अध्याय 1

पहला उपदेश

The Prophecy of Christ's Death and Passion: Sermons on Isaiah 53 · John Calvin

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पहला उपदेश

शीर्षक पृष्ठ

यशायाह से लिया गया, मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के विषय में

उसकी भविष्यद्वाणी पर उपदेश

पहला उपदेश

यशायाह, अध्याय LII

13. देखो, मेरा दास सफल होगा, वह महान किया जाएगा, वह ऊँचे पर उठाया जाएगा, वह अत्यन्त महान ठहरेगा। 14. जैसे बहुत से लोग तुझे देखकर चकित हुए, क्योंकि उसका मुख किसी भी मनुष्य से अधिक बिगड़ा हुआ था, और उसका रूप मनुष्यों की सन्तानों से भी अधिक — 15. वैसे ही वह बहुत सी जातियों पर जल छिड़केगा; राजा उसके कारण अपना मुँह बन्द करेंगे; क्योंकि जो बात उन्हें बताई नहीं गई थी उसे वे देखेंगे, और जो उन्होंने नहीं सुना था उस पर वे ध्यान करेंगे।

अध्याय LIII 1. हमारे समाचार पर किसने विश्वास किया? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रगट हुआ है?

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भविष्यद्वक्ता ने यहूदियों की सारी प्रजा के विषय में सामान्य रूप से कह लेने के बाद, अब उस शिरोमणि के पास आता है जिस पर वह सब निर्भर था जो उसने ऊपर कहा है। क्योंकि उनका छुटकारा हमारे प्रभु यीशु मसीह को छोड़ और किसी पर आधारित नहीं था, जैसे परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ उसी में पूरी होती हैं। अब छुड़ानेवाले की प्रतिज्ञा तो बहुत पहले ही की जा चुकी थी; परन्तु जब ऐसा दिखाई देने लगा कि दाऊद का वंश बिलकुल बुझ गया है, तब विश्वासियों की आशा भी मिट सकती थी। कहा गया था कि परमेश्वर सदा एक राजा को स्थापित करेगा और उसे दाऊद के सिंहासन पर बैठाएगा, और जब तक आकाश में सूर्य और चन्द्रमा हैं तब तक वह राज्य बना और सुरक्षित रहेगा; और यदि सारा संसार भी नाश हो जाए, तो भी वहाँ ऐसी दृढ़ता होगी कि सब स्पष्ट देख लेंगे कि यह राज्य पूर्णतः परमेश्वर के लिए समर्पित है। फिर भी वह घटता गया; वरन् इसके थोड़े ही समय बाद वह धीरे-धीरे क्षीण होता चला गया, यहाँ तक कि अन्तिम से पहले वाले राजा को बन्दी बनाकर ले जाया गया, और सारा राजवंश उठा लिया गया और प्रायः जड़ से काट दिया गया। अन्तिम राजा, जो एक अविश्वासी मनुष्य की इच्छा से राजा बनाया गया था, जो सब धर्म का बैरी था, और अन्त में उसके विरुद्ध विद्रोह करने के कारण पकड़ लिया गया, उसकी आँखें निकाल ली गईं, उस पर मुकद्दमा चलाया गया, उसके बच्चे मार डाले गए, और वह सब प्रकार की लज्जा के बीच दण्डित किया गया; मन्दिर और सब घर जला दिए गए। इन सब बातों से कोई क्या समझ सकता था? यहूदियों को भविष्यद्वक्ता के द्वारा यह आश्वासन मिलना आवश्यक था कि परमेश्वर अन्त में उन पर दया करेगा, और उन्हें उनकी बन्धुआई से लौटा ले आएगा; उसे उन्हें यह दिखाना आवश्यक था कि जो बात बहुत पहले अब्राहम से कही गई थी वह व्यर्थ नहीं थी — कि उसके वंश में पृथ्वी की सब जातियाँ आशीष पाएँगी — परन्तु दाऊद के वंश में से एक राजा सिंहासन पर विराजमान होगा, जिसके राज्य का अन्त न होगा, वरन् वह अनन्तकाल का होगा। इसी कारण यशायाह अब अपना वचन हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व तक सीमित कर देता है, ताकि (मैं कहता हूँ) जो कुछ उसने ऊपर प्रजा के छुटकारे और लौट आने के विषय में घोषित किया है, वह निश्चित और अचूक माना जाए।

अब हम ऊपर देख चुके हैं कि हमारे प्रभु को परमेश्वर का दास कहा गया, क्योंकि उसने हमारे उद्धार के लिए अपने आप को पूर्ण आज्ञाकारिता में दीन किया — वह जो महिमा का प्रभु था, स्वर्गदूतों का सिरमौर, जिसके सामने हर एक घुटना झुकना चाहिए। जब, तब, उसे यह दास का नाम दिया जाता है, तो हम जान लें कि इसका कारण यह है कि उसने हमारा स्वभाव धारण किया, और उसमें वह केवल अपने आप को दीन करने के लिए ही नहीं, वरन् अपने आप को पूरी तरह रिक्त करने के लिए भी तैयार हुआ। क्योंकि आवश्यक था कि हमारे अपराध और अधर्म उसकी आज्ञाकारिता के द्वारा भर दिए जाएँ। और जैसा उसने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से भी कहा, उसके लिए सारी धार्मिकता को पूरा करना आवश्यक था। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह, यद्यपि सारी महिमा उसी की है और वह अनन्त परमेश्वर है, फिर भी जब उसने हमारा शरीर धारण किया और अपने आप को हमारे अनुरूप कर लिया, उस समय निचले दर्जे में होने से चूकता नहीं; इसमें कोई विरोध नहीं है। क्योंकि यद्यपि उसके ईश्वरीय स्वभाव में कुछ नहीं बदला, तथापि यदि हम उसे परमेश्वर और हमारे बीच मध्यस्थ मानकर देखें, तो उसका अपने आप को दीन करना आवश्यक है, जैसा यह भी कहा गया है कि वह व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ, यद्यपि वह किसी भी रीति से उसका ऋणी नहीं था, और वही तो था जिसे उस पर शासन करना था, और जिसके प्रति सारी अधीनता देय है; परन्तु उसने अपने आप को उस श्रेणी में रखा कि हमें उस जूए से छुड़ाए जो हमारे लिए असह्य था। क्योंकि व्यवस्था हमें कुचल डालनेवाला बोझ थी, केवल इस अर्थ को छोड़कर कि हमारे प्रभु यीशु ने उसे उठा लिया और इस प्रकार हमें उससे मुक्त किया। और हमें यह अनोखा नहीं लगना चाहिए कि उसे परमेश्वर का दास कहा गया, क्योंकि उसने हमारा भी दास होने से इनकार नहीं किया — जो कहीं बढ़कर बात है। क्योंकि यदि हम अपनी दशा को देखें, तो उसमें व्यर्थता ही व्यर्थता है; हम पृथ्वी के दीन कीड़े हैं, शैतान और पाप तक हम पर प्रभुता करते हैं; और तौभी देखो, परमेश्वर का एकलौता पुत्र अपने आप को इतना दीन करता है कि हमारी सेवा में लग जाता है, जैसा सन्त पौलुस इसके विषय में कहता है: वह (वह कहता है) खतने का सेवक है। फिर, भविष्यद्वक्ता ने यह शब्द विशेष रूप से इसीलिए प्रयोग किया है कि हम जानें कि यहाँ उसके विषय में जो कुछ बताया गया है वह सारी कलीसिया के भले और साझे उद्धार के लिए है। अब हमें विचार करना चाहिए कि यीशु मसीह किस काम के लिए बुलाया गया था: अर्थात् सब विश्वासियों और परमेश्वर के सब चुने हुओं का छुड़ानेवाला होने के लिए। इसलिए, जब यह कार्यभार उसे सौंपा गया, और यही उसकी बुलाहट है, तो हम सन्देह न करें कि उसके व्यक्तित्व के विषय में जो कुछ घोषित किया गया है वह हम सब के लिए साझा है, और जो कुछ हम आगे देखेंगे उससे हमें लाभ मिलेगा। तो भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य के विषय में इतना ही।

