अध्याय 6

पिगियस की चौथी पुस्तक पर कैल्विन का उत्तर [पिगियस की]

The Bondage and Liberation of the Will · John Calvin

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पिगियस की चौथी पुस्तक पर कैल्विन का उत्तर [पिगियस की]

अपनी चौथी पुस्तक की भूमिका में पिगियस विजयोल्लास की घोषणा से आरम्भ करता है और हमारे पक्ष पर जीत का दावा करता है। वह तर्क देता है कि यदि कोई बात कलीसिया की सर्वसम्मत शिक्षा या प्राचीन कलीसिया-पिताओं के निर्णय के विरुद्ध हो, तो चाहे केवल पवित्रशास्त्र के आधार पर वह कितनी ही स्पष्ट क्यों न दिखाई दे, किसी को उसे नहीं मानना चाहिए। उसका मानना है कि व्यक्ति तो पवित्रशास्त्र की गलत व्याख्या कर सकते हैं, परन्तु कलीसिया स्वयं विश्वास की आवश्यक बातों में चूक नहीं सकती, क्योंकि वह “सत्य का खंभा और नेव” है (1 तीमुथियुस 3:15)।

यह कोई नया दावा नहीं है; इतिहास में कलीसिया का विरोध करनेवाले लोग प्रायः अधिकार पाने के लिए उसी के नाम का आवरण ओढ़ते रहे हैं। तो फिर हम सच्ची कलीसिया को झूठी से कैसे पहचानें? पिगियस का कहना है कि हमें संख्या पर भरोसा करना चाहिए, अर्थात् बहुमत ही सच्ची कलीसिया को परिभाषित करता है। परन्तु मेरा मत है कि यह निर्णय परमेश्वर के वचन पर आधारित होना चाहिए, क्योंकि कलीसिया की पहचान पवित्रशास्त्र के प्रति उसकी निष्ठा से होती है, इस बात से नहीं कि वह अपने आपको कैसे प्रस्तुत करती है। पिगियस कहता है कि यदि परमेश्वर का वचन अस्पष्ट हो, तो निश्चयता कलीसिया की व्याख्या से आनी चाहिए। परन्तु पवित्रशास्त्र स्वयं नींव है, और जैसा पौलुस कहता है, कलीसिया प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा की नींव पर बनी है (इफिसियों 2:20), अपने ही अधिकार पर नहीं।

पिगियस यह उत्तर दे सकता है कि कलीसिया का काम पवित्रशास्त्र की व्याख्या करना है, परन्तु यह दावा दोषपूर्ण है। सच्ची कलीसिया की पहचान करते समय हमें मसीह के अपने ही नियम का पालन करना चाहिए: उसकी भेड़ें उसका शब्द सुनती हैं (यूहन्ना 10:27)। इसलिए कलीसिया सत्य को तभी थामे रखती है जब वह उस शिक्षा की, जिस पर वह स्थापित हुई थी, विश्वासयोग्यता से रखवाली करती है। हमें केवल उसी समुदाय को सच्ची कलीसिया मानना चाहिए जो इस शिक्षा को थामे रखता है। मसीह और कलीसिया के बीच का बन्धन उसके वचन के सत्य से गढ़ा गया है; पिगियस इस बन्धन को तोड़ने का प्रयत्न करता है, क्योंकि वह कलीसिया के अधिकार को परमेश्वर की शिक्षा के अधिकार से ऊपर रखता है और उसकी व्याख्या वैसी नहीं करता जैसी परमेश्वर ने उसे दिया, वरन् जैसी मनुष्य की रुचि चाहती है।

पिगियस की पद्धति में एक और चौंकानेवाला विरोधाभास है। आरम्भ में वह कहता है कि वह अपना तर्क पवित्रशास्त्र से सिद्ध करेगा, परन्तु फिर ऐसा करने से बचता है, और इसके स्थान पर यह दावा करता है कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा की पुष्टि करता है। वह कहता है कि क्योंकि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि परमेश्वर हर एक का न्याय उसके कामों के अनुसार करेगा और उसमें व्यवस्था और आज्ञाएँ भी हैं, इसलिए यह स्वतंत्र चुनाव की सामर्थ्य को प्रमाणित करता है।

यदि पिगियस सोचता है कि पवित्रशास्त्र केवल मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा के विषय में सिखाता है और कुछ नहीं, तो वह विश्वास के एक मूलभूत अंश को खो रहा है। वह अनुग्रह की अनिवार्य प्रतिज्ञाओं की अनदेखी करता है। जब परमेश्वर हमें अपने मार्गों पर चलने की आज्ञा देता है, तब वह आज्ञा मानने की सामर्थ्य देने की प्रतिज्ञा भी करता है—वह हमें वह हृदय और वह शक्ति देगा जिसकी हमें आवश्यकता है। पवित्रशास्त्र की व्यवस्था, आज्ञाएँ, चेतावनियाँ और प्रोत्साहन हमें इन्हीं प्रतिज्ञाओं तक ले जाते हैं और दिखाते हैं कि हममें जो कुछ भला है वह केवल परमेश्वर के अनुग्रह से है। जो लोग मनुष्य की सामर्थ्य को केवल व्यवस्था से आँकते हैं, वे विश्वास के मूल सिद्धान्तों के विषय में अपनी समझ की कमी प्रकट करते हैं।

पिगियस का दावा है कि परमेश्वर का न्याय तब तक उचित नहीं होगा जब तक वह हमारा न्याय हमारे अपने पुण्य के अनुसार न करे। इस पर अगस्तीन उत्तर देता है, “यदि परमेश्वर हमारा न्याय केवल हमारे पुण्य के अनुसार करे, तो सारी मानव जाति पर हाय!” परमेश्वर निश्चय ही अपने सेवकों को प्रतिफल देने की प्रतिज्ञा करता है, परन्तु हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि सन्तों की धार्मिकता भी परमेश्वर का निरा दान है।

जब पवित्रशास्त्र से दिए गए पिगियस के तर्क डगमगाने लगते हैं, तब वह ओरिजन और टर्टुलियन जैसे कलीसिया-पिताओं की शिक्षाओं की ओर मुड़ता है, इस आशा में कि उनका अधिकार उसके मत को सहारा देगा। यदि हम उनकी व्याख्याओं को बन्धनकारी मान भी लें—जो हम नहीं मानते—तब भी यह स्पष्ट है कि पिगियस उन्हें गलत रूप में प्रस्तुत करता है। जब वे कहते हैं कि आज्ञा मानने की सामर्थ्य के बिना व्यवस्था निरर्थक होगी, तब वे मनुष्य की पतित अवस्था की बात नहीं कर रहे होते। हमारी निर्बलता हमारे अपने पापमय चुनावों से आई है, इस कारण से नहीं कि हम मूल रूप से कैसे रचे गए थे। अगस्तीन स्वयं इन आपत्तियों का उत्तर देते हुए कहता है कि हमारी वर्तमान अक्षमता हमारे अपने दोष के कारण है, परमेश्वर की योजना के कारण नहीं।

पिगियस अगस्तीन की पहले की रचनाओं का भी दुरुपयोग करता है, ताकि यह सुझाए कि अगस्तीन मानता था कि जिन पापों से हम बच नहीं सकते उनके लिए हमें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अगस्तीन ने बाद में अपने विचारों को स्पष्ट किया और बताया कि उसने अपनी समझ की वृद्धि के अनुसार अपनी रचनाओं में संशोधन किया। अपनी रचना अन्त तक स्थिर रहने का दान में वह समझाता है कि यद्यपि मानवजाति स्वतंत्र इच्छा से गिरी, तथापि उसके फलस्वरूप आई भ्रष्टता ने हमारी स्वतंत्रता को पाप की एक प्रकार की दासता में बदल दिया है। अपनी रचना धार्मिकता की सिद्धता में वह कहता है, “मनुष्य के चुनाव से पाप हुआ, परन्तु अब वह चुनाव भ्रष्ट हो गया है, और स्वतंत्रता पाप करने की अनिवार्यता बन गई है।”

पिगियस का दावा है कि जब-जब परमेश्वर हमें आज्ञा देता या प्रोत्साहित करता है, अगस्तीन स्वतंत्र चुनाव का समर्थन करता है। यह सच है कि अगस्तीन अनुग्रह और स्वतंत्र इच्छा के सम्बन्ध पर चर्चा करता है, और उसका उद्देश्य यह दिखाना है कि परमेश्वर का अनुग्रह मनुष्य के चुनाव को रद्द नहीं करता। परन्तु अगस्तीन का मत समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि “स्वतंत्र चुनाव” से उसका अर्थ क्या है। अगस्तीन स्पष्ट कहता है कि यद्यपि लोग अपनी इच्छा से कार्य करते हैं, तथापि यह इच्छा स्वभाव से केवल पाप की ओर झुकी हुई है। केवल अनुग्रह ही लोगों को भला करने और उसमें स्थिर रहने के योग्य बनाता है।

अगस्तीन ने लिखा कि वह उन लोगों को सम्बोधित कर रहा था जो अनुग्रह पर बल देने के कारण स्वतंत्र चुनाव का इनकार करते थे। उसने स्वीकार किया कि लोग अपनी ही इच्छा से कार्य करते हैं, परन्तु उसने यह चेतावनी भी दी कि हमें स्वतंत्र चुनाव का बचाव कभी ऐसे नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता का इनकार हो जाए। स्वतंत्र चुनाव से अगस्तीन का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने बल पर भला कर सकते हैं, परन्तु यह कि अपने आप पर छोड़े जाने पर हम केवल पाप ही कर सकते हैं। हम जो भी भला करते हैं उसका स्रोत परमेश्वर है।

