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पिगियस की छठी पुस्तक पर कैल्विन का उत्तर
अपनी छठी पुस्तक में पिगियस उन प्रबल आपत्तियों का उत्तर देने का प्रयत्न करता है जिनके द्वारा हमने अपनी शिक्षा का बचाव किया है। वह कहता है कि उसका उद्देश्य इन तर्कों का खण्डन करना है, फिर भी वह शीघ्र ही अपने पाठकों का ध्यान इन्हें वास्तव में परखने से हटाने लग जाता है। वह अपने पाठकों से आग्रह करता है कि हम पवित्रशास्त्र के जो भी अंश प्रस्तुत करें, उन्हें कलीसिया की सर्वसम्मति की "बाड़" के भीतर ही बाँधे रखकर अनदेखा कर दें, मानो उससे ज़रा-सा भी हटना ख़तरनाक हो। परन्तु यदि पवित्रशास्त्र स्वयं ही स्पष्ट रूप से कुछ और सिखाता हो तो? पिगियस का हठ है कि तब भी उसके पाठक अडिग रहें, चाहे वे उसे पाठ में साफ़ देख रहे हों; अर्थात् यदि पवित्रशास्त्र कलीसिया की सर्वसम्मति के विरुद्ध प्रतीत हो तो उन्हें अपनी ही आँखों पर सन्देह करना चाहिए।
आगे चलकर वह फिर आत्मविश्वास पा लेता है और यह दिखाने का लक्ष्य रखता है कि मेरे तर्कों में कोई वास्तविक बल नहीं है। मैंने पहले इंस्टीट्यूट्स में यह कहा था कि सदियों से सामान्यतः यही माना जाता रहा है कि मनुष्य में भले और बुरे, दोनों ही कामों में इच्छा की स्वतन्त्रता है, अर्थात् पाप करने के लिए किसी को विवश नहीं किया जाता, और न परमेश्वर के आत्मा के बिना कोई स्वभाव से भलाई की ओर झुकता है। पिगियस यह सिद्ध करने के लिए प्राचीन लेखकों का एक समूह ले आता है कि यही कलीसिया का चिरकालीन मत है। परन्तु उसका परिश्रम व्यर्थ है, क्योंकि इन लेखकों के विषय में मैं अपने पिछले तर्कों में पहले ही बात कर चुका हूँ और उनसे मेल बैठा चुका हूँ।
पिगियस मेरी शिक्षाओं को तोड़-मरोड़कर ऐसा दिखाता है मानो मैं बाध्यता का पक्ष ले रहा हूँ, जबकि मैं बार-बार इस पर बल देता हूँ कि कोई कर्म सचमुच भला या बुरा होने के लिए स्वेच्छा से किया गया होना चाहिए। मैंने यह स्पष्ट करने का भरसक यत्न किया है कि हमारे कर्म विवशता से नहीं होते, परन्तु हमारे भीतर परमेश्वर के कार्य से ढलते हैं। पिगियस और मेरे बीच वास्तविक विवाद यह है: हम दोनों इस पर सहमत हैं कि हम में जो कुछ भला है उसका श्रेय परमेश्वर को मिलना चाहिए। फिर भी जब मैं परमेश्वर का वर्णन ऐसे करता हूँ कि वह हमारे हृदयों को भलाई की ओर सक्रिय रूप से गढ़ता और चलाता है, तो पिगियस आपत्ति करता है। उसका तर्क है कि यद्यपि हम में भलाई के आरम्भ का उत्तरदायित्व परमेश्वर का है, फिर भी उत्तरदायित्व का एक भाग हम पर ही रहना चाहिए।
जब मैं पौलुस का यह वचन प्रस्तुत करता हूँ, "जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे पूरा करेगा" (फिलिप्पियों 1:6), और समझाता हूँ कि परमेश्वर इस कार्य को इस प्रकार आरम्भ करता है कि वह हम में धार्मिकता के प्रति प्रेम को जगाता और हमारे हृदयों को उसकी ओर चलाता है, तो पिगियस आरम्भ में मेरी बात मान लेता है। परन्तु वह मेरे इस वर्णन पर आपत्ति करता है कि परमेश्वर हमारे हृदयों को "झुकाता" और "निर्देशित" करता है, और इन शब्दों को अपरिचित पाता है। फिर भी ये शब्द नए नहीं हैं; इनकी जड़ें पवित्रशास्त्र में हैं और विश्वासी जन इतिहास भर में इनका प्रयोग करते आए हैं। भजन संहिता 119 में दाऊद प्रार्थना करता है, "मेरे मन को अपनी चेतावनियों की ओर फेर दे।" इसी प्रकार सुलैमान कहता है, "राजा का मन नालियों के जल के समान यहोवा के हाथ में रहता है, जिधर वह चाहता है उधर उसको फेर देता है" (नीतिवचन 21:1)।
पिगियस आगे मुझ पर यह दोष लगाता है कि मैं विश्वासियों के लिए अपरिचित एक नई, विचित्र भाषा को बढ़ावा दे रहा हूँ, परन्तु उसकी आपत्ति अज्ञानता से उपजी प्रतीत होती है। वह ऐसे कथनों से ठोकर खाता है जिनका प्रयोग पवित्रशास्त्र स्वयं बहुधा करता है और जिन्हें कलीसिया के प्राचीन पिताओं, विशेषकर अगस्तीन, ने भी काम में लिया है। फिर भी उसकी शिकायत बाइबल की शिक्षा पर नहीं, परन्तु उसकी अपनी ग़लतफ़हमियों पर टिकी है। स्वयं पौलुस ऐसी भाषा का प्रयोग करता है जो हृदय को परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन बताती है, और यह कोई नई शिक्षा नहीं, परन्तु आत्मा की अपनी ही वाणी है।
पिगियस तो यहाँ तक कह देता है कि मैं हमारे हृदयों पर परमेश्वर के प्रभाव को एक प्रकार का वशीकरण बताता हूँ, जैसे दुष्टात्माएँ अपने वश में किए हुए लोगों पर नियन्त्रण रखती हैं। यह आरोप निराधार है। मैंने स्पष्ट कहा है कि मनुष्यों में स्वभाव से कर्म करने की इच्छा होती है, परन्तु पाप की भ्रष्टता के कारण हम अपने आप बुराई की ओर ही झुकते हैं। इसलिए ठीक रीति से इच्छा करने की सामर्थ्य परमेश्वर का दान है; वह हमारी इच्छा के विरुद्ध हमें बलपूर्वक नहीं चलाती, परन्तु प्रेम से हमारी अभिलाषाओं को बदल देती है।
पिगियस मुझ पर यह दोष लगाता है कि मैं इससे इनकार करता हूँ कि मानव इच्छा अनुग्रह की कुछ सहायता पाकर भी अपने आप भली हो सकती है। वह कहता है कि मैं यह मत अति तक खींच ले जाता हूँ जब मैं कहता हूँ कि मानव हृदय में कोई भी भलाई उत्पन्न होने के लिए परमेश्वर को उसे पूरी तरह बदलना पड़ता है। मैं भविष्यद्वक्ता यहेजकेल का हवाला देता हूँ जहाँ परमेश्वर कहता है, "मैं तुम को नया हृदय दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा बसाऊँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूँगा" (यहेजकेल 36:26)। इससे मेरा अभिप्राय यह है कि परमेश्वर किसी ऐसी मानव इच्छा को मात्र सहारा नहीं देता जो स्वभाव से दुर्बल तो है परन्तु भलाई की ओर झुकी हुई है। परन्तु वह उसे पूरी तरह नया कर देता है, क्योंकि इस परिवर्तन के बिना मानव हृदय कोई सच्ची भलाई उत्पन्न नहीं कर सकता।
परन्तु पिगियस इस मत को ठुकरा देता है, और मुझ पर लोगों को भटकाने और पवित्रशास्त्र को तोड़ने-मरोड़ने का दोष लगाता है। उसका तर्क है कि यहेजकेल में लोगों को जो आज्ञा दी गई है कि "अपने अधर्म के कामों को दूर करो" और "अपने लिए नया हृदय बना लो" (यहेजकेल 18:31), वह मानवीय सामर्थ्य और उत्तरदायित्व की ओर संकेत करती है। वह हठ करता है कि इन आज्ञाओं का अर्थ यह है कि लोग अनुग्रह के सहयोग से अपने परिवर्तन को आंशिक रूप से स्वयं सम्पन्न कर सकते हैं। वह मान बैठता है कि यदि परमेश्वर कुछ आज्ञा देता है तो वह मनुष्य के प्रयास से सम्भव अवश्य होगा, भले ही अनुग्रह उसकी सहायता करता हो।
फिर भी पिगियस एक निर्णायक सत्य को अनदेखा कर देता है: परमेश्वर की व्यवस्था का उद्देश्य मानव की अक्षमता को प्रकट करना है, न कि मानव की सामर्थ्य की पुष्टि करना। जैसा पौलुस सिखाता है, व्यवस्था अन्ततः "मार डालती है" (2 कुरिन्थियों 3:6), क्योंकि परमेश्वर के आत्मा के बिना हम उसे पूरा करने में असमर्थ हैं। व्यवस्था की आज्ञाएँ हमें दीन बनाने के लिए हैं, ताकि अपनी असफलता और अपनी आवश्यकता को देखकर हम अनुग्रह की खोज करें।
इसी कारण यिर्मयाह एक नई वाचा की भविष्यद्वाणी करता है, जिसमें परमेश्वर अपनी आज्ञाओं का केवल बाहर से प्रचार नहीं करेगा, परन्तु उन्हें सीधे हमारे हृदयों पर लिखेगा (यिर्मयाह 31:33)। बाहरी आज्ञाओं पर आधारित पुरानी वाचा मानव विद्रोह के कारण निभाई न जा सकी। परन्तु नई वाचा यह प्रतिज्ञा करती है कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था हमारे भीतर लिखेगा, और अपने आत्मा के द्वारा हमें भीतर से बाहर तक बदल देगा।
यदि पिगियस मानव दुर्बलता की गहराई और परमेश्वर पर हमारी निर्भरता को समझ लेता, तो वह यह न मान बैठता कि आज्ञा दिया जाना ही सामर्थ्य का सूचक है। इसके स्थान पर वह यह पहचान लेता, जैसा पवित्रशास्त्र दिखाता है, कि सच्ची आज्ञाकारिता केवल उसी हृदय के द्वारा सम्भव है जो परमेश्वर के आत्मा से बदल दिया गया हो।
पिगियस का तर्क है कि यदि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ यह दिखाती हैं कि मन-फिराव केवल परमेश्वर का काम है, तो आज्ञाओं का अर्थ यह है कि हम परमेश्वर की सहायता के बिना अपने बल से पूरी आज्ञाकारिता कर सकते हैं, क्योंकि आज्ञाएँ हम पर माँगें रखती हैं और अनुग्रह का स्पष्ट उल्लेख नहीं करतीं। परन्तु वह परमेश्वर की आज्ञाओं का उद्देश्य बिलकुल चूक जाता है। व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि हम उसे अपनी शक्ति से पूरा कर सकते हैं, परन्तु यह कि वह हमें हमारी दुर्बलता दिखाए और हमें परमेश्वर के अनुग्रह पर भरोसा रखने की ओर ले जाए। इसके विपरीत प्रतिज्ञाएँ दिखाती हैं कि हम में अपना कार्य परमेश्वर ही पूरा करता है। वह कहता है, "मैं तुम को नया हृदय दूँगा... और ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे" (यहेजकेल 36:26-27)। ये प्रतिज्ञाएँ सारा उत्तरदायित्व परमेश्वर पर रखती हैं और अपनी पूर्ति के लिए मानवीय प्रयास पर निर्भर नहीं हैं।
आज्ञाएँ देकर परमेश्वर हमें कोई नई शक्ति नहीं देता, और न हम में किसी सामर्थ्य की सराहना करता है। इसके विपरीत वह हमें हमारी अक्षमता दिखाता है, ताकि हम जान लें कि जिस सहायता की हमें आवश्यकता है उसे हमें अपने से बाहर खोजना होगा। परमेश्वर के कार्य और हमारे प्रयासों के बीच "मध्यम" सन्तुलन ठहराने का पिगियस का प्रयत्न भ्रामक है। प्रतिज्ञाएँ हमें परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण कार्य की ओर संकेत करती हैं, जबकि व्यवस्था हमारी पूर्ण अपर्याप्तता को प्रकट करके हमें उसके अनुग्रह की खोज की ओर धकेलती है।
