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एक सौ सूत्र — पहली पुस्तक
जॉन कैल्विन के एक सौ सूत्र
1. मनुष्य की सच्ची बुद्धि सृष्टिकर्ता और छुड़ानेवाले परमेश्वर के ज्ञान में स्थित है।
2. यह ज्ञान स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर रोपा गया है, और इसका परिणाम परमेश्वर की सही ढंग से व्यवस्थित आराधना होना चाहिए—अर्थात् भय और प्रेम से युक्त ईश्वर-भक्ति।
3. परन्तु यह बीज अज्ञान से भ्रष्ट हो जाता है, जिससे अन्धविश्वासी आराधना उत्पन्न होती है; और दुष्टता से भी, जिससे दासवत् भय और परमेश्वर से घृणा निकलते हैं।
4. परमेश्वर का ज्ञान अन्य स्रोतों से भी प्राप्त होता है—अर्थात् सृष्टि की रचना से, और पवित्रशास्त्र से।
5. सृष्टि की रचना सिखाती है कि परमेश्वर की भलाई, सामर्थ्य, न्याय और बुद्धि किस प्रकार की हैं—स्वर्ग और पृथ्वी की वस्तुओं को रचने में, और साधारण तथा असाधारण शासन द्वारा उन्हें सुरक्षित रखने में, जिसमें उसका विधान स्पष्ट रूप से जाना जाता है। वही रचना हमें हमारी दरिद्रता की मात्रा सिखाती है, ताकि हम अपना भरोसा परमेश्वर की भलाई, सामर्थ्य और बुद्धि पर रखना सीखें; उसकी आज्ञाओं का पालन करना; विपत्तियों में उसे अपना शरणस्थान बनाना; जो वरदान हमारे पास हैं उन्हें उसी के नाम करना, और धन्यवाद के साथ उन्हें ग्रहण करना।
6. सृष्टिकर्ता परमेश्वर पवित्रशास्त्र से भी जाना जाता है, जिसके मूल गुणों पर विचार करना चाहिए—अर्थात् कि वह सत्य है, और पवित्र आत्मा से निकला है; ये तथ्य पवित्र आत्मा की गवाही से, पवित्रशास्त्र की व्यावहारिक शक्ति और प्राचीनता से, भविष्यद्वाणी की निश्चयता से, व्यवस्था के अद्भुत संरक्षण से, प्रेरितों की बुलाहट और लेखों से, कलीसिया की सहमति से, और शहीदों की दृढ़ता से सिद्ध होते हैं। इससे स्पष्ट है कि वे उन्मादी लोग भक्ति के सब सिद्धान्तों को उलट देते हैं, जो पवित्रशास्त्र को कम मानकर “प्रकाशनों” की ओर उड़ जाते हैं।
7. विचार करना चाहिए कि पवित्रशास्त्र क्या सिखाता है—अर्थात् परमेश्वर का स्वभाव अपने में क्या है, और वस्तुओं की सृष्टि और शासन में क्या है।
8. परमेश्वर का स्वभाव अनन्त, अदृश्य, सनातन, सर्वशक्तिमान है; इससे यह निकलता है कि जो परमेश्वर को दृश्य रूप देते हैं, वे भ्रम में हैं। परमेश्वर का स्वभाव एक ही तत्व का भी है, जिसमें तीन व्यक्ति हैं—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।
9. वस्तुओं की सृष्टि में हमें विशेष रूप से स्वर्गीय और आत्मिक अस्तित्वों पर विचार करना चाहिए; अर्थात्, पहला, स्वर्गदूत—जिनमें से कुछ भले हैं और भक्तों के रक्षक; अन्य बुरे हैं—ऐसे रचे गए नहीं, बल्कि भ्रष्ट हो गए; दूसरा, पार्थिव अस्तित्व, विशेषकर मनुष्य, जिसकी पूर्णता उसकी आत्मा और शरीर में चमकती है।
10. परमेश्वर का स्वभाव वस्तुओं के शासन में दो प्रकार से प्रकट होता है। एक सर्वव्यापी शासन है, जिसके द्वारा परमेश्वर सब प्राणियों को उस गुण के अनुसार चलाता है, जो उसने सृष्टि के समय उदारता से हर एक को बाँटा।
11. एक विशेष शासन भी है, जो घटनाओं के अर्थ में देखा जाता है—अर्थात्, यदि कोई व्यक्ति विपत्ति या समृद्धि का भागी हो, तो उसका कर्तव्य है कि वह उसे पूरी तरह परमेश्वर के नाम करे। इसी प्रकार, प्रकृति की स्थापित व्यवस्था के कारण कार्य करनेवाली वस्तुओं के क्रम में भी—जिन वस्तुओं में यद्यपि स्वाभाविक रूप से हर एक का विशेष गुण ठहराया गया है, फिर भी वे अपनी सहज शक्ति का प्रयोग उतना ही करती हैं जितना वे परमेश्वर के उपस्थित हाथ से चलाई जाती हैं।
12. ईश्वरीय शासन पर समय की व्यवस्था में—भूत और भविष्य में—भी विचार करना चाहिए। भूतकाल के विषय में: ताकि हम जानें कि सब कुछ परमेश्वर के प्रबन्ध के अनुसार होता है, जो साधारण [साधनों] के द्वारा, या साधारण साधनों के बिना, या साधारण साधनों के विरुद्ध कार्य करता है। इसलिए जो कुछ भी हो, वह भक्तों के लिए भलाई और अधर्मियों के लिए बुराई में परिणत होगा। भविष्य के विषय में वह सिखाता है कि मानवीय विचार-विमर्श का उचित क्षेत्र क्या है, और वैध वस्तुओं का क्या उपयोग किया जा सकता है—फिर भी इस प्रकार कि वह विधान, जिस पर हम टिके हैं, अपने ही साधनों से सुसज्जित रहे।
13. अन्त में, उन फलों के क्रम पर विचार करना चाहिए जो भक्त इसी से बटोरते हैं। क्योंकि हम निश्चय जानते हैं: 1. कि सारी मानवजाति, और विशेष रूप से उसकी अपनी कलीसिया, परमेश्वर की चिन्ता का विषय है। 2. कि परमेश्वर अपने ही संकेत से सब वस्तुओं पर शासन करता है, और अपनी ही बुद्धि से उन्हें चलाता है। 3. कि परमेश्वर के पास भलाई करने की पर्याप्त विशाल सामर्थ्य है, क्योंकि स्वर्ग और पृथ्वी उसके हाथ में हैं; सारी सृष्टि उसकी अधीनता में समर्पित है; भक्त उसकी रक्षा के नीचे विश्राम में हैं; और नारकीय प्राणियों की शक्ति उसके अधिकार से रोक में रखी गई है। कुछ भी संयोग से नहीं होता, यद्यपि कारण छिपे हो सकते हैं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा से होता है; और यह इच्छा जहाँ तक गुप्त है, हम उसकी छानबीन नहीं कर सकते, बल्कि, जैसा व्यवस्था और सुसमाचार में घोषित है, उसे भक्तिपूर्वक पूजते हैं।
