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अपने में बहुत-सी उत्तम शिक्षाएँ रखता है, जैसा कि अब तक माना जाता रहा है। क्योंकि वह हमें ऐसे कर्म करने की आज्ञा नहीं देता जिनके द्वारा हम धर्मी बन सकें, वरन् हमें परमेश्वर के उस अनुग्रह का प्रचार करता है जो सेंत-मेंत और हमारे अपने किसी भी पुण्य के बिना दिया गया है; और वह बताता है कि मसीह ने कैसे हमारा स्थान ले लिया, और हमारे पापों के लिए प्रायश्चित्त किया, और उन्हें मिटा दिया, और अपने ही कामों के द्वारा हमें धर्मी ठहराता और हमारा उद्धार करता है।
जो कोई प्रचार करके या लिखकर इसे प्रस्तुत करता है, _वही_ सच्चा सुसमाचार सिखाता है, जैसा कि सब प्रेरितों ने किया, विशेषकर संत पौलुस और संत
पतरस ने, अपनी पत्रियों में। अतः जो कुछ भी मसीह को प्रस्तुत करता है, चाहे वह कुछ भी हो, वह एक ही और वही सुसमाचार है, यद्यपि कोई दूसरी रीति अपना सकता है और दूसरे से भिन्न भाषा में उसके विषय में बोल सकता है; क्योंकि वह संक्षिप्त या विस्तृत उपदेश हो सकता है, अथवा संक्षिप्त या विस्तृत लेख। परन्तु फिर भी यदि वह इस बात की ओर ले जाता है कि मसीह हमारा उद्धारकर्ता है, और हम उस पर विश्वास के द्वारा, अपने कर्मों के बिना, धर्मी ठहराए जाते और उद्धार पाते हैं, तो वह फिर भी वही वचन है, और केवल एक ही
सुसमाचार है, ठीक वैसे ही जैसे सारे मसीही जगत में केवल एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा है।
इसी प्रकार एक प्रेरित ने भी वही [सुसमाचार] लिखा है जो दूसरे के लेखों में पाया जाता है; परन्तु जो इस बात पर सबसे अधिक और सबसे ज़ोर देकर बल देते हैं कि केवल मसीह पर विश्वास ही धर्मी ठहराता है, वे ही सबसे अच्छे सुसमाचार-प्रचारक हैं। इसलिए संत पौलुस की पत्रियाँ मत्ती, मरकुस और लूका से बढ़कर सुसमाचार हैं, क्योंकि ये तीनों मसीह के कामों और आश्चर्यकर्मों के इतिहास से थोड़ा ही अधिक देते हैं; परन्तु उस अनुग्रह के विषय में जो हमें मसीह के द्वारा मिलता है, कोई भी संत पौलुस के समान ज़ोर देकर नहीं लिखता, विशेषकर रोमियों के नाम उसकी पत्री में। और फिर भी, क्योंकि मसीह के कामों और करतूतों की अपेक्षा उसके वचन का कहीं अधिक महत्व है, और यदि हमें दोनों में से एक से वंचित होना पड़े तो यह अच्छा होगा कि हम वचन और शिक्षा के बिना रहने की अपेक्षा कामों और इतिहास के बिना रहें; इसलिए वे पुस्तकें सबसे अधिक आदर के योग्य हैं जो प्रभु मसीह की शिक्षा और वचनों का सबसे विस्तार से वर्णन करती हैं; क्योंकि यदि मसीह के आश्चर्यकर्म कभी हुए ही न होते, और हमें उनका कोई ज्ञान न होता, तब भी _वचन_ में हमारे लिए पर्याप्त होता, जिसके बिना हम जीवन नहीं पा सकते थे।
इस प्रकार संत पतरस की यह पत्री नये नियम की सबसे श्रेष्ठ पुस्तकों में से एक है, और सचमुच शुद्ध सुसमाचार रखती है; क्योंकि वह विश्वास की सच्ची शिक्षा को मन में बैठाने में वही मार्ग अपनाता है जो संत पौलुस और सब सुसमाचार-प्रचारकों ने अपनाया,--अर्थात् यह कि मसीह हमें दिया गया है, जो हमारे पाप को दूर करता और हमारा उद्धार करता है, जैसा कि हम सुनेंगे।
इसलिए तुम सब पुस्तकों और शिक्षाओं को परख सकते हो कि क्या सुसमाचार है और क्या नहीं; क्योंकि जो इस रीति से प्रस्तुत नहीं किया गया या लिखा नहीं गया, उसे तुम निःसंकोच झूठा ठहरा सकते हो, चाहे वह देखने में कितना ही उत्तम क्यों न हो। निर्णय करने का यह अधिकार सब मसीहियों के पास है,--न कि पोप या महासभाओं के पास, जो डींग मारते हैं कि निर्णय करने का अधिकार केवल उन्हीं के पास है।--इतनी भूमिका और प्रस्तावना पर्याप्त है। अब हम संत पतरस की पहली सामान्य पत्री को सुनें।
पद 1, 2. _पतरस की ओर से, जो यीशु मसीह का प्रेरित है, उन परदेशियों के नाम जो पुन्तुस, गलातिया, कप्पदूकिया, आसिया और बिथुनिया में तितर-बितर होकर रहते हैं, और परमेश्वर पिता के पूर्वज्ञान के अनुसार, आत्मा के पवित्र करने के द्वारा, आज्ञा मानने और यीशु मसीह के लहू के छिड़के जाने के लिए चुने गए हैं।_
यह शीर्षक और अभिवादन है। यहाँ तुम तुरन्त पहचान लेते हो कि यह सुसमाचार है। वह अपने आप को प्रेरित कहता है--अर्थात् ऐसा जन जो कोई सन्देश सुनाने के लिए भेजा गया हो; इसलिए डच [जर्मन] में इसका उचित अनुवाद है, एक सन्देशवाहक, या बारह-सन्देशवाहक,[1] क्योंकि वे बारह थे। परन्तु क्योंकि सामान्यतः यह समझा जाता है कि प्रेरित (यूनानी शब्द) का अर्थ क्या है, इसलिए मैंने इसका अनुवाद डच में नहीं किया है। परन्तु इसका विशेष अर्थ है, वह जो मुँह से कोई सन्देश पहुँचाता है; वह नहीं जो चिट्ठियाँ ढोता है, वरन् एक योग्य मनुष्य जो किसी विषय को मौखिक रूप से प्रस्तुत करता और उसकी पैरवी करता है,--उस वर्ग का जिसे लातीनी में _Oratores_ (वक्ता) कहा जाता है।
सो वह अब यह कहना चाहता है, मैं यीशु मसीह का प्रेरित हूँ,--अर्थात् मुझे यीशु मसीह से आज्ञा मिली है कि मैं मसीह की ओर से प्रचार करूँ।
[पाद-टिप्पणी 1: मूल में _Tswolffbott_ है, जिसके लिए हमारे पास अंग्रेज़ी में कोई समानार्थी शब्द नहीं है।] यहाँ देखो कि मनुष्यों की शिक्षा सिखानेवाले सब लोग कितनी शीघ्रता से बाहर कर दिए जाते हैं। क्योंकि यीशु मसीह का सन्देशवाहक _वही_ है जो वह प्रस्तुत करता है जिसकी आज्ञा मसीह ने दी है; यदि वह इसके अतिरिक्त कुछ और प्रचार करे, तो वह मसीह का सन्देशवाहक नहीं है, और इसलिए उसकी नहीं सुननी चाहिए। परन्तु यदि वह ऐसा करता है, तो यह उतना ही महत्वपूर्ण है मानो तुमने स्वयं मसीह को उपस्थित होकर बोलते सुना हो।
उन परदेशियों के नाम जो तितर-बितर होकर रहते हैं।_ यह पत्री उन देशों को लिखी गई थी जो पहले मसीही थे परन्तु अब तुर्क के अधीन हैं, फिर भी सम्भव है कि आज के दिन भी वहाँ कुछ मसीही पाए जाएँ। पुन्तुस एक बड़ा, विस्तृत प्रदेश है, जो समुद्र के किनारे स्थित है। कप्पदूकिया उसी पड़ोस में है, और उसकी सीमा से लगा है। गलातिया उनके पीछे स्थित है। आसिया और बिथुनिया समुद्र से लगे हैं--पूर्व की ओर फैले हुए--और विस्तृत प्रदेश हैं। पौलुस ने भी गलातिया में और आसिया में प्रचार किया; बिथुनिया में भी किया या नहीं, मैं नहीं जानता। अन्य दो में उसने प्रचार नहीं किया। _परदेशी_ वे हैं जिन्हें हम विदेशी कहते हैं। वह उन्हें ऐसा इसलिए कहता है क्योंकि वे अन्यजाति थे; और यह हमें आश्चर्यचकित करनेवाली बात है कि संत पतरस, यद्यपि वह यहूदियों का प्रेरित था, फिर भी अन्यजातियों को लिखता है। यहूदी इन्हें (जिनकी हम चर्चा कर रहे हैं)
यहूदी-मतधारी (प्रोसेलाइट) कहते थे,--अर्थात् सम्मिलित यहूदी, ऐसे लोग जिन्होंने उनकी व्यवस्था अपना ली थी, परन्तु यहूदी कुल के या अब्राहम के लहू के नहीं थे। इस प्रकार वह उन्हें लिखता है जो पहले अन्यजाति (अन्यजातियों में से) थे, परन्तु अब विश्वास में आ गए थे, और विश्वासी यहूदियों से जुड़ गए थे, और वह उन्हें _चुने हुए परदेशी_ कहता है, जो निश्चय ही मसीही हैं, और केवल उन्हीं को वह लिखता है। यह ध्यान देने योग्य बात है, जैसा कि हम सुनेंगे।
परमेश्वर पिता के पूर्वज्ञान के अनुसार।_ वह कहता है, वे चुने हुए हैं। कैसे? अपने आप से नहीं, वरन् परमेश्वर की इच्छा-योजना के अनुसार: क्योंकि हम न तो अपने आप को स्वर्ग तक उठा सकते हैं, न अपने भीतर विश्वास उत्पन्न कर सकते हैं। परमेश्वर सब मनुष्यों को स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं देगा; जो उसके अपने हैं उन्हें वह पूरी तत्परता से ग्रहण करेगा। स्वतन्त्र इच्छा और हमारी अपनी सामर्थ्य की मानवीय शिक्षा व्यर्थ है। यह बात हमारी इच्छा पर नहीं, वरन् परमेश्वर की इच्छा और चुनाव पर निर्भर है।
आत्मा के पवित्र करने के द्वारा।_ परमेश्वर ने हमें पहले से ठहराया है कि हम पवित्र हों, और इसके अतिरिक्त यह भी कि हम आत्मिक रूप से पवित्र हों।
पवित्र और आत्मिक, ये बहुमूल्य शब्द प्रचारकों के लालच के कारण हमारे लिए बिगाड़ दिए गए हैं, क्योंकि उन्होंने याजकों और भिक्षुओं की दशा को पवित्र और आत्मिक कहा है, और इस प्रकार लज्जाजनक रीति से हमें इन उत्तम, बहुमूल्य शब्दों से वंचित कर दिया है, जैसे कि कलीसिया शब्द से भी, क्योंकि _उनके_ यहाँ पोप और बिशप ही कलीसिया हैं, जबकि वे इस घोषणा के बल पर कि "कलीसिया ने इसे वर्जित किया है," जो कुछ चाहते हैं अपनी ही इच्छा के अनुसार करते हैं। पवित्रता वह नहीं जो भिक्षुओं, याजकों और भिक्षुणियों की दशा में--मुण्डन और चोगा पहनने में--निहित है; यह एक आत्मिक शब्द है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के सामने आत्मा में एक भीतरी पवित्रता है।
और विशेषकर यही कारण है कि उसने यह कहा, ताकि यह दिखाए कि उस पवित्रता को छोड़ जिसे परमेश्वर हमारे भीतर उत्पन्न करता है, और कुछ भी पवित्र नहीं है।
क्योंकि यद्यपि यहूदियों के पास बहुत-सी बाहरी या विधि-संबंधी पवित्रता थी, फिर भी उसमें कोई सच्ची पवित्रता नहीं थी। पतरस यहाँ यह कहना चाहता है, परमेश्वर ने तुम्हें इसी उद्देश्य से पहले से ठहराया है कि तुम सचमुच पवित्र हो; जैसा कि पौलुस भी इफिसियों 4 में कहता है, "धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में"--अर्थात् एक सच्ची और दृढ़ नींव पर टिकी पवित्रता में,--क्योंकि बाहरी पवित्रता, जैसी यहूदियों के पास थी, परमेश्वर के सामने किसी काम की नहीं।
इस प्रकार पवित्रशास्त्र हमें पवित्र कहता है, जबकि हम अभी पृथ्वी पर जीवित हैं, यदि हम विश्वास करते हैं। परन्तु पोप-पक्षियों ने यह नाम हमसे छीन लिया है, और कहते हैं, हमें पवित्र नहीं होना है; केवल स्वर्ग के संत ही पवित्र हैं। इसलिए हमें इस उत्तम नाम को फिर से प्राप्त करने के लिए विवश होना पड़ता है। तुम्हें पवित्र होना ही चाहिए, परन्तु तुम्हें इस बात से भी सावधान रहना चाहिए कि यह कल्पना न करो कि तुम अपने आप से या अपने पुण्य से पवित्र हो, वरन् केवल यह कि तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन है, कि स्वर्ग तुम्हारा है, कि तुम मसीह के द्वारा सचमुच भक्त और पवित्र किए गए हो।
यदि तुम मसीही होना चाहते हो तो तुम्हें यह अंगीकार करना होगा। क्योंकि यह मसीह के नाम का सबसे बड़ा अपमान और निन्दा होगी, यदि हम मसीह के लहू के उस आदर में से कुछ छीन लें जो उसका अधिकार है, कि यही हमारे पापों को धो डालता है, या उस विश्वास में से कि यह लहू हमें पवित्र करता है।
इसलिए यदि तुम पवित्र होना चाहते हो तो तुम्हें विश्वास करना और अंगीकार करना होगा; परन्तु यह इस लहू के द्वारा होना चाहिए, तुम्हारी अपनी उत्तमता के द्वारा नहीं, यहाँ तक कि इसके लिए तुम प्राण और अपना सब कुछ त्याग देने, और जो कुछ तुम पर आ पड़े उसे सहने को तैयार रहो।
आज्ञा मानने और मसीह के लहू के छिड़के जाने के लिए।_ वह कहता है, इसी के द्वारा हम पवित्र किए जाते हैं, यदि हम आज्ञाकारी हों, और मसीह के वचन पर विश्वास करें, और उसके लहू से छिड़के जाएँ। और यहाँ संत पतरस संत पौलुस से कुछ भिन्न रीति से बोलता है। परन्तु सार में यह वही है जो पौलुस कहता है कि हम मसीह पर विश्वास के द्वारा उद्धार पाते हैं; क्योंकि विश्वास हमें मसीह और उसके वचन के प्रति आज्ञाकारी और अधीन बनाता है।
क्योंकि परमेश्वर के वचन और मसीह के वचन को मानना एक ही बात है, और उसके लहू से छिड़का जाना विश्वास करने के समान है। क्योंकि स्वभाव के लिए यह कठिन है, उसके विरुद्ध है, और अत्यन्त नम्र करनेवाला है कि वह मसीह के अधीन हो, अपनी सारी सम्पत्ति त्याग दे, और उसे तुच्छ और पापमय समझे। परन्तु फिर भी उसे अधीनता में लाना ही होगा।
छिड़काव के विषय में भजन _Miserere Domine_ (51) भी कहता है:
"जूफा से मुझ पर छिड़काव कर, तो मैं शुद्ध हो जाऊँगा।" यह मूसा की व्यवस्था की ओर संकेत करता है, जिससे संत पतरस ने इसे लिया है, और जब वह पवित्रशास्त्र को सामने लाता है तो मूसा को हमारी दृष्टि के सामने खोल देता है। जब मूसा ने तम्बू बना लिया, तो उसने बछड़ों का लहू लिया और सारी प्रजा पर छिड़का।
परन्तु _यह_ छिड़काव आत्मा में पवित्र नहीं करता, केवल बाहरी रूप से करता है। इसलिए एक आत्मिक शुद्धि होनी ही चाहिए, क्योंकि बाहरी पवित्रता, और वह जो शरीर से संबंधित है, परमेश्वर के सामने किसी काम की नहीं। और इसलिए परमेश्वर ने इस छिड़काव के द्वारा आत्मिक छिड़काव का पूर्व-चित्रण किया है। मानो पतरस ने कहा हो, जो यहूदी उस बाहरी पवित्रता में थे वे धर्मी और शुद्ध जीवन के लोग माने जाते थे। परन्तु तुम नीच समझे जाते हो, फिर भी तुम्हारे पास एक उत्तम छिड़काव है; तुम आत्मा में छिड़के गए हो, ताकि तुम भीतर से शुद्ध हो जाओ। यहूदियों पर बाहरी रूप से बछड़ों का लहू छिड़का जाता था, परन्तु हम पर भीतर से, विवेक में, छिड़काव होता है, जिससे हृदय शुद्ध और आनन्दित हो जाता है।
इस प्रकार अन्यजाति अब अन्यजाति नहीं रहे। धर्मी यहूदी अपने छिड़काव के साथ अब धर्मी नहीं रहे, वरन् सब कुछ उलट गया है। एक ऐसा छिड़काव होना चाहिए जो हमें बदल दे और हमें आत्मिक मनवाला बना दे।
छिड़काव का प्रचार करना यह प्रचार करना है कि मसीह ने अपना लहू बहाया है, और हमारे लिए अपने पिता के पास ऊपर चढ़ गया है, और यह कहकर बिनती करता है, "प्रिय
पिता! मेरे इस लहू को देख जो मैंने इन पापियों के लिए बहाया है।" यदि तुम इस पर विश्वास करते हो, तो तुम पर छिड़काव हो गया है। इस प्रकार तुम प्रचार करने की सही रीति देखते हो। यदि सब पोप, भिक्षु और याजक अपने प्रचार की सारी सामग्री को गलाकर एक ढेर बना दें, तब भी वे उतना नहीं सिखा और प्रस्तुत कर सकेंगे जितना संत पतरस यहाँ इन थोड़े-से शब्दों में करता है।
इस प्रकार तुम्हारे पास पत्री का अभिवादन है, जिसमें वह अपना पद प्रकट करता है और यह कि वह क्या प्रचार करता है, जैसा कि तुमने अभी सुना। क्योंकि केवल यही सुसमाचार है, और जो कुछ इससे मेल नहीं खाता उसे पाँवों तले रौंद देना चाहिए, और उन सब दूसरी पुस्तकों से बचना चाहिए जिनमें तुम्हें कर्मों और प्रार्थनाओं और पाप-क्षमा-पत्रों का कोई सुन्दर दिखावा मिले, जो ऐसी ही शिक्षा नहीं देतीं, और खुले रूप में इसी पर आधारित नहीं हैं। पोप की सब पुस्तकों में इस आज्ञाकारिता, इस लहू और छिड़काव का एक अक्षर भी नहीं है। अब उन लोगों को अभिवादन आता है जिन्हें वह लिखता है।
और शान्ति बहुतायत से बढ़ती जाए।_ यहाँ संत पतरस प्रेरित पौलुस के अभिवादन की रीति अपनाता है, यद्यपि उतने विस्तार से नहीं, और यह ऐसा है मानो उसने कहा हो, तुम्हारे पास अब शान्ति और अनुग्रह है, परन्तु फिर भी सिद्धता में नहीं; इसलिए तुम्हें उनमें तब तक बढ़ते रहना चाहिए जब तक पुराना आदम मर न जाए। अनुग्रह परमेश्वर की कृपा है, जो अब हममें आरम्भ होती है, परन्तु जिसे मृत्यु तक आगे बढ़ते और बढ़ते रहना चाहिए। जो कोई अंगीकार करता और विश्वास करता है कि उसका परमेश्वर अनुग्रहकारी है, वह इसे पाता है, और उसके हृदय को शान्ति भी मिलती है, और वह न संसार से डरता है न शैतान से; क्योंकि वह जानता है कि परमेश्वर, जो सब वस्तुओं पर अधिकार रखता है, उसका मित्र है, और उसे मृत्यु, नरक और सब बुराई से छुड़ाएगा,--इसलिए उसके विवेक में शान्ति और आनन्द है। विश्वास करनेवालों के लिए संत पतरस की यही कामना है, और यह एक सच्चा मसीही अभिवादन है जिससे सब मसीही एक दूसरे को भली-भाँति नमस्कार कर सकते हैं।