पिगियस का यह विचार कि हमारे आत्मिक नवीकरण में हम परमेश्वर के साथ मिलकर कार्य करते हैं, एक ख़तरनाक मिश्रण है। वह यह सुझाता है कि हमारी आत्मा के परिवर्तन के कार्य में परमेश्वर और मनुष्य की भूमिका बराबर है। उसके अनुसार परमेश्वर हमें परिवर्तित करता है, परन्तु हम अपने आप को भी परिवर्तित करते हैं; हम अपने पापी स्वभाव को क्रूस पर चढ़ाते हैं, फिर भी परमेश्वर हमें नया करता है। वह इस कल्पित समानता को इस बात से निकालता है कि परमेश्वर हमें वही करने की आज्ञा देता है जिसे पूरा करने की वह प्रतिज्ञा भी करता है। परन्तु परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हमें उस बात का आश्वासन देती हैं जो वह अकेला करेगा। दूसरी ओर आज्ञाएँ हमारी सामर्थ्यहीनता को प्रकट करती हैं और इसलिए दी गई हैं कि हमें पूरी तरह परमेश्वर के बल पर निर्भर होने को प्रेरित करें, न कि अपनी किसी काल्पनिक क्षमता पर।
जब मैं कहता हूँ कि मानव हृदय को "पथरीला" कहने का अर्थ यह है कि उससे कोई भलाई निकलने के लिए उसे पूरी तरह बदलना होगा, तो पिगियस तीव्र प्रतिक्रिया करता है, मानो अविश्वास से स्तब्ध हो गया हो। वह मान लेता है कि मैं हृदय के स्वभाव या गुण की नहीं, परन्तु उसके तत्त्व की बात कर रहा हूँ। वह कल्पना करता है कि मेरा सुझाव यह है कि परमेश्वर के बदलने से पहले हृदय सचमुच पत्थर ही है। परन्तु भविष्यद्वक्ता का "पत्थर के हृदय" का "मांस के हृदय" में बदलने वाला रूपक स्पष्ट रूप से उसके स्वभाव या प्रवृत्ति के परिवर्तन की ओर संकेत करता है, न कि उसके पदार्थ के परिवर्तन की ओर।
पिगियस मुझे उस तर्क से फँसाने का यत्न करता है जिसे वह चतुराई भरा समझता है। चूँकि मैं मानता हूँ कि पवित्रशास्त्र में हृदय प्रायः इच्छा का प्रतीक होता है, इसलिए वह कहता है कि मैं इच्छा करने की शक्ति या क्षमता के ही परिवर्तन का दावा कर रहा होऊँगा। परन्तु पिगियस भूल से इच्छा करने की सामर्थ्य को उस इच्छा के नैतिक चरित्र के बराबर ठहरा देता है। अपने उत्तर में मैं एक तार्किक भेद खींचता हूँ जिसे दर्शनशास्त्र का एक आरम्भिक विद्यार्थी भी समझ ले: इच्छा के तत्त्व (चुनने की क्षमता) और उसके नैतिक झुकाव (वह कैसी इच्छा करती है) के बीच का भेद।
सरल श्रेणियों का प्रयोग करके मैंने यह स्पष्ट किया कि इच्छा स्वयं सब मनुष्यों में एक-सी रहती है, परन्तु उसका चरित्र भिन्न-भिन्न होता है। इच्छा भलाई या बुराई की ओर झुक सकती है, यह इस पर निर्भर है कि वह स्वभाव से भ्रष्ट है या परमेश्वर के आत्मा से नई की गई है। इस भेद को समझना कठिन नहीं है, और हृदय के परिवर्तन विषयक बाइबल की शिक्षा का यह आधार है।
दाऊद की परमेश्वर से यह विनती, "हे परमेश्वर, मेरे भीतर शुद्ध मन उत्पन्न कर" (भजन संहिता 51:10), इसी समझ को प्रकट करती है। दाऊद न तो नया शारीरिक हृदय माँगता है, न इच्छा करने की कोई नई शक्ति, परन्तु ऐसी नई आत्मा माँगता है जो धार्मिकता की ओर झुकी हो। पवित्रशास्त्र इसी गहन परिवर्तन का, अर्थात् अब परमेश्वर की आज्ञा मानने की ओर झुके हुए हृदय का, गुणगान करता है। अन्त में पिगियस की आपत्तियाँ निष्प्रभाव हो जाती हैं, क्योंकि वह पवित्रशास्त्र के अभिप्राय और सच्चे आत्मिक नवीकरण के स्वरूप, दोनों को ही नहीं समझता।
सारांश में, मेरा कहना यह है कि मानव इच्छा परमेश्वर की रचना से बुरी नहीं है, परन्तु पाप से भ्रष्ट हुई है। यह भ्रष्टता तब तक बनी रहती है जब तक परमेश्वर का अनुग्रह पवित्र आत्मा के द्वारा उसे बदल न दे। यह परिवर्तन इच्छा का स्वयं बदल दिया जाना नहीं, परन्तु उसकी प्रवृत्ति का नवीकरण है, जिससे वह विद्रोह के स्थान पर धार्मिकता की ओर झुक जाती है। जब दाऊद "नए हृदय" के लिए प्रार्थना करता है (भजन संहिता 51:10), तो वह इसी आन्तरिक परिवर्तन को माँग रहा है, न कि अपने हृदय के तत्त्व को बदले जाने को। फिर भी पिगियस ग़लत समझता है, और मुझ पर यह दोष लगाता है कि मैं सुझाता हूँ कि हृदय का वास्तविक सार ही बदल दिया जाता है।
पिगियस "पत्थर के हृदय" के "मांस के हृदय" में बदलने के बाइबल के चित्र (यहेजकेल 36:26) की व्याख्या केवल हमारे लिए इस आह्वान के रूप में करता है कि हम अपने हृदय कोमल कर लें, मानो अपने आप को आत्मिक रूप से संवेदनशील बना लेने की सामर्थ्य हमारे पास हो। परन्तु पवित्रशास्त्र दिखाता है कि हमारे कठोर हृदयों को परमेश्वर ही बदलता है। यहेजकेल में प्रभु "पत्थर के हृदय" को निकालने की बात कहता है, जो परमेश्वर के प्रति हमारे स्वाभाविक, हठीले विरोध का रूपक है, और "मांस का हृदय" देने की, जो ऐसी नई प्रवृत्ति है जो उसकी आज्ञाओं के प्रति स्वेच्छा से उत्तर देती है। परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह हमसे अपने मार्गों पर चलवाएगा, केवल यह विकल्प नहीं देगा। अनुग्रह से होने वाला यह परिवर्तन हमें वास्तव में उसकी आज्ञाओं पर चलने की ओर ले जाता है, न कि केवल ऐसा करने की सम्भावना रखने की ओर।
इस ईश्वरीय कार्य को घटाकर पिगियस अनुग्रह की सामर्थ्य और आवश्यकता को कम कर देता है। वह परमेश्वर की प्रतिज्ञा को केवल समर्थ बनाने तक सीमित कर देता है, मानो परमेश्वर की भूमिका बस हमें आज्ञाकारिता के योग्य बना देना हो, उस आज्ञाकारिता को हम में सुनिश्चित किए बिना। परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि वह अपनी व्यवस्था हमारे हृदयों पर लिखेगा (यिर्मयाह 31:33), जिसका अर्थ है कि वह वास्तव में हमें अपनी धार्मिकता से प्रेम करने के लिए गढ़ेगा। यह इच्छा की प्रवृत्ति का वह परिवर्तन है जो हमें परमेश्वर के मार्गों के अनुसार चाहने और करने में समर्थ बनाता है।
पिगियस के इस दावे के विपरीत कि आत्मिक कठोरता केवल एक बुरी आदत है, पवित्रशास्त्र उसे हमारे भ्रष्ट स्वभाव के कारण समस्त मानवजाति में निहित विद्रोह के रूप में प्रकट करता है। केवल परमेश्वर का अनुग्रह ही इस दशा को बदल सकता है, और हमारे स्वाभाविक विरोध के स्थान पर ऐसा हृदय देता है जो उसके पीछे चलने को तैयार हो। इस परिवर्तन को हम अपने आप सिद्ध नहीं कर सकते, परन्तु यह पूरी तरह ईश्वरीय अनुग्रह का कार्य है।
अपनी बात स्पष्ट करने के लिए: भविष्यद्वक्ता यह साफ़ कर देता है कि मानव इच्छा केवल दुर्बल ही नहीं है कि भली बातों की अभिलाषा करने के लिए उसे अतिरिक्त सहायता चाहिए। अगस्तीन अनुग्रह और स्वतन्त्र चुनाव में और विटालिस को लिखे अपने पत्र में यह समझाता है, और तर्क देता है कि हमारी इच्छा किसी ऐसे भले आवेग से आरम्भ नहीं होती जिसकी परमेश्वर केवल सहायता करता हो; परन्तु वह पूरी तरह भ्रष्ट और परमेश्वर की विरोधी है, जब तक परमेश्वर उसे बदल न दे।
जब मैं कहता हूँ कि नया जन्म होने में "जो कुछ हमारा है" उसे दूर किया जाना चाहिए, तो पिगियस मेरी बात का यह अर्थ निकालता है कि जब हम परमेश्वर की ओर फिरते हैं तब देह और आत्मा दोनों का सर्वनाश हो जाता है। परन्तु मेरा यह अभिप्राय नहीं है। अगस्तीन ने इसे भली-भाँति कहा जब उसने कहा कि हमारे पास जो भी धार्मिकता है वह परमेश्वर की ओर से है, जबकि जिसे हम अपना कह सकते हैं वह केवल पाप है (यूहन्ना पर प्रवचन 49)। "जो कुछ हमारा है" से मेरा अर्थ वह पापमय भ्रष्टता है जो पतन के परिणामस्वरूप हमारे स्वभाव में समाई हुई है, और जो हमारे हर अंग को प्रभावित करती है।
तब पिगियस यह तर्क करता है कि यदि हमारे तर्क और इच्छा को पूर्ण नवीकरण की आवश्यकता है, तो इसका अर्थ यह होगा कि हमारी आत्मा ही बदल दी जानी चाहिए, क्योंकि तर्क करना और इच्छा करना आत्मा से अविभाज्य हैं। परन्तु वह इस बात को अनदेखा करता है कि पाप के कारण ये क्षमताएँ भ्रष्ट गुण धारण कर सकती हैं। आत्मा को स्वयं बदले जाने की आवश्यकता नहीं, परन्तु उसका तर्क करना और इच्छा करना पाप से दूषित हैं और उन्हें नया किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए मैं यह मानता हूँ कि चूँकि पाप ने हमारी आत्मा की शक्तियों को पूरी तरह दूषित कर दिया है, इसलिए हम में जो कुछ भ्रष्ट हुआ है, उस सब को फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका अर्थ नई आत्मा नहीं, परन्तु हमारे भीतर एक नई, शुद्ध की हुई प्रवृत्ति है।
अपने तर्क का सार यह है: मैं मानता हूँ कि इच्छा, जो स्वभाव से परमेश्वर से विमुख है, केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से ही उसके पास लाई जाती है। इच्छा की कोई सक्रिय भूमिका नहीं, सिवाय इसके कि परमेश्वर का आत्मा उसे जैसा चलाए। अगस्तीन इसी सत्य को व्यक्त करता है जब वह कहता है कि इच्छा अनुगमन करती है, अगुवाई नहीं। इस दृष्टि में हमारी इच्छा में जो भी भली अभिलाषा है वह केवल आत्मा के नवीकरण से ही उत्पन्न होती है।
पिगियस मेरे मत को परमेश्वर का अपमान समझता है, और कहता है कि इसका अर्थ यह है कि भ्रष्ट स्वभाव के कारण इच्छा का परमेश्वर से अलग रहना अनिवार्य है। परन्तु मैं पहले ही समझा चुका हूँ कि मानवजाति की पापमय दशा हमारा अपना किया हुआ है, परमेश्वर का दोष नहीं। पवित्रशास्त्र मेरे कुछ कहे बिना भी मनुष्यों के हृदयों की बुराई की निरन्तर पुष्टि करता है।
पिगियस मेरे इस दावे को भी चुनौती देता है कि इच्छा जब तक नई न की जाए तब तक अपने मन-फिराव में कोई योगदान नहीं देती। वह पूछता है, "यदि मन-फिराव केवल परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर है, कि वह जहाँ, जब और जैसे चाहे, तो वह हमें बार-बार अपनी ओर फिरने के लिए क्यों बुलाता है?" वह कहता है, क्या यह अन्याय नहीं, ठीक वैसे ही जैसे किसी निर्धन से वह ऋण चुकाने को कहना जो वह चुका नहीं सकता?
