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पवित्र आत्मा का व्यक्तित्व और कार्य (जारी)
कि उसने अपनी आत्मा की चिन्ता बहुत अधिक की थी। जीवन का मार्ग एक सकरा मार्ग है—परन्तु उस पर चलनेवालों के पदचिन्ह सब एक ही दिशा में हैं—आदम की सन्तानों में से एक भी कभी लौटकर यह नहीं कह गया कि वह एक भ्रम था। संसार का मार्ग चौड़ा मार्ग है—परन्तु करोड़ों-करोड़ों ने उसे त्याग दिया, और यह गवाही दी कि वह शोक और निराशा का मार्ग था।
3. अब तीसरे स्थान पर मुझे उनसे बात करने दीजिए जो जीवित हैं।
क्या तुम सचमुच परमेश्वर के लिये जीवित हो? क्या तुम सच्चाई से कह सकते हो, "मैं मरा हुआ था, और फिर जी उठा हूँ। मैं अन्धा था—परन्तु अब देखता हूँ"? तो चेतावनी के वचन को ग्रहण करो, और अपने मन को बुद्धि की ओर लगाओ।
क्या तुम जीवित हो? तो अपने कामों से इसे प्रमाणित करो। एक सुसंगत गवाह बनो। तुम्हारे शब्द, कर्म, चाल-चलन और स्वभाव सब एक ही कहानी कहें। तुम्हारा जीवन कछुए या आलसी जन्तु के समान सुस्त और निष्क्रिय जीवन न हो—वह हिरन या पक्षी के समान स्फूर्तिमय और सक्रिय जीवन हो। तुम्हारे जीवन की सब खिड़कियों से तुम्हारे सद्गुण चमकें, ताकि तुम्हारे निकट रहनेवाले देख सकें कि पवित्र आत्मा तुम्हारे हृदयों में वास करता है। तुम्हारा प्रकाश मद्धम, टिमटिमाती और अनिश्चित लौ न हो; वह वेदी की उस अखण्ड आग के समान स्थिर जले, और कभी मन्द न पड़े। तुम्हारे धर्म की सुगन्ध, मरियम के बहुमूल्य इत्र के समान, उन सब घरों को भर दे जहाँ तुम रहते हो। मसीह की ऐसी पत्री बनो जो इतने स्पष्ट रूप से, इतने बड़े और गहरे अक्षरों में लिखी गई हो—कि दौड़ता हुआ भी उसे पढ़ सके। तुम्हारी मसीही चाल ऐसी स्पष्ट हो, तुम्हारी आँख ऐसी एकाग्र, तुम्हारा हृदय ऐसा सम्पूर्ण, तुम्हारा चलन ऐसा सीधा हो कि जो कोई तुम्हें देखे उसे इसमें कोई सन्देह न रहे कि तुम किसके हो और किसकी सेवा करते हो। यदि हम आत्मा के द्वारा जिलाए गए हैं, तो कोई इसमें सन्देह न कर सके। हमारा आचरण स्पष्ट घोषणा करे कि हम "एक देश की खोज में हैं।" (इब्रानियों 11:14।) लोगों को यह बताना आवश्यक न हो, जैसा कि किसी बुरी तरह बने चित्र के विषय में बताना पड़ता है, कि "यह एक मसीही है।" हम इतने सुस्त और निश्चल न हों कि लोगों को पास आकर ध्यान से देखना पड़े, और कहना पड़े, "यह मरा हुआ है या जीवित?"
क्या तुम जीवित हो? तो अपनी उन्नति से इसे प्रमाणित करो। भीतर का वह महान परिवर्तन प्रति वर्ष और अधिक प्रकट होता जाए। तुम्हारा प्रकाश बढ़ता हुआ प्रकाश हो, यहोशू के उस सूर्य के समान नहीं जो अय्यालोन की तराई में ठहर गया था—न हिज़किय्याह के उस सूर्य के समान जो पीछे लौट गया—परन्तु ऐसा जो अपने जीवन के अन्तिम दिन तक अधिक से अधिक चमकता रहे। तुम्हारे प्रभु का वह स्वरूप, जिसमें तुम नए बनाए गए हो, प्रति मास और अधिक स्पष्ट और तीक्ष्ण होता जाए। वह सिक्के की उस छाप और लेख के समान न हो जो जितना प्रयोग में आता है उतना ही धुँधला और घिसता जाता है। वह जितना पुराना हो उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाए, और तुम्हारे राजा की समानता और अधिक पूर्णता और तीक्ष्णता से उभरकर दिखाई दे।
मुझे ठहरे हुए धर्म पर कोई भरोसा नहीं। मैं नहीं समझता कि मसीही को किसी पशु के समान बनाया गया है जो एक निश्चित आयु तक बढ़कर रुक जाता है। मैं तो यह मानता हूँ कि उसे एक वृक्ष के समान होना था, जो जीवन भर बल और जोश में बढ़ता ही जाए। प्रेरित पतरस के इन शब्दों को स्मरण रखो, "अपने विश्वास पर सद्गुण, और सद्गुण पर ज्ञान, और ज्ञान पर संयम, और संयम पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाओ।" (2 पतरस 1:5-7।) उपयोगी मसीही बनने का यही मार्ग है। जब लोग निरन्तर उन्नति देखेंगे तो विश्वास करेंगे कि तुम सच्चे हो, और शायद तुम्हारे साथ चलने को भी खिंच आएँगे। निश्चयता का सुख पाने का यह भी एक उपाय है। "इस रीति से तुम्हारे लिये हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्त राज्य में प्रवेश करने का मार्ग भली भाँति खुल जाएगा।" (2 पतरस 1:11।) आह, यदि तुम चाहते हो कि अपने धर्म में उपयोगी और सुखी रहो, तो अपने अन्तिम दिन तक यही तुम्हारा आदर्श-वाक्य हो, "आगे बढ़ो, आगे बढ़ो!"