अगस्तीन आगे समझाता है कि परमेश्वर का अनुग्रह हममें किसी भलाई का प्रतिफल नहीं है, वरन् तब भी सेंतमेंत दिया जाता है जब हमारा कोई पुण्य नहीं होता। वह बताता है कि जब परमेश्वर हमें नया जन्म देता है, तब वह वे भले कर्म तैयार करता है जो हमें करने हैं—हमारे भले कर्म हमारे द्वारा तैयार नहीं किए गए, वे परमेश्वर के दान हैं। अगस्तीन इस विचार को भी अस्वीकार करता है कि लोग अनुग्रह को ग्रहण करने के लिए स्वयं को तैयार कर सकते हैं; इसके विपरीत, अनुग्रह हमारे “पत्थर के हृदय” को दूर करने से आरम्भ होता है, जो स्वभाव से परमेश्वर का विरोधी है।

व्यवस्था के विषय में अगस्तीन उन्हें उत्तर देता है जो कहते हैं कि परमेश्वर वह आज्ञा नहीं देगा जो हम कर नहीं सकते। वह कहता है कि परमेश्वर हमारी स्वाभाविक सामर्थ्य से परे की बातों की आज्ञा इसलिए देता है कि हम देख सकें कि हमें उससे क्या माँगना चाहिए। अगस्तीन के शब्दों में: “यदि हम चाहें तो आज्ञाओं का पालन करते हैं, परन्तु क्योंकि इच्छा को तैयार करनेवाला परमेश्वर है, हमें उससे प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारी सहायता करे कि हम उसकी इच्छा की अभिलाषा करें। जब हम कार्य करते हैं तो हम ही कार्य करते हैं, परन्तु इच्छा को कार्य करने की सामर्थ्य देनेवाला परमेश्वर है।”

अन्त में, अगस्तीन दृढ़ता से कहता है कि परमेश्वर हमारी इच्छा को बुराई से भलाई की ओर बदलता है और उसे थामे रखता है। वह सिखाता है कि परमेश्वर न केवल भला करनेवालों की इच्छाओं पर अधिकार रखता है, वरन् उन पर भी प्रभाव डालता है जो उसका विरोध करते हैं, और उनके हृदयों को भी अपने उद्देश्यों के अनुसार मोड़ देता है। यद्यपि परमेश्वर बुराई की सृष्टि नहीं करता, तथापि वह कठोर हृदयवालों को भी अपने लक्ष्यों की ओर निर्देशित कर सकता है।

पिगियस हमारा उपहास करता है और कहता है कि हम सत्य की ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं, जबकि वास्तव में यह स्पष्ट है कि अगस्तीन मानता था कि अनुग्रह मनुष्य की इच्छा को बदलता और थामे रखता है। अगस्तीन ने स्वतंत्र चुनाव को परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना भला करने की सामर्थ्य का श्रेय नहीं दिया।

अपनी इंस्टिट्यूट्स में, अपनी शिक्षा समझाने के पश्चात्, मैंने उनके सामान्य तर्कों का उत्तर दिया जो इसका विरोध करते हैं। अब पिगियस यह दिखाने का प्रयत्न करता है कि मेरे उत्तर निर्बल, अधूरे या असंगत हैं। वह ऐसा एक संवाद रचकर करता है जिसमें वह मुझे वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, परन्तु जब-जब यह उसके पक्ष में होता है, वह वार्तालाप में बाधा डालता या उसे बदल देता है।

इंस्टिट्यूट्स में मैंने उल्लेख किया था कि कुछ आलोचक हमारी शिक्षाओं के विरुद्ध कथित “असंगतियों” का ढेर लगा देते हैं, यह दावा करते हुए कि वे सामान्य बुद्धि के विरुद्ध हैं, और फिर पवित्रशास्त्र से आक्रमण करते हैं। मैंने कहा था कि मैं दोनों प्रकार के आक्रमणों का उत्तर दूँगा। इसके उत्तर में पिगियस नाटकीय ढंग से मेरे आत्मविश्वास की आलोचना करता है, और मुझ पर यह दोष लगाता है कि मैं प्राचीन पूज्य सन्तों को चुनौती देने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

परन्तु मैं प्राचीन पिताओं से विरोध में नहीं हूँ; मेरा विरोध पिगियस और उसके जैसे लोगों से है, जो परमेश्वर के उद्धारकारी सत्य को बिगाड़ते और अपवित्र करते हैं, कभी उसे पैरों तले रौंदते और कभी बैर से उसके टुकड़े-टुकड़े करते हैं।

यदि मैं उसके सारे अतिरिक्त शब्दों में उलझूँ, तो उसका कोई अन्त न होगा। इसके स्थान पर मैं पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे मुख्य विषय पर ध्यान टिकाए रखें। यदि वे ऐसा करेंगे, तो मैं यह निश्चित करूँगा कि मेरे उत्तर पूर्ण और स्पष्ट हों।

पहली “असंगति” जो पिगियस उठाता है, वह यह है: “यदि पाप अनिवार्य है, तो वह पाप नहीं रहा; और यदि वह स्वैच्छिक है, तो उससे बचा जा सकता होगा।” मैंने इंस्टिट्यूट्स में उल्लेख किया था कि पेलेगियस ने कभी अगस्तीन को चुनौती देने के लिए यह तर्क दिया था, और पिगियस इसका उल्लेख करने के लिए मेरी हँसी उड़ाता है। फिर भी अगस्तीन ने धार्मिकता की सिद्धता में इसी प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दिया है। पेलेगियस का तर्क नया नहीं है; आज के रोमन कैथोलिक धर्मवैज्ञानिक इसे हमारे विरुद्ध वैसे ही प्रयोग करते हैं जैसे पेलेगियस ने अगस्तीन के विरुद्ध किया था।

इंस्टिट्यूट्स में मैंने समझाया था कि पाप से बच न पाने की हमारी अक्षमता हमें उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करती। यदि हम यह कहें कि हम पाप किए बिना रह ही नहीं सकते, तो परमेश्वर वैसा ही उत्तर देगा जैसा उसने इस्राएल को दिया: “हे इस्राएल, तेरा नाश तो तुझ से ही हुआ, परन्तु तेरी सहायता मुझ ही से होती है” (होशे 13:9)। भला करने में हमारी अक्षमता हमारे स्वभाव की भ्रष्टता से उत्पन्न होती है—ऐसी भ्रष्टता जो परमेश्वर के विरुद्ध मानवजाति के विद्रोह के कारण आई। चूँकि हम सब आदम के विद्रोह में सहभागी हैं, इसलिए पाप करने की अनिवार्यता हमें क्षमा नहीं दिलाती, वरन् वही हमारे दण्ड का आधार है।

पिगियस इस उत्तर का उपहास करता है और अड़ा रहता है कि यदि परमेश्वर कोई आज्ञा देता है, तो हमें उसे स्वतंत्रता से करने में समर्थ होना चाहिए। वह अपना यह दावा दोहराता है कि यदि व्यवस्था उस बात की माँग करे जो हम पूरी नहीं कर सकते तो वह अर्थहीन होगी, और यह कि स्वतंत्र इच्छा भलाई और बुराई दोनों के योग्य होनी चाहिए। परन्तु अगस्तीन, जो पिताओं का विश्वासयोग्य व्याख्याकार है, सिखाता है कि हमारी अक्षमता हमारे पतित स्वभाव का परिणाम है—ऐसी दशा जो हमने आदम के द्वारा अपने ऊपर स्वयं ली है। अगस्तीन कहता है कि पाप की यह “अनिवार्यता” वस्तुतः हमारे पाप का दण्ड है, जो उचित रूप से दोष के योग्य है।

पिगियस यह भी तर्क देता है कि यदि पाप स्वैच्छिक है, तो उससे बचा जा सकता होगा। मैंने इसका उत्तर यह कहकर दिया कि “स्वैच्छिक” का अर्थ “स्वतंत्र” नहीं है। वह अगस्तीन को मेरे विरुद्ध प्रयोग करने का प्रयत्न करता है, यह दावा करते हुए कि अगस्तीन हर कहीं उससे सहमत है। परन्तु अगस्तीन ने स्पष्ट कहा था कि यद्यपि पाप स्वैच्छिक है, फिर भी उससे बचना तभी सम्भव है जब पहले परमेश्वर के अनुग्रह से हमें चंगाई मिले। अपनी वर्तमान भ्रष्ट दशा में हम पाप से बँधे हुए हैं, फिर भी वह हमारा ही उत्तरदायित्व बना रहता है।

संक्षेप में, अगस्तीन सिखाता है कि यदि हम स्वस्थ और सम्पूर्ण होते, तो पाप से बचना सचमुच सम्भव होता। परन्तु जैसी स्थिति है, हमारा स्वभाव भ्रष्ट है, इसलिए हम पाप से केवल परमेश्वर के अनुग्रह से ही बच सकते हैं। पिगियस के तर्क इसलिए बिखर जाते हैं कि वह इस भ्रष्टता को स्वीकार करने से इनकार करता है और इसके बदले मानता है कि मानव स्वभाव अब भी परमेश्वर की सहायता के बिना भलाई को चुनने में समर्थ है।