परन्तु परमेश्वर हमें मन-फिराव के लिए उस रीति से नहीं बुलाता जैसा पिगियस सुझाता है। जब परमेश्वर हमें अपनी ओर फिरने की आज्ञा देता है, तो वह खोखली माँगें नहीं रखता; वरन् अपनी आज्ञा से हमें अपनी प्रतिज्ञा ग्रहण करने के लिए तैयार करता है। अपने आत्मा के द्वारा परमेश्वर अपने वचन हमारे हृदयों पर लिखता है, इसलिए अपनी ओर फिरने का आह्वान केवल सुना नहीं जाता, परन्तु आत्मा के द्वारा प्रभावशाली बनाया जाता है। इसलिए यह कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा कहा भी जाता है और सिद्ध भी किया जाता है, जो अपने आह्वान से हमें भीतर से बदलता है (2 कुरिन्थियों 3)। यह हमारा काम नहीं कि परमेश्वर को बताएँ कि वह कैसे कार्य करे, परन्तु यह कि हमें बुलाने और परिवर्तित करने में जैसी उसकी इच्छा है, उसकी बुद्धि के अधीन रहें।
पिगियस के इस प्रश्न के उत्तर में कि परमेश्वर त्यागे हुए लोगों को, जिन्हें सच्चे विश्वास के स्थान पर केवल "मृत अक्षर" मिलता है, अपना वचन क्यों देता है, मैं यह कहता हूँ: परमेश्वर की शिक्षा का उद्देश्य सदा विश्वास करनेवालों के लिए उद्धार लाना है। परन्तु जो उसे ठुकराते हैं, उनके लिए वह अनुग्रह का नहीं, न्याय का साधन बन जाती है। पिगियस, फिर भी, यह मान लेता है कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्य समान रूप से उसकी ओर फिरें और इसलिए अनुग्रह सब को बिना भेदभाव के देता है, और उद्धार को इस पर निर्भर कर देता है कि वे उसे स्वीकारें या ठुकराएँ। वह मन-फिराव के भविष्यद्वाणी-आह्वानों की, जैसे "लौट आओ, मैं तुम्हें चंगा करूँगा" (यिर्मयाह 3:22) या "लौट आओ, और मैं तुम से अपना मुँह न फेरूँगा" (यिर्मयाह 18:11), इस प्रकार व्याख्या करता है मानो वे यह जताते हों कि परमेश्वर के कार्य करने से पहले लोगों को अपनी ही पहल से फिरना होगा।
मैं मन-फिराव के इन आह्वानों को भिन्न रूप में देखता हूँ। ये इस बात के आश्वासन हैं कि यदि किसी मनुष्य का हृदय परमेश्वर की ओर लौट आए, तो वह उसे क्षमा करेगा और पुनः स्थापित करेगा। परन्तु क्योंकि मन-फिराव अपने सार में "आत्मिक पुनरुत्थान" है, इसलिए मेरा मानना है कि मनुष्य के लिए अपने आप यह परिवर्तन ले आना उतना ही उसके वश में नहीं है जितना अपने आप को जीवन दे देना। सच्चा मन-फिराव परमेश्वर का कार्य है; यह वह परिवर्तन है जिसे केवल वही सम्पन्न कर सकता है।
तब पिगियस पूछता है कि यदि मन-फिराव मानव सामर्थ्य से परे है तो भविष्यद्वक्ता लोगों को मन-फिराव के लिए क्यों बुलाते हैं। कारण यह है कि परमेश्वर ने बाहरी प्रचार के द्वारा कार्य करना चुना है, यद्यपि वह इस आन्तरिक परिवर्तन को अपने आत्मा से अकेले पूरा करने में पूरी तरह समर्थ है। जब उसका वचन प्रचार किया जाता है, तब परमेश्वर प्रायः इन्हीं सत्यों को लोगों के हृदयों पर लिख देता है, और पवित्र आत्मा के द्वारा अपने सन्देश को आत्मिक रूप से जीवित और प्रभावशाली बना देता है।
पिगियस यह भी तर्क करता है कि परमेश्वर अपनी कृपा दिखाने से पहले दीनता और मन-फिराव की माँग करता है, और यशायाह का हवाला देता है: "मैं उसी की ओर दृष्टि करूँगा जो दीन और खेदित मन का हो" (यशायाह 66:2)। परन्तु यह अपेक्षा परमेश्वर के सर्वसत्ताधारी अनुग्रह के विरुद्ध नहीं है। जैसा मैंने अपनी इंस्टीट्यूट्स में समझाया है, परमेश्वर दो प्रकार से मनुष्यों की ओर दृष्टि करता है: एक अर्थ में, वह तब कृपा दिखाता है जब वह लोगों का मन-फिराव और दीनता देखता है; दूसरे अर्थ में, वह तब भी अनुग्रह बढ़ाता है जब वे अब भी उसके विरुद्ध विद्रोह में हों। उदाहरण के लिए, पौलुस हमें बताता है कि रोमी और इफिसी लोग परमेश्वर से तब मिलाए गए जब वे अब भी उसके शत्रु थे, पाप में जीते थे और आशारहित थे। परमेश्वर की दया का यह स्वरूप पौलुस की पत्रियों में सर्वत्र प्रकट है। स्वयं पौलुस दमिश्क के मार्ग पर परमेश्वर के हस्तक्षेप से बदला गया, इसलिए नहीं कि वह परमेश्वर को खोज रहा था, परन्तु तब जब वह उसका सक्रिय विरोध कर रहा था। परमेश्वर ने केवल पौलुस के कानों को नहीं पुकारा; उसने पवित्र आत्मा के द्वारा आज्ञाकारिता की अपनी व्यवस्था पौलुस के हृदय पर लिख दी, और उसे वहाँ स्वेच्छुक बना दिया जहाँ वह अनिच्छुक था।
इसलिए मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि परमेश्वर अपने अनुग्रह में हृदयों को बदलता और लोगों को अपनी ओर खींचता है, इसलिए नहीं कि वे अपने आप को तैयार करते हैं, परन्तु अपनी सर्वसत्ताधारी पहल से।
भविष्यद्वक्ता का यह वचन, "जिन्होंने मुझे नहीं ढूँढ़ा उन्होंने मुझे पाया," और पौलुस की यह व्याख्या कि अन्यजातियों ने धार्मिकता पाई यद्यपि वे उसे ढूँढ़ नहीं रहे थे, यह उजागर करते हैं कि परमेश्वर प्रायः उन तक पहुँचता है जिन्होंने पहले उसकी कोई खोज नहीं की थी (रोमियों 10:20)। यह आरम्भ से ही सत्य रहा है, अब्राहम और उसके वंशजों के लिए भी, जो आरम्भ में परमेश्वर को नहीं ढूँढ़ रहे थे, परन्तु अनुग्रह से उसके द्वारा निकट खींचे गए। इससे प्रकट होता है कि परमेश्वर द्वारा लोगों को ग्रहण किया जाना दो प्रकार से होता है। पहला, वह अपने चुने हुए लोगों से उनके अपने पास बुलाए जाने से भी पहले प्रेम और कृपा रखता है, और यह प्रेम मसीह के द्वारा दिया जाता है। फिर जब वह उन्हें बुलाता है, तब इस प्रेम को प्रकट करता है, कि वे उसे पहचानें और उसका आनन्द लें।
जब परमेश्वर लोगों को अपने पास बुलाता है, तो यह उनके मन-फिराव और विश्वास में प्रकट होता है। मन-फिराव का आरम्भ अपने आप से दीनतापूर्वक असन्तुष्ट होने में है, जो कोमल, सीखने को तत्पर आत्मा की ओर ले जाता है। इस बिन्दु पर परमेश्वर लोगों की ओर अपनी दृष्टि ऐसे ढंग से प्रकट करता है जिसे वे व्यक्तिगत रूप से समझ सकें; वह अपने आप को उनके पिता के रूप में प्रकट करता है और उन पर अपनी भलाई की पुष्टि करता है।
परन्तु पिगियस का तर्क है कि परमेश्वर पापी को केवल फिरने के लिए प्रोत्साहित करता है, उसे अपनी सामर्थ्य से फिराता नहीं। पिगियस के अनुसार परमेश्वर की ओर लौटना हम पर निर्भर है, और जब हम फिर जाते हैं उसके बाद ही परमेश्वर हमें ग्रहण करता और जीवन देता है। इस दृष्टि में परमेश्वर की भूमिका केवल प्रबोधन तक सिमट जाती है, मानो वह हमें केवल उकसाता हो, सक्रिय रूप से समर्थ नहीं बनाता। यह शिक्षा मूलतः वही है जो पेलागियस ने फैलाई थी, कि मनुष्यों को परमेश्वर की ओर लौटने में पहल करनी चाहिए, और परमेश्वर केवल बाद में सहायता करता है। यद्यपि पिगियस मानता है कि परमेश्वर सहायता देता है, फिर भी वह हठ करता है कि मनुष्य को पहले प्रयास करना होगा, इस प्रकार मनुष्य को प्रमुख भूमिका देकर परमेश्वर को गौण स्थान पर धकेल देता है।
कुछ आगे चलकर पिगियस इस विषय में कि परमेश्वर हमें कैसे परिवर्तित करता है, पेलागियस से भी आगे निकल जाता है। वह तर्क करता है कि लोगों को परिवर्तित करने की परमेश्वर की रीति में केवल बाहरी कार्य सम्मिलित हैं: दण्ड रोककर धीरज दिखाना, मन-फिराव के लिए समय देना, और प्रोत्साहन, आशीषों और यहाँ तक कि ताड़ना जैसे नाना साधनों का उपयोग करना। इस दृष्टि में परिवर्तन में परमेश्वर के अनुग्रह का सारा कार्य बाहरी प्रभावों तक सीमित हो जाता है, और हृदय को नया करने और बदलने में पवित्र आत्मा के आन्तरिक कार्य का कोई उल्लेख ही नहीं रहता।
परिवर्तन की ऐसी परिभाषा करके पिगियस यह सुझाता है कि परमेश्वर का प्रभाव पूरी तरह बाहरी है, और इस प्रकार प्रभावी रूप से इससे इनकार कर देता है कि आत्मा की सामर्थ्य से हृदय का कोई आन्तरिक परिवर्तन या नवीकरण होता है। पवित्र आत्मा के कार्य पर उसकी चुप्पी यह जताती है कि वह परिवर्तन के इस अनिवार्य पक्ष को ठुकराता है, मानो भीतर के परिवर्तन के बिना केवल बाहरी साधनों के प्रयोग से सच्चा मन-फिराव और विश्वास आ सकता हो। आत्मा की भूमिका की यह उपेक्षा केवल एक चूक नहीं है; यह इस बात की मौलिक ग़लतफ़हमी को प्रकट करती है कि अनुग्रह विश्वासी के हृदय में कितनी गहराई से कार्य करता है।
पिगियस इस तर्क के समर्थन में कि लोग अपना मन-फिराव स्वयं आरम्भ करते हैं, पवित्रशास्त्र का उपयोग करने का प्रयत्न करता है। उदाहरण के लिए वह यिर्मयाह का हवाला देता है: "यदि तू फिरे तो मैं तुझे फिराऊँगा" (यिर्मयाह 15)। परन्तु पिगियस प्रसंग को ग़लत समझता है। इस अंश में परमेश्वर भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह से बोल रहा है, जो निराशा से अभिभूत होकर अपनी बुलाहट पर सन्देह करने लगता है। परमेश्वर उत्तर देता है, और उसे भरोसे और आज्ञाकारिता की ओर लौटने को प्रोत्साहित करता है, तथा प्रतिज्ञा करता है कि वह यिर्मयाह के विश्वास और संकल्प को पुनः स्थापित करेगा।
"यदि तू फिरे तो मैं तुझे फिराऊँगा" कहकर परमेश्वर यह नहीं जता रहा कि यिर्मयाह अपना परिवर्तन स्वयं आरम्भ करता है, परन्तु यह कि विश्वासयोग्यता की ओर कोई भी वापसी अन्ततः परमेश्वर के अपने समर्थ बनाने से ही होगी। यह वाक्यांश परमेश्वर के अनुग्रह की कोमल स्मरण-दिलाहट है: यदि यिर्मयाह लौटता है, तो इसलिए कि परमेश्वर ने अनुग्रह करके उसे लौटाया है।
पिगियस पवित्रशास्त्र के और भी हवाले इकट्ठे करता है जिनमें परमेश्वर उन लोगों के हठ को डाँटता है जो उसकी भलाई का विरोध करते हैं, और इससे यह तर्क करता है कि यदि लोग न फिरने के कारण दोषी ठहराए जाते हैं, तो परमेश्वर की ओर फिरना उन्हीं की उपलब्धि होनी चाहिए। परन्तु यद्यपि पवित्रशास्त्र यह प्रकट करता है कि लोग अपने पापमय स्वभाव के कारण परमेश्वर का विरोध करते हैं, तथापि वह यह भी स्पष्ट कहता है कि सच्चा मन-फिराव पवित्र आत्मा का कार्य है। इसलिए हठ तो मानव हृदय से आता है, परन्तु मन-फिराने और परमेश्वर की ओर लौटने की सामर्थ्य पूरी तरह परमेश्वर का दान है, मानवीय बल का कार्य नहीं।
यदि पिगियस की आपत्ति मान्य होती, तो उसे यह प्रमाणित करना पड़ता कि मेरी शिक्षा मनुष्यों को निराशा की ओर धकेलती है, जैसे इस्राएल ने विलाप किया था, "हमारे अपराध और पाप हम पर लदे हैं, और हम उनके कारण नाश हो रहे हैं" (यहेजकेल 33:10)। वह तर्क करता है कि यदि हमारे हृदयों को केवल परमेश्वर फिराता है, तो पापी निराश हो सकता है, यह मानकर कि जब तक परमेश्वर उसे उठाना न चाहे वह नाश होने को ठहराया गया है। परन्तु यह घोर ग़लतफ़हमी है। जब हम अपनी निज दुर्बलता और अक्षमता को पहचानते हैं, तो वह निराशा की ओर नहीं ले जाती, परन्तु हमें परमेश्वर की दया खोजने की ओर निर्देशित करती है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए यह सत्य आशा का स्रोत है, क्योंकि वे अपनी ओर नहीं, परन्तु उस अनुग्रह और बल की ओर देखते हैं जिसे परमेश्वर देने की प्रतिज्ञा करता है। त्यागे हुए लोगों के लिए, जो कठोर बने रहते हैं, उनका विनाश परमेश्वर की उपेक्षा से नहीं होता, परन्तु वह उनके अपने दोष और ईश्वरीय बुलाहट को ठुकराने की साक्षी है।
यहेजकेल के उस अंश के प्रसंग पर विचार करें जिसका पिगियस हवाला देता है। लोगों की शिकायत सच्ची दीनता या पश्चाताप से नहीं उपजी थी; वह परमेश्वर के न्यायदण्डों से क्रुद्ध कठोर हृदयों से निकली थी। उनका प्रश्न, "यदि परमेश्वर ने हमारा विनाश पहले ही ठहरा दिया है तो हम मन क्यों फिराएँ?" विद्रोह की आत्मा को प्रकट करता है, मन-फिराव को नहीं। परमेश्वर का उत्तर, "मैं दुष्ट के मरने से प्रसन्न नहीं होता" (यहेजकेल 33:11), उद्धार पर मानवीय अधिकार का कथन नहीं है। यह परमेश्वर की दया की, और भटके हुओं के प्रति मेल-मिलाप के उसके निरन्तर प्रस्ताव की घोषणा है। पिगियस अपने अन्धेपन में कल्पना करता है कि इसका अर्थ यह है कि उद्धार किसी न किसी प्रकार हमारे नियन्त्रण में है। परन्तु सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र से स्पष्ट है कि केवल परमेश्वर का आत्मा ही हृदय को कोमल कर सकता है, ताकि मन-फिराव के लिए उसका आह्वान फलदायी हो।
पिगियस आगे नीनवे के राजा की उस आज्ञा की ओर संकेत करता है जो उसने योना की चेतावनी के उत्तर में दी थी, मानो यह जताने के लिए कि "बुराई से फिरो" की आज्ञा का अर्थ है कि मन-फिराव हमारी अपनी पहुँच में है। यहाँ फिर वह पाठ को ग़लत समझता है। राजा का मन-फिराव का आह्वान निश्चय ही उसका कर्तव्य था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि केवल मानवीय बल ही परिवर्तन ला सकता है। भविष्यद्वक्ताओं, पासबानों और राजाओं को समान रूप से पापियों को मन-फिराव के लिए बुलाना चाहिए, फिर भी मृत आत्मा को जीवन केवल परमेश्वर ही देता है। राजा की आज्ञा का अर्थ यह नहीं था कि वह या लोग केवल इच्छाशक्ति के बल से अपने आप को परमेश्वर की ओर फिरा सकते थे; वह ईश्वरीय दया के लिए एक विनती थी, जिसका परमेश्वर ने अनुग्रह से उत्तर दिया। जैसे परमेश्वर मन-फिराने का अनुग्रह देता है, वैसे ही वह उस मन-फिराव को मानवीय योग्यता के नहीं, परन्तु हम में अपने आत्मा के कार्य के रूप में ग्रहण करना भी चुनता है।
अन्त में पिगियस का दावा है कि नीनवेवासियों के मन-फिराव को परमेश्वर ने ऐसे प्रतिफल दिया मानो वह उनकी अपनी सामर्थ्य का फल हो, मानो केवल मानवीय प्रयास ने नगर को बचा लिया हो। फिर भी उनका मन-फिराव भी परमेश्वर का दान था, जिसने उनके हृदयों में कार्य किया और केवल दया के कार्य के रूप में अपना क्रोध रोक लिया। यहाँ मैं अगस्तीन से सहमत हूँ, जो कहता है, "यदि हमारे पुण्य हमारी ओर से हैं तो वे बुरे हैं; उनके भले होने के लिए उन्हें परमेश्वर के दान होना होगा" (अनुग्रह और स्वतन्त्र चुनाव, अध्याय 6)। प्रभु हम में अपने ही कार्य को मुकुट पहनाता है, और उस भलाई को स्वीकार करता है जिसे उसने स्वयं हमारे हृदयों में जीवित किया है। इस प्रकार परमेश्वर की दया मानवीय परिश्रम का प्रतिफल नहीं, परन्तु उन पर उसकी भलाई का उमड़ाव है जो पूरी तरह उस पर निर्भर हैं। पिगियस अगस्तीन से सीखे: हम में जो भलाई है वह हमारे घमण्ड की नहीं; वह केवल परमेश्वर की है, जो उसे देता, सम्भालता और उसे मुकुट पहनाता है।
पिगियस तर्क करता है कि जब यीशु कफरनहूम से कहता है, "जो सामर्थ्य के काम तुम में किए गए, यदि वे सूर और सैदा में या सदोम में किए जाते, तो वे टाट ओढ़कर और राख में बैठकर कब का मन फिरा लेते" (मत्ती 11:21-23), तो इसका अर्थ यह है कि यदि परमेश्वर उन नगरों को वे ही चमत्कार दिखाता तो उन्हें मन-फिराव प्रदान करता। वह कहता है, यदि यह सच है तो परमेश्वर ने वहाँ चमत्कार क्यों नहीं किए जब वह जानता था कि वे मन फिराएँगे? और कफरनहूम को चमत्कार क्यों दिए जबकि वे उन्हें ठुकराने वाले थे?