"लोग शब्दों की अपेक्षा कामों पर कहीं अधिक ध्यान देते हैं।"— लेइटन।
मैं सब विश्वासी पाठकों से विनती करता हूँ कि स्मरण रखें कि मैं अपने आप से भी उतना ही कह रहा हूँ जितना उनसे। मैं कहता हूँ कि मसीहियों में जो आत्मिक जीवन है वह और अधिक प्रकट होना चाहिए। हमारे दीपकों को सँवारने की आवश्यकता है—उन्हें इतना मद्धम नहीं जलना चाहिए। संसार से हमारा अलगाव और अधिक स्पष्ट होना चाहिए—परमेश्वर के साथ हमारी चाल और अधिक दृढ़ होनी चाहिए। हम में से बहुत लूत के समान हैं—ढील करनेवाले; या रूबेन, गाद और मनश्शे के समान—सीमा पर ठहरनेवाले; या एज्रा के दिनों के यहूदियों के समान—परायों के साथ ऐसे घुले-मिले कि हमारी आत्मिक वंशावली पहचानी नहीं जा सकती। ऐसा नहीं होना चाहिए। आओ, हम उठें और काम में लगें। यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी। यदि हम में सचमुच जीवन है, तो उसे प्रकट करें।
संसार की दशा इसकी माँग करती है। अन्तिम दिन हम पर आ पड़े हैं। पृथ्वी के राज्य हिल रहे हैं, गिर रहे हैं, टूट रहे हैं, और चूर-चूर होते जा रहे हैं। (यशायाह 24:1 आदि।) वह महिमामय राज्य जो कभी हटाया न जाएगा, निकट आता जा रहा है। राजा स्वयं द्वार पर है। इस संसार के लोग चारों ओर देख रहे हैं कि पवित्र लोग क्या कर रहे हैं। परमेश्वर अपनी अद्भुत व्यवस्थाओं के द्वारा हमें पुकार रहा है, "मेरी ओर कौन है? कौन?"—निश्चय ही हमें अब्राहम के समान उत्तर देने को तत्पर रहना चाहिए, "देख, मैं यहाँ हूँ!" (उत्पत्ति 22:1।)
तुम कह सकते हो, "आह! ये तो पुरानी बातें हैं—ये तो वीरता के बोल हैं। हम यह सब जानते हैं। परन्तु हम निर्बल हैं, हम में एक अच्छा विचार भी सोचने की शक्ति नहीं, हम कुछ नहीं कर सकते, हमें चुपचाप बैठे रहना है।" हे विश्वासी पाठक, सुन। तेरी निर्बलता का कारण क्या है? क्या यह इसलिये नहीं कि जीवन के सोते का उपयोग कम किया गया है? क्या यह इसलिये नहीं कि तू पुराने अनुभवों पर टिका है, और प्रतिदिन नया मन्ना इकट्ठा नहीं करता—प्रतिदिन मसीह से नया बल नहीं लेता? उसने तेरे लिये सहायक की प्रतिज्ञा छोड़ी है। "वह और भी अनुग्रह देता है"—जो माँगता है उसे अनुग्रह पर अनुग्रह। वह इसलिये आया कि "वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ।" आज वह कहता है, "अपना मुँह पसार, तब मैं उसे भर दूँगा।" (याकूब 4:6; यूहन्ना 10:10; भजन संहिता 81:10।)
इस लेख को पढ़नेवाले सब विश्वासियों से मैं कहता हूँ, यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा आत्मिक जीवन अधिक स्वस्थ और सशक्त हो, तो तुम्हें अनुग्रह के सिंहासन के पास और अधिक साहस के साथ आना होगा। तुम्हें यह पीछे हटने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी—प्रभु के वचन को उसी के कहे अनुसार मान लेने में यह हिचकिचाहट छोड़नी होगी। निःसन्देह तुम दीन पापी हो, और कुछ भी नहीं हो। प्रभु यह जानता है, और उसने तुम्हारे लिए सामर्थ्य का भण्डार रखा है। परन्तु जो भण्डार उसने तैयार किया है, तुम उससे लेते नहीं—तुम्हारे पास इसलिए नहीं है कि तुम माँगते नहीं। तुम्हारी निर्बलता का भेद तुम्हारा थोड़ा विश्वास है—और थोड़ी प्रार्थना। सोता खुला है—परन्तु तुम केवल कुछ बूँदें चखते हो। जीवन की रोटी तुम्हारे सामने है—फिर भी तुम केवल कुछ टुकड़े खाते हो। स्वर्ग का भण्डार खुला है—परन्तु तुम केवल कुछ सिक्के उठाते हो। "हे अल्पविश्वासी, तू ने क्यों सन्देह किया?" (मत्ती 14:31।)
अपने विशेषाधिकारों को जानने के लिए जाग उठो—जागो, और अब न सोओ। जब तक अनुग्रह का सिंहासन तुम्हारे सामने है, तब तक मुझसे आत्मिक भूख, प्यास और दरिद्रता की बात मत करो। बल्कि यह कहो कि तुम अभिमानी हो—और दीन पापियों के रूप में उसके पास आना नहीं चाहते। यह कहो कि तुम आलसी हो—और अधिक पाने के लिए परिश्रम करना नहीं चाहते।
अभिमान के उन कफ़न-वस्त्रों को उतार फेंको—जो अब भी तुम्हारे चारों ओर लिपटे हैं। आलस्य का वह मिस्री वस्त्र उतार दो—जिसे लाल समुद्र के पार लाना ही नहीं चाहिए था। उस अविश्वास को दूर करो, जो तुम्हारी जीभ को बाँधकर उसे निर्बल कर देता है। तुम परमेश्वर में तंग नहीं हो—परन्तु अपने आप में हो। "अनुग्रह के सिंहासन के निकट साहस बाँधकर चलो," जहाँ पिता सदा देने को तत्पर है, और यीशु उसके पास सदा मध्यस्थता की प्रार्थना करने को विराजमान है। (इब्रानियों 4:16।) साहस बाँधकर आओ, क्योंकि तुम आ सकते हो, चाहे तुम कितने ही पापी क्यों न हो—यदि तुम महान महायाजक के नाम से आओ। साहस बाँधकर आओ, और बहुत माँगो, और तुम्हें भरपूर उत्तर मिलेंगे—नदी के समान दया, और प्रबल धारा के समान अनुग्रह और सामर्थ्य। साहस बाँधकर आओ, और तुम्हें वह सब मिलेगा जो तुम्हारे माँगने या सोचने से कहीं बढ़कर है। "अब तक तुम ने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा; माँगो तो पाओगे, कि तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।" (यूहन्ना 16:24।)
यदि हम सचमुच जीवित हैं और मरे हुए नहीं, तो आओ हम अपना आचरण ऐसा रखने का यत्न करें कि लोग जान लें कि हम किसके हैं। जब तक हम जीवित हैं, हम प्रभु के लिए जीएँ। जब हम मरें, तो धर्मियों की मृत्यु मरें। और जब प्रभु यीशु आए, तो हम तैयार पाए जाएँ, और "उसके आने पर उसके सामने लज्जित न हों।" (1 यूहन्ना 2:28।)
परन्तु अन्त में, क्या हम जीवित हैं या मरे हुए? यही बड़ा प्रश्न है!
पवित्र आत्मा का होना
"ये वे हैं जो सांसारिक हैं, और पवित्र आत्मा से रहित हैं।" - यहूदा 19
मैं यह मानकर चलता हूँ कि इस लेख का हर पाठक पवित्र आत्मा पर विश्वास करता है। इस देश में जो लोग नास्तिक, ईश्वरवादी या सोसिनियन हैं और त्रिएकता के सिद्धान्त का खुलकर इनकार करते हैं, उनकी संख्या सौभाग्य से बहुत अधिक नहीं है। अधिकतर लोगों ने पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा लिया है। कलीसिया के सदस्यों में तो कम ही ऐसे होंगे जिन्होंने हमारी पुरानी प्रश्नोत्तरी के ये प्रसिद्ध शब्द बार-बार न सुने हों, "मैं परमेश्वर पवित्र आत्मा पर विश्वास करता हूँ, जो मुझे और परमेश्वर के सब चुने हुए लोगों को पवित्र करता है।"
परन्तु इस सब के होते हुए भी, बहुतों के लिए यह भला होगा कि वे विचार करें कि वे पवित्र आत्मा के नाम के सिवा उसके विषय में और क्या जानते हैं। आत्मा के कार्य से तुम्हारा अनुभव-जनित परिचय कितना है? उसने तुम्हारे लिए क्या किया है? तुम्हें उससे क्या लाभ मिला है? परमेश्वर पिता के विषय में तुम कह सकते हो, "उसने मुझे और सारे जगत को बनाया।" परमेश्वर पुत्र के विषय में तुम कह सकते हो, "वह मेरे और सारी मानवजाति के लिए मरा।" परन्तु क्या तुम पवित्र आत्मा के विषय में कुछ कह सकते हो? क्या तुम किसी भी निश्चय के साथ कह सकते हो, "वह मुझ में वास करता है, और मुझे पवित्र करता है"? एक शब्द में, क्या तुम में आत्मा है? इस लेख के आरम्भ का पद तुम्हें बताएगा कि "आत्मा का न होना" भी कुछ होता है। यही बात मैं तुम्हारे ध्यान में लाना चाहता हूँ।
मेरा विश्वास है कि यह बात सब समयों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मैं इसे आज के दिनों में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। मेरा मानना है कि पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में स्पष्ट समझ हमारे समय में फैले अनेक झूठे सिद्धान्तों से बचाने के सर्वोत्तम उपायों में से है। इसलिए मुझे अनुमति दो कि मैं तुम्हारे सामने कुछ बातें रखूँ, जो परमेश्वर की आशीष से आत्मा के होने के विषय पर प्रकाश डालें।
