफ़ देखते हैं कि लोग उद्धार पाने के लिए "हर प्रकार का प्रयत्न नहीं कर रहे" हैं। सोमवार की सुबह शैतान आ पहुँचता है और अपने असंख्य फन्दे बिछाता है; संसार आ जाता है और अपने भ्रामक पुरस्कार दिखाता है; हमारे सुननेवाले उनके पीछे लालच से दौड़ पड़ते हैं। वे इस संसार की सम्पत्ति के लिए कठिन परिश्रम करते हैं; वे शैतान के कहने पर मेहनत करते हैं; परन्तु जो एक काम उन्हें करना आवश्यक है, वही वे नहीं करते—वे "हर प्रकार का प्रयत्न" बिलकुल नहीं करते।
मैं सुनी-सुनाई बातें नहीं लिख रहा हूँ। जो मैंने देखा है वही कहता हूँ। मैं सेवकाई में अपने सैंतीस वर्षों के अनुभव का परिणाम लिख रहा हूँ। इस अवधि में मैंने मानव स्वभाव के विषय में ऐसे पाठ सीखे हैं जो मैं पहले नहीं जानता था। मैंने देखा है कि सकरे मार्ग के विषय में हमारे प्रभु के वचन कितने सच्चे हैं। मैंने जान लिया है कि उद्धार पाने के लिए "हर प्रकार का प्रयत्न करनेवाले" कितने थोड़े हैं।
क्षणिक बातों के प्रति गम्भीरता तो बहुत सामान्य है। इस संसार में धनी और समृद्ध होने का यत्न करना कोई दुर्लभ बात नहीं है। धन, और व्यापार, और राजनीति की चिन्ता—वाणिज्य, और विज्ञान, और ललित कलाओं, और मनोरंजनों की चिन्ता—किराए, और मज़दूरी, और श्रम, और भूमि की चिन्ता—ऐसे विषयों की चिन्ता मैं नगर और देहात दोनों में भरपूर देखता हूँ। परन्तु अपनी आत्माओं की चिन्ता करनेवाले मुझे थोड़े ही दिखाई देते हैं। सकरे द्वार से भीतर प्रवेश करने के लिए "हर प्रकार का प्रयत्न करनेवाले" मुझे कहीं भी थोड़े ही दिखाई देते हैं।
इस सब पर मुझे कुछ भी आश्चर्य नहीं होता। मैं बाइबल में पढ़ता हूँ कि मुझे यही अपेक्षा रखनी चाहिए। बड़े भोज का दृष्टान्त उन बातों का ठीक चित्र है जो मैं सेवक बनने के समय से अपनी आँखों से देखता आया हूँ (लूका 14:16)। जैसा मेरे प्रभु और उद्धारकर्ता ने मुझे बताया है, मैं पाता हूँ कि "मनुष्य बहाना करते हैं।" किसी को अपना खेत देखना है; दूसरे को अपने बैल परखने हैं; तीसरे को परिवार की रुकावटें हैं। परन्तु इस सबसे मनुष्यों की आत्माओं के लिए मेरा गहरा शोक कम नहीं होता। मुझे यह सोचकर शोक होता है कि अनन्त जीवन उनके इतने निकट है, फिर भी वे इसलिए खो जाएँगे कि वे भीतर प्रवेश करने और उद्धार पाने के लिए "हर प्रकार का प्रयत्न" नहीं करना चाहते।
मैं नहीं जानता कि इस लेख के बहुत से पाठकों की आत्मा की दशा कैसी है। परन्तु मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि सावधान रहो, ऐसा न हो कि तुम इसलिए सदा के लिए नाश हो जाओ कि तुमने "यत्न नहीं किया।" यह न सोचो कि तुम्हें विनाश के गड्ढे तक पहुँचाने के लिए किसी बड़े लाल रंग के पाप की आवश्यकता है। तुम्हें बस चुपचाप बैठे रहना है और कुछ नहीं करना है, और तुम अन्त में अपने आप को नरक के गड्ढे में पाओगे। हाँ! शैतान तुमसे यह नहीं माँगता कि तुम कैन, और फिरौन, और अहाब, और बेलशस्सर, और यहूदा इस्करियोती के पदचिह्नों पर चलो। नरक को जाने का एक और मार्ग है जो वहाँ पहुँचाने की पूरी गारंटी देता है—आत्मिक