बाध्यता और अनिवार्यता

क्योंकि मैंने बाध्यता और अनिवार्यता के भेद का बार-बार उल्लेख किया है, जो इस चर्चा के लिए केन्द्रीय है, आइए हम उसे और निकटता से देखें। जो लोग अनुग्रह के ऊपर स्वतंत्र इच्छा का पक्ष लेते हैं, वे तर्क देते हैं कि यदि कोई बात अनिवार्य है, तो वह न पापमय हो सकती है और न पुण्यमय। परन्तु हम उत्तर में यह बताते हैं कि परमेश्वर अनिवार्य रूप से भला है, फिर भी उसकी भलाई इसलिए कम प्रशंसनीय नहीं कि वह अपरिवर्तनीय है। इसी प्रकार शैतान अनिवार्य रूप से बुरा है, फिर भी उसकी दुष्टता इसलिए कम दोषपूर्ण नहीं।

पिगियस इसका प्रतिवाद यह दावा करके करता है कि मनुष्य परमेश्वर से भिन्न हैं; वह कहता है कि सृजे हुए प्राणियों में जो गुण “अनिवार्य” हैं, वे उनके लिए न प्रशंसा लाते हैं न दोष, क्योंकि ऐसे गुण उनके सृजे हुए स्वभाव का परिणाम हैं। वह आग्रह करता है कि केवल स्वतंत्रता से चुने गए कार्य ही पुण्य कमाते हैं। परन्तु हम यह नहीं कह रहे कि अनिवार्यता मनुष्य के उत्तरदायित्व को निरस्त कर देती है। हम तो यह दिखा रहे हैं कि अनिवार्यता और उत्तरदायित्व साथ-साथ रह सकते हैं, जैसा कि हम परमेश्वर की अपरिवर्तनीय भलाई में देखते हैं, जो प्रशंसा के योग्य है।

पिगियस यह भी दावा करता है कि परमेश्वर कुछ भी अनिवार्यता से नहीं करता, केवल अपनी स्वतंत्र इच्छा से करता है। परन्तु इस प्रकार की सोच भटकी हुई है और ईश-निन्दा की सीमा पर है, क्योंकि यह परमेश्वर के स्वभाव को उसके कार्यों से अलग कर देती है। परमेश्वर की भलाई, बुद्धि और सामर्थ्य इस प्रकार एक हैं कि वह वही चाहता है जो वह स्वभाव से है। उसकी इच्छा और उसका स्वभाव विभाजित नहीं हैं। इसलिए जैसे परमेश्वर अनिवार्य रूप से भला है, वैसे ही वह भला होना चाहता भी है, बाध्यता से नहीं, वरन् उच्चतम स्तर की स्वेच्छा से। हम इसे “स्वतंत्रता” भी कह सकते हैं, इस अर्थ में कि यह स्वयं-निर्धारित है।

पिगियस शैतान के हमारे उदाहरण को भी यह कहकर टालने का प्रयत्न करता है कि उसकी बुराई करने की अनिवार्यता उसके मूल पाप का परिणाम है, जिसे उसने स्वतंत्रता से किया था। परन्तु यह मानवजाति पर भी उतना ही लागू होता है। हम सिखाते हैं कि पाप के प्रति मानवजाति की दासता हमारी पतित अवस्था से आती है, हमारे मूल स्वभाव से नहीं। अन्तर यह है कि जहाँ शैतान की दासता अनन्त है, वहाँ मानवजाति को पवित्र आत्मा के अनुग्रह से छुटकारे की आशा है।

अन्त में, पिगियस मानता है कि अनिवार्यता अपने आप में इच्छा के विरुद्ध नहीं है, परन्तु दावा करता है कि वह उन लोगों की इच्छा के विरुद्ध है जो अब भी पृथ्वी पर हैं। वह सोचता है कि इससे उसके पक्ष को सहायता मिलेगी, परन्तु हमें इस भेद को मान्य मानने का कोई कारण नहीं दिखता।

पिगियस का दावा है कि अगस्तीन अनिवार्यता को मनुष्य की इच्छा से तभी जोड़ता है जब वह “परदेशियों” अर्थात् अब भी पृथ्वी पर रहनेवालों की बात करता है। परन्तु अगस्तीन वास्तव में इस अनिवार्यता की चर्चा पतन से पहले के आदम के सन्दर्भ में करता है, एक ऐसे बोझ के रूप में जो अब उसके सब वंशजों पर पड़ता है। अगस्तीन, प्रॉस्पर और बर्नार्ड सब सिखाते हैं कि पतन के बाद से हम अनिवार्यता के इस “जुए” के अधीन हैं, जिससे अन्यथा हम मुक्त होते।

आइए हम अनिवार्यता को परिभाषित करें: यह एक स्थिर दशा है जिसमें कोई वस्तु जैसी है उससे भिन्न नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, परमेश्वर अनिवार्य रूप से भला है—उसकी भलाई अपरिवर्तनीय है। इस अनिवार्यता का अर्थ बाध्यता नहीं है; परमेश्वर स्वतंत्रता और स्वेच्छा से भला है, परन्तु वह अन्यथा नहीं हो सकता। इसी प्रकार शैतान अनिवार्य रूप से बुरा है, फिर भी वह ऐसा स्वेच्छा से करता है।

इससे प्रकट होता है कि अनिवार्यता और स्वतंत्र इच्छा कभी-कभी साथ-साथ रह सकती हैं। मनुष्यों के विषय में हम “बुरी जड़ की बुरी डालियाँ” हैं—अर्थात् क्योंकि हम पाप में जन्म लेते हैं, इसलिए हम केवल अपने पापी स्वभाव के अनुसार ही कार्य कर सकते हैं। हम अपने बल पर बुराई से भलाई की ओर नहीं मुड़ सकते; यह हमारी सामर्थ्य से परे है। फिर भी पाप करने की यह अनिवार्यता हमें क्षमा नहीं दिलाती, क्योंकि इसकी जड़ आदम के परमेश्वर की आज्ञा न मानने के मूल, स्वैच्छिक निर्णय में है।

यहाँ तक कि अरस्तू ने भी, जो एक अन्यजाति दार्शनिक था, इसे पहचाना: उसने देखा कि यद्यपि कोई व्यक्ति किसी दशा (जैसे रोग) में पड़ने को विवश हो जाता है, फिर भी प्रायः वह उस दशा में स्वेच्छा से प्रवेश करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति के बुरे चुनावों से रोग लगा, तो एक बार बीमार पड़ जाने पर वह स्वयं को सरलता से चंगा नहीं कर सकता, परन्तु आरम्भ में उसके चुनावों ने ही ऐसा किया। उसी प्रकार, जब कोई पत्थर फेंकता है, तब एक बार वह हवा में चला जाए तो वह उसे वापस नहीं ले सकता, परन्तु उसने फेंकना स्वयं चुना था।

मसीहियों के लिए यह विचार मूलभूत है। आदम के पाप ने न केवल उसे, वरन् सारी मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। यह भ्रष्टता अब हमारे स्वभाव में जम गई है, और यद्यपि हम अब पाप से बच नहीं सकते, तथापि वह स्वैच्छिक बना रहता है, क्योंकि हम ऐसी दशा में जन्म लेते हैं जिससे हम अपने बल पर निकल नहीं सकते। इसलिए पाप, यद्यपि हमारे लिए अवश्यम्भावी है, फिर भी हमारा ही उत्तरदायित्व है।

हमारे विरोधियों की उठाई हुई दूसरी “असंगति” यह है: “जब तक गुण और अवगुण स्वतंत्रता से चुने गए निर्णय से न आएँ, तब तक लोगों को दण्ड या प्रतिफल देना उचित न होगा।” इसका उत्तर देने से पहले मैंने कहा था कि यद्यपि यह तर्क अरस्तू से निकला, तथापि क्राइसोस्टम और जेरोम जैसे धर्मवैज्ञानिकों ने इसे अपना लिया। पिगियस तर्क देता है कि उसका मत पेलेगियस से बहुत भिन्न है, फिर भी इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि पेलेगियसवादियों ने भी यह तर्क प्रयोग किया, भले ही थोड़े भिन्न रूप में कहा हो।

पिगियस मेरी इसलिए भी आलोचना करता है कि मैंने केवल दो नामों का उल्लेख किया, मानो मुझ पर यह बाध्यता थी कि जिस-जिसने यह मत रखा उन सबकी सूची दूँ। सच तो यह है कि लिखते समय मेरे पास साधन सीमित थे, और जो नाम मुझे स्मरण थे मैंने वही बताए।

दण्ड के विषय में मेरा उत्तर यह है कि वह उचित रूप से उन पर लगाया जाता है जो पाप के उत्तरदायी हैं, चाहे वे स्वतंत्रता से पाप करें या दासता में, जब तक वह स्वैच्छिक है। पिगियस आग्रह करता है कि “स्वैच्छिक” का अर्थ “हमारे वश में” होना चाहिए। परन्तु मैं अगस्तीन की नाईं उत्तर देता हूँ कि यह स्वतंत्रता तभी उपलब्ध थी जब हमारा स्वभाव निर्दोष था, और जब आदम ने इसका दुरुपयोग किया तब मानवजाति ने यह स्वतंत्रता खो दी।

प्रतिफल के विषय में मेरा कथन है कि वे परमेश्वर की दया पर निर्भर हैं, मनुष्य के पुण्य पर नहीं। पिगियस इसे ईश-निन्दा कहकर ठुकराता है और कहता है कि प्रतिफल में सेवा और पुण्य दोनों निहित हैं। सेवा के विषय में मैं सहमत हूँ, परन्तु यदि “पुण्य” से उसका अर्थ योग्यता है तो मैं असहमत हूँ; यदि उसका अर्थ केवल वह आज्ञाकारिता है जो परमेश्वर ग्रहण करता है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।

