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मुख्य उद्धरण
स्वतन्त्र इच्छा और मानवीय भ्रष्टता के विषय में
1. “पहले मनुष्य के पतन के समय से स्वतन्त्र चुनाव केवल नाम का रह गया है, और हम स्वयं पाप करने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते।”
2. “मानव स्वभाव अपनी सृष्टि के समय तो निश्चय ही भला था, परन्तु पतन के द्वारा वह इतना गहरा भ्रष्ट हो गया कि भलाई के लिए उसकी सारी क्षमताएँ तब तक बुझी रहती हैं जब तक परमेश्वर के अनुग्रह से वह नया न किया जाए।”
3. “इच्छा पाप की ऐसी दासी बन गई है कि वह अपने आप भलाई को नहीं खोज सकती; अपने ही भरोसे छोड़ दी जाए तो अपनी जन्मजात भ्रष्टता के कारण वह बुराई को चुनती है।”
4. “यद्यपि मनुष्य स्वेच्छा से चुनाव करते हैं, फिर भी वे भलाई के अयोग्य हैं, क्योंकि उनकी इच्छा, जो पाप से बँधी है, केवल दुष्टता की ओर झुकी रहती है।”
5. “प्राण और उसकी इच्छा, जो बुद्धि के निर्देश में चलने के लिए रची गई थीं, पाप के कारण आत्मिक रूप से अन्धी हो गई हैं, और ईश्वरीय हस्तक्षेप के बिना परमेश्वर की धार्मिकता को खोजने में असमर्थ हैं।”
6. “हमारा भ्रष्ट स्वभाव, जब तक अनुग्रह उसे स्पर्श न करे, वासना (concupiscence) के सिवाय और कुछ नहीं है—बुरी लालसाओं का ऐसा सोता जो कोई भी सचमुच भली वस्तु उत्पन्न नहीं कर सकता।”
7. “मनुष्य की इच्छा, यद्यपि स्वतन्त्र सृजी गई थी, भ्रष्टता की दासी बन गई है, और पाप की जंजीरों से छूटने तथा कोई भी भलाई करने के लिए उसे परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता है।”
8. “मानवजाति की सच्ची स्वतन्त्रता उसकी पतित इच्छा में नहीं है, जो पाप से बँधी है, वरन् उस छुटकारे में है जो केवल परमेश्वर का अनुग्रह देता है।”
ये उद्धरण पाप के प्रति इच्छा की दासता के विषय में कैल्विन के दृष्टिकोण को प्रकट करते हैं, और इस बात पर बल देते हैं कि बन्धन को तोड़ने और सचमुच भलाई का अनुसरण करने के लिए मनुष्य को ईश्वरीय अनुग्रह की आवश्यकता है।
भले कामों के स्वरूप के विषय में
1. “यह निश्चित है कि जितने भले काम गिनाए जा सकते हैं, वे अपने ही मूल्य के कारण परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करते, वरन् उसके अनुग्रहपूर्ण अनुकम्पा के कारण, क्योंकि वह उन्हें इतना मूल्य देना चाहता है, चाहे वे उसके योग्य न हों।”
2. “भले काम, यदि अपने आप में परखे जाएँ, तो बिना किसी अपवाद के पापमय हैं; वे भले हैं और परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं तो परमेश्वर की पिता-तुल्य स्वीकृति के द्वारा, न कि अपनी किसी निहित योग्यता से।”
3. “क्योंकि सन्त चाहे कितने ही सच्चे और निष्कपट मन से अपने आपको परमेश्वर की आज्ञाकारिता में लगाएँ, तो भी व्यवस्था के उस सुविदित सार के द्वारा जो आज्ञाकारिता की तत्परता माँगी जाती है, वह उनमें पूरी रीति से कहीं पाई नहीं जाती।”
4. “सन्तों के उत्तम से उत्तम काम भी, यदि परमेश्वर उनकी जाँच करे और उन्हें उस तराजू में तौले जो स्वर्गदूतों तक को भय से भर देता है, तो भ्रष्ट ही ठहरेंगे, चाहे मनुष्यों के विचार में उनका कितना ही मूल्य क्यों न हो।”
