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पवित्र आत्मा का व्यक्तित्व और कार्य
1. आत्मा मनुष्यों के हृदयों को जिलाता है।
2. आत्मा मनुष्यों के मनों को सिखाता है।
3. आत्मा वचन की ओर ले जाता है।
4. आत्मा पाप के विषय में कायल करता है।
5. आत्मा मसीह की ओर खींचता है।
6. आत्मा पवित्र करता है।
7. आत्मा लोगों को आत्मिक मन वाला बनाता है।
8. आत्मा भीतर संघर्ष उत्पन्न करता है।
9. आत्मा लोगों में भाइयों के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है।
10. आत्मा प्रार्थना करना सिखाता है।
पवित्र आत्मा की उपस्थिति के ये ही बड़े चिह्न हैं। अपने विवेक से एक मनुष्य की भाँति यह प्रश्न पूछो—क्या आत्मा ने तुम्हारी आत्मा के लिये इस प्रकार का कुछ कार्य किया है?
मैं तुम्हें चिताता हूँ कि मेरे इस प्रश्न का उत्तर खोजे बिना बहुत दिन न बीतने दो। एक विश्वासयोग्य पहरेदार की भाँति तुम्हारे हृदय के द्वार पर खटखटाते हुए मैं तुम्हें बुलाता हूँ कि इस बात का निपटारा कर लो। हम एक पुराने, थके-हारे, पाप के बोझ से दबे हुए संसार में रहते हैं। कौन जानता है कि "दिन भर में क्या होगा?" कौन दूसरा वर्ष देखने के लिये जीवित रहेगा? क्या तुम्हारे पास आत्मा है? (नीतिवचन 27:1।)
(ख) फिर, क्या तुम जानना चाहते हो कि हमारे समय के मसीही धर्म में सबसे बड़ी कमी क्या है? मेरी सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
जिस बड़ी कमी की मैं बात करता हूँ वह केवल यह है कि बहुत से लोगों का मसीही धर्म वास्तव में मसीही धर्म है ही नहीं। मैं जानता हूँ कि ऐसी राय कठोर और चौंकानेवाली रीति से निष्ठुर लगती है। मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता—मुझे विश्वास है कि यह दुःख के साथ सच है। मैं तो केवल यह चाहता हूँ कि लोगों का मसीही धर्म वही हो जो बाइबल का है; परन्तु मुझे बहुत अधिक सन्देह है कि बहुत से मामलों में वह ऐसा है।
मेरा विश्वास है कि इंग्लैंड में अनगिनत लोग हर रविवार को केवल रीति के रूप में कलीसिया या उपासनालय जाते हैं। उनके माता-पिता जाते थे, इसलिये वे भी जाते हैं; देश में जाने का चलन है, इसलिये वे जाते हैं; धार्मिक सभा में उपस्थित होना और उपदेश सुनना रिवाज है, इसलिये वे जाते हैं। परन्तु वास्तविक, जीवित, उद्धार देनेवाले धर्म के विषय में—वे न कुछ जानते हैं, न उसकी कुछ चिन्ता करते हैं। वे सुसमाचार के विशिष्ट सिद्धान्तों का कोई वर्णन नहीं दे सकते। धर्मी ठहराया जाना, नया जन्म और पवित्रीकरण ऐसे "शब्द और नाम" हैं जिन्हें वे समझा नहीं सकते। हो सकता है उन्हें एक प्रकार का धुँधला-सा विचार हो कि उन्हें प्रभु-भोज में जाना चाहिए, और वे मसीह के विषय में कुछ अस्पष्ट शब्द कह भी लें—परन्तु उद्धार के मार्ग की उन्हें कोई समझदारी-भरी धारणा नहीं होती। पवित्र आत्मा के विषय में वे इससे अधिक शायद ही कुछ कह सकें कि उन्होंने उसका नाम सुना है।
अब यदि इस लेख के किसी पाठक को यह भान हो कि उसका धर्म वैसा ही है जैसा मैंने वर्णन किया है, तो मैं उसे प्रेम से केवल यह चेतावनी दूँगा कि स्मरण रखे कि ऐसा धर्म सर्वथा व्यर्थ है। वह उसकी आत्मा को न बचाएगा, न शान्ति देगा, न सन्तुष्ट करेगा, न पवित्र करेगा। और मेरी सीधी सलाह यह है कि वह बिना देर किये उसे किसी उत्तम वस्तु से बदल ले। मेरे शब्दों को स्मरण रखो। अन्त में यह काम न आएगा।
(ग) फिर, क्या तुम जानना चाहते हो कि सुसमाचार की वह कौन-सी एक सच्चाई है जिसके विषय में आज के दिनों में हमें विशेष रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है? सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
जिस सत्य की ओर मेरा ध्यान है वह पवित्र आत्मा के कार्य का सत्य है। निस्सन्देह सारे सत्य पर शैतान लगातार आक्रमण करता रहता है। मेरी इच्छा क्षण भर के लिये भी आत्मा के पद को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की नहीं है—और न उसे सुसमाचार के सूर्य और केन्द्र—यीशु मसीह—से ऊपर ठहराने की। परन्तु मैं यह अवश्य मानता हूँ कि मसीह के याजकीय पद के बाद आज के समय में कोई सत्य इतनी बार आँखों से ओझल नहीं किया जाता और इतनी छल-भरी रीति से उस पर आक्रमण नहीं किया जाता जितना आत्मा के कार्य पर। कुछ लोग अज्ञानता-भरी उपेक्षा से उसे हानि पहुँचाते हैं—उनकी सारी बातें मसीह के विषय में होती हैं। वे "उद्धारकर्ता" के विषय में कुछ बता सकते हैं; परन्तु यदि तुम उनसे आत्मा के उस भीतरी कार्य के विषय में पूछो जिसका अनुभव वे सब करते हैं जो उद्धारकर्ता को सचमुच जानते हैं, तो उनके पास कहने को एक शब्द नहीं होता।
कुछ लोग आत्मा के कार्य को यह मानकर हानि पहुँचाते हैं कि वह तो हो ही चुका है। कलीसिया की सदस्यता और संस्कारों में भाग लेना उनके लिये मन फिराव और आत्मिक नया जन्म के स्थान पर आ जाते हैं। कुछ लोग आत्मा के कार्य को स्वाभाविक विवेक की क्रिया के साथ गड्ड-मड्ड करके उसे हानि पहुँचाते हैं। इस निम्न दृष्टिकोण के अनुसार, मनुष्यों में केवल सबसे कठोर और पतित लोग ही पवित्र आत्मा से रहित हैं। सत्य से ऐसे सब भटकावों के विरुद्ध हम चौकसी करें और सावधान रहें। सुसमाचार के कथनों के अनुपात को छोड़ने से सावधान रहें। आज के समय में हमारे मुख्य नारों में से एक यह हो—आत्मा के भीतरी कार्य के बिना उद्धार नहीं! पवित्र आत्मा का कोई भीतरी कार्य नहीं, जब तक वह देखा, अनुभव किया और जाना न जा सके! आत्मा का कोई उद्धार करनेवाला कार्य नहीं, जो परमेश्वर की ओर मन फिराव और यीशु मसीह पर जीवित विश्वास के रूप में प्रकट न हो!