पिगियस पौलुस के उन शब्दों का हवाला देता है जिनमें धर्मी न्यायी द्वारा दिए जानेवाले “धार्मिकता के मुकुट” की बात है। परन्तु जैसा अगस्तीन कहता है, “धर्मी न्यायी उस कमाए हुए मुकुट को किसे देता, यदि दयालु पिता ने पहले बिना कमाया अनुग्रह न दिया होता?” हम मानते हैं कि मसीही जीवन में परिश्रम और संघर्ष है, जो हमारी पूरी प्रतिबद्धता माँगता है। प्रश्न यह है कि हम अपनी सामर्थ्य से लड़ते हैं या परमेश्वर साहस, कौशल और बल प्रदान करता है।

पिगियस परमेश्वर के अनुग्रह को केवल एक छोटी भूमिका देता है, और दावा करता है कि अधिकांश प्रयत्न हमारा है। परन्तु मेरा मत है कि परमेश्वर इस्राएल से की हुई अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करता है: जब हम उसमें विश्राम करते हैं, तब वह हमारे लिए लड़ता है (निर्गमन 14:14)। इसका अर्थ यह नहीं कि हम कुछ नहीं करते; वरन् हम परमेश्वर से प्रेरित होते हुए कार्य करते हैं। जैसे वह हमारे हृदयों को चलाता है वैसे ही हम चाहते हैं, जैसे वह हमें बल देता है वैसे ही हम यत्न करते हैं, और उसके समर्थ करने से ही हम सफल होते हैं। हम उसके हाथों में जीवित औज़ार हैं, और वही इस कार्य का अगुवा और पूरा करनेवाला है।

हमारे विरोधियों की उठाई हुई दूसरी “असंगति” यह है: “यदि गुण और अवगुण स्वतंत्र चुनाव से नहीं आते, तो लोगों को दण्ड या प्रतिफल देना अनुचित होगा।” इसका उत्तर देने से पहले मैंने कहा था कि यद्यपि यह विचार अरस्तू से उत्पन्न हुआ, तथापि बाद में क्राइसोस्टम और जेरोम जैसे व्यक्तियों ने इसे अपना लिया, और पेलेगियसवादियों ने भी इसका प्रयोग किया। पिगियस अपने मत को पेलेगियस से भिन्न दिखाने का प्रयत्न करता है, परन्तु इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि दोनों समान तर्क देते हैं।

पिगियस मेरी इसलिए भी आलोचना करता है कि मैंने केवल दो नाम उद्धृत किए। लगता है वह उन सब लोगों की पूरी सूची की अपेक्षा करता है जिन्होंने यह मत रखा, परन्तु उस समय मेरे पास साधन सीमित थे। मैंने वे थोड़े से नाम बताए जो मुझे स्मरण थे।

दण्ड के प्रश्न पर मैं कहता हूँ कि दण्ड उचित रूप से उन पर लगाया जाता है जो पाप के उत्तरदायी हैं, चाहे उनका निर्णय स्वतंत्र हो या विवश, जब तक वह स्वैच्छिक है। पिगियस सहमत होता है, परन्तु आग्रह करता है कि “स्वैच्छिक” का अर्थ पूर्णतः हमारे नियन्त्रण में होना चाहिए। अगस्तीन के साथ मैं उत्तर देता हूँ कि यह स्वतंत्रता मूलतः एक निर्दोष स्वभाव पर निर्भर थी, जिसे आदम के गिरने पर मानवजाति ने खो दिया।

प्रतिफल के विषय में मेरा कथन है कि वे परमेश्वर की दया पर निर्भर हैं, मनुष्य के पुण्य पर नहीं। पिगियस इसे ठुकराता है और कहता है कि प्रतिफल में सेवा और पुण्य दोनों निहित हैं। सेवा के विषय में मैं सहमत हूँ, परन्तु पुण्य के विषय में नहीं—जब तक कि पुण्य से उसका अर्थ केवल वह आज्ञाकारिता न हो जो परमेश्वर ग्रहण करता है।

पिगियस पौलुस के उस उल्लेख को उठाता है जिसमें परमेश्वर द्वारा दिए जानेवाले “धार्मिकता के मुकुट” की बात है। फिर भी, जैसा अगस्तीन कहता है, “धर्मी न्यायी उस कमाए हुए मुकुट को कैसे देता, यदि दयालु पिता ने पहले बिना कमाया अनुग्रह न दिया होता?” यद्यपि हमारी मसीही यात्रा में परिश्रम और संघर्ष अवश्य है, तथापि प्रश्न यह है कि हम अपनी सामर्थ्य से यत्न करते हैं या परमेश्वर के प्रबन्ध से। पिगियस परमेश्वर के अनुग्रह को केवल एक छोटी भूमिका देता है, और दावा करता है कि बड़ा भाग हमारा है। मैं इसके बदले यह मानता हूँ कि इस्राएल से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा हम पर भी लागू होती है: जब हम उसमें विश्राम करते हैं, तब वह हमारे लिए लड़ता है (निर्गमन 14:14)।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम कुछ नहीं करते; वरन् हम परमेश्वर से सामर्थ्य पाकर कार्य करते हैं। जैसे वह हमें चलाता है वैसे ही हम चाहते हैं, जैसे वह हमें बल देता है वैसे ही हम यत्न करते हैं, और जैसे वह हमें समर्थ करता है वैसे ही हम सफल होते हैं। हम उसके हाथों में जीवित औज़ार हैं, और वही इस कार्य का सच्चा अगुवा और पूरा करनेवाला बना रहता है।

पिगियस का दावा है कि जब मैं अगस्तीन का यह कथन उद्धृत करता हूँ कि “परमेश्वर हममें अपने ही दानों को मुकुट पहनाता है,” तब मैं उसके शब्दों को बिगाड़ता हूँ। परन्तु अगस्तीन यह बात बार-बार कहता है, और स्पष्ट करता है कि हममें जो कुछ भला है वह परमेश्वर के अनुग्रह से है। उदाहरण के लिए, सिक्स्तुस को लिखे अपने पत्र में अगस्तीन समझाता है कि अनन्त जीवन भी, जो हमारे पुण्यों के प्रतिफल के रूप में दिया जाता है, अनुग्रह ही कहलाता है, क्योंकि ये “पुण्य” स्वयं परमेश्वर ने हमें दिए थे।

अगस्तीन ने पेलेगियसवादियों के इस विचार का विरोध किया कि केवल पापों की क्षमा दान है, और सिखाया कि जिन गुणों को परमेश्वर प्रतिफल देता है वे भी उसके दान हैं। पिगियस तर्क देता है कि यह दृष्टिकोण पुण्य को समाप्त नहीं करता, वरन् उसे स्थापित करता है। इसके उत्तर में मैं कहता हूँ कि हमारे पुण्य स्थिर तो रखे जाते हैं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह के कार्यों के रूप में। आत्मा हमें यह पहचानने को बुलाता है कि हमारा चुना जाना, बुलाया जाना और धर्मी ठहराया जाना परमेश्वर की दया से है—हमारे अपने प्रयत्नों से नहीं। पिगियस इसे अस्वीकार करता है और कहता है कि यदि यह सच होता तो परमेश्वर अन्यायी ठहरता, परन्तु यह उत्तर पवित्र आत्मा के विरुद्ध मात्र निन्दा है।

मेरे विरोधियों की तीसरी “असंगति” में वे तर्क देते हैं: “यदि भले कर्म हमारे वश में उतने नहीं जितने बुरे कर्म, तो कुछ लोग विश्वास और भले कर्मों से क्यों गिर जाते हैं जबकि दूसरे स्थिर रहते हैं?” इस प्रश्न का मेरा उत्तर सरल है: यह भेद परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव में निहित है। चुनाव हमारी बुलाहट की नींव है—केवल उसके आरम्भ में ही नहीं, वरन् उसकी निरन्तरता और पूर्णता में भी। यह शिक्षा मेरी अपनी गढ़ी हुई नहीं है; यह सीधे पवित्रशास्त्र से आती है, जैसा कि अगस्तीन ने भी बार-बार सिखाया।

फिर भी पिगियस परमेश्वर पर क्रूरता का दोष लगाता है, यदि सचमुच ऐसा ही है। इंस्टिट्यूट्स में मैं पौलुस की उस शिक्षा का उल्लेख करता हूँ कि हमें घमण्ड नहीं करना चाहिए, क्योंकि हमारे पास जो कुछ है, हमारा विश्वास भी, परमेश्वर का दान है (1 कुरिन्थियों 4:7)। पौलुस का आशय मनुष्य के घमण्ड और पुण्य को मिटाना है, यह दिखाकर कि सब कुछ—हमारे भले कर्म भी—परमेश्वर के अनुग्रह से है, हमारे प्रयत्नों से नहीं।

पिगियस इसे ठुकराता है और दावा करता है कि पौलुस स्वतंत्र इच्छा का इनकार नहीं करता; वह तो केवल इतना कहता है कि हम जो कुछ हैं और हमारे पास जो कुछ है उसका श्रेय परमेश्वर को दिया जाना चाहिए। फिर पिगियस मेरे मत का उपहास करता है और कहता है कि वह भी मानता है कि स्वतंत्र चुनाव अन्ततः परमेश्वर का दान है, और इस “विजय” पर डींग मारता है। परन्तु उसका तर्क खोखला है, जो पौलुस के सन्देश के सार से बचकर निकल जाता है। प्राचीन विधर्मी पेलेगियस की नाईं वह ऊपर-ऊपर से अनुग्रह की पुष्टि करने का प्रयत्न करता है, जबकि उद्धार में उसकी सच्ची भूमिका को निर्बल करता है।