इसके उत्तर में मैं कहूँगा कि यीशु यहाँ यह चर्चा नहीं कर रहा कि कुछ को मन-फिराव क्यों दिया जाता है और दूसरों को क्यों नहीं। वह इस पर प्रकाश डाल रहा है कि कफरनहूम अपने को मिले भरपूर चिह्नों और शिक्षाओं के बावजूद कितना कठोर हो गया है। वह उनकी तुलना अन्य नगरों से करता है, और कहता है कि सबसे हठीले हृदय भी वही चमत्कार देखकर मन फिरा लेते। यीशु यह नहीं जता रहा कि परमेश्वर ने सूर, सैदा या सदोम को मन-फिराव से रोके रखने के लिए चमत्कार रोक लिए। वह तो उन लोगों के विशेष विशेषाधिकार और उत्तरदायित्व पर बल देता है जो सुसमाचार को सुनते और परमेश्वर के कार्यों को देखते हैं, फिर भी अडिग बने रहते हैं।
यदि पिगियस "वे मन फिरा लेते" वाक्यांश पर ज़ोर देता ही रहे, तो उसे इस प्रश्न का उत्तर देना होगा: यदि परमेश्वर जानता था कि वे नगर उसके सन्देश का उत्तर देंगे, तो उसने उन्हें वही अवसर क्यों नहीं दिए जो कफरनहूम को दिए? पिगियस का तर्क उसे अपने ही तर्कों के जाल में उलझा छोड़ता है।
इसके बाद पिगियस परमेश्वर की आज्ञाओं को इस बात के प्रमाण के रूप में गिनाता है कि हमारे पास अपने हृदयों को तैयार करने और परमेश्वर की बुलाहट का उत्तर देने की सामर्थ्य अवश्य है। वह तर्क करता है कि परमेश्वर का ऐसी बातों की आज्ञा देना जो हमारे पूरा कर सकने से परे हों "पागलपन" होगा। वह यिर्मयाह के शब्द उद्धृत करता है: "आओ, हम अपने चालचलन को ढूँढ़ें और जाँचें, और यहोवा की ओर फिरें; आओ, हम स्वर्ग में वास करनेवाले परमेश्वर की ओर हाथ फैलाकर अपने मन को उठाएँ, और कहें, 'हमने पाप किया है...'" (विलापगीत 3:40-41)। पिगियस का दावा है कि इससे प्रकट होता है कि लोग आत्म-परीक्षण और मन-फिराव के द्वारा अनुग्रह के लिए अपने को तैयार कर सकते हैं। उसके अनुसार "हृदय उठाने" का अर्थ सांसारिक अभिलाषाओं से मुड़ना है, और "हाथ उठाने" का अर्थ भले कर्म करना है।
परन्तु यह तर्क पवित्रशास्त्र को उसके अपने मत के अनुकूल तोड़ता-मरोड़ता है। "हृदय और हाथ उठाने" का साधारण अर्थ है दीनता और प्रार्थना में परमेश्वर की ओर फिरना, और उसकी दया की अपनी आवश्यकता को स्वीकार करना। पिगियस की यहाँ की विस्तृत व्याख्या अनावश्यक जटिलता के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जो सीधे-सादे वाक्यांशों को उसके अपने धर्मविज्ञान के अनुकूल कल्पित अर्थों से भर देती है।
वास्तव में परमेश्वर की आज्ञाएँ उसके अनुग्रह की हमारी आवश्यकता को प्रकट करती हैं, हमारी अपनी सामर्थ्य को नहीं। यदि कुछ है, तो आज्ञाएँ हमें अपनी अपर्याप्तता को स्वीकार करने की ओर ले जाती और परमेश्वर के आत्मा पर निर्भर होने को प्रेरित करती हैं। मानवीय क्षमता को सिद्ध करने के बजाय वे हमें दिखाती हैं कि हम परमेश्वर की दया और अपने भीतर उसके आत्मा के कार्य पर कितने निर्भर हैं।
मन-फिराव की तैयारी की चर्चा के तुरन्त बाद पिगियस अगले चरण पर आता है, जिसे वह "परिवर्तन" कहता है, अर्थात् मन-फिराव का मुख्य भाग। वह दावा करता है कि मन-फिराव पूरी तरह हमारी अपनी सामर्थ्य में है। परन्तु मन-फिराव का जो आरम्भ वह बताता है, अर्थात् पापी की अपने दुष्कर्म को पहचानने पर होनेवाली लज्जा और बेचैनी, वह वास्तव में परमेश्वर के अनुग्रह का कार्य है। यहेजकेल में परमेश्वर अपने लोगों से कहता है, "तूने मेरी वाचा तोड़ी है, तो भी मैं उसे स्मरण करूँगा और तेरे साथ एक सदा की वाचा बाँधूँगा। तब तू अपनी चालचलन को स्मरण करके लज्जित होगी" (यहेजकेल 16:60-63)। यहाँ परमेश्वर पहल करता है, और अपने लोगों को अपने पापों को पहचानने और उन पर खेद करने के लिए प्रेरित करता है। पिगियस कल्पना करता है कि मनुष्य परमेश्वर की ओर पहला क़दम उठाता है, परन्तु प्रभु दिखाता है कि हृदय में यह परिवर्तन वह स्वयं आरम्भ करता है।
फिर प्रार्थना के विषय में पिगियस दावा करता है कि लोग अपने ही बल से परमेश्वर को पुकारकर पहला क़दम उठाते हैं, और इस प्रकार उसके अनुग्रह से पहले ही आगे बढ़ जाते हैं। परन्तु पौलुस स्पष्ट कहता है: "जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, उसका नाम कैसे लें?" (रोमियों 10:14)। पौलुस दिखाता है कि परमेश्वर को पुकारना विश्वास से निकलता है, जो स्वयं परमेश्वर का दान है। विश्वास जड़ है, और परमेश्वर को पुकारना फल है। परन्तु यह विश्वास कहाँ से आता है यदि परमेश्वर से नहीं? पिगियस यहाँ तक भी कह सकता है कि विश्वास ही वह है जिसकी तैयारी हम अपने आप करते हैं। फिर भी अगस्तीन हमें स्मरण दिलाता है, "विश्वास हमें प्रार्थना करने में बलवन्त करता है कि हमारी सुनी जाए, ढूँढ़ने में कि हम पाएँ, और खटखटाने में कि द्वार खोला जाए" (धार्मिकता की सिद्धता)।
पिगियस सुलैमान के शब्दों का भी प्रयोग यह तर्क करने के लिए करता है कि लोगों के पास अपने हृदय को आप तैयार करने की सामर्थ्य है, और उद्धृत करता है, "मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है" (नीतिवचन 16:1)। परन्तु इस वचन का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने हृदय का स्वामी है; यह तो एक सूक्ष्म व्यंग्य है। सुलैमान मानवीय अहंकार की ओर संकेत करता है, जिसमें लोग सबसे बड़े कार्य ऐसे हाथ में लेते हैं मानो उनके हृदय उनके अपने वश में हों, जबकि वे सबसे छोटी बातों को भी, जैसे अपनी जीभ को चलाना, सम्भाल नहीं पाते। यह वचन मानवीय घमण्ड के विरुद्ध चेतावनी देता है, और दिखाता है कि परमेश्वर से अलग छोटे से छोटे प्रयास भी व्यर्थ हैं। फिर भी पिगियस इसे तोड़कर यह जताता है कि मनुष्य किसी न किसी रूप में परमेश्वर के अनुग्रह से आगे बढ़ सकता है।
पिगियस तर्क करता है कि लोग अपने हृदयों को ऐसी रीतियों से तैयार कर सकते हैं जो परमेश्वर को भाती हैं, और वह दाऊद को ग़लत उद्धृत करके इसका समर्थन करने का प्रयत्न करता है: "परमेश्वर ने दीन की विनती सुनी; तेरे कान ने उनके हृदय की तैयारी को सुना" (भजन संहिता 10:17)। परन्तु मूल पाठ वास्तव में कहता है, "तू उनके हृदय को तैयार करेगा; तेरा कान सुनेगा।" यहाँ दाऊद पुष्टि करता है कि हृदय को तैयार करनेवाला परमेश्वर है, मनुष्य नहीं। पिगियस एक घटिया अनुवाद का सहारा लेकर इस वचन को इस प्रकार तोड़ने का प्रयत्न करता है मानो मानवीय प्रयास किसी रीति से परमेश्वर के अनुग्रह से होड़ करता हो।
पिगियस रहूबियाम की असफलता को भी इस बात के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है कि लोग परमेश्वर को खोजने के लिए अपने हृदय तैयार कर सकते हैं, और कहता है कि रहूबियाम ने अपना राज्य इसलिए खोया कि उसने "यहोवा की खोज में अपना मन नहीं लगाया" (2 इतिहास 12:14)। पिगियस पूछता है, यदि लोग परमेश्वर के लिए अपने हृदय तैयार नहीं कर सकते, तो पवित्रशास्त्र रहूबियाम की इस असफलता का विशेष उल्लेख क्यों करता? यहाँ उसकी भूल यह मान लेना है कि प्रत्येक मनुष्य में स्वभाव से एक "नरम हृदय" होता है जो आत्मा के प्रभाव के बिना परमेश्वर की ओर फिर सकता है। वास्तविक अर्थ यह है कि रहूबियाम ने अपना हृदय परमेश्वर की ओर नहीं लगाया, जो उन सब का लक्षण है जो उसके विरुद्ध कठोर हो गए हैं।
पवित्रशास्त्र दो प्रकार के हृदयों में भेद करता है: एक वह जो पाप और विद्रोह से कठोर हो गया है, और दूसरा वह जो परमेश्वर के आत्मा से कोमल और आज्ञाकारी बनाया गया है। परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना सब मानव हृदय कठोर हैं, बुराई की ओर झुके हुए हैं, और भलाई को खोजने में असमर्थ हैं। परन्तु जब परमेश्वर "पत्थर के हृदय" को "मांस के हृदय" से बदलता है (यहेजकेल 36:26), तब वह उसे अपनी व्यवस्था के प्रति ग्रहणशील और आज्ञाकारी बनाता है, और उसे हृदय पर ही लिख देता है। जिन्हें परमेश्वर नया करता है वे उसकी सेवा करने को तैयार और समर्थ होते हैं; जो पाप में कठोर बने रहते हैं वे अपने ही हठ से उसका विरोध करते हैं। इस प्रकार वे लोग जो स्वभाव से परमेश्वर को खोजने की अपनी अक्षमता में एक-से हैं, या तो केवल परमेश्वर के अनुग्रह से बदले जाते हैं या उसके न्याय से विरोध में बने रहते हैं। यह मेरा आविष्कार नहीं, परन्तु पवित्रशास्त्र की स्पष्ट शिक्षा है, जो इस विषय में कोई भ्रम नहीं छोड़ती।
पिगियस दाऊद के इन शब्दों में परमेश्वर के अनुग्रह के लिए तैयारी करने की मानवीय सामर्थ्य का प्रमाण पाने का दावा करता है: "परमेश्वर ने दीन की विनती सुनी; तेरे कान ने उनके हृदय की तैयारी को सुना।" फिर भी उसकी व्याख्या, घटिया अनुवाद के कारण, दोषपूर्ण है। पाठ का शब्दशः अर्थ है, "तू उनके हृदय को तैयार करेगा।" यह मनुष्य से उत्पन्न किसी तैयारी की नहीं, परन्तु स्वयं परमेश्वर के द्वारा हृदय के तैयार किए जाने की बात करता है। पिगियस ऐसा सुनाने का प्रयत्न करता है मानो मानवीय प्रयास परमेश्वर के अनुग्रह के कार्य के बराबर हो सकता है, परन्तु वह पाठ को ग़लत पढ़कर ऐसा करता है।
वह रहूबियाम के पतन की ओर भी संकेत करता है, और तर्क देता है कि राजा का परमेश्वर की ओर अपना "हृदय लगाने" में असफल होना इस बात का प्रमाण है कि लोगों में स्वभाव से यह क्षमता होती है। पिगियस पूछता है, यदि मनुष्य परमेश्वर के लिए अपने हृदय तैयार नहीं कर सकते, तो पवित्रशास्त्र रहूबियाम की असफलता का उल्लेख भी क्यों करता है? परन्तु वह वास्तविक बात चूक जाता है: इस अंश का यह अर्थ नहीं कि रहूबियाम में परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना अपने हृदय को तैयार करने की कोई स्वाभाविक, भक्तिपूर्ण प्रवृत्ति थी। वह तो केवल यह देखता है कि वह परमेश्वर की ओर नहीं फिरा, जो उसके अभक्त स्वभाव का चिह्न है।
पिगियस के तर्कों में यह भ्रम सामान्य है, क्योंकि वह प्रायः मनुष्यों की स्वाभाविक दशा, जो पाप की ओर झुकी है, और उनकी बदली हुई दशा, जो परमेश्वर के आत्मा द्वारा चलाए जाते हैं, इनके बीच भेद करने में असफल रहता है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि समस्त मानवजाति का स्वाभाविक हृदय पत्थर का है, जो परमेश्वर का विरोधी है, जब तक परमेश्वर स्वयं अपने आत्मा के द्वारा "उपचार" न करे (यहेजकेल 36:26)। जब परमेश्वर हृदय को बदलता है और उसे "मांस का हृदय" बनाता है, तब वह इच्छा करने और उसकी आज्ञा मानने में समर्थ हो जाता है।