सुस्ती, आत्मिक आलस्य और आत्मिक काहिली का मार्ग। शैतान को इस पर कोई आपत्ति नहीं कि तुम मसीही कलीसिया के एक प्रतिष्ठित सदस्य के रूप में जाने जाओ। वह तुम्हें अपनी भेंट चढ़ाने देगा; वह तुम्हें जीवन भर हर रविवार कलीसिया में आराम से बैठने देगा। वह भली-भाँति जानता है कि जब तक तुम "यत्न नहीं करते," तब तक तुम्हें अन्त में उस स्थान पर पहुँचना ही है जहाँ नाश करनेवाला कीड़ा कभी नहीं मरता, और आग कभी नहीं बुझती। चौकस रहो कि तुम इस अन्त तक न पहुँचो। मैं फिर कहता हूँ, "तुम्हें बस कुछ नहीं करना है, और तुम खो जाओगे।"
यदि तुम्हें अपनी आत्मा की भलाई के लिए "यत्न करना" सिखाया गया है, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि कभी यह न सोचना कि तुम बहुत आगे बढ़ सकते हो। कभी इस विचार को स्थान न देना कि तुम अपनी आत्मिक दशा के विषय में बहुत चिन्तित हो, और इतनी सावधानी की कोई आवश्यकता नहीं। इसके बजाय अपने मन में यह दृढ़ कर लो कि "सब परिश्रम में लाभ है," और कोई परिश्रम उतना लाभदायक नहीं जितना आत्मा के लिए किया गया परिश्रम। अच्छे किसानों में यह कहावत है कि वे भूमि के लिए जितना अधिक करते हैं, भूमि उनके लिए उतना ही अधिक करती है। मुझे विश्वास है कि मसीहियों में भी यही कहावत होनी चाहिए कि वे अपने मसीही जीवन के लिए जितना अधिक करते हैं, उनका मसीही जीवन उनके लिए उतना ही अधिक करेगा।
बाइबल पढ़ने, कलीसिया जाने, प्रार्थना करने और प्रभु-भोज में सम्मिलित होने जैसी बातों में ज़रा-सी भी लापरवाही की प्रवृत्ति से सावधान रहो। अपनी प्रार्थनाओं, बाइबल पढ़ने और परमेश्वर के साथ अपनी निजी सहभागिता को छोटा करने से बचो। चौकस रहो कि तुम कलीसिया की साप्ताहिक सभाओं का उपयोग करने में विचारहीन और आलसी रीति को स्थान न दो। सुसमाचार का प्रचार सुनते समय ऊँघने, आलोचना करने और दोष ढूँढ़ने की किसी भी उभरती प्रवृत्ति से लड़ो। परमेश्वर के लिए जो कुछ भी करो, उसे अपने पूरे मन, पूरी बुद्धि और पूरी शक्ति से करो। दूसरी बातों में संयम रखो और अति में पड़ने से डरो। आत्मा की बातों में संयम से वैसे ही डरो जैसे तुम महामारी से डरते हो। इसकी चिन्ता न करो कि मनुष्य तुम्हारे विषय में क्या सोचते हैं। तुम्हारे लिए यही बहुत है कि तुम्हारा स्वामी कहता है, "यत्न करो।"
III. इस लेख में विचार करने की अन्तिम बात वह "भयानक भविष्यद्वाणी है जो प्रभु यीशु ने सुनाई।" वह कहता है, "बहुत से प्रवेश करने का यत्न करेंगे, और न कर सकेंगे।"
यह कब होगा? किस समय उद्धार का द्वार सदा के लिए बन्द हो जाएगा? प्रवेश करने का "यत्न करना" कब व्यर्थ हो जाएगा? ये गम्भीर प्रश्न हैं। द्वार अब सबसे बड़े पापी के लिए भी खुलने को तैयार है; परन्तु एक दिन ऐसा आएगा जब वह फिर नहीं खुलेगा।
हमारे प्रभु ने जिस समय की भविष्यद्वाणी की, वह उसके अपने दूसरे आगमन का समय है, जब वह जगत का न्याय करने आएगा। परमेश्वर की सहनशीलता का अन्त अवश्य होगा। अनुग्रह का सिंहासन अन्त में उठा लिया जाएगा, और उसके स्थान पर न्याय का सिंहासन स्थापित किया जाएगा। जीवते जल का सोता