I. मैं समझाऊँ कि "आत्मा का होना" कितना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
II. मैं वह महान सामान्य सिद्धान्त बताऊँ जिससे ही इस प्रश्न की परख हो सकती है, "क्या तुम में आत्मा है?"
III. मैं उन विशेष प्रभावों का वर्णन करूँ जो आत्मा सदा उन आत्माओं में उत्पन्न करता है जिनमें वह वास करता है।
I. पहले मैं यह समझाऊँ कि आत्मा का होना कितना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
इस बात को स्पष्ट करना नितान्त आवश्यक है। जब तक तुम यह नहीं देखोगे, मैं इस सारे लेख में ऐसा प्रतीत होऊँगा जैसे हवा में मुक्के मार रहा हूँ। एक बार तुम्हारा मन इस बात को पकड़ ले, तो जो काम मैं करना चाहता हूँ, उसका आधा तुम्हारी आत्मा के लिए हो चुका।
मैं सहज ही कल्पना कर सकता हूँ कि कोई पाठक कह रहा है, मुझे इस प्रश्न की उपयोगिता समझ नहीं आती! मान लो कि मुझ में आत्मा नहीं है, तो इसमें भारी हानि क्या है? मैं इस संसार में अपना कर्तव्य निभाने का यत्न करता हूँ—मैं नियम से अपनी कलीसिया में जाता हूँ—कभी-कभी संस्कार ग्रहण करता हूँ—मेरा मानना है कि मैं अपने पड़ोसियों के समान ही अच्छा
मसीही हूँ। मैं अपनी प्रार्थनाएँ करता हूँ—मुझे भरोसा है कि परमेश्वर मसीह के निमित्त मेरे पाप क्षमा करेगा। मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि मैं अन्त में स्वर्ग क्यों न पहुँचूँ, और आत्मा के विषय में कठिन प्रश्नों से अपने आप को क्यों परेशान करूँ।"
यदि तुम्हारे विचार ये ही हैं, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि कुछ मिनट मुझ पर ध्यान दो, जब मैं तुम्हें भिन्न रीति से सोचने के कारण देने का यत्न करता हूँ। मेरी बात मानो, तुम्हारी आत्मा का उद्धार "आत्मा के होने" पर ही निर्भर है। जीवन या मृत्यु; स्वर्ग या नरक; अनन्त सुख या अनन्त दुःख; सब इस लेख के विषय से जुड़े हैं।
(क) एक बात तो स्मरण रखो, यदि तुम में आत्मा नहीं है, तो मसीह में तुम्हारा कोई भाग नहीं, और स्वर्ग पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।
पौलुस के शब्द स्पष्ट और असंदिग्ध हैं, "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।" (रोमियों 8:9)। यूहन्ना के शब्द भी कुछ कम स्पष्ट नहीं हैं, "इसी से हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है, अर्थात् उस आत्मा से जो उस ने हमें दिया है।" (1 यूहन्ना 3:24)। परमेश्वर पवित्र आत्मा का भीतर वास करना मसीह में सब सच्चे विश्वासियों का साझा चिह्न है। यह प्रभु यीशु की भेड़-बकरियों के झुण्ड पर चरवाहे की छाप है, जो उन्हें संसार के शेष लोगों से अलग करती है। यह परमेश्वर के सच्चे पुत्रों पर सुनार की मुहर है, जो उन्हें झूठे अंगीकार करनेवालों की मैल और भीड़ से अलग करती है। यह उन लोगों पर राजा की अपनी मुहर है जो उसकी निज प्रजा हैं, और यह प्रमाणित करती है कि वे उसकी ही सम्पत्ति हैं। यह वह "बयाना" है जो छुड़ानेवाला अपने विश्वासी चेलों को उनके देह में रहते हुए देता है, कि पुनरुत्थान की भोर में आनेवाले पूर्ण और सम्पूर्ण "छुटकारे" का चिह्न बना रहे। (इफिसियों 1:14)। सब विश्वासियों की यही दशा है। उन सब में आत्मा है।
यह स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए कि जिसमें आत्मा नहीं, उसमें मसीह नहीं। जिसमें मसीह नहीं, उसके पापों की क्षमा नहीं—परमेश्वर के साथ मेल नहीं—स्वर्ग का कोई अधिकार नहीं—उद्धार पाने की कोई दृढ़ आशा नहीं।
उसका धर्म उस घर के समान है जो रेत पर बनाया गया। अच्छे मौसम में वह सुन्दर दिख सकता है। स्वास्थ्य और समृद्धि के समय वह उसे सन्तुष्ट कर सकता है। परन्तु जब बाढ़ चढ़ती है और आँधी चलती है—जब बीमारी और संकट उस पर टूट पड़ते हैं—तब वह गिर जाएगा और उसे अपने खण्डहरों के नीचे दबा लेगा। वह बिना किसी उत्तम आशा के जीता है, और बिना उत्तम आशा के मरता है। वह फिर जी उठेगा, परन्तु केवल दुःखी होने के लिए। वह न्याय में खड़ा होगा, परन्तु केवल दोषी ठहरने के लिए; वह सन्तों और स्वर्गदूतों को देखता हुआ पाएगा, और स्मरण करेगा कि वह भी उनके बीच हो सकता था—पर अब बहुत देर हो चुकी; वह अपने चारों ओर असंख्य खोए हुओं को देखेगा, और पाएगा कि वे उसे सान्त्वना नहीं दे सकते—पर अब बहुत देर हो चुकी। उस मनुष्य का अन्त यही होगा जो सोचता है कि आत्मा के बिना स्वर्ग पहुँच जाएगा।
इन बातों को अपनी स्मृति में बैठा लो, और इन्हें कभी न भूलो। क्या ये स्मरण रखने योग्य नहीं? तुममें पवित्र आत्मा नहीं—तो मसीह में कोई भाग नहीं! मसीह में कोई भाग नहीं—तो पापों की क्षमा नहीं! पापों की क्षमा नहीं—तो परमेश्वर के साथ मेल नहीं! परमेश्वर के साथ मेल नहीं—तो स्वर्ग का कोई अधिकार नहीं! स्वर्ग का कोई अधिकार नहीं—तो स्वर्ग में प्रवेश नहीं! स्वर्ग में प्रवेश नहीं—तो फिर क्या? हाँ—फिर क्या? तुम ठीक ही पूछ सकते हो। तुम कहाँ भागोगे? किस ओर मुड़ोगे? किस शरण में दौड़ोगे? कोई भी शरण नहीं है। नरक के सिवा कुछ नहीं बचता। स्वर्ग में प्रवेश न पाकर—तुम्हें अन्त में नरक में गिरना ही होगा।
मैं इस लेख के हर पाठक से कहता हूँ कि मेरी बात को भली-भाँति ध्यान में रखे। सम्भव है यह तुम्हें चौंका दे—परन्तु क्या तुम्हारे लिए चौंकना भला नहीं हो सकता? क्या मैंने तुम्हें सीधे-सादे पवित्रशास्त्रीय सत्य से बढ़कर कुछ बताया है? तुमने जो तर्क-शृंखला सुनी है उसकी कौन-सी कड़ी कमज़ोर है? तर्क में दोष कहाँ है? मैं अपने विवेक से मानता हूँ कि कोई नहीं है। आत्मा के बिना होने से नरक में पहुँचने तक केवल नीचे उतरती सीढ़ियों की एक लम्बी कतार है। आत्मा के बिना जीते हुए तुम पहले ही शिखर पर खड़े हो; आत्मा के बिना मरते हुए तुम तल तक पहुँचने का मार्ग पा लोगे!