पेलेगियस ने, जब उसका सामना किया गया, अनुग्रह को परमेश्वर द्वारा किसी पूर्व पुण्य के बिना दिया गया प्रतिफल कहकर उसे स्वीकार करने का ढोंग किया। परन्तु जैसा अगस्तीन ने दिखाया, पौलुस उस अनुग्रह की बात नहीं कर रहा जो हमें केवल मनुष्य के रूप में रचता है, वरन् उस अनुग्रह की जो हमें धर्मी बनाता है। यह भेद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है: जो अनुग्रह हमें नया करता और परमेश्वर की ओर फेरता है, वह उस अनुग्रह से मूलतः भिन्न है जिसने हमें रचा। पौलुस की शिक्षा दिखाती है कि इन दोनों को अलग रखा जाना चाहिए। हमारा पतित स्वभाव केवल सृष्टि से सुधारा नहीं जा सकता; उसे उस विशेष, छुटकारा देनेवाले अनुग्रह की आवश्यकता है जो चंगा करता और रूपान्तरित करता है।

सृष्टि में परमेश्वर के सार्वभौमिक अनुग्रह को नया जन्म के विशेष अनुग्रह से गड्डमड्ड करके पिगियस वास्तविक प्रश्न से बच निकलता है। अगस्तीन ने देखा कि अनुग्रह के विरोधी प्रायः मनुष्य की “स्वाभाविक” क्षमताओं की प्रशंसा की आड़ में छिप जाते हैं, ताकि उद्धार में परमेश्वर के रूपान्तरकारी कार्य का महत्त्व घटा सकें।

चौथी “असंगति”

इंस्टिट्यूट्स में मैं अपने विरोधियों द्वारा प्रायः उठाई जानेवाली चौथी आपत्ति प्रस्तुत करता हूँ: “जब तक हममें आज्ञा मानने की सामर्थ्य न हो, तब तक उपदेश, चेतावनियाँ और फटकार व्यर्थ हैं।” पिगियस इस तर्क को कलीसिया के अनेक प्राचीन लेखकों का हवाला देकर, जिन्होंने ऐसी ही बातें कही थीं, और कुछ संदिग्ध स्रोतों को भी जोड़कर, और प्रबल बनाता है। टर्टुलियन और आइरेनियस ने तर्क दिया कि यदि हममें उसे स्वतंत्रता से मानने की क्षमता न होती, तो परमेश्वर हमें अपनी व्यवस्था न देता। परन्तु सृष्टि के समय मानवजाति को दी गई क्षमताओं में और पतन के बाद जो शेष रहीं उनमें एक महत्त्वपूर्ण भेद है। मानव स्वभाव तब से अपनी मूल शक्ति से वंचित कर दिया गया है और अब आत्मिक दरिद्रता की दशा में है।

पिगियस रोमी दार्शनिक सिसरो को भी अपने मत के समर्थन में बुलाता है, परन्तु इससे उसके तर्क को कोई सहायता नहीं मिलती। मानव स्वभाव की विरासत में मिली पापमयता और उसकी अनुग्रह की आवश्यकता की समझ सिसरो जैसे लोगों को ज्ञात नहीं थी, जो केवल मानवीय तर्क पर निर्भर थे। यह आश्चर्य की बात नहीं कि दार्शनिक और वक्ता इस सत्य से चूक गए।

इंस्टिट्यूट्स में मैंने इस प्रश्न को अगस्तीन की रचना फटकार और अनुग्रह से उसके शब्द उद्धृत करके सम्बोधित करना चुना। अगस्तीन ने यह पुस्तक ठीक इसीलिए लिखी थी कि उसके विरुद्ध उठाई गई ऐसी ही आपत्तियों का उत्तर दे सके। फिर भी पिगियस मुझ पर आरोप लगाता है कि मैंने अगस्तीन के विचारों को अनुचित रूप से अपने विचारों के साथ मिला दिया है। वह इस आरोप का बचाव कैसे करता है? फटकार और अनुग्रह के सम्बन्धित तर्क का उत्तर देने के बजाय, वह पाठकों का ध्यान भटकाने के लिए अगस्तीन की एक असम्बद्ध रचना की ओर संकेत करता है, जिसमें अगस्तीन समझाता है कि स्वतंत्र चुनाव अनुग्रह के साथ रह सकता है।

अगस्तीन की स्वतंत्र चुनाव सम्बन्धी शिक्षा की चर्चा मैं ऊपर पहले ही कर चुका हूँ, और यहाँ हम एक भिन्न प्रश्न से निपट रहे हैं। अगस्तीन ने फटकार और अनुग्रह क्यों लिखी? ठीक यह समझाने के लिए कि परमेश्वर का अनुग्रह कैसे कार्य करता है, जबकि हम स्वयं परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में असमर्थ हैं। इसे सीधे सम्बोधित करने के बजाय पिगियस मूल विषय से ध्यान हटाता है, और कोई वास्तविक सार की बात प्रस्तुत नहीं करता।

पिगियस, वैलेन्तिनुस को लिखे अगस्तीन के पत्रों से अनेक उद्धरण एकत्र करके तर्क देता है कि अगस्तीन स्वतंत्र चुनाव के पूर्ण इनकार की और उसे परमेश्वर के अनुग्रह से अलग करनेवाले किसी भी मत की निन्दा करता है। पिगियस का दावा है कि अगस्तीन एक “मध्यम” स्थिति अपनाता है, यह कहते हुए कि मनुष्य की इच्छा सचमुच स्वतंत्र है, परन्तु जो उचित है उसे सचमुच जानने और करने के लिए उसे परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता है।

मैं मानता हूँ कि अगस्तीन स्वतंत्र चुनाव और अनुग्रह दोनों के महत्त्व को सिखाता है। फिर भी यह स्पष्ट है कि अगस्तीन स्वतंत्र चुनाव से यह अर्थ नहीं लेता कि हम परमेश्वर की सहायता के बिना उसे प्रसन्न कर सकते हैं। उसका अर्थ यह है कि मनुष्यों में एक ऐसी इच्छा है जो भलाई या बुराई चुन सकती है, परन्तु यह इच्छा पाप के कारण स्वभाव से भ्रष्ट है। केवल परमेश्वर के अनुग्रह से ही यह इच्छा इस प्रकार रूपान्तरित होती है कि परमेश्वर को भानेवाले कार्यों की अभिलाषा और उनका पालन करे। यदि अब भी अगस्तीन की स्थिति के विषय में तुम्हें सन्देह है, तो मैं आग्रह करता हूँ कि उसकी अन्य रचनाओं को देखो, विशेषकर सिक्स्तुस को लिखा उसका पत्र, जहाँ वह स्पष्ट करता है कि अनुग्रह के बिना मनुष्य का चुनाव कितना सीमित है।

तब पिगियस मुझे चुनौती देता है कि मैं सिद्ध करूँ कि अगस्तीन को कभी इस आपत्ति का सामना करना पड़ा कि यदि लोगों में आज्ञा मानने की सामर्थ्य नहीं, तो आज्ञाएँ और उपदेश व्यर्थ हैं। इसके उत्तर में मैं उसे अगस्तीन की अपनी रचनाओं की ओर भेजता हूँ, जहाँ वह उन लोगों की ऐसी ही आपत्तियाँ दर्ज करता है जिन्होंने तर्क दिया कि यदि परमेश्वर हममें “इच्छा और काम दोनों” करता है, तो मनुष्यों की आज्ञाएँ और फटकारें निरर्थक हैं। विरोधी सचमुच इन आपत्तियों का प्रयोग अनुग्रह की शिक्षा का उपहास करने के लिए करते थे।

पिगियस का दावा है कि ऐसी आपत्तियाँ अगस्तीन की अपेक्षा मेरी शिक्षाओं पर अधिक उचित रूप से लगाई जातीं। मैं मानता हूँ कि अगस्तीन ऐसी आलोचना के योग्य न रहा होगा, परन्तु मेरी बात फिर भी मान्य है: अगस्तीन को इन आपत्तियों का सामना करना पड़ा था, और वे दिखाती हैं कि अनुग्रह की उसकी शिक्षा के प्रति लोगों में कैसा तनाव था। यहाँ पिगियस की उग्र आलोचना केवल यही प्रकट करती है कि वह सत्य को सावधानी से समझने और उससे जुड़ने के बजाय वाद-विवाद जीतने को उत्सुक है।

अब आइए देखें कि पिगियस हमें अगस्तीन के विचारों से कैसे अलग करने का प्रयत्न करता है। वह कहता है कि यदि हम मानते हैं कि परमेश्वर एक ही आज्ञा से कुछ लोगों (चुने हुओं) को अपना चंगा करनेवाला अनुग्रह देता है और दूसरों को उनकी पापमय दशा में छोड़ देता है, तो लोगों को सिखाना, चेतावनी देना या फटकारना मूर्खता होगी। पिगियस तर्क देता है कि अगस्तीन का मत इससे पूर्णतः भिन्न है। परन्तु अगस्तीन वास्तव में क्या कहता है?

