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चौथी पुस्तक
66. परमेश्वर कलीसियाई और नागरिक शासन के द्वारा हमें मसीह की सहभागिता में दृढ़ता से थामे रखता है।
67. कलीसियाई शासन में तीन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए। 1. कलीसिया किस से बनती है। 2. वह कैसे शासित हो। 3. उसका अधिकार क्या हो।
68. कलीसिया को दो दृष्टियों से देखा जा सकता है। 1. वह अदृश्य, सार्वभौमिक कलीसिया, जो सन्तों की सहभागिता है। 2. एक दृश्य विशिष्ट कलीसिया; यह परमेश्वर के वचन के शुद्ध प्रचार से, और संस्कारों के विधिसम्मत प्रबन्ध से पहचानी जाती है।
69. कलीसिया के शासन की पद्धति के विषय में पाँच बिन्दु मन में तौलने चाहिए। 1. जो उस पर अधिकारी हैं। 2. उनकी योग्यता। 3. उनकी बुलाहट का स्वरूप। 4. उनके कार्य। 5. प्राचीन कलीसिया की संरचना कैसी रही होगी।
70. कलीसिया पर अधिकारी मनुष्य हैं, स्वर्गदूत नहीं। इसमें परमेश्वर हमारे प्रति अपनी भलाई घोषित करता है; हमें नम्रता और आज्ञाकारिता का विशेष अभ्यास मिलता है, और परस्पर प्रेम का सबसे अच्छा बन्धन भी।
71. जो कलीसिया पर अधिकारी हैं वे हैं भविष्यद्वक्ता, प्रेरित, सुसमाचार-प्रचारक, जिनका पद कुछ समय के लिए रहा; और पासबान तथा शिक्षक भी, जो सदा बने रहते हैं।
72. उनकी बुलाहट दो प्रकार की है। “भीतरी” बुलाहट, और “बाहरी” बुलाहट। “भीतरी” बुलाहट परमेश्वर के आत्मा से है। “बाहरी” बुलाहट में चार बिन्दु जुड़े हैं जिन्हें तौलना चाहिए। 1. चुने जाने वाले मनुष्यों की योग्यताएँ—अर्थात् कि वे खरी विद्या और अच्छे आचरण से सम्पन्न हों। 2. वे किस रीति से चुने जाएँ—अर्थात् उपवास और प्रार्थना के साथ। 3. वे किनके द्वारा चुने जाएँ—अर्थात् भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के रूप में सीधे परमेश्वर द्वारा; और वचन के मार्गदर्शन में धर्माध्यक्षों, प्राचीनों (आयु के विषय में) और लोगों द्वारा परोक्ष रूप से। 4. किस रीति से—अर्थात् हाथ रखने के द्वारा, जिसका उपयोग त्रिविध है। 1. ताकि कार्य की गरिमा प्रकट हो। 2. ताकि जो बुलाया गया है वह जाने कि वह परमेश्वर के लिए प्रतिष्ठित किया गया है। 3. ताकि वह विश्वास करे कि पवित्र आत्मा इस पवित्र सेवकाई में कमी न रहने देगा।
73. कलीसिया में पासबानों का कर्तव्य है वचन का प्रचार करना, संस्कारों का प्रबन्ध करना, अनुशासन का प्रयोग करना।
74. प्राचीन कलीसिया की व्यवस्था प्रेस्बिटरों, प्राचीनों और सेवकों (डीकनों) में विभाजित थी; सेवक कलीसिया की सम्पत्ति को धर्माध्यक्षों, पादरी-वर्ग, निर्धनों और पवित्र भवनों की मरम्मत के लिए बाँटते थे।
75. कलीसिया के अधिकार पर सिद्धान्त, विधि-निर्माण और न्यायाधिकार के सम्बन्ध में विचार करना चाहिए।
76. उसका सिद्धान्त आदेशों या विश्वास के बिन्दुओं से सम्बन्ध रखता है, जिनमें से कोई आदेश परमेश्वर के वचन से बाहर नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि सब का सम्बन्ध परमेश्वर की महिमा और कलीसिया की उन्नति से होना चाहिए। वह आदेशों के प्रयोग से भी सम्बन्ध रखता है, जिसे विश्वास के अनुपात से मेल खाना चाहिए।
