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दूसरी पुस्तक
14. छुड़ानेवाले परमेश्वर का ज्ञान मनुष्य के पतन से, और छुटकारे के द्रव्य-कारण से बटोरा जाता है।
15. मनुष्य के पतन में उसके कर्तव्य और उसकी क्षमता पर विचार करना उचित है।
16. वह परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार रचा गया, अर्थात् वह बुद्धि, न्याय और ईश्वरीय पवित्रता में भागी था; और इसलिए, आत्मा और शरीर में सिद्ध होकर, वह परमेश्वर की आज्ञाओं को पूर्ण रूप से पालन करने का ऋणी था।
17. पतन के तात्कालिक कारण थे शैतान, साँप, हव्वा, निषिद्ध फल। दूरवर्ती कारण थे—अविश्वास, महत्वाकांक्षा, कृतघ्नता, हठ। इससे मनुष्य में परमेश्वर के स्वरूप का मिट जाना हुआ, जो अविश्वासी, अधर्मी और मृत्यु के अधीन हो गया।
18. इसके बाद मनुष्य की क्षमता पर, उसकी आत्मा के सम्बन्ध में और उसके शरीर के सम्बन्ध में भी, विचार करना चाहिए। ईश्वरीय बातों में—अर्थात् परमेश्वर को पहचानने और उसकी सच्ची आराधना में—उसकी आत्मा की समझ छछूँदर से भी अन्धी है। वह न भले कर्मों की योजना बना सकता है, न उन्हें कर सकता है। मानवीय कार्यों में—जैसे उदार कलाओं या यन्त्र-विद्या में—मनुष्य की समझ बहुत मात्रा में धुँधली और परिवर्तनशील है; परन्तु उसकी इच्छा, जहाँ तक वह ईश्वरीय बातों से सम्बन्ध रखती है, केवल उसी की कामना करती है जो बुरा है; और निम्न मानवीय विषयों में वह अस्थिर, भटकती हुई है, और पूरी तरह अपने अधिकार में नहीं।*
19. मनुष्य का शरीर आत्मा की भ्रष्ट लालसाओं के पीछे चलता है, और बहुत-सी दुर्बलताओं के, और अन्ततः मृत्यु के अधीन है।
20. इससे यह निकलता है कि खोए हुए मनुष्य के लिए छुटकारा मध्यस्थ मसीह में खोजा जाना चाहिए; क्योंकि चुने हुए लोगों का पहला लेपालकपन, कलीसिया का संरक्षण, तितर-बितर होने के बाद उसकी बहाली, संकटों से उसका छुटकारा, भक्तों की आशा—ये सदा एक मध्यस्थ के अनुग्रह पर निर्भर रहे। इसलिए व्यवस्था दी गई, जो मसीह के आगमन तक [मनुष्यों के] मनों को प्रतीक्षा में रखे; यह तथ्य बार-बार दोहराई गई मुफ़्त वाचा के स्मरण से, उसकी रीतियों, बलिदानों और शुद्धिकरणों से, लेपालकपन की निरन्तरता से, और याजकपद के अधिकार से स्पष्ट है।
* Nec omnino sui juris.
21. छुटकारे का द्रव्य-कारण मसीह है, जिसमें तीन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए: 1. वह किस रीति से मनुष्यों के सामने प्रस्तुत किया जाए। 2. वह कैसे ग्रहण किया जाए। 3. मनुष्य उसकी संगति [सहभागिता] में कैसे बनाए रखे जाएँ।
22. मसीह व्यवस्था और सुसमाचार के द्वारा मनुष्य के सामने प्रस्तुत किया जाता है।
23. व्यवस्था तीन प्रकार की है: रीति-सम्बन्धी, न्याय-सम्बन्धी, नैतिक। रीति-सम्बन्धी व्यवस्था का उपयोग समाप्त कर दिया गया है, परन्तु उसका परिणाम सदा बना रहता है। न्याय-सम्बन्धी, या नागरिक व्यवस्था यहूदियों के लिए विशेष थी और हटा दी गई है; परन्तु नैतिक व्यवस्था में वर्णित न्याय के सार्वभौमिक सिद्धान्त बने रहते हैं। यह नैतिक व्यवस्था, जो भक्ति और न्याय के पोषण और संरक्षण से सम्बन्ध रखती है, सनातन है, और सारी मानवजाति के लिए उपयुक्त है।
24. नैतिक व्यवस्था का उपयोग तीन प्रकार का है। पहला, वह हमारी असमर्थता, अधर्म और दण्डाज्ञा को दिखाती है—इसलिए नहीं कि हम निराश हों, बल्कि इसलिए कि हम मसीह की शरण लें। दूसरा, ताकि जो प्रतिज्ञाओं से नहीं हिलते, वे धमकियों के भय से रोके जाएँ। तीसरा, ताकि हम जानें कि परमेश्वर की इच्छा क्या है; ताकि हम आज्ञाकारिता के लिए उस पर मनन करें; ताकि इस बिन्दु पर हमारे मन दृढ़ किए जाएँ; ताकि हम फिसलन से हटाए जाएँ।