इस प्रकार, जिनके हृदय परमेश्वर के अनुग्रह से कोमल किए गए हैं वे उसकी आज्ञाकारिता में जीते हैं, जबकि जो अपनी स्वाभाविक दशा में छोड़ दिए गए हैं वे कठोर, हठीले और अवज्ञाकारी बने रहते हैं। अपनी अपरिवर्तित दशा में लोग परमेश्वर की आज्ञाओं का ठीक पालन नहीं कर सकते। परन्तु जब परमेश्वर हृदय को नई प्रवृत्ति दे देता है, तो वह व्यक्ति उसकी इच्छा पर चलने की ओर झुक जाता है। संक्षेप में, भक्तों की आज्ञाकारिता पूरी तरह परमेश्वर का कार्य है, जबकि अभक्तों की विद्रोहशीलता उनका अपना किया हुआ है। इसमें चुने हुए और त्यागे हुए के बीच का भेद परमेश्वर के अनुग्रह में है, मानवीय पुण्य में नहीं।
तो फिर पवित्रशास्त्र स्पष्ट है: हृदय का वह परिवर्तन जो हमें परमेश्वर को खोजने में समर्थ बनाता है, केवल उसी की ओर से आता है, और इस कार्य को अनुग्रह के लिए मानवीय तैयारी नहीं कहा जा सकता। यह सब परमेश्वर के हस्तक्षेप और हमारे भीतर कार्य करते उसके आत्मा पर निर्भर है।
पिगियस, जैसा वह प्रायः करता है, आज्ञाओं की ओर लौटता है, और यह जताता है कि इतिहास भर में विश्वासी जन परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरा करने में समर्थ रहे हैं। वह दाऊद की ओर संकेत करता है जो लोगों से अपने हृदय परमेश्वर को अर्पित करने का आग्रह करता है, और हिजकिय्याह की ओर जो इस्राएल को प्रोत्साहित करता है कि वे हठ न करें परन्तु यहोवा के अधीन हो जाएँ। पवित्रशास्त्र तो यह भी लिखता है कि सारे इस्राएल से लोग इकट्ठे हुए और अपने हृदय परमेश्वर को सौंप दिए। इससे कौन इनकार कर सकता है? परन्तु पिगियस एक अनिवार्य बात को अनदेखा करता है: पवित्रशास्त्र यह भी बताता है कि जिन्होंने सचमुच अपने आप को उसके अधीन किया वे केवल वही थे "जिनके हृदय को यहोवा ने छुआ था।" वास्तविक प्रश्न यह है कि भक्ति के ऐसे कार्य केवल मानवीय प्रयास से उठते हैं, या पवित्र आत्मा से चलाए और प्रेरित किए जाते हैं।
स्वतन्त्र इच्छा को अनुग्रह के साथ जोड़ने के प्रयास में पिगियस तर्क करता है कि परमेश्वर के दान, जैसे बुद्धि, केवल उन्हीं को दिए जाते हैं जो उन्हें दीनता से खोजते हैं। उसके अनुसार बुद्धि परमेश्वर द्वारा थोपी नहीं जाती, परन्तु केवल वही पाते हैं जो उसके लिए अपने हृदय तैयार करते हैं। परन्तु यहाँ वह एक मौलिक सत्य चूक जाता है: दीनता भी परमेश्वर का दान है। क्या वह सचमुच यह दावा कर सकता है कि दीनता स्वयं से उत्पन्न होती है? विश्वासी भली-भाँति जानते हैं कि सब भली वस्तुएँ, दीनता भी, केवल परमेश्वर के अनुग्रह से आती हैं।
पिगियस यह जताता है कि यदि परमेश्वर किसी मनुष्य की तैयारी का विचार किए बिना अनुग्रह देता है, तो जिन्हें वह छोड़ देता है उनके प्रति परमेश्वर अन्यायी है। यदि परमेश्वर पिगियस के मानदण्डों पर मुक़दमे में खड़ा हो, तो उसे अन्यायी ठहराया जाएगा। फिर भी परमेश्वर स्वयं घोषणा करता है कि अपने लोगों को अलग करनेवाला उसका अपना अनुग्रह ही है; उसके बिना सब समान रूप से पाप में बने रहते। इसलिए पिगियस का तर्क "स्वर्ग पर पत्थर फेंकने" जैसा व्यर्थ है, जो लौटकर उसी पर आ गिरते हैं।
वह अनन्त काल तक विरोध कर सकता है, उन पर शाप भी उच्चारित कर सकता है जो इससे इनकार करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह के योग्य ठहरने की सामर्थ्य रखते हैं। परन्तु पवित्रशास्त्र से अधिक सुदृढ़ तर्कों के बिना उसकी आपत्तियाँ "हवा पर भौंकने" जितनी निर्बल हैं। परमेश्वर का सत्य, जो उसकी सर्वसत्ता और अनुग्रह पर स्थापित है, ऐसे खोखले तर्कों से हिलाए जाने के लिए बहुत दृढ़ता से खड़ा है।
अपने अगले मुद्दे की ओर बढ़ते हुए पिगियस मेरे तर्कों और पवित्रशास्त्र पर मेरे दावों का खण्डन करने का प्रयत्न करता है। मैंने इंस्टीट्यूट्स में लिखा था कि मानव इच्छा को ऐसी वस्तु नहीं माना जा सकता जो स्वतन्त्र रूप से परमेश्वर के अनुग्रह की अगुवाई का अनुसरण करती हो, मानो वह अपनी अलग सामर्थ्य से सहयोग करती हो। इसके विपरीत, आत्मा को ग्रहण करने और उसके पीछे चलने के लिए इच्छा की तत्परता तभी आती है जब परमेश्वर उसे नया कर चुका हो, और उसे अपने प्रभाव के प्रति इच्छुक और उत्तरदायी बना चुका हो। पिगियस इसे असंगत कहकर ठुकराता है, और दावा करता है कि मैं स्वयं भी अपनी बात नहीं समझता। इसके अतिरिक्त वह मुझ पर सरासर अभक्ति का दोष लगाता है, और कहता है कि मैंने अगस्तीन को लापरवाही से ग़लत पढ़कर उसके समर्थन का अनुचित हवाला दिया है। काश पिगियस पवित्रशास्त्र के पास उसी लगन से जाता जिसकी कमी वह मुझ में बताता है! इस विषय में मैं प्रमाण को ही बोलने दूँगा।
प्रस्तुत विषय को सम्बोधित करते हुए मैंने क्राइसोस्टम के उस कथन की आलोचना की थी कि न अकेला अनुग्रह और न अकेली मानव इच्छा एक-दूसरे के बिना कोई भलाई उत्पन्न कर सकती है। पिगियस मुझ पर दोष लगाता है कि मैं इस विचार का आरोप अनुचित रूप से केवल क्राइसोस्टम पर लगाता हूँ, और हठ करता है कि यह कलीसिया में व्यापक रूप से स्वीकृत मत है और अगस्तीन ने भी इसकी पुष्टि की है। वह हाइपोग्नॉस्टिकॉन का, जो प्रायः अगस्तीन का माना जाता रहा है, एक अंश उद्धृत करता है। यद्यपि यहाँ की भाषा क्राइसोस्टम की भाषा से कुछ मिलती-जुलती है, फिर भी अर्थ मूलतः भिन्न है। हाइपोग्नॉस्टिकॉन का लेखक यह सुझाता है कि भले कर्म अनुग्रह और स्वतन्त्र इच्छा, दोनों के परिणाम हैं, और इस प्रक्रिया की तुलना घुड़सवार द्वारा घोड़े को चलाने से करता है: घोड़ा दौड़ता तो है, परन्तु वह सवार के निर्देशन से ही सही मार्ग पर रहता है। वह आगे समझाता है कि इच्छा, भटकते पशु के समान, सांसारिक खोजों में लक्ष्यहीन रहती है जब तक परमेश्वर का आत्मा प्रवेश करके उसे धार्मिकता के मार्ग पर न लौटा दे। एक बार निर्देशित हो जाने पर वह सही मार्ग पर आत्मा के निरन्तर निर्देशन से ही चलती रहती है।
इस प्रकार वह निष्कर्ष निकालता है कि यद्यपि इच्छा "दौड़ती" है, फिर भी उसे मार्ग पर बनाए रखनेवाला और अपने ठहराए गन्तव्य तक पहुँचानेवाला परमेश्वर है।
मैं सदा से यह मानता आया हूँ कि इच्छा स्वयं, अर्थात् चुनने की क्षमता, हम में अक्षुण्ण रहती है। परन्तु जो भला है उसकी इच्छा करने और उसे करने की सामर्थ्य हमारी स्वाभाविक नहीं है; वह केवल परमेश्वर के अनुग्रह का दान है। इसमें मुझे यह कहने में कोई विरोधाभास नहीं दिखता कि हमारी इच्छा अपनी स्वाभाविक दशा में चुनने में सक्षम तो है, परन्तु इतनी भ्रष्ट है कि केवल बुराई को ही चुनती है। जब परमेश्वर का आत्मा इच्छा को नया करता है, तो उसे धार्मिकता की ओर नई प्रवृत्ति मिलती है, और यह परिवर्तन पूरी तरह परमेश्वर का किया हुआ है। इसलिए इच्छा मनुष्य की है, फिर भी वह भलाई की ओर केवल परमेश्वर के पूर्ववर्ती कार्य से ही फिरती है।
मुझे यह कहने में कोई कठिनाई नहीं दिखती कि इच्छा अनुग्रह के "साथ चलती है", जैसे द्रव्य रूप के अनुरूप ढलता है। जैसे मिट्टी का द्रव्य कुम्हार द्वारा गढ़ा जाता है, वैसे ही हमारी इच्छा परमेश्वर के आत्मा द्वारा गढ़ी जाती है। ठीक रीति से इच्छा करने की हमारी सामर्थ्य हम से नहीं आती; वरन् आत्मा ही हमारे स्वभाव को सुधारता और उसे भलाई की ओर नई प्रवृत्ति देता है। फिर भी क्राइसोस्टम का मत इस सत्य को यह सुझाकर विकृत करता है कि अनुग्रह अपनी प्रभावशीलता के लिए मानवीय सहयोग पर निर्भर है। पिगियस, अपनी बारी में, क्राइसोस्टम की भूल से चिपका रहता है और शब्दों को उनके अभिप्रेत अर्थ से अलग न कर पाने के कारण अपने आप को, और दूसरों को भी, धोखा देता है।
अगस्तीन ने ठीक ही इस विचार को असंगत ठहराया कि परमेश्वर की दया तब तक निष्प्रभावी रहेगी जब तक उसे हमारी इच्छा का सहारा न मिले। जैसा वह लिखता है, "यह न तो इच्छा करनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु परमेश्वर की है जो दया करता है" (रोमियों 9:16)। केवल परमेश्वर ही इच्छा को तैयार करता है ताकि वह अनुग्रह को ग्रहण कर सके, और तैयार हो जाने के बाद भी उसकी सहायता करता है। वह अनिच्छुक आत्मा के आगे-आगे चलता है कि उसे इच्छुक बनाए, और उसे सम्भाले रखता है कि वह व्यर्थ इच्छा न करे। यही वह शिक्षा है जिसकी मैं पुष्टि करता हूँ: परमेश्वर का अनुग्रह पूर्णतः पर्याप्त है।
फिर भी पिगियस दावा करता है कि मैं स्वतन्त्र इच्छा को सर्वथा नष्ट कर देता हूँ, मानो मैं सिखाता होऊँ कि इच्छा का तत्त्व ही मिटा दिया जाता है। यह बकवास है। मैंने कभी नहीं कहा कि इच्छा के सार को नष्ट किया जाना चाहिए। मैंने सदा उसके गुण की भ्रष्टता की बात की है, अर्थात् उस प्रवृत्ति की जो परमेश्वर की विरोधी है, और जिसे अनुग्रह से बदला जाना चाहिए। जब अगस्तीन ने "पूर्वगामी अनुग्रह" की चर्चा की जो स्वतन्त्र इच्छा को भलाई करने के लिए तैयार करता है, तब उसने मानवीय प्रयास को परमेश्वर के अनुग्रह से पहले आनेवाला नहीं कहा; वरन् उसने दिखाया कि यह अनुग्रह ही है जो हम में भलाई का आरम्भ भी करता है और उसे पूरा भी करता है, जबकि स्वतन्त्र इच्छा अनुगमन करती है।
परन्तु पिगियस अगस्तीन के शब्दों को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयत्न करता है, और कल्पना करता है कि वह मेरी शिक्षा को दोषी ठहराता है। अगस्तीन के शब्द, "अनुग्रह कार्य करता है, उसे निर्देशित करता है, और उसे पूरा करता है, जबकि वह इच्छा को संलग्न करता है," लगभग मेरे ही लिखे हो सकते थे, क्योंकि वे मेरी ही इस धारणा को दर्शाते हैं कि हमारे सब भले कर्म परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण पहल से निकलते हैं, हमारे अपने बल से नहीं। यदि पिगियस यह नहीं देख पाता, तो यह केवल अन्धेपन के कारण नहीं, द्वेष के कारण भी है।
पिगियस मेरे तर्कों की आलोचना उसी दोषपूर्ण तर्कणा के साथ जारी रखता है जिसका प्रयोग वह पहले कर चुका है। आरम्भ में वह दावा करता है कि यिर्मयाह के उस हवाले का वह पहले ही पर्याप्त उत्तर दे चुका है जहाँ परमेश्वर कहता है, "मैं अपने प्रति भय उनके हृदयों में उत्पन्न करूँगा, कि वे मुझ से अलग न हों," और, "मैं उन्हें एक नया हृदय दूँगा, कि वे जीवन भर मेरा भय मानें" (यिर्मयाह 32:40, यहेजकेल 11:19)। परन्तु पिगियस का तथाकथित उत्तर केवल खण्डन मात्र है। प्रभु स्पष्ट घोषणा करता है कि वही है जो हमें अपने प्रति विश्वासयोग्य बनाए रखता है। वह यह कहकर इसे स्पष्ट करता है कि वह हमें नया हृदय देता है और अपने प्रति श्रद्धा हमारे भीतर रोपता है।