(घ) फिर, क्या तुम जानना चाहते हो कि हम जो सुसमाचार के सेवक हैं, अपने सुननेवाले किसी भी जन से, जब तक वह जीवित है, निराश क्यों नहीं होते? सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
हम निराश इसलिये नहीं होते कि हम पवित्र आत्मा की सामर्थ्य पर विश्वास करते हैं। जब हम अपने ही कामों को देखते हैं तो निराश होने का हमारे पास पर्याप्त कारण होता है—हम प्रायः अपने आप से ही ऊब जाते हैं! जब हम अपनी मण्डलियों के कुछ लोगों को देखते हैं तो भी निराश होने का कारण होता है—वे नीचे की चक्की के पाट जैसे कठोर और संवेदनहीन लगते हैं। परन्तु हम पवित्र आत्मा को स्मरण करते हैं, और यह भी कि उसने क्या किया है; हम पवित्र आत्मा को स्मरण करते हैं और विचार करते हैं कि वह बदला नहीं है। वह आग की नाईं उतरकर सबसे कठोर हृदयों को भी पिघला सकता है! वह हमारे सुननेवालों में से सबसे बुरे पुरुष या स्त्री को भी परिवर्तित कर सकता है, और उनके सारे चरित्र को नए साँचे में ढाल सकता है। और इसलिये हम प्रचार करते जाते हैं। हम पवित्र आत्मा के कारण आशा रखते हैं। आह, कि हमारे सुननेवाले समझ लें कि सच्चे धर्म की उन्नति "न बल से, और न शक्ति से," परन्तु प्रभु के आत्मा से होती है! आह, कि उनमें से बहुत लोग सेवकों पर कम भरोसा रखना और पवित्र आत्मा के लिये अधिक प्रार्थना करना सीख लें! आह, कि सब लोग पाठशालाओं, पर्चों और कलीसियाई तन्त्र से कम आशा रखना सीख लें, और सब साधनों का परिश्रम से उपयोग करते हुए आत्मा के उण्डेले जाने के लिये और अधिक लगन से खोजें। (जकर्याह 4:6।)
(ङ) फिर, क्या तुम जानना चाहते हो कि यदि तुम्हारा विवेक तुम्हें बताए कि तुम्हारे पास आत्मा नहीं है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
यदि तुम में पवित्र आत्मा नहीं है, तो तुम्हें तुरन्त प्रार्थना में प्रभु यीशु मसीह के पास जाना चाहिए, और उससे विनती करनी चाहिए कि वह तुम पर दया करे और तुम्हें आत्मा भेजे। जो लोग यह कहते हैं कि पहले पवित्र आत्मा के लिये प्रार्थना करो, ताकि फिर मसीह के पास जा सको, उनसे मेरी तनिक भी सहानुभूति नहीं है। पवित्रशास्त्र में मुझे ऐसा कहने का कोई आधार नहीं दिखता। मुझे केवल यह दिखता है कि यदि लोग अपने आप को दीन और नाश होनेवाले पापी अनुभव करते हैं, तो उन्हें सबसे पहले सीधे और प्रत्यक्ष रूप से यीशु मसीह के पास जाना चाहिए। मैं देखता हूँ कि वह स्वयं कहता है, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" (यूहन्ना 7:37)। मैं जानता हूँ कि लिखा है, "तू ने मनुष्यों से, वरन हठीलों से भी भेंटें ली हैं, कि प्रभु परमेश्वर उनके बीच निवास करे।" (भजन संहिता 68:18)। मैं जानता हूँ कि पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देना उसी का विशेष कार्य है, और यह भी कि "उसमें सारी परिपूर्णता वास करती है।" मैं बाइबल से अधिक व्यवस्थित होने का दावा करने का साहस नहीं करता। मैं विश्वास करता हूँ कि मसीह ही परमेश्वर और आत्मा के मिलन का स्थान है, और जो कोई पवित्र आत्मा चाहता है उसे मेरी पहली सलाह सदा यही होगी, "यीशु के पास जा, और अपनी आवश्यकता उसी को बता!" (कुलुस्सियों 1:19)।
इसके अतिरिक्त मैं यह भी कहूँगा कि यदि तुम में पवित्र आत्मा नहीं है, तो तुम्हें अनुग्रह के उन साधनों में परिश्रम से भाग लेना चाहिए जिनके द्वारा आत्मा कार्य करता है। तुम्हें नियमित रूप से उस वचन को सुनना चाहिए जो उसकी तलवार है; तुम्हें उन सभाओं में बराबर उपस्थित होना चाहिए जिनमें उसकी उपस्थिति की प्रतिज्ञा है। संक्षेप में, यदि तुम चाहते हो कि आत्मा तुम्हारा भला करे, तो तुम्हें आत्मा के मार्ग में पाया जाना चाहिए। अन्धा बरतिमाई यदि आलस्य से घर में बैठा रहता और बाहर निकलकर मार्ग के किनारे न बैठता, तो उसे कभी दृष्टि न मिलती। जक्कई यदि आगे दौड़कर गूलर के पेड़ पर न चढ़ता, तो शायद वह कभी यीशु को न देख पाता और अब्राहम का पुत्र न बनता। आत्मा प्रेम करनेवाला और भला आत्मा है। परन्तु जो अनुग्रह के साधनों को तुच्छ जानता है, वह पवित्र आत्मा का विरोध करता है।
इन दो बातों को स्मरण रखो। मुझे दृढ़ विश्वास है कि ऐसा कोई मनुष्य नहीं हुआ जिसने इन दो सलाहों पर सच्चाई और धीरज के साथ चलकर देर-सबेर पवित्र आत्मा को न पाया हो।