5. “भले कामों का मूल्य स्वयं कर्म पर नहीं, वरन् परमेश्वर के प्रति सिद्ध प्रेम पर निर्भर है; कोई काम तब तक धार्मिक और शुद्ध न होगा जब तक वह परमेश्वर के प्रति सिद्ध प्रेम से न निकले।”
6. “अगस्तीन के ये शब्द—‘अनुग्रह ही कार्य करता है, उसे दिशा देता है और उसे पूरा करता है, यहाँ तक कि वह इच्छा को भी संलग्न करता है’—मेरी अपनी इस प्रतीति को प्रकट करते हैं कि हमारे सब भले काम परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण पहल से निकलते हैं, हमारे अपने बल से नहीं।”
7. “प्रभु हम में अपने ही कार्य को मुकुट पहनाता है, और उस भलाई को पहचानता है जिसे उसी ने हमारे हृदयों में जीवित किया है। इस प्रकार परमेश्वर की दया मनुष्य के प्रयत्न का प्रतिफल नहीं है; वह उन लोगों के प्रति उसकी भलाई की उमड़ती हुई धारा है जो पूरी रीति से उसी पर आश्रित हैं।”
8. “मूसा की व्यवस्था के अधीन, जो कुछ पवित्र वस्तु अशुद्धता के सम्पर्क में आती थी वह अशुद्ध मानी जाती थी; इससे प्रकट होता है कि मानवीय अपूर्णता उस वस्तु को भी दूषित कर देती है जो अन्यथा भली हो सकती थी।”
ये उद्धरण कैल्विन के इस मत को स्पष्ट करते हैं कि भले काम, मूल्यवान होते हुए भी, अपना मूल्य केवल परमेश्वर के अनुग्रह से पाते हैं, किसी निहित मानवीय योग्यता से नहीं। यह विषय ईश्वरीय दया पर मनुष्य की निर्भरता को रेखांकित करता है और मानवीय प्रयासों की सीमाओं को उजागर करता है।
मानवीय अक्षमता के होते हुए भी विश्वास के लिए आग्रह करने के विषय में
1. “इसी कारण मैं उसकी अन्तिम आपत्ति को केवल संक्षेप में छूऊँगा, जिसमें वह हमारी मूर्खता का उपहास करता है कि हम लोगों को शिक्षा देने में इतना परिश्रम करते हैं, जबकि साथ ही हम यह कहते हैं कि विश्वास मनुष्यों के समझाने-बुझाने के प्रयासों से नहीं मिलता, वरन् पवित्र आत्मा का विशेष कार्य है।”
2. “वह कहता है कि लोगों से विश्वास करने का आग्रह और आह्वान करने में हमारा परिश्रम व्यर्थ है, यदि सचमुच वे [विश्वास] को अपनी ही सामर्थ्य से नहीं उपजाते, वरन् परमेश्वर उसे अपने अनुग्रह से उनमें फूँकता है।”
3. “हम उससे अधिक व्यर्थ परिश्रम नहीं कर रहे जितना किसान तब करते हैं जब वे भूमि जोतते और बीज बोते हैं। क्योंकि लिखा है, ‘तुम बोओगे पर काटोगे नहीं,’ जिससे प्रकट होता है कि परमेश्वर की आशीष के बिना सब परिश्रम व्यर्थ है।”
4. “वचन प्रचार में बोए गए बीज के समान है; फिर भी वह तभी जड़ पकड़ता, बढ़ता और फल लाता है जब आत्मा भीतर कार्य करके उसे जीवन देता है।”
5. “हमारी शिक्षा स्पष्ट है: मानवजाति का पतित स्वभाव पाप से इतना गहरा भ्रष्ट है कि वह सचमुच कोई भली वस्तु उत्पन्न नहीं कर सकता। जब हम उसका अनुसरण करते हैं जो उत्तम है, तब भी पाप के अवशेष हमारी अभिलाषाओं को दूषित कर देते हैं।”