अब वह कहता है कि यीशु मसीह, अपने सब लोगों को बचाने के इस पद पर बुलाया जाकर, सफल होगा, कि वह ऊँचा किया जाएगा और आश्चर्यजनक रीति से महिमान्वित होगा। यह विश्वासियों को उस परीक्षा के विरुद्ध सशस्त्र करने के लिए है जो उन्हें यीशु मसीह के अपनी महिमा और प्रताप में प्रकट होने से पहले हो सकती थी — अर्थात् उसके प्रकट होने से पहले जो अनन्त परमेश्वर है, महिमा से परिपूर्ण, और देह में प्रकट हुआ। क्योंकि जब यहूदी बाबुल में ले जाए जाते हैं (जैसा हम पहले कह चुके हैं), तब दाऊद के वंश में कोई प्रतिष्ठा नहीं रहती; सब कुछ खुरच दिया गया है। यह सच है कि जब उनमें से कुछ लोग लौटते हैं, तो जरुब्बाबेल है, जो सेनापति और प्रधान माना जाता है; परन्तु वहाँ कोई राजमुकुट नहीं है, केवल सम्मान की कुछ ख्याति है, क्योंकि प्रजा अब भी दाऊद के इस घराने के प्रति कुछ आदर रखती है। देखो, मैं कहता हूँ, जरुब्बाबेल की बात मानी जाती है — हाँ, परन्तु उसमें किसी साम्राज्य का आभास नहीं है। इसलिए विश्वासियों का ऐसी परीक्षा के विरुद्ध दृढ़ किया जाना आवश्यक था, और परमेश्वर को उन्हें आश्वासन देना आवश्यक था कि छुड़ानेवाला निकल आएगा, और चाहे पृथ्वी को फटना पड़े, और सब अथाह गड्ढों को उसे मार्ग देना और उसे ऊँचे पर उठाना पड़े, तौभी यह बात होकर रहेगी। इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ दो विपरीत बातों की तुलना करता है: कि यीशु मसीह को बहुत समय तक मानो छिपा रहना होगा, वरन् अथाह गड्ढों की गहराइयों में डूबा रहना होगा, और जब वह आया तब भी उसमें मनुष्यों की दृष्टि में मूल्यवान ठहरने के लिए कोई बड़ा ठाठ-बाट नहीं होगा, वरन् इसके ठीक विपरीत — कि वह ठुकराया जाएगा, या वह इतना तुच्छ होगा कि सोचा जाएगा कि उसके द्वारा प्रजा का उद्धार कभी पूरा नहीं हो सकता — और तौभी वह ऊँचा किया जाएगा।

और यह और भी पूर्णता से तब व्यक्त होता है जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि वह किसी भी मनुष्य से अधिक बिगड़ा हुआ था, और उसमें कोई रूप पहचाना नहीं जाता था — मानो वह सृजे हुए प्राणियों में गिने जाने के योग्य ही न हो, वरन् घृणित माना जाए, और मनुष्यों को उसे देखने से भी भय लगे। तो देखो, जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यीशु मसीह ऊँचा किया जाता है, तो उसका क्या अभिप्राय है। ये दो बातें हैं जो पहली दृष्टि में परस्पर विरोधी लगतीं, और असंगत मानी जातीं: अर्थात् यह कि यीशु मसीह को पहचाना न जाए, उसे ढूँढ़ा जाए और वह न मिले, और जब वह दिखाई दे तो ठुकराया जाए, उसमें किसी आदर के योग्य कुछ न पाया जाए — और तौभी परमेश्वर उसे ऊँचा करता, महिमान्वित करता, और उठाता है, यहाँ तक कि वह उस सब से बढ़ जाता है जो हम इस संसार में उसके प्रताप के विषय में सोच सकते हैं। कोई यह न कहेगा कि ये दोनों बातें आग और पानी की तरह भी मेल खा सकती हैं; और तौभी भविष्यद्वक्ता कहता है कि हमें आशा रखनी चाहिए कि परमेश्वर ऐसा कार्य करेगा कि ये छोटे आरम्भ पूर्णता को अपने लक्ष्य तक पहुँचने से न रोकेंगे। और इसी कारण वह कहता है कि वह उठाया जाएगा, वह ऊँचा किया जाएगा और आश्चर्यजनक रीति से ऊँचे पर बढ़ाया जाएगा — क्योंकि इस परीक्षा पर जय पाना कठिन था। और यह पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर एक वचन में हमें बता दे कि वह क्या करना चाहता है; जब हम बाधाएँ देखते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि जो परमेश्वर ने कहा है वह असम्भव है, तब हमें दृढ़ किया जाना आवश्यक है; हमारे पास वह होना चाहिए जिससे हम उस सब पर जय पाएँ जो आपत्ति में उठाया जा सकता है, और उस सब पर जो हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास करने से रोक सकता है। इसलिए यह ऐसा है मानो भविष्यद्वक्ता कहता है: मेरे मित्रो, परमेश्वर की बाट जोहो कि वह छुड़ानेवाले को उठाएगा, क्योंकि वह ऐसा करेगा। और यदि हम उत्तर दें, हाँ, परन्तु कैसे? क्योंकि उपाय बहुत ही विचित्र लगते हैं — तो सन्देह न करो, क्योंकि परमेश्वर में एक सामर्थ्य है जो तुमसे छिपी है; परन्तु (जो भी हो) यदि तुम सन्देह करते हो, यदि तुम डगमगाते हो, यदि तुम विवाद में पड़ते हो, जब यही वचन तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं होता, तो इन सब कल्पनाओं का सामना करो, हियाव बाँधो, अपने सारे अविश्वास को ललकारो, और इसी निश्चय पर डटे रहो — कि जो भी हो, परमेश्वर तुम्हारी आशा से परे, तुम्हारे विचार और तुम्हारी इन्द्रियों से परे कार्य करेगा।