अगस्तीन सिखाता है कि सब लोग पाप में जन्म लेते हैं। वह समझाता है कि फटकार का एक उद्देश्य है: उनमें, जो “प्रतिज्ञा की सन्तान” हैं, परिवर्तन की इच्छा जगाना। अगस्तीन लिखता है, “बाहर से सुनाई देनेवाली फटकार के द्वारा परमेश्वर भीतर भी कार्य करता है, और भली बात की अभिलाषा उत्पन्न करता है—यदि फटकारा जानेवाला सचमुच परमेश्वर के चुने हुओं में से है।” वह स्पष्ट करता है कि सच्चा परिवर्तन केवल शब्दों या चेतावनियों से नहीं, वरन् हृदय में कार्य करनेवाले परमेश्वर के आत्मा से आता है, और यह अनुग्रह केवल चुने हुओं को दिया जाता है, सब को नहीं।

अगस्तीन आगे कहता है: “अनुग्रह का यह दान पाए बिना कोई भी मानवजाति के पतित पिण्ड से अलग नहीं किया जा सकता। जो चुने गए हैं वे परमेश्वर द्वारा बुलाए जाते हैं, अपने चुनाव से नहीं, वरन् उसके निर्णय से।” वह जोड़ता है, “परमेश्वर जानता है कि सचमुच उसके कौन हैं। प्रेम से सक्रिय उनका विश्वास टलेगा नहीं—या यदि टल भी जाए, तो परमेश्वर जीवन के अन्त से पहले उन्हें पुनःस्थापित करेगा, और उन्हें अन्त तक स्थिर रहनेवालों में गिनेगा। जो विश्वास से गिर जाएँगे, उन्हें परमेश्वर ने कभी उस पतित पिण्ड से अलग नहीं किया था, और न वे उसके निर्णय के अनुसार चुने या बुलाए गए थे।”

अन्त में, अगस्तीन कहता है कि हम मनुष्य होने के नाते यह नहीं जान सकते कि कौन पूर्वनिर्धारित है और कौन नहीं, इसलिए हमें सबके साथ इस आशा से व्यवहार करना चाहिए कि वे उद्धार पा सकते हैं। हमें सब को फटकारना चाहिए, आत्मिक औषधि के रूप में, इस आशा से कि वह उन्हें बचा ले या औरों को भटकाने से रोक दे। परन्तु अन्ततः यह परमेश्वर ही है जो उनके लिए फटकार को प्रभावी बनाता है जिन्हें उसने पहले से जाना और पूर्वनिर्धारित किया है।

अब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि पिगियस के तर्क कितने अविश्वसनीय हैं। जो किराये पर बोलते हैं उन्हें अपने दावों के सत्य की कोई चिन्ता नहीं लगती, बस वे बोलते रहें। पिगियस तर्क देता है कि हमारे विश्वास के विरुद्ध आपत्तियाँ—कि परमेश्वर अपनी आज्ञा मात्र से कुछ लोगों को अनुग्रह देता और दूसरों को छोड़ देता है—केवल हम पर लागू होती हैं, अगस्तीन पर नहीं। फिर भी अगस्तीन अपनी रचनाओं में इसी प्रश्न की चर्चा करता है।

पिगियस का दावा है कि अगस्तीन लोगों को प्रोत्साहित करता है कि “आज्ञा से सीखो कि तुम्हें क्या करना चाहिए, फटकार से सीखो कि यदि तुम चूकते हो तो यह तुम्हारा अपना दोष है, और प्रार्थना से सीखो कि अनुग्रह कहाँ मिलेगा” (रोमियों 3:19-20)। वह आश्चर्य करता है कि मैं, कैल्विन, यही बात कैसे कह सकता हूँ, जबकि मैं सिखाता हूँ कि लोग अनुग्रह को पाने से पहले उसे न ढूँढ़ सकते हैं न चाह सकते हैं। परन्तु अगस्तीन मन-परिवर्तन में परमेश्वर की सर्वोच्चता पर बार-बार बल देता है। उदाहरण के लिए, वह कहता है, “क्या तुम फिरते, यदि बुलाए न गए होते? यदि परमेश्वर ने तब नहीं बुलाया होता जब तुम भाग रहे थे, तो तुम लौट नहीं सकते थे” (भजन संहिता 84)। अगस्तीन यह भी कहता है, “वह हमारी सहायता के बिना हमें बुलाता है,” और घोषणा करता है कि परमेश्वर “न केवल अनिच्छुकों को इच्छुक बनाने में, वरन् विद्रोहियों को भी अधीन बनाने में” समर्थ है। अगस्तीन प्रायः इसी प्रकार बोलता है, जिसे पिगियस सुविधा से अनदेखा कर देता है।

जब मैं इंस्टिट्यूट्स में इस आलोचना का उत्तर देता हूँ, तब मैं यह बताता हूँ कि इस शिक्षा में हम अकेले नहीं हैं—मसीह और प्रेरित भी हमारे साथ खड़े हैं। वे निरन्तर दिखाते हैं कि जब तक परमेश्वर हमें समर्थ न करे, तब तक भलाई प्राप्त करने में मनुष्य के प्रयत्न किसी काम के नहीं, फिर भी वे आज्ञा देते, प्रोत्साहित करते और फटकारते रहते हैं। यह संगति दिखाती है कि ईश्वरीय अनुग्रह नैतिक शिक्षा को निरस्त नहीं करता; वरन् हमें प्रत्युत्तर देने के योग्य बनाता है।

पिगियस मसीह की शिक्षाओं की मेरी दुहाई का उपहास करता है, और दावा करता है कि मसीह हमारा विरोध करेगा क्योंकि वह हमारे हृदयों के द्वार पर खटखटाता है और यरूशलेम के उसे ग्रहण करने की अनिच्छा पर विलाप करता है (प्रकाशितवाक्य 3:20; मत्ती 23:37)। फिर भी मैं मानता हूँ कि यद्यपि मानवजाति परमेश्वर की आत्मा के बिना उसे उत्तर देने में असमर्थ है, तथापि मन फिराव और आज्ञाकारिता का आह्वान अनिवार्य बना रहता है। हम पूर्णतः परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर हैं, इसलिए उसकी आज्ञाओं की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती।

पिगियस पौलुस के लेखों का भी प्रयोग यह दिखाने के लिए करता है कि पौलुस अनुग्रह के साथ स्वतंत्र इच्छा को भी महत्त्व देता है। वह इंगित करता है कि पौलुस हमारी इच्छा और हमारे दौड़ने को स्वीकार करता है (रोमियों 9:16)। परन्तु यदि वह सचमुच पौलुस को समझता है, तो उसे यह भी मानना होगा कि पौलुस कहता है, “परमेश्वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)। हमारी इच्छा और हमारे कार्य दोनों परमेश्वर के अनुग्रह से समर्थ होते हैं, जो दिखाता है कि वे केवल हमारी स्वाभाविक क्षमता पर निर्भर नहीं हैं।

पिगियस का दावा है कि मेरी शिक्षा विरोधाभासों से इतनी भरी है कि उन सबका उत्तर देना अन्तहीन कार्य होगा। वह इस कथित दोष का एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करके आरम्भ करता है जिसे वह स्पष्ट मानता है। मैं सिखाता हूँ कि परमेश्वर अपने चुने हुओं में दो स्तरों पर कार्य करता है: बाहर से अपने वचन के द्वारा और भीतर से अपने आत्मा के द्वारा। आत्मा के द्वारा हमारी बुद्धि को प्रकाशित करके और हमारे हृदयों को धार्मिकता से प्रेम करने और उसका पीछा करने के लिए ढालकर परमेश्वर हमें नई सृष्टि बनाता है। साथ ही, अपने वचन के द्वारा वह हममें इस नवीनीकरण को खोजने और उसका पीछा करने की अभिलाषा जगाता है। पिगियस तर्क देता है कि यदि वचन आत्मा के कार्य से पहले आता है, तो वह अपुनर्जीवित हृदय के लिए निष्प्रभावी होगा; और यदि बाद में आता है, तो अनावश्यक प्रतीत होगा, क्योंकि विश्वासी तो पहले ही नया किया जा चुका होगा।

उत्तर में मैं समझाता हूँ कि वचन उन्हें सुनाया जाता है जो परमेश्वर द्वारा पहले से नए किए जा रहे हैं। इस प्रचार का उद्देश्य बार-बार नया जन्म आरम्भ करना नहीं, वरन् उस नए जीवन को दृढ़ करना और बढ़ाना है जिसे परमेश्वर ने पहले ही आरम्भ कर दिया है। मसीही परिपक्वता जीवन भर की प्रक्रिया है, कोई एक बार का कार्य नहीं। इसलिए वचन के प्रचार का उद्देश्य तब भी बना रहता है जब विश्वासी बढ़ते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह से क्रमशः रूपान्तरित होते जाते हैं।

पिगियस आगे आपत्ति करता है, यह दावा करते हुए कि मेरी शिक्षा में पुनर्जन्म से पहले लोगों के लिए परमेश्वर के आत्मा को खोजने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। परन्तु मैं उत्तर देता हूँ कि यद्यपि स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर के प्रति सचमुच अंधा है, फिर भी वह वचन के द्वारा कायल किया जा सकता है, और परमेश्वर के विरुद्ध उसके तर्क चुप कराए जा सकते हैं। पौलुस स्वयं सिखाता है कि “विश्वास सुनने से होता है” (रोमियों 10:17), परन्तु वह यह भी स्पष्ट करता है कि सच्चा विश्वास तभी उत्पन्न होता है जब परमेश्वर हृदय पर अपने आपको प्रकट करता है। इस प्रकार वचन प्रचार में बोए गए बीज के समान है; फिर भी वह तभी जड़ पकड़ता, बढ़ता और फल लाता है जब आत्मा भीतर कार्य करके उसे जीवन देता है।