फिर भी पिगियस का हठ है कि परमेश्वर का अनुग्रह हमें केवल विश्वासयोग्य बने रहने की सामर्थ्य देता है, यदि हम वैसा चुनें। इसके अतिरिक्त वह यह सुझाता है कि अनुग्रह पाने से पहले हमें अपनी ही पहल से परमेश्वर को खोजना होगा। ऐसे विचार का पवित्रशास्त्र में कोई समर्थन नहीं, फिर भी पिगियस आशा करता है कि उसे बिना प्रश्न किए मान लिया जाए।
जब मैं सन्तों की उन प्रार्थनाओं का हवाला देता हूँ जिनमें वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह "उनके हृदयों को निर्देशित करे" और "उनमें शुद्ध मन उत्पन्न करे" (भजन संहिता 51:10), तो वह परमेश्वर की उन आज्ञाओं को उद्धृत करके उत्तर देता है जिनमें हमें अपने हृदयों को आप निर्देशित करने को कहा गया है। परन्तु कोई भ्रम नहीं होना चाहिए: इस प्रकार प्रार्थना करके सन्त स्वीकार करते हैं कि उनकी भला करने की सामर्थ्य अन्ततः परमेश्वर से आती है। दूसरी ओर आज्ञाएँ हमारा कर्तव्य प्रकट करती हैं, ईश्वरीय सहायता के बिना उसे पूरा कर सकने की हमारी क्षमता को नहीं।
पिगियस का दावा है कि सन्तों की प्रार्थनाएँ केवल अनुग्रह के लिए उनकी अभिलाषा को दर्शाती हैं, और तर्क देता है कि यह मेरे इस मत के विपरीत है कि हम अनुग्रह पाने के लिए अपने आप को तैयार नहीं करते। फिर भी ये प्रार्थनाएँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि जो कार्य परमेश्वर ने आरम्भ किया उसे सम्भाले रखने के लिए सन्त उस पर निर्भर हैं। जब दाऊद और सुलैमान पुकारते हैं, "हे परमेश्वर, हमारे हृदयों को निर्देशित कर," तो वे स्वीकार करते हैं कि जो नवीकरण परमेश्वर ने आरम्भ किया है उसे वही पूरा करे। इन प्रार्थनाओं में वे अपनी किसी सामर्थ्य का दावा नहीं कर रहे, परन्तु परमेश्वर से विनती कर रहे हैं कि वह उसे पूरा करे जिसे केवल वही पूरा कर सकता है।
पिगियस अब तक इस शिक्षा को निर्बल नहीं कर पाया है कि मानव हृदयों को धार्मिकता की ओर निर्देशित करना केवल परमेश्वर का कार्य है। मैंने ध्यान दिलाया था कि परमेश्वर हम से इससे अधिक तत्परता से कुछ नहीं माँगता कि हम उसके विश्रामदिन को मानें, ऐसा सच्चा विश्रामदिन जिसका अर्थ है अपने ही कामों से विश्राम लेना (यशायाह 58:13-14)। पिगियस उत्तर देता है कि परमेश्वर हम से केवल "दासत्व के" काम से दूर रहने को कहता है, भक्ति और आज्ञाकारिता के कार्यों से नहीं। फिर भी विश्रामदिन का उल्लेख करने का मेरा उद्देश्य इस पर बल देना था कि परमेश्वर का भय मानना और उसके मार्गों पर चलना भी ऐसे कार्य नहीं हैं जिन्हें हम अपने आप सिद्ध करते हैं। जब परमेश्वर हमें अपने कामों से विश्राम करने की आज्ञा देता है, तो वह प्रकट करता है कि अपने आप में हमारे काम पाप के सिवा कुछ नहीं हैं। यशायाह इसकी पुष्टि यह कहकर करता है कि जब हम उस पर अपनी इच्छा थोपते हैं तब विश्रामदिन भंग होता है। विश्रामदिन का वास्तविक अर्थ, जैसा पौलुस रोमियों 6 में बताता है, यह है कि हमारा पापमय स्वभाव, अर्थात् "पुराना मनुष्यत्व", क्रूस पर चढ़ाया जाता है, जिसे पिगियस सर्वथा अनदेखा कर देता है।
इसके बाद मैंने मसीह के इन शब्दों का हवाला दिया: "सच्ची दाखलता मैं हूँ, और तुम डालियाँ हो। जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे तो अपने आप से फल नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ नहीं कर सकते" (यूहन्ना 15:1-5)। यहाँ पिगियस अपने ही मत का समर्थन देखता है, और तर्क देता है कि दाखलता और डालियों का सम्बन्ध स्वतन्त्र चुनाव और अनुग्रह, दोनों को दर्शाता है। उसके अनुसार दाखलता जीवन देती है, जबकि डाली (अर्थात् हम) अपने प्रयास से फल लाती है, जो एक साझेदारी का संकेत है। परन्तु मसीह का अभिप्राय अधिक सरल और कहीं अधिक गहरा है। जैसे दाखलता से कटी हुई डाली पूरी तरह निर्जीव हो जाती है, वैसे ही मसीह से जुड़े बिना हम आत्मिक जीवन उत्पन्न करने में सर्वथा असमर्थ हैं। उससे जुड़े रहते हुए भी हम फलवन्त होने के लिए परमेश्वर की निरन्तर देखभाल पर निर्भर हैं। जो इस उपमा को वैसे समझेंगे जैसा मसीह ने अभिप्रेत किया, वे उस भ्रम से नहीं भटकेंगे जो पिगियस फैलाने का प्रयत्न करता है।
परन्तु पिगियस इस स्पष्ट शिक्षा को भी तोड़ने-मरोड़ने का प्रयत्न करता है। वह हठ करता है कि डाली के समान हम अपनी जीवनदायी सामर्थ्य से फल लाते हैं, भले ही वह जीवन परमेश्वर से आता हो। यदि उसका केवल यह अर्थ है कि परमेश्वर ने हमें इच्छा, विवेक और कर्म करने के बल जैसी क्षमताएँ दी हैं, तो मैं सहमत हूँ। परन्तु यदि वह यह जताता है कि हम जो कोई भलाई करते हैं उसका कुछ भाग पूरी तरह परमेश्वर का नहीं, परन्तु हमारा भी है, तो वह स्पष्टतः भूल में है। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि भले और बुरे दोनों प्रकार के कार्य "फल" कहलाते हैं, परन्तु मसीह से अलग हम केवल पाप और मृत्यु का फल उत्पन्न कर सकते हैं। भला फल लाने के लिए हमें अनुग्रह की आवश्यकता है। अपने आप पर छोड़े जाने पर हम किसी भी भली वस्तु से बंजर और दुष्कर्म में बहुफलदायी हैं।
मैं यह भी जानना चाहूँगा कि क्या पिगियस मानता है कि सब लोग स्वभाव से मसीह से जुड़े हैं, या वह स्वीकार करता है कि यह मेल अनुग्रह की एक विशेष आशीष है, जो स्वाभाविक सामर्थ्य से परे है। यदि वह यह मान लेता है, जैसा उसे मानना ही होगा, तो उसके इस विचार का क्या होगा कि स्वतन्त्र चुनाव की हमें अनुग्रह के लिए तैयार करने में कोई भूमिका है? पौलुस इस विषय को मसीह से अलग लोगों की तुलना जंगली जैतून की डालियों से करके निपटा देता है (रोमियों 11:17), और दिखाता है कि मसीह में कलम लगाए बिना हम वह फल कभी नहीं ला सकते जो परमेश्वर चाहता है।
पिगियस समझता है कि उसने अपना पक्ष सिद्ध कर दिया है, यह तर्क देकर कि यदि डाली दाखलता में बनी रहे बिना फल नहीं ला सकती, तो एक बार वहाँ बने रहने पर वह स्वभावतः फल लाएगी। उसके मत में जब हम मसीह में हैं, तो हमारी इच्छा "अपने आप से" फल उत्पन्न करती है। वह इस बात का उत्सव मनाता है, परन्तु उसकी तर्कणा की त्रुटि कोई भी देख सकता है। मसीह के शब्दों का स्पष्ट अर्थ यह है कि डाली अपनी सामर्थ्य से फलवन्त नहीं होती; वह तभी फल लाती है जब दाखलता में बनी रहे। पिगियस अर्थ को मरोड़ने का प्रयत्न करता है, परन्तु उसका उपाय विफल होता है। मसीह "अपने आप से" की तुलना "दाखलता में" से करता है, जिसका संकेत यह है कि "अपने आप से" का अर्थ दाखलता से अलग होना है। मसीह के बिना हम बंजर और निष्फल हैं।
जब पौलुस कहता है, "परमेश्वर ही है जो अपनी सुइच्छा के लिए तुम में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डालता है" (फिलिप्पियों 2:13), तो पिगियस यह दावा करके उत्तर देता है कि इच्छा भी कार्य करती है, मानो इस कथन से कुछ बदल जाता हो। हाँ, इच्छा कार्य करती है; प्रश्न यह है कि वह स्वतन्त्र रूप से कार्य करती है या परमेश्वर के निर्देशन में। पौलुस का मुद्दा यह है कि हमारी इच्छा, जो आत्मा द्वारा निर्देशित है, भलाई की ओर परमेश्वर के कार्य से फिरती है, हमारे अपने कार्य से नहीं। इसलिए पिगियस का उत्तर सारहीन है।
पौलुस के इस कथन के विषय में कि "परमेश्वर ही सब में सब कुछ करता है" (1 कुरिन्थियों 12:6), पिगियस तर्क करता है कि यद्यपि परमेश्वर परम कारण है, फिर भी उसके प्राणी अपने कार्य स्वतन्त्र रूप से करते हैं। परन्तु पौलुस के यह कहने का उद्देश्य कि परमेश्वर सब कुछ करता है, इस पर बल देना है कि उससे अलग कुछ नहीं होता। यह सृष्टि पर परमेश्वर के सामान्य शासन की नहीं, परन्तु विशेष रूप से पवित्र आत्मा के द्वारा विश्वासियों को आज्ञाकारिता में ले चलने के उसके कार्य की बात है। इस भेद को चूककर पिगियस एक सतही और अपर्याप्त समझ प्रस्तुत करता है।
पिगियस यह तर्क करने का प्रयत्न करता है कि लोग मसीह के पास केवल अपनी सहमति से ही आते हैं, और क्राइसोस्टम के इस दावे का हवाला देता है कि परमेश्वर लोगों को उनकी इच्छा से अपनी ओर खींचता है। वह इसे सदियों से कलीसिया की कथित सर्वसम्मति से, और यह कहकर पुष्ट करने का प्रयत्न करता है कि परमेश्वर केवल "द्वार पर खड़ा है" और हमारे खोलने की प्रतीक्षा करता है। परन्तु यह तर्क उस गहराई को चूक जाता है जो पवित्रशास्त्र उद्धार में परमेश्वर की भूमिका के विषय में सिखाता है। अम्ब्रोस ने ठीक कहा कि मसीह और शैतान, दोनों अनुयायी भर्ती करते हैं, परन्तु हम जानते हैं कि मसीह के अनुयायी उसके आत्मा से बदले जाते हैं। जैसा अगस्तीन ने कहा, परमेश्वर हमें बलपूर्वक नहीं खींचता, परन्तु हमारी इच्छा को गढ़कर खींचता है। मैं मानता हूँ कि जिन्हें परमेश्वर खींचता है वे स्वेच्छा से आते हैं; परन्तु वे ऐसा इसलिए करते हैं कि परमेश्वर ने उनकी इच्छा को नया किया है।
फिर पिगियस मसीह के इन शब्दों के मेरे प्रयोग की आलोचना करता है, "जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है" (यूहन्ना 6:45), और हठ करता है कि इस "सीखने" का अर्थ केवल सुनने को सहमत होना है। वह यह जताता है कि कोई परमेश्वर की शिक्षा को स्वीकारना या ठुकराना चुन सकता है। परन्तु यहाँ मसीह का अभिप्राय केवल बाहरी शिक्षा, जो कान तक पहुँचती है, और आत्मा के उस आन्तरिक कार्य के बीच का भेद दिखाना है जो हृदय को प्रकाशित करता है। यीशु इस प्रकार इसलिए कहता है कि जिन्होंने उसके शब्द सुने उनमें से बहुत से आत्मिक रूप से अन्धे और विरोधी थे। इसलिए शिक्षा तभी फल लाती है जब परमेश्वर समझ और पीछे चलने की इच्छा प्रदान करता है।
पिगियस सिरिल के मत का सहारा लेकर मेरी व्याख्या को निर्बल करने का प्रयत्न करता है, मानो केवल इसी से मेरी बात निराधार हो जाएगी। परन्तु यदि हम ऐतिहासिक समर्थन पर विचार कर रहे हैं, तो अगस्तीन दृढ़ता से मेरे पक्ष में है, और उसने मसीह के शब्दों को इस घोषणा के रूप में देखा कि केवल वही लोग वास्तव में मसीह के पास आते हैं जिन्हें पिता ने भीतर से सिखाया है। यह शिक्षा प्रभावशाली है, वैकल्पिक नहीं। पिगियस यह दावा करके उत्तर देता है कि सीखना व्यक्तिगत चुनाव पर निर्भर है, फिर भी यह स्पष्टतः मसीह की शिक्षा के अभिप्राय के विपरीत है, जो इस पर बल देती है कि विश्वास तक आना परमेश्वर का दिया हुआ दान है। सिरिल का यह मत कि जो आते हैं उन्हें विवश नहीं किया जाता, ऐसा नहीं जिसका मैं विरोध करूँ; मेरा तर्क परमेश्वर के उस आन्तरिक कार्य के स्वरूप पर टिका है जो हमें स्वेच्छा से ले चलता है, बल के किसी विचार पर नहीं।