(च) क्या तुम आगे यह जानना चाहते हो कि यदि तुम्हें अपनी दशा के विषय में सन्देह हो, और तुम न कह सको कि तुम में पवित्र आत्मा है या नहीं, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
यदि तुम्हें सन्देह हो कि तुम में पवित्र आत्मा है या नहीं, तो तुम्हें शान्ति से जाँचना चाहिए कि तुम्हारे सन्देह उचित हैं या नहीं। मुझे भय है कि बहुत से सच्चे विश्वासियों को अपनी दशा के विषय में कोई दृढ़ निश्चयता नहीं होती—सन्देह करना ही उनका जीवन बन गया है। मैं ऐसे लोगों से कहता हूँ कि अपनी बाइबल उठाओ और अपनी चिन्ताओं के आधारों पर शान्ति से विचार करो। मैं उनसे कहता हूँ कि सोचो, तुम्हारा पाप का बोध, चाहे कितना ही दुर्बल हो—मसीह के प्रति तुम्हारा प्रेम, चाहे कितना ही फीका हो—पवित्रता की तुम्हारी लालसा, चाहे कितनी ही निर्बल हो—परमेश्वर के लोगों की संगति में तुम्हारा आनन्द—प्रार्थना और वचन की ओर तुम्हारा झुकाव—ये सब कहाँ से आए? मैं पूछता हूँ, ये बातें कहाँ से आईं? क्या ये तुम्हारे अपने हृदय से आईं? कदापि नहीं! पापी मानव स्वभाव ऐसा फल नहीं लाता। क्या ये शैतान की ओर से आईं? कदापि नहीं! शैतान शैतान से युद्ध नहीं करता। तो फिर, मैं दोहराता हूँ, ये बातें कहाँ से आईं? मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि सावधान रहो, ऐसा न हो कि पवित्र आत्मा के कार्यों की सच्चाई पर सन्देह करके तुम उसे शोकित करो। मैं तुमसे कहता हूँ कि अब समय है कि तुम विचार करो कि कहीं तुम किसी ऐसी 'आन्तरिक सिद्धता' की आशा तो नहीं करते रहे जिसकी आशा करने का तुम्हें अधिकार न था, और साथ ही कृतघ्नता से उस वास्तविक कार्य को तुच्छ तो नहीं जान रहे जो पवित्र आत्मा ने तुम्हारे प्राणों में सचमुच किया है।
एक महान राजनेता ने एक बार कहा था कि यदि कोई विदेशी पहली बार आँखों पर पट्टी बाँधे और कान खुले रखे इंग्लैंड आए—सब कुछ सुनता हुआ—परन्तु कुछ न देखता हुआ—तो वह भली-भाँति समझ सकता है कि इंग्लैंड विनाश के मार्ग पर है; क्योंकि अंग्रेज़ लोगों की बड़बड़ाहट इतनी अधिक है। फिर भी यदि वही विदेशी कान बन्द और आँखें खुली रखकर इंग्लैंड आए—सब कुछ देखता हुआ और कुछ न सुनता हुआ—तो वह शायद समझेगा कि इंग्लैंड संसार का सबसे धनी और समृद्ध देश है, क्योंकि समृद्धि के इतने चिह्न उसे दिखाई देंगे।
मेरा मन प्रायः इस बात को सन्देह करनेवाले मसीहियों पर लागू करने को होता है। यदि मैं वह सब मान लेता जो वे अपने विषय में कहते हैं, तो अवश्य सोचता कि वे बुरी दशा में हैं। परन्तु जब मैं उन्हें जीवन जीते देखता हूँ—धार्मिकता के भूखे और प्यासे, मन के दीन, पवित्रता की लालसा रखनेवाले, मसीह के नाम से प्रेम करनेवाले, बाइबल पढ़ने और प्रार्थना की आदतें बनाए रखनेवाले—जब मैं ये बातें देखता हूँ, तो मेरा भय जाता रहता है। मैं अपने कानों से अधिक अपनी आँखों पर भरोसा करता हूँ। मैं आत्मा की उपस्थिति के स्पष्ट चिह्न देखता हूँ, और केवल इस बात का शोक करता हूँ कि वे स्वयं उन्हें देखना नहीं चाहते। मैं देखता हूँ कि शैतान उनके मन में ये सन्देह डालकर उनकी शान्ति छीन रहा है, और मैं शोक करता हूँ कि वे उसकी बात मानकर अपनी हानि कर रहे हैं। कुछ अंगीकार करनेवालों को निःसन्देह यह सन्देह हो सकता है कि उनमें पवित्र आत्मा है या नहीं, क्योंकि उनमें अनुग्रह का कोई चिह्न नहीं है। परन्तु बहुत से लोग अपने मन में सन्देह की आदत को पालते रहते हैं, जिसका उनके पास कोई कारण नहीं, और जिस पर उन्हें लज्जित होना चाहिए।
(छ) क्या तुम अन्त में यह जानना चाहते हो कि यदि तुम में सचमुच पवित्र आत्मा है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? मेरी सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
यदि तुम में पवित्र आत्मा है, तो "आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।" (इफिसियों 5:18)। जीवन के जल को गहराई से पीओ। थोड़े से धर्म से सन्तुष्ट मत हो। प्रार्थना करो कि आत्मा तुम्हारे हृदय के हर कोने और हर कोठरी को भर दे, और उसमें संसार और शैतान के लिये एक इंच भी स्थान न बचे।