77. कलीसिया की व्यवस्थाएँ, आवश्यक पालन की आज्ञाओं के विषय में, परमेश्वर के लिखित वचन के अनुरूप होनी चाहिए। उदासीन विषयों में स्थानों, व्यक्तियों और समयों का ध्यान रखना चाहिए—क्रम और शोभा के पालन के साथ। परन्तु उन विधानों से बचना चाहिए जो झूठे पासबानों द्वारा परमेश्वर की सच्ची आराधना के स्थान पर दिए जाते हैं; जो संकीर्ण अनिवार्यता से विवेक को कसते हैं; जो परमेश्वर के वचन को निष्प्रभावी कर देते हैं; जो व्यर्थ और असंगत हैं; जो अपनी संख्या से विवेक को दबाते हैं; जो नाटकीय प्रदर्शन लाते हैं; जो प्रायश्चित के बलिदानों के रूप में मूल्यवान माने जाते हैं; जो लाभ में बदल दिए जाते हैं।
78. कलीसिया का न्यायाधिकार दो प्रकार का है। 1. वह न्यायाधिकार जो पादरी-वर्ग के लिए नियत है, जो प्रान्तीय और सार्वभौमिक सभाओं में कार्यरूप लेता है। 2. वह न्यायाधिकार जो पादरी-वर्ग और लोकजन दोनों को प्रभावित करता है, जिसका उद्देश्य द्विविध है—कि अपराध रोके जाएँ, और जो अपराध उठ खड़ा हुआ है उसे दबाया जाए। कार्यपालक न्यायाधिकार निजी और सार्वजनिक चेतावनियों में है; और सहभागिता से निष्कासन में भी, जिसका लक्ष्य त्रिविध है। 1. कि कलीसिया की बुराई न की जाए। 2. कि भले लोग बुरों की संगति से भ्रष्ट न हों। 3. कि निष्कासित व्यक्ति लज्जा के बोध से पश्चाताप में प्रवेश करे।
79. उसी न्यायाधिकार से कुछ समयों के सम्बन्ध में उपवास ठहराए जाते हैं, और मन्नतें मानी जाती हैं। उपवासों का उद्देश्य है कि शरीर दुखी किया जाए; कि हम प्रार्थना के लिए अच्छी तरह व्यवस्थित हों; कि वे नम्रता और आज्ञाकारिता के प्रमाण हों।
वे भोजन लेने के समय, उसके गुण और मात्रा में होते हैं। यहाँ हमें सावधान रहना चाहिए कि कपटियों के समान हम केवल अपने वस्त्र न फाड़ें और हृदय न फाड़ें; कि किए जाने पर वे पुण्य-कर्म न गिने जाएँ; कि वे बहुत कठोरता से, मानो उद्धार के लिए आवश्यक हों, वसूल न किए जाएँ।
80. मन्नत मानने में मन में तौलना चाहिए: 1. मन्नत किससे मानी जाती है—अर्थात् परमेश्वर से; इससे यह निकलता है कि उसके वचन के आगे-आगे चले बिना कुछ भी प्रयत्न नहीं करना चाहिए, जिससे हमें सिखाया जाता है कि परमेश्वर को क्या प्रिय या अप्रिय हो सकता है। 2. मन्नत कौन मानता है—अर्थात् मनुष्य। इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि हम अपनी स्वतंत्रता की उपेक्षा न करें; कि हम ऐसी कोई प्रतिज्ञा न करें जो हमारे बल से ऊपर हो, या जो हमारी बुलाहट से लड़ती हो। 3. क्या मन्नत मानी जा सकती है। यहाँ समय का कुछ विचार होना चाहिए—बीते समय का भी: धन्यवाद और पश्चाताप की हमारी मन्नत क्या है?—और आनेवाले समय का भी: कि आगे हम अधिक सावधान हों, और इन प्रेरणाओं से अपने कर्तव्य के लिए उभारे जाएँ। इससे स्पष्ट है कि पोप-समर्थक मन्नतों के विषय में क्या सोचना चाहिए।