तो भविष्यद्वक्ता ने इन तीन शब्दों — वरन् चार — को, जिनका अर्थ एक ही है, इसी अभिप्राय से प्रयोग किया। और वह यह भली-भाँति दिखाता है जब कहता है कि वह कुरूप किया गया, और किसी ने उस पर दृष्टि करना भी उचित न समझा, क्योंकि उसमें न सुन्दरता थी न रूप, वरन् वह ऐसा था मानो मनुष्यों की सारी संगति से काट दिया गया हो, और मरणहार प्राणियों में गिने जाने के योग्य न हो। अब यह आगे और भी पूर्णता से बताया जाएगा, क्योंकि यही कथन अधिक व्याख्या के लिए दोहराया जाएगा। परन्तु जो भी हो, भविष्यद्वक्ता पहले ही दिखा देता है कि यहूदियों को, अपने छुड़ानेवाले की बाट जोहते हुए, उस सब के प्रति अपनी आँखें बन्द कर लेनी चाहिए जिसकी मनुष्य आम तौर पर अपेक्षा करते हैं, और विश्वास को स्थान देना चाहिए, ताकि वे परमेश्वर की भलाई के विषय में निश्चित बने रहें, चाहे सब कुछ उनकी धारणा के कितना ही विपरीत क्यों न चले। और यह केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व के विषय में नहीं कहा गया, वरन् उसके सुसमाचार के सारे क्रम और उस सम्पूर्ण व्यवस्था के विषय में भी जो वह अपने विश्वासियों के संचालन में रखता है। इसलिए यदि हम यीशु मसीह में अपने उद्धार के विषय में निश्चित होना चाहते हैं, तो पहले तो हमें इस बात से लज्जित न होना चाहिए कि वह मनुष्यों की आँखों में इस प्रकार कुरूप ठहरा, और कि संसार में भेजे जाकर वह घृणित और शापित माना गया; और फिर यह भी कि उसके सुसमाचार को भी सब प्रकार की निन्दा का सामना करना पड़ा है, जैसा हम आज भी वैसा ही देखते हैं।

क्योंकि यदि हम अपने क्रूसित प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करने से लज्जित होते हैं, तो निश्चय है कि हम उद्धार की सारी आशा से बाहर रखे गए हैं। क्योंकि हम उसके द्वारा कैसे बचाए जाते हैं? स्वर्ग का उत्तराधिकार हमारा कैसे होता है, सिवाय इसके कि वह हमारे लिए श्राप बना, और न केवल मनुष्यों के सामने शापित हुआ वरन् अपने पिता परमेश्वर के मुख से भी? देखो, यीशु मसीह, जो सब आशीष का सोता है, तौभी उसने हमारे पाप उठाए, और उन प्राचीन बलिदानों के समान बनाया गया जो पापबलि कहलाते थे, क्योंकि आवश्यक था कि वहाँ परमेश्वर का क्रोध प्रकट हो, ताकि मनुष्य उससे छुड़ाए और मुक्त किए जाएँ। और यीशु मसीह हमारा जीवन कैसे है, सिवाय इसके कि उसने मरकर मृत्यु को निगल लिया? और हम उसके द्वारा कैसे उठाए जाते हैं, सिवाय इसके कि वह नरक के अथाह गड्ढों तक उतर गया — अर्थात् उसने वे भयावह बातें सहीं जो हमारे पाप के कारण हम पर थीं, और जिनसे हम दब जाते? क्योंकि आवश्यक था कि परमेश्वर सदा हमारा न्यायी रहता, और यह सब से अधिक भयानक बात है कि परमेश्वर हमारे विरुद्ध हो। आवश्यक था कि यीशु मसीह वहाँ हमारे जमानती के रूप में प्रवेश करे, वह जो हमारे लिए भुगतान करे और हमारा दण्ड उठाए ताकि हमें उससे मुक्त करे। इसलिए जब हम देखें कि वह इस प्रकार कुरूप किया गया, तो हम इसे अनोखा न समझें; और यदि यह हमारी समझ के लिए मूर्खता है, तो हम जान लें (जैसा सन्त पौलुस कहता है) कि परमेश्वर की मूर्खता संसार की सारी बुद्धि से बढ़कर है।