इस प्रकार हमारे पास शीर्षक और अभिवादन है; अब वह आरम्भ करता है पद 3-9. _हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिसने अपनी बड़ी दया से यीशु मसीह के मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा हमें जीवित आशा के लिए नया जन्म दिया, अर्थात् एक अविनाशी और निर्मल और अजर मीरास के लिए, जो तुम्हारे लिए स्वर्ग में रखी है, जिनकी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए होती है जो आनेवाले अन्तिम समय में प्रगट होने को तैयार है, जिसके कारण तुम बहुत आनन्दित होते हो, यद्यपि अब कुछ समय के लिए (यदि आवश्यक हो) नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण तुम उदास हो; ताकि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास नाशवान सोने से (जो आग से परखा जाता है) कहीं अधिक बहुमूल्य होकर यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा, आदर और महिमा का कारण ठहरे, जिसे तुमने नहीं देखा फिर भी उससे प्रेम रखते हो, जिस पर तुम विश्वास करते हो और उसे नहीं देखते, फिर भी अपने विश्वास के कारण ऐसे आनन्दित होते हो जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है, और अपने विश्वास का प्रतिफल, अर्थात् अपनी आत्मा का उद्धार प्राप्त करते हो।_
इस प्रस्तावना में तुम प्रस्तुत विषयों का एक सच्चा प्रेरितीय सम्बोधन और परिचय देखते हो, और जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ, यह एक उत्तम पत्री का आदर्श है। क्योंकि उसने पहले ही दिखा और प्रगट कर दिया है कि मसीह क्या है, और हमने उसके द्वारा क्या प्राप्त किया है, जब वह कहता है कि परमेश्वर ने मसीह के जी उठने के द्वारा हमें जीवित आशा के लिए नया जन्म दिया है।
इस प्रकार सब अच्छी वस्तुएँ हमें पिता की ओर से दी जाती हैं, हमारी किसी योग्यता के कारण नहीं, वरन् शुद्ध दया से। ये सच्चे सुसमाचार के वचन हैं जिनका प्रचार किया जाना चाहिए, परन्तु--परमेश्वर हमें बचाए--इस प्रकार का प्रचार सब प्रकार की पुस्तकों में, उनमें भी जो सबसे अच्छी मानी जाती हैं, कितना कम मिलता है; इस बात पर कितनी कम सहमति है, जैसा कि संत
जेरोम और संत ऑगस्टीन ने लिखा है,--कि यीशु मसीह का प्रचार किया जाना चाहिए, कि वह मरा और फिर जी उठा, और कि वह इसलिए मरा और फिर जी उठा कि ऐसे प्रचार के द्वारा मनुष्य उस पर विश्वास करें और उद्धार पाएँ। यही सच्चे सुसमाचार का प्रचार है। जो कुछ इस रीति से प्रचार नहीं किया जाता वह सुसमाचार नहीं है, चाहे उसे कोई भी करे।
अब इन शब्दों का _summa summarum_ (सारांश का सार) यह है। मसीह अपने जी उठने के द्वारा हमें पिता के पास ले आया है; और इसी प्रकार संत पतरस भी हमें प्रभु मसीह के द्वारा पिता के पास ले आना चाहता है, और वह उसे परमेश्वर और हमारे बीच मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करता है। अब तक हमें यह सिखाया गया है कि हमें संतों को पुकारना चाहिए; कि वे परमेश्वर के सामने हमारे लिए बिनती करनेवाले हैं, और इसके अतिरिक्त हमने अपनी प्रिय कुँवारी की शरण ली है, और उसे मध्यस्थिनी बना दिया है, और मसीह को एक क्रोधित न्यायी समझकर छोड़ दिया है। पवित्रशास्त्र ऐसा नहीं करता; वह इससे आगे बढ़ता है, और ऊँचा उठाता है
मसीह को; यह सिखाते हुए कि वह हमारा मध्यस्थ है, जिसके द्वारा हम पिता के पास आते हैं। ओह! यह एक असीम रूप से विशाल आशीष है जो मसीह के द्वारा हमें दी गई है, कि हम पिता की उपस्थिति में जा सकें और उस मीरास का दावा कर सकें जिसके विषय में संत पतरस यहाँ बोलता है।
ये शब्द उन भावनाओं को भी भली-भाँति प्रगट करते हैं जो प्रेरित के मन में थीं, जब वह गहरी श्रद्धा के साथ पिता की स्तुति करना आरम्भ करता है, और चाहता है कि हम उन असीम धन के कारण जो उसने हमें दिया है उसकी आराधना करें और उसे धन्य कहें, कि उसने हमें नया जन्म दिया है, और वह भी इससे पहले कि हमने उसकी इच्छा की या उसे खोजा हो; ताकि शुद्ध दया को छोड़ और किसी बात की स्तुति न की जाए, जिससे हम किसी कर्म पर घमण्ड न करें, वरन् अंगीकार करें कि जो कुछ हमारे पास है वह हमें परमेश्वर की करुणा से मिला है।
अब पहले के समान व्यवस्था और प्रतिशोध हमारे सामने नहीं है, जब उसने यहूदियों को ऐसा भयभीत किया कि उन्हें भागना पड़ा, और वे पहाड़ की ओर जाने का साहस न कर सके। वह अब हमें न सताता है न ताड़ना देता है, वरन् हम पर सबसे बड़ी मित्रता दिखाता है, हमें नये सिरे से रचता है, और हमें कोई काम या कई काम करने के लिए नियुक्त नहीं करता, वरन् हमारे भीतर एक बिल्कुल नया जन्म और नया अस्तित्व उत्पन्न करता है, कि हम उससे भिन्न कुछ हो जाएँ जो हम पहले थे, जब हम आदम की सन्तान थे,--अर्थात् ऐसे जो आदम की मीरास से निकालकर परमेश्वर की मीरास में रोपे गए हैं; ताकि परमेश्वर हमारा पिता हो, हम उसकी सन्तान हों, और इस प्रकार उन सब अच्छी वस्तुओं के वारिस भी हों जो उसके पास हैं। देखो कि पवित्रशास्त्र इस विषय को कितने बल के साथ प्रस्तुत करता है; जिस विषय से हमारा सम्बन्ध है वह सब जीवित है, व्यर्थ नहीं। क्योंकि हम इस प्रकार परमेश्वर की सन्तान और वारिस होने के लिए नया जन्म पाए हुए हैं, हम आदर और प्रतिष्ठा में संत पौलुस, संत पतरस, हमारी धन्य कुँवारी और सब संतों के बराबर हैं। क्योंकि परमेश्वर की ओर से हमारे पास वह खज़ाना और सब अच्छी वस्तुएँ उतनी ही बहुतायत से हैं जितनी उनके पास; क्योंकि उनके लिए भी नया जन्म पाना उतना ही आवश्यक है जितना हमारे लिए,--इसलिए उनके पास अन्य सब मसीहियों से अधिक कुछ नहीं है।
एक जीवित आशा।_ हम जो पृथ्वी पर जीवित रहते हैं, वह मुख्यतः इसी उद्देश्य से है कि हम दूसरों की सेवा करें। नहीं तो यह अच्छा होता कि परमेश्वर हमारी साँस ले लेता और जैसे ही हमने बपतिस्मा पाया और विश्वास करना आरम्भ किया, हमें मरने देता। परन्तु वह हमें यहाँ इसलिए जीवित रहने देता है कि हम दूसरों को भी विश्वास में ले आएँ, और उनके साथ वैसा ही करें जैसा उसने हमारे साथ किया है। परन्तु जब तक हम पृथ्वी पर रहते हैं, हमें आशा में जीना होगा; क्योंकि यद्यपि हमें निश्चय है कि विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सब अच्छी वस्तुएँ हमारे पास हैं, (क्योंकि विश्वास अपने साथ निश्चय ही नया जन्म, लेपालकपन, मीरास लाता है, और उन्हें तुम्हारा बना देता है,) फिर भी तुम अभी उन्हें देखते नहीं; वरन् यह विषय आशा में बना हुआ है, और यह छोटी-सी बात है कि हम उसे अपनी आँखों से न देख पाएँ। इसे वह _जीवन की आशा_ कहता है; अर्थात् एक इब्रानी मुहावरे के अनुसार, जैसे पापी मनुष्य के लिए हम कहें, पाप का मनुष्य।
हम इसे जीवित आशा कहते हैं; अर्थात् ऐसी आशा जिसमें हम निश्चय ही अनन्त जीवन की बाट जोहते हैं, और उसके विषय में आश्वस्त हो सकते हैं। परन्तु वह छिपा हुआ है, और उस पर परदा डाला गया है, कि हम उसे देख नहीं पाते। उसे केवल हृदय में और विश्वास के द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, जैसा कि संत यूहन्ना अपनी पत्री में लिखता है, 1 यूहन्ना 5:
"अब हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या कुछ होंगे; परन्तु हम जानते हैं कि जब यह प्रगट होगा कि हम उसके समान हैं, तो हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है।" क्योंकि _यह_ जीवन और _वह_ जीवन आपस में मिल नहीं सकते, एक साथ नहीं रह सकते, कि हम खाएँ, पीएँ, सोएँ, जागें, और शरीर के वे दूसरे काम करें जिन्हें यह जीवन आवश्यक बनाता है, और उसी समय हमारा पूरा उद्धार भी हमारे पास हो।
इसलिए जब तक हम मर न जाएँ, और यह वर्तमान जीवन बीत न जाए, हम कभी अनन्त जीवन तक नहीं पहुँच सकते। इस प्रकार जब तक हम यहाँ हैं हमें आशा में स्थिर रहना होगा, जब तक परमेश्वर को यह भला न लगे कि हम उन आशीषों को देखें जो हमारी हैं।
परन्तु हम इस जीवित आशा तक कैसे पहुँचते हैं? वह कहता है, मसीह के मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा। मैंने बार-बार कहा है कि कोई भी मध्यस्थता के बिना परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि हममें से कोई भी परमेश्वर के सामने अपने लिए बात नहीं कर सकता, इसलिए कि हम सब क्रोध की सन्तान हैं; वरन् हमारे पास कोई दूसरा होना चाहिए जिसके द्वारा हम परमेश्वर के सामने आ सकें, जो हमारे लिए बिनती करे और हमें परमेश्वर से मिला दे। परन्तु प्रभु मसीह को छोड़, जो परमेश्वर का पुत्र है, कोई दूसरा मध्यस्थ नहीं है। इसलिए वह सच्चा विश्वास नहीं है जो तुर्कों और यहूदियों का है,--मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को रचा है। ठीक ऐसा ही विश्वास शैतान भी करता है, परन्तु इससे उसे कोई लाभ नहीं। वे मसीह को मध्यस्थ बनाए बिना परमेश्वर के सामने उपस्थित होने का साहस करते हैं। इसलिए संत पौलुस रोमियों के पाँचवें अध्याय में कहता है, "विश्वास के द्वारा हमारी परमेश्वर तक पहुँच है, अपने द्वारा नहीं, वरन् मसीह के द्वारा।" इसलिए हमें मसीह को अपने साथ लाना होगा, उसके साथ आना होगा, उसके द्वारा परमेश्वर को सन्तुष्ट करना होगा, और जो कुछ हमें परमेश्वर से लेना-देना है वह सब उसके द्वारा, और उसके नाम में करना होगा। संत पतरस का यहाँ यही आशय है, और वह यह भी कहना चाहता है, हम निश्चय ही इस जीवन की बाट जोहते हैं, यद्यपि हम अभी पृथ्वी पर हैं। परन्तु यह सब किसी दूसरे मार्ग से नहीं, केवल मसीह के जी उठने के द्वारा आता है, क्योंकि वह जी उठा है और स्वर्ग पर चढ़ गया है, और परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है। क्योंकि इसी कारण वह ऊपर चढ़ा, कि हमें अपना
आत्मा दे, कि हम नया जन्म पाएँ, और अब उसके द्वारा पिता के पास आकर कहें, "देख, मैं तेरे सामने आता और प्रार्थना करता हूँ, इसलिए नहीं कि मैं अपनी विनती पर भरोसा रखता हूँ, वरन् इसलिए कि मेरा प्रभु मसीह मुझसे आगे गया है और मेरा बिनती करनेवाला बन गया है।" जहाँ कहीं विश्वास करनेवाला हृदय है वहाँ ये सब धधकते हुए वचन हैं; जहाँ नहीं है, वहाँ सब ठण्डा और प्रभावहीन है।
इसलिए हम निर्णय कर सकते हैं कि सच्ची मसीही शिक्षा या प्रचार क्या है। यदि सुसमाचार का प्रचार किया जाना है, तो उसका सम्बन्ध मसीह के जी उठने से होना चाहिए। जो इसका प्रचार नहीं करता वह प्रेरित नहीं है; क्योंकि यह हमारे विश्वास का मुख्य सिद्धान्त है। और वे पुस्तकें सचमुच सबसे श्रेष्ठ हैं जो ऐसी शिक्षा सिखाती और उस पर बल देती हैं, जैसा कि ऊपर कहा गया। जिससे हम सहज ही जान सकते हैं कि याकूब की पत्री कोई सच्ची प्रेरितीय
पत्री[2] नहीं है, क्योंकि उसमें इन बातों का मुश्किल से एक अक्षर है, जबकि विश्वास के इसी सिद्धान्त का सबसे बड़ा महत्व है। क्योंकि यदि जी उठने जैसी कोई बात न होती, तो हमारे पास न सान्त्वना होती न आशा, और जो कुछ मसीह ने सहा या भुगता, वह सब व्यर्थ होता।
[पाद-टिप्पणी 2: याकूब की पत्री के विषय में लूथर के सुप्रसिद्ध विचार, और वे आधार जिन पर उसने उसे नये नियम के धर्मशास्त्र-संग्रह (कैनन) से अस्वीकार किया, इस अंश में प्रस्तुत हैं। वह विश्वास के विषय में पौलुस और याकूब के बीच _प्रतीत होनेवाले_ विरोध के प्रति बहुत अधीर था, और उसने बहुत जल्दबाज़ी में यह निष्कर्ष निकाला कि उनमें मेल नहीं बैठाया जा सकता। याकूब की पत्री में दिए गए तर्क के उद्देश्य पर सावधानी से विचार करने पर यह कठिनाई दूर हो जाती है, जैसा कि बाद के टीकाकारों में विस्तार से देखा जा सकता है। याकूब की पत्री को अविश्वसनीय ठहराने का कोई ऐतिहासिक कारण नहीं है। आरम्भिक मसीही लेखक उसके पक्ष में बहुत स्पष्ट गवाही देते हैं। रोम के क्लेमेंट ने दो बार उसकी ओर संकेत किया है। हर्मास में उसकी ओर कम से कम सात संकेत हैं, जो लार्डनर के अनुसार उसकी प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं।
ओरिजन, जेरोम, अथानासियुस, और बाद के अधिकांश कलीसियाई लेखक उससे उद्धरण देते हैं, और वह सामान्य तथा प्रान्तीय महासभाओं द्वारा प्रकाशित धर्मशास्त्र-संग्रह की पुस्तकों की सब सूचियों में पाई जाती है। परन्तु इससे भी अधिक वज़नदार तर्क यह तथ्य है कि वह नये नियम के सुरियानी अनुवाद में सम्मिलित है, जो पहली शताब्दी के अन्त में, या दूसरी शताब्दी के आरम्भ में तैयार किया गया था। निश्चय ही कोई इस पर प्रश्न नहीं उठाएगा कि जिन यहूदी विश्वासियों को वह लिखी गई थी, वे ही उसकी वास्तविकता और प्रामाणिकता के सबसे अच्छे परखनेवाले होंगे, और उन्होंने उसे बिना हिचकिचाहट ग्रहण किया।]
इसलिए इस रीति से सिखाना चाहिए: तुम देखते हो कि मसीह तुम्हारे लिए मरा है, उसने पाप, मृत्यु और नरक को अपने ऊपर ले लिया, और उनके नीचे झुक गया। परन्तु वे उसे किसी भी प्रकार कुचल न सके, क्योंकि वह उनके लिए बहुत बलवन्त था; वरन् वह उनके नीचे से जी उठा है, और उसने सब पर जय पाई है, और उन्हें अपने अधीन कर लिया है; और इसी उद्देश्य से, कि तुम उनसे छुटकारा पाओ, और उन पर विजयी बनाए जाओ। यदि तुम विश्वास करते हो, तो यह तुम्हारे पास है। ये सब बातें हम अपनी सामर्थ्य से पूरी नहीं कर सकते थे; इसलिए आवश्यक था कि मसीह इसे करे, नहीं तो उसे स्वर्ग से नीचे आने की कभी आवश्यकता न होती। हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यदि कोई हमारे अपने कर्मों का प्रचार करता है, तो _वह_ प्रचार इससे मेल नहीं खाता और इसके साथ टिक नहीं सकता। ओह, हम मसीहियों को इसे कितनी अच्छी तरह जानना चाहिए! यह पत्री हमारे लिए कितनी स्पष्ट होनी चाहिए!
पद 4. _एक अविनाशी और निर्मल और अजर मीरास के लिए।_ अर्थात्, हम किसी ऐसी आशीष या मीरास की आशा नहीं रखते जो दूर हो। वरन् हम एक ऐसी मीरास की आशा में जीते हैं जो बिल्कुल निकट है, और जो अविनाशी होने के साथ-साथ निर्मल और अजर भी है। यह आशीष अब से सदा के लिए हमारी है, यद्यपि हम अभी उसे देखते नहीं। ये सामर्थी और उत्तम वचन हैं; जिस किसी के मन में ये प्रवेश करते हैं, मैं समझता हूँ, वह सांसारिक धन और सुख के पीछे बहुत चिन्तित न होगा। यह कैसे सम्भव है कि जो इस पर निश्चय से विश्वास करता है, वह फिर भी नाशवान सम्पत्ति और अभिलाषाओं से चिपटा रहे?
यदि इसके विपरीत सांसारिक धन को सामने रखा जाए, तो तुरन्त दिख जाता है कि वह सब कैसे बीत जाता है और थोड़े ही समय तक टिकता है; परन्तु केवल यही सदा बना रहता है और कभी नष्ट न होगा। इसके अतिरिक्त, _वह_ सब अशुद्ध है, और हमें अशुद्ध करता है, क्योंकि कोई मनुष्य इतना भक्त नहीं कि सांसारिक समृद्धि उसकी शुद्धता को मैला न कर दे। परन्तु केवल _यही_ मीरास शुद्ध है; जिसके पास यह है वह सदा निर्मल रहता है; यह मुरझाएगी नहीं; यह बनी रहती है और सड़ती नहीं। पृथ्वी पर जो कुछ है, चाहे वह कितना ही कठोर हो, फिर भी परिवर्तनशील है और उसमें स्थायित्व नहीं। मनुष्य जैसे ही बूढ़ा होता है, कुरूप हो जाता है: परन्तु यह नहीं बदलती, वरन् सदा हरी-भरी और ताज़ी बनी रहती है। पृथ्वी पर ऐसा कोई सुख नहीं जो अन्त में उबाऊ न हो जाए, जैसा कि हम देखते हैं कि मनुष्य सब वस्तुओं से ऊब जाते हैं; परन्तु इस आशीष के साथ ऐसा नहीं है। यह हमारे पास केवल मसीह में, परमेश्वर की दया के द्वारा है, यदि हम विश्वास करते हैं, और यह हमें सेंत-मेंत दी गई है। क्योंकि यह कैसे सम्भव है कि हम दीन-हीन अभागे अपने कर्मों के द्वारा ऐसी भलाई के योग्य बन सकें जिसकी कल्पना कोई मानवीय बुद्धि या समझ नहीं कर सकती?