यदि तुम में पवित्र आत्मा है, तो "पवित्र आत्मा को शोकित मत करो।" (इफिसियों 4:30)। विश्वासियों के लिये उसकी उपस्थिति के बोध को निर्बल कर देना और अपने आप को उसकी शान्ति से वंचित कर लेना सरल है। छोटे पाप जिनका नाश न किया गया हो, स्वभाव या जीभ की छोटी बुरी आदतें जिन्हें सुधारा न गया हो, संसार के साथ छोटे-छोटे समझौते—ये सब पवित्र आत्मा को अप्रसन्न करने के लिये पर्याप्त हैं। ओह, कि विश्वासी इसे स्मरण रखते! "पृथ्वी पर स्वर्ग" का आनन्द उससे कहीं अधिक उठाया जा सकता है जितना उनमें से बहुत से पाते हैं—और वे उसे क्यों नहीं पाते? वे अपने दैनिक चाल-चलन पर पर्याप्त चौकसी नहीं रखते, और इस कारण आत्मा का कार्य मन्द पड़ जाता है और रुक जाता है। यदि आत्मा को तुम्हारे प्राण का शान्ति देनेवाला होना है, तो उसे पूरी रीति से पवित्र करनेवाला आत्मा होना होगा।
यदि तुम में पवित्र आत्मा है, तो आत्मा के सब फल उत्पन्न करने का परिश्रम करो। "पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं। और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।" (गलातियों 5:22-24)
प्रेरित ने जो सूची तैयार की है, उसे पढ़ो और देखो कि इन फलों में से एक भी उपेक्षित न रह जाए। आह, यदि विश्वासी और अधिक "प्रेम" और और अधिक "आनन्द" की खोज करते! तब वे सब लोगों का अधिक भला करते; तब वे स्वयं भी अधिक सुखी होते; तब वे संसार की दृष्टि में धर्म को अधिक सुन्दर बना देते!
मैंने जो बातें लिखी हैं, उन्हें मैं इन पृष्ठों के प्रत्येक पाठक के गम्भीर ध्यान के लिए सौंपता हूँ। ये व्यर्थ ही न लिखी गई हों। मेरे साथ मिलकर प्रार्थना करो कि पवित्र आत्मा ऊपर से पहले की अपेक्षा कहीं अधिक प्रचुर प्रभाव के साथ उण्डेला जाए। प्रार्थना करो कि वह देश और विदेश के सब विश्वासियों पर उण्डेला जाए, कि वे अधिक एक और अधिक पवित्र हों। प्रार्थना करो कि वह यहूदियों, मुसलमानों और अन्यजातियों पर उण्डेला जाए, कि उनमें से बहुत लोग मन फिराएँ।
प्रार्थना करो कि वह रोमन कैथोलिकों पर, और विशेषकर इटली और आयरलैण्ड में, उण्डेला जाए। प्रार्थना करो कि वह तुम्हारे अपने देश पर उण्डेला जाए, और वह उन न्यायदण्डों से बचा रहे जिनके वह योग्य है। प्रार्थना करो कि वह सब विश्वासयोग्य सेवकों और मिशनरियों पर उण्डेला जाए, और उनकी संख्या सौ गुना बढ़ जाए। सबसे बढ़कर प्रार्थना करो कि वह तुम्हारी अपनी आत्मा पर प्रचुर सामर्थ्य के साथ उण्डेला जाए—कि यदि तुम सत्य को नहीं जानते, तो उसे जानना सीख सको, और यदि जानते हो, तो उसे और भली-भाँति जानो।
पवित्र आत्मा की सामर्थ्य
"हेल्मिंगहम श्रृंखला" की पुस्तिकाएँ, जो उन्नीसवीं शताब्दी के बाद से प्रकाशित नहीं हुईं।
जब तक मनुष्य जीवित है, तब तक सुसमाचार में उसके लिए आशा है। पाप क्षमा करने के लिए मसीह में अनन्त इच्छा है। हृदय बदलने के लिए पवित्र आत्मा में अनन्त सामर्थ्य है।
शरीर के बहुत से रोग असाध्य हैं। सबसे निपुण वैद्य भी उन्हें चंगा नहीं कर सकते। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो! आत्मा के कोई रोग असाध्य नहीं हैं। हर प्रकार और हर मात्रा के पाप मसीह के द्वारा धोए जा सकते हैं। सबसे कठोर और सबसे दुष्ट हृदय भी बदला जा सकता है।
पाठक, मैं फिर कहता हूँ, जब तक जीवन है तब तक आशा है। सबसे बूढ़ा, सबसे नीच, सबसे बुरा पापी भी उद्धार पा सकता है। वह केवल मसीह के पास आए, अपना पाप मान ले, और क्षमा के लिए उसकी दुहाई दे,—वह केवल अपनी आत्मा को मसीह पर डाल दे, और वह चंगा हो जाएगा। मसीह की प्रतिज्ञा के अनुसार पवित्र आत्मा उसके हृदय पर उतारा जाएगा, और वह अपनी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से उसे एक नई सृष्टि में बदल देगा।
मैं किसी के भी पक्के मसीही बनने से कभी निराश नहीं होता, चाहे वह बीते दिनों में कैसा ही क्यों न रहा हो। मैं जानता हूँ कि मृत्यु से जीवन में आने का परिवर्तन कितना बड़ा है; मैं जानता हूँ कि कुछ मनुष्यों और स्वर्ग के बीच जो फूट के पहाड़ खड़े दिखते हैं, वे कैसे हैं; मैं स्वाभाविक हृदय की कठोरता, पूर्वाग्रहों और भयानक पापमयता को जानता हूँ; परन्तु मुझे स्मरण है कि पिता परमेश्वर ने इस महिमामय संसार को शून्य से रचा। मुझे स्मरण है कि प्रभु यीशु की वाणी लाज़र तक पहुँची, जब वह चार दिन का मरा हुआ था, और उसे कब्र से भी बुला लाई; मुझे स्मरण है कि परमेश्वर के आत्मा ने स्वर्ग के नीचे हर जाति में कैसी आश्चर्यजनक विजयें पाई हैं; मैं यह सब स्मरण करता हूँ, और अनुभव करता हूँ कि मुझे कभी निराश होने की आवश्यकता नहीं। हाँ! जो लोग अभी पापों में सबसे अधिक पूरी तरह मरे हुए दिखते हैं, वे भी एक नए जीवन में उठाए जा सकते हैं, और नई जीवन-चाल से परमेश्वर के सामने चल सकते हैं।