(ख) एक और बात स्मरण रखो: यदि तुममें आत्मा नहीं तो तुममें हृदय की पवित्रता नहीं, और स्वर्ग के योग्य होना भी नहीं।
स्वर्ग वह स्थान है जहाँ सब लोग मरने के बाद जाने की आशा रखते हैं। बहुतों के लिए भला होता यदि वे शान्ति से विचार करते कि स्वर्ग कैसा निवास-स्थान है। वह राजाओं के राजा का निवास है, जो "ऐसा शुद्ध है कि बुराई को देख नहीं सकता," और अनिवार्य है कि वह पवित्र स्थान हो। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि यह ऐसा स्थान है जहाँ कोई "अशुद्ध वस्तु, और घृणित काम करनेवाला" प्रवेश न करेगा। (प्रकाशित वाक्य 21:27)। यह ऐसा स्थान है जहाँ कुछ भी दुष्ट, पापमय या विषयासक्त न होगा—कुछ भी सांसारिक, मूर्खतापूर्ण, तुच्छ या अपवित्र न होगा। वहाँ, लोभी मनुष्य याद रखे, फिर धन न होगा। वहाँ, सुख-विलास ढूँढ़नेवाला याद रखे, फिर न दौड़ें होंगी, न नाटकघर, न उपन्यास पढ़ना, न नाच-रंग। वहाँ, पियक्कड़ और जुआरी याद रखें, फिर न मदिरा होगी, न पासे, न दाँव, न ताश। परमेश्वर, सन्तों और स्वर्गदूतों की सदा की उपस्थिति—परमेश्वर की इच्छा का निरन्तर पूरा किया जाना—हर उस वस्तु का पूर्ण अभाव जिसे परमेश्वर अनुमोदित नहीं करता—यही मुख्य बातें स्वर्ग को बनाएँगी। वह एक अनन्त विश्रामदिन होगा।
इस स्वर्ग के लिए हम सब स्वभाव से सर्वथा अयोग्य हैं। हममें उसके आनन्द को भोगने की क्षमता नहीं। हमें उसकी आशीषों की रुचि नहीं। हमारे पास उसकी सुन्दरता देखने की आँख नहीं। हमारे पास उसकी सान्त्वनाओं को अनुभव करने का हृदय नहीं। स्वतन्त्रता के स्थान पर हम उसे बन्धन पाएँगे। महिमामय स्वाधीनता के स्थान पर हम उसे निरन्तर रोक-टोक पाएँगे। भव्य महल के स्थान पर हम उसे उदास कारागार पाएँगे। सूखी भूमि पर मछली, पानी में भेड़, पिंजरे में उकाब—ये सब स्वर्ग में किसी अपवित्र मनुष्य से अधिक सहज और अपनी जगह पर अनुभव करेंगे। "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा।" (इब्रानियों 12:14)।
इस स्वर्ग के लिए मनुष्यों के प्राणों को तैयार करना पवित्र आत्मा का विशेष कार्य है। केवल वही सांसारिक हृदय को बदल सकता है, और आदम की सन्तान के भ्रष्ट सांसारिक मनोभावों को शुद्ध कर सकता है। केवल वही उनके मनों को परमेश्वर के अनुकूल कर सकता है, और उन्हें सन्तों, स्वर्गदूतों और मसीह की अनन्त संगति के लिए तैयार कर सकता है। केवल वही उन्हें वह प्रेम करना सिखा सकता है जो परमेश्वर प्रेम करता है, उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और परमेश्वर की उपस्थिति में आनन्दित होना। केवल वही मानव स्वभाव के उन अंगों को बैठा सकता है जो आदम के पतन से टूट गए और उखड़ गए थे, और मनुष्य की इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच सच्ची एकता ला सकता है। और वह हर उस व्यक्ति के लिए यह करता है जिसका उद्धार होता है। विश्वासियों के विषय में लिखा है कि वे "परमेश्वर की दया के अनुसार" बचाए गए, परन्तु "नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के नया करने के द्वारा।" वे उद्धार के लिए चुने गए हैं—परन्तु "आत्मा के द्वारा पवित्र होने" और "सत्य की प्रतीति" दोनों के द्वारा। (तीतुस 3:5; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13)।
यह भी अपनी स्मरण-पट्टी पर लिख रखो। जब तक पहले पृथ्वी पर आत्मा तुम्हारे हृदय में न आए, स्वर्ग में कोई प्रवेश नहीं! इस जीवन में पहले पवित्रीकरण हुए बिना अगले जीवन की महिमा में कोई प्रवेश नहीं! यदि इस संसार में पवित्र आत्मा तुम में नहीं है, तो आनेवाले संसार में स्वर्ग भी नहीं! तुम उसके योग्य न होगे! तुम उसके लिए तैयार न होगे! वह तुम्हें अच्छा न लगेगा! तुम उसका आनन्द न ले सकोगे! आजकल "पवित्र" शब्द का बहुत प्रयोग होता है। "पवित्र कलीसिया," "पवित्र बपतिस्मा," "पवित्र दिन," "पवित्र जल," "पवित्र सेवाएँ" और "पवित्र याजक" सुनते-सुनते हमारे कान थक गए हैं। परन्तु एक बात इन सबसे हज़ार गुना अधिक महत्त्वपूर्ण है, और वह यह है कि आत्मा के द्वारा सचमुच पवित्र मनुष्य बनाया जाना। जीवित रहते हुए ही हमें ईश्वरीय स्वभाव में सहभागी बनाया जाना चाहिए। यदि हम कभी अनन्त जीवन की कटनी काटना चाहते हैं, तो हमें "आत्मा के लिये बोना" होगा। (2 पतरस 1:4; गलातियों 6:8।)
(ग) एक और बात भी स्मरण रखो: यदि तुम में आत्मा नहीं है, तो तुम्हें सच्चा मसीही समझे जाने का कोई अधिकार नहीं, और न ही एक बनने की कोई इच्छा या सामर्थ्य है।
संसार के मापदण्ड के अनुसार किसी को 'मसीही' बनाने में बहुत कम लगता है। बस मनुष्य बपतिस्मा ले ले और किसी आराधना-स्थल में जाता रहे, तो संसार की अपेक्षाएँ पूरी हो जाती हैं। उस मनुष्य का विश्वास किसी तुर्क जितना भी समझदारी भरा न हो, वह बाइबल से बिलकुल अनजान हो; उसका आचरण किसी अन्यजाति के मनुष्य से अच्छा न हो, कितने ही सम्मानित हिन्दू उसे लज्जित कर सकते हों। पर इससे क्या? वह अंग्रेज़ है! उसका बपतिस्मा हुआ है! वह गिरजे या प्रार्थनालय में जाता है और वहाँ शिष्टता से व्यवहार करता है! और क्या चाहिए? यदि तुम उसे मसीही न कहो, तो तुम्हें बहुत निर्दय समझा जाता है!