6. “परमेश्वर का वचन और आत्मा मेल के साथ मिलकर कार्य करते हैं। जब आत्मा वचन को सामर्थ्य देता है, तब वह हम में नवीकरण की अभिलाषा रोपता है। यद्यपि हम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि परमेश्वर कब या कैसे कार्य करे, फिर भी हम भरोसा रखते हैं कि वह वचन और आत्मा को एक साथ लाकर अपने लोगों को विश्वास में रूपान्तरित और परिपक्व करता है।”
7. “जब हम अपनी निर्बलता और अक्षमता को पहचानते हैं, तो वह हमें निराशा की ओर नहीं ले जाती, वरन् परमेश्वर की दया खोजने की ओर निर्देशित करती है। परमेश्वर के चुने हुओं के लिए यह सत्य आशा का स्रोत है, क्योंकि वे अपनी ओर नहीं, वरन् उस अनुग्रह और सामर्थ्य की ओर देखते हैं जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की है।”
8. “भविष्यद्वक्ता, पास्टर और राजा, सभी को पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाना चाहिए, फिर भी मरी हुई आत्मा को जीवन देनेवाला केवल परमेश्वर ही है।”
9. “पवित्रशास्त्र सिखाता है कि व्यवस्था की सिद्धता हमारी स्वाभाविक सामर्थ्य से परे है। किसी ने भी उसे कभी पूरी रीति से नहीं माना, और न कोई मान सकता है, क्योंकि वह पूर्ण धार्मिकता की माँग करती है।”
ये उद्धरण कैल्विन के इस दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करते हैं कि मानवीय अक्षमता के होते हुए भी विश्वास के लिए आग्रह सार्थक हैं, क्योंकि सच्चा रूपान्तरण और विश्वास केवल परमेश्वर ही अपने आत्मा के द्वारा उत्पन्न करता है।
ईश्वरीय सामर्थ्य और मानवीय निर्बलता
1. “मसीह ने प्रार्थना की कि पतरस का विश्वास जाता न रहे, जिससे प्रकट होता है कि परमेश्वर का अनुग्रह विश्वासियों को उनकी अपनी निर्बलता में भी दृढ़ बनाए रखता है। परमेश्वर केवल सहारा ही नहीं देता; वह हमारे भीतर सक्रिय रूप से कार्य करता है कि हम विश्वास में बने रहें।”
2. “परमेश्वर का अनुग्रह हमारी इच्छा को प्रज्वलित करता है, और हमें बने रहने की सामर्थ्य तथा अभिलाषा दोनों देता है। इस अनुग्रह के बिना हमारी निर्बल इच्छाएँ परीक्षा में डगमगा जातीं, परन्तु इसी के कारण हम दृढ़ किए और थामे जाते हैं।”
3. “परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की कि जो कुछ वह हम से माँगता है उसे वह स्वयं करेगा, इसलिए उसकी प्रतिज्ञाएँ उसकी सामर्थ्य पर निर्भर हैं, हमारी पर नहीं।”
4. “क्योंकि परमेश्वर ही है जो अपनी सुइच्छा के लिये तुम में इच्छा और काम, दोनों का प्रभाव डालता है। यह जीवन भर का कार्य केवल परमेश्वर के अनुग्रह से उत्पन्न होता है, जो हमारी किसी योग्यता का विचार किए बिना उसकी अपनी भलाई से प्रवाहित होता है।”
5. “परमेश्वर जब आज्ञाकारिता माँगता है, तब भी वही हमें आज्ञा मानने की इच्छा देता है। हम इसलिए कर्म करते और अभिलाषा रखते हैं कि परमेश्वर हमें सामर्थ्य देता है।”
6. “परमेश्वर का अनुग्रह केवल हमारी निर्बलता की सहायता नहीं करता; वह हम में परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य है। केवल अनुग्रह ही से हमारे हृदय बदले जाते हैं, हमारी इच्छाएँ नई की जाती हैं, और जो उचित है उसकी अभिलाषा करने और उसका अनुसरण करने के लिए हम नवीकृत किए जाते हैं।”