पिगियस अपना तर्क ओकम के विलियम के उस कथन का समर्थन करके समाप्त करता है जो पेलागियस के विचार में रचा-बसा है: "जो अपने से बन पड़ता है वह करता है, उस से परमेश्वर अपना अनुग्रह नहीं रोकता।" वह मानता है कि मेरी यह शिक्षा कि आत्मा के प्रेरित किए बिना कोई परमेश्वर का अनुग्रह नहीं खोजता, लोगों को "निर्जीव ठूँठ" बना देती है। उसकी तर्कणा यह है कि यदि अनुग्रह परमेश्वर की पहल के बिना खोजा नहीं जा सकता, तो अनुग्रह खोजने से पहले ही उपस्थित है। परन्तु वह उस भेद को चूक जाता है जो मैंने दो प्रकार के अनुग्रह के बीच खींचा है: परमेश्वर को खोजने की भक्तिपूर्ण अभिलाषा, और उसके अनुग्रह का वास्तविक ग्रहण। अगस्तीन इसे भली-भाँति कहता है जब वह कहता है, "यह विश्वास का स्वास्थ्य है जो तुझे माँगने, ढूँढ़ने और खटखटाने की ओर ले जाता है," जो अन्ततः परमेश्वर से आता है, अकेले ढूँढ़नेवाले से नहीं।
अन्त तक स्थिर रहने के दान के विषय में पिगियस दावा करता है कि वह मुफ़्त में भी दिया जाता है और हमारे अपने पुण्यों का प्रतिफल भी है। फिर भी पौलुस की स्पष्ट शिक्षा इस विचार का विरोध करती है: "यदि यह अनुग्रह से है, तो अब कर्मों से नहीं" (रोमियों 11:6)। पौलुस यह भी तर्क देता है कि यदि कुछ प्रतिफल के रूप में दिया जाए तो वह ऋण है, अनुग्रह नहीं (रोमियों 4:4)। पिगियस यह चूक जाता प्रतीत होता है कि अनुग्रह को कमाने का दावा करना उसके मुफ़्त होने की धारणा का ही खण्डन करता है।
फिर पिगियस मसीह के तोड़ों के दृष्टान्त का प्रयोग करता है, और दावा करता है कि यह इस विचार का समर्थन करता है कि परमेश्वर पहले मिले अनुग्रहों के उचित उपयोग को और दानों से प्रतिफल देता है। मैं कुछ अंश तक सहमत हूँ; परमेश्वर वास्तव में अपने दानों के विश्वासयोग्य उपयोग के उत्तर में अधिक अनुग्रह देता है। फिर भी मैं दो अनिवार्य बातों पर बल देता हूँ: पहली, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारे अपने प्रयास अनुग्रह को प्रभावशाली बनाते हैं। दूसरी, हमें कभी यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि अनुग्रह मुफ़्त दान नहीं रहता। परमेश्वर निश्चय ही हमारे उपयोग के अनुसार अपने दान बढ़ाता है, परन्तु यह विश्वासयोग्यता भी उसके अनुग्रह से ही सम्भव होती है। मैंने इंस्टीट्यूट्स में स्पष्ट कहा है कि जब परमेश्वर हमारी विश्वासयोग्यता की प्रशंसा करता और उसे प्रतिफल देता है, तो वह मूलतः हम में अपने ही दानों को मुकुट पहना रहा होता है। स्वयं पौलुस कहता है कि परमेश्वर ही है जो हम में अपनी सुइच्छा के लिए इच्छा और काम दोनों करने का प्रभाव डालता है (फिलिप्पियों 2:13)।
पिगियस की दृष्टान्त की व्याख्या मेरी अपनी शिक्षा का खण्डन नहीं करती। हम सेवक हैं, परमेश्वर के दान तोड़े हैं, और परमेश्वर स्वयं स्वामी है। विश्वासियों को सचमुच यह आशा रखनी चाहिए कि जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का भली रीति से उत्तर देंगे, तो वह अनुग्रह से और बढ़ाएगा। परन्तु विश्वासयोग्यता से उत्तर देने की उनकी यही सामर्थ्य परमेश्वर का एक और दान है।
पिगियस पौलुस के शब्दों का प्रयोग यह तर्क करने के लिए करता है कि हमारी इच्छा परमेश्वर के अनुग्रह के साथ सहयोग करती है, और पौलुस के इस कथन का हवाला देता है कि उसने "उन सब से बढ़कर परिश्रम किया" (1 कुरिन्थियों 15:10)। परन्तु पौलुस तुरन्त स्पष्ट करता है, और कहता है, "मैंने नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह ने जो मुझ पर था।" पिगियस दावा करता है कि पौलुस का अर्थ केवल यह था कि उसने परमेश्वर की सहायता से परिश्रम किया। परन्तु यदि पौलुस यह कहना चाहता कि उसने परमेश्वर की सहायता से काम किया, तो वह कहता कि उसने अनुग्रह के साथ मिलकर परिश्रम किया। इसके विपरीत पौलुस का सुधार इस पर बल देता है कि उसका परिश्रम पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह का परिणाम था। यह सुधार दिखाता है कि पौलुस ने जो भी बल और प्रयत्न लगाया वह उसकी अपनी ओर से नहीं, परन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य देनेवाले अनुग्रह से आया।
पिगियस हठ करता है कि मसीही जीवन में मानवीय प्रयास हमारा अपना है, और परमेश्वर केवल उसके लिए बल जुटाता है। फिर भी पौलुस के शब्द इस मत को चुनौती देते हैं, और पुष्टि करते हैं कि परमेश्वर केवल सहायता नहीं करता, परन्तु इच्छा और कर्म, दोनों का स्रोत है (फिलिप्पियों 2:13)। जब लोग विश्वास में परिश्रम करते हैं, तो इसलिए कि परमेश्वर उन्हें अपने उद्देश्य के अनुसार कार्य करने को प्रेरित करता है। यदि पिगियस इस व्याख्या से झगड़ना चाहता है, तो उसे पौलुस के अपने शब्दों का सामना करना होगा, जो ऐसे कार्य का श्रेय स्पष्टतः केवल परमेश्वर को देते हैं।
फिर पिगियस यीशु के दाख की बारी के मज़दूरों के दृष्टान्त की ओर संकेत करता है, यह तर्क करने के लिए कि मानवीय श्रम का परमेश्वर के अनुग्रह से अलग अपना मूल्य है, और सोचता है कि हम केवल यही उत्तर दे सकते हैं कि मज़दूरों की मज़दूरी का कारण अकेला अनुग्रह है। परन्तु हम विश्वासयोग्य मज़दूरों की वास्तविकता से इनकार नहीं करते। इसके विपरीत हम पुष्टि करते हैं कि उनके काम करने की सामर्थ्य, उनकी अभिलाषा, और उनका श्रम तक, सब परमेश्वर के अनुग्रह के दान हैं। इस शिक्षा में कोई विरोधाभास नहीं: यद्यपि मज़दूरों को मज़दूरी मिलती है, वे अपनी तत्परता और बल के लिए परमेश्वर के ऋणी हैं, जो अकेला उन्हें अपनी दाख की बारी में सेवा करने में समर्थ बनाता है। दृष्टान्त की यह समझ इस सत्य को सुरक्षित रखती है कि समस्त मानवीय भलाई परमेश्वर के प्रचुर अनुग्रह से बहती है।
स्वतन्त्र इच्छा और अनुग्रह पर अगस्तीन का मत
अपने पक्ष के समर्थन में मैंने अगस्तीन के अंश उद्धृत किए हैं, विशेषकर वैलेन्टीनस को लिखे उसके पत्रों से। परन्तु इन अंशों को सीधे सम्बोधित करने के बजाय पिगियस अपने पाठकों को लम्बे, असंगत भटकावों में ले जाता है, मानो अगस्तीन के शब्दों के स्पष्ट सत्य को धुँधला करने का प्रयत्न कर रहा हो। वह दावा करता है कि चूँकि अगस्तीन अनुग्रह के साथ "स्वतन्त्र चुनाव" की चर्चा करता है, इसी से उसका मत सिद्ध होता है। परन्तु हम पहले ही दिखा चुके हैं कि अगस्तीन इस शब्द से क्या अभिप्राय रखता है। "स्वतन्त्र चुनाव" से अगस्तीन का तात्पर्य स्वयं इच्छा से है, जिसे वह खुलकर स्वीकार करता है कि अनुग्रह द्वारा छुड़ाए जाने तक पाप से बँधी है। यह मत हमारी शिक्षा के विरुद्ध नहीं है।
जब अगस्तीन कहता है कि इच्छा "अनुग्रह से मिटाई नहीं जाती, परन्तु बुराई से भलाई में बदली जाती है, और एक बार भली हो जाने पर अनुग्रह से सहायता पाती है," तब वह हमारी समझ के बहुत निकट खड़ा होता है। इच्छा बनी रहती है, परन्तु जब तक परमेश्वर उसे बदल न दे तब तक वह भलाई के लिए सामर्थ्यहीन है। पिगियस शब्दों पर झगड़ता है, परन्तु अगस्तीन की शिक्षा का सार हमारे मत की पुष्टि करता है: मानव इच्छा, यद्यपि वास्तविक है, पाप की बन्दी है और परमेश्वर के अनुग्रह के बिना भलाई के लिए सामर्थ्यहीन है।
पिगियस एक ऐसे वाक्यांश पर भी बल देता है जहाँ अगस्तीन कहता है कि "अनुग्रह की अभिलाषा करना पहले से ही अनुग्रह का आरम्भ है," और जताता है कि यह हमारे सिद्धान्त के विरुद्ध है। फिर भी यहाँ कोई वास्तविक टकराव नहीं है। इस वाक्यांश का सीधा अर्थ यह है कि परमेश्वर को खोजने की कोई भी प्रवृत्ति स्वयं उसके अनुग्रह का दान है, जिसकी हम सहर्ष पुष्टि करते हैं। विडम्बना यह है कि पिगियस अब उसी विचार की "रूढ़िवादी" कहकर प्रशंसा करता है जिसे उसने पहले विधर्म कहकर धिक्कारा था। वह यह नहीं देखता कि इस सत्य को स्वीकार करके वह अपने पूरे तर्क को निर्बल कर देता है, क्योंकि इसका संकेत है कि परमेश्वर को खोजने के आरम्भिक क़दम भी उसके अनुग्रह से प्रेरित हैं, हम में किसी निहित सामर्थ्य से नहीं।
पिगियस दावा करता है कि अगस्तीन उन लोगों को डाँटता है जो कहते हैं कि अनुग्रह पर बल देने से प्रबोधन व्यर्थ हो जाता है। परन्तु हमारी परम्परा में कब किसी ने ऐसा सुझाया है? पिगियस हठ करता है कि हमारी शिक्षा इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है, कि यदि अनुग्रह के बिना कोई बुराई का विरोध या भलाई नहीं कर सकता, और यदि हम में यह कार्य अकेला अनुग्रह करता है, तो लोगों को भलाई करने के लिए बुलाना उतना ही व्यर्थ है जितना किसी अन्धे से कहना कि देख। फिर भी अगस्तीन लगभग यही बात कहता है: "लोग केवल मसीह के अनुग्रह से बुराई से छुड़ाए जाते हैं। इसके बिना वे कुछ भी भला नहीं करते, चाहे सोचकर, इच्छा करके, प्रेम करके या कर्म करके" (अध्याय 2)। वह यह भी कहता है, "मानव इच्छा अपनी स्वतन्त्रता से अनुग्रह नहीं पाती, परन्तु अनुग्रह से स्वतन्त्रता पाती है" (अध्याय 8)। आगे अगस्तीन पुष्टि करता है, "परमेश्वर भीतर है, जो हृदयों को रोकता है, उन्हें चलाता है, और मनुष्यों को उनकी उन इच्छाओं के द्वारा खींचता है जो उसने उन में उत्पन्न की हैं" (अध्याय 14)।
फिर पिगियस दावा करता है कि अगस्तीन दिखाता है कि ताड़ना को ग्रहण करना प्रत्येक व्यक्ति की सामर्थ्य में है। यह अगस्तीन के शब्दों की पूरी तरह ग़लत व्याख्या है। अगस्तीन बार-बार स्पष्ट करता है कि ताड़ना से कोई भी लाभ केवल परमेश्वर पर निर्भर है। वह लिखता है, "मनुष्य को ताड़ना से तभी लाभ होता है जब परमेश्वर, जो ताड़ना के बिना भी भला कर सकता है, दया करके उसकी सहायता करता है" (अध्याय 5)। और, "दण्ड के योग्य भीड़ को ताड़ना दी जानी चाहिए, ताकि परमेश्वर भीतर से कार्य करे, चाहे ताड़ना बाहर से सुनी जाए" (अध्याय 6)। वह यह भी कहता है, "जब लोग ताड़ना का उत्तर देते और धार्मिकता की ओर लौटते हैं, तो उनके हृदयों में यह कौन करता है? केवल परमेश्वर, जो बढ़ाता है" (अध्याय 14)।
अगस्तीन निष्कर्ष देता है, "हमारे लिए, जो नहीं जान सकते कि कौन पूर्वनियत है, हमें सब को ताड़ना देनी चाहिए ताकि वे नाश न हों और दूसरों को न भटकाएँ। परन्तु केवल परमेश्वर ही इसे उनके लिए लाभदायक बनाता है जिन्हें उसने अपने पुत्र के स्वरूप में ढलने के लिए पूर्वनियत किया है" (अध्याय 16)। इस प्रकार अगस्तीन स्पष्ट करता है कि हृदय को फिरानेवाला केवल परमेश्वर है, यद्यपि प्रबोधन साधन के रूप में काम आ सकते हैं। इस सब में अगस्तीन की स्थिति हमारी शिक्षा से पूर्ण सहमति में बनी रहती है: जबकि हम ताड़ना देते हैं, उसकी वास्तविक सामर्थ्य पूरी तरह परमेश्वर के सर्वसत्ताधारी कार्य में है।