ऐसा क्यों न हो? पवित्र आत्मा सामर्थी, दयालु और प्रेमी आत्मा है। वह किसी मनुष्य से उसकी नीचता के कारण मुँह नहीं मोड़ता। वह किसी के पास से इसलिए होकर नहीं गुज़र जाता कि उसके पाप काले और लाल रंग के हैं।
कुरिन्थियों में ऐसा कुछ न था कि वह उतरकर उन्हें जिलाए। पौलुस उनके विषय में बताता है कि वे "व्यभिचारी, मूर्तिपूजक, परस्त्रीगामी, लुच्चे, चोर, लोभी, पियक्कड़, गाली देनेवाले, अन्धेर करनेवाले" थे। वह कहता है, "तुम में से कितने ऐसे ही थे।" फिर भी उन्हें भी आत्मा ने जिलाया। वह लिखता है, "तुम धोए गए, तुम पवित्र किए गए, तुम प्रभु यीशु के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धर्मी ठहराए गए" (1 कुरिन्थियों 6:9-11)।
कुलुस्सियों में ऐसा कुछ न था कि वह उनके हृदयों में आए। पौलुस हमें बताता है कि वे "व्यभिचार, अशुद्धता, दुष्कामना, बुरी अभिलाषा और लोभ, जो मूर्तिपूजा के बराबर है," में चलते थे। फिर भी उन्हें भी आत्मा ने जिलाया। उसने उनसे "पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतरवाया, और नए मनुष्यत्व को पहिनवाया, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है" (कुलुस्सियों 3:5-10)।
मरियम मगदलीनी में ऐसा कुछ न था कि आत्मा उसकी आत्मा को जीवित करे। एक समय वह सात दुष्टात्माओं से ग्रस्त थी; यदि चर्चा सच है, तो एक समय वह नीचता और अधर्म के लिए कहावत बनी हुई स्त्री थी: फिर भी उसे भी आत्मा ने नई सृष्टि बनाया,—उसे उसके पापों से अलग किया,—उसे मसीह के पास लाया,—उसे क्रूस के पास सबसे अन्त तक और कब्र पर सबसे पहले पहुँचने वाली बनाया।
आत्मा किसी आत्मा से उसकी भ्रष्टता के कारण कभी, कभी मुँह नहीं मोड़ेगा। उसने कभी ऐसा नहीं किया;—वह कभी नहीं करेगा। यह उसकी महिमा है कि उसने सबसे अशुद्ध लोगों के मनों को शुद्ध किया है, और उन्हें अपने निवास के लिए मन्दिर बनाया है। हो सकता है कि वह इस पुस्तिका के पढ़नेवालों में से सबसे बुरे को भी लेकर उसे अनुग्रह का पात्र बना दे।
वास्तव में ऐसा क्यों न हो? आत्मा सर्वशक्तिमान आत्मा है। वह पत्थर के हृदय को माँस के हृदय में बदल सकता है; वह सबसे प्रबल बुरी आदतों को अग्नि के आगे सन के समान तोड़ सकता है; वह अत्यन्त कठिन बातों को सहज बना सकता है, और बड़ी से बड़ी आपत्तियों को वसन्त के हिम की नाईं गला सकता है; वह पीतल के बेंड़ों को काट सकता है, और पूर्वाग्रह के फाटकों को पूरी तरह खोल सकता है; वह हर तराई को भर सकता है, और हर ऊबड़-खाबड़ स्थान को चौरस कर सकता है। उसने यह बार-बार किया है, और वह इसे फिर कर सकता है।
आत्मा एक यहूदी को,—जो मसीही धर्म का सबसे कड़वा शत्रु है, सच्चे विश्वासियों का सबसे उग्र सतानेवाला है, फरीसी धारणाओं का सबसे कट्टर पक्षधर है, सुसमाचार के सिद्धान्त का सबसे पूर्वाग्रही विरोधी है,—लेकर उसे उसी विश्वास का उत्साही प्रचारक बना सकता है जिसे वह कभी नष्ट करता था। वह यह कर चुका है।—उसने प्रेरित पौलुस के साथ यह किया।
पवित्र आत्मा एक रोमन कैथोलिक भिक्षु को ले सकता है, जो रोमी अन्धविश्वास के बीच पला-बढ़ा हो,—जिसे बचपन से झूठे सिद्धान्त पर विश्वास करने और पोप की आज्ञा मानने का प्रशिक्षण दिया गया हो,—जो भ्रम में आकण्ठ डूबा हुआ हो,—और उस मनुष्य को विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने का वैसा स्पष्ट समर्थक बना सकता है जैसा संसार ने कभी नहीं देखा; वह ऐसा कर भी चुका है।—उसने मार्टिन लूथर के साथ ऐसा ही किया।
पवित्र आत्मा एक अंग्रेज़ ठठेरे को ले सकता है, जिसके पास न विद्या हो, न संरक्षक, न धन,—जो एक समय निन्दा और गालियों के लिए जितना कुख्यात था उतना और किसी बात के लिए नहीं,—और उस मनुष्य से एक ऐसी धार्मिक पुस्तक लिखवा सकता है, जो अपने ढंग में प्रेरितों के समय से अब तक की किसी भी पुस्तक से अद्वितीय और बेजोड़ ठहरे। वह ऐसा कर भी चुका है—उसने "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" के लेखक जॉन बन्यन के साथ ऐसा ही किया।
पवित्र आत्मा एक नाविक को ले सकता है, जो संसारिकता और पाप में डूबा हुआ हो,—दासों के जहाज़ का एक लम्पट कप्तान,—और उस मनुष्य को सुसमाचार का अत्यन्त सफल सेवक बना सकता है; ऐसे पत्रों का लेखक, जो अनुभवजन्य धर्म का भण्डार हैं; और ऐसे भजनों का रचयिता, जो जहाँ कहीं अंग्रेज़ी बोली जाती है वहाँ जाने और गाए जाते हैं। वह ऐसा कर भी चुका है।—उसने जॉन न्यूटन के साथ ऐसा ही किया।