वह इसे परमेश्वर की मूर्खता कहता है कि हमारा प्रभु यीशु इस प्रकार नीचे गिराया गया; क्योंकि यदि मनुष्य यहाँ न्याय करने बैठें, तो निश्चय है कि वे इसे एक बेतुकी बात कहेंगे। क्या? कि वह जिसकी आराधना स्वर्ग और पृथ्वी पर होनी चाहिए, ऐसी निन्दा के सामने खड़ा किया जाए? और किस प्रयोजन से? इस प्रकार, अपने अहंकार और ढिठाई के अनुसार, मनुष्य सदा उस सब की निन्दा करेंगे जो परमेश्वर उनके छुटकारे के लिए करता है — किसी भी बात के समान साहस और निर्लज्जता के साथ; परन्तु इस बीच परमेश्वर अपनी ही युक्ति में दिखाएगा कि उसमें उस सब से अधिक बुद्धि है जो सब मनुष्य सोच सकें। और इसलिए पहले तो हम इसे पूरी तरह निश्चित मानें: कि यदि हमारा प्रभु यीशु तुच्छ ठहरा, और यदि उसने न केवल हमारे लिए अपने आप को दीन किया वरन् अपने आप को पूर्णतः रिक्त कर दिया (जैसा सन्त पौलुस इसके विषय में कहता है), तो हमें उसे वह आदर देने से नहीं चूकना चाहिए जो उसका है। क्योंकि इससे उसकी महिमा घटी नहीं, यद्यपि वह सब पर प्रकट न थी; वरन् इससे उसकी भलाई की ज्योति और भी अधिक चमकी। और हमें आश्चर्य से भी भर जाना चाहिए, यह देखकर कि परमेश्वर के पुत्र ने मानो कुरूप किए जाने से इनकार नहीं किया — वह जो अपने पिता परमेश्वर के प्रतिरूप के समान है — और यह सब इसलिए कि यह प्रतिरूप हम में सुधारा जाए। क्योंकि निश्चय है कि हम दागों से इतने भरे हैं कि परमेश्वर के सामने प्रकट होकर हमें ठुकराया जाना चाहिए, जब तक हमारा प्रभु यीशु हम पर अपनी छाप न लगाए, जिससे हम परमेश्वर को भाने लगें और उसके सामने अनुग्रह पाएँ। इसलिए जब हमें बताया जाता है कि वह कुरूप किया गया, तो हम अपनी ओर देखें, और जानें कि उसके लिए हमारे सब कलंक और दाग ग्रहण करना आवश्यक था, ताकि हम उनसे शुद्ध और निर्मल किए जाएँ, और अब हम परमेश्वर के न्याय के सामने धार्मिकता और पवित्रता के अतिरिक्त और कुछ न लाएँ, जो हमारे पास न होती जब तक परमेश्वर उसे यीशु मसीह में हमें न देता।

अब इस पर वह आगे कहता है कि जब वह इस प्रकार ऊँचा किया जाएगा, और जब वे ऐसा परिवर्तन देखेंगे जैसा मनुष्यों ने कभी न सोचा होता, तब राजा भी अपना मुँह बन्द कर लेंगे। यहाँ वह दिखाता है कि जब हम देखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु ने इस प्रकार अपने आप को दीन किया और यहाँ तक कि मिटा दिया, तब हमें उतावली से निर्णय नहीं करना चाहिए, वरन् अन्त को देखना चाहिए, और इसे कि परमेश्वर पिता ने उसे कहाँ पहुँचाया — अर्थात् यह कि उसे वह नाम दिया गया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, कि हर एक घुटना उसके सामने झुके, जैसा सन्त पौलुस फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय में कहता है। क्योंकि जब उसने हमें नम्रता का उपदेश दिया, और दिखाया कि हमें अपने आप को ऊँचा न समझना चाहिए, तो वह हमारे सामने हमारे प्रभु यीशु मसीह का दर्पण और आदर्श रखता है। वह, सन्त पौलुस कहता है, जो सच्चा परमेश्वर है, और जिसके लिए अपनी स्वर्गीय महिमा में प्रकट होना लूट न होता, उसने अपने आप को रिक्त कर दिया, और दास की दशा और स्थिति धारण की; और यहाँ तक कि वह क्रूस पर चढ़ाया जाना भी चाहता था, और उसने उस मृत्यु से इनकार नहीं किया, जो परमेश्वर के सामने और मनुष्यों के सामने भी इतनी अपमानजनक और शापित थी — और यह सब इसलिए कि वह अपने ऊपर वह सब उठा ले जो हम पर देय था। अब इसी कारण, वह कहता है, पिता ने उसे ऊँचा किया और उसे ऐसा नाम दिया कि सब सृजे हुए प्राणी, क्या ऊँचे क्या नीचे, उसे दण्डवत् करें, और सब मान लें कि सचमुच वह अपने पिता परमेश्वर की महिमा में है — और कि यदि हम परमेश्वर के प्रताप का मनन करना चाहते हैं, कि जैसा वह योग्य है वैसी उसकी महिमा करें, तो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आना होगा।

देखो, सार यह है कि भविष्यद्वक्ता क्या कहना चाहता था: कि इस बात को कि वह कुछ समय के लिए दीन किया गया, हम यीशु मसीह पर विश्वास करने और अपना सारा मन उस पर लगाने के लिए द्वार बन्द करने का कारण न बनने दें — वरन् यह विचार करें कि उसका अन्त क्या हुआ, और जब हम उसकी मृत्यु की बात करें, तो तुरन्त उसके पुनरुत्थान पर आएँ और दोनों को साथ जोड़ें, क्योंकि ये दो बातें अविभाज्य हैं — कि यीशु मसीह ने उस दुर्बलता में दुःख उठाना चाहा जो उसने हमसे ली थी, और कि वह अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से जी उठा — और इसमें उसने अपने आप को परमेश्वर का सच्चा पुत्र प्रकट किया, जैसा सन्त पौलुस इसके विषय में तीमुथियुस की पहली पत्री में और कुरिन्थियों की दूसरी में, और फिर रोमियों के पहले अध्याय में कहता है। और भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय भी इस खण्ड में यही था। अब हम कह चुके हैं कि यह केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में ही नहीं वरन् उसके सुसमाचार में भी देखा जाता है। क्योंकि जब सुसमाचार का प्रचार हुआ, तो यीशु मसीह को कैसे जाना गया, और संसार ने उसकी कैसी आज्ञाकारिता की? हम देखते हैं कि जिन्हें उसने सब अधिकार दिया था, वे न केवल मनुष्यों द्वारा ठट्ठों में उड़ाए और दोषी ठहराए गए, वरन् पीटे और कोड़े भी मारे गए, और अन्त में लज्जाजनक मृत्यु दण्ड के भागी हुए। जब ऐसा है, तो हम ऐसी ठोकरों पर जय पाएँ, और भविष्यद्वक्ता के यहाँ कहे गए इस वचन से सशस्त्र होकर, उस अन्त की ओर दृष्टि करें जहाँ हमारा प्रभु यीशु पहुँचा है, ताकि मुँह बन्द हो जाए — अर्थात् ताकि मनुष्य चकित हों और उनके पास कोई उत्तर न हो — जैसा हम अब भी अविश्वासियों को बकवास करते देखते हैं। फिर भी यह ऐसा ही है, और वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास उसे दण्डवत् करने कभी नहीं आ सकते, क्योंकि अपनी ही दृष्टि में उनके पास, जैसा उन्हें प्रतीत होता है, इसके विरुद्ध तर्क करने का कुछ कारण है।