स्वर्ग में रखी है।_ यह निश्चित है कि हमारी मीरास अविनाशी, निर्मल और अजर है। वह केवल थोड़ी देर के लिए हमसे छिपी है, जब तक हम अपनी आँखें मूँद न लें और गाड़े न जाएँ, तब, यदि हम विश्वास करते हैं, तो हम निश्चय ही उसे पाएँगे और देखेंगे।
पद 5. _जिनकी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उद्धार के लिए होती है।_ वह कहता है, हम इस अमूल्य मीरास की बाट उस आशा में जोहते हैं जो हमें विश्वास के द्वारा प्राप्त हुई है; क्योंकि इनका क्रम यह है: वचन से विश्वास आता है, विश्वास से नया जन्म, नये जन्म से हम आशा तक पहुँचते हैं, जिससे हम निश्चय ही आशीष की बाट जोहते और उसके विषय में आश्वस्त रहते हैं। सो पतरस ने यहाँ सच्ची मसीही रीति से यह दृढ़ता से कहा है कि यह विश्वास के द्वारा होना चाहिए, हमारे अपने कर्मों के द्वारा नहीं।
परन्तु संत पतरस यहाँ और भी विशेष रूप से कहता है, _तुम्हारी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से होती है--उद्धार के लिए_। परन्तु बहुत-से लोग ऐसे हैं जो, यदि सुसमाचार सुनते हैं,--अर्थात् यह कि केवल विश्वास, कर्मों के बिना, धर्मी ठहराता है,--तो तुरन्त बीच में बोल उठते हैं, "हाँ! मैं भी विश्वास करता हूँ!" अपने ही गढ़े हुए विचारों को सोचना, यही उनके लिए विश्वास है। फिर भी हमें पवित्रशास्त्र से यह भी सिखाया गया है कि हम परमेश्वर के आत्मा के बिना छोटे से छोटा काम भी नहीं कर सकते; तो फिर अपनी सामर्थ्य से हम सबसे ऊँचा काम,--अर्थात् विश्वास करना,--कैसे कर सकेंगे? इसलिए ऐसे विचार एक स्वप्न और कल्पना को छोड़ और कुछ नहीं। परमेश्वर की सामर्थ्य को उपस्थित होकर हमारे भीतर कार्य करना चाहिए, ताकि हम विश्वास कर सकें; जैसा कि पौलुस भी कहता है,
इफिसियों 1, "परमेश्वर तुम्हें ज्ञान की आत्मा दे कि तुम जानो कि उसकी सामर्थ्य हम विश्वास करनेवालों की ओर उसकी शक्ति के प्रभाव के अनुसार कितनी महान है," इत्यादि। यह केवल
परमेश्वर की इच्छा ही नहीं, वरन् परमेश्वर की एक सामर्थ्य है जो किसी भी प्रकार तुच्छ नहीं। क्योंकि यदि परमेश्वर मनुष्यों में विश्वास उत्पन्न करता है, तो यह निश्चय ही उतना ही बड़ा काम है मानो
वह आकाश और पृथ्वी को फिर से रचे।
इसलिए वे मूर्ख नहीं जानते कि वे क्या कहते हैं, जो पूछते हैं, अकेला विश्वास कैसे पर्याप्त हो सकता है, जबकि बहुत-से लोग विश्वास करते हैं और फिर भी कोई भला काम नहीं करते? क्योंकि वे अपने ही व्यर्थ स्वप्न को विश्वास समझते हैं, और सोचते हैं कि विश्वास भले कामों के बिना रह सकता है। परन्तु हम कहते हैं, ठीक जैसे पतरस कहता है, कि विश्वास एक ईश्वरीय सामर्थ्य है; जब परमेश्वर विश्वास उत्पन्न करता है, तो मनुष्य को नया जन्म पाना और नई सृष्टि बनना ही होता है; शुद्ध किए गए स्वभाव से बहनेवाले भले काम विश्वास के पीछे अवश्य आते हैं। इसलिए हमें किसी विश्वासी मसीही से यह नहीं कहना चाहिए, यह या वह काम करो,--क्योंकि वह अपने आप और बिना कहे, केवल भले ही काम करता है।
परन्तु उससे यह कहना अवश्य है कि वह झूठे, काल्पनिक विश्वास से अपने आप को धोखा न दे। इसलिए उन असभ्य बकवादियों को जाने दो, जो इस विषय पर बहुत कुछ कह सकते हैं जो अन्त में केवल झाग और व्यर्थ बकबक के सिवा कुछ नहीं। जिनके विषय में पौलुस भी कहता है, 1 कुरिन्थियों 4, "मैं तुम्हारे पास आऊँगा और फूले हुओं की बातों को नहीं, वरन् उनकी सामर्थ्य को जानूँगा; क्योंकि परमेश्वर का राज्य बातों में नहीं, वरन् सामर्थ्य में है।" जहाँ कहीं परमेश्वर की यह सामर्थ्य नहीं है, वहाँ न सच्चा विश्वास है न भले काम। अतः वे निरे झूठे हैं, जो अपने मसीही नाम और विश्वास पर घमण्ड करते हैं और फिर भी दुष्ट जीवन बिताते हैं। क्योंकि यदि यह परमेश्वर की सामर्थ्य से होता, तो वे निश्चय ही कुछ और होते।
परन्तु संत पतरस का क्या अर्थ है जब वह कहता है, _तुम्हारी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से उद्धार के लिए होती है_? उसका अर्थ यह है: उस विश्वास से सम्बन्धित बात इतनी कोमल और बहुमूल्य है जिसे परमेश्वर की सामर्थ्य
(जो हमारे साथ है और जिससे हम भरे हुए हैं) हममें उत्पन्न करती है, कि वह हमें उद्धार से सम्बन्धित सब बातों की सही, स्पष्ट समझ देता है, ताकि हम पृथ्वी पर की सब बातों को परख सकें, और कह सकें, यह शिक्षा सच्ची है, वह झूठी है; यह आचरण उचित है, वह नहीं; यह काम भला और ग्रहणयोग्य है, वह बुरा है। और ऐसा मनुष्य जो कुछ निर्णय करता है वह उचित और सत्य होता है, क्योंकि वह धोखा नहीं खा सकता; वरन् उसकी रक्षा की जाएगी, और वह सुरक्षित रखा जाएगा, और सब शिक्षाओं का न्यायी बना रहेगा।
दूसरी ओर, जहाँ कहीं विश्वास और परमेश्वर की यह सामर्थ्य नहीं है, वहाँ भ्रम और अन्धेपन को छोड़ और कुछ नहीं; वहाँ बुद्धि अपने आप को इधर-उधर, एक काम से दूसरे काम की ओर ले जाए जाने देती है, क्योंकि वह अपने ही कामों के द्वारा स्वर्ग तक पहुँचना चाहती है, और सदा इस प्रकार कल्पना करती रहती है, "हाँ! यह काम तुम्हें स्वर्ग पहुँचाएगा: इसे करो और तुम उद्धार पाओगे।" इसी कारण संसार में इतने अधिक धर्म-मण्डल (चैप्टर), मठ, वेदियाँ, पोप, भिक्षु और भिक्षुणियाँ हैं। परमेश्वर अविश्वासियों को ऐसे अन्धेपन में गिरने देता है। परन्तु वह हम विश्वास करनेवालों को सही समझ में बनाए रखता है, ताकि हम दण्ड की आज्ञा में न पड़ें, वरन् उद्धार प्राप्त करें।
जो अन्तिम समय में प्रगट होने को तैयार है।_ अर्थात्, जो मीरास उनके लिए ठहराई गई है वह बहुत पहले प्राप्त कर ली गई थी, और जगत की उत्पत्ति से तैयार की गई थी, परन्तु अब छिपी है, अभी तक ढकी हुई, रखी हुई और मुहरबन्द है। परन्तु यह केवल थोड़ी देर के लिए है, जब पल भर में वह खोली और प्रगट की जाएगी, ताकि हम उसे देखें।
पद 6. _जिसके कारण तुम बहुत आनन्दित होते हो, यद्यपि अब कुछ समय के लिए (यदि आवश्यक हो) नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण उदास हो।_ क्या तुम मसीही हो, और क्या तुम इस मीरास या इस उद्धार की बाट जोहते हो? तो तुम्हें केवल इसी से चिपटे रहना होगा, और पृथ्वी पर की सब बातों को तुच्छ जानना होगा, और अंगीकार करना होगा कि सारी सांसारिक बुद्धि, ज्ञान और महिमा कुछ भी नहीं--ऐसी बात जिसे संसार सह नहीं सकेगा; इसलिए तुम्हें आशा रखनी चाहिए कि मनुष्य तुम्हें दोषी ठहराएँगे और तुम्हें सताएँगे। इस प्रकार संत
पतरस विश्वास, आशा और पवित्र क्रूस को एक साथ जोड़ता है, क्योंकि एक दूसरे के पीछे आता है।
और यहाँ वह हमें सान्त्वना का एक स्रोत देता है यदि हम दुःख उठाते और सताए जाते हैं। यह उदासी थोड़ी देर तक रहेगी; उसके बाद तुम अत्यन्त आनन्दित होगे, क्योंकि यह उद्धार तुम्हारे लिए पहले ही से तैयार है; इसलिए अपने दुःखों में धीरज धरो।
इसके अतिरिक्त यह एक सच्ची मसीही सान्त्वना है,--वैसी सान्त्वना नहीं जैसी मनुष्यों की शिक्षाएँ देती हैं, जो बाहरी विपत्ति से छुटकारा ढूँढ़ने से अधिक कुछ प्रयत्न नहीं करतीं। (वह मानो कहता है) मैं शारीरिक सान्त्वना की बात नहीं करता; यह कोई वास्तविक हानि नहीं कि तुम्हें बाहरी विपत्ति सहनी पड़ती है, केवल साहस से आगे बढ़ते जाओ और स्थिर रहो; यह मत पूछो कि तुम इस कष्ट से कैसे मुक्त हो सकते हो, वरन् अपने मन में सोचो, मेरी मीरास तैयार है और मेरे सामने रखी गई है; मेरे दुःख के समाप्त होने में बस थोड़ा ही समय है।
इस प्रकार हमें सांसारिक सान्त्वनाओं को अलग रख देना चाहिए, और उनके सामने उस अनन्त सान्त्वना को रखना चाहिए जो हमें परमेश्वर में मिलती है।
इसके अतिरिक्त, यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि प्रेरित आगे बताता है कि यह सब किन परिस्थितियों में होगा, जैसा कि वह आगे तीसरे अध्याय में कहेगा, _यदि परमेश्वर की यही इच्छा हो_।
बहुत-से लोग ऐसे हैं जो स्वर्ग पर धावा बोलकर तुरन्त उसमें प्रवेश करना चाहते हैं, इसलिए वे अपनी ही कल्पित भलाई के लिए अपने ऊपर क्रूस लाद लेते हैं; क्योंकि बुद्धि सदा अपने ही कामों को सामने रखने के सिवा और कुछ नहीं करेगी, जिन्हें परमेश्वर ठुकरा देगा। हमें अपने चुने हुए कामों को नहीं अपनाना चाहिए, वरन् जो कुछ परमेश्वर हम पर डालता और हमारे लिए ठहराता है उसकी बाट जोहनी चाहिए, ताकि जहाँ कहीं वह हमें ले जाए हम आगे बढ़ें और उसके पीछे चलें; इसलिए तुम्हें अपनी ही इच्छा के पीछे नहीं दौड़ना है, यदि ऐसा हो
(अर्थात् परमेश्वर के ठहराने से) कि तुम्हें दुःख उठाना है, तो उसे स्वीकार करो और उस उद्धार से अपने आप को सान्त्वना दो जो सांसारिक नहीं वरन् अनन्त है।
पद 7, 8. _ताकि तुम्हारे विश्वास की परख (या तुम्हारा परखा हुआ विश्वास) नाशवान सोने से (जो आग में परखा जाता है) कहीं अधिक बहुमूल्य ठहरे, और यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा, आदर और महिमा का कारण हो, जिसे तुमने नहीं देखा, फिर भी उससे प्रेम रखते हो, जिस पर तुम विश्वास भी करते हो यद्यपि उसे देखते नहीं।_ क्रूस और सब प्रकार की विपत्तियों का यही उद्देश्य होना चाहिए,--कि हम झूठे और सच्चे विश्वास में भेद कर सकें। इसलिए परमेश्वर हम पर अपना हाथ रखता है, कि हमारे विश्वास को परखे और उसे संसार पर प्रगट करे, ताकि दूसरे विश्वास करने को प्रेरित हों, और हम भी प्रशंसा और आदर पाएँ। क्योंकि जैसे हम परमेश्वर को ऊँचा उठाते हैं, वैसे ही
वह बदले में हमें ऊँचा उठाएगा, हमारा मान करेगा और हमें आदर देगा, यहाँ तक कि झूठे कपटी, जो सही मार्ग पर नहीं चलते, लज्जित किए जाएँगे।
पवित्रशास्त्र सर्वत्र परीक्षा की तुलना आग से करता है। इस प्रकार संत पतरस यहाँ आग से परखे जानेवाले सोने की तुलना परीक्षा और दुःख के द्वारा विश्वास की परख से करता है। आग सोने में से कुछ घटाती नहीं, वरन् उसे शुद्ध और चमकीला बना देती है, जिससे सारा मैल निकल जाता है। इसी प्रकार परमेश्वर ने सब मसीहियों पर क्रूस रखा है, कि वे उसके द्वारा शुद्ध किए जाएँ। और यह ठीक ही कहा गया है, विश्वास वैसा ही शुद्ध बना रहे जैसा वचन शुद्ध है, ताकि हम केवल वचन पर निर्भर रहें, और किसी दूसरी वस्तु पर भरोसा न रखें: क्योंकि पुराने भ्रष्ट आदम के कारण हमें प्रतिदिन ऐसी ही आग और क्रूस की आवश्यकता है।
इस प्रकार मसीही जीवन की यह विशेषता है कि वह निरन्तर बढ़ता और अधिक पवित्र होता जाए; क्योंकि यदि हम सुसमाचार के प्रचार के द्वारा विश्वास तक पहुँचाए जाते हैं, तो हम धर्मी ठहराए जाएँगे और पवित्रता में बढ़ेंगे; परन्तु जब तक हम शरीर में रहते हैं हम कभी पूरी तरह शुद्ध नहीं हो सकते। इसलिए परमेश्वर हमें आग के बीच,--अर्थात् दुःख, लज्जा और विपत्ति में,--डाल देता है, ताकि हम मरने तक अधिकाधिक शुद्ध होते जाएँ--ऐसी स्थिति जिस तक हम अपने किसी काम के द्वारा नहीं पहुँच सकते। क्योंकि कोई बाहरी काम हृदय को भीतर से कैसे शुद्ध कर सकता है? इसके अतिरिक्त, यदि विश्वास को परखा (शुद्ध किया) जाना है, तो जो कुछ उसमें जोड़ा हुआ और झूठा है उसे अलग करके निकाल देना होगा। इससे एक उत्तम प्रतिफल प्राप्त होगा,--मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा और महिमा। इसके बाद यह आता है:
पद 8, 9. _परन्तु अपने विश्वास के कारण ऐसे आनन्द से आनन्दित हो जो वर्णन से बाहर और महिमामय है, और अपने विश्वास का प्रतिफल, अर्थात् अपनी आत्माओं का उद्धार भी प्राप्त करो।_ संत पतरस कहता है, वह एक अवर्णनीय महिमामय आनन्द होगा,
जिससे हमें आदर और प्रशंसा मिलती है। संसार का आनन्द ऐसा है कि उससे हमें लज्जा के सिवा कुछ नहीं मिलता, और जिस पर हमें लज्जित होना पड़ता है। यहाँ संत पतरस ने स्पष्ट रूप से आनेवाले आनन्द के विषय में कहा है,--और आनेवाले आनन्द के विषय में इस स्थान के समान स्पष्ट कोई दूसरा अंश मुश्किल से मिलता है,--और फिर भी वह उसे व्यक्त करने में अपने आप को असमर्थ पाता है।
यह भूमिका का एक भाग है, जिसमें प्रेरित ने दिखाया है कि मसीह पर विश्वास क्या है, और जब परमेश्वर हमारे लिए ठहराता है तब हमें विपत्ति और दुःख के द्वारा कैसे परखा और शुद्ध किया जाना चाहिए।--अब आगे यह आता है कि पवित्रशास्त्र में इस विश्वास का स्वरूप और नाम क्या बताया गया है।
पद 10, 11, 12. _इसी उद्धार के विषय में उन भविष्यद्वक्ताओं ने बहुत ढूँढ़-ढाँढ़ और जाँच-पड़ताल की, जिन्होंने उस अनुग्रह के विषय में भविष्यद्वाणी की जो तुम पर होने को था; वे इस बात की खोज करते थे कि मसीह का आत्मा जो उनमें था, किस या कैसे समय की ओर संकेत करता था, जब वह मसीह के दुःखों की और उनके बाद होनेवाली महिमा की पहले ही से गवाही देता था; उन पर यह प्रगट किया गया कि वे अपनी नहीं वरन् हमारी सेवा के लिए ये बातें कहा करते थे, जिनका समाचार अब तुम्हें उनके द्वारा मिला है जिन्होंने स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा के द्वारा तुम्हें सुसमाचार सुनाया; और इन बातों को स्वर्गदूत भी ध्यान से देखने की लालसा रखते हैं।_
यहाँ संत पतरस हमें पवित्रशास्त्र की ओर वापस ले जाता है, ताकि हम उसमें देखें कि परमेश्वर हममें से जिस किसी को बुलाता है उसकी रक्षा करता है, हमारे किसी पुण्य के कारण नहीं, वरन् केवल अनुग्रह से; क्योंकि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र इसी उद्देश्य की ओर निर्देशित है, कि वह हमें हमारे अपने कामों से हटाकर विश्वास तक ले आए। और यह आवश्यक है कि हम पवित्रशास्त्र का सावधानी से अध्ययन करें ताकि हम अपने विश्वास के विषय में भली-भाँति आश्वस्त हो सकें। पौलुस भी रोमियों के नाम पत्री के अध्याय 1 में हमें यही बात सिखाता है, जहाँ वह कहता है कि परमेश्वर ने पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में सुसमाचार की प्रतिज्ञा की थी। इसी प्रकार रोमियों 3 में: कि जिस विश्वास के द्वारा हम धर्मी ठहराए जाते हैं, उसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं।
इसी प्रकार हम प्रेरितों के काम 17 में भी पढ़ते हैं कि पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को कैसे विश्वास का प्रचार किया, उन्हें पवित्रशास्त्र की ओर ले जाकर और उसे उन्हें समझाकर, और वे कैसे प्रतिदिन पवित्रशास्त्र की शरण लेते, और जाँचते थे कि जो बातें पौलुस ने उन्हें सिखाई थीं वे ऐसी ही हैं या नहीं। इसी प्रकार हमें भी करना चाहिए, पीछे लौटकर, और पुराने नियम से यह सीखकर कि नये नियम को किस पर आधारित करें। इसके अतिरिक्त, हम वहाँ मसीह की प्रतिज्ञा को पाएँगे, जैसा कि मसीह स्वयं भी कहता है, यूहन्ना 5: "पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ो, क्योंकि यही है जो मेरी गवाही देता है।" और "यदि तुम मूसा का विश्वास करते हो, तो तुम्हें मेरा भी विश्वास करना चाहिए, क्योंकि उसने मेरे विषय में लिखा है।"
इसलिए हमें उन व्यर्थ बकवादियों को जाने देना चाहिए जो पुराने नियम को तुच्छ जानते हैं, और कहते हैं कि अब उसका कोई उपयोग नहीं,--जबकि केवल वहीं से हमें अपने विश्वास का आधार लेना है; क्योंकि परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को यहूदियों के पास इसी उद्देश्य से भेजा कि वे आनेवाले मसीह की गवाही दें। इसी कारण प्रेरितों ने सर्वत्र यहूदियों को उन्हीं के पवित्रशास्त्र से निरुत्तर किया और विश्वास दिलाया कि यही मसीह है।