संक्षेप में, मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि परमेश्वर का वचन और आत्मा सामंजस्य में साथ-साथ कार्य करते हैं। जब आत्मा वचन को सामर्थ्य देता है, तब वह हममें नवीनीकरण की अभिलाषा रोपता है। यद्यपि हम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि परमेश्वर कब या कैसे कार्य करे, फिर भी हम भरोसा रखते हैं कि वह अपने लोगों को विश्वास में रूपान्तरित करने और परिपक्व बनाने के लिए वचन और आत्मा को एक साथ लाता है।

जॉन कैल्विन के विरुद्ध उद्धृत किए गए पवित्रशास्त्र के पद

हमारे विरोधी प्रायः हमारी शिक्षाओं के विरुद्ध तर्क देने के लिए पवित्रशास्त्र के कुछ पदों का दुरुपयोग करते हैं। इंस्टिट्यूट्स में मैं समझाता हूँ कि इन अंशों को प्रायः इस प्रकार तोड़ा-मरोड़ा जाता है कि उनसे ऐसा अर्थ निकले जो उनके मूल आशय से अनजान है। मैं इन पदों को कई वर्गों में व्यवस्थित करता हूँ, आरम्भ उनसे करता हूँ जो परमेश्वर की आज्ञाओं से सम्बन्धित हैं।

हमारे विरोधियों का तर्क इस प्रकार चलता है: “यदि परमेश्वर कोई आज्ञा देता है, तो निश्चय ही हममें उसे पूरा करने की सामर्थ्य होनी चाहिए, नहीं तो वह हमें असफल होने के लिए खड़ा कर रहा है।” इसके उत्तर में मैं कहता हूँ कि जो लोग मनुष्य की सामर्थ्य को आज्ञाओं से मापते हैं, उन्हें पवित्रशास्त्र की समझ बहुत कम है। पिगियस और अन्य लोग तर्क देते हैं कि व्यवस्था का पालन सम्भव है; वे यह दावा आत्मविश्वास से इसलिए करते हैं कि उन्होंने इस पर गहराई से विचार नहीं किया कि व्यवस्था का पालन करने के लिए वास्तव में क्या चाहिए। व्यवस्था के ये तथाकथित रक्षक मनुष्य के पुण्य और सिद्धता की बात करने में तो शीघ्र हैं, जबकि वे स्वयं आंशिक रूप में भी व्यवस्था का पालन करने के निकट नहीं पहुँचे। परन्तु यदि वे सचमुच समझते कि “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारी बुद्धि, और सारी शक्ति से प्रेम रखना” (व्यव. 6:5) का क्या अर्थ है, तो वे देखते कि मरणहार निर्बलता से बँधी हुई पतित मानवजाति के लिए इस आज्ञा को पूरा करना कितना असम्भव है।

इसके अतिरिक्त, हमारा कहना केवल यह नहीं कि मनुष्य व्यवस्था का पूर्ण रूप से पालन नहीं कर सकते; हम यह दृढ़ता से कहते हैं कि वे उसके पालन का आरम्भ करने में भी असमर्थ हैं। धार्मिकता के सरलतम अंश भी परमेश्वर के अनुग्रह के बिना मनुष्य की पहुँच से बाहर हैं, चाहे पिगियस और अन्य लोग मनुष्य की क्षमताओं को कितना ही ऊँचा क्यों न उठाएँ।

यदि किसी को इसमें सन्देह हो, तो वह विश्वास में अपना ही अनुभव जाँचे। अनेक मसीही पाएँगे कि वे अपने भरसक प्रयत्न से भी अपने बल पर सच्ची धार्मिकता उत्पन्न नहीं कर सकते। जैसा पौलुस सिखाता है, “व्यवस्था के द्वारा तो पाप की पहचान होती है” (रोमियों 3:20)। जब पौलुस पूछता है कि क्या धार्मिकता व्यवस्था से प्राप्त हो सकती है, तो वह गूँजते हुए “नहीं” में उत्तर देता है, क्योंकि व्यवस्था पाप की केवल तीव्र चेतना लाती है, उस पर जय पाने की सामर्थ्य नहीं। यदि मानवजाति में अपने बल पर व्यवस्था का पालन करने की क्षमता होती, तो पौलुस का तर्क टिक नहीं सकता था।

एक अन्य अंश में पौलुस समझाता है कि व्यवस्था “बीच में आ गई कि अपराध बहुत हो” (रोमियों 5:20)। इससे स्पष्ट निहित है कि व्यवस्था का उद्देश्य आज्ञाकारिता को सामर्थ्य देना नहीं, वरन् पाप को प्रकट करना है। इसलिए, जैसा अगस्तीन ने ठीक कहा, “व्यवस्था के द्वारा हम सुनते हैं कि परमेश्वर हमसे क्या चाहता है; अनुग्रह के द्वारा हम उसे करने के योग्य बनते हैं।” अकेली व्यवस्था सुननेवाले उत्पन्न करती है, परन्तु केवल अनुग्रह ही करनेवाले उत्पन्न करता है। एक और स्थान पर अगस्तीन स्पष्ट करता है, “परमेश्वर की धार्मिकता व्यवस्था की उन आज्ञाओं पर आधारित नहीं जो भय उत्पन्न करती हैं, वरन् मसीह के अनुग्रह की सहायता पर, जो अकेला ही विश्वासियों के लिए व्यवस्था का उद्देश्य पूरा करता है।” निश्चय ही, इस सत्य को समझना ही मसीही होने के अर्थ के केन्द्र में है।

इस समझ के द्वारा हम पुष्टि करते हैं कि परमेश्वर की आज्ञाएँ पवित्र और धर्ममय हैं, फिर भी उन्हें पूरा करने की शक्ति के लिए हम पूर्णतः उसके अनुग्रह पर निर्भर हैं।

इंस्टिट्यूट्स में मैं उन कुछ तर्कों का उत्तर देता हूँ जो हमारे विरोधी पवित्रशास्त्र को तोड़-मरोड़कर हमारे विरुद्ध प्रयोग करते हैं। वे तर्क देते हैं कि यदि परमेश्वर कोई आज्ञा देता है, तो स्वाभाविक रूप से हममें उसे मानने की सामर्थ्य होनी चाहिए, नहीं तो आज्ञा निरर्थक होगी। मैं उत्तर में यह बताता हूँ कि जो लोग मनुष्य के बल को आज्ञाओं से आँकते हैं, वे पवित्रशास्त्र को गलत समझते हैं। उदाहरण के लिए, पिगियस साहसपूर्वक दावा करता है कि व्यवस्था का पालन करना सम्भव है—यह दावा वह केवल इसलिए करता है कि उसने सचमुच नहीं समझा कि व्यवस्था क्या माँगती है। जो लोग घोषणा करते हैं कि मनुष्य व्यवस्था को पूरा कर सकते हैं, वे प्रायः यह नहीं जानते कि “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे प्राण, और सारी शक्ति से प्रेम रखना” (व्यव. 6:5) का वास्तव में क्या अर्थ है। ऐसा सर्वग्रासी प्रेम ईश्वरीय सहायता के बिना मनुष्य की क्षमता से कहीं परे है।

हम पुष्टि करते हैं, न केवल यह कि लोग व्यवस्था का पूर्ण पालन करने में असमर्थ हैं, वरन् यह भी कि वे उसका पालन आरम्भ तक नहीं कर सकते। सच्ची धार्मिकता के छोटे से छोटे कार्य भी, यदि मनुष्य को उसकी अपनी क्षमताओं पर छोड़ दिया जाए, तो उसके बल से बाहर हैं। मैं नहीं चाहता कि कोई इसे केवल मेरे शब्दों के आधार पर स्वीकार करे; हर विश्वासी अपने विश्वास के अनुभव में इस सत्य को देख सकता है। पौलुस गवाही देता है कि “व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है” (रोमियों 3:20), उस पर जय पाने की सामर्थ्य नहीं। वह सिखाता है कि व्यवस्था “अपराध को बढ़ाने के लिए” दी गई (रोमियों 5:20), जिससे हमारी निर्बलता प्रकट हो और हमें दिखे कि आज्ञा मानने की क्षमता हमारे भीतर से नहीं आती।

जैसा अगस्तीन ने बुद्धिमानी से कहा, “व्यवस्था हमें यह सुनने योग्य बनाती है कि परमेश्वर क्या चाहता है, परन्तु उसे करने की सामर्थ्य केवल अनुग्रह देता है।” व्यवस्था धार्मिकता के सुननेवाले बनाती है; अनुग्रह करनेवाले बनाता है। अगस्तीन का एक और अंश इसे और स्पष्ट करता है: “धार्मिकता व्यवस्था की उन आज्ञाओं से नहीं आती जो भय उत्पन्न करती हैं, वरन् मसीह के अनुग्रह से, जो अकेला वह पूरा करता है जो व्यवस्था माँगती है।”

पिगियस मेरी शिक्षा को गलत समझता है जब मैं कहता हूँ कि व्यवस्था यह प्रकट करने के लिए दी गई कि हमें क्या करना चाहिए, ताकि हम प्रभु से उसे करने की सामर्थ्य माँगें। वह दावा करता है कि मैं अपना ही खण्डन करता हूँ, यह तर्क देते हुए कि यदि मनुष्यों में अनुग्रह की अभिलाषा करने की भी सामर्थ्य नहीं, तो फिर उसके लिए प्रार्थना पहली बार कौन करेगा? मैं मानता हूँ कि प्रार्थना की आत्मा भी परमेश्वर ही हमें देता है। पौलुस सिखाता है कि “विश्वास प्रार्थना की जननी है” (रोमियों 10:14), इसलिए परमेश्वर ही हमें अपने को पुकारने के लिए उभारता है। फिर भी परमेश्वर व्यवस्था को कायल करने और सिखाने के साधन के रूप में भी प्रयोग करता है, और हमें उस अनुग्रह की ओर मार्गदर्शन करता है जिसकी हमें अत्यन्त आवश्यकता है।