यह सब पवित्र आत्मा कर चुका है, और इससे कहीं अधिक भी, जिसके विषय में मैं विस्तार से नहीं कह सकता। और पवित्र आत्मा का हाथ छोटा नहीं हो गया है: उसकी सामर्थ्य घटी नहीं है। वह प्रभु यीशु के समान है,—कल, आज और युगानुयुग एकसा। वह अब भी आश्चर्यकर्म कर रहा है, और अन्त तक करता रहेगा।
यदि इसी जीवन में मैं यह सुनूँ कि जिस मनुष्य को मैं सबसे कठोर जानता हूँ वह कोमल हो गया है, और जो सबसे अभिमानी था वह दूध छुड़ाए हुए बालक के समान यीशु के चरणों में आ बैठा है, तो मुझे आश्चर्य न होगा।
यदि न्याय के दिन मैं दाहिनी ओर ऐसे बहुतों को देखूँ जिन्हें अपनी मृत्यु के समय मैं चौड़े मार्ग पर चलता छोड़ गया था, तो मुझे आश्चर्य न होगा।
मैं कभी निराश नहीं होता, क्योंकि मैं पवित्र आत्मा की सामर्थ्य पर विश्वास करता हूँ। हम सेवक अपने कामों को देखकर निराश हो जाने के योग्य हैं। हम अकसर अपने आप से ऊब जाते हैं। जब हम अपनी मण्डलियों के कुछ लोगों को देखते हैं तो भी निराश हो सकते हैं; वे नीचे की चक्की के पाट के समान कठोर और संवेदनहीन दिखाई देते हैं: परन्तु हम पवित्र आत्मा को स्मरण करते हैं, और यह भी कि उसने क्या-क्या किया है। हम पवित्र आत्मा को स्मरण करते हैं, और विचार करते हैं कि वह बदला नहीं है। वह आग के समान उतरकर सबसे कठोर हृदयों को पिघला सकता है; वह हमारे श्रोताओं में से सबसे बुरे पुरुष या स्त्री को भी परिवर्तित कर सकता है, और उनके सम्पूर्ण चरित्र को नए साँचे में ढाल सकता है। इसलिए हम प्रचार करते रहते हैं। पवित्र आत्मा के कारण हम आशा रखते हैं। आह, कि हमारे हृदय यह समझ लें कि सच्चे धर्म की उन्नति न बल से होती है, न शक्ति से, परन्तु प्रभु के आत्मा से! आह, कि उनमें से बहुत से सेवकों पर कम भरोसा रखना और पवित्र आत्मा के लिए अधिक प्रार्थना करना सीख लें! आह, कि सब लोग पाठशालाओं, पर्चों और कलीसियाई तन्त्र से कम आशा रखना सीखें; और सब साधनों को परिश्रम से काम में लाते हुए, आत्मा के उण्डेले जाने के लिए और अधिक सच्चाई से खोज करें।
पाठक, क्या तू परमेश्वर की ओर तनिक भी खिंचाव अनुभव करता है?—अपनी अमर आत्मा के विषय में थोड़ी भी चिन्ता? क्या तेरा विवेक आज तुझसे कहता है कि तूने अब तक आत्मा की सामर्थ्य का अनुभव नहीं किया, और क्या तू जानना चाहता है कि क्या करना चाहिए? सुन, मैं तुझे बताता हूँ।
एक बात तो यह कि तुझे तुरन्त प्रार्थना में प्रभु यीशु मसीह के पास जाना चाहिए, और उससे विनती करनी चाहिए कि वह तुझ पर दया करे और तुझे आत्मा भेजे। तुझे सीधे जीवते जल के उस खुले हुए सोते, प्रभु यीशु मसीह, के पास जाना चाहिए, और तू पवित्र आत्मा पाएगा (यूहन्ना 7:39)। अभी से पवित्र आत्मा के लिए प्रार्थना करना आरम्भ कर। यह न सोच कि तू बन्द और आशा से कटा हुआ है: पवित्र आत्मा उनसे प्रतिज्ञा किया गया है जो उससे माँगते हैं। उसका नाम ही प्रतिज्ञा का आत्मा और जीवन का आत्मा है। जब तक वह उतरकर तुझे नया हृदय न दे, उसे चैन न लेने दे। प्रभु से ज़ोर से पुकार,—उससे कह, "मुझे भी आशीष दे, हाँ मुझे भी: मुझे जिला और जीवित कर।"
मैं तो चिन्तित आत्माओं को मसीह को छोड़ किसी और के पास भेजने का साहस नहीं करता। जो लोग कहते हैं कि पहले पवित्र आत्मा के लिए प्रार्थना करो, ताकि फिर मसीह के पास जा सको, उनसे मैं सहमत नहीं हो सकता। मुझे पवित्रशास्त्र में ऐसा कहने का कोई आधार नहीं दिखता। मैं केवल इतना देखता हूँ कि यदि मनुष्य अपने आप को दरिद्र, नाश होनेवाला पापी अनुभव करें, तो उन्हें सबसे पहले और सीधे यीशु मसीह के पास जाना चाहिए। मैं देखता हूँ कि वह स्वयं कहता है, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए" (यूहन्ना 7:37)। मैं जानता हूँ कि लिखा है, "तू ने मनुष्यों से, वरन् हठीलों से भी भेंट ली, ताकि यहोवा परमेश्वर उनके बीच निवास करे" (भजन संहिता 68:18)। मैं जानता हूँ कि पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देना उसी का विशेष कार्य है, और कि "उसी में सारी परिपूर्णता वास करती है।" मैं बाइबल से अधिक व्यवस्थित होने का ढोंग करने का साहस नहीं करता। मैं विश्वास करता हूँ कि मसीह ही परमेश्वर और आत्मा के मिलन का स्थान है: और जो कोई आत्मा चाहता है, उसे मेरी पहली सलाह सदा यही होगी, "यीशु के पास जा, और अपनी घटियाँ उसी को बता।"