81. संस्कारों की व्याख्या में तीन बातों पर विचार करना चाहिए। 1. अर्थात् वह बाहरी चिह्न क्या है, जिससे परमेश्वर हमारे विश्वास की निर्बलता को थामने के लिए, हमारे प्रति प्रेमपूर्ण दया की प्रतिज्ञाओं पर गवाह के रूप में मुहर लगाता है। हम भी, अपनी ओर से, उसके प्रति अपनी भक्ति की गवाही देते हैं। 2. कौन-सी बातें आवश्यक हैं—अर्थात्: चिह्न, चिह्नित विषय, प्रतिज्ञा, सामान्य सहभागिता। 3. संस्कार संख्या में कितने हैं—अर्थात्: बपतिस्मा, और (प्रभु-) भोज।
82. बपतिस्मे का चिह्न जल है; चिह्नित विषय मसीह का लहू है; प्रतिज्ञा अनन्त जीवन है। सहभागी या भागी, विश्वास का अंगीकार करने के बाद, वयस्क व्यक्ति हैं। वयस्कों के समान शिशु भी भागी हैं, क्योंकि बपतिस्मा खतने के स्थान पर आया है, और दोनों में भेद, प्रतिज्ञा, उपयोग और प्रभावशीलता एक ही हैं। पापों की क्षमा शिशुओं के लिए भी है; इसलिए इस क्षमा का “चिह्न” उनके लिए है।
83. बपतिस्मे के दो उद्देश्य हैं। 1. कि वह परमेश्वर के प्रति हमारे विश्वास की सेवा करे, क्योंकि वह मसीह के लहू के द्वारा हमारे धुलने का चिह्न है; हमारे शरीर को मार डालने का और मसीह में उसके फिर से जन्मने का भी; इसके अतिरिक्त, मसीह के साथ जुड़े होकर हम विश्वास करते हैं कि हम उसकी सब भली वस्तुओं के भागी होंगे, और हमारे लिए कोई दण्डाज्ञा न होगी। 2. कि वह हमारे पड़ोसी के सम्बन्ध में अंगीकार की सेवा करे। क्योंकि वह इस बात का चिह्न है कि हम परमेश्वर की सन्तान में गिने जाना चाहते हैं। हम इसका भी प्रमाण देते हैं कि हम मसीह के धर्म का अंगीकार करते हैं, और चाहते हैं कि हमारे सब अपने लोग परमेश्वर की स्तुति की साँस लें।
84. (प्रभु-) भोज एक आत्मिक भोज है, जिसके द्वारा हम उस जीवन में सुरक्षित रखे जाते हैं जिसके लिए परमेश्वर ने अपने ही वचन से हमें जन्म दिया है।
85. भोज का उद्देश्य त्रिविध है। 1. कि वह परमेश्वर के प्रति हमारे विश्वास को दृढ़ करने में सहायक हो। 2. मनुष्यों के सामने हमारे अंगीकार करने में। 3. परस्पर प्रेम के उपदेश में।
86. सावधानी रखनी चाहिए कि चिह्नों का बहुत कम मूल्य आँकने में हम उन्हें उनके अपने भेदों से—जिनसे वे एक रीति से बँधे हैं—बहुत अधिक न छीन लें; और यह भी, कि चिह्नों को सीमा से बाहर ऊँचा उठाने में हम भेदों को ही तुच्छ न बना दें।
87. (प्रभु-) भोज के दो भाग हैं। 1. आत्मिक सत्य, जिसमें प्रतिज्ञाओं में उसके अर्थ पर विचार करना चाहिए; विषय-वस्तु पर भी—मसीह, जो मरा और फिर जी उठा; और प्रभाव पर—अर्थात् हमारा छुटकारा और धर्मी ठहराया जाना। 2. दिखाई देनेवाले चिह्न—रोटी और दाखरस।
88. पोप-समर्थक मिस्सा (प्रभु-) भोज के विरुद्ध है। 1. वह मसीह के साथ अपमान का व्यवहार करता है। 2. वह उसके क्रूस को गाड़ देता है। 3. वह उसकी मृत्यु को रद्द कर देता है। 4. वह उन आशीषों को छीन लेता है जो हम मसीह में पाते हैं। 5. वह उन संस्कारों को निर्बल कर देता है जिनमें उसकी मृत्यु का स्मरण छोड़ा गया है।