इस प्रकार मूसा की पुस्तकें और भविष्यद्वक्ता सुसमाचार हैं, क्योंकि उन्होंने पहले ही मसीह के विषय में वह प्रचार किया और लिखा जो बाद में प्रेरितों ने प्रचार किया और लिखा। फिर भी उनमें एक भेद है। क्योंकि यद्यपि दोनों, अक्षर के अनुसार, कागज़ पर लिखे गए हैं, फिर भी सुसमाचार, या नये नियम के विषय में ठीक-ठीक यह नहीं कहा जा सकता कि वह लिखा गया है, वरन् यह कि वह उस जीवित वाणी में था जिसने उसकी घोषणा की, और जो सारे संसार में सर्वत्र सुनी गई। परन्तु यह कि उसे लिखा भी गया, एक बाहरी बात है। परन्तु पुराना नियम केवल लेख के रूप में रचा गया, और इसलिए अक्षर कहलाता है; और प्रेरित भी पवित्रशास्त्र को यही नाम देते हैं, क्योंकि वह केवल आनेवाले मसीह की ओर संकेत करता था। परन्तु सुसमाचार उस मसीह की जीवित घोषणा है जो आ चुका है।
इसके अतिरिक्त, पुराने नियम की पुस्तकों में भी एक भेद है। पहले स्थान पर मूसा की पाँच पुस्तकें हैं, जो पवित्रशास्त्र की नींव हैं, और जिन्हें विशेष रूप से पुराना
नियम कहा जाता है। फिर इतिहास की और वृत्तान्त की पुस्तकें आती हैं, जिनमें सब प्रकार के उदाहरण लिखे गए हैं, चाहे उनके जिन्होंने मूसा की व्यवस्था को माना या ठुकराया। तीसरे स्थान पर भविष्यद्वक्ता हैं जो मूसा पर आधारित हैं, और जो कुछ उसने लिखा है उसे उन्होंने स्पष्ट भाषा में और अधिक विस्तार से समझाया और स्पष्ट किया है। परन्तु सब भविष्यद्वक्ताओं और मूसा का आशय एक ही है।
परन्तु तुम्हें उस बात को भी समझना चाहिए जो लोग कहते हैं, कि पुराना नियम त्याग दिया गया और अलग रख दिया गया है। पहले तो पुराने और नये नियम के बीच वह भेद है, जैसा हमने ऊपर कहा है, कि पुराने ने मसीह का पूर्व-चित्रण किया, परन्तु नया हमें वह देता है जिसकी प्रतिज्ञा पहले पुराने में की गई थी, और जिसकी ओर छायाओं (प्रतिरूपों) के द्वारा हमें संकेत किया गया था।
परन्तु ये प्रतिरूप अब समाप्त हो गए हैं, क्योंकि जिस उद्देश्य की वे पूर्ति करनेवाले थे वह पूरा और प्राप्त हो चुका है, और जो उनके द्वारा पहले से दर्शाया गया था वह पूरा हो गया है। इसलिए अब भोजन, वस्त्र, स्थान और समय के और भेद नहीं होने चाहिए। मसीह में सब एक समान हैं, जिसमें सब कुछ पूरा हो गया है। यहूदियों का उद्धार इससे नहीं हुआ, क्योंकि यह उन्हें इस उद्देश्य से नहीं दिया गया था कि यह उन्हें पवित्र बनाए, वरन् इसलिए कि यह उन्हें आनेवाले मसीह की छाया दिखाए।
इसके अतिरिक्त, पुराने नियम में परमेश्वर ने दोहरा शासन स्थापित किया,--एक बाहरी और एक भीतरी। वहाँ उसने अपनी प्रजा पर शासन करने का
बीड़ा उठाया, भीतर से हृदय में भी, और बाहर से शरीर और सम्पत्ति में भी। इसलिए उसने उन्हें इतने प्रकार की व्यवस्थाएँ दीं, एक प्रकार को दूसरे में मिलाकर। इसलिए यह उस शासन के अधीन था जो शरीर से सम्बन्धित था, कि कोई पुरुष अपनी पत्नी को त्यागपत्र देकर उसे छोड़ दे।
परन्तु आत्मिक शासन से यह आज्ञा सम्बन्धित थी, तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना। परन्तु अब वह मसीह के द्वारा हम पर केवल आत्मिक रूप से शासन करता है; जबकि शरीर और बाहरी दशा से सम्बन्धित शासन को वह सांसारिक न्यायाधिकारियों के माध्यम से चलाता है। इसलिए जब मसीह आया तो बाहरी शासन समाप्त हो गया, और परमेश्वर अब हमें _बाहरी_ व्यक्ति, समय और स्थान के विषय में निर्देश नहीं देता। वरन् वह केवल वचन के द्वारा आत्मिक रूप से हम पर शासन करता है, ताकि हम सब बाहरी बातों का प्रबन्ध स्वयं करें, और शरीर से सम्बन्धित किसी भी बात से बँधे न रहें।
परन्तु जो उसके आत्मिक शासन से सम्बन्धित है वह त्यागा नहीं गया, वरन् जैसा तब था वैसा ही अब भी सदा के लिए स्थिर है,--परमेश्वर और अपने पड़ोसी से प्रेम की व्यवस्था, जो मूसा की पुस्तकों में है, जिसे परमेश्वर अब भी बनाए रखना चाहता है, और जिसके द्वारा वह सब अविश्वासियों को दोषी ठहराएगा।
इसके अतिरिक्त, प्रतिरूप अपने _आत्मिक_ अर्थ के अनुसार बने रहते हैं; अर्थात् जो कुछ बाहरी प्रतिरूपों के द्वारा दर्शाया गया है, यद्यपि बाहरी भाग हटा दिया गया है। इस प्रकार यह कि कोई पुरुष व्यभिचार के कारण अपनी पत्नी से अलग होकर उसे भेज दे, एक प्रतिरूप और छाया है जो अब भी आत्मिक रूप से पूरी होती है; क्योंकि इसी प्रकार परमेश्वर ने भी यहूदियों को ठुकरा दिया जब उन्होंने मसीह पर विश्वास नहीं किया, और अन्यजातियों को चुन लिया। इसी प्रकार वह अब भी करता है; यदि कोई विश्वास में नहीं चलना चाहता, तो वह उसे मसीही
कलीसिया से बाहर कर दिए जाने देता है, ताकि वह सुधार की ओर ले जाया जाए।
इसी प्रकार का अर्थ इसका भी है, कि स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद अपने पति के भाई से विवाह करे, और उसके लिए सन्तान उत्पन्न करे, और वह अपने आप को उसके नाम से कहलाने दे, और उसकी सम्पत्ति का अधिकारी हो। यह, यद्यपि अब समाप्त हो गया है, या यों कहें कि अमान्य हो गया है, जिससे इसे बिना पाप किए किया या छोड़ा जा सकता है, एक ऐसा प्रतिरूप है जिसका अब भी मसीह के सम्बन्ध में अर्थ है। क्योंकि वह हमारा भाई है, हमारे लिए मरा और स्वर्ग पर चढ़ गया, और हमें आज्ञा दी है कि हम सुसमाचार के द्वारा आत्माओं में बीज बोएँ और उन्हें फलवन्त बनाएँ, उसके नाम से कहलाएँ, और उसकी सम्पत्ति के अधिकारी हों।
इसलिए मुझे यह घमण्ड नहीं करना चाहिए कि मैं मनुष्यों को बदलता हूँ, वरन् यह सब प्रभु मसीह को ही दिया जाना चाहिए। पुराने नियम के अन्य सब प्रतिरूपों के साथ भी ऐसा ही है, जिनका वर्णन करना बहुत लम्बा हो जाएगा।
परन्तु पुराने नियम में जो कुछ बाहरी नहीं है वह अब भी लागू है, जैसे भविष्यद्वक्ताओं में विश्वास और प्रेम के विषय में सब अंश। इसलिए मसीह भी मत्ती 7 में इसकी पुष्टि करता है: "इस कारण जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है।" इसके अतिरिक्त, मूसा और भविष्यद्वक्ता आनेवाले मसीह की गवाही देते हैं। जैसे, जब मैं मसीह के विषय में प्रचार करता हूँ कि वही एकमात्र उद्धारकर्ता है जिसके द्वारा सबका उद्धार होना है, तो अपने समर्थन में मैं उत्पत्ति 22 का यह अंश उद्धृत कर सकता हूँ: "तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।" वहाँ से मैं एक जीवित वाणी और भाषा निकालता हूँ।
मसीह के द्वारा, जो अब्राहम का वंश है, सब मनुष्यों को आशीष पानी है। इससे यह निकलता है कि हम सब आदम में शापित और दण्ड के योग्य ठहराए गए थे; इसलिए यदि हम दण्ड से बचना चाहते हैं तो आवश्यक है कि हम उस वंश पर विश्वास करें। ऐसे अंशों से हम अपने विश्वास की नींव रख सकते हैं, और उसे बना रहने दें, ताकि हम उनमें देखें कि वे कैसे मसीह की गवाही देते हैं, जिससे हमारा विश्वास उनके द्वारा दृढ़ हो। संत पतरस अब इन शब्दों के द्वारा यही चाहता है, जिनमें वह कहता है:
पद 10. _इसी उद्धार के विषय में भविष्यद्वक्ताओं ने बहुत ढूँढ़-ढाँढ़ और जाँच-पड़ताल की, जिन्होंने उस अनुग्रह के विषय में भविष्यद्वाणी की जो तुम पर होने को था।_ इसी रीति से पौलुस भी रोमियों के नाम पत्री के अन्त की ओर उस भेद के प्रगट होने के विषय में कहता है जो जगत के सब युगों से छिपा रहा, परन्तु अब भविष्यद्वक्ताओं के लेखों के द्वारा प्रगट और बताया गया है। और इसी प्रकार तुम नये
नियम में भविष्यद्वक्ताओं से उद्धृत बहुत-से अंश पाते हो, जिनके द्वारा प्रेरित दिखाते हैं कि सब कुछ ठीक वैसा ही पूरा हुआ जैसा भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से कहा था।
यह बात मसीह स्वयं यशायाह भविष्यद्वक्ता से सिद्ध करता है, मत्ती 11: "अन्धे देखते हैं, लँगड़े चलते हैं," इत्यादि। मानो उसने कहा हो, जैसा वहाँ लिखा था वैसा ही अब हो रहा है; इसी प्रकार हम प्रेरितों के काम 9 में पौलुस के विषय में, और 18 में अपुल्लोस के विषय में पढ़ते हैं कि कैसे उन्होंने यहूदियों को निरुत्तर किया, और पवित्रशास्त्र से उन्हें विश्वास दिलाया कि यही मसीह है। क्योंकि जो कुछ भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से कहा था, वह सब अब मसीह में पूरा हो गया था। इसी प्रकार (प्रेरितों के काम 15) प्रेरित दिखाते हैं कि अन्यजातियों को सुसमाचार का प्रचार कैसे किया जाना चाहिए ताकि वे विश्वास करें। यह भी पूरा हुआ है, और आरम्भ किया गया है, ताकि यहूदी निरुत्तर किए जाएँ और यह मानने पर विवश हों कि सब कुछ ठीक वैसा ही हुआ जैसा पवित्रशास्त्र ने पहले से कहा था।
पद 11. _और यह खोज करते थे कि मसीह का आत्मा जो उनमें था, किस या कैसे समय की ओर;_ संत पतरस यह कहना चाहता है, यद्यपि भविष्यद्वक्ताओं को किसी नियत और निश्चित समय का विशेष ज्ञान नहीं था, फिर भी उन्होंने सामान्य रूप से समय और स्थान की सब परिस्थितियों की गवाही दी है;--जैसे यह कि मसीह दुःख उठाएगा, और वह कैसी मृत्यु मरेगा, और यह कि अन्यजाति उस पर विश्वास करेंगे: जिससे कोई इन चिह्नों के द्वारा निश्चय से जान सके कि समय कब आ गया है। दानिय्येल भविष्यद्वक्ता और भी निकट आ गया है, परन्तु फिर भी इस विषय में कुछ अस्पष्ट रूप से बोलता है, कि कब
मसीह दुःख उठाएगा और मरेगा--कब यह या वह होगा।
इसी प्रकार उनके पास यह निश्चित भविष्यद्वाणी भी थी कि मसीह के आने से पहले यहूदियों का राज्य समाप्त हो जाएगा। परन्तु वह दिन और ठीक समय जब यह होगा, निश्चित नहीं किया गया था। क्योंकि इतना पर्याप्त था कि जब यह समय आए, तो वे उसके द्वारा निश्चय से जान लें कि मसीह दूर नहीं है। योएल भविष्यद्वक्ता ने भी उस समय की भविष्यद्वाणी की जब पवित्र
आत्मा आएगा, जहाँ वह कहता है, "मैं अन्तिम दिनों में अपना आत्मा सब प्राणियों पर उण्डेलूँगा," इत्यादि, जिस अंश को संत पतरस प्रेरितों के काम 2 में उद्धृत करता है, और दिखाता है कि वह उसी समय और उन्हीं विशेष व्यक्तियों के विषय में बोलता है।
इन सब से तुम देखते हो कि प्रेरित कितने परिश्रम से सर्वत्र अपने प्रचार और शिक्षा का आधार और पुष्टि दिखाते हैं। महासभाएँ और पोप अब इस मार्ग को उलट देते हैं, और पवित्रशास्त्र से अलग होकर हमसे व्यवहार करना चाहते हैं, और कलीसिया के प्रति आज्ञाकारिता और बहिष्कार (धर्म-बहिष्कार) के भय से हमें आज्ञा देते हैं कि हम उन पर विश्वास करें। प्रेरित पवित्र आत्मा से भरे हुए थे, और निश्चित थे कि वे मसीह के द्वारा भेजे गए हैं, और सच्चे
सुसमाचार का प्रचार करते थे; फिर भी उन्होंने अपने आप को ऊँचा नहीं उठाया, और मनुष्यों से अपने पर विश्वास करने को नहीं कहा, जब तक कि उन्होंने पवित्रशास्त्र से निर्णायक रूप से सिद्ध न कर दिया कि बात ठीक वैसी ही है जैसी वे कहते थे, जिससे अविश्वासियों का मुँह बन्द हो गया, यहाँ तक कि वे और कोई आपत्ति न कर सके। और क्या हम उन निरे अनपढ़ खोपड़ियों पर विश्वास करें जो परमेश्वर के वचन का प्रचार बिल्कुल नहीं करते, और निरन्तर यह चिल्लाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते, "निश्चय ही पूर्वज भूल में नहीं हो सकते, और इसका निर्णय बहुत समय पहले हो चुका है, इसलिए अब यह प्रश्न नहीं रहना चाहिए?" परन्तु यह बात हम पवित्रशास्त्र से स्पष्ट रूप से सिद्ध कर सकते हैं, कि मसीह पर विश्वास करनेवाले को छोड़ और किसी का उद्धार नहीं हो सकता, जिससे इसके विरुद्ध वे कुछ नहीं कह सकते।
परन्तु अपनी ओर से वे पवित्रशास्त्र से हमें कभी सिद्ध न कर सकेंगे कि जो इस या उस दिन उपवास नहीं करता वह दण्ड के योग्य ठहराया जाएगा। इसलिए हमें उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए और न करेंगे।
अब संत पतरस आगे कहता है:
पद 11. _वह आत्मा मसीह के दुःखों की, और उनके बाद प्रगट होनेवाली महिमा की पहले ही से गवाही देता था।_ इसे दोनों प्रकार के दुःखों के विषय में समझा जा सकता है,--वह जो मसीह ने उठाया, और जो हम भी उठाते हैं। संत पौलुस सब मसीहियों के दुःखों को मसीह का दुःख कहता है। क्योंकि जैसे मसीह का विश्वास, नाम, वचन और काम मेरे हैं, क्योंकि मैं उस पर विश्वास करता हूँ, वैसे ही उसका दुःख भी मेरा है, क्योंकि मैं भी उसके लिए दुःख उठाता हूँ। इस प्रकार संसार के अन्त तक मसीहियों में मसीह के दुःख प्रतिदिन पूरे होते रहेंगे।
तब जो दुःख हम भोगते हैं उन सब में हमारी सान्त्वना यह है, कि जो कुछ हम सहते हैं उसमें मसीह हमारा साझी है, कि वह उस सब को अपना ही दुःख मानता है। और इस बात का हमें निश्चय है, कि दुःख के बाद शीघ्र ही महिमा आएगी। परन्तु हमें यह भी समझना चाहिए कि मसीह दुःख उठाने से पहले महिमित नहीं हुआ, इसलिए हमें पहले उसके साथ अपना क्रूस उठाना है, ताकि बाद में हम उसके आनन्द के भागी हों।
वह कहता है, जो कुछ हम अब प्रचार करते हैं, वह सब भविष्यद्वक्ताओं ने पहले ही से अत्यन्त स्पष्ट रीति से कहा और वर्णन किया, ठीक जैसा पवित्र आत्मा ने उन पर प्रगट किया। हम जो भविष्यद्वक्ताओं को इतना अधूरा समझते हैं, उसका कारण यह है कि हम उनकी भाषा नहीं समझते, क्योंकि उन्होंने तो पर्याप्त स्पष्टता से कहा है। इसलिए जो भाषा से परिचित हैं, और जिनके पास परमेश्वर का आत्मा है, जो सब विश्वासियों के पास है, उनके लिए इसे समझना कठिन नहीं, क्योंकि वे सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र का आशय जानते हैं। परन्तु यदि कोई उनकी भाषा नहीं समझता, और उसके पास आत्मा, या मसीही समझ नहीं है, तो उसे ऐसा लग सकता है मानो भविष्यद्वक्ता मतवाले और नये दाखरस से भरे हुए हों; यद्यपि जहाँ हमें एक के बिना रहना पड़े, वहाँ भाषा के बिना आत्मा, आत्मा के बिना भाषा से उत्तम है। भविष्यद्वक्ताओं की एक विशेष शब्द-शैली है, परन्तु भाव वही है जिसका प्रचार प्रेरित करते हैं, क्योंकि दोनों ने मसीह के दुःख और महिमा के विषय में, और विश्वास से सम्बन्धित बातों के विषय में भी, विस्तार से कहा है। जैसे जब
दाऊद मसीह के विषय में कहता है (भजन संहिता 21 [22]), "मैं तो कीड़ा हूँ, मनुष्य नहीं," जिसके द्वारा वह दिखाता है कि वह अपने दुःख में कितना गहरा गिरा हुआ और निराश है।
इसी प्रकार वह अपनी प्रजा और मसीहियों के क्लेश के विषय में भी भजन संहिता 45 में लिखता है: "हम तुच्छ समझे गए, और वध होनेवाली भेड़ों के समान गिने गए।"
पद 12. _कि वे अपनी नहीं वरन् हमारी सेवा के लिए ये बातें कहा करते थे, जिनका समाचार अब तुम्हें उनके द्वारा मिला है जिन्होंने स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा के द्वारा तुम्हें सुसमाचार सुनाया;_ अर्थात्, भविष्यद्वक्ताओं के पास इसका इतना ज्ञान था कि वे इस तथ्य को जानते थे। परन्तु यह कि उन्होंने इसे अपने पीछे (लिखित रूप में) छोड़ दिया, हमारी कृतज्ञता की माँग करता है; वे हमारे सेवक बन गए हैं, और उन्होंने हमारी ऐसी सेवा की है कि हम उनके द्वारा पाठशाला जाएँ और वही पाठ सीखें। इसमें हमारे पास यह दिखाने का तर्क है कि हमारा विश्वास और दृढ़ होना चाहिए, और हम सब झूठी शिक्षा के विरुद्ध अपने आप को हथियारबन्द करने और सम्भालने के योग्य बनें।