25. व्यवस्था का सार उसकी प्रस्तावना में और दो पटियाओं में निहित है। प्रस्तावना में सूचित किया गया है: 1. परमेश्वर की सामर्थ्य, ताकि वह लोगों को आज्ञाकारिता की अनिवार्यता से दृढ़ता से बाँधे। 2. अनुग्रह की प्रतिज्ञा, जिसके द्वारा वह अपने को कलीसिया का परमेश्वर घोषित करता है। 3. एक उपकार, जिसके द्वारा परमेश्वर यहूदियों को कृतघ्नता का दोषी ठहराता है, यदि वे उसकी दया का प्रत्युत्तर न दें।
26. पहली पटिया, जो परमेश्वर की आराधना से सम्बन्ध रखती है, चार आज्ञाओं में पूर्ण है।
27. पहली आज्ञा का उद्देश्य यह है कि अपने लोगों की दृष्टि में केवल परमेश्वर की ही प्रधानता हो; इसलिए केवल परमेश्वर के ही हम आराधना, भरोसा, प्रार्थना-अर्पण और धन्यवाद के ऋणी हैं।
28. दूसरी आज्ञा का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर नहीं चाहता कि उसकी आराधना अन्धविश्वासी रीति से अपवित्र की जाए। यह आज्ञा दो भागों की है। एक भाग हमारी ओर से अति-स्वतंत्रता को रोकता है, ताकि हम परमेश्वर को इन्द्रियों की समझ के अधीन न करें, और न किसी रूप से उसका प्रतिनिधित्व करें। दूसरा भाग धर्म के बहाने किसी भी मूर्ति की आराधना करने से मना करता है; इसलिए यह परमेश्वर की सामर्थ्य को सामने रखता है, जिसका तिरस्कार वह सहन नहीं करेगा; उसकी जलन को भी, क्योंकि वह किसी साथी को स्वीकार नहीं करेगा; सन्तान की सन्तान पर उसके प्रतिफल को; और अपने प्रताप के आराधकों पर उसकी दया को।
29. तीसरी आज्ञा तीन बातों की आज्ञा देती है। 1. कि मन का हर विचार, या जीभ का हर उच्चारण, परमेश्वर के प्रताप का सम्मान करे। 2. कि हम महत्वाकांक्षी या लोभी उद्देश्यों के लिए उसके पवित्र वचन और पवित्र भेदों का दुस्साहस से दुरुपयोग न करें। 3. कि हम परमेश्वर के कार्यों की निन्दा न करें, बल्कि उसकी बुद्धि, सामर्थ्य, भलाई और न्याय की स्तुति के साथ उनका प्रचार करें। इन सब के विरुद्ध है परमेश्वर के नाम की वह त्रिविध अपवित्रता—झूठी शपथ से, अनावश्यक शपथ खाने से, और मूर्तिपूजा से भी, अर्थात् जब परमेश्वर के स्थान पर हम सन्तों को, या सजीव और निर्जीव प्राणियों को, रखते हैं।
30. चौथी आज्ञा का उद्देश्य यह है कि हम, अपनी निजी भावनाओं और दैनिक कार्यों के विषय में मरे हुए होकर, परमेश्वर के राज्य पर मनन करें। इससे तीन विचार उत्पन्न होते हैं:— 1. एक आत्मिक विश्राम, जब विश्वासी अपने सामान्य कार्यों से अवकाश लेते हैं, ताकि परमेश्वर उनमें कार्य करे। 2. कि परमेश्वर का नाम लेने, उसका वचन सुनने और पवित्र रीतियों के निष्पादन के लिए एक नियत दिन हो। 3. कि दासों को काम से कुछ विराम मिले।
31. दूसरी पटिया में अपने पड़ोसी के प्रति प्रेमपूर्ण दया के कर्तव्यों के विषय में निम्नलिखित छह व्यवस्थाएँ हैं। पाँचवीं आज्ञा का तात्पर्य यह है कि क्योंकि परमेश्वर की अपनी पद्धति का पालन उसे प्रिय है, इसलिए उसके द्वारा ठहराए गए पद के क्रम अलंघनीय हैं। इसलिए हमें मना है कि हम तिरस्कार, हठ या कृतघ्नता से ऊपरवालों की गरिमा को घटाएँ; हाँ, बल्कि हमें उनके साथ श्रद्धा, आज्ञाकारिता और कृतज्ञता का व्यवहार करना चाहिए।
32. छठी आज्ञा का तात्पर्य यह है कि जैसे परमेश्वर ने मानवजाति को एक निश्चित एकता से बाँध रखा है, वैसे ही सामान्य सुरक्षा कर्तव्य के रूप में हर व्यक्ति को सौंपी गई है; इससे यह निकलता है कि हर एक के लिए अलग-अलग हिंसा निषिद्ध है और परोपकार की आज्ञा है।
33. सातवीं आज्ञा का उद्देश्य यह है कि, क्योंकि परमेश्वर शुद्धता को प्रेम करता है, इसलिए यह कर्तव्य है कि सब अशुद्धता हमसे दूर की जाए; इसलिए कामुकता—विचार, वचन या कर्म में—उसके द्वारा निषिद्ध है।