परन्तु बाइबल के मापदण्ड के अनुसार किसी को सच्चा मसीही बनाने में इससे कहीं अधिक लगता है। इसके लिए धन्य त्रिएकता के तीनों व्यक्तियों का सहयोग आवश्यक है। परमेश्वर पिता का चुनाव, परमेश्वर पुत्र का लहू और मध्यस्थता की प्रार्थना, परमेश्वर आत्मा का पवित्रीकरण, ये सब उस आत्मा पर एक साथ आने चाहिए जिसका उद्धार होना है। आदम की किसी भी सन्तान को सच्चा मसीही बनाने का कार्य करने के लिए पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक होना पड़ता है।
यह गहरा विषय है और इसे श्रद्धा के साथ ही संभालना चाहिए। परन्तु जहाँ बाइबल निश्चयपूर्वक बोलती है, वहाँ हम भी निश्चयपूर्वक बोल सकते हैं; और यदि किसी मनुष्य को सच्चा मसीही बनाने में पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही आवश्यक नहीं जितना पिता या पुत्र का कार्य, तो बाइबल के वचनों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। हमें बताया गया है, "कोई पवित्र आत्मा के बिना यह नहीं कह सकता कि यीशु प्रभु है।" (1 कुरिन्थियों 12:3।) पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि सच्चे मसीही "आत्मा से जन्मे" हैं। वे आत्मा में जीवित हैं; आत्मा उनकी अगुआई करता है; आत्मा के द्वारा वे शरीर के कामों को मार डालते हैं; एक ही आत्मा के द्वारा उनकी यीशु के द्वारा पिता तक पहुँच है। उनके सारे गुण आत्मा के फल हैं; वे पवित्र आत्मा का मन्दिर हैं; वे आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास-स्थान हैं; वे आत्मा के अनुसार चलते हैं; आत्मा उन्हें दृढ़ करता है। आत्मा के द्वारा वे विश्वास से धार्मिकता की आशा की बाट जोहते हैं। (यूहन्ना 3:6; गलातियों 5:25; रोमियों 8:13, 14; इफिसियों 2:18; गलातियों 5:22; 1 कुरिन्थियों 6:19; इफिसियों 2:22; रोमियों 8:4; इफिसियों 3:16; गलातियों 5:5।) ये पवित्रशास्त्र के स्पष्ट वचन हैं। इनका खण्डन करने का साहस कौन करेगा?
सच्चाई यह है कि मानव स्वभाव का गहरा भ्रष्टाचार उद्धार को असम्भव बना देता, यदि आत्मा का कार्य न होता। उसके बिना पिता का प्रेम और पुत्र का छुटकारा हमारे सामने व्यर्थ ही रखा जाता है। आत्मा को ही इन्हें प्रकट करना होगा, आत्मा को ही इन्हें लागू करना होगा, नहीं तो हम खोए हुए प्राण हैं!
जिसने सृष्टि के दिन जल के ऊपर विचरण किया, उसकी सामर्थ्य से कम कुछ भी हमें हमारी दीन दशा से कभी नहीं उठा सकता। जिसने कहा, "उजियाला हो," और उजियाला हो गया, उसे ही वचन कहना होगा, तब हम में से कोई भी नए जीवन में उठेगा। जो पिन्तेकुस्त के दिन उतरा, उसे ही हमारे इन दीन मरे हुए प्राणों पर उतरना होगा, तब वे परमेश्वर का राज्य देखेंगे। दया और दुःख हमारे हृदय की ऊपरी सतह को हिला सकते हैं, पर अकेले वे भीतरी मनुष्य तक कभी नहीं पहुँचेंगे। संस्कार, सेवाएँ और उपदेश बाहरी औपचारिकता उत्पन्न कर सकते हैं और हमें 'धर्म की खाल' पहना सकते हैं, पर उनमें जीवन न होगा। सेवक लोग प्रभु-भोज में भाग लेनेवाले बना सकते हैं और कलीसियाओं को नियमित आराधकों से भर सकते हैं; पर सच्चे मसीही बनाने और स्वर्ग को महिमा पाए हुए सन्तों से भरने की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य केवल पवित्र आत्मा में है।
यह भी अपनी स्मृति में लिख रखो और कभी न भूलो। पवित्र आत्मा नहीं, तो सच्ची मसीहियत नहीं! यदि तुम्हें कभी उद्धार पाना है, तो तुम्हारे लिए मसीह के साथ-साथ तुम में आत्मा का होना भी आवश्यक है। परमेश्वर तुम्हारा प्रेममय पिता हो, यीशु तुम्हारा जाना-पहचाना छुड़ानेवाला हो, पवित्र आत्मा तुम्हारा अनुभव किया हुआ पवित्र करनेवाला हो, नहीं तो तुम्हारे लिए इससे अच्छा होता कि तुम कभी जन्मे ही न होते!