7. “हमारी निर्बल और बन्दी इच्छाएँ, जो पाप के बन्धन में पड़ी हैं, केवल परमेश्वर के हस्तक्षेप से ही छुड़ाई जा सकती हैं। वह हमारी स्वतन्त्रता का आरम्भ ही नहीं करता, वरन् यह भी निश्चित करता है कि हम उसमें बने रहें।”
ये उद्धरण विश्वासी की यात्रा में परमेश्वर की सक्रिय सामर्थ्य और अनुग्रह की केन्द्रीयता पर कैल्विन के बल को उजागर करते हैं, और अन्तर्निहित निर्बलता के बीच ईश्वरीय सामर्थ्य पर मनुष्य की निर्भरता को रेखांकित करते हैं।
ईश्वरीय दया
1. “परमेश्वर की दया मनुष्य के प्रयत्न का प्रतिफल नहीं है; वह उन लोगों के प्रति उसकी भलाई की उमड़ती हुई धारा है जो पूरी रीति से उसी पर आश्रित हैं।”
2. “परमेश्वर पहले कार्य करता है, और मनुष्य को अपने को जानने और खोजने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि जब तक परमेश्वर स्वयं उनके हृदयों में सच्ची ज्योति न चमकाए, तब तक कोई उसे पहचान नहीं सकता।”
3. “अपनी दया में परमेश्वर ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया जो कभी पराए और विद्रोही थे, जिससे प्रकट होता है कि उसका चुनाव केवल अनुग्रह पर आधारित है, किसी मानवीय झुकाव पर नहीं।”
4. “अगस्तीन दृढ़ता से कहता है कि हमारा उद्धार पूर्णतः परमेश्वर के स्वतन्त्र और प्रभुता-सम्पन्न अनुग्रह का कार्य है, जो विश्वास के लिए हमारी अभिलाषा और क्षमता से पहले चलता है, उसे उत्पन्न करता है और थामे रखता है।”
5. “परमेश्वर का यह उत्तर, ‘मैं दुष्ट के मरने से प्रसन्न नहीं होता,’ उद्धार पर मनुष्य के अधिकार का कथन नहीं है। यह परमेश्वर की दया की घोषणा है, और भटके हुओं के प्रति मेल-मिलाप के उसके निरन्तर प्रस्ताव की।”
6. “हमारी इच्छा, जैसी टूटी हुई है, तब तक स्वतन्त्रता से परमेश्वर को नहीं चुन सकती जब तक उसका अनुग्रह उस पर कार्य न करे। भलाई की अभिलाषा भी परमेश्वर के अनुग्रह से दी जाती है, मनुष्य की योग्यता से नहीं।”
7. “ईश्वरीय दया के द्वारा विश्वासी उन भले कामों तक पहुँचते हैं जिनकी न उन्होंने स्वयं अभिलाषा की थी और न जिन्हें खोजा था। मनुष्य जो कुछ चाहता या करता है वह प्रभु की ओर से है।”
8. “अगस्तीन के शब्द गूँजते हैं: ‘यदि हमारी योग्यताएँ हमारी अपनी हैं, तो वे बुरी हैं; उनके भली होने के लिए अवश्य है कि वे परमेश्वर की ओर से दान हों।’ इस प्रकार परमेश्वर हम में अपने ही कार्य को मुकुट पहनाता है, और उस भलाई को पहचानता है जिसे उसी ने हमारे हृदयों में जीवित किया है।”
ये उद्धरण कैल्विन के इस दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर की दया पूर्णतः बिना कमाई हुई है और उसकी अपनी भलाई से प्रवाहित होती है, और यही विश्वासी के जीवन में विश्वास और आज्ञाकारिता की नींव है।
आवश्यकता बनाम बलप्रयोग
1. पाप के प्रति स्वैच्छिक दासता के विषय में
“हम बलप्रयोग और जबरदस्ती को दूर करते हैं, क्योंकि यह इच्छा के स्वभाव के विपरीत है और उसके साथ नहीं रह सकता। हम इस बात से इनकार करते हैं कि चुनाव स्वतन्त्र है, क्योंकि मनुष्य की जन्मजात दुष्टता के कारण वह अनिवार्य रूप से बुराई की ओर चलाया जाता है और बुराई के सिवाय कुछ और नहीं खोज सकता।”