जिन्हें स्वर्गदूत भी ध्यान से देखने की लालसा रखते हैं।_ प्रेरितों ने पवित्र आत्मा के द्वारा, जो स्वर्ग से उन पर उतरा, हमें ऐसी बड़ी बातें बताई हैं, कि स्वर्गदूत भी उन्हें आनन्द से झाँककर देखना चाहते हैं।
जब यह आत्मा हमारी आँखें खोलता है और हमें दिखाता है कि सुसमाचार क्या है, तो हममें उसकी भूख और उसमें आनन्द होगा, यद्यपि हम उसे शारीरिक आँखों से नहीं देख सकते, वरन् हमें विश्वास करना होगा कि हम उस धार्मिकता, सत्य, उद्धार और सब आशीषों के भागी और संगी वारिस हैं जो परमेश्वर को देनी हैं। क्योंकि जब उसने हमें अपना एकलौता
पुत्र दे दिया, जो सबसे ऊँची भलाई है, तो वह उसके द्वारा हमें सब अच्छी वस्तुएँ, धन और खज़ाने भी देगा, जिनसे स्वर्ग के स्वर्गदूतों को अपना सारा आनन्द मिलता है, और जिनकी वे सबसे अधिक लालसा रखते हैं। यह सब सुसमाचार के द्वारा हमारे सामने रखा जाता है, और यदि हम विश्वास करते हैं तो हममें भी उनके लिए वैसी ही लालसा होगी। परन्तु जब तक हम पृथ्वी पर जीते हैं, उनके लिए हमारी लालसा स्वर्गदूतों की लालसा के समान सिद्ध नहीं हो सकती; परन्तु यदि हम विश्वास के द्वारा उसका कुछ अनुभव करते हैं, तो यह हममें एक अच्छा आरम्भ है।
परन्तु स्वर्ग में यह इतनी बड़ी है कि कोई मानवीय हृदय उसकी कल्पना नहीं कर सकता; परन्तु यदि हम उस स्थान तक पहुँचेंगे तो हम स्वयं उसका अनुभव करेंगे।
इस प्रकार तुम देखते हो कि संत पतरस हमें कैसे सिखाता है कि हम पवित्रशास्त्र से अपने आप को हथियारबन्द और सुसज्जित करें। क्योंकि अब तक उसने वर्णन किया है कि सुसमाचार का प्रचार करना क्या है, और दिखाया है कि जैसे पहले भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उसका प्रचार किया गया, वैसे ही अब भी होना चाहिए, और उसी रीति से प्रचार किया जाना चाहिए। अब वह आगे बढ़ता है, और इस अध्याय में हमें चिताता है कि हम विश्वास के द्वारा सुसमाचार के उसी प्रचार से चिपटे रहें, और प्रेम के द्वारा उसके पीछे चलें, और इसलिए कहता है,-पद 13-16. _इस कारण अपनी बुद्धि की कमर बाँधो; सचेत रहो, और उस अनुग्रह पर अपनी आशा दृढ़ता से लगाओ जो यीशु मसीह के प्रगट होने के द्वारा तुम्हें दिया जाता है, आज्ञाकारी बालकों के समान, अपनी अज्ञानता के समय की पुरानी अभिलाषाओं के सदृश न बनो; परन्तु जैसा तुम्हारा बुलानेवाला
पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल-चलन में पवित्र बनो, क्योंकि लिखा है, पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।_ यह विश्वास के लिए एक चितावनी है, और इसका अर्थ यह है: जबकि सुसमाचार के द्वारा तुम्हें ऐसी बातें प्रचार की और दी जाती हैं जिन्हें देखकर स्वर्गदूत आनन्दित होते और देखने की लालसा रखते, तो उन पर भरोसा रखो, और पूरी दृढ़ता से उन पर अपना भरोसा जमाओ, ताकि वह एक सच्चा विश्वास हो, न कि कोई रंगा-पुता या काल्पनिक भ्रम या स्वप्न।
अपनी बुद्धि की कमर बाँधो।_ यहाँ पतरस बुद्धि की एक आत्मिक कमर बाँधने की बात करता है, ठीक जैसे कोई अपनी तलवार अपने शरीर की कमर में बाँधता है। इस कमर बाँधने पर मसीह ने भी बल दिया है, लूका 12, जहाँ वह कहता है, "तुम्हारी कमरें बँधी रहें।" कुछ स्थानों में पवित्रशास्त्र कमर की चर्चा शारीरिक अभिलाषा के सम्बन्ध में करता है; परन्तु यहाँ संत पतरस आत्मा की कमर की बात करता है। शरीर के विषय में, पवित्रशास्त्र कमर की चर्चा पिता से होनेवाली स्वाभाविक उत्पत्ति के सम्बन्ध में करता है; जैसा हम उत्पत्ति 49 में पढ़ते हैं, कि यहूदा की कमर से मसीह आएगा। इसी प्रकार कमर का शारीरिक रूप से बाँधा जाना पवित्रता (संयम) के समान है, जैसा यशायाह अध्याय 11 में कहता है, "धार्मिकता उसकी कमर का पटुका, और विश्वास उसके गुर्दों का पटुका होगा।" अर्थात्, केवल विश्वास के द्वारा ही दुष्ट अभिलाषा दबाई और रोकी जाती है।
परन्तु यह आत्मिक कमर बाँधना, जिसके विषय में प्रेरित बोलता है, इससे अधिक अर्थ रखता है।
जैसे एक कुँवारी शरीर में शुद्ध और अछूती होती है, वैसे ही आत्मा विश्वास के द्वारा आत्मिक रूप से अछूती रहती है, जिसके द्वारा वह मसीह की दुल्हन बनती है। परन्तु यदि वह विश्वास से गिरकर झूठी शिक्षा में पड़ जाए, तो उसे लज्जित होना ही पड़ेगा।
इसलिए पवित्रशास्त्र सदा अभक्ति और अविश्वास को व्यभिचार और वेश्यागमन कहता है,--अर्थात् जब आत्मा मनुष्यों की शिक्षाओं पर भरोसा करती है, और इस प्रकार विश्वास और मसीह पर से अपनी पकड़ छोड़ देती है। इसी को संत पतरस यहाँ वर्जित करता है, जब वह हमें अपनी बुद्धि की कमर बाँधने को कहता है; मानो वह कहना चाहता है, तुमने अब सुसमाचार सुन लिया है और विश्वास करने लगे हो, इसलिए देखो कि तुम उसमें बने रहो, और अपने आप को झूठी शिक्षा के साथ बहकने न दो, ताकि तुम डगमगाओ नहीं और कर्मों के साथ इधर-उधर न दौड़ो।
और यहाँ वह बोलने की एक विशेष रीति अपनाता है, संत पौलुस की रीति के अनुसार नहीं, जहाँ वह "तुम्हारी बुद्धि की कमर" की बात करता है। वह
यहाँ बुद्धि उसे कहता है जिसे हम मनोवृत्ति कहते हैं; जैसे जब मैं कहता हूँ, "यह मुझे ठीक लगता है और जैसा पौलुस कहता है, वैसा ही हम इसे समझते हैं, हमारी ऐसी ही _मनोवृत्ति_ है।" इसमें वह विशेषकर विश्वास की ओर संकेत करता है, और कहना चाहता है: तुमने यह सही समझ प्राप्त कर ली है कि हमें विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना है; उसी मन में बने रहो; उसकी अच्छी तरह कमर बाँधो, उसे दृढ़ता से थामे रहो, और अपने आप को उससे अलग न होने दो; तब तुम भली-भाँति स्थिर रहोगे। क्योंकि बहुत-से झूठे शिक्षक आएँगे और मनुष्यों की शिक्षाएँ स्थापित करेंगे ताकि तुम्हारी समझ को बिगाड़ें और तुम्हारे विश्वास का पटुका ढीला कर दें; इसलिए सचेत रहो, और उसे अपने मन से अच्छी तरह बाँध लो।
जो कपटी अपने कर्मों पर भरोसा रखते हैं, और इसलिए सावधानी से संयमी जीवन बिताते हैं, वे यह मन रखते हैं कि परमेश्वर को उनके कर्मों के कारण उन्हें स्वर्ग में ले जाना ही होगा; वे फूल जाते हैं, घमण्डी हो जाते हैं, अपनी ही राय और अन्धेपन में बने रहते हैं, लूका 18 के फरीसियों के समान। जिनके विषय में मरियम भी _Magnificat_ (मरियम के स्तुतिगान) में बोलती है, जहाँ वह वही शब्द प्रयोग करती है जो यहाँ पतरस में है, उसने घमण्डियों को उनके मन की कल्पना में तितर-बितर किया है,--अर्थात् उनके अपने मन में।
सचेत (संयमी) रहना बाहरी रूप से शरीर के लिए उपयोगी है, और विश्वास का मुख्य काम है। क्योंकि यद्यपि मनुष्य धर्मी ठहराया जा चुका है, फिर भी वह बुरी अभिलाषाओं से सुरक्षित नहीं है; विश्वास ने शरीर को वश में करना आरम्भ तो किया है, परन्तु शरीर सदा हलचल करता रहता है, और सब प्रकार की अभिलाषाओं में उच्छृंखल होता है, जो फिर से फूट निकलकर अपनी इच्छा के अनुसार चलना चाहती हैं। इसलिए आत्मा को उसे रोकने और वश में करने के लिए प्रतिदिन परिश्रम करना होगा, और बिना रुके इसका भार अपने ऊपर लेना होगा, और शरीर की चौकसी करनी होगी कि वह विश्वास को नष्ट न कर दे। इसलिए वे लोग अपने आप को धोखा देते हैं, जो कहते तो हैं कि उनके पास विश्वास है, और यह कल्पना करके कि इतना पर्याप्त है, तब से अपनी ही मनमानी के अनुसार जीते हैं। जहाँ विश्वास सच्चा है वहाँ उसे शरीर पर नियन्त्रण रखना और उसे वश में रखना होगा, ताकि वह वह न करे जिसकी उसे लालसा है। इसलिए संत पतरस कहता है कि हमें सचेत रहना चाहिए।
फिर भी वह नहीं चाहता कि हम शरीर को नष्ट करें या उसे बहुत अधिक दुर्बल करें, जैसा कि हम देखते हैं कि बहुतों ने उपवास करके और अपने आप को यातना देकर मृत्यु तक पहुँचा दिया। संत
बर्नार्ड भी बहुत समय तक इस मूर्खता में बना रहा, यद्यपि वह सचमुच एक पवित्र मनुष्य था, क्योंकि उसने अपने शरीर को इतना मारा कि उसकी साँस दुर्गन्धयुक्त हो गई और सही नहीं जाती थी। फिर भी बाद में उसने इसे छोड़ दिया, और अपने भाइयों को आज्ञा दी कि वे शरीर को हानि न पहुँचाएँ; क्योंकि उसने भली-भाँति देखा कि उसने अपने आप को अपने भाइयों की सेवा के अयोग्य बना दिया था। इसलिए
संत पतरस इससे अधिक कुछ नहीं माँगता कि हम सचेत रहें,--अर्थात् शरीर को उस सीमा तक मारें कि वह हमारे विचार में बहुत उच्छृंखल न हो जाए; क्योंकि वह कोई निश्चित समय नियत नहीं करता कि हमें कितने समय तक उपवास करना चाहिए, जैसा पोप ने किया है, वरन् यह प्रत्येक पर व्यक्तिगत रूप से छोड़ देता है कि वह ऐसा उपवास करे कि सचेत बना रहे और पेटूपन से शरीर पर बोझ न डाले, जिससे वह बुद्धि और विवेक-विचार का स्वामी बना रहे, और विचार करे कि शरीर को वश में रखना उसके लिए कहाँ तक आवश्यक है। क्योंकि सारी मण्डली और कलीसिया पर एक ही आज्ञा थोपना पूर्णतः व्यर्थ है, क्योंकि हम एक दूसरे से इतने भिन्न हैं; एक शरीर में बलवान, दूसरा निर्बल,--इसलिए एक को उसे अधिक मारना पड़ता है, दूसरे को कम, बशर्ते कि शरीर स्वस्थ और परिश्रम के लिए सबसे अच्छी दशा में बना रहे।
परन्तु एक दूसरी भीड़ यहाँ भूल करती है, यह ठान लेती है कि वे उपवास नहीं करेंगे, और कि वे माँस खा सकते हैं, और इसमें वे गलत हैं। क्योंकि ये लोग सुसमाचार को भी ठुकराते हैं, और दूसरों के समान ही निकम्मे हैं; ये पोप की आज्ञा का तिरस्कार करने से अधिक कुछ नहीं करते, अपनी बुद्धि और आत्मा की कमर बाँधने को तैयार नहीं, जैसा पतरस कहता है, शरीर को उसकी मनमानी पर छोड़ देते हैं, कि वह भ्रष्ट और उच्छृंखल हो जाए। उपवास करना अच्छा है; परन्तु केवल वही सच्चा उपवास कहलाया जा सकता है, जब हम शरीर को उतने से अधिक भोजन नहीं देते जितना उसके लिए आवश्यक है कि वह अपना स्वास्थ्य बनाए रखे और परिश्रम और जागरण सह सके--कि बूढ़ा गधा बहुत हठी न हो जाए, और बर्फ़ पर नाचने जाकर कोई हड्डी न तोड़ ले; वरन् नियन्त्रण में चलता रहे, और आत्मा के पीछे चले; उन लोगों की रीति पर नहीं जो जब कभी उपवास करते हैं, अपने आप को मछली और सबसे अच्छे दाखरस से इतना भर लेते हैं कि उनके पेट फूल जाते हैं। इस प्रकार संत पतरस हमें सचेत रहने की आज्ञा देता है, और अब आगे कहता है:
उस अनुग्रह पर अपनी आशा दृढ़ता से (या पूरे सोच-विचार के साथ) लगाओ जो तुम्हें दिया जाता है।_ मसीही विश्वास का स्वभाव ऐसा है कि वह पूरे भरोसे के साथ परमेश्वर के वचन पर निःसंकोच अपने आप को स्थापित करता है, उस पर निःसंकोच सब कुछ दाँव पर लगा देता है, और आनन्द से आगे बढ़ता है। इसलिए पतरस कहना चाहता है: तुम्हारी बुद्धि की कमर बँधी है, और तुम्हारा विश्वास सच्चा है, जब तुम इस प्रकार उस वचन पर उसे दाँव पर लगाते हो, चाहे इसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़े,--सम्पत्ति, आदर, अंग, या प्राण।
इस प्रकार उसने इन शब्दों के द्वारा सचमुच एक सच्चे और निष्कपट विश्वास का भली-भाँति वर्णन किया है। वह कोई भ्रष्ट और ऊँघता हुआ विश्वास न हो, जो इस प्रकार केवल एक स्वप्न बन जाए, वरन् एक जीवित और सक्रिय वास्तविकता हो, ताकि हम पूरे सोच-विचार के साथ अपने आप को उसमें लगा दें और वचन से चिपटे रहें, जिससे परमेश्वर हमारे साथ जैसा भी होने दे, हम भले और बुरे दोनों में से होकर आगे बढ़ते रहें। इस प्रकार जब मैं मरने पर आऊँ तो मुझे तुरन्त मसीह पर सब कुछ दाँव पर लगाना होगा, साहस से अपना सिर उठाना होगा, और परमेश्वर के उस वचन पर भरोसा रखना होगा जो मुझे धोखा नहीं दे सकता। इस प्रकार विश्वास को सीधे आगे बढ़ना होगा, किसी भी बात में अपने आप को भटकने नहीं देना होगा, और जो कुछ वह देखता, सुनता और अनुभव करता है उस सब को जाँच के अधीन करना होगा। संत पतरस ऐसा विश्वास माँगता है जो विचार या शब्द में नहीं, वरन् ऐसी ही सामर्थ्य में हो।
फिर, संत पतरस कहता है: अपनी आशा उस अनुग्रह पर लगाओ जो तुम्हें दिया जाता है। अर्थात्, तुमने इस बड़े अनुग्रह की योग्यता नहीं कमाई है, परन्तु फिर भी यह तुम्हें सेंत-मेंत दिया जाता है; क्योंकि सुसमाचार, जो इस अनुग्रह को प्रगट करता है, हमारा कोई आविष्कार या खोज नहीं है, वरन् पवित्र आत्मा ने इसे स्वर्ग से संसार में भेजा है। परन्तु वह क्या है जो हमें दिया जाता है? यह, जो हम पहले ही सुन चुके हैं, कि जो कोई मसीह पर विश्वास करता और वचन से चिपटा रहता है, वह _उसे_ उन सब आशीषों के साथ पाता है जो उसे देनी हैं, जिससे वह पाप, मृत्यु, शैतान और नरक पर प्रभु है, और अनन्त जीवन का निश्चय रखता है। यह खज़ाना हमारी सहायता या योग्यता के बिना, हाँ, हमारी आशा से परे और हमारे जाने या सोचे बिना, हमारे द्वार तक लाया और हमारी गोद में रखा जाता है। इसलिए प्रेरित चाहता है कि हम आनन्द से उस पर सब कुछ दाँव पर लगाएँ, क्योंकि परमेश्वर, जो हमें ऐसा अनुग्रह देता है, निश्चय ही हमें धोखा नहीं देगा।
यीशु मसीह के प्रगट होने के द्वारा।_ परमेश्वर अपने अनुग्रह का प्रस्ताव मसीह के सिवा और किसी के द्वारा किसी को करने नहीं देता। इसलिए किसी मनुष्य को इस मध्यस्थ के बिना उसके पास आने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, जैसा हम ऊपर पर्याप्त सुन चुके हैं। क्योंकि वह किसी की नहीं सुनेगा, सिवाय उसके जो
उसके प्रिय पुत्र को अपने साथ लाता है, जिस पर ही वह दृष्टि करता है, और उसी के कारण उन पर जो उस पर निर्भर हैं। इसलिए वह चाहता है कि हम पुत्र का अंगीकार करें, कि हम उसके लहू के द्वारा पिता से मिलाए गए हैं, ताकि हम उसके सामने आ सकें। क्योंकि इसी उद्देश्य से मसीह संसार में आया, माँस और लहू धारण किया, और अपने आप को हमसे जोड़ लिया, कि वह पिता से हमारे लिए ऐसा अनुग्रह प्राप्त करे। इसी प्रकार सब भविष्यद्वक्ताओं और कुलपतियों की भी मसीह पर ऐसे ही विश्वास के द्वारा रक्षा हुई और उद्धार हुआ। क्योंकि उन सबने उस प्रतिज्ञा पर विश्वास किया जो परमेश्वर ने अब्राहम से की थी, "तेरे वंश के द्वारा सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।"
इसलिए, जैसा हमने कहा है, यहूदियों और तुर्कों के लिए विश्वास किसी काम का नहीं, और न उनके लिए जो अपने कर्मों पर भरोसा रखते हैं और उनके द्वारा स्वर्ग तक पहुँचना चाहते हैं। इसलिए पतरस कहता है, यह अनुग्रह तुम्हें दिया जाता है, परन्तु यह यीशु मसीह के प्रगट होने के द्वारा है (या इसे हमारी भाषा में और स्पष्ट करें तो), इसलिए कि यीशु मसीह तुम पर प्रगट किया गया है।
सुसमाचार के द्वारा हमें बताया जाता है कि मसीह क्या है, ताकि हम उससे यह भी सीखें कि वह हमारा उद्धारकर्ता है। वह हमें पाप और मृत्यु से छुड़ाता है, और हर बुराई से निकालने में हमारी सहायता करता है, हमें पिता से मिलाता है, और हमारे अपने कर्मों के बिना हमें धर्मी ठहराता और हमारा उद्धार करता है।
तब जो कोई इस प्रकार मसीह का अंगीकार नहीं करता वह अवश्य नाश होगा; क्योंकि यद्यपि तुम जान सकते हो कि वह परमेश्वर का पुत्र है, कि वह मरा और जी उठा है, और पिता के दाहिने हाथ बैठा है,--फिर भी तुमने मसीह को अभी तक सचमुच नहीं जाना, यह सब तुम्हारे किसी काम का नहीं; वरन् यदि तुम्हारा विश्वास तुम्हारी सहायता करे, तो तुम्हें जानना और विश्वास करना होगा कि उसने यह सब तुम्हारे लिए किया है। इसलिए वह एक व्यर्थ, निरर्थक शिक्षा है जिसका अब तक बड़ी पाठशालाओं में प्रचार और शिक्षण होता रहा है, जिन्हें इस ज्ञान का कोई अनुभव नहीं हुआ, और जो केवल यह कल्पना करने तक पहुँच सकीं कि शाप ने हमारे प्रभु मसीह को कैसे पीड़ित किया, और वह कैसे ऊपर स्वर्ग में बिना काम के बैठा है, और अपने आप में आनन्द रखता है; और इस प्रकार उनके हृदय बंजर बने रहते हैं, जिससे उनमें विश्वास जीवित नहीं रह सकता।