मैं इस विषय को उन सब की गम्भीर विचारणा के लिए रखता हूँ जो ये पृष्ठ पढ़ते हैं। मुझे भरोसा है कि मैंने इतना कह दिया है कि तुम समझ सको कि तुम्हारे प्राण के लिए "आत्मा का होना" अत्यन्त आवश्यक है। यह कोई गूढ़ और रहस्यमय धर्मशास्त्रीय बात नहीं है; यह कोई ऐसा बारीक प्रश्न नहीं है जिसका हल इधर हो या उधर, कुछ अन्तर न पड़ता हो। यह ऐसा विषय है जिससे तुम्हारे प्राण की अनन्त शान्ति जुड़ी हुई है।
हो सकता है यह समाचार तुम्हें अच्छा न लगे। तुम इसे उन्मादपूर्ण उत्साह, कट्टरता या अति कह सकते हो। मैं बाइबल की स्पष्ट शिक्षा पर खड़ा हूँ। मैं कहता हूँ कि पृथ्वी पर परमेश्वर को आत्मा के द्वारा तुम्हारे हृदय में वास करना होगा, नहीं तो तुम कभी स्वर्ग में परमेश्वर के साथ वास न करोगे।
तुम कह सकते हो, "अरे, मैं इसके बारे में अधिक नहीं जानता। मुझे भरोसा है कि परमेश्वर दयालु होगा। मुझे आशा है कि अन्त में मैं स्वर्ग जाऊँगा।" मैं उत्तर देता हूँ: आज तक किसी मनुष्य ने मसीह की दया का स्वाद नहीं चखा जिसने उसका आत्मा भी न पाया हो। कोई मनुष्य कभी धर्मी न ठहराया गया जो पवित्र भी न किया गया हो। कोई मनुष्य कभी स्वर्ग नहीं गया जिसे आत्मा वहाँ न ले गया हो।
II. दूसरे, मैं वह बड़ा सामान्य नियम और सिद्धान्त बताना चाहता हूँ जिससे यह प्रश्न निर्णीत हो सकता है कि हम में आत्मा है या नहीं।
मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि यह जानने का विचार कि हममें "पवित्र आत्मा है" या नहीं, बहुतों के मन को अप्रिय लगता है। मैं उन आपत्तियों से अनजान नहीं हूँ जिन्हें शैतान स्वाभाविक मन में तुरन्त उभार देता है। कोई कहता है, "इसे जानना असम्भव है; यह गूढ़ बात है और हमारी पहुँच से बाहर है।" दूसरा कहता है, "यह इतनी रहस्यमय बात है कि इसकी जाँच-पड़ताल नहीं की जा सकती; हमें इस विषय को अनिश्चित ही छोड़कर सन्तोष करना चाहिए।" तीसरा कहता है, "इसके बारे में कुछ जानने का दावा करना ग़लत है; हमें ऐसे प्रश्नों में झाँकने के लिए नहीं बनाया गया है। आत्मा के होने की बात तो केवल उन्मादियों और कट्टरपंथियों के कहने की है।" मैं ऐसी आपत्तियाँ सुनता हूँ, पर उनसे विचलित नहीं होता। मैं कहता हूँ कि यह जाना जा सकता है कि मनुष्य में पवित्र आत्मा है या नहीं। यह जाना जा सकता है—जाना जा सकता है, और जाना जाना चाहिए। इसे पहचानने के लिए न स्वर्ग से कोई दर्शन चाहिए, न किसी स्वर्गदूत का प्रकाशन; इसके लिए परमेश्वर के वचन के प्रकाश में शान्त जाँच के सिवा और कुछ नहीं चाहिए। आइए, हम उस जाँच में प्रवेश करें।
सब लोगों में पवित्र आत्मा नहीं है। मैं इस सिद्धान्त को कि 'सारी मानवजाति को एक भीतरी आत्मिक ज्योति प्राप्त है' पवित्रशास्त्र-विरुद्ध भ्रम मानता हूँ। मैं उद्धार के बारे में आजकल के इस सार्वभौमिक विचार को निराधार स्वप्न समझता हूँ। निस्सन्देह परमेश्वर ने पतित मनुष्य के हृदय में अपने आपको बिना गवाही के नहीं छोड़ा है। उसने हर मन में भले-बुरे का इतना ज्ञान रख छोड़ा है कि सब मनुष्य उत्तरदायी और जवाबदेह ठहरें। उसने आदम की हर सन्तान को विवेक दिया है—परन्तु आदम की हर सन्तान को पवित्र आत्मा नहीं दिया है। कोई मनुष्य बिलाम के समान भली इच्छाएँ रख सकता है, हेरोदेस के समान बहुत से काम कर सकता है, अग्रिप्पा के समान क़रीब-क़रीब क़ायल हो सकता है और फेलिक्स के समान काँप सकता है, फिर भी इन लोगों के समान पवित्र आत्मा के अनुग्रह से सर्वथा वंचित हो सकता है। पौलुस हमें बताता है कि मन फिराव से पहले भी लोग एक अर्थ में "परमेश्वर को जान" सकते हैं और उनके विचार "आपस में दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते" हैं। पर वह यह भी बताता है कि मन फिराव से पहले लोग "परमेश्वर से रहित" और "मसीह से रहित" हैं, उनके लिए "कोई आशा नहीं" है, और वे स्वयं "अन्धकार" ही हैं। (रोमियों 1:21; 2:15; इफिसियों 2:12; 5:8।) प्रभु यीशु स्वयं आत्मा के विषय में कहता है, "संसार उसे न तो देखता है और न जानता है—परन्तु तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।" (यूहन्ना 14:17।)
कलीसिया के सब सदस्यों और बपतिस्मा पाए हुए सब लोगों में पवित्र आत्मा नहीं है। मुझे पवित्रशास्त्र में यह कहने का कोई आधार नहीं दिखता कि जो भी मनुष्य बपतिस्मा पाता है उसे पवित्र आत्मा मिल जाता है, और हमें उसे आत्मा से जन्मा हुआ मानना चाहिए। मैं बपतिस्मा पाए हुए लोगों से यह कहने का साहस नहीं करता कि उन सब में पवित्र आत्मा है, और उद्धार पाने के लिए उन्हें केवल अपने भीतर "परमेश्वर के वरदान को प्रज्वलित" करने की आवश्यकता है। इसके विपरीत, मैं देखता हूँ कि यहूदा अपने समय के दृश्य कलीसिया के सदस्यों के विषय में कहता है कि वे "आत्मा से रहित" हैं। सम्भव है कि उनमें से कुछ ने प्रेरितों के हाथों बपतिस्मा पाया हो और वे अंगीकार करनेवाली कलीसिया की पूरी सहभागिता में लिए गए हों। इससे क्या! वे "आत्मा से रहित" थे। (यहूदा 19।)
इस एक ही कथन की शक्ति से बच निकलने का प्रयत्न व्यर्थ है। यह स्पष्ट सिखाता है कि "पवित्र आत्मा का होना" हर मनुष्य का भाग नहीं है, और न मसीह की दृश्य कलीसिया के हर सदस्य का अंश है। यह कोई ऐसा सामान्य नियम और सिद्धान्त खोज निकालने की आवश्यकता को दिखाता है जिससे यह निश्चय हो सके कि किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा उपस्थित है या नहीं। वह हर एक में नहीं रहता। बपतिस्मा और कलीसिया की सदस्यता उसकी उपस्थिति के प्रमाण नहीं हैं। तो फिर मैं कैसे जानूँ कि किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा है?