89. निम्नलिखित झूठे रूप में संस्कार गिने जाते हैं: दृढ़ीकरण (कन्फ़र्मेशन), प्रायश्चित-संस्कार, अन्तिम अभिषेक, नियुक्ति (ऑर्डिनेशन)—जिसने बड़े या छोटे “पदों” को जन्म दिया है—और विवाह।
90. एक नागरिक शासन शेष रहता है, जो आचरण की बाहरी धार्मिकता से सम्बन्ध रखता है।
91. यहाँ विचार करना चाहिए: शासक-पद, व्यवस्थाएँ, जन-साधारण।
92. शासक परमेश्वर का स्थान रखता है; वह अपने देश का पिता है, व्यवस्थाओं का रक्षक है, न्याय-प्रबन्ध पर अध्यक्षता करता है, कलीसिया का पोषण करता है।
93. इन नामों से वह अपने कर्तव्य के लिए उभारा जाता है। 1. कि वह परमेश्वर के सामने पवित्रता से चले, और मनुष्यों के सामने सत्यनिष्ठा, विवेक, संयम, निर्दोषता और धार्मिकता प्रदर्शित करे। 2. कि विशेष सान्त्वना से वह अपने पद की कठिनाइयों को शान्त करे।
94. शासक-पद या नागरिक शासन के विशिष्ट रूप हैं: राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र, लोकतन्त्र।
95. व्यवस्थाओं के विषय में हमें परमेश्वर और मनुष्य के स्वभाव को ध्यान में रखकर भली-भाँति तौलना चाहिए कि उनकी रचना कैसी हो; फिर समयों, स्थानों और जातियों पर ध्यान देकर उनका न्यायसंगत प्रयोग।
96. लोग शासक-पद के ऋणी हैं: 1. परमेश्वर के दूत के रूप में श्रद्धा के, और वह भी मन की निष्कपटता के साथ। 2. आज्ञाकारिता के—चाहे आदेशों को पूरा करने में, या कर देने में, या सार्वजनिक पद और भार उठाने में। 3. स्नेह के, जिसके द्वारा लोग शासकों की समृद्धि को प्रार्थनाओं में परमेश्वर को सौंप सकते हैं।
97. हमें आज्ञा है कि हम केवल अच्छे शासकों की ही नहीं, बल्कि उन सब की आज्ञा मानें जो अधिकार में हैं—चाहे वे अत्याचार ही करें; क्योंकि वे परमेश्वर के आदेश के बिना अगुवे नियुक्त नहीं किए गए।
98. इसके अतिरिक्त, जब अत्याचारी शासन करते हैं, तो पहले हमारे पापों का स्मरण आ सकता है, जो ऐसे कोड़ों से दण्डित किए जाते हैं। इससे आत्मा की दीनता हमारी अधीरता पर लगाम लगाएगी; और यह निष्कर्ष भी कि ऐसी बुराइयों का उपचार करना हमारा क्षेत्र नहीं है। केवल यही शेष रहता है कि हम परमेश्वर से सहायता की याचना करें, जिसके हाथ में राजाओं के हृदय और झुकाव हैं।
99. तथापि, परमेश्वर अत्याचारियों के प्रकोप को दो रीतियों से रोकता है: या तो अपने कुछ सेवकों को प्रकट प्रतिशोधकों के रूप में उभारकर, जो लोगों को अत्याचार से छुड़ाएँ; या, किसी और योजना को सोचने और उसका षड्यन्त्र रचनेवाले लोगों के क्रोध को उसी लक्ष्य की ओर निर्देशित करके—इस प्रकार एक अत्याचार को दूसरे अत्याचार से उलटकर।
100. विशेष व्यक्तियों के लिए अब ठहराई गई आज्ञाकारिता इस बात में बाधा नहीं कि ऐसे जन-शासक हो सकते हैं जिनका क्षेत्र अत्याचारियों को रोकना और लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करना हो। परन्तु शासकों की आज्ञाकारिता इस शर्त के साथ की जानी चाहिए: “कि सर्वोच्च राजा का उचित अधिकार पूर्ण और अछूता रहे।”