दूसरी बात यह कि यदि तूने अब तक आत्मा की परिवर्तन करनेवाली सामर्थ्य का अनुभव नहीं किया, तो तुझे उन अनुग्रह के साधनों में परिश्रम से लगे रहना चाहिए जिनके द्वारा आत्मा कार्य करता है। तुझे नियमित रूप से उस वचन को सुनना चाहिए जो उसकी तलवार है; तुझे उन सभाओं में नित्य जाना चाहिए जहाँ उसकी उपस्थिति की प्रतिज्ञा है; संक्षेप में, यदि तू चाहता है कि आत्मा तेरा भला करे, तो तुझे आत्मा के मार्ग में पाया जाना चाहिए। अन्धा बर्तिमाई यदि आलस्य से घर में बैठा रहता, और बाहर आकर मार्ग के किनारे न बैठता, तो उसे कभी दृष्टि न मिलती। यदि ज़क्कई आगे दौड़कर गूलर के पेड़ पर न चढ़ता, तो शायद वह यीशु को कभी न देखता और अब्राहम का पुत्र न बनता। आत्मा प्रेममय और भला आत्मा है। परन्तु जो अनुग्रह के साधनों को तुच्छ जानता है, वह पवित्र आत्मा का विरोध करता है।
पाठक, इन दो बातों को स्मरण रख। मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि कोई भी मनुष्य जिसने इन दो सलाहों पर सच्चाई और धीरज से चला, ऐसा नहीं हुआ जिसे देर-सवेर आत्मा न मिला हो, और जिसने अनुभव से न जाना हो कि वह "बचाने में सामर्थी" है।
पवित्र आत्मा के विषय में शिक्षा
पर्व के अन्तिम दिन, जो सबसे बड़ा दिन था, यीशु खड़ा हुआ और ऊँची आवाज़ से कहा, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए, और जो मुझ पर विश्वास करे, वह पीए। जैसा पवित्रशास्त्र में कहा गया है, 'उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।'" (यह उसने उस आत्मा के विषय में कहा जिसे उस पर विश्वास करनेवाले पानेवाले थे, क्योंकि आत्मा अब तक नहीं दिया गया था, क्योंकि यीशु अब तक अपनी महिमा को नहीं पहुँचा था।) - यूहन्ना 7:37-39
कहा गया है कि पवित्रशास्त्र में कुछ ऐसे अंश हैं जो सोने के अक्षरों में छपने के योग्य हैं। हमारे सामने की ये आयतें ऐसे ही अंशों में से एक हैं। इनमें मनुष्यों के लिए उन विस्तृत, पूर्ण और निःशुल्क निमन्त्रणों में से एक है, जो मसीह के सुसमाचार को इतने उत्कृष्ट रूप में "परमेश्वर का शुभ समाचार" बनाते हैं। आइए देखें कि वह किन बातों से बना है।
इन आयतों में, पहले, एक मानी हुई स्थिति हमारे सामने है। प्रभु यीशु कहता है, "यदि कोई प्यासा हो।" निःसन्देह इन शब्दों का अर्थ आत्मिक था। यहाँ की प्यास विशुद्ध आत्मिक प्रकार की है। इसका अर्थ है आत्मा की चिन्ता—पाप का कायल होना—क्षमा की अभिलाषा—विवेक की शान्ति की तड़प। जब मनुष्य अपने पापों को अनुभव करता है और क्षमा चाहता है—अपनी आत्मा की आवश्यकता को गहराई से समझता है और सहायता तथा राहत की उत्कट इच्छा रखता है—तब वह उसी मन की दशा में होता है जो हमारे प्रभु के सामने थी, जब उसने कहा, "यदि कोई प्यासा हो।" जिन यहूदियों ने पिन्तेकुस्त के दिन पतरस का प्रचार सुना और "जिनके हृदय छिद गए,"—वह फिलिप्पी का दारोगा जिसने पौलुस और सीलास से पुकारकर कहा, "उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?"—दोनों इस बात के उदाहरण हैं कि इस कथन का क्या अर्थ है। दोनों में "प्यास" थी।
दुर्भाग्य से, ऐसी प्यास को थोड़े ही लोग जानते हैं। सबको इसका अनुभव करना चाहिए, और यदि सब बुद्धिमान होते तो सब इसका अनुभव करते। हम सब पापी, मरणहार और मरनेवाले प्राणी हैं, हमारी आत्माओं का एक दिन न्याय होगा और वे अनन्तकाल स्वर्ग या नरक में बिताएँगी; पृथ्वी पर ऐसा कोई स्त्री-पुरुष नहीं जिसे उद्धार की "प्यास" न होनी चाहिए। फिर भी अधिकतर लोग उद्धार को छोड़ लगभग हर वस्तु के प्यासे हैं। धन, सुख-विलास, मान-सम्मान, पद, स्वार्थ-भोग—यही वस्तुएँ हैं जिनकी वे लालसा करते हैं। मनुष्य के पतन और मानव स्वभाव के पूर्ण भ्रष्ट होने का इससे स्पष्ट प्रमाण और कोई नहीं कि अधिकांश लोग अपनी आत्माओं के विषय में लापरवाह और उदासीन हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि बाइबल स्वाभाविक मनुष्य को "अन्धा," "सोया हुआ" और "मरा हुआ" कहती है, जब उद्धार के विषय में जागा हुआ, जीवित और प्यासा मनुष्य इतने कम पाए जाते हैं।