2. दासता स्वैच्छिक है, बलपूर्वक नहीं
“क्योंकि हम यह नहीं कहते कि मनुष्य अनिच्छा से घसीटकर पाप में डाला जाता है, वरन् यह कि उसकी इच्छा भ्रष्ट होने के कारण वह पाप के जूए के नीचे बन्दी है, और इसलिए अनिवार्य रूप से बुराई की रीति से चाहता है। क्योंकि जहाँ दासता है, वहाँ अनिवार्यता है। परन्तु इसमें बड़ा अन्तर है कि दासता स्वैच्छिक है या बलपूर्वक।”
3. भ्रष्टता और स्वनिर्धारित इच्छा
“अन्ततः, बँधी हुई इच्छा वह है जो अपनी भ्रष्टता के कारण बुरी अभिलाषाओं के अधिकार के अधीन बन्दी है, ऐसी कि वह बुराई के सिवाय कुछ चुन नहीं सकती, चाहे वह अपनी ही इच्छा से और प्रसन्नता से ऐसा करे, किसी बाहरी प्रेरणा से चलाए बिना।”
4. अनिवार्यता को बलप्रयोग से अलग पहचानना
“हम यह नहीं कह रहे कि अनिवार्यता मानवीय उत्तरदायित्व को मिटा देती है। वरन् हम दिखा रहे हैं कि अनिवार्यता और उत्तरदायित्व साथ-साथ रह सकते हैं, जैसा कि हम परमेश्वर की अपरिवर्तनीय भलाई में देखते हैं, जो स्तुति के योग्य है।”
5. पापमय कर्म स्वैच्छिक भी और अनिवार्य भी
“यद्यपि लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव के कारण अनिवार्य रूप से पाप करते हैं, तथापि यह अनिवार्यता स्वैच्छिक है, क्योंकि लोग अपनी भ्रष्ट अभिलाषाओं के अनुसार कर्म करते हैं, किसी बाहरी दबाव से नहीं।”
6. अनिवार्यता की जड़ पाप की भ्रष्टता में है
“भलाई करने में हमारी अक्षमता हमारे स्वभाव की भ्रष्टता से उत्पन्न होती है—ऐसी भ्रष्टता जो मानवजाति के परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह के कारण आई। चूँकि हम सब आदम के विद्रोह में भागी हैं, इसलिए पाप करने की अनिवार्यता हमें निर्दोष नहीं ठहराती, वरन् वही हमारे दण्ड का आधार है।”
7. परमेश्वर की भलाई और बलप्रयोग के बिना अनिवार्यता
“परमेश्वर अनिवार्य रूप से भला है, फिर भी उसकी भलाई इस कारण कम स्तुत्य नहीं कि वह अपरिवर्तनीय है। इसी प्रकार शैतान अनिवार्य रूप से बुरा है, फिर भी उसकी दुष्टता इस कारण कम दोषपूर्ण नहीं।”
8. स्वैच्छिक, फिर भी बँधी हुई
“यद्यपि इच्छा स्वयं-निर्देशित है और उस पर बलप्रयोग नहीं होता, तथापि वह अपने पापमय स्वभाव से ‘बँधी’ है, और इसलिए केवल उसी भ्रष्ट दशा के भीतर कर्म कर सकती है। अनिवार्यता और बलप्रयोग के बीच यह भेद स्पष्ट करता है कि पापमय कर्म एक स्वैच्छिक, फिर भी गहराई से दासत्व में पड़ी, इच्छा से उत्पन्न होते हैं।”
ये उद्धरण कैल्विन की इस व्याख्या को रेखांकित करते हैं कि मानवीय इच्छा, अपने भ्रष्ट स्वभाव के भीतर स्वतन्त्रता से कार्य करती हुई भी, पाप से अनिवार्यता के द्वारा बँधी है, बाहरी बल के द्वारा नहीं। यह भेद मानवीय उत्तरदायित्व को सुरक्षित रखता है, साथ ही सच्ची स्वतन्त्रता के लिए ईश्वरीय अनुग्रह पर हमारी निर्भरता की पुष्टि भी करता है।
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मोनरजिज़्म बुक्स
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