34. आठवीं आज्ञा का उद्देश्य यह है कि क्योंकि अन्याय परमेश्वर के सामने घृणित है, इसलिए वह चाहता है कि हर एक को उसका अपना मिले। परन्तु मनुष्य हिंसा, दुर्भावपूर्ण छल, धूर्तता, प्रलोभनों और अन्य साधनों से ठगते हैं।
35. नौवीं आज्ञा का तात्पर्य इस प्रकार है। क्योंकि परमेश्वर, जो सत्य है, झूठ से घृणा करता ही है, इसलिए वह मिथ्या-दोषारोपण और झूठे आरोपों से मना करता है, जिनसे पड़ोसी के भले नाम को हानि होती है; और झूठे कथनों से भी, जिनसे कोई अपनी सांसारिक सम्पत्ति के विषय में दबाया जाता है। दूसरी ओर, परमेश्वर चाहता है कि सत्य को बनाए रखकर हममें से हर व्यक्ति अपने पड़ोसी की प्रतिष्ठा और सम्पत्ति की सम्पूर्णता की रक्षा करे।
36. दसवीं आज्ञा का तात्पर्य यह है कि क्योंकि परमेश्वर की इच्छा है कि सारी आत्मा “प्रेम” की भावना से अधिकृत हो, इसलिए सब लालच, जो प्रेमपूर्ण दया का विरोधी है, मन से निकाला जाना चाहिए; फलस्वरूप, हर प्रकार की ऐसी लालसा, जो दूसरे की हानि की ओर झुकती है, निषिद्ध है।
37. हमने कहा है कि मसीह सुसमाचार के द्वारा हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है। सबसे पहले, सुसमाचार—या नए नियम—की शिक्षा की पुराने नियम के साथ संगति निम्न कारणों से दिखाई जाती है। 1. क्योंकि दोनों वाचाओं के अधीन भक्त लोगों के लिए अमरता की एक ही आशा हो सकती है, और रही होगी। यही वाचा मनुष्यों के कर्मों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया पर स्थापित है। परमेश्वर और मनुष्य के बीच एक ही मध्यस्थ है—मसीह।
38. इससे दोनों वाचाओं के बीच का भेद प्रकट होता है, जो पाँच बातों में है। 1. व्यवस्था के अधीन स्वर्गीय विरासत पार्थिव वस्तुओं के नीचे दिखाई गई; सुसमाचार के अधीन हमारे मन उसकी ओर सीधे निर्देशित किए जाते हैं। 2. पुरानी वाचा ने, प्रतीकों के नीचे, केवल एक प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया—सत्य स्वयं अनुपस्थित था; नई वाचा वास्तव में उपस्थित सत्य को प्रदर्शित करती है। 3. पुरानी, व्यवस्था के कारण, दण्डाज्ञा और मृत्यु की सेवकाई थी; नई न्याय और जीवन की पद्धति है। 4. पुरानी दासता की स्थिति थी, जो मन में भय उत्पन्न करने की ओर झुकती थी; नई स्वतंत्रता की व्यवस्था है, जो मन को भरोसे तक उठा सकती है। 5. वचन केवल यहूदियों के लिए नियत था; अब यह सब जातियों में प्रचार किया जाता है।
39. सुसमाचार की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य यह सिखाना है— 1. मसीह किस प्रकार के स्वभाव का है। 2. वह किस उद्देश्य से भेजा गया। 3. उसने छुटकारे के विभिन्न भागों को कैसे पूरा किया।
40. मसीह परमेश्वर और मनुष्य है। परमेश्वर—ताकि वह अपने लोगों को दान के रूप में धार्मिकता, पवित्रीकरण और छुटकारा प्रदान करे। मनुष्य—क्योंकि उसे मनुष्य का ऋण चुकाना था।
41. मसीह एक कार्य को निष्पादित करने के लिए भेजा गया— 1. भविष्यद्वक्ता का—सत्य का प्रचार करने में, भविष्यद्वाणी पूरी करने में, परमेश्वर की इच्छा को करने और सिखाने में। 2. राजा का—सारी कलीसिया और उसके हर सदस्य पर शासन करने में, और शत्रुओं की हर हानि से अपने लोगों की रक्षा करने में। 3. याजक का—पापों के लिए अपना शरीर अर्पित करने में, अपनी आज्ञाकारिता से परमेश्वर का हमसे मेल कराने में, और पिता परमेश्वर से प्रार्थनाओं द्वारा अपने लोगों के लिए सदा मध्यस्थता करने में।
42. मसीह ने छुड़ानेवाले के सब भागों को पूरा किया है—हमारे पापों के लिए मरने में, हमें धर्मी ठहराने के लिए फिर जी उठने में, अपने स्वर्गारोहण के द्वारा हमारे लिए स्वर्ग खोलने में, पिता की दाहिनी ओर बैठने में—जहाँ से वह जीवितों और मरे हुओं का न्याय करने आनेवाला है। इसलिए उसने हमारे लिए परमेश्वर का अनुग्रह और उद्धार भली-भाँति अर्जित किया है।