पिगियस स्वीकार करता है, यद्यपि बाद में स्वयं का खण्डन करता है, कि अगस्तीन यह सिखाता है: परिवर्तन, भलाई में वृद्धि, और अन्त तक स्थिर रहना, सब पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह के दान हैं, और यह अनुग्रह सब को नहीं दिया जाता। अगस्तीन तर्क देता है कि ये बातें केवल परमेश्वर की इच्छा से दी जाती हैं और मानवीय प्रयास या अभिलाषा से प्राप्त नहीं की जा सकतीं। यद्यपि पिगियस यह मानता है, फिर भी वह अगस्तीन के अर्थ को तोड़ने का प्रयत्न करता है, और दावा करता है कि परिवर्तन और अन्त तक स्थिर रहना, यद्यपि परमेश्वर के दान हैं, फिर भी किसी न किसी रूप में किसी व्यक्ति के पहले के स्वतन्त्र चुनाव का प्रतिफल हैं। ऐसा करके वह खुले रूप में अगस्तीन से असहमत होता है। पिगियस सोचता है कि वह कुछ चतुर शब्दों से इन खिंचावों को सुलझा सकता है, परन्तु स्पष्ट बुद्धि रखनेवाला कोई भी उसके तर्क की असंगति को पहचान लेगा।
मैंने अगस्तीन के ये शब्द भी उद्धृत किए: "अन्त तक स्थिर रहने का अनुग्रह आदम को दिया जाता यदि वह उसे चुनता; वह हमें इसलिए दिया जाता है कि हम चुनें और अपनी इच्छा से अपनी पापमय अभिलाषाओं पर जय पाएँ। आदम में चुनने की सामर्थ्य थी, यद्यपि उसे समर्थ बनानेवाली इच्छा नहीं थी; हमें इच्छा और सामर्थ्य दोनों दिए गए हैं।" यहाँ अगस्तीन एक भेद करता है: आदम की स्वतन्त्रता पाप न करने की सामर्थ्य थी, जबकि मसीह में हमारी स्वतन्त्रता उससे बड़ी है, क्योंकि हमें पाप पर जय पाने की इच्छा और सामर्थ्य दोनों दिए गए हैं। तब पिगियस मुझ पर दोष लगाता है कि मैंने इसे सन्तों के वर्तमान जीवन पर ग़लत लागू किया है, और दावा करता है कि यह केवल पुनरुत्थान के बाद की सिद्ध दशा पर लागू होता है।
मैं इससे इनकार नहीं करता कि अगस्तीन जिस पूर्ण स्वतन्त्रता का वर्णन करता है वह पुनरुत्थान के बाद ही सिद्ध होगी। फिर भी अगस्तीन का स्पष्ट अर्थ यह है कि इस स्वतन्त्रता के आरम्भ आज भी सन्तों के जीवन में जड़ पकड़ चुके हैं। यह तब स्पष्ट होता है जब अगस्तीन लिखता है कि दृढ़ बने रहने की वह शक्ति जो अब पवित्र स्वर्गदूतों को उनकी विश्वासयोग्यता के प्रतिफल के रूप में दी गई है, मानवजाति की भी होती यदि आदम आज्ञाकारी बना रहता। परन्तु उसके पतन के कारण हम अब इस दान को अनुग्रह के रूप में पाते हैं, प्रतिफल के रूप में नहीं।
इसके अतिरिक्त अगस्तीन समझाता है कि परमेश्वर का अनुग्रह हमें न केवल भलाई की अभिलाषा करने, परन्तु उसमें बने रहने में भी समर्थ बनाता है। वह "पाप न कर सकने की सामर्थ्य" और "पाप कर न सकने" के बीच, तथा "न मर सकने की सामर्थ्य" और "मर न सकने" के बीच भेद करता है। अगस्तीन तर्क देता है कि हमें एक बड़ा अनुग्रह दिया गया है, केवल हमारी स्वतन्त्रता को पुनः स्थापित करने के लिए नहीं, परन्तु हम में चुनने और भलाई में बने रहने की इच्छा उत्पन्न करने के लिए भी। यह परिवर्तन एक दान है, जो यहाँ और अभी हम में परमेश्वर का कार्य दिखाता है, जैसा वह महिमा में पूरी रीति से प्रकट होगा।
अगस्तीन के शब्दों में हमारी वर्तमान स्वतन्त्रता और भावी आशा परमेश्वर के दान हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि हमारी इच्छा, यद्यपि सक्रिय है, केवल परमेश्वर के अनुग्रह से समर्थ बनाई और सम्भाली जाती है।
पिगियस प्रश्न उठाता है कि पूर्ण स्वतन्त्रता का वर्णन करते समय अगस्तीन भविष्यकाल का प्रयोग क्यों करता है। अगस्तीन का उत्तर स्पष्ट है: इस जीवन में हम केवल वह आंशिक स्वतन्त्रता अनुभव करते हैं जो नया जन्म होने से मिलती है, परन्तु पाप से पूरी मुक्ति की परिपूर्णता पुनरुत्थान के लिए रखी है। अगस्तीन समझाता है, "पहला मनुष्य स्वतन्त्र इच्छा के साथ, बिना पाप के रचा गया, फिर भी उसने अपने आप को पाप का दास बना लिया। परन्तु मसीह के द्वारा, जिसने कहा, 'यदि पुत्र तुम्हें स्वतन्त्र करेगा तो तुम सचमुच स्वतन्त्र हो जाओगे,' हमारी इच्छा, जो पहले पाप की दास थी, अब स्वतन्त्र की गई है। हम इस जीवन में पाप के विरुद्ध लड़ते हैं, परन्तु अब हम उससे ऐसे दासों की रीति से नहीं बँधे जो मृत्यु की ओर ले जाते हैं" (अध्याय 12)। इसलिए जब अगस्तीन ऐसे समय की बात करता है जब हम पाप करने में असमर्थ "हो जाएँगे", तो वह स्वतन्त्रता की उस अन्तिम दशा की ओर संकेत करता है जो पुनरुत्थान के बाद मसीह के राज्य में पूरी रीति से प्रकट होगी।
पिगियस हठ करता है कि मैं किसी को भी अगस्तीन के स्वतन्त्रता सम्बन्धी कथन की व्याख्या पुनरुत्थान के बाद की हमारी सिद्ध दशा से सम्बन्धित बताने की अनुमति नहीं देता। परन्तु यह ग़लत है। यद्यपि स्वतन्त्रता की परिपूर्णता महिमा में हमारी प्रतीक्षा करती है, अगस्तीन स्पष्ट कहता है कि नया जन्म देनेवाला अनुग्रह अब भी सक्रिय है।
इस विषय में किसी भी सन्देह को दूर करने के लिए मैंने अगस्तीन के शब्द उद्धृत किए। अगस्तीन कहता है, "सन्तों की इच्छाएँ पवित्र आत्मा से इस प्रकार प्रेरित की जाती हैं कि वे इसलिए कर्म कर सकते हैं कि वे वैसी इच्छा करते हैं, और वे इसलिए इच्छा करते हैं कि परमेश्वर उनमें इच्छा करने का प्रभाव डालता है। ईश्वरीय अनुग्रह उनकी दुर्बल इच्छाओं को सम्भालता है, और उन्हें स्थिरता देता है ताकि वे उससे फिर न जाएँ या अपने आप को उससे अलग न कर लें।" पिगियस मेरे हवाले का उपहास करता है, और जताता है कि वह असंगत है। फिर भी अगस्तीन यहाँ एक सटीक भेद करता है जो हमारी वर्तमान आत्मिक सहायता और भावी आशा को सम्बोधित करता है।
अगस्तीन दो प्रकार की ईश्वरीय सहायता की चर्चा करता है। पहली, वह आदम को दी गई सहायता का वर्णन करता है, जिसने उसे स्थिर रहने में समर्थ किया परन्तु वैसा करने के लिए उसे विवश नहीं किया। आदम को ठीक चुनने की सामर्थ्य दी गई थी, परन्तु उसमें स्थिर रहने की टिकाऊ शक्ति नहीं थी। इसके विपरीत अगस्तीन समझाता है कि सन्त, जो मसीह के राज्य के लिए नियत हैं, अधिक प्रभावशाली अनुग्रह पाते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह अब केवल स्थिर रहने में सहायता नहीं करता, परन्तु उसे सुनिश्चित भी करता है। यीशु ने घोषणा की, "मुझ से अलग होकर तुम कुछ नहीं कर सकते" और "तुम ने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हें चुना और ठहराया कि तुम फल लाओ और तुम्हारा फल बना रहे।" इससे प्रकट होता है कि परमेश्वर उद्धार के लिए आवश्यक धार्मिकता ही नहीं, परन्तु उसे बनाए रखने के लिए अन्त तक स्थिर रहने का दान भी देता है।
इस प्रकार अगस्तीन पुष्टि करता है कि विश्वासियों का अन्त तक स्थिर रहना परमेश्वर के अनुग्रह से सुनिश्चित है। मसीह में हमें केवल टिके रहने की सम्भावना ही नहीं दी जाती, परन्तु हम इस प्रकार सम्भाले जाते हैं कि अन्ततः गिर नहीं सकते। अगस्तीन की शिक्षा स्पष्ट है: परमेश्वर का अनुग्रह विश्वास में हमारी यात्रा को आरम्भ करता है, उसे सम्भालता है और पूरा करता है, और अन्त तक हमारे स्थिर रहने का आश्वासन देता है।
मैं पूछता हूँ, कौन इससे इनकार कर सकता है कि अगस्तीन की शिक्षाएँ उससे निकट मेल खाती हैं जो मैंने समझाया है, यद्यपि वह भिन्न शब्दों का प्रयोग करता है? उन धारणाओं को अलग करने का प्रयत्न करके, जिन्हें अगस्तीन इतनी दृढ़ता से जोड़ता है, पिगियस को क्या लाभ हो सकता है? अगस्तीन स्पष्ट सिखाता है कि परमेश्वर का अनुग्रह हमें केवल विश्वास करने में समर्थ ही नहीं बनाता, परन्तु विश्वास करने की इच्छा भी देता है। उसका अनुग्रह केवल हमें विश्वास रखने का अवसर या उसे थामे रहने की सम्भावना देने में ही प्रभावी नहीं है; वह वास्तव में सुनिश्चित करता है कि हम विश्वास करें और स्थिर रहें। वह हमें जो भला है उससे चिपके रहने की अटल इच्छा और उसे न छोड़ने का दृढ़ संकल्प देता है।
फिर भी पिगियस इसे विकृत रूप में प्रस्तुत करता है। वह हठ करता है कि अगस्तीन केवल इतना कह रहा है कि हमें इस सीमा तक "सहायता" मिलती है कि यदि हम स्वयं को निराश न करें तो विजय निश्चित है। उसके मत में हम नरक का सामना कर सकते और शैतान की शक्ति का विरोध कर सकते हैं, जब तक हम भ्रष्टता या लापरवाही में न गिरें। परन्तु यदि चुने हुओं में से कोई फिर जाए, अनुग्रह की उपेक्षा करे, या दुर्बलता के कारण उसे खो दे, तो उस अनुग्रह का क्या होगा जिसकी चर्चा अगस्तीन करता है, जो हमें अडिग संकल्प के साथ सुरक्षित करता है? अगस्तीन सिखाता है कि अनुग्रह हमें केवल विश्वास करने की सामर्थ्य ही नहीं देता, वरन् हमें वास्तव में विश्वासी बनाता है। वह केवल हमें अन्त तक स्थिर रहने का प्रस्ताव नहीं देता, परन्तु हम में ऐसी स्थिरता उत्पन्न करता है जो हमें स्थिर रहने को विवश करती है। अगस्तीन भलाई को थामे रहने की एक "अजेय इच्छा" और न छोड़नेवाली एक "अजेय स्थिरता" की बात करता है।
फिर भी पिगियस इस सब को ऊँचे स्वर के भ्रान्त आत्मविश्वास के साथ ठुकरा देता है, और दावा करता है कि अगस्तीन स्पष्टतः मेरा खण्डन करता है। वह यह देखने से इनकार करता है कि अगस्तीन के शब्द मेरी शिक्षा से सहमत हैं: अनुग्रह कोई ऐसा मात्र प्रस्ताव नहीं जो हमारी इच्छा को उसी के भरोसे छोड़ दे, परन्तु एक सामर्थी बल है जो विश्वास में हमारे स्थिर रहने को बदलता, सम्भालता और सुनिश्चित करता है।
अन्त में, पिगियस की रचना दस पुस्तकों में बँटी है: पहली छह मानव स्वतन्त्र इच्छा की चर्चा करती हैं, और शेष चार परमेश्वर की पूर्वनियति और विधान को लेती हैं। चूँकि ये भिन्न विषय हैं, इसलिए मैंने अब तक सीमित समय में अपनी पूरी सामर्थ्य से स्वतन्त्र इच्छा के प्रश्न को ही सम्बोधित करने पर ध्यान दिया है। मैं पूर्वनियति और विधान के विषयों को बाद में सम्बोधित करने की योजना रखता हूँ, क्योंकि कोई जल्दी नहीं है, और जब वह प्रकाशित होगा, यदि प्रभु की इच्छा हो, तो सावधानी से किया गया विवेचन अधिक लाभदायक होगा।
फिर भी मुझे चिन्ता थी कि यदि मैं बहुत देर तक चुप रहा, तो पिगियस अपनी सामान्य चमकदार वाक्पटुता से कुछ पाठकों को भटका सकता है। इसलिए मैंने इस भाग को पूर्वावलोकन के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया, कि उसके घमण्ड को शान्त करूँ और भक्त जनों को प्रोत्साहित करूँ। वे देखें कि पिगियस के आक्रमणों के बल के बीच भी परमेश्वर का सत्य अपराजित रहता है, और वे अपने विश्वास में दृढ़ किए जाएँ।