मनुष्य की आत्मा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति केवल उन प्रभावों से जानी जा सकती है जो वह उत्पन्न करता है। वह मनुष्य के हृदय और जीवन में जो फल उत्पन्न करवाता है, वे ही एकमात्र भरोसे के योग्य प्रमाण हैं। यदि हम यह जानना चाहें कि किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा है या नहीं, तो मनुष्य का विश्वास, उसके विचार और उसका आचरण ही वे गवाह हैं जिनकी हमें जाँच करनी चाहिए। प्रभु यीशु का यही नियम है, "हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।" (लूका 6:44।)
पवित्र आत्मा जो प्रभाव उत्पन्न करता है वे सदा देखे जा सकते हैं। संसारी मनुष्य उन्हें न समझे—और बहुत सी बातों में वे निर्बल और अस्पष्ट भी हो सकते हैं; परन्तु जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ वह छिपा न रहेगा। जब वह हृदय में प्रवेश करता है तो निष्क्रिय नहीं रहता। वह चुपचाप पड़ा नहीं रहता। वह सोता नहीं। वह अपनी उपस्थिति प्रकट करेगा। वह धीरे-धीरे मनुष्य की दैनिक आदतों और बातचीत की खिड़कियों से चमक उठेगा, और संसार पर प्रकट कर देगा कि वह उसमें है। पवित्र आत्मा का सुप्त, निष्क्रिय और मौन निवास एक ऐसी धारणा है जो बहुतों के मन को भाती है। परन्तु मुझे परमेश्वर के वचन में इसका कोई अधिकार नहीं दिखता। मैं पूरी तरह पिन्तेकुस्त के रविवार के उपदेश-पत्र से सहमत हूँ, "जैसे पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है, वैसे ही पवित्र आत्मा भी।"
जिस किसी में मैं पवित्र आत्मा के प्रभाव और फल देखता हूँ, उस मनुष्य में मैं ऐसा जन देखता हूँ जिसमें पवित्र आत्मा है। मैं मानता हूँ कि ऐसा सोचना केवल उदारता ही नहीं है—उस पर सन्देह करना दुस्साहस है। मैं अपनी शारीरिक आँखों से पवित्र आत्मा को देखने या अपने हाथों से उसे छूने की आशा नहीं रखता। परन्तु मुझे यह दिखाने के लिए कि वह कहाँ रहता है, किसी स्वर्गदूत के उतरने की आवश्यकता नहीं। यह बताने के लिए कि मैं उसे कहाँ पा सकता हूँ, मुझे स्वर्ग से किसी दर्शन की आवश्यकता नहीं। मुझे केवल ऐसा मनुष्य दिखाओ जिसमें पवित्र आत्मा के फल देखे जा सकते हों, और मैं ऐसा जन देखता हूँ जिसमें "पवित्र आत्मा है"। जब मैं एक स्पष्ट प्रभाव का बाहरी तथ्य देखता हूँ, तब मैं उस सर्वशक्तिमान कारण की भीतरी उपस्थिति पर सन्देह न करूँगा।
क्या मैं आँधी के दिन हवा को देख सकता हूँ? मैं नहीं देख सकता—परन्तु उसके बल और सामर्थ्य के प्रभाव देख सकता हूँ। जब मैं देखता हूँ कि बादल उसके आगे-आगे उड़े जा रहे हैं और पेड़ उसके नीचे झुक रहे हैं—जब मैं उसे दरवाज़ों और खिड़कियों में सनसनाते या चिमनियों के ऊपर गरजते सुनता हूँ, तो मुझे उसके अस्तित्व पर एक क्षण के लिए भी सन्देह नहीं होता। मैं कहता हूँ, "हवा चल रही है।" आत्मा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति के विषय में भी ठीक ऐसा ही है।
क्या मैं गर्मी की संध्या को गिरती हुई स्वर्ग की ओस को देख सकता हूँ? मैं नहीं देख सकता। वह कोमलता और धीमे से उतरती है, बिना आहट के और अगोचर। परन्तु जब मैं बिना बादल की रात के बाद सवेरे बाहर जाता हूँ और हर पत्ते को नमी से चमकता देखता हूँ और घास की हर पत्ती को गीली और भीगी हुई पाता हूँ, तो मैं तुरन्त कहता हूँ, "ओस पड़ी है।" आत्मा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति के विषय में भी ठीक ऐसा ही है।
क्या जुलाई के महीने में अनाज के खेतों में से गुज़रते हुए मैं बोनेवाले का हाथ देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। मुझे केवल लाखों बालें दिखाई देती हैं, जो दानों से भरी हैं और पकाई के भार से भूमि की ओर झुकी हुई हैं—पर क्या मैं यह सोचता हूँ कि वह फ़सल संयोग से आ गई, और अपने आप उग आई? मैं ऐसा कुछ नहीं सोचता। उन खेतों को देखकर मैं जानता हूँ कि किसी दिन हल और पटेला चला था, और कोई हाथ वहाँ आया था जिसने बीज बोया। ठीक ऐसा ही आत्मा में पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में भी है।
क्या मैं दिशासूचक यन्त्र की सुई में चुम्बकत्व को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। वह गुप्त और रहस्यमय रीति से कार्य करता है—पर जब मैं लोहे के उस छोटे से टुकड़े को सदा उत्तर की ओर घूमते देखता हूँ, तो तुरन्त जान लेता हूँ कि वह चुम्बकीय शक्ति के गुप्त प्रभाव में है। ठीक ऐसा ही आत्मा में पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में भी है।
क्या अपनी घड़ी का मुँह देखकर मैं उसकी मुख्य कमानी को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। पर जब मैं सुइयों को घूमते और दिन के घण्टों और मिनटों को नियमित क्रम से बताते देखता हूँ, तो कमानी के अस्तित्व पर मुझे कोई सन्देह नहीं होता। ठीक ऐसा ही पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में भी है।
जब घर लौटता हुआ जहाज़ पहले-पहल दिखाई देता है, और उसके पाल क्षितिज पर उजले चमकते हैं, तब क्या मैं उसके कर्णधार को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। पर जब मैं घाट के सिरे पर खड़ा होकर उस जहाज़ को किसी जीवित वस्तु के समान समुद्र पर अपना मार्ग तय करते हुए बन्दरगाह के मुहाने की ओर बढ़ते देखता हूँ, तो भली भाँति जानता हूँ कि पतवार पर कोई है जो उसकी गति को चला रहा है। ठीक ऐसा ही पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में भी है।
मैं अपने सब पाठकों को चिताता हूँ कि इसे स्मरण रखें। इसे अपने मन में एक स्थिर सिद्धान्त के रूप में स्थापित कर लें कि यदि पवित्र आत्मा सचमुच किसी मनुष्य में है, तो वह उन प्रभावों से प्रकट होगा जो वह उसके हृदय और जीवन पर उत्पन्न करता है।
इस भ्रम से सावधान रहो कि मनुष्य में पवित्र आत्मा हो सकता है जबकि आत्मा में उसकी उपस्थिति का कोई बाहरी प्रमाण न हो। ऐसा सोचना एक खतरनाक और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध भ्रान्ति है। पवित्रशास्त्र में हमारे लिए जो व्यापक सिद्धान्त ठहराए गए हैं, उन्हें हमें कभी दृष्टि से ओझल नहीं होने देना चाहिए: "यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है, और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठ बोलते हैं और सत्य पर नहीं चलते।" "इसी से परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान प्रगट होती हैं; जो कोई धार्मिकता के काम नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं।" (1 यूहन्ना 1:6; 3:10।)