परन्तु मसीह वहाँ अपने लिए नहीं खड़ा है, वरन् उसका प्रचार इस रूप में किया जाना चाहिए कि वह हमारा है। क्योंकि नहीं तो क्या आवश्यकता थी कि वह पृथ्वी पर उतर आए और अपना लहू बहाए? परन्तु क्योंकि
वह संसार में भेजा गया है, जैसा वह कहता है, यूहन्ना 3, "कि संसार उसके द्वारा उद्धार पाए।" उसने निश्चय ही इस कार्य को पूरा किया होगा, क्योंकि वह पिता की ओर से भेजा गया था। क्योंकि पिता की ओर से इस भेजे जाने और निकल आने को केवल ईश्वरीय स्वभाव के विषय में ही नहीं, वरन् मानवीय स्वभाव और उसकी सेवकाई के विषय में भी समझना चाहिए।
जैसे ही उसने बपतिस्मा लिया यह आरम्भ हुआ, और उसने इसे पूरा किया है, जिस उद्देश्य से वह भेजा गया और संसार में आया, अर्थात् यह कि वह सत्य का प्रचार करे और उसे हमारे लिए प्राप्त करे, कि जो कोई उस पर विश्वास करे उसका उद्धार हो। इस प्रकार उसने अपने आप को प्रगट किया है, और अपने आप को हमारे ज्ञान के सामने प्रस्तुत किया है, और हमें अनुग्रह दिया है।
पद 14. _आज्ञाकारी बालकों के समान।_ अर्थात्, आज्ञाकारी बालकों के समान आचरण करो। पवित्रशास्त्र में आज्ञाकारिता का अर्थ विश्वास है। परन्तु पोप ने अपनी ऊँची पाठशालाओं और मठों के साथ इस शब्द को भी हमसे छीन लिया है, और इस आज्ञाकारिता के विषय में पवित्रशास्त्र में जो लिखा है उसका झूठा अर्थ लगाया है, जैसे 1 राजाओं 15 [1 शमूएल 15] का यह अंश: "आज्ञा मानना बलि चढ़ाने से उत्तम है।" क्योंकि जब वे देखते हैं कि पवित्रशास्त्र में आज्ञाकारिता की बहुत प्रशंसा की गई है, तो उन्होंने उसका दावा अपने लिए हड़प लिया है, ताकि वे लोगों को अन्धा कर दें, और मनुष्य यह सोचें कि पवित्रशास्त्र जिस आज्ञाकारिता की बात करता है वह उनकी इस बकवास के प्रति आज्ञाकारिता है।
इस प्रकार वे हमें परमेश्वर के वचन से हटाकर अपने झूठ की ओर, और शैतान की आज्ञाकारिता की ओर ले जाना चाहते हैं। जो कोई परमेश्वर का वचन सुनता और उस पर विश्वास करता है, वह परमेश्वर की आज्ञाकारी सन्तान है। इसलिए जो कुछ परमेश्वर का वचन नहीं है, उसे अपने पाँवों तले रौंद दो और उस पर कोई ध्यान न दो।
अपनी अज्ञानता के समय की पुरानी अभिलाषाओं के सदृश बनो।_ अर्थात्, कि तुम पहले के समान ऐसा दिखावा न करो और ऐसा जीवन न बिताओ, और कि तुम उसी दशा में न पाए जाओ जिसमें तुम पहले थे। एक समय तुम भक्तिहीन थे, और लुचपन, पेटूपन, मतवालेपन, लोभ, घमण्ड, क्रोध, डाह और बैर में जीते थे, जो एक बुरी, अन्यजातियों जैसी दशा थी, और अविश्वास की दशा थी, और जब तुम अन्धों के समान ऐसी दशा में चले गए थे, तो तुम नहीं जानते थे कि तुमने क्या किया है। अब उन्हीं बुरी अभिलाषाओं से बचो। यहाँ तुम देखते हो कि वह अज्ञानता पर कैसे दोष लगाता है, कि सारी बुराई उसी से निकलती है। क्योंकि जहाँ विश्वास और मसीह का ज्ञान नहीं है, वहाँ केवल भ्रम और अन्धापन रह जाता है, जिससे मनुष्य नहीं जानते कि क्या उचित है और क्या अनुचित, यहाँ तक कि लोग हर प्रकार के दुर्गुण में गिर पड़ते हैं।
अब तक ऐसा ही हुआ है: जहाँ मसीह को दृष्टि से ओझल और धुँधला कर दिया गया, वहाँ भ्रम प्रबल होने लगा; और सारे संसार में यह प्रश्न खींचतान करता रहा है कि मनुष्य का उद्धार कैसे हो सकता है। यह तुरन्त अन्धेपन या अज्ञानता का चिह्न है, कि विश्वास की सच्ची समझ खो गई है, और कोई उसके विषय में और कुछ नहीं जानता। इसीलिए संसार ऐसे विविध पन्थों से इतना भरा है, और सब बँटे हुए हैं, क्योंकि हर कोई अपने लिए स्वर्ग का अपना ही मार्ग गढ़ना चाहता है। अपने दुर्भाग्य में हमें निरन्तर अपने अन्धेपन में और गहरे गिरते जाना पड़ता है, क्योंकि हम अपनी सहायता नहीं कर सकते। इसलिए संत पतरस कहना चाहता है: तुमने पहले ही अपने आप को बहुत मूर्ख बना लिया है; अब इससे रुक जाओ, क्योंकि तुम्हें शिक्षा मिल चुकी है और तुम सही समझ तक पहुँच गए हो।
पद 15, 16. _परन्तु जैसा तुम्हारा बुलानेवाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल-चलन में पवित्र बनो, क्योंकि लिखा है, पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।_ यहाँ संत पतरस पुराने नियम से एक अंश उद्धृत करता है,
लैव्यव्यवस्था 19, जहाँ परमेश्वर कहता है: "पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ;" अर्थात्, क्योंकि मैं तुम्हारा प्रभु और परमेश्वर हूँ, और तुम मेरी प्रजा हो, इसलिए तुम्हें भी वैसा ही होना चाहिए जैसा मैं हूँ।
क्योंकि एक विश्वासयोग्य स्वामी यह सुनिश्चित करता है कि उसके लोग उसके समान हों, और आज्ञाकारिता में चलें, और स्वामी की इच्छा के अनुरूप हों। तब जैसे परमेश्वर हमारा स्वामी पवित्र है, वैसे ही उसकी प्रजा भी पवित्र है, और यदि हम विश्वास में चलते हैं तो हम सब पवित्र हैं। पवित्रशास्त्र उन संतों के विषय में अधिक नहीं कहता जो मर चुके हैं, वरन् उनके विषय में जो पृथ्वी पर जीवित हैं। इसलिए दाऊद भजन संहिता 85 [86] में अपना दावा प्रस्तुत करता है: "हे प्रभु, मेरे प्राण की रक्षा कर, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।"
परन्तु यहाँ हमारे विद्वानों ने एक बार फिर इस अंश को बिगाड़ दिया है, और वे कहते हैं: भविष्यद्वक्ता को एक विशेष प्रकाशन मिला था, जिससे उसने अपने आप को पवित्र कहा; इसके द्वारा वे स्वयं मान लेते हैं कि वे विश्वास पर अत्याचार करते हैं, और उनके पास यीशु मसीह का प्रकाशन नहीं है, नहीं तो वे निश्चय ही इसका अनुभव करते। क्योंकि जो कोई मसीही है वह अपने भीतर ऐसे प्रकाशन का अनुभव करता है; परन्तु जो इसका अनुभव नहीं करते वे मसीही नहीं हैं। क्योंकि जो कोई मसीही है वह हमारे प्रभु मसीह के साथ उसकी सब अच्छी वस्तुओं में सहभागिता में प्रवेश करता है।
तब क्योंकि मसीह पवित्र है, उसे भी पवित्र होना चाहिए, या फिर इस बात से इनकार करना चाहिए कि मसीह पवित्र है। क्या तूने बपतिस्मा लिया है? तो तूने वह पवित्र वस्त्र पहन लिया है, जो मसीह है, जैसा पौलुस कहता है।
पवित्र शब्द का अर्थ है वह जो परमेश्वर का अपना है, और जो केवल उसी का है, या जैसा हम डच [जर्मन] में अनुवाद करते हैं (_geweiht_), अभिषिक्त या समर्पित। इस प्रकार
पतरस यहाँ कहता है: तुमसे केवल यह माँगा जाता है कि तुम परमेश्वर को उसका अपना दो; इसलिए सावधान रहो कि तुम अपने आप को फिर से सांसारिक अभिलाषाओं की ओर ले जाए जाने न दो, वरन् केवल परमेश्वर को अपने भीतर शासन करने, जीने और कार्य करने दो; तब तुम पवित्र होगे, जैसा वह पवित्र है।
इस प्रकार उसने अब तक उस अनुग्रह का वर्णन किया है जो सुसमाचार और यीशु मसीह के प्रचार के द्वारा हम पर बढ़ाया गया है, और हमें सिखाया है कि इसलिए हमें कैसा आचरण करना चाहिए, अर्थात्: कि हम विश्वास के शुद्ध, अछूते मन में बने रहें, क्योंकि हम जानते हैं कि कोई भी काम जो हम कर सकते या सोच सकते हैं, हमारी कुछ भी सहायता नहीं कर सकता: जब ऐसी शिक्षा का प्रचार किया जाता है, तो बुद्धि आपत्ति करती है, और कहती है, आह! यदि यह सच है, तो मुझे कोई भला काम करने की आवश्यकता नहीं। और तब बड़ी-बड़ी खोपड़ियाँ इस पर टूट पड़ती हैं, और मसीही दशा से शरीर की स्वतन्त्रता निकाल लेती हैं, यह कल्पना करके कि वे जो चाहें कर सकती हैं। इनका सामना संत पतरस यहाँ करता है, और पहले ही से उन्हें रोकता है, और सिखाता है कि हमें अपनी मसीही स्वतन्त्रता का उपयोग केवल परमेश्वर की ओर कैसे करना है। क्योंकि विश्वास के सिवा और कुछ आवश्यक नहीं, इस उद्देश्य से कि मैं परमेश्वर को वह आदर दूँ जो उसका अधिकार है, और उसे अपना परमेश्वर मानकर ग्रहण करूँ, यह अंगीकार करते हुए कि वह न्यायी, सच्चा और दयालु है; ऐसा विश्वास हमें पाप और सब बुराई से स्वतन्त्र करता है। यदि अब मैंने परमेश्वर को ऐसा प्रत्युत्तर दे दिया है, तो जितना समय मैं अभी जीवित हूँ, मुझे अपने पड़ोसी के लिए जीना है, ताकि उसकी सेवा और सहायता करूँ। विश्वास से निकलनेवाला सबसे बड़ा काम यह है: कि मैं अपने मुँह से मसीह का अंगीकार करूँ, उस अंगीकार पर अपने लहू से मुहर लगाऊँ, और यदि ऐसा ही हो तो उसके लिए अपना प्राण दे दूँ। फिर भी परमेश्वर को इस काम की आवश्यकता नहीं; केवल मुझे इसे करना है, कि मेरा विश्वास इसके द्वारा परखा और जाना जाए, ताकि दूसरे भी विश्वास में लाए जाएँ। इसके बाद दूसरे काम भी आते हैं, जो सब इसी उद्देश्य की ओर निर्देशित होने चाहिए कि मैं उनके द्वारा अपने पड़ोसी की सेवा करूँ,--जिन सब को परमेश्वर को हममें करना होगा; क्योंकि इससे कोई लाभ नहीं कि हम शारीरिक जीवन बिताएँ और जो चाहें करें। इसलिए संत पतरस अब कहता है:
पद 17-21. _और जबकि तुम पिता को पुकारते हो, जो बिना पक्षपात हर एक के काम के अनुसार न्याय करता है, तो अपने यहाँ के परदेशीपन का समय भय से बिताओ; और जान लो कि तुम्हारा छुटकारा अपने पूर्वजों की परम्पराओं में चले आ रहे निकम्मे चाल-चलन से नाशवान चाँदी या सोने के द्वारा नहीं हुआ, वरन् मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा, जैसे एक निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने के लहू के द्वारा, जो सचमुच जगत की उत्पत्ति से पहले ही से ठहराया गया था, परन्तु इन अन्तिम समयों में तुम्हारे लिए प्रगट हुआ, जो उसके द्वारा उस परमेश्वर पर विश्वास करते हो, जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया, और उसे प्रभुता दी, ताकि तुम्हारा विश्वास और आशा परमेश्वर पर हो।_
इसलिए संत पतरस कहता है: तुम विश्वास के द्वारा यहाँ तक पहुँच गए हो कि तुम परमेश्वर की सन्तान हो, और वह तुम्हारा पिता है। और तुमने स्वर्ग में एक अविनाशी मीरास प्राप्त की है, (जैसा पहले ही कहा जा चुका है।)
इस प्रकार अब और कुछ शेष नहीं रहता, सिवाय इसके कि परदा हटा दिया जाए, और जो अब छिपा है वह खोल दिया जाए, जिसके लिए तुम्हें अभी तब तक बाट जोहनी है जब तक तुम उसे देख न लो। यद्यपि तुम अब उस दशा में पहुँच गए हो जिसमें तुम आनन्द से परमेश्वर को अपना पिता कह सकते हो, फिर भी वह इतना धर्मी है कि वह हर मनुष्य को उसके कामों के अनुसार प्रतिफल देगा, और पक्षपात नहीं करेगा। इसलिए तुझे यह कल्पना नहीं करनी चाहिए, यद्यपि तेरे पास वह बड़ा नाम है कि तू मसीही या परमेश्वर की सन्तान कहलाता है, कि वह इस कारण तेरा बना रहेगा यदि तू बिना भय के जीता है, और सोचता है कि इतना पर्याप्त है कि तू ऐसे नाम पर घमण्ड करता है। संसार तो व्यक्ति को देखकर न्याय करता है, क्योंकि वह सबको एक समान दण्ड नहीं देता, और उनका पक्ष करता है जो मित्र, धनी, प्रतिष्ठित, विद्वान, बुद्धिमान और शक्तिशाली हैं। परन्तु परमेश्वर इस प्रकार की किसी बात पर ध्यान नहीं देता; उसके लिए सब एक समान है, व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो। इसी प्रकार मिस्र में उसने राजा फ़िरौन के पुत्र को भी मार डाला, और कंगाल चक्कीवाले के पुत्र को भी।
इसलिए प्रेरित चाहता है कि हम परमेश्वर से ऐसे न्याय की आशा रखें, और भय में रहें, ताकि हम अपनी इस उपाधि पर घमण्ड न करें कि हम
मसीही हैं, और फिर उसके कारण लापरवाह न हो जाएँ, मानो वह इस कारण दूसरों की अपेक्षा हमें अधिक आसानी से छोड़ देगा। क्योंकि इसी बात में यहूदी पहले धोखा खा गए, जो घमण्ड करते थे कि वे अब्राहम के वंश और परमेश्वर की प्रजा हैं। पवित्रशास्त्र शरीर के सम्बन्ध में कोई भेद नहीं करता, वरन् आत्मा के सम्बन्ध में करता है। यह सच है कि मसीह को अब्राहम के वंश से जन्म लेना था और उससे एक पवित्र प्रजा निकलनी थी, परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि जो कोई अब्राहम से जन्मा वह सब परमेश्वर की सन्तान है। उसने यह भी प्रतिज्ञा की कि अन्यजातियों का उद्धार होगा, परन्तु उसने यह नहीं कहा कि वह _सब_ का उद्धार करेगा। परन्तु अब यहाँ एक प्रश्न उठता है: जब हम कहते हैं कि परमेश्वर कर्मों पर ध्यान दिए बिना केवल विश्वास के द्वारा हमारा उद्धार करता है, तो संत पतरस क्यों कहता है कि वह व्यक्ति के अनुसार नहीं, वरन् कर्मों के अनुसार न्याय करता है? उत्तर।
हमने जो सिखाया है कि परमेश्वर के सामने केवल विश्वास ही धर्मी ठहराता है, वह निःसन्देह सत्य है, क्योंकि यह पवित्रशास्त्र से इतना स्पष्ट है कि इसका इनकार नहीं किया जा सकता। जो प्रेरित यहाँ कहता है, कि परमेश्वर कर्मों के अनुसार न्याय करता है, वह भी सत्य है; परन्तु इसलिए हमें निश्चय ही यह मानना चाहिए कि जहाँ विश्वास नहीं है, वहाँ कोई भला काम नहीं हो सकता; और दूसरी ओर, कि जहाँ भले काम नहीं हैं वहाँ विश्वास नहीं है।
इसलिए विश्वास और भले कामों को एक साथ जोड़ो, क्योंकि दोनों ही में सम्पूर्ण मसीही जीवन का सार निहित है। जैसा तुम अब जीते हो, वैसा ही तुम्हारे साथ होगा, क्योंकि उसी के अनुसार परमेश्वर तुम्हारा न्याय करेगा। इसलिए यद्यपि परमेश्वर हमारे कामों के अनुसार हमारा न्याय करता है, फिर भी यह सत्य बना रहता है कि काम केवल विश्वास के फल हैं, जिनके द्वारा हम पहचानते हैं कि कहाँ विश्वास है या अविश्वास; इसलिए परमेश्वर तुम्हारे कामों से तुम्हें दण्ड सुनाएगा और दोषी ठहराएगा, कि तुमने विश्वास किया है या नहीं किया। इसी प्रकार कोई भी किसी झूठे को उसके शब्दों के सिवा और किसी आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकता और उसका न्याय नहीं कर सकता। फिर भी यह स्पष्ट है कि वह शब्द के द्वारा झूठा नहीं बनाया जाता, वरन् झूठ बोलने से पहले ही झूठा बन गया था, क्योंकि झूठ को हृदय से मुँह में आना ही होता है। इसलिए इस अंश को इस प्रकार, सबसे सरल रीति से समझो: कि काम विश्वास के फल और चिह्न हैं, और कि परमेश्वर मनुष्यों का न्याय ऐसे फलों के अनुसार करता है जो उसके पीछे अवश्य ही आते हैं, ताकि खुले रूप में देखा जाए कि हृदय में विश्वास है या अविश्वास। परमेश्वर इसके द्वारा यह न्याय नहीं करेगा कि तुम मसीही _कहलाते_ हो, या तुमने बपतिस्मा लिया है, वरन् तुमसे पूछेगा, "क्या तू मसीही _है_? तो मुझे बता कि वे फल कहाँ हैं जिनके द्वारा तू अपना विश्वास प्रमाणित कर सकता है।"
इसलिए संत पतरस आगे कहता है: जबकि तुम्हारा ऐसा पिता है, जो व्यक्ति को देखकर न्याय नहीं करता, तो अपनी तीर्थयात्रा का समय भय से बिताओ; अर्थात्, पिता के सामने भय में रहो, पीड़ा और दण्ड के भय में नहीं,--जैसे मसीह-रहित लोग, और शैतान भी, डरता है,--वरन् इस भय में कि कहीं वह तुम्हें त्याग न दे और अपना हाथ न खींच ले; ठीक जैसे एक कर्तव्यनिष्ठ बालक डरता है कि कहीं वह अपने पिता को क्रोधित न कर दे, और कुछ ऐसा न कर बैठे जो उसे अच्छा न लगे। परमेश्वर हममें ऐसा ही भय चाहता है, कि जब तक हम यहाँ पृथ्वी पर जीते हैं, हम पाप से अपनी रक्षा करें, और अपने पड़ोसी की सेवा करें।