हमारे विरोधी आगे तर्क देते हैं कि पवित्रशास्त्र की सशर्त प्रतिज्ञाएँ संकेत देती हैं कि इन शर्तों को पूरा करने की सामर्थ्य हममें स्वयं है। वे सोचते हैं कि यदि परमेश्वर हमारे कार्यों पर निर्भर प्रतिज्ञाएँ करता है, तो इन प्रतिज्ञाओं को पाने के लिए जो आवश्यक है उसे करना हमारे वश में अवश्य होगा। मैं इसका उत्तर यह समझाकर देता हूँ कि प्रतिज्ञाएँ भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न उद्देश्य पूरे करती हैं। अविश्वासियों को प्रतिज्ञाएँ उनकी अयोग्यता प्रकट करती हैं, यह दिखाते हुए कि परमेश्वर का आदर करने में चूकने से वे क्या खोते हैं। विश्वासियों के लिए प्रतिज्ञाएँ गहरी श्रद्धा और पवित्रता की अभिलाषा जगाती हैं—अपनी सामर्थ्य पर निर्भर रहने से नहीं, वरन् आत्मा पर निर्भर रहने से।

इस प्रकार ये प्रतिज्ञाएँ लोगों को परमेश्वर के अनुग्रह को खोजने की ओर निर्देशित करती हैं, जो अकेला हमें उसकी बुलाहट का उत्तर देने के योग्य बनाता है। पिगियस असहमत है, यह सोचकर कि यह दृष्टिकोण लोगों को स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर बनाता है। वह मूसा का उल्लेख करता है, जो व्यवस्था देने के बाद कहता है, “आज मैंने जीवन और मरण को तुम्हारे आगे रखा है” (व्यव. 30:19), मानो इससे यह निहित हो कि हम अपनी सामर्थ्य से जीवन चुन सकते हैं। फिर भी पौलुस सिखाता है कि हमारे पापी स्वभाव के कारण, जो व्यवस्था जीवन लाने के लिए थी वह उलटे दण्ड की ओर ले जाती है (रोमियों 7:10)।

व्यवस्था निश्चय ही हमें आज्ञा देती है, परन्तु हम उसे अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते। व्यवस्था उन्हें जीवन की प्रतिज्ञा देती है जो उसका पूर्ण पालन करें, फिर भी कोई अपनी सामर्थ्य से उसके पीछे यत्न करने में समर्थ नहीं। पौलुस, व्यवस्था की माँग “इन्हें कर और जीवित रह” का उद्धरण देते हुए, तुरन्त हमें मसीह की ओर शरण के रूप में निर्देशित करता है, ताकि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को कर्मों से नहीं, वरन् विश्वास से सेंतमेंत पाएँ (रोमियों 10:4; गलातियों 3:11)। पिगियस तर्क देता है कि मूसा लोगों को “अपनी सारी सामर्थ्य से” आज्ञा मानने का निर्देश देता है (व्यव. 30:14), परन्तु यह आज्ञा हमें हमारे कर्तव्य का स्मरण दिलाने के लिए है और, जब हम उसे पूरा करने में अपनी अक्षमता को समझें, तब हमें यह प्रार्थना करने की ओर ले आए: “जो तू आज्ञा देता है वह दे, और फिर जो चाहे आज्ञा दे।”

इंस्टिट्यूट्स में मैं हमारे विरोधियों की उठाई एक और आपत्ति का उत्तर देता हूँ, जो पवित्रशास्त्र के उन अंशों के विषय में है जहाँ परमेश्वर इस्राएल को डाँटता है और उसकी आशीषें न पाने के लिए उसे उत्तरदायी ठहराता है। वे तर्क देते हैं कि यदि इस्राएल में अपने पाप के कारण परमेश्वर की आज्ञा मानने की सामर्थ्य ही नहीं थी, तो ऐसी फटकारें अन्यायपूर्ण हैं। वे पूछते हैं, “यदि हम समृद्धि चाहते थे परन्तु उसे पा न सके क्योंकि पाप हम पर प्रभुता करता था, तो हमें क्यों दोषी ठहराया जाता है? जिस पर हमारा वश न था उसके लिए हमें दोषी ठहराना कैसे उचित हो सकता है?”

इसके उत्तर में मैं कहता हूँ कि दोष उचित रूप से मनुष्य की इच्छा पर पड़ता है, जो विरासत में मिले पाप से भ्रष्ट हो चुकी है। बुराई की जड़ हमारे अपने हृदयों में है, और हम उत्तरदायित्व किसी और पर नहीं डाल सकते। हम अपने पाप का उत्तरदायित्व किसी दूसरे पर टाल नहीं सकते; दोष हमारा ही रहता है।

पिगियस अपनी सामान्य तिरस्कारपूर्ण शैली में इस उत्तर को ठुकराता है, और फिर मूसा के एक कथन की ओर ध्यान देता है, जहाँ मूसा इस्राएल से कहता है कि परमेश्वर की आज्ञा “न तो तुझ से बहुत भारी है और न दूर है, वरन् तेरे मुँह और तेरे हृदय में है” (व्यव. 30:14)। पहली दृष्टि में यह निहित करता प्रतीत होता है कि उनमें उसे मानने की सामर्थ्य थी। मैंने इंस्टिट्यूट्स में इस अंश की चर्चा की थी, यह बताते हुए कि यदि मैं तर्क से ऊपर-ऊपर बचकर निकलना चाहता, तो कह सकता था कि मूसा केवल व्यवस्था को समझने की उनकी क्षमता की बात कर रहा था, उसके पालन की नहीं। परन्तु मैंने पौलुस की शिक्षा के आधार पर आगे दिखाया कि यह अंश अन्ततः व्यवस्था की ओर नहीं, वरन् सुसमाचार की ओर संकेत करता है।

पिगियस इसका खण्डन यह आग्रह करके करने का प्रयत्न करता है कि मूसा स्पष्टतः व्यवस्था की बात करता है। मुझे आश्चर्य नहीं कि वह हमारा इतना उग्र विरोध करता है, क्योंकि पौलुस के द्वारा पवित्र आत्मा की व्याख्या के प्रति उसमें बैर है। क्योंकि पौलुस, आत्मा से प्रेरित होकर, इन शब्दों की व्याख्या रोमियों 10:6-8 में सुसमाचार के सम्बन्ध में करता है। पौलुस समझाता है कि व्यवस्था जीवन की प्रतिज्ञा केवल उन्हें देती है जो उसकी आज्ञाओं का पूर्ण पालन करें, जबकि सुसमाचार विश्वास से सेंतमेंत दी जानेवाली धार्मिकता प्रदान करता है। इस प्रकार पौलुस मूसा के शब्द, “वचन तेरे निकट है,” उद्धृत करके सुसमाचार की प्रतिज्ञा की निकटता का वर्णन करता है, और उसे “विश्वास का वचन” कहता है।

पिगियस आपत्ति करता है, आग्रह करते हुए कि यह पाठ केवल व्यवस्था के विषय में है, और दावा करता है कि इसे सुसमाचार पर लागू करना बेतुका होगा। मैं मानता हूँ कि मूसा ने ये शब्द व्यवस्था के सन्दर्भ में कहे, परन्तु व्यवस्था स्वयं हमें मसीह तक ले जाने के लिए है। अपने आप में, व्यवस्था की आज्ञाएँ केवल दण्ड की ओर ले जाती हैं, क्योंकि पाप से भ्रष्ट मानव स्वभाव उनका पालन नहीं कर सकता। इसी कारण पौलुस, ठीक ही और परमेश्वर के अभिप्राय के अनुसार, इस अंश को सुसमाचार पर लागू करता है, जिसमें प्रतिज्ञा निकट और सुलभ है, इसलिए नहीं कि हम उसे कमाते हैं, वरन् इसलिए कि वह परमेश्वर की ओर से सेंतमेंत दी जाती है।

फिर भी पिगियस का दावा है कि परमेश्वर की आज्ञाएँ “उपहास” हैं यदि वे उन लोगों को दी जाएँ जो अपने कठोर हृदयों के कारण आज्ञा नहीं मान सकते। परन्तु पौलुस व्यवस्था को “मृत्यु और दण्ड की सेवकाई” कहता है (2 कुरिन्थियों 3:7-9) ठीक इसीलिए कि वह हमारी अक्षमता को प्रकट करती और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता को दिखाती है। व्यवस्था मृत्यु लाती है, जब तक कि नई वाचा के अधीन परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा वह हमारे हृदयों पर न लिखी जाए।

अपने दावे करने के बाद, पिगियस घोषित करता है कि उसने सिद्ध कर दिया है कि पवित्रशास्त्र हमारी शिक्षा का विरोध करता है। फिर भी मेरा सुझाव है कि वह अपने तर्कों पर अधिक नम्रता से और व्यवस्था में परमेश्वर के उद्देश्य की स्पष्ट समझ के साथ पुनर्विचार करे, जो हमें सुसमाचार की ओर ले जाना था, और हमें मसीह के अनुग्रह की हमारी आवश्यकता दिखाना था।

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