मुझे विश्वास है कि तुमने मसीही होने का दावा करनेवालों के एक अभागे वर्ग के विषय में सुना होगा, जो एण्टिनोमियन कहलाते हैं। ये वे लोग हैं जो मसीह में उद्धार के भागी होने पर घमण्ड करते हैं, और कहते हैं कि हमारे पाप क्षमा और मोचन हो चुके हैं, जबकि साथ ही वे जानबूझकर पाप में जीते और परमेश्वर की आज्ञाओं को खुले रूप से तोड़ते हैं। मैं निस्संकोच कहता हूँ कि ऐसे लोग बुरी तरह धोखे में हैं। वे अपने दाहिने हाथ में झूठ लिए नरक की ओर जा रहे हैं! मसीह में सच्चा विश्वास करनेवाला "पाप के लिये मरा हुआ" है। जो कोई मसीह में सच्ची आशा रखता है, वह "अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है जैसा वह पवित्र है।" (1 यूहन्ना 3:3।)
परन्तु मैं तुम्हें एक ऐसे भ्रम के विषय में बताता हूँ जो एण्टिनोमियन लोगों के भ्रम जितना ही खतरनाक है, और उससे कहीं अधिक भुलावे में डालनेवाला है। वह भ्रम यह है—अपने आप को यह कहकर बहलाना कि पवित्र आत्मा तुम्हारे हृदय में वास करता है, जबकि तुम्हारे जीवन में आत्मा के कोई फल दिखाई नहीं देते। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि यह भ्रम एण्टिनोमियनवाद के समान ही हज़ारों को नाश कर रहा है। पवित्र आत्मा का अनादर करना उतना ही खतरनाक है जितना मसीह का अनादर करना। आत्मा के कार्य में भागी होने का ढोंग करना परमेश्वर को उतना ही अप्रिय है जितना मसीह के कार्य में भागी होने का ढोंग करना।
एक बार और सदा के लिए, मैं अपने पाठकों को चिताता हूँ कि स्मरण रखें: जो प्रभाव पवित्र आत्मा उत्पन्न करता है, वही उसकी उपस्थिति के एकमात्र विश्वासयोग्य प्रमाण हैं। यह कहना कि पवित्र आत्मा तुम में वास करता है और फिर भी तुम्हारे जीवन में दिखाई नहीं देता, सचमुच अत्यन्त अनुचित बात है। यह सुसमाचार के प्रथम सिद्धान्तों को उलझा देती है—यह ज्योति और अन्धकार को, स्वभाव और अनुग्रह को, मन फिराव और अमन फिराव को, विश्वास और अविश्वास को, परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान को गड्डमड्ड कर देती है।
इस विषय में केवल एक ही सुरक्षित स्थान है। इस प्रश्न का कि "हम कैसे निर्णय करें कि किसमें पवित्र आत्मा है?" केवल एक ही सुरक्षित उत्तर है। हमें उस पुराने सिद्धान्त पर दृढ़ रहना चाहिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने ठहराया है: "उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।" (मत्ती 7:20।) जहाँ पवित्र आत्मा है वहाँ फल होगा—जिसमें आत्मा का फल नहीं, उसमें पवित्र आत्मा नहीं। पवित्र आत्मा का ऐसा कार्य जो न अनुभव हो, न दिखाई दे, न प्रभावशाली हो, एक बड़ा भ्रम है। जहाँ पवित्र आत्मा सचमुच है, वहाँ वह अनुभव किया जाएगा, देखा जाएगा, और जाना जाएगा।
III. अन्त में, मुझे उन विशेष प्रभावों का वर्णन करने दीजिए जो पवित्र आत्मा उन आत्माओं में उत्पन्न करता है जिनमें वह वास करता है।
मैं विषय के इस भाग को सबसे महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। अब तक मैंने उन बड़े प्रमुख सिद्धान्तों के विषय में सामान्य रूप से कहा है जो पवित्र आत्मा के कार्य की जाँच-पड़ताल में हमारा मार्गदर्शन करने चाहिए। अब मुझे और निकट आकर उन विशेष चिह्नों के विषय में कहना है जिनसे किसी व्यक्ति के हृदय में पवित्र आत्मा की उपस्थिति पहचानी जा सकती है। सौभाग्य से, बाइबल की ज्योति में इन चिह्नों को खोज निकालना कठिन नहीं है।
विषय में पूरी तरह प्रवेश करने से पहले मैं कुछ बातें पहले ही कह देना चाहता हूँ। मार्ग साफ़ करने के लिए यह आवश्यक है।
(क) मैं खुलकर मानता हूँ कि पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में कुछ गहरे रहस्य हैं। मैं यह नहीं समझा सकता कि वह हृदय में किस रीति से आता है। "हवा जिधर चाहती है उधर बहती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और कहाँ को जाती है; जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।" (यूहन्ना 3:8।) मैं यह नहीं समझा सकता कि वह एक हृदय में क्यों आता है और दूसरे में क्यों नहीं—वह इस मनुष्य में वास करने की कृपा क्यों करता है और उस मनुष्य में क्यों नहीं। मैं केवल इतना जानता हूँ कि ऐसा ही है। वह सर्वाधिकारी के रूप में कार्य करता है। कलीसिया की प्रश्नोत्तरी के शब्दों में, वह "परमेश्वर के चुने हुए लोगों" को पवित्र करता है। परन्तु मुझे यह भी स्मरण है कि मैं यह नहीं समझा सकता कि मैं मूर्तिपूजक अफ्रीका में नहीं, परन्तु मसीही इंग्लैण्ड में क्यों जन्मा। मैं यह मानकर सन्तुष्ट हूँ कि परमेश्वर का सारा कार्य भली भाँति किया गया है। मेरे लिए इतना ही बहुत है कि मैं राजा के दरबार में हूँ, भले ही राजा की मन्त्रणा में सम्मिलित न होऊँ।
(ख) मैं खुले मन से मानता हूँ कि मनुष्यों की आत्माओं में पवित्र आत्मा जिन कार्य-विधियों से अपना काम करता है, उनमें बड़ी विविधताएँ हैं। जिस आयु में वह हृदय में प्रवेश करना आरम्भ करता है, उसमें भेद होते हैं। किसी में वह बचपन में ही आरम्भ करता है, जैसे बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना और तीमुथियुस में; और किसी में बुढ़ापे में, जैसे मनश्शे और जक्कई में। जो भावनाएँ वह आरम्भ में हृदय में जगाता है, उनमें भी भेद होते हैं। कुछ को वह गहरे भय और घबराहट के द्वारा ले चलता है, जैसे फिलिप्पी के दारोगा को। कुछ को वह उनके हृदय को कोमलता से खोलकर सत्य ग्रहण करने के योग्य बनाता है, जैसे लुदिया को। चरित्र के इस पूर्ण परिवर्तन को पूरा करने में लगनेवाले समय में भी भेद होते हैं। किसी में परिवर्तन तुरन्त और अचानक होता है, जैसे शाऊल में जब वह दमिश्क की यात्रा पर था; औरों में वह धीरे-धीरे और क्रमशः होता है, जैसे फरीसी नीकुदेमुस में। आत्मा को उसकी स्वाभाविक मृत्यु से पहली बार जगाने में जिन साधनों का वह उपयोग करता है, उनमें भी भेद होते हैं। किसी के लिए वह उपदेश का, किसी के लिए बाइबल का, किसी के लिए एक पुस्तिका का, किसी के लिए मित्र की सलाह का, किसी के लिए बीमारी या विपत्ति का उपयोग करता है, और किसी के लिए ऐसी कोई एक बात नहीं होती जिसे स्पष्ट रूप से पहचाना जा सके। यह सब समझना अत्यन्त आवश्यक है। सब लोगों से एक ही प्रकार के अनुभव की माँग करना बहुत ही गम्भीर भूल है!
(ग) मैं खुले मन से मानता हूँ कि पवित्र आत्मा के कार्य के आरम्भ प्रायः छोटे और अदृश्य होते हैं। जिस बीज से आत्मिक चरित्र बनता है, वह आरम्भ में प्रायः बहुत छोटा होता है। आत्मिक जीवन का उद्गम, अनेक विशाल नदियों के उद्गम के समान, अपने आरम्भ में प्रायः केवल एक पतली-सी बहती धारा होता है। इसलिए किसी आत्मा में पवित्र आत्मा के कार्य के आरम्भ को संसार प्रायः अनदेखा कर देता है; दूसरे मसीही भी बहुधा उसका उचित मूल्य नहीं आँकते और उसे प्रोत्साहन नहीं देते; और जिस आत्मा में वह कार्य होता है, वह स्वयं भी लगभग बिना किसी अपवाद के उसे पूरी तरह गलत समझती है। यह बात कभी न भूली जाए। जिस मनुष्य में पवित्र आत्मा कार्य आरम्भ करता है, उसे बहुत समय बाद तक शायद ही यह पता चलता है कि उसके मन-फिराव के समय के आसपास की उसकी मनोदशा पवित्र आत्मा के प्रवेश से उत्पन्न हुई थी।