परन्तु यहाँ हमें बताया जाता है कि जब हम भली-भाँति देखें कि हमारे प्रभु यीशु ने क्या प्राप्त किया, और उसकी मृत्यु और दुःखभोग का, जो उसने हमारे उद्धार के लिए सहा, अन्त और फल क्या रहा, तब हमारा मुँह बन्द हो जाएगा। क्योंकि जब पवित्रशास्त्र ऐसा कहता है, तो उसका अर्थ परमेश्वर के कामों पर पूर्णतः स्थिर और शान्त मन से विचार करना है। क्योंकि जब तक मनुष्य अपना मुँह खुला रखते हैं (जैसा पहले ही छुआ जा चुका है) तब तक वे विवाद में पड़ना चाहते हैं; वे इधर-उधर तर्क-वितर्क करना चाहते हैं, जिससे परमेश्वर वहाँ एक ओर कर दिया जाता है, और उसका किया हुआ सब कुछ मानो ठुकरा दिया जाता है। परन्तु जब कहा जाता है कि हर एक मुँह बन्द किया जाता है कि परमेश्वर के सामने चुप रहे, तो यह दिखाने के लिए है कि हमारी सब इन्द्रियाँ वश में और बन्दी होनी चाहिए, वरन् हमारी जीभ पर लगाम होनी चाहिए, ताकि हम शान्ति से मान लें कि परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में महिमा पाने के योग्य है। और यदि यह राजाओं के विषय में कहा गया है, तो साधारण लोगों का क्या कहना? इसलिए हमें उस क्रम को भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए जो भविष्यद्वक्ता यहाँ रखता है; क्योंकि वह हमें चिताता है कि हमारे प्रभु यीशु को मानो कुरूप होना आवश्यक था, और संसार उसे ठुकराएगा। इसलिए, जब पवित्र आत्मा द्वारा हमें इसकी पहले से चेतावनी दी गई है, तो हम इसे अनोखा न समझें, और सच्चे विश्वास से उसे गले लगाने से न चूकें; और यद्यपि पहली दृष्टि में उसका क्रूस (जो मनुष्यों की दृष्टि में एक घृणित फाँसी का खम्भा है) हमें फेर दे और हमें उससे पूरी तरह दूर कर दे, तौभी हम अपनी सारी महिमा वहीं ढूँढ़ने से न चूकें — अर्थात् क्रूसित यीशु मसीह में। और शेष के लिए, हम उसके सहे हुए पर ही न रुक जाएँ, कि उसमें केवल उस अपमान की कल्पना करें जिसके अधीन वह हमारे लिए स्वेच्छा से हुआ — वरन् उसके पुनरुत्थान को उसकी मृत्यु के साथ जोड़ें, और जानें कि क्रूस पर चढ़ाए जाने पर भी वह अपने पिता परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में विराजमान है, कि सर्वोच्च अधिकार चलाए और स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में सारी सामर्थ्य रखे। और इसी कारण कहा गया है कि वह ऊँचा किया जाएगा। यह सच है कि उसका फाँसी के खम्भे पर ऊँचे पर चढ़ाया जाना मनुष्यों की दृष्टि में अपमान था; परन्तु फिर भी वह शैतान का उपहास करता और सारे संसार को ललकारता है, यह कहकर कि वह सचमुच ऊँचा किया जाएगा, और जब वह ऐसे अपमान के सामने खड़ा किया गया, जब सब ने उस पर जीभ निकाली और उसके विरुद्ध अपनी निन्दाएँ और घिनौनी गालियाँ उगलीं, तब भी वह अपने सिंहासन पर विराजमान है, जैसा हम सन्त पौलुस के खण्ड से पहले ही उद्धृत कर चुके हैं। और एक दूसरे स्थान में वह विशेष रूप से कहता है कि क्रूस, यद्यपि पहले वह लज्जा से भरा फाँसी का खम्भा था, विजय-रथ के समान बन गया है, और यीशु मसीह ने न केवल वहाँ शैतान को जीता, वरन् यह भी दिखाया कि अब हम घमण्ड कर सकते हैं, क्योंकि अब हम सब दण्ड-आज्ञा से मुक्त किए गए हैं — कि पाप का हम पर अब कोई अधिकार नहीं, और नरक के सब दुष्ट आत्मा उस सब से निकाल बाहर किए गए हैं जो वे हमारे विरुद्ध दावा कर सकते थे।

तो देखो, सार यह है कि हमें विश्वास के द्वारा अपने प्रभु यीशु मसीह की महिमा तक कैसे उठना चाहिए, ताकि हम उसके क्रूस में अपना उद्धार, उसके श्राप में अपनी आशीष, उसकी मृत्यु में अपना जीवन ढूँढ़ने से लज्जित न हों, और फिर उसके ऐसे अपमान के सामने खड़े किए जाने में अपनी महिमा, और उसकी ऐसी पीड़ा में, जिसके कारण उसे लहू और पानी का पसीना आया, अपना आनन्द ढूँढ़ें। देखो, सार यह है कि हमें इस खण्ड से क्या स्मरण रखना चाहिए। अब भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से कहता है कि वह छिड़केगा। यह सच है कि उपमा के रूप में इस शब्द का अर्थ “बोलने पर विवश करना” भी हो सकता है; परन्तु ध्यान से देखने पर पाया जाता है कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्रेत स्वाभाविक अर्थ यह है कि यीशु मसीह सब जातियों पर जल छिड़केगा — अर्थात् चाहे वह लकड़ी का सूखा और बाँझ ठूँठ ही क्यों न हो, तौभी सारा संसार उसकी सामर्थ्य से सींचा जाएगा। संक्षेप में, वह दिखाता है कि परमेश्वर अगम्य रीति से कार्य करेगा, और कि यहूदियों को किसी मानवीय उपाय की आशा न रखनी चाहिए, वरन् यह आशा रखनी चाहिए कि परमेश्वर उस सब पर जय पाएगा जो मनुष्य सोच सकते हैं। क्योंकि जब हमें आश्चर्यकर्मों की बात बताई जाती है, तो हमारी बुद्धि चूक जानी चाहिए; और जब हमें भेदों — अर्थात् रहस्यों — की बात बताई जाती है, तो हमें मान लेना चाहिए कि हम योग्य न्यायी या निर्णायक नहीं हैं कि कहें, “ऐसा ही होना चाहिए,” परन्तु हमें उसकी आराधना करनी है जो हमारे सिर में समा नहीं सकता, और जिसका कारण हमें ज्ञात नहीं। तो यही है जो हमें और स्मरण रखना चाहिए। अब यह चेतावनी आज हमारे लिए है कि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हम अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह से सींचे जाने दें; और यद्यपि वह मानो बाँझ दिखाई दिया, और उसमें आदर के योग्य कुछ न पाया गया, तौभी जब वह अपने आप को हमारे सामने प्रस्तुत करता है, और निकट आना चाहता है, तो हम अपने अविश्वास से उसे दूर न धकेलें, वरन् विश्वास के द्वारा उसे प्रवेश दें। देखो, सार यह है कि हमें भविष्यद्वक्ता की इस शिक्षा से क्या स्मरण रखना चाहिए।