एक मसीही, यदि वह सचमुच विश्वास करता है, तो परमेश्वर की सब अच्छी वस्तुएँ उसके पास हैं, और वह परमेश्वर की सन्तान है, जैसा हम सुन चुके हैं। परन्तु जो समय वह अभी जीता है वह केवल एक तीर्थयात्रा है: क्योंकि आत्मा विश्वास के द्वारा पहले ही स्वर्ग में है, जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं पर प्रभु बन जाता है। परन्तु इसी उद्देश्य से
परमेश्वर उसे अभी शरीर में जीने देता है, और उसके शरीर को पृथ्वी पर रहने देता है, कि वह दूसरों की सहायता करे और उन्हें भी स्वर्ग तक ले आए।
इसलिए हमें पृथ्वी पर की सब वस्तुओं का उपयोग एक अतिथि के समान करना है, जो थका-माँदा चलता हुआ एक सराय में पहुँचता है जहाँ उसे रात बितानी है, और उससे भोजन और ठहरने के स्थान के सिवा कुछ नहीं ले सकता; फिर भी वह यह नहीं कहता कि सराय की सम्पत्ति उसकी है। इसी प्रकार हमें भी अपनी सांसारिक सम्पत्ति के विषय में बरतना चाहिए, मानो वह हमारी नहीं, और हम उसमें से केवल उतना ही भोगें जितना शरीर को सम्भालने के लिए आवश्यक है, और शेष से हमें अपने पड़ोसी की सहायता करनी है। इस प्रकार मसीही जीवन केवल एक रात का पड़ाव है; क्योंकि यहाँ हमारा कोई स्थायी नगर नहीं, वरन् हमें उसे वहाँ पाना है जहाँ हमारा पिता है, स्वर्ग में। संत पतरस कहता है, इसलिए हमें यहाँ उच्छृंखलता में नहीं जीना चाहिए, वरन् भय में रहना चाहिए।
पद 18. _और जान लो कि तुम्हारा छुटकारा अपने पूर्वजों की परम्पराओं में चले आ रहे निकम्मे चाल-चलन से नाशवान चाँदी या सोने के द्वारा नहीं हुआ, वरन् मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा।_ वह कहना चाहता है, यह बात तुम्हें परमेश्वर के उस भय की ओर खींचे, जिसमें तुम्हें रहना चाहिए, कि तुम स्मरण करो कि तुम्हारे छुटकारे के लिए कितना मूल्य चुकाया गया है।
पहले तुम संसार के नागरिक थे, और शैतान के अधीन रखे गए थे, परन्तु अब परमेश्वर ने तुम्हें ऐसी दशा से छुड़ाकर दूसरी दशा में दृढ़ता से स्थापित किया है, जिससे तुम्हारी नागरिकता स्वर्ग में है; परन्तु तुम पृथ्वी पर परदेशी और अतिथि हो। और देखो कि परमेश्वर ने तुम्हें कितना बड़ा मूल्य चुकाकर वापस लिया है, और वह खज़ाना कितना बड़ा है जिससे तुम मोल लिए गए हो, और इस दशा में लाए गए हो कि परमेश्वर की सन्तान बनो। इसलिए अपने परदेशीपन का समय भय से बिताओ, और ध्यान रखो कि तुम ऐसे छुटकारे को तुच्छ न जानो, और उस उत्तम, बहुमूल्य खज़ाने को न खो दो।
अब वह खज़ाना क्या है जिससे तुम छुड़ाए गए हो? नाशवान सोना या चाँदी नहीं, वरन् परमेश्वर के पुत्र मसीह का बहुमूल्य लहू: यह खज़ाना इतना मूल्यवान और उत्तम है कि कोई मानवीय समझ या बुद्धि उसकी कल्पना नहीं कर सकती, यहाँ तक कि इस निर्दोष लहू की केवल एक बूँद सारे संसार के पाप के लिए पर्याप्त से अधिक होती: फिर भी पिता ने अपना अनुग्रह हम पर इतनी बहुतायत से उण्डेलना चाहा है, और अपने आप को इतना
त्याग दिया है कि अपने पुत्र मसीह को हमारे लिए अपना सारा लहू बहाने दिया, और हमें सारा खज़ाना दे दिया है। इसलिए वह नहीं चाहता कि हम ऐसे बड़े अनुग्रह की उपेक्षा करें, और उसे छोटी बात समझें, वरन् चौकस बने रहें, कि भय में जीएँ, ताकि यह खज़ाना हमसे छीन न लिया जाए।
और यहाँ यह ध्यान देना अच्छा है कि संत पतरस कहता है, तुम अपने पूर्वजों की परम्पराओं में चले आ रहे निकम्मे चाल-चलन से छुड़ाए गए हो; क्योंकि इसके द्वारा वह उन सब सहारों को धराशायी कर देता है जिन पर हम टिकते हैं जब हम कल्पना करते हैं कि हमारा मत सही ही होगा क्योंकि वह प्राचीन काल से इसी प्रकार सुरक्षित रहा है, और हमारे सब पूर्वज उसे ऐसा ही मानते आए हैं, जिनमें निश्चय ही बुद्धिमान और भक्त लोग थे। यह ऐसा कहना है, जो कुछ हमारे पूर्वजों ने ठहराया और किया, वह बुरा था; जो कुछ उनसे तुम्हें परमेश्वर की उपासना के विषय में सिखाया गया, वह भी बुरा है; क्योंकि लोगों को उससे छुड़ाने के लिए परमेश्वर के पुत्र को अपना लहू चुकाना पड़ा; इसलिए जो कुछ इस लहू में धोया नहीं गया, वह सब शरीर के कारण विषैला और शापित है। इससे यह निकलता है कि जितना अधिक कोई मनुष्य अपने आप को धर्मी बनाने का प्रयत्न करता है और उसके पास मसीह नहीं, उतना ही अधिक वह अपने आप को उलझाता है, और अन्धेपन और दुष्टता में और गहरा डूबता है, और इस बहुमूल्य लहू के सम्बन्ध में अपने आप को दोषी ठहराता है।
बाहरी बातें, जो अपने आप में महत्वपूर्ण हैं, इसकी तुलना में तुच्छ भी हैं, कि कोई मनुष्य यह सिखाए कि हम कर्मों के द्वारा कैसे धर्मी ठहराए जा सकते हैं, और अपनी बुद्धि के अनुसार परमेश्वर की एक उपासना गढ़े; क्योंकि इसके द्वारा उस निर्दोष लहू का सबसे गहरा अनादर और निन्दा होती है।
अन्यजातियों ने बहुत-से बड़े पाप किए हैं, कि उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा से प्रार्थना की, जिसे वे परमेश्वर की सच्ची उपासना मानते थे, यद्यपि यह दूसरे पापों के साथ जुड़ा था। परन्तु मानवीय धार्मिकता
(मानवीय कर्मों के द्वारा धर्मी ठहरना) परमेश्वर की निरी निन्दा है, और सब पापों में सबसे बड़ा पाप है जो मनुष्य करता है। इसी प्रकार जीवन की वह रीति भी, जिसमें संसार अब व्यस्त है और जिसे वह परमेश्वर की उपासना और भक्ति मानता है, परमेश्वर की दृष्टि में किसी भी दूसरे पाप से अधिक क्रोध दिलानेवाली है, जैसे याजकों और भिक्षुओं की व्यवस्था, जो संसार के सामने सुन्दर दिखाई देती है, फिर भी विश्वास से रहित है। इसलिए जो कोई इस लहू के द्वारा परमेश्वर के सामने अनुग्रह प्राप्त नहीं करना चाहता, उसके लिए यह अच्छा होता कि वह कभी परमेश्वर की उपस्थिति में न आता, क्योंकि इससे वह केवल उसके प्रताप का अधिकाधिक अनादर करता है।
पद 19. _जैसे एक निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने के।_ परन्तु यहाँ संत पतरस पवित्रशास्त्र की व्याख्या करता है,--क्योंकि यह पत्री, यद्यपि इतनी छोटी है, अत्यन्त समृद्ध है,--क्योंकि जैसे ही उसने पूर्वजों की परम्पराओं में उनके निकम्मे चाल-चलन की बात कही, उसे भविष्यद्वक्ताओं में हमारे लिए बहुत-सी शिक्षा मिलती है--जैसे यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता 16 में: "अन्यजातियाँ पृथ्वी की छोर से तेरे पास आकर कहेंगी, हमारे पूर्वज झूठ के साथ भटक गए थे," मानो संत पतरस ने कहा हो, वहाँ भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से कहा कि तुम अपने पूर्वजों की परम्परा से छुड़ाए जाओगे।
इसलिए जब वह यहाँ कहता है, तुम मसीह के लहू के द्वारा, जैसे एक निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने के लहू के द्वारा छुड़ाए गए हो, तो वह फिर से पवित्रशास्त्र की ओर संकेत करना चाहता है, और उसकी व्याख्या करना चाहता है जो भविष्यद्वक्ताओं और मूसा में है--जैसे यशायाह 53: "जैसे भेड़ वध होने के लिए ले जाई जाती है, वैसे ही वह ले जाया गया।" इसी प्रकार निर्गमन 12 के फसह के मेम्ने के प्रतिरूप के विषय में, यह सब वह यहाँ समझाता है, और कहता है, यह मेम्ना मसीह है; और जैसे प्राचीन काल का मेम्ना निष्कलंक होना चाहिए था, वैसे ही यह भी, जिसका लहू हमारे लिए बहाया गया, निष्कलंक और निर्दोष होना चाहिए।
पद 20. _जो सचमुच जगत की उत्पत्ति से पहले ही से ठहराया गया था, परन्तु इन अन्तिम समयों में तुम्हारे लिए प्रगट हुआ।_ अर्थात्, हमने परमेश्वर से इसकी योग्यता नहीं कमाई और न इसके लिए प्रार्थना ही की, कि मसीह का बहुमूल्य लहू हमारे लिए बहाया जाए, इसलिए हम किसी भी बात में घमण्ड नहीं कर सकते; महिमा केवल परमेश्वर ही की है। परमेश्वर ने हमारे किसी पुण्य के कारण नहीं, वह प्रतिज्ञा की और हम पर प्रगट किया या हमें बताया, जो उसने अनादि काल से, जगत के बनाए जाने से पहले, ठहराया और पूर्वनियत किया था। भविष्यद्वक्ताओं में इसकी प्रतिज्ञा तो की गई है, फिर भी धुँधले रूप में और खुले रूप में नहीं; परन्तु अब, मसीह के जी उठने और पवित्र आत्मा के भेजे जाने के बाद से, इसका सार्वजनिक रूप से प्रचार किया जाता है और सारे संसार में फैलाया जाता है।
अब यह पिछला युग (अन्तिम समय) है, जैसा संत पतरस कहता है, जिसमें हम जीते हैं--अब--मसीह के स्वर्गारोहण से लेकर अन्तिम दिन तक। इसलिए प्रेरित और भविष्यद्वक्ता, और स्वयं मसीह भी, इसे अन्तिम घड़ी कहते हैं; इसलिए नहीं कि अन्तिम दिन मसीह के स्वर्गारोहण के तुरन्त बाद आनेवाला था, वरन् इसलिए कि मसीह के सुसमाचार के इस प्रचार के बाद कोई दूसरा कभी नहीं आएगा; और कोई और प्रकाशन या प्रगटीकरण नहीं होगा, सिवाय इसके कि इसी की व्याख्या की जाए और इसे प्रगट किया जाए। एक के बाद एक प्रकाशन तो निकलता रहा है।
इसलिए परमेश्वर कहता है, निर्गमन 6, "अपने यहोवा नाम से मैं उन पर प्रगट न हुआ।" क्योंकि कुलपिताओं ने, यद्यपि वे परमेश्वर को जानते थे, फिर भी उस समय उसका ऐसा स्पष्ट प्रगटीकरण नहीं पाया था जैसा बाद में मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया; परन्तु अब सुसमाचार से बढ़कर उसका कोई अधिक महिमामय या स्पष्ट प्रगटीकरण संसार में नहीं आया।
इसलिए यह अन्तिम है; सब व्यवस्थाएँ (युग-विधान) अपना काल पूरा कर चुकी हैं, सिवाय वर्तमान के,--अन्तिम के,--जो हम पर प्रगट किया गया है।
इसके अतिरिक्त, अब से संसार के अन्त तक का समय लम्बा नहीं है, जैसा संत पतरस 2 पतरस 3 में दिखाता है, जहाँ वह कहता है: "प्रभु के यहाँ एक दिन हज़ार वर्ष के बराबर है, और हज़ार वर्ष एक दिन के बराबर।" और इसलिए वह समय की इस गणना के द्वारा हमें परमेश्वर की रीति के अनुसार यह निष्कर्ष निकालने की ओर ले जाना चाहता है कि यह अन्तिम समय है, और अन्त निकट आ रहा है, परन्तु जो समय अभी शेष है वह परमेश्वर की दृष्टि में कुछ भी नहीं। उद्धार पहले ही प्रगट और पूरा हो चुका है: परमेश्वर संसार को अभी और समय तक केवल इसलिए बने रहने देता है कि उसके नाम का और अधिक व्यापक रूप से आदर और स्तुति हो, यद्यपि वह अपनी ओर से अब पूरी तरह प्रगट हो चुका है।
पद 21. _तुम्हारे लिए, जो उसके द्वारा उस परमेश्वर पर विश्वास करते हो, जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया, और उसे प्रभुता दी, ताकि तुम्हारा विश्वास और आशा परमेश्वर पर हो।_ वह कहता है, हमारे लिए सुसमाचार प्रगट किया गया है। क्योंकि परमेश्वर और प्रभु मसीह को इसकी आवश्यकता नहीं थी, वरन् उन्होंने इसे हमारे लाभ के लिए किया है, कि हम उन पर विश्वास करें; और वह भी अपने द्वारा नहीं, वरन् मसीह के द्वारा, जो पिता के सामने हमारे लिए बिनती करता है, जिसे उसने मरे हुओं में से जिलाया है, कि वह सब वस्तुओं पर प्रभु हो; ताकि जो कोई उस पर विश्वास करता है उसके पास उसकी सब अच्छी वस्तुएँ हों, और उसके द्वारा उसकी पिता तक पहुँच हो। इस प्रकार परमेश्वर पर हमारा विश्वास है, और उसी विश्वास के द्वारा एक आशा है। केवल विश्वास ही हमारा उद्धार करे, परन्तु वह परमेश्वर पर विश्वास होना चाहिए; क्योंकि यदि परमेश्वर हमारी सहायता नहीं करता, तो हमारी सहायता नहीं होती; इसलिए यह पर्याप्त नहीं, चाहे तुम्हारे पास सब मनुष्यों की मित्रता हो, वरन् तुम्हारे पास परमेश्वर की मित्रता होनी चाहिए, ताकि तुम घमण्ड कर सको कि वह तुम्हारा पिता है, और तुम उसकी सन्तान हो, और अपने प्रिय पिता और माता से भी बढ़कर उस पर भरोसा रखो कि वह तुम्हारे सब कष्टों में तुम्हारी सहायता करेगा, और यह केवल एक ही मध्यस्थ और उद्धारकर्ता, प्रभु मसीह के द्वारा। (वह कहता है) ऐसा विश्वास मानवीय सामर्थ्य से नहीं आता, वरन् परमेश्वर उसे हममें उत्पन्न करता है, क्योंकि मसीह ने अपने लहू के द्वारा उसे अर्जित किया है; जिसे उसने महिमा दी है, और जिसे उसने अपने दाहिने हाथ बैठाया है, कि वह परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा हममें विश्वास उत्पन्न करे।
अब तक हमने संत पतरस को हमें यह चिताते सुना है कि हम अपनी बुद्धि की कमर बाँधें, ताकि हम निर्मल बने रहें और विश्वास में जीएँ; फिर यह भी, जो इस बीच इतना महत्वपूर्ण है, कि हम भय में चलें और कभी न भूलें कि हम मसीही कहलाते हैं, क्योंकि परमेश्वर ऐसा न्यायी है जो किसी का पक्षपात नहीं करता, वरन् व्यक्तियों का भेद किए बिना एक का वैसा ही न्याय करता है जैसा दूसरे का।
पद 22-25. _और सत्य की आज्ञा मानने के द्वारा आत्मा में अपनी आत्माओं को भाइयों की निष्कपट प्रीति के लिए पवित्र करो, और शुद्ध मन से एक दूसरे से तन-मन लगाकर प्रेम रखो, क्योंकि तुमने नाशवान नहीं वरन् अविनाशी बीज से, अर्थात् परमेश्वर के जीवते वचन के द्वारा, जो सदा बना रहता है, नया जन्म पाया है। क्योंकि सब प्राणी घास के समान हैं, और मनुष्य की सारी शोभा घास के फूल के समान है। घास सूख जाती है, और उसका फूल झड़ जाता है, परन्तु प्रभु का वचन सदा बना रहेगा; और यही वह वचन है जो तुम्हें सुनाया गया था।_
पौलुस गलातियों 5 में उन फलों को बताता है जो विश्वास के पीछे आते हैं। वह कहता है, आत्मा के फल आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, संयम हैं। इसी प्रकार संत पतरस यहाँ विश्वास के फल के विषय में बोलता है,--अर्थात् यह कि हम सत्य की आज्ञा मानने के द्वारा आत्मा में अपनी आत्माओं को पवित्र करें। क्योंकि जहाँ सच्चा विश्वास है वहाँ वह शरीर को अपने अधीन कर लेता है, और शारीरिक अभिलाषा पर नियन्त्रण रखता है; और यद्यपि वह उसे पूरी तरह नष्ट नहीं करता, फिर भी उसे आत्मा के अधीन और आज्ञाकारी बना देता है, और उसे वश में रखता है।
संत पौलुस भी यही बात कहना चाहता है जब वह आत्मा के फलों की बात करता है। यह एक बड़ी उपलब्धि है कि आत्मा शरीर पर नियन्त्रण प्राप्त कर ले, और उस बुरी अभिलाषा को रोके जो हमारे माता-पिता से हममें उतरती है: क्योंकि यह सम्भव नहीं कि अनुग्रह के बिना हम विवाहित दशा में पवित्र जीवन बिताने में सफल हों, अविवाहितों की तो बात ही क्या।
परन्तु तब वह क्यों कहता है, अपनी आत्माओं को पवित्र करो? वह भली-भाँति जानता है कि शरीर की अभिलाषाएँ बपतिस्मा के बाद भी, कब्र तक, हमारे साथ बनी रहती हैं। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि कोई व्यक्ति कामों से रुका रहे और बाहर से शुद्ध बना रहे, जबकि वह बुरी अभिलाषाओं को अपने हृदय से चिपटे रहने देता है, वरन् उसे इसके बाद सावधान रहना होगा कि आत्मा शुद्ध हो, और जो कुछ हृदय से निकलता है वह भी, और कि आत्मा इन दुष्ट अभिलाषाओं और लालसाओं का विरोध करे, और निरन्तर उनसे लड़ती रहे, जब तक वह उनकी शक्ति से मुक्त न हो जाए।
और यहाँ वह एक उत्तम उपाय जोड़ता है: कि हम अपनी आत्माओं को पवित्र करें,[3] _आत्मा में सत्य की आज्ञा मानने के द्वारा_। ब्रह्मचर्य (शुद्धता) पर बहुत प्रचार किया गया है, और इस विषय पर बहुत-सी पुस्तकें रची गई हैं। उन्होंने कहा है, हमें इतने लम्बे समय तक उपवास करना चाहिए, हमें माँस नहीं खाना चाहिए, हमें दाखरस नहीं पीना चाहिए, इत्यादि, ताकि हम परीक्षा से मुक्त रहें। इन बातों ने शायद उस उद्देश्य में कुछ सहायता की हो, परन्तु यह पर्याप्त नहीं रहा, इससे अभिलाषा वश में नहीं हुई।
[पाद-टिप्पणी 3: उन्हें शुद्ध (संयमी) बनाओ।] इसी प्रकार संत जेरोम अपने विषय में लिखता है कि उसने अपने शरीर को इतना मारा था कि वह एक मूर (काले हब्शी) के समान हो गया था; फिर भी इससे कोई लाभ नहीं हुआ था, और उसने स्वप्न देखा था कि वह रोम में वेश्याओं के बीच रंगरेलियों में है।