धन्य हैं वे जो अनुभव से आत्मिक "प्यास" के विषय में कुछ जानते हैं। सारे सच्चे मसीही जीवन का आरम्भ यह जान लेना है कि हम दोषी, रिक्त और अभावग्रस्त पापी हैं। जब तक हम यह नहीं जानते कि हम खोए हुए हैं, तब तक हम उद्धार पाने के मार्ग में नहीं हैं। स्वर्ग की ओर पहला कदम यह भली-भाँति मान लेना है कि हम नरक के योग्य हैं। पाप का वह बोध जो कभी-कभी मनुष्य को घबरा देता है और उसे अपनी दशा निराशाजनक लगती है, एक अच्छा चिन्ह है। वास्तव में यह आत्मिक जीवन का लक्षण है—"धन्य हैं वे जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे।" (मत्ती 5:6।)
इन आयतों में, दूसरे, एक उपाय प्रस्तुत किया गया है। प्रभु यीशु कहता है, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" वह घोषणा करता है कि वही जीवन का सच्चा सोता है, सब आत्मिक आवश्यकताओं का देनेवाला, सब आत्मिक अभावों को दूर करनेवाला। वह उन सब को जो पाप का भारी बोझ अनुभव करते हैं, अपने पास आने का निमन्त्रण देता है, और अपने आप को उनका सहायक घोषित करता है।
"वह मेरे पास आए"—ये शब्द थोड़े और बहुत सरल हैं। परन्तु ये एक ऐसे महान प्रश्न का समाधान करते हैं जिसे यूनानी और रोमी दार्शनिकों की सारी बुद्धि कभी हल न कर सकी; ये दिखाते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के साथ मेल कैसे पा सकता है। ये दिखाते हैं कि मेल मसीह में, उसे अपना मध्यस्थ और प्रतिनिधि जानकर उस पर भरोसा रखने से, एक शब्द में विश्वास करने से मिलता है। मसीह के "पास आना" उस पर विश्वास करना है, और उस पर "विश्वास" करना उसके पास आना है। यह उपाय बहुत सरल प्रतीत हो सकता है, इतना सरल कि सच न लगे। परन्तु इसके सिवा कोई और उपाय नहीं; और संसार की सारी बुद्धि इसमें कोई दोष नहीं निकाल सकती, न इससे अच्छा उपाय निकाल सकती है।
मसीह के इस महान नुस्खे का प्रयोग करना उद्धार देनेवाले सारे मसीही जीवन का भेद है। हर युग में परमेश्वर के सन्त वे स्त्री-पुरुष रहे हैं जिन्होंने विश्वास से इस सोते का जल पिया और राहत पाई। उन्होंने अपना दोष और रिक्तता अनुभव की और छुटकारे के प्यासे हुए। उन्होंने सुना कि क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह में सब पश्चातापी विश्वासियों के लिए क्षमा, दया और अनुग्रह का भरपूर भण्डार है। उन्होंने इस शुभ समाचार पर विश्वास किया और उस पर चले। उन्होंने अपनी भलाई और योग्यता पर से सारा भरोसा त्याग दिया और पापी होकर विश्वास से मसीह के पास आए। इस प्रकार आने पर उन्हें राहत मिली। इस प्रकार प्रतिदिन आकर वे जीए। इस प्रकार आकर वे मरे। पाप की पापमयता को सचमुच अनुभव करना और प्यासा होना, और सचमुच मसीह के पास आकर विश्वास करना—ये दो कदम स्वर्ग की ओर ले जाते हैं। परन्तु ये बड़े कदम हैं। हज़ारों लोग इतने घमण्डी और लापरवाह हैं कि इन्हें नहीं उठाते। हाय! थोड़े सोचते हैं, और उनसे भी थोड़े विश्वास करते हैं।
इन आयतों में, अन्त में, एक प्रतिज्ञा सामने रखी गई है। प्रभु यीशु कहता है, "जो मुझ पर विश्वास करता है, उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।" निःसन्देह इन शब्दों का अर्थ आलंकारिक था। इनके दो प्रयोग हैं। एक ओर ये सिखाते हैं कि जो सब विश्वास से मसीह के पास आते हैं, वे उसमें भरपूर सन्तोष पाएँगे। दूसरी ओर ये सिखाते हैं कि विश्वासियों के पास न केवल अपनी आत्माओं की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त होगा, वरन् वे दूसरों के लिए आशीषों के सोते भी बन जाएँगे।
प्रतिज्ञा के पहले भाग की पूर्ति की गवाही आज के समय में हज़ारों जीवित मसीही दे सकते हैं। यदि उनकी गवाही एकत्र की जा सके तो वे कहेंगे कि जब वे विश्वास से मसीह के पास आए, तो उन्होंने उसमें अपनी आशा से अधिक पाया। जब से उन्होंने पहले विश्वास किया, तब से उन्होंने ऐसी शान्ति, आशा और सान्त्वना का स्वाद चखा है जिसे वे अपने सारे सन्देहों और भयों के होते हुए भी इस संसार की किसी वस्तु के बदले न बदलेंगे। उन्होंने अपनी आवश्यकता के अनुसार अनुग्रह और अपने दिनों के अनुसार बल पाया है। अपने आप में और अपने हृदयों में वे अकसर निराश हुए हैं; परन्तु मसीह में वे कभी निराश नहीं हुए।
प्रतिज्ञा के दूसरे भाग की पूर्ति पूरी रीति से न्याय के दिन तक कभी नहीं जानी जाएगी। केवल वही दिन प्रकट करेगा कि हर एक विश्वासी अपने मन फिराव के दिन से ही दूसरों की कितनी भलाई करने का साधन बनाया जाता है। कुछ लोग भलाई करते हैं जबकि