और फिर, वह आगे कहता है कि सारा संसार हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा कैसे छिड़का जाएगा — अर्थात् सुसमाचार के प्रचार के द्वारा। क्योंकि जिन्हें (वह कहता है) बताया नहीं गया था वे देखेंगे, और जिन्होंने नहीं सुना था वे समझेंगे। यहाँ भविष्यद्वक्ता अपने वचन को विस्तार देता है, यह दिखाते हुए कि हमारा प्रभु यीशु परमेश्वर पिता की ओर से न केवल यहूदियों के लिए भेजा जाएगा (यद्यपि उसकी प्रतिज्ञा विशेष रूप से उन्हीं से की गई थी) परन्तु वह सारे संसार का उद्धारकर्ता होगा। कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय सचमुच यही है, सन्त पौलुस रोमियों के पन्द्रहवें अध्याय में घोषित करता है, इन शब्दों को इस बात पर लागू करते हुए कि वह परदेशी जातियों के बीच भेजा गया था और इधर-उधर दौड़ता फिरा था, हर एक प्रदेश को सुसमाचार से भरता हुआ, जहाँ परमेश्वर की चर्चा पहले कभी न हुई थी — और कि उसने न केवल यहूदियों में वरन् अन्यजातियों में भी प्रचार किया। तो हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय था, और यह खण्ड हमारे लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश देनेवाली कुंजी के समान होना चाहिए।

क्योंकि यदि यीशु मसीह की प्रतिज्ञा केवल अब्राहम के वंश से की गई होती, तो वह हमारे किस काम का होता? चाहे वह उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाला होता, तो भी वह हमारे लिए व्यर्थ होता; हमारा उसमें कोई भाग या हिस्सा न होता। परन्तु जब उसके भेजे जाने से इतने पहले यह भविष्यवाणी की गई थी कि वह सब जातियों पर जल छिड़केगा — वरन् यह कि जिन्होंने पहले नहीं समझा था वे समझेंगे, और जिन्हें बताया नहीं गया था वे सुनेंगे — तो हम मान लें कि हमारे प्रभु ने हमें अपना लिया है, क्योंकि यीशु मसीह संसार में आया और उसने वह पूरा किया जो हमारे उद्धार के लिए अपेक्षित और आवश्यक था; इसलिए अब सुसमाचार की शिक्षा हमारे लिए वर्षा के समान है जो हमें स्वर्गीय बल दे, जबकि हम पूर्णतः बाँझ थे, और क्योंकि हम परमेश्वर की जाति से भूखे और रिक्त हैं, हमें सुसमाचार की शिक्षा से सार प्राप्त करना चाहिए, और अनुभव करना चाहिए कि हमारे छुड़ानेवाले ने जो मृत्यु सही, वह हमारे लिए कितनी मूल्यवान है, और हम उससे कैसे लाभ पाते हैं, और यह कि उसका जीवन हमारी धार्मिकता की सिद्धता है।

अब निश्चय है कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यहाँ उन यहूदियों के विषय में कहना नहीं था जो बचपन से ही व्यवस्था में पाले और प्रशिक्षित हुए थे, वरन् उसने उन परदेशी जातियों को भी सम्मिलित किया जिनके पास पहले अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजाओं के सिवा कुछ न था। क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर सारे संसार द्वारा ठुकराया गया था; वह तुच्छ जाना गया, और अन्यजातियाँ सच्चे धर्म का उपहास करती थीं। अब कहा गया है कि ये सुनेंगे, और सुनकर समझेंगे। इन शब्दों से भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि विश्वास कहाँ से आता है, अर्थात् परमेश्वर का वचन सुनने से; परन्तु साथ ही वह यह भी सूचित करता है कि केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि हमारे कान सुसमाचार के प्रचार से टकराएँ, जब तक उसके साथ समझ न जुड़ी हो। अब यह सब को नहीं दी जाती; इसलिए हमें इस कथन को परमेश्वर के चुने हुओं और उन तक सीमित रखना चाहिए जो पवित्र आत्मा से नए किए गए हैं — जैसा वह आगे जो जोड़ता है उसमें और अधिक स्पष्टता से घोषित भी करता है: “हमारी शिक्षा पर कौन विश्वास करेगा? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रगट या प्रदर्शित किया जाएगा?” यहाँ भविष्यद्वक्ता अपने वचन के बीच में रुक जाता है, और मानो चकित और विस्मित होकर पुकार उठता है। और यह खण्ड भली-भाँति ध्यान देने के योग्य है। हम देख चुके हैं कि वह विश्वासियों को उदारता और स्थिरता का उपदेश दे रहा था, मानो कह रहा हो: मेरे मित्रो, यदि तुम्हारे छुड़ानेवाले में कोई प्रतिष्ठा नहीं, और यदि संसार में उसका मूल्य नहीं, वरन् सब उसके मुँह पर थूकते और उसे तुच्छ जानते हैं, और उसे घृणित भी मानते हैं — तो इस सब के कारण उससे न फिर जाना। क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया था; और तौभी तुम परिणाम देखते हो: कि मृत्यु के अथाह गड्ढों से निकाला जाकर वह ऊँचे पर उठाया गया, वरन् सब सृजे हुए प्राणियों पर अधिकार दिया गया। इसलिए इस छुड़ानेवाले की आराधना करने से मत चूको जिसने तुम्हारे भले के लिए अपने आप को इस प्रकार दीन किया। और वास्तव में वह उसकी तुलना वर्षा से करता है, और कहता है कि परमेश्वर उन्हें सींचेगा जिन्होंने सत्य के विषय में कभी कुछ नहीं समझा था, जो बेचारे मूक पशुओं के समान रहे थे। ये, वह कहता है, सिखाए जाएँगे, और प्राप्त किए हुए उद्धार के भागी बनाए जाएँगे, और परमेश्वर की कलीसिया सारे संसार में फैलेगी, ऐसा कि जिन्होंने शुद्ध शिक्षा के विरुद्ध निन्दा की है उनके मुँह बन्द किए जाएँगे, सिवाय इसके कि वे पूरे आदर और संयम के साथ मान लें कि इस्राएल के परमेश्वर को छोड़ और कोई नहीं जिसका आदर होना चाहिए, और कि उसका एकलौता पुत्र, जिसमें उसकी महिमा और प्रताप का यथार्थ प्रतिरूप है, ग्रहण किया जाना चाहिए ताकि उसे दण्डवत् किया जाए। राजा भी, यद्यपि अपने अहंकार से अन्धे हैं, अपने आप को दीन करने को विवश होंगे, और पूर्ण आज्ञाकारिता में झुकने को बाध्य होंगे। देखो वे भव्य वचन जो भविष्यद्वक्ता ने कहे हैं।