संत बर्नार्ड ने भी अपने आप को ऐसी कठोर तपस्याओं के अधीन किया, और अपने शरीर को इतना मारा कि वह घृणित हो गया, जैसा मैंने ऊपर कहा। उन्होंने कठोर परीक्षा सही, और इस प्रकार बाहरी उपायों से उसे वश में करने का विचार किया। परन्तु क्योंकि यह बाहरी है, यह केवल एक बाहरी लेप है, जिसका भीतर कोई उपयोग नहीं। इसलिए यह अभिलाषा को वश में करने के लिए पर्याप्त नहीं।
परन्तु यहाँ संत पतरस ने एक उचित औषधि बताई है,--अर्थात् आत्मा में सत्य की आज्ञाकारिता, जैसा पवित्रशास्त्र ने दूसरे स्थानों में भी किया है,--जैसे यशायाह 11: "विश्वास उसके गुर्दों का पटुका होगा।"
यही सच्चा लेप है जो गुर्दों की कमर बाँधता है, क्योंकि उसे भीतर से बाहर की ओर निकलना चाहिए, बाहर से भीतर की ओर नहीं। क्योंकि अभिलाषा माँस और लहू, मज्जा और जीवित देह के दूसरे अंगों में घुस गई है; वह पहनावे या वस्त्रों में बाहर नहीं है। इसलिए यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि हम बाहरी वस्तुओं से अभिलाषा को वश में कर लेंगे; हम उपवासों और परिश्रमों से शरीर को दुर्बल कर सकते और उसे नष्ट कर सकते हैं, परन्तु इससे बुरी अभिलाषाएँ निकाली नहीं जातीं; फिर भी विश्वास उन्हें वश में कर सकता है, और उन पर पहरा दे सकता है, कि वे आत्मा को स्थान देने के लिए विवश हों।
इसी प्रकार जकर्याह भविष्यद्वक्ता 9 में उस दाखरस के विषय में बोलता है जो मसीह के पास है, जिससे शुद्ध लोग बढ़ते हैं, और जिसे वह उन्हें पीने को देता है। दूसरा दाखरस प्रायः दुष्ट अभिलाषा को न्योता देता है, परन्तु यह दाखरस,--अर्थात् सुसमाचार,--उसे वश में करता है, और हृदय को पवित्र बनाता है।
संत पतरस इसी की बात करता है जब कोई सत्य को हृदय से ग्रहण करता है, और आत्मा में उसकी आज्ञा मानता है। यही इसकी सच्ची सहायता और सबसे सामर्थी औषधि है, क्योंकि तुम्हें ऐसी कोई दूसरी नहीं मिलेगी जो इसके समान सब बुरे विचारों को शान्त कर सके; क्योंकि यदि यह हमारे हृदयों में प्रवेश करता है, तो बुरे झुकाव शीघ्र ही चले जाते हैं; जो चाहे इसे आज़माकर देखे, वह इसे सच पाएगा, और जिसने इसे आज़माया है, वह इसे भली-भाँति जानता है; परन्तु शैतान किसी को सहज ही इस तक पहुँचने, और परमेश्वर के वचन को ऐसा समझने नहीं देता कि वह उसमें आनन्दित हो; क्योंकि वह भली-भाँति जानता है कि यह बुरी अभिलाषाओं और विचारों को वश में करने में कितना सामर्थी है।
इसलिए संत पतरस यहाँ कहना चाहता है, यदि तुम पवित्र (शुद्ध) बने रहना चाहते हो, तो तुम्हें आत्मा में सत्य की आज्ञा माननी होगी, अर्थात्,--हमें परमेश्वर का वचन केवल पढ़ना और सुनना ही नहीं, वरन् उसे अपने हृदयों में ग्रहण करना है। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि कोई मनुष्य एक बार सुसमाचार का प्रचार करे या उसे सुने, वरन् उसे सदा उसके पीछे लगे रहना और उसमें स्थिर रहना होगा; क्योंकि वचन में ऐसा अनुग्रह है कि जितना अधिक हम उसका स्वाद लेते हैं उतना ही वह अधिक आनन्ददायक होता है; यद्यपि सर्वत्र विश्वास की एक ही और वही शिक्षा है, फिर भी जहाँ हृदय उच्छृंखल और अनियन्त्रित नहीं है, वहाँ उसे बहुत अधिक नहीं सुना जा सकता।
भाइयों की निष्कपट प्रीति।_ तब हमें किस उद्देश्य से पवित्र और शुद्ध जीवन बिताना है? क्या इसलिए कि हम उसके द्वारा उद्धार पाएँ? नहीं! वरन् इसलिए कि हम अपने पड़ोसी के लिए उपयोगी हों। मैं क्या करूँ कि अपने पाप को रोक सकूँ? मुझे आत्मा में सत्य की आज्ञाकारिता रखनी है। परन्तु मुझे उसे क्यों रोकना है? इसलिए कि मैं दूसरों की सेवा कर सकूँ, क्योंकि मुझे पहले आत्मा के द्वारा अपनी देह और शरीर पर नियन्त्रण करना होगा, और इस प्रकार मैं बाद में दूसरों की सेवा कर सकता हूँ।--आगे यह आता है:
शुद्ध मन से एक दूसरे से तन-मन लगाकर प्रेम रखो।_ प्रेरित पतरस और पौलुस भाईचारे की प्रीति, और सामान्य प्रेम में एक दूसरे से भेद करते हैं। भाईचारा यह है, कि मसीही सब मिलकर भाइयों के समान रहें, और आपस में कोई भेद न करें। क्योंकि हम सबका एक ही साझा मसीह, एक बपतिस्मा, एक विश्वास, एक खज़ाना है, इसलिए मैं तुझसे अच्छा नहीं; जो तेरे पास है,
वह मेरे पास भी है, और मैं ठीक उतना ही धनी हूँ जितना तू। खज़ाना वही है, सिवाय इसके कि वह मेरे पास तुझसे अच्छे रूप में हो सकता है, क्योंकि मेरे पास वह सोने में रखा हो सकता है, परन्तु तेरे पास एक दीन वस्त्र में। इसलिए जैसे मसीह का अनुग्रह और सब आत्मिक आशीषें हमारी साझी हैं, वैसे ही हमें शरीर और प्राण, सम्पत्ति और आदर भी साझे रखने चाहिए, कि एक सब बातों में दूसरे की सेवा करे।
यहाँ वह स्पष्ट कहता है: _निष्कपट भाईचारे की प्रीति में_। प्रेरित इस शब्द का प्रयोग करना पसन्द करते हैं, परन्तु उन्होंने स्पष्ट देख लिया है कि यदि हम सब के सब बिना भेद एक दूसरे के साथ मसीही और भाई कहलाएँ, तो यह झूठा, एक दिखावटी या कल्पित बात होगी, और केवल कपट होगा।
संसार में हमने बहुत-से भाईचारे (धार्मिक बिरादरियाँ) स्थापित किए हैं, परन्तु वे व्यर्थ धोखे और भ्रष्टताएँ हैं, जिन्हें शैतान ने गढ़ा और संसार में ले आया है, जो केवल सच्चे विश्वास और सच्चे भाईचारे की प्रीति के विरोधी हैं। मसीह उतना ही मेरा है जितना संत बर्नार्ड का; उतना ही तेरा जितना संत फ्रांसिस का; इसलिए यदि कोई तेरे पास आकर कहे, यदि मैं इस या उस बिरादरी का सदस्य हूँ तो मैं स्वर्ग जाऊँगा, तो उससे कह दे कि वह धोखे में है; क्योंकि मसीह उस साझे भाईचारे को छोड़, जो हम सबका एक दूसरे के साथ है, किसी दूसरे को न सह सकता है और न होने देगा; फिर भी तू, हे मूर्ख, यहाँ आकर अपना एक अलग भाईचारा स्थापित करना चाहता है। इतना मैं सहज ही होने दूँगा, कि वे स्थापित किए जाएँ, आत्मा की सहायता के लिए नहीं, वरन् किसी के दान-कोष के रूप में, और इस प्रकार एक निधि का काम दें जिससे ज़रूरतमन्दों की सहायता की जाए।
इस प्रकार हम सब, मसीही होने के नाते, बपतिस्मा में एक भाईचारे तक पहुँचे हैं, जिसमें किसी संत के पास मुझसे या तुझसे अधिक कुछ नहीं। क्योंकि जितने बहुमूल्य दाम में वह मोल लिया गया, उसी दाम में मैं भी मोल लिया गया। परमेश्वर ने मेरे लिए उतना ही लगाया है जितना सबसे बड़े संत के लिए, सिवाय इसके कि _उसने_ उस खज़ाने का अधिक अच्छा उपयोग किया हो, और उसका विश्वास मुझसे अधिक दृढ़ हो।
परन्तु प्रेम भाईचारे से बड़ा है, क्योंकि वह हमारे शत्रुओं तक भी फैलता है, और विशेषकर उन तक जो प्रेम के योग्य नहीं। क्योंकि जैसे विश्वास वहाँ अपना काम करता है जहाँ वह कुछ नहीं देखता, वैसे ही प्रेम को भी कुछ नहीं देखना चाहिए, और विशेषकर वहाँ अपना काम करना चाहिए जहाँ कुछ भी प्रेम करने योग्य दिखाई नहीं देता, वरन् केवल अप्रीति और शत्रुता। जहाँ कुछ भी मुझे अच्छा नहीं लगता, वहाँ मुझे और भी अधिक प्रसन्न होने का यत्न करना चाहिए। और संत पतरस कहता है, यह भाव तन-मन लगाकर, सारे हृदय से निकलना चाहिए, ठीक जैसे परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया जब हम प्रेम के योग्य नहीं थे।--अब आगे यह आता है:
जिन्होंने नया जन्म पाया है।_ फिर से, हमें यह करना चाहिए, क्योंकि (वह कहता है) हम वह नहीं हैं जो पहले थे, वरन् नई सृष्टि बन गए हैं। यह कामों के द्वारा नहीं हुआ है, वरन् नये जन्म का परिणाम है। क्योंकि तू नये मनुष्य को बना नहीं सकता, वरन् उसे बढ़ना, या जन्म लेना होगा; जैसे एक किसान वृक्ष को बना नहीं सकता, वरन् उसे अपने आप पृथ्वी से उगना होता है, और जैसे हम निश्चय ही आदम की सन्तान नहीं बनते, सिवाय इसके कि हम जन्म लें और अपने माता-पिता से पाप पाएँ। इसी प्रकार यहाँ यह कामों के द्वारा नहीं हो सकता कि हम परमेश्वर की सन्तान बनें, वरन् हमें भी नये जन्म का अनुभव करना होगा। इसलिए प्रेरित यही कहना चाहता है: तब जबकि तुम नई सृष्टि बन गए हो, तुम्हें पहले से भिन्न आचरण करना चाहिए, और नया जीवन बिताना चाहिए। जैसे तुम पहले बैर में जीते थे, वैसे अब तुम्हें प्रेम में चलना है--हर बात में उलटा। परन्तु नया जन्म कैसे हुआ है? यह भी आगे आता है:
पद 23. _नाशवान नहीं, वरन् अविनाशी बीज से, अर्थात् परमेश्वर के जीवते वचन के द्वारा जो सदा बना रहता है।_ एक बीज के द्वारा हम नया जन्म पाते हैं, क्योंकि जैसा हम देखते हैं, बीज के बिना और किसी रीति से कुछ नहीं उगता।
क्या पुराना जन्म एक बीज से निकला? तो नया जन्म भी एक बीज से ही निकलना चाहिए। परन्तु यह बीज क्या है? माँस और लहू नहीं! तो फिर क्या? यह नाशवान नहीं, वरन् एक अनन्त वचन है। इसके अतिरिक्त, यह वह है जिस पर हम जीते हैं,--भोजन और पोषण। परन्तु विशेष रूप से यह वह बीज है जिसके द्वारा हम नया जन्म पाते हैं, जैसा वह यहाँ कहता है।
परन्तु यह कैसे होता है? इस रीति से: परमेश्वर वचन को--सुसमाचार को--बाहर जाने देता है, और बीज मनुष्यों के हृदयों में गिरता है, और जहाँ कहीं वह हृदय में जम जाता है वहाँ पवित्र आत्मा उपस्थित होता है, और एक नया मनुष्य बनाता है; तब मनुष्य दूसरा हो जाता है, दूसरे विचारों का, दूसरे शब्दों और कामों का। इस प्रकार तू पूरी तरह बदल जाता है। जिस किसी से तू पहले बचता था, अब उसे ढूँढ़ता है, और जिसके पीछे तू पहले भागता था उससे अब दूर भागता है। शरीर के जन्म के विषय में यह बात है कि जब गर्भ ठहरता है तो बीज बदल जाता है, जिससे वह फिर बीज नहीं रहता। परन्तु यह एक ऐसा बीज है जो बदला नहीं जा सकता; वह सदा बना रहता है; वह मुझे बदल देता है, जिससे मैं उसमें रूपान्तरित हो जाता हूँ, और जो कुछ मुझमें बुरा है वह मेरे स्वभाव से जाता रहता है। इसलिए यह सचमुच एक अद्भुत जन्म है, और असाधारण बीज से है।--अब संत पतरस आगे कहता है:
पद 24, 25. _क्योंकि सब प्राणी घास हैं, और मनुष्य की सारी शोभा घास के फूल के समान है; घास सूख जाती है, और उसका फूल झड़ जाता है, परन्तु प्रभु का वचन सदा बना रहेगा।_ यह अंश यशायाह भविष्यद्वक्ता 40 से लिया गया है, जहाँ भविष्यद्वक्ता इस रीति से बोलता है: "पुकार! मैं क्या पुकारूँ? यों पुकार: सब प्राणी घास हैं, और उनकी सारी शोभा मैदान के फूल के समान है; घास सूख जाती है और फूल झड़ जाता है, परन्तु परमेश्वर का वचन सदा बना रहेगा।" इन शब्दों को संत पतरस यहाँ लाता है; क्योंकि जैसा मैंने कहा है, यह एक समृद्ध पत्री है, और पवित्रशास्त्र से भली-भाँति मसालेदार है।
तब पवित्रशास्त्र यों कहता है: _परमेश्वर का वचन सदा बना रहता है।_ जो माँस और लहू है वह नाशवान है, उस घास के समान जो अभी हरी है, कि उसमें फूल खिलते हैं; इसी प्रकार जो कुछ धनी, बलवान, बुद्धिमान और सुन्दर है, और इस प्रकार फल-फूल रहा है (जो सब फूल ही से सम्बन्धित है), फिर भी तुम उसके फूल को मुरझाते देखते हो; जो जवान और बलवान था वह बूढ़ा और कुरूप हो जाएगा; जो धनी है वह कंगाल हो जाएगा, इत्यादि। और सब कुछ परमेश्वर के वचन के द्वारा गिरना ही है। परन्तु यह बीज नाश नहीं हो सकता।--अब पतरस समाप्त करता है:
यही वह वचन है जो तुम्हें सुनाया गया था।_ मानो वह कहना चाहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचन तक पहुँचने के लिए दूर नहीं देखना है; वह तुम्हारी आँखों के सामने है; वचन वह है जिसका हम प्रचार करते हैं; उसके द्वारा तुम सब बुरी अभिलाषाओं को वश में कर सकते हो। तुम्हें उसे दूर से नहीं ढूँढ़ना है; जब उसका प्रचार किया जाता है तो उसे पूरी तरह ग्रहण करने के सिवा तुम्हें और कुछ नहीं करना है। क्योंकि वह हमारे इतने निकट है कि हम उसे सुन सकते हैं, जैसा मूसा भी व्यवस्थाविवरण 30 में कहता है: "जो वचन मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ वह तुझसे दूर नहीं, कि तुझे उसके लिए दूर जाना पड़े; स्वर्ग पर चढ़ना या समुद्र पार जाना पड़े, वरन् वह तेरे निकट, हाँ, तेरे मुँह और तेरे हृदय में है।" वह तो शीघ्र ही कहा और सुना जाता है। परन्तु यदि वह हमारे हृदयों में प्रवेश करता है तो वह न मर सकता है न नाश हो सकता है, और तुम्हें नाश नहीं होने देगा; जब तक तुम उससे चिपटे रहोगे, वह तुमसे चिपटा रहेगा।
जैसे जब मैं सुनता हूँ कि यीशु मसीह मेरे पापों को दूर करने के लिए मरा, और उसने मेरे लिए स्वर्ग मोल लिया है, और जो कुछ उसके पास है वह सब मुझे देता है, तब मैं सुसमाचार सुनता हूँ; यदि कोई इसका प्रचार करता है तो वचन शीघ्र ही चला जाता है, परन्तु यदि वह हृदय में गिरता है और विश्वास के द्वारा ग्रहण किया जाता है, तो वह कभी नहीं मिट सकता। इस सत्य को कोई प्राणी उलट नहीं सकता; सबसे स्पष्ट तर्क भी इसके विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता; और यदि मैं भी शैतान के जबड़ों में रहते हुए उस पर प्रहार करना चाहूँ, और इसे थाम सकूँ, तो मुझे इसी के आधार पर उसका सामना करना होगा और वचन पर दृढ़ बने रहना होगा। इसलिए वह ठीक ही कहता है, तुम्हें उस सुसमाचार को छोड़ जो हमने तुम्हें सुनाया है, किसी दूसरे सुसमाचार की खोज नहीं करनी है।
इसी प्रकार संत पौलुस भी रोमियों के नाम पत्री के आरम्भिक भाग में कहता है: "मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, क्योंकि वह हर एक विश्वास करनेवाले के उद्धार के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है।" वचन एक ईश्वरीय और अनन्त सामर्थ्य है; क्योंकि यद्यपि आवाज़ या बोली शीघ्र ही चली जाती है, फिर भी सार बना रहता है,--अर्थात् अर्थ, सत्य, जो आवाज़ के द्वारा पहुँचाया जाता है। जैसे जब मैं एक कटोरा जिसमें दाखरस है अपने मुँह से लगाता हूँ, तो मैं दाखरस निगल जाता हूँ, यद्यपि कटोरे को अपने गले में नहीं ठूँसता।
इसी प्रकार वह वचन भी है जिसे आवाज़ पहुँचाती है; वह हमारे हृदयों में गिरता है और जीवित रहता है, जबकि आवाज़ बाहर रह जाती और मिट जाती है।
इसलिए यह सचमुच एक ईश्वरीय सामर्थ्य है; हाँ, यह स्वयं परमेश्वर है। क्योंकि इस प्रकार वह मूसा से कहता है, निर्गमन 4: "मैं तेरे मुँह के संग रहूँगा;" और भजन संहिता 80 [81]: "अपना मुँह पसार, शुभ समाचार सुना; कह कि तू भूखा है, मैं तुझे तृप्त करूँगा, मैं शीघ्र ही तुझसे सान्त्वना की बातें कहूँगा।"
इसी प्रकार यूहन्ना 14 में भी मसीह कहता है: "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ।" जो कोई इस पर भरोसा रखता है वह परमेश्वर से जन्मा है; इसलिए हमारे प्रभु का यह बीज स्वयं ईश्वरीय है। यह सब हमें यह सिखाने के लिए है कि कामों के द्वारा हमारी सहायता नहीं हो सकती। यद्यपि वचन एक छोटी-सी बात है, और जब वह मुँह से निकलता है तो कुछ भी नहीं प्रतीत होता, फिर भी उसमें ऐसी अपार सामर्थ्य है कि वह उस पर भरोसा रखनेवालों को परमेश्वर की सन्तान बना देता है। यूहन्ना 1। इस प्रकार हमारा उद्धार हमें एक उच्च धन्यता तक उठा देता है।
यह इस पत्री का पहला अध्याय है, जिसमें तुम देखते हो कि संत पतरस कैसी निपुण रीति से विश्वास का प्रचार और विवेचन करता है, जिससे हम सहज ही देखते हैं कि यह पत्री सच्चा सुसमाचार है। अब दूसरा अध्याय आता है, जो हमें कामों के विषय में शिक्षा देगा, कि हमें कैसे