अब वह पहले से देखता है कि जब सारे संसार में सुसमाचार का प्रचार होगा, तो कुछ लोग उसका ठट्ठा करेंगे, कुछ उसका विरोध करेंगे, कुछ उसमें कोई आनन्द न पाएँगे, कुछ जड़ बने रहेंगे, कुछ कपट से परमेश्वर से झूठ बोलेंगे और शिक्षा की आज्ञाकारिता का कुछ दिखावा करेंगे, परन्तु वह केवल झूठा बहाना ही होगा। इसलिए भविष्यद्वक्ता, संसार को इतना दुष्ट देखकर, और यह पहले से देखकर कि परमेश्वर की नहीं सुनी जाएगी, कि उसका वचन उस आदर के साथ ग्रहण नहीं किया जाएगा जिसके वह योग्य है, विस्मय से भर जाता है और पुकार उठता है: कौन है जो हमारी शिक्षा पर विश्वास करेगा? मानो वह कहता है: हाय, मैं यहाँ संसार के उद्धार का प्रचार करता हूँ, और सब कुछ निराशाजनक और खोया हुआ है जब तक कि यह उपाय न दिया जाए — अर्थात् कि परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र को भेजे, जो शैतान और मृत्यु से युद्ध करके हमारे लिए धार्मिकता और जीवन प्राप्त करे; क्योंकि इस शिक्षा को सारे संसार को सींचना है, नहीं तो हम बाँझ हैं। हम में निरी शुष्कता और दरिद्रता के सिवा कुछ नहीं; फिर भी परमेश्वर इसकी बाट नहीं जोहता कि हम उससे सींचे जाने के लिए माँगें, वरन् आगे बढ़कर आता है, और अपने आप को मुफ्त में अर्पित करता है, और वहाँ हमारे सामने अपने एकलौते पुत्र को उसकी शिक्षा के साथ प्रस्तुत करता है; और इसमें वह अपने आप को इतना अनुग्रहकारी दिखाता है कि उसे निश्चय ही बिना किसी विरोध के ग्रहण किया जाना चाहिए — वरन् क्या हर एक को ऐसी उत्कण्ठा से नहीं भर जाना चाहिए कि वह इस प्रकट हुए छुड़ानेवाले को गले लगाने के लिए और सब कुछ तुच्छ जाने?

फिर भी, ऐसा होने से कहीं दूर, सुननेवालों में से मुश्किल से दसवें भाग का मन ही सचमुच छुआ जाता है। और वास्तव में अनुभव दिखाता है कि कुछ ठट्ठा करते हैं — जैसे वे जो परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले हैं, जिनमें कुत्तों से अधिक न विश्वास है न धर्म, और अनन्त जीवन के विषय में जो कुछ उनसे कहा जाता है उसे कहानी मानते हैं। दूसरे परमेश्वर के वचन को ऐसा तुच्छ जानने से ही सन्तुष्ट नहीं; उन्हें और आगे बढ़ना है, क्योंकि वे उसके विरुद्ध क्रोध और उन्माद से भड़क उठते हैं। दूसरी ओर, कुछ ऐसे हैं जो खुले मुँह से निन्दा करते हैं, और कुछ ऐसे जो केवल उसी से चिपके रहना चाहते हैं जो उन्होंने अपने ही मस्तिष्क में गढ़ लिया है। फिर बहुत से जड़ लोग मिलेंगे, जो किसी बात से नहीं हिलते, और पत्थरों से अधिक छुए नहीं जा सकते; और कुछ ऐसे भी हैं जो, यद्यपि उन पर भक्ति का कोई सुन्दर आवरण है, झूठे और शपथ तोड़नेवाले हैं, जिनमें छल और कपट के सिवा कुछ नहीं। हम यह देखते हैं; और यदि भविष्यद्वक्ता ने यह न भी कहा होता, तो भी हम अपनी आँखें खोलें, और इसे पूरा होता पाएँगे। और क्या यह भयानक बात नहीं, प्रकृति के विरुद्ध एक विकृति? निश्चय ही यह ऐसा ही है। अब यहाँ हम बहुत ठोकर खा सकते हैं, और यह हमें सुसमाचार के पास आने से रोकनेवाली बाधा के समान भी हो सकता है, जब हम विचार करें कि संसार क्या करता है, और कहें: यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का वचन तो मनुष्यों का परम भला और सुख होना चाहिए — फिर वह इस प्रकार क्यों ठुकराया जाता है? और परमेश्वर कैसे सहता है कि मनुष्य इस प्रकार उसका ठट्ठा करें और उसका विरोध करें, और वह अपनी बात न सुनवाए, अपना उचित मान न पाए? देखो हम कैसे सुसमाचार पर विश्वास न करने के लिए परखे जाते हैं — मानो मनुष्यों का अविश्वास परमेश्वर की सच्चाई में कुछ घटाता हो, और उसके आदर को कम करता हो।

इसलिए, भविष्यद्वक्ता यशायाह ने बिना कारण इस कथन को नहीं डाला है। क्योंकि यदि उसने केवल वही कहा होता जो हम पहले देख चुके हैं — कि सारा संसार हमारे प्रभु यीशु मसीह से सींचा जाएगा, और सुसमाचार की शिक्षा सब कहीं फैलेगी, और राजा उसके अधीन होंगे — तो अब हम कहते: अरे, भविष्यद्वक्ता यशायाह ने हमारे समय के लिए नहीं कहा, क्योंकि हम ठीक उलटा देखते हैं; पृथ्वी के उद्धार पाने के लिए सींचे जाने के स्थान पर, हम सब अधर्म की बाढ़ देखते हैं; हम मनुष्यों को पशुओं के समान, नारकीय विद्रोह में, परमेश्वर की सब बातों को ठुकराते देखते हैं। संक्षेप में, यह देखा जाता है कि सुसमाचार इतना बुरा ग्रहण किया जाता है कि यह भयावह है। जब ऐसा है, तो जो भविष्यद्वक्ता ने कहा वह अभी पूरा नहीं हुआ होगा। अब यह (जैसा मैंने कहा) हमारे विश्वास को उलट देने का काम करता; परन्तु जब वह इस कथन को उससे जोड़ता है जो हम ऊपर देख चुके हैं — कि जहाँ परमेश्वर मनुष्यों को जीवन देने के लिए वर्षा भेजता है, वहाँ वह अपने पवित्र आत्मा का यह विशेष अनुग्रह सब को नहीं देता कि जो वह कहता है उसे ग्रहण करें — परन्तु अधिकांश लोग अविश्वासी होंगे, जिनके कान बन्द होंगे, या जो हठीले हो जाएँगे और बुराई के प्रति और भी विषैले हो जाएँगे, जबकि दूसरे उस अनमोल भलाई का कुछ मूल्य न समझेंगे जो उन्हें दी जाती है। तो जब भविष्यद्वक्ता ने ये सब बातें घोषित कर दी हैं, और हम उन्हें देखते हैं, तो हमें उन पर और चकित न होना चाहिए, वरन् उनसे हमारा विश्वास दृढ़ होना चाहिए।

तो देखो, सार यह है कि हमें क्या स्मरण रखना चाहिए। इसलिए हम यह मान लें कि संसार कभी परमेश्वर की ओर इतना न फिरेगा कि उसका बड़ा भाग शैतान के वश में न रहे, जो वहाँ जड़ बना रहेगा, और जो उस भलाई को ग्रहण करने के बदले जो उन्हें दी जाती है नाश होना पसन्द करेगा। और अनेक प्रकार हैं, जैसा हमने कहा है: कुछ जड़ होंगे, कुछ में परमेश्वर का ठट्ठा करने का घमण्ड होगा, और सुसमाचार में जो कुछ है उस सब की निन्दा करने की मूर्खतापूर्ण ढिठाई होगी; कुछ इस संसार की चिन्ताओं में लिपटे होंगे; वे अपनी ही चालाकियों और छलों में लगे रहेंगे, ऐसा कि वे स्वर्ग की किसी बात का स्वाद न लें; कुछ इतने पशुवत् होंगे कि उनके मन में प्रवेश करके उन्हें कोई शिक्षा दिखाना भी सम्भव न होगा। इसलिए जब हम यह सब देखें, तो हम मान लें कि यद्यपि सुसमाचार का प्रचार हो रहा है, और परमेश्वर का शब्द सब कहीं गूँजता और प्रतिध्वनित होता है, तौभी बहुत से लोग जैसे थे वैसे ही रहेंगे, और बदलेंगे नहीं, और सारी शिक्षा उनके लिए मृत के समान होगी। एक बात के विषय में इतना ही। और इस प्रकार हम विश्वासियों की संख्या छोटी देखते हैं। शेष यह है कि इसके लिए हम निराश न हों, वरन् मान लें कि परमेश्वर वह पूरा करता है जो उसने अपने मुँह से कहा है। और इस बीच हमें और भी सावधान होना चाहिए कि हम अपने आप को मानो परमेश्वर के पंखों के नीचे इकट्ठा करें, जब आज सारा संसार बैर और विद्रोह से भरा है।

यह सच है कि हमें डरना चाहिए, और अधिक चौकसी से चलना चाहिए। क्योंकि यदि सब परमेश्वर की सेवा के लिए भले मनवाले होते, तो हमारे पास सब ओर ऐसे उदाहरण होते जो हमें अपनी ओर से साहसपूर्वक इसमें लग जाने के लिए उभारने को पर्याप्त होते; परन्तु जब कहा जाता है कि जिन्हें सुसमाचार सुनाया जाता है उनमें से अधिकांश दुष्टात्माओं के समान होंगे, और कहीं भी लुचपन के सिवा कुछ न मिलेगा, ऐसा कि प्रतीत होगा कि संसार ने हमें परमेश्वर से पूरी तरह दूर करने का षड्यन्त्र रचा है — तब हमारे पास भय के साथ चलने का उचित कारण है। क्योंकि यदि परमेश्वर हमें आश्चर्यजनक रीति से न बचाए रखता, तो हमारा क्या होता? इसलिए, जो कोई सुसमाचार को थामे रहना चाहता है उसे सब ठोकरों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और जब वह दूसरों को अपना कर्तव्य करते न देखे, तो इस कारण से न फिरे — वरन् जब हम सारे संसार को परमेश्वर के वचन को पाँव तले रौंदते देखें, तो हम उसके प्रति और भी समर्पित हों, और केवल इतना ही नहीं, वरन् अपने परमेश्वर के प्रति अपने आप को व्यवस्थित करने में और भी परिश्रम करें जब हम देखें कि ठोकरें और बुरे उदाहरण हमें उससे फेर सकते हैं — और उस खराई में बने रहें जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाता है।

तो देखो, यहाँ भविष्यद्वक्ता की इस पुकार के विषय में कि “हमारे समाचार पर किसने विश्वास किया?” हमें क्या स्मरण रखना चाहिए। क्योंकि वह पहले से मानता है कि संख्या बिखरी हुई और थोड़ी होगी, और जब सुसमाचार सब कहीं प्रकाशित किया जाएगा, तो यदि कोई देखे कि उससे कितना लाभ हुआ, तो वह बहुत ही थोड़े लोग पाएगा जिनकी जीवित जड़ है, जो सुधारे और बदले गए हैं, जो अपना जीवन बदलते हैं, जो अपने आप का इनकार करते हैं ताकि अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित करें — मैं कहता हूँ, वह पाएगा कि ऐसों की संख्या छोटी है। परन्तु साथ ही वह कारण भी जोड़ता है, जिसकी पूरी व्याख्या हम अब नहीं कर सकते — अर्थात् कि हमें यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि विश्वास परमेश्वर का विशेष दान है, और यह पर्याप्त नहीं कि हमारे पास शिक्षा हो, और हमारे कान उससे टकराएँ, वरन् परमेश्वर को हमें छूना, और हम में गुप्त सामर्थ्य से कार्य करना चाहिए, ताकि हम उसकी ओर खिंचें, और जो प्रचार हमने सुना है उससे उन्नति पाएँ। परन्तु इसका अब पूरा वर्णन नहीं हो सकता, इसलिए हम इसे किसी और दिन के लिए रख छोड़ेंगे।

अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सामने अपने दोषों को मानते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें, इत्यादि